शनिवार, 19 सितंबर 2026

udaydinmaan: फर्जीवाड़े की ‘डाक्टरी’ पर सरकारी मुहर

udaydinmaan: फर्जीवाड़े की ‘डाक्टरी’ पर सरकारी मुहर: स्वतंत्रता सेनानियों के हक पर डाका, सोता रहा तंत्र एक हफ्ते की मियाद या लीपापोती की है नई तैयारी चार अभ्यर्थियों के एमबीबीएस दाखिले पहले ही ...

फर्जीवाड़े की ‘डाक्टरी’ पर सरकारी मुहर

स्वतंत्रता सेनानियों के हक पर डाका, सोता रहा तंत्र एक हफ्ते की मियाद या लीपापोती की है नई तैयारी चार अभ्यर्थियों के एमबीबीएस दाखिले पहले ही निरस्त देहरादून। उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के तहत एमबीबीएस दाखिलों में कथित फर्जी प्रमाणपत्रों का मामला अब सीमित संख्या में सामने आए मामलों से कहीं बड़ा होता दिखाई दे रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप बहुगुणा ने चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल को 370 संदिग्ध अभ्यर्थियों की सूची सौंपते हुए उनके स्थायी निवास, शैक्षणिक अभिलेख और आरक्षण से जुड़े प्रमाणपत्रों की व्यापक जांच की मांग की है। मंत्री ने जिलाधिकारियों से एक सप्ताह में जांच रिपोर्ट तलब की है। मामले की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि शुरुआती जांच में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के प्रमाणपत्रों में गड़बड़ी पाए जाने के बाद चार एमबीबीएस दाखिले निरस्त किए जा चुके हैं। प्रशासन की जांच में जिस स्वतंत्रता सेनानी के नाम का प्रमाणपत्र लगाया गया था, उसका नाम संबंधित सरकारी पंजिका में नहीं मिला। आवेदन में दिए गए पतों की स्थलीय जांच में भी कई विसंगतियां सामने आईं। जांच के दौरान एक ही स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर वर्मा पुत्र खजान सिंह के नाम का इस्तेमाल कई अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों में किए जाने का मामला सामने आया। प्रशासनिक जांच में संबंधित नाम सरकारी अभिलेखों में नहीं मिलने और आवेदकों के बताए पतों पर परिवार के नहीं पाए जाने जैसी बातें सामने आईं। शपथपत्रों और पारिवारिक विवरणों में भी विसंगतियां दर्ज की गईं। इसके बाद चारों प्रमाणपत्र निरस्त किए गए और एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने इनके आधार पर हुए एमबीबीएस दाखिले भी रद्द कर दिए। संबंधित प्रकरण में पुलिस मुकदमा भी दर्ज किया गया है। नए स्तर पर सामने आई 370 अभ्यर्थियों की सूची ने जांच का दायरा काफी बढ़ा दिया है। शिकायतकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया है कि सूची में शामिल कुछ अभ्यर्थियों ने उत्तराखंड के बाहर के राज्यों में पढ़ाई की, इसके बावजूद उन्होंने उत्तराखंड का स्थायी निवास और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र किस आधार पर हासिल किया। हालांकि सूची में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को संदिग्ध या दोषी मानना उचित नहीं होगा। 370 नाम जांच का विषय हैं, दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं। इसलिए अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती निष्पक्ष और दस्तावेज-आधारित सत्यापन की है। मामले की पुलिस जांच में अब आनलाइन आवेदन प्रक्रिया का डिजिटल रिकार्ड महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आवेदन से लेकर प्रमाणपत्र अपलोड करने और स्वीकृति तक की प्रक्रिया का रिकार्ड उपलब्ध होने के कारण यह पता लगाया जा सकता है कि दस्तावेज किस स्तर पर प्रस्तुत हुए और किन अधिकारियों अथवा स्तरों से उनका सत्यापन किया गया। यही जांच का सबसे अहम बिंदु है। यदि कहीं फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए, तो केवल लाभ लेने वाले अभ्यर्थी तक जांच सीमित रखने के बजाय यह भी देखना होगा कि प्रमाणपत्र जारी करने और सत्यापन की सरकारी प्रक्रिया में कहां चूक हुई। चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभाग को संदिग्ध दस्तावेज मिलने पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। अब 370 नामों की जांच में प्रशासन को यह तय करना होगा कि कौन-सा प्रमाणपत्र वास्तविक है, कौन-सा संदिग्ध है और किन मामलों में दस्तावेजों की सत्यता पर कोई प्रश्न नहीं है। यह प्रकरण केवल कुछ एमबीबीएस सीटों का विवाद नहीं है। यदि जांच में बड़े पैमाने पर दस्तावेजी गड़बड़ियां प्रमाणित होती हैं तो इससे प्रमाणपत्र जारी करने, राजस्व अभिलेखों के सत्यापन और चिकित्सा शिक्षा में आरक्षण व्यवस्था की निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जांच पारदर्शी हो और वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित न हों। स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों के लिए निर्धारित अवसर किसी अपात्र व्यक्ति के कारण छिनना भी उतना ही गंभीर विषय है जितना किसी निर्दाेष अभ्यर्थी को बिना पर्याप्त सत्यापन के संदेह के घेरे में रखना। 370 नामों की सूची अब सरकार के लिए केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गई है। जांच रिपोर्ट यह तय करेगी कि मामला कुछ फर्जी प्रमाणपत्रों तक सीमित है या इसके पीछे प्रमाणपत्र जारी करने और सत्यापन की व्यवस्था में कहीं बड़ी खामी मौजूद है।

खुद लिखी ‘पटकथा’ और बन गए ‘मसीहा’

2022 में चुनावी रण से भागे, 2027 में 20 हजार का दंभ सहसपुर में हरक का दावा, 20 हजार पार जीत की गारंटी हरक सिंह रावत ने हाईकमान के सामने रखा अपना दावा सहसपुर से चुनाव लड़ने की इच्छा जताकर जीत का आंकड़ा कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर अब बढ़ेगी सियासी हलचल देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ कांग्रेस अब पूरी तरह चुनावी मोड में दिखाई देने लगी है। संगठनात्मक गतिविधियों के साथ ही पार्टी नेताओं की विधानसभा सीटों पर दावेदारी भी सामने आने लगी है। इसी कड़ी में कांग्रेस की चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष और पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने सहसपुर विधानसभा सीट को लेकर बड़ा दावा किया है। रावत का कहना है कि यदि कांग्रेस हाईकमान उन्हें सहसपुर से चुनाव मैदान में उतारता है तो वह पार्टी की जीत को 20 हजार से अधिक मतों के अंतर से सुनिश्चित करने की गारंटी देते हैं। हरक का यह बयान ऐसे समय आया है जब कांग्रेस 2027 की चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने में जुटी है। ऐसे में उनके दावे को केवल व्यक्तिगत चुनावी इच्छा के रूप में नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर टिकट की संभावित दौड़ के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। सहसपुर विधानसभा क्षेत्र देहरादून जिले की महत्वपूर्ण सीटों में शामिल है। क्षेत्र में ग्रामीण और शहरी आबादी के साथ विभिन्न सामाजिक समूहों की मौजूदगी चुनावी समीकरणों को बहुस्तरीय बनाती है। ऐसे में यहां किसी मजबूत चेहरे को उतारना कांग्रेस की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। हरक सिंह रावत लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और कई सरकारों में मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनका राजनीतिक अनुभव और अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रियता कांग्रेस के लिए उपयोगी हो सकती है। हालांकि किसी सीट पर चुनाव लड़ने और टिकट मिलने का अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व को करना है। हरक सिंह रावत ने अपने दावे को केवल चुनाव लड़ने की इच्छा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीत के अंतर का आंकड़ा भी सामने रखा है। 20 हजार से अधिक वोटों से जीत की गारंटी का दावा राजनीतिक तौर पर बड़ा संदेश है। इस दावे के कई राजनीतिक अर्थ निकाले जा सकते हैं। पहला, हरक रावत सहसपुर में अपने जनाधार को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं। दूसरा, वह पार्टी नेतृत्व को यह संदेश देना चाहते हैं कि उन्हें यदि जिम्मेदारी दी जाती है तो वह सीट को कांग्रेस के पक्ष में निर्णायक रूप से मोड़ सकते हैं। तीसरा, चुनाव से पहले ही संभावित प्रत्याशियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा में यह बयान उनकी दावेदारी को सार्वजनिक रूप से स्थापित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि जीत का वास्तविक अंतर चुनाव परिणाम आने पर ही तय होगा। अभी यह हरक सिंह रावत का राजनीतिक दावा है, जिसे चुनावी परिस्थितियों, प्रत्याशियों, स्थानीय मुद्दों और मतदाताओं के रुझान की कसौटी पर परखा जाना बाकी है। हरक सिंह रावत वर्तमान में कांग्रेस की चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हैं। ऐसे में उनका किसी विधानसभा सीट को लेकर इस तरह खुलकर दावा करना पार्टी के भीतर चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है। सवाल यह भी है कि क्या चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल रहे वरिष्ठ नेता खुद चुनाव मैदान में उतरेंगे या संगठन की व्यापक रणनीति पर काम करेंगे। कांग्रेस में टिकट वितरण को लेकर अभी अंतिम तस्वीर सामने नहीं आई है। लेकिन नेताओं की सार्वजनिक दावेदारी से साफ है कि विधानसभा चुनाव की तैयारियां अब केवल संगठनात्मक बैठकों तक सीमित नहीं हैं। संभावित उम्मीदवार अपने-अपने राजनीतिक क्षेत्र में जमीन तैयार करने लगे हैं। कांग्रेस के सामने 2027 में एक तरफ भाजपा की चुनावी तैयारियों का मुकाबला करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर टिकट के दावेदारों को साधने की जिम्मेदारी भी होगी। यदि एक ही सीट से कई मजबूत नेता दावेदारी करते हैं तो टिकट वितरण पार्टी नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा बन सकता है। हरक सिंह रावत का सहसपुर को लेकर सामने आया दावा इसी व्यापक तस्वीर का हिस्सा है। अब देखना होगा कि पार्टी हाईकमान उनकी दावेदारी को किस नजर से देखता है और सहसपुर में कांग्रेस किस चेहरे पर भरोसा जताती है। फिलहाल हरक ने गेंद हाईकमान के पाले में डाल दी हैकृसहसपुर से टिकट मिला तो 20 हजार से अधिक मतों की जीत की गारंटी। अब कांग्रेस नेतृत्व के सामने सवाल केवल प्रत्याशी चुनने का नहीं, बल्कि हर दावेदार की राजनीतिक ताकत को चुनावी रणनीति में बदलने का भी है।

उत्तराखंड में भाजपा की ‘सुनामी’

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने किया बड़ा दावा प्रदेश का राजनीतिक माहौल भाजपा के पक्ष में, जमीनी स्तर पर दिख रहे बदलाव के संकेत जमीन पर असंतोष, हवा में सुनामी का दावा, 2027 से पहले महेंद्र भट्ट का आत्ममुग्ध शगूफा सत्ता के चश्मे से गायब हो गए उत्तराखंड के बेरोजगारी, पलायन और भ्रष्टाचार आदि सभी मुद्दे देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच सियासी बयानबाजी भी तेज होने लगी है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने दावा किया है कि प्रदेश की राजनीतिक हवाएं भाजपा के पक्ष में बह रही हैं और आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की सुनामी दिखाई देगी। उन्होंने कहा कि यह केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि प्रदेश में दिखाई दे रहे कई संकेतों से स्पष्ट हो रहा है। महेंद्र भट्ट के बयान से साफ है कि भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी राजनीतिक आक्रामकता बढ़ा दी है। पार्टी जहां संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर जोर दे रही है, वहीं वरिष्ठ नेता सरकार की उपलब्धियों और संगठन की सक्रियता को चुनावी आधार बनाने में जुटे हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का कहना है कि प्रदेश में राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और इसके संकेत जमीनी स्तर पर दिखाई दे रहे हैं। उनके अनुसार जनता के बीच सरकार के कामकाज को लेकर सकारात्मक माहौल है और संगठन लगातार मजबूत हो रहा है। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश का चुनाव होगा। ऐसे में पार्टी नेतृत्व अभी से अपने कार्यकर्ताओं और संगठन को चुनावी लक्ष्य के अनुरूप सक्रिय कर रहा है। महेंद्र भट्ट का सुनामी वाला बयान इसी चुनावी आत्मविश्वास को सामने रखता है। भाजपा के इस दावे के साथ कांग्रेस पर भी राजनीतिक दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है। कांग्रेस जहां सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, पलायन और अन्य मुद्दों को लेकर हमलावर है, वहीं भाजपा विपक्ष के दावों का जवाब सरकार के कामकाज और संगठनात्मक मजबूती के जरिए देने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। 2027 के चुनाव में दोनों प्रमुख दलों के बीच मुकाबला केवल सत्ता और विपक्ष की लड़ाई नहीं रहेगा, बल्कि अपने-अपने दावों को जमीन पर साबित करने की चुनौती भी होगी। महेंद्र भट्ट ने राजनीतिक माहौल को भाजपा के पक्ष में बताते हुए सुनामी का दावा जरूर किया है, लेकिन इस दावे की वास्तविक राजनीतिक परीक्षा चुनाव में ही होगी। फिलहाल चुनाव की अधिसूचना और अंतिम प्रत्याशी तय होने में समय है। आने वाले महीनों में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों का चयन, संगठन की सक्रियता और मतदाताओं के बीच दोनों दलों की स्वीकार्यता जैसे कारक तस्वीर को प्रभावित करेंगे। भाजपा ने फिलहाल चुनावी नैरेटिव की दिशा तय करने की कोशिश शुरू कर दी हैकृसंदेश साफ है कि पार्टी खुद को 2027 की लड़ाई में मजबूत स्थिति में मान रही है। अब कांग्रेस इस दावे का जवाब किस मुद्दे और किस रणनीति से देती है, यह उत्तराखंड की अगली राजनीतिक जंग की दिशा तय करने वाले प्रमुख पहलुओं में होगा।

चेलों ने लूटा प्रदेश और गुरु बने ‘सत्यवादी’

