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शनिवार, 12 सितंबर 2026
udaydinmaan: 2016 के ‘जख्म’ का 2027 में ‘हिसाब’
udaydinmaan: 2016 के ‘जख्म’ का 2027 में ‘हिसाब’: ईडी की कार्रवाई के बाद हरीश रावत ने कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश की 2016 की भर्ती परीक्षा की जांच ने फिर खोला कांग्रेस सरकार के दौर ...
2016 के ‘जख्म’ का 2027 में ‘हिसाब’
ईडी की कार्रवाई के बाद हरीश रावत ने कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश की
2016 की भर्ती परीक्षा की जांच ने फिर खोला कांग्रेस सरकार के दौर का नया अध्याय
2027 चुनाव से पहले कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे के कदम ने बढ़ाई पार्टी की मुश्किलें
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कार्रवाई को राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश बताया
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में शनिवार सुबह उस वक्त बड़ा सियासी भूचाल आ गया, जब पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने पार्टी में अपने सभी पदों से इस्तीफे की पेशकश कर दी। पूर्व मुख्यमंत्री के इस फैसले को उनके पूर्व ओएसडी और वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद उठाया गया कदम माना जा रहा है। हालांकि रावत ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने की बात नहीं कही है।
ईडी ने 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े धनशोधन मामले में देहरादून में कई ठिकानों पर कार्रवाई की। एजेंसी के मुताबिक चंदन सिंह जीना के परिसर से 32 लाख रुपये नकद और 12 महंगी घड़ियां बरामद की गईं। जीना रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान ओएसडी रह चुके हैं और वर्तमान में उनके निजी सहायक के रूप में कार्यरत बताए गए हैं। हरीश रावत का इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब उत्तराखंड कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा को चुनौती देने की तैयारी में जुटी है। ऐसे में रावत का पद छोड़ना केवल व्यक्तिगत नैतिकता का सवाल नहीं, बल्कि कांग्रेस की चुनावी रणनीति के लिए भी बड़ा राजनीतिक संदेश है।
रावत लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली और अनुभवी चेहरों में रहे हैं। पार्टी की चुनावी राजनीति में उनका प्रभाव, पहाड़ और मैदान के बीच राजनीतिक संतुलन साधने की उनकी क्षमता और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ कांग्रेस की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। कांग्रेस की उत्तराखंड प्रदेश चुनाव समिति में भी रावत का नाम शामिल रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या रावत का पदों से हटना कांग्रेस के लिए नैतिक दबाव कम करेगा या चुनावी मैदान में उसके सामने नया संकट खड़ा करेगा?
रावत ने अपने सहयोगी पर लगे आरोपों को लेकर अविश्वास जताया है। उनका कहना है कि वह आरोपों पर विश्वास नहीं करते, लेकिन यदि जांच में उनकी ओर से कोई गलती साबित होती है तो उसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने मौजूदा घटनाक्रम को उनके और उनके सहयोगियों के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश के रूप में भी देखा है। यही वह बिंदु है जहां रावत का इस्तीफा महज संगठनात्मक निर्णय न रहकर राजनीतिक संदेश बन जाता है। एक तरफ वह अपने सहयोगी के बचाव में खड़े दिखाई दे रहे हैं, दूसरी तरफ पद छोड़कर जांच से अपने राजनीतिक कद को अलग रखने की कोशिश कर रहे हैं।
2027 का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आएगा, 2016 की कांग्रेस सरकार का कार्यकाल भाजपा के निशाने पर रहना तय माना जा रहा है। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं का मुद्दा पहले ही उत्तराखंड की राजनीति में युवाओं के बीच संवेदनशील विषय बन चुका है। ऐसे में ईडी की कार्रवाई और उसके बाद रावत का इस्तीफा भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने के लिए नया राजनीतिक हथियार दे सकता है। भाजपा इसे कांग्रेस शासनकाल की व्यवस्था पर सवाल के रूप में पेश कर सकती है, जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती होगी कि वह जांच को राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों से जोड़ते हुए अपनी राजनीतिक जमीन बचाए।
सबसे बड़ा सवाल अब कांग्रेस के भीतर उठेगा। पार्टी पहले ही 2027 के लिए सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, एसआईआर और जनसरोकार के मुद्दे उठाने की तैयारी में है। ऐसे समय में उसके सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक का नाम एक जांच के राजनीतिक प्रभाव में आना पार्टी की धार को कमजोर कर सकता है। दूसरा सवाल नेतृत्व को लेकर है। क्या कांग्रेस हरीश रावत के प्रभाव से बाहर निकलकर नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे करेगी या रावत अब भी पार्टी की चुनावी रणनीति के केंद्र में बने रहेंगे?
रावत का यह कदम उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है। पिछले कई वर्षों से कांग्रेस की राजनीति में रावत का प्रभाव और पार्टी के दूसरे धड़ों के साथ उनका समीकरण चर्चा में रहा है। अब जब विधानसभा चुनाव सिर पर हैं, उनका पद छोड़ना पार्टी के भीतर नेतृत्व, उम्मीदवार चयन और चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसे कांग्रेस छोड़ने के संकेत के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक रावत ने पार्टी के पदों से इस्तीफे की पेशकश की है, कांग्रेस की सदस्यता से नहीं। लेकिन राजनीतिक रूप से संदेश साफ हैकृ2016 की परछाइयां एक बार फिर 2027 के चुनावी मैदान तक पहुंच गई हैं। ईडी की कार्रवाई ने पुराने भर्ती प्रकरण को फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है और रावत के इस्तीफे ने इसे और बड़ा बना दिया है।
अब जांच एजेंसियां अपना काम करेंगी, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में असली लड़ाई उस नैरेटिव की होगी जिसमें एक तरफ कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताएगी और दूसरी तरफ भाजपा इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के रूप में पेश करेगी। 2027 की जंग से पहले रावत का पद छोड़ना कांग्रेस के लिए सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि अपने सबसे अनुभवी चेहरे के राजनीतिक कवच पर आया बड़ा दबाव है।
रावत के सियासी ‘कुनबे’ पर ईडी की चोट
यूकेएसएसएससी केस ने फिर खोला 2016 का पन्ना,हरीश रावत के दौर की फाइल फिर खुली
पूर्व ओएसडी के ठिकाने पर छापे में 32 लाख नकद, सोना और लग्जरी घड़ियों की बरामदगी का दावा
भर्ती परीक्षा की कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले ने 2027 से पहले बढ़ाई कांग्रेस की मुश्किलें
रावत बोले-आरोपों पर विश्वास नहीं, गलती साबित हुई तो जिम्मेदारी मेरी भी
भाजपा के हाथ लगा कांग्रेस के पुराने शासनकाल पर वार का नया हथियार
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत के दौर की फाइल एक बार फिर खुल गई है। 2016 की ग्राम विकास अधिकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने पूर्व मुख्यमंत्री के राजनीतिक कुनबे को सीधे कठघरे में ला खड़ा किया है। रावत के पूर्व ओएसडी और निजी सहायक रहे चंदन सिंह जीना के ठिकाने पर ईडी की छापेमारी में 32 लाख रुपये नकद, सोना और महंगी घड़ियां समेत अन्य कीमती सामान मिलने की रिपोर्ट सामने आई है। सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह नहीं है कि ईडी की कार्रवाई में क्या मिला। असली सवाल यह है कि जिस दौर की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, उस दौर में सत्ता के सबसे नजदीकी लोगों की भूमिका आखिर कितनी दूर तक जाती है?
रावत ने आरोपों को खारिज करते हुए अपने सहयोगी का बचाव किया है। उनका कहना है कि उन्हें जीना के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर विश्वास नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि यदि उनकी ओर से कोई गलती साबित होती है तो उन्हें उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे बड़े और अनुभवी चेहरों में हैं। इसलिए उनके पूर्व ओएसडी से जुड़ी ईडी कार्रवाई का राजनीतिक असर महज किसी सहयोगी की जांच तक सीमित नहीं रहेगा। 2016 की परीक्षा, तत्कालीन कांग्रेस सरकार और रावत के सत्ता काल का संदर्भ एक साथ सामने आने से भाजपा को कांग्रेस के पुराने शासन पर सीधा हमला करने का अवसर मिल गया है।
2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच यह घटनाक्रम कांग्रेस के लिए असहज करने वाला है। जिस पार्टी को भर्ती घोटालों और युवाओं के मुद्दे पर भाजपा को घेरना था, उसी के सबसे वरिष्ठ नेता से जुड़े राजनीतिक घेरे में अब जांच एजेंसी की कार्रवाई चर्चा का विषय बन गई है। ईडी की कार्रवाई में कथित रूप से नकदी, सोना और महंगी घड़ियां मिलने की खबर ने मामले को और राजनीतिक रंग दे दिया है। रिपोर्टों में 32 लाख रुपये नकद और करीब 200 ग्राम सोने की बरामदगी का भी उल्लेख है।
हालांकि इन संपत्तियों का स्रोत क्या है और इनका यूकेएसएसएससी प्रकरण से कोई प्रत्यक्ष संबंध है या नहीं, यह जांच का विषय है। बरामदगी को दोष सिद्धि मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतनी बड़ी कार्रवाई ने राजनीतिक सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं और यही सवाल रावत के सामने सबसे कठिन चुनौती बनकर खड़ा हैकृकि क्या उनके बेहद करीबी रहे व्यक्ति की भूमिका सिर्फ संयोग है या जांच किसी बड़े नेटवर्क तक पहुंचेगी?
घटनाक्रम के बीच रावत द्वारा कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश ने मामले को और राजनीतिक वजन दे दिया। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने कांग्रेस के दो संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दिया है। यानी एक तरफ रावत अपने सहयोगी पर लगे आरोपों पर विश्वास नहीं करने की बात कह रहे हैं, दूसरी तरफ राजनीतिक जिम्मेदारी से पीछे हटने का संदेश भी दे रहे हैं। यहीं से कांग्रेस के भीतर भी सवाल उठना स्वाभाविक हैकृअगर आरोप बेबुनियाद हैं तो इस्तीफे की जरूरत क्यों पड़ी और अगर राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार की जा रही है तो जांच के निष्कर्ष का इंतजार क्यों नहीं?
उत्तराखंड की राजनीति में भर्ती घोटाले सबसे संवेदनशील मुद्दों में रहे हैं। युवाओं के बीच सरकारी नौकरियों की परीक्षा में पारदर्शिता बड़ा राजनीतिक प्रश्न है। ऐसे में 2016 की परीक्षा से जुड़ी ईडी कार्रवाई को भाजपा निश्चित रूप से चुनावी मुद्दा बनाएगी। भाजपा का हमला सीधा होगाकृकि जिस कांग्रेस शासनकाल में परीक्षा हुई, उसी दौर के मुख्यमंत्री के करीबी पर अब जांच एजेंसी की कार्रवाई क्यों हो रही है? कांग्रेस के पास इसका राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर जवाब देना होगा।
इस पूरे प्रकरण को केवल हरीश रावत बनाम भाजपा की लड़ाई बना देना भी जांच के मूल सवाल को छोटा कर देगा। असली सवाल यह है कि सरकारी भर्ती व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों का नेटवर्क कितना गहरा था और उसमें किस-किस स्तर के लोगों की भूमिका थी। यदि जांच में रावत या उनके किसी सहयोगी की कोई भूमिका सामने आती है तो कानून को अपना काम करना चाहिए। यदि आरोप राजनीतिक या तथ्यहीन साबित होते हैं तो जांच के बाद स्थिति भी साफ होनी चाहिए। लेकिन फिलहाल इतना जरूर है कि 2016 का वह अध्याय, जिसे उत्तराखंड की राजनीति पीछे छोड़ देना चाहती थी, 2027 के चुनाव से ठीक पहले फिर सामने खड़ा है और इस बार सवाल केवल भर्ती परीक्षा का नहीं है।
सवाल यह है कि सत्ता के गलियारों में किसकी पहुंच कितनी थी, किसने उस पहुंच का इस्तेमाल किया और उस दौर की राजनीतिक जवाबदेही आखिर तय होगी या फिर फाइलों के साथ सवाल भी दफन हो जाएंगे? रावत के सामने अब राजनीतिक चुनौती दोहरी हैकृकि सहयोगी का बचाव भी करना है और उस दौर की सत्ता पर उठ रहे सवालों का जवाब भी देना है।
उत्तराखंड की सियासत के गढ़ में एनएसयूआई ने गाड़ा झंडा
छात्र राजनीति के मैदान से 2027 की सियासी पिच तैयार करने में जुटी कांग्रेस
बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, छात्र हितों के मुद्दों को हथियार बनाएगी एनएसयूआई
भाजपा के मजबूत राजनीतिक आधार में युवा वोट बैंक को चुनौती देने की तैयारी
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में जहां 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है, वहीं कांग्रेस ने सत्ता की लड़ाई से पहले छात्र राजनीति के मैदान में अपनी जमीन मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने प्रदेश के छात्र राजनीति के गढ़ों में संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाते हुए युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने का दावा किया है। संगठन का लक्ष्य केवल छात्रसंघ चुनाव तक सीमित नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए युवा नेतृत्व की नई फौज तैयार करना भी माना जा रहा है।
उत्तराखंड की राजनीति में छात्र राजनीति की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से निकले छात्र नेता आगे चलकर मुख्यधारा की राजनीति में पहुंचे हैं। यही वजह है कि एनएसयूआई की सक्रियता को कांग्रेस के लिए महज संगठनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि भविष्य की सियासी निवेश रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। एनएसयूआई का फोकस छात्रसंघ चुनावों में प्रभाव बढ़ाने के साथ युवाओं के उन मुद्दों को राजनीतिक आवाज देने पर है, जो प्रदेश की राजनीति में लगातार बड़ा सवाल बन रहे हैं। सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दे कांग्रेस की छात्र इकाई के एजेंडे में प्रमुखता से रखे जा रहे हैं।
कांग्रेस के लिए यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में युवा मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाली बड़ी ताकत है। जिस संगठन की छात्र परिसरों में पकड़ मजबूत होगी, उसके पास भविष्य की राजनीति के लिए कार्यकर्ताओं और नेताओं का मजबूत आधार तैयार करने का अवसर भी होगा। उत्तराखंड में लंबे समय से भाजपा का संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत माना जाता है। ऐसे में एनएसयूआई की सक्रियता का एक बड़ा राजनीतिक अर्थ यह भी है कि कांग्रेस भाजपा के मजबूत माने जाने वाले सामाजिक और युवा आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस के सामने चुनौती केवल भाजपा को चुनाव में हराने की नहीं है। उसे बूथ स्तर तक मजबूत संगठन खड़ा करना है और इसके लिए छात्र राजनीति से निकलने वाले कार्यकर्ता महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यही कारण है कि एनएसयूआई की गतिविधियों को कांग्रेस के 2027 मिशन की शुरुआती प्रयोगशाला के रूप में भी देखा जा सकता है। उत्तराखंड में सरकारी नौकरी युवाओं की राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मामलों ने युवाओं में व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। एनएसयूआई इसी असंतोष को राजनीतिक मुद्दे में बदलने की तैयारी में है। संगठन यदि छात्र परिसरों से निकलकर भर्ती परीक्षाओं और रोजगार के सवाल को व्यापक युवा आंदोलन का रूप देने में सफल होता है तो इसका असर सीधे 2027 की राजनीति पर पड़ सकता है। कांग्रेस के लिए यह भाजपा सरकार को घेरने का मौका भी है और अपने संगठन को पुनर्जीवित करने का माध्यम भी।
एनएसयूआई की सबसे बड़ी राजनीतिक उपयोगिता कांग्रेस के लिए यह हो सकती है कि इससे पार्टी को नई पीढ़ी का नेतृत्व मिल सके। उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से पुराने और स्थापित चेहरों का प्रभाव रहा है। ऐसे में छात्र राजनीति से आने वाले नए नेताओं को आगे बढ़ाना पार्टी के लिए संगठनात्मक बदलाव का रास्ता खोल सकता है। लेकिन इसके लिए एनएसयूआई को केवल चुनावी पोस्टर और नारों से आगे बढ़ना होगा। परिसरों में छात्र समस्याओं पर लगातार संघर्ष, संवाद और संगठनात्मक उपस्थिति ही उसे स्थायी राजनीतिक ताकत दे सकती है।
एनएसयूआई ने अगर छात्र राजनीति के मैदान में अपना झंडा गाड़ा है तो अब असली परीक्षा उसे टिकाए रखने की है। छात्रसंघ चुनाव में जीत हासिल करना एक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उसे विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक ऊर्जा में बदलना अलग चुनौती है। 2027 की सियासत में बेरोजगारी, भर्ती, पलायन, शिक्षा और युवाओं की भागीदारी जैसे मुद्दे निर्णायक हो सकते हैं। ऐसे में एनएसयूआई कांग्रेस के लिए युवा असंतोष को राजनीतिक संगठन में बदलने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता का रास्ता भले ही विधानसभा से होकर गुजरता हो, लेकिन उस रास्ते की पहली राजनीतिक सीढ़ी विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के परिसर भी बन सकते हैं और कांग्रेस ने शायद इसी सियासी गणित को पढ़ते हुए छात्र राजनीति के मैदान में अपना झंडा पहले ही गाड़ने की तैयारी शुरू कर दी है।
कांग्रेस को लगा ‘सियासी’ नेत्र रोग
विकास दिखता तो दुष्प्रचार की जरूरत नहीं पड़ती
भाजपा का पलटवार-जमीन पर चहुंमुखी विकास
कांग्रेस को उपलब्धियां नजर नहीं आ रहीं आजकल
सुविधाएं पहुंचाने को बताया सरकार का मूल मंत्र
देहरादून। कांग्रेस के लगातार सरकार पर हमलावर होने के बीच भाजपा ने पलटवार करते हुए विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को अब राजनीतिक नेत्र रोग हो गया है। यही वजह है कि उसे जमीन पर दिखाई दे रहा चहुंमुखी विकास नजर नहीं आ रहा। भाजपा के अनुसार प्रदेश में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, कनेक्टिविटी, रोजगार, महिला सशक्तीकरण, पर्यटन और आधारभूत ढांचे से जुड़े क्षेत्रों में लगातार काम हो रहा है, लेकिन कांग्रेस इन उपलब्धियों को देखने के बजाय राजनीतिक चश्मे से केवल कमियां तलाशने में जुटी है।
भाजपा का कहना है कि विपक्ष का काम सवाल उठाना है, लेकिन सवाल और दुष्प्रचार में अंतर होता है। कांग्रेस यदि सरकार के कामकाज पर तथ्य आधारित सवाल उठाती है तो सरकार उसका जवाब देने के लिए तैयार है, लेकिन हर विकास कार्य को नकारना और हर उपलब्धि में राजनीति तलाशना जनता को गुमराह करने की कोशिश है। भाजपा का दावा है कि वह कांग्रेस की इस रणनीति का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि अपनी विकास की लकीर को और लंबा करके देगी।
भाजपा ने अपने राजनीतिक नैरेटिव के केंद्र में समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को रखा है। पार्टी का कहना है कि विकास का वास्तविक पैमाना केवल बड़े प्रोजेक्ट और चमकती सड़कें नहीं हैं, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ उस व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं, जिसके पास संसाधन सबसे कम हैं। भाजपा के अनुसार गरीब, किसान, महिला, युवा, बुजुर्ग और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक सुविधाओं और योजनाओं की पहुंच बढ़ाने पर सरकार का जोर है। पार्टी इसे महज चुनावी घोषणा नहीं बल्कि शासन की कार्यशैली का हिस्सा बता रही है।
भाजपा का सीधा आरोप है कि कांग्रेस विकास के सवाल को राजनीतिक संघर्ष में बदलने की कोशिश कर रही है। पार्टी का कहना है कि विपक्ष को प्रदेश में हो रहे काम दिखाई देने चाहिए, लेकिन कांग्रेस का पूरा फोकस सरकार की आलोचना पर है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि यदि विपक्ष सरकार की किसी योजना में कमी बताता है तो उस पर चर्चा हो सकती है, लेकिन हर काम को नकार देना प्रदेश की जनता के साथ भी अन्याय है। पार्टी का कहना है कि जनता अब दावों से अधिक काम को देख रही है और आने वाले समय में वही राजनीतिक फैसला करेगी।
हालांकि कांग्रेस सरकार के इन दावों को स्वीकार करने के बजाय बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, मूल निवास और भू-कानून जैसे मुद्दों पर सरकार को लगातार घेर रही है। विपक्ष का तर्क है कि केवल योजनाओं की घोषणा और बड़े विकास प्रोजेक्टों से जनता की समस्याएं खत्म नहीं होतीं। ऐसे में भाजपा का चहुंमुखी विकास वाला दावा कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती है तो कांग्रेस के लगातार सवाल भाजपा के लिए जवाबदेही की कसौटी।
यही वजह है कि उत्तराखंड की सियासत अब एक दिलचस्प मुकाम पर पहुंचती दिखाई दे रही है। एक तरफ भाजपा विकास कार्यों को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस सरकार के दावों की जमीन पर पड़ताल करने और कमियां गिनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। भाजपा का संकेत साफ है कि वह कांग्रेस के हर आरोप का जवाब देने में अपनी राजनीतिक ऊर्जा खर्च करने के बजाय विकास को अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाना चाहती है। पार्टी का मानना है कि चुनावी राजनीति में सबसे प्रभावी जवाब वही है, जिसे जनता अपनी आंखों से देख सके और अपने जीवन में महसूस कर सके।
इसी सोच के तहत भाजपा कांग्रेस के आरोपों को दुष्प्रचार बताते हुए अपनी उपलब्धियों को गांव, गरीब और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। पार्टी का दावा है कि उसकी राजनीति का लक्ष्य विपक्ष की लकीर छोटी करना नहीं, बल्कि अपनी लकीर इतनी बड़ी करना है कि विरोधियों के आरोप उसके सामने बौने साबित हों। सियासी संदेश साफ है- कांग्रेस जहां सरकार के काम पर सवालों की रोशनी डाल रही है, वहीं भाजपा जनता के बीच विकास के कामों की तस्वीर लेकर जाने की तैयारी में है। अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि 2027 की चुनावी चौखट पर जनता को किसकी तस्वीर ज्यादा साफ दिखाई देती है कि विपक्ष के सवालों की या सत्ता के विकास दावों की।
शुक्रवार, 11 सितंबर 2026
udaydinmaan: ‘जेन-जी’ की ताकत से बदल दी ‘सियासत’
udaydinmaan: ‘जेन-जी’ की ताकत से बदल दी ‘सियासत’: अब देशभर में नेता युवाओं की चौखट पर दे रहे हैं दस्तक नेपाल से उठी आवाज ने दुनिया के नेताओं को दिया नया संदेश सत्ता की राजनीति में सोशल मीडिय...
