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शुक्रवार, 28 अगस्त 2026
udaydinmaan: उत्तराखंड के सियासी मैदान में ‘बयानवीर’
udaydinmaan: उत्तराखंड के सियासी मैदान में ‘बयानवीर’: चुनाव की आहट मिलते ही बंद कमरों की बैठकों से निकलकर सार्वजनिक मंचों पर छाने की होड़ सबसे मुखर चेहरा बनने की रेस में विपक्षी दलों के साथ ही पा...
उत्तराखंड के सियासी मैदान में ‘बयानवीर’
चुनाव की आहट मिलते ही बंद कमरों की बैठकों से निकलकर सार्वजनिक मंचों पर छाने की होड़
सबसे मुखर चेहरा बनने की रेस में विपक्षी दलों के साथ ही पार्टी की रणनीति पर उठ रहे सवाल
ोत्रीय दबदबा कायम रखने के लिए बयानबाजी बन गई है सियासी संदेश देने का सबसे बड़ा हथियार
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही सियासी मैदान में बयानवीरों की सक्रियता बढ़ गई है, जिन नेताओं की आवाज लंबे समय से संगठनात्मक बैठकों या सीमित राजनीतिक मंचों तक सुनाई दे रही थी, वह अब सार्वजनिक मंचों, प्रेस कांफ्रेंस और सोशल मीडिया पर लगातार नजर आने लगे हैं। कोई अपनी ही पार्टी की रणनीति पर सवाल उठा रहा है तो कोई विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोलकर खुद को सबसे मुखर चेहरा साबित करने में जुटा है। चुनाव अभी कुछ दूर है, लेकिन राजनीतिक तापमान तेजी से बढ़ रहा है। टिकट की दावेदारी, संगठन में जगह, राजनीतिक भविष्य और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर नेताओं के बीच अंदरूनी खींचतान भी अब धीरे-धीरे सार्वजनिक होती दिख रही है। बयान अब केवल विपक्ष पर हमला करने का हथियार नहीं रह गए हैं, बल्कि कई बार अपनी ही पार्टी के भीतर संदेश देने का माध्यम भी बन रहे हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में चुनाव से पहले नेताओं का मुखर होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार सोशल मीडिया ने बयानबाजी को और धार दे दी है। सुबह दिया गया बयान दोपहर तक वायरल हो जाता है और शाम तक उस पर पार्टी के भीतर और बाहर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो जाता है। ऐसे में कई नेता शायद यह भी समझने लगे हैं कि राजनीतिक चर्चा में बने रहने का सबसे आसान रास्ता बयान देना है। विधानसभा चुनाव के करीब आते ही संभावित दावेदारों की सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक है। हर सीट पर कई चेहरे अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में नेताओं के लिए सिर्फ जनता के बीच जाना ही पर्याप्त नहीं रह गया है। उन्हें पार्टी नेतृत्व की नजर में भी अपनी उपयोगिता साबित करनी है। यहीं से बयानबाजी का खेल शुरू होता है।
किसी नेता का बयान अपनी ही सरकार या संगठन की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है तो किसी दूसरे नेता का बयान सीधे पार्टी के भीतर चल रही खींचतान की ओर इशारा करता है। कई बार नेता किसी मुद्दे पर पार्टी लाइन से अलग राय रखते हुए दिखाई देते हैं। इसे कोई जनहित की आवाज बताता है तो कोई टिकट की राजनीति का हिस्सा। राजनीति में धारणा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना संगठन। इसलिए हर बयान के पीछे राजनीतिक संदेश तलाशा जाने लगा है।
चुनाव के समय विपक्ष पर हमला करना राजनीति का सामान्य हिस्सा है। भाजपा के नेता कांग्रेस को निशाने पर ले रहे हैं तो कांग्रेस नेता भाजपा सरकार की नीतियों और कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं। क्षेत्रीय दल भी अपनी जमीन तलाशने में जुटे हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कई बयान विपक्ष से ज्यादा अपनी पार्टी के भीतर चर्चा पैदा कर रहे हैं। नेता जब अपनी ही पार्टी के किसी फैसले पर सवाल उठाता है तो उसका निशाना वास्तव में कौन हैकृयह सवाल राजनीतिक गलियारों में घूमने लगता है। बयान देने वाला नेता भले ही इसे जनभावना की आवाज बताए, लेकिन पार्टी के भीतर इसे टिकट, पद या प्रभाव की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। यानी बयान विपक्ष के लिए हो सकता है, लेकिन संदेश अक्सर अपनों के लिए होता है।
पहले नेता बयान देते थे तो अगले दिन अखबारों में उसकी खबर आती थी। अब तस्वीर कुछ अलग है। सोशल मीडिया ने हर नेता को अपना छोटा सा मीडिया प्लेटफार्म दे दिया है। एक वीडियो, एक पोस्ट या कुछ पंक्तियों का बयान राजनीतिक बहस को जन्म देने के लिए काफी है। यही वजह है कि नेता अब मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने में देर नहीं करना चाहते। कोई घटना हुई नहीं कि बयान तैयार। विपक्ष ने कुछ कहा नहीं कि पलटवार तैयार। पार्टी ने कोई फैसला किया नहीं कि समर्थन या विरोध का संदेश तैयार। राजनीति में सक्रियता जरूरी है, लेकिन लगातार बयान देने की होड़ ने कई बार मुद्दे की गंभीरता को पीछे छोड़ दिया है।
चुनावी राजनीति में बयान महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन आखिरकार जनता के सामने सवाल काम का ही आता है। उत्तराखंड का मतदाता रोजगार, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई, आपदा और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर जवाब चाहता है। ऐसे में बयानवीरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपनी बयानबाजी को जनसरोकार से कितना जोड़ पाते हैं। सिर्फ यह बताना आसान है कि विपक्ष गलत है। यह बताना भी आसान है कि अपनी पार्टी में सब ठीक नहीं है। मुश्किल यह बताना है कि अगर जनता ने मौका दिया तो समाधान क्या होगा।
उत्तराखंड में 2027 की चुनावी पिच तैयार होने लगी है। राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं, संभावित प्रत्याशी अपनी जमीन नाप रहे हैं और नेता अपनी राजनीतिक हैसियत का आकलन कर रहे हैं। इसी बीच बयानवीरों की बढ़ती सक्रियता यह संकेत दे रही है कि आने वाले महीनों में सियासी शोर और बढ़ने वाला है। अब देखना यह होगा कि इन बयानों में कितने वास्तव में जनता के मुद्दे उठाते हैं और कितने टिकट की कतार में अपनी जगह बनाने की कवायद साबित होते हैं। क्योंकि चुनाव में बयान सुर्खियां तो बना सकते हैं, लेकिन वोटर के मन में जगह बनाने के लिए सिर्फ बयान काफी नहीं होते। आखिरकार माइक नेता के हाथ में होता है, लेकिन फैसला जनता के हाथ में।
उत्तराखंड में वोटर लिस्ट का ‘धर्मयुद्ध’
एसआईआर प्रक्रिया पर सियासत गर्म, संस्थाओं की शुचिता बनाम राजनीतिक नफा-नुकसान
प्रक्रिया पर सवाल उठाना हक, लेकिन क्या कागजों और तथ्यों के साथ मैदान में है विपक्ष
हर पात्र को मिले मताधिकार, पर राजनीतिक बयानबाजी से न बिगड़े संस्थागत व्यवस्था
कटघरे में खड़ा करने के बजाय संस्थागत प्रक्रिया और नियम-प्रमाण से निपटे विवाद
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासत लगातार गरमा रही है। कांग्रेस जहां प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी का सवाल उठाते हुए निर्वाचन आयोग के सामने अपनी आपत्तियां दर्ज करा रही है, वहीं भाजपा कांग्रेस पर एसआईआर की संवैधानिक प्रक्रिया में बाधा डालने का आरोप लगा रही है। मुद्दा अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल भी उठने लगा है कि चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक दल संवैधानिक संस्थाओं की प्रक्रिया को किस नजरिये से देखते हैं। लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुचिता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी यह भी है कि उस प्रक्रिया को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय नियम और प्रमाण के आधार पर परखा जाए।
कांग्रेस को यदि एसआईआर में किसी स्तर पर गड़बड़ी दिखाई दे रही है तो उसे तथ्यों और दस्तावेजों के साथ निर्वाचन आयोग के सामने रखना चाहिए। किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है तो उसका विवरण सामने आना चाहिए। किसी पात्र व्यक्ति को सूची से बाहर किया गया है तो उसकी शिकायत का समाधान कराने के लिए संस्थागत रास्ता अपनाया जाना चाहिए। यही जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि केवल आशंकाओं के आधार पर पूरी प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर देना लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा कर सकता है।
उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया प्रशासनिक स्तर पर चल रही है और जिला प्रशासन की वेबसाइटों पर भी इससे संबंधित सूचनाएं, बैठकें और प्रशिक्षण संबंधी विवरण सार्वजनिक किए जा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी लड़ाई फर्जी मतदाताओं के खिलाफ है या वैध मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए। दोनों के बीच फर्क करना बेहद जरूरी है। अगर किसी व्यक्ति का नाम दो जगह है, व्यक्ति का निधन हो चुका है, वह स्थायी रूप से कहीं और चला गया है या मतदाता सूची में उसका नाम नियमों के विपरीत दर्ज है, तो उसका सत्यापन होना चाहिए। लेकिन इसी प्रक्रिया में किसी वास्तविक मतदाता का नाम केवल राजनीतिक पहचान, धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर प्रभावित होता है तो उसका विरोध भी उतनी ही मजबूती से होना चाहिए। यही लोकतंत्र का संतुलन है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह एसआईआर के मुद्दे को तुष्टिकरण बनाम ध्रुवीकरण की राजनीति में फंसने से बचाए। चुनावी राजनीति में हर दल अपने वोट बैंक की चिंता करता है, लेकिन मतदाता सूची किसी दल का वोट बैंक नहीं होती। वह लोकतंत्र की बुनियादी सूची है। कांग्रेस यदि वास्तव में मतदाता अधिकारों को लेकर गंभीर है तो उसे बूथ स्तर तक अपने प्रतिनिधियों को सक्रिय करना चाहिए। एक-एक आपत्ति की जांच करानी चाहिए और जहां गलती मिले, वहां निर्वाचन आयोग से सुधार की मांग करनी चाहिए। इससे उसका पक्ष भी मजबूत होगा और जनता के बीच यह संदेश भी जाएगा कि पार्टी चुनावी लाभ से ज्यादा चुनावी प्रक्रिया की शुचिता को महत्व देती है।
भाजपा के लिए भी यह सवाल कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि वह एसआईआर को लेकर कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो। किसी भी पात्र मतदाता का नाम न कटे और किसी भी अपात्र नाम को राजनीतिक संरक्षण न मिले। केवल कांग्रेस के विरोध को राजनीतिक मुद्दा बनाने से ज्यादा जरूरी है कि भाजपा भी निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता के पक्ष में खड़ी दिखाई दे।
दरअसल, चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव तभी बन सकता है जब मतदाता सूची पर जनता का भरोसा कायम रहे। एसआईआर किसी राजनीतिक दल की जीत या हार का औजार नहीं हो सकता। यह निर्वाचन व्यवस्था की एक प्रक्रिया है। इसलिए कांग्रेस को विरोध करना है तो करे, सवाल पूछने हैं तो पूछे, शिकायत करनी है तो करेकृलेकिन हर सवाल तथ्य और प्रमाण के साथ होना चाहिए। इसी तरह सत्ता पक्ष को भी विपक्ष की हर आपत्ति को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज करने के बजाय गंभीरता से जांच की मांग करनी चाहिए। उत्तराखंड चुनावी मोड में प्रवेश कर चुका है। ऐसे समय में राजनीतिक दलों के सामने असली परीक्षा भाषणों की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उनके व्यवहार की है।
कांग्रेस के लिए यह मौका है कि वह तुष्टिकरण की राजनीति के आरोपों से बाहर निकलकर एक जिम्मेदार और तथ्याधारित विपक्ष की भूमिका निभाए। उसे यह साबित करना होगा कि उसकी चिंता किसी खास समुदाय के वोटों को बचाने की नहीं, बल्कि हर पात्र नागरिक के मताधिकार को सुरक्षित रखने की है। क्योंकि लोकतंत्र में एक गलत नाम भी समस्या है और एक सही नाम का गलत तरीके से कटना भी उतनी ही बड़ी समस्या। इसलिए एसआईआर पर सियासत की जगह संविधान, कानून और तथ्य को केंद्र में रखने की जरूरत है। चुनाव आएंगे और जाएंगे, सरकारें बदलेंगी, विपक्ष सत्ता में आएगाकृलेकिन मतदाता सूची की विश्वसनीयता कमजोर हुई तो नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।
भाजपा का ‘आपरेशन विस्तार’ पर फोकस
छोटे दलों से बड़े चेहरों तक साध रही सियासी बिसात
संगठन मजबूत करने के साथ विपक्ष में सेंधमारी पर जोर
2027 की हैट्रिक के लिए मैदान तैयार कर रही भाजपा
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले ही अभी दूर हो, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी तैयारियों को रफ्तार दे दी है। इनमें भारतीय जनता पार्टी सबसे आगे दिखाई दे रही है। पार्टी चुनाव की घोषणा का इंतजार करने के बजाय पहले से ही ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार करने में जुटी है, जिसमें संगठन की ताकत, सामाजिक समीकरण और विपक्ष की कमजोरीकृतीनों एक साथ दिखाई दें। छोटे राजनीतिक दलों को अपने साथ मिलाने से लेकर दूसरे दलों के प्रभावशाली नेताओं को भाजपा की सदस्यता दिलाने तक, पार्टी का आपरेशन विस्तार लगातार जारी है।
भाजपा की रणनीति को केवल दल-बदल तक सीमित करके देखना शायद सही नहीं होगा। इसके पीछे 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की व्यापक चुनावी रणनीति दिखाई दे रही है। पार्टी का लक्ष्य है कि चुनाव की घोषणा होने तक संगठनात्मक स्तर पर वह इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच जाए कि विपक्ष को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर होना पड़े। उत्तराखंड की राजनीति में कई छोटे राजनीतिक दल और क्षेत्रीय संगठन भले ही विधानसभा चुनाव में निर्णायक संख्या में सीटें न जीत पाते हों, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में उनकी पकड़ रहती है। भाजपा अब ऐसे संगठनों को अपने साथ जोड़कर चुनावी समीकरणों को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
हालिया दौर में गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का भाजपा में विलय भी इसी रणनीति की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा के लिए ऐसे संगठनों का साथ आना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पार्टी को केवल सदस्य नहीं मिलते, बल्कि उनके साथ जुड़े स्थानीय कार्यकर्ता, समर्थक और सामाजिक नेटवर्क भी भाजपा के संगठन का हिस्सा बनते हैं। यानी भाजपा की नजर केवल संख्या पर नहीं, सामाजिक पहुंच के विस्तार पर भी है। भाजपा की दूसरी रणनीति विपक्षी दलों के प्रभावशाली नेताओं को अपने पाले में लाने की है। उत्तराखंड की राजनीति में नेताओं का दल बदलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन चुनाव से करीब एक साल पहले होने वाली ऐसी राजनीतिक गतिविधियों का असर कहीं ज्यादा होता है।
किसी बड़े नेता के भाजपा में आने से पार्टी को तत्काल राजनीतिक प्रचार मिलता है। उसके समर्थकों और स्थानीय प्रभाव का लाभ मिलने की उम्मीद रहती है। इससे विपक्ष के भीतर भी असमंजस पैदा होता है और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि भाजपा ऐसे चेहरों को अपने साथ जोड़ने में कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती, जिनकी अपने क्षेत्र में राजनीतिक पहचान है। भाजपा की चुनावी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका संगठन है। पार्टी पहले ही बूथ स्तर तक चुनावी तैयारियों को मजबूत करने में जुटी है। 70 विधानसभा क्षेत्रों में संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाने, बूथ समितियों को सक्रिय करने और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरणों की समीक्षा का काम चल रहा है। इस रणनीति में नए नेताओं और छोटे दलों का भाजपा में आना अतिरिक्त ताकत के रूप में देखा जा रहा है।
पार्टी की कोशिश साफ हैकृचुनाव की घोषणा होने तक संगठन को चुनावी मोड में पूरी तरह सक्रिय कर दिया जाए। इसके बाद जब आचार संहिता लागू होगी तो राजनीतिक दलों के पास समय सीमित होगा। भाजपा इससे पहले ही अपना राजनीतिक आधार मजबूत करना चाहती है। भाजपा के लगातार विस्तार का सबसे सीधा राजनीतिक असर कांग्रेस पर पड़ना तय माना जा रहा है। कांग्रेस जहां सरकार के खिलाफ मुद्दे तलाश रही है, वहीं भाजपा चुनाव से पहले ही अपना कुनबा बढ़ाने में जुटी है। विपक्ष के सामने चुनौती दोहरी है। एक तरफ उसे भाजपा सरकार के खिलाफ जनता के बीच मुद्दे खड़े करने होंगे, दूसरी ओर अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना होगा।
राजनीति में यह धारणा महत्वपूर्ण होती है कि कौन जीतने की स्थिति में दिखाई दे रहा है। यदि चुनाव से पहले लगातार दूसरे दलों के नेता भाजपा में शामिल होते रहे तो इससे भाजपा के पक्ष में राजनीतिक माहौल बनने का मनोवैज्ञानिक लाभ भी मिल सकता है। कांग्रेस के लिए इसलिए जरूरी होगा कि वह केवल भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं की आलोचना करने तक सीमित न रहे, बल्कि अपने संगठन को भी सक्रिय करे और जनता के बीच अपनी वैकल्पिक राजनीतिक तस्वीर स्पष्ट करे।
भाजपा पहले ही 2027 में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य सार्वजनिक रूप से रख चुकी है। ऐसे में चुनाव से पहले होने वाला हर राजनीतिक घटनाक्रम पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है। भाजपा की रणनीति में एक तरफ उपलब्धियों का प्रचार है तो दूसरी तरफ संगठन विस्तार। एक तरफ बूथ प्रबंधन है तो दूसरी तरफ सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश और इसी के साथ विपक्षी खेमे में सेंधमारी का सिलसिला भी दिखाई दे रहा है। यह रणनीति भाजपा को शुरुआती बढ़त जरूर देती है, लेकिन चुनाव का अंतिम फैसला संगठन विस्तार से नहीं, मतदाता के फैसले से होगा। किसी नेता का भाजपा में शामिल होना उसके क्षेत्र के पूरे वोट बैंक के भाजपा के साथ आने की गारंटी नहीं है। इसी तरह छोटे दल के विलय का अर्थ यह नहीं कि उसका हर समर्थक भाजपा को वोट देगा। असली चुनौती इन राजनीतिक उपलब्धियों को बूथ स्तर के वोट में बदलने की होगी।
उत्तराखंड की राजनीति में फिलहाल यही तस्वीर उभर रही है कि चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले ही भाजपा ने चुनावी मैदान को अपने हिसाब से तैयार करना शुरू कर दिया है। पार्टी छोटे दलों को साथ ला रही है, दूसरे दलों के नेताओं को अपने पाले में कर रही है और संगठन को बूथ स्तर पर मजबूत करने में जुटी है। यानी भाजपा की रणनीति का संदेश साफ हैकृचुनाव की घोषणा बाद में होगी, चुनावी तैयारी पहले पूरी करनी है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल भाजपा के इस आपरेशन विस्तार का जवाब किस रणनीति से देते हैं। क्योंकि उत्तराखंड का 2027 विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता और विपक्ष की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि चुनाव से पहले संगठन, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने में कौन सा दल बाजी मारता है। भाजपा फिलहाल अपनी बिसात बिछा चुकी है। विपक्ष के पास अब उस बिसात को पढ़ने और अपनी चाल चलने का वक्त है।
कुनबा बढ़ाने की ‘होड़’ में वोट बैंक का ‘गणित’
चुनाव नजदीक आते ही सामाजिक वर्गों को साधने की रणनीति तेज
प्रदेश में असरदार गोरखा समाज का मिला उत्तराखंड भाजपा का साथ