ईडी की आंच से बचने को हरीश रावत ने चला भावनात्मक पैंतरा पूर्व सीएम को याद आई मां, आंसुओं से धुलेंगे भ्रष्टाचार के दाग जांच एजेंसियों की कार्रवाई और आरोपों से घिरे पूर्व सीएम हरीश देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में चुनावी रण अभी पूरी तरह खुला भी नहीं है और आरोप-प्रत्यारोप के तीरों ने निशाना साधना शुरू कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ उठ रहे आरोपों के बीच अब खुद रावत मैदान में उतर आए हैं। लेकिन इस बार उनका जवाब सामान्य राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि भावनाओं से लिपटा हुआ राजनीतिक प्रतिआक्रमण है। हाथों में मां की तस्वीर, मां की सौगंध और फिर बड़ा दावाकृन नौकरी दिलाने के नाम पर कभी पैसा लिया और न किसी राजनीतिक पद के लिए। रावत ने अपने अंदाज में सवाल भी खड़ा किया और जवाब भी दिया। संदेश साफ थाकृआरोप लगाने वालों को वह केवल राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत आस्था को सामने रखकर चुनौती दे रहे हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब उनके पूर्व विशेष कार्याधिकारी और वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना से जुड़ी प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। जांच एजेंसी की कार्रवाई के बाद रावत पहले ही कांग्रेस के कुछ संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं। हालांकि उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने की बात नहीं कही। हरीश रावत के लिए मौजूदा विवाद केवल किसी एक आरोप का जवाब देने तक सीमित नहीं है। यह उनके दशकों लंबे राजनीतिक सफर और सार्वजनिक छवि से जुड़ा सवाल बन गया है। यही वजह है कि रावत ने जवाब देते हुए राजनीतिक शब्दावली के बजाय परिवार और आस्था का सहारा लिया। मां की तस्वीर हाथ में लेकर सौगंध खाना दरअसल अपने समर्थकों और राजनीतिक विरोधियों दोनों को संदेश देने की कोशिश है कि वह इस आरोप को व्यक्तिगत रूप से अपनी प्रतिष्ठा पर हमला मान रहे हैं। रावत का कहना है कि उन्होंने कभी नौकरी लगवाने के नाम पर पैसा नहीं लिया। राजनीतिक पद दिलाने के बदले धन लेने के आरोपों से भी उन्होंने इनकार किया है। यानी पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोपों की पूरी राजनीतिक धार को अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी के सवाल से जोड़ दिया है। रावत के जवाब का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि आरोपों के शोर को वह सबूत की कसौटी पर कसने की चुनौती दे रहे हैं। उनका कहना है कि उनके राजनीतिक जीवन में पहले भी आरोप लगाए गए, लेकिन वह उन हमलों के बीच खड़े रहे। यहीं से मामला महज बचाव का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिरोध का रूप लेता दिखाई दे रहा है। रावत जानते हैं कि चुनावी राजनीति में किसी नेता पर लगा आरोप केवल अदालत या जांच एजेंसी तक सीमित नहीं रहता। वह जनता की धारणा का हिस्सा बन जाता है। ऐसे में रावत ने शुरुआती स्तर पर ही अपनी राजनीतिक कथा गढ़ने की कोशिश की हैकृआरोप बनाम हरीश रावत की साख। चंदन सिंह जीना से जुड़े मामले में ईडी की कार्रवाई के बाद भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का राजनीतिक आधार मिला है, जबकि कांग्रेस इसे व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देख रही है। ऐसे में रावत का भावुक वीडियो इसी टकराव की अगली कड़ी माना जा सकता है। भाजपा की ओर से जहां जांच और कार्रवाई को कानून की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, वहीं रावत ने अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों को राजनीतिक हमले के रूप में प्रस्तुत किया है। यही विरोधाभास आने वाले दिनों में इस मुद्दे को और गरमा सकता है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और भाजपा को सत्ता से चुनौती देने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे समय में कांग्रेस के सबसे पुराने और प्रभावशाली चेहरों में शामिल हरीश रावत पर उठते सवाल पार्टी के लिए भी राजनीतिक महत्व रखते हैं। रावत के सामने दोहरी चुनौती हैकृएक तरफ आरोपों का जवाब देना और दूसरी तरफ यह संदेश देना कि वह अभी भी सक्रिय राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में हैं। इसीलिए उनका मां की सौगंध वाला वीडियो महज सफाई नहीं है। यह राजनीतिक रूप से अपने समर्थक आधार को साधने और विरोधियों के हमले की धार को भावनात्मक मोर्चे पर रोकने की कोशिश भी है। उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत की शैली हमेशा से अलग रही है। कभी पहाड़ की संस्कृति, कभी लोक भोजन, कभी खेत-खलिहान और कभी पहाड़ी अस्मिताकृरावत राजनीति को सीधे जनभावनाओं से जोड़ने के लिए जाने जाते हैं। इस बार भी उन्होंने वही रास्ता चुना है, लेकिन मुद्दा कहीं ज्यादा गंभीर है। हाथ में मां की तस्वीर लेकर दिया गया बयान उनके लिए राजनीतिक बचाव का भावनात्मक कवच बन गया है। अब असली सवाल यह है कि क्या यह भावनात्मक अपील आरोपों के राजनीतिक असर को रोक पाएगी? इसका जवाब आने वाले दिनों की जांच, सामने आने वाले दस्तावेजों और दोनों दलों की राजनीतिक रणनीति से मिलेगा। हरीश रावत ने संकेत दे दिया है कि वह चुप बैठने वाले नहीं हैं। उन्होंने संघर्ष जारी रखने की बात कही है। यानी आने वाले दिनों में यह मामला और मुखर हो सकता है। एक तरफ जांच एजेंसी की कार्रवाई है, दूसरी तरफ रावत की राजनीतिक सफाई। एक तरफ भाजपा के हमले की जमीन है, दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर रावत की अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता का सवाल। 2027 की चुनावी बिसात पर अभी कई मोहरे चलने बाकी हैं। लेकिन हरीश रावत ने अपने ऊपर लगे आरोपों के जवाब में पहली चाल चल दी हैकृहाथों में मां की तस्वीर, जुबान पर सौगंध और सामने राजनीतिक चुनौती। अब सवाल यह नहीं कि रावत चुप होंगे या नहीं। सवाल यह है कि उनके इस भावनात्मक पलटवार के बाद भाजपा और कांग्रेस की सियासी लड़ाई किस नए मोड़ पर पहुंचती है।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

udaydinmaan: कोल पावर प्लांट पर घिरी धामी सरकार

udaydinmaan: कोल पावर प्लांट पर घिरी धामी सरकार: कांग्रेस ने निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने और निविदा की शर्तों में हेरफेर का लगाया आरोप सरकार का दावाकृदीर्घकालिक बिजली संकट से निपटने के लिए ...

कोल पावर प्लांट पर घिरी धामी सरकार

कांग्रेस ने निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने और निविदा की शर्तों में हेरफेर का लगाया आरोप सरकार का दावाकृदीर्घकालिक बिजली संकट से निपटने के लिए पारदर्शी तरीके से लिया फैसला विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राज्य की राजनीति में चरम पर पहुंची बयानबाजी देहरादून। विधानसभा चुनाव की आहट के बीच उत्तराखंड की सियासत में बिजली का मुद्दा गरमाने लगा है। छत्तीसगढ़ स्थित प्रस्तावित कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना से 1320 मेगावाट बिजली खरीद के 25 वर्षीय करार को लेकर कांग्रेस ने धामी सरकार को सीधे निशाने पर लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सार्वजनिक क्षेत्र की प्रस्तावित परियोजना को समाप्त कर निजी कंपनी से बिजली खरीद का रास्ता तैयार किया गया और निविदा की शर्तों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए। दूसरी ओर सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को नियमसम्मत, प्रतिस्पर्धी और राज्य की दीर्घकालिक बिजली जरूरतों को पूरा करने वाला बताया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने दिल्ली में प्रेस वार्ता कर आरोप लगाया कि 1320 मेगावाट की बिजली खरीद के लिए जारी निविदा में कुल 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किया गया। कांग्रेस का सवाल है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में निविदा शर्तों में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी और क्या इससे किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने की स्थिति बनी। कांग्रेस के मुताबिक वर्ष 2024 में उत्तराखंड सरकार ने यूजेवीएनएल और टीएचडीसी के संयुक्त उपक्रम के माध्यम से 1320 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट लगाने का प्रस्ताव रखा था। पार्टी का दावा है कि केंद्र से सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद जनवरी 2025 में इस परियोजना को समाप्त कर दिया गया और फरवरी 2025 में बिजली खरीद के लिए नया टेंडर जारी किया गया। कांग्रेस का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राज्य की अपनी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बिजली परियोजना विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही थीं, तो उस प्रस्ताव को समाप्त करने के बाद बाहर से बिजली खरीदने का फैसला क्यों किया गया। पार्टी ने टेंडर में पावर प्लांट को उत्तराखंड के बजाय देश में कहीं भी स्थापित किए जाने की अनुमति, एक ही बोलीदाता से पूरी 1320 मेगावाट बिजली लेने तथा ट्रांसमिशन लागत से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि इन बदलावों का सीधा संबंध छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित परियोजना से है। उत्तराखंड कैबिनेट ने अगस्त 2026 में यूपीसीएल को अदाणी पावर से 25 साल तक 1320 मेगावाट बिजली खरीदने के लिए समझौता करने की अनुमति दी थी। प्रस्तावित दर 5.746 रुपये प्रति यूनिट बताई गई है। नियामक आयोग की स्वीकृति की प्रक्रिया भी इस करार का हिस्सा है। सरकार का तर्क है कि इससे राज्य की भविष्य की आधार-भार बिजली जरूरत सुरक्षित होगी और बिजली खरीद की लागत में अनिश्चितता कम होगी।यही दीर्घकालिक करार अब कांग्रेस के राजनीतिक हमले का केंद्र बन गया है। कांग्रेस ने 25 वर्षों में संभावित भुगतान को लेकर भी सवाल उठाए हैं और पूरी निविदा प्रक्रिया के दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि वह सत्ता में आने पर इस करार की समीक्षा करेगी और यदि किसी स्तर पर अनियमितता मिलती है तो कार्रवाई की जाएगी। कांग्रेस के आरोपों के बीच सरकार ने अपना पक्ष भी सामने रखा है। प्रमुख सचिव ऊर्जा आर मीनाक्षी सुंदरम ने कहा है कि 1320 मेगावाट बिजली खरीद की प्रक्रिया नियमों, तकनीकी आवश्यकताओं और प्रतिस्पर्धी बोली व्यवस्था के तहत आगे बढ़ी है। उनके अनुसार आरएफक्यू चरण में पांच कंपनियां पात्र पाई गई थीं और अंतिम चयन प्रतिस्पर्धी बोली के आधार पर किया गया। प्रमुख सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि प्लांट के लिए उत्तराखंड के बाहर स्थान चुनने का विकल्प तकनीकी, पर्यावरणीय और कोयला परिवहन लागत को ध्यान में रखते हुए रखा गया। सरकार का कहना है कि निश्चित शुल्क की सीमा में बदलाव से उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और अंतिम दरों का निर्धारण नियामकीय प्रक्रिया के तहत होगा। सियासी लड़ाई केवल कांग्रेस के आरोपों तक सीमित नहीं है। भाजपा ने पलटवार करते हुए कांग्रेस शासनकाल में काशीपुर के गैस आधारित बिजली संयंत्रों से जुड़े महंगे बिजली करार का मुद्दा उठाया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने मौजूदा करार की दर को कांग्रेस शासनकाल के कथित गैस पावर करार की तुलना में कम बताते हुए इसे राज्य की दीर्घकालिक बिजली जरूरत सुरक्षित करने वाला फैसला बताया है। इस तरह बिजली का मुद्दा अब महज ऊर्जा नीति का सवाल नहीं रह गया है। यह आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच आर्थिक फैसलों, सरकारी बनाम निजी क्षेत्र और जनता पर संभावित वित्तीय बोझ के सवालों को लेकर राजनीतिक टकराव का नया मैदान बनता जा रहा है। इस पूरे विवाद में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन जनता के सामने कुछ ठोस सवाल हैंकृनिविदा की शर्तों में बड़े पैमाने पर बदलाव क्यों किए गए? सार्वजनिक क्षेत्र की प्रस्तावित परियोजना को समाप्त करने का तकनीकी आधार क्या था? छत्तीसगढ़ से बिजली खरीदना उत्तराखंड के लिए दीर्घकाल में कितना किफायती होगा? 25 साल के करार की कुल वित्तीय देनदारी क्या होगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इस पूरी प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता के सभी मानकों का पालन हुआ? सरकार इन सवालों का तथ्यात्मक जवाब देकर विवाद को खत्म कर सकती है। वहीं कांग्रेस के लिए भी आरोपों से आगे बढ़कर दस्तावेजों और ठोस तथ्यों के साथ अपने सवालों को साबित करना चुनौती होगी। बिजली की जरूरत उत्तराखंड की है, भुगतान भी उत्तराखंड के उपभोक्ताओं को करना है। इसलिए चुनावी शोर से अलग इस करार की असली कसौटी यही होगी कि 25 साल की यह व्यवस्था राज्य को कितनी सुनिश्चित, किफायती और विश्वसनीय बिजली देती है।

सेवा संकल्प के बहाने भाजपा की चुनावी तैयारी

चुनाव की तारीखों से पहले ही जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ाने और संगठन की ताकत परखने की कवायद ज़िले से लेकर मंडल स्तर तक सेवा सेतु और बहुउद्देशीय शिविरों के जरिए जनता के बीच पहुंचेगी पार्टी भाजपा के पास जनता की नब्ज टटोलने, उपलब्धियां गिनाने और संगठन को बूथ तक कसने का मौका देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तारीख भले अभी घोषित नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां लगातार चुनावी रंग ले रही हैं। इसी क्रम में भाजपा का सेवा संकल्प अभियान महज सेवा कार्यक्रमों की श्रृंखला नहीं, बल्कि सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने और संगठन की जमीनी सक्रियता परखने का बड़ा अवसर बनकर सामने आया है। अभियान के तहत 11 प्रमुख कार्यक्रम प्रस्तावित हैं और इन्हें जिलों से लेकर मंडल स्तर तक ले जाने की तैयारी है। भाजपा की घोषित रणनीति में सेवा, जनभागीदारी, संवाद और नवाचार को केंद्र में रखा गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अनुसार अभियान के जरिए केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं से हुए बदलाव तथा लाभार्थियों की कहानियों को जनता के सामने रखा जाएगा। सेवा सेतु जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सरकारी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने और शिविरों के जरिए संवाद करने की भी योजना है। यहीं से इस अभियान का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है। चुनावी वर्ष में किसी भी दल के लिए जनता से सीधा संपर्क केवल संगठनात्मक गतिविधि नहीं होता। वह यह समझने का माध्यम भी बनता है कि सरकार की योजनाओं को लेकर जमीन पर क्या प्रतिक्रिया है, किन वर्गों तक लाभ पहुंचा है और किन मुद्दों पर लोगों की शिकायतें बरकरार हैं। भाजपा के सामने इस समय एक तरफ सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच स्थापित करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ संगठन को चुनावी मोड में सक्रिय बनाए रखने की जरूरत है। पार्टी पहले ही बूथ सशक्तीकरण, शक्ति केंद्र बैठकों और घर-घर संपर्क जैसे कार्यक्रमों के जरिए संगठन को अंतिम छोर तक सक्रिय करने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है। ऐसे में सेवा संकल्प अभियान इन गतिविधियों को व्यापक जनसंपर्क से जोड़ने का माध्यम बन सकता है। पार्टी ने अभियान के अलग-अलग कार्यक्रमों की जिम्मेदारी मंत्रियों और संगठन के पदाधिकारियों को भी सौंपी है। इससे सरकार और संगठन के बीच समन्वय की परीक्षा भी होगी। भाजपा का जोर केंद्र और राज्य की योजनाओं के लाभार्थियों तक पहुंचने पर है। आशीर्वाद का दीया, नमो सेवा गाथा, कहानी बदलाव की, सेवा मेरा योगदान और सेवा सेतु जैसे कार्यक्रम इसी उद्देश्य से तैयार किए गए हैं। लेकिन राजनीतिक रूप से असली सवाल यह होगा कि क्या योजनाओं का लाभ पाने वाला वर्ग उसी अनुपात में सरकार के पक्ष में राजनीतिक समर्थन भी व्यक्त करता है? यह स्वतः मान लेना उचित नहीं होगा। लाभार्थी की संतुष्टि कई मुद्दों में से एक हो सकती है। रोजगार, महंगाई, पलायन, स्थानीय विकास, भू-कानून, मूल निवास और सरकारी भर्ती जैसे सवाल भी मतदाताओं के राजनीतिक रुख को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि सेवा संकल्प अभियान भाजपा के लिए केवल उपलब्धियां बताने का मंच नहीं, बल्कि फीडबैक लेने की जमीन भी बन सकता है। भाजपा के इस अभियान ने कांग्रेस के सामने भी राजनीतिक चुनौती खड़ी की है। यदि भाजपा घर-घर जाकर सरकार की उपलब्धियों और योजनाओं का प्रचार करती है तो कांग्रेस को उसी जनता के बीच सरकार के दावों की पड़ताल और अपने मुद्दों को प्रभावी ढंग से रखने की जरूरत होगी। कांग्रेस के लिए रोजगार, महंगाई, भर्ती परीक्षाओं, पलायन, कानून-व्यवस्था और विकास के सवाल पहले से राजनीतिक मुद्दे हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में मुकाबला केवल भाषणों और प्रेस वार्ताओं तक सीमित रहने के बजाय सरकार ने क्या किया बनाम जनता को क्या मिला के सवाल पर केंद्रित हो सकता है। सेवा संकल्प अभियान की सफलता का एक पैमाना यह भी होगा कि भाजपा का संगठन कितनी प्रभावी ढंग से इसे बूथ स्तर तक पहुंचाता है। पार्टी ने पहले ही चुनावी तैयारियों को बूथ और शक्ति केंद्र स्तर तक ले जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसलिए आने वाला एक महीना भाजपा के लिए कार्यकर्ताओं की सक्रियता, जनसंपर्क की क्षमता और स्थानीय नेतृत्व की पकड़ परखने का अवसर भी है। जहां संगठन मजबूत है, वहां अभियान आसानी से जमीन पकड़ सकता है, जहां स्थानीय स्तर पर असंतोष या निष्क्रियता है, वहां वही अभियान पार्टी के लिए फीडबैक का माध्यम बन सकता है। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा ने सेवा को अपने जनसंपर्क अभियान का केंद्रीय शब्द बनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने से इसे जोड़ा गया है और उत्तराखंड में अभियान को विकसित भारत 2047 के संकल्प से जोड़ने की बात कही गई है। लेकिन चुनावी राजनीति में किसी अभियान की वास्तविक प्रभावशीलता नारों से नहीं, जनता की प्रतिक्रिया से तय होती है। सेवा संकल्प अभियान के दौरान भाजपा के सामने यही सबसे महत्वपूर्ण फीडबैक होगा कि सरकार की उपलब्धियों का संदेश कितनी दूर तक पहुंचा और जमीन पर जनता किन सवालों को प्राथमिकता दे रही है। कुल मिलाकर, चुनावी साल में भाजपा का सेवा संकल्प अभियान सरकार के कामकाज का प्रचार अभियान होने के साथ-साथ संगठन के लिए जनता की नब्ज टटोलने का अवसर भी है। अब देखना यह होगा कि भाजपा इस जनसंपर्क से केवल अपनी उपलब्धियों की सूची तैयार करती है या जनता की शिकायतों और अपेक्षाओं को भी चुनावी रणनीति में जगह देती है। 2027 की राजनीतिक लड़ाई में यही फीडबैक आगे चलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