‘जेन-जी’ की ताकत से बदल दी ‘सियासत’
अब देशभर में नेता युवाओं की चौखट पर दे रहे हैं दस्तक
नेपाल से उठी आवाज ने दुनिया के नेताओं को दिया नया संदेश
सत्ता की राजनीति में सोशल मीडिया पीढ़ी की बढ़ती दखल
देहरादून। जिस जेन-जी को कुछ साल पहले तक राजनीति से दूर, मोबाइल और सोशल मीडिया में उलझी पीढ़ी माना जाता था, आज वही पीढ़ी सत्ता के गलियारों में सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी है। नेपाल में युवाओं के आक्रोश और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ उठी आवाज ने जिस तरह सत्ता को चुनौती दी, उसने सिर्फ पड़ोसी देशों की राजनीति को नहीं झकझोरा, बल्कि दुनिया के राजनीतिक दलों को भी अपने भविष्य की रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। संदेश साफ हैकृअब नेता सिर्फ मंच से युवाओं को संबोधित करके काम नहीं चला सकते, उन्हें जेन-जी की चौखट तक जाना होगा।
नेपाल का घटनाक्रम इस बदलाव का सबसे ताजा उदाहरण है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, राजनीतिक अस्थिरता और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर युवाओं की नाराजगी ने पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दी। सोशल मीडिया के जरिए तेजी से संगठित होने वाली इस पीढ़ी ने दिखा दिया कि चुनावी राजनीति में संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन डिजिटल दौर में असंतोष की गति और उसकी पहुंच उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। जेन-जी को लंबे समय तक राजनीतिक दलों के लिए भविष्य का वोट बैंक माना जाता रहा। लेकिन नेपाल सहित विभिन्न देशों के घटनाक्रम ने इस धारणा को बदल दिया है। यह पीढ़ी अब सिर्फ वोट देने वाली नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दे तय करने, सरकार से सवाल पूछने और नेताओं की सार्वजनिक छवि बनाने-बिगाड़ने वाली ताकत बनती जा रही है।
यही कारण है कि राजनीतिक दलों की भाषा भी बदल रही है। नेताओं के भाषणों में रोजगार, डिजिटल स्वतंत्रता, शिक्षा, पारदर्शिता, भ्रष्टाचार और अवसर जैसे मुद्दों की जगह बढ़ रही है। राजनीतिक अभियान भी अब केवल रैलियों और पोस्टरों तक सीमित नहीं हैं। इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक, एक्स और अन्य डिजिटल मंच राजनीतिक संवाद के नए अखाड़े बन चुके हैं। जेन-जी की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह सिर्फ घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होती। वह सवाल पूछती हैकृकब? कैसे? किसके लिए? और जवाबदेही किसकी?
युवा पीढ़ी पारंपरिक राजनीतिक भाषणों और जुमलों की बजाय सीधे परिणाम देखना चाहती है। यही वजह है कि सत्ता में बैठे नेताओं के लिए अब सोशल मीडिया सिर्फ प्रचार का माध्यम नहीं रह गया है। वहां हर निर्णय की तत्काल प्रतिक्रिया होती है और राजनीतिक संदेश कुछ ही घंटों में व्यापक जनमत का रूप ले सकता है। इस बदलाव ने नेताओं के सामने नई मजबूरी पैदा की है। उन्हें अब जेन-जी को सिर्फ चुनाव के समय याद करने के बजाय लगातार उसके साथ संवाद करना पड़ रहा है।
नेपाल में जेन-जी की राजनीतिक सक्रियता ने दक्षिण एशिया में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया हैकृकि क्या आने वाले चुनावों में युवा असंतोष पारंपरिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रहा है? भारत समेत कई देशों में राजनीतिक दल पहले ही युवा मतदाताओं को साधने के लिए डिजिटल अभियान, युवा संवाद और सोशल मीडिया केंद्रित राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं। लेकिन नेपाल के घटनाक्रम ने इस रणनीति को और गंभीर बना दिया है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नेता युवाओं तक कैसे पहुंचेंगे। असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल जेन-जी के सवालों का जवाब देने के लिए अपने पुराने राजनीतिक तौर-तरीके बदलने को तैयार हैं?
इस पीढ़ी की अपेक्षा केवल रोजगार या विकास योजनाओं तक सीमित नहीं है। वह निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी, पारदर्शिता, संस्थाओं की जवाबदेही और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई चाहती है। वह यह भी चाहती है कि राजनीति में उसकी आवाज केवल चुनावी आंकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि नीति निर्माण में दिखाई दे। यही वह बिंदु है जहां पारंपरिक राजनीति और जेन-जी के बीच सबसे बड़ा टकराव दिखाई देता है। राजनीतिक दल जहां संगठन, नेतृत्व और सत्ता के पुराने ढांचे के जरिए राजनीति को देखते हैं, वहीं जेन-जी अधिक विकेंद्रित, त्वरित और सवाल पूछने वाली राजनीति की तरफ बढ़ रही है।
नेपाल की घटनाओं ने भारत के राजनीतिक दलों को भी एक संकेत दिया है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में जहां बड़ी संख्या में युवा रोजगार, पलायन, शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं और स्थानीय अवसरों को लेकर सवाल उठाते हैं, वहां जेन-जी की भूमिका आने वाले चुनावों में महत्वपूर्ण हो सकती है। 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे दलों के लिए भी यह महज सोशल मीडिया अभियान का विषय नहीं है। युवा मतदाता क्या सोच रहा है, वह किस मुद्दे पर नाराज है और वह राजनीतिक दलों से क्या अपेक्षा करता हैकृयह चुनावी रणनीति का केंद्रीय सवाल बन सकता है। अब नेताओं की चौखट पर जेन-जी को बुलाने का दौर खत्म होता दिख रहा है। जेन-जी की चौखट पर नेताओं के पहुंचने का दौर शुरू हो चुका है।
इतिहास बनाम अस्मिता की जंग
नितिन नवीन के हमले के बाद कांग्रेस का पलटवार
विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ गया राजनीतिक पारा
भाजपा अध्यक्ष ने कांग्रेस के इतिहास पर उठाए सवाल
कांग्रेस पार्टी ने भाजपा से घटना पर सीधा जवाब मांगा
देहरादून। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच शुरू हुआ विवाद अब सीधे राजनीतिक टकराव में बदल गया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने हल्द्वानी पहुंचकर कांग्रेस पर दलितों के अपमान का आरोप लगाया और कहा कि जिस कांग्रेस का इतिहास दलितों के अपमान का रहा हो, वह सम्मान की बात नहीं कर सकती।
नितिन नवीन के इस हमले पर कांग्रेस ने पलटवार करते हुए सवाल खड़ा किया है कि मुद्दा कांग्रेस के इतिहास का है या हल्द्वानी में खरगे की सभा के बाद हुए शुद्धिकरण का? कांग्रेस का कहना है कि भाजपा को इतिहास के पन्ने पलटने के बजाय पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि सार्वजनिक मंच का शुद्धिकरण किस मानसिकता और संदेश के साथ किया गया।
विवाद अब केवल एक कार्यक्रम के बाद किए गए धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे दलित अस्मिता और संवैधानिक समानता से जोड़ रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस पर इस प्रकरण को राजनीतिक रंग देने और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है। इससे आगामी विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच वैचारिक टकराव और तेज हो गया है। नितिन नवीन ने प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के दौरान कांग्रेस पर हमला बोलते हुए शुद्धिकरण विवाद को कांग्रेस के दलित विरोधी इतिहास से जोड़ने की कोशिश की। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाकर समाज को बांटने का प्रयास कर रही है। लेकिन कांग्रेस ने भाजपा के इस तर्क को मुद्दे से भटकाने की कोशिश करार दिया है। पार्टी का कहना है कि अगर घटना गलत नहीं थी तो जांच और जवाबदेही से भाजपा को परेशानी क्यों हो रही है?
