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शनिवार, 13 जून 2026
‘मीडिया संवाद में संवाद गायब’
सवालों से दूरी या संवाद का नया माडल, भाजपा मुख्यालय के मीडिया संवाद पर उठे सवाल
पत्रकारों को बुलाया, उपलब्धियां सुनाई, राष्ट्रगान और कार्यक्रम समाप्त, कोई सवाल-जवाब नहीं
भाजपा मुख्यालय में आयोजित संवाद पर छिड़ी बहस, कांग्रेस बोली-प्रेस कान्फ्रेंस या प्रस्तुति सभा
देहरादून। दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के प्रदेश मुख्यालय में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम अब राजनीतिक और पत्रकारिता जगत में चर्चा का विषय बन गया है। कार्यक्रम में पत्रकारों को आमंत्रित तो किया गया, लेकिन जिस तरह पूरा आयोजन संचालित हुआ, उसने संवाद और प्रेस कान्फ्रेंस की परंपराओं को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
भाजपा मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् से हुई। इसके बाद मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के 12 वर्षों के कार्यकाल की उपलब्धियों को विस्तार से रखा। केंद्र सरकार की योजनाओं, विकास कार्यों और उपलब्धियों पर करीब एक घंटे तक प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान हुआ और आयोजन समाप्त घोषित कर दिया गया। लेकिन पूरे कार्यक्रम के दौरान सबसे अधिक जिस बात की चर्चा रही, वह थी पत्रकारों के सवालों के लिए मंच का न खुलना। आमतौर पर मीडिया संवाद या प्रेस वार्ता का उद्देश्य पत्रकारों और सत्ता पक्ष के बीच प्रत्यक्ष संवाद माना जाता है, जहां पत्रकार जनहित से जुड़े प्रश्न पूछते हैं और सरकार या संगठन अपना पक्ष रखता है। लेकिन इस आयोजन में संवाद की जगह एकतरफा प्रस्तुति देखने को मिली।
राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि पत्रकारों को केवल उपलब्धियां सुनाने के लिए बुलाया जाए और उनसे सवाल पूछने का अवसर ही न दिया जाए, तो ऐसे कार्यक्रम का स्वरूप मीडिया संवाद कम और प्रचार कार्यक्रम अधिक प्रतीत होता है। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका केवल सूचना ग्रहण करने की नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगने की भी होती है। पत्रकार जनता की ओर से सवाल पूछते हैं और यही प्रक्रिया लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत बनाती है। ऐसे में सवाल-जवाब का अभाव स्वाभाविक रूप से बहस को जन्म देता है। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि सरकार और संगठन अपने कामकाज को लेकर आश्वस्त हैं तो उन्हें पत्रकारों के सवालों से परहेज नहीं होना चाहिए। विपक्ष इसे संवाद से अधिक एकतरफा संप्रेषण की संज्ञा दे रहा है।
हालांकि भाजपा नेताओं का तर्क है कि कार्यक्रम का उद्देश्य प्रधानमंत्री के कार्यकाल की उपलब्धियों को साझा करना था और यह एक विशेष प्रस्तुति थी, न कि पारंपरिक प्रेस कान्फ्रेंस। पार्टी का कहना है कि मीडिया के साथ नियमित रूप से संवाद और प्रेस वार्ताएं होती रहती हैं। फिर भी देहरादून में हुए इस आयोजन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या राजनीति में मीडिया संवाद का स्वरूप बदल रहा है? क्या प्रेस कान्फ्रेंस अब सवालों और जवाबों का मंच कम और उपलब्धियों के प्रस्तुतीकरण का माध्यम अधिक बनती जा रही हैं? लोकतंत्र में प्रेस और सत्ता के रिश्ते की मजबूती सवाल पूछने और जवाब देने की संस्कृति पर टिकी होती है। ऐसे में भाजपा मुख्यालय का यह आयोजन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मीडिया और राजनीति के बदलते संबंधों पर नई बहस की शुरुआत भी बन गया है।
‘कंक्रीट’ के जंगलों में गुम हो गई ‘मंडुए की रोटी’ की खुशबू
मंडुए की रोटी में था पहाड़ की मिट्टी की खुशबू और मां के हाथों का स्वाद
पिज्जा-बर्गर के दौर में मंडुए की रोटी हमारे पहाड़ की है असली पहचान
कभी थी मजबूरी की थाली, आज दुनिया के लिए है सेहत का खजाना
देहरादून। जब पहाड़ की सुबह धूप की पहली किरणों के साथ जागती है, जब दूर कहीं गौशाला से आती घंटियों की आवाज और चूल्हे में जलती लकड़ियों की खुशबू गांव की हवा में घुलती थी, तब पहाड़ की रसोई में एक ऐसी खुशबू फैलती है, जो सिर्फ भूख नहीं मिटाती बल्कि यादों को भी जगा देती है। यह खुशबू होती है मंडुए की रोटी की। लोहे के तवे पर सिकती काली-सुनहरी मंडुए की रोटी, ऊपर से लगाया गया घर का घी और साथ में भांग की चटनी, गहत की दाल या पहाड़ी सब्जी यह सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, मेहनत और आत्मनिर्भर जीवनशैली की पहचान है।
पहाड़ के गांवों में आज भी कई घरों की सुबह मंडुए की रोटी से शुरू होती है। बुजुर्ग महिलाओं के हाथों में मंडुए का आटा आते ही जैसे पुरानी यादें जीवंत हो उठती हैं। आटे को गूंथने से लेकर गोल रोटी बनाने तक हर प्रक्रिया में पहाड़ की परंपरा बसती है। कई लोगों के लिए मंडुए की रोटी का स्वाद बचपन की उन सुबहों की याद है, जब मां चूल्हे के पास बैठकर रोटियां सेंकती थीं और बच्चे स्कूल जाने से पहले गरम-गरम रोटी खाकर निकलते थे। आज जब शहरों की भागदौड़ में लोग पैकेट बंद भोजन की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं पहाड़ की यह साधारण सी रोटी अपने भीतर प्रकृति और अपनापन समेटे हुए है।
एक समय था जब मंडुआ पहाड़ के गरीब और मेहनतकश लोगों का मुख्य भोजन माना जाता था। पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जहां गेहूं और चावल की खेती आसान नहीं थी, वहां मंडुआ किसानों का सहारा बना। कम पानी में भी उगने वाली यह फसल पहाड़ के किसानों की जीवनरेखा रही। खेतों में मेहनत करने वाले लोग मंडुए की रोटी खाकर दिनभर पहाड़ की चढ़ाई और कठिन काम करते थे। लेकिन समय बदला, जिस मंडुए को कभी पिछड़ेपन की निशानी माना जाता था, वही आज पोषण और स्वास्थ्य के कारण दुनिया भर में पहचान बना रहा है।
बता दें कि मंडुआ पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है। इसमें फाइबर, कैल्शियम और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। यही वजह है कि आज शहरों में भी लोग पारंपरिक अनाजों की ओर लौट रहे हैं। लेकिन पहाड़ के लोगों के लिए मंडुआ कोई नया फैशन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली का हिस्सा है। मंडुए की रोटी की कहानी सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं है। इसके पीछे किसान की मेहनत, पहाड़ की मिट्टी और महिलाओं का संघर्ष छिपा है।
गांव की महिलाएं मंडुआ बोने से लेकर उसे काटने, सुखाने और पीसने तक की पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पहले घरों में हाथ की चक्की से मंडुआ पीसा जाता था, जिसकी खुशबू आज भी बुजुर्गों को पुराने दिनों की याद दिलाती है। पलायन के कारण पहाड़ के कई गांव खाली हो गए, खेत बंजर होने लगे, लेकिन मंडुए ने अपनी जगह नहीं छोड़ी। आज भी कई गांवों में बुजुर्ग अपने खेतों में मंडुआ उगाते हैं और नई पीढ़ी को अपनी परंपरा से जोड़ने का प्रयास करते हैं।
मंडुए की रोटी हमें याद दिलाती है कि पहाड़ की असली ताकत सिर्फ ऊंचे पहाड़ और नदियां नहीं, बल्कि वहां के लोगों की मेहनत और उनकी सादगी भी है। मंडुए की रोटी का स्वाद शब्दों में बांधना आसान नहीं। इसमें पहाड़ की ठंडी हवा है, खेतों की मिट्टी की खुशबू है, मां के हाथों का प्यार है और उस जीवन का एहसास है, जिसमें कम साधनों में भी खुशियां भरपूर थीं। आज भले ही बड़े शहरों में लोग इसे स्वास्थ्य के नाम पर अपना रहे हैं, लेकिन पहाड़ के लिए मंडुए की रोटी हमेशा से भावनाओं की रोटी रही है।
जिंदगी की जंग से हारा ‘गोल्डन बॉय’
निशानेबाज जसपाल राणा के निधन से उत्तराखंड राज्य में शोक की लहर
पहाड़ों की पगडंडियों से वैश्विक मंच तक हर कदम पर देश का मान बढ़ाया
दुनिया को अपनी उंगलियों के इशारे पर झुकाया आज यादों का तमगा छोड़ गया
एक खिलाड़ी नहीं बल्कि नई पीढ़ी को निशानेबाजी की राह दिखाने वाला ही चला गया
देहरादून। कभी जिस हाथ ने लक्ष्य पर निशाना साधकर देश के लिए गौरव हासिल किया था, वही हाथ आज हमेशा के लिए थम गया। उत्तराखंड की धरती ने अपना वह बेटा खो दिया, जिसने छोटे से पहाड़ी परिवेश से निकलकर दुनिया के खेल मंच पर भारत का नाम रोशन किया था। जसपाल राणा के निधन की खबर ने न केवल खेल जगत बल्कि पूरे उत्तराखंड को गहरे शोक में डुबो दिया है।
जसपाल राणा सिर्फ एक निशानेबाज नहीं थे वह पहाड़ के उन सपनों की कहानी थे जो सीमित संसाधनों के बावजूद आसमान छूने का हौसला रखते हैं। उनके जाने से प्रदेश ने एक ऐसा खिलाड़ी खो दिया, जिसने खेल को पहचान दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ता तैयार किया। उत्तराखंड के पहाड़ी परिवेश से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना आसान नहीं था। लेकिन जसपाल राणा ने अपनी मेहनत, अनुशासन और दृदृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जहां पहुंचना हर खिलाड़ी का सपना होता है।
कम उम्र में ही उन्होंने निशानेबाजी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उनके शानदार प्रदर्शन ने भारत को गर्व के कई मौके दिए। एशियन गेम्स और कामनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े मंचों पर उन्होंने देश के लिए पदक जीते। उत्तराखंड अक्सर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति और वीरता के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन खेलों की दुनिया में जसपाल राणा ने प्रदेश का नाम एक नई ऊंचाई दी थी। उन्होंने यह साबित किया कि पहाड़ों के गांवों में पलने वाले सपने भी अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकते हैं। उनके प्रदर्शन ने उत्तराखंड के युवाओं को यह विश्वास दिया कि खेल भी भविष्य बनाने का रास्ता हो सकता है।
जसपाल राणा का योगदान केवल उनके अपने पदकों तक सीमित नहीं रहा। खिलाड़ी के रूप में सफलता हासिल करने के बाद उन्होंने कोच की भूमिका निभाई और नई प्रतिभाओं को तराशने का काम किया। युवा निशानेबाजों को तैयार करने में उनका योगदान याद किया जाएगा। उनके मार्गदर्शन में कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। वह मानते थे कि एक खिलाड़ी की असली सफलता केवल खुद जीतने में नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को जीतने के लिए तैयार करने में है। जसपाल राणा की खेल यात्रा के पीछे परिवार का बड़ा योगदान रहा। उनके पिता नारायण सिंह राणा भी निशानेबाजी से जुड़े रहे और उन्होंने बेटे को इस खेल की शुरुआती सीख दी। पिता से मिली प्रेरणा और खुद की मेहनत ने जसपाल को देश के शीर्ष निशानेबाजों में शामिल किया।
यह सफर केवल एक खिलाड़ी का सफर नहीं था, बल्कि एक परिवार की उस तपस्या की कहानी थी, जिसने उत्तराखंड को गर्व करने का मौका दिया। खेल की दुनिया में कुछ नाम केवल रिकार्ड और पदकों से नहीं पहचाने जाते, बल्कि उनके व्यक्तित्व और योगदान से याद किए जाते हैं। जसपाल राणा भी ऐसे ही नामों में शामिल हैं। उनका जाना उत्तराखंड के खेल जगत के लिए एक बड़ी कमी है। आने वाले वर्षों में जब भी प्रदेश में निशानेबाजी और खेल प्रतिभाओं की बात होगी, जसपाल राणा का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा।
पहाड़ की शांत वादियों से निकलकर दुनिया के मंच तक पहुंचने वाले जसपाल राणा अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मेहनत, उपलब्धियां और खिलाड़ियों के प्रति उनका समर्पण हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। उत्तराखंड ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया है।
‘हैट्रिक’ की राह में अपनों की ‘बेरुखी’
न जनता की नाराजगी झेलेंगे, न कार्यकर्ताओं की दूरी,अपनों को मनाने में जुटी भाजपा
सियासी बिसात पर शह-मात का खेल शुरू, हमलों से पहले ढाल तैयार करने की होड़
तीसरी बार सत्ता का ख्वाब, लेकिन पहले मोर्चे दुरुस्त करने का अग्निपरीक्षा का प्लान
पार्टी नेताओं की नाराजगी के मोर्चों को साधने की कवायद, गांव-गांव पहुंचने लगे नेता
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की उलटी गिनती भले ही अभी बाकी हो, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही भाजपा अब उन मोर्चों को मजबूत करने में जुट गई है, जहां उसे आने वाले चुनाव में नुकसान की आशंका दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर यह मंथन तेज है कि चुनावी रण में उतरने से पहले जनता की नाराजगी, कार्यकर्ताओं की दूरी और विपक्ष के हमलों से पैदा हो रहे राजनीतिक नुकसान को कैसे कम किया जाए।
भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल सरकार के कामकाज का मूल्यांकन नहीं होगा, बल्कि यह भी परीक्षा होगी कि पार्टी जनता के बीच अपनी पकड़ कितनी मजबूत बनाए रख पाती है। यही वजह है कि संगठन से लेकर सरकार तक अब डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर काम होता दिखाई दे रहा है।
उत्तराखंड की राजनीति में हर चुनाव सत्ता के प्रति जनता के मूड को बदलने वाला साबित हुआ है। राज्य गठन के बाद लंबे समय तक यहां सरकारों के बदलने का ट्रेंड रहा है। हालांकि भाजपा ने 2022 में इस मिथक को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2027 में उसके सामने चुनौती इस रिकॉर्ड को आगे बढ़ाने की है। पार्टी नेतृत्व जानता है कि पांच साल के कार्यकाल के अंतिम दौर में सरकार के खिलाफ स्थानीय स्तर पर छोटी-छोटी नाराजगियां भी चुनाव में बड़ा असर डाल सकती हैं। इसलिए अब फोकस उन मुद्दों पर है, जिन पर जनता सीधे सवाल उठा रही है।
उत्तराखंड में रोजगार और पलायन लंबे समय से चुनावी मुद्दे रहे हैं। पहाड़ के गांवों से युवाओं का लगातार बाहर जाना, खाली होते गांव, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के सीमित अवसर विपक्ष के लिए बड़े हथियार बन सकते हैं। भाजपा सरकार विकास योजनाओं और निवेश के दावों के जरिए इन सवालों का जवाब देने की तैयारी में है, लेकिन पार्टी के रणनीतिकारों को यह भी अहसास है कि केवल योजनाओं की घोषणा से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसका असर जमीन पर दिखाई देना जरूरी है। इसी कारण सरकार और संगठन के स्तर पर उन क्षेत्रों की पहचान की जा रही है जहां जनता तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में कमी रही है।
2027 के चुनाव में टिकट वितरण भाजपा के लिए सबसे अहम रणनीतिक फैसलों में से एक होगा। पार्टी अपने विधायकों और संभावित उम्मीदवारों की जमीनी पकड़ को परखने में जुटी है। सूत्रों के मुताबिक जिन क्षेत्रों में विधायकों के प्रति नाराजगी या जनता से दूरी की शिकायतें सामने आ रही हैं, वहां संगठन स्तर पर फीडबैक लिया जा रहा है। पार्टी यह आकलन कर रही है कि कौन से चेहरे चुनावी माहौल में मजबूत साबित हो सकते हैं और किन सीटों पर नए चेहरों की जरूरत पड़ सकती है।
यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उत्तराखंड में कई विधानसभा सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी रहता है और उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि चुनाव परिणाम को प्रभावित करती है। भाजपा की चुनावी ताकत उसका मजबूत संगठन माना जाता है, लेकिन समय के साथ कई क्षेत्रों में पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी और गुटबाजी भी चुनौती बन सकती है।
पार्टी अब सक्रिय कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाने, पुराने नेताओं को साथ जोड़ने और बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। भाजपा का प्रयास है कि चुनाव के समय तक हर बूथ पर सक्रिय टीम तैयार हो और कार्यकर्ताओं में उत्साह बना रहे। कांग्रेस समेत विपक्षी दल भाजपा सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था, भू-कानून, मूल निवास और पहाड़ की पहचान जैसे मुद्दों पर घेरने की तैयारी कर रहे हैं। भाजपा की रणनीति इन मुद्दों पर विपक्ष को आक्रामक होने से पहले ही जवाब तैयार करने की है। पार्टी सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ भावनात्मक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
उत्तराखंड छोटा राज्य होने के बावजूद राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहां कुछ हजार वोटों का अंतर कई सीटों का समीकरण बदल सकता है। इसलिए भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी राज्य की चुनावी तैयारियों पर नजर बनाए हुए है। संगठन, सरकार और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर तालमेल बनाना भाजपा की प्राथमिकताओं में शामिल है। पार्टी नहीं चाहती कि चुनाव के समय कोई ऐसा मुद्दा सामने आए, जिसे समय रहते संभाला जा सकता था। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने विकास के एजेंडे को जनता के भरोसे में बदल पाए। सत्ता में रहने के कारण सरकार को उपलब्धियों के साथ-साथ असंतोष का जवाब भी देना होगा।