सैन्य बहुल राज्य का सियासी गणित

पूर्व सैनिकों और सैन्य परिवारों के वोटों को साधने के लिए 2027 चुनाव से पहले राजनीतिक बिसात बिछना शुरू अग्निवीर पर सियासी संग्राम, भाजपा ने कांग्रेस को घेरा,54 लाख आवेदनों को बनाया हथियार सत्तारूढ़ दल का दावाकृयोजना के तहत आए रिकार्ड आवेदनों ने साबित किया युवाओं का भरोसा देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच अग्निवीर योजना एक बार फिर सियासी विमर्श के केंद्र में आती दिख रही है। कांग्रेस लगातार अग्निपथ योजना को युवाओं के भविष्य और रोजगार से जोड़कर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा ने इसे लेकर कांग्रेस पर युवाओं को भ्रमित करने का आरोप लगाया है। भाजपा का कहना है कि अग्निवीरों के लिए सेवा के बाद रोजगार और करियर का रोडमैप स्पष्ट है और बड़ी संख्या में युवाओं द्वारा आवेदन किया जाना योजना में उनकी रुचि को दर्शाता है। उत्तराखंड में सैन्य सेवा का सामाजिक और भावनात्मक महत्व लंबे समय से रहा है। बड़ी संख्या में युवा सेना में भर्ती को करियर के साथ-साथ गौरव और सेवा का अवसर मानते हैं। ऐसे में अग्निपथ योजना का मुद्दा सीधे युवाओं और पूर्व सैनिक परिवारों से जुड़ता है। विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए यह वर्ग महत्वपूर्ण राजनीतिक समूह है। यही कारण है कि अग्निवीर योजना अब केवल रक्षा भर्ती की नीति नहीं, बल्कि युवा रोजगार और भविष्य से जुड़ा राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है। भाजपा ने अग्निपथ योजना के पक्ष में सबसे बड़ा राजनीतिक तर्क बड़ी संख्या में प्राप्त आवेदनों को बनाया है। पार्टी का कहना है कि 54 लाख आवेदन इस बात का संकेत हैं कि देश के युवाओं में सेना में भर्ती होने को लेकर उत्साह और रुचि बनी हुई है। भाजपा के मुताबिक यदि युवा योजना को पूरी तरह अस्वीकार करते, तो इतनी बड़ी संख्या में आवेदन नहीं आते। पार्टी इसे कांग्रेस के उस नैरेटिव का जवाब मान रही है जिसमें अग्निपथ योजना को युवाओं के लिए नुकसानदेह बताया जाता है। हालांकि आवेदन की संख्या को योजना के प्रति युवाओं की पूर्ण संतुष्टि का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। आवेदन यह जरूर बताते हैं कि सेना में भर्ती के प्रति आकर्षण कायम है, जबकि योजना के दीर्घकालिक प्रभाव का आकलन सेवा पूरी करने वाले अग्निवीरों के रोजगार और करियर के आंकड़ों से होगा। कांग्रेस का मुख्य राजनीतिक हमला अग्निवीर की चार वर्ष की सेवा अवधि को लेकर रहा है। पार्टी का तर्क है कि सेना में नियमित भर्ती की जगह सीमित अवधि की सेवा व्यवस्था से युवाओं के सामने चार साल बाद करियर को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है। विपक्ष इस मुद्दे को बेरोजगारी से जोड़कर युवाओं के बीच ले जाने की कोशिश करता रहा है। कांग्रेस के लिए अग्निवीर योजना केंद्र सरकार की रोजगार नीति पर सवाल उठाने का माध्यम भी बन रही है। भाजपा का पलटवार है कि कांग्रेस युवाओं के सामने उपलब्ध अवसरों को नजरअंदाज कर केवल भ्रम का वातावरण बनाने का प्रयास कर रही है। अग्निपथ योजना पर भाजपा का बचाव केवल योजना के प्रावधानों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट हैकृसरकार सेना को युवा शक्ति से जोड़ रही है और अग्निवीरों को सेवा के बाद भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था कर रही है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और असम राइफल्स में पूर्व अग्निवीरों के लिए कांस्टेबल/राइफलमैन भर्ती में 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान सरकार की ओर से किया गया है। कई राज्यों ने भी पुलिस और अन्य सेवाओं में पूर्व अग्निवीरों के लिए अवसर या प्राथमिकता संबंधी फैसले लिए हैं। भाजपा इन्हीं प्रावधानों को अग्निवीरों के लिए तैयार किए गए रोडमैप के तौर पर प्रस्तुत कर रही है। उत्तराखंड के लिए अग्निवीर योजना का राजनीतिक महत्व दूसरे राज्यों की तुलना में अलग है। पहाड़ों में सेना की नौकरी को लेकर पीढ़ियों पुरानी परंपरा रही है। सेना में भर्ती यहां रोजगार के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा और देशसेवा से भी जुड़ी रही है। इसलिए कांग्रेस अगर अग्निवीर योजना को युवाओं के भविष्य का सवाल बनाती है तो भाजपा के लिए जरूरी होगा कि वह प्रदेश के युवाओं के बीच योजना के बाद के अवसरों को स्पष्ट रूप से रखे। वहीं कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह अपने आरोपों को ठोस आंकड़ों और अग्निवीरों की वास्तविक स्थिति से जोड़कर जनता के सामने रखे। 2027 की चुनावी राजनीति में अग्निवीर योजना पर बहस आगे और तेज हो सकती है। भाजपा इसे युवा शक्ति, राष्ट्र सेवा और रोजगार के नए अवसरों से जोड़ सकती है, जबकि कांग्रेस इसे स्थायी रोजगार और युवाओं के भविष्य के सवाल के रूप में उठाएगी। इस राजनीतिक टकराव में 54 लाख आवेदनों का आंकड़ा भाजपा के लिए बड़ा प्रचार बिंदु है, लेकिन चुनावी विमर्श में इससे आगे भी सवाल खड़े होंगेकृचार साल बाद अग्निवीरों का करियर कैसा रहा, कितनों को स्थायी रोजगार मिला और पुनर्वास की व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित हुई? यानी अग्निवीर पर चुनावी सियासत में फिलहाल दो नैरेटिव आमने-सामने हैंकृभाजपा का युवाओं का उत्साह और अवसर बनाम कांग्रेस का भविष्य की सुरक्षा और स्थायी रोजगार। आने वाले चुनावी महीनों में इन दोनों दावों की असली परीक्षा युवाओं के बीच होने वाली राजनीतिक बहस और उपलब्ध आंकड़ों से होगी।

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

udaydinmaan: उत्तराखंड में बीजेपी का ‘बूथ स्ट्राइक’ प्लान

udaydinmaan: उत्तराखंड में बीजेपी का ‘बूथ स्ट्राइक’ प्लान: राजधानी से बाहर निकली बीजेपी, जिलों में नए कमान संभालेंगे सेनापति प्रदेश में विधायकों और सांसदों को भी मिल गया है बूथ स्तर का टास्क उत्तराखं...

उत्तराखंड में बीजेपी का ‘बूथ स्ट्राइक’ प्लान

राजधानी से बाहर निकली बीजेपी, जिलों में नए कमान संभालेंगे सेनापति प्रदेश में विधायकों और सांसदों को भी मिल गया है बूथ स्तर का टास्क उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा आ गई ‘इलेक्शन मोड’ में देहरादून। उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी औपचारिक रूप से घोषित नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक दलों की तैयारियों ने चुनावी तापमान बढ़ा दिया है। इस मुकाबले में भाजपा की सबसे स्पष्ट ताकत उसका संगठनात्मक ढांचा, सत्ता की मशीनरी से जुड़ा जनसंपर्क और बूथ स्तर तक पहुंच बनाने की कोशिश है। हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि पार्टी ने चुनावी तैयारी को केवल राजधानी की बैठकों तक सीमित रखने के बजाय विधानसभा और मंडल स्तर तक फैलाना शुरू कर दिया है। भाजपा ने 19 संगठनात्मक जिलों के प्रभारी और सह प्रभारी नियुक्त किए हैं। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी प्रदेश को चुनावी दृष्टि से अलग-अलग संगठनात्मक इकाइयों में सक्रिय कर रही है। इससे पहले प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में सांसदों, विधायकों और वरिष्ठ संगठन पदाधिकारियों की अगुवाई में कोर कमेटियां बनाने की योजना भी सामने आई थी। इन समितियों को चुनाव तक संगठनात्मक गतिविधियों, जनसंपर्क अभियानों और पार्टी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने हल्द्वानी की प्रदेश कार्यसमिति में कहा कि पार्टी की बूथ स्तर तक की रणनीति तैयार है। उन्होंने निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए 2027 में पूरी ताकत से चुनाव लड़ने की बात कही। यानी भाजपा की चुनावी रणनीति का पहला आधार संगठन की निरंतर सक्रियता है। पार्टी चुनाव से कुछ महीने पहले कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के बजाय काफी पहले से नेटवर्क को चुनावी भूमिका में लगाने का प्रयास कर रही है। भाजपा की दूसरी बड़ी ताकत सत्ता में होना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को चुनावी संवाद का हिस्सा बना रही है। हल्द्वानी में धामी ने चारधाम, आलवेदर रोड, पर्यटन और रोजगार को सरकार के प्रमुख कामों के रूप में सामने रखा तथा योजनाओं को घर-घर पहुंचाने पर जोर दिया। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 2027 का चुनाव मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इससे भाजपा के सामने नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक स्तर पर एक स्पष्ट राजनीतिक रेखा दिखाई देती हैकृसंगठन की कमान भट्ट के हाथों में और सरकार का चेहरा धामी। भाजपा अपने संगठनात्मक दावे को हाल के निकाय चुनावों के प्रदर्शन से जोड़ रही है। पार्टी नेतृत्व ने हल्द्वानी कार्यसमिति में 11 नगर निगमों और छह सहकारिता जिलों में जीत का उल्लेख किया। इसके अलावा अगस्त में श्रीनगर की निर्दलीय महापौर आरती भंडारी समेत 10 पार्षद भाजपा में शामिल हुए थे। इससे राज्य के सभी 11 नगर निगमों के महापौर भाजपा के साथ होने की स्थिति बनी। यह आंकड़ा भाजपा को शहरी निकायों में अपने संगठन और राजनीतिक विस्तार को रेखांकित करने का आधार देता है। हालांकि विधानसभा चुनाव का सामाजिक और भौगोलिक समीकरण निकाय चुनावों से अलग होता है, इसलिए इन परिणामों को सीधे विधानसभा परिणाम का संकेत मानना उचित नहीं होगा। भाजपा की राजनीतिक कार्यशैली की एक विशेषता यह है कि संगठन चुनाव के बीच निष्क्रिय रहने के बजाय लगातार कार्यक्रमों और अभियानों के जरिए कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने की कोशिश करता है। प्रदेश कार्यसमिति, जिला प्रभारियों की नियुक्ति और विधानसभा स्तर की कोर कमेटियां इसी ढांचे का हिस्सा हैं। 2025 में पार्टी ने 42 प्रदेश पदाधिकारियों की टीम भी घोषित की थी, जिसे 2027 की तैयारी से जोड़ा गया था। यही निरंतरता भाजपा को चुनावी मुकाबले में अपनी राजनीतिक बात बूथ तक ले जाने का ढांचा देती है। भाजपा के सामने सत्ता में होने की अपनी चुनौतियां भी हैं। बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद, भू-कानून, मूल निवास, आपदा और विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव जैसे मुद्दे विपक्ष के राजनीतिक विमर्श में बने हुए हैं। हाल के दिनों में हरिद्वार-देहरादून समेत प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बीच सामाजिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर तीखी बयानबाजी भी हुई है। ऐसे में भाजपा के लिए केवल संगठन का विस्तार पर्याप्त नहीं होगा। उसे संगठन की ताकत को सरकार के कामकाज के जनअनुभव से जोड़ना होगा। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वह भाजपा के मजबूत संगठनात्मक ढांचे के मुकाबले अपना संदेश कितनी प्रभावी ढंग से बूथ तक पहुंचा पाती है। इस समय भाजपा की रणनीति को तीन शब्दों में समझा जा सकता हैकृ कि संगठन, सरकार और जनसंपर्क। संगठन बूथ तक, सरकार की उपलब्धियां घर-घर तक और राजनीतिक संदेश प्रदेश के हर क्षेत्र तक पहुंचाने की कोशिश हो रही है। हल्द्वानी में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी वाली प्रदेश कार्यसमिति और उसके बाद सामने आई चुनावी तैयारियां इसी दिशा की कड़ी हैं। लेकिन चुनावी राजनीति में संगठन की ताकत अंततः जनता के मुद्दों से ही परखी जाती है। 2027 की लड़ाई में भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही रहेगा कि वह अपनी संगठनात्मक बढ़त को जनता के रोजमर्रा के सवालोंकृरोजगार, महंगाई, पलायन, विकास, कानून-व्यवस्था और पहाड़ की बुनियादी जरूरतोंकृसे किस तरह जोड़ती है। यही वह मोर्चा होगा जहां संगठन की ताकत और जनमत आमने-सामने होंगे।

कांग्रेस की ‘एकजुटता’ की परीक्षा

कांग्रेस का संगठनात्मक कसावट बनाम आंतरिक गुटबाजी पर फोकस भाजपा से मुकाबले से पहले कांग्रेस को साधने होंगे अपने सभी समीकरण संगठन की खींचतान से नेतृत्व की अस्पष्टता तक कांग्रेस की खास तैयारी देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से सीधा मुकाबला करने से पहले अपने संगठन को एकजुट और चुनावी रूप से सक्रिय रखने की है। कांग्रेस ने चुनाव अभियान कार्यालय, पांच चुनावी समितियां, जोनल जिम्मेदारियां और जनसंपर्क अभियानों के जरिए तैयारी तेज की है, लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व और गुटीय समन्वय से जुड़े सवाल लगातार राजनीतिक चर्चा में बने हुए हैं। उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से विभिन्न वरिष्ठ नेताओं के बीच राजनीतिक खींचतान चर्चा का विषय रही है। अप्रैल 2026 में हरीश रावत के राजनीतिक अवकाश को लेकर विवाद खुलकर सामने आया था और इसके बाद पार्टी के भीतर अलग-अलग खेमों के बीच मतभेदों की खबरें आईं। चुनाव के लिहाज से यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस के सामने केवल भाजपा सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाने की चुनौती नहीं है, बल्कि उन मुद्दों को एक साझा राजनीतिक संदेश में बदलने की भी जरूरत है। कांग्रेस के पास प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जैसे अनुभवी चेहरे हैं। जुलाई में कांग्रेस महासचिव संगठन केसी वेणुगोपाल ने देहरादून में वरिष्ठ नेताओं, जिला अध्यक्षों और अग्रिम संगठनों के साथ चुनावी रणनीति पर बैठक की थी। लेकिन यही बहु-नेतृत्व व्यवस्था पार्टी के लिए समन्वय की चुनौती भी पैदा करती है। सवाल यह है कि चुनाव के मैदान में कौन सा चेहरा अंतिम राजनीतिक दिशा तय करेगा और टिकट, संगठन तथा अभियान के स्तर पर सभी प्रमुख नेता किस सीमा तक एक लाइन पर रहेंगे? कांग्रेस ने अगस्त में पांच समितियां गठित कर चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाया और सितंबर में प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने सभी विभागों तथा प्रकोष्ठों को सक्रिय करने, जिला और विधानसभा स्तर पर प्रभारियों की नियुक्ति तथा जमीनी संपर्क बढ़ाने पर जोर दिया। यह तथ्य अपने आप में कांग्रेस की एक बड़ी चुनौती को रेखांकित करता हैकृचुनाव सिर पर हैं और संगठन को लगातार पुनर्गठित तथा सक्रिय किया जा रहा है। जून में प्रकाशित एक विश्लेषण में भी राज्य कांग्रेस की पूर्ण कार्यकारिणी के गठन में लंबे समय से चली आ रही देरी को संगठनात्मक कमजोरी के रूप में रेखांकित किया गया था। कांग्रेस बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महंगाई, कानून-व्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा और विकास से जुड़े मुद्दों को लगातार उठा रही है। जून में पार्टी ने प्रदेशव्यापी जनसंपर्क अभियान शुरू कर इन मुद्दों को जनता तक ले जाने की घोषणा की थी। लेकिन विपक्ष में रहते हुए मुद्दे उठाना और उन्हें चुनावी समर्थन में बदलना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि सरकार विरोधी मुद्दों को केवल विरोध के नारों तक सीमित न रखकर बूथ स्तर पर प्रभावी राजनीतिक अभियान में बदला जाए। सितंबर में हरीश रावत के पूर्व ओएसडी एवं वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना से जुड़े मामले में ईडी की कार्रवाई के बाद राजनीतिक विवाद और तेज हुआ। इसके बाद रावत ने कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी और कांग्रेस कार्यसमिति की स्थायी आमंत्रित सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा की। रावत ने कहा कि उनका उद्देश्य पार्टी के भ्रष्टाचार-विरोधी संघर्ष को कमजोर न होने देना है। इस घटनाक्रम का राजनीतिक असर क्या होगा, यह अलग प्रश्न है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि चुनावी तैयारी के बीच कांग्रेस को अपने सबसे वरिष्ठ नेताओं से जुड़े विवादों का राजनीतिक प्रबंधन भी करना पड़ रहा है। भाजपा जहां बूथ, मंडल और जिला स्तर पर चुनावी ढांचे को लगातार सक्रिय करने पर जोर दे रही है, वहीं कांग्रेस को अपने संगठनात्मक ढांचे में समन्वय और जमीनी सक्रियता दोनों मजबूत करनी हैं। कांग्रेस नेतृत्व खुद कार्यकर्ताओं को कागजों तक सीमित न रहने और जनता के बीच सक्रिय होने का संदेश दे चुका है। इसलिए कांग्रेस की कमजोरी को केवल गुटबाजी कहकर खत्म करना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती तीन स्तरों पर हैकृनेतृत्व में समन्वय, संगठन में स्पष्टता और मुद्दों को बूथ तक पहुंचाने की क्षमता। कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ कई मुद्दे हैं और पार्टी ने चुनावी तैयारियां भी तेज कर दी हैं। राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के प्रस्तावित कार्यक्रमों के जरिए अभियान को गति देने की तैयारी भी सामने आई है। लेकिन चुनावी राजनीति में राष्ट्रीय चेहरों की मौजूदगी तभी संगठनात्मक लाभ में बदलती है, जब स्थानीय नेतृत्व एकजुट संदेश दे और कार्यकर्ता उसे बूथ तक लेकर जाएं। यही कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा हैकृभाजपा के खिलाफ मुद्दे उसके पास हैं, नेता भी कम नहीं हैं। अब इन नेताओं, मुद्दों और संगठन को एक चुनावी दिशा में कितनी मजबूती से जोड़ा जाता है, यह 2027 की लड़ाई में महत्वपूर्ण रहेगा।