कांग्रेस का हमला सीधा हैकृखरगे के मंच पर शुद्धिकरण क्यों हुआ? इसके पीछे कौन था? इसका संदेश क्या था? कांग्रेस पहले ही इस घटना को सामाजिक भेदभाव और दलित सम्मान से जोड़कर विरोध दर्ज करा चुकी है। पार्टी ने देहरादून में प्रदर्शन किया और मामले में कार्रवाई की मांग की। मामले में पुलिस ने प्राथमिकी भी दर्ज की है और जांच आगे बढ़ रही है। रिपोर्टों के अनुसार प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून की धारा भी लगाई गई है।
यही इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष है। धार्मिक आस्था का सम्मान लोकतंत्र की बुनियादी भावना है, लेकिन आस्था के नाम पर किसी व्यक्ति या समुदाय की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने का आरोप लगे तो सवाल संवैधानिक समानता तक पहुंचता है। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने फिलहाल पुलिस को मामले की जांच करने देने का रास्ता अपनाया है और राज्य सरकार की ओर से महत्वपूर्ण इलेक्ट्रानिक साक्ष्य सुरक्षित रखने का आश्वासन दर्ज किया गया है। इसलिए राजनीतिक बयानबाजी के बीच असली कसौटी अब जांच होगी। कौन सही है, कौन गलतकृइसका फैसला नारों और मंचों से नहीं, तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए।
2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच हल्द्वानी का यह विवाद भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन चुका है। भाजपा इसे कांग्रेस की कथित तुष्टीकरण और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ मुद्दा बना रही है, जबकि कांग्रेस इसे भाजपा की कथित जातिवादी और सामाजिक विभाजन की राजनीति के उदाहरण के रूप में पेश कर रही है। यानी रामलीला मैदान अब सिर्फ एक मैदान नहीं रहाकृवह भाजपा और कांग्रेस के बीच वैचारिक और चुनावी संघर्ष का नया अखाड़ा बन गया है। सवाल अब यह नहीं कि कौन किस पर कितना बड़ा आरोप लगाता है। सवाल यह है कि राजनीति आस्था की रक्षा के नाम पर आगे बढ़ेगी या संविधान की समानता को केंद्र में रखकर? हल्द्वानी का जवाब आने वाले चुनावी विमर्श की दिशा तय कर सकता है।
‘पालिटिकल लैब’ में बिछाई हैट्रिक के लिए ‘बिसात’
संगठन से सामाजिक समीकरण तक साधने की कोशिश की
कमजोर सीटों, युवा और बूथ प्रबंधन पर भाजपा की है नजर
कार्यसमिति के बहाने कुमाऊं में भाजपा ने खोला चुनावी मोर्चा
राष्ट्रीय अध्यक्ष का संदेशकृसंगठन की ताकत ही जीत की गारंटी
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 की चुनावी पटकथा लिखे जाने से पहले भाजपा ने कुमाऊं को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बना दिया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का हल्द्वानी दौरा इसी रणनीति का संकेत है। प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के मंच से संगठन को चुनावी मोड में लाने के साथ ही भाजपा ने कांग्रेस पर वैचारिक और राजनीतिक हमला भी तेज कर दिया। संदेश एकदम स्पष्ट हैकृभाजपा चुनाव का इंतजार करने के बजाय मैदान पहले ही अपने कब्जे में लेने की तैयारी कर रही है।
हल्द्वानी में नितिन नवीन की सक्रियता को केवल संगठनात्मक कार्यक्रम मानना राजनीतिक तौर पर अधूरा आकलन होगा। कुमाऊं में भाजपा के सामने सत्ता की हैट्रिक का लक्ष्य है तो कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को चुनावी पूंजी बनाने की कोशिश में है। ऐसे में राष्ट्रीय नेतृत्व का सीधे मैदान में उतरना बताता है कि भाजपा हर सीट, हर बूथ और हर सामाजिक समीकरण की नए सिरे से पड़ताल कर रही है।
भाजपा के लिए कुमाऊं का महत्व सीटों के आंकड़े से कहीं बड़ा है। यह क्षेत्र कांग्रेस की परंपरागत राजनीतिक जमीन भी रहा है और कई विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय समीकरण चुनाव का रुख बदलते रहे हैं। यही कारण है कि भाजपा अब संगठन की पकड़ को मजबूत करने के साथ-साथ उन सीटों पर भी फोकस बढ़ा रही है जहां मुकाबला आसान नहीं माना जाता। नितिन नवीन की मौजूदगी में संगठन को जो संदेश गया, उसका सार यही है कि अब टिकट केवल दावेदारी से नहीं, जमीन पर ताकत से तय होगा।
स्थानीय स्तर पर सक्रियता, बूथ की स्थिति, जनता के बीच स्वीकार्यता और संगठन के साथ तालमेलकृइन सभी कसौटियों पर नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता परखी जाएगी। यह संदेश मौजूदा विधायकों के लिए भी है और टिकट की कतार में खड़े नए चेहरों के लिए भी। भाजपा की चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू टिकट वितरण है। पार्टी पहले ही संगठनात्मक ढांचे को बूथ स्तर तक मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर जोर दे रही है। नितिन नवीन के दौरे ने इस रणनीति को और राजनीतिक वजन दिया है।
इसका सीधा अर्थ है कि 2027 में टिकट की दौड़ में केवल बड़े नाम पर्याप्त नहीं होंगे। पार्टी यह देखेगी कि कौन नेता अपने क्षेत्र में संगठन को कितना मजबूत कर सकता है और चुनावी मुकाबले में कितनी प्रभावी लड़ाई दे सकता है। यही समीकरण कई पुराने चेहरों के लिए चुनौती बन सकता है। हल्द्वानी में भाजपा अध्यक्ष का कांग्रेस पर हमला भी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। खासकर रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण विवाद के बीच दलित सम्मान और कांग्रेस के इतिहास को लेकर नितिन नवीन के बयान ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया। भाजपा ने जहां कांग्रेस को उसके राजनीतिक इतिहास के आईने में खड़ा करने की कोशिश की, वहीं कांग्रेस इस प्रकरण को सामाजिक सम्मान और संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर भाजपा पर पलटवार कर रही है। यानी हल्द्वानी का मैदान अब सिर्फ एक विवाद का केंद्र नहीं, बल्कि 2027 की राजनीतिक कथा गढ़ने का अखाड़ा बनता जा रहा है।
भाजपा की अगली चुनौती युवा मतदाता है। रोजगार, भर्ती परीक्षाएं, पलायन, शिक्षा और स्थानीय अवसरों से जुड़े सवाल उत्तराखंड की राजनीति में लगातार प्रभावी रहे हैं। नितिन नवीन के दौरे में युवा संवाद को महत्व दिया जाना बताता है कि पार्टी इस वर्ग को केवल चुनावी आंकड़े के तौर पर नहीं देख रही, बल्कि उसके असंतोष और अपेक्षाओं को समझने की कोशिश कर रही है। जिस युवा के हाथ में मोबाइल है, वही चुनावी नैरेटिव बदलने की क्षमता भी रखता है। भाजपा जानती है कि बूथ की मशीनरी और डिजिटल नैरेटिवकृदोनों को साथ साधे बिना अगला चुनाव आसान नहीं होगा।
कुमाऊं में पूर्व सैनिक परिवारों का प्रभाव भी चुनावी समीकरणों में महत्वपूर्ण है। ऐसे में पूर्व सैनिकों के साथ संवाद और संगठनात्मक सक्रियता को भी भाजपा की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। एक तरफ सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की तैयारी है, दूसरी तरफ संगठन को बूथ स्तर पर सक्रिय किया जा रहा है। यही वह माडल है, जिसके सहारे भाजपा सत्ता विरोधी संभावित लहर को संगठन की ताकत से काटना चाहती है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि भाजपा मैदान में है। चुनौती यह है कि भाजपा कितनी जल्दी मैदान में उतर गई है।
कांग्रेस अभी जहां मुद्दों और सरकार विरोधी माहौल को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा संगठनात्मक मशीनरी को चुनावी अभियान में बदलने में जुटी है। राष्ट्रीय नेतृत्व की लगातार सक्रियता भी इसी ओर संकेत कर रही है। कांग्रेस यदि भाजपा के खिलाफ केवल सरकार की नाकामियों का आरोप लगाकर चुनाव लड़ने की रणनीति बनाती है तो उसे भाजपा की जमीनी तैयारी का जवाब देने के लिए अपना संगठन भी उसी स्तर पर सक्रिय करना होगा।
नितिन नवीन का हल्द्वानी दौरा भाजपा की चुनावी तैयारी का सिर्फ एक पड़ाव नहीं, बल्कि कुमाऊं में 2027 की बिसात बिछाने का संकेत है। अब भाजपा की नजर सिर्फ सत्ता बचाने पर नहीं, उन सीटों पर भी है जहां कांग्रेस उसे चुनौती देने की तैयारी कर रही है। असली मुकाबला अब नारों का नहींकृबूथ, भरोसे और सामाजिक समीकरणों का होगा। कुमाऊं ने करवट ली तो उत्तराखंड का चुनावी गणित भी बदल सकता है।
इंटर्न डाक्टर्स के लिए खुशखबरी, वकीलों-खिलाड़ियों के लिए गुड न्यूज
धामी कैबिनेट की बैठक में 10 प्रस्ताव पास
मेडिकल इंटर्न का स्टाइपेंड को 25 हजार, खिलाड़ियों के लिए मिले 243 पद
कैबिनेट के फैसलों से स्वास्थ्य, खेल, न्याय व पर्यटन क्षेत्र को मिली बड़ी राहत
33 नए व्यायाम शिक्षक पद सृजित होंगे, सरकारी अधिवक्ताओं की फीस भी बढ़ेगी
मसूरी रोपवे के लिए गढ़वाल सभा को 972 वर्गमीटर भूमि लीज पर देने की मंजूरी
देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक संपन्न हो गई है। बैठक में कुल 10 महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर मुहर लगी है। विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड सरकार ने स्वास्थ्य, खेल, न्याय, शिक्षा, पर्यटन और प्रशासनिक सुधार से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों पर मुहर लगाई है। शुक्रवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में राजकीय मेडिकल कालेजों में एमबीबीएस इंटर्न का मासिक स्टाइपेंड 17 हजार से बढ़ाकर न्यूनतम 25 हजार रुपये करने का निर्णय लिया गया। वहीं खेल नीति के तहत अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को आउट ऑफ टर्न नियुक्ति देने के लिए विभिन्न विभागों में कुल 243 पदों पर नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया गया है। माध्यमिक शिक्षा विभाग में सहायक अध्यापक व्यायाम के 33 पदों को समर्पित करते हुए लेवल-6 में अपर सहायक अध्यापक व्यायाम के 33 नए पद सृजित करने को भी कैबिनेट ने मंजूरी दी है। इन पदों का उपयोग खेल प्रतिभाओं को आउट ऑफ टर्न सेवायोजन देने के लिए किया जाएगा।
कैबिनेट के निर्णयों की जानकारी देते हुए सूचना महानिदेशक बंशीधर तिवाड़ी ने बताया कि कैबिनेट ने न्यायिक क्षेत्र में भी बड़ा निर्णय लिया है। उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय नैनीताल और प्रदेश के अधीनस्थ न्यायालयों में आबद्ध सरकारी अधिवक्ताओं को दिए जाने वाले शुल्क की दरों के पुनर्निर्धारण को मंजूरी दी गई है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित सात सदस्यीय समीक्षा समिति के निर्णय के आधार पर अधिवक्ताओं की फीस बढ़ाने का प्रस्ताव स्वीकृत किया गया। उन्होंने बताया कि प्रदेश के पांच राजकीय मेडिकल कालेजों श्रीनगर, हल्द्वानी, देहरादून, हरिद्वार और अल्मोड़ा में एमबीबीएस तथा पीजी पाठ्यक्रम संचालित हो रहे हैं। इन मेडिकल कालेजों में वर्तमान में एमबीबीएस इंटर्न को 17 हजार रुपये प्रतिमाह स्टाइपेंड दिया जा रहा था। कैबिनेट ने इसे बढ़ाकर न्यूनतम 25 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मंजूरी दी है। सरकार का तर्क है कि प्रदेश के दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच मजबूत करने के लिए चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सकीय मानव संसाधन को प्रोत्साहित करना जरूरी है। स्टाइपेंड बढ़ाने का फैसला इंटर्न डाक्टरों के लिए सीधे आर्थिक राहत के साथ मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में सरकार की मानव संसाधन नीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इसके साथ ही खेल नीति-2021 के तहत अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय खेलों में पदक विजेता खिलाड़ियों को प्रदेश में राजपत्रित और अराजपत्रित पदों पर आउट ऑफ टर्न सेवायोजन देने का प्रावधान है। कैबिनेट ने खेल विभाग, युवा कल्याण, गृह, परिवहन, शिक्षा और वन विभाग के अंतर्गत कुल 243 पदों पर नियुक्ति प्रदान किए जाने को मंजूरी दी है। यह निर्णय प्रदेश के उन खिलाड़ियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर राज्य का नाम रोशन करते हैं और सरकारी सेवाओं में अवसर की उम्मीद रखते हैं। सरकार ने खेल प्रतिभाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए खेल नीति में किए गए प्रावधान को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
इसके साथ ही खिलाड़ियों को आउट आफ टर्न नियुक्ति देने के लिए माध्यमिक शिक्षा विभाग में भी पदों का पुनर्गठन किया गया है। सहायक अध्यापक व्यायाम के लेवल-7 के कुल 1898 सृजित पदों में से 33 पद समर्पित करते हुए लेवल-6 में अपर सहायक अध्यापक व्यायाम के 33 पद सृजित किए जाएंगे। कैबिनेट के इस निर्णय से खेल प्रतिभाओं को सरकारी सेवा में समायोजित करने के लिए शिक्षा विभाग में नए अवसर उपलब्ध होंगे।
वहीं उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय नैनीताल और प्रदेश के अधीनस्थ न्यायालयों में सरकार की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ताओं की फीस की दरों के पुनर्निर्धारण को भी कैबिनेट ने हरी झंडी दे दी है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित सात सदस्यीय समीक्षा समिति ने शुल्क की दरों की समीक्षा की थी। समिति की बैठक में लिए गए निर्णय के आधार पर फीस बढ़ाने के प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दी। इससे लंबे समय से शुल्क पुनरीक्षण की प्रतीक्षा कर रहे शासकीय अधिवक्ताओं को राहत मिलने की उम्मीद है।
व्यवसाय और नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने की दिशा में भी कैबिनेट ने कदम बढ़ाया है। विधिक माप विज्ञान अधिनियम-2009 के तहत उत्तराखंड विधिक माप विज्ञान नियमावली-2012 में संशोधन करते हुए उत्तराखंड विधिक माप विज्ञान नियमावली-2026 के प्रख्यापन को मंजूरी दी गई। केंद्र सरकार के ईज आफ डूइंग बिजनेस, अनुपालन में कमी और विश्वास आधारित नियामकीय व्यवस्था के तहत चल रहे सुधार कार्यक्रमों के अनुरूप यह संशोधन किया गया है। इसका उद्देश्य बाट-माप से संबंधित लाइसेंसिंग प्रक्रिया को सरल बनाना है। देहरादून के पुरुकुल गांव से मसूरी लाइब्रेरी चौक तक प्रस्तावित रोपवे परियोजना को लेकर भी कैबिनेट ने महत्वपूर्ण फैसला किया है। रोपवे परियोजना के अपर टर्मिनल प्वाइंट और पार्किंग निर्माण के लिए पर्यटन विभाग को प्राप्त भूमि पर पूर्व में गढ़वाल सभा मसूरी को लीज पर दी गई भूमि के बराबर 972 वर्गमीटर भूमि लीज पर देने की अनुमति दी गई है। यह 972 वर्गमीटर भूमि मसूरी में गढ़वाल मंडल विकास निगम की पार्किंग के लिए क्रय की गई भूमि में से दी जाएगी। निर्णय को रोपवे परियोजना से जुड़े भूमि प्रबंधन और स्थानीय संस्थाओं के साथ समन्वय की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कर्मचारी राज्य बीमा निगम के हरिद्वार स्थित चिकित्सालय के समीप चिन्हित 15 एकड़ भूमि को ईएसआई के निर्माण के लिए आवंटित करने का निर्णय भी कैबिनेट ने लिया है। इससे ईएसआई से जुड़े स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार का रास्ता खुलेगा। कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवा विभाग के ढांचे में भी बदलाव को मंजूरी मिली है। सुधारात्मक विंग के लिए अपर महानिरीक्षक कारागार का एक नवसृजित पद संवर्गीय ढांचे में शामिल किया जाएगा। इसके लिए उत्तराखंड कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवा विभाग समूह क एवं ख सेवा नियमावली-2026 में संशोधन को कैबिनेट ने मंजूरी दी है। सरकार के अनुसार इससे विभागीय ढांचे को मजबूत करने के साथ सुधारात्मक कार्यों को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।
उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग की वर्ष 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट को आगामी विधानसभा सत्र में सदन के पटल पर रखे जाने के प्रस्ताव को भी कैबिनेट ने स्वीकृति दी है। यह निर्णय विद्युत अधिनियम-2003 की धारा 105 के प्रावधानों के तहत लिया गया है। इसी तरह आयोग के वर्ष 2024-25 के वार्षिक लेखा विवरण को भी आगामी विधानसभा सत्र में विधानसभा के पटल पर रखने को मंजूरी दी गई है। इससे आयोग के कामकाज और वित्तीय विवरण को विधायिका के समक्ष प्रस्तुत करने की प्रक्रिया पूरी होगी।
बाक्स
कैबिनेट के प्रमुख फैसले
25 हजार रुपये एमबीबीएस इंटर्न का न्यूनतम मासिक स्टाइपेंड
243 पदकृ विभिन्न विभागों में पदक विजेता खिलाड़ियों के लिए आउट आफ टर्न नियुक्ति
33 पदकृ अपर सहायक अध्यापक व्यायाम के नए पद
972 वर्गमीटरकृ गढ़वाल सभा मसूरी के लिए लीज पर दी जाने वाली भूमि
15 एकड़कृ हरिद्वार में ईएसआई निर्माण के लिए भूमि आवंटन
1 पदकृ सुधारात्मक विंग में अपर महानिरीक्षक कारागार का नवसृजित पद
गुरुवार, 10 सितंबर 2026
udaydinmaan: दूनघाटी में पीजी का ‘काला’ कारोबार
udaydinmaan: दूनघाटी में पीजी का ‘काला’ कारोबार: बिना लाइसेंस वमानकों की अनदेखी के आरोपों ने खड़े किए हैं सवाल छात्र-छात्राओं से मोटी रकम वसूलने वाले संचालकों पर निगरानी कितनी पुलिस की चेकिं...
दूनघाटी में पीजी का ‘काला’ कारोबार
बिना लाइसेंस वमानकों की अनदेखी के आरोपों ने खड़े किए हैं सवाल
छात्र-छात्राओं से मोटी रकम वसूलने वाले संचालकों पर निगरानी कितनी
पुलिस की चेकिंग में सत्यापन और सीसीटीवी, पीजी नेटवर्क की चुनौती
सवाल यह कि राजधानी में कितने पीजी वास्तव में मानकों पर खरे उतरते
देहरादून। राजधानी देहरादून में पढ़ाई और रोजगार के लिए आने वाले युवाओं के लिए पीजी आवास बड़ी जरूरत बन चुके हैं, लेकिन इसी जरूरत ने एक बड़े कारोबार का रूप ले लिया है। शहर के कई इलाकों में मकानों और व्यावसायिक भवनों को पीजी में तब्दील कर दिया गया है। सवाल अब सिर्फ किराये और सुविधाओं का नहीं, बल्कि इन पीजी की वैधता, अग्निसुरक्षा, भवन क्षमता, पुलिस सत्यापन और संचालकों की जवाबदेही का है। पीजी कारोबार में बड़ी रकम घूम रही है, लेकिन इसके समानांतर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या हर संचालक जरूरी अनुमति और सुरक्षा मानकों का पालन कर रहा है? हालिया रिपोर्टों में देहरादून के कई पीजी में अग्निसुरक्षा से जुड़े नियमों की अनदेखी की शिकायतें सामने आई हैं। इनमें पर्याप्त निकासी व्यवस्था, अग्निशमन उपकरण और अन्य सुरक्षा उपायों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
राजधानी के शिक्षण संस्थानों और रोजगार केंद्रों के आसपास पीजी की मांग लगातार बनी हुई है। इसका सीधा फायदा संचालकों को मिलता है। एक ही भवन में कई कमरों को किराये पर देकर संचालक नियमित आय अर्जित करते हैं। लेकिन जिस भवन में दर्जनों युवक-युवतियां रह रहे हों, वहां फायर सेफ्टी, विद्युत सुरक्षा, आपातकालीन निकास, भवन की क्षमता और पुलिस सत्यापन जैसे मानक महज कागजी औपचारिकता नहीं हो सकते। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस पीजी में एक साथ बड़ी संख्या में लोग रह रहे हैं, उसकी सुरक्षा जांच आखिरी बार कब हुई?