पकड़ मजबूत करने की कवायद, कांग्रेस पार्टी की बढ़ गई है चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की चुनावी बिसात बिछने के साथ ही राजनीतिक दलों का कुनबा बढ़ाने और सामाजिक समीकरण साधने का सिलसिला तेज हो गया है। इसी क्रम में गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का भारतीय जनता पार्टी में विलय भाजपा के लिए एक अहम राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। भाजपा इसे संगठन के विस्तार के साथ-साथ गोरखा समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत होने के संकेत के तौर पर देख रही है। भाजपा का संदेश साफ हैकृ2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की तैयारी केवल नारों से नहीं, बल्कि समाज के अलग-अलग वर्गों को साथ जोड़कर की जा रही है। गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का पार्टी में विलय इसी रणनीति की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल उत्तराखंड की राजनीति में गोरखा समाज की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में गोरखा समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति है। ऐसे में किसी राजनीतिक संगठन का भाजपा के साथ आना चुनावी दृष्टि से महज एक संगठन का विलय नहीं, बल्कि सामाजिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। भाजपा इसे अपने लिए इसलिए भी शुभ संकेत मान रही है क्योंकि विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही समय बचा है और पार्टी पहले से ही बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने की कवायद में जुटी है। ऐसे समय में अलग-अलग सामाजिक समूहों और क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों का भाजपा के साथ जुड़ना पार्टी के चुनावी अभियान को मनोवैज्ञानिक बढ़त देने वाला कदम माना जा रहा है।
हालांकि भाजपा के लिए असली परीक्षा अब शुरू होगी। किसी संगठन का विलय कागज पर जितना आसान दिखाई देता है, उसे चुनावी वोट में बदलना उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है। गोरखा समाज के बीच भाजपा को यह साबित करना होगा कि विलय केवल चुनावी गणित का हिस्सा नहीं है, बल्कि समाज से जुड़े मुद्दों और अपेक्षाओं को भी पार्टी के राजनीतिक एजेंडे में पर्याप्त स्थान मिलेगा। यही विपक्ष के लिए भी बड़ा सवाल है। कांग्रेस और दूसरे राजनीतिक दल अब यह आकलन करने में जुटेंगे कि भाजपा के इस कदम का सामाजिक और चुनावी प्रभाव कितना हो सकता है। यदि विपक्ष ने इसे केवल एक राजनीतिक दल के विलय तक सीमित समझा तो भाजपा को इसका फायदा मिल सकता है। लेकिन यदि विपक्ष गोरखा समाज के स्थानीय मुद्दों, युवाओं की अपेक्षाओं, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान को लेकर ठोस रणनीति तैयार करता है तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
भाजपा की रणनीति पिछले कुछ समय से स्पष्ट दिखाई दे रही है। पार्टी एक ओर संगठनात्मक ढांचे को मजबूत कर रही है, दूसरी ओर छोटे राजनीतिक समूहों और प्रभावशाली सामाजिक चेहरों को अपने साथ जोड़ रही है। लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि चुनाव से पहले ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार करना है जिसमें पार्टी का संगठनात्मक आत्मविश्वास दिखाई दे। गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का विलय इसी आत्मविश्वास को और बढ़ाने वाला घटनाक्रम माना जा रहा है। भाजपा इसे 2027 की हैट्रिक के लिए शुभ संकेत बता रही है। लेकिन चुनावी राजनीति में शुभ संकेत तभी परिणाम में बदलते हैं, जब संगठन की सक्रियता और जनता का समर्थन एक साथ दिखाई दे। 2022 में भाजपा ने लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी कर इतिहास बनाया था। अब उसके सामने उस प्रदर्शन को दोहराने के साथ-साथ सत्ता विरोधी माहौल की किसी भी संभावना को रोकने की चुनौती है।
ऐसे में हर राजनीतिक संगठन का साथ आना भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि पार्टी अपने पुराने समर्थकों के साथ नए सामाजिक समूहों को कितना प्रभावी ढंग से जोड़ पाती है। गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट के विलय ने फिलहाल भाजपा के चुनावी खेमे में उत्साह जरूर बढ़ाया है। इसे पार्टी 2027 की राह में एक और सकारात्मक संकेत के तौर पर देख रही है। मगर विपक्ष के लिए भी यह चेतावनी है कि चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन भाजपा ने अपनी चुनावी तैयारी को पहले ही गति दे दी है। अब सवाल यह नहीं कि भाजपा 2027 में हैट्रिक का सपना देख रही है या नहीं। सवाल यह है कि क्या विपक्ष उस सपने को चुनौती देने के लिए समय रहते अपना सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तैयार कर पाएगा? गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का भाजपा में विलय इसी बड़े चुनावी मुकाबले की एक नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
गुरुवार, 27 अगस्त 2026
udaydinmaan: 45 मिनट की ‘खामोशी’ पर सवाल
udaydinmaan: 45 मिनट की ‘खामोशी’ पर सवाल: नेपाली प्रशासन को आपदा की पहली सूचना करीब 9ः 00 बजे मिली यही 45 मिनट का फासला अब नेपाल में तीखे विवाद का केंद्र भी बना सवाल मिनटों का नहीं,अ...
बेरोजगारी और पलायन पर आर-पार
चुनावी रण में रोजगार के सवाल को धार देने की तैयारी
उत्तराखंड के युवा मतदाताओं को साधने में जुटे राहुल गांधी
राहुल का सीधा संवाद, अब बैकफुट से फ्रंटफुट पर आएंगे
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ ही कांग्रेस ने युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ानी शुरू कर दी है। इसी क्रम में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के युवाओं से संवाद का कार्यक्रम प्रदेश की सियासत में नई हलचल पैदा कर सकता है। संवाद के केंद्र में रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएं, भर्ती प्रक्रिया और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दे रहने की संभावना है। उत्तराखंड की राजनीति में युवा मतदाता हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। पहाड़ी राज्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में बेरोजगारी और पलायन शामिल हैं। बड़ी संख्या में युवा रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में प्रदेश से बाहर जाते हैं। ऐसे में चुनाव से पहले युवाओं के बीच पहुंचना किसी भी राजनीतिक दल के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। राहुल गांधी का युवाओं से संवाद इसी राजनीतिक जरूरत से जोड़कर देखा जा रहा है। कांग्रेस इसे महज एक राजनीतिक कार्यक्रम के बजाय युवाओं की समस्याओं को सीधे सुनने और उनके मुद्दों को चुनावी विमर्श के केंद्र में लाने के प्रयास के रूप में पेश कर सकती है।
उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों की भर्ती, परीक्षाओं में अनियमितता के आरोप और पेपर लीक जैसे मुद्दे पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। कांग्रेस लगातार इन मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधती रही है। राहुल गांधी के संवाद में भी युवाओं से उनके अनुभव जानने और रोजगार के सवाल पर सरकार को घेरने की रणनीति दिखाई दे सकती है। कांग्रेस की कोशिश होगी कि युवाओं के बीच यह संदेश जाए कि पार्टी उनके रोजगार और भविष्य के सवालों को राजनीतिक प्राथमिकता दे रही है। हालांकि, कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ सरकार पर सवाल उठाने की नहीं बल्कि वैकल्पिक रोजगार नीति का स्पष्ट खाका सामने रखने की भी होगी। युवा अब केवल आरोप-प्रत्यारोप सुनने के बजाय यह जानना चाहते हैं कि सत्ता में आने पर राजनीतिक दल उनके लिए क्या करेंगे।
उत्तराखंड में राजनीतिक दलों ने युवा मतदाताओं को लेकर अपनी रणनीति तेज कर दी है। सोशल मीडिया अभियान, युवा सम्मेलन, रोजगार के मुद्दों पर आंदोलन और संवाद कार्यक्रमों के जरिए राजनीतिक दल युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी का कार्यक्रम इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर का राजनीतिक चेहरा दे सकता है। कांग्रेस के लिए यह मौका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 का चुनाव उसके लिए प्रदेश की सत्ता में वापसी की बड़ी लड़ाई होगा। पार्टी की कोशिश होगी कि राहुल गांधी का संवाद सिर्फ भाषण तक सीमित न रहे, बल्कि युवाओं की वास्तविक समस्याओं और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श से जोड़ा जाए।
उत्तराखंड का युवा सिर्फ नौकरी नहीं चाहता। वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, स्थानीय स्तर पर रोजगार, उद्यमिता के अवसर और सम्मानजनक भविष्य चाहता है। पहाड़ के युवा के लिए चुनौती और बड़ी है, क्योंकि रोजगार के अवसरों की कमी पलायन को बढ़ाती है। ऐसे में राहुल गांधी के सामने युवाओं से संवाद के दौरान कई सवाल होंगेकृपहाड़ में रोजगार कैसे आएगा? सरकारी भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी कैसे बनाया जाएगा? निजी क्षेत्र में अवसर कैसे बढ़ेंगे? पलायन रोकने के लिए क्या मॉडल होगा? स्थानीय संसाधनों से रोजगार कैसे पैदा होंगे? इन सवालों के जवाब कांग्रेस के लिए चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण होंगे।
कांग्रेस के लिए राहुल गांधी का युवाओं से संवाद सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं बल्कि चुनावी नैरेटिव बनाने की कवायद भी हो सकता है। यदि पार्टी युवाओं के मुद्दों को लगातार अभियान का केंद्र बनाती है तो रोजगार बनाम विकास, भर्ती बनाम वादे और पलायन बनाम स्थानीय अवसर जैसे सवाल चुनावी बहस में प्रमुखता हासिल कर सकते हैं। भाजपा की ओर से भी कांग्रेस के आरोपों का जवाब आना तय माना जा रहा है। ऐसे में युवाओं के मुद्दे पर आने वाले दिनों में सियासी टकराव और तेज हो सकता है। 2027 की चुनावी लड़ाई में कौन सा दल युवाओं का भरोसा जीतता है, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में अब युवाओं को सिर्फ भीड़ के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्हें सुनना होगा, उनके सवालों का जवाब देना होगा और रोजगार के सवाल पर ठोस रोडमैप भी दिखाना होगा। राहुल गांधी संवाद करेंगे, नेता भाषण देंगे, पार्टियां दावे करेंगी,कृलेकिन आखिरी फैसला वही युवा करेगा, जिसके हाथ में रोजगार का सवाल और सामने भविष्य की चिंता होगी।
45 मिनट की ‘खामोशी’ पर सवाल
नेपाली प्रशासन को आपदा की पहली सूचना करीब 9ः 00 बजे मिली
यही 45 मिनट का फासला अब नेपाल में तीखे विवाद का केंद्र भी बना
सवाल मिनटों का नहीं,अर्ली वार्निंग सिस्टम की पारदर्शिता व रफ्तार का
देहरादून। नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद अब तबाही के पानी के साथ एक और सवाल बहकर सामने आया हैकृक्या इस त्रासदी को कुछ हद तक टाला जा सकता था? सवाल सीधे चीन की ओर उठ रहे हैं। नेपाली मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, तिब्बत के केरुंग क्षेत्र में बाढ़ आने और नेपाल को इसकी जानकारी मिलने के बीच करीब 45 मिनट का अंतर रहा। यही 45 मिनट अब नेपाल में बहस का केंद्र बन गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, चीन के तिब्बती क्षेत्र केरुंग काउंटी में स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 10ः 30 बजे बाढ़ की स्थिति सामने आई। नेपाल और चीन के समय में 2 घंटे 15 मिनट का अंतर है। इस हिसाब से घटना नेपाल के समयानुसार करीब 8ः15 बजे की बताई जा रही है, जबकि नेपाली प्रशासन को लगभग 9 बजे के आसपास इसकी जानकारी मिलने का दावा किया गया है। यानी सवाल सिर्फ 45 मिनट का नहीं है। सवाल यह है कि सीमा के उस पार पैदा हुई आपदा की सूचना सीमा के इस पार रहने वाले लोगों तक कितनी जल्दी पहुंचनी चाहिए थी।
आपदा के समय 45 मिनट सामान्य समय नहीं होते। नदी किनारे रहने वाले लोगों को हटाने, बाजार बंद कराने, पुलों और संवेदनशील रास्तों पर आवाजाही रोकने तथा सुरक्षाबलों को अलर्ट करने के लिए यही समय बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि अगर 45 मिनट पहले चेतावनी मिल जाती तो कितनी जानें निश्चित रूप से बच जातीं। लेकिन इतना जरूर है कि समय रहते चेतावनी मिलने से एहतियाती कदम उठाने का अवसर बढ़ता। नेपाली अधिकारियों और रिपोर्टों में इसी को लेकर सवाल उठ रहे हैं और यही वह बिंदु है जहां प्राकृतिक आपदा एक कूटनीतिक सवाल में बदल जाती है।
नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई। बाढ़ और मलबे ने सड़कें, पुल, मकान और दूसरी बुनियादी सुविधाएं तबाह कर दीं। शुरुआती रिपोर्टों में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने और सैकड़ों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। चीन के तिब्बती क्षेत्र में भी जान-माल का नुकसान हुआ है। इसलिए यह घटना किसी एक देश की त्रासदी नहीं है। यह हिमालयी क्षेत्र में सीमा पार आपदा-सूचना तंत्र की कमजोरी का भी बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है।
नेपाल में चीन पर समय पर सूचना साझा नहीं करने के आरोप लग रहे हैं। नेपाली विदेश मामलों के जानकारों और पत्रकारों ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि 45 मिनट की देरी और जान बचने की संभावित संख्या से जुड़े दावों की पूरी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। चीन की ओर से आधिकारिक स्तर पर क्या सूचना साझा की गई, कब की गई और दोनों देशों के बीच आपदा-सूचना साझा करने की निर्धारित व्यवस्था क्या थीकृइन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आना बाकी हैं। यही वजह है कि इस घटना को सीधे धोखा घोषित करने के बजाय पहले पूरे संचार रिकार्ड की जांच जरूरी है।
नेपाल और चीन के बीच राजनीतिक सीमा है, लेकिन पहाड़ों में बहने वाली नदियां किसी सीमा रेखा को नहीं मानतीं। तिब्बत में भूस्खलन, हिमनद या अचानक जलप्रवाह की घटना होती है तो उसका असर कुछ ही समय में नेपाल के निचले इलाकों में दिखाई दे सकता है। यही कारण है कि हिमालयी देशों के बीच रियल टाइम डेटा साझा करना बेहद जरूरी हो जाता है। जलस्तर, ग्लेशियर, भूस्खलन और अचानक आने वाले जलप्रवाह की सूचना यदि सीमा पार समय रहते पहुंच जाए तो प्रशासन को कम से कम लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजने का मौका मिल सकता है। नेपाल की त्रासदी ने इसी जरूरत को और उजागर कर दिया है।
आज नेपाल पूछ रहा हैकृ45 मिनट की खामोशी क्यों रही? कल यही सवाल भारत, भूटान या हिमालय के किसी दूसरे हिस्से से भी पूछा जा सकता है। क्योंकि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के दौर में हिमालयी आपदाओं का जोखिम गंभीर होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में पड़ोसी देशों के बीच आपदा-सूचना राजनीतिक विश्वास से ऊपर मानवीय जिम्मेदारी का विषय होनी चाहिए। बाढ़ पानी लेकर आई थी। लेकिन अपने पीछे उसने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया हैकृकि अगर खतरा सीमा पार पैदा हो चुका था, तो चेतावनी सीमा पार पहुंचने में 45 मिनट क्यों लगी? इन 45 मिनटों का पूरा सच सामने आना जरूरी है। क्योंकि आपदा में कभी-कभी कुछ मिनट भी सिर्फ समय नहीं होतेकृवह जिंदगी और मौत के बीच का अंतर हो सकते हैं।
स्वाइन फ्लू की दस्तक
उत्तराखंड में तापमान में उतार-चढ़ाव से वायरल और श्वसन संबंधी संक्रमण का जोखिम बढ़ा
बुखार, खांसी, गले में खराश, नाक बहना और बदन दर्द इसके मुख्य लक्षण
देहरादून समेत मैदानी व पर्वतीय क्षेत्रों के अस्पतालों में सांस और वायरल के मरीज बढ़े
देहरादून। उत्तराखंड में बदलते मौसम के बीच स्वाइन फ्लू की दस्तक ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। बारिश के बाद तापमान में उतार-चढ़ाव और वायरल संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच स्वास्थ्य महकमा सतर्कता बरतने की तैयारी में जुट गया है। हालांकि स्वाइन फ्लू को लेकर घबराने के बजाय सावधानी और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। स्वाइन फ्लू को आमतौर पर इन्फ्लुएंजा-ए संक्रमण के रूप में जाना जाता है। इसके लक्षण सामान्य फ्लू जैसे हो सकते हैंकृबुखार, खांसी, गले में खराश, नाक बहना, शरीर में दर्द और कमजोरी। कुछ लोगों में संक्रमण गंभीर रूप भी ले सकता है, खासकर यदि उन्हें पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या हो।
उत्तराखंड में मानसून के दौरान लगातार बारिश और तापमान में बदलाव के कारण श्वसन संबंधी संक्रमणों का खतरा बढ़ सकता है। अस्पतालों की ओपीडी में वायरल और सांस से जुड़ी शिकायतों वाले मरीजों की संख्या बढ़ने पर स्वास्थ्य विभाग के सामने संक्रमण की निगरानी की चुनौती भी बढ़ जाती है। देहरादून सहित मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य संस्थानों को संदिग्ध मरीजों पर नजर रखने, आवश्यक जांच और उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करने की जरूरत है। अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी।
स्वाइन फ्लू के लक्षण शुरुआत में सामान्य वायरल बुखार जैसे लग सकते हैं। यही कारण है कि कई बार लोग इसे सामान्य सर्दी-जुकाम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लगातार या तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी, अत्यधिक कमजोरी अथवा हालत बिगड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। बीमारी की पुष्टि केवल लक्षणों के आधार पर नहीं की जाती। जरूरत पड़ने पर डाक्टर जांच की सलाह दे सकते हैं और उसी के आधार पर उपचार तय होता है।
इन्फ्लुएंजा जैसे श्वसन संक्रमणों से बचाव के लिए हाथों की स्वच्छता, खांसते-छींकते समय मुंह और नाक ढकना तथा बीमार होने पर दूसरों से दूरी बनाए रखना उपयोगी सावधानियां हैं। स्कूल, कार्यालय और सार्वजनिक स्थानों पर भी साफ-सफाई और वेंटिलेशन पर ध्यान देना जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि संक्रमण की रोकथाम के साथ लोगों में अनावश्यक भय भी न फैले। स्वाइन फ्लू का नाम सुनते ही घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन लापरवाही भी उचित नहीं।
हर बार किसी संक्रामक बीमारी की दस्तक स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों की परीक्षा भी होती है। अस्पतालों में आवश्यक दवाओं, जांच की सुविधा, प्रशिक्षित स्टाफ और संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था को मजबूत रखना जरूरी है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में चुनौती इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि दूरदराज के क्षेत्रों में विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान नहीं है। ऐसे में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक निगरानी और रेफरल व्यवस्था मजबूत रहना जरूरी होगा।
उत्तराखंड में रक्षाबंधन पर चुनावी ‘प्रेम’
नेताओं की कलाई पर लगा राखियों का अंबार
त्योहार के आड़ में शुरू हुआ कार्यक्रमों का दौर
भाईचारे से ज्यादा वोटों की गणित साधी जा रही
कलाई पर चढ़ती राखियों की परतें, मंच के बैनर
बहन की कलाई से चुनावी ताकत नाप रहे हैं नेता
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन चुनावी मौसम की आहट इतनी साफ सुनाई देने लगी है कि अब राखी के धागे में भी राजनीति दिखाई देने लगी है। शहर से लेकर कस्बों तक रक्षाबंधन कार्यक्रमों की धूम है। कहीं महिला सम्मेलन के नाम पर बहनों को बुलाया जा रहा है, कहीं राखी बांधने का कार्यक्रम हो रहा है और कहीं मंच पर नेताओं की कलाई पर राखियों की इतनी परतें चढ़ रही हैं कि लगता है जैसे भाईचारे का प्रमाणपत्र बांटा जा रहा हो। सवाल यह नहीं कि राखी क्यों बांधी जा रही है। सवाल यह है कि राखी बांधने के बाद नेता क्या कर रहे हैं?
रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार है। लेकिन चुनाव के करीब आते-आते यह रिश्ता राजनीतिक फोटो फ्रेम में बदलता नजर आ रहा है। नेता बहनों के बीच पहुंच रहे हैं, राखियां बंधवा रहे हैं, आशीर्वाद ले रहे हैं और फिर तस्वीरें सोशल मीडिया पर पहुंच रही हैं। तस्वीर में नेता की कलाई है, सामने महिलाओं की भीड़ है और पीछे बड़े-बड़े बैनर हैं। राजनीति में अब शायद यही नया गणित हैकृजितनी राखियां, उतनी ताकत। लेकिन लोकतंत्र में ताकत राखियों की संख्या से नहीं, जनता के भरोसे से तय होती है।
उत्तराखंड की राजनीति में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। पहाड़ के गांवों में घर, खेत, पानी, जंगल और पलायन की मार सबसे ज्यादा महिलाओं ने झेली है। पहाड़ की महिला सिर्फ वोटर नहीं है, वह परिवार के राजनीतिक फैसले को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण आवाज भी है। शायद इसी वजह से चुनाव से पहले हर राजनीतिक दल और हर संभावित प्रत्याशी महिला मतदाताओं के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहता है। राखी इस राजनीति का सबसे आसान और भावनात्मक माध्यम बन गई है।
नेता बहनों से राखी बंधवा रहे हैं। बहनें भी राखी बांध रही हैं। मंच पर मुस्कान है। कैमरे हैं। भाषण हैं। तालियां हैं। लेकिन मंच से उतरने के बाद वही पुराना सवाल खड़ा हैकृमहिलाओं के लिए किया क्या? जिस बहन ने राखी बांधी, उसके गांव में पानी की समस्या है तो उसका समाधान कब होगा? जिस महिला ने मंच पर आकर नेता को भाई माना, उसके परिवार का बेटा रोजगार के लिए प्रदेश से बाहर क्यों जा रहा है? जिस महिला ने तालियां बजाईं, उसके गांव की सड़क बरसात में क्यों बंद हो जाती है? पहाड़ की बेटी की शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य की चिंता चुनावी कैलेंडर के किस पन्ने पर लिखी है? इन सवालों का जवाब राखी की फोटो में नहीं मिलता और यही उत्तराखंड की चुनावी राजनीति की असली कहानी है।
दरअसल, चुनाव से पहले नेताओं की गतिविधियां बदल जाती हैं। जनता अचानक परिवार बन जाती है। कोई बहनों का भाई बन जाता है, कोई युवाओं का साथी, कोई किसानों का हितैषी और कोई पहाड़ का बेटा। चुनाव बीतते ही रिश्तों की यह शब्दावली धीरे-धीरे सरकारी फाइलों की भाषा में बदल जाती है। इस बार राखी का राजनीतिक मौसम भी कुछ ऐसा ही संदेश दे रहा है। किसी नेता के कार्यक्रम में कितनी महिलाएं पहुंचीं, कितनी राखियां बंधीं, कितने समर्थक आए और कितनी तस्वीरें वायरल हुईंकृइन सबका हिसाब रखा जा रहा है। मानो विधानसभा चुनाव का सर्वे किसी चुनावी एजेंसी ने नहीं, राखी की थाली ने कर दिया हो।लेकिन चुनावी राजनीति इतनी सरल नहीं है।
महिलाएं अब सिर्फ मंच पर बैठकर भाषण सुनने वाली भीड़ नहीं हैं। वह सवाल पूछती हैं। वे सरकारी योजनाओं का लाभ देखती हैं। वह अपने बच्चों के रोजगार को देखती हैं। महंगाई महसूस करती हैं। सड़क, अस्पताल और स्कूल की हालत जानती हैं। उन्हें पता है कि चुनाव के समय कौन उनके घर आया था और पांच साल में कौन कितनी बार आया। इसलिए राखी बांधने की प्रतियोगिता में जुटे नेताओं को यह भी याद रखना चाहिए कि राखी की डोर भावनात्मक जरूर है, लेकिन मतदाता की स्मृति उससे भी मजबूत होती है।
उत्तराखंड में 2027 का चुनाव सिर्फ कुर्सी का चुनाव नहीं होगा। यह पांच साल के कामकाज का हिसाब मांगने वाला चुनाव भी होगा। यहां बेरोजगारी है, पलायन है, आपदा है, सड़कें हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल हैं। युवाओं की बेचौनी है। गांवों के खाली होते घर हैं। पहाड़ और मैदान के बीच विकास के सवाल हैं। इन सवालों के बीच अगर राजनीति सिर्फ राखी बांधने और फोटो खिंचवाने तक सीमित रह गई तो लोकतंत्र का त्योहार जरूर मनेगा, लेकिन जनता के सवाल फिर पीछे छूट जाएंगे।
राखी बांधिए, जरूर बांधिए। बहनों का सम्मान कीजिए। उनके बीच जाइए। लेकिन राखी के साथ जिम्मेदारी भी बांधिए। कलाई पर बंधी राखी अगर नेता को यह याद दिलाए कि बहन के गांव में पानी पहुंचाना है, उसके बच्चों को रोजगार देना है, उसकी सड़क ठीक करनी है और उसके परिवार को सुरक्षित भविष्य देना है, तभी इस रिश्ते का अर्थ है। वरना यह सिर्फ एक और चुनावी फोटो होगी और उत्तराखंड की जनता अब फोटो नहीं, हिसाब देखना चाहती है।
इसलिए चुनाव से पहले सबसे ज्यादा राखी बंधवाने वाले नेता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि वही सबसे मजबूत है। असली ताकत उस दिन पता चलेगी, जब मतदाता की उंगली ईवीएम के बटन तक पहुंचेगी। कलाई पर राखी होगी। सामने उम्मीदवार होगा और बीच में पांच साल का हिसाब।
बुधवार, 26 अगस्त 2026
udaydinmaan: ‘चाय खतरे में है मित्तर’
udaydinmaan: ‘चाय खतरे में है मित्तर’: महंगाई पर तंज कसना पड़ गया एक लेखपाल को भारी चीनी पहुंची सत्तर लिखने पर जौनपुर के लेखपाल निलंबित हल्की-फुल्की टिप्पणी में लिखा था, चाय खतरे म...
‘चाय खतरे में है मित्तर’
महंगाई पर तंज कसना पड़ गया एक लेखपाल को भारी
चीनी पहुंची सत्तर लिखने पर जौनपुर के लेखपाल निलंबित
हल्की-फुल्की टिप्पणी में लिखा था, चाय खतरे में है मित्तर
लेखपाल के निलंबन के बाद सोशल मीडिया पर उठे सवाल
देहरादून। महंगाई पर सोशल मीडिया में एक हल्की-फुल्की टिप्पणी करना उत्तर प्रदेश के जौनपुर में एक लेखपाल को भारी पड़ गया। फेसबुक पर चाय और चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर पोस्ट लिखने वाले लेखपाल के खिलाफ प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। बताया जा रहा है कि लेखपाल ने फेसबुक पर लिखा थाकृ चाय खतरे में है मित्तर, चीनी पहुंच गई सत्तर। पोस्ट सामने आने के बाद मामला प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचा। इसके बाद संबंधित लेखपाल के खिलाफ कार्रवाई की गई और उन्हें निलंबित कर दिया गया।
मामले ने सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की सीमा और सरकारी कर्मचारियों की सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि महंगाई पर एक सामान्य टिप्पणी को प्रशासनिक कार्रवाई का आधार बनाया जाना किस हद तक उचित है। वहीं प्रशासन की ओर से कार्रवाई के पीछे क्या विस्तृत कारण हैं, यह स्पष्ट रूप से सामने आना अभी बाकी है।
सरकारी कर्मचारियों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर पहले से ही सेवा नियम और आचरण संबंधी प्रावधान लागू हैं। ऐसे में किसी कर्मचारी की सोशल मीडिया पोस्ट को व्यक्तिगत टिप्पणी मानने के बजाय यदि उसे सरकारी सेवा आचरण के दायरे में देखा जाता है, तो विभागीय कार्रवाई की गुंजाइश बनती है।
हालांकि इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प पहलू पोस्ट की भाषा है। महंगाई पर तंज कसते हुए लिखे गए महज एक वाक्य ने प्रशासनिक कार्रवाई का रूप ले लिया। चाय खतरे में है मित्तर जैसी पंक्ति अब जौनपुर के प्रशासनिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा का विषय बनी हुई है।
यह घटना उस दौर में सामने आई है जब सोशल मीडिया सरकारी कर्मचारियों के लिए भी अपनी बात रखने का बड़ा माध्यम बन चुका है। कर्मचारी निजी जीवन में क्या पोस्ट कर सकते हैं और किस बिंदु पर उनकी सोशल मीडिया टिप्पणी सरकारी आचरण का विषय बन जाती हैकृइसको लेकर स्पष्टता और संतुलन दोनों जरूरी हैं।
फिलहाल लेखपाल के निलंबन ने एक संदेश जरूर दिया है कि सरकारी सेवा में रहते हुए सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी को केवल निजी अभिव्यक्ति मानकर छोड़ दिया जाना तय नहीं है। दूसरी ओर, कार्रवाई के कारणों की स्पष्ट जानकारी सामने आने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि मामला महज एक फेसबुक पोस्ट का था या पोस्ट के पीछे कोई अन्य प्रशासनिक अथवा सेवा संबंधी उल्लंघन भी माना गया।
राहुल के ‘सनातन’ बयान पर बवाल
युवाओं में हिंदू धर्म की गलत छवि पेश करने का लगा आरोप
राजनीतिक फायदे के लिए आस्था से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं
युवा पीढ़ी के सामने धर्म की विकृत तस्वीर पेश करने का आरोप
देहरादून। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के सनातन और हिंदू धर्म को लेकर दिए गए कथित बयान पर उत्तराखंड की सियासत गरमा गई है। भाजपा ने राहुल गांधी पर युवाओं के बीच सनातन धर्म की नकारात्मक छवि पेश करने का आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला है। पार्टी नेताओं का कहना है कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े धर्म और परंपराओं को राजनीतिक लाभ के लिए निशाना बनाना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी लगातार ऐसे मुद्दों को उठाकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं, जिनका सीधा संबंध देश की धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनाओं से है। उनका कहना है कि युवा पीढ़ी के सामने सनातन की ऐसी तस्वीर पेश करने का प्रयास किया जा रहा है, जो उसके वास्तविक स्वरूप से मेल नहीं खाती।
भाजपा का कहना है कि सनातन परंपरा केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। भारतीय दर्शन, संस्कृति, साहित्य, योग, अध्यात्म और सामाजिक जीवन में इसकी गहरी भूमिका रही है। ऐसे में हिंदू धर्मशास्त्रों और सनातन परंपरा पर टिप्पणी करने से पहले उसके व्यापक स्वरूप को समझना आवश्यक है। भाजपा नेताओं ने तंज कसते हुए कहा कि हिंदू धर्मशास्त्रों को समझने में राहुल गांधी को कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे।
भाजपा नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस की राजनीति में समय-समय पर बहुसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाओं को लेकर विरोधाभासी रुख दिखाई देता रहा है। उनके अनुसार, एक तरफ कांग्रेस खुद को सभी धर्मों के सम्मान की राजनीति करने वाली पार्टी बताती है, वहीं दूसरी तरफ उसके प्रमुख नेता सनातन को लेकर ऐसी टिप्पणियां करते हैं, जिनसे विवाद खड़ा होता है।
भाजपा ने राहुल गांधी से सवाल किया कि यदि कांग्रेस वास्तव में धार्मिक सद्भाव और संविधान में विश्वास रखती है तो फिर सनातन धर्म को लेकर ऐसी टिप्पणियों की आवश्यकता क्यों पड़ती है। पार्टी नेताओं ने कहा कि किसी भी धर्म या समुदाय की आलोचना राजनीतिक बहस का विषय हो सकती है, लेकिन करोड़ों लोगों की आस्था को अपमानित करने वाली भाषा से सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है।
हालांकि, कांग्रेस की ओर से इन आरोपों को राजनीतिक रंग देने की कोशिश बताया जा सकता है। कांग्रेस का तर्क रहा है कि भाजपा धार्मिक मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाकर वास्तविक जनसमस्याओं से ध्यान भटकाने का प्रयास करती है। ऐसे में सनातन को लेकर छिड़ी यह बहस केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे आगामी चुनावों की राजनीतिक रणनीति भी देखी जा रही है।
उत्तराखंड में यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि प्रदेश की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान में धार्मिक परंपराओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। चारधाम, तीर्थ परंपरा और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी आस्था प्रदेश के सामाजिक जीवन का हिस्सा है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर सनातन को लेकर होने वाली राजनीतिक बयानबाजी का असर उत्तराखंड की राजनीति में भी दिखाई देना स्वाभाविक है।
भाजपा फिलहाल इस मुद्दे को युवाओं और धार्मिक आस्था से जोड़कर कांग्रेस पर दबाव बनाने की कोशिश में है। पार्टी का संदेश साफ है कि सनातन के अपमान को राजनीतिक बहस का सामान्य हिस्सा नहीं बनने दिया जाएगा। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह राहुल गांधी के बयानों को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए अपनी राजनीतिक लाइन स्पष्ट करे।
आखिरकार सवाल यह है कि चुनावी राजनीति में धार्मिक विमर्श की सीमा क्या होनी चाहिए। राजनीतिक दलों के लिए यह जरूरी है कि वह आस्था से जुड़े विषयों पर बयान देते समय शब्दों की मर्यादा और सामाजिक संवेदनशीलता का ध्यान रखें। क्योंकि चुनाव आते-जाते रहेंगे, लेकिन समाज की धार्मिक आस्थाएं और सांस्कृतिक विरासत लंबे समय तक कायम रहती हैं।
चुनाव से पहले भाजपा का बड़ा मीडिया दांव
8 नए चेहरे, आक्रामक तेवर
विपक्षी हमलों का जवाब देने और उपलब्धियों को भुनाने की रणनीति
भाजपा का आठ नए प्रवक्ताओं के सहारे हवा का रुख मोड़ने की कवायद
चुनाव से पहले आक्रामक अंदाज में पक्ष रखने की तैयारी में है भाजपा
