udaydinmaan
मंगलवार, 25 अगस्त 2026
गीत और धुन वही और ‘राजनीति नई’
राष्ट्रगीत पर सियासत
वंदे मातरम् की पंक्तियों पर बंटी राजनीति, देशभक्ति टेस्ट पर संग्राम
भाजपा का वार, विपक्ष का सवालकृकौन देगा राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट
राजनीति में राष्ट्रगीत आया तो बहस फिर शब्दों से निकली नीयत पर
देहरादून। वंदे मातरम् फिर राजनीति के मंच पर है। इस बार भी सवाल गीत की पंक्तियों से ज्यादा इस बात पर है कि कौन कितनी देशभक्ति दिखा रहा है और कौन कितनी कम। भाजपा ने विपक्ष को घेरा है। आरोप लगाया जा रहा है कि विपक्ष राष्ट्रभावना के सवाल पर गंभीर नहीं है। दूसरी तरफ विपक्ष कह रहा है कि देशभक्ति को राजनीतिक प्रमाणपत्र में बदलने की कोशिश क्यों की जा रही है? यानी गीत वही है, धुन वही है, लेकिन राजनीति नई है। भारत में राष्ट्रगीत वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से जुड़ा भावनात्मक प्रतीक है। लेकिन चुनावी मौसम आते ही प्रतीकों की राजनीति तेज हो जाती है। फिर यह तय होने लगता है कि कौन कितना राष्ट्रवादी है, किसने कितनी पंक्तियां गाईं और किसने कितनी नहीं गाईं। यहीं से सवाल शुरू होता है। क्या देशभक्ति की माप अब गीत की पंक्तियों से होगी? अगर कोई राजनीतिक दल वंदे मातरम् की कुछ पंक्तियां गाता है तो क्या वह अधिक देशभक्त हो जाता है और कोई दल पूरी तरह नहीं गाता तो उसकी देशभक्ति संदिग्ध हो जाती है? लोकतंत्र में यह तय करने का अधिकार आखिर किसके पास है?
भाजपा ने विपक्ष को घेरते हुए सवाल उठाया है। राजनीतिक तौर पर भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी उपयोगी है क्योंकि राष्ट्रवाद उसके लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा रहा है। विपक्ष के लिए मुश्किल यह है कि वह इस बहस में कदम रखता है तो भाजपा के बनाए मैदान पर खेलता है और मैदान से बाहर रहता है तो भाजपा उसे राष्ट्रभावना से दूरी के आरोपों से घेरती है। राजनीति का यही खेल है। एक तरफ रोजगार का सवाल है। दूसरी तरफ भर्ती परीक्षाओं की चिंता है। पहाड़ में सड़कें हैं, अस्पताल हैं, स्कूल हैं। युवाओं के भविष्य का सवाल है। महंगाई है। पलायन है। लेकिन चुनावी राजनीति में इन सवालों का जवाब कठिन है। वंदे मातरम् पर बहस करना आसान है। यह ऐसा मुद्दा है जिसमें एक नारा लगाइए, भीड़ तालियां बजाएगी। सोशल मीडिया पर वीडियो डालिए, समर्थक शेयर करेंगे। विपक्ष को घेरिए, बयान आएगा। विपक्ष जवाब देगा, दूसरा बयान आएगा। फिर दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों के बीच चले जाएंगे। और जनता? वह फिर अगले दिन नौकरी की तैयारी में बैठ जाएगी।
यही वह बिंदु है जहां देशभक्ति की राजनीति और नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी के बीच दूरी दिखाई देती है। देश से प्रेम केवल मंच पर गीत गाने से साबित नहीं होता। देश से प्रेम उस व्यवस्था को बेहतर बनाने से भी साबित होता है, जिसमें एक युवा बिना सिफारिश के नौकरी की उम्मीद कर सके, एक छात्र को परीक्षा की विश्वसनीयता पर भरोसा हो, पहाड़ का मरीज अस्पताल तक पहुंच सके और किसी गांव का बच्चा बारिश में स्कूल जाने से न डरे। वंदे मातरम् गाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है और उस पर सवाल पूछना भी। लेकिन किसी नागरिक या राजनीतिक दल की देशभक्ति का अंतिम प्रमाणपत्र बांटना लोकतंत्र को छोटा करता है। भाजपा विपक्ष को घेर रही है। विपक्ष भाजपा पर भावनात्मक मुद्दों के सहारे असली सवालों से ध्यान भटकाने का आरोप लगा सकता है। दोनों के पास अपने तर्क हैं। लेकिन मतदाता के पास एक सीधा सवाल हैकृमेरे जीवन में क्या बदला?
यही सवाल 2027 के विधानसभा चुनाव में भी लौटेगा। क्योंकि चुनावी मंच पर वंदे मातरम् की आवाज ऊंची हो सकती है, लेकिन गांव की टूटी सड़क की आवाज उससे भी पुरानी है। बेरोजगार युवा की बेचौनी किसी राष्ट्रगीत की धुन में खत्म नहीं होती। परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र को केवल राष्ट्रवाद नहीं, एक भरोसेमंद भर्ती व्यवस्था भी चाहिए। देशभक्ति जरूरी है। राष्ट्रभावना जरूरी है। वंदे मातरम् का ऐतिहासिक महत्व भी निर्विवाद है। मगर लोकतंत्र में देशभक्ति को एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करने की राजनीति कितनी दूर जाएगी, यह सवाल भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि देश किसी एक पार्टी का नहीं है। न वंदे मातरम् किसी दल की संपत्ति है, न तिरंगा, न संविधान, न भारत। राजनीतिक दल आते-जाते रहेंगे। सरकारें बनेंगी और बदलेंगी। लेकिन देश रहेगाकृऔर जनता अपने सवालों के साथ वहीं रहेगी।
इसलिए अगली बार जब मंच से पूछा जाए कि कौन वंदे मातरम् के साथ है? तो शायद जनता को भी पलटकर पूछना चाहिए।कृठीक है, लेकिन मेरे रोजगार, मेरी सड़क, मेरे स्कूल और मेरे भविष्य के साथ कौन है? यही सवाल चुनावी शोर में सबसे ज्यादा सुनाई देना चाहिए।
एक देश-एक चुनाव पर ‘अनोखी रार’
धार्मिक मंचों के राजनीतिक इस्तेमाल पर कांग्रेस का वार, भाजपा का पलटवार
चुनावी सुधार की बहस में साधु-संतों के मंच से उठ गया है उत्तराखंड से विवाद
संत समाज के मंच से वन नेशन, वन इलेक्शन पर उत्तराखंड में मचा घमासान
देहरादून। देश में वन नेशन, वन इलेक्शन की बहस चल रही है। सरकार और भाजपा इसे चुनावी व्यवस्था में सुधार, खर्च कम करने और बार-बार होने वाले चुनावों से मुक्ति की दिशा में बड़ा कदम बता रही हैं। कांग्रेस और विपक्ष इस पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन उत्तराखंड में बहस ने एक अलग मोड़ ले लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा ने साधु-संतों के मंच का राजनीतिक इस्तेमाल किया। अब सवाल सिर्फ वन नेशन, वन इलेक्शन का नहीं रह गया। सवाल यह भी है कि चुनावी राजनीति में धार्मिक और आध्यात्मिक मंचों की भूमिका कहां तक होनी चाहिए? मंच पर साधु-संत हों, सामने श्रद्धालु हों और बीच में राजनीतिक संदेश पहुंच जाएकृतो इसे आस्था का संवाद कहा जाए या चुनावी राजनीति का विस्तार? यही वह सवाल है जिसे कांग्रेस ने उठाया है।
भाजपा के पास इसका अपना जवाब होगा। वह कह सकती है कि संत समाज भी देश और समाज का हिस्सा है, उसे राजनीतिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है। लोकतंत्र में किसी वर्ग की आवाज को केवल इसलिए नहीं रोका जा सकता कि वह धार्मिक मंच से आ रही है। बात सही भी है। लेकिन लोकतंत्र का दूसरा सवाल भी हैकृक्या हर मंच चुनावी संदेश के लिए बनाया गया है? यहीं से बहस थोड़ी कठिन हो जाती है।
वन नेशन, वन इलेक्शन सुनने में बहुत सीधा लगता है। एक देश, एक साथ चुनाव। चुनाव कम होंगे, खर्च कम होगा, सरकारें लगातार चुनावी मोड से बाहर निकलकर काम कर सकेंगी। यह समर्थकों का तर्क है। विरोधियों के पास सवाल हैं। क्या एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान और कानूनों में बड़े बदलाव नहीं करने पड़ेंगे? राज्यों की विधानसभाओं की अवधि का क्या होगा? अगर किसी राज्य की सरकार बीच में गिर जाए तो क्या होगा? क्या राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रीय मुद्दों को दबा देंगे? क्या मतदाता विधानसभा और लोकसभा के लिए अलग-अलग राजनीतिक पसंद को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर पाएगा? यह गंभीर सवाल हैं। लेकिन राजनीति अक्सर गंभीर सवालों को गंभीर बहस में बदलने के बजाय भावनात्मक बहस में बदल देती है और जब धार्मिक मंच उसमें शामिल हो जाता है तो बहस और मुश्किल हो जाती है।
भारत में साधु-संतों का सामाजिक प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। करोड़ों लोग उन्हें श्रद्धा से देखते हैं। इसलिए उनके मंच से निकला राजनीतिक संदेश सामान्य राजनीतिक सभा की तुलना में अलग असर पैदा कर सकता है। इसी कारण कांग्रेस का आरोप भी केवल मंच को लेकर नहीं है। असल चिंता यह है कि क्या धार्मिक आस्था को राजनीतिक समर्थन जुटाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? लेकिन यहां विपक्ष के लिए भी एक सवाल है। अगर साधु-संत किसी राजनीतिक प्रस्ताव का समर्थन करते हैं तो क्या उनकी राय को सिर्फ इसलिए खारिज कर देना चाहिए कि वह धार्मिक मंच पर बैठे हैं? शायद नहीं।
लोकतंत्र में संत भी नागरिक हैं और उनकी राय भी राय है। समस्या राय रखने में नहीं, समस्या तब पैदा होती है जब आस्था को राजनीतिक समर्थन का प्रमाणपत्र बनाने की कोशिश हो। यानी किसी नीति का समर्थन इसलिए नहीं कि उसके पक्ष में तर्क हैं, बल्कि इसलिए कि उसके पीछे धार्मिक प्रतिष्ठा खड़ी कर दी गई है। फिर सवाल नीति से हटकर निष्ठा का हो जाता है और यही लोकतंत्र के लिए खतरनाक मोड़ है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में यह बहस और महत्वपूर्ण है। यहां धर्म, तीर्थ, संत परंपरा और राजनीति एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हैं। चारधाम से लेकर कुंभ तक धार्मिक पहचान सामाजिक जीवन का बड़ा हिस्सा है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि मंदिर और मठ की श्रद्धा को विधानसभा की नीति से अलग रखकर भी दोनों का सम्मान किया जा सकता है। राजनीतिक दलों को यह दूरी बनाए रखने की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी। क्योंकि अगर हर धार्मिक मंच चुनावी मंच बन गया, हर संत राजनीतिक प्रवक्ता बन गया और हर धार्मिक आयोजन राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन में बदल गया तो फिर राजनीति से बाहर बचने वाली जगह बहुत कम रह जाएगी और तब जनता पूछेगीकृहमारे पास चर्चा करने के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और महंगाई जैसे मुद्दे हैं। इनके जवाब कौन देगा?
वन नेशन, वन इलेक्शन पर बहस होनी चाहिए। खुलकर होनी चाहिए। संसद में हो, विशेषज्ञों के बीच हो, राज्यों में हो और जनता के बीच हो। समर्थक अपने तर्क रखें, विरोधी अपने सवाल रखें। संविधान, संघवाद और चुनावी प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा हो। लेकिन फैसला तर्क से हो, तमाशे से नहीं। संतों के मंच की अपनी गरिमा है। राजनीतिक दलों के मंच की अपनी भूमिका है। दोनों को एक-दूसरे की जगह लेने की जरूरत नहीं। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किसके मंच पर कौन बैठा था। सवाल यह होना चाहिए कि जो प्रस्ताव सामने है, वह देश और राज्यों के लोकतंत्र के लिए कितना सही है। वरना कल चुनाव एक होंगे, मंच एक होगा, नारे एक होंगे, लेकिन जनता के सवाल फिर भी अनेक रह जाएंगे और लोकतंत्र का असली चुनाव वहीं से शुरू होगा।
उत्तराखंड में ‘शुद्धिकरण’ कांड पर बवाल
मंच धोने वालों पर कार्रवाई के लिए राज्यपाल के द्वार पहुंची कांग्रेस
शुद्धिकरण ड्रामे पर भड़की कांग्रेस, राज्यपाल से की सीधी शिकायत
कांग्रेस का आरोपकृसार्वजनिक मंच के शुद्धिकरण से सामाजिक सौहार्द को ठेस
देहरादून। उत्तराखंड में मंच शुद्धिकरण को लेकर शुरू हुआ राजनीतिक विवाद अब लोकभवन तक पहुंच गया है। प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात कर पूरे प्रकरण की जानकारी दी और मामले में कार्रवाई की मांग की। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच का कथित रूप से शुद्धिकरण किया जाना सामाजिक विभाजन और भेदभाव की मानसिकता को बढ़ावा देने वाला कदम है। प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल के समक्ष कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक मंच किसी एक वर्ग या समुदाय की निजी संपत्ति नहीं होता। उस पर निर्वाचित जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक समान रूप से उपस्थित होते हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति के मंच पर आने के बाद उसके शुद्धिकरण जैसी कार्रवाई सामाजिक रूप से गंभीर संदेश देती है। कांग्रेस नेताओं ने राज्यपाल से आग्रह किया कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी स्तर पर कानून या संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
मंच शुद्धिकरण का विवाद अब केवल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे सामाजिक सम्मान और समानता से जोड़ रही है। पार्टी का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में जातिगत भेदभाव की किसी भी अभिव्यक्ति को सामान्य राजनीतिक घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि संविधान समानता की बात करता है और सार्वजनिक जीवन में किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। ऐसे में मंच शुद्धिकरण का कथित घटनाक्रम संवेदनशील है और इसकी गंभीरता से जांच जरूरी है।
वहीं, राजनीतिक तौर पर यह विवाद उत्तराखंड में आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेस इसे भाजपा सरकार और उसके नेताओं की सामाजिक सोच से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल की राज्यपाल से मुलाकात के बाद अब निगाहें सरकार और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर हैं। कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि वह इस मुद्दे को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रखेगी और इसे सामाजिक न्याय तथा संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर उठाती रहेगी।
दरअसल, उत्तराखंड की राजनीति में जाति और सामाजिक सम्मान का सवाल हमेशा संवेदनशील रहा है। पहाड़ की सामाजिक संरचना को अपेक्षाकृत सरल और समानतावादी बताने की कोशिशें होती रही हैं, लेकिन समय-समय पर सामने आने वाली घटनाएं इन दावों पर सवाल भी खड़े करती हैं। यही वजह है कि मंच शुद्धिकरण का विवाद राजनीतिक गलियारों से निकलकर अब सामाजिक बहस का विषय बन गया है। कांग्रेस का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी सार्वजनिक मंच को किसी व्यक्ति की मौजूदगी के बाद शुद्ध करने की जरूरत महसूस की गई, तो इसके पीछे की मानसिकता क्या थी? क्या यह केवल धार्मिक परंपरा का हिस्सा था, या फिर किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान से जुड़ा संदेश? इसका जवाब जांच से ही सामने आ सकता है। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक पुराना सवाल फिर खड़ा कर दिया हैकृक्या संविधान के बराबरी के सिद्धांत और समाज में मौजूद भेदभाव की मानसिकता के बीच अभी भी बड़ी खाई है?