पीजी में सुरक्षा की अनदेखी का खतरा केवल चोरी या अपराध तक सीमित नहीं है। आग, गैस रिसाव, शार्ट सर्किट अथवा भवन संबंधी दुर्घटना की स्थिति में भीड़भाड़ वाले भवन गंभीर खतरा बन सकते हैं। हाल ही में सेलाकुई के एक निजी छात्रावास में आग की घटना के बाद अग्निशमन विभाग की जांच में अनिवार्य अग्निशमन अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं होने तथा स्मोक डिटेक्टर और स्प्रिंकलर जैसी व्यवस्थाओं के अभाव की बात सामने आई थी। यह घटना राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में संचालित छात्रावासों तथा पीजी की सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक जांच की जरूरत को सामने लाती है।
सरकार और प्रशासन का रुख यह रहा है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले आवासीय और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई की जाएगी। देहरादून पुलिस ने अगस्त में प्रेमनगर क्षेत्र के पीजी और हास्टलों में चेकिंग अभियान चलाया। संचालकों को रहने वालों का शत-प्रतिशत पुलिस सत्यापन कराने और सीसीटीवी लगाने के निर्देश दिए गए। बाहरी लोगों के प्रवेश तथा अन्य गतिविधियों पर भी निगरानी बढ़ाने को कहा गया। प्रशासन इससे पहले दूसरे तरह के आवासीय व्यवसायों में भी कार्रवाई कर चुका है। मई 2026 में मानकों के विपरीत संचालित 96 होमस्टे के पंजीकरण निरस्त किए गए थे। निरीक्षण में कई जगह अग्निशमन उपकरणों की कमी जैसी खामियां भी मिली थीं। यानी सरकार का संदेश साफ हैकृमानकों से खिलवाड़ स्वीकार नहीं होगा।
सवाल यह है कि यदि होमस्टे के मामले में निरीक्षण और पंजीकरण निरस्तीकरण की कार्रवाई हो सकती है तो राजधानी के पीजी नेटवर्क की भी संयुक्त सुरक्षा जांच क्यों न हो? प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि देहरादून में कितने पीजी संचालित हैं, इनमें से कितने पंजीकृत हैं, कितनों के पास जरूरी अग्निसुरक्षा स्वीकृति है और कितने भवन अपनी स्वीकृत क्षमता के अनुरूप छात्रों को आवास दे रहे हैं। सिर्फ पुलिस सत्यापन और सीसीटीवी से पूरी समस्या का समाधान नहीं होगा। भवन सुरक्षा, अग्निसुरक्षा, स्वच्छता, विद्युत व्यवस्था, आपातकालीन निकास और किरायेदारों के रिकार्डकृसभी की एक साथ जांच जरूरी है।
राजधानी में पीजी अब महज मकान किराये पर देने का मामला नहीं रह गया है। यह हजारों विद्यार्थियों और कामकाजी युवाओं की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। इसलिए प्रशासन को पीजी संचालकों की सूची सार्वजनिक करने, नियमित निरीक्षण कराने और मानकों का उल्लंघन मिलने पर नोटिस से लेकर सीलिंग तक की कार्रवाई का स्पष्ट तंत्र बनाना चाहिए। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि पीजी से कितना पैसा कमाया जा रहा है। असली सवाल यह है कि उस पैसे के बदले वहां रहने वालों को कितनी सुरक्षा दी जा रही है। सरकार के सामने चुनौती यही हैकृराजधानी में पीजी कारोबार चले, लेकिन नियमों की कीमत पर नहीं।
बता दें कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जुलाई 2026 में देहरादून से जुड़े एक मामले में अग्निसुरक्षा कमियों के बावजूद फायर एनओसी जारी करने संबंधी जिलाधिकारी के आदेश को निरस्त किया था, जिससे अग्निसुरक्षा प्रमाणन में नियमों के पालन की गंभीरता सामने आती है।
भाजपा ने ‘महामंथन’ में परखी मिशन-2027 की ‘बिसात’
कोर कमेटी में संगठन से लेकर चुनावी रणनीति तक मंथन, सियासी जमीन मजबूत करने पर जोर
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी में प्रदेश नेतृत्व ने खंगाली चुनावी तैयारी
बूथ से लेकर विधानसभा स्तर तक संगठन की सक्रियता पर नजर, भाजपा का शक्ति प्रदर्शन भी अहम
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की उलटी गिनती के बीच हल्द्वानी भाजपा के महामंथन का केंद्र बन गया है। प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के बाद पार्टी की प्रदेश कोर कमेटी में संगठन की ताकत, चुनावी तैयारियों और आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों को लेकर मंथन ने साफ संकेत दिया है कि भाजपा अब चुनावी मोड में तेजी से आगे बढ़ रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी ने बैठक की अहमियत और बढ़ा दी है। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और संगठन के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में हुई बैठकों में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दे में बदलना और संगठन की जमीन को बूथ तक मजबूत रखना है। प्रदेश कार्यसमिति में मुख्यमंत्री, प्रदेश पदाधिकारी, जिलाध्यक्ष और विभिन्न मोर्चों-प्रकोष्ठों के पदाधिकारी शामिल हुए।
हल्द्वानी को बैठक के लिए चुनना अपने आप में राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। कुमाऊं की राजनीति में भाजपा की पकड़ मजबूत रही है, लेकिन कांग्रेस लगातार क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व का हल्द्वानी में बैठकर चुनावी तैयारियों की समीक्षा करना संगठन के लिए महत्वपूर्ण है। पार्टी पहले ही सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में कोर कमेटियों के गठन और स्थानीय मुद्दों, बूथ प्रबंधन तथा सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर काम शुरू कर चुकी है। यानी अब चुनाव की तैयारी केवल प्रदेश मुख्यालय तक सीमित नहीं रहने वाली। हर विधानसभा, हर मंडल और हर बूथ को चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाने की कवायद तेज होगी।
हल्द्वानी में यह बैठक ऐसे समय हुई है जब रामलीला मैदान के शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव तेज है। कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर भाजपा पर विभाजनकारी राजनीति का आरोप लगा रही है, जबकि भाजपा की ओर से कांग्रेस पर राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं को मुद्दा बनाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। ऐसे माहौल में राष्ट्रीय अध्यक्ष का हल्द्वानी पहुंचना केवल संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा। भाजपा के लिए यह कुमाऊं की राजनीतिक जमीन पर अपने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट दिशा देने का अवसर भी है। दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह इस विवाद को व्यापक जनमुद्दे में बदल पाती है या नहीं।
भाजपा के सामने 2027 में सबसे बड़ा सवाल सत्ता विरोधी माहौल को रोकने का होगा। सरकार विकास, रोजगार, निवेश, चारधाम, बुनियादी ढांचे और जनकल्याणकारी योजनाओं को अपनी उपलब्धियों के रूप में सामने रखेगी। विपक्ष बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, कानून-व्यवस्था और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। इसलिए कोर कमेटी की बैठक में केवल संगठन की समीक्षा पर्याप्त नहीं होगी। सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने और विपक्ष के आरोपों का राजनीतिक जवाब देने की रणनीति भी चुनावी सफलता का आधार बनेगी।
भाजपा की चुनावी रणनीति में बूथ प्रबंधन हमेशा से अहम रहा है। इस बार भी पार्टी का जोर बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने पर है। विधानसभा क्षेत्रवार कोर कमेटियों का गठन इसी रणनीति का हिस्सा है। अब सवाल यह है कि सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा और संगठन उस लाभार्थी तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच पाता है। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल चेहरों का चुनाव नहीं होगा। यह संगठन बनाम संगठन, बूथ बनाम बूथ और नैरेटिव बनाम नैरेटिव की लड़ाई भी होगी। 10 सितंबर को नितिन नवीन की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तावित सेवा संकल्प अभियान को लेकर भी बैठक होनी है। इसके बाद हल्द्वानी में पूर्व सैनिक सम्मेलन और रुद्रपुर में पंजाबी गौरव सम्मेलन का कार्यक्रम है। इससे भाजपा की रणनीति का एक और पहलू सामने आता हैकृकि संगठनात्मक गतिविधियों को सामाजिक संपर्क अभियानों से जोड़ना। यानी पार्टी चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही अपने संपर्क अभियान को व्यापक सामाजिक आधार देने की कोशिश में है।
हल्द्वानी की बैठक ने भाजपा के मिशन-2027 का संकेत जरूर दिया है, लेकिन असली परीक्षा बैठकों के बाद शुरू होगी। बैठक में रणनीति बन सकती है, लक्ष्य तय हो सकते हैं और संगठन को दिशा दी जा सकती है, लेकिन चुनाव जनता के बीच लड़ा जाएगा। भाजपा के सामने अब सवाल सिर्फ सत्ता बचाने का नहीं, बल्कि लगातार तीसरी जीत के लिए जनता के मन में अपने पक्ष का भरोसा कायम रखने का है। हल्द्वानी की बैठक से निकला संदेश साफ हैकृकि भाजपा चुनाव की तैयारी को अब अभियान में बदलने की ओर बढ़ रही है।
मिशन-2027 के लिए भाजपा का ‘हैट्रिक प्लान’
हैट्रिक के लिए भाजपा का प्लान तैयार, नितिन नवीन ने दिखाया जीत का रास्ता
जिताऊ चेहरों पर दांव और सामाजिक समीकरण साधने की बन गई है रणनीति
पूर्व सैनिकों और सिख समाज सम्मेलन के जरिए अब संपर्क बढ़ाने की कवायद
देहरादून। उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ भाजपा ने विधानसभा चुनाव-2027 की तैयारियों को निर्णायक मोड़ पर पहुंचा दिया है। हल्द्वानी में प्रदेश पदाधिकारी एवं विस्तारित कार्यसमिति की बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने संगठन को चुनावी मोड में पूरी ताकत के साथ उतरने का संदेश दिया। पार्टी ने सिर्फ सत्ता बरकरार रखने के बजाय हैट्रिक के साथ दो-तिहाई बहुमत की दिशा में बढ़ने का लक्ष्य रखा है।
नितिन नवीन का उत्तराखंड दौरा ऐसे समय हुआ है जब प्रदेश में चुनावी गतिविधियां तेज हो रही हैं। पार्टी नेतृत्व संगठन और सरकार दोनों के कामकाज की समीक्षा कर रहा है। भाजपा के लिए यह कवायद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 में उसे सत्ता विरोधी रुझानों, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दों पर विपक्ष के हमलों का सामना करना होगा। भाजपा के नए चुनावी रोडमैप में संगठन को नीचे तक सक्रिय करने पर विशेष जोर है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार नवीन ने मंडल के बजाय शक्ति केंद्र आधारित रणनीति के साथ चुनावी तैयारी का आह्वान किया। इसका मतलब साफ हैकृभाजपा चुनाव के अंतिम चरण का इंतजार करने के बजाय अभी से मतदाता संपर्क, संगठन विस्तार और बूथ प्रबंधन को मजबूत करना चाहती है। पार्टी के लिए असली चुनौती यही होगी कि प्रदेश नेतृत्व का संदेश प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र और प्रत्येक बूथ तक कितनी मजबूती से पहुंचता है।
भाजपा ने टिकट वितरण को लेकर भी संकेत स्पष्ट किए हैं। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के अनुसार पार्टी सर्वे के आधार पर जिताऊ चेहरों को प्राथमिकता देने की दिशा में आगे बढ़ रही है। पार्टी की ओर से कराए गए एक सर्वे में भाजपा को 55 सीटों पर बढ़त का दावा भी सामने आया है, हालांकि यह पार्टी का आंतरिक आकलन है, स्वतंत्र चुनाव परिणाम नहीं। यानी टिकट में सिफारिश से ज्यादा चुनाव जीतने की क्षमता को तरजीह देने का संदेश दिया जा रहा है।
भाजपा का चुनावी प्लान केवल संगठन तक सीमित नहीं है। नितिन नवीन के दौरे में पूर्व सैनिकों और सिख समाज से जुड़े कार्यक्रम भी रखे गए हैं। पूर्व सैनिक सम्मेलन में हजारों लोगों के शामिल होने की तैयारी की गई थी। यह संकेत है कि पार्टी अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाकर अपने समर्थन आधार को चुनाव से पहले और व्यापक करना चाहती है। संगठन मजबूत होने के बावजूद चुनाव जीतने के लिए सरकार के कामकाज को जनता के बीच प्रभावी ढंग से पहुंचाना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, निवेश, चारधाम, महिला कल्याण और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाएगी।
वहीं कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल इन्हीं क्षेत्रों में सरकार की कमियां गिनाकर सत्ता विरोधी माहौल बनाने की कोशिश करेंगे। यानी भाजपा की रणनीति का अगला चरण उपलब्धि बनाम आरोप की राजनीतिक लड़ाई होगा। हल्द्वानी में भाजपा का महामंथन ऐसे समय हुआ जब रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। मामला अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर जांच और कानूनी प्रक्रिया तक पहुंच चुका है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हाल में मामले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए पुलिस को जांच जारी रखने दिया। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती है कि वह चुनावी विमर्श को केवल विवादों तक सीमित न रहने दे और सरकार के कामकाज तथा संगठन की तैयारियों को केंद्र में रखे।
भाजपा के हैट्रिक प्लान ने विपक्ष के सामने भी चुनौती बढ़ा दी है। कांग्रेस जहां सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने में जुटी है, वहीं भाजपा चुनाव से काफी पहले संगठनात्मक तैयारी में बढ़त बनाने की कोशिश कर रही है। 2027 में मुकाबला केवल नारों का नहीं होगा, जिस दल का संगठन बूथ तक मजबूत होगा और जो मतदाता के रोजमर्रा के सवालों का विश्वसनीय जवाब दे पाएगा, उसके लिए बढ़त बनाना आसान होगा।
हल्द्वानी में भाजपा ने लक्ष्य बड़ा रखा हैकृहैट्रिक और दो-तिहाई बहुमत। संगठन के पास चुनावी मशीनरी का अनुभव भी है और सत्ता की ताकत भी। लेकिन चुनावी गणित सिर्फ संगठन से नहीं बनता। महंगाई, रोजगार, पलायन, भू-कानून, मूल निवास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे मतदाता के मन में क्या असर डालते हैं, यही भाजपा की रणनीति की असली परीक्षा होगी। नितिन नवीन ने पार्टी को जीत का लक्ष्य जरूर दे दिया है, लेकिन हैट्रिक का फैसला आखिरकार बूथ की मशीनरी नहीं, मतदाता की उंगली करेगी।
बाक्स
भाजपा के हैट्रिक प्लान के सूत्र
शक्ति केंद्र आधारित संगठन
जिताऊ उम्मीदवारों पर जोर
सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाना
पूर्व सैनिकों और सामाजिक समूहों से संपर्क
हैट्रिक के साथ दो-तिहाई बहुमत का लक्ष्य
2027 से पहले धार्मिक मुद्दों पर ‘महाभारत’
दुष्यंत गौतम के बयान को लेकर कांग्रेस ने भाजपा को सीधे निशाने पर लिया
सनातन और धार्मिक आस्था के सवाल पर दलों में तेज हुआ आरोप-प्रत्यारोप
हल्द्वानी शुद्धिकरण विवाद के बाद टीका प्रकरण ने बढ़ाया सियासी तापमान
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी तलवारें एक बार फिर खिंच गई हैं। हल्द्वानी के शुद्धिकरण विवाद के बाद अब दुष्यंत गौतम के टीका प्रकरण ने दोनों प्रमुख दलों को सीधे आमने-सामने ला खड़ा किया है। कांग्रेस ने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम की टिप्पणी को सनातन और धार्मिक आस्था का अपमान करार देते हुए भाजपा पर हमला बोला है। जवाब में भाजपा कांग्रेस की राजनीति और उसकी मंशा पर सवाल खड़े कर रही है। यानी विवाद अब सिर्फ एक नेता के बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भाजपा बनाम कांग्रेस की वैचारिक और राजनीतिक लड़ाई का नया मोर्चा बन गया है।
कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा धार्मिक प्रतीकों और सनातन की आस्था को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है। पार्टी ने गौतम के बयान को इसी राजनीतिक सोच का उदाहरण बताते हुए भाजपा से जवाब मांगा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सनातन करोड़ों लोगों की आस्था है और किसी राजनीतिक दल को इसे अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं है। भाजपा के लिए कांग्रेस का यह हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी 2027 के चुनाव में सनातन, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था को अपने व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की तैयारी में है। ऐसे में गौतम का बयान विपक्ष को भाजपा पर हमला करने का नया अवसर दे रहा है।
रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस पहले ही आमने-सामने हैं। कांग्रेस जहां इसे सामाजिक और धार्मिक अपमान से जोड़ रही है, वहीं भाजपा इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा विषय बता रही है। अब टीका विवाद ने दोनों दलों को फिर उसी बहस के बीच ला खड़ा किया है। कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का मुद्दा मिला है तो भाजपा के सामने अपने राजनीतिक नैरेटिव को बचाने की चुनौती है। इस पूरे घटनाक्रम को 2027 की चुनावी राजनीति से अलग करके देखना मुश्किल है। भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने और सरकार की उपलब्धियों के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी मुद्दों को धार देने में जुटी है। ऐसे में धार्मिक विवाद दोनों दलों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
कांग्रेस इन्हें ध्रुवीकरण और विभाजन की राजनीति के उदाहरण के रूप में पेश करेगी, जबकि भाजपा इन्हें सनातन और सांस्कृतिक अस्मिता के सम्मान के सवाल से जोड़कर जवाब देने की कोशिश करेगी। यही इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है। यदि भाजपा इसे धार्मिक आस्था का प्रश्न मानती है तो कांग्रेस इसे राजनीतिक इस्तेमाल का मामला बता रही है। इस तरह बहस अब इस बात पर नहीं रह गई कि टीका विवाद में किसने क्या कहा, बल्कि सवाल यह बन गया है कि क्या उत्तराखंड की 2027 की चुनावी लड़ाई विकास और जनसरोकारों से आगे बढ़कर आस्था और पहचान की राजनीति के इर्द-गिर्द सिमटने जा रही है?
कांग्रेस के लिए यह विवाद भाजपा को घेरने का मौका है। पार्टी बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, भू-कानून, मूल निवास और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों के साथ धार्मिक विवादों को भी अपने चुनावी अभियान में जोड़ना चाहती है। भाजपा के लिए चुनौती दूसरी है। उसे एक तरफ कांग्रेस के हमले का जवाब देना है और दूसरी तरफ यह संदेश भी बनाए रखना है कि सरकार का चुनावी एजेंडा विकास और सुशासन पर केंद्रित है। यानी टीका विवाद में असली लड़ाई बयान की नहीं, राजनीतिक नैरेटिव की है।
हल्द्वानी के शुद्धिकरण विवाद और अब टीका विवाद ने संकेत दे दिया है कि उत्तराखंड में चुनावी तापमान बढ़ने लगा है। आने वाले महीनों में ऐसे मुद्दों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव और तेज होने की संभावना है। जनता के सामने अब दोनों दलों की परीक्षा होगी कि वह धार्मिक और राजनीतिक विवादों के बीच रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और पहाड़ के विकास जैसे सवालों को कितना महत्व देते हैं। क्योंकि 2027 का चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं होगाकृयह इस बात की भी लड़ाई होगा कि उत्तराखंड की राजनीति का एजेंडा कौन तय करेगा।
बुधवार, 9 सितंबर 2026
udaydinmaan: एक प्रकरण, तीन एफआईआर
udaydinmaan: एक प्रकरण, तीन एफआईआर: उत्तराखंड में सियासत से सड़क तक पहुंचा विवाद 3 एफआईआर के कानूनी जाल में उलझा विवाद कांग्रेस का हल्लाबोल तो भाजपा का पलटवार सामाजिक मर्यादा बन...