2027 का चुनाव भाजपा के लिए केवल सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की ऐतिहासिक कोशिश होगी। इसलिए चुनावी रण में उतरने से पहले पार्टी हर उस कमजोरी को दूर करना चाहती है, जो भविष्य में नुकसान का कारण बन सकती है। डैमेज कंट्रोल की यह कवायद आने वाले महीनों में और तेज होने के संकेत हैं। अब नजर इस बात पर होगी कि भाजपा की रणनीति जमीन पर कितना असर दिखाती है और जनता का मूड 2027 में किस दिशा में जाता है।
सरहद के प्रहरी 140 करोड़ का विश्वास: राष्ट्रपति
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की गरिमामई उपस्थिति में आईएमए की पासिंग आउट परेड सम्पन्न
आईएमए की पासिंग आउट परेड का निरीक्षण कर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सलामी ली
481भारतीय,16 मित्र देशों के 34 विदेशी कैडेट बने सैन्य अधिकारी, 9 महिला कैडेटों ने रचा इतिहास
देहरादून। देश की राष्ट्रपति एवं सशस्त्र सेनाओं की सर्वाेच्च कमांडर द्रौपदी मुर्मू देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी में आयोजित पासिंग आउट परेड में मुख्य अतिथि एवं समीक्षा अधिकारी के रूप में शामिल हुईं। राष्ट्रपति ने भारतीय सैन्य अकादमी के 158वें नियमित और 141वें तकनीकी स्नातक पाठ्यक्रम की भव्य पासिंग आउट परेड की समीक्षा की और नवप्रशिक्षित सैन्य अधिकारियों को शुभकामनाएं दीं।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने पास आउट होने वाले कैडेट्स को भारत माता की रक्षा के लिए कर्तव्यनिष्ठा, समर्पण, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की भावना के साथ कार्य करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि सैन्य अधिकारी केवल देश की सीमाओं के प्रहरी ही नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के विश्वास, सम्मान और आकांक्षाओं के भी संरक्षक हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन में सभी कैडेट्स को सफल प्रशिक्षण के लिए बधाई दी। उन्होंने प्रशिक्षण देने वाले अधिकारियों की मेहनत की भी सराहना की। राष्ट्रपति ने कहा कि यहां से केवल सैन्य प्रशिक्षण ही नहीं बल्कि दया और करुणा जैसे मानवीय मूल्य भी मिलते हैं, जिन्हें अधिकारी आगे अपने सेवा जीवन में अपनाएंगे। उन्होंने सभी ऑफिसर कैडेट्स को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं।
राष्ट्रपति ने कहा कि तेजी से बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य और तकनीकी प्रगति के इस दौर में भारतीय सेना को निरंतर नवाचार, आधुनिकता और अनुकूलनशीलता के साथ आगे बढ़ना होगा। उन्होंने युवा अधिकारियों से अग्रिम मोर्चे से नेतृत्व करने, उच्च नैतिक मूल्यों का पालन करने तथा सैनिकों के कल्याण और सैन्य प्रभावशीलता के बीच संतुलन स्थापित करने का आह्वान किया।
इस अवसर पर उत्तराखण्ड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, भारतीय सैन्य अकादमी के समादेशक लेफ्टिनेंट जनरल नागेन्द्र सिंह सहित सैन्य एवं नागरिक प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी, गणमान्य अतिथि तथा बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी बनकर नवप्रशिक्षित अधिकारियों का उत्साहवर्धन किया।
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आईएमए से पास आउट हुए देश-विदेश के 515 सैन्य अफसर
आज भारतीय सैन्य अकादमी में 158वीं पासिंग आउट परेड संपन्न हो गई है। इस बार कुल 515 अधिकारी कैडेट पास आउट हुए। इनमें 481 भारतीय अधिकारी कैडेट और 16 मित्र देशों के 34 विदेशी अधिकारी कैडेट शामिल हैं। पासिंग आउट परेड में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। इस बार की पासिंग आउट परेड कई मायनों में ऐतिहासिक रही है। पहली बार आईएमए से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली 9 महिला कैडेट्स भी परेड में कदमताल करती दिखीं। इन 9 महिला कैडेट्स ने एक वर्ष का कठोर सैन्य प्रशिक्षण पूरा किया है। अब यह अंतिम पग पार कर सेना का हिस्सा बन गई हैं। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद ये सभी भारतीय सेना और अपने-अपने देशों की सेनाओं में अधिकारी के रूप में नई जिम्मेदारियां संभालेंगे। करीब सवा सात बजे उत्तराखंड के राज्यपाल गुरमीत सिंह रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आईएमए पासिंग आउट परेड में शामिल होने के लिए परेड स्थल पहुंचे। इसके बाद करीब 7 बजकर 30 मिनट पर आईएमए पीओपी की मुख्य अतिथि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू परेड स्थल पर पहुंचीं। राष्ट्रपति ने विशेष घोड़ा बग्गी पटियाला कोच से परेड की समीक्षा की।
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पासआउट कैडेट्स पर हेलीकाप्टर से पुष्पवर्षा
समारोह के दौरान पासआउट कैडेट्स पर हेलीकाप्टर से पुष्पवर्षा की गई, जिससे पूरा माहौल उत्सव और गर्व से भर गया। इसके बाद तीन हेलीकाप्टरों ने भारतीय तिरंगा, सेना का ध्वज और आईएमए का ध्वज लेकर परेड ग्राउंड के ऊपर फ्लाईपास्ट किया। इस वर्ष की पासिंग आउट परेड में विभिन्न कोर्सों के उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले कैडेट्स को सम्मानित भी किया गया। स्वार्ड आफ आनर विशाल कुमार को मिला, जिन्होंने आरईजी कोर्स में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। प्रिंस राज को सिल्वर मेडल, तेजस भट्ट को ब्रान्ज मेडल, जबकि टेक्निकल ग्रेजुएट कोर्स में हृषभ मिश्रा ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके अलावा टीईएस कोर्स में करन पांडे और स्पेशल कमीशन में बोधराज थापा को भी सम्मान मिला। बांग्लादेश के कैडेट को बेस्ट फारेन कैडेट पुरस्कार दिया गया।
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देश को पहली बार आईएमए से मिलीं नौ महिला सैन्य अफसर
आईएमए में शनिवार को एक और इतिहास रचा गया। अकादमी की पासिंग आउट परेड में पहली बार नौ महिला सैन्य अफसर पासआउट होकर भारतीय सेना का हिस्सा बनीं। कदमताल करते हुए कैडेट्स ने सैन्य अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रसेवा की भावना का प्रदर्शन किया। परेड का सबसे खास और ऐतिहासिक क्षण वह रहा, जब पहली बार आईएमए से प्रशिक्षित नौ महिला कैडेट्स सैन्य अफसर के रूप में पासआउट हुईं। इस वर्ष की पासिंग आउट परेड में शामिल 515 कैडेट्स में नौ महिला कैडेट्स सहित कुल 481 भारतीय कैडेट थे। इनके अलावा 16 मित्र देशों के 34 कैडेट्स ने भी प्रशिक्षण पूरा किया और अपने-अपने देशों की सेनाओं का हिस्सा बने। परेड के बाद पीपिंग सेरेमनी का आयोजन किया गया, जिसमें नव नियुक्त सैन्य अधिकारियों के कंधों पर रैंक सजाई गई। यह दूसरा अवसर है जब किसी महिला राष्ट्रपति ने आईएमए की पासिंग आउट परेड में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल भी परेड की सलामी ले चुकी हैं। इस बार की परेड ने न केवल 515 युवा अधिकारियों को सेना को सौंपा, बल्कि पहली बार नौ महिला सैन्य अफसरों के पासआउट होने के साथ भारतीय सैन्य इतिहास में एक नया अध्याय भी जोड़ दिया।
शुक्रवार, 12 जून 2026
‘गहत की दाल’ आज बनी वैश्विक ‘सुपरफूड’
पहाड़ी रसोई की शान, जो विज्ञान की कसौटी पर भी है महान
रसोई का सहारा गहत आज सुपरफूड के रूप में बनी पहचान
गहत में है पहाड़ की परंपरा और पोषण का है अनमोल संगम
देहरादून। गढ़वाल में गहत, कुमाऊं में कुल्थ केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि पहाड़ों की इस औषधीय दाल के आगे आज आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक है। जो स्थान पहाड़ों में अपनों के सत्कार का है, वही स्थान पहाड़ी थाली में गहत का है। सदियों से जो दाल उत्तराखंड के सुदूर गांवों की रसोई में लोहे की कड़ाई पर सुलगती आंच पर पकती रही, आज उसने आधुनिक पोषण विज्ञान की दुनिया में तहलका मचा रखा है।
पहाड़ों में यदि किसी दाल को सबसे अधिक सम्मान मिला है तो वह है गहत की दाल। गढ़वाल में इसे गहत और कुमाऊं में कुल्थ कहा जाता है। सदियों से पहाड़ी रसोई का हिस्सा रही यह दाल आज आधुनिक पोषण विज्ञान की कसौटी पर भी खरी उतर रही है। कभी ग्रामीण परिवारों के भोजन का सामान्य हिस्सा मानी जाने वाली गहत अब सुपरफूड के रूप में पहचान बना रही है।
पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में उगने वाली गहत केवल एक फसल नहीं बल्कि स्थानीय जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है। कम पानी, कम संसाधनों और कठिन जलवायु में भी यह फसल आसानी से तैयार हो जाती है। यही कारण है कि इसे पहाड़ के किसानों की भरोसेमंद फसल माना जाता रहा है। गहत की दाल का स्वाद अन्य दालों से अलग होता है। पहाड़ी घरों में इसे सिलबट्टे पर मसाले पीसकर धीमी आंच में पकाया जाता है। सर्दियों के दिनों में गर्मागर्म गहत की दाल और मंडुवे या गेहूं की रोटी का स्वाद आज भी लोगों को बचपन की यादों में ले जाता है।
गहत से केवल दाल ही नहीं बल्कि परांठे, डुबके, फाणु और रस जैसे कई पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते हैं। गांवों में किसी विशेष अवसर या मेहमान के आने पर भी गहत के व्यंजन परोसे जाते रहे हैं। गहत की दाल शरीर को गर्म रखती है और ठंड के मौसम में विशेष लाभ पहुंचाती है। बुजुर्गों का मानना है कि यह पथरी की समस्या में भी लाभकारी होती है। यही कारण है कि पहाड़ों में इसे घरेलू उपचार का हिस्सा भी माना जाता रहा है। आयुर्वेद और आधुनिक पोषण विशेषज्ञ भी गहत को प्रोटीन, फाइबर, आयरन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर मानते हैं। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच अब शहरों में भी इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
एक समय था जब गहत की दाल केवल पहाड़ी घरों तक सीमित थी, लेकिन अब देश के बड़े शहरों और आनलाइन बाजारों में भी इसकी मांग बढ़ रही है। जैविक उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता ने गहत को नई पहचान दी है। उत्तराखंड के किसान भी इसे नकदी फसल के रूप में देखने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गहत के उत्पादन और विपणन को बढ़ावा दिया जाए तो यह किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ उत्तराखंड की पारंपरिक कृकृषि को भी नई मजबूती दे सकती है।
आज जब फास्ट फूड और आधुनिक खानपान की संस्कृति तेजी से बढ़ रही है, तब गहत जैसी पारंपरिक फसलें हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही हैं। पहाड़ की मिट्टी में उपजी यह दाल न केवल स्वाद का खजाना है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वास्थ्य और परंपरा की अमूल्य विरासत भी है।
भाजपा के ‘रिपोर्ट कार्ड’ पर कांग्रेस की ‘चार्जशीट’
जनता पूछेगी कहां है रोजगार, पलायन और विकास का हिसाब
भाजपा गिनाएगी उपलब्धियां, कांग्रेस उठाएगी अधूरे वादों का मुद्दा
उत्तराखंड के चुनावी रण में जनता बनेगी सबसे बड़ी निर्णायक
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही प्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। भाजपा जहां अपने दस वर्षों के शासनकाल की उपलब्धियों को जनता के सामने रखने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस सरकार के अधूरे वादों और जमीनी समस्याओं को चुनावी हथियार बनाने में जुट गई है। राजनीतिक दलों ने संगठनात्मक तैयारियां तेज कर दी हैं और चुनावी रणनीति का केंद्र अब जनता से किए गए वादों का हिसाब-किताब बनने लगा है।
प्रदेश में रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, सड़कों की स्थिति, पर्वतीय क्षेत्रों में खाली होते गांव, महंगाई और किसानों की समस्याएं ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि पिछले चुनावों में किए गए कई बड़े वादे आज भी धरातल पर पूरी तरह नहीं उतर पाए हैं। दूसरी ओर भाजपा का दावा है कि चारधाम ऑल वेदर रोड, रेल परियोजनाएं, निवेश, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य हुए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल नए वादों का नहीं बल्कि पुराने वादों के मूल्यांकन का चुनाव होगा। राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी पहाड़ से पलायन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई गांव आबादी खो चुके हैं और रोजगार की तलाश में युवा मैदानों और महानगरों की ओर जा रहे हैं। ऐसे में विपक्ष इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है।
उत्तराखंड में बेरोजगारी हमेशा से चुनावी विमर्श का हिस्सा रही है। सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया, पेपर लीक प्रकरण और निजी क्षेत्र में सीमित अवसरों को लेकर युवाओं में असंतोष समय-समय पर सामने आता रहा है। विपक्ष इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। वहीं भाजपा भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और नए रोजगार अवसरों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के करीब आते-आते क्षेत्रीय असंतुलन का मुद्दा भी फिर जोर पकड़ सकता है। पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क सुविधाओं को लेकर उठते सवाल चुनावी बहस का हिस्सा बनेंगे। वहीं मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण, ट्रैफिक, भूमि और कानून-व्यवस्था के मुद्दे चर्चा में रहेंगे।
भाजपा ने 2027 की तैयारियों को लेकर बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने की रणनीति शुरू कर दी है। पार्टी का लक्ष्य लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का है। इसके लिए हारे हुए बूथों पर विशेष फोकस किया जा रहा है। उधर कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ जनता के बीच सरकार की कथित विफलताओं को ले जाने की तैयारी में है। पार्टी नेताओं का मानना है कि सत्ता विरोधी माहौल और अधूरे वादे उनके लिए राजनीतिक अवसर बन सकते हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2027 के चुनाव में घोषणापत्रों से ज्यादा चर्चा उन वादों की होगी जो पहले किए गए थे। जनता यह जानना चाहेगी कि रोजगार के कितने अवसर बने, पलायन कितना रुका, स्वास्थ्य सेवाएं कितनी बेहतर हुईं और पहाड़ों का विकास कितना आगे बढ़ा। ऐसे में चुनावी जंग विकास के दावों और अधूरे वादों के बीच सिमटती दिखाई दे रही है। उत्तराखंड की राजनीति में अगले कुछ महीनों में बयानबाजी और तेज होगी, लेकिन अंतिम फैसला जनता करेगी, जो इस बार नेताओं से नए सपनों से ज्यादा पुराने वादों का हिसाब मांगती नजर आ रही है।
बुधवार, 10 जून 2026
मंत्री से भाजपा असहज
चुनावी साल से पहले बढ़ी उत्तराखंड में सियासी बेचौनी
कैबिनेट मंत्री के बयान विपक्ष को दे रहे हमले का मौका
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल एक बार फिर अपनी हरकतों को लेकर चर्चा में हैं। इससे भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई है। सोशल मीडिया पर मंत्री के उप चुनाव के दौरान अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाला वीडियो वायरल हो रहा है।
प्रदेश की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि सुबोध उनियाल भाजपा के उन नेताओं में शामिल हैं जो अपनी बेबाक राय रखने के लिए जाने जाते हैं। कई बार उनकी भाषा विपक्ष के बजाय पार्टी के भीतर ही चर्चा का विषय बन जाते हैं। यही वजह है कि जब भी कोई विवादित या अलग राय सामने आती है तो राजनीतिक गलियारों में उसकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देती है।
भाजपा इस समय मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व में चुनावी रणनीति को धार देने में जुटी है। पार्टी की कोशिश है कि संगठन और सरकार के बीच पूरी तरह समन्वय का संदेश जाए। ऐसे समय में किसी भी वरिष्ठ नेता का अलग रुख या बयान विपक्ष को सरकार और संगठन के बीच मतभेदों का मुद्दा उठाने का अवसर दे देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुबोध उनियाल का अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार और लंबा अनुभव है। यही कारण है कि उनके बयानों को सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया के बजाय गंभीरता से देखा जाता है। कई बार उनके वक्तव्य यह संकेत भी देते हैं कि पार्टी के भीतर विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग राय मौजूद है। हालांकि भाजपा सार्वजनिक रूप से इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बताती रही है।