राजनीतिक दल इस सवाल को अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल करेंगे। आरोप लगेंगे, जवाब आएंगे और चुनावी मंचों पर यह मुद्दा और तेज हो सकता है। मगर लोकतंत्र के लिए जरूरी यह है कि किसी भी व्यक्ति की गरिमा और समान नागरिक अधिकारों से जुड़े सवालों को राजनीतिक शोर में दबने न दिया जाए। राजभवन तक पहुंची कांग्रेस की शिकायत के बाद अब गेंद सरकार और प्रशासन के पाले में है। देखना होगा कि यह मामला भी केवल बयानबाजी और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सिमटता है या वास्तव में जांच और कार्रवाई तक पहुंचता है। क्योंकि मंच का शुद्धिकरण हुआ या नहीं, यह जांच का विषय हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बराबरी की कसौटी पर किसी नागरिक को खड़ा करना पूरे लोकतंत्र की परीक्षा है।
एसआईआर पर ‘राष्ट्रवाद- का तड़का
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
प्रशासनिक प्रक्रिया से शुरू विवाद, उत्तराखंड में सियासी जंग में बदला
भाजपा ने किया राष्ट्रवाद वाला वार, कांग्रेस ने उठाए पारदर्शिता पर सवाल
चुनाव आयोग की प्रक्रिया के बीच बढ़ गई है सबूे में राजनीतिक बयानबाजी
देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। एक तरफ भाजपा कांग्रेस और विपक्ष पर एसआईआर को लेकर भ्रम फैलाने और राष्ट्रहित के खिलाफ राजनीति करने का आरोप लगा रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस प्रक्रिया की पारदर्शिता, मतदाताओं के नामों और दावों-आपत्तियों के निस्तारण को लेकर सवाल उठा रही है। यानी मामला मतदाता सूची का है, लेकिन राजनीति में पहुंचते-पहुंचते बात राष्ट्रवाद तक पहुंच गई है। उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर चल रही है। जिला प्रशासन की वेबसाइटों पर एसआईआर से संबंधित घोषणाएं, बीएलओ विवरण, बैठकें और अन्य सामग्री भी उपलब्ध कराई जा रही है। लेकिन चुनावी साल की आहट के बीच मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है। राजनीतिक दल इसे आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देख रहे हैं।
भाजपा का तर्क है कि मतदाता सूची में केवल पात्र भारतीय नागरिकों के नाम होना चाहिए। पार्टी विपक्ष पर आरोप लगा रही है कि वह एसआईआर को लेकर राजनीतिक भ्रम पैदा कर रहा है और ऐसी राजनीति कर रहा है, जिससे देशहित प्रभावित हो सकता है। भाजपा के लिए यह मुद्दा केवल मतदाता सूची की सफाई का नहीं, बल्कि अवैध या अपात्र लोगों के नाम हटाने से भी जुड़ा हुआ है। पार्टी का कहना है कि यदि मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसे ठीक करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करता है। भाजपा विपक्ष से सवाल कर रही है कि यदि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है तो उसका विरोध क्यों? यहीं से भाजपा का राजनीतिक हमला राष्ट्रवाद की तरफ मुड़ जाता है।
पार्टी विपक्ष पर आरोप लगाती है कि वह वोट बैंक की राजनीति के कारण ऐसे मुद्दे उठा रहा है जो मतदाता सूची की शुचिता से जुड़े हैं। भाजपा का संदेश साफ हैकृमतदाता सूची में केवल पात्र नागरिक रहें, यह किसी दल का नहीं बल्कि लोकतंत्र का सवाल है। कांग्रेस इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार करने को तैयार नहीं है। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने की जरूरत से उसे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से न हटे। कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता यही है कि पुनरीक्षण के दौरान यदि किसी मतदाता का नाम सूची से बाहर हो जाता है तो उसके पास दावा और आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर होना चाहिए।
प्रदेश कांग्रेस ने एसआईआर से जुड़े दावों और आपत्तियों में मतदाताओं की मदद के लिए जिलावार नेताओं की जिम्मेदारी भी तय की है। कांग्रेस के अनुसार पार्टी अध्यक्ष गणेश गोदियाल के निर्देश पर अलग-अलग जिलों में सहायता और कानूनी मदद के लिए टीमें बनाई गई हैं। यह अपने आप में बताता है कि कांग्रेस अब एसआईआर को केवल राजनीतिक बयानबाजी का मुद्दा नहीं छोड़ना चाहती, बल्कि बूथ और मतदाता स्तर तक इस प्रक्रिया पर नजर रखने की तैयारी में है। इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण संस्था चुनाव आयोग है। क्योंकि मतदाता सूची का अंतिम फैसला राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, निर्धारित चुनावी प्रक्रिया से होना है।
उत्तराखंड में प्रशासन की ओर से राजनीतिक दलों के साथ बैठकें भी की गई हैं। पौड़ी जिला प्रशासन के रिकार्ड में एसआईआर के दौरान राजनीतिक दलों के साथ बैठक और बीएलओ, बीएलए तथा अन्य संबंधित लोगों के प्रशिक्षण का उल्लेख है। यानी राजनीतिक दलों की भागीदारी प्रक्रिया का हिस्सा है। यही वजह है कि विवाद का समाधान भी राजनीतिक बयान से ज्यादा पारदर्शी प्रक्रिया में है। एसआईआर को लेकर सबसे संवेदनशील सवाल यही है कि सूची से अपात्र नाम हटाने की कोशिश में कहीं पात्र मतदाता का नाम न छूट जाए। किसी अपात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए समस्या है। लेकिन किसी पात्र नागरिक का नाम सूची से हट जाना भी उतनी ही गंभीर समस्या है। इसलिए दोनों बातों को एक साथ देखना होगा।
सिर्फ यह कहना कि नाम कटेंगे तो गड़बड़ी दूर होगी पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि जिनके नाम सूची में नहीं रहेंगे, उन्हें सूचना कैसे मिलेगी, दावा कैसे दाखिल होगा, आपत्ति कैसे सुनी जाएगी और अंतिम निर्णय किस आधार पर होगा। यही पारदर्शिता ैप्त् की विश्वसनीयता तय करेगी। भाजपा के लिए चुनौती यह है कि एसआईआर को राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रविरोध की बहस में बदलने के बजाय मतदाता सूची की शुचिता के ठोस आंकड़े सामने रखे जाएं। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह हर कार्रवाई को राजनीतिक साजिश बताने के बजाय जहां वास्तविक गड़बड़ी है, वहां दस्तावेज और तथ्य सामने रखे। क्योंकि मतदाता सूची किसी पार्टी की नहीं होती। उसमें दर्ज नाम किसी भाजपा कार्यकर्ता का हो या कांग्रेस समर्थक का, मतदाता का अधिकार समान है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में एसआईआर का मुद्दा आने वाले महीनों में और राजनीतिक रंग ले सकता है। भाजपा इसे मतदाता सूची की शुचिता और पात्र नागरिकों के अधिकार का मुद्दा बनाएगी, जबकि कांग्रेस इसे निष्पक्षता, पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने के सवाल से जोड़ेगी। इस लड़ाई में सबसे जरूरी बात यह है कि मतदाता राजनीति का शिकार न बने। एसआईआर का मतलब अगर मतदाता सूची को बेहतर बनाना है तो यह काम बिना डर, बिना दबाव और बिना राजनीतिक भेदभाव के होना चाहिए। भाजपा को अपने आरोपों के साथ तथ्य रखने होंगे। कांग्रेस को अपनी आपत्तियों के साथ प्रमाण देने होंगे और चुनावी मशीनरी को हर पात्र मतदाता की आवाज सुननी होगी। क्योंकि चुनाव में सरकारें बदल सकती हैं, विधायक बदल सकते हैं, राजनीतिक नारे बदल सकते हैं। लेकिन एक बार मतदाता सूची में किसी पात्र नागरिक का नाम छूट गया तो उसके लोकतांत्रिक अधिकार पर सीधा असर पड़ सकता है। इसलिए एसआईआर की असली लड़ाई भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं है। असली सवाल यह हैकृमतदाता सूची कितनी साफ होगी और उसमें दर्ज हर पात्र नागरिक का वोट कितना सुरक्षित रहेगा।
सोमवार, 24 अगस्त 2026
udaydinmaan: यूकेडी सियासी जमीन पर ‘री-लांच’
udaydinmaan: यूकेडी सियासी जमीन पर ‘री-लांच’: वजूद बचाने को गांव-गांव बिछाया जा रहा यूकेडी का सांगठनिक जाल राज्य बनाने वाला दल अपनी जगह ढूंढ रहाकृगांव-कस्बों पर टिकीं नजरें लगातार हार और...
यूकेडी सियासी जमीन पर ‘री-लांच’
वजूद बचाने को गांव-गांव बिछाया जा रहा यूकेडी का सांगठनिक जाल
राज्य बनाने वाला दल अपनी जगह ढूंढ रहाकृगांव-कस्बों पर टिकीं नजरें
लगातार हार और बिखराव के बीच नए सिरे से ताकत झोंकने की तैयारी
देहरादून। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर उत्तराखंड क्रांति दल ने अपनी चुनावी तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया है। लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में अपने लिए मजबूत जमीन तलाश रहे दल के सामने इस बार चुनौती केवल चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने और जनता के बीच अपनी खोई राजनीतिक जगह वापस हासिल करने की भी है। यूकेडी कार्यकर्ताओं को अब गांव, कस्बे और विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय होने का संदेश दिया जा रहा है। राज्य गठन के आंदोलन से निकला यूकेडी उत्तराखंड की राजनीति में कभी मजबूत क्षेत्रीय विकल्प के रूप में देखा जाता था। लेकिन पिछले वर्षों में संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व के स्तर पर खींचतान और लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों के चलते दल का प्रभाव सीमित हुआ है। अब आगामी विधानसभा चुनाव को दल के लिए राजनीतिक अस्तित्व और पुनरुत्थान की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है।
यूकेडी की रणनीति में सबसे बड़ा जोर स्थानीय मुद्दों को चुनावी राजनीति के केंद्र में लाने पर है। पहाड़ से पलायन, रोजगार, मूल निवास, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन, गैरसैंण, पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा की बदहाल स्थिति और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार जैसे सवालों को लेकर कार्यकर्ताओं को जनता के बीच जाने की तैयारी है। दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन मुद्दों पर भाजपा और कांग्रेस भी लगातार अपना राजनीतिक पक्ष रखती रही हैं। ऐसे में यूकेडी को जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि वह केवल चुनावी मौसम में क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल उठाने वाला दल नहीं, बल्कि राज्य के हितों के लिए लगातार संघर्ष करने वाला राजनीतिक विकल्प है।
यूकेडी के भीतर संगठन को सक्रिय करने को लेकर बैठकों का दौर तेज होने की उम्मीद है। विधानसभा स्तर पर संभावित प्रत्याशियों और सक्रिय कार्यकर्ताओं की भूमिका तय करने के साथ ही बूथ स्तर पर टीम तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। पार्टी की कोशिश है कि चुनाव की घोषणा का इंतजार करने के बजाय उससे पहले ही संगठन को मैदान में उतार दिया जाए। कार्यकर्ताओं से कहा जा रहा है कि वह केवल सोशल मीडिया तक सीमित न रहें, बल्कि जनता के बीच जाकर स्थानीय समस्याओं को उठाएं। इससे पार्टी को दोहरा फायदा मिल सकता हैकृएक तरफ संगठन सक्रिय होगा और दूसरी तरफ संभावित प्रत्याशियों की जमीनी पकड़ का भी आकलन हो सकेगा।
उत्तराखंड की राजनीति में युवा मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं के बीच असंतोष की चर्चा लगातार होती रही है। यूकेडी इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकता है। दल के लिए चुनौती यह होगी कि वह युवाओं के बीच केवल भावनात्मक मुद्दों के बजाय रोजगार और राज्य की अर्थव्यवस्था को लेकर ठोस रोडमैप भी सामने रखे। युवा मतदाता अब केवल नारे नहीं, बल्कि अवसर और जवाबदेही की राजनीति भी चाहता है।
उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला रहने की स्थिति में यूकेडी के लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं होगा। इसके अलावा अन्य राजनीतिक दल भी क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दों को लेकर मैदान में सक्रिय हैं। ऐसे में यूकेडी को अपने पुराने आंदोलनकारी तेवर के साथ संगठनात्मक मजबूती और नए राजनीतिक नैरेटिव का संयोजन करना होगा। यूकेडी के लिए आगामी विधानसभा चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करेगा कि राज्य गठन के आंदोलन से निकली क्षेत्रीय राजनीति उत्तराखंड की नई पीढ़ी के बीच कितनी प्रासंगिक रह गई है। यदि दल अपने पारंपरिक मुद्दों को युवाओं के रोजगार, शिक्षा और भविष्य से जोड़ने में सफल रहता है और संगठन को बूथ स्तर तक खड़ा कर पाता है, तो वह चुनावी मुकाबले में अपनी मौजूदगी प्रभावी ढंग से दर्ज करा सकता है।
फिलहाल यूकेडी के कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ने लगी है और संकेत साफ हैंकृइस बार चुनावी रण में उतरने से पहले संगठन मैदान तैयार करने की कोशिश में है। अब देखना यह होगा कि यह सक्रियता केवल बैठकों और नारों तक सीमित रहती है या गांव-गांव तक वास्तविक राजनीतिक अभियान में बदलती है।
किताबें खुलीं और अफसर ‘खामोश’
अनोखा विरोध
बच्चों ने बिना शोर-शराबे के नगर निगम को बना दिया स्कूल
निगम के दफ्तरों में क्लास,साइलेंट प्रोटेस्ट ने दागे तीखे सवाल
पढ़ाई का हक मांगने खुद निगम की चौखट पर आ पहुंचे मासूम
बच्चों की किताबों ने खोला निगम की अव्यवस्था का रिपोर्ट कार्ड
देहरादून। स्कूल में पानी भर गया तो बच्चों ने छुट्टी मनाने के बजाय ऐसी जगह कक्षा लगाने का फैसला किया, जहां शायद उन्हें पढ़ाने की जरूरत सबसे ज्यादा थीकृनगर निगम के दफ्तर में। हाथों में किताबें और चेहरे पर मासूम सवाल लिए बच्चे नगर निगम पहुंचे और अधिकारियों के कमरों में ही अपनी कक्षा लगा दी। कुछ देर के लिए सरकारी दफ्तर, दफ्तर कम और स्कूल ज्यादा नजर आया। बच्चों ने अधिकारियों के कमरों में बैठकर पढ़ाई की। यह प्रदर्शन किसी राजनीतिक मंच से नहीं था। न कोई लंबा भाषण, न नारेबाजी का शोर। बच्चों की किताबें खुलीं और पढ़ाई शुरू हो गई। संदेश इतना सीधा था कि उसके लिए माइक की जरूरत नहीं पड़ीकृजब स्कूल में पढ़ने की जगह पानी में बदल जाए तो बच्चे आखिर पढ़ने कहां जाएं?
यह तस्वीर सिर्फ रुड़की के एक स्कूल की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था की कहानी है जिसमें बारिश के बाद सड़क पर पानी भरना आम बात हो सकती है, लेकिन स्कूल के भीतर पानी भर जाना बच्चों की पढ़ाई का सवाल बन जाता है। फिर बच्चे स्कूल से निकलकर उसी व्यवस्था के दरवाजे पर पहुंचते हैं, जिसके पास इस समस्या का समाधान होना चाहिए। सोचिए, एक बच्चा अपनी किताब लेकर स्कूल पहुंचता है। उसे ब्लैकबोर्ड चाहिए, शिक्षक चाहिए और बैठने के लिए जगह चाहिए। लेकिन वहां पानी है। अब वह नगर निगम पहुंचता है और कहता है कि आपकी व्यवस्था के कारण हमारा स्कूल कक्षा के लायक नहीं रहा, इसलिए आज आपकी कक्षा में पढ़ेंगे।
नगर निगम के कमरों में बैठे अधिकारी शायद फाइलों के बीच बच्चों को देखकर कुछ पल के लिए सोचने को मजबूर हुए होंगे कि विकास की रिपोर्ट में स्कूल की यह तस्वीर किस खाने में दर्ज होगी? सरकारी फाइलों में जल निकासी की योजनाएं हो सकती हैं। नालों की सफाई के दावे हो सकते हैं। बारिश से पहले तैयारियों की बैठकें हो सकती हैं। लेकिन बच्चों की कक्षा में पानी भर जाने के बाद एक सवाल उन तमाम कागजों से बड़ा हो जाता हैकृक्या शहर इतना भी सक्षम नहीं कि बच्चों को सूखी जगह पर बैठाकर पढ़ा सके? इस प्रदर्शन की सबसे दिलचस्प बात यही रही कि बच्चों ने व्यवस्था को भाषण नहीं दिया। उन्होंने किताब खोल दी।
यही शायद इस प्रदर्शन की ताकत भी थी। बच्चों ने अधिकारियों के कमरे में बैठकर यह नहीं कहा कि आप काम नहीं करते। उन्होंने बस अपनी कक्षा वहीं लगा दी। बाकी सवाल कमरे में मौजूद हर व्यक्ति के सामने खुद खड़े हो गए। बारिश में स्कूल डूबता है तो केवल फर्श गीला नहीं होता। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, शिक्षकों की परेशानी बढ़ती है और अभिभावकों की चिंता भी बढ़ती है। सरकारी व्यवस्था के लिए यह एक जलभराव हो सकता है, लेकिन बच्चे के लिए यह उसका स्कूल, उसकी पढ़ाई और उसका भविष्य है। शहरों को स्मार्ट बनाने की बातें अक्सर बड़े प्रोजेक्ट, सड़कों, पार्किंग, लाइट और दूसरी सुविधाओं के आसपास घूमती हैं। लेकिन किसी शहर की असली परीक्षा तब होती है जब बारिश होती है। यदि बारिश होते ही स्कूल में पानी भर जाए और बच्चों को नगर निगम में कक्षा लगानी पड़े, तो स्मार्टनेस के तमाम दावे बच्चों की किताब के एक पन्ने के सामने छोटे पड़ जाते हैं।
बच्चों का यह अनोखा प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने व्यवस्था को उसकी भाषा में जवाब दिया है। अधिकारी दफ्तर में बैठकर काम करते हैं, बच्चे स्कूल में बैठकर पढ़ते हैं। जब स्कूल में बैठने की जगह नहीं रही तो बच्चे दफ्तर में आ गए। बच्चों ने अपनी कक्षा लगा दी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगली बारिश में उन्हें फिर नगर निगम की कक्षा न लगानी पड़े और वे अपने स्कूल में ही बैठकर पढ़ सकें। क्योंकि किसी भी शहर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसके दफ्तर कितने सुंदर हैं, बल्कि यह है कि उसके बच्चों के स्कूल कितने सुरक्षित और पढ़ने लायक हैं और अगर बच्चों को अपनी पढ़ाई के लिए नगर निगम का कमरा चुनना पड़े, तो सवाल बच्चों से नहीं, व्यवस्था से पूछा जाना चाहिएकृआपकी कक्षा आखिर कहां लगी है?