चुनावी कसौटी पर उत्तराखंड
धामी के रिपोर्ट कार्ड से खिलेगा कमल या कांग्रेस बनाएगी सत्ता की राह
बीजेपी के काम का हिसाब बनाम कांग्रेस की 5 साल की घेराबंदी
दावों से नहीं, जनता के श्अनुभवश् से तय होगी 2027 की सरकार
शासन बनाम पांच साल की विपक्षी राजनीति, जनता मांगेगी हिसाब
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की जमीन तैयार होने लगी है और इसके साथ ही सियासी मुकाबले का सबसे बड़ा सवाल भी आकार लेने लगा हैकृभाजपा अपने पांच साल के शासन का हिसाब लेकर जनता के बीच जाएगी या कांग्रेस पांच साल की विपक्षी राजनीति को सत्ता की सीढ़ी बनाएगी? चुनाव में अब मुद्दों से ज्यादा यह कसौटी महत्वपूर्ण होगी कि जनता किसके दावों को अपने अनुभव के करीब पाती है। सत्तारूढ़ भाजपा के पास सबसे बड़ा हथियार सरकार का रिपोर्ट कार्ड होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी विकास परियोजनाओं, सड़क और कनेक्टिविटी, निवेश, रोजगार, महिला कल्याण, कानून-व्यवस्था और धार्मिक-आध्यात्मिक स्थलों के विकास को अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के सामने रखने की तैयारी में है।
भाजपा की रणनीति साफ है सरकार ने क्या किया, इसे बूथ स्तर तक पहुंचाया जाए। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा उसके अभियान की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। यदि भाजपा सरकार की योजनाओं और उनके वास्तविक लाभार्थियों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने में सफल रही तो विपक्ष के आरोपों की धार कमजोर करने में उसे मदद मिलेगी। लेकिन सत्ता के साथ जवाबदेही भी आती है। महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, पहाड़ों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा की स्थिति, सरकारी भर्तियों और स्थानीय स्तर पर विकास की गति जैसे सवालों पर भाजपा को विपक्ष के साथ-साथ जनता के सवालों का भी सामना करना पड़ेगा।
कांग्रेस की चुनौती और अवसर दोनों यहीं से शुरू होते हैं। विपक्ष के पास सरकार चलाने का पांच साल का रिकार्ड नहीं है, लेकिन उसके पास सरकार से पांच साल सवाल पूछने का रिकार्ड जरूर है। कांग्रेस बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महंगाई, पलायन, किसानों की समस्याओं, सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने की कोशिश करेगी। पार्टी का तर्क होगा कि सरकार के दावों और जमीन पर जनता के अनुभव में अंतर है। लेकिन कांग्रेस के सामने भी बड़ा सवाल हैकृपांच साल विपक्ष में रहते हुए उसने जनता के बीच कितनी मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार की? सिर्फ सरकार की कमियां गिनाना पर्याप्त नहीं होगा। कांग्रेस को यह भी बताना पड़ेगा कि सत्ता में आने पर वह क्या अलग करेगी। 2027 का चुनाव उसके लिए केवल भाजपा विरोध का चुनाव नहीं, बल्कि वैकल्पिक शासन माडल पेश करने की परीक्षा भी होगा।
उत्तराखंड का चुनाव हमेशा केवल बड़े राजनीतिक नारों से तय नहीं होता। पहाड़ में सड़क कब पहुंची, अस्पताल में डाक्टर है या नहीं, स्कूल में शिक्षक हैं या नहीं, युवा को रोजगार मिला या नहीं और गांव से पलायन रुका या नहींकृयह सवाल ज्यादा वजन रखते हैं। यही वजह है कि 2027 में सरकारी विज्ञापन बनाम विपक्षी आरोप की लड़ाई से आगे बढ़कर जमीन पर काम और जनता के अनुभव का मुकाबला होगा। भाजपा कहेगी कि उसने उत्तराखंड को नई दिशा दी, कांग्रेस कहेगी कि सरकार के दावे धरातल पर कमजोर हैं। जनता के सामने असली सवाल होगा कि इन दोनों दावों में सच्चाई कितनी है।
राज्य की 70 विधानसभा सीटों का चुनाव एक जैसा नहीं होगा। कुमाऊं और गढ़वाल, मैदान और पहाड़ तथा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के मुद्दे अलग-अलग हैं। कहीं सड़क और रोजगार बड़ा सवाल होगा तो कहीं वन कानून, जमीन, पर्यटन, कृषि और पलायन। ऐसे में दोनों दलों को प्रदेशव्यापी नैरेटिव के साथ विधानसभा स्तर का अलग चुनावी एजेंडा तैयार करना पड़ेगा। आखिरकार 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होगा। यह भाजपा के पांच साल के शासन और कांग्रेस के पांच साल के विपक्षी प्रदर्शन की संयुक्त परीक्षा भी होगा। भाजपा को बताना होगा कि उसने सत्ता में रहते हुए क्या बदला और कांग्रेस को साबित करना होगा कि वह सत्ता में आने के बाद क्या बदलेगी।
यही वह मोड़ होगा जहां चुनावी भाषणों से ज्यादा जनता का अपना अनुभव निर्णायक बनेगा। सरकार अपने काम का हिसाब देगी, विपक्ष अपने संघर्ष का, लेकिन अंतिम फैसला उत्तराखंड की जनता करेगी कि उसे अगले पांच साल के लिए किसकी कहानी पर भरोसा है।
एक प्रकरण, तीन एफआईआर
उत्तराखंड में सियासत से सड़क तक पहुंचा विवाद
3 एफआईआर के कानूनी जाल में उलझा विवाद
कांग्रेस का हल्लाबोल तो भाजपा का पलटवार
सामाजिक मर्यादा बनाम राजनीतिक दांव-पेच
कांग्रेस ने सामाजिक सौहार्द को बनाया मुद्दा
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में हल्द्वानी के कथित शुद्धिकरण प्रकरण ने अब नया मोड़ ले लिया है। एक आयोजन से शुरू हुआ विवाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर तीन अलग-अलग एफआईआर तक पहुंच गया है। मामला जितना कानूनी होता जा रहा है, उतना ही इसका राजनीतिक तापमान भी बढ़ रहा है। कांग्रेस जहां इसे सामाजिक सौहार्द और राजनीतिक मर्यादा से जोड़कर सरकार को घेर रही है, वहीं भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीतिक बेचौनी और मुद्दाविहीनता से जोड़ने की कोशिश कर रही है।
हल्द्वानी में कथित शुद्धिकरण कार्यक्रम के बाद विवाद ने तेजी पकड़ी। कार्यक्रम को लेकर दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग दावे सामने आए और देखते ही देखते मामला राजनीतिक मुद्दा बन गया। आरोप-प्रत्यारोप के बीच पुलिस तक शिकायतें पहुंचीं और प्रकरण में तीन एफआईआर दर्ज होने से विवाद की गंभीरता बढ़ गई। अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया कि कार्यक्रम में क्या हुआ था, बल्कि सवाल यह भी है कि इस पूरे प्रकरण में कानून-व्यवस्था, राजनीतिक जिम्मेदारी और सामाजिक सौहार्द की सीमाएं कहां तय होंगी?
एक ही विवाद से जुड़े घटनाक्रम में तीन एफआईआर दर्ज होने के बाद राजनीतिक दलों के लिए पीछे हटना मुश्किल होता जा रहा है। कांग्रेस इसे अपने खिलाफ राजनीतिक कार्रवाई के रूप में देख रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और किसी को भी कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। एफआईआर की संख्या ने इस प्रकरण को सामान्य राजनीतिक बयानबाजी से निकालकर कानूनी जांच के दायरे में ला दिया है। अब आरोपों की राजनीतिक व्याख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण पुलिस जांच और उसके निष्कर्ष होंगे।
कांग्रेस ने मामले को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के विरोध-प्रदर्शनों ने इसे प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बना दिया है। कांग्रेस का प्रयास है कि इस प्रकरण को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक सवाल से जोड़कर भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाए। लेकिन कांग्रेस के सामने भी चुनौती है। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि आंदोलन कानूनी और लोकतांत्रिक विरोध की सीमा में रहे, ताकि मुद्दा मूल विवाद से हटकर कानून-व्यवस्था के सवाल में न बदल जाए।
भाजपा के सामने भी इस विवाद को संभालने की चुनौती कम नहीं है। सत्ता पक्ष के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पुलिस कार्रवाई निष्पक्ष दिखाई दे और किसी भी पक्ष को यह संदेश न जाए कि राजनीतिक दबाव जांच को प्रभावित कर रहा है। भाजपा यदि इस मामले को केवल कांग्रेस बनाम भाजपा के राजनीतिक संघर्ष के रूप में पेश करती है तो सामाजिक स्तर पर उठ रहे सवाल पीछे छूट सकते हैं। उसे यह स्पष्ट करना होगा कि कानून सबके लिए समान है और धार्मिक-सामाजिक भावनाओं से जुड़े मामलों में राजनीतिक संयम जरूरी है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोर पकड़ रही हैं। इसलिए इसकी राजनीतिक गूंज आने वाले महीनों में और बढ़ सकती है। कांग्रेस इसे सरकार के खिलाफ बड़े नैरेटिव में बदलने की कोशिश करेगी, जबकि भाजपा इसे कांग्रेस की रणनीति और राजनीतिक ध्रुवीकरण से जोड़ सकती है। लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष राजनीतिक दल नहीं, उत्तराखंड का सामाजिक ताना-बाना है। देवभूमि की राजनीति में धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता हमेशा महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में किसी भी तरह के कथित शुद्धिकरण, बहिष्कार या अपमान से जुड़े घटनाक्रम को राजनीतिक लाभ के लिए और भड़काना दोनों पक्षों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
तीन एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। अब जनता की नजर इस बात पर है कि जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और आरोपों की सच्चाई क्या सामने आती है। राजनीतिक मंचों पर बयानबाजी जारी रहेगी, लेकिन कानून का फैसला राजनीतिक नारों से नहीं, साक्ष्यों और जांच से होना चाहिए। एक घटना, तीन एफआईआर और बढ़ता राजनीतिक तापमानकृहल्द्वानी का यह प्रकरण अब सिर्फ स्थानीय विवाद नहीं रह गया है। यह 2027 की चुनावी राजनीति में सामाजिक सौहार्द, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक संयम की भी परीक्षा बनता दिखाई दे रहा है।
वर्षों का इंतजार और अंतहीन दर्द
विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने से पहले जनता का मूड सख्त
2027 से पहले उत्तराखंड के गांवों में चुनाव बहिष्कार की गूंज
मूलभूत समस्याओं के दर्द से उपजा अविश्वास बना जनता का हथियार
सड़क नहीं तो वोट नहीं के नारों से सुलग उठी 2027 की चुनावी सियासत
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तारीख का अभी ऐलान भी नहीं हुआ है, लेकिन प्रदेश के कई इलाकों में स्थानीय समस्याओं को लेकर चुनाव बहिष्कार की चेतावनियां सामने आने लगी हैं। सड़कों से लेकर पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार तक के सवालों पर नाराजगी अब सिर्फ शिकायतों तक सीमित नहीं रहना चाहती। गांवों और क्षेत्रों में उठती यह आवाज राजनीतिक दलों के लिए समय रहते चेतावनी भी है और आने वाले चुनाव का संकेत भी। राजनीतिक दल भले ही 2027 की चुनावी तैयारियों में जुटे हों, लेकिन जनता के एक हिस्से का सवाल सीधा हैकृजब पांच साल में समस्याएं दूर नहीं हुईं तो चुनाव के समय फिर वोट मांगने क्यों आएंगे?
स्थानीय स्तर पर सड़क, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, पेयजल, बिजली, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे वर्षों से उठते रहे हैं। कई जगह ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के सामने मांगें रखीं, ज्ञापन दिए और आंदोलन किए। जब समाधान नहीं मिला तो अब चुनाव बहिष्कार को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की चेतावनी दी जा रही है। यह स्थिति राजनीतिक दलों के लिए इसलिए गंभीर है क्योंकि चुनाव बहिष्कार का नारा अक्सर किसी एक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के प्रति नाराजगी को दर्शाता है।
उत्तराखंड में सड़क और पलायन का सवाल नया नहीं है। गांव खाली हो रहे हैं, युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं और कई दूरस्थ क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की कमी अब भी बड़ी चुनौती है। कहीं सड़क नहीं तो कहीं सड़क बनी है लेकिन बरसात में बंद हो जाती है। कहीं अस्पताल की इमारत है लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं। कहीं स्कूल है लेकिन पर्याप्त शिक्षक नहीं। ऐसे में विकास के बड़े दावों और स्थानीय हकीकत के बीच पैदा हुआ अंतर जनता की नाराजगी को बढ़ा रहा है। यही अंतर 2027 के चुनाव में सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन सकता है।
भाजपा सरकार अपनी उपलब्धियों के साथ जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है, जबकि कांग्रेस सरकार की कमियों को चुनावी मुद्दा बनाने में जुटी है। लेकिन चुनाव बहिष्कार की चेतावनियां दोनों दलों के लिए असहज करने वाली हैं। क्योंकि यदि जनता का एक वर्ग यह मानने लगे कि उसकी समस्याएं सत्ता बदलने से भी नहीं बदलेंगी, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति भरोसे का संकट पैदा होता है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि चुनाव केवल पोस्टर, रैलियों और नारों का आयोजन नहीं है। चुनाव से पहले जनता के बीच जाकर यह सुनना भी जरूरी है कि उसके गांव और मोहल्ले की सबसे बड़ी समस्या क्या है।
चुनाव बहिष्कार की चेतावनी लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर नहीं मानी जा सकती। लोकतंत्र में वोट जनता की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन जब जनता वोट न देने की बात करने लगे तो इसे केवल राजनीतिक धमकी मानकर खारिज करना भी खतरनाक होगा। इस आवाज के पीछे छिपे सवालों को सुनना होगा। क्यों लोग नाराज हैं? किस समस्या का समाधान नहीं हुआ? किस वादे पर भरोसा टूटा? और पांच साल बाद भी वही मुद्दा क्यों खड़ा है? इन सवालों के जवाब राजनीतिक दलों को चुनावी घोषणापत्र से पहले देने होंगे।
विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने में अभी वक्त है। राजनीतिक दल टिकट, गठबंधन और बूथ प्रबंधन में उलझने से पहले अगर जनता के इस शुरुआती संदेश को पढ़ लें तो शायद चुनाव के समय बहिष्कार की नौबत न आए। क्योंकि मतदान केंद्र तक पहुंचने से पहले ही यदि जनता सवाल लेकर सड़क पर उतर रही है, तो यह सिर्फ चुनावी नाराजगी नहींकृसत्ता और व्यवस्था के लिए चेतावनी की घंटी है। 2027 का चुनाव किसके पक्ष में जाएगा, यह बाद की बात है। फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि चुनाव की तारीख आने से पहले ही जनता क्यों कह रही हैकृपहले काम, फिर वोट।
मंगलवार, 8 सितंबर 2026
udaydinmaan: चुनाव ‘पास’ और मुद्दे ‘गायब’
udaydinmaan: चुनाव ‘पास’ और मुद्दे ‘गायब’: उत्तराखंड में पलायन और सड़कों पर भारी पड़ा मंच शुद्धिकरण का शोर भाजपा और कांग्रेस की जंग में जनता के असली सवाल हो गए अशुद्ध रोजगार, पलायन, आपद...