कांग्रेस भी ऐसे मौकों को हाथ से जाने नहीं देना चाहती। विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि भाजपा के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है और वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी समय-समय पर सामने आती रहती है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब सरकार के मंत्री ही सवाल खड़े करने लगें तो विपक्ष के आरोपों को बल मिलता है।
भाजपा नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि चुनावी माहौल में किसी भी प्रकार की अंदरूनी असहमति की चर्चा कार्यकर्ताओं और मतदाताओं तक न पहुंचे। पार्टी फिलहाल विकास, निवेश, रोजगार और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। ऐसे में विवादों से बचना और एकजुटता का संदेश देना उसकी प्राथमिकता है।
पहाड़ की ‘पगडंडियों’ पर उतरे नेता
चुनावी सरगर्मियां पहाड़ की पगडंडियों तक पहुंची
चौपालों, मंदिरों और मेलों में पहुंचने लगे हैं नेताजी
मतदाताओं के मूड को भांपने की शुरू हुई कवायद
देहरादून। उत्तराखंड में चुनावी बिगुल भले ही आधिकारिक रूप से न बजा हो, लेकिन राजनीतिक दलों और नेताओं ने गांवों की पगडंडियां नापनी शुरू कर दी हैं। आने वाले महीनों में यह गतिविधियां और तेज होंगी। चुनावी सरगर्मियां अभी से पहाड़ की पगडंडियों तक पहुंचने लगी हैं। जिन गांवों में चुनाव के बाद नेताओं की आवाजाही कम हो जाती थी, वहां अब फिर से राजनीतिक चहल-पहल दिखाई देने लगी है। कोई गांव की चौपाल में बैठकर लोगों की समस्याएं सुन रहा है तो कोई धार्मिक आयोजनों, मेलों और सामाजिक कार्यक्रमों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है।
दरअसल, भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि उत्तराखंड की राजनीति का असली मूड देहरादून के दफ्तरों में नहीं, बल्कि पहाड़ के गांवों और कस्बों में तय होता है। यही कारण है कि संभावित प्रत्याशी और वरिष्ठ नेता अभी से गांव-गांव जाकर जनता का रुख जानने की कोशिश कर रहे हैं।
एक समय था जब चुनावी मौसम में ही गांवों में नेताओं की भीड़ दिखाई देती थी, लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग है। कई विधानसभा क्षेत्रों में नेता छोटे-छोटे जनसंपर्क कार्यक्रमों के जरिए ग्रामीणों से संपर्क साध रहे हैं। गांव की चौपाल, चाय की दुकान और मंदिर परिसर फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र बनने लगे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसे मुद्दे आज भी प्रमुख हैं। नेता इन मुद्दों को सुन रहे हैं और जनता को भरोसा दिला रहे हैं कि उनकी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर कराया जाएगा।
पर्वतीय जिलों में पलायन का मुद्दा आज भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। गांवों में खाली होते घर, बंद पड़े स्कूल और खेती से दूर होती नई पीढ़ी लोगों की चिंता का विषय हैं। ऐसे में जो नेता गांवों तक पहुंच रहे हैं, उन्हें सबसे अधिक सवाल रोजगार और पलायन पर सुनने पड़ रहे हैं। युवाओं का एक बड़ा वर्ग सरकारी नौकरियों, स्वरोजगार और पर्यटन आधारित रोजगार के अवसरों को लेकर जवाब मांग रहा है। यही कारण है कि राजनीतिक दल भी अपने भविष्य के चुनावी एजेंडे में इन मुद्दों को प्रमुखता देने की तैयारी कर रहे हैं।
सत्तारूढ़ भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सरकार विकास, निवेश, सड़क और धार्मिक पर्यटन परियोजनाओं को अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के बीच ले जा रही है। पार्टी के नेता गांवों में जाकर सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संवाद कर रहे हैं और विकास कार्यों का फीडबैक ले रहे हैं। भाजपा की रणनीति यह संदेश देने की है कि डबल इंजन सरकार ने उत्तराखंड के विकास को नई गति दी है और इसी गति को आगे बढ़ाने के लिए जनता का समर्थन जरूरी है।
वहीं कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल की संभावनाओं को भुनाने की तैयारी में है। पार्टी के नेता महंगाई, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं। कांग्रेस का प्रयास है कि गांवों में भाजपा के खिलाफ माहौल तैयार किया जाए और सरकार की कमियों को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया जाए। पार्टी संगठन भी बूथ स्तर पर अपनी सक्रियता बढ़ाने की कवायद में जुटा है ताकि चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय किया जा सके।
कई विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय नेता और संभावित निर्दलीय उम्मीदवार भी अभी से सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी बढ़ी है। वह स्थानीय मुद्दों को उठाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ की राजनीति में व्यक्तिगत संपर्क और जनसरोकारों का महत्व आज भी बरकरार है। सोशल मीडिया के दौर में भी गांव की चौपाल और घर-घर संपर्क का कोई विकल्प नहीं बन पाया है।
उत्तराखंड में अर्द्धकुंभ पर ‘सियासत’ का संगम
उत्तराखंड में धर्म के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस आ गए हैं आमने-सामने
भाजपा ने बताया आस्था का सम्मान,कांग्रेस ने उठाए व्यवस्थाओं पर सवाल
करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा विषय पर राजनीति का लगा तड़का
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच धर्म और आस्था की राजनीति एक बार फिर केंद्र में आ गई है। हरिद्वार में अर्द्धकुंभ के आयोजन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी संग्राम तेज हो गया है। सत्ता पक्ष इसे सनातन संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण का बड़ा कदम बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे चुनावी वर्ष से पहले धार्मिक भावनाओं को भुनाने की कोशिश करार दे रहा है।
अर्द्धकुंभ को लेकर शुरू हुई बहस अब केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। भाजपा का कहना है कि देवभूमि उत्तराखंड की पहचान उसकी आध्यात्मिक विरासत और धार्मिक परंपराएं हैं। ऐसे में अर्द्धकुंभ का आयोजन करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा विषय है, जिस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
दूसरी ओर कांग्रेस का आरोप है कि सरकार धार्मिक आयोजनों को प्रचार का माध्यम बना रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में श्रद्धालुओं की चिंता करती है तो उसे हरिद्वार की यातायात, पार्किंग, गंगा सफाई और बुनियादी सुविधाओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए। विपक्ष का तर्क है कि अर्द्धकुंभ के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। उत्तराखंड में धर्म और आस्था हमेशा से चुनावी विमर्श का अहम हिस्सा रहे हैं। चारधाम यात्रा, समान नागरिक संहिता, लव जिहाद कानून और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दों पर भाजपा पहले ही अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी है। अब अर्द्धकुंभ का मुद्दा भी उसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
भाजपा इस मुद्दे के जरिए अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश में दिख रही है, जबकि कांग्रेस धार्मिक आयोजनों के विरोध की छवि से बचते हुए सरकार को व्यवस्थाओं और खर्चों के सवालों पर घेरने की रणनीति अपना रही है। यही कारण है कि दोनों दल सीधे तौर पर आस्था का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि आयोजन के स्वरूप और सरकार की मंशा को लेकर एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं।
‘चौंसू’ है हजारों साल पुरानी पहाड़ी ‘विरासत’
‘चौंसू’ की सोंधी खुशबू और लोहे की कढ़ाई के जादू की दीवानगी
पहाड़ की थाली का स्वाद, परंपरा और सेहत का अनमोल संगम है चौंसू
काली उड़द की दाल को भूनकर तैयार होने वाली चौंसू रसोई का हिस्सा
हर उत्तराखंडी के खून और यादों में बसा है चौंसू का वह सोंधा स्वाद
देहरादून। पहाड़ की कड़कड़ाती ठंड हो या सावन की रिमझिम फुहार, उत्तराखंड के घरों में जब लोहे की कढ़ाई में चौंसू पकता है, तो उसकी सोंधी खुशबू पूरे मोहल्ले को बता देती है कि आज रसोई में कुछ खास बन रहा है। गढ़वाल और कुमाऊं के पारंपरिक खान-पान का राजा चौंसू सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ों की संस्कृति, सेहत और यादों का एक खूबसूरत हिस्सा है।
चौंसू बनाने के लिए सबसे पहले काली उड़द की दाल को हल्का भून लिया जाता है। इसके लिए साबुत या छिलके वाली काली उड़द की दाल को धीमी आंच पर तवे या कढ़ाई में तब तक भूना जाता है, जब तक कि उसमें से एक सोंधी सी महक न आने लगे। भूनने के बाद इस दाल को सिल-बट्टे पर दरदरा पीसा जाता है। चौंसू हमेशा लोहे की कढ़ाई में ही बनाया जाता है। लोहे की कढ़ाई में पकने के कारण इसका रंग गाढ़ा काला-भूरा हो जाता है और इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। इसके बाद शुरू होता है इसे पकाने का पारंपरिक तरीका। सरसों के तेल में जख्या या जीरे का तड़का लगाया जाता है। फिर पिसी हुई दाल को मसाले और हींग के साथ भूनकर पानी डाला जाता है। इसे धीमी आंच पर देर तक पकाया जाता है। जैसे-जैसे चौंसू उबलता है, इसकी तरी गाढ़ी और मखमली होती जाती है।
पहाड़ की महिलाएं आज भी मानती हैं कि असली चौंसू वही है जो लकड़ी के चूल्हे पर धीमी आंच में पकाई जाए। इससे इसका स्वाद और सुगंध कई गुना बढ़ जाती है। चौंसू स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी मानी जाती है। काली उड़द प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और फाइबर से भरपूर होती है। पहाड़ के कठिन भौगोलिक जीवन में लोगों को ऊर्जा प्रदान करने के लिए यह व्यंजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इसके साथ ही चौंसू शरीर को ताकत देने के साथ पाचन तंत्र को भी मजबूत करती है। यही कारण है कि पुराने समय में खेतों में काम करने वाले लोग इसे विशेष रूप से पसंद करते थे।
उत्तराखंड के गांवों से लगातार हो रहे पलायन के कारण कई पारंपरिक व्यंजन धीरे-धीरे लोगों की थाली से दूर होते जा रहे हैं। बावजूद इसके चौंसू आज भी अपनी जगह बनाए हुए है। शहरों में रहने वाले उत्तराखंडी परिवार भी अपने बच्चों को पहाड़ के स्वाद और संस्कृति से जोड़ने के लिए चौंसू बनाना नहीं भूलते। आज सोशल मीडिया और पर्यटन के बढ़ते प्रभाव के कारण उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों की चर्चा देशभर में हो रही है। चौंसू भी अब केवल गांवों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पहाड़ी व्यंजनों की पहचान बनकर नए लोगों को आकर्षित कर रही है।
स्थानीय होटल और होमस्टे संचालक भी अपने मेन्यू में चौंसू को शामिल कर रहे हैं, ताकि पर्यटक पहाड़ के असली स्वाद का अनुभव कर सकें।
उत्तराखंड में एक कहावत जैसी है कि चौंसू का मजा तब तक अधूरा है, जब तक थाली में गरमा-गरम भात न हो। घी की एक चम्मच, हरी मिर्च और ककड़ी का पहाड़ी पिस्यूं लूण इसके स्वाद में चार चांद लगा देते हैं। दोपहर के धूप में बैठकर चौंसू-भात खाने का आनंद किसी फाइव-स्टार होटल के खाने से कहीं बढ़कर है।
भाजपा-कांग्रेस ने शुरू की ‘नेट प्रैक्टिस’
भाजपा सत्ता की हैट्रिक के लिए बूथों को कर रही मजबूत
कांग्रेस जनाक्रोश को राजनीतिक ताकत में बदलने की तैयारी
भाजपा और कांग्रेस संगठन दे रहे चुनावी रण के लिए धार
दलों में बूथ से लेकर सोशल मीडिया तक सक्रियता बढ़ी
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय शेष है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी आहट साफ सुनाई देने लगी है। सत्ता में काबिज भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ने संगठनात्मक मोर्चे पर अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि 2027 की लड़ाई केवल नेताओं के चेहरे या चुनावी घोषणाओं से नहीं, बल्कि संगठन की ताकत से तय होगी। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतिहास रचने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस दस साल के वनवास को खत्म कर सत्ता में लौटने का सपना संजोए हुए है। ऐसे में दोनों दलों का फोकस संगठन को धारदार बनाने पर है।
प्रदेश में भाजपा का संगठन इस समय बूथ सशक्तीकरण अभियान, लाभार्थी संपर्क और सरकार की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पार्टी का सबसे बड़ा चुनावी चेहरा मानते हुए संगठन उनके नेतृत्व में चुनावी जमीन तैयार कर रहा है। भाजपा की कोशिश है कि समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, चारधाम परियोजना और निवेश जैसे मुद्दों को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में जनता के बीच स्थापित किया जाए। दूसरी ओर कांग्रेस संगठन को फिर से जीवंत बनाने की चुनौती से जूझ रही है। पार्टी नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की धीमी रफ्तार जैसे मुद्दे सत्ता विरोधी माहौल बना सकते हैं। इसी कारण कांग्रेस लगातार जनसभाओं, पदयात्राओं और मुद्दा आधारित आंदोलनों के जरिए जनता से जुड़ने का प्रयास कर रही है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे और लगातार बढ़ती राजनीतिक सक्रियता को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कांग्रेस संगठन गांव-गांव तक अपनी पहुंच बढ़ाने और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करने का प्रयास कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति में संगठन हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। वर्ष 2022 के चुनाव में भाजपा ने मजबूत बूथ प्रबंधन और संगठनात्मक समन्वय के दम पर सत्ता बरकरार रखी थी। वहीं कांग्रेस को कई सीटों पर संगठनात्मक कमजोरी का नुकसान उठाना पड़ा था। यही कारण है कि इस बार कांग्रेस भी बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी हुई है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों दल युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी अब चुनावी रणक्षेत्र का अहम हिस्सा बन चुके हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों की आईटी और सोशल मीडिया टीमें लगातार सक्रिय दिखाई दे रही हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आने वाले महीनों में संगठनात्मक फेरबदल, नई नियुक्तियां और बड़े नेताओं के दौरे बढ़ेंगे। चुनावी रणनीति का असली केंद्र अब गांव, बूथ और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बनने जा रहे हैं। फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति में एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है। यह प्रतिस्पर्धा जनसभाओं से ज्यादा संगठन की मजबूती को लेकर है। भाजपा और कांग्रेस दोनों समझती हैं कि 2027 की सत्ता की चाबी देहरादून, हरिद्वार या हल्द्वानी में नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं के हाथ में होगी। इसलिए चुनावी रण को धार देने की सबसे बड़ी जंग इस समय संगठन के मोर्चे पर लड़ी जा रही है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की औपचारिक घोषणा भले अभी दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी शंखनाद कर दिया है। संगठन को मजबूत बनाने की यह होड़ आने वाले दिनों में और तेज होती दिखाई देगी।
भड्डू का ‘स्वाद’ और ‘पुरखों’ की याद
मिट्टी की खुशबू, कांसे की गरिमा और पहाड़ का सदियों पुराना स्वाद
आधुनिक किचन के दौर में भी पहाड़ की रसोई में जिंदा है भड्डू की परंपरा
कांसे के इस बर्तन में बनी दाल आज भी दिलाती है पुरखों के स्वाद की याद
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से जुड़ा जीवन दर्शन है। यहां की रसोई में कई ऐसे बर्तन और व्यंजन हैं, जो सदियों से लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बने हुए हैं। इन्हीं में से एक है भड्डू, कांसे से बना पारंपरिक बर्तन, और उसमें पकने वाली दाल, जिसका स्वाद आज भी पहाड़ के लोगों को अपने गांव और पुरखों की याद दिला देता है।
पहाड़ की कड़ाके की ठंड में जब चूल्हे पर धीरे-धीरे भड्डू में दाल पकती है, तो उसकी सोंधी खुशबू पूरे घर में फैल जाती है। लकड़ी की आग, कांसे का बर्तन और स्थानीय दालों का मेल ऐसा स्वाद रचता है, जिसे आधुनिक गैस चूल्हे और स्टील के बर्तन भी नहीं दे पाते। भड्डू कांसे से बना एक पारंपरिक बर्तन होता है, जिसका उपयोग विशेष रूप से दाल, झोली और अन्य पारंपरिक व्यंजन पकाने के लिए किया जाता रहा है। पहाड़ के लगभग हर पुराने घर में भड्डू कभी न कभी रसोई का अहम हिस्सा रहा है।