उम्मीदों का ‘ह्यूमन चेन’ प्रोटेस्ट
सरकार की नजर नहीं पड़ी, तो दो जिलों के लोगों ने एक-दूसरे का हाथ थाम खींची उम्मीद की रेखा
अस्पताल, स्कूल और उम्मीद का रास्ता बंद हुआ, तो इंसानी कड़ियों से सज गई सड़क
बिना माइक और मंच के बनी मानव श्रृंखला, उधड़ती सड़कों पर व्यवस्था से तीखा सवाल
देहरादून। पहाड़ में सड़क सिर्फ सड़क नहीं होती। वह अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता है, बच्चे के स्कूल जाने का रास्ता है, किसान की उपज बाजार तक पहुंचाने का रास्ता है और गांव को बाकी दुनिया से जोड़ने वाली उम्मीद भी है। इसलिए जब सड़क टूटती है तो सिर्फ डामर नहीं टूटता, लोगों का भरोसा भी दरकने लगता है। उत्तराखंड के बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिलों में सड़क की बदहाली के खिलाफ लोगों ने कुछ ऐसा ही संदेश दिया। सड़क की हालत सुधारने की मांग को लेकर दो जिलों के लोगों ने मानव श्रृंखला बनाई। लोग सड़क किनारे खड़े हुए और एक-दूसरे का हाथ थामकर ऐसी कड़ी बना दी, जिसे शायद किसी सरकारी मशीनरी से ज्यादा आसानी से देखा जा सकता था। यह कोई वीआईपी कार्यक्रम नहीं था। न लाल कालीन था, न मंच पर भाषणों की लंबी सूची। सड़क थी, उसके किनारे खड़े लोग थे और बीच में वह सवाल था जो पहाड़ वर्षों से पूछ रहा हैकृआखिर सड़क कब ठीक होगी?
बागेश्वर और पिथौरागढ़ प्रशासनिक नक्शे पर अलग-अलग जिले हैं, लेकिन सड़क की समस्या ने दोनों को एक ही मुद्दे पर खड़ा कर दिया। लोगों की शिकायत है कि बदहाल सड़क के कारण रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। आवागमन मुश्किल है और बारिश के मौसम में परेशानी और बढ़ जाती है। पहाड़ में सड़क खराब होने का मतलब केवल गाड़ी का झटका नहीं है। इसका मतलब है कि मरीज को अस्पताल पहुंचाने में ज्यादा समय, किसान को बाजार तक पहुंचाने में ज्यादा परेशानी और बच्चे को स्कूल तक जाने में ज्यादा जोखिम। मैदान में सड़क पर गड्ढा खबर बन सकता है। पहाड़ में वही गड्ढा किसी परिवार की पूरी दिनचर्या बदल देता है।
मानव श्रृंखला का दृश्य अपने आप में एक सवाल था। जिन लोगों को सड़क चाहिए थी, उन्होंने सड़क के किनारे खड़े होकर अपने हाथों को जोड़ दिया। सड़क जोड़ने का काम सरकार का है, लेकिन यहां जनता खुद जुड़ गई। शायद यह प्रतीकात्मक तस्वीर व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा संदेश है। सड़क नहीं बनी तो लोग खुद श्रृंखला बन गए। रास्ता सरकार को बनाना था, लेकिन लोगों ने पहले अपनी एकता का रास्ता बना लिया। इसमें व्यंग्य भी है और दर्द भी। जिन लोगों को सरकार से सड़क चाहिए, वह सरकार के सामने अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए इंसानों की सड़क बना रहे हैं। सड़क निर्माण और मरम्मत की योजनाएं कागजों पर बनती हैं। बजट आता है, टेंडर होते हैं, काम शुरू होता है और फिर जनता इंतजार करती है। लेकिन पहाड़ में लोग पूछ रहे हैं कि योजना की उम्र कितनी है और सड़क की उम्र कितनी?
हर बरसात के बाद सड़क की हालत खराब होती है तो सवाल फिर वही लौट आता है। मरम्मत क्यों नहीं हुई? स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ? जिम्मेदारी किसकी है? सरकारी विभागों के पास इन सवालों के तकनीकी जवाब हो सकते हैं। लेकिन सड़क पर खड़े लोगों के पास एक सरल जवाब हैकृहमें चलने लायक सड़क चाहिए। उत्तराखंड में विकास की तस्वीर अक्सर बड़ी परियोजनाओं से बनाई जाती है। सुरंगें, पुल, हाईवे, चारधाम परियोजनाएं और बड़े-बड़े निर्माण विकास के प्रतीक बनते हैं। लेकिन पहाड़ का आम आदमी विकास को बहुत छोटे पैमाने पर भी मापता है। उसके लिए विकास का मतलब हैकृबीमार को समय पर अस्पताल पहुंचा सकना, बच्चे का सुरक्षित स्कूल पहुंचना, गांव की उपज बाजार तक ले जा पाना और बारिश में सड़क का संपर्क न टूटना। अगर इन बुनियादी जरूरतों के लिए लोगों को दो जिलों में मानव श्रृंखला बनानी पड़े, तो यह सिर्फ सड़क विभाग की समस्या नहीं रह जाती। यह विकास की प्राथमिकताओं पर सवाल बन जाता है।
बागेश्वर और पिथौरागढ़ के लोगों की यह मानव श्रृंखला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल सड़क की मांग नहीं है। इसमें पहाड़ के उस धैर्य की भी झलक है जो बार-बार टूटती सड़क, बंद रास्ते और सरकारी आश्वासनों के बावजूद अभी तक खड़ा है। लोगों ने हाथ पकड़ लिए हैं। अब देखना यह है कि सरकार सड़क पकड़ती है या फिर अगली बरसात तक यह सवाल भी किसी फाइल में रख दिया जाता है। क्योंकि पहाड़ के लोग कोई असंभव मांग नहीं कर रहे। वह सिर्फ इतना कह रहे हैं सड़क ऐसी हो, जिस पर जिंदगी चल सके।
रविवार, 23 अगस्त 2026
udaydinmaan: महंगाई का ‘मिठास’ पर डाका
udaydinmaan: महंगाई का ‘मिठास’ पर डाका: चीनी के दामों ने बिगाड़ा रसोई का बजट, विपक्ष हमलावर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने बढ़ती कीमतों पर जताया आक्रोश विपक्ष ने रसोई के बजट पर असर को...
राहुल गांधी का ‘स्त्री स्वाभिमान’ दांव
पुणे में छात्राओं के बीच राहुल गांधी का बयान
मनुस्मृति की व्याख्या को लेकर सियासी बहस
अधिकार और पहचान को लेकर सियासत तेज
देहरादून। हजारों छात्राओं के बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी का एक बयान अब राजनीतिक बहस का नया केंद्र बन गया है। पुणे में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्र पहचान, उनके अधिकार और अपने भविष्य के फैसले खुद लेने की क्षमता पर जोर देते हुए कहा कि महिलाएं किसी की नहीं, सिर्फ अपनी हैं। बयान सामने आने के बाद महिला अधिकार, सामाजिक परंपराओं और मनुस्मृति की व्याख्या को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। राहुल गांधी ने छात्राओं के बीच अपने संबोधन में महिलाओं की स्वतंत्रता को केवल सामाजिक अधिकार का विषय नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत पहचान और निर्णय लेने की आजादी से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि किसी भी महिला को उसकी पहचान किसी दूसरे व्यक्ति या रिश्ते के आधार पर नहीं दी जानी चाहिए। उसके सपने, उसकी महत्वाकांक्षा और उसके भविष्य का फैसला करने का अधिकार उसी के पास होना चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति में महिलाओं को लेकर की गई व्याख्याओं पर भी सवाल खड़े किए। उनका तर्क था कि समाज में महिलाओं की भूमिका और स्वतंत्रता को लेकर पुराने विचारों को आज के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर देखा जाना चाहिए। यही हिस्सा अब राजनीतिक बहस का कारण बन गया है। कांग्रेस इसे महिला सम्मान और समान अधिकार की आवाज के रूप में पेश कर रही है, जबकि भाजपा और उसके वैचारिक समर्थक राहुल गांधी के बयान को हिंदू परंपराओं और धार्मिक ग्रंथों पर राजनीतिक टिप्पणी के रूप में देख सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। राहुल गांधी का मंच और दर्शक वर्ग भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। हजारों छात्राओं के बीच महिलाओं की स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय की बात करके उन्होंने सीधे युवा महिला मतदाताओं से संवाद स्थापित करने की कोशिश की। राहुल का संदेश साफ था कि महिलाओं को किसी रिश्ते की पहचान से आगे बढ़कर स्वतंत्र नागरिक के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका जोर इस बात पर रहा कि महिला अपनी शिक्षा, करियर, जीवन और भविष्य को लेकर खुद निर्णय लेने में सक्षम हो।
राहुल गांधी का यह बयान केवल सामाजिक विमर्श तक सीमित रहने वाला नहीं है। भारतीय राजनीति में महिला मतदाता पिछले कुछ चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। ऐसे में महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान और अधिकार से जुड़े मुद्दे सीधे चुनावी राजनीति को प्रभावित करते हैं। कांग्रेस के लिए यह बयान युवाओं और महिलाओं के बीच अपने राजनीतिक संदेश को मजबूत करने का अवसर है। वहीं भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह इस मुद्दे पर राहुल गांधी के हमले का जवाब किस राजनीतिक और वैचारिक धरातल पर देती है।
दरअसल, बहस केवल मनुस्मृति की व्याख्या तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि आधुनिक भारत में महिला की पहचान क्या होकृकिसी रिश्ते, परिवार और सामाजिक भूमिका से तय होने वाली पहचान या अपने फैसले खुद लेने वाली स्वतंत्र नागरिक की पहचान? राहुल गांधी के बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज होने की संभावना है। समर्थक इसे महिला स्वतंत्रता और समानता का संदेश बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे धार्मिक-सामाजिक परंपराओं पर हमला करार दे सकते हैं। ऐसे में पुणे का यह बयान आने वाले दिनों में संसद से लेकर चुनावी मंचों तक सुनाई दे सकता है। राहुल गांधी ने छात्राओं के बीच जिस मुद्दे को उठाया है, वह अब केवल एक कार्यक्रम का बयान नहीं रह गया है। यह भारतीय राजनीति में महिला की स्वतंत्र पहचान, परंपरा बनाम आधुनिकता और संविधान बनाम सामाजिक रूढ़ियों की पुरानी बहस को एक बार फिर सामने लाने वाला मुद्दा बन गया है। आखिरकार सवाल यही है कि महिला को राजनीति कब तक किसी के वोट बैंक के रूप में देखेगी और कब उसे उसके अपने निर्णयों वाली नागरिक के रूप में स्वीकार करेगी? पुणे में राहुल गांधी का बयान इसी सवाल को राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आया है।
महंगाई का ‘मिठास’ पर डाका
चीनी के दामों ने बिगाड़ा रसोई का बजट, विपक्ष हमलावर
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने बढ़ती कीमतों पर जताया आक्रोश
विपक्ष ने रसोई के बजट पर असर को बनाया राजनीतिक हथियार
देहरादून। रसोई के बजट पर बढ़ते दबाव ने उत्तराखंड की सियासत को भी गरमा दिया है। चीनी समेत रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी कई वस्तुओं के दाम बढ़ने को लेकर कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि महंगाई लगातार आम परिवारों की जेब पर बोझ बढ़ा रही है, जबकि सरकार राहत देने के बजाय आंकड़ों और दावों के सहारे अपनी पीठ थपथपा रही है। चीनी जैसी रोजमर्रा की जरूरत की वस्तु के दाम बढ़ना भले ही देखने में छोटा मुद्दा लगे, लेकिन इसका सीधा असर घर के मासिक बजट पर पड़ता है। चाय से लेकर मिठाई और घरेलू खाद्य पदार्थों तक में चीनी का इस्तेमाल होता है। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों के खर्च का संतुलन भी बिगाड़ता है।
कांग्रेस ने बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार को घेरते हुए कहा कि आम आदमी पहले ही महंगाई, रोजगार और आय से जुड़े दबावों से जूझ रहा है। ऐसे में खाद्य और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी उसकी मुश्किलें और बढ़ा रही है। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार को केवल महंगाई दर के आंकड़े बताने के बजाय बाजार में आम उपभोक्ता की स्थिति देखनी चाहिए। उनका तर्क है कि कागज पर महंगाई नियंत्रित होने का दावा अपनी जगह है, लेकिन बाजार में परिवार का मासिक खर्च बढ़ रहा है तो इसका असर राजनीतिक रूप से भी दिखाई देगा।
महंगाई भारतीय राजनीति में हमेशा से बड़ा चुनावी मुद्दा रही है। खासकर विधानसभा चुनावों के दौरान रसोई का बजट सीधे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाता है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए विपक्ष को सरकार को घेरने के लिए यह मुद्दा उपयोगी हथियार मिल सकता है। महंगाई का सवाल केवल चीनी तक सीमित नहीं है। खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, दूध और अन्य दैनिक जरूरतों की कीमतों में उतार-चढ़ाव आम उपभोक्ता की चिंता बढ़ाता है। विपक्ष इसी व्यापक तस्वीर को सामने रखकर सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठा रहा है।
सत्तारूढ़ भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह बढ़ती कीमतों को लेकर जनता की नाराजगी को किस तरह शांत करती है। सरकार के पास कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों और बाजार व्यवस्था से जुड़े अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक चुनौती केवल आंकड़ों से हल नहीं होगी। क्योंकि चुनावी राजनीति में जनता यह नहीं देखती कि महंगाई का कारण वैश्विक बाजार है या घरेलू आपूर्ति व्यवस्था। वह सबसे पहले अपनी जेब देखती है। महीने के अंत में घर का बजट बिगड़ रहा है तो सरकार से सवाल होना स्वाभाविक है।
हालांकि महंगाई के मुद्दे ने कांग्रेस समेत विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का अवसर जरूर दिया है, लेकिन इसे चुनावी मुद्दे में बदलना विपक्ष के लिए भी चुनौतीपूर्ण होगा। केवल बढ़ी कीमतों की सूची गिनाने से जनता का भरोसा हासिल नहीं किया जा सकता। विपक्ष को यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह महंगाई को नियंत्रित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाएगा। उत्तराखंड की सियासत में अब महंगाई का सवाल धीरे-धीरे जमीन पकड़ सकता है। चीनी के बढ़ते दाम से शुरू हुई बहस यदि दाल, तेल, सब्जी, दूध और अन्य जरूरी वस्तुओं तक पहुंचती है तो यह सरकार के लिए असहज राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
चीनी की कीमतों पर एथेनाल का ‘तड़का’
उत्तराखंड में आमने-सामने आ गए कांग्रेस-भाजपा
कांग्रेस ने एथेनाल नीति को बताया महंगाई की वजह
भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को करार दिया प्रोपेगेंडा
देहरादून। चीनी के बढ़ते दाम को लेकर उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर एथेनाल का मुद्दा गर्म हो गया है। कांग्रेस ने चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को केंद्र की एथेनाल नीति से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा है। वहीं भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक प्रोपेगेंडा करार दिया है। दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने चीनी की कीमतों के सवाल को सीधे केंद्र की कृषि और ऊर्जा नीति से जोड़ दिया है। कांग्रेस का तर्क है कि गन्ने से चीनी उत्पादन के बजाय एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति का असर चीनी की उपलब्धता और बाजार कीमतों पर पड़ सकता है। पार्टी का कहना है कि जब गन्ने और उसके उत्पादों का एक हिस्सा एथेनॉल के लिए इस्तेमाल होता है तो चीनी उत्पादन की मात्रा प्रभावित होने की आशंका रहती है। ऐसे में यदि बाजार में आपूर्ति का संतुलन बिगड़ता है तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
भाजपा ने कांग्रेस के इस तर्क को राजनीतिक रंग देने की कोशिश बताया है। पार्टी का कहना है कि चीनी की कीमतों में उतार-चढ़ाव को केवल एथेनाल नीति से जोड़ देना आर्थिक तथ्यों को नजरअंदाज करना है। भाजपा के अनुसार चीनी बाजार पर उत्पादन, मांग, स्टाक, निर्यात-आयात और वैश्विक बाजार समेत कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। दरअसल एथेनाल नीति पिछले कुछ वर्षों से केंद्र की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। पेट्रोल में एथेनाल मिश्रण बढ़ाने की नीति का उद्देश्य आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करना, किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना और कृषि उत्पादों से वैकल्पिक ईंधन तैयार करना है। यही नीति अब चीनी की कीमतों को लेकर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कांग्रेस इसे सरकार की प्राथमिकताओं से जोड़कर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि एथेनॉल को चीनी की महंगाई का सीधा कारण बताना तथ्यात्मक रूप से अधूरा निष्कर्ष है।
महंगाई का मुद्दा जनता से सीधे जुड़ा होने के कारण दोनों दल इसे अपने-अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रहे हैं। कांग्रेस के लिए चीनी की बढ़ती कीमत सरकार की आर्थिक नीतियों पर हमला करने का अवसर है। वहीं भाजपा इसे विपक्ष की ओर से सरकार को बदनाम करने की कोशिश के तौर पर पेश कर रही है। राजनीतिक रूप से यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महंगाई का असर सीधे परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ता है। चीनी भले ही रोजमर्रा की खरीदारी में बड़ी वस्तु न हो, लेकिन इसके दाम बढ़ने का असर चाय, मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।
एथेनाल और चीनी की कीमतों के बीच संबंध को लेकर राजनीतिक दावों से अलग वास्तविक तस्वीर उत्पादन और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। गन्ने का कितना हिस्सा चीनी के लिए और कितना एथेनाल के लिए जाता है, चीनी का उत्पादन कितना हुआ, घरेलू मांग कितनी है और बाजार में उपलब्ध स्टाक कितना हैकृइन सभी पहलुओं को देखे बिना केवल एक कारण तय करना आसान नहीं है। यही वह जगह है जहां राजनीतिक बहस और आर्थिक विश्लेषण अलग-अलग रास्ते पकड़ लेते हैं। कांग्रेस इसे सरकार की नीति का परिणाम बता रही है, जबकि भाजपा इसे विपक्ष का प्रोपेगेंडा बता रही है। लेकिन आम उपभोक्ता के लिए बहस का केंद्र इससे कहीं सरल हैकृबाजार में चीनी कितने की मिल रही है और आगे इसकी कीमत कहां जाएगी?