विरासत की वैशाखी पर 70 सीटों का सपना

2027 का महासंग्राम यूकेडी की चुनावी जंग में बड़े दावे के साथ उतरने की तैयारी क्षेत्रीय अस्मिता का अंतिम दांव या फिर यह है चुनावी हुंकार उत्तराखंड में वोट बैंक में तब्दील हो पाएगा यूकेडी का वजूद देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय अस्मिता का सबसे पुराना झंडा उठाने वाला उत्तराखंड क्रांति दल एक बार फिर 2027 की विधानसभा जंग में बड़े दावे के साथ उतरने की तैयारी कर रहा है। यूकेडी ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। पार्टी नेतृत्व का दावा है कि उसके पक्ष में माहौल बन रहा है और वह राष्ट्रीय दलों के सामने मजबूत क्षेत्रीय विकल्प के रूप में उभर सकती है। लेकिन यूकेडी की इस हुंकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही हैकृक्या राज्य आंदोलन की विरासत को चुनावी ताकत में बदलने के लिए उसके पास पर्याप्त संगठन और जमीनी विस्तार है? यूकेडी का 70 सीटों पर प्रत्याशी उतारने का फैसला नया नहीं है। पार्टी वर्ष 2026 की शुरुआत से ही इस रणनीति को सार्वजनिक करती रही है। केंद्रीय बैठकों में प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र से संभावित प्रत्याशियों के नाम तलाशने की बात भी सामने आई है। अर्थात पार्टी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरे प्रदेश में फैलने की है। मगर विधानसभा चुनाव केवल प्रत्याशी घोषित करने से नहीं जीते जाते। बूथ कमेटियां, मतदान केंद्रवार नेटवर्क, संसाधन, लगातार जनसंपर्क और चुनाव के अंतिम चरण तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने की क्षमता किसी भी दल की वास्तविक ताकत तय करती है। यहीं यूकेडी के दावे की असली परीक्षा होगी। यूकेडी की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी उत्तराखंड राज्य आंदोलन से उसका ऐतिहासिक जुड़ाव है। पार्टी आज भी क्षेत्रीय अस्मिता, पहाड़ के अधिकार, पलायन, बेरोजगारी, भू-कानून और मूल निवास जैसे सवालों को अपनी राजनीति के केंद्र में रख रही है। अगस्त 2026 में यूकेडी ने संकल्पकृनए उत्तराखंड का नाम से नीति दस्तावेज जारी किया। इसमें अनुच्छेद 371 के तहत विशेष संवैधानिक सुरक्षा, मूल निवास व्यवस्था को कानूनी मान्यता, सशक्त भू-कानून और पलायन के समाधान जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी गई है। यानी यूकेडी ने अपना राजनीतिक नैरेटिव स्पष्ट करने की कोशिश की हैकृकि राष्ट्रीय दलों के मुकाबले क्षेत्रीय मुद्दों को केंद्र में लाना। राजनीतिक दावों और चुनावी परिणामों के बीच अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 70 सीटों पर लड़ने का ऐलान अपने आप में व्यापक राजनीतिक महत्वाकांक्षा दिखाता है, लेकिन इसके साथ सवाल यह भी है कि पार्टी कितनी सीटों पर प्रभावी मुकाबला खड़ा करने की स्थिति में पहुंच पाती है। मई 2026 में प्रकाशित एक राजनीतिक विश्लेषण में यूकेडी की सक्रियता को राष्ट्रीय दलों के वोट बैंक में संभावित सेंध के संदर्भ में देखा गया था। वहीं पार्टी नेताओं ने संगठन विस्तार और 70 सीटों पर तैयारी की बात कही थी। इसलिए यूकेडी के सामने चुनौती केवल भाजपा और कांग्रेस को चुनौती देने की नहीं है। पहले उसे अपने राजनीतिक दावे को बूथ स्तर की संगठनात्मक ताकत में बदलना होगा। यूकेडी स्वयं को भाजपा और कांग्रेस के बीच एक क्षेत्रीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि पिछले वर्षों में राष्ट्रीय दल राज्य के मूल सवालों का समाधान नहीं कर पाए और अब क्षेत्रीय राजनीति को मजबूत करने का समय है। यह नैरेटिव उत्तराखंड के उन मतदाताओं के बीच जगह बना सकता है जो भू-कानून, मूल निवास, रोजगार, पलायन और पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान जैसे सवालों को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन राजनीतिक प्रभाव के लिए केवल मुद्दों की मौजूदगी पर्याप्त नहीं होती। संगठन और उम्मीदवारों की स्थानीय स्वीकार्यता भी महत्वपूर्ण होती है। यूकेडी ने जमीनी संपर्क बढ़ाने के लिए हर घर चर्चा और हर घर पर्चा जैसे अभियान शुरू किए हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि इनके जरिए संगठन को घर-घर तक पहुंचाया जाएगा। हालिया गतिविधियों में विधानसभा स्तर पर संगठन मजबूत करने की कोशिशें भी दिखाई दे रही हैं। सितंबर में रानीखेत क्षेत्र में पार्टी की बैठक में संगठन विस्तार और विधानसभा चुनाव की रणनीति पर चर्चा की गई। यह सक्रियता बताती है कि यूकेडी केवल घोषणा तक सीमित नहीं रहना चाहती। लेकिन अब असली सवाल इसकी निरंतरता और व्यापकता का है। यूकेडी के सामने 2027 का चुनाव अपने राजनीतिक अस्तित्व और प्रभाव को पुनर्परिभाषित करने का अवसर भी है। उसके पास क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा है, राज्य आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है और भाजपा-कांग्रेस से अलग राजनीतिक पहचान बनाने का प्रयास है। लेकिन दूसरी तरफ राष्ट्रीय दलों के पास कहीं बड़ा संगठनात्मक ढांचा और चुनावी संसाधन हैं। ऐसे में 70 सीटों पर उतरने की घोषणा को वास्तविक राजनीतिक चुनौती में बदलना आसान नहीं होगा। यूकेडी की हुंकार बड़ी है, एजेंडा स्पष्ट है और महत्वाकांक्षा पूरे प्रदेश की है। अब सवाल सिर्फ इतना है कि यह दंभ कितनी दूर तक धरातल पर दिखाई देता है। 2027 की चुनावी बिसात पर यूकेडी को अपने लिए जगह बनाने के लिए राज्य आंदोलन की भावनात्मक विरासत को ठोस संगठन, विश्वसनीय उम्मीदवार और बूथ स्तर की ताकत में बदलना होगा। यही उसके दावे और उसकी वास्तविक राजनीतिक क्षमता के बीच की दूरी तय करेगा।

मंगलवार, 15 सितंबर 2026

udaydinmaan: कांग्रेस के ‘चंदा माडल’ पर भाजपा का हमला

udaydinmaan: कांग्रेस के ‘चंदा माडल’ पर भाजपा का हमला: ब्लैक मनी और चंदे के खेल पर घिरी कांग्रेस भ्रष्टाचार के आरोपों से गरमाई सूबे की राजनीति भाजपा का हमला और कांग्रेस के नैरेटिव का जिक्र कांग्...

कांग्रेस के ‘चंदा माडल’ पर भाजपा का हमला

ब्लैक मनी और चंदे के खेल पर घिरी कांग्रेस भ्रष्टाचार के आरोपों से गरमाई सूबे की राजनीति भाजपा का हमला और कांग्रेस के नैरेटिव का जिक्र कांग्रेस की फंडिंग व्यवस्था व नेटवर्क पर उठे सवाल देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर भ्रष्टाचार के आरोपों ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। भाजपा ने प्रदेश और देश में कांग्रेस से जुड़े सामने आ रहे कथित भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर कांग्रेस की कार्यशैली पर तीखा हमला बोला है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता को जवाब देने के बजाय राजनीतिक सुविधा के अनुसार नैरेटिव गढ़ती रही है, जबकि उसके शासनकाल और नेताओं से जुड़े मामलों ने कथित तौर पर अलग तस्वीर सामने रखी है। भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के निजी सहायक से कथित काले धन की बरामदगी और आरोपी पीए की ओर से कांग्रेस के लिए चंदा जुटाने संबंधी बताए जा रहे बयान को राजनीतिक रूप से बड़ा मुद्दा बनाया है। भाजपा का कहना है कि यदि जांच में सामने आए तथ्यों और आरोपों की पुष्टि होती है तो यह महज किसी एक व्यक्ति का मामला नहीं रहेगा, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक फंडिंग व्यवस्था और सत्ता के दौरान बने कथित नेटवर्क पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। भाजपा का हमला यहीं नहीं रुका। पार्टी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस की राजनीति में भ्रष्टाचार कोई अपवाद नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही कार्यसंस्कृति का हिस्सा रहा है। हालांकि, इन राजनीतिक आरोपों की अंतिम सच्चाई जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया से ही तय होगी। फिलहाल दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर शुरू हो गया है। भाजपा की रणनीति में सबसे महत्वपूर्ण हथियार कथित कांग्रेसी चंदा माडल का मुद्दा है। पार्टी का तर्क है कि यदि किसी आरोपी से जुड़े बयान में राजनीतिक दल के लिए चंदा जुटाने की व्यवस्था का उल्लेख सामने आता है तो कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पार्टी के लिए धन जुटाने की प्रक्रिया क्या रही है और इसमें कौन-कौन लोग शामिल रहे हैं। राजनीतिक तौर पर यह सवाल कांग्रेस के लिए इसलिए असहज करने वाला है क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोपों का जवाब केवल राजनीतिक प्रत्यारोप से नहीं दिया जा सकता। भाजपा अब कांग्रेस से यह पूछ रही है कि पार्टी को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता, उसके स्रोत और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों पर उसका आधिकारिक पक्ष क्या है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का नाम सामने आने से यह विवाद और राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया है। रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रमुख चेहरों में रहे हैं और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उनकी राजनीतिक सक्रियता भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में भाजपा के लिए यह मुद्दा कांग्रेस के पुराने शासनकाल और उसके नेतृत्व की कार्यशैली पर हमला करने का अवसर बन गया है। भाजपा का संदेश साफ हैकृकि भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की नैतिकता की परीक्षा अब उसके अपने नेताओं और उनसे जुड़े मामलों के संदर्भ में होनी चाहिए। वहीं कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह इन आरोपों को केवल राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताकर खारिज करने के बजाय तथ्यों के आधार पर जवाब दे। यदि आरोप निराधार हैं तो पार्टी को जांच और दस्तावेजों के आधार पर अपना पक्ष मजबूती से सामने रखना होगा। यही लोकतांत्रिक राजनीति में जवाबदेही की कसौटी है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ रहा है और ऐसे में भ्रष्टाचार का मुद्दा स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हथियार बनेगा। भाजपा कांग्रेस के पिछले शासनकाल को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करेगी, जबकि कांग्रेस मौजूदा सरकार के कार्यकाल, रोजगार, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर भाजपा पर पलटवार करेगी। यानी लड़ाई केवल एक कथित बरामदगी या एक आरोपी के बयान तक सीमित रहने वाली नहीं है। इसके केंद्र में बड़ा राजनीतिक सवाल हैकृकि सत्ता और राजनीतिक चंदे के बीच संबंध कितना पारदर्शी है और राजनीतिक दल अपने आर्थिक स्रोतों के प्रति कितने जवाबदेह हैं? यही वह बिंदु है जहां भाजपा का दाल काली वाला हमला कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती बनता है। हालांकि, लोकतंत्र में आरोप लगना और आरोप साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए किसी भी दल को राजनीतिक लाभ के लिए जांच से पहले किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने के बजाय तथ्यों और कानून की प्रक्रिया पर भरोसा करना चाहिए। उत्तराखंड की जनता के सामने अब असली सवाल किसी एक पार्टी की बयानबाजी से बड़ा है। जनता यह जानना चाहती है कि राजनीतिक दलों को पैसा कहां से मिलता है, कौन देता है, किसके माध्यम से पहुंचता है और चुनावी राजनीति में उसका इस्तेमाल किस तरह होता है। भाजपा यदि कांग्रेस के कथित चंदा माडल को मुद्दा बना रही है तो उसे भी राजनीतिक चंदे और अपने वित्तीय तंत्र की पारदर्शिता के सवालों पर समान कसौटी स्वीकार करनी होगी। लोकतंत्र में जवाबदेही एकतरफा नहीं हो सकती। 2027 की चुनावी लड़ाई में भ्रष्टाचार निश्चित रूप से बड़ा मुद्दा बन सकता है। लेकिन इस बार जनता केवल आरोप नहीं, सबूत, जांच और कार्रवाई का परिणाम भी देखना चाहेगी। राजनीति में किसकी दाल कितनी काली का फैसला भाषणों से नहीं, तथ्यों और जांच की निष्पक्ष परिणति से होना चाहिए।

भाजपा का शक्ति प्रदर्शन, 31 जनप्रतिनिधियों ने थामा कमल

कई जनप्रतिनिधियों के भाजपा में शामिल होने से सियासी हलचल तेज महेंद्र भट्ट बोलेकृएकतरफा जनादेश बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा का माहौल अभियान शुरू देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्वाचन जनपद चंपावत में अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया है। प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट की मौजूदगी में नगर पंचायत अध्यक्ष समेत 31 जनप्रतिनिधियों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। बड़ी संख्या में निर्वाचित प्रतिनिधियों के एक साथ भाजपा में आने को पार्टी ने प्रदेश में अपने पक्ष में बन रहे राजनीतिक माहौल का संकेत बताया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने इस मौके पर कहा कि एक ही स्थान से बड़ी संख्या में एकतरफा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का भाजपा में शामिल होना प्रदेश में पार्टी के पक्ष में बने माहौल को दर्शाता है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा के प्रति जनता का विश्वास लगातार मजबूत हो रहा है और इसका प्रतिबिंब निजी समाचार संस्थानों के सर्वेक्षणों में भी दिखाई देने लगा है। चंपावत मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का निर्वाचन क्षेत्र होने के साथ ही भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से विशेष महत्व रखता है। ऐसे में नगर निकाय स्तर के निर्वाचित प्रतिनिधियों का पार्टी में शामिल होना भाजपा के लिए महज संगठन विस्तार नहीं, बल्कि 2027 से पहले राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा इस घटनाक्रम को बूथ से लेकर स्थानीय निकाय तक अपने संगठन को मजबूत करने की रणनीति से जोड़ रही है। पार्टी की कोशिश है कि चुनाव से पहले स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले जनप्रतिनिधियों और सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़कर चुनावी नेटवर्क को और व्यापक किया जाए। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के बयान में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत एकतरफा निर्वाचित प्रतिनिधियों को लेकर है। इसका सीधा संदेश यह देने की कोशिश है कि पार्टी में आने वाले लोग केवल सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि अपने क्षेत्रों में जनता का समर्थन हासिल कर चुके निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। भाजपा इसे अपने पक्ष में बढ़ते जनसमर्थन के प्रमाण के तौर पर पेश कर रही है। हालांकि, किसी भी राजनीतिक दल के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों का दल बदलना चुनावी माहौल का एक संकेत हो सकता है, लेकिन इसे पूरे प्रदेश की जनता के अंतिम राजनीतिक रुझान का निर्णायक प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। 2027 का वास्तविक जनादेश चुनाव के दौरान ही सामने आएगा। महेंद्र भट्ट ने अपने बयान में निजी समाचार संस्थानों के सर्वेक्षणों का भी उल्लेख किया। राजनीतिक रूप से यह कांग्रेस समेत विपक्षी दलों पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि चुनाव से काफी पहले ही उसके पक्ष में माहौल दिखाई देने लगा है। इसके पीछे पार्टी की व्यापक चुनावी रणनीति भी दिखाई देती है। भाजपा जहां संगठनात्मक स्तर पर बूथ सशक्तीकरण और जनप्रतिनिधियों को अपने साथ जोड़ने पर जोर दे रही है, वहीं राजनीतिक संदेशों के जरिए यह धारणा बनाने का प्रयास भी कर रही है कि मुकाबले में वह शुरुआती बढ़त हासिल कर चुकी है। 31 जनप्रतिनिधियों के भाजपा में शामिल होने से विपक्षी दलों के सामने अपने स्थानीय संगठन और जनाधार को लेकर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। कांग्रेस के लिए चुनौती दोहरी हैकृएक ओर उसे अपने नेताओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों को भाजपा की ओर जाने से रोकना होगा, वहीं दूसरी ओर भाजपा के मजबूत माहौल के दावे को राजनीतिक और संगठनात्मक स्तर पर चुनौती देनी होगी। 2027 के चुनाव में सत्ता विरोधी माहौल कितना प्रभावी होगा, यह भी इसी तरह के स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रमों से तय होगा। यदि विपक्ष अपने प्रभावशाली स्थानीय चेहरों को संभालने में कमजोर पड़ता है तो भाजपा को इसका चुनावी लाभ मिल सकता है। इसके विपरीत विपक्ष यदि नए नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों के साथ जमीन पर सक्रिय होता है तो तस्वीर बदलने की गुंजाइश भी बनी रहेगी। चंपावत में हुआ यह दल-बदल भाजपा के लिए संगठन विस्तार से अधिक माहौल बनाने की राजनीति का हिस्सा दिखाई देता है। पार्टी एक तरफ जनप्रतिनिधियों के शामिल होने को अपने बढ़ते प्रभाव का प्रमाण बता रही है, तो दूसरी तरफ सर्वेक्षणों का हवाला देकर यह संदेश दे रही है कि चुनावी मुकाबले में भाजपा मजबूत स्थिति में है। अब देखने वाली बात यह होगी कि चंपावत से निकला यह राजनीतिक संदेश राज्य के अन्य जिलों तक कितना प्रभाव डालता है। फिलहाल भाजपा का दावा स्पष्ट हैकृस्थानीय निकायों से लेकर जनता के बीच तक पार्टी के पक्ष में माहौल बन रहा है और 2027 की लड़ाई के लिए संगठन पहले से मैदान में उतर चुका है।