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भाजपा ने अपने मीडिया मोर्चे को और धार देने की कवायद शुरू कर दी है। पार्टी ने प्रवक्ता टोली का विस्तार करते हुए आठ नए प्रवक्ताओं की घोषणा की है। इसे महज संगठनात्मक विस्तार के बजाय आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा की व्यापक संचार रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। चुनावी माहौल बनने के साथ ही पार्टी अब सरकार की उपलब्धियों, विपक्ष के आरोपों और जनमुद्दों पर अपना पक्ष अधिक आक्रामक और नियमित तरीके से रखने की तैयारी में है।
भाजपा के लिए मीडिया और सोशल मीडिया चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में प्रवक्ताओं की संख्या बढ़ाने का सीधा अर्थ यही है कि पार्टी अलग-अलग मुद्दों पर अधिक प्रभावी ढंग से अपना पक्ष जनता के सामने रखना चाहती है। आठ नए चेहरों को जिम्मेदारी देकर भाजपा ने संकेत दिया है कि चुनावी मैदान में केवल बूथ और संगठन ही नहीं, बल्कि नैरेटिव की लड़ाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
पार्टी के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे प्रदेश सरकार के कामकाज को उपलब्धियों के रूप में जनता तक पहुंचाना है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के लगातार उठाए जा रहे सवालों का जवाब भी देना है। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पलायन, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं, कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन तथा एसआईआर जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में चुनावी बहस के केंद्र में रह सकते हैं। ऐसे में भाजपा की नई प्रवक्ता टोली को इन मुद्दों पर पार्टी की स्पष्ट लाइन सामने रखनी होगी।
प्रवक्ता टोली का विस्तार यह भी बताता है कि भाजपा अब चुनावी संवाद को केवल प्रेस कांफ्रेंस तक सीमित रखने के पक्ष में नहीं है। टेलीविजन डिबेट, डिजिटल प्लेटफार्म, सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया के माध्यम से एक साथ राजनीतिक संदेश पहुंचाने की रणनीति पर पार्टी काम कर रही है। अलग-अलग क्षेत्रों और विषयों से जुड़े प्रवक्ताओं को आगे करने से पार्टी को स्थानीय मुद्दों पर भी तत्काल प्रतिक्रिया देने में मदद मिल सकती है।
दिलचस्प यह है कि भाजपा ने यह कदम ऐसे समय उठाया है जब कांग्रेस भी संगठन को चुनावी मोड में लाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस की ओर से सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, युवाओं, भर्ती और जनहित के मुद्दों को लेकर लगातार हमलावर रुख अपनाया जा रहा है। ऐसे में भाजपा की नई प्रवक्ता टोली का पहला लक्ष्य विपक्ष के हमलों का जवाब देना और सरकार के पक्ष में माहौल तैयार करना होगा।
लेकिन यहां भाजपा के लिए चुनौती भी कम नहीं है। प्रवक्ताओं की संख्या बढ़ाने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि सभी प्रवक्ताओं का संदेश एक हो। अलग-अलग मंचों पर यदि अलग-अलग बयान सामने आते हैं तो विस्तार का उद्देश्य ही कमजोर पड़ सकता है। चुनाव के समय एक ही मुद्दे पर पार्टी की अलग-अलग व्याख्या विपक्ष को हमले का अवसर दे सकती है। इसलिए नई टोली के सामने संदेश की एकरूपता और तथ्यों के साथ जवाब देने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
दूसरी ओर कांग्रेस के लिए भी भाजपा का यह कदम एक राजनीतिक संकेत है। अब उसे अपने मीडिया तंत्र को और सक्रिय करना होगा। यदि भाजपा रोजाना कई मुद्दों पर अपना पक्ष रखती है और कांग्रेस की प्रतिक्रिया देर से आती है, तो राजनीतिक विमर्श में भाजपा का नैरेटिव हावी हो सकता है। चुनावी राजनीति में कई बार मुद्दे से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि जनता के बीच उस मुद्दे की व्याख्या कौन और कितनी तेजी से करता है।
उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर दिखाई दे सकता है, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां बता रही हैं कि चुनावी तैयारी शुरू हो चुकी है। भाजपा संगठन, बूथ और मीडियाकृतीनों मोर्चों पर अपनी मशीनरी को सक्रिय कर रही है। प्रवक्ता टोली का विस्तार इसी तैयारी की अगली कड़ी है।
अब देखना यह होगा कि आठ नए प्रवक्ता पार्टी की आवाज को कितनी मजबूती देते हैं। भाजपा के लिए यह सिर्फ आठ नए नाम जोड़ने का फैसला नहीं, बल्कि चुनाव से पहले मीडिया के मैदान में अपनी टीम को मजबूत करने की कवायद है। आने वाले महीनों में यह टोली जितनी सक्रिय होगी, उतना ही स्पष्ट होगा कि भाजपा चुनावी मुद्दों को अपने पक्ष में मोड़ने की रणनीति में कितनी सफल रहती है।
कांग्रेस का ‘दावा’ तय है सत्ता परिवर्तन
बेरोजगारी और किसानी के मुद्दे बनेंगे चुनावी हथियार, कहा- कोरे प्रचार से नहीं छिपेंगे जनता के सवाल
उत्तराखंड में चुनावी पारा हाई, युवाओं, किसानों और कर्मचारियों की अनदेखी पर आर-पार की तैयारी
सिर्फ योजनाओं के बखान से नहीं चलेगा काम, अनसुलझे सवालों पर भाजपा को घेरने की रणनीति तैयार
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक तापमान बढ़ने लगा है। कांग्रेस ने प्रदेश में बड़े राजनीतिक बदलाव का दावा करते हुए भाजपा पर एक बार फिर हमला तेज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि प्रदेश की जनता अब बदलाव के मूड में है और आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका जवाब मिलेगा। कांग्रेस के इस दावे के बाद सियासी गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज होने के आसार हैं।
कांग्रेस का निशाना सीधे तौर पर प्रदेश की भाजपा सरकार और उसके कामकाज पर है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि सरकार के कार्यकाल में युवाओं, बेरोजगारों, किसानों, कर्मचारियों और आम लोगों से जुड़े कई सवाल अनसुलझे हैं। कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में है। पार्टी का मानना है कि महज सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों के प्रचार से जनता के सवाल खत्म नहीं होंगे।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड की जनता ने लंबे समय तक भाजपा को मौका दिया है, लेकिन अब वह सरकार से कामकाज का हिसाब मांग रही है। बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, सड़कों की स्थिति और महंगाई जैसे मुद्दों को कांग्रेस लगातार उठाती रही है। पार्टी अब इन्हीं सवालों को गांव-गांव तक ले जाने की रणनीति पर काम कर रही है।
कांग्रेस के इस आक्रामक रुख के पीछे चुनावी गणित भी देखा जा रहा है। पार्टी लंबे समय से संगठनात्मक कमजोरी और आपसी खींचतान की चुनौती से जूझती रही है। ऐसे में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने के साथ ही कांग्रेस के सामने अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को एकजुट करने की चुनौती भी है। केवल भाजपा विरोध के सहारे सत्ता में वापसी आसान नहीं होगी। जनता के सामने कांग्रेस को अपना वैकल्पिक एजेंडा भी मजबूती से रखना होगा।
भाजपा ने कांग्रेस के बदलाव के दावे को पहले से चली आ रही राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा माना है। भाजपा का तर्क है कि जनता सरकार के विकास कार्यों को देख रही है और विपक्ष केवल आरोप लगाने तक सीमित है। पार्टी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि प्रदेश में सड़क, चारधाम, पर्यटन, बुनियादी ढांचे और रोजगार से जुड़े क्षेत्रों में काम हुआ है।
यही वह मोर्चा है जहां आने वाले दिनों में दोनों दलों के बीच असली राजनीतिक मुकाबला दिखाई देगा। कांग्रेस जहां बदलाव की जरूरत का नैरेटिव खड़ा करना चाहती है, वहीं भाजपा काम और विकास को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। दोनों दलों के बीच यह टकराव जितना बढ़ेगा, उतना ही चुनावी विमर्श आरोपों से निकलकर उपलब्धियों और जनसवालों की तरफ जाने की संभावना रहेगी।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि बदलाव के दावे को जमीन पर संगठनात्मक ताकत में कैसे बदला जाए। भाजपा के लिए चुनौती सत्ता विरोधी संभावनाओं को रोकने की होगी। उत्तराखंड में हर चुनाव में क्षेत्रीय संतुलन, पहाड़-मैदान, युवा मतदाता, महिला मतदाता और स्थानीय मुद्दे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए किसी भी दल के लिए केवल बड़े राजनीतिक दावे पर्याप्त नहीं होंगे।
फिलहाल कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलकर यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह आगामी चुनाव को लेकर अपनी राजनीतिक भाषा और रणनीति दोनों को आक्रामक बनाने जा रही है। भाजपा भी जवाब देने में पीछे रहने वाली नहीं है। ऐसे में आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में बयानबाजी और तेज होगी।
बदलाव का दावा कांग्रेस ने किया है, लेकिन उस दावे को जनसमर्थन में बदलना अब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है। दूसरी ओर भाजपा के सामने सत्ता में रहते हुए यह साबित करने की चुनौती है कि उसके पक्ष में केवल संगठन नहीं, बल्कि जनता का भरोसा भी कायम है। चुनाव की असली तस्वीर इन्हीं दोनों दावों की जमीन पर होने वाली परीक्षा से सामने आएगी।
मंगलवार, 25 अगस्त 2026
गीत और धुन वही और ‘राजनीति नई’
राष्ट्रगीत पर सियासत
वंदे मातरम् की पंक्तियों पर बंटी राजनीति, देशभक्ति टेस्ट पर संग्राम
भाजपा का वार, विपक्ष का सवालकृकौन देगा राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट
राजनीति में राष्ट्रगीत आया तो बहस फिर शब्दों से निकली नीयत पर
देहरादून। वंदे मातरम् फिर राजनीति के मंच पर है। इस बार भी सवाल गीत की पंक्तियों से ज्यादा इस बात पर है कि कौन कितनी देशभक्ति दिखा रहा है और कौन कितनी कम। भाजपा ने विपक्ष को घेरा है। आरोप लगाया जा रहा है कि विपक्ष राष्ट्रभावना के सवाल पर गंभीर नहीं है। दूसरी तरफ विपक्ष कह रहा है कि देशभक्ति को राजनीतिक प्रमाणपत्र में बदलने की कोशिश क्यों की जा रही है? यानी गीत वही है, धुन वही है, लेकिन राजनीति नई है। भारत में राष्ट्रगीत वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से जुड़ा भावनात्मक प्रतीक है। लेकिन चुनावी मौसम आते ही प्रतीकों की राजनीति तेज हो जाती है। फिर यह तय होने लगता है कि कौन कितना राष्ट्रवादी है, किसने कितनी पंक्तियां गाईं और किसने कितनी नहीं गाईं। यहीं से सवाल शुरू होता है। क्या देशभक्ति की माप अब गीत की पंक्तियों से होगी? अगर कोई राजनीतिक दल वंदे मातरम् की कुछ पंक्तियां गाता है तो क्या वह अधिक देशभक्त हो जाता है और कोई दल पूरी तरह नहीं गाता तो उसकी देशभक्ति संदिग्ध हो जाती है? लोकतंत्र में यह तय करने का अधिकार आखिर किसके पास है?
भाजपा ने विपक्ष को घेरते हुए सवाल उठाया है। राजनीतिक तौर पर भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी उपयोगी है क्योंकि राष्ट्रवाद उसके लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा रहा है। विपक्ष के लिए मुश्किल यह है कि वह इस बहस में कदम रखता है तो भाजपा के बनाए मैदान पर खेलता है और मैदान से बाहर रहता है तो भाजपा उसे राष्ट्रभावना से दूरी के आरोपों से घेरती है। राजनीति का यही खेल है। एक तरफ रोजगार का सवाल है। दूसरी तरफ भर्ती परीक्षाओं की चिंता है। पहाड़ में सड़कें हैं, अस्पताल हैं, स्कूल हैं। युवाओं के भविष्य का सवाल है। महंगाई है। पलायन है। लेकिन चुनावी राजनीति में इन सवालों का जवाब कठिन है। वंदे मातरम् पर बहस करना आसान है। यह ऐसा मुद्दा है जिसमें एक नारा लगाइए, भीड़ तालियां बजाएगी। सोशल मीडिया पर वीडियो डालिए, समर्थक शेयर करेंगे। विपक्ष को घेरिए, बयान आएगा। विपक्ष जवाब देगा, दूसरा बयान आएगा। फिर दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों के बीच चले जाएंगे। और जनता? वह फिर अगले दिन नौकरी की तैयारी में बैठ जाएगी।
यही वह बिंदु है जहां देशभक्ति की राजनीति और नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी के बीच दूरी दिखाई देती है। देश से प्रेम केवल मंच पर गीत गाने से साबित नहीं होता। देश से प्रेम उस व्यवस्था को बेहतर बनाने से भी साबित होता है, जिसमें एक युवा बिना सिफारिश के नौकरी की उम्मीद कर सके, एक छात्र को परीक्षा की विश्वसनीयता पर भरोसा हो, पहाड़ का मरीज अस्पताल तक पहुंच सके और किसी गांव का बच्चा बारिश में स्कूल जाने से न डरे। वंदे मातरम् गाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है और उस पर सवाल पूछना भी। लेकिन किसी नागरिक या राजनीतिक दल की देशभक्ति का अंतिम प्रमाणपत्र बांटना लोकतंत्र को छोटा करता है। भाजपा विपक्ष को घेर रही है। विपक्ष भाजपा पर भावनात्मक मुद्दों के सहारे असली सवालों से ध्यान भटकाने का आरोप लगा सकता है। दोनों के पास अपने तर्क हैं। लेकिन मतदाता के पास एक सीधा सवाल हैकृमेरे जीवन में क्या बदला?