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले महंगाई जैसे मुद्दे राजनीतिक दलों के लिए अहम होते जा रहे हैं। कांग्रेस यदि चीनी की कीमतों को एथेनाल नीति से जोड़कर व्यापक महंगाई के मुद्दे में बदलती है तो भाजपा को सरकार की नीतियों का बचाव करना होगा। वहीं भाजपा के लिए चुनौती केवल कांग्रेस के आरोपों को प्रोपेगेंडा बताने की नहीं, बल्कि उपभोक्ता को यह भरोसा दिलाने की भी होगी कि सरकार महंगाई पर नजर रख रही है। फिलहाल चीनी की मिठास पर सियासत कड़वी होती जा रही है। कांग्रेस के लिए एथेनाल सरकार की नीति पर सवाल उठाने का हथियार है तो भाजपा के लिए वही मुद्दा विपक्ष के प्रोपेगेंडा का उदाहरण। असली फैसला राजनीतिक मंचों पर नहीं, बाजार की कीमतों और उपभोक्ता की जेब करेगी।
मिशन 2027 के लिए बूथ पर ‘कमल’
बूथ सशक्तिकरण से भाजपा का चुनावी आगाज
संगठन को जमीनी स्तर पर धार देने की तैयारी
प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में गठित की गई टीम
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर भाजपा ने अब अपनी रणनीति को पूरी तरह बूथ स्तर तक ले जाने की कवायद तेज कर दी है। संगठन को चुनावी मोड में लाते हुए पार्टी बूथ सशक्तिकरण अभियान के जरिये धरातल पर अपनी चुनावी रणनीति का आगाज करने जा रही है। इसके लिए प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में बूथ सशक्तिकरण अभियान की टीम का गठन किया गया है। भाजपा का फोकस अब केवल बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों और नेताओं की सभाओं तक सीमित रहने के बजाय बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने पर है। पार्टी की रणनीति है कि प्रत्येक बूथ पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाई जाए, स्थानीय स्तर पर मतदाताओं से संपर्क मजबूत किया जाए और संगठन की योजनाओं एवं सरकार की उपलब्धियों को घर-घर तक पहुंचाया जाए।
भाजपा की चुनावी राजनीति में बूथ प्रबंधन हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी एक बार फिर इसी माडल को मजबूत करने में जुटी है। बूथ सशक्तिकरण अभियान के तहत कमजोर बूथों की पहचान, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, पन्ना स्तर तक संपर्क और स्थानीय मुद्दों की जानकारी जुटाने पर जोर दिए जाने की रणनीति है। पार्टी की कोशिश यह भी है कि बूथ स्तर पर संगठन केवल चुनाव के समय सक्रिय दिखाई न दे, बल्कि लगातार जनता के बीच मौजूद रहे। इसके लिए बूथ अध्यक्ष से लेकर पन्ना प्रमुख और अन्य जिम्मेदार कार्यकर्ताओं की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने की तैयारी की जा रही है।
बूथ सशक्तिकरण अभियान को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में टीम गठित की गई है। यह टीम संगठनात्मक जिलों और मंडलों के साथ समन्वय करते हुए बूथों की स्थिति का आकलन करेगी और आवश्यकतानुसार कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां सौंपेगी। भाजपा की रणनीति में यह अभियान इसलिए भी अहम है क्योंकि विधानसभा चुनाव में हर सीट का परिणाम बूथ स्तर के प्रदर्शन से तय होता है। पार्टी कमजोर बूथों को चिन्हित कर वहां संगठन की पकड़ मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे सकती है। बूथ सशक्तिकरण अभियान को केवल संगठनात्मक कवायद न रखकर सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों से भी जोड़ने की तैयारी है। भाजपा कार्यकर्ताओं के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने के साथ ही लाभार्थियों से संपर्क मजबूत करने की रणनीति पर काम करेगी।
पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि सरकार की उपलब्धियों और संगठन के संदेश को स्थानीय स्तर के मुद्दों से कैसे जोड़ा जाए। उत्तराखंड में रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, महंगाई और आपदा जैसे सवाल जनता के बीच महत्वपूर्ण हैं। बूथ स्तर का कार्यकर्ता इन मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया संगठन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीधी टक्कर कांग्रेस से मानी जा रही है। ऐसे में बूथ सशक्तिकरण अभियान को पार्टी की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा जहां अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे का लाभ उठाना चाहती है, वहीं कांग्रेस भी लगातार संगठन को सक्रिय करने और सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए चुनौती सत्ता विरोधी रुझानों को रोकने के साथ-साथ युवा, महिला और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंच बनाने की भी है। बूथ स्तर का नेटवर्क इस काम में पार्टी के लिए सबसे उपयोगी माध्यम बन सकता है।
भाजपा की ओर से बूथ सशक्तिकरण अभियान की टीम का गठन इस बात का संकेत है कि 2027 की चुनावी तैयारियां अब बैठकों और रणनीति दस्तावेजों से आगे बढ़कर जमीन पर उतरने लगी हैं। आने वाले महीनों में संगठनात्मक गतिविधियों, बूथ बैठकों और मतदाता संपर्क अभियानों में तेजी देखने को मिल सकती है। कुल मिलाकर भाजपा ने चुनावी रण में उतरने से पहले अपना सबसे मजबूत हथियार धारदार करने की तैयारी शुरू कर दी हैकृबूथ। अब देखना होगा कि बूथ सशक्तिकरण अभियान संगठन को कितनी मजबूती देता है और 2027 के चुनावी मुकाबले में भाजपा की जमीन कितनी पुख्ता कर पाता है।
एसआईआर पर ‘सियासी’ टकराव
बीएलओ और बीएलए-2 को धमकाने का आरोप
चुनाव आयोग से मिला भाजपा का प्रतिनिधिमंडल
प्रक्रिया बाधित करने वालों पर कार्रवाई की मांग
देहरादून। उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर एसआईआर प्रक्रिया को प्रभावित करने और बूथ स्तर पर काम कर रहे बीएलओ तथा पार्टी के बीएलए-2 को कथित रूप से धमकाने का आरोप लगाया है। भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए एसआईआर की प्रक्रिया बाधित करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की। भाजपा का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से बूथ स्तर पर भ्रम और दबाव का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी का कहना है कि निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और राजनीतिक दलों के अधिकृत प्रतिनिधियों को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दिया जाना चाहिए।
भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रखते हुए कहा कि एसआईआरजैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में किसी भी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। पार्टी ने आयोग से मांग की कि बीएलओ और बीएलए-2 के काम में बाधा डालने, उन्हें धमकाने अथवा दबाव बनाने की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। भाजपा नेताओं का कहना है कि मतदाता सूची का शुद्ध और पारदर्शी होना चुनाव की विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी है। यदि बूथ स्तर पर ही प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास होगा तो इसका असर पूरी चुनावी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर कांग्रेस एसआईआर को लेकर पहले से ही निर्वाचन आयोग और भाजपा पर सवाल उठाती रही है। कांग्रेस का आरोप है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में यदि वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित होते हैं तो इसका सीधा असर मताधिकार पर पड़ेगा। पार्टी ने बूथ स्तर पर निगरानी और अपने प्रतिनिधियों की सक्रिय भूमिका की बात कही है। यही वजह है कि एसआईआर अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। मतदाता सूची को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दल आमने-सामने हैं और हर पक्ष दूसरे पर चुनावी लाभ के लिए प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगा रहा है।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 में प्रस्तावित हैं। ऐसे में मतदाता सूची का पुनरीक्षण राजनीतिक दलों के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया है। चुनाव से पहले मतदाता सूची में नाम जुड़ने, हटने या संशोधन की प्रक्रिया पर राजनीतिक दलों की नजर स्वाभाविक रूप से बनी हुई है। भाजपा का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है। पार्टी ने आयोग से आग्रह किया कि प्रक्रिया में किसी भी तरह की बाधा को गंभीरता से लिया जाए और कानून के तहत कार्रवाई हो। वहीं कांग्रेस की ओर से लगातार यह सवाल उठाया जा रहा है कि कहीं पुनरीक्षण की प्रक्रिया के नाम पर वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित न हों। ऐसे में आने वाले दिनों में एसआईआर को लेकर दोनों दलों की सियासी बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं।
एसआईआर को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ते आरोप-प्रत्यारोप ने निर्वाचन आयोग के सामने भी चुनौती बढ़ा दी है। आयोग के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि पूरी प्रक्रिया राजनीतिक विवाद से अलग, पारदर्शी और नियमों के मुताबिक पूरी हो। मतदाता सूची में एक भी वास्तविक मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना गंभीर विषय है, वहीं अपात्र नामों की मौजूदगी भी चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती है। इसलिए राजनीतिक आरोपों के बीच असली कसौटी प्रक्रिया की पारदर्शिता और शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण की होगी।
फिलहाल एसआईआर उत्तराखंड में चुनावी राजनीति का नया मोर्चा बन चुका है। भाजपा आयोग के दरवाजे पर पहुंचकर कांग्रेस पर प्रक्रिया बाधित करने का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस पहले से ही एसआईआर को लेकर सवाल उठा रही है। 2027 के चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर छिड़ी यह सियासी जंग आने वाले दिनों में और धार पकड़ सकती है।
शनिवार, 22 अगस्त 2026
udaydinmaan: 60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’
udaydinmaan: 60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’: आमजन के लिए उम्र की सीमा, साहबों के लिए आजीवन कुर्सी कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, पद बदलते हैं पर चेहरा वही पेंशन भी जेब में और भारी-भरकम सं...
60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’
आमजन के लिए उम्र की सीमा, साहबों के लिए आजीवन कुर्सी
कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, पद बदलते हैं पर चेहरा वही
पेंशन भी जेब में और भारी-भरकम संविदा का वेतन भी जारी
अफसरों के लिए अनलिमिटेड एक्सटेंशन पर उठे गंभीर सवाल
देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी नौकरी की एक अजीब कहानी है। कर्मचारी की उम्र 60 साल होती है, फाइलों में सेवा समाप्त हो जाती है, पेंशन शुरू हो जाती है, लेकिन कुछ अफसरों की सरकारी पारी खत्म नहीं होती। कुर्सी बदल जाती है, पदनाम बदल जाता है, कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, कभी आयोग तो कभी किसी समिति में नई भूमिका मिल जाती है। यानी सरकारी नौकरी का कैलेंडर आम आदमी के लिए चलता है, लेकिन कुछ खास अफसरों के लिए शायद अतिरिक्त पन्ने भी रखे गए हैं। सवाल यह नहीं है कि किसी सेवानिवृत्त अफसर की विशेषज्ञता का इस्तेमाल क्यों किया जाए। सवाल यह है कि किस आधार पर, कितने समय के लिए और किस पारदर्शी प्रक्रिया के तहत? उत्तराखंड में सेवानिवृत्त सरकारी सेवकों की जनहित और अपरिहार्यता की स्थिति में पुनर्नियुक्ति का प्रावधान है। शासन के एक आदेश में सलाहकार, परामर्शी, विशेष कार्याधिकारी और विशेषज्ञ समन्वयक जैसे पदों पर संविदा के आधार पर तैनाती की व्यवस्था का उल्लेख है।
यहीं से असली सवाल पैदा होता है। अगर सरकार को किसी अफसर का अनुभव इतना जरूरी लगता है कि रिटायरमेंट के बाद भी उसे सरकारी काम सौंपना पड़े, तो फिर क्या राज्य में नई पीढ़ी के अधिकारियों और विशेषज्ञों की कमी है? और अगर कमी है तो उसे दूर करने की योजना क्या है? उत्तराखंड का युवा नौकरी के लिए परीक्षा देता है। हजारों युवा सालों तैयारी करते हैं। रिक्तियों का इंतजार करते हैं। भर्ती परीक्षाओं की तारीख देखते हैं। कभी परीक्षा टलती है, कभी परिणाम का इंतजार होता है। दूसरी तरफ सरकारी व्यवस्था में ऐसी तस्वीर दिखाई देती है जिसमें रिटायर होने के बाद भी अनुभवी अफसरों के लिए सरकारी दरवाजे बंद नहीं होते।
यह विरोधाभास सवाल पूछता है। क्या सरकारी व्यवस्था अनुभव के नाम पर एक ही चेहरे को बार-बार मौका देती रहेगी? सरकार कह सकती है कि अनुभवी अफसरों की जरूरत है। बिल्कुल है। अनुभव किसी भी प्रशासन की पूंजी है। लेकिन अनुभव और स्थायी सरकारी पुनर्वास में अंतर है। किसी विशेष परियोजना के लिए विशेषज्ञ की जरूरत हो तो निश्चित अवधि की नियुक्ति समझ में आती है। लेकिन अगर रिटायरमेंट के बाद लगातार नई जिम्मेदारियां मिलती रहें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकारी व्यवस्था में पदों का एक अनौपचारिक पोस्ट-रिटायरमेंट क्लब तैयार हो रहा है? और यह सवाल सिर्फ एक सरकार का नहीं है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन यह व्यवस्था कई बार अपना रास्ता खोज लेती है।
लोकतंत्र में कुर्सी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती। सरकारी पद जनता के पैसे से चलते हैं। इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि रिटायरमेंट के बाद किसी अधिकारी की पुनर्नियुक्ति क्यों की गई, उसके लिए चयन की प्रक्रिया क्या रही, कितने उम्मीदवारों पर विचार हुआ और उसकी नियुक्ति की समयसीमा क्या है। वरना विशेषज्ञता शब्द धीरे-धीरे पहचान का दूसरा नाम बन सकता है। उत्तराखंड जैसे युवा राज्य में यह बहस और जरूरी है। यहां बेरोजगार युवाओं की सबसे बड़ी शिकायत सिर्फ नौकरी की कमी नहीं, बल्कि अवसरों की समानता को लेकर भी है। जब युवा देखता है कि एक ओर सरकारी पदों के लिए उम्र सीमा खत्म हो जाती है और दूसरी ओर कुछ रिटायर अफसरों के लिए सरकारी व्यवस्था में नई भूमिकाएं निकल आती हैं, तो उसके मन में सवाल पैदा होना स्वाभाविक है। सरकार को इस व्यवस्था के लिए एक साफ नीति बनानी चाहिए।
रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति अपवाद हो, परंपरा नहीं। हर पुनर्नियुक्ति के साथ कारण सार्वजनिक हो। पद की अवधि तय हो। काम का स्पष्ट दायरा हो। प्रदर्शन की समीक्षा हो। और जहां काम किसी नियमित सेवा अधिकारी या नए विशेषज्ञ से कराया जा सकता है, वहां सिर्फ पुराने प्रशासनिक संपर्कों के आधार पर नियुक्ति न हो। क्योंकि लोकतंत्र में अनुभव जरूरी है, लेकिन अवसरों का दरवाजा हमेशा एक ही पीढ़ी के लिए खुला रहना जरूरी नहीं है। उत्तराखंड को अब यह तय करना होगा कि सरकारी सेवा का मतलब 60 साल की उम्र में खत्म होने वाली नौकरी है या फिर कुछ लोगों के लिए सरकारी व्यवस्था में चलती रहने वाली दूसरी पारी? अगर दूसरी पारी जरूरी है तो उसके नियम सबके सामने होने चाहिए। वरना जनता यही पूछेगीकृकि सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट हुआ है या सिर्फ पदनाम से?