तारीख का इंतजार, मैदान में ‘महाभारत’

चुनाव की घोषणा अभी दूर, लेकिन उत्तराखंड में शब्दबाणों के हमले तेज भाजपा-कांग्रेस से लेकर छोटे दलों तक सत्ता की लड़ाई ने पकड़ी रफ्तार विधानसभा चुनाव को लेकर है पहाड़ के सवालों पर छोटे दलों की नजर देहरादून। विधानसभा चुनाव की तारीख का अभी ऐलान नहीं हुआ है, चुनावी बिगुल भी आधिकारिक तौर पर नहीं बजा है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में शंखनाद हो चुका है। जैसे-जैसे 2027 विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे प्रदेश के राजनीतिक दलों ने अपने तरकश से शब्दबाण निकालने शुरू कर दिए हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोपों की ऐसी बौछार चल रही है कि लगता है मानो चुनावी कुरुक्षेत्र सज चुका हो और महाभारत का युद्ध समय से पहले ही शुरू हो गया हो। भाजपा अपनी सरकार की उपलब्धियों, संगठन की मजबूती और लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के दावे के साथ मैदान में उतर चुकी है। दूसरी ओर कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था, भर्ती परीक्षाओं, भ्रष्टाचार और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को हथियार बनाकर सरकार को घेरने की कोशिश में है। वहीं उत्तराखंड क्रांति दल समेत छोटे राजनीतिक दल क्षेत्रीय अस्मिता, मूल निवास, भू-कानून और पहाड़ के सवालों को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने में जुटे हैं। अभी चुनाव की तारीख तय नहीं हुई है, लेकिन नेताओं की भाषा बता रही है कि सभी दल चुनावी मोड में आ चुके हैं। भाजपा विपक्ष को उसके पुराने शासनकाल, कथित भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता के मुद्दों पर घेर रही है। कांग्रेस पलटवार में मौजूदा सरकार से रोजगार, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था और विकास के सवालों पर जवाब मांग रही है। हर राजनीतिक बयान के पीछे अब केवल वर्तमान की राजनीति नहीं, बल्कि 2027 का गणित दिखाई देने लगा है। कोई संगठन की ताकत दिखा रहा है तो कोई जनसभाओं की भीड़ को जनादेश का संकेत बता रहा है। कोई नेताओं के दल बदलने को अपने पक्ष में माहौल बता रहा है तो कोई इसे सत्ता का दबाव और राजनीतिक प्रबंधन करार दे रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की है। पार्टी इसे केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि जनता के निरंतर विश्वास का प्रमाण बताने की रणनीति पर काम कर रही है। संगठनात्मक स्तर पर बूथ को मजबूत करने, स्थानीय जनप्रतिनिधियों को पार्टी से जोड़ने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की कवायद तेज हो गई है। भाजपा का पूरा राजनीतिक अभियान इस संदेश के इर्द-गिर्द आकार ले रहा है कि उत्तराखंड में राजनीतिक स्थिरता और विकास के लिए एक बार फिर भाजपा को अवसर मिलना चाहिए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के कामकाज को भी पार्टी चुनावी विमर्श के केंद्र में रखने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस की रणनीति भाजपा के विकास और स्थिरता के दावे के सामने जनता के सवाल खड़े करने की है। पार्टी रोजगार, युवाओं की नाराजगी, पलायन, महंगाई और कथित प्रशासनिक विफलताओं को लेकर सरकार को घेर रही है। कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार विरोधी मुद्दे उठाना नहीं, बल्कि यह साबित करना भी है कि सत्ता का विकल्प बनने के लिए उसके पास एकजुट संगठन, विश्वसनीय नेतृत्व और स्पष्ट राजनीतिक दिशा मौजूद है। पार्टी के भीतर नेतृत्व और चुनावी चेहरे को लेकर होने वाली हर चर्चा को भाजपा अपने राजनीतिक हथियार में बदलने की कोशिश करेगी। इस चुनावी महाभारत में केवल भाजपा और कांग्रेस ही योद्धा नहीं हैं। उत्तराखंड क्रांति दल और अन्य छोटे राजनीतिक दल भी अपने-अपने हथियार तैयार कर रहे हैं। क्षेत्रीय दलों की राजनीति का केंद्र वही मुद्दे हैं, जो लंबे समय से उत्तराखंड की पहचान से जुड़े रहे हैंकृभू-कानून, मूल निवास, पलायन, रोजगार और पहाड़ की अस्मिता। छोटे दल भले ही सत्ता की सीधी लड़ाई में भाजपा और कांग्रेस जितने मजबूत न दिखें, लेकिन कई सीटों पर वह चुनावी गणित बदलने की क्षमता रखते हैं। कुछ हजार वोटों का इधर-उधर होना भी कई विधानसभा क्षेत्रों में जीत और हार के बीच की दूरी तय कर सकता है। उत्तराखंड की राजनीति में फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा आरोपों और प्रत्यारोपों की है। लेकिन जनता के सामने असली सवाल इससे कहीं बड़े हैं। पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन, युवाओं के लिए रोजगार, प्राकृतिक आपदाओं से जूझता राज्य, स्वास्थ्य और शिक्षा की चुनौतियां, गांवों का खाली होना और विकास का असंतुलनकृयह ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब केवल चुनावी मंचों की बयानबाजी से नहीं मिलेगा। राजनीतिक दलों के लिए चुनौती यह होगी कि वे एक-दूसरे पर शब्दबाण चलाने के साथ-साथ यह भी बताएं कि उत्तराखंड के भविष्य के लिए उनकी ठोस योजना क्या है। जनता अब केवल यह सुनने के मूड में नहीं है कि कौन किससे ज्यादा भ्रष्ट, विफल या अवसरवादी है। वह यह भी जानना चाहती है कि अगले पांच वर्षों में उसकी जिंदगी और प्रदेश की दिशा कैसे बदलेगी। फिलहाल चुनाव की तारीख का इंतजार है, लेकिन राजनीतिक महाभारत शुरू हो चुकी है। आने वाले दिनों में नेताओं की बयानबाजी और तीखी होगी, पुराने आरोप नए रूप में सामने आएंगे, दल-बदल बढ़ेंगे, सर्वेक्षणों की राजनीति तेज होगी और सोशल मीडिया चुनावी रणभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगा। कुरुक्षेत्र तैयार है, सेनाएं सज रही हैं और शब्दबाणों की बौछार शुरू हो चुकी है। फर्क सिर्फ इतना है कि अभी चुनाव आयोग का शंख नहीं बजा है। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति बता रही है कि 2027 की महाभारत का पहला चरण शुरू हो चुका हैकृअब देखना यह है कि शब्दों की इस लड़ाई को जनता के असली मुद्दे कितना दिशा देते हैं और अंतिम दिन मतदाता किसके पक्ष में अपना ब्रह्मास्त्र चलाता है।

सोमवार, 14 सितंबर 2026

udaydinmaan: गुटबाजी पर कांग्रेस का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

udaydinmaan: गुटबाजी पर कांग्रेस का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: उत्तराखंड कांग्रेस पार्टी में चलेगा अनुशासन का चाबुक कांग्रेस अनुशासन समिति की दो टूककृसंगठन सबसे ऊपर उत्तराखंड कांग्रेस में नियम तोड़ने वालो...

विकास की ‘राह’ में कांग्रेस का ‘ब्रेक’

भाजपा का आरोपकृजनता के मुद्दों पर कांग्रेस का फोकस नहीं सरकार के हर काम का विरोध ही बना है राजनीति का एजेंडा विकास पर राजनीति और हर फैसले का विरोध कर रही कांग्रेस देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज होता जा रहा है। भाजपा ने प्रदेश कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि कांग्रेस ने राज्य के विकास को रोकने की सुपारी अपने आलाकमान से ले रखी है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस के पास न तो विकास का कोई वैकल्पिक रोडमैप है और न ही जनहित से जुड़े मुद्दों पर कोई सकारात्मक दृष्टिकोण। उसका पूरा राजनीतिक अभियान केवल सरकार के विरोध और जनता को भ्रमित करने तक सीमित रह गया है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि प्रदेश में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, चारधाम यात्रा, पर्यटन, रोजगार और बुनियादी ढांचे से जुड़े लगातार काम हो रहे हैं, लेकिन कांग्रेस को इनमें उपलब्धियां नहीं, बल्कि राजनीति के अवसर दिखाई देते हैं। भाजपा का कहना है कि विपक्ष सरकार की कमियां उठाए, सवाल पूछे और जवाबदेही तय करे, यह लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन हर विकास परियोजना का विरोध करना और हर सरकारी फैसले पर सवाल खड़ा करना जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका नहीं हो सकती। भाजपा के अनुसार कांग्रेस ने प्रदेश में ऐसी राजनीति खड़ी करने की कोशिश की है, जिसमें सरकार की प्रत्येक पहल को संदेह की नजर से देखा जाए। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस जनता के बीच यह भ्रम पैदा करना चाहती है कि राज्य में कुछ हो ही नहीं रहा, जबकि धरातल पर विकास कार्यों की गति लगातार बढ़ी है। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस से सवाल किया कि यदि सरकार की नीतियां गलत हैं तो कांग्रेस अपना वैकल्पिक माडल सामने क्यों नहीं रखती? बेरोजगारी, पलायन, पहाड़ी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था, पर्यटन, औद्योगिक निवेश और बुनियादी सुविधाओं को लेकर कांग्रेस के पास ठोस कार्ययोजना क्या है? भाजपा का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में जुटी है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व की राजनीतिक रणनीति का असर उत्तराखंड की राजनीति में भी दिखाई दे रहा है और प्रदेश कांग्रेस स्थानीय विकास के मुद्दों से ज्यादा राष्ट्रीय राजनीति के नारों को प्राथमिकता दे रही है। भाजपा नेताओं ने कहा कि उत्तराखंड की जनता ने राज्य को आंदोलन, संघर्ष और अस्थिरता के लंबे दौर से निकालकर विकास की राह पर आगे बढ़ाने का जनादेश दिया है। ऐसे में राजनीतिक दलों को विकास के मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए, न कि विकास परियोजनाओं को राजनीतिक हथियार बनाना चाहिए। भाजपा ने कांग्रेस को चेताते हुए कहा कि जनता अब केवल बयान नहीं, काम का हिसाब मांग रही है। आरोप लगाया कि कांग्रेस जितना सरकार के काम को रोकने और नकारने की कोशिश करेगी, उतना ही जनता के बीच उसकी राजनीतिक मंशा उजागर होगी। भाजपा नेताओं ने कहा कि कांग्रेस को सरकार की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, लेकिन विकास रोकने की राजनीति का अधिकार किसी को नहीं है। पार्टी ने दावा किया कि 2027 का चुनाव सरकार बनाम विपक्ष से अधिक काम बनाम विरोध के बीच होगा और जनता तय करेगी कि उत्तराखंड को विकास की दिशा में आगे कौन ले जा सकता है।

नाम पर ‘बवाल’ और काम पर ‘सवाल’

राहुल मियां पर भाजपा ने कर दिया है अब सीधा पालिटिकल अटैक भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कांग्रेस पर हमलाकृमियां पर आपत्ति अवैध धर्मांतरण, मदरसों व धार्मिक अतिक्रमणों पर कथित नरमी क्यों देहरादून। उत्तराखंड में राजनीतिक बयानबाजी के बीच भाजपा ने कांग्रेस की ओर से राहुल मियां संबोधन पर जताई जा रही आपत्ति को लेकर पलटवार किया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जो पार्टी लंबे समय से एक वर्ग को खुश करने की राजनीति करती रही है, उसे अब मियां शब्द से परेशानी होने लगी है। उन्होंने कांग्रेस के इस रुख को राजनीतिक दोगलापन करार दिया। भट्ट ने कहा कि कांग्रेस को अवैध धर्मांतरण, मदरसों, धार्मिक अतिक्रमण, लव जिहाद और लैंड जिहाद जैसे मुद्दों पर भाजपा की ओर से उठाए जाने वाले सवालों से परेशानी होती है, लेकिन अब संबोधन में इस्तेमाल किए जा रहे मियां शब्द पर आपत्ति जताई जा रही है। उनका आरोप था कि कांग्रेस की राजनीति में मुद्दों से ज्यादा राजनीतिक सुविधा महत्वपूर्ण हो गई है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि मियां शब्द पर आपत्ति है तो कांग्रेस को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह वर्षों से जिस कथित तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है, उसका आधार क्या है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने हमेशा राष्ट्रवाद, समान नागरिक अधिकार और सभी वर्गों के विकास की बात की है, जबकि कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति के आरोप लगातार लगते रहे हैं। भट्ट ने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कांग्रेस को ‘मियां कहलाना पसंद नहीं है, लेकिन तुष्टिकरण की राजनीति से उसे कोई परेशानी नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस भाजपा के बयानों के एक शब्द को मुद्दा बनाकर मूल राजनीतिक सवालों से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है। भट्ट ने अपने बयान को और धार देते हुए कहा कि कांग्रेस के इस कथित दोहरे रवैये को हिंदू समाज पहले से समझ चुका है और अब मुस्लिम समाज को भी कांग्रेस की राजनीति को समझना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस चुनावी राजनीति के दौरान अलग-अलग वर्गों के बीच भ्रम पैदा कर अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने का प्रयास करती रही है। भाजपा नेता ने कहा कि उत्तराखंड की राजनीति अब केवल नारों और भावनात्मक मुद्दों से तय नहीं होगी। जनता विकास, कानून-व्यवस्था, रोजगार, पलायन, भ्रष्टाचार और राज्य की पहचान से जुड़े सवालों पर राजनीतिक दलों का हिसाब लेगी। राहुल मियां संबोधन को लेकर कांग्रेस की आपत्ति ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का नया राजनीतिक हथियार दे दिया है। भाजपा अब इसे कांग्रेस के कथित तुष्टिकरण के बड़े नैरेटिव से जोड़ रही है। पार्टी का प्रयास है कि 2027 के चुनावी विमर्श में कांग्रेस को वोट बैंक की राजनीति बनाम सबका विकास के सवाल पर घेरा जाए। हालांकि, कांग्रेस की ओर से इस तरह के संबोधनों पर आपत्ति को राजनीतिक शुचिता और भाषा की मर्यादा से जोड़कर देखा जा सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह विवाद केवल एक शब्द तक सीमित रहने के बजाय तुष्टिकरण बनाम सामाजिक समरसता की बहस में बदल सकता है। कुल मिलाकर भाजपा ने मियां विवाद को महज संबोधन का विवाद मानने के बजाय इसे कांग्रेस की कथित वोट बैंक राजनीति से जोड़ दिया है। चुनावी साल से पहले यह हमला बताता है कि उत्तराखंड में अब शब्द भी सियासी हथियार बन रहे हैं और हर बयान को 2027 के बड़े राजनीतिक नैरेटिव में फिट करने की कोशिश तेज हो गई है।