यही सवाल 2027 के विधानसभा चुनाव में भी लौटेगा। क्योंकि चुनावी मंच पर वंदे मातरम् की आवाज ऊंची हो सकती है, लेकिन गांव की टूटी सड़क की आवाज उससे भी पुरानी है। बेरोजगार युवा की बेचौनी किसी राष्ट्रगीत की धुन में खत्म नहीं होती। परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र को केवल राष्ट्रवाद नहीं, एक भरोसेमंद भर्ती व्यवस्था भी चाहिए। देशभक्ति जरूरी है। राष्ट्रभावना जरूरी है। वंदे मातरम् का ऐतिहासिक महत्व भी निर्विवाद है। मगर लोकतंत्र में देशभक्ति को एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करने की राजनीति कितनी दूर जाएगी, यह सवाल भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि देश किसी एक पार्टी का नहीं है। न वंदे मातरम् किसी दल की संपत्ति है, न तिरंगा, न संविधान, न भारत। राजनीतिक दल आते-जाते रहेंगे। सरकारें बनेंगी और बदलेंगी। लेकिन देश रहेगाकृऔर जनता अपने सवालों के साथ वहीं रहेगी।
इसलिए अगली बार जब मंच से पूछा जाए कि कौन वंदे मातरम् के साथ है? तो शायद जनता को भी पलटकर पूछना चाहिए।कृठीक है, लेकिन मेरे रोजगार, मेरी सड़क, मेरे स्कूल और मेरे भविष्य के साथ कौन है? यही सवाल चुनावी शोर में सबसे ज्यादा सुनाई देना चाहिए।
एक देश-एक चुनाव पर ‘अनोखी रार’
धार्मिक मंचों के राजनीतिक इस्तेमाल पर कांग्रेस का वार, भाजपा का पलटवार
चुनावी सुधार की बहस में साधु-संतों के मंच से उठ गया है उत्तराखंड से विवाद
संत समाज के मंच से वन नेशन, वन इलेक्शन पर उत्तराखंड में मचा घमासान
देहरादून। देश में वन नेशन, वन इलेक्शन की बहस चल रही है। सरकार और भाजपा इसे चुनावी व्यवस्था में सुधार, खर्च कम करने और बार-बार होने वाले चुनावों से मुक्ति की दिशा में बड़ा कदम बता रही हैं। कांग्रेस और विपक्ष इस पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन उत्तराखंड में बहस ने एक अलग मोड़ ले लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा ने साधु-संतों के मंच का राजनीतिक इस्तेमाल किया। अब सवाल सिर्फ वन नेशन, वन इलेक्शन का नहीं रह गया। सवाल यह भी है कि चुनावी राजनीति में धार्मिक और आध्यात्मिक मंचों की भूमिका कहां तक होनी चाहिए? मंच पर साधु-संत हों, सामने श्रद्धालु हों और बीच में राजनीतिक संदेश पहुंच जाएकृतो इसे आस्था का संवाद कहा जाए या चुनावी राजनीति का विस्तार? यही वह सवाल है जिसे कांग्रेस ने उठाया है।
भाजपा के पास इसका अपना जवाब होगा। वह कह सकती है कि संत समाज भी देश और समाज का हिस्सा है, उसे राजनीतिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है। लोकतंत्र में किसी वर्ग की आवाज को केवल इसलिए नहीं रोका जा सकता कि वह धार्मिक मंच से आ रही है। बात सही भी है। लेकिन लोकतंत्र का दूसरा सवाल भी हैकृक्या हर मंच चुनावी संदेश के लिए बनाया गया है? यहीं से बहस थोड़ी कठिन हो जाती है।
वन नेशन, वन इलेक्शन सुनने में बहुत सीधा लगता है। एक देश, एक साथ चुनाव। चुनाव कम होंगे, खर्च कम होगा, सरकारें लगातार चुनावी मोड से बाहर निकलकर काम कर सकेंगी। यह समर्थकों का तर्क है। विरोधियों के पास सवाल हैं। क्या एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान और कानूनों में बड़े बदलाव नहीं करने पड़ेंगे? राज्यों की विधानसभाओं की अवधि का क्या होगा? अगर किसी राज्य की सरकार बीच में गिर जाए तो क्या होगा? क्या राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रीय मुद्दों को दबा देंगे? क्या मतदाता विधानसभा और लोकसभा के लिए अलग-अलग राजनीतिक पसंद को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर पाएगा? यह गंभीर सवाल हैं। लेकिन राजनीति अक्सर गंभीर सवालों को गंभीर बहस में बदलने के बजाय भावनात्मक बहस में बदल देती है और जब धार्मिक मंच उसमें शामिल हो जाता है तो बहस और मुश्किल हो जाती है।
भारत में साधु-संतों का सामाजिक प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। करोड़ों लोग उन्हें श्रद्धा से देखते हैं। इसलिए उनके मंच से निकला राजनीतिक संदेश सामान्य राजनीतिक सभा की तुलना में अलग असर पैदा कर सकता है। इसी कारण कांग्रेस का आरोप भी केवल मंच को लेकर नहीं है। असल चिंता यह है कि क्या धार्मिक आस्था को राजनीतिक समर्थन जुटाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? लेकिन यहां विपक्ष के लिए भी एक सवाल है। अगर साधु-संत किसी राजनीतिक प्रस्ताव का समर्थन करते हैं तो क्या उनकी राय को सिर्फ इसलिए खारिज कर देना चाहिए कि वह धार्मिक मंच पर बैठे हैं? शायद नहीं।
लोकतंत्र में संत भी नागरिक हैं और उनकी राय भी राय है। समस्या राय रखने में नहीं, समस्या तब पैदा होती है जब आस्था को राजनीतिक समर्थन का प्रमाणपत्र बनाने की कोशिश हो। यानी किसी नीति का समर्थन इसलिए नहीं कि उसके पक्ष में तर्क हैं, बल्कि इसलिए कि उसके पीछे धार्मिक प्रतिष्ठा खड़ी कर दी गई है। फिर सवाल नीति से हटकर निष्ठा का हो जाता है और यही लोकतंत्र के लिए खतरनाक मोड़ है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में यह बहस और महत्वपूर्ण है। यहां धर्म, तीर्थ, संत परंपरा और राजनीति एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हैं। चारधाम से लेकर कुंभ तक धार्मिक पहचान सामाजिक जीवन का बड़ा हिस्सा है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि मंदिर और मठ की श्रद्धा को विधानसभा की नीति से अलग रखकर भी दोनों का सम्मान किया जा सकता है। राजनीतिक दलों को यह दूरी बनाए रखने की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी। क्योंकि अगर हर धार्मिक मंच चुनावी मंच बन गया, हर संत राजनीतिक प्रवक्ता बन गया और हर धार्मिक आयोजन राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन में बदल गया तो फिर राजनीति से बाहर बचने वाली जगह बहुत कम रह जाएगी और तब जनता पूछेगीकृहमारे पास चर्चा करने के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और महंगाई जैसे मुद्दे हैं। इनके जवाब कौन देगा?
वन नेशन, वन इलेक्शन पर बहस होनी चाहिए। खुलकर होनी चाहिए। संसद में हो, विशेषज्ञों के बीच हो, राज्यों में हो और जनता के बीच हो। समर्थक अपने तर्क रखें, विरोधी अपने सवाल रखें। संविधान, संघवाद और चुनावी प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा हो। लेकिन फैसला तर्क से हो, तमाशे से नहीं। संतों के मंच की अपनी गरिमा है। राजनीतिक दलों के मंच की अपनी भूमिका है। दोनों को एक-दूसरे की जगह लेने की जरूरत नहीं। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किसके मंच पर कौन बैठा था। सवाल यह होना चाहिए कि जो प्रस्ताव सामने है, वह देश और राज्यों के लोकतंत्र के लिए कितना सही है। वरना कल चुनाव एक होंगे, मंच एक होगा, नारे एक होंगे, लेकिन जनता के सवाल फिर भी अनेक रह जाएंगे और लोकतंत्र का असली चुनाव वहीं से शुरू होगा।
उत्तराखंड में ‘शुद्धिकरण’ कांड पर बवाल
मंच धोने वालों पर कार्रवाई के लिए राज्यपाल के द्वार पहुंची कांग्रेस
शुद्धिकरण ड्रामे पर भड़की कांग्रेस, राज्यपाल से की सीधी शिकायत
कांग्रेस का आरोपकृसार्वजनिक मंच के शुद्धिकरण से सामाजिक सौहार्द को ठेस
देहरादून। उत्तराखंड में मंच शुद्धिकरण को लेकर शुरू हुआ राजनीतिक विवाद अब लोकभवन तक पहुंच गया है। प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात कर पूरे प्रकरण की जानकारी दी और मामले में कार्रवाई की मांग की। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच का कथित रूप से शुद्धिकरण किया जाना सामाजिक विभाजन और भेदभाव की मानसिकता को बढ़ावा देने वाला कदम है। प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल के समक्ष कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक मंच किसी एक वर्ग या समुदाय की निजी संपत्ति नहीं होता। उस पर निर्वाचित जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक समान रूप से उपस्थित होते हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति के मंच पर आने के बाद उसके शुद्धिकरण जैसी कार्रवाई सामाजिक रूप से गंभीर संदेश देती है। कांग्रेस नेताओं ने राज्यपाल से आग्रह किया कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी स्तर पर कानून या संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
मंच शुद्धिकरण का विवाद अब केवल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे सामाजिक सम्मान और समानता से जोड़ रही है। पार्टी का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में जातिगत भेदभाव की किसी भी अभिव्यक्ति को सामान्य राजनीतिक घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि संविधान समानता की बात करता है और सार्वजनिक जीवन में किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। ऐसे में मंच शुद्धिकरण का कथित घटनाक्रम संवेदनशील है और इसकी गंभीरता से जांच जरूरी है।
वहीं, राजनीतिक तौर पर यह विवाद उत्तराखंड में आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेस इसे भाजपा सरकार और उसके नेताओं की सामाजिक सोच से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल की राज्यपाल से मुलाकात के बाद अब निगाहें सरकार और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर हैं। कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि वह इस मुद्दे को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रखेगी और इसे सामाजिक न्याय तथा संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर उठाती रहेगी।
दरअसल, उत्तराखंड की राजनीति में जाति और सामाजिक सम्मान का सवाल हमेशा संवेदनशील रहा है। पहाड़ की सामाजिक संरचना को अपेक्षाकृत सरल और समानतावादी बताने की कोशिशें होती रही हैं, लेकिन समय-समय पर सामने आने वाली घटनाएं इन दावों पर सवाल भी खड़े करती हैं। यही वजह है कि मंच शुद्धिकरण का विवाद राजनीतिक गलियारों से निकलकर अब सामाजिक बहस का विषय बन गया है। कांग्रेस का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी सार्वजनिक मंच को किसी व्यक्ति की मौजूदगी के बाद शुद्ध करने की जरूरत महसूस की गई, तो इसके पीछे की मानसिकता क्या थी? क्या यह केवल धार्मिक परंपरा का हिस्सा था, या फिर किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान से जुड़ा संदेश? इसका जवाब जांच से ही सामने आ सकता है। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक पुराना सवाल फिर खड़ा कर दिया हैकृक्या संविधान के बराबरी के सिद्धांत और समाज में मौजूद भेदभाव की मानसिकता के बीच अभी भी बड़ी खाई है?
राजनीतिक दल इस सवाल को अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल करेंगे। आरोप लगेंगे, जवाब आएंगे और चुनावी मंचों पर यह मुद्दा और तेज हो सकता है। मगर लोकतंत्र के लिए जरूरी यह है कि किसी भी व्यक्ति की गरिमा और समान नागरिक अधिकारों से जुड़े सवालों को राजनीतिक शोर में दबने न दिया जाए। राजभवन तक पहुंची कांग्रेस की शिकायत के बाद अब गेंद सरकार और प्रशासन के पाले में है। देखना होगा कि यह मामला भी केवल बयानबाजी और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सिमटता है या वास्तव में जांच और कार्रवाई तक पहुंचता है। क्योंकि मंच का शुद्धिकरण हुआ या नहीं, यह जांच का विषय हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बराबरी की कसौटी पर किसी नागरिक को खड़ा करना पूरे लोकतंत्र की परीक्षा है।
एसआईआर पर ‘राष्ट्रवाद- का तड़का
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
प्रशासनिक प्रक्रिया से शुरू विवाद, उत्तराखंड में सियासी जंग में बदला
भाजपा ने किया राष्ट्रवाद वाला वार, कांग्रेस ने उठाए पारदर्शिता पर सवाल
चुनाव आयोग की प्रक्रिया के बीच बढ़ गई है सबूे में राजनीतिक बयानबाजी
देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। एक तरफ भाजपा कांग्रेस और विपक्ष पर एसआईआर को लेकर भ्रम फैलाने और राष्ट्रहित के खिलाफ राजनीति करने का आरोप लगा रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस प्रक्रिया की पारदर्शिता, मतदाताओं के नामों और दावों-आपत्तियों के निस्तारण को लेकर सवाल उठा रही है। यानी मामला मतदाता सूची का है, लेकिन राजनीति में पहुंचते-पहुंचते बात राष्ट्रवाद तक पहुंच गई है। उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर चल रही है। जिला प्रशासन की वेबसाइटों पर एसआईआर से संबंधित घोषणाएं, बीएलओ विवरण, बैठकें और अन्य सामग्री भी उपलब्ध कराई जा रही है। लेकिन चुनावी साल की आहट के बीच मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है। राजनीतिक दल इसे आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देख रहे हैं।
भाजपा का तर्क है कि मतदाता सूची में केवल पात्र भारतीय नागरिकों के नाम होना चाहिए। पार्टी विपक्ष पर आरोप लगा रही है कि वह एसआईआर को लेकर राजनीतिक भ्रम पैदा कर रहा है और ऐसी राजनीति कर रहा है, जिससे देशहित प्रभावित हो सकता है। भाजपा के लिए यह मुद्दा केवल मतदाता सूची की सफाई का नहीं, बल्कि अवैध या अपात्र लोगों के नाम हटाने से भी जुड़ा हुआ है। पार्टी का कहना है कि यदि मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसे ठीक करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करता है। भाजपा विपक्ष से सवाल कर रही है कि यदि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है तो उसका विरोध क्यों? यहीं से भाजपा का राजनीतिक हमला राष्ट्रवाद की तरफ मुड़ जाता है।
पार्टी विपक्ष पर आरोप लगाती है कि वह वोट बैंक की राजनीति के कारण ऐसे मुद्दे उठा रहा है जो मतदाता सूची की शुचिता से जुड़े हैं। भाजपा का संदेश साफ हैकृमतदाता सूची में केवल पात्र नागरिक रहें, यह किसी दल का नहीं बल्कि लोकतंत्र का सवाल है। कांग्रेस इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार करने को तैयार नहीं है। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने की जरूरत से उसे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से न हटे। कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता यही है कि पुनरीक्षण के दौरान यदि किसी मतदाता का नाम सूची से बाहर हो जाता है तो उसके पास दावा और आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर होना चाहिए।
प्रदेश कांग्रेस ने एसआईआर से जुड़े दावों और आपत्तियों में मतदाताओं की मदद के लिए जिलावार नेताओं की जिम्मेदारी भी तय की है। कांग्रेस के अनुसार पार्टी अध्यक्ष गणेश गोदियाल के निर्देश पर अलग-अलग जिलों में सहायता और कानूनी मदद के लिए टीमें बनाई गई हैं। यह अपने आप में बताता है कि कांग्रेस अब एसआईआर को केवल राजनीतिक बयानबाजी का मुद्दा नहीं छोड़ना चाहती, बल्कि बूथ और मतदाता स्तर तक इस प्रक्रिया पर नजर रखने की तैयारी में है। इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण संस्था चुनाव आयोग है। क्योंकि मतदाता सूची का अंतिम फैसला राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, निर्धारित चुनावी प्रक्रिया से होना है।
उत्तराखंड में प्रशासन की ओर से राजनीतिक दलों के साथ बैठकें भी की गई हैं। पौड़ी जिला प्रशासन के रिकार्ड में एसआईआर के दौरान राजनीतिक दलों के साथ बैठक और बीएलओ, बीएलए तथा अन्य संबंधित लोगों के प्रशिक्षण का उल्लेख है। यानी राजनीतिक दलों की भागीदारी प्रक्रिया का हिस्सा है। यही वजह है कि विवाद का समाधान भी राजनीतिक बयान से ज्यादा पारदर्शी प्रक्रिया में है। एसआईआर को लेकर सबसे संवेदनशील सवाल यही है कि सूची से अपात्र नाम हटाने की कोशिश में कहीं पात्र मतदाता का नाम न छूट जाए। किसी अपात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए समस्या है। लेकिन किसी पात्र नागरिक का नाम सूची से हट जाना भी उतनी ही गंभीर समस्या है। इसलिए दोनों बातों को एक साथ देखना होगा।
सिर्फ यह कहना कि नाम कटेंगे तो गड़बड़ी दूर होगी पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि जिनके नाम सूची में नहीं रहेंगे, उन्हें सूचना कैसे मिलेगी, दावा कैसे दाखिल होगा, आपत्ति कैसे सुनी जाएगी और अंतिम निर्णय किस आधार पर होगा। यही पारदर्शिता ैप्त् की विश्वसनीयता तय करेगी। भाजपा के लिए चुनौती यह है कि एसआईआर को राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रविरोध की बहस में बदलने के बजाय मतदाता सूची की शुचिता के ठोस आंकड़े सामने रखे जाएं। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह हर कार्रवाई को राजनीतिक साजिश बताने के बजाय जहां वास्तविक गड़बड़ी है, वहां दस्तावेज और तथ्य सामने रखे। क्योंकि मतदाता सूची किसी पार्टी की नहीं होती। उसमें दर्ज नाम किसी भाजपा कार्यकर्ता का हो या कांग्रेस समर्थक का, मतदाता का अधिकार समान है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में एसआईआर का मुद्दा आने वाले महीनों में और राजनीतिक रंग ले सकता है। भाजपा इसे मतदाता सूची की शुचिता और पात्र नागरिकों के अधिकार का मुद्दा बनाएगी, जबकि कांग्रेस इसे निष्पक्षता, पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने के सवाल से जोड़ेगी। इस लड़ाई में सबसे जरूरी बात यह है कि मतदाता राजनीति का शिकार न बने। एसआईआर का मतलब अगर मतदाता सूची को बेहतर बनाना है तो यह काम बिना डर, बिना दबाव और बिना राजनीतिक भेदभाव के होना चाहिए। भाजपा को अपने आरोपों के साथ तथ्य रखने होंगे। कांग्रेस को अपनी आपत्तियों के साथ प्रमाण देने होंगे और चुनावी मशीनरी को हर पात्र मतदाता की आवाज सुननी होगी। क्योंकि चुनाव में सरकारें बदल सकती हैं, विधायक बदल सकते हैं, राजनीतिक नारे बदल सकते हैं। लेकिन एक बार मतदाता सूची में किसी पात्र नागरिक का नाम छूट गया तो उसके लोकतांत्रिक अधिकार पर सीधा असर पड़ सकता है। इसलिए एसआईआर की असली लड़ाई भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं है। असली सवाल यह हैकृमतदाता सूची कितनी साफ होगी और उसमें दर्ज हर पात्र नागरिक का वोट कितना सुरक्षित रहेगा।
सोमवार, 24 अगस्त 2026
udaydinmaan: यूकेडी सियासी जमीन पर ‘री-लांच’
udaydinmaan: यूकेडी सियासी जमीन पर ‘री-लांच’: वजूद बचाने को गांव-गांव बिछाया जा रहा यूकेडी का सांगठनिक जाल राज्य बनाने वाला दल अपनी जगह ढूंढ रहाकृगांव-कस्बों पर टिकीं नजरें लगातार हार और...