बेटी का न्याय बनाम ‘सियासी जंग’
अंकिता भंडारी केस में आखिर कब तक चलेगी बयानबाजी
सीबीआई जांच पर खिंची तलवारों के बीच सवाल दरकिनार
अंकिता की आत्मा को न्याय चाहिए, राजनीति की रोटियां नहीं
प्रकरण पर सियासत तेज,जांच अदालत में या बयानों के मंच पर
देहरादून। अंकिता प्रकरण उत्तराखंड के लिए सिर्फ एक मुकदमा नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है, जो एक बेटी के परिवार से लेकर पूरे समाज तक फैला हुआ है। ऐसे मामले में सबसे जरूरी चीज हैकृन्याय। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि न्याय की इस लंबी यात्रा के बीच राजनीति लगातार अपना रास्ता खोज लेती है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि अंकिता प्रकरण में सीबीआई जांच को लेकर सरकार और जांच एजेंसी की भूमिका सवालों के घेरे में है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष का कहना है कि कांग्रेस इस संवेदनशील मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाने में जुटी है और केंद्रीय जांच ब्यूरो तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर नियमानुसार जांच कर रही है। यहीं से असली सवाल पैदा होता हैकृकि क्या किसी जांच की दिशा बयानबाजी से तय होगी या सबूतों से? किसी भी आपराधिक मामले में अदालत के सामने आरोप नहीं, साक्ष्य टिकते हैं। जांच एजेंसी का काम प्रेस कांफ्रेंस में फैसला सुनाना नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों, दस्तावेजों, बयानों और वैज्ञानिक साक्ष्यों की पड़ताल करना है। सीबीआई हो या कोई दूसरी जांच एजेंसी, उसकी जांच का अंतिम मूल्यांकन अदालत में होना है। लेकिन राजनीति को अदालत का इंतजार कम ही पसंद आता है।
एक तरफ कांग्रेस सवाल पूछ रही है। दूसरी तरफ भाजपा उन सवालों को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज कर रही है। टीवी स्क्रीन और सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप का शोर बढ़ता जा रहा है। मगर इस शोर में सबसे महत्वपूर्ण आवाज कहीं पीछे छूटने का खतरा हैकृअंकिता के परिवार की न्याय की आवाज। कांग्रेस यदि सीबीआई जांच पर सवाल उठाती है तो उसे सिर्फ राजनीतिक बयान देने के बजाय ठोस तथ्यों के साथ अपनी आपत्तियां सामने रखनी चाहिए। कौन-सा साक्ष्य नजरअंदाज हुआ? किस बिंदु पर जांच में कमी है? किस तथ्य की अनदेखी की गई? जनता को यह बताया जाना चाहिए। उधर सरकार और भाजपा के पास भी केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि सीबीआई स्वतंत्र एजेंसी है। जनता का भरोसा सिर्फ इस वाक्य से नहीं बनता। जांच की प्रक्रिया में पारदर्शिता, अदालत में मजबूत पैरवी और पीड़ित परिवार को समय पर न्यायकृयही भरोसा पैदा करते हैं। क्योंकि जनता अब राजनीतिक दावों से आगे देखना चाहती है।
अंकिता प्रकरण में वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवार के लिए हर नया बयान शायद पुराने जख्म को फिर खोलता है। इसलिए राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि किसी बेटी की त्रासदी को चुनावी पोस्टर, प्रेस नोट और राजनीतिक भाषण का विषय बनाने से न्याय नहीं मिलता और यहां एक असुविधाजनक सवाल दोनों पक्षों से है। अगर जांच सही है तो अदालत में साक्ष्य बोलने दीजिए। अगर जांच में कमी है तो ठोस तथ्य सामने रखिए। सिर्फ राजनीति हो रही है कहकर हर सवाल को खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक जवाब नहीं है। और हर जांच को साजिश बताकर संदेह पैदा करना भी न्याय प्रक्रिया को मजबूत नहीं करता।
उत्तराखंड के लोगों ने इस प्रकरण में बहुत कुछ देखा हैकृआक्रोश, आंदोलन, राजनीतिक आरोप, वादे और फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया। अब जनता को बहस नहीं, परिणाम चाहिए। राजनीति अपनी जगह है। जांच अपनी जगह। अदालत अपनी जगह। अंकिता के मामले में सबसे जरूरी यह है कि जांच निष्पक्ष हो, साक्ष्यों के आधार पर हो और अदालत के सामने पूरा सच पहुंचे। दोषी कौन है, इसका फैसला राजनीतिक दलों के मंच से नहीं, कानून और न्यायालय की प्रक्रिया से होना चाहिए। क्योंकि आखिर में सवाल यह नहीं रहेगा कि किस पार्टी ने कितनी प्रेस कांफ्रेंस कीं। सवाल यह रहेगा कि अंकिता को न्याय मिला या नहीं? और इस सवाल का जवाब किसी पार्टी के प्रवक्ता के पास नहीं, न्याय की प्रक्रिया के पास होना चाहिए।
वोटर लिस्ट पर ‘सियासी जंग’
ड्रामेबाजी और घुसपैठिए के बयानों में उलझा लोकतंत्र का असली सवाल
मतदाता सूची के बहाने कांग्रेस की घेराबंदी और भाजपा का काउंटर अटैक
अगर सूची में खोट नहीं तो इतने सवाल क्यों और खोट है तो सुधार कब होगा
विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कांग्रेस आक्रामक, भाजपा ने साधा निशाना
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प तस्वीर दिखाई दे रही है। एक तरफ कांग्रेस विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर लगातार सवाल उठा रही है, दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस की इस मुहिम को ड्रामेबाजी बताकर उसके जमीनी संगठन पर सवाल खड़े कर रही है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस जमीनी राजनीति में कमजोर हो चुकी है और अब मतदाता सूची के मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन लोकतंत्र में असली सवाल यह नहीं कि कौन किसे ड्रामेबाज कह रहा है। असली सवाल यह है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसे ठीक कौन करेगा और अगर गड़बड़ी नहीं है तो इतने सवाल क्यों उठ रहे हैं? भाजपा कह रही है कि उत्तराखंड की सरकार यहां की जनता चुनेगी, कोई घुसपैठिया नहीं। राजनीतिक संदेश साफ हैकृमतदाता सूची की शुचिता को राष्ट्रीय सुरक्षा और पहचान के सवाल से जोड़कर कांग्रेस पर दबाव बनाना। भाजपा के लिए यह मुद्दा चुनावी रणनीति का हिस्सा भी है और अपने समर्थक मतदाताओं को सक्रिय करने का माध्यम भी।
कांग्रेस के सामने चुनौती दूसरी है। सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस, बयान और आरोपों से चुनाव नहीं जीते जाते। चुनाव बूथ पर लड़ा जाता है। मतदाता से संपर्क, संगठन की सक्रियता, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और कार्यकर्ताओं की मौजूदगीकृयही जमीनी राजनीति की असली परीक्षा है। यदि कांग्रेस एसआईआर को लेकर गंभीर है तो उसे बूथ स्तर तक अपने प्रतिनिधि उतारने होंगे, प्रभावित मतदाताओं की सूची तैयार करनी होगी और तथ्य के साथ चुनाव आयोग के सामने आपत्तियां रखनी होंगी। वरना भाजपा का ड्रामेबाजी वाला आरोप कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार बन सकता है। लेकिन भाजपा को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सूची कोई राजनीतिक प्रचार का दस्तावेज नहीं, लोकतंत्र की बुनियाद है। किसी वास्तविक भारतीय मतदाता का नाम केवल प्रक्रिया की गड़बड़ी के कारण छूटता है तो उसका नुकसान किसी पार्टी को नहीं, लोकतंत्र को होता है। इसलिए एसआईआर को लेकर उठ रहे हर गंभीर सवाल का जवाब तथ्यों से देना जरूरी है।
घुसपैठिया नहीं, जनता चुनेगी सरकारकृयह राजनीतिक नारा सुनने में प्रभावी हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत मतदाता की पहचान से आगे उसकी स्वतंत्र पसंद में है। मतदाता कौन है, यह कानून और चुनावी प्रक्रिया तय करेगी और किसे वोट देना है, यह जनता तय करेगी और यहीं 2027 की लड़ाई दिलचस्प होती जा रही है। भाजपा अपने संगठन और बूथ नेटवर्क के भरोसे कांग्रेस पर बढ़त का दावा कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल, बेरोजगारी, भर्ती विवाद, महंगाई, पलायन और स्थानीय मुद्दों को हथियार बनाने की कोशिश में है। लेकिन इन मुद्दों को वोट में बदलने के लिए कांग्रेस को बयानबाजी से कहीं आगे जाना होगा।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा भाजपा नहीं, उसकी अपनी जमीनी निष्क्रियता है। यदि पार्टी के नेता राजधानी में एसआईआर पर रोज बयान देते रहें और गांव-कस्बे के बूथ पर कार्यकर्ता दिखाई न दे, तो राजनीति प्रेस नोट में जरूर जिंदा रह सकती है, चुनाव में नहीं। दूसरी ओर भाजपा यदि संगठन की ताकत के भरोसे यह मान ले कि चुनाव पहले ही जीत लिया गया है तो वह भी गलती करेगी। उत्तराखंड का मतदाता कई बार सत्ता को चौंकाने की क्षमता रखता है। पहाड़ के गांव से लेकर मैदानी शहर तक मतदाता अपने मुद्दों पर फैसला करता है और चुनाव के दिन राजनीतिक समीकरणों की सारी गणित बदल सकता है। इसलिए एसआईआर का मुद्दा सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई नहीं होना चाहिए। यह सवाल होना चाहिए कि किसका नाम मतदाता सूची में है, किसका नाम नहीं है और क्यों नहीं है।
चुनावी शोर में यह बुनियादी सवाल दबना नहीं चाहिए। क्योंकि सरकार न भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट चुनेगा, न कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस। सरकार वही चुनेगा जिसके सामने आखिर में मतदाता अपना वोट डालेगा और उस मतदाता को घुसपैठिया कहकर नहीं, उसके अधिकार और भरोसे के साथ देखना होगा। 2027 की असली लड़ाई अभी शुरू हुई है। एसआईआर उसका एक अध्याय है। फैसला पूरी किताब पर होगा।
शुक्रवार, 21 अगस्त 2026
udaydinmaan: गुलदार और भालू के बाद ‘नई आफत’
udaydinmaan: गुलदार और भालू के बाद ‘नई आफत’: पहाड़ों में खूंखार आवारा कुत्तों का कहर, गांवों और रास्तों पर बना दहशत का माहौल चमोली के नारायणबगड़ में हिंसक कुत्तों के डर से 10 स्कूलों में ...
गुलदार और भालू के बाद ‘नई आफत’
पहाड़ों में खूंखार आवारा कुत्तों का कहर, गांवों और रास्तों पर बना दहशत का माहौल
चमोली के नारायणबगड़ में हिंसक कुत्तों के डर से 10 स्कूलों में 4 दिन का अवकाश घोषित
स्कूल बंद होने के चलते अब घर बैठे आनलाइन माध्यम से पढ़ाई करने को मजबूर छात्र
मीलों पैदल सफर तय कर स्कूल जाने वाले नौनिहालों और अभिभावकों की उड़ी रातों की नींद
देहरादून। पहाड़ में वन्यजीवों के बाद अब आवारा और हिंसक कुत्तों का आतंक भी लोगों के लिए चिंता का सबब बनता जा रहा है। चमोली जिले के नारायणबगड़ क्षेत्र में आवारा और हिंसक कुत्तों के बढ़ते आतंक को देखते हुए प्रशासन ने स्कूली बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर बड़ा फैसला लिया है। क्षेत्र के दस विद्यालयों में 20 अगस्त से 23 अगस्त तक छात्र-छात्राओं के लिए अवकाश घोषित कर दिया गया है। इस दौरान विद्यालयों में ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई जारी रखने के निर्देश दिए गए हैं।
पहाड़ के दूरदराज इलाकों में बच्चों का स्कूल तक पहुंचना पहले ही किसी चुनौती से कम नहीं है। कई बच्चे पैदल रास्तों से होकर विद्यालय पहुंचते हैं। ऐसे में रास्तों में हिंसक कुत्तों के झुंड का खतरा बच्चों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा रहा है। प्रशासन को बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूल बंद करने जैसा कदम उठाना पड़ा, यह स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में कभी बाघ और गुलदार की दस्तक, कभी भालू का आतंक और अब आवारा कुत्तों के झुंड ग्रामीण आबादी के सामने नई चुनौती बनते जा रहे हैं। सवाल यह है कि जिन पहाड़ी क्षेत्रों में बच्चों को रोजाना कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचना पड़ता है, वहां उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
नारायणबगड़ क्षेत्र में आवारा और हिंसक कुत्तों के आतंक को लेकर जिलाधिकारी चमोली की ओर से दिए गए निर्देशों के बाद मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने विद्यालयों के लिए आदेश जारी किया। आदेश में संबंधित विकासखंड शिक्षा अधिकारी और उप शिक्षा अधिकारी को इसका अनुपालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही अवकाश की अवधि में संबंधित विद्यालयों के शिक्षकों को आनलाइन माध्यम से शिक्षण कार्य संचालित करने को कहा गया है, ताकि बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित न हो।इस संबंध में मुख्य शिक्षा अधिकारी, चमोली की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि नारायणबगड़ क्षेत्र में आवारा और हिंसक कुत्तों के अत्यधिक आतंक को देखते हुए जिलाधिकारी चमोली के निर्देशों के अनुपालन में छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के दृष्टिगत यह निर्णय लिया गया है।
आदेश के मुताबिक नारायणबगड़ क्षेत्र के राजकीय इंटर कालेज नारायणबगड़, राजकीय बालिका इंटर कालेज नारायणबगड़, सरस्वती शिशु मंदिर नारायणबगड़, उत्तरांचल विद्या निकेतन नारायणबगड़, राजकीय प्राथमिक विद्यालय नारायणबगड़, श्री गुरु राम राय पब्लिक स्कूल पैंती, राजकीय प्राथमिक विद्यालय नलंगाव, राजकीय इंटर कालेज नलंगाव, माडर्न चिल्ड्रन एकेडमी नारायणबगड़ और उत्तराखंड विद्या निकेतन नारायणबगड़ में यह आदेश लागू रहेगा।
बाक्स
वन्यजीवों के बाद आवारा कुत्तों का संकट
उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लंबे समय से गंभीर समस्या बना हुआ है। पहाड़ के गांवों में बाघ, गुलदार और भालू की आवाजाही से ग्रामीणों में भय बना रहता है। अब कई क्षेत्रों में आवारा और हिंसक कुत्तों के झुंड भी लोगों की सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहे हैं। नारायणबगड़ का ताजा मामला इस बात का संकेत है कि पहाड़ी क्षेत्रों में मानव सुरक्षा का संकट केवल जंगल से आने वाले वन्यजीवों तक सीमित नहीं रह गया है। सड़कों, बाजारों और आबादी के आसपास घूमने वाले आवारा कुत्ते भी प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बन चुके हैं। चार दिन के लिए स्कूल बंद करने का फैसला बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से तत्काल राहत जरूर है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 23 अगस्त के बाद क्या होगा? यदि कुत्तों के आतंक पर स्थायी नियंत्रण नहीं हुआ तो बच्चों की पढ़ाई, अभिभावकों की चिंता और ग्रामीणों की सुरक्षा का सवाल फिर सामने खड़ा होगा। अब निगाह प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है कि वह केवल स्कूल बंद करने तक सीमित रहता है या आवारा और हिंसक कुत्तों की समस्या के स्थायी समाधान के लिए ठोस कदम भी उठाता है।
‘एक्स्ट्रा इनकम’ का लाइसेंस
उत्तराखंड में डाक्टरों को भी जल्द ही मिलेगा शाम का बाजार
मजबूरी से निकलकर एक्स्ट्रा इनकम बनी देशभर में अधिकार
डाक्टरों की निजी प्रैक्टिस की छूट से व्यवस्था पर उठेंगे सवाल
देहरादून। सरकारी नौकरी में तनख्वाह मिलती है। तनख्वाह के बदले कर्मचारी से उम्मीद की जाती है कि वह अपने पद की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएगा। लेकिन धीरे-धीरे इस व्यवस्था में एक नया शब्द घुस आया हैकृएक्स्ट्रा इनकम। पहले यह शब्द फुसफुसाकर बोला जाता था। अब लगता है कि इसे व्यवस्था ने बाकायदा स्वीकार करना शुरू कर दिया है। पुलिस में ऊपर की कमाई की कहानियां पुरानी हैं। सरकारी दफ्तरों में फाइल आगे बढ़ाने की अपनी फीस है। कहीं काम कराने की कीमत है, कहीं काम रोकने की कीमत। कहीं ठेका है तो कहीं कमीशन। कहीं परमिट है तो कहीं सिफारिश। जनता को धीरे-धीरे समझा दिया गया कि सरकारी नौकरी की असली कमाई वेतन पर्ची में नहीं, उसके बाहर है और अब बेचारे डाक्टर भी बच गए थे। सरकार ने कहाकृउन्हें भी शाम को मरीज देखने दीजिए।
खबर सुनकर शायद कोई कहेगा कि इसमें बुराई क्या है? डाक्टर हैं, मेहनत करेंगे, अतिरिक्त कमाई करेंगे। लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है। अगर सरकारी अस्पताल की नौकरी के बाद उसी सरकारी अस्पताल में निजी प्रैक्टिस होगी, तो मरीज सरकारी रहेगा या निजी? डाक्टर सरकारी रहेगा या निजी? अस्पताल सरकारी रहेगा या कमाई का साझा मंच? उत्तराखंड में सरकारी चिकित्सकों को शाम के समय सरकारी अस्पतालों में सशर्त निजी प्रैक्टिस की अनुमति देने की तैयारी है। यानी अब व्यवस्था का मॉडल कुछ ऐसा दिखाई दे रहा हैकृदिन में सरकार की नौकरी, शाम को उसी व्यवस्था में निजी कमाई। इसे सुविधा कहिए, सुधार कहिए या डाक्टरों को रोकने की कोशिश। लेकिन जनता का सवाल इससे खत्म नहीं होता। क्योंकि सरकारी अस्पताल में आने वाला गरीब मरीज यह सोचकर आता है कि यहां उसे निजी अस्पताल की तुलना में राहत मिलेगी। वह डाक्टर की फीस और अस्पताल के खर्च से बचने की उम्मीद लेकर आता है। अगर उसी सरकारी परिसर में निजी प्रैक्टिस का रास्ता खुलता है तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि सरकारी सेवा और निजी सेवा के बीच दीवार कहां होगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारी व्यवस्था धीरे-धीरे ऐसी दुकान बन जाए जिसमें काउंटर दो होंकृएक सरकार के नाम पर और दूसरा निजी कमाई के नाम पर?