गुटबाजी पर कांग्रेस का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

उत्तराखंड कांग्रेस पार्टी में चलेगा अनुशासन का चाबुक कांग्रेस अनुशासन समिति की दो टूककृसंगठन सबसे ऊपर उत्तराखंड कांग्रेस में नियम तोड़ने वालों की अब खैर नहीं कांग्रेस अनुशासन समिति ने खींच दी मर्यादा की लंबी रेखा देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस में लगातार सामने आ रहे अंतर्विरोधों और संगठनात्मक चुनौतियों के बीच प्रदेश कांग्रेस की नव नियुक्त अनुशासन समिति ने अपनी पहली महत्वपूर्ण बैठक में संगठन को अनुशासन की कसौटी पर कसने के संकेत दिए हैं। प्रदेश कांग्रेस कमेटी कार्यालय में समिति के अध्यक्ष विक्रम सिंह नेगी की अध्यक्षता में हुई बैठक में पार्टी की नीतियों, सिद्धांतों और संगठनात्मक निर्णयों के अनुरूप काम करने पर विस्तार से चर्चा हुई। मुख्य एजेंडा प्रदेश कांग्रेस संगठन में अनुशासन को और प्रभावी एवं मजबूत बनाना रहा। समिति ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक संगठन होने के नाते कांग्रेस में कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन संगठनात्मक मर्यादा और पार्टी के निर्णयों की सीमा का उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जा सकता। समिति के सदस्यों ने कहा कि कांग्रेस में हर कार्यकर्ता को अपनी बात रखने और अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता है। लेकिन संगठन के भीतर असहमति व्यक्त करने और सार्वजनिक रूप से पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाने के बीच अंतर है। पदाधिकारी और कार्यकर्ता दोनों के लिए संगठन की गरिमा, अनुशासन और मर्यादा का पालन जरूरी है। बैठक के संदेश को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब प्रदेश कांग्रेस में समय-समय पर नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच मतभेद तथा सार्वजनिक बयानबाजी सामने आती रही है। ऐसे में नई अनुशासन समिति की सक्रियता को संगठन के भीतर बेलगाम बयानबाजी पर लगाम लगाने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखने की है। टिकट, नेतृत्व, चुनावी रणनीति और स्थानीय स्तर पर गुटबाजी जैसे सवाल चुनाव नजदीक आने के साथ और संवेदनशील हो सकते हैं। ऐसे में अनुशासन समिति की भूमिका केवल शिकायतों के निस्तारण तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि संगठन में सामूहिक निर्णयों के पालन को सुनिश्चित करने की भी होगी। पार्टी की ओर से दिया गया संदेश साफ है कि असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन अनुशासन संगठन की मजबूती की शर्त है। समिति की बैठक में इसी संतुलन को लेकर जोर दिया गया। नई अनुशासन समिति के गठन के बाद अब पार्टी कार्यकर्ताओं की निगाह इस बात पर रहेगी कि संगठनात्मक अनुशासन के उल्लंघन की शिकायतों पर समिति किस तरह की कार्रवाई करती है। यदि समिति सार्वजनिक बयानबाजी, पार्टी विरोधी गतिविधियों और संगठनात्मक निर्णयों की अवहेलना के मामलों में सख्ती दिखाती है तो इसका सीधा असर कांग्रेस की आंतरिक राजनीति पर पड़ सकता है। बैठक ने कम से कम इतना संकेत जरूर दे दिया है कि चुनावी तैयारियों के बीच प्रदेश कांग्रेस अब संगठन के भीतर अनुशासन को महज अपील के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति के अहम हिस्से के रूप में देख रही है। चुनौती यह है कि अनुशासन की इस कवायद को गुटबाजी से ऊपर उठाकर पूरे संगठन पर समान रूप से लागू किया जाए।

कांग्रेस का ‘यूथ स्ट्रैटेजी’ प्लान

गांवों से युवाओं के पलायन को बनाएगी चुनावी मुद्दा राजीव गांधी पंचायती राज संगठन की बैठक में फैसला रोजगार के अवसर बढ़ाने पर सरकार को घेरने की तैयारी देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने बेरोजगारी और ग्रामीण क्षेत्रों से युवाओं के पलायन को राजनीतिक मुद्दा बनाने की तैयारी तेज कर दी है। प्रदेश कांग्रेस राजीव गांधी पंचायती राज संगठन की महत्वपूर्ण बैठक में प्रदेशभर में काम मांगो अभियान शुरू करने का निर्णय लिया गया। अभियान के जरिये कांग्रेस गांव-गांव पहुंचकर रोजगार के सवाल पर युवाओं और ग्रामीणों के बीच सरकार को घेरने की रणनीति पर आगे बढ़ेगी। प्रदेश कांग्रेस कमेटी कार्यालय देहरादून में आयोजित बैठक में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं उत्तराखंड प्रभारी दीपक राठौर की मौजूदगी रही। बैठक की अध्यक्षता राजीव गांधी पंचायती राज संगठन के प्रदेश अध्यक्ष ललित फर्स्वाण ने की। इस दौरान प्रदेश में बढ़ती बेरोजगारी, ग्रामीण क्षेत्रों से युवाओं के पलायन तथा स्थानीय स्तर पर रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं होने को लेकर गंभीर चर्चा की गई। कांग्रेस ने काम मांगो अभियान के जरिये रोजगार के मुद्दे को केवल देहरादून जैसे शहरी राजनीतिक केंद्रों तक सीमित रखने के बजाय गांवों तक ले जाने का संकेत दिया है। पार्टी का फोकस उन ग्रामीण परिवारों और युवाओं पर रहेगा, जिनके सामने स्थानीय स्तर पर रोजगार के सीमित विकल्पों के कारण दूसरे शहरों या राज्यों की ओर जाने की मजबूरी बनी हुई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड के गांवों में रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं होने के कारण युवाओं का पलायन गंभीर चुनौती बना हुआ है। पार्टी इसी सवाल को लेकर सरकार से जवाब मांगने की तैयारी में है। राजीव गांधी पंचायती राज संगठन के माध्यम से अभियान चलाने का निर्णय राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। पंचायत स्तर तक संगठन की मौजूदगी का लाभ उठाते हुए कांग्रेस रोजगार के सवाल को स्थानीय समस्याओं से जोड़ना चाहती है। गांव में रोजगार, स्वरोजगार, कृषि आधारित आजीविका, पर्यटन और स्थानीय संसाधनों से जुड़े अवसरों को अभियान के प्रमुख मुद्दों में शामिल किए जाने की संभावना है। कांग्रेस का यह अभियान केवल सरकार के खिलाफ मुद्दा खड़ा करने तक सीमित रहेगा या गांवों में पार्टी के संगठन को भी मजबूत करेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। हालांकि 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस ने ग्रामीण मतदाताओं और युवाओं के बीच अपनी सक्रियता बढ़ाने का संकेत जरूर दे दिया है। भाजपा जहां विकास और रोजगार के क्षेत्र में सरकार की उपलब्धियों को सामने रख सकती है, वहीं कांग्रेस बेरोजगारी और पलायन के आंकड़ों तथा जमीनी समस्याओं को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश करेगी। ऐसे में काम मांगो अभियान आने वाले महीनों में उत्तराखंड की सियासत में रोजगार बनाम सरकारी दावों की नई बहस को जन्म दे सकता है। सियासी तौर पर कांग्रेस का दांव साफ हैकृपंचायत के रास्ते गांव तक पहुंचो, युवाओं के रोजगार का सवाल उठाओ और पलायन को चुनावी बहस के केंद्र में लाओ। अब निगाह इस बात पर होगी कि काम मांगो अभियान धरातल पर कितना व्यापक होता है और क्या कांग्रेस रोजगार के सवाल के साथ अपना ठोस वैकल्पिक रोजगार माडल भी जनता के सामने रख पाती है।

रविवार, 13 सितंबर 2026

udaydinmaan: सत्ता से सवाल पर ‘बुलडोजर’

udaydinmaan: सत्ता से सवाल पर ‘बुलडोजर’: यूपी में सत्ता से सवाल की कीमत नौकरी, धमकी और खौफ योगी सरकार पर पत्रकार की आवाज दबाने के आरोप डबल इंजन सरकार में सवाल पूछना इतना बड़ा अपराध स...

2027 का ‘सियासी ट्रेलर’ जारी

विस चुनाव करीब आते ही केंद्रीय एजेंसियां एक्टिव कांग्रेस ने घेरा, भाजपा बोली-जांच से क्यों भाग रहे एजेंसियों पर चुनावी पिच तैयार का लगाया आरोप देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। कांग्रेस ने कार्रवाई के समय और उसके राजनीतिक प्रभाव को सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़ते हुए इसे राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि चुनाव नजदीक आते ही केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता बढ़ना महज संयोग नहीं है। वहीं भाजपा का कहना है कि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की जांच को चुनाव से जोड़ना कांग्रेस की पुरानी रणनीति है और यदि किसी मामले में जांच एजेंसी कार्रवाई कर रही है तो उसे राजनीतिक रंग देने के बजाय तथ्यों का सामना करना चाहिए। ईडी की कार्रवाई के बाद प्रदेश कांग्रेस ने भाजपा पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि आखिर चुनावी वर्ष की ओर बढ़ते उत्तराखंड में केंद्रीय जांच एजेंसियों की गतिविधियां अचानक क्यों तेज हो रही हैं। कांग्रेस का तर्क है कि राजनीतिक विरोधियों और उनसे जुड़े लोगों पर कार्रवाई के जरिए माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि 2027 के चुनाव को देखते हुए भाजपा विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति अपना रही है। कांग्रेस के इस हमले ने कार्रवाई को महज जांच एजेंसी की कार्रवाई न रहने देकर इसे सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यदि किसी मामले में भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता के ठोस प्रमाण हैं तो जांच और कार्रवाई कानून के अनुसार होनी चाहिए, लेकिन जांच एजेंसियों की कार्रवाई का इस्तेमाल राजनीतिक नैरेटिव बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। कांग्रेस के आरोपों पर भाजपा का पलटवार भी उतना ही तीखा है। भाजपा का कहना है कि ईडी कोई राजनीतिक संगठन नहीं बल्कि कानून के तहत काम करने वाली जांच एजेंसी है। किसी मामले में जांच आगे बढ़ती है तो उसका आधार दस्तावेज और साक्ष्य होते हैं, चुनावी कैलेंडर नहीं। भाजपा नेताओं के मुताबिक कांग्रेस जब सत्ता में थी, तब भी जांच एजेंसियों की कार्रवाई होती रही है। अब विपक्ष में रहते हुए हर कार्रवाई को चुनाव से जोड़ना कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी बन गई है। भाजपा का सवाल है कि यदि संबंधित व्यक्ति या मामले में कोई गड़बड़ी नहीं है तो जांच से डरने की जरूरत क्या है? दरअसल, उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अब राजनीतिक दलों के लिए दूर की मंजिल नहीं रह गया है। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर संगठन को चुनावी मोड में ला चुकी है, वहीं कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए सरकार के खिलाफ मुद्दे तलाश रही है। ऐसे में ईडी की किसी भी कार्रवाई का राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है। कांग्रेस इस कार्रवाई को केंद्रीय एजेंसियों के कथित राजनीतिक इस्तेमाल के बड़े नैरेटिव से जोड़ रही है। पार्टी के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि वह पहले से ही बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, महंगाई और अन्य जनमुद्दों को लेकर भाजपा सरकार को घेरने की तैयारी में है। भाजपा दूसरी ओर कांग्रेस के इस नैरेटिव को जांच से बचने की कोशिश के रूप में पेश कर सकती है। यानी ईडी की कार्रवाई के साथ ही दोनों दलों के बीच जांच बनाम राजनीतिक प्रतिशोध की बहस तेज होने के आसार हैं। ईडी की कार्रवाई के बाद असली सवाल यही है कि इसका असर 2027 के चुनावी विमर्श पर कितना पड़ेगा। यदि जांच में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के तथ्य सामने आते हैं तो भाजपा इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के रूप में पेश करेगी। इसके उलट यदि कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध साबित करने में सफल रहती है तो वह इसे विपक्ष को दबाने और चुनावी लाभ लेने की रणनीति के तौर पर जनता के सामने रखेगी। इसलिए फिलहाल लड़ाई केवल जांच की नहीं है। लड़ाई उस नैरेटिव की है जिसे दोनों प्रमुख दल 2027 के चुनाव तक जनता के बीच स्थापित करना चाहते हैं। ईडी की कार्रवाई ने कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का नया मुद्दा दिया है, जबकि भाजपा के पास कांग्रेस से यह सवाल पूछने का अवसर है कि यदि जांच निष्पक्ष है तो उसे चुनाव से जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ रही है? आने वाले दिनों में जांच की दिशा और सामने आने वाले तथ्य ही तय करेंगे कि यह मामला केवल एक कानूनी कार्रवाई बनकर रह जाता है या 2027 के चुनाव का बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता है।

भ्रष्टाचार पर ‘मौन’ और कार्रवाई पर ‘शोर’

भाजपा का पलटवार, जांच एजेंसियों पर सवाल उठाना फितरत 2027 के चुनाव का नाम लेकर न छिपाएं अपनी नाकामियां हर ऐक्शन को पालिटिकल रंग देना कांग्रेस पार्टी की मजबूरी देहरादून। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई को लेकर कांग्रेस के सवालों पर भाजपा ने पलटवार करते हुए तीखा हमला बोला है। भाजपा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस लंबे समय से भ्रष्टाचार के मामलों पर आंखें बंद किए रही और अब जब केंद्रीय जांच एजेंसी ने कार्रवाई शुरू की है तो उसे राजनीतिक प्रतिशोध बताकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। भाजपा का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच कार्रवाई पर सवाल उठाने के बजाय कांग्रेस को जांच का सामना करना चाहिए और यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें तथ्यों के साथ खारिज करना चाहिए। भाजपा नेताओं ने कहा कि जांच एजेंसियां किसी राजनीतिक दल के निर्देश पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर कार्रवाई करती हैं। ऐसे में हर कार्रवाई को आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़ना कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति हो सकती है, लेकिन इससे जांच की वैधता पर सवाल खड़ा नहीं होता। भाजपा ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जब भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते हैं तो कांग्रेस राजनीतिक संरक्षण और बयानबाजी का सहारा लेती है, लेकिन जांच आगे बढ़ते ही उसे लोकतंत्र पर हमला बताने लगती है। भाजपा का सवाल है कि क्या किसी जांच एजेंसी की कार्रवाई इसलिए रोक दी जानी चाहिए क्योंकि चुनाव नजदीक हैं? भाजपा का कहना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस हर उस कार्रवाई को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है, जिससे उसके नेताओं या करीबियों पर सवाल खड़े हो सकते हैं। पार्टी के अनुसार कांग्रेस के पास सरकार को घेरने के लिए जनमुद्दों का अभाव है, इसलिए वह जांच एजेंसियों की कार्रवाई को ही राजनीतिक मुद्दा बनाने में जुटी है। भाजपा नेताओं ने कहा कि यदि ईडी की कार्रवाई कानून के तहत हो रही है तो कांग्रेस को जांच पूरी होने का इंतजार करना चाहिए। जांच को प्रभावित करने या कार्रवाई पर राजनीतिक दबाव बनाने के बजाय कांग्रेस को तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष रखना चाहिए। भाजपा ने कांग्रेस के रवैये को लेकर कहा कि यह दोहरा मापदंड है। आरोप लगने पर कांग्रेस सफाई देती है, लेकिन जांच एजेंसी कार्रवाई करती है तो पूरा विपक्ष एजेंसी की निष्पक्षता पर सवाल उठाने लगता है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस की राजनीति का यही विरोधाभास अब जनता के सामने उजागर हो रहा है। पार्टी ने कहा कि भ्रष्टाचार किसी दल का राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि जनता के धन और व्यवस्था से जुड़ा सवाल है। इसलिए जांच जहां भी होनी चाहिए, वहां होनी चाहिए और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। ईडी कार्रवाई को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ती बयानबाजी ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक नया राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस जहां इसे केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग से जोड़ रही है, वहीं भाजपा इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाई बता रही है। अब राजनीतिक लड़ाई इस बात पर भी केंद्रित होगी कि जनता के बीच कौन-सा नैरेटिव ज्यादा प्रभावी होता हैकृकि कांग्रेस का एजेंसियों का दुरुपयोग या भाजपा का भ्रष्टाचार पर कार्रवाई से डर क्यों? ईडी की जांच से जुड़े तथ्य और आगे होने वाली कानूनी कार्रवाई इस राजनीतिक बहस की दिशा तय करेगी। फिलहाल भाजपा ने कांग्रेस के सामने सीधा सवाल खड़ा कर दिया हैकृकि अगर भ्रष्टाचार नहीं हुआ तो जांच से आपत्ति क्यों, और अगर जांच गलत है तो तथ्य सामने रखने के बजाय चुनाव का हवाला क्यों?