बुजुर्ग बताते हैं कि कांसे के बर्तन में भोजन धीरे-धीरे और समान रूप से पकता है। इससे दाल का स्वाद और सुगंध दोनों बढ़ जाते हैं। यही कारण है कि आज भी कई परिवार त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और विशेष अवसरों पर भड्डू में दाल बनाना पसंद करते हैं। उत्तराखंड में गहत, भट्ट, मसूर, उड़द और राजमा जैसी स्थानीय दालों को भड्डू में पकाने की परंपरा रही है। चूल्हे की धीमी आंच पर घंटों तक पकने वाली दाल में एक अलग ही गाढ़ापन और स्वाद आ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी माना जाता है कि भड्डू में बनी दाल केवल भोजन नहीं, बल्कि सेहत का खजाना है। स्थानीय मसालों और जाखिया के तड़के के साथ परोसी गई दाल पहाड़ी भोजन की आत्मा मानी जाती है।
पहाड़ के लोगों के लिए भड्डू केवल एक बर्तन नहीं, बल्कि परिवार की धरोहर है। कई घरों में यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में चला आ रहा है। शादी-ब्याह में दहेज के सामान में भी कभी भड्डू शामिल किया जाता था। बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि जब नई बहू घर आती थी तो उसे भड्डू में दाल बनाना सिखाया जाता था। यह केवल खाना बनाने की कला नहीं, बल्कि परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाने का तरीका था।
समय के साथ स्टील, एल्युमिनियम और नान-स्टिक बर्तनों ने रसोई में अपनी जगह बना ली। गैस चूल्हों और तेज रफ्तार जीवनशैली ने भी पारंपरिक बर्तनों के उपयोग को कम कर दिया। आज कई युवा भड्डू का नाम तो जानते हैं, लेकिन उसके उपयोग और महत्व से अनजान हैं। हालांकि अच्छी बात यह है कि पारंपरिक खान-पान और लोक संस्कृति के प्रति बढ़ती रुचि के कारण भड्डू एक बार फिर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है।
राज्य के कई होमस्टे और ग्रामीण पर्यटन केंद्र अब पर्यटकों को भड्डू में बनी दाल और पारंपरिक पहाड़ी भोजन परोस रहे हैं। इससे न केवल स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ रही है। पर्यटक जब भड्डू में बनी गहत या भट्ट की दाल का स्वाद चखते हैं, तो उन्हें पहाड़ की संस्कृति और जीवनशैली की एक अलग झलक देखने को मिलती है।
पहाड़ की रसोई में चूल्हे पर चढ़ा भड्डू केवल दाल नहीं पकाता, बल्कि वह संस्कृति, परंपरा और स्मृतियों को भी सहेजता है। बदलते दौर में भले ही आधुनिक बर्तनों ने उसकी जगह कम कर दी हो, लेकिन भड्डू की दाल का स्वाद आज भी पहाड़ की पहचान और पहाड़ की आत्मा को जीवित रखे हुए है। जब तक पहाड़ की रसोई में भड्डू की खुशबू रहेगी, तब तक वहां की सांस्कृतिक विरासत भी महकती रहेगी।
सोमवार, 8 जून 2026
'THE CJP EFFECT'
‘काकरोच’ बने देश के युवाओं की नई सियासी पहचान
कोर्ट रूम के एक ‘तंज’ से हो गया बड़ा डिजिटल ब्लास्ट
बिना बड़े नेताओं व पारंपरिक राजनीतिक ढांचे की आवाज
व्यवस्था से नाराज युवाओं के एक तबकों को मिला नया मंच
देहरादून। देश की राजनीति में जहां अरबों रुपये के चुनावी फंड और बड़े-बड़े दिग्गजों का दबदबा कायम है, वहीं सोशल मीडिया की स्क्रीन से निकला एक नया प्रयोग मुख्यधारा के नेताओं की नींद उड़ा रहा है। नाम हैकृकाकरोच जनता पार्टी। यह कोई पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ उपजा युवाओं का वो आक्रोश है, जो अब नारों से नहीं, सीधे समाधान की मांग कर रहा है।
मई 2026 में जब सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान युवाओं की स्थिति को लेकर काकरोच जैसे शब्द का इस्तेमाल हुआ, तो इंटरनेट पर गुस्सा फूट पड़ा। पुणे के अभिजीत दीपके ने व्यंग्य के रूप में इंस्टाग्राम पर एक पेज शुरू किया। महज 5 दिनों के भीतर इस काकरोच जनता पार्टी ने फालोअर्स के मामले में सत्ताधारी भाजपा के आफिशियल हैंडल को भी पीछे छोड़ दिया। आलसी और बेरोजगारों की आवाज़ की टैगलाइन के साथ देश का जेन-जी युवा इससे जुड़ता चला गया।
जब आलोचकों ने इसे सिर्फ फोन चलाने वाले युवाओं का शौक कहा तब युवाओं ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्रालय की नाकामियों के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन कर सबको चौंका दिया। विपक्ष के नेताओं के साथ-साथ पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक ने भी खुद को मानद काकरोच घोषित कर युवाओं के इस अनूठे विरोध का समर्थन किया। अब देश का युवा मुफ्त की रेवड़ियों, जातिगत समीकरणों या बड़े-बड़े भाषणों से बहलने वाला नहीं है। उन्हें पारदर्शी परीक्षाएं, रोजगार और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बुनियादी मुद्दों पर ठोस एक्शन चाहिए।
भले ही काकरोच जनता पार्टी चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड दल नहीं है, लेकिन इसने यह साबित कर दिया है कि सोशल मीडिया की ताकत सरकारों को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकती है। काकरोच जनता पार्टी का दावा है कि वह किसी एक नेता, परिवार या विचारधारा के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि आम लोगों के मुद्दों को केंद्र में रखकर अपनी मुहिम चला रही है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं को लेकर पार्टी के कार्यकर्ता राजधानी में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार काकरोच को प्रतीक के रूप में चुनना अपने आप में एक संदेश है। काकरोच को ऐसा जीव माना जाता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। पार्टी इसे आम आदमी के संघर्ष और जीवटता का प्रतीक बताती है। उनका कहना है कि जिस तरह आम जनता तमाम मुश्किलों के बावजूद जीवन की लड़ाई लड़ती है, उसी भावना को यह प्रतीक दर्शाता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बिना मजबूत संगठन और प्रभावशाली नेतृत्व के किसी आंदोलन को लंबे समय तक बनाए रखना आसान नहीं होता। लेकिन सोशल मीडिया और जन भागीदारी के इस दौर में नए राजनीतिक प्रयोगों की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता। देश में युवाओं के बीच रोजगार, किसानों के बीच आय, मध्यम वर्ग के बीच महंगाई और शहरी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर असंतोष की चर्चा समय-समय पर होती रही है। यदि काकरोच जनता पार्टी इन मुद्दों को संगठित रूप से उठाने और लोगों को जोड़ने में सफल रहती है, तो यह मुख्यधारा की राजनीति पर दबाव बनाने का काम कर सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भले ही नई राजनीतिक ताकतें तत्काल सत्ता तक न पहुंचें, लेकिन वह जनमत निर्माण और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। कई बार ऐसे ही आंदोलनों ने बड़े दलों को अपनी नीतियां बदलने पर मजबूर किया है। दिल्ली की राजनीति में अपनी जगह बनाना किसी भी नए संगठन के लिए आसान नहीं है। संसाधन, संगठन, कार्यकर्ता नेटवर्क और जनविश्वास जैसी कई चुनौतियां सामने होती हैं। इसके अलावा आंदोलन को केवल विरोध की राजनीति तक सीमित न रखकर ठोस वैकल्पिकदृदृष्टि प्रस्तुत करनी होगी।
फिलहाल काकरोच जनता पार्टी एक राजनीतिक जिज्ञासा और चर्चा का विषय बनी हुई है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जनता के मुद्दों पर खड़े हुए कई छोटे आंदोलन समय के साथ बड़े राजनीतिक बदलावों का कारण बने हैं। दिल्ली में सुनाई दे रही काकरोच पार्टी की आहट भविष्य में कितनी दूर तक जाएगी, यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इसने व्यवस्था से असंतुष्ट लोगों के बीच एक नई बहस जरूर छेड़ दी है।
दिल्ली में गिरफ्तारी, उत्तराखंड में सियासी घमासान
---धामी ने की हस्तक्षेप की पहल तो कांग्रेस ने खोला मोर्चा
---मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दिल्ली की सीएम से की बात
---कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने उठाए जांच की निष्पक्षता पर सवाल
देहरादून। दिल्ली के मालवीय नगर अग्निकांड में उत्तराखंड मूल के युवक केशव नेगी की गिरफ्तारी को लेकर उत्तराखंड की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। एक ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले में सक्रियता दिखाते हुए दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से बातचीत कर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने का आग्रह किया है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है।
मुख्यमंत्री धामी ने दिल्ली की मुख्यमंत्री से फोन पर बातचीत कर यह स्पष्ट किया कि हादसे में दोषी चाहे कोई भी हो, उसे सजा मिलनी चाहिए, लेकिन किसी निर्दाेष को बिना पर्याप्त तथ्यों के कार्रवाई का सामना न करना पड़े। धामी की इस पहल को उत्तराखंड के लोगों के हितों की रक्षा के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
बता दें कि दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक होटल में हुए भीषण अग्निकांड की जांच अब राजनीतिक रंग लेने लगी है। इस हादसे में 22 लोगों की मौत के बाद दिल्ली पुलिस ने होटल के शेफ के रूप में कार्यरत उत्तराखंड मूल के केशव नेगी को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारी के बाद उत्तराखंड में राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है कि आखिर एक कर्मचारी को मुख्य आरोपी बनाना कितना उचित है, जबकि होटल में सुरक्षा मानकों के उल्लंघन और प्रबंधन की जिम्मेदारी जैसे कई बड़े सवाल अभी भी जांच के दायरे में हैं। दिल्ली पुलिस का दावा है कि प्रारंभिक जांच में शेफ की कथित लापरवाही की भूमिका सामने आई है। वहीं होटल मालिक और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है तथा जांच जारी है।
मामले पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर होटल के मालिकों और सुरक्षा मानकों की जिम्मेदारी तय किए बिना एक कर्मचारी को मुख्य आरोपी के रूप में प्रस्तुत करना कितना उचित है। कांग्रेस का आरोप है कि जांच की दिशा को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड के एक युवक को जल्दबाजी में आरोपी बनाकर पूरे मामले की जिम्मेदारी उस पर डालने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। पार्टी ने जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता और राजनीतिक स्तर पर भी मामला उठाने के संकेत दिए हैं।
केशव नेगी की गिरफ्तारी के बाद उनके पैतृक क्षेत्र में भी चिंता और नाराजगी का माहौल देखने को मिल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हादसे की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और वास्तविक जिम्मेदार लोगों को कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए। कई सामाजिक संगठनों ने भी मांग की है कि जांच केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित न रहे, बल्कि होटल प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारियों की भी गहन पड़ताल की जाए।
दिल्ली अग्निकांड में हुई जनहानि ने पूरे देश को झकझोर दिया है। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हादसे के लिए वास्तविक जिम्मेदार कौन है। मुख्यमंत्री धामी की सक्रियता और कांग्रेस के आक्रामक रुख ने इस मामले को राजनीतिक विमर्श का विषय जरूर बना दिया है, लेकिन आम लोगों की प्राथमिक चिंता न्याय और सच्चाई सामने आने की है। फिलहाल उत्तराखंड की निगाहें जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि जांच पारदर्शी और तथ्य आधारित रही तो विवाद शांत हो सकता है, लेकिन यदि किसी भी स्तर पर पक्षपात या जल्दबाजी की आशंका बनी रही तो यह मामला उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है।
सत्ता की ‘राह’ में विरोधी लहर का ‘रोड़ा’
---लगातार दो कार्यकाल के बाद जनता के मूड को भांपने में जुटे राजनीतिक दल
---विकास बनाम जन असंतोष की लड़ाई में बदल सकता है विधानसभा का चुनाव
---इस पर मिथक टूटेगा या फिर मतदाता सत्ता परिवर्तन कर देगा सरकार को जवाब
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर दिखाई दे रहा हो, लेकिन राज्य की राजनीति में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि एंटी-इंकम्बेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर बन सकती है। वर्ष 2017 और 2022 में लगातार जीत हासिल करने वाली भाजपा तीसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही है, लेकिन इसके रास्ते में जनता की नाराजगी सबसे बड़ा रोड़ा बन सकती है।
राज्य गठन के बाद उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां मतदाता सत्ता परिवर्तन के लिए जाने जाते रहे हैं। हालांकि 2022 में भाजपा ने इस मिथक को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई, लेकिन अब तीसरे कार्यकाल की दहलीज पर खड़ी पार्टी को जनता के सवालों का सामना करना पड़ सकता है।
भाजपा सरकार चारधाम आल वेदर रोड, )षिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, निवेश सम्मेलन, समान नागरिक संहिता और धार्मिक पर्यटन जैसे बड़े मुद्दों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। दूसरी ओर विपक्ष बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, पेयजल संकट, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विकास परियोजनाओं का लाभ आम जनता तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंचा तो एंटी-इंकम्बेंसी का असर चुनावी नतीजों में दिखाई दे सकता है। प्रदेश के पर्वतीय जिलों में पलायन आज भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। गांव खाली हो रहे हैं और युवाओं का रोजगार के लिए मैदानों व अन्य राज्यों की ओर जाना जारी है। चुनाव के दौरान विपक्ष इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर सत्ता विरोधी माहौल बनाने का प्रयास करेगा। कई क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं को लेकर स्थानीय असंतोष भी भाजपा के लिए चिंता का विषय बन सकता है। विशेष रूप से युवा मतदाताओं और बेरोजगारों की नाराजगी चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखती है।
भाजपा ने पिछले वर्षों में कई मुख्यमंत्री बदले हैं। वर्तमान नेतृत्व को 2027 में जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता साबित करनी होगी। वहीं कांग्रेस भी मजबूत नेतृत्व और संगठन के दम पर सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में सफल रहती है और भाजपा संगठन स्तर पर असंतोष को नियंत्रित नहीं कर पाती, तो एंटी-इंकम्बेंसी बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।
2027 के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या चुनावी परिणामों को प्रभावित करेगी। रोजगार, शिक्षा और डिजिटल अवसर उनके प्रमुख मुद्दे होंगे। वहीं महिला मतदाताओं के लिए महंगाई, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषय अहम रहेंगे। भाजपा के पास विकास कार्यों और केंद्र सरकार की योजनाओं का मजबूत आधार है, लेकिन जनता की बढ़ती अपेक्षाएं और स्थानीय मुद्दों पर असंतोष एंटी-इंकम्बेंसी को जन्म दे सकता है। ऐसे में 2027 का चुनाव विकास बनाम असंतोष की सीधी लड़ाई में बदलता दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उत्तराखंड की सत्ता का भविष्य विपक्ष की ताकत से ज्यादा इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा जनता के बीच मौजूद नाराजगी को कितना कम कर पाती है। यही कारण है कि 2027 की चुनावी जंग में एंटी-इंकम्बेंसी सबसे बड़ा और निर्णायक फैक्टर बनकर उभर सकती है।
‘फास्ट फूड’ के दौर में ‘झंगोरे की खीर’ का जलवा
---मीठा खाने की चाहत भी पूरी और वजन बढ़ने का डर भी खत्म, यह पूरी तरह से ग्लूटेन-फ्री
---देश के बड़े रेस्टोरेंट्स में पहाड़ी थाली के साथ बनी झंगोरे की खीर परोसना स्टेटस सिंबल
---कभी पर्वतीय घरों की पारंपरिक मिठाई अब सेहतमंद भोजन के रूप में बना रही पहचान
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल प्राकृतिक सौंदर्य और देवस्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां का पारंपरिक खान-पान भी अपनी अलग पहचान रखता है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में एक नाम है झंगोरे की खीर जो वर्षों से पर्वतीय संस्कृति और खान-पान का अभिन्न हिस्सा रही है। बदलते दौर में जहां आधुनिक खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ा है, वहीं झंगोरे की खीर अपनी पौष्टिकता और स्वाद के कारण फिर से लोगों की पसंद बनती जा रही है।
झंगोरा, जिसे अंग्रेजी में बार्नयार्ड मिलेट कहा जाता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों में शामिल है। कम पानी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी इसकी खेती आसानी से हो जाती है। यही कारण है कि इसे पहाड़ की जीवनशैली और कृषि संस्कृति का आधार माना जाता रहा है।