यूकेडी सियासी जमीन पर ‘री-लांच’
वजूद बचाने को गांव-गांव बिछाया जा रहा यूकेडी का सांगठनिक जाल
राज्य बनाने वाला दल अपनी जगह ढूंढ रहाकृगांव-कस्बों पर टिकीं नजरें
लगातार हार और बिखराव के बीच नए सिरे से ताकत झोंकने की तैयारी
देहरादून। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर उत्तराखंड क्रांति दल ने अपनी चुनावी तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया है। लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में अपने लिए मजबूत जमीन तलाश रहे दल के सामने इस बार चुनौती केवल चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने और जनता के बीच अपनी खोई राजनीतिक जगह वापस हासिल करने की भी है। यूकेडी कार्यकर्ताओं को अब गांव, कस्बे और विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय होने का संदेश दिया जा रहा है। राज्य गठन के आंदोलन से निकला यूकेडी उत्तराखंड की राजनीति में कभी मजबूत क्षेत्रीय विकल्प के रूप में देखा जाता था। लेकिन पिछले वर्षों में संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व के स्तर पर खींचतान और लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों के चलते दल का प्रभाव सीमित हुआ है। अब आगामी विधानसभा चुनाव को दल के लिए राजनीतिक अस्तित्व और पुनरुत्थान की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है।
यूकेडी की रणनीति में सबसे बड़ा जोर स्थानीय मुद्दों को चुनावी राजनीति के केंद्र में लाने पर है। पहाड़ से पलायन, रोजगार, मूल निवास, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन, गैरसैंण, पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा की बदहाल स्थिति और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार जैसे सवालों को लेकर कार्यकर्ताओं को जनता के बीच जाने की तैयारी है। दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन मुद्दों पर भाजपा और कांग्रेस भी लगातार अपना राजनीतिक पक्ष रखती रही हैं। ऐसे में यूकेडी को जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि वह केवल चुनावी मौसम में क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल उठाने वाला दल नहीं, बल्कि राज्य के हितों के लिए लगातार संघर्ष करने वाला राजनीतिक विकल्प है।
यूकेडी के भीतर संगठन को सक्रिय करने को लेकर बैठकों का दौर तेज होने की उम्मीद है। विधानसभा स्तर पर संभावित प्रत्याशियों और सक्रिय कार्यकर्ताओं की भूमिका तय करने के साथ ही बूथ स्तर पर टीम तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। पार्टी की कोशिश है कि चुनाव की घोषणा का इंतजार करने के बजाय उससे पहले ही संगठन को मैदान में उतार दिया जाए। कार्यकर्ताओं से कहा जा रहा है कि वह केवल सोशल मीडिया तक सीमित न रहें, बल्कि जनता के बीच जाकर स्थानीय समस्याओं को उठाएं। इससे पार्टी को दोहरा फायदा मिल सकता हैकृएक तरफ संगठन सक्रिय होगा और दूसरी तरफ संभावित प्रत्याशियों की जमीनी पकड़ का भी आकलन हो सकेगा।
उत्तराखंड की राजनीति में युवा मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं के बीच असंतोष की चर्चा लगातार होती रही है। यूकेडी इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकता है। दल के लिए चुनौती यह होगी कि वह युवाओं के बीच केवल भावनात्मक मुद्दों के बजाय रोजगार और राज्य की अर्थव्यवस्था को लेकर ठोस रोडमैप भी सामने रखे। युवा मतदाता अब केवल नारे नहीं, बल्कि अवसर और जवाबदेही की राजनीति भी चाहता है।
उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला रहने की स्थिति में यूकेडी के लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं होगा। इसके अलावा अन्य राजनीतिक दल भी क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दों को लेकर मैदान में सक्रिय हैं। ऐसे में यूकेडी को अपने पुराने आंदोलनकारी तेवर के साथ संगठनात्मक मजबूती और नए राजनीतिक नैरेटिव का संयोजन करना होगा। यूकेडी के लिए आगामी विधानसभा चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करेगा कि राज्य गठन के आंदोलन से निकली क्षेत्रीय राजनीति उत्तराखंड की नई पीढ़ी के बीच कितनी प्रासंगिक रह गई है। यदि दल अपने पारंपरिक मुद्दों को युवाओं के रोजगार, शिक्षा और भविष्य से जोड़ने में सफल रहता है और संगठन को बूथ स्तर तक खड़ा कर पाता है, तो वह चुनावी मुकाबले में अपनी मौजूदगी प्रभावी ढंग से दर्ज करा सकता है।
फिलहाल यूकेडी के कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ने लगी है और संकेत साफ हैंकृइस बार चुनावी रण में उतरने से पहले संगठन मैदान तैयार करने की कोशिश में है। अब देखना यह होगा कि यह सक्रियता केवल बैठकों और नारों तक सीमित रहती है या गांव-गांव तक वास्तविक राजनीतिक अभियान में बदलती है।
किताबें खुलीं और अफसर ‘खामोश’
अनोखा विरोध
बच्चों ने बिना शोर-शराबे के नगर निगम को बना दिया स्कूल
निगम के दफ्तरों में क्लास,साइलेंट प्रोटेस्ट ने दागे तीखे सवाल
पढ़ाई का हक मांगने खुद निगम की चौखट पर आ पहुंचे मासूम
बच्चों की किताबों ने खोला निगम की अव्यवस्था का रिपोर्ट कार्ड
देहरादून। स्कूल में पानी भर गया तो बच्चों ने छुट्टी मनाने के बजाय ऐसी जगह कक्षा लगाने का फैसला किया, जहां शायद उन्हें पढ़ाने की जरूरत सबसे ज्यादा थीकृनगर निगम के दफ्तर में। हाथों में किताबें और चेहरे पर मासूम सवाल लिए बच्चे नगर निगम पहुंचे और अधिकारियों के कमरों में ही अपनी कक्षा लगा दी। कुछ देर के लिए सरकारी दफ्तर, दफ्तर कम और स्कूल ज्यादा नजर आया। बच्चों ने अधिकारियों के कमरों में बैठकर पढ़ाई की। यह प्रदर्शन किसी राजनीतिक मंच से नहीं था। न कोई लंबा भाषण, न नारेबाजी का शोर। बच्चों की किताबें खुलीं और पढ़ाई शुरू हो गई। संदेश इतना सीधा था कि उसके लिए माइक की जरूरत नहीं पड़ीकृजब स्कूल में पढ़ने की जगह पानी में बदल जाए तो बच्चे आखिर पढ़ने कहां जाएं?
यह तस्वीर सिर्फ रुड़की के एक स्कूल की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था की कहानी है जिसमें बारिश के बाद सड़क पर पानी भरना आम बात हो सकती है, लेकिन स्कूल के भीतर पानी भर जाना बच्चों की पढ़ाई का सवाल बन जाता है। फिर बच्चे स्कूल से निकलकर उसी व्यवस्था के दरवाजे पर पहुंचते हैं, जिसके पास इस समस्या का समाधान होना चाहिए। सोचिए, एक बच्चा अपनी किताब लेकर स्कूल पहुंचता है। उसे ब्लैकबोर्ड चाहिए, शिक्षक चाहिए और बैठने के लिए जगह चाहिए। लेकिन वहां पानी है। अब वह नगर निगम पहुंचता है और कहता है कि आपकी व्यवस्था के कारण हमारा स्कूल कक्षा के लायक नहीं रहा, इसलिए आज आपकी कक्षा में पढ़ेंगे।
नगर निगम के कमरों में बैठे अधिकारी शायद फाइलों के बीच बच्चों को देखकर कुछ पल के लिए सोचने को मजबूर हुए होंगे कि विकास की रिपोर्ट में स्कूल की यह तस्वीर किस खाने में दर्ज होगी? सरकारी फाइलों में जल निकासी की योजनाएं हो सकती हैं। नालों की सफाई के दावे हो सकते हैं। बारिश से पहले तैयारियों की बैठकें हो सकती हैं। लेकिन बच्चों की कक्षा में पानी भर जाने के बाद एक सवाल उन तमाम कागजों से बड़ा हो जाता हैकृक्या शहर इतना भी सक्षम नहीं कि बच्चों को सूखी जगह पर बैठाकर पढ़ा सके? इस प्रदर्शन की सबसे दिलचस्प बात यही रही कि बच्चों ने व्यवस्था को भाषण नहीं दिया। उन्होंने किताब खोल दी।
यही शायद इस प्रदर्शन की ताकत भी थी। बच्चों ने अधिकारियों के कमरे में बैठकर यह नहीं कहा कि आप काम नहीं करते। उन्होंने बस अपनी कक्षा वहीं लगा दी। बाकी सवाल कमरे में मौजूद हर व्यक्ति के सामने खुद खड़े हो गए। बारिश में स्कूल डूबता है तो केवल फर्श गीला नहीं होता। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, शिक्षकों की परेशानी बढ़ती है और अभिभावकों की चिंता भी बढ़ती है। सरकारी व्यवस्था के लिए यह एक जलभराव हो सकता है, लेकिन बच्चे के लिए यह उसका स्कूल, उसकी पढ़ाई और उसका भविष्य है। शहरों को स्मार्ट बनाने की बातें अक्सर बड़े प्रोजेक्ट, सड़कों, पार्किंग, लाइट और दूसरी सुविधाओं के आसपास घूमती हैं। लेकिन किसी शहर की असली परीक्षा तब होती है जब बारिश होती है। यदि बारिश होते ही स्कूल में पानी भर जाए और बच्चों को नगर निगम में कक्षा लगानी पड़े, तो स्मार्टनेस के तमाम दावे बच्चों की किताब के एक पन्ने के सामने छोटे पड़ जाते हैं।
बच्चों का यह अनोखा प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने व्यवस्था को उसकी भाषा में जवाब दिया है। अधिकारी दफ्तर में बैठकर काम करते हैं, बच्चे स्कूल में बैठकर पढ़ते हैं। जब स्कूल में बैठने की जगह नहीं रही तो बच्चे दफ्तर में आ गए। बच्चों ने अपनी कक्षा लगा दी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगली बारिश में उन्हें फिर नगर निगम की कक्षा न लगानी पड़े और वे अपने स्कूल में ही बैठकर पढ़ सकें। क्योंकि किसी भी शहर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसके दफ्तर कितने सुंदर हैं, बल्कि यह है कि उसके बच्चों के स्कूल कितने सुरक्षित और पढ़ने लायक हैं और अगर बच्चों को अपनी पढ़ाई के लिए नगर निगम का कमरा चुनना पड़े, तो सवाल बच्चों से नहीं, व्यवस्था से पूछा जाना चाहिएकृआपकी कक्षा आखिर कहां लगी है?
उम्मीदों का ‘ह्यूमन चेन’ प्रोटेस्ट
सरकार की नजर नहीं पड़ी, तो दो जिलों के लोगों ने एक-दूसरे का हाथ थाम खींची उम्मीद की रेखा
अस्पताल, स्कूल और उम्मीद का रास्ता बंद हुआ, तो इंसानी कड़ियों से सज गई सड़क
बिना माइक और मंच के बनी मानव श्रृंखला, उधड़ती सड़कों पर व्यवस्था से तीखा सवाल
देहरादून। पहाड़ में सड़क सिर्फ सड़क नहीं होती। वह अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता है, बच्चे के स्कूल जाने का रास्ता है, किसान की उपज बाजार तक पहुंचाने का रास्ता है और गांव को बाकी दुनिया से जोड़ने वाली उम्मीद भी है। इसलिए जब सड़क टूटती है तो सिर्फ डामर नहीं टूटता, लोगों का भरोसा भी दरकने लगता है। उत्तराखंड के बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिलों में सड़क की बदहाली के खिलाफ लोगों ने कुछ ऐसा ही संदेश दिया। सड़क की हालत सुधारने की मांग को लेकर दो जिलों के लोगों ने मानव श्रृंखला बनाई। लोग सड़क किनारे खड़े हुए और एक-दूसरे का हाथ थामकर ऐसी कड़ी बना दी, जिसे शायद किसी सरकारी मशीनरी से ज्यादा आसानी से देखा जा सकता था। यह कोई वीआईपी कार्यक्रम नहीं था। न लाल कालीन था, न मंच पर भाषणों की लंबी सूची। सड़क थी, उसके किनारे खड़े लोग थे और बीच में वह सवाल था जो पहाड़ वर्षों से पूछ रहा हैकृआखिर सड़क कब ठीक होगी?
बागेश्वर और पिथौरागढ़ प्रशासनिक नक्शे पर अलग-अलग जिले हैं, लेकिन सड़क की समस्या ने दोनों को एक ही मुद्दे पर खड़ा कर दिया। लोगों की शिकायत है कि बदहाल सड़क के कारण रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। आवागमन मुश्किल है और बारिश के मौसम में परेशानी और बढ़ जाती है। पहाड़ में सड़क खराब होने का मतलब केवल गाड़ी का झटका नहीं है। इसका मतलब है कि मरीज को अस्पताल पहुंचाने में ज्यादा समय, किसान को बाजार तक पहुंचाने में ज्यादा परेशानी और बच्चे को स्कूल तक जाने में ज्यादा जोखिम। मैदान में सड़क पर गड्ढा खबर बन सकता है। पहाड़ में वही गड्ढा किसी परिवार की पूरी दिनचर्या बदल देता है।
मानव श्रृंखला का दृश्य अपने आप में एक सवाल था। जिन लोगों को सड़क चाहिए थी, उन्होंने सड़क के किनारे खड़े होकर अपने हाथों को जोड़ दिया। सड़क जोड़ने का काम सरकार का है, लेकिन यहां जनता खुद जुड़ गई। शायद यह प्रतीकात्मक तस्वीर व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा संदेश है। सड़क नहीं बनी तो लोग खुद श्रृंखला बन गए। रास्ता सरकार को बनाना था, लेकिन लोगों ने पहले अपनी एकता का रास्ता बना लिया। इसमें व्यंग्य भी है और दर्द भी। जिन लोगों को सरकार से सड़क चाहिए, वह सरकार के सामने अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए इंसानों की सड़क बना रहे हैं। सड़क निर्माण और मरम्मत की योजनाएं कागजों पर बनती हैं। बजट आता है, टेंडर होते हैं, काम शुरू होता है और फिर जनता इंतजार करती है। लेकिन पहाड़ में लोग पूछ रहे हैं कि योजना की उम्र कितनी है और सड़क की उम्र कितनी?
हर बरसात के बाद सड़क की हालत खराब होती है तो सवाल फिर वही लौट आता है। मरम्मत क्यों नहीं हुई? स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ? जिम्मेदारी किसकी है? सरकारी विभागों के पास इन सवालों के तकनीकी जवाब हो सकते हैं। लेकिन सड़क पर खड़े लोगों के पास एक सरल जवाब हैकृहमें चलने लायक सड़क चाहिए। उत्तराखंड में विकास की तस्वीर अक्सर बड़ी परियोजनाओं से बनाई जाती है। सुरंगें, पुल, हाईवे, चारधाम परियोजनाएं और बड़े-बड़े निर्माण विकास के प्रतीक बनते हैं। लेकिन पहाड़ का आम आदमी विकास को बहुत छोटे पैमाने पर भी मापता है। उसके लिए विकास का मतलब हैकृबीमार को समय पर अस्पताल पहुंचा सकना, बच्चे का सुरक्षित स्कूल पहुंचना, गांव की उपज बाजार तक ले जा पाना और बारिश में सड़क का संपर्क न टूटना। अगर इन बुनियादी जरूरतों के लिए लोगों को दो जिलों में मानव श्रृंखला बनानी पड़े, तो यह सिर्फ सड़क विभाग की समस्या नहीं रह जाती। यह विकास की प्राथमिकताओं पर सवाल बन जाता है।
बागेश्वर और पिथौरागढ़ के लोगों की यह मानव श्रृंखला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल सड़क की मांग नहीं है। इसमें पहाड़ के उस धैर्य की भी झलक है जो बार-बार टूटती सड़क, बंद रास्ते और सरकारी आश्वासनों के बावजूद अभी तक खड़ा है। लोगों ने हाथ पकड़ लिए हैं। अब देखना यह है कि सरकार सड़क पकड़ती है या फिर अगली बरसात तक यह सवाल भी किसी फाइल में रख दिया जाता है। क्योंकि पहाड़ के लोग कोई असंभव मांग नहीं कर रहे। वह सिर्फ इतना कह रहे हैं सड़क ऐसी हो, जिस पर जिंदगी चल सके।
रविवार, 23 अगस्त 2026
udaydinmaan: महंगाई का ‘मिठास’ पर डाका
udaydinmaan: महंगाई का ‘मिठास’ पर डाका: चीनी के दामों ने बिगाड़ा रसोई का बजट, विपक्ष हमलावर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने बढ़ती कीमतों पर जताया आक्रोश विपक्ष ने रसोई के बजट पर असर को...
