शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

युवाओं का पलायन,गांव खाली


युवाओं का पलायन,गांव खाली

नन्दन बिष्ट
उत्तराखंड राज्य का सत्तर प्रतिशत भाग पर्वतीय है, 80 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में निवास करती है। पर्वतीय भूभाग में अधिकांश कृषि भूमि विखरी हुई तथा सीढ़ीनुमा खेतों पर की जाती है। बिखरे खेतों के कारण यहां का किसान खेतों पर खेती नहीं कर पाता है। जिससे अधिकांश भूमि बजंर होती नजर आ रही है। कृषि की ठोस नीति न होने के कारण युवाओं में पलायन का बुखार चढ़ा हुआ है जिससे आए दिन गांव के गांव खाली होते जा रहे है। यदि सरकार द्वारा गंभीरता से कृषि पर पहाड़ को ठोस नीति बनाकर आत्मर्भिर नहीं बनाया जाता है तो गांव के गांव खाली होते जाएंगें और पहाड़ पर पलायन के कारण गंभीर संकट के बादल छा सकते हैं।
उत्तराखंड राज्य को बने 14 साल हो गए हैं लेकिन आई गई सरकारों द्वारा कृषि पर कोई ठोस नीति तैयार नहीं की गई। हांलाकि उत्तराखंड बनने के बाद भूमि सुधार व चकबंदी की बातें तो की गई तथा भूमि सुधार को लेकर उच्च स्तरीय समिति का गठन भी किया गया था लेकिन इस दिशा में कोई ठोस नीति नहींे बन पाई। हांलाकि 2004 में सरकार ने चकबंदी एवं भमि सुधार का गठन भी किया गया था लेकिन उस पर भी कोई अमल नहींे हो पाया। उत्तराखंड राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में छितरी खेती होने के कारण किसानों को कई समस्याओं से जूझना पड़ता है। एक ही स्थान पर खेती न होने से किसानों को कृषि करने का लाभ नहीं मिल पाता है। हमारा पड़ोसी राज्य शिमला में किसानों के लिए ठोस नीति बनी हुई है ओर चकबंदी से किसानों को काफी लाभ पहुंचा है। अधिकत्तर लोग खेती पर ही निर्भर हैं और उत्तराखंड की तरह पलायन की मार नहीं झेल रहा है। उत्तराखंड के विकास में यदि हम बाधा की बात करते हैं तो सबसे बड़ी बाधा चकबंदी न होना है। यदि उत्तराखंड में कृषि बागवानी की ठोस नीति बनाकर चकबंदी के माध्यम से किसानों को जागरूक किया जाता है तो हम विकास की बात कर सकते है। अन्यथा विकास की बात करना नामुमकिन है। पूरा पहाड़ आज अनाज व बागवानी के लिए मैदानी भाग पर निर्भर है। यहां पर कृषि बागवानी, जड़ी-बूटी, कृषि आधारित लघु उद्योग के साथ ही पशुपालन की योजनाओं के लिए ठोस नीति होनी चाहिए तथा प्रत्येक किसान को सरकार की लाभकारी योजनाओं से सीधे-सीधे जोड़ देना होगा तभी हम पहाड़ के विकास की बात कर सकते हैं। यदि आज हम छितरी हुई कृषि योग्य भूमि को चकबंदी कराकर कृषि व बागवानी के क्षेत्र में विकसित करने में कामयाब हो सके तो पलायन पर अंकुश तो लगेगा ही साथ ही जैविक उत्पादन को बढा़वा देकर कृषि के क्षेत्र में नया आयाम पैदा कर सकते हैं। सरकार को गंभीर होर इस विषय पर पहल करनी होगी।यूं तो उत्तराखंड राज्य बने 14 साल हो गए हैं लेकिन अभी तक भी इस राज्य का अपना भूमि सुधार कानून नहीं बन पाया है। रानैतिक दल तो अपनी रोटी सेंकने के जुगत में लगे रहते हैं लेकिन किसी का ध्यान भी उत्तराखंड के भूमि सुधार कानून को बनाने में नहीं गया। सभी राज्यों का अपना-अपना भूमि सुधार कानून है लेकिन हम आज भी उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार कानून पर ही टिके हैं। हांलाकि 1960 में उत्तर प्रदेश में रहते हुए कुमाउं उत्तराखंड जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार कानून ;कूजा एक्टद्ध लागू हुआ है। लेकिन इस पर भी कोई अमल नहीं हो रहा है। हांलाकि तत्कालीन इस कानून से पहाड़ और मैदानी के लिए अलग-अलग भूमि सुधार कानून लागू है। पहाड़ का दुर्भाग्य ही कहें या भौगोलिक संरचना से आए दिन प्राकृतिक आपदाओं ने समय-समय पर झकझोरा है। पहाड़ के कई गांव आज भी पर्नवास की वाट जोह रहे हैं और आपदाओं के कारण विकास में बाधक पहुंची है लेकिन आपदाओं के कारण ही हम कृषि नीति व भूमि सुधार पर काम नहीं कर पा रहे हैं यह सोचना गलत है। हमें यदि पहाड़ का विकास चाहिए तो सरकार को कृषि आधारित एक ठोस नीति को बनाना होगा और पलायन के इस दंश को रोकना चाहें तो चकबंदी जैसे कानून पर कार्य करना होगा। आज जरूरत है तो राज्य में कृषि आधारित उद्योगों को लगाने की पहाड़ के कच्चे माल पर शोध कर छोटे-छोटे लघुउद्यम लगाने की ताकि युवाओं को यहीं पर रोजगार मिल सके और युवा राज्य के विकास में योगदान दे सके। हालांकि पहाड़ में कुछ लोगों ने चकबंदी का प्रयास भी किया है ओर सफलता भी मिली है। लेकिन इस पर सरकार ने अभी तक ठोस कार्य नहीं किया है।

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