पहाड़ के गांवों में झंगोरे की खीर केवल एक मिठाई नहीं बल्कि परंपरा का हिस्सा है। शादी-विवाह, पूजा-पाठ, नामकरण संस्कार और धार्मिक आयोजनों में इसे विशेष रूप से बनाया जाता है। दूध, घी, मेवा और झंगोरे से तैयार होने वाली यह खीर मेहमानों के स्वागत का भी प्रमुख व्यंजन रही है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जब बाजारों में मिठाइयों की उपलब्धता कम थी, तब झंगोरे की खीर ही पर्वतीय परिवारों की सबसे खास मिठाई हुआ करती थी। इसका स्वाद आज भी लोगों को अपने बचपन और गांव की याद दिला देता है।
विशेषज्ञों के अनुसार झंगोरा फाइबर, प्रोटीन, आयरन और कई आवश्यक खनिज तत्वों से भरपूर होता है। इसमें ग्लूटेन नहीं होता, जिससे यह स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बन रहा है। मधुमेह और वजन नियंत्रित रखने वालों के लिए भी इसे लाभदायक माना जाता है। यही वजह है कि जिस झंगोरे को कभी केवल पहाड़ की फसल माना जाता था, आज वह देश और विदेश के बाजारों में सुपरफूड के रूप में पहचान बना रहा है।
पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के बावजूद झंगोरे की खीर आज भी गांवों की रसोई में अपनी जगह बनाए हुए है। कई स्वयं सहायता समूह और स्थानीय उद्यमी झंगोरे से जुड़े उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। इससे स्थानीय किसानों को भी नई उम्मीद मिली है। झंगोरे की खीर केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इसमें पहाड़ की मिट्टी की खुशबू, खेतों की मेहनत और पारंपरिक जीवनशैली की झलक दिखाई देती है। आधुनिकता के इस दौर में भी जब लोग अपने पारंपरिक स्वाद की ओर लौट रहे हैं, तब झंगोरे की खीर उत्तराखंड की पहचान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम कर रही है। आज के दौर में पिज्जा-बर्गर के दीवाने अब देवभूमि के इस पारंपरिक स्वाद के आगे सरेंडर कर रहे हैं। कभी गरीबों का राशन समझा जाने वाला झंगोरा अब बड़े-बड़े होटलों के डेजर्ट मेन्यू की शान बन चुका है। स्वाद ऐसा कि उंगलियां चाटते रह जाएं और सेहत ऐसी कि डाक्टर भी हैरान रह जाएं।
रविवार, 7 जून 2026
वक्त और फैशन बदला पर नहीं बदला ‘गलोबंद’ का टशन
---सामाजिक पहचान व सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है गलोबंद
---गढ़वाल और कुमाऊं में पारंपरिक महिलाओं का प्रमुख आभूषण
---विशेष रूप से पहना जाता है विवाह व मांगलिक अवसरों पर
---कई परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में है यह संरक्षित
---पहाड़ के लोकगीतों व लोक संस्कृति में है इसका विशेष स्थान
देहरादून। उत्तराखंड की समृ( लोक संस्कृति में अनेक ऐसे प्रतीक हैं जो केवल परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज की पहचान भी हैं। इन्हीं में से एक है गलोबंद जो सदियों से पहाड़ की महिलाओं के गले की शोभा बढ़ाने के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बना हुआ है। आधुनिकता की तेज़ रफ्तार के बावजूद गलोबंद आज भी उत्तराखंड की लोक विरासत में अपना विशेष स्थान बनाए हुए है।
पहाड़ की महिलाओं का पारंपरिक श्रृंगार विविध आभूषणों से सुसज्जित रहा है। नथ, पौंजी, हंसुली, गुलूबंद, चरेऊ और गलोबंद जैसे आभूषण न केवल सौंदर्य बढ़ाते हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और सामाजिक परंपराओं को भी अभिव्यक्त करते हैं। इनमें गलोबंद सबसे विशिष्ट माना जाता है। काले मखमली कपड़े या मोटे धागे की पट्टी पर सोने, चांदी अथवा धातु के कलात्मक टुकड़ों को पिरोकर बनाया जाने वाला यह आभूषण गले से सटा रहता है और महिलाओं के व्यक्तित्व में अलग ही गरिमा जोड़ देता है।
लोक संस्कृति के जानकार बताते हैं कि गलोबंद का इतिहास कई पीढ़ियों पुराना है। पुराने समय में जब पहाड़ के गांवों में आधुनिक आभूषण आसानी से उपलब्ध नहीं थे, तब स्थानीय कारीगर हाथों से गलोबंद तैयार करते थे। प्रत्येक डिजाइन में स्थानीय कला और पारंपरिक सौंदर्यबोध की झलक दिखाई देती थी। कई परिवारों में गलोबंद केवल गहना नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत माना जाता था, जिसे मां अपनी बेटी और सास अपनी बहू को सौंपती थी।
उत्तराखंड के विवाह समारोहों में गलोबंद का विशेष महत्व रहा है। दुल्हन के श्रृंगार में इसे शुभता और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। मांगल गीतों और लोक नृत्यों में भी गलोबंद का बार-बार उल्लेख मिलता है। पहाड़ की लोक गायिकाओं द्वारा गाए जाने वाले कई गीतों में महिलाओं के श्रृंगार और आभूषणों का वर्णन मिलता है, जिनमें गलोबंद प्रमुख स्थान रखता है।
समय के साथ फैशन बदलता गया, लेकिन गलोबंद की लोकप्रियता कम नहीं हुई। आज यह पारंपरिक परिधान के साथ-साथ आधुनिक परिधानों में भी नए रूप में दिखाई देने लगा है। राज्य के सांस्कृतिक मेलों, उत्तरायणी, नंदा देवी महोत्सव और विभिन्न लोक उत्सवों में युवा पीढ़ी भी गलोबंद पहनकर अपनी संस्कृति से जुड़ाव का प्रदर्शन कर रही है। सोशल मीडिया के दौर में भी पारंपरिक पहाड़ी वेशभूषा और गलोबंद की तस्वीरें व्यापक रूप से पसंद की जा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्वीकरण के इस दौर में जब स्थानीय परंपराएं धीरे-धीरे सिमटती जा रही हैं, तब गलोबंद जैसे सांस्कृतिक प्रतीक नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। यह केवल गले का आभूषण नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक स्मृति, लोक कला और महिलाओं की पहचान का जीवंत दस्तावेज है।
आज भी जब किसी पर्व, विवाह या सांस्कृतिक आयोजन में पारंपरिक वेशभूषा पहने कोई पहाड़ी महिला गलोबंद धारण करती है, तो उसमें केवल सौंदर्य नहीं झलकता, बल्कि सदियों पुरानी लोक परंपरा की चमक दिखाई देती है। यही कारण है कि गलोबंद उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का ऐसा अनमोल आभूषण है, जिसकी चमक समय के साथ और अधिक निखरती जा रही है।
पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, लोकगीतों और पर्वों तक सीमित नहीं है। यहां के पारंपरिक आभूषण भी इस विरासत के महत्वपूर्ण वाहक हैं। गलोबंद उन्हीं में से एक है, जो आज भी पहाड़ की महिलाओं के गले में संस्कृति, गौरव और पहचान बनकर दमक रहा है।
उत्तराखंड में वक्त से पहले चुनावी शंखनाद
भाजपा-कांग्रेस ने कसी कमर, सत्ता और सियासत की बिसात बिछनी शुरू
राहुल गांधी के दौरे से लेकर भाजपा के बूथ मैनेजमेंट अभियान तक
चुनाव में अभी समय, लेकिन राजनीतिक दल आए चुनावी मोड में
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में भले ही अभी कई महीने शेष हों, लेकिन राज्य की राजनीति में चुनावी शंखनाद साफ सुनाई देने लगा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने स्तर पर तैयारियां तेज कर दी हैं। नेताओं के लगातार दौरे, संगठनात्मक बैठकों का दौर, बूथ स्तर तक पहुंचने की कवायद और चुनावी मुद्दों की तलाश इस बात का संकेत है कि राज्य में चुनावी जंग समय से पहले ही शुरू हो चुकी है।
भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ मैदान में है। पार्टी का पूरा फोकस उन बूथों और क्षेत्रों पर है, जहां पिछले चुनावों में उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। संगठन को और मजबूत बनाने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए शीर्ष नेतृत्व लगातार उत्तराखंड का दौरा कर रहा है। हाल के दिनों में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी चुनावी रणनीति को लेकर विशेष बैठकों का सिलसिला शुरू किया है।
दूसरी ओर कांग्रेस भी इस चुनाव को अस्तित्व की लड़ाई मानकर चल रही है। कांग्रेस बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने और गुटबाजी को कम करने की रणनीति पर काम कर रही है।
2027 के चुनाव में रोजगार, पलायन, महंगाई, चारधाम यात्रा की व्यवस्थाएं, आपदा प्रबंधन, सैन्य परिवारों से जुड़े विषय और पहाड़-मैदान का संतुलित विकास प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। कांग्रेस बेरोजगारी, अग्निवीर योजना और युवाओं के सवालों को केंद्र में लाने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा विकास परियोजनाओं, सड़क, रेल और धार्मिक पर्यटन को अपनी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखेगी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 में केवल मुद्दों की नहीं बल्कि नेतृत्व की भी लड़ाई होगी। भाजपा मुख्यमंत्री नेतृत्व और संगठन की मजबूती के सहारे मैदान में उतरेगी, जबकि कांग्रेस को जनता के सामने एकजुट नेतृत्व का संदेश देना होगा। पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस के भीतर चली आ रही गुटबाजी भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
अभी तक चुनावी गतिविधियां बड़े नेताओं के दौरों तक सीमित दिख रही हैं, लेकिन आने वाले महीनों में यह लड़ाई गांवों, बूथों और सोशल मीडिया तक पहुंचने वाली है। राजनीतिक दलों ने अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना शुरू कर दिया है और जनसंपर्क अभियानों की रूपरेखा भी तैयार होने लगी है।
उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह राज्य के भविष्य के विकास माडल, युवाओं की उम्मीदों और पहाड़ की पहचान से जुड़े सवालों का भी चुनाव होगा। फिलहाल तस्वीर साफ हैकृचुनाव में अभी समय बाकी है, लेकिन चुनावी जंग शुरू हो चुकी है।
उच्यणू है ‘अनहोनी’ का ‘पहाड़ी’ इलाज
जब आधुनिक दवाएं भी हार मान लें, वहां उम्मीद की आखिरी किरण जगाती है देवभूमि की यह थाती
लंबी बीमारी हो या अचानक आया कोई बड़ा संकट ‘उच्यणू’ की एक पोटली में छिपी होती है सुकून की उम्मीद
संकट के वक्त जब समझ न आए कोई रास्ता, तब ईष्ट देवों के आगे शीश नवाकर ऐसे रखा जाता है उच्यणू
आधुनिक चिकित्सा के दौर में भी उत्तराखंड के कई गांवों में जीवित है यह अनोखा लोकविश्वास
लोकसंस्कृति, आस्था और सामुदायिक विश्वास का अनूठा संगम है पहाड़ की अनोखी परंपरा
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में आज भी ऐसी अनेक परंपराएं जीवित हैं, जो आधुनिकता की तेज रफ्तार के बावजूद लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं। इन्हीं में से एक है ‘उच्यणू’। जब किसी व्यक्ति की बीमारी लंबे समय तक ठीक नहीं होती, परिवार पर लगातार संकट आते हैं या किसी अनहोनी का कारण समझ नहीं आता, तब गांवों में आज भी उच्यणू रखा जाता है।
गढ़वाल और कुमाऊं के अनेक ग्रामीण इलाकों में प्रचलित यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। लोगों का विश्वास है कि कभी-कभी कुलदेवता, ग्रामदेवता या स्थानीय देवी-देवताओं के रूठ जाने से परिवार पर संकट आ सकता है। ऐसे में देवताओं की इच्छा और नाराजगी का कारण जानने के लिए उच्यणू आयोजित किया जाता है।
उच्यणू के दौरान गांव के जागरिया, पश्वा या देववक्ता को बुलाया जाता है। ढोल-दमाऊं और मंत्रोच्चारण के बीच देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। लोकमान्यता है कि इस प्रक्रिया में देवता पश्वा पर अवतरित होकर परिवार की समस्या का कारण बताते हैं और उसके समाधान का मार्ग भी सुझाते हैं।
पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जब चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, तब उच्यणू सामाजिक और मानसिक सहारे का माध्यम भी था। बीमारी के दौरान पूरा गांव एक परिवार के साथ खड़ा होता था। लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द में सहभागी बनते थे और सामूहिक रूप से समाधान खोजने का प्रयास करते थे।
समाजशास्त्रियों के अनुसार उच्यणू केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी है। इसके माध्यम से लोकपरंपराएं, लोकसंगीत, लोकभाषा और सांस्कृतिक विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही हैं।
हालांकि नई पीढ़ी के बीच वैज्ञानिक सोच और आधुनिक चिकित्सा के प्रसार के कारण इस परंपरा का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में कम हुआ है, फिर भी दूरस्थ गांवों में उच्यणू आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। कई परिवार आधुनिक उपचार के साथ-साथ देवताओं का आशीर्वाद लेने के लिए भी इस परंपरा का सहारा लेते हैं।
उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में उच्यणू केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पहाड़ के उस जीवन दर्शन का हिस्सा है जिसमें प्रकृति, देवता और मनुष्य एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए माने जाते हैं। बदलते समय में भी यह परंपरा पहाड़ की लोकआस्था और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का कार्य कर रही है।
पहाड़ की ‘अनमोल’ विरासत है ‘फाणु’
---फाणु है पहाड़ की थाली का स्वाद, सेहत और संस्कृति का अनमोल संगम
---गढ़वाल-कुमाऊं की रसोई से निकलकर आधुनिक खानपान में भी अपनी पहचान बना रहा है फाणु
---कभी ग्रामीण जीवन की जरूरत था तो आज बन रहा है पहाड़ी विरासत का सबसे बड़ा प्रतीक
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल हिमालय, देवालय और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। यहां की संस्कृति और खानपान भी उतने ही समृ( हैं। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में एक नाम है फाणु जो सदियों से पहाड़ी रसोई का अभिन्न हिस्सा रहा है। आज जब लोग फास्ट फूड और आधुनिक व्यंजनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तब भी फाणु अपनी पौष्टिकता और विशिष्ट स्वाद के कारण लोगों की थाली में सम्मानजनक स्थान बनाए हुए है।
फाणु केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ के जीवन संघर्ष, प्रकृति से जुड़ाव और पारंपरिक ज्ञान का प्रतीक है। यह व्यंजन मुख्य रूप से गहत, भट्ट, उड़द और अन्य स्थानीय दालों से तैयार किया जाता है। दालों को भिगोकर पीसा जाता है और फिर धीमी आंच पर मसालों के साथ पकाया जाता है। इसकी गाढ़ी बनावट और अनूठा स्वाद इसे अन्य दालों से अलग पहचान देता है।
पुराने समय में पहाड़ का जीवन कठिन था। खेतों में घंटों काम करना, दूर-दूर तक पैदल चलना और सीमित संसाधनों में जीवन यापन करना आम बात थी। ऐसे में शरीर को भरपूर ऊर्जा देने वाले भोजन की आवश्यकता होती थी। फाणु इसी जरूरत को पूरा करता था। प्रोटीन और पोषक तत्वों से भरपूर यह व्यंजन किसानों और मेहनतकश लोगों के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत माना जाता था।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि सर्दियों के दिनों में फाणु और मंडुवे की रोटी का स्वाद और ताकत दोनों ही बेजोड़ होते थे। यही कारण है कि यह व्यंजन पीढ़ी दर पीढ़ी पहाड़ी परिवारों में बनता चला आ रहा है। आधुनिक पोषण विशेषज्ञ भी फाणु को स्वास्थ्यवर्धक भोजन मानते हैं। गहत और भट्ट जैसी दालों में भरपूर प्रोटीन, फाइबर और खनिज तत्व पाए जाते हैं। यह पाचन तंत्र को मजबूत करने के साथ-साथ शरीर को आवश्यक पोषण भी प्रदान करता है। पहाड़ में इसे पारंपरिक रूप से स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में देखा जाता रहा है।
एक समय ऐसा था जब फाणु केवल गांवों और पारंपरिक रसोई तक सीमित था, लेकिन अब उत्तराखंड के कई होटल, होम-स्टे और रेस्तरां इसे विशेष व्यंजन के रूप में परोस रहे हैं। पर्यटन के बढ़ते प्रभाव के साथ देश-विदेश से आने वाले पर्यटक भी पहाड़ के इस पारंपरिक स्वाद को पसंद कर रहे हैं।
बदलती जीवनशैली और आधुनिक खानपान के प्रभाव के कारण कई पारंपरिक व्यंजन धीरे-धीरे लोगों की थाली से गायब हो रहे हैं। हालांकि फाणु अभी भी अपनी पहचान बनाए हुए है, लेकिन नई पीढ़ी को इससे जोड़ना बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय व्यंजनों को पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाए तो न केवल उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत भी संरक्षित रहेगी।
फाणु केवल दालों से बना एक व्यंजन नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की मिट्टी, मेहनत और परंपरा का स्वाद है, जिस तरह हिमालय पहाड़ की पहचान है, उसी तरह फाणु पहाड़ की रसोई की आत्मा है। बदलते समय में इस पारंपरिक व्यंजन को बचाए रखना केवल स्वाद का नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संजोने का भी प्रश्न है।
पहाड़ में ‘रिसोर्स’ नहीं, मां के रूप में है ‘प्रकृति’
जब तक पहाड़ की जीवनशैली जिंदा रहेगी तब तक सुरक्षित रहेगा पर्यावरण
क्रासर
---पहाड़ के गांवों में पर्यावरण संरक्षण कोई सरकारी योजना या अभियान नहीं जीवन का है हिस्सा
---पहाड़ के गांवों में लोग जीते आ रहे हैं सदियों से प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का जीवन