राहुल गांधी का ‘स्त्री स्वाभिमान’ दांव
पुणे में छात्राओं के बीच राहुल गांधी का बयान
मनुस्मृति की व्याख्या को लेकर सियासी बहस
अधिकार और पहचान को लेकर सियासत तेज
देहरादून। हजारों छात्राओं के बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी का एक बयान अब राजनीतिक बहस का नया केंद्र बन गया है। पुणे में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्र पहचान, उनके अधिकार और अपने भविष्य के फैसले खुद लेने की क्षमता पर जोर देते हुए कहा कि महिलाएं किसी की नहीं, सिर्फ अपनी हैं। बयान सामने आने के बाद महिला अधिकार, सामाजिक परंपराओं और मनुस्मृति की व्याख्या को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। राहुल गांधी ने छात्राओं के बीच अपने संबोधन में महिलाओं की स्वतंत्रता को केवल सामाजिक अधिकार का विषय नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत पहचान और निर्णय लेने की आजादी से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि किसी भी महिला को उसकी पहचान किसी दूसरे व्यक्ति या रिश्ते के आधार पर नहीं दी जानी चाहिए। उसके सपने, उसकी महत्वाकांक्षा और उसके भविष्य का फैसला करने का अधिकार उसी के पास होना चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति में महिलाओं को लेकर की गई व्याख्याओं पर भी सवाल खड़े किए। उनका तर्क था कि समाज में महिलाओं की भूमिका और स्वतंत्रता को लेकर पुराने विचारों को आज के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर देखा जाना चाहिए। यही हिस्सा अब राजनीतिक बहस का कारण बन गया है। कांग्रेस इसे महिला सम्मान और समान अधिकार की आवाज के रूप में पेश कर रही है, जबकि भाजपा और उसके वैचारिक समर्थक राहुल गांधी के बयान को हिंदू परंपराओं और धार्मिक ग्रंथों पर राजनीतिक टिप्पणी के रूप में देख सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। राहुल गांधी का मंच और दर्शक वर्ग भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। हजारों छात्राओं के बीच महिलाओं की स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय की बात करके उन्होंने सीधे युवा महिला मतदाताओं से संवाद स्थापित करने की कोशिश की। राहुल का संदेश साफ था कि महिलाओं को किसी रिश्ते की पहचान से आगे बढ़कर स्वतंत्र नागरिक के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका जोर इस बात पर रहा कि महिला अपनी शिक्षा, करियर, जीवन और भविष्य को लेकर खुद निर्णय लेने में सक्षम हो।
राहुल गांधी का यह बयान केवल सामाजिक विमर्श तक सीमित रहने वाला नहीं है। भारतीय राजनीति में महिला मतदाता पिछले कुछ चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। ऐसे में महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान और अधिकार से जुड़े मुद्दे सीधे चुनावी राजनीति को प्रभावित करते हैं। कांग्रेस के लिए यह बयान युवाओं और महिलाओं के बीच अपने राजनीतिक संदेश को मजबूत करने का अवसर है। वहीं भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह इस मुद्दे पर राहुल गांधी के हमले का जवाब किस राजनीतिक और वैचारिक धरातल पर देती है।
दरअसल, बहस केवल मनुस्मृति की व्याख्या तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि आधुनिक भारत में महिला की पहचान क्या होकृकिसी रिश्ते, परिवार और सामाजिक भूमिका से तय होने वाली पहचान या अपने फैसले खुद लेने वाली स्वतंत्र नागरिक की पहचान? राहुल गांधी के बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज होने की संभावना है। समर्थक इसे महिला स्वतंत्रता और समानता का संदेश बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे धार्मिक-सामाजिक परंपराओं पर हमला करार दे सकते हैं। ऐसे में पुणे का यह बयान आने वाले दिनों में संसद से लेकर चुनावी मंचों तक सुनाई दे सकता है। राहुल गांधी ने छात्राओं के बीच जिस मुद्दे को उठाया है, वह अब केवल एक कार्यक्रम का बयान नहीं रह गया है। यह भारतीय राजनीति में महिला की स्वतंत्र पहचान, परंपरा बनाम आधुनिकता और संविधान बनाम सामाजिक रूढ़ियों की पुरानी बहस को एक बार फिर सामने लाने वाला मुद्दा बन गया है। आखिरकार सवाल यही है कि महिला को राजनीति कब तक किसी के वोट बैंक के रूप में देखेगी और कब उसे उसके अपने निर्णयों वाली नागरिक के रूप में स्वीकार करेगी? पुणे में राहुल गांधी का बयान इसी सवाल को राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आया है।
महंगाई का ‘मिठास’ पर डाका
चीनी के दामों ने बिगाड़ा रसोई का बजट, विपक्ष हमलावर
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने बढ़ती कीमतों पर जताया आक्रोश
विपक्ष ने रसोई के बजट पर असर को बनाया राजनीतिक हथियार
देहरादून। रसोई के बजट पर बढ़ते दबाव ने उत्तराखंड की सियासत को भी गरमा दिया है। चीनी समेत रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी कई वस्तुओं के दाम बढ़ने को लेकर कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि महंगाई लगातार आम परिवारों की जेब पर बोझ बढ़ा रही है, जबकि सरकार राहत देने के बजाय आंकड़ों और दावों के सहारे अपनी पीठ थपथपा रही है। चीनी जैसी रोजमर्रा की जरूरत की वस्तु के दाम बढ़ना भले ही देखने में छोटा मुद्दा लगे, लेकिन इसका सीधा असर घर के मासिक बजट पर पड़ता है। चाय से लेकर मिठाई और घरेलू खाद्य पदार्थों तक में चीनी का इस्तेमाल होता है। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों के खर्च का संतुलन भी बिगाड़ता है।
कांग्रेस ने बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार को घेरते हुए कहा कि आम आदमी पहले ही महंगाई, रोजगार और आय से जुड़े दबावों से जूझ रहा है। ऐसे में खाद्य और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी उसकी मुश्किलें और बढ़ा रही है। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार को केवल महंगाई दर के आंकड़े बताने के बजाय बाजार में आम उपभोक्ता की स्थिति देखनी चाहिए। उनका तर्क है कि कागज पर महंगाई नियंत्रित होने का दावा अपनी जगह है, लेकिन बाजार में परिवार का मासिक खर्च बढ़ रहा है तो इसका असर राजनीतिक रूप से भी दिखाई देगा।
महंगाई भारतीय राजनीति में हमेशा से बड़ा चुनावी मुद्दा रही है। खासकर विधानसभा चुनावों के दौरान रसोई का बजट सीधे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाता है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए विपक्ष को सरकार को घेरने के लिए यह मुद्दा उपयोगी हथियार मिल सकता है। महंगाई का सवाल केवल चीनी तक सीमित नहीं है। खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, दूध और अन्य दैनिक जरूरतों की कीमतों में उतार-चढ़ाव आम उपभोक्ता की चिंता बढ़ाता है। विपक्ष इसी व्यापक तस्वीर को सामने रखकर सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठा रहा है।
सत्तारूढ़ भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह बढ़ती कीमतों को लेकर जनता की नाराजगी को किस तरह शांत करती है। सरकार के पास कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों और बाजार व्यवस्था से जुड़े अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक चुनौती केवल आंकड़ों से हल नहीं होगी। क्योंकि चुनावी राजनीति में जनता यह नहीं देखती कि महंगाई का कारण वैश्विक बाजार है या घरेलू आपूर्ति व्यवस्था। वह सबसे पहले अपनी जेब देखती है। महीने के अंत में घर का बजट बिगड़ रहा है तो सरकार से सवाल होना स्वाभाविक है।
हालांकि महंगाई के मुद्दे ने कांग्रेस समेत विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का अवसर जरूर दिया है, लेकिन इसे चुनावी मुद्दे में बदलना विपक्ष के लिए भी चुनौतीपूर्ण होगा। केवल बढ़ी कीमतों की सूची गिनाने से जनता का भरोसा हासिल नहीं किया जा सकता। विपक्ष को यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह महंगाई को नियंत्रित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाएगा। उत्तराखंड की सियासत में अब महंगाई का सवाल धीरे-धीरे जमीन पकड़ सकता है। चीनी के बढ़ते दाम से शुरू हुई बहस यदि दाल, तेल, सब्जी, दूध और अन्य जरूरी वस्तुओं तक पहुंचती है तो यह सरकार के लिए असहज राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
चीनी की कीमतों पर एथेनाल का ‘तड़का’
उत्तराखंड में आमने-सामने आ गए कांग्रेस-भाजपा
कांग्रेस ने एथेनाल नीति को बताया महंगाई की वजह
भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को करार दिया प्रोपेगेंडा
देहरादून। चीनी के बढ़ते दाम को लेकर उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर एथेनाल का मुद्दा गर्म हो गया है। कांग्रेस ने चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को केंद्र की एथेनाल नीति से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा है। वहीं भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक प्रोपेगेंडा करार दिया है। दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने चीनी की कीमतों के सवाल को सीधे केंद्र की कृषि और ऊर्जा नीति से जोड़ दिया है। कांग्रेस का तर्क है कि गन्ने से चीनी उत्पादन के बजाय एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति का असर चीनी की उपलब्धता और बाजार कीमतों पर पड़ सकता है। पार्टी का कहना है कि जब गन्ने और उसके उत्पादों का एक हिस्सा एथेनॉल के लिए इस्तेमाल होता है तो चीनी उत्पादन की मात्रा प्रभावित होने की आशंका रहती है। ऐसे में यदि बाजार में आपूर्ति का संतुलन बिगड़ता है तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
भाजपा ने कांग्रेस के इस तर्क को राजनीतिक रंग देने की कोशिश बताया है। पार्टी का कहना है कि चीनी की कीमतों में उतार-चढ़ाव को केवल एथेनाल नीति से जोड़ देना आर्थिक तथ्यों को नजरअंदाज करना है। भाजपा के अनुसार चीनी बाजार पर उत्पादन, मांग, स्टाक, निर्यात-आयात और वैश्विक बाजार समेत कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। दरअसल एथेनाल नीति पिछले कुछ वर्षों से केंद्र की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। पेट्रोल में एथेनाल मिश्रण बढ़ाने की नीति का उद्देश्य आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करना, किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना और कृषि उत्पादों से वैकल्पिक ईंधन तैयार करना है। यही नीति अब चीनी की कीमतों को लेकर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कांग्रेस इसे सरकार की प्राथमिकताओं से जोड़कर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि एथेनॉल को चीनी की महंगाई का सीधा कारण बताना तथ्यात्मक रूप से अधूरा निष्कर्ष है।
महंगाई का मुद्दा जनता से सीधे जुड़ा होने के कारण दोनों दल इसे अपने-अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रहे हैं। कांग्रेस के लिए चीनी की बढ़ती कीमत सरकार की आर्थिक नीतियों पर हमला करने का अवसर है। वहीं भाजपा इसे विपक्ष की ओर से सरकार को बदनाम करने की कोशिश के तौर पर पेश कर रही है। राजनीतिक रूप से यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महंगाई का असर सीधे परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ता है। चीनी भले ही रोजमर्रा की खरीदारी में बड़ी वस्तु न हो, लेकिन इसके दाम बढ़ने का असर चाय, मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।
एथेनाल और चीनी की कीमतों के बीच संबंध को लेकर राजनीतिक दावों से अलग वास्तविक तस्वीर उत्पादन और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। गन्ने का कितना हिस्सा चीनी के लिए और कितना एथेनाल के लिए जाता है, चीनी का उत्पादन कितना हुआ, घरेलू मांग कितनी है और बाजार में उपलब्ध स्टाक कितना हैकृइन सभी पहलुओं को देखे बिना केवल एक कारण तय करना आसान नहीं है। यही वह जगह है जहां राजनीतिक बहस और आर्थिक विश्लेषण अलग-अलग रास्ते पकड़ लेते हैं। कांग्रेस इसे सरकार की नीति का परिणाम बता रही है, जबकि भाजपा इसे विपक्ष का प्रोपेगेंडा बता रही है। लेकिन आम उपभोक्ता के लिए बहस का केंद्र इससे कहीं सरल हैकृबाजार में चीनी कितने की मिल रही है और आगे इसकी कीमत कहां जाएगी?
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले महंगाई जैसे मुद्दे राजनीतिक दलों के लिए अहम होते जा रहे हैं। कांग्रेस यदि चीनी की कीमतों को एथेनाल नीति से जोड़कर व्यापक महंगाई के मुद्दे में बदलती है तो भाजपा को सरकार की नीतियों का बचाव करना होगा। वहीं भाजपा के लिए चुनौती केवल कांग्रेस के आरोपों को प्रोपेगेंडा बताने की नहीं, बल्कि उपभोक्ता को यह भरोसा दिलाने की भी होगी कि सरकार महंगाई पर नजर रख रही है। फिलहाल चीनी की मिठास पर सियासत कड़वी होती जा रही है। कांग्रेस के लिए एथेनाल सरकार की नीति पर सवाल उठाने का हथियार है तो भाजपा के लिए वही मुद्दा विपक्ष के प्रोपेगेंडा का उदाहरण। असली फैसला राजनीतिक मंचों पर नहीं, बाजार की कीमतों और उपभोक्ता की जेब करेगी।
मिशन 2027 के लिए बूथ पर ‘कमल’
बूथ सशक्तिकरण से भाजपा का चुनावी आगाज
संगठन को जमीनी स्तर पर धार देने की तैयारी
प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में गठित की गई टीम
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर भाजपा ने अब अपनी रणनीति को पूरी तरह बूथ स्तर तक ले जाने की कवायद तेज कर दी है। संगठन को चुनावी मोड में लाते हुए पार्टी बूथ सशक्तिकरण अभियान के जरिये धरातल पर अपनी चुनावी रणनीति का आगाज करने जा रही है। इसके लिए प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में बूथ सशक्तिकरण अभियान की टीम का गठन किया गया है। भाजपा का फोकस अब केवल बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों और नेताओं की सभाओं तक सीमित रहने के बजाय बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने पर है। पार्टी की रणनीति है कि प्रत्येक बूथ पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाई जाए, स्थानीय स्तर पर मतदाताओं से संपर्क मजबूत किया जाए और संगठन की योजनाओं एवं सरकार की उपलब्धियों को घर-घर तक पहुंचाया जाए।
भाजपा की चुनावी राजनीति में बूथ प्रबंधन हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी एक बार फिर इसी माडल को मजबूत करने में जुटी है। बूथ सशक्तिकरण अभियान के तहत कमजोर बूथों की पहचान, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, पन्ना स्तर तक संपर्क और स्थानीय मुद्दों की जानकारी जुटाने पर जोर दिए जाने की रणनीति है। पार्टी की कोशिश यह भी है कि बूथ स्तर पर संगठन केवल चुनाव के समय सक्रिय दिखाई न दे, बल्कि लगातार जनता के बीच मौजूद रहे। इसके लिए बूथ अध्यक्ष से लेकर पन्ना प्रमुख और अन्य जिम्मेदार कार्यकर्ताओं की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने की तैयारी की जा रही है।
बूथ सशक्तिकरण अभियान को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में टीम गठित की गई है। यह टीम संगठनात्मक जिलों और मंडलों के साथ समन्वय करते हुए बूथों की स्थिति का आकलन करेगी और आवश्यकतानुसार कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां सौंपेगी। भाजपा की रणनीति में यह अभियान इसलिए भी अहम है क्योंकि विधानसभा चुनाव में हर सीट का परिणाम बूथ स्तर के प्रदर्शन से तय होता है। पार्टी कमजोर बूथों को चिन्हित कर वहां संगठन की पकड़ मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे सकती है। बूथ सशक्तिकरण अभियान को केवल संगठनात्मक कवायद न रखकर सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों से भी जोड़ने की तैयारी है। भाजपा कार्यकर्ताओं के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने के साथ ही लाभार्थियों से संपर्क मजबूत करने की रणनीति पर काम करेगी।
पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि सरकार की उपलब्धियों और संगठन के संदेश को स्थानीय स्तर के मुद्दों से कैसे जोड़ा जाए। उत्तराखंड में रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, महंगाई और आपदा जैसे सवाल जनता के बीच महत्वपूर्ण हैं। बूथ स्तर का कार्यकर्ता इन मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया संगठन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीधी टक्कर कांग्रेस से मानी जा रही है। ऐसे में बूथ सशक्तिकरण अभियान को पार्टी की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा जहां अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे का लाभ उठाना चाहती है, वहीं कांग्रेस भी लगातार संगठन को सक्रिय करने और सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए चुनौती सत्ता विरोधी रुझानों को रोकने के साथ-साथ युवा, महिला और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंच बनाने की भी है। बूथ स्तर का नेटवर्क इस काम में पार्टी के लिए सबसे उपयोगी माध्यम बन सकता है।
भाजपा की ओर से बूथ सशक्तिकरण अभियान की टीम का गठन इस बात का संकेत है कि 2027 की चुनावी तैयारियां अब बैठकों और रणनीति दस्तावेजों से आगे बढ़कर जमीन पर उतरने लगी हैं। आने वाले महीनों में संगठनात्मक गतिविधियों, बूथ बैठकों और मतदाता संपर्क अभियानों में तेजी देखने को मिल सकती है। कुल मिलाकर भाजपा ने चुनावी रण में उतरने से पहले अपना सबसे मजबूत हथियार धारदार करने की तैयारी शुरू कर दी हैकृबूथ। अब देखना होगा कि बूथ सशक्तिकरण अभियान संगठन को कितनी मजबूती देता है और 2027 के चुनावी मुकाबले में भाजपा की जमीन कितनी पुख्ता कर पाता है।
एसआईआर पर ‘सियासी’ टकराव
बीएलओ और बीएलए-2 को धमकाने का आरोप
चुनाव आयोग से मिला भाजपा का प्रतिनिधिमंडल
प्रक्रिया बाधित करने वालों पर कार्रवाई की मांग
देहरादून। उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर एसआईआर प्रक्रिया को प्रभावित करने और बूथ स्तर पर काम कर रहे बीएलओ तथा पार्टी के बीएलए-2 को कथित रूप से धमकाने का आरोप लगाया है। भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए एसआईआर की प्रक्रिया बाधित करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की। भाजपा का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से बूथ स्तर पर भ्रम और दबाव का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी का कहना है कि निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और राजनीतिक दलों के अधिकृत प्रतिनिधियों को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दिया जाना चाहिए।
भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रखते हुए कहा कि एसआईआरजैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में किसी भी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। पार्टी ने आयोग से मांग की कि बीएलओ और बीएलए-2 के काम में बाधा डालने, उन्हें धमकाने अथवा दबाव बनाने की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। भाजपा नेताओं का कहना है कि मतदाता सूची का शुद्ध और पारदर्शी होना चुनाव की विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी है। यदि बूथ स्तर पर ही प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास होगा तो इसका असर पूरी चुनावी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर कांग्रेस एसआईआर को लेकर पहले से ही निर्वाचन आयोग और भाजपा पर सवाल उठाती रही है। कांग्रेस का आरोप है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में यदि वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित होते हैं तो इसका सीधा असर मताधिकार पर पड़ेगा। पार्टी ने बूथ स्तर पर निगरानी और अपने प्रतिनिधियों की सक्रिय भूमिका की बात कही है। यही वजह है कि एसआईआर अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। मतदाता सूची को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दल आमने-सामने हैं और हर पक्ष दूसरे पर चुनावी लाभ के लिए प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगा रहा है।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 में प्रस्तावित हैं। ऐसे में मतदाता सूची का पुनरीक्षण राजनीतिक दलों के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया है। चुनाव से पहले मतदाता सूची में नाम जुड़ने, हटने या संशोधन की प्रक्रिया पर राजनीतिक दलों की नजर स्वाभाविक रूप से बनी हुई है। भाजपा का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है। पार्टी ने आयोग से आग्रह किया कि प्रक्रिया में किसी भी तरह की बाधा को गंभीरता से लिया जाए और कानून के तहत कार्रवाई हो। वहीं कांग्रेस की ओर से लगातार यह सवाल उठाया जा रहा है कि कहीं पुनरीक्षण की प्रक्रिया के नाम पर वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित न हों। ऐसे में आने वाले दिनों में एसआईआर को लेकर दोनों दलों की सियासी बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं।
एसआईआर को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ते आरोप-प्रत्यारोप ने निर्वाचन आयोग के सामने भी चुनौती बढ़ा दी है। आयोग के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि पूरी प्रक्रिया राजनीतिक विवाद से अलग, पारदर्शी और नियमों के मुताबिक पूरी हो। मतदाता सूची में एक भी वास्तविक मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना गंभीर विषय है, वहीं अपात्र नामों की मौजूदगी भी चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती है। इसलिए राजनीतिक आरोपों के बीच असली कसौटी प्रक्रिया की पारदर्शिता और शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण की होगी।
फिलहाल एसआईआर उत्तराखंड में चुनावी राजनीति का नया मोर्चा बन चुका है। भाजपा आयोग के दरवाजे पर पहुंचकर कांग्रेस पर प्रक्रिया बाधित करने का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस पहले से ही एसआईआर को लेकर सवाल उठा रही है। 2027 के चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर छिड़ी यह सियासी जंग आने वाले दिनों में और धार पकड़ सकती है।
शनिवार, 22 अगस्त 2026
udaydinmaan: 60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’
udaydinmaan: 60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’: आमजन के लिए उम्र की सीमा, साहबों के लिए आजीवन कुर्सी कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, पद बदलते हैं पर चेहरा वही पेंशन भी जेब में और भारी-भरकम सं...