सत्ता से सवाल पर ‘बुलडोजर’

यूपी में सत्ता से सवाल की कीमत नौकरी, धमकी और खौफ योगी सरकार पर पत्रकार की आवाज दबाने के आरोप डबल इंजन सरकार में सवाल पूछना इतना बड़ा अपराध सत्ता से सवाल पूछना गुनाह है तो प्रेस कान्फ्रेंस किसलिए देहरादून/लखनऊ। लोकतंत्र में प्रेस कान्फ्रेंस का मतलब सवाल-जवाब होता है। लेकिन उत्तर प्रदेश में महिला पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव से जुड़े घटनाक्रम ने इस बुनियादी लोकतांत्रिक परंपरा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक तीखा सवाल पूछने के बाद पत्रकार के सामने नौकरी जाने, पूछताछ और धमकी जैसी परिस्थितियां खड़ी होने के आरोप सामने आए हैं। विपक्ष ने इसे सीधे तौर पर पत्रकारिता की आवाज दबाने और सत्ता के असहज सवालों से बचने की कोशिश करार दिया है। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सवाल किसी राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता में पूछा गया था। यानी जहां पत्रकारों से सवाल पूछने और सरकार से जवाब मांगने की अपेक्षा होती है, वहीं सवाल पूछने वाली पत्रकार को ही कथित दबाव का सामना करना पड़ा। लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता के सामने खड़े होकर सवाल पूछना है। सवाल तीखा हो सकता है, असहज कर सकता है और सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकता है। लेकिन सवाल का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए। दिव्या श्रीवास्तव प्रकरण में विपक्ष का आरोप है कि सवाल पूछने के बाद पत्रकार पर दबाव बनाया गया। नौकरी जाने और धमकी जैसे आरोपों ने पूरे मामले को महज एक पत्रकार की व्यक्तिगत परेशानी से निकालकर मीडिया की स्वतंत्रता बनाम सत्ता के दबाव की बहस के केंद्र में ला दिया है। सबसे बड़ा सवाल यही हैकृकि अगर पत्रकार सत्ता से सवाल नहीं पूछेगा तो फिर जनता की ओर से सवाल कौन पूछेगा? इस घटनाक्रम पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि पत्रकारों को सवाल पूछने का अधिकार नहीं है तो प्रेस कान्फ्रेंस को प्रेस एकालाप कहा जाना चाहिए। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद की जड़ ही सवाल पूछने के अधिकार से जुड़ी है। सरकार की प्रेस वार्ता में पत्रकार मौजूद होते हैं ताकि सरकार की नीतियों, फैसलों और दावों पर सवाल कर सकें। यदि केवल अनुकूल सवाल ही स्वीकार्य हों तो फिर प्रेस वार्ता और सरकारी प्रचार कार्यक्रम के बीच अंतर ही क्या रह जाता है? भाजपा सरकारें सुशासन, कानून-व्यवस्था और मजबूत प्रशासन को अपनी पहचान बताती रही हैं। ऐसे में पत्रकार पर दबाव के आरोप सरकार के सामने असहज सवाल खड़े करते हैं। क्या मजबूत सरकार की ताकत सवालों का सामना करने में है या सवाल पूछने वाले को चुप कराने में? यदि पत्रकार ने गलत तथ्य रखे, तो सरकार उसका खंडन कर सकती थी। यदि सवाल भ्रामक था, तो तथ्य सामने रखे जा सकते थे। यदि कोई पत्रकारिता संबंधी गलती हुई थी, तो संस्थागत स्तर पर उसका समाधान हो सकता था। लेकिन यदि सवाल के बाद पत्रकार को नौकरी गंवानी पड़ी और उसके सामने सरकारी तंत्र से पूछताछ अथवा धमकी का माहौल बना, जैसा विपक्ष आरोप लगा रहा है, तो यह केवल एक पत्रकार का मामला नहीं रह जाता। विवाद में कथित तौर पर बुलडोजर के खौफ का भी उल्लेख किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बुलडोजर सरकार की कार्रवाई और सख्ती का प्रतीक बन चुका है। ऐसे में यदि किसी पत्रकार को ही बुलडोजर की धमकी महसूस होने का दावा किया जाता है तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर आरोप है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और पूरे घटनाक्रम पर संबंधित पक्षों का स्पष्ट पक्ष सामने आना जरूरी है। लेकिन सवाल फिर वही हैकृक्या पत्रकार को सत्ता से सवाल पूछने के बाद अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित होना चाहिए? देशभर में पिछले कुछ वर्षों से मीडिया की स्वतंत्रता, पत्रकारों पर राजनीतिक दबाव और सत्ता के साथ मीडिया के रिश्तों को लेकर बहस चलती रही है। उत्तर प्रदेश का यह प्रकरण उसी बहस को फिर सामने ले आया है। सत्ता के लिए पत्रकारिता तब तक सुविधाजनक हो सकती है, जब तक वह उपलब्धियों की खबर लिखती रहे। असली लोकतांत्रिक परीक्षा तब होती है जब पत्रकार सरकार के दावों के सामने असुविधाजनक सवाल रखता है। सरकार की आलोचना सरकार विरोध नहीं होती और सवाल पूछना अपराध नहीं। लोकतंत्र में सत्ता बदलती रहती है, लेकिन सवाल पूछने का अधिकार स्थायी रहना चाहिए। इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू यही है कि यदि किसी पत्रकार को सवाल पूछने के बाद कथित दबाव का सामना करना पड़ता है तो इसका संदेश केवल मीडिया तक सीमित नहीं रहता। न्यूजरूम में बैठा दूसरा पत्रकार भी सोच सकता हैकृक्या यह सवाल पूछना सुरक्षित है? और जब पत्रकार सवाल पूछने से पहले अपने रोजगार, सुरक्षा या भविष्य के बारे में सोचने लगे, तब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बाहर से खड़ा दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर से कमजोर होने लगता है। इसलिए सरकार को आगे आकर पूरे घटनाक्रम पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। पत्रकार पर लगाए गए आरोप हों तो सामने रखे जाएं। नौकरी जाने का कारण सार्वजनिक किया जाए। यदि किसी सरकारी तंत्र ने पत्रकार से पूछताछ या दबाव बनाया तो उसका आधार बताया जाए और यदि धमकी के आरोप गलत हैं तो सरकार उन्हें स्पष्ट रूप से खारिज करे। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि उसके पास सत्ता है। उसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह सवालों का सामना करने का साहस रखती है। सवाल पूछने वाले पत्रकार को जवाब मिलेगा या कार्रवाई? लोकतंत्र में प्रेस कान्फ्रेंस होगी या प्रेस एकालाप? सत्ता आईने से संवाद करेगी या आईना तोड़ने का आरोप झेलेगी? यही सवाल अब उत्तर प्रदेश की सियासत और मीडिया की स्वतंत्रता के सामने खड़ा है।

शनिवार, 12 सितंबर 2026

udaydinmaan: 2016 के ‘जख्म’ का 2027 में ‘हिसाब’

udaydinmaan: 2016 के ‘जख्म’ का 2027 में ‘हिसाब’: ईडी की कार्रवाई के बाद हरीश रावत ने कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश की 2016 की भर्ती परीक्षा की जांच ने फिर खोला कांग्रेस सरकार के दौर ...

2016 के ‘जख्म’ का 2027 में ‘हिसाब’

ईडी की कार्रवाई के बाद हरीश रावत ने कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश की 2016 की भर्ती परीक्षा की जांच ने फिर खोला कांग्रेस सरकार के दौर का नया अध्याय 2027 चुनाव से पहले कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे के कदम ने बढ़ाई पार्टी की मुश्किलें पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कार्रवाई को राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश बताया देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में शनिवार सुबह उस वक्त बड़ा सियासी भूचाल आ गया, जब पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने पार्टी में अपने सभी पदों से इस्तीफे की पेशकश कर दी। पूर्व मुख्यमंत्री के इस फैसले को उनके पूर्व ओएसडी और वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद उठाया गया कदम माना जा रहा है। हालांकि रावत ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने की बात नहीं कही है। ईडी ने 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े धनशोधन मामले में देहरादून में कई ठिकानों पर कार्रवाई की। एजेंसी के मुताबिक चंदन सिंह जीना के परिसर से 32 लाख रुपये नकद और 12 महंगी घड़ियां बरामद की गईं। जीना रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान ओएसडी रह चुके हैं और वर्तमान में उनके निजी सहायक के रूप में कार्यरत बताए गए हैं। हरीश रावत का इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब उत्तराखंड कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा को चुनौती देने की तैयारी में जुटी है। ऐसे में रावत का पद छोड़ना केवल व्यक्तिगत नैतिकता का सवाल नहीं, बल्कि कांग्रेस की चुनावी रणनीति के लिए भी बड़ा राजनीतिक संदेश है। रावत लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली और अनुभवी चेहरों में रहे हैं। पार्टी की चुनावी राजनीति में उनका प्रभाव, पहाड़ और मैदान के बीच राजनीतिक संतुलन साधने की उनकी क्षमता और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ कांग्रेस की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। कांग्रेस की उत्तराखंड प्रदेश चुनाव समिति में भी रावत का नाम शामिल रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या रावत का पदों से हटना कांग्रेस के लिए नैतिक दबाव कम करेगा या चुनावी मैदान में उसके सामने नया संकट खड़ा करेगा? रावत ने अपने सहयोगी पर लगे आरोपों को लेकर अविश्वास जताया है। उनका कहना है कि वह आरोपों पर विश्वास नहीं करते, लेकिन यदि जांच में उनकी ओर से कोई गलती साबित होती है तो उसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने मौजूदा घटनाक्रम को उनके और उनके सहयोगियों के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश के रूप में भी देखा है। यही वह बिंदु है जहां रावत का इस्तीफा महज संगठनात्मक निर्णय न रहकर राजनीतिक संदेश बन जाता है। एक तरफ वह अपने सहयोगी के बचाव में खड़े दिखाई दे रहे हैं, दूसरी तरफ पद छोड़कर जांच से अपने राजनीतिक कद को अलग रखने की कोशिश कर रहे हैं। 2027 का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आएगा, 2016 की कांग्रेस सरकार का कार्यकाल भाजपा के निशाने पर रहना तय माना जा रहा है। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं का मुद्दा पहले ही उत्तराखंड की राजनीति में युवाओं के बीच संवेदनशील विषय बन चुका है। ऐसे में ईडी की कार्रवाई और उसके बाद रावत का इस्तीफा भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने के लिए नया राजनीतिक हथियार दे सकता है। भाजपा इसे कांग्रेस शासनकाल की व्यवस्था पर सवाल के रूप में पेश कर सकती है, जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती होगी कि वह जांच को राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों से जोड़ते हुए अपनी राजनीतिक जमीन बचाए। सबसे बड़ा सवाल अब कांग्रेस के भीतर उठेगा। पार्टी पहले ही 2027 के लिए सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, एसआईआर और जनसरोकार के मुद्दे उठाने की तैयारी में है। ऐसे समय में उसके सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक का नाम एक जांच के राजनीतिक प्रभाव में आना पार्टी की धार को कमजोर कर सकता है। दूसरा सवाल नेतृत्व को लेकर है। क्या कांग्रेस हरीश रावत के प्रभाव से बाहर निकलकर नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे करेगी या रावत अब भी पार्टी की चुनावी रणनीति के केंद्र में बने रहेंगे? रावत का यह कदम उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है। पिछले कई वर्षों से कांग्रेस की राजनीति में रावत का प्रभाव और पार्टी के दूसरे धड़ों के साथ उनका समीकरण चर्चा में रहा है। अब जब विधानसभा चुनाव सिर पर हैं, उनका पद छोड़ना पार्टी के भीतर नेतृत्व, उम्मीदवार चयन और चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसे कांग्रेस छोड़ने के संकेत के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक रावत ने पार्टी के पदों से इस्तीफे की पेशकश की है, कांग्रेस की सदस्यता से नहीं। लेकिन राजनीतिक रूप से संदेश साफ हैकृ2016 की परछाइयां एक बार फिर 2027 के चुनावी मैदान तक पहुंच गई हैं। ईडी की कार्रवाई ने पुराने भर्ती प्रकरण को फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है और रावत के इस्तीफे ने इसे और बड़ा बना दिया है। अब जांच एजेंसियां अपना काम करेंगी, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में असली लड़ाई उस नैरेटिव की होगी जिसमें एक तरफ कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताएगी और दूसरी तरफ भाजपा इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के रूप में पेश करेगी। 2027 की जंग से पहले रावत का पद छोड़ना कांग्रेस के लिए सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि अपने सबसे अनुभवी चेहरे के राजनीतिक कवच पर आया बड़ा दबाव है।

रावत के सियासी ‘कुनबे’ पर ईडी की चोट

यूकेएसएसएससी केस ने फिर खोला 2016 का पन्ना,हरीश रावत के दौर की फाइल फिर खुली पूर्व ओएसडी के ठिकाने पर छापे में 32 लाख नकद, सोना और लग्जरी घड़ियों की बरामदगी का दावा भर्ती परीक्षा की कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले ने 2027 से पहले बढ़ाई कांग्रेस की मुश्किलें रावत बोले-आरोपों पर विश्वास नहीं, गलती साबित हुई तो जिम्मेदारी मेरी भी भाजपा के हाथ लगा कांग्रेस के पुराने शासनकाल पर वार का नया हथियार देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत के दौर की फाइल एक बार फिर खुल गई है। 2016 की ग्राम विकास अधिकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने पूर्व मुख्यमंत्री के राजनीतिक कुनबे को सीधे कठघरे में ला खड़ा किया है। रावत के पूर्व ओएसडी और निजी सहायक रहे चंदन सिंह जीना के ठिकाने पर ईडी की छापेमारी में 32 लाख रुपये नकद, सोना और महंगी घड़ियां समेत अन्य कीमती सामान मिलने की रिपोर्ट सामने आई है। सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह नहीं है कि ईडी की कार्रवाई में क्या मिला। असली सवाल यह है कि जिस दौर की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, उस दौर में सत्ता के सबसे नजदीकी लोगों की भूमिका आखिर कितनी दूर तक जाती है? रावत ने आरोपों को खारिज करते हुए अपने सहयोगी का बचाव किया है। उनका कहना है कि उन्हें जीना के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर विश्वास नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि यदि उनकी ओर से कोई गलती साबित होती है तो उन्हें उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे बड़े और अनुभवी चेहरों में हैं। इसलिए उनके पूर्व ओएसडी से जुड़ी ईडी कार्रवाई का राजनीतिक असर महज किसी सहयोगी की जांच तक सीमित नहीं रहेगा। 2016 की परीक्षा, तत्कालीन कांग्रेस सरकार और रावत के सत्ता काल का संदर्भ एक साथ सामने आने से भाजपा को कांग्रेस के पुराने शासन पर सीधा हमला करने का अवसर मिल गया है। 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच यह घटनाक्रम कांग्रेस के लिए असहज करने वाला है। जिस पार्टी को भर्ती घोटालों और युवाओं के मुद्दे पर भाजपा को घेरना था, उसी के सबसे वरिष्ठ नेता से जुड़े राजनीतिक घेरे में अब जांच एजेंसी की कार्रवाई चर्चा का विषय बन गई है। ईडी की कार्रवाई में कथित रूप से नकदी, सोना और महंगी घड़ियां मिलने की खबर ने मामले को और राजनीतिक रंग दे दिया है। रिपोर्टों में 32 लाख रुपये नकद और करीब 200 ग्राम सोने की बरामदगी का भी उल्लेख है। हालांकि इन संपत्तियों का स्रोत क्या है और इनका यूकेएसएसएससी प्रकरण से कोई प्रत्यक्ष संबंध है या नहीं, यह जांच का विषय है। बरामदगी को दोष सिद्धि मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतनी बड़ी कार्रवाई ने राजनीतिक सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं और यही सवाल रावत के सामने सबसे कठिन चुनौती बनकर खड़ा हैकृकि क्या उनके बेहद करीबी रहे व्यक्ति की भूमिका सिर्फ संयोग है या जांच किसी बड़े नेटवर्क तक पहुंचेगी? घटनाक्रम के बीच रावत द्वारा कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश ने मामले को और राजनीतिक वजन दे दिया। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने कांग्रेस के दो संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दिया है। यानी एक तरफ रावत अपने सहयोगी पर लगे आरोपों पर विश्वास नहीं करने की बात कह रहे हैं, दूसरी तरफ राजनीतिक जिम्मेदारी से पीछे हटने का संदेश भी दे रहे हैं। यहीं से कांग्रेस के भीतर भी सवाल उठना स्वाभाविक हैकृअगर आरोप बेबुनियाद हैं तो इस्तीफे की जरूरत क्यों पड़ी और अगर राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार की जा रही है तो जांच के निष्कर्ष का इंतजार क्यों नहीं? उत्तराखंड की राजनीति में भर्ती घोटाले सबसे संवेदनशील मुद्दों में रहे हैं। युवाओं के बीच सरकारी नौकरियों की परीक्षा में पारदर्शिता बड़ा राजनीतिक प्रश्न है। ऐसे में 2016 की परीक्षा से जुड़ी ईडी कार्रवाई को भाजपा निश्चित रूप से चुनावी मुद्दा बनाएगी। भाजपा का हमला सीधा होगाकृकि जिस कांग्रेस शासनकाल में परीक्षा हुई, उसी दौर के मुख्यमंत्री के करीबी पर अब जांच एजेंसी की कार्रवाई क्यों हो रही है? कांग्रेस के पास इसका राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर जवाब देना होगा। इस पूरे प्रकरण को केवल हरीश रावत बनाम भाजपा की लड़ाई बना देना भी जांच के मूल सवाल को छोटा कर देगा। असली सवाल यह है कि सरकारी भर्ती व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों का नेटवर्क कितना गहरा था और उसमें किस-किस स्तर के लोगों की भूमिका थी। यदि जांच में रावत या उनके किसी सहयोगी की कोई भूमिका सामने आती है तो कानून को अपना काम करना चाहिए। यदि आरोप राजनीतिक या तथ्यहीन साबित होते हैं तो जांच के बाद स्थिति भी साफ होनी चाहिए। लेकिन फिलहाल इतना जरूर है कि 2016 का वह अध्याय, जिसे उत्तराखंड की राजनीति पीछे छोड़ देना चाहती थी, 2027 के चुनाव से ठीक पहले फिर सामने खड़ा है और इस बार सवाल केवल भर्ती परीक्षा का नहीं है। सवाल यह है कि सत्ता के गलियारों में किसकी पहुंच कितनी थी, किसने उस पहुंच का इस्तेमाल किया और उस दौर की राजनीतिक जवाबदेही आखिर तय होगी या फिर फाइलों के साथ सवाल भी दफन हो जाएंगे? रावत के सामने अब राजनीतिक चुनौती दोहरी हैकृकि सहयोगी का बचाव भी करना है और उस दौर की सत्ता पर उठ रहे सवालों का जवाब भी देना है।