---पहाड़ के लोग केवल पर्यावरण के उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े संरक्षक
देहरादून। आज दुनिया पर्यावरण संरक्षण के लिए नई तकनीकों और नीतियों पर अरबों रुपये खर्च कर रही है। लेकिन पहाड़ के लोगों ने बिना किसी बड़े बजट और प्रचार के सदियों तक जंगल, पानी और जैव विविधता को बचाकर रखा। उनकी जीवनशैली, परंपराएं और प्रकृति के प्रति सम्मान ही पर्यावरण संरक्षण का सबसे प्रभावी माडल है।
हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों में पर्यावरण संरक्षण कोई सरकारी योजना या अभियान नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा रहा है। यहां जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, नदियां केवल पानी का माध्यम नहीं हैं और पहाड़ केवल भूमि का टुकड़ा नहीं हैं। यहां प्रकृति को मां, देवता और जीवनदाता के रूप में देखा जाता है।
आज जब जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं, तब पहाड़ के लोगों का जीवन दर्शन दुनिया को एक महत्वपूर्ण संदेश देता हैकृप्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सामंजस्य ही विकास का आधार होना चाहिए। उत्तराखंड में अनेक जंगल, जलस्रोत और पर्वत धार्मिक आस्था से जुड़े हैं।
गांवों के आसपास बने देववन और बुग्याल केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं बल्कि सामुदायिक संरक्षण के उदाहरण हैं। वर्षों तक लोगों ने इन्हें अपनी आस्था और परंपराओं के माध्यम से सुरक्षित रखा। ग्रामीण समाज में पेड़ों को काटने से पहले अनुमति लेने, जलस्रोतों को साफ रखने और जंगलों के संरक्षण की परंपरा आधुनिक पर्यावरणीय कानूनों से कहीं पहले से मौजूद रही है।
जब पर्यावरण संरक्षण की बात होती है तो उत्तराखंड का नाम स्वतः सामने आ जाता है। 1970 के दशक में हुआ चिपको आंदोलन केवल एक आंदोलन नहीं था, बल्कि प्रकृति और समाज के रिश्ते का प्रतीक था। गांव की महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर जंगलों को बचाने का जो संदेश दिया, उसने पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का नया रास्ता दिखाया। यह आंदोलन साबित करता है कि पहाड़ के लोग जंगलों को संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानते हैं।
विडंबना यह है कि जिन लोगों ने सदियों तक जंगलों और जलस्रोतों की रक्षा की, आज वही लोग पलायन के कारण गांव छोड़ने को मजबूर हैं। खाली होते गांवों के साथ पारंपरिक संरक्षण व्यवस्था भी कमजोर हो रही है। कई स्थानों पर जलस्रोत सूख रहे हैं, खेती की जमीन बंजर हो रही है और जंगलों की निगरानी कम होती जा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पहाड़ को बचाना है तो पहाड़ के लोगों को गांवों में टिकाए रखना होगा।
सड़क, बिजली, पर्यटन और आधारभूत सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन हिमालय की संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर किया गया विकास भविष्य में बड़े संकट पैदा कर सकता है। हाल के वर्षों में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं ने यह संकेत दिया है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है। स्थानीय समुदायों का अनुभव और पारंपरिक ज्ञान इस संतुलन को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
हिमालय को बचाने की लड़ाई केवल पेड़ों और नदियों को बचाने की लड़ाई नहीं है। यह उन लोगों को बचाने की लड़ाई भी है जिन्होंने पीढ़ियों तक प्रकृति की रक्षा की है। यदि पहाड़ के गांव जीवित रहेंगे, तो जंगल भी सुरक्षित रहेंगे, जलस्रोत भी बहते रहेंगे और हिमालय की आत्मा भी जीवित रहेगी। पर्यावरण के सबसे सच्चे रक्षक आज भी पहाड़ के लोग ही हैं।
मौसम ने रोकी राहुल गांधी की उड़ान
राहुल गांधी ने मोबाइल से किया अल्मोड़ा की जनसभा को संबोधित
मोबाइल से दिए गए संदेश ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा
खराब मौसम के कारण राहुल का अल्मोड़ा कार्यक्रम स्थगित, पंतनगर से हुए वापस
देहरादून। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का प्रस्तावित अल्मोड़ा दौरा गुरुवार को खराब मौसम की भेंट चढ़ गया। लगातार खराब मौसम और उड़ान संबंधी बाधाओं के कारण राहुल गांधी अल्मोड़ा नहीं पहुंच सके, लेकिन उन्होंने तकनीक के माध्यम से जनसभा को संबोधित कर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों का उत्साह बनाए रखा। पंतनगर एयरपोर्ट के डायरेक्टर पवन कुमार ने बताया कि पंतनगर एयरपोर्ट पर उतरने के बाद राहुल गांधी अल्मोड़ा के लिए हेलीकाप्टर से निकले थे लेकिन खराब मौसम के कारण उनका हेलीकाप्टर वहां उतर नहीं पाया और वापस पंतनगर एयरपोर्ट आकर लौट गए हैं।
अल्मोड़ा में आयोजित कांग्रेस की विशाल जनसभा में हजारों कार्यकर्ता और समर्थक राहुल गांधी के इंतजार में जुटे थे। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण जब उनका हेलीकाप्टर उड़ान नहीं भर सका तो कांग्रेस नेतृत्व ने वैकल्पिक व्यवस्था करते हुए राहुल गांधी का संबोधन मोबाइल फोन के माध्यम से जनसभा स्थल पर सुनवाया। राहुल गांधी ने अपने संक्षिप्त लेकिन प्रभावी संबोधन में उत्तराखंड के मुद्दों, बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती जैसे विषयों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मैं आप सभी के बीच अल्मोड़ा व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना चाहता था। मौसम खराब होने के कारण मेरा हेलीकाप्टर लैंड नहीं कर पाया, जिसके लिए मैं आप सभी से क्षमा प्रार्थी हूँ। लेकिन मौसम हमारी शारीरिक दूरी तो बढ़ा सकता है, दिल का रिश्ता नहीं। इतनी खराब परिस्थितियों में भी जो हज़ारों की संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक यहां डटे रहे, मैं उनके इस जज्बे को सलाम करता हूँ। आप सभी कांग्रेस की रीढ़ हैं। तानाशाह ताकतों के सामने झुकना हमारी फितरत नहीं है। मौसम खराब है, लेकिन हमारा हौसला बुलंद है। मैं जल्द ही दोबारा अल्मोड़ा आने का कार्यक्रम बनाऊंगा और आप सब के बीच आकर आपकी बात सुनूंगा। तब तक आप जनता की आवाज बनकर लड़ते रहिए।
राहुल गांधी के संबोधन से पहले प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के कई कांग्रेस नेताओं ने सभा को संबोधित किया। वक्ताओं ने राज्य में बढ़ती बेरोजगारी, पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन, महंगाई और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर भाजपा सरकार पर सवाल उठाए। नेताओं ने कहा कि उत्तराखंड की जनता अब बदलाव चाहती है और आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरेगी। सभा में मौजूद नेताओं ने राहुल गांधी के उत्तराखंड से विशेष लगाव का उल्लेख करते हुए कहा कि मौसम खराब होने के बावजूद उन्होंने जनसभा को संबोधित कर कार्यकर्ताओं के प्रति अपनी प्रतिब(ता दिखाई है।
अल्मोड़ा की जनसभा को कांग्रेस शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि मौसम ने राहुल गांधी की भौतिक उपस्थिति को रोक दिया, लेकिन डिजिटल माध्यम से उनका संबोधन पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए संदेश देने में सफल रहा। अपने संबोधन में राहुल गांधी ने कहा कि उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार, किसानों को बेहतर सुविधाएं और पहाड़ों को पलायन से मुक्ति दिलाना कांग्रेस की प्राथमिकता है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से जनता के बीच जाकर उनके मुद्दों को उठाने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने का आह्वान किया।
वर्चुअल’ रणभूमि में उतरे ‘सियासी यो(ा’
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की जंग के लिए सोशल मीडिया का मैदान तैयार
---भाजपा और कांग्रेस ने डिजिटल सेना को किया सक्रिय
---फेसबुक-एक्स-इंस्टाग्राम पर शुरू हुई नैरेटिव की लड़ाई
---डिजिटल वालंटियर लगातार प्रचार अभियान चला रहे
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी भले ही समय बाकी हो, लेकिन चुनावी जंग की शुरुआत सोशल मीडिया पर हो चुकी है। राजनीतिक दलों ने यह समझ लिया है कि आज के दौर में चुनावी माहौल केवल जनसभाओं और रैलियों से नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर बनने वाले नैरेटिव से भी तय होता है। यही कारण है कि भाजपा, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने अपनी डिजिटल टीमों को सक्रिय कर दिया है।
बीते कुछ महीनों में उत्तराखंड की राजनीति से जुड़े मुद्दों पर सोशल मीडिया गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार की उपलब्धियों, यूसीसी, चारधाम यात्रा, सड़क और रेल परियोजनाओं को लेकर भाजपा समर्थक पेज और डिजिटल वालंटियर लगातार प्रचार अभियान चला रहे हैं। वहीं कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं और पर्वतीय क्षेत्रों की बदहाली को प्रमुख मुद्दा बनाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। भाजपा नेतृत्व भी अपने कार्यकर्ताओं को सोशल मीडिया पर संयम और अनुशासन बनाए रखने के निर्देश दे चुका है, जिससे डिजिटल मोर्चे को चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव उत्तराखंड में पहला ऐसा विधानसभा चुनाव हो सकता है, जिसमें सोशल मीडिया की भूमिका निर्णायक स्तर पर दिखाई दे। राज्य के लाखों युवा मतदाता फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं। ऐसे में पार्टियां केवल भाषण नहीं, बल्कि वीडियो, रील्स, पाडकास्ट और शार्ट कंटेंट के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं।
विशेष बात यह है कि इस बार राजनीतिक दलों के साथ-साथ समर्थक समूह, स्थानीय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और क्षेत्रीय डिजिटल प्लेटफार्म भी चुनावी विमर्श को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक घटनाओं पर मिनटों में प्रतिक्रियाएं, वीडियो क्लिप और पोस्ट वायरल हो रहे हैं। इससे मुद्दों की लड़ाई अब गांव की चौपाल से निकलकर मोबाइल की स्क्रीन तक पहुंच गई है।
हालांकि सोशल मीडिया की इस राजनीति के साथ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। फेक न्यूज, भ्रामक सूचनाएं और ट्रोलिंग जैसे खतरे भी बढ़ रहे हैं। चुनाव नजदीक आने के साथ इन गतिविधियों में और तेजी आने की संभावना है। इसलिए राजनीतिक दलों के साथ निर्वाचन आयोग और प्रशासन की नजर भी डिजिटल मंचों पर बनी रहेगी।
उत्तराखंड की राजनीति में कभी जाति, क्षेत्र और संगठनात्मक ताकत चुनावी सफलता का आधार मानी जाती थी, लेकिन 2027 की लड़ाई यह संकेत दे रही है कि अब डिजिटल प्रभाव भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सोशल मीडिया का यह महासंग्राम वास्तविक वोटों में किस हद तक बदल पाता है।
उत्तराखंड में फेसबुक की टाइमलाइन, इंस्टाग्राम की रील्स, एक्स की पोस्ट और यूट्यूब के वीडियो में भी चुनाव की अभी से गूंज सुनाई देने लगी है। राजनीतिक दलों ने अपनी डिजिटल तलवारें निकाल ली हैं, अब देखना यह है कि वर्चुअल यु( का असली विजेता कौन बनता है।
‘अग्निवीर’ के बहाने कांग्रेस की सियासी ‘बिसात’
---देवभूमि के सैन्य परंपरा वाले समाज के बीच अग्निवीर योजना को बनाया प्रमुख मुद्दा
---उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने खोला नया मोर्चा
---उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में सैनिक परिवारों को साधने की रहेगी पूरी कोशिश
देहरादून। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। अल्मोड़ा में आयोजित जनसभा को मोबाइल के माध्यम से संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने केंद्र सरकार की अग्निवीर योजना पर एक बार फिर सवाल खड़े किए। उनके इस बयान को राजनीतिक विश्लेषक केवल एक चुनावी टिप्पणी नहीं, बल्कि उत्तराखंड जैसे सैनिक बहुल राज्य में कांग्रेस की दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति के रूप में देख रहे हैं।
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि अग्निवीर योजना युवाओं के भविष्य और सेना की पारंपरिक भर्ती व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि चार साल की सेवा के बाद अधिकांश युवाओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा। कांग्रेस लगातार इस योजना को युवाओं और सैनिक परिवारों के हितों के खिलाफ बताती रही है और उत्तराखंड दौरे में भी राहुल गांधी ने इसी मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।
उत्तराखंड को देश के सबसे बड़े सैनिक योगदान देने वाले राज्यों में गिना जाता है। गढ़वाल और कुमाऊं के हजारों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सेना से जुड़े हुए हैं। राज्य के लगभग हर गांव से युवा सेना में भर्ती होने का सपना देखते हैं। ऐसे में अग्निवीर योजना यहां केवल राष्ट्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक विषय भी बन गई है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी ने उत्तराखंड में इस मुद्दे को उठाकर सैनिक परिवारों और सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं तक सीधा संदेश पहुंचाने का प्रयास किया है। कांग्रेस का आकलन है कि सेना भर्ती की पुरानी व्यवस्था को लेकर युवाओं के बीच मौजूद असंतोष उसे राजनीतिक लाभ दिला सकता है।
दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि अग्निवीर योजना सेना को आधुनिक बनाने और युवाओं को नए अवसर देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि योजना के माध्यम से युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण, अनुशासन और रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं तथा कई राज्यों और संस्थानों ने अग्निवीरों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था भी बनाई है।
दरअसल, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को देखते हुए कांग्रेस ऐसे मुद्दों की तलाश में है जो सीधे जनता के जीवन और भावनाओं से जुड़े हों। बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और अग्निवीर जैसे विषय पार्टी की राजनीतिक रणनीति के केंद्र में दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी के दौरे में अग्निवीर योजना पर विशेष फोकस इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति में अग्निवीर मुद्दा और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है। कांग्रेस इसे युवाओं और सैनिक परिवारों के बीच ले जाएगी, जबकि भाजपा इसके लाभ गिनाकर जवाबी अभियान चलाएगी। ऐसे में 2027 के चुनावी संग्राम में विकास, रोजगार और पलायन के साथ-साथ अग्निवीर योजना भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन सकती है।
राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा केवल संगठनात्मक मजबूती तक सीमित नहीं दिखा। अग्निवीर योजना पर हमला कर उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की है कि कांग्रेस सैनिक बहुल राज्य में उन मुद्दों को प्रमुखता से उठाएगी, जो सीधे युवाओं और फौजी परिवारों से जुड़े हैं। अब देखना यह होगा कि यह मुद्दा चुनावी मैदान में कितना प्रभाव छोड़ पाता है।
‘फेस वैल्यू’ वर्सेस ‘ग्राउंड रियलिटी’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-25
राज्य गठन से अब तक का इतिहास गवाह, विकास पीछे छूटा, हर बार नेतृत्व परिवर्तन बना बड़ा मुद्दा
---रोजगार और जमीनी मुद्दों के बीच, वोटर तलाश रहा है एक मजबूत और क्रेडिबल चेहरा
---एंटी-इंकम्बेंसी और संगठन की अंदरूनी कलह के बीच ‘चेहरे’ की ब्रांडिंग भी है आवश्यक
---पलायन का दर्द और सियासत की चाल, आम मतदाता की नजर रहेगी सिर्फ ‘कैप्टन’ पर
---उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में नेतृत्व को लेकर बढ़ रही हैं चर्चाएं
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में एक सवाल तेजी से चर्चा का विषय बनता जा रहा हैकृआखिर चुनाव में नेतृत्व का चेहरा कितना महत्वपूर्ण होगा? राज्य गठन के बाद से उत्तराखंड की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। ऐसे में आगामी चुनाव में विकास, रोजगार और पलायन के साथ-साथ नेतृत्व की लड़ाई भी प्रमुख चुनावी मुद्दा बन सकती है।