60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’
आमजन के लिए उम्र की सीमा, साहबों के लिए आजीवन कुर्सी
कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, पद बदलते हैं पर चेहरा वही
पेंशन भी जेब में और भारी-भरकम संविदा का वेतन भी जारी
अफसरों के लिए अनलिमिटेड एक्सटेंशन पर उठे गंभीर सवाल
देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी नौकरी की एक अजीब कहानी है। कर्मचारी की उम्र 60 साल होती है, फाइलों में सेवा समाप्त हो जाती है, पेंशन शुरू हो जाती है, लेकिन कुछ अफसरों की सरकारी पारी खत्म नहीं होती। कुर्सी बदल जाती है, पदनाम बदल जाता है, कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, कभी आयोग तो कभी किसी समिति में नई भूमिका मिल जाती है। यानी सरकारी नौकरी का कैलेंडर आम आदमी के लिए चलता है, लेकिन कुछ खास अफसरों के लिए शायद अतिरिक्त पन्ने भी रखे गए हैं। सवाल यह नहीं है कि किसी सेवानिवृत्त अफसर की विशेषज्ञता का इस्तेमाल क्यों किया जाए। सवाल यह है कि किस आधार पर, कितने समय के लिए और किस पारदर्शी प्रक्रिया के तहत? उत्तराखंड में सेवानिवृत्त सरकारी सेवकों की जनहित और अपरिहार्यता की स्थिति में पुनर्नियुक्ति का प्रावधान है। शासन के एक आदेश में सलाहकार, परामर्शी, विशेष कार्याधिकारी और विशेषज्ञ समन्वयक जैसे पदों पर संविदा के आधार पर तैनाती की व्यवस्था का उल्लेख है।
यहीं से असली सवाल पैदा होता है। अगर सरकार को किसी अफसर का अनुभव इतना जरूरी लगता है कि रिटायरमेंट के बाद भी उसे सरकारी काम सौंपना पड़े, तो फिर क्या राज्य में नई पीढ़ी के अधिकारियों और विशेषज्ञों की कमी है? और अगर कमी है तो उसे दूर करने की योजना क्या है? उत्तराखंड का युवा नौकरी के लिए परीक्षा देता है। हजारों युवा सालों तैयारी करते हैं। रिक्तियों का इंतजार करते हैं। भर्ती परीक्षाओं की तारीख देखते हैं। कभी परीक्षा टलती है, कभी परिणाम का इंतजार होता है। दूसरी तरफ सरकारी व्यवस्था में ऐसी तस्वीर दिखाई देती है जिसमें रिटायर होने के बाद भी अनुभवी अफसरों के लिए सरकारी दरवाजे बंद नहीं होते।
यह विरोधाभास सवाल पूछता है। क्या सरकारी व्यवस्था अनुभव के नाम पर एक ही चेहरे को बार-बार मौका देती रहेगी? सरकार कह सकती है कि अनुभवी अफसरों की जरूरत है। बिल्कुल है। अनुभव किसी भी प्रशासन की पूंजी है। लेकिन अनुभव और स्थायी सरकारी पुनर्वास में अंतर है। किसी विशेष परियोजना के लिए विशेषज्ञ की जरूरत हो तो निश्चित अवधि की नियुक्ति समझ में आती है। लेकिन अगर रिटायरमेंट के बाद लगातार नई जिम्मेदारियां मिलती रहें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकारी व्यवस्था में पदों का एक अनौपचारिक पोस्ट-रिटायरमेंट क्लब तैयार हो रहा है? और यह सवाल सिर्फ एक सरकार का नहीं है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन यह व्यवस्था कई बार अपना रास्ता खोज लेती है।
लोकतंत्र में कुर्सी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती। सरकारी पद जनता के पैसे से चलते हैं। इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि रिटायरमेंट के बाद किसी अधिकारी की पुनर्नियुक्ति क्यों की गई, उसके लिए चयन की प्रक्रिया क्या रही, कितने उम्मीदवारों पर विचार हुआ और उसकी नियुक्ति की समयसीमा क्या है। वरना विशेषज्ञता शब्द धीरे-धीरे पहचान का दूसरा नाम बन सकता है। उत्तराखंड जैसे युवा राज्य में यह बहस और जरूरी है। यहां बेरोजगार युवाओं की सबसे बड़ी शिकायत सिर्फ नौकरी की कमी नहीं, बल्कि अवसरों की समानता को लेकर भी है। जब युवा देखता है कि एक ओर सरकारी पदों के लिए उम्र सीमा खत्म हो जाती है और दूसरी ओर कुछ रिटायर अफसरों के लिए सरकारी व्यवस्था में नई भूमिकाएं निकल आती हैं, तो उसके मन में सवाल पैदा होना स्वाभाविक है। सरकार को इस व्यवस्था के लिए एक साफ नीति बनानी चाहिए।
रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति अपवाद हो, परंपरा नहीं। हर पुनर्नियुक्ति के साथ कारण सार्वजनिक हो। पद की अवधि तय हो। काम का स्पष्ट दायरा हो। प्रदर्शन की समीक्षा हो। और जहां काम किसी नियमित सेवा अधिकारी या नए विशेषज्ञ से कराया जा सकता है, वहां सिर्फ पुराने प्रशासनिक संपर्कों के आधार पर नियुक्ति न हो। क्योंकि लोकतंत्र में अनुभव जरूरी है, लेकिन अवसरों का दरवाजा हमेशा एक ही पीढ़ी के लिए खुला रहना जरूरी नहीं है। उत्तराखंड को अब यह तय करना होगा कि सरकारी सेवा का मतलब 60 साल की उम्र में खत्म होने वाली नौकरी है या फिर कुछ लोगों के लिए सरकारी व्यवस्था में चलती रहने वाली दूसरी पारी? अगर दूसरी पारी जरूरी है तो उसके नियम सबके सामने होने चाहिए। वरना जनता यही पूछेगीकृकि सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट हुआ है या सिर्फ पदनाम से?
बेटी का न्याय बनाम ‘सियासी जंग’
अंकिता भंडारी केस में आखिर कब तक चलेगी बयानबाजी
सीबीआई जांच पर खिंची तलवारों के बीच सवाल दरकिनार
अंकिता की आत्मा को न्याय चाहिए, राजनीति की रोटियां नहीं
प्रकरण पर सियासत तेज,जांच अदालत में या बयानों के मंच पर
देहरादून। अंकिता प्रकरण उत्तराखंड के लिए सिर्फ एक मुकदमा नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है, जो एक बेटी के परिवार से लेकर पूरे समाज तक फैला हुआ है। ऐसे मामले में सबसे जरूरी चीज हैकृन्याय। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि न्याय की इस लंबी यात्रा के बीच राजनीति लगातार अपना रास्ता खोज लेती है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि अंकिता प्रकरण में सीबीआई जांच को लेकर सरकार और जांच एजेंसी की भूमिका सवालों के घेरे में है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष का कहना है कि कांग्रेस इस संवेदनशील मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाने में जुटी है और केंद्रीय जांच ब्यूरो तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर नियमानुसार जांच कर रही है। यहीं से असली सवाल पैदा होता हैकृकि क्या किसी जांच की दिशा बयानबाजी से तय होगी या सबूतों से? किसी भी आपराधिक मामले में अदालत के सामने आरोप नहीं, साक्ष्य टिकते हैं। जांच एजेंसी का काम प्रेस कांफ्रेंस में फैसला सुनाना नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों, दस्तावेजों, बयानों और वैज्ञानिक साक्ष्यों की पड़ताल करना है। सीबीआई हो या कोई दूसरी जांच एजेंसी, उसकी जांच का अंतिम मूल्यांकन अदालत में होना है। लेकिन राजनीति को अदालत का इंतजार कम ही पसंद आता है।
एक तरफ कांग्रेस सवाल पूछ रही है। दूसरी तरफ भाजपा उन सवालों को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज कर रही है। टीवी स्क्रीन और सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप का शोर बढ़ता जा रहा है। मगर इस शोर में सबसे महत्वपूर्ण आवाज कहीं पीछे छूटने का खतरा हैकृअंकिता के परिवार की न्याय की आवाज। कांग्रेस यदि सीबीआई जांच पर सवाल उठाती है तो उसे सिर्फ राजनीतिक बयान देने के बजाय ठोस तथ्यों के साथ अपनी आपत्तियां सामने रखनी चाहिए। कौन-सा साक्ष्य नजरअंदाज हुआ? किस बिंदु पर जांच में कमी है? किस तथ्य की अनदेखी की गई? जनता को यह बताया जाना चाहिए। उधर सरकार और भाजपा के पास भी केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि सीबीआई स्वतंत्र एजेंसी है। जनता का भरोसा सिर्फ इस वाक्य से नहीं बनता। जांच की प्रक्रिया में पारदर्शिता, अदालत में मजबूत पैरवी और पीड़ित परिवार को समय पर न्यायकृयही भरोसा पैदा करते हैं। क्योंकि जनता अब राजनीतिक दावों से आगे देखना चाहती है।
अंकिता प्रकरण में वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवार के लिए हर नया बयान शायद पुराने जख्म को फिर खोलता है। इसलिए राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि किसी बेटी की त्रासदी को चुनावी पोस्टर, प्रेस नोट और राजनीतिक भाषण का विषय बनाने से न्याय नहीं मिलता और यहां एक असुविधाजनक सवाल दोनों पक्षों से है। अगर जांच सही है तो अदालत में साक्ष्य बोलने दीजिए। अगर जांच में कमी है तो ठोस तथ्य सामने रखिए। सिर्फ राजनीति हो रही है कहकर हर सवाल को खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक जवाब नहीं है। और हर जांच को साजिश बताकर संदेह पैदा करना भी न्याय प्रक्रिया को मजबूत नहीं करता।
उत्तराखंड के लोगों ने इस प्रकरण में बहुत कुछ देखा हैकृआक्रोश, आंदोलन, राजनीतिक आरोप, वादे और फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया। अब जनता को बहस नहीं, परिणाम चाहिए। राजनीति अपनी जगह है। जांच अपनी जगह। अदालत अपनी जगह। अंकिता के मामले में सबसे जरूरी यह है कि जांच निष्पक्ष हो, साक्ष्यों के आधार पर हो और अदालत के सामने पूरा सच पहुंचे। दोषी कौन है, इसका फैसला राजनीतिक दलों के मंच से नहीं, कानून और न्यायालय की प्रक्रिया से होना चाहिए। क्योंकि आखिर में सवाल यह नहीं रहेगा कि किस पार्टी ने कितनी प्रेस कांफ्रेंस कीं। सवाल यह रहेगा कि अंकिता को न्याय मिला या नहीं? और इस सवाल का जवाब किसी पार्टी के प्रवक्ता के पास नहीं, न्याय की प्रक्रिया के पास होना चाहिए।
वोटर लिस्ट पर ‘सियासी जंग’
ड्रामेबाजी और घुसपैठिए के बयानों में उलझा लोकतंत्र का असली सवाल
मतदाता सूची के बहाने कांग्रेस की घेराबंदी और भाजपा का काउंटर अटैक
अगर सूची में खोट नहीं तो इतने सवाल क्यों और खोट है तो सुधार कब होगा
विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कांग्रेस आक्रामक, भाजपा ने साधा निशाना
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प तस्वीर दिखाई दे रही है। एक तरफ कांग्रेस विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर लगातार सवाल उठा रही है, दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस की इस मुहिम को ड्रामेबाजी बताकर उसके जमीनी संगठन पर सवाल खड़े कर रही है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस जमीनी राजनीति में कमजोर हो चुकी है और अब मतदाता सूची के मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन लोकतंत्र में असली सवाल यह नहीं कि कौन किसे ड्रामेबाज कह रहा है। असली सवाल यह है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसे ठीक कौन करेगा और अगर गड़बड़ी नहीं है तो इतने सवाल क्यों उठ रहे हैं? भाजपा कह रही है कि उत्तराखंड की सरकार यहां की जनता चुनेगी, कोई घुसपैठिया नहीं। राजनीतिक संदेश साफ हैकृमतदाता सूची की शुचिता को राष्ट्रीय सुरक्षा और पहचान के सवाल से जोड़कर कांग्रेस पर दबाव बनाना। भाजपा के लिए यह मुद्दा चुनावी रणनीति का हिस्सा भी है और अपने समर्थक मतदाताओं को सक्रिय करने का माध्यम भी।
कांग्रेस के सामने चुनौती दूसरी है। सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस, बयान और आरोपों से चुनाव नहीं जीते जाते। चुनाव बूथ पर लड़ा जाता है। मतदाता से संपर्क, संगठन की सक्रियता, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और कार्यकर्ताओं की मौजूदगीकृयही जमीनी राजनीति की असली परीक्षा है। यदि कांग्रेस एसआईआर को लेकर गंभीर है तो उसे बूथ स्तर तक अपने प्रतिनिधि उतारने होंगे, प्रभावित मतदाताओं की सूची तैयार करनी होगी और तथ्य के साथ चुनाव आयोग के सामने आपत्तियां रखनी होंगी। वरना भाजपा का ड्रामेबाजी वाला आरोप कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार बन सकता है। लेकिन भाजपा को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सूची कोई राजनीतिक प्रचार का दस्तावेज नहीं, लोकतंत्र की बुनियाद है। किसी वास्तविक भारतीय मतदाता का नाम केवल प्रक्रिया की गड़बड़ी के कारण छूटता है तो उसका नुकसान किसी पार्टी को नहीं, लोकतंत्र को होता है। इसलिए एसआईआर को लेकर उठ रहे हर गंभीर सवाल का जवाब तथ्यों से देना जरूरी है।
घुसपैठिया नहीं, जनता चुनेगी सरकारकृयह राजनीतिक नारा सुनने में प्रभावी हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत मतदाता की पहचान से आगे उसकी स्वतंत्र पसंद में है। मतदाता कौन है, यह कानून और चुनावी प्रक्रिया तय करेगी और किसे वोट देना है, यह जनता तय करेगी और यहीं 2027 की लड़ाई दिलचस्प होती जा रही है। भाजपा अपने संगठन और बूथ नेटवर्क के भरोसे कांग्रेस पर बढ़त का दावा कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल, बेरोजगारी, भर्ती विवाद, महंगाई, पलायन और स्थानीय मुद्दों को हथियार बनाने की कोशिश में है। लेकिन इन मुद्दों को वोट में बदलने के लिए कांग्रेस को बयानबाजी से कहीं आगे जाना होगा।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा भाजपा नहीं, उसकी अपनी जमीनी निष्क्रियता है। यदि पार्टी के नेता राजधानी में एसआईआर पर रोज बयान देते रहें और गांव-कस्बे के बूथ पर कार्यकर्ता दिखाई न दे, तो राजनीति प्रेस नोट में जरूर जिंदा रह सकती है, चुनाव में नहीं। दूसरी ओर भाजपा यदि संगठन की ताकत के भरोसे यह मान ले कि चुनाव पहले ही जीत लिया गया है तो वह भी गलती करेगी। उत्तराखंड का मतदाता कई बार सत्ता को चौंकाने की क्षमता रखता है। पहाड़ के गांव से लेकर मैदानी शहर तक मतदाता अपने मुद्दों पर फैसला करता है और चुनाव के दिन राजनीतिक समीकरणों की सारी गणित बदल सकता है। इसलिए एसआईआर का मुद्दा सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई नहीं होना चाहिए। यह सवाल होना चाहिए कि किसका नाम मतदाता सूची में है, किसका नाम नहीं है और क्यों नहीं है।
चुनावी शोर में यह बुनियादी सवाल दबना नहीं चाहिए। क्योंकि सरकार न भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट चुनेगा, न कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस। सरकार वही चुनेगा जिसके सामने आखिर में मतदाता अपना वोट डालेगा और उस मतदाता को घुसपैठिया कहकर नहीं, उसके अधिकार और भरोसे के साथ देखना होगा। 2027 की असली लड़ाई अभी शुरू हुई है। एसआईआर उसका एक अध्याय है। फैसला पूरी किताब पर होगा।
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