यह सवाल डाक्टरों के खिलाफ नहीं है। बिल्कुल नहीं। डाक्टर मेहनत करते हैं, कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, दूरदराज के इलाकों में सेवाएं देते हैं। स्वास्थ्य विभाग में डाक्टरों की कमी भी वास्तविक समस्या है और सरकारी आंकड़ों में मेडिकल आफिसर और विशेषज्ञों के पदों पर रिक्तियां दर्ज हैं। लेकिन सवाल व्यवस्था का है। अगर डाक्टरों को रोकने के लिए उन्हें अतिरिक्त कमाई का रास्ता देना जरूरी हो गया है, तो अगला सवाल यह होना चाहिए कि पुलिस को क्या दिया जाएगा? फिर पटवारी क्यों पीछे रहे? फिर तहसील का कर्मचारी क्यों पीछे रहे? फिर वह क्लर्क क्यों पीछे रहे जिसकी मेज पर आपकी फाइल पड़ी है? फिर हर सरकारी विभाग में एक बोर्ड क्यों न लगा दिया जाए।कृसरकारी सेवा समय-सुबह से शाम तक और एक्स्ट्रा इनकम का समय-शाम के बाद। व्यंग्य लग रहा है? लेकिन खतरा यहीं है।
जब व्यवस्था किसी अनौपचारिक एक्स्ट्रा इनकम को रोकने में असफल होती है, तो उसके सामने दो रास्ते होते हैं। पहलाकृभ्रष्टाचार और अनौपचारिक कमाई पर कठोर कार्रवाई। दूसराकृउसे किसी न किसी रूप में वैध या स्वीकार्य बनाने का रास्ता। दूसरा रास्ता आसान है। जनता भी धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाती है। पहले लोग कहते थेकृबिना पैसे काम नहीं होता। फिर कहने लगेकृसाहब की भी मजबूरी है। अब कहीं ऐसा न हो कि अगली पीढ़ी पूछेकृकि सरकारी नौकरी में एक्स्ट्रा इनकम कितनी है?यही असली खतरा है। सरकार को डाक्टरों के लिए अतिरिक्त कमाई का रास्ता खोलना है तो नियम इतने साफ होने चाहिए कि सरकारी सेवा की कीमत पर निजी कमाई का खेल न हो। मरीज को पहले यह अधिकार होना चाहिए कि उसे सरकारी अस्पताल में सरकारी सेवा किस कीमत पर और किस व्यवस्था में मिलेगी। क्योंकि सरकारी अस्पताल गरीब की मजबूरी नहीं, उसका अधिकार है।
सरकारी डाक्टर सिर्फ एक कर्मचारी नहीं होता। वह राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का चेहरा होता है। जिस डाक्टर को जनता अपने टैक्स से वेतन देती है, उससे जनता को यह उम्मीद भी होती है कि उसका इलाज प्राथमिकता होगा, न कि उसकी जेब और यही सवाल पुलिस और दूसरे विभागों पर भी लागू होता है। सरकारी नौकरी अगर सेवा है तो सेवा की कीमत वेतन है। अगर वेतन कम है तो वेतन बढ़ाइए। काम का दबाव ज्यादा है तो व्यवस्था सुधारिए। डाक्टरों की कमी है तो भर्ती कीजिए। अस्पतालों में सुविधाएं नहीं हैं तो सुविधाएं बढ़ाइए। लेकिन हर समस्या का समाधान एक्स्ट्रा इनकम क्यों बनता जा रहा है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार व्यवस्था सुधारने के बजाय व्यवस्था की कमियों को कमाई का अवसर बनाकर छोड़ रही है? जनता को सरकारी अस्पताल में इलाज चाहिए, सरकारी दफ्तर में काम चाहिए, पुलिस से सुरक्षा चाहिए और विभागों से जवाबदेही। उसे यह नहीं चाहिए कि हर सेवा के साथ कोई एक्स्ट्रा जुड़ा हुआ हो। क्योंकि जिस दिन सरकारी सेवा और निजी कमाई के बीच की रेखा मिट गई, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान गरीब का होगा। फिर सरकारी अस्पताल अस्पताल नहीं रहेगा, सरकारी दफ्तर दफ्तर नहीं रहेगा और सरकारी नौकरी नौकरी नहीं रहेगीकृसब कुछ एक बाजार में बदल जाएगा और बाजार में सबसे कमजोर हमेशा वही होता है जिसके पास पैसे कम होते हैं। इसलिए सवाल डाक्टरों को अतिरिक्त कमाई की अनुमति देने से ज्यादा बड़ा है। क्या सरकार सरकारी व्यवस्था को मजबूत कर रही है या धीरे-धीरे जनता को यह समझा रही है कि हर सरकारी सेवा के पीछे एक एक्स्ट्रा देना सामान्य बात है? क्योंकि ‘एक्स्ट्रा इनकम’ की यह छोटी-सी दरार कल पूरी व्यवस्था की दीवार में बड़ा छेद बन सकती है।
आजादी के ‘महामंत्र’ पर राजनीति
वंदे मातरम के गायन पर आमने-सामने भाजपा और कांग्रेस
पूरे गायन पर उठे सवाल और सियासत का बन गया नया केंद्र
भाजपा ने बनाया हथियार, कांग्रेस की मंशा पर उठाए सवाल
देहरादून। जिस देश की आजादी की लड़ाई में वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज बन गया था, उसी देश में इसके गायन को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा होना निश्चित तौर पर गंभीर सवाल पैदा करता है। कांग्रेस की ओर से कार्यक्रमों में वंदे मातरम के पूरे गायन को लेकर उठे सवालों ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का मौका दे दिया है। भाजपा इसे राष्ट्रभावना से जोड़कर कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार बना रही है, जबकि कांग्रेस की ओर से इसे राजनीतिक मुद्दा बनाए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
आजादी के आंदोलन के दौर में वंदे मातरम ने लोगों के भीतर राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम किया। स्वतंत्रता सेनानियों के नारों में यह गूंजता था और ब्रिटिश शासन के विरोध का प्रतीक बन चुका था। ऐसे में इस गीत को लेकर किसी भी तरह का विवाद भावनात्मक रूप से देश के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है।
भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस का रवैया राष्ट्रवादी प्रतीकों को लेकर हमेशा से दोहरा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जिस वंदे मातरम को स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में अपनी आवाज बनाया, उसके गायन से कांग्रेस का पीछे हटना दुर्भाग्यपूर्ण है। भाजपा इस मुद्दे को कांग्रेस की कथित तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़कर भी देख रही है। हालांकि इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी है। वंदे मातरम के इतिहास, इसके विभिन्न पदों और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका को समझे बिना इसे सिर्फ राजनीतिक नारे में बदल देना भी उचित नहीं होगा। राष्ट्रगीत का सम्मान और उसके राजनीतिक इस्तेमाल के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
असल सवाल यह है कि क्या देशभक्ति का प्रमाण अब इस बात से तय होगा कि कौन कितना जोर से वंदे मातरम गाता है? अगर कोई दल या नेता इसके गायन को लेकर सवाल उठाता है तो उससे सवाल जरूर होना चाहिए। लेकिन इसी के साथ यह भी पूछा जाना चाहिए कि आजादी के आंदोलन के प्रतीकों का इस्तेमाल सिर्फ चुनावी राजनीति के लिए क्यों किया जा रहा है? वंदे मातरम् की ताकत उसकी धुन में नहीं, उस इतिहास में है जिसमें यह करोड़ों भारतीयों की आवाज बना था। इसलिए इसे राजनीतिक अखाड़े में खींचने के बजाय उसके ऐतिहासिक महत्व और राष्ट्रीय भावना का सम्मान किया जाना चाहिए।
कांग्रेस के लिए भी यह राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मामला है। अगर उसके किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर असमंजस या अनिच्छा दिखाई देती है तो पार्टी को देश के सामने अपना पक्ष साफ करना चाहिए। उसे यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह वंदे मातरम के सम्मान और उसके गायन के खिलाफ है या केवल उसके राजनीतिक इस्तेमाल का विरोध कर रही है। क्योंकि जनता के लिए संदेश महत्वपूर्ण है। जिस गीत को स्वतंत्रता आंदोलन में देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे लोगों ने अपनी आवाज बनाया, उसके प्रति किसी भी राजनीतिक दल की असंवेदनशीलता सवालों के घेरे में आएगी।
लेकिन भाजपा को भी यह समझना होगा कि राष्ट्रभक्ति किसी एक राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। वंदे मातरम किसी पार्टी का गीत नहीं, देश के स्वतंत्रता संघर्ष की ऐतिहासिक विरासत है। इसलिए इसे लेकर राजनीति जितनी कम होगी, सम्मान उतना ही ज्यादा रहेगा। देश को आज भी वंदे मातरम की जरूरत हैकृलेकिन राजनीतिक हथियार के रूप में नहीं, उस साझा राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में जिसने कभी अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने का साहस दिया था।
लोकतंत्र की पहली शर्त पर ‘पालिटिकल वार’
उत्तराखंड में मतदाता सूची पर बढ़ी रार, मतदाता सूची की शुद्धि पर गरमाई राजनीति
वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का खतरा, कांग्रेस ने सत्यापन की उठाई मांग
सूची की सफाई पर विरोध क्यों, भाजपा बोली फर्जी नामों को हटाना बेहद जरूरी
देहरादून। लोकतंत्र की सबसे पहली शर्त है कि मतदाता सूची साफ हो, सही हो और उसमें वही नाम हों जो वास्तव में मतदान के पात्र हैं। लेकिन उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासत लगातार गरमाती जा रही है। कांग्रेस इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा इसे मतदाता सूची को शुद्ध करने की जरूरी कवायद बता रही है। सवाल अब यह उठ रहा है कि अगर एसआईआर का मकसद मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है तो कांग्रेस को इससे परेशानी क्यों हो रही है?
कांग्रेस का तर्क है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का खतरा है और किसी भी पात्र नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। पार्टी लगातार मांग कर रही है कि प्रक्रिया पारदर्शी हो और प्रत्येक नाम हटाने से पहले उचित सत्यापन किया जाए। लेकिन भाजपा कांग्रेस के इस विरोध को राजनीतिक चश्मे से देख रही है। भाजपा नेताओं का सवाल है कि अगर मतदाता सूची में फर्जी, डुप्लीकेट या अपात्र नाम हैं तो उन्हें हटाने का विरोध क्यों? लोकतंत्र में मतदाता सूची जितनी साफ होगी, चुनाव उतने ही निष्पक्ष होंगे। यहीं से एसआईआर सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक बहस का मुद्दा बन जाता है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर वह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता की बात करती है तो उसे मतदाता सूची के शुद्धिकरण का सिद्धांततः विरोध क्यों करना चाहिए? उसे यह स्पष्ट करना होगा कि वह एसआईआर के खिलाफ है या उस तरीके के खिलाफ जिसमें एसआईआर को लागू किया जा रहा है। दूसरी तरफ सरकार और निर्वाचन तंत्र की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। सिर्फ यह कह देना पर्याप्त नहीं कि सूची शुद्ध की जा रही है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वास्तविक मतदाता का नाम गलती से न कटे। खासकर पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में जहां पलायन, अस्थायी निवास और दस्तावेजों से जुड़े सवाल पहले से जटिल हैं, वहां विशेष सावधानी की जरूरत है।
मतदाता सूची की शुचिता लोकतंत्र की बुनियाद है। इसमें फर्जी नाम नहीं होने चाहिए, लेकिन किसी वास्तविक नागरिक का नाम भी सिर्फ तकनीकी गलती से नहीं हटना चाहिए। कांग्रेस को बताना होगा कि उसे शुद्ध मतदाता सूची से परेशानी है या प्रक्रिया से और सरकार को बताना होगा कि वह शुद्धिकरण के नाम पर किसी वास्तविक मतदाता के अधिकार की रक्षा कैसे करेगी। आखिर चुनाव सिर्फ जीतने-हारने का खेल नहीं है। मतदाता सूची में दर्ज हर नाम लोकतंत्र में एक नागरिक की आवाज है। इसलिए एसआईआर पर राजनीति हो सकती है, लेकिन मतदाता के अधिकार से खिलवाड़ नहीं।
2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच मतदाता सूची पर उठते सवालों को हल्के में लेना किसी भी दल के लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है। कांग्रेस हो या भाजपाकृदोनों को याद रखना होगा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा वोट बैंक कोई पार्टी नहीं, खुद मतदाता है।
चुनावी रण से पहले ‘मीडिया मैनेजमेंट’ एक्टिव
भाजपा फुल एक्टिव, कांग्रेस सुस्त, बाकी दलों की आवाज कहां
मीडिया मैनेजमेंट के मोर्चे पर भाजपा सबसे आगे, कांग्रेस है पीछे
चुनाव से पहले कांग्रेस के पास मौके, लेकिन प्रचार मशीनरी बंद
भाजपा चला रही विज्ञप्ति-बाण, कांग्रेस का संचार तंत्र अभी सुस्त
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियों का रिहर्सल शुरू कर दिया है। कहीं बूथ मजबूत किए जा रहे हैं, कहीं संगठन की बैठकें हो रही हैं और कहीं टिकट के दावेदार शक्ति प्रदर्शन में जुटे हैं। लेकिन इस पूरी चुनावी तैयारी में एक ऐसा मोर्चा भी है, जहां भाजपा फिलहाल बाकी दलों से काफी आगे दिखाई दे रही हैकृमीडिया मैनेजमेंट। अखबारों के न्यूजरूम तक पहुंचने वाली प्रेस विज्ञप्तियों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी दिलचस्प है। भाजपा की ओर से एक दिन में पांच से दस तक विज्ञप्तियां पहुंच रही हैं। बयान, कार्यक्रम, संगठनात्मक बैठकें, सरकार की उपलब्धियां, विपक्ष पर हमले और स्थानीय गतिविधियांकृहर मुद्दे को मीडिया तक पहुंचाने की कोशिश दिखाई दे रही है। इसके उलट कांग्रेस की तरफ से कई दिनों में महज एक-दो विज्ञप्तियां ही पहुंचती हैं। पार्टी के पास मुद्दे हैं, नेता हैं, बयान हैं और सरकार को घेरने के मौके भी हैं, लेकिन उन्हें लगातार और व्यवस्थित तरीके से मीडिया तक पहुंचाने की मशीनरी उतनी सक्रिय नजर नहीं आती। चुनाव में यह अंतर सिर्फ प्रेस विज्ञप्तियों का नहीं, राजनीतिक संचार की तैयारी का संकेत है।
भाजपा ने लंबे समय से यह समझ लिया है कि चुनाव सिर्फ मैदान में नहीं लड़ा जाता। चुनाव की लड़ाई अखबारों, टीवी चैनलों, डिजिटल प्लेटफार्म और सोशल मीडिया पर भी लड़ी जाती है। इसलिए पार्टी के पास संगठन के साथ-साथ संदेश पहुंचाने का तंत्र भी लगातार सक्रिय रहता है। एक कार्यक्रम हुआ नहीं कि तस्वीरें तैयार। नेता ने बयान दिया नहीं कि प्रेस नोट तैयार। सरकार ने कोई उपलब्धि गिनाई नहीं कि उसका प्रचार शुरू। विपक्ष ने कोई आरोप लगाया नहीं कि उसका जवाब भी तैयार। यानी भाजपा का संदेश हैकृखबर खत्म होने से पहले हमारी प्रतिक्रिया खबर में होनी चाहिए। इसके सामने कांग्रेस का मीडिया तंत्र कई बार ऐसा दिखाई देता है जैसे पार्टी को खबर बनने के बाद खबर याद आती हो। कांग्रेस के पास बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों की कमी नहीं है। सरकार को घेरने के लिए उसके पास सामग्री की पूरी फाइल है। लेकिन सवाल यह है कि उस फाइल को रोज जनता तक पहुंचाने वाला कौन है?
राजनीति में मुद्दा होना पर्याप्त नहीं है। मुद्दे को जनता की भाषा में लगातार सामने रखना भी पड़ता है। कांग्रेस अगर सप्ताह में एक-दो बार प्रेस नोट जारी करके यह मान ले कि उसने विपक्ष की भूमिका निभा दी, तो भाजपा की लगातार चलने वाली मीडिया मशीनरी के सामने उसका संदेश स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ेगा और बाकी दल? उनकी स्थिति तो और भी कठिन है। उत्तराखंड क्रांति दल राज्य की अस्मिता, मूल निवास और क्षेत्रीय मुद्दों की राजनीति को फिर से धार देने की कोशिश कर रहा है। आम आदमी पार्टी सरकार और विपक्ष दोनों पर सवाल उठा सकती है। बसपा का अपना सामाजिक आधार है। वाम दलों के पास मुद्दों की कमी नहीं। छोटे क्षेत्रीय और नए राजनीतिक समूह भी चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन मीडिया में मौजूदगी के मामले में इनमें से अधिकांश दल या तो कभी-कभार दिखाई देते हैं या चुनाव के करीब आते ही सक्रिय होने की उम्मीद में बैठे हैं। यहीं सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि मीडिया कोई चुनावी लाउडस्पीकर नहीं है, जिसे मतदान से दो महीने पहले आन कर दिया जाए।
जनता को लगातार बताना पड़ता है कि पार्टी क्या सोचती है, क्या चाहती है और सत्ता में आने पर क्या करेगी। भाजपा इस मोर्चे पर फिलहाल बाकी दलों से आगे है। लेकिन कांग्रेस के लिए यह स्थिति चेतावनी भी है और अवसर भी। अगर कांग्रेस सचमुच 2027 को गंभीरता से ले रही है तो उसे सिर्फ बड़े नेताओं के दौरों और प्रेस कान्फ्रेंस तक सीमित रहने के बजाय डेली मीडिया नैरेटिव बनाना होगा। हर दिन का एक मुद्दा, सरकार पर एक सवाल, जनता की एक समस्या और उसका राजनीतिक समाधानकृयह लगातार जनता तक जाना चाहिए। क्योंकि चुनाव में जनता को वही दिखाई देता है जो लगातार दिखाई देता है। यहां एक और दिलचस्प सवाल हैकृक्या मीडिया मैनेजमेंट चुनाव जिताता है?