राज्य की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां मुख्यमंत्री बदलने की घटनाएं आम रही हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल समय-समय पर नेतृत्व परिवर्तन के प्रयोग करते रहे हैं। ऐसे में 2027 के चुनाव में मतदाता केवल दल नहीं, बल्कि नेतृत्व की स्थिरता और विश्वसनीयता को भी परख सकते हैं। भाजपा फिलहाल सत्ता में है और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार काम कर रही है। धामी ने युवा नेतृत्व की पहचान बनाने की कोशिश की है, लेकिन चुनाव नजदीक आते-आते पार्टी के भीतर और बाहर यह चर्चा भी तेज होगी कि क्या भाजपा पूरी तरह धामी के चेहरे पर चुनाव लड़ेगी या सामूहिक नेतृत्व की रणनीति अपनाएगी। हालांकि शीर्ष नेतृत्व धामी के नाम पर मोहर लगा चुका है, लेकिन भाजपा के अंदर कुछ भी हो सकता है।
वहीं कांग्रेस में स्थिति और अधिक दिलचस्प दिखाई देती है। पार्टी के पास कई अनुभवी नेता हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार कौन होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसा नेतृत्व प्रस्तुत करने की होगी जो संगठन को एकजुट रख सके और जनता के बीच भरोसे का वातावरण बना सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में अब मतदाता केवल चुनावी घोषणाओं से प्रभावित नहीं होते। वह यह भी देखना चाहते हैं कि सरकार का नेतृत्व कौन करेगा और संकट की परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता किसके पास है। चारधाम यात्रा, आपदा प्रबंधन, बेरोजगारी, पलायन और निवेश जैसे मुद्दों पर नेतृत्व की कार्यशैली भी जनता के मूल्यांकन का हिस्सा बन सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में क्षेत्रीय संतुलन भी नेतृत्व की बहस को प्रभावित करता है। गढ़वाल और कुमाऊं के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न समय-समय पर सामने आता रहा है। ऐसे में चुनाव के दौरान नेतृत्व का सवाल केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों से भी जुड़ सकता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार यदि चुनाव त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता है तो नेतृत्व का प्रभाव और अधिक बढ़ सकता है। ऐसे हालात में मजबूत और स्वीकार्य चेहरा चुनावी लाभ दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
फिलहाल भाजपा और कांग्रेस दोनों ही विकास, संगठन विस्तार और जनसंपर्क अभियानों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव करीब आएंगे, नेतृत्व को लेकर चर्चाएं और तेज होना तय है। उत्तराखंड की राजनीति में यह प्रश्न बार-बार उठता रहा है कि जनता पार्टी को वोट देती है या चेहरे को। 2027 का चुनाव इस बहस का नया अध्याय लिख सकता है।
बाक्स
आमने सामने
भाजपा
सत्ता विरोधी माहौल को नेतृत्व के जरिए संतुलित करने की चुनौती
सीएम धामी के कार्यकाल का मूल्यांकन चुनावी बहस का भी हिस्सा
संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखने की चुनौती
कांग्रेस
मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर स्पष्टता की मांग बढ़ेगी
वरिष्ठ व युवा नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना होगा
सत्ता का विकल्प बनने के लिए नेतृत्व पर भरोसा
नेतृत्व विकास का मुद्दा
उत्तराखंड में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे हमेशा चुनावी केंद्र में रहते हैं। लेकिन यदि राजनीतिक दलों के भीतर नेतृत्व को लेकर असमंजस या प्रतिस्पर्धा बढ़ती है तो चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा नेतृत्व की बहस की ओर भी मुड़ सकता है। ऐसे में 2027 का चुनाव केवल नीतियों का नहीं, बल्कि भरोसेमंद नेतृत्व की तलाश का चुनाव भी बन सकता है।
उत्तराखंड में समय से पहले ‘महासंग्राम’
विधानसभा चुनाव अभी दूर, लेकिन दिल्ली के दिग्गजों ने पहाड़ में डाला डेरा
---बीजेपी के चक्रव्यूह को भेदने मैदान में उतरे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी
---पहाड़ की ढलान और मैदान की बिसात पर सीधी नजर, भाजपा सकते में दिखी
---भगवा खेमे की ताबड़तोड़ सक्रियता के बीच राहुल गांधी की एंट्री होगी दिलचस्प
---भाजपा के मजबूत चुनावी अभियान के बीच कांग्रेस का उत्तराखंड में चुनावी बिगुल
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इस समय भाजपा और कांग्रेस दोनों चुनावी मोड में दिखाई दे रही हैं। हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी राज्य में लगातार दौरे कर संगठन को सक्रिय किया है। ऐसे में राहुल गांधी का दौरा स्पष्ट संकेत देता है कि 2027 का चुनावी संग्राम समय से पहले शुरू हो चुका है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाधी का दो दिवसीय उत्तराखंड दौरा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विधानसभा चुनाव 2027 के लिए कांग्रेस के चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के लगातार तीसरे कार्यकाल की तैयारी के बीच कांग्रेस के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई जैसा है। 2017 और 2022 में हार का सामना कर चुकी कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट करना और जनता के बीच भरोसा वापस हासिल करना है। इसी कारण राहुल गांधी का यह दौरा जनसभा से अधिक संगठनात्मक मजबूती पर केंद्रित दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस ने राहुल गांधी के कार्यक्रमों को रणनीतिक रूप से तैयार किया है। अल्मोड़ा में जनसभा के माध्यम से कुमाऊं क्षेत्र को साधने की कोशिश है, जबकि पौड़ी में पूर्व सैनिकों से संवाद के जरिए सेना और अग्निपथ योजना से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में लाने का प्रयास किया जा रहा है। अगले दिन देहरादून में पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने का संदेश दिया जाएगा।
कांग्रेस इस दौरे के माध्यम से महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, भ्रष्टाचार, महिलाओं की सुरक्षा और चारधाम यात्रा व्यवस्थाओं जैसे मुद्दों को केंद्र में लाना चाहती है। वहीं भाजपा इसे राहुल गांधी की पारंपरिक राजनीतिक यात्रा बताते हुए ज्यादा महत्व नहीं दे रही है। लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि राहुल गांधी की मौजूदगी से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार होना तय है।
वास्तव में यह दौरा केवल दो दिनों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की दिशा तय करने वाला राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस पहाड़ की नाराजगी, युवाओं की बेचौनी और संगठन की नई संरचना के सहारे सत्ता वापसी का सपना देख रही है, जबकि भाजपा अपने विकास और स्थिरता के एजेंडे पर जनता का समर्थन बनाए रखने की कोशिश में जुटी है। ऐसे में राहुल गांधी का उत्तराखंड आगमन चुनावी शतरंज की नई चाल के रूप में देखा जा रहा है।
दिल्ली पहुंची ‘काकरोच’ की डिजिटल सेना
जनमुद्दों की लड़ाई को दिया राष्ट्रीय मंच, न कोई बड़ा नेता, न राजनीतिक वंश
क्रासर
---बिना नेता के आंदोलन ने खींचा ध्यान, जनआंदोलनों की तर्ज पर सभी मुद्दें
---पारंपरिक राजनीति से मोहभंग के बीच नई तरह की जनभागीदारी का दावा
---शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के मुद्दे पर दिल्ली में चल रहा अनोखा प्रदर्शन
देहरादून। सोशल मीडिया से जन्मी कांकरोच जनता पार्टी अब देश की राजधानी दिल्ली पहुंच गई है। अपने अनोखे नाम और पारंपरिक राजनीति से अलग अंदाज के कारण चर्चा में रहने वाला यह संगठन अब जनमुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए दिल्ली पहुंच चुका है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर काकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर काकरोच ने सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।
बता दें कि कुछ ही दिनों पहले तक काकरोच जनता पार्टी को इंटरनेट पर एक व्यंग्य और मजाक के रूप में देखा जा रहा था वह अब लाखों युवाओं के समर्थन के साथ एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक अभियान का रूप लेता दिखाई दे रहा है। काकरोच जनता पार्टी की शुरुआत उस समय हुई जब सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान सीजेआई द्वारा कुछ युवाओं को लेकर की गई टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इसके बाद अभिजित दिपके ने व्यंग्यात्मक अंदाज में काकरोच जनता पार्टी नाम से अभियान शुरू किया। देखते ही देखते इसके सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर करोड़ों फालोअर्स जुड़ गए और अब यह शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को लेकर खुलकर आवाज उठा रहा है। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि काकरोच जनता पार्टी भविष्य में चुनावी राजनीति में कदम रखेगी या नहीं, लेकिन भारतीय राजनीति के इतिहास में कई बड़े राजनीतिक दल जन आंदोलनों से ही जन्मे और बाद में सत्ता तक पहुंचे।
ज्ञात हो कि लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी ताकत जनता होती है। इतिहास बताता है कि जब जनता अपने मुद्दों के लिए संगठित होकर आवाज उठाती है, तो सत्ता को उसकी बात सुननी पड़ती है। यही कारण है कि जनमुद्दों पर खड़े हुए आंदोलन केवल विरोध का माध्यम नहीं होते, बल्कि वह राजनीतिक बदलाव की नई इबारत भी लिखते हैं। डिजिटल प्लेटफार्म से बनी कांकरोच जनता पार्टी का आंदोलन पहले सोशल मीडिया पर चल रहा था जो अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों तक पहुंच गया है। किसी बड़े चेहरे, स्थापित नेता या राजनीतिक परिवार के बिना चल रहा यह आंदोलन अपने अनोखे नाम और पारंपरिक राजनीति के खिलाफ मुखर तेवरों के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है। दिल्ली में कांकरोच जनता पार्टी के बैनर तले जुटे कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने दावा किया कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि उन मुद्दों के लिए है जिन्हें मुख्यधारा की राजनीति लगातार नजरअंदाज करती रही है।
आज के बदलते दौर में सोशल मीडिया पर आमजन का जमावड़ा इतिहास बदलने की ओर अग्रसर है। दिल्ली में आयोजित प्रदर्शन यह साबित करने के लिए काफी है। कांकरोच जनता पार्टी के समर्थक अपने आंदोलन की उन आंदोलनों से कर रहे है जो किसी एक नेता की नहीं थी, बल्कि जनभावनाओं और जनसहभागिता का परिणाम थी। उस दौर में गांव-गांव से लोग बिना किसी राजनीतिक लाभ की अपेक्षा के सड़कों पर उतरे थे। आज कांकरोच आंदोलन भी उसी भावना को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। युवाओं के बीच पारंपरिक दलों के प्रति असंतोष नई तरह की राजनीतिक अभिव्यक्तियों को जन्म दे रहा है।
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कांकरोच जनता पार्टी का दावा
कांकरोच जनता पार्टी से जुडे़ युवाओं का दावा है कि उसका आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष या राजनीतिक महत्वाकांक्षा का आंदोलन नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज है जो वर्षों से अपनी समस्याओं के समाधान का इंतजार कर रहे हैं। संगठन का मानना है कि जब तक जनमुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक उन पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाएगा। इसी सोच के साथ कांकरोच जनता पार्टी ने राजधानी दिल्ली में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। प्रदर्शन के दौरान युवाओं ने रोजगार, पलायन और बढ़ती आर्थिक असमानता के मुद्दों को जोरदार ढंग से उठाया। कांकरोच जनता पार्टी की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जा रही है कि यह किसी एक बड़े नेता के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। संगठन अपने आप को जनआधारित मंच बताता है, जहां मुद्दों को व्यक्ति से ऊपर रखा जाता है। यही कारण है कि दिल्ली में भी संगठन ने किसी बड़े राजनीतिक चेहरे को आगे करने के बजाय सामूहिक नेतृत्व का संदेश देने का प्रयास किया। दिल्ली की सड़कों पर गूंजे इस आंदोलन ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या भारतीय राजनीति में मुद्दों पर आधारित नए जनआंदोलनों के लिए जगह बन रही है, या फिर यह भी समय के साथ एक प्रतीकात्मक पहल बनकर रह जाएगा।
आंदोलनों ने राजनीतिक व्यवस्था को बदला
उत्तराखंड राज्य आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 1990 के दशक में पहाड़ के लोगों ने अलग राज्य की मांग को लेकर लंबा संघर्ष किया। इस आंदोलन का कोई एक सर्वमान्य नेता नहीं था, बल्कि गांव-गांव से उठी जनभावनाओं ने इसे शक्ति दी। महिलाओं, युवाओं, कर्मचारियों और छात्रों ने आंदोलन को जनआंदोलन बनाया। अंततः केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ। इस आंदोलन ने न केवल एक नया राज्य बनाया बल्कि उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण भी बदल दिए।
इसके साथ ही 1974 में शुरू हुआ संपूर्ण क्रांति आंदोलन भी जनशक्ति की ताकत का बड़ा उदाहरण है। महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया। आंदोलन के प्रभाव ने तत्कालीन केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। इसके बाद देश ने आपातकाल और फिर सत्ता परिवर्तन का दौर देखा। यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े राजनीतिक बदलावों में गिना जाता है।
2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ चला आंदोलन भी जनभावनाओं की ताकत का उदाहरण बना। दिल्ली के रामलीला मैदान से उठी आवाज पूरे देश में गूंजी। लाखों लोगों ने इसमें भागीदारी की। इस आंदोलन ने न केवल भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया बल्कि देश में नई राजनीतिक शक्तियों के उभरने का रास्ता भी तैयार किया। हाल के वर्षों में किसान आंदोलन ने भी यह साबित किया कि संगठित जनदबाव सरकारों को अपने फैसले बदलने के लिए मजबूर कर सकता है। लंबे आंदोलन और लगातार जनसमर्थन के बाद केंद्र सरकार को कृषि कानून वापस लेने पड़े। यह लोकतंत्र में जनशक्ति की प्रभावशीलता का ताजा उदाहरण माना जाता है।
बुधवार, 3 जून 2026
आखिर कौन है असली उत्तराखंडी’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-25
मूल निवास, भू-कानून और क्षेत्रीय अस्मिता पर सिमट सकता है सियासी विमर्श
---राज्य आंदालन की मूल भावना को फिर से मिल रही है आवाज
---विकास के साथ अस्मिता भी बनेगी इस बार विस चुनाव में मुद्दा
---पलायन, जमीन व सांस्कृतिक अस्तित्व के मुद्दों पर बढे़गा दबाव
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, प्रदेश की राजनीति में पहचान और अस्मिता का मुद्दा केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ वर्षों में मूल निवास, सशक्त भू-कानून, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार में प्राथमिकता और पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान को बचाने की मांग लगातार मजबूत हुई है। यही कारण है कि राजनीतिक दल अब विकास के साथ-साथ पहचान आधारित मुद्दों पर भी अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल भावना में भी क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार का प्रश्न शामिल था। राज्य गठन के इतने साल बाद भी बड़ी संख्या में लोग मानते हैं कि उनकी अपेक्षाएं पूरी तरह पूरी नहीं हुई हैं। विशेषकर पहाड़ी जिलों में पलायन, भूमि खरीद की बढ़ती प्रवृत्ति और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर चिंताएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। प्रदेश में मूल निवास 1950 की मांग और मजबूत भू-कानून को लेकर कई सामाजिक संगठनों ने आंदोलन किए हैं। इन आंदोलनों ने युवाओं और प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच भी व्यापक समर्थन हासिल किया है। यही कारण है कि राजनीतिक दल इन मुद्दों को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं हैं।
भाजपा सरकार ने समान नागरिक संहिता, भू-कानून में संशोधन और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण जैसे कदमों को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया है। वहीं कांग्रेस सरकार को घेरते हुए यह सवाल उठा रही है कि राज्य आंदोलन की मूल भावना के अनुरूप स्थानीय लोगों को कितना लाभ मिला। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल सड़क, बिजली और पानी तक सीमित नहीं रहेगा। कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों में स्थानीय पहचान, रोजगार में स्थानीय युवाओं की भागीदारी और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दे मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि चुनाव में विकास, महिला मतदाता, अनुसूचित जाति वोट बैंक और सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, लेकिन पहचान का प्रश्न इन सभी मुद्दों को जोड़ने वाला साझा राजनीतिक सूत्र बन सकता है।