उत्तराखंड की सियासत के गढ़ में एनएसयूआई ने गाड़ा झंडा

छात्र राजनीति के मैदान से 2027 की सियासी पिच तैयार करने में जुटी कांग्रेस बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, छात्र हितों के मुद्दों को हथियार बनाएगी एनएसयूआई भाजपा के मजबूत राजनीतिक आधार में युवा वोट बैंक को चुनौती देने की तैयारी देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में जहां 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है, वहीं कांग्रेस ने सत्ता की लड़ाई से पहले छात्र राजनीति के मैदान में अपनी जमीन मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने प्रदेश के छात्र राजनीति के गढ़ों में संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाते हुए युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने का दावा किया है। संगठन का लक्ष्य केवल छात्रसंघ चुनाव तक सीमित नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए युवा नेतृत्व की नई फौज तैयार करना भी माना जा रहा है। उत्तराखंड की राजनीति में छात्र राजनीति की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से निकले छात्र नेता आगे चलकर मुख्यधारा की राजनीति में पहुंचे हैं। यही वजह है कि एनएसयूआई की सक्रियता को कांग्रेस के लिए महज संगठनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि भविष्य की सियासी निवेश रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। एनएसयूआई का फोकस छात्रसंघ चुनावों में प्रभाव बढ़ाने के साथ युवाओं के उन मुद्दों को राजनीतिक आवाज देने पर है, जो प्रदेश की राजनीति में लगातार बड़ा सवाल बन रहे हैं। सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दे कांग्रेस की छात्र इकाई के एजेंडे में प्रमुखता से रखे जा रहे हैं। कांग्रेस के लिए यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में युवा मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाली बड़ी ताकत है। जिस संगठन की छात्र परिसरों में पकड़ मजबूत होगी, उसके पास भविष्य की राजनीति के लिए कार्यकर्ताओं और नेताओं का मजबूत आधार तैयार करने का अवसर भी होगा। उत्तराखंड में लंबे समय से भाजपा का संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत माना जाता है। ऐसे में एनएसयूआई की सक्रियता का एक बड़ा राजनीतिक अर्थ यह भी है कि कांग्रेस भाजपा के मजबूत माने जाने वाले सामाजिक और युवा आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के सामने चुनौती केवल भाजपा को चुनाव में हराने की नहीं है। उसे बूथ स्तर तक मजबूत संगठन खड़ा करना है और इसके लिए छात्र राजनीति से निकलने वाले कार्यकर्ता महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यही कारण है कि एनएसयूआई की गतिविधियों को कांग्रेस के 2027 मिशन की शुरुआती प्रयोगशाला के रूप में भी देखा जा सकता है। उत्तराखंड में सरकारी नौकरी युवाओं की राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मामलों ने युवाओं में व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। एनएसयूआई इसी असंतोष को राजनीतिक मुद्दे में बदलने की तैयारी में है। संगठन यदि छात्र परिसरों से निकलकर भर्ती परीक्षाओं और रोजगार के सवाल को व्यापक युवा आंदोलन का रूप देने में सफल होता है तो इसका असर सीधे 2027 की राजनीति पर पड़ सकता है। कांग्रेस के लिए यह भाजपा सरकार को घेरने का मौका भी है और अपने संगठन को पुनर्जीवित करने का माध्यम भी। एनएसयूआई की सबसे बड़ी राजनीतिक उपयोगिता कांग्रेस के लिए यह हो सकती है कि इससे पार्टी को नई पीढ़ी का नेतृत्व मिल सके। उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से पुराने और स्थापित चेहरों का प्रभाव रहा है। ऐसे में छात्र राजनीति से आने वाले नए नेताओं को आगे बढ़ाना पार्टी के लिए संगठनात्मक बदलाव का रास्ता खोल सकता है। लेकिन इसके लिए एनएसयूआई को केवल चुनावी पोस्टर और नारों से आगे बढ़ना होगा। परिसरों में छात्र समस्याओं पर लगातार संघर्ष, संवाद और संगठनात्मक उपस्थिति ही उसे स्थायी राजनीतिक ताकत दे सकती है। एनएसयूआई ने अगर छात्र राजनीति के मैदान में अपना झंडा गाड़ा है तो अब असली परीक्षा उसे टिकाए रखने की है। छात्रसंघ चुनाव में जीत हासिल करना एक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उसे विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक ऊर्जा में बदलना अलग चुनौती है। 2027 की सियासत में बेरोजगारी, भर्ती, पलायन, शिक्षा और युवाओं की भागीदारी जैसे मुद्दे निर्णायक हो सकते हैं। ऐसे में एनएसयूआई कांग्रेस के लिए युवा असंतोष को राजनीतिक संगठन में बदलने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता का रास्ता भले ही विधानसभा से होकर गुजरता हो, लेकिन उस रास्ते की पहली राजनीतिक सीढ़ी विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के परिसर भी बन सकते हैं और कांग्रेस ने शायद इसी सियासी गणित को पढ़ते हुए छात्र राजनीति के मैदान में अपना झंडा पहले ही गाड़ने की तैयारी शुरू कर दी है।

कांग्रेस को लगा ‘सियासी’ नेत्र रोग

विकास दिखता तो दुष्प्रचार की जरूरत नहीं पड़ती भाजपा का पलटवार-जमीन पर चहुंमुखी विकास कांग्रेस को उपलब्धियां नजर नहीं आ रहीं आजकल सुविधाएं पहुंचाने को बताया सरकार का मूल मंत्र देहरादून। कांग्रेस के लगातार सरकार पर हमलावर होने के बीच भाजपा ने पलटवार करते हुए विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को अब राजनीतिक नेत्र रोग हो गया है। यही वजह है कि उसे जमीन पर दिखाई दे रहा चहुंमुखी विकास नजर नहीं आ रहा। भाजपा के अनुसार प्रदेश में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, कनेक्टिविटी, रोजगार, महिला सशक्तीकरण, पर्यटन और आधारभूत ढांचे से जुड़े क्षेत्रों में लगातार काम हो रहा है, लेकिन कांग्रेस इन उपलब्धियों को देखने के बजाय राजनीतिक चश्मे से केवल कमियां तलाशने में जुटी है। भाजपा का कहना है कि विपक्ष का काम सवाल उठाना है, लेकिन सवाल और दुष्प्रचार में अंतर होता है। कांग्रेस यदि सरकार के कामकाज पर तथ्य आधारित सवाल उठाती है तो सरकार उसका जवाब देने के लिए तैयार है, लेकिन हर विकास कार्य को नकारना और हर उपलब्धि में राजनीति तलाशना जनता को गुमराह करने की कोशिश है। भाजपा का दावा है कि वह कांग्रेस की इस रणनीति का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि अपनी विकास की लकीर को और लंबा करके देगी। भाजपा ने अपने राजनीतिक नैरेटिव के केंद्र में समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को रखा है। पार्टी का कहना है कि विकास का वास्तविक पैमाना केवल बड़े प्रोजेक्ट और चमकती सड़कें नहीं हैं, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ उस व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं, जिसके पास संसाधन सबसे कम हैं। भाजपा के अनुसार गरीब, किसान, महिला, युवा, बुजुर्ग और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक सुविधाओं और योजनाओं की पहुंच बढ़ाने पर सरकार का जोर है। पार्टी इसे महज चुनावी घोषणा नहीं बल्कि शासन की कार्यशैली का हिस्सा बता रही है। भाजपा का सीधा आरोप है कि कांग्रेस विकास के सवाल को राजनीतिक संघर्ष में बदलने की कोशिश कर रही है। पार्टी का कहना है कि विपक्ष को प्रदेश में हो रहे काम दिखाई देने चाहिए, लेकिन कांग्रेस का पूरा फोकस सरकार की आलोचना पर है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि यदि विपक्ष सरकार की किसी योजना में कमी बताता है तो उस पर चर्चा हो सकती है, लेकिन हर काम को नकार देना प्रदेश की जनता के साथ भी अन्याय है। पार्टी का कहना है कि जनता अब दावों से अधिक काम को देख रही है और आने वाले समय में वही राजनीतिक फैसला करेगी। हालांकि कांग्रेस सरकार के इन दावों को स्वीकार करने के बजाय बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, मूल निवास और भू-कानून जैसे मुद्दों पर सरकार को लगातार घेर रही है। विपक्ष का तर्क है कि केवल योजनाओं की घोषणा और बड़े विकास प्रोजेक्टों से जनता की समस्याएं खत्म नहीं होतीं। ऐसे में भाजपा का चहुंमुखी विकास वाला दावा कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती है तो कांग्रेस के लगातार सवाल भाजपा के लिए जवाबदेही की कसौटी। यही वजह है कि उत्तराखंड की सियासत अब एक दिलचस्प मुकाम पर पहुंचती दिखाई दे रही है। एक तरफ भाजपा विकास कार्यों को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस सरकार के दावों की जमीन पर पड़ताल करने और कमियां गिनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। भाजपा का संकेत साफ है कि वह कांग्रेस के हर आरोप का जवाब देने में अपनी राजनीतिक ऊर्जा खर्च करने के बजाय विकास को अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाना चाहती है। पार्टी का मानना है कि चुनावी राजनीति में सबसे प्रभावी जवाब वही है, जिसे जनता अपनी आंखों से देख सके और अपने जीवन में महसूस कर सके। इसी सोच के तहत भाजपा कांग्रेस के आरोपों को दुष्प्रचार बताते हुए अपनी उपलब्धियों को गांव, गरीब और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। पार्टी का दावा है कि उसकी राजनीति का लक्ष्य विपक्ष की लकीर छोटी करना नहीं, बल्कि अपनी लकीर इतनी बड़ी करना है कि विरोधियों के आरोप उसके सामने बौने साबित हों। सियासी संदेश साफ है- कांग्रेस जहां सरकार के काम पर सवालों की रोशनी डाल रही है, वहीं भाजपा जनता के बीच विकास के कामों की तस्वीर लेकर जाने की तैयारी में है। अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि 2027 की चुनावी चौखट पर जनता को किसकी तस्वीर ज्यादा साफ दिखाई देती है कि विपक्ष के सवालों की या सत्ता के विकास दावों की।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

udaydinmaan: ‘जेन-जी’ की ताकत से बदल दी ‘सियासत’

udaydinmaan: ‘जेन-जी’ की ताकत से बदल दी ‘सियासत’: अब देशभर में नेता युवाओं की चौखट पर दे रहे हैं दस्तक नेपाल से उठी आवाज ने दुनिया के नेताओं को दिया नया संदेश सत्ता की राजनीति में सोशल मीडिय...

‘जेन-जी’ की ताकत से बदल दी ‘सियासत’

अब देशभर में नेता युवाओं की चौखट पर दे रहे हैं दस्तक नेपाल से उठी आवाज ने दुनिया के नेताओं को दिया नया संदेश सत्ता की राजनीति में सोशल मीडिया पीढ़ी की बढ़ती दखल देहरादून। जिस जेन-जी को कुछ साल पहले तक राजनीति से दूर, मोबाइल और सोशल मीडिया में उलझी पीढ़ी माना जाता था, आज वही पीढ़ी सत्ता के गलियारों में सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी है। नेपाल में युवाओं के आक्रोश और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ उठी आवाज ने जिस तरह सत्ता को चुनौती दी, उसने सिर्फ पड़ोसी देशों की राजनीति को नहीं झकझोरा, बल्कि दुनिया के राजनीतिक दलों को भी अपने भविष्य की रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। संदेश साफ हैकृअब नेता सिर्फ मंच से युवाओं को संबोधित करके काम नहीं चला सकते, उन्हें जेन-जी की चौखट तक जाना होगा। नेपाल का घटनाक्रम इस बदलाव का सबसे ताजा उदाहरण है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, राजनीतिक अस्थिरता और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर युवाओं की नाराजगी ने पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दी। सोशल मीडिया के जरिए तेजी से संगठित होने वाली इस पीढ़ी ने दिखा दिया कि चुनावी राजनीति में संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन डिजिटल दौर में असंतोष की गति और उसकी पहुंच उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। जेन-जी को लंबे समय तक राजनीतिक दलों के लिए भविष्य का वोट बैंक माना जाता रहा। लेकिन नेपाल सहित विभिन्न देशों के घटनाक्रम ने इस धारणा को बदल दिया है। यह पीढ़ी अब सिर्फ वोट देने वाली नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दे तय करने, सरकार से सवाल पूछने और नेताओं की सार्वजनिक छवि बनाने-बिगाड़ने वाली ताकत बनती जा रही है। यही कारण है कि राजनीतिक दलों की भाषा भी बदल रही है। नेताओं के भाषणों में रोजगार, डिजिटल स्वतंत्रता, शिक्षा, पारदर्शिता, भ्रष्टाचार और अवसर जैसे मुद्दों की जगह बढ़ रही है। राजनीतिक अभियान भी अब केवल रैलियों और पोस्टरों तक सीमित नहीं हैं। इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक, एक्स और अन्य डिजिटल मंच राजनीतिक संवाद के नए अखाड़े बन चुके हैं। जेन-जी की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह सिर्फ घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होती। वह सवाल पूछती हैकृकब? कैसे? किसके लिए? और जवाबदेही किसकी? युवा पीढ़ी पारंपरिक राजनीतिक भाषणों और जुमलों की बजाय सीधे परिणाम देखना चाहती है। यही वजह है कि सत्ता में बैठे नेताओं के लिए अब सोशल मीडिया सिर्फ प्रचार का माध्यम नहीं रह गया है। वहां हर निर्णय की तत्काल प्रतिक्रिया होती है और राजनीतिक संदेश कुछ ही घंटों में व्यापक जनमत का रूप ले सकता है। इस बदलाव ने नेताओं के सामने नई मजबूरी पैदा की है। उन्हें अब जेन-जी को सिर्फ चुनाव के समय याद करने के बजाय लगातार उसके साथ संवाद करना पड़ रहा है। नेपाल में जेन-जी की राजनीतिक सक्रियता ने दक्षिण एशिया में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया हैकृकि क्या आने वाले चुनावों में युवा असंतोष पारंपरिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रहा है? भारत समेत कई देशों में राजनीतिक दल पहले ही युवा मतदाताओं को साधने के लिए डिजिटल अभियान, युवा संवाद और सोशल मीडिया केंद्रित राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं। लेकिन नेपाल के घटनाक्रम ने इस रणनीति को और गंभीर बना दिया है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नेता युवाओं तक कैसे पहुंचेंगे। असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल जेन-जी के सवालों का जवाब देने के लिए अपने पुराने राजनीतिक तौर-तरीके बदलने को तैयार हैं? इस पीढ़ी की अपेक्षा केवल रोजगार या विकास योजनाओं तक सीमित नहीं है। वह निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी, पारदर्शिता, संस्थाओं की जवाबदेही और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई चाहती है। वह यह भी चाहती है कि राजनीति में उसकी आवाज केवल चुनावी आंकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि नीति निर्माण में दिखाई दे। यही वह बिंदु है जहां पारंपरिक राजनीति और जेन-जी के बीच सबसे बड़ा टकराव दिखाई देता है। राजनीतिक दल जहां संगठन, नेतृत्व और सत्ता के पुराने ढांचे के जरिए राजनीति को देखते हैं, वहीं जेन-जी अधिक विकेंद्रित, त्वरित और सवाल पूछने वाली राजनीति की तरफ बढ़ रही है। नेपाल की घटनाओं ने भारत के राजनीतिक दलों को भी एक संकेत दिया है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में जहां बड़ी संख्या में युवा रोजगार, पलायन, शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं और स्थानीय अवसरों को लेकर सवाल उठाते हैं, वहां जेन-जी की भूमिका आने वाले चुनावों में महत्वपूर्ण हो सकती है। 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे दलों के लिए भी यह महज सोशल मीडिया अभियान का विषय नहीं है। युवा मतदाता क्या सोच रहा है, वह किस मुद्दे पर नाराज है और वह राजनीतिक दलों से क्या अपेक्षा करता हैकृयह चुनावी रणनीति का केंद्रीय सवाल बन सकता है। अब नेताओं की चौखट पर जेन-जी को बुलाने का दौर खत्म होता दिख रहा है। जेन-जी की चौखट पर नेताओं के पहुंचने का दौर शुरू हो चुका है।