सिर्फ मीडिया मैनेजमेंट से चुनाव नहीं जीता जा सकता। लेकिन खराब मीडिया मैनेजमेंट चुनावी संदेश को जरूर कमजोर कर सकता है। भाजपा अगर रोज दस बातें जनता तक पहुंचा रही है और कांग्रेस रोज एक बात भी मुश्किल से पहुंचा रही है तो जनता के सामने किसकी मौजूदगी ज्यादा होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है और छोटे दलों के लिए तो चुनौती और बड़ी है। उनके पास संसाधन कम हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके पास खबरें नहीं हैं। आज डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, स्थानीय पत्रकारों और क्षेत्रीय मुद्दों के माध्यम से कम खर्च में भी मजबूत राजनीतिक संवाद बनाया जा सकता है। लेकिन उसके लिए चाहिएकृनियमितता, रणनीति और राजनीतिक संदेश की स्पष्टता।
उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की जमीन तैयार हो रही है। भाजपा संगठन और मीडिया दोनों स्तर पर पहले से सक्रिय दिखाई दे रही है। कांग्रेस सरकार विरोधी माहौल को राजनीतिक विकल्प में बदलने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसके संदेश की निरंतरता सवालों में है। यूकेडी और दूसरे छोटे दल जनता के मुद्दे उठा रहे हैं, मगर उनकी आवाज का विस्तार सीमित है। आखिर चुनाव सिर्फ यह नहीं है कि कौन जनता के बीच गया। यह भी है कि कौन जनता के दिमाग में लगातार मौजूद रहा और मीडिया की इस लड़ाई में अभी तस्वीर साफ है।कृभाजपा रोज दस्तक दे रही है, कांग्रेस कभी-कभार दरवाजा खटखटा रही है और बाकी दल शायद यह इंतजार कर रहे हैं कि चुनाव की तारीख घोषित हो और दरवाजा अपने आप खुल जाए। लेकिन राजनीति में दरवाजे अपने आप नहीं खुलते, उन्हें रोज खटखटाना पड़ता है।
गुरुवार, 20 अगस्त 2026
udaydinmaan: भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू
udaydinmaan: भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू: 19 जिलों में भाजपा की नई तैनाती, चुनावी बिसात पर संगठन प्रभारी-सह प्रभारियों की नियुक्ति महज संगठन विस्तार ही नहीं विस चुनाव से पहले बूथ तक ...
भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू
19 जिलों में भाजपा की नई तैनाती, चुनावी बिसात पर संगठन
प्रभारी-सह प्रभारियों की नियुक्ति महज संगठन विस्तार ही नहीं
विस चुनाव से पहले बूथ तक पकड़ मजबूत करने की कवायद
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में डालना शुरू कर दिया है। पार्टी ने प्रदेश के 19 सांगठनिक जिलों के लिए प्रभारी और सह प्रभारी नियुक्त कर दिए हैं। पहली नजर में यह सामान्य संगठनात्मक फेरबदल दिखाई दे सकता है, लेकिन चुनावी राजनीति के लिहाज से देखें तो भाजपा का यह कदम काफी महत्वपूर्ण है। पार्टी ने जिलों में ऐसे समय पर जिम्मेदारियां तय की हैं, जब चुनावी मैदान तैयार हो रहा है और टिकट से लेकर बूथ प्रबंधन तक हर स्तर पर राजनीतिक समीकरण तेजी से आकार ले रहे हैं। भाजपा की राजनीति में संगठन केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाला ढांचा नहीं है। बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक लगातार सक्रिय रहने वाला कैडर उसका सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार माना जाता है। यही वजह है कि 19 सांगठनिक जिलों में प्रभारी और सह प्रभारियों की नियुक्ति को 2027 की चुनावी रणनीति की शुरुआती बड़ी कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।
उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों का चुनाव केवल बड़े राजनीतिक नारों से नहीं जीता जाता। यहां पहाड़ और मैदान की अलग-अलग राजनीतिक जरूरतें हैं। कुमाऊं और गढ़वाल के भीतर भी क्षेत्रवार मुद्दे और जातीय-सामाजिक समीकरण अलग हैं। ऐसे में प्रदेश मुख्यालय से चुनावी रणनीति बनाने के बजाय उसे जिले और मंडल स्तर तक पहुंचाना भाजपा की प्राथमिकता होगी। नए प्रभारी और सह प्रभारी इसी काम की कड़ी होंगे। उनकी जिम्मेदारी केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहेगी। संगठन की वास्तविक स्थिति, बूथ कमेटियों की सक्रियता, स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल, सरकार की योजनाओं का प्रचार और जनता के बीच पार्टी की पकड़ जैसे मुद्दों पर भी नजर रखनी होगी। यानी भाजपा चुनाव आने से पहले ही यह जान लेना चाहती है कि कौन सा बूथ मजबूत है, कहां संगठन कमजोर है और कहां पार्टी के भीतर ही असंतोष चुनावी नुकसान का कारण बन सकता है।
भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल संगठन की परीक्षा नहीं है। प्रदेश की सरकार के कामकाज का भी जनमत संग्रह होगा। धामी सरकार डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। लेकिन विपक्ष बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आपदा प्रबंधन और युवाओं से जुड़े सवालों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में जिला प्रभारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें केवल पार्टी का पक्ष जनता तक पहुंचाना नहीं होगा, बल्कि जनता के सवालों और नाराजगी की रिपोर्ट भी ऊपर तक पहुंचानी होगी। क्योंकि चुनावी राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब पार्टी के पास कागजों में मजबूत संगठन हो, लेकिन जमीन पर मतदाता उससे दूरी बनाने लगे।
2027 के चुनाव से पहले भाजपा के सामने एक और बड़ी चुनौती टिकट की होगी। हर विधानसभा क्षेत्र में संभावित दावेदार सक्रिय हो चुके हैं। कई पुराने चेहरे टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं, तो नए नेता भी संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। जिला प्रभारी और सह प्रभारी ऐसे समय में पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें यह भी देखना होगा कि टिकट की होड़ संगठनात्मक गुटबाजी में न बदल जाए। क्योंकि भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष से पहले अपनों की नाराजगी हो सकती है। टिकट कटने के बाद बगावत, भीतरघात या निर्दलीय मैदान में उतरने की स्थिति पार्टी के चुनावी गणित को बिगाड़ सकती है।
भाजपा की यह कवायद कांग्रेस के लिए भी राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस अभी संगठन को मजबूत करने और चुनावी चेहरे को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट करने में जुटी है। ऐसे में भाजपा यदि डेढ़ साल पहले ही जिलेवार संगठन की जिम्मेदारी तय कर रही है तो इसका अर्थ साफ हैकृपार्टी चुनाव को अंतिम छह महीने की लड़ाई नहीं मान रही। भाजपा चाहती है कि चुनाव की घोषणा होने से पहले ही उसका संगठन मतदाता तक पहुंच चुका हो। सरकार की उपलब्धियां बूथ तक पहुंचें, लाभार्थियों से संपर्क हो, स्थानीय मुद्दों की पहचान हो और कमजोर सीटों पर पहले से काम शुरू किया जाए।
हालांकि भाजपा की संगठनात्मक ताकत किसी से छिपी नहीं है, लेकिन चुनाव केवल संगठन के दम पर नहीं जीते जाते। अंततः मतदाता यह तय करता है कि सरकार ने उसके जीवन में कितना बदलाव किया। 19 जिलों में प्रभारी-सह प्रभारी नियुक्त करना भाजपा की तैयारी का संकेत जरूर है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि 2027 का चुनाव पार्टी के लिए आसान होगा। पहाड़ की नाराजगी, युवाओं के रोजगार के सवाल, सरकारी नौकरियों की भर्ती, पलायन, महिलाओं की सुरक्षा और महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी हवा का रुख बदल सकते हैं। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ संगठन खड़ा करने की नहीं, बल्कि संगठन को जनता की नब्ज पढ़ने वाली मशीन बनाने की है।
2027 की चुनावी बिसात पर भाजपा ने पहली बड़ी चाल चल दी है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रभारी और सह प्रभारी पार्टी के लिए सिर्फ बैठकें और रिपोर्ट तैयार करते हैं या वास्तव में जमीन पर संगठन की कमजोर नसों को पकड़ पाते हैं। क्योंकि चुनाव बूथ पर लड़ा जाएगा, लेकिन उसका फैसला जनता के मन में होगा।
एसआईआर की सुनवाई में कांग्रेस की ‘निगरानी’
कांग्रेस पार्टी की हर दावे-आपत्ति पर नजर रखने की है तैयारी
मतदाता सूची को लेकर चुनावी साल में बढ़ेगी सियासी तपिश
एसआईआर में आपत्तियों के दौरान मौजूद रहेंगे कांग्रेस प्रतिनिधि
देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी हलचल अब और तेज होने के आसार हैं। कांग्रेस ने संकेत दिया है कि एसआईआर के तहत होने वाली सुनवाई के दौरान वह अपने प्रतिनिधियों को मौजूद रखेगी। पार्टी का तर्क है कि मतदाता सूची से जुड़े दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी पात्र मतदाता का नाम प्रभावित न हो। कांग्रेस का यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही हैं। चुनावी राजनीति में मतदाता सूची महज प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया की बुनियाद होती है। ऐसे में एसआईआर की हर गतिविधि अब राजनीतिक दलों की निगाह में रहने वाली है।
कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही है। पार्टी सुनवाई के दौरान अपने प्रतिनिधियों के जरिए यह देखने की कोशिश करेगी कि दावे और आपत्तियों पर निर्धारित नियमों के अनुसार कार्रवाई हो रही है या नहीं। कांग्रेस को आशंका है कि प्रक्रिया के दौरान यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटता है या किसी आपत्ति का निस्तारण पारदर्शी तरीके से नहीं होता, तो उसका सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है। यही कारण है कि पार्टी अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय प्रक्रिया के स्तर पर निगरानी बढ़ाने की तैयारी में है।
उत्तराखंड में एसआईआर अब सिर्फ प्रशासनिक कवायद नहीं रह गया है। इसके साथ राजनीतिक दलों की चिंता भी जुड़ गई है। चुनाव से पहले मतदाता सूची में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस पहले भी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी की कोशिश है कि सुनवाई के दौरान उसके प्रतिनिधि मौजूद रहें और जरूरत पड़ने पर आपत्ति या शिकायत को संबंधित स्तर तक पहुंचाया जा सके। भाजपा की ओर से इस पर क्या रुख अपनाया जाता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। यदि सत्तारूढ़ दल और विपक्ष एसआईआर को लेकर आमने-सामने आते हैं तो मतदाता सूची आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है।
कांग्रेस के लिए यह फैसला केवल प्रशासनिक निगरानी का विषय नहीं है। यह उसके संगठन की जमीनी क्षमता की भी परीक्षा है। प्रतिनिधि नियुक्त करना आसान है, लेकिन उन्हें हर स्तर पर सक्रिय रखना बड़ी चुनौती होगी। उन्हें मतदाता सूची समझनी होगी, दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया की जानकारी रखनी होगी और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं के साथ संपर्क बनाए रखना होगा। यानी एसआईआर कांग्रेस के लिए संगठन को बूथ तक सक्रिय करने का अवसर भी बन सकता है। भाजपा लंबे समय से अपने बूथ संगठन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती रही है। ऐसे में कांग्रेस यदि एसआईआर की सुनवाई में अपने प्रतिनिधियों को सक्रिय करती है तो भाजपा को भी अपने संगठन की सक्रियता बनाए रखनी होगी।
2027 के चुनाव में मुकाबला केवल चुनावी सभाओं और नारों का नहीं होगा। मतदाता सूची से लेकर बूथ प्रबंधन तक हर स्तर पर राजनीतिक दलों की तैयारियां निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान यदि बड़ी संख्या में नाम हटने, जोड़ने या दावों-आपत्तियों को लेकर विवाद सामने आते हैं तो मामला राजनीतिक रंग ले सकता है। कांग्रेस इसे चुनावी पारदर्शिता का सवाल बनाएगी, जबकि भाजपा संभवतः प्रक्रिया को नियमों के तहत होने वाली सामान्य चुनावी कवायद बताएगी। लेकिन असली सवाल यह होगा कि अंतिम मतदाता सूची कितनी विश्वसनीय और स्वीकार्य बनती है।
2027 की चुनावी जंग अभी दूर है, लेकिन मतदाता सूची पर निगरानी की लड़ाई शुरू हो चुकी है। कांग्रेस ने सुनवाई में प्रतिनिधि उतारने का फैसला लेकर साफ कर दिया है कि वह एसआईआर को केवल सरकारी प्रक्रिया मानकर चुप बैठने वाली नहीं है। अब देखना होगा कि यह निगरानी लोकतांत्रिक पारदर्शिता तक सीमित रहती है या आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत का नया चुनावी रणक्षेत्र बन जाती है।
वोट की चोट के नारों से सत्ता में ‘खलबली’
सालों की मेहनत, कोचिंग का कर्ज और लगातार रद्द होती परीक्षाओं से सब्र का बांध टूटा
नारों में बदला बेरोजगारों का आक्रोश, 2027 के सियासी समीकरण बिगाड़ने का अल्टीमेटम
शहर-शहर मोदी के खिलाफ जनता का गुस्सा, युवाओं की नाराजगी बनी बड़ी चुनौती
देहरादून/नई दिल्ली। सियासत में नाराजगी कोई नई चीज नहीं है। लेकिन जब नाराजगी सवाल पूछने लगे, जब सवाल नारे बन जाएं और नारे चुनावी बातचीत का हिस्सा बनने लगें, तब सत्ता को ठहरकर सुनना पड़ता है। आज देश के कई हिस्सों में युवाओं के बीच कुछ ऐसा ही माहौल दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में हैं। कहीं युवा कह रहे हैंकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। कहीं सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं और कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों पर सवाल उठाते हुए युवाओं का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है।
इस गुस्से को समझने के लिए सिर्फ राजनीतिक भाषण सुनना काफी नहीं होगा। उस युवा को सुनना होगा जो वर्षों से परीक्षा की तैयारी कर रहा है। वह परिवार सुनना होगा जिसने कोचिंग और रहने पर पैसा खर्च किया। वह अभ्यर्थी सुनना होगा जिसकी परीक्षा रद्द हो गई या जिसकी मेहनत पर प्रश्नपत्र लीक होने की खबर ने पानी फेर दिया। यही वह जगह है जहां पेपर लीक की राजनीति, बेरोजगारी की चिंता और चुनावी नाराजगी एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है।
प्रधानमंत्री मोदी की ओर से राजनीतिक विरोधियों पर किए गए तीखे तंजों के बीच विपक्ष और सोशल मीडिया ने भी अपनी शब्दावली गढ़ ली है। काकरोच जनता पार्टी जैसा व्यंग्य इसी राजनीतिक भाषा की नई अभिव्यक्ति है। नाम चाहे जो हो, असली सवाल नाम का नहीं है। सवाल यह है कि जनता किसे वोट देगी और क्यों देगी?
लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ सरकार की उपलब्धियों का उत्सव नहीं होते। वह जनता की शिकायतों की सुनवाई भी होते हैं और जब युवा अपने अनुभवों को राजनीतिक सवाल में बदलने लगते हैं तो चुनावी समीकरणों में उसका असर पड़ना स्वाभाविक है। आज का युवा केवल यह नहीं पूछ रहा कि देश कितना आगे बढ़ा। वह यह भी पूछ रहा है कि मेरी नौकरी कहां है? मेरी परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं है? मेरी मेहनत की गारंटी कौन देगा? इन सवालों का जवाब किसी नारे से नहीं दिया जा सकता।
पेपर लीक की घटनाओं ने प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। परीक्षा की तैयारी करने वाला युवा सिर्फ किताब नहीं पढ़ता। वह अपनी उम्र के कई साल उस परीक्षा के नाम कर देता है। जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठता है तो नुकसान सिर्फ एक परीक्षा का नहीं होता। नुकसान उस भरोसे का होता है जिसके आधार पर लाखों युवा अपने भविष्य की योजना बनाते हैं। यही वजह है कि पेपर लीक का मुद्दा अब विपक्ष के भाषणों से आगे निकलकर युवाओं की निजी जिंदगी का सवाल बन चुका है। सरकारें जांच की घोषणा कर सकती हैं। एजेंसियां जांच कर सकती हैं। गिरफ्तारियां हो सकती हैं। लेकिन जिस युवा ने दो-तीन साल तैयारी में लगाए, उसके समय का क्या? यही सवाल चुनावी राजनीति में सबसे ज्यादा असहज करने वाला हो सकता है।
भाजपा की ताकत उसका संगठन है। उसका बूथ नेटवर्क है। उसका चुनावी प्रबंधन है। उसके पास प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा राजनीतिक चेहरा है। लेकिन दूसरी तरफ एक ऐसा वर्ग भी है जिसे किसी राजनीतिक दल का स्थायी वोटर मान लेना खतरनाक होगाकृयुवा। यह युवा जाति, क्षेत्र और परंपरागत राजनीतिक पहचान से आगे जाकर रोजगार, परीक्षा, शिक्षा और अवसर की भाषा में सवाल पूछ रहा है। सोशल मीडिया ने इस गुस्से को और तेज कर दिया है। एक शहर में हुआ प्रदर्शन दूसरे शहर तक पहुंच जाता है। एक अभ्यर्थी का वीडियो हजारों युवाओं तक पहुंच जाता है। एक पेपर लीक की खबर देखते ही दूसरे राज्यों के युवा अपने अनुभव साझा करने लगते हैं। यानी पहले जिस नाराजगी को सत्ता स्थानीय घटना मानकर टाल सकती थी, वह अब कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन सकती है।
शहरों की सड़कों पर दिखाई दे रहा गुस्सा अगर गांवों और कस्बों तक पहुंच गया, और युवाओं की नाराजगी मतदान के फैसले में बदल गई, तो 2027 की राजनीति में यह सिर्फ विपक्ष की कहानी नहीं होगीकृयह सत्ता के लिए सबसे बड़ा सवाल बन सकती है और सवाल वही रहेगाकृकि जिस युवा ने नौकरी के लिए अपनी जवानी लगाई, अगर वह सरकार से कहे कि अब वोट सोच-समझकर देंगे, तो क्या सत्ता उसकी आवाज सुनेगी?