चुनाव ‘पास’ और मुद्दे ‘गायब’
उत्तराखंड में पलायन और सड़कों पर भारी पड़ा मंच शुद्धिकरण का शोर
भाजपा और कांग्रेस की जंग में जनता के असली सवाल हो गए अशुद्ध
रोजगार, पलायन, आपदा, स्वास्थ्य और पहाड़ की बदहाली पर खामोशी
देहरादून। उत्तराखंड चुनावी मोड में पहुंच चुका है और सियासत का पारा चढ़ने लगा है। लेकिन प्रदेश की राजनीति में इस वक्त जिस मुद्दे ने सबसे ज्यादा जगह घेर रखी है, वह रोजगार नहीं, पलायन नहीं, अस्पताल नहीं, सड़क नहीं और आपदा नहींकृबल्कि शुद्धिकरण है। हल्द्वानी में कथित मंच शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस जिस तरह आमने-सामने हैं, उससे एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा हैकृकि क्या उत्तराखंड के असली मुद्दे राजनीतिक दलों के लिए अब इतने छोटे हो गए हैं कि उन्हें चुनावी शोर में दबाया जा सके? एक तरफ कांग्रेस इस घटनाक्रम को सामाजिक सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर सरकार पर हमला बोल रही है।
दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस पर विवाद को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगा रही है। बयान पर बयान, प्रदर्शन पर प्रदर्शन और पलटवार पर पलटवार जारी है। यानी चुनावी मैदान तैयार हो रहा है और दोनों दलों के पास एक-दूसरे को घेरने के लिए नया हथियार भी मिल गया है। लेकिन इसी बीच पहाड़ का वह युवा कहां है जो नौकरी की तलाश में देहरादून, दिल्ली, चंडीगढ़ या मुंबई जाने को मजबूर है? वह किसान कहां है जिसे अपनी उपज का उचित बाजार चाहिए? वह पहाड़ी परिवार कहां है जिसके गांव में अस्पताल तो दूर, डॉक्टर तक नियमित नहीं पहुंचता? वह आपदा प्रभावित परिवार कहां है जिसका घर बरसात में उजड़ जाता है और मुआवजे के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं?इन सवालों का शुद्धिकरण की राजनीति में जवाब नहीं है।
उत्तराखंड की राजनीति का यह सबसे बड़ा विरोधाभास है। चुनाव करीब आते ही राजनीतिक दल जनता की भावनाओं से जुड़े प्रतीकों और विवादों को तेजी से पकड़ लेते हैं। कारण साफ हैकृऐसे मुद्दे तत्काल राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा करते हैं, समर्थकों को लामबंद करते हैं और सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक आसानी से दिखाई देते हैं। इसके मुकाबले बेरोजगारी पर बहस कठिन है। पलायन पर बहस में आंकड़े चाहिए। स्वास्थ्य व्यवस्था पर सरकार और विपक्ष दोनों को अपना रिकॉर्ड सामने रखना पड़ेगा। स्कूलों की स्थिति पर सवाल उठेंगे तो घोषणाओं और जमीन की हकीकत का फर्क सामने आएगा। आपदा प्रबंधन पर सवाल होंगे तो हर साल बारिश में होने वाली तबाही का हिसाब देना पड़ेगा। इसलिए शायद शुद्धिकरण पर लड़ना आसान है और व्यवस्था के शुद्धिकरण पर बहस करना मुश्किल।
सत्तारूढ़ भाजपा के लिए यह केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का मामला नहीं है। उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने शासन का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखने की है। सरकार को बताना होगा कि रोजगार के मोर्चे पर पिछले वर्षों में कितने स्थायी अवसर बने। कितने युवाओं को पहाड़ में ही रोजगार मिला। पलायन प्रभावित गांवों की तस्वीर कितनी बदली। स्वास्थ्य सुविधाओं में कितना सुधार हुआ। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क और शिक्षा की स्थिति कितनी बेहतर हुई। सिर्फ योजनाओं की घोषणा से चुनाव नहीं जीता जाता। जनता अब घोषणा नहीं, परिणाम पूछेगी। भाजपा यदि हर विवाद को कांग्रेस की राजनीति बताकर खारिज करती है तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जनता के मूल सवालों से उसका संवाद मजबूत रहे।
विपक्षी कांग्रेस के लिए भी रास्ता आसान नहीं है। सरकार को घेरने के लिए मुद्दा उठाना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह शुद्धिकरण विवाद से आगे निकलकर अपना व्यापक राजनीतिक एजेंडा जनता के सामने रख पाएगी? कांग्रेस को बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह रोजगार कैसे पैदा करेगी। पलायन रोकने के लिए उसकी नीति क्या होगी। पहाड़ की अर्थव्यवस्था को किस माडल से मजबूत करेगी। स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में क्या बदलेगा। सिर्फ भाजपा विरोध चुनावी विकल्प नहीं बनाता, विकल्प के लिए अपना रोडमैप भी चाहिए। यही वह जगह है जहां कांग्रेस को भावनात्मक मुद्दों के साथ ठोस नीतिगत मुद्दों को भी बराबर ताकत से उठाना होगा।
दरअसल यह विवाद सिर्फ एक मंच या शुद्धिकरण तक सीमित नहीं है। इसके पीछे 2027 की चुनावी राजनीति में नैरेटिव पर कब्जे की लड़ाई दिखाई दे रही है। भाजपा चाहती है कि चुनावी चर्चा सरकार के काम, विकास योजनाओं और उसके संगठनात्मक प्रदर्शन के इर्द-गिर्द रहे। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों के जरिए धार देना चाहती है। दोनों दलों को पता है कि चुनाव केवल आंकड़ों से नहीं, धारणा से भी जीते जाते हैं। यही कारण है कि आने वाले महीनों में ऐसे विवादों की संख्या बढ़ सकती है जो राजनीतिक रूप से तुरंत असर पैदा करते हैं।लेकिन इस नैरेटिव की राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान तब होगा, जब जनता के वास्तविक सवाल पीछे छूट जाएंगे।
राजनीतिक दल एक-दूसरे के मंचों और कार्यक्रमों की शुद्धता पर सवाल उठा रहे हैं। मगर उत्तराखंड की जनता इससे बड़ा सवाल पूछ सकती हैकृकि राजनीति का शुद्धिकरण कब होगा? भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कब होगी? भर्ती परीक्षाओं पर भरोसा कब मजबूत होगा? पहाड़ से पलायन कब रुकेगा? सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डाक्टर कब मिलेंगे?दूरस्थ गांवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कब पहुंचेगी? बरसात में हर साल सड़कें टूटने और गांवों के अलग-थलग पड़ने का स्थायी समाधान कब होगा? और सबसे बड़ा सवालकृ कि जिस पहाड़ को बचाने के नाम पर हर चुनाव में राजनीति होती है, उस पहाड़ में रहने वाले युवाओं का भविष्य कौन बचाएगा?
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सबसे बड़ा सवाल
भाजपा और कांग्रेस चाहे जितनी जोर से एक-दूसरे के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई लड़ें, लोकतंत्र में जनता को यह अधिकार है कि वह दोनों से पूछेकृआपकी लड़ाई किसके लिए है?यदि लड़ाई केवल एक-दूसरे को राजनीतिक रूप से कमजोर करने के लिए है तो जनता के सवाल फिर अनुत्तरित रह जाएंगे। उत्तराखंड को ऐसी राजनीति चाहिए जो मंच के शुद्धिकरण से आगे बढ़कर व्यवस्था के शुद्धिकरण की बात करे। ऐसी राजनीति चाहिए जो धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विवादों पर अपनी राय रखे, लेकिन साथ ही रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा जैसे सवालों से आंख न चुराए। क्योंकि चुनाव मंच कौन साफ करता है, इस पर नहींकृप्रदेश की व्यवस्था कौन साफ करेगा, इस पर होना चाहिए। और अगर भाजपा-कांग्रेस की सियासी जंग में जनता के सवाल ही गायब हो जाएं, तो फिर सबसे बड़ा सवाल यही है।
चुनावी हुंकार से पहले ‘म्यान’ से निकलीं तलवारें
हल्द्वानी शुद्धिकरण पर सामाजिक अस्मिता बनाम देवभूमि की साख की जंग
बार-बार नकारे जाने से बौखलाई कांग्रेस, देवभूमि को बदनाम करने में जुटी
भाजपा का पलटवारकृदलितों की नहीं, युवराज के झूठ को सच साबित करने की
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 की चुनावी जंग अभी औपचारिक रूप से शुरू भी नहीं हुई, लेकिन सियासी तलवारें म्यान से बाहर आ चुकी हैं। हल्द्वानी के कथित मंच शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच शुरू हुआ विवाद अब सीधे सियासी प्रतिष्ठा की लड़ाई में बदल गया है। कांग्रेस सड़क पर है तो भाजपा बयानबाजी के मोर्चे पर। कांग्रेस इसे सामाजिक सम्मान और दलित अस्मिता से जोड़ रही है, वहीं भाजपा ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया है कि बार-बार जनता द्वारा नकारे जाने से बौखलाई पार्टी देवभूमि को बदनाम करने की कोशिश कर रही है।
भाजपा ने कांग्रेस पर हमला और तीखा करते हुए कहा कि कांग्रेस को दलितों के सम्मान की चिंता नहीं, बल्कि अपने युवराज के कथित झूठ को सच साबित करने की चिंता है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस एक विवाद को राजनीतिक हथियार बनाकर उत्तराखंड के सामाजिक सौहार्द और देवभूमि की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रही है। यानी चुनावी मौसम आने से पहले ही उत्तराखंड में शुद्धिकरण बनाम राजनीतिक शुद्धता की नई जंग छिड़ गई है और इस जंग में सबसे दिलचस्प बात यह है कि दोनों प्रमुख दल एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने में इतने व्यस्त हैं कि प्रदेश के असली सवालों की आवाज लगातार धीमी पड़ती जा रही है।
भाजपा ने कांग्रेस के आंदोलन और उसके नेताओं के बयानों पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि यदि कांग्रेस को वास्तव में दलित समाज के सम्मान की चिंता है तो उसे राजनीतिक तमाशे के बजाय तथ्यों और कानून की प्रक्रिया पर भरोसा करना चाहिए। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस पूरे घटनाक्रम को अपनी राजनीतिक जरूरत के मुताबिक पेश कर रही है। पार्टी ने कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि विपक्ष को उत्तराखंड की जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर बात करने के बजाय ऐसा विषय मिल गया है, जिसके जरिए भावनाओं को भड़काकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा सकती है। भाजपा के निशाने पर कांग्रेस नेतृत्व भी है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर अपने शीर्ष नेतृत्व के कथित दावों को उत्तराखंड की घटना के सहारे सही साबित करने की कोशिश कर रही है। भाजपा का सीधा संदेशकृकांग्रेस को जनता ने नकार दिया है, इसलिए अब वह विवादों में राजनीतिक जमीन तलाश रही है।
दूसरी ओर कांग्रेस इस मुद्दे को हाथ से जाने देने के मूड में नहीं है। पार्टी इसे केवल एक स्थानीय विवाद मानने के बजाय सामाजिक सम्मान और संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर सरकार पर दबाव बना रही है। कांग्रेस का तर्क है कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय के सम्मान से जुड़ा सवाल उठाना राजनीति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। पार्टी सरकार से पूरे मामले पर जवाब और कार्रवाई की मांग कर रही है। कांग्रेस का आंदोलन इस बात का संकेत भी है कि पार्टी आगामी चुनाव से पहले सामाजिक मुद्दों को राजनीतिक लामबंदी के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है। यहीं से भाजपा और कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई देती है। भाजपाकृकांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक षड्यंत्र बताकर खारिज करना चाहती है। कांग्रेसकृइसी विवाद को सरकार के खिलाफ बड़े राजनीतिक अभियान में बदलना चाहती है। लेकिन असली सवाल कहीं और है...।
हल्द्वानी का विवाद राजनीतिक मंच पर जितना बड़ा हो गया है, उतना ही बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड के बाकी मुद्दे इसी शोर में दब जाएंगे? प्रदेश का बेरोजगार युवा नौकरी मांग रहा है। पहाड़ का गांव पलायन से खाली हो रहा है। बरसात में सड़कें टूट रही हैं। आपदा प्रभावित परिवार राहत और पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं अब भी चुनौती हैं। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं। कृषि और बागवानी से जुड़े लोग बाजार और बेहतर आय की मांग कर रहे हैं। महिलाएं स्थानीय स्तर पर रोजगार और सुरक्षित आजीविका चाहती हैं। लेकिन राजनीतिक मंच पर इस वक्त सबसे तेज आवाज किसकी है?कृशुद्धिकरण विवाद की। यही वह बिंदु है जहां जनता और राजनीति के बीच दूरी दिखाई देती है।
2027 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बनने जा रहा है। भाजपा सत्ता में वापसी के लिए अपना रिकार्ड और संगठन सामने रखेगी, जबकि कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करेगी। ऐसे में कोई भी ऐसा मुद्दा जो भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा कर सके, राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। शुद्धिकरण विवाद भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। कांग्रेस के लिए यह सरकार को घेरने का अवसर है। भाजपा के लिए कांग्रेस पर हमला करने का अवसर। लेकिन जनता के लिए? जनता के लिए सवाल यह है कि इससे उसके जीवन में क्या बदलेगा? क्या इससे रोजगार आएगा? क्या पलायन रुकेगा? क्या गांव में डाक्टर पहुंचेगा? क्या बरसात में सड़क बंद नहीं होगी? क्या युवाओं को घर के पास काम मिलेगा? इन सवालों का जवाब न भाजपा के आरोप में है, न कांग्रेस के आंदोलन में।
भाजपा ने जहां इसे देवभूमि की छवि से जोड़ दिया है, वहीं कांग्रेस इसे दलित सम्मान के सवाल के रूप में देख रही है। दोनों दलों के अपने राजनीतिक तर्क हैं। लेकिन यही वह जगह है जहां राजनीतिक बहस को सावधानी की जरूरत है। किसी घटना की जांच, दोष तय करना और कानून के अनुसार कार्रवाई करना अलग बात है। उसे चुनावी ध्रुवीकरण का हथियार बनाना अलग। उत्तराखंड की सामाजिक संरचना बेहद संवेदनशील है। इसलिए राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी बड़ी है। आरोप लगाना आसान है, सामाजिक भरोसा बचाना मुश्किल।
शुद्धिकरण विवाद ने एक और संकेत दे दिया हैकृ2027 का चुनाव केवल विकास के आंकड़ों की लड़ाई नहीं होगा। यह नैरेटिव की लड़ाई भी होगा। कौन जनता को यह समझाने में सफल होता है कि उसके सामने सबसे बड़ा खतरा क्या है? कौन यह साबित करता है कि असली मुद्दा क्या है? कौन विरोधी दल को जनता के सवालों से भटका हुआ साबित करता है? और कौन अपने पक्ष में सामाजिक समीकरण खड़ा करता है? यही आने वाले महीनों की राजनीति का केंद्रीय खेल होगा। भाजपा कांग्रेस को नकारात्मक और विवाद की राजनीति करने वाली पार्टी के रूप में पेश करेगी। कांग्रेस भाजपा को सत्ता के अहंकार और सामाजिक संवेदनशीलता की अनदेखी करने वाली सरकार के रूप में घेरने की कोशिश करेगी। यानी असली चुनाव से पहले ही किसका नैरेटिव चलेगा की लड़ाई शुरू हो चुकी है।
न दांव-पेच, न बयानबाजी
उत्तराखंड की सियासत में चुपचाप तीसरा विकल्प गढ़ने की होड़
शुद्धिकरण की लड़ाई से मिला खुला स्पेस, आप-यूकेडी की पैठ
बडे़ दलों की तकरार में छोटे दल तलाश रहे सूबे में सियासी जमीन
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनावी माहौल बनने लगा है। भाजपा और कांग्रेस हल्द्वानी के कथित शुद्धिकरण प्रकरण को लेकर आमने-सामने हैं। आरोप-प्रत्यारोप और प्रदर्शन के बीच आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल अपेक्षाकृत खामोशी से अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। यही इस समय प्रदेश की राजनीति का दिलचस्प पहलू हैकृ। दो बड़े दल एक-दूसरे से लड़ रहे हैं और छोटे दल जनता के बीच अपनी जगह तलाश रहे हैं। उत्तराखंड में 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ चुकी आप अब संगठन को मजबूत करने और भाजपा-कांग्रेस से अलग राजनीतिक विकल्प पेश करने की कोशिश में है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उसके निशाने पर हैं। लेकिन पहाड़ी राजनीति में केवल मुद्दे काफी नहीं। स्थानीय संगठन और भरोसेमंद नेतृत्व आप की सबसे बड़ी चुनौती हैं। अगर पार्टी इन्हें मजबूत कर पाती है तो वह कुछ सीटों पर मुकाबले को प्रभावित कर सकती है।
यूकेडी के पास उत्तराखंड आंदोलन की विरासत और पहाड़ के सवालों की राजनीतिक जमीन है। पलायन, रोजगार, जल-जंगल-जमीन और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार उसके पुराने मुद्दे हैं। मगर राज्य गठन के बाद पार्टी अपना जनाधार कायम नहीं रख सकी। 2027 उसके लिए राजनीतिक वापसी की बड़ी परीक्षा है। सवाल यह है कि क्या वह उत्तराखंडियत के मुद्दे को फिर से मतदाता की प्राथमिकता बना पाएगी?
शुद्धिकरण विवाद ने भाजपा-कांग्रेस को एक-दूसरे पर हमला करने का नया मौका दिया है। लेकिन इसी बीच बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और आपदा जैसे सवाल पीछे छूट रहे हैं। यहीं छोटे दलों के लिए राजनीतिक अवसर बनता है। युवा नौकरी पूछ रहा है, पहाड़ पलायन का जवाब मांग रहा है और गांव बुनियादी सुविधाओं की। अगर आप और यूकेडी इन सवालों को लगातार जमीन पर उठाते हैं तो भाजपा-कांग्रेस के बीच नाराज मतदाताओं के लिए विकल्प बनने की कोशिश कर सकते हैं।
फिलहाल आप या यूकेडी को भाजपा-कांग्रेस के बराबर खड़ा करना जल्दबाजी होगी। दोनों दलों के सामने संगठन, संसाधन और सीटों तक पहुंच बनाने की बड़ी चुनौती है। लेकिन चुनावी राजनीति में कुछ सीटों पर सीमित वोट भी बड़ा खेल बदल सकते हैं। यदि मुकाबला कई सीटों पर त्रिकोणीय हुआ तो दोनों प्रमुख दलों के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
2027 की लड़ाई अभी लंबी है, लेकिन राजनीतिक संकेत साफ हैं। भाजपा और कांग्रेस अगर एक-दूसरे को घेरने में ही उलझे रहे तो आप और यूकेडी के लिए जगह बन सकती है। फिलहाल यह जगह छोटी है, लेकिन चुनावी राजनीति में छोटा सियासी सुराख भी बड़े समीकरण बदल सकता है।
सोमवार, 7 सितंबर 2026
udaydinmaan: ‘शौर्य’ गाथा पर सियासी ‘ड्रामा’
udaydinmaan: ‘शौर्य’ गाथा पर सियासी ‘ड्रामा’: पांच साल तक क्यों अटका सैन्य धाम, 2021 में शिलान्यास, 2023 में पूरा होने का था लक्ष्य तारीखें बढ़ती गईं, लागत भी बढ़ी, अब चुनावी मौसम में फिर ...
‘शौर्य’ गाथा पर सियासी ‘ड्रामा’
पांच साल तक क्यों अटका सैन्य धाम, 2021 में शिलान्यास, 2023 में पूरा होने का था लक्ष्य
तारीखें बढ़ती गईं, लागत भी बढ़ी, अब चुनावी मौसम में फिर सुर्खियों में आ गई परियोजना
सैन्य परंपरा को समर्पित सैन्य धाम पांच साल से सत्ता के दावों और तारीखों के बीच झूल रहा
देहरादून। शहीदों की स्मृति और उत्तराखंड की सैन्य परंपरा को समर्पित देहरादून का सैन्य धाम पांच साल से सत्ता के दावों और तारीखों के बीच झूल रहा है। वर्ष 2021 में जिस परियोजना को दो साल के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, वह 2026 में भी राजनीतिक बहस के केंद्र में है। अब विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सैन्य धाम फिर चर्चा में है तो सवाल भी उतना ही सीधा है। कृअगर यह शहीदों को श्रद्धांजलि का प्रकल्प था तो इसे समय पर पूरा क्यों नहीं किया गया?