भाजपा का दावा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को मजबूत करने के लिए कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए हैं। पार्टी इन उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। वही कांग्रेस का कहना है कि पहचान केवल नारों से नहीं बल्कि स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन रोकने और संसाधनों पर स्थानीय अधिकार सुनिश्चित करने से मजबूत होगी। पार्टी इन सवालों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है।
उत्तराखंड राज्य का गठन पहाड़ के पानी और पहाड़ की जवानी को बचाने के संकल्प के साथ हुआ था। लेकिन आज राज्य की जनता के सामने दो बड़े संकट हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बाहरी लोग आकर पहाड़ों में अंधाधुंध जमीनें खरीद रहे हैं, जिससे डेमोग्राफी बदल रही है। लोग हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर सख्त भू-कानून की मांग कर रहे हैं, ताकि कृकृषि और आवासीय जमीनों को सुरक्षित रखा जा सके। इसके आंदोलनकारियों की मांग है कि राज्य में नौकरियों और अन्य संसाधनों पर पहला हक उनका हो जिनके पूर्वज 1950 से यहां रह रहे हैं, न कि उनका जो कुछ साल पहले आकर बस गए हैं।
2027 का चुनाव विकास के दावों बनाम क्षेत्रीय अस्मिता के बीच लड़ा जा सकता है और जो भी दल पहाड़ के युवाओं को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहेगा कि वह उनकी जमीन और नौकरी की रक्षा कर सकता है, सत्ता की चाबी उसी के पास जाएगी। 2027 के उत्तराखंड चुनाव केवल इस बात पर तय नहीं होंगे कि कितनी सड़कें बनीं या कितने रोजगार मिले, बल्कि इस बात पर भी तय होंगे कि उत्तराखंड का भविष्य किसके हाथों में सुरक्षित है।
देवभूमि पर ‘टिप्पणी’ से आया ‘भूचाल’
भाजपा के वरिष्ठ नेता तीरथ सिंह रावत के एक बयान ने छेड़ दी नई बहस
---देवभूमि अब देवभूमि नहीं रही जैसी टिप्पणी ने न केवल राजनीतिक दल आए आमने-सामने
---पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की पीड़ा या सरकार पर परोक्ष प्रहार, बयान के कई राजनीतिक मायने
---सत्ता पक्ष के एक वरिष्ठ नेता राज्य की पहचान पर सवाल उठाए तो स्वाभाविक है राजनीतिक गलियारों में हलचल
देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता तीरथ सिंह रावत के एक बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। देवभूमि अब देवभूमि नहीं रही जैसी टिप्पणी ने न केवल राजनीतिक दलों को आमने-सामने ला दिया है, बल्कि शासन-प्रशासन की कार्यशैली और राज्य की बदलती सामाजिक तस्वीर पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। तीरथ सिंह रावत ने इस स्थिति के लिए शासन और प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है।
उत्तराखंड को देशभर में देवभूमि के नाम से जाना जाता है। चारधाम, हरिद्वार, )षिकेश और अनगिनत धार्मिक स्थलों के कारण यह पहचान राज्य की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पूंजी रही है। ऐसे में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा ही देवभूमि की अवधारणा पर चिंता जताना साधारण राजनीतिक बयान नहीं माना जा रहा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तीरथ सिंह रावत का बयान केवल कानून-व्यवस्था या प्रशासनिक व्यवस्था पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह राज्य की बदलती सामाजिक परिस्थितियों, बढ़ते अपराध, नैतिक मूल्यों के क्षरण और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। यही कारण है कि इस बयान की गूंज सत्ता और संगठन दोनों के भीतर सुनाई दे रही है।
विपक्ष ने इस बयान को लपक लिया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री स्वयं राज्य की स्थिति पर चिंता जता रहे हैं तो सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए। विपक्ष इसे सरकार की विफलताओं की स्वीकारोक्ति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है। दूसरी ओर भाजपा के भीतर भी इस बयान को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं। कुछ नेता इसे राज्य के प्रति एक वरिष्ठ नेता की चिंता बता रहे हैं, जबकि राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे सरकार और प्रशासन को चेतावनी के रूप में भी देख रहे हैं।
यह पहला अवसर नहीं है जब तीरथ सिंह रावत का कोई बयान व्यापक राजनीतिक चर्चा का कारण बना हो। मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनके कई वक्तव्य राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बने थे। 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच आया यह बयान भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। पार्टी जहां विकास, निवेश और धार्मिक पर्यटन को अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश कर रही है, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री का बयान विपक्ष को नया राजनीतिक हथियार दे सकता है।
कांग्रेस अब इस मुद्दे को कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जवाबदेही से जोड़कर सरकार को घेरने की रणनीति बना सकती है। पार्टी नेताओं का मानना है कि जब सवाल सत्ता पक्ष के वरिष्ठ नेता की ओर से उठे हैं तो उनकी राजनीतिक गंभीरता और बढ़ जाती है। क्या तीरथ सिंह रावत का यह बयान केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है या फिर उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति को लेकर भाजपा के भीतर मौजूद बेचौनी का संकेत? इसका जवाब आने वाले दिनों की राजनीति तय करेगी।
देवभूमि की पहचान केवल मंदिरों और तीर्थों से नहीं, बल्कि समाज की आस्था, संस्कृति और व्यवस्था से भी बनती है। पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत के बयान ने इसी पहचान को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। अब देखना यह होगा कि यह बहस राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहती है या सरकार को आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है।
पहाड़ में पलायन ने छीनी ‘बचपन की छांव’
---पहाड़ के गांवों में दादा-दादी और नाना-नानी से दूर हो रहे नौनिहाल, टूट रहे रिश्तों के अनकहे धागे
---रोजगार की तलाश में शहरों की ओर बढ़ते कदमों ने बच्चों के बचपन से भी बुजुर्गों का स्नेह छीना
---पहाड़ की सामाजिक संस्कृति की सबसे मजबूत कड़ी पर लग गई है आज पलायन की नजर
देहरादून। पहाड़ के चमोली जिले के दरमोड़ा गांव में 75 वषीय कमला देवी हर शाम घर के आंगन में बैठकर सड़क की ओर देखती हैं। उनकी आंखें किसी राहगीर को नहीं, बल्कि उस उम्मीद को तलाशती हैं कि शायद इस बार छुट्टियों में उनका पोता घर आ जाए। पोता अब देहरादून के एक निजी स्कूल में पढ़ता है। साल में एक-दो बार ही गांव आ पाता है। मोबाइल पर बात तो होती है, लेकिन कमला देवी कहती हैं, फोन में बच्चे की आवाज सुनाई देती है, उसकी हंसी नहीं दिखती।
उत्तराखंड के पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन ने केवल गांवों की आबादी कम नहीं की है, बल्कि पीढ़ियों के बीच मौजूद आत्मीय रिश्तों को भी कमजोर कर दिया है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में हजारों परिवार शहरों में बस गए हैं। इसके साथ ही बच्चों और उनके दादा-दादी, नाना-नानी के बीच का वह रिश्ता भी दूर होता जा रहा है, जो कभी पहाड़ की सामाजिक संस्कृति की सबसे मजबूत कड़ी हुआ करता था।
एक समय था जब गांवों के आंगन बच्चों की किलकारियों से गूंजते थे। दादी की कहानियां, नानी के लोकगीत, दादा के अनुभव और नाना की सीख बच्चों के व्यक्तित्व का हिस्सा बनते थे। आज इन आंगनों में सन्नाटा है। बुजुर्ग अकेले हैं और बच्चे शहरों की भागदौड़ में अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। पौड़ी जिले के पाटयों गांव में रहने वाले 82 वर्षीय मोहन सिंह बताते हैं कि उनका नाती दिल्ली में रहता है। जब वह छोटा था तो हर गर्मियों में गांव आता था। अब पढ़ाई और कोचिंग के कारण वर्षों निकल जाते हैं। कभी-कभी वीडियो कॉल पर बात हो जाती है, लेकिन वह बात कहां जो गोद में बैठकर होती थी।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं, भावनात्मक भी है। बच्चों को बुजुर्गों का अनुभव और संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं, वहीं बुजुर्ग अकेलेपन और उपेक्षा की भावना से जूझ रहे हैं। संयुक्त परिवारों के टूटने और पलायन की बढ़ती प्रवृत्ति ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया है।
पहाड़ की लोक संस्कृति में बुजुर्ग केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि परंपराओं और लोक ज्ञान के जीवित स्रोत होते थे। लोककथाएं, रीति-रिवाज, त्योहारों की परंपराएं और स्थानीय इतिहास बच्चों तक इन्हीं के माध्यम से पहुंचता था। अब यह श्रृंखला धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पहाड़ों में रोजगार और शिक्षा के बेहतर अवसर विकसित किए जाएं तो पलायन की गति को कम किया जा सकता है। इससे न केवल गांवों की रौनक लौटेगी, बल्कि परिवारों के बिखरते रिश्तों को भी नई मजबूती मिलेगी।
आज भी पहाड़ के हजारों गांवों में कई दादा-दादी और नाना-नानी अपने बच्चों और पोते-पोतियों की राह देख रहे हैं। उनके लिए सबसे बड़ी खुशी कोई सरकारी योजना या आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि घर के आंगन में गूंजती अपने बच्चों की किलकारी है। पलायन ने पहाड़ के गांवों से केवल लोगों को नहीं छीना, उसने बच्चों के बचपन से दादी की कहानियां, नानी की ममता और दादा के अनुभवों की वह अमूल्य धरोहर भी छीन ली है, जो किसी किताब या मोबाइल स्क्रीन पर नहीं मिल सकती।
चुनावी वैतरणी में ‘आल वेदर रोड’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-24
चारधाम आल वेदर रोड परियोजनाः विकास की पहचान या जनसरोकारों का सवाल
---भाजपा बताएगी अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि, कांग्रेस उठा सकती है पर्यावरण और विस्थापन के सवाल
---सड़क चौड़ीकरण, पर्यटन और रोजगार के दावे बनाम भूस्खलन और पारिस्थितिकी की चिंता
---देश-विदेश के हजारों तीर्थयात्रियों की सुविधा और पहाड़ की संवेदनशीलता के बीच होगी चुनावी जंग
देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही विकास और पर्यावरण के मुद्दे फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आने लगे हैं। लगभग 12000 करोड़ रुपये की लागत वाली 900 किलोमीटर लंबी चारधाम आल वेदर रोड परियोजना इस समय सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए सबसे बड़ा चुनावी हथियार बन चुकी है। एक तरफ जहां यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सुगम धार्मिक पर्यटन का मुख्य जरिया बनी है, वहीं दूसरी तरफ यह पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है, जिससे जनता के बीच कशमकश की स्थिति है।
सत्ता पक्ष चीन सीमा से सटे )षिकेश-माना और गंगोत्री मार्गों की 10 मीटर चौड़ाई को देश की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य बता रहा है। रिकार्ड तोड़ धार्मिक पर्यटन और होमस्टे क्रांति को रिवर्स-पलायन का जरिया बताकर भाजपा इसे अपना सबसे मजबूत चुनावी ट्रंप कार्ड मान रही है। भाजपा के लिए यह महत्वाकांक्षी परियोजना चुनावी वैतरणी पार करने का एक मजबूत आधार है। सरकार इसे अपनी डबल इंजन सरकार की सबसे बड़ी बुनियादी ढांचागत उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। इसके केंद्र में पहला मुद्दा सामरिक महत्व का है। )षिकेश-माना-गंगोत्री और टनकपुर-पिथौरागढ़ जैसे मार्ग सीधे चीन सीमा को जोड़ते हैं। हाल के वर्षों में भारत-चीन सीमा पर उपजे विवादों के मद्देनजर, सेना के भारी टैंक, मिसाइल लान्चर और सैन्य रसद को सीमा तक तेजी से पहुंचाने के लिए इन सड़कों का डबल-लेन होना बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी दिसंबर 2021 में देश की सुरक्षा चिंताओं को सर्वाेपरि मानते हुए इस चौड़ाई को हरी झंडी दी थी।
दूसरा बड़ा पहलू धार्मिक पर्यटन और आर्थिकी का है। आल वेदर रोड बनने से चारधाम की यात्रा अब बारहमासी और अत्यधिक सुगम होने का दावा किया जा रहा है। यात्रा सुगम होने से राज्य में रिकार्ड तोड़ श्र(ालु पहुंच रहे हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर होटल, होमस्टे, टैक्सी आपरेटरों और छोटे व्यापारियों की आर्थिकी में अभूतपूर्व उछाल आया है। सरकार इसे पहाड़ से होने वाले पलायन को रोकने वाले एक बड़े आर्थिक हथियार के रूप में जनता के सामने रख रही है।
विपक्ष और पर्यावरणविदों का आरोप है कि पहाड़ों को 90 डिग्री के सीधे वर्टिकल कट दिए जाने से सैकड़ों नए लैंडस्लाइड जोन बन गए हैं। भागीरथी इको-सेंसिटिव जोन में जंगलों का कटान और नदियों में मलबे की डंपिंग से धराली जैसी फ्लैश फ्लड की घटनाएं बढ़ रही हैं। पर्यावरणविदों के अनुसार सड़कों को चौड़ा करने के लिए पहाड़ों को अवैज्ञानिक तरीके से सीधे वर्टिकल कट दिए जा रहे हैं, जिससे संवेदनशील और कच्चे हिमालयी पहाड़ पूरी तरह अस्थिर हो चुके हैं। इसके कारण चारधाम मार्गों पर सैकड़ों नए भूस्खलन क्षेत्र पैदा हो गए हैं, जो बरसात के दिनों में यात्रियों और स्थानीय निवासियों की जान के लिए खतरा बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, सड़क चौड़ीकरण से निकलने वाले लाखों टन मलबे को सीधे नदियों और बरसाती गदेरों में डंप किया जा रहा है। इससे नदियों का तल उथला हो रहा है, पानी के प्राकृतिक स्रोत सूख रहे हैं और जोशीमठ जैसी जमीन धंसने की घटनाएं अन्य संवेदनशील गांवों में भी पैर पसार रही हैं।
उत्तराखंड का मतदाता इस समय एक बेहद अजीब द्वंद्व से गुजर रहा है। पहाड़ का आम नागरिक बेहतर बुनियादी ढांचा, चौड़ी सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार की आकांक्षा तो रखता है, लेकिन वह हालिया वर्षों में आई प्राकृतिक आपदाओं और अपने पुश्तैनी गांवों के दरकने से डरा हुआ भी है। सीमावर्ती जिलों जैसे उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग के स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि सड़कें सुगम होने से व्यापारिक गतिविधियां निश्चित रूप से बढ़ी हैं, लेकिन मानसून आते ही जब पहाड़ दरकते हैं, तो हफ्तों तक जिंदगी थम जाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 2027 के चुनाव में यह मुद्दा केवल खोखली बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि सत्तारूढ़ दल राष्ट्रीय सुरक्षा और सुगम धार्मिक आर्थिकी के अपने राष्ट्रवाद प्रेरित नैरेटिव से जनता का भरोसा बरकरार रख पाता है, या विपक्ष पहाड़ के अस्तित्व, मलबे की डंपिंग और पर्यावरणीय तबाही के स्थानीय मुद्दों को वोट बैंक में तब्दील करने में कामयाब होता है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में चारधाम प्रोजेक्ट दो अलग-अलग राजनीतिक नैरेटिव के रूप में सामने आ सकता है। भाजपा इसे विकास, धार्मिक पर्यटन और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की सफलता के रूप में प्रचारित करेगी, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल पर्यावरणीय चुनौतियों, भू-स्खलन और स्थानीय चिंताओं को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करेंगे। स्पष्ट है कि उत्तराखंड की राजनीति में चारधाम प्रोजेक्ट केवल एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि विकास, आस्था, पर्यावरण और जनसरोकारों के बीच संतुलन की बहस का प्रतीक बन चुका है। यही वजह है कि 2027 के चुनावी रण में यह मुद्दा मतदाताओं के बीच व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है।
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भाजपा का दावा और कांग्रेस के सवाल
भाजपा का दावा है कि चारधाम प्रोजेक्ट के कारण यात्रा मार्ग पहले की तुलना में अधिक सुगम हुए हैं, यात्रा समय कम हुआ है और पर्यटन तथा स्थानीय कारोबार को नई गति मिली है। पार्टी आगामी चुनाव में इसे अपनी उपलब्धियों की सूची में प्रमुख स्थान दे सकती है। साथ ही यह संदेश देने का प्रयास होगा कि केंद्र और राज्य सरकार ने धार्मिक पर्यटन को नई पहचान दी है। दूसरी ओर कांग्रेस और विभिन्न सामाजिक संगठन परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि सड़क चौड़ीकरण के दौरान बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई और पहाड़ों की अनियोजित कटिंग से कई स्थानों पर भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। विपक्ष का कहना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय लोगों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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