वोट नहीं देंगे से किसे देंगे तक का सवाल
हालांकि चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है। सरकार से नाराज होना और विपक्ष को वोट देनाकृदो अलग बातें हैं। अगर कोई युवा कहता है कि वह मौजूदा सरकार को वोट नहीं देगा, तो अगला सवाल होगाकृवह किसे वोट देगा?यही विपक्ष की असली परीक्षा है। सत्ता के खिलाफ गुस्सा पैदा करना आसान है। उस गुस्से को राजनीतिक विकल्प में बदलना कठिन है। युवाओं की नाराजगी को वोट में बदलने के लिए विपक्ष को सिर्फ मोदी विरोध से आगे जाना होगा। उसे रोजगार, परीक्षा सुधार, भर्ती कैलेंडर, पेपर लीक पर जवाबदेही और युवाओं के भविष्य का स्पष्ट रोडमैप देना होगा।वरना चुनाव के बाद यही गुस्सा फिर सोशल मीडिया पर लौट सकता है।
चुनावी साल में सबसे बड़ा सवाल
सियासत में अक्सर बड़े मुद्दों के बीच छोटे-छोटे सवाल दब जाते हैं। लेकिन कभी-कभी वही छोटे सवाल चुनाव का बड़ा मुद्दा बन जाते हैं। एक बेरोजगार युवक का सवाल। एक रद्द हुई परीक्षा का सवाल। एक पेपर लीक से टूटे भरोसे का सवाल। एक परिवार की आर्थिक चिंता का सवाल और फिर वह वाक्यकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। यह वाक्य अपने आप में चुनाव का परिणाम नहीं बताता। लेकिन यह जरूर बताता है कि सत्ता के सामने सवाल खड़े हो चुके हैं। अब देखना यह है कि इन सवालों का जवाब भाषणों से दिया जाता है या नीतियों से। क्योंकि लोकतंत्र में जनता को हमेशा चुप नहीं कराया जा सकता। कभी-कभी जनता चुप रहती है, कभी सड़क पर आती है और कभी ईवीएम के सामने खड़ी होकर जवाब देती है।
उत्तराखंड कांग्रेस में ‘हलचल’
कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में हरीश रावत शिरकत ने बढ़ाई सियासी हलचल
लंबे राजनीतिक अनुभव के बल पर रावत एक बार फिर पार्टी में अपनी धमक
नए नेतृत्व की चर्चाओं के बीच उनकी सक्रियता से समीकरण बदलने के आसार
देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की सक्रियता चर्चा में है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में उनकी शिरकत ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत की भूमिका को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाते रहे हैं, ऐसे में पार्टी के शीर्ष मंच पर उनकी मौजूदगी को महज औपचारिकता मानने के बजाय राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल हैं जिनकी प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान और व्यापक राजनीतिक अनुभव है। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री तक की जिम्मेदारी संभाल चुके रावत लगातार प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। हालांकि पिछले कुछ समय में कांग्रेस के भीतर नई पीढ़ी के नेतृत्व और संगठनात्मक बदलाव को लेकर जिस तरह की कवायद हुई है, उसमें रावत की सक्रियता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। बैठक में उनकी मौजूदगी ने इन चर्चाओं को फिर हवा दे दी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस हाईकमान उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत के अनुभव का फिर से अधिक इस्तेमाल करने की तैयारी में है? 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखने और सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में राजनीतिक वोट में बदलने की है। ऐसे में हरीश रावत जैसे अनुभवी नेता की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। रावत प्रदेश के राजनीतिक भूगोल, सामाजिक समीकरण और कांग्रेस संगठन की अंदरूनी राजनीति से लंबे समय से परिचित हैं। पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक उनकी राजनीतिक पहुंच को पार्टी चुनावी रणनीति में इस्तेमाल करना चाहे तो यह कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है। उत्तराखंड कांग्रेस में पिछले कुछ समय से नेतृत्व को लेकर कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिले हैं। नई प्रदेश कार्यकारिणी, संगठन को मजबूत करने की कोशिश और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच पार्टी को पुराने अनुभवी नेताओं और नए नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना होगा। हरीश रावत की सक्रियता इसी संतुलन की राजनीति का हिस्सा मानी जा सकती है।
हालांकि इसका यह अर्थ निकालना जल्दबाजी होगा कि रावत को कोई नई औपचारिक जिम्मेदारी मिलने जा रही है। लेकिन कांग्रेस की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था की बैठक में उनकी भागीदारी यह जरूर बताती है कि पार्टी में उनका राजनीतिक महत्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
उत्तराखंड में अगला विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस सत्ता में लौटने के लिए मजबूत रणनीति बनाने में जुटी है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल भाजपा विरोधी वोट को एकजुट करने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के मतभेदों को नियंत्रित करने का भी है। प्रदेश कांग्रेस में अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। ऐसे में हरीश रावत की भूमिका केवल चुनावी चेहरा होने तक सीमित नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर समन्वय कायम करने में भी महत्वपूर्ण हो सकती है। राजनीति में किसी वरिष्ठ नेता की एक बैठक में मौजूदगी को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होता। लेकिन चुनावी साल की ओर बढ़ते उत्तराखंड में हर राजनीतिक गतिविधि के अपने मायने होते हैं।
हरीश रावत की बैठक में मौजूदगी ने कम से कम इतना संकेत जरूर दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्री अभी राजनीतिक पारी के किनारे खड़े होकर सिर्फ घटनाक्रम देखने वाले नेता नहीं हैं। वे राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की गतिविधियों में भागीदारी कर रहे हैं और उत्तराखंड के संदर्भ में उनकी राजनीतिक उपयोगिता भी बनी हुई है। अब नजर इस बात पर होगी कि कांग्रेस हाईकमान आगामी महीनों में रावत को किस भूमिका में देखता है। क्या उन्हें प्रदेश में चुनावी रणनीति की जिम्मेदारी दी जाएगी? क्या वह वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय की भूमिका निभाएंगे? या फिर कांग्रेस उन्हें एक बड़े चुनावी अभियान के चेहरे के तौर पर इस्तेमाल करेगी?
फिलहाल इतना तय है कि हरीश रावत की सक्रियता ने उत्तराखंड कांग्रेस की सियासत में पुराने समीकरणों की फाइल फिर खोल दी है। 2027 की चुनावी बिसात जैसे-जैसे बिछेगी, रावत की भूमिका भी उतनी ही ज्यादा चर्चा में आने की संभावना है।
गलती से भी वोट नहीं देंगे
शहर-शहर मोदी के खिलाफ गुस्सा, सड़क पर जनता
सत्ता के खिलाफ नाराजगी ने बदली राजनीतिक भाषा
प्रदर्शन और सोशल मीडिया के नारों में दिखाअसंतोष
अब सवाल सिर्फ विरोध का नहीं, वोट के फैसले का
देहरादून। देश की राजनीति में नाराजगी अक्सर भाषणों में दिखाई देती है, लेकिन जब यही नाराजगी सड़क पर उतरने लगे तो सत्ता के लिए सवाल थोड़ा कठिन हो जाता है। इन दिनों अलग-अलग मुद्दों को लेकर शहरों में हो रहे प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर उभरते विरोध के बीच एक वाक्य तेजी से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन रहा हैकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। यह सिर्फ एक नारा है या बदलते जनमत का संकेत, इसका फैसला चुनाव में होगा। लेकिन इतना जरूर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को लेकर विपक्षी राजनीति का स्वर अब पहले से ज्यादा आक्रामक है। महंगाई, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ियां, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे इस नाराजगी को लगातार खाद-पानी दे रहे हैं।
आज का राजनीतिक विरोध सिर्फ किसी पार्टी के कार्यालय या बड़ी रैली तक सीमित नहीं है। शहरों में छोटे-छोटे प्रदर्शन हो रहे हैं, युवा अपनी समस्याओं के साथ सामने आ रहे हैं और सोशल मीडिया पर सरकार से सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं। एक समय था जब किसी आंदोलन की आवाज को स्थानीय बताकर नजरअंदाज किया जा सकता था। अब मोबाइल कैमरा उस आंदोलन को कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंचा देता है। यही वजह है कि बेरोजगारी या परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी किसी घटना का असर केवल संबंधित राज्य तक सीमित नहीं रहता। दूसरे राज्यों के युवा भी उसमें अपना भविष्य देखने लगते हैं।
युवाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल रोजगार का है। इसके साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसी घटनाओं ने भरोसे को चोट पहुंचाई है। एक अभ्यर्थी के लिए परीक्षा केवल परीक्षा नहीं होती। उसके पीछे वर्षों की तैयारी, परिवार का खर्च और भविष्य की उम्मीद जुड़ी होती है। जब परीक्षा प्रक्रिया सवालों में घिरती है तो गुस्सा सिर्फ व्यवस्था से नहीं, पूरी राजनीतिक व्यवस्था से होने लगता है। यही गुस्सा अब चुनावी सवाल में बदलने की कोशिश हो रही है। नौकरी चाहिए, भाषण नहीं। पेपर लीक बंद करो। भर्ती कैलेंडर दो। ऐसे सवालों का जवाब राजनीतिक नारों से देना मुश्किल है।
प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता भारतीय राजनीति की बड़ी वास्तविकता है। भाजपा के चुनावी अभियानों का केंद्र भी लंबे समय से मोदी का चेहरा रहा है। ऐसे में उनके खिलाफ उठने वाली आवाज को हल्के में लेना भी संभव नहीं, लेकिन उसे पूरे देश की राय मान लेना भी जल्दबाजी होगी। सड़क पर विरोध करने वाला हर व्यक्ति विपक्ष का मतदाता हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन राजनीति में संकेतों की अपनी अहमियत होती है। यदि सरकार के समर्थक वर्ग के भीतर भी रोजगार, परीक्षा और महंगाई जैसे मुद्दों पर सवाल बढ़ते हैं, तो यह सत्ता के लिए चेतावनी जरूर बन सकता है।
यहां विपक्ष के सामने भी बड़ी चुनौती है। सिर्फ यह कहना कि जनता मोदी से नाराज है, पर्याप्त नहीं होगा। जनता पूछेगीकृतो विकल्प क्या है? युवा पूछेगा कि रोजगार पर आपकी नीति क्या है? परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने के लिए क्या करेंगे? पेपर लीक रोकने की जिम्मेदारी किसकी होगी? सरकारी भर्तियां समय पर कैसे होंगी? यानी सत्ता से नाराजगी को वोट में बदलने के लिए विपक्ष को सिर्फ विरोध नहीं, भरोसे का विकल्प भी देना होगा।
चुनाव अभी दूर हो सकते हैं, लेकिन राजनीति में माहौल पहले बनता है और मतदान बाद में होता है। आज का प्रदर्शन कल का वोट बनेगा, यह तय नहीं। लेकिन आज का सवाल कल के चुनावी मुद्दे में बदल सकता है। गलती से भी वोट नहीं देंगे कहने वाली भीड़ अगर मतदान के दिन भी उसी गुस्से के साथ खड़ी रही, तो सत्ता के लिए यह सामान्य विरोध नहीं रहेगा। क्योंकि लोकतंत्र में जनता पहले सवाल पूछती है, फिर बहस करती है और अंत में वोट के जरिए फैसला सुनाती है। फिलहाल शहरों की सड़कों पर जो आवाज सुनाई दे रही है, वह सत्ता को हटाने का फैसला नहीं है। मगर यह इतना जरूर कह रही है कि जनता को सिर्फ उपलब्धियों की सूची नहीं, अपने सवालों के जवाब भी चाहिए और चुनावी राजनीति में यही सवाल सबसे भारी पड़ते हैं कि नौकरी कहां है? परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं? महंगाई का बोझ कब घटेगा? और अगर जनता नाराज है, तो क्या सत्ता उसकी आवाज सुन रही है?
बुधवार, 19 अगस्त 2026
udaydinmaan: यूकेडी की 70 सीटों पर ‘अकेले’ हुंकार
udaydinmaan: यूकेडी की 70 सीटों पर ‘अकेले’ हुंकार: उत्तराखंड बचाओ यात्रा से अपनी चुनावी जमीन नापेगा यूकेडी यूकेडी के टिकट दावेदार दिखाएंगे अपने समर्थकों संग ताकत विधानसभा चुनाव से पहले यूकेडी...
यूकेडी की 70 सीटों पर ‘अकेले’ हुंकार
उत्तराखंड बचाओ यात्रा से अपनी चुनावी जमीन नापेगा यूकेडी
यूकेडी के टिकट दावेदार दिखाएंगे अपने समर्थकों संग ताकत
विधानसभा चुनाव से पहले यूकेडी ने तेज की सियासी सक्रियता
यात्रा के जरिए संगठन व टिकट दावेदारों की ताकत को परखेगी
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव का माहौल धीरे-धीरे जमीन पर उतरने लगा है। भाजपा और कांग्रेस के साथ अब राज्य आंदोलन की राजनीतिक विरासत का दावा करने वाला उत्तराखंड क्रांति दल यानी यूकेडी भी अपनी चुनावी जमीन मजबूत करने में जुट गया है। पार्टी ने सभी 70 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ऐसे में प्रस्तावित उत्तराखंड बचाओ यात्रा को केवल जनसंपर्क अभियान नहीं, बल्कि आगामी चुनाव के लिए संगठन और संभावित प्रत्याशियों की ताकत परखने की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है। यात्रा के दौरान यूकेडी के टिकट दावेदार अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों से समर्थकों को जुटाकर संगठन के सामने अपनी राजनीतिक पकड़ का प्रदर्शन कर सकते हैं। यानी यह यात्रा एक तरह से कौन कितना मजबूत का अनौपचारिक इम्तिहान भी बन सकती है। जिन दावेदारों के पीछे कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भीड़ दिखाई देगी, वह पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी दावेदारी को मजबूती से रखने की कोशिश करेंगे।
यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि हर विधानसभा क्षेत्र में ऐसा संगठन खड़ा करना है जो मतदान तक सक्रिय रह सके। पार्टी यदि सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ती है तो उसे बड़ी संख्या में मजबूत स्थानीय चेहरों की जरूरत होगी। यही वजह है कि संभावित प्रत्याशियों के लिए अब केवल पार्टी का टिकट मांगना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें यह भी साबित करना होगा कि उनके पास क्षेत्र में कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, स्थानीय मुद्दों की पकड़ और चुनाव लड़ने की क्षमता है। यात्रा इसी शक्ति परीक्षण का मंच बन सकती है। किस विधानसभा क्षेत्र से कितने लोग यात्रा में पहुंचते हैं, कौन-सा दावेदार अपने साथ संगठन के कितने कार्यकर्ताओं को जोड़ पाता है और स्थानीय स्तर पर किस चेहरे को ज्यादा समर्थन मिलता हैकृइन सब पर पार्टी के भीतर स्वाभाविक रूप से नजर रहेगी।
यूकेडी ने हाल के महीनों में अपने पुराने क्षेत्रीय मुद्दों को फिर से राजनीतिक केंद्र में लाने की कोशिश की है। मूल निवास, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन, पलायन और उत्तराखंड की विशिष्ट पहचान जैसे सवाल पार्टी के एजेंडे में प्रमुख हैं। जून में पार्टी की बैठकों में भी मूल निवास और जल-जंगल-जमीन पर उत्तराखंडवासियों के अधिकार को प्रमुख मुद्दा बनाने पर जोर दिया गया था। अगस्त में यूकेडी ने संकल्प, नए उत्तराखंड का नाम से अपना नीतिगत एजेंडा जारी करते हुए अनुच्छेद 371 के तहत विशेष संवैधानिक प्रावधान, मूल निवास को कानूनी मान्यता, व्यापक भू-कानून, रोजगार और पलायन रोकने जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी। यानी उत्तराखंड बचाओ यात्रा के जरिए पार्टी कोशिश कर सकती है कि चुनावी बहस को केवल भाजपा बनाम कांग्रेस के द्वंद्व तक सीमित न रहने दिया जाए।
यूकेडी के संभावित प्रत्याशियों के लिए यह यात्रा दोहरी परीक्षा होगी। एक तरफ उन्हें पार्टी के मुद्दों को जनता तक पहुंचाना होगा, दूसरी तरफ अपने क्षेत्र में अपनी व्यक्तिगत स्वीकार्यता भी दिखानी होगी। खासकर उन सीटों पर जहां कई नेता टिकट की दौड़ में हैं, वहां समर्थकों की मौजूदगी राजनीतिक संदेश देने का काम कर सकती है। लेकिन भीड़ को वोट में बदलना अलग चुनौती होगी। उत्तराखंड की राजनीति में कई बार बड़े जनसमूह और चुनावी परिणाम के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला है। इसलिए पार्टी के सामने सवाल केवल भीड़ जुटाने का नहीं, बल्कि भीड़ को बूथ तक पहुंचाने वाले संगठन का है।
2027 का चुनाव यूकेडी के लिए राजनीतिक अस्तित्व और पुनर्स्थापना का बड़ा अवसर माना जा सकता है। राज्य गठन के आंदोलन से निकली पार्टी लंबे समय से विधानसभा में अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। इस बार पार्टी जिस तरह 70 सीटों पर अकेले उतरने की बात कर रही है, उससे उसके सामने संभावनाओं के साथ जोखिम भी बढ़ गया है। दूसरी ओर, भाजपा सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है और कांग्रेस भी सत्ता परिवर्तन की तैयारी में है। ऐसे में यूकेडी को दोनों बड़े दलों के बीच अपनी अलग राजनीतिक जगह बनानी होगी। उत्तराखंड बचाओ यात्रा इसलिए सिर्फ एक राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि यूकेडी के लिए अपनी ताकत, संगठन और संभावित प्रत्याशियों की परीक्षा भी बन सकती है।
अब देखना यह होगा कि यात्रा खत्म होने के बाद पार्टी के पास सिर्फ तस्वीरों में दिखाई देने वाली भीड़ होगी या फिर विधानसभा क्षेत्रों में खड़ा होने वाला ऐसा संगठन भी, जो 2027 के चुनावी मैदान में मुकाबला कर सके। क्योंकि चुनाव में नारा भीड़ जुटाता है, लेकिन बूथ ही वोट जुटाता है।
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