सैन्य धाम का शिलान्यास 2021 में किया गया था। बाद में गुनियालगांव में परियोजना को आगे बढ़ाया गया और दिसंबर 2021 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वहां दूसरा शिलान्यास किया। उस समय इसे करीब दो वर्ष में पूरा करने की बात कही गई थी। अगस्त 2022 में राज्यपाल के निरीक्षण के दौरान भी 2023 में सैन्य धाम पूरा करने का लक्ष्य बताया गया था।
लेकिन लक्ष्य की तारीख आती गई और निर्माण पूरा नहीं हुआ। सितंबर 2023 में सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी ने खुद निर्माण की धीमी गति पर नाराजगी जताई और अधिकारियों को उसी वर्ष दिसंबर तक काम पूरा करने के निर्देश दिए। जनवरी 2024 में भी निर्माण करीब 65 प्रतिशत पूरा होने की जानकारी सामने आई और काम दिन-रात चलाने के निर्देश दिए गए। इसके बाद 2024 में परियोजना की लागत को लेकर भी सवाल उठे। आरटीआई आधारित रिपोर्ट के अनुसार परियोजना की लागत 2022 में करीब 48 करोड़ रुपये से बढ़कर 99 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई। यानी देरी के साथ परियोजना की लागत में भी बड़ा उछाल आया।
सरकार की ओर से लगातार यह दावा किया जाता रहा कि सैन्य धाम जल्द प्रदेश को समर्पित किया जाएगा। अगस्त और अक्टूबर 2024 में निर्माण को तय समय में पूरा करने के निर्देश दिए गए। दिसंबर 2024 में भी अंतिम चरण के काम और फिनिशिंग का हवाला देते हुए इसे जल्द जनता को समर्पित करने की बात कही गई। यहीं से सैन्य धाम की कहानी सिर्फ निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि राजनीतिक सवाल भी बन जाती है।
2025 में भी इसके लोकार्पण को लेकर उम्मीदें जताई गईं। अक्टूबर 2025 में निरीक्षण के दौरान नौ नवंबर को राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री के संभावित दौरे के दौरान लोकार्पण का प्रस्ताव सामने आया था। लेकिन अब 2026 में चुनावी माहौल के बीच कांग्रेस ने फिर सरकार को घेरा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने पांच वर्ष की देरी, लागत बढ़ने और चुनावी लाभ के लिए परियोजना को इस्तेमाल किए जाने पर सवाल उठाए हैं।
सैन्य धाम उत्तराखंड के लिए महज एक भवन नहीं है। प्रदेश के हजारों परिवारों की सैन्य परंपरा, शहीदों की स्मृति और युवाओं के लिए प्रेरणा से जुड़ा यह प्रकल्प है। शहीद सम्मान यात्रा के माध्यम से शहीद परिवारों के आंगन की मिट्टी भी यहां लाई गई है। ऐसे में पांच साल की देरी स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करती है कि आखिर परियोजना की योजना, निर्माण और निगरानी में ऐसी कौन-सी अड़चनें थीं जिनके कारण निर्धारित समयसीमा बार-बार आगे बढ़ती रही।
2027 विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं हैं। ऐसे में सैन्य धाम का राजनीतिक महत्व भी बढ़ना स्वाभाविक है। भाजपा इसे सैनिक सम्मान और उत्तराखंड की सैन्य पहचान से जोड़ती रही है, जबकि कांग्रेस अब इसी परियोजना की देरी को सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार बना रही है। यानी आने वाले महीनों में सैन्य धाम सिर्फ शहीदों की स्मृति का केंद्र नहीं रहेगा। यह सत्ता बनाम विपक्ष के चुनावी नैरेटिव का भी बड़ा मैदान बन सकता है। असल सवाल यह नहीं कि सैन्य धाम किसके खाते में जाएगा। असली सवाल यह है कि जिस धाम की नींव शहीदों की स्मृति में रखी गई थी, उसे समय पर पूरा करने की राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति पांच साल तक कहां थी? और अब जब चुनाव सामने हैं, तो सवाल और तीखा हो गया है। क्या सैन्य धाम की रफ्तार सचमुच शहीदों के सम्मान से बढ़ी है या चुनाव की घड़ी ने इसकी गति बढ़ाई है?
गाँव-गाँव में शहीद, शहर में अटका धाम
सैन्य धाम की नींव से चुनावी चर्चा तक पहुंचा सफर
तय समय बीता, तारीखें बदलीं और बढ़ती गई लागत
चुनाव से पहले सैन्य धाम फिर सियासत के केंद्र में
देहरादून। उत्तराखंड की पहचान अगर किसी एक शब्द से सबसे गहराई से जुड़ती है तो वह हैकृसैन्य परंपरा, जिस प्रदेश के हर गांव से सैनिक निकलते हैं और जिसके हजारों परिवारों का रिश्ता सेना से जुड़ा है, उसी प्रदेश में शहीदों की स्मृति में बनने वाला सैन्य धाम पांच साल से निर्माण, घोषणाओं और लोकार्पण की तारीखों के बीच उलझा हुआ है। अब विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सैन्य धाम एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है, जिस परियोजना को शहीदों के सम्मान का प्रतीक बताया गया, उसे समय पर पूरा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति पांच साल तक क्यों नहीं दिखाई दी?
सैन्य धाम का शिलान्यास वर्ष 2021 में हुआ। उस समय परियोजना को लेकर बड़े दावे किए गए। इसे उत्तराखंड के सैनिकों और शहीद परिवारों के सम्मान से जोड़ा गया और जल्द पूरा करने का लक्ष्य सामने रखा गया। बाद में निर्माण स्थल पर दूसरा शिलान्यास भी हुआ। 2023 तक परियोजना पूरी करने की समयसीमा बताई गई। लेकिन समयसीमा गुजर गई और धाम तैयार नहीं हुआ।
इसके बाद हर साल नई उम्मीद और नई तारीख सामने आती रही। कभी निर्माण में तेजी लाने के निर्देश दिए गए, कभी अधिकारियों को समयबद्ध तरीके से काम पूरा करने को कहा गया। निरीक्षण हुए, समीक्षा बैठकें हुईं और जल्द लोकार्पण के दावे किए गए। मगर सैन्य धाम का इंतजार खत्म नहीं हुआ। सवाल यह है कि पांच साल में ऐसा क्या नहीं हो सका, जो एक महत्वपूर्ण और राजनीतिक रूप से प्राथमिकता वाली परियोजना में होना चाहिए था?
सैन्य धाम की कहानी सिर्फ देरी तक सीमित नहीं है। परियोजना की लागत में वृद्धि ने भी सवाल खड़े किए। शुरुआती अनुमान के मुकाबले लागत बढ़ने की खबरें सामने आईं। यानी परियोजना जितनी लंबी खिंचती गई, उसके साथ सरकारी खजाने पर बोझ भी बढ़ता गया। यहां विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिला। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सैन्य धाम को शहीदों के सम्मान के बजाय राजनीतिक परियोजना बना दिया गया। भाजपा स्वाभाविक रूप से इसे सैनिक सम्मान और राष्ट्रवाद से जोड़कर देखती रही। यही वह बिंदु है जहां शहीदों की स्मृति और चुनावी राजनीति एक-दूसरे के सामने खड़ी दिखाई देती हैं।
2027 विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं हैं। उत्तराखंड में सैनिक परिवार और पूर्व सैनिक बड़ा सामाजिक वर्ग हैं। सैन्य धाम इस वर्ग की भावनाओं से सीधे जुड़ा हुआ है। इसलिए इसका राजनीतिक महत्व केवल एक निर्माण परियोजना तक सीमित नहीं है। भाजपा के लिए सैन्य धाम राष्ट्रवाद, सैनिक सम्मान और शहीदों की विरासत का प्रतीक है। वहीं कांग्रेस के लिए यही परियोजना सरकार की कार्यशैली और घोषणाओं की हकीकत पर सवाल उठाने का हथियार बन सकती है। यानी चुनावी मौसम में सैन्य धाम का मुद्दा जितना भावनात्मक है, उतना ही राजनीतिक भी।
सैन्य धाम के लिए प्रदेश के शहीद सैनिकों के घरों से मिट्टी जुटाने का अभियान चलाया गया था। उद्देश्य था कि शहीदों की स्मृति को इस धाम से जोड़ा जाए। यह भावनात्मक पहल थी और इसका संदेश भी स्पष्ट था। प्रदेश अपने बलिदानियों को नहीं भूलेगा। लेकिन अब पांच साल बाद यही सवाल उठ रहा है कि जब शहीदों के घरों से मिट्टी जुटाने में इतनी तत्परता दिखाई गई, तो उस मिट्टी से बनने वाले धाम को आकार देने में इतनी सुस्ती क्यों रही? शहीदों की स्मृति इंतजार नहीं मांगती। राजनीति मांगती हैकृसमय, मंच और चुनाव।
सैन्य धाम का निर्माण यदि निर्धारित समय में पूरा हो जाता तो आज राजनीतिक सवाल शायद इतने तीखे नहीं होते। लेकिन लगातार टलती समयसीमा और चुनाव के नजदीक फिर बढ़ती सक्रियता ने टाइमिंग पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष के लिए यह कहना आसान है कि सरकार ने पांच साल तक परियोजना को लटकाए रखा और अब चुनाव से पहले इसे फिर चर्चा में लाया जा रहा है। सत्ता पक्ष के पास इसका जवाब विकास कार्य की प्रगति और सैनिक सम्मान की अपनी प्राथमिकता के रूप में है। लेकिन जनता के सामने तीसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है। क्या शहीदों के नाम पर बनी परियोजनाओं की सफलता का पैमाना चुनावी लोकार्पण होना चाहिए या समय पर पूरा होना?
सैन्य धाम को लेकर अब सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि निर्माण कितने प्रतिशत पूरा हुआ। जनता जानना चाहेगी कि मूल समयसीमा क्या थी, उसमें देरी क्यों हुई, लागत कितनी बढ़ी, जिम्मेदारी किसकी थी और अब वास्तविक लोकार्पण कब होगा। क्योंकि यह कोई सामान्य सरकारी भवन नहीं है। यह उन सैनिकों के नाम पर बन रहा है जिन्होंने देश के लिए अपना जीवन दिया। इसलिए सवाल सरकार से नहीं, पूरे राजनीतिक तंत्र से हैकृशहीदों के नाम पर घोषणाएं इतनी जल्दी क्यों होती हैं और काम पूरा करने में पांच साल क्यों लगते हैं? 2027 का चुनाव जैसे-जैसे करीब आएगा, सैन्य धाम की राजनीति भी तेज होगी। मंचों पर शहीदों का सम्मान होगा, राष्ट्रवाद के नारे होंगे और लोकार्पण की चर्चा होगी। लेकिन चुनावी शोर के बीच एक सवाल दबना नहीं चाहिए।
युवाओं पर भरोसा, तरीका न थोपेंः भागवत
लंदन में सेलिब्रेशन आफ वननेस कार्यक्रम में बोले संघ प्रमुख
युवाओं को लक्ष्य बताएं, तरीका तय करने की स्वतंत्रता दें
मतभेद छोड़ दुनिया बेहतर बनाने को तैयार है देश के युवा
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने युवा पीढ़ी पर भरोसा जताते हुए कहा है कि आने वाली पीढ़ियां दुनिया को बेहतर बनाने की इच्छा रखती हैं और इस उद्देश्य के लिए अपने छोटे-छोटे मतभेदों को पीछे छोड़ने को तैयार हैं। उन्होंने युवाओं को पुरानी पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार बताते हुए कहा कि उनमें सही बात को पहचानकर उस पर काम करने का साहस अधिक है।
लंदन में रविवार को स्थानीय समयानुसार सेलिब्रेशन आफ वननेस विषय पर आयोजित कम्युनिटी लीडर्स रिसेप्शन और सिविलाइजेशनल डायलॉग में भागवत ने कहा कि पुरानी पीढ़ियां अपने जीवन के अनुभवों और उनसे पैदा हुई आशंकाओं से अधिक प्रभावित रहती हैं। इसके कारण वह किसी कदम के संभावित परिणामों को लेकर ज्यादा सतर्क रहती हैं। इसके विपरीत युवा पीढ़ी इन आशंकाओं से कम बंधी होती है और जब उसे कोई बात सही लगती है तो उस पर आगे बढ़ने के लिए ज्यादा तैयार रहती है।
भागवत ने कहा कि बुजुर्ग पीढ़ी को युवाओं के सामने लक्ष्य स्पष्ट करना चाहिए, लेकिन उस लक्ष्य तक पहुंचने का तरीका उन पर नहीं थोपना चाहिए। युवाओं को आवश्यक जानकारी और मार्गदर्शन देकर उन्हें अपना रास्ता तलाशने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि इस तरह युवा पीढ़ी अपने उद्देश्य को अधिक तेजी और प्रभावी ढंग से हासिल कर सकती है।
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में समाज और दुनिया में एकता के लिए उन बातों पर जोर देने की आवश्यकता बताई जो लोगों को जोड़ती हैं। उन्होंने विविधता को स्वीकार करने और उसका सम्मान करने की बात भी कही। सेलिब्रेशन आफ वननेस कार्यक्रम में उन्होंने भारतीय चिंतन की उस परंपरा का उल्लेख किया जिसमें अलग-अलग विचारों और रास्तों के बावजूद एकता की भावना को महत्व दिया जाता है।
भागवत का युवा पीढ़ी को लेकर यह भरोसा उनके हालिया वक्तव्यों की कड़ी में देखा जा रहा है। इससे पहले भी उन्होंने युवाओं और विशेष रूप से जेन-जी को लेकर सकारात्मक रुख व्यक्त किया था। लंदन में उनका संदेश रहा कि नई पीढ़ी को केवल निर्देश देने के बजाय उस पर विश्वास करना और उसे अपने तरीके से समाधान खोजने का अवसर देना चाहिए।
लंदन में आयोजित कार्यक्रम हिंदू स्वयंसेवक संघ यूके की पहल और इंटीग्रल के सहयोग से हुआ। संघ के अनुसार, इसमें ब्रिटेन की 310 से अधिक सामुदायिक संस्थाओं और संगठनों के शामिल होने की अपेक्षा थी। भागवत के ब्रिटेन दौरे के दौरान उन्होंने धार्मिक नेताओं, शिक्षाविदों और भारतीय मूल के समुदाय से जुड़े लोगों से भी संवाद किया।
संघ के मुताबिक लंदन कार्यक्रम में सामाजिक सद्भाव, सेवा और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना पर भी जोर दिया गया। भागवत ने विविधताओं को स्वीकार करते हुए समाज को उन मूल्यों पर आगे बढ़ाने की बात रखी जो लोगों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं।
भाजपा का ‘अभेद्य’ चुनावी ‘चक्रव्यूह’
भाजपा का मिशन बूथ, चुनाव सिर्फ लक्ष्य नहीं, हर घर से संपर्क का संकल्प, जीत की रणनीति
अंतिम छोर तक पहुंचेगा विकास, भाजपा ने तैयार किया सेवा और संगठन की मजबूती का महा-रोडमैप
बूथ से लेकर गांव तक सक्रिय होगा भाजपा संगठन, जनसेवा को चुनावी रणनीति से जोड़ेगी भाजपा
देहरादून। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने संगठन को जमीन के अंतिम छोर तक मजबूत करने और सरकार की विकास योजनाओं को आमजन तक पहुंचाने का महा-रोडमैप तैयार कर लिया है। पार्टी की रणनीति अब केवल चुनावी तैयारियों तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि सेवा, संपर्क और संगठन को एक साथ जोड़कर बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने की है। लक्ष्य साफ हैकृसरकार के काम का संदेश घर-घर पहुंचे और संगठन का नेटवर्क हर मतदाता तक अपनी पहुंच बनाए। भाजपा की रणनीति में सबसे अधिक जोर बूथ को मजबूत करने पर है। पार्टी के लिए बूथ केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाली इकाई नहीं, बल्कि पूरे साल जनता से संपर्क का माध्यम बनेगा। बूथ समितियों को स्थानीय समस्याओं की जानकारी जुटाने, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संवाद करने और जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाने की जिम्मेदारी दी जाएगी।
भाजपा संगठन की योजना में केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को प्रमुखता से रखा गया है। पार्टी कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर यह बताने की कोशिश करेंगे कि विकास योजनाओं का लाभ किस तरह अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है। साथ ही जहां किसी पात्र व्यक्ति को योजना का लाभ नहीं मिला है, वहां उसकी समस्या को संबंधित स्तर तक पहुंचाने की व्यवस्था पर भी जोर रहेगा। पार्टी का मानना है कि सरकार की उपलब्धियों को केवल मंचों और विज्ञापनों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें जनता के बीच ले जाना जरूरी है। यही कारण है कि संगठन को सेवा गतिविधियों से जोड़ने की रणनीति तैयार की जा रही है।
भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में बूथ, शक्ति केंद्र और मंडल स्तर पर जिम्मेदारियों को और स्पष्ट किया जाएगा। पन्ना प्रमुखों और बूथ कार्यकर्ताओं को अपने-अपने क्षेत्र में नियमित संपर्क का जिम्मा दिया जाएगा। पार्टी की नजर खास तौर पर उन इलाकों पर रहेगी जहां संगठन कमजोर है या जहां राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। इसके साथ ही युवा, महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य सामाजिक समूहों के बीच संगठन की गतिविधियां बढ़ाने की योजना है। पार्टी की कोशिश हर वर्ग के साथ अलग-अलग स्तर पर संवाद स्थापित करने की है।
भाजपा के रोडमैप में एक महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय समस्याओं को राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाना है। पहाड़ में पलायन, रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा और मूलभूत सुविधाओं से जुड़े सवालों पर पार्टी कार्यकर्ताओं को जनता के बीच जाने के निर्देश दिए जा सकते हैं। मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण, यातायात, रोजगार, महंगाई और आधारभूत ढांचे से जुड़े मुद्दों पर फोकस रहेगा। यानी संगठन की रणनीति में एक ही फार्मूला पूरे प्रदेश पर लागू करने के बजाय क्षेत्रवार मुद्दों को प्राथमिकता देने की तैयारी है।
भाजपा के लिए सेवा गतिविधियां संगठन विस्तार का महत्वपूर्ण माध्यम रही हैं। अब इसी मॉडल को और व्यापक स्तर पर लागू करने की तैयारी है। रक्तदान, स्वास्थ्य शिविर, स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण, आपदा राहत और जरूरतमंदों की सहायता जैसी गतिविधियों के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं की जनता के बीच मौजूदगी बढ़ाई जाएगी। इस रणनीति के पीछे राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट है। भाजपा चाहती है कि चुनाव से काफी पहले ही उसका कार्यकर्ता मतदाता के संपर्क में रहे। इससे चुनावी समय में अचानक सक्रिय होने के बजाय संगठन के पास स्थायी जनसंपर्क नेटवर्क तैयार रहेगा। आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की चुनौती से जुड़ा है। ऐसे में संगठन की मजबूती पार्टी की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। सरकार के कामकाज, मुख्यमंत्री के चेहरे और संगठन की सक्रियताकृइन तीनों को एक साथ जोड़कर चुनावी जमीन तैयार करने की रणनीति दिखाई दे रही है।
हालांकि, रोडमैप की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसका क्रियान्वयन कागजों से निकलकर गांव की चौपाल, बूथ की बैठक और आम मतदाता के दरवाजे तक कितनी तेजी से पहुंचता है। भाजपा के सामने चुनौती केवल उपलब्धियां गिनाने की नहीं, बल्कि जनता के बीच मौजूद नाराजगी, स्थानीय असंतोष और विपक्ष के सवालों का जवाब देने की भी होगी। यही वजह है कि भाजपा का नया संगठनात्मक मंत्र केवल सत्ता की वापसी तक सीमित नहीं दिख रहा। पार्टी अब सेवा के जरिये संपर्क, संपर्क के जरिये संगठन और संगठन के जरिये चुनावी बढ़त बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ती नजर आ रही है।
रविवार, 6 सितंबर 2026
udaydinmaan: मुद्दा एक, नैरेटिव दो
udaydinmaan: मुद्दा एक, नैरेटिव दो: हल्द्वानी से निकला एक विवाद अब बेंगलुरु तक पहुंच गया भाजपा-कांग्रे का एफआईआर-एफआईआर का खेल शुरू उत्तराखंड में कांग्रेस, कर्नाटक में भाजपा पर...
मेट्रो में पीएम मोदी का सरप्राइज सफर
श्रीराम कालेज के शताब्दी समारोह में शामिल होने पहुंचे पीएम मोदी
शताब्दी समारोह में जाने के लिए पीएम ने चुना सार्वजनिक परिवहन
प्रधानमंत्री मोदी ने छात्र-छात्राओं व मेट्रो में यात्रियों से की बातचीत
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली मेट्रो में सफर करते नजर आए। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कालेज आफ कामर्स के शताब्दी समारोह में शामिल होने के लिए मेट्रो से पहुंचे। सफर के दौरान प्रधानमंत्री ने मेट्रो में मौजूद छात्रों, बच्चों और अन्य यात्रियों से बातचीत की। प्रधानमंत्री के मेट्रो में पहुंचने से यात्रियों के लिए सफर का सामान्य अनुभव अचानक खास बन गया। मेट्रो स्टेशन पर प्रवेश के दौरान उनके हाथ में मेट्रो कार्ड भी नजर आया। करीब 20 मिनट के सफर में उन्होंने सहयात्रियों से बातचीत की और बच्चों के साथ भी सहज अंदाज में संवाद किया।
प्रधानमंत्री का यह मेट्रो सफर ऐसे समय हुआ, जब श्रीराम कालेज आफ कामर्स अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है। समारोह में वर्तमान छात्रों के साथ कॉलेज के पूर्व छात्र, शिक्षक और पूर्व प्राचार्य भी शामिल हुए। प्रधानमंत्री ने समारोह में कालेज की शैक्षणिक परंपरा और उसके योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने संस्थान के पूर्व छात्रों की उपलब्धियों का भी उल्लेख किया। समारोह में कालेज की शताब्दी के अवसर पर स्मारक डाक टिकट भी जारी किया गया। प्रधानमंत्री मोदी का श्रीराम कालेज आफ कामर्स से पुराना जुड़ाव रहा है। वह इससे पहले 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए कालेज पहुंचे थे। अब करीब 13 वर्ष बाद वह दोबारा एसआरसीसी पहुंचे।
मेट्रो से कालेज तक का सफर इस यात्रा को और खास बना गया। प्रधानमंत्री का सार्वजनिक परिवहन के जरिए कार्यक्रम स्थल तक पहुंचना और रास्ते में यात्रियों से संवाद करना सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना। प्रधानमंत्री की इस यात्रा में छात्रों से बातचीत खास तौर पर महत्वपूर्ण रही। शिक्षक दिवस के अवसर पर भी उन्होंने शिक्षकों से बच्चों में नशे की समस्या और अत्यधिक स्क्रीन समय जैसे मुद्दों पर सतर्क रहने का आह्वान किया था। उन्होंने खेल, शारीरिक गतिविधियों और रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा देने पर जोर दिया था। ऐसे में दिल्ली मेट्रो में छात्रों के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी को युवाओं से सीधे संवाद की उनकी शैली के रूप में भी देखा जा रहा है।
एक तरफ राजधानी की रोजमर्रा की मेट्रो यात्रा, दूसरी तरफ देश का प्रधानमंत्रीकृशनिवार को दिल्ली मेट्रो के एक डिब्बे में दोनों दृश्य कुछ देर के लिए एक साथ दिखाई दिए।
भारत की छाती पर बैठा है ‘इंडिया’
साध्वी ऋतम्भरा के बयान से फिर गरमाई भारत बनाम इंडिया की सियासत
देशभर में पहचान और विचारधारा पर छिड़ी भाजपा-कांग्रेस में नई बहस
नाम से शुरू हुई बहस, अब विचारधारा तक पहुंच गई है देशभर में
देहरादून। देश की राजनीति में भारत और इंडिया को लेकर चल रही बहस एक बार फिर सुर्खियों में है। साध्वी ऋतम्भरा के बयानकृभारत की छाती पर इंडिया को बैठाना हमारा दुर्भाग्य हैकृने इस बहस को नया राजनीतिक रंग दे दिया है। बयान सामने आने के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि क्या देश के नाम और पहचान से जुड़े प्रतीकों को लेकर राजनीति आने वाले चुनावों में बड़ा मुद्दा बनने जा रही है? साध्वी ऋतम्भरा का बयान सीधे तौर पर उस वैचारिक टकराव की ओर इशारा करता है, जिसमें भारत को भारतीय सभ्यता, संस्कृति और परंपरा की पहचान के रूप में देखा जाता है, जबकि इंडिया को आधुनिक राजनीतिक-संवैधानिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।
भारत और इंडिया की बहस नई नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह विवाद राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आया है। विपक्षी दलों ने अपने गठबंधन का नाम इस पर रखा तो भाजपा और उसके समर्थक खेमे की ओर से इस नाम को लेकर लगातार सवाल उठाए गए। इसके बाद सरकारी कार्यक्रमों और दस्तावेजों में इंडिया के स्थान पर भारत शब्द के इस्तेमाल को लेकर भी राजनीतिक विवाद हुआ। विपक्ष ने इसे राजनीतिक रणनीति बताया, जबकि भाजपा समर्थक इसे औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति और भारतीय पहचान के पुनर्स्थापन से जोड़ते रहे। साध्वी ऋतम्भरा का ताजा बयान इसी व्यापक वैचारिक बहस को आगे बढ़ाता नजर आता है।
इस विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इंडिया शब्द अब केवल देश के अंग्रेजी नाम के अर्थ में नहीं देखा जा रहा। विपक्षी गठबंधन ने इसे अपने राजनीतिक मंच के रूप में इस्तेमाल किया, जिसके बाद यह शब्द भारतीय राजनीति में एक खास राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन गया। यही वजह है कि भारत बनाम इंडिया की बहस में संविधान, इतिहास, संस्कृति और राजनीतिकृचारों एक साथ दिखाई देने लगे हैं।
देश में आने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने नैरेटिव को धार देने में जुटे हैं। भाजपा जहां राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और सनातन से जुड़े मुद्दों को अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना सकती है, वहीं कांग्रेस संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक समावेशिता को केंद्र में रखकर जवाब देने की कोशिश कर सकती है। यानी नाम की लड़ाई धीरे-धीरे नैरेटिव की लड़ाई में बदलती जा रही है।
इस बहस का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में संवैधानिक रूप से दोनों नाम देश की पहचान का हिस्सा हैं। ऐसे में राजनीतिक बहस का असली प्रश्न यह नहीं कि भारत सही है या इंडिया। सवाल यह है कि इन दोनों शब्दों को राजनीतिक मंचों पर किस अर्थ और उद्देश्य के साथ इस्तेमाल किया जा रहा है। साध्वी ऋतम्भरा का बयान इसी सवाल को फिर सामने ले आया है।
फिलहाल इतना तय है कि भारत और इंडिया के बीच शब्दों की यह लड़ाई महज भाषा की लड़ाई नहीं रह गई है। यह देश की राजनीतिक पहचान, इतिहास और भविष्य की दिशा पर चल रही बड़ी वैचारिक बहस का हिस्सा बन चुकी है और चुनावी राजनीति में जब कोई शब्द विचारधारा का प्रतीक बन जाए, तो उसकी गूंज संसद से लेकर सड़क और सोशल मीडिया तक सुनाई देती है।
मुद्दा एक, नैरेटिव दो
हल्द्वानी से निकला एक विवाद अब बेंगलुरु तक पहुंच गया
भाजपा-कांग्रे का एफआईआर-एफआईआर का खेल शुरू
उत्तराखंड में कांग्रेस, कर्नाटक में भाजपा पर एफआईआर
एफआईआरकृसियासत ने भौगोलिक सीमाएं भी तो तोड़ दी
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में शुरू हुआ शुद्धिकरण विवाद अब एफआईआर की राजनीति का ऐसा चक्र बन गया है, जिसमें उत्तराखंड से निकली राजनीतिक गर्मी कर्नाटक तक पहुंच गई है। पहले हल्द्वानी मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर हुई और अब उसी विवाद को लेकर बेंगलुरु पुलिस ने उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट समेत अन्य के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज कर दी। यानी एक राज्य में कांग्रेस पर कानूनी कार्रवाई और दूसरे राज्य में भाजपा पर एफआईआरकृसियासत ने भौगोलिक सीमाएं तोड़ दी हैं।
राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज मामले में शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित धार्मिक अनुष्ठान को लेकर राहुल गांधी ने जातिगत और सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा देने वाली टिप्पणी की। मामले में भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के साथ एससी/एसटी कानून भी लगाया गया। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक दबाव का नतीजा बताया और एफआईआर के विरोध में आंदोलन किया। भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए राहुल गांधी पर जाति और भेदभाव की राजनीति करने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी इस मुद्दे पर राहुल गांधी पर पलटवार किया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। एफआईआर का जवाब अब दूसरी एफआईआर से आया है।
कांग्रेस से जुड़े एक शिकायतकर्ता की शिकायत पर बेंगलुरु की विधान सौध पुलिस ने उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और पार्टी के अन्य सदस्यों के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि हल्द्वानी में खरगे की सभा के बाद कथित शुद्धिकरण अनुष्ठान के जरिए जातिगत भेदभाव का संदेश गया। मामला एससी/एसटी कानून समेत संबंधित प्रावधानों के तहत दर्ज किया गया और आगे की कार्रवाई के लिए उत्तराखंड भेजे जाने की बात सामने आई है। अब सवाल यह है कि कानून अपना काम कर रहा है या राजनीति कानून के रास्ते अपना काम कर रही है?
कांग्रेस के लिए यह मामला केवल एफआईआर का विरोध नहीं है। पार्टी इसे दलित सम्मान और सामाजिक न्याय के बड़े मुद्दे में बदलना चाहती है। सात सितंबर को कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर बड़े राजनीतिक कार्यक्रम की तैयारी है और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े विवाद को पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के दलित सांसद भी इस मुद्दे पर चर्चा करने वाले हैं। भाजपा की रणनीति भी साफ दिखाई दे रही है। वह राहुल गांधी की टिप्पणी को मुद्दा बनाकर कांग्रेस को घेरना चाहती है और यह संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस जातिगत राजनीति कर रही है। लेकिन बेंगलुरु की जीरो एफआईआर ने भाजपा को बचाव की मुद्रा में ला दिया है।
दिलचस्प यह भी है कि एफआईआर के बाद महेंद्र भट्ट ने अपने पुराने बयान से दूरी बनाते हुए सफाई दी है। उन्होंने कहा कि उनके बयान को संदर्भ से अलग करके पेश किया गया। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए यह विवाद राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। कांग्रेस इसे दलित सम्मान, संविधान और सामाजिक बराबरी के सवाल से जोड़ रही है, जबकि भाजपा राहुल गांधी के बयान को निशाना बनाकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर रही है।
यानी मुद्दा एक, नैरेटिव दो और अब दोनों दलों के पास अपनी-अपनी एफआईआर है। कांग्रेस कह सकती हैकृदेखिए, हमारे नेता पर एफआईआर हुई। भाजपा कह सकती हैकृदेखिए, हमारे प्रदेश अध्यक्ष पर भी एफआईआर कराई गई। लेकिन जनता के सामने असली सवाल इससे बड़ा है। क्या एफआईआर राजनीतिक जवाब का माध्यम बनती जा रही है? लोकतंत्र में एफआईआर का उद्देश्य राजनीतिक हिसाब बराबर करना नहीं, कानून के उल्लंघन की निष्पक्ष जांच शुरू करना होना चाहिए। यदि किसी ने कानून तोड़ा है तो कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे वह सत्ता पक्ष का नेता हो या विपक्ष का। लेकिन यदि एफआईआर ही राजनीतिक संघर्ष का अगला हथियार बन जाए तो असली मुद्दा पीछे छूट जाता है।
उत्तराखंड की राजनीति के लिए यह आने वाले चुनाव का संकेत भी है। 2027 की जंग केवल भाषणों और रैलियों तक सीमित नहीं रहने वाली। नैरेटिव, सोशल मीडिया, कानूनी लड़ाई और एफआईआरकृसभी चुनावी हथियार बनते दिखाई दे रहे हैं। हल्द्वानी से निकला विवाद बेंगलुरु तक पहुंच चुका है। अब देखना यह है कि अगली एफआईआर किस राज्य में और किस राजनीतिक चेहरे पर होती है। सवाल यही हैकृक्या यह कानून का राज है या एफआईआर-एफआईआर का नया चुनावी खेल?
सरकार की घेराबंदी का ‘सियासी मंच’
सीएम आवास कूच के लिए कांग्रेस ने कसी कमर
शुद्धिकरण विवाद पर सरकार को घेरने की तैयारी
निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग
देहरादून। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कथित शुद्धिकरण के मामले को लेकर कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सात सितंबर को प्रस्तावित मुख्यमंत्री आवास कूच को सफल बनाने के लिए कांग्रेस ने संगठनात्मक तैयारियां तेज कर दी हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि हल्द्वानी की घटना केवल एक स्थानीय विवाद नहीं है, बल्कि इससे जुड़े सवाल सामाजिक सम्मान, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े हैं। पार्टी ने इसी मुद्दे को लेकर सात सितंबर के कूच को सरकार के खिलाफ बड़े राजनीतिक प्रदर्शन के रूप में तैयार करने की रणनीति बनाई है।
महानगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डा. जसविंदर पाल सिंह गोगी ने भाजपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की विभाजनकारी और जातिवादी राजनीति के खिलाफ कांग्रेस मजबूती से संघर्ष करेगी। गोगी ने कहा कि हल्द्वानी की घटना ने भाजपा की कथित मानसिकता को जनता के सामने उजागर किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक सम्मान के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगी। सात सितंबर का मुख्यमंत्री आवास कूच केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष है।
गोगी ने कहा कि कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर मुकदमे दर्ज कर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इससे कांग्रेस पीछे हटने वाली नहीं है। उन्होंने सरकार से हल्द्वानी प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करने की मांग की।
कांग्रेस ने सात सितंबर के कूच के जरिए सरकार को सीधे राजनीतिक कठघरे में खड़ा करने की तैयारी की है। हल्द्वानी प्रकरण पहले ही राजनीतिक बयानबाजी का केंद्र बन चुका है। अब कांग्रेस इसे प्रदेशव्यापी मुद्दे के रूप में उठाकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ती राजनीतिक सक्रियता के बीच सात सितंबर का प्रदर्शन कांग्रेस के लिए शक्ति प्रदर्शन का मौका भी माना जा रहा है।
कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं को बड़ी संख्या में जुटाने का लक्ष्य तो रखा है, लेकिन अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सात सितंबर को परेड ग्राउंड पर पार्टी कितना बड़ा जमावड़ा कर पाती है। यदि भीड़ जुटती है तो कांग्रेस इसे सरकार के खिलाफ जनआक्रोश के संकेत के तौर पर पेश करेगी और यदि अपेक्षा के अनुरूप भीड़ नहीं जुटी तो सरकार इसे कांग्रेस के कमजोर संगठन की तस्वीर के रूप में प्रचारित कर सकती है।
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