मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: 70 सीटों पर भाजपा का चुनावी चक्रव्यूह

udaydinmaan: 70 सीटों पर भाजपा का चुनावी चक्रव्यूह: 2027 की जंग के लिए संगठन ने खोले पत्ते, तीसरी बार सत्ता में वापसी की तैयारी प्रभारियों के सामने सीट बचाने से लेकर विपक्ष की घेराबंदी तोड़ने त...

70 सीटों पर भाजपा का चुनावी चक्रव्यूह

2027 की जंग के लिए संगठन ने खोले पत्ते, तीसरी बार सत्ता में वापसी की तैयारी प्रभारियों के सामने सीट बचाने से लेकर विपक्ष की घेराबंदी तोड़ने तक की चुनौती देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव का रण अभी दूर है, लेकिन भाजपा ने सियासी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर प्रभारियों की घोषणा कर पार्टी ने साफ संकेत दे दिया है कि वह चुनाव को अंतिम समय की कवायद नहीं, बल्कि लंबी राजनीतिक लड़ाई के रूप में लड़ने की तैयारी में है। लक्ष्य साफ हैकृलगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी। मगर इस बार भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ जीत दोहराने की नहीं, बल्कि सत्ता विरोधी माहौल की आशंकाओं को मात देकर अपने चुनावी दावों को जमीन पर साबित करने की भी है। सभी सीटों पर प्रभारियों की तैनाती के साथ भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में लाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अब विधानसभा स्तर पर पार्टी की गतिविधियों, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय समीकरणों और विपक्ष की रणनीति पर नजर रखने की जिम्मेदारी इन प्रभारियों के कंधों पर होगी। पार्टी के लिए यह व्यवस्था चुनावी तैयारियों की निगरानी का माध्यम बनेगी, लेकिन इसके साथ ही प्रभारियों की राजनीतिक क्षमता और संगठन में स्वीकार्यता की परीक्षा भी शुरू हो जाएगी। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने चुनावी लक्ष्य और जमीनी हकीकत के बीच तालमेल बैठाने की है। सत्ता में रहने के दौरान सरकार को अपने फैसलों, घोषणाओं और उपलब्धियों का हिसाब जनता के सामने देना पड़ता है। उत्तराखंड में बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर उठे सवाल, पलायन, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाल सुविधाएं तथा भ्रष्टाचार के आरोप विपक्ष के लिए सरकार को घेरने के प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। ऐसे में केवल संगठनात्मक नियुक्तियों और चुनावी नारों के सहारे सत्ता में वापसी की राह आसान नहीं होगी। विधानसभा प्रभारियों को यह देखना होगा कि किन क्षेत्रों में पार्टी का संगठन मजबूत है और कहां स्थानीय असंतोष उसकी संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, जिन सीटों पर भाजपा को पिछले चुनावों में बढ़त मिली थी, वहां भी पुराना प्रदर्शन दोहराने के लिए नए सिरे से राजनीतिक जमीन तैयार करनी होगी। 70 विधानसभा सीटों पर प्रभारियों की नियुक्ति का एक अहम मकसद चुनाव से पहले विपक्ष की रणनीति का मुकाबला करने के लिए संगठन को सक्रिय रखना भी है। कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनमुद्दों को धार देने की कोशिश करेगी, जबकि क्षेत्रीय और अन्य राजनीतिक ताकतें स्थानीय असंतोष को अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास कर सकती हैं। भाजपा के सामने चुनौती केवल कांग्रेस को रोकने की नहीं, बल्कि उन विधानसभा क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ बनाए रखने की होगी, जहां स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवारों को लेकर असंतोष या क्षेत्रीय मुद्दे चुनावी गणित बदल सकते हैं। उत्तराखंड में कई बार स्थानीय समीकरण और उम्मीदवारों की स्वीकार्यता बड़े राजनीतिक दावों पर भारी पड़ते रहे हैं। इसलिए प्रदेश नेतृत्व की रणनीति का वास्तविक इम्तिहान विधानसभा स्तर पर ही होगा। विधानसभा प्रभारियों की नियुक्ति के बाद अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि यह नेता संगठन को कितना सक्रिय कर पाते हैं। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की पहुंच, स्थानीय समस्याओं की जानकारी, नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय तथा जनता के बीच सरकार की छवि को लेकर फीडबैक जुटाना उनकी भूमिका के अहम हिस्से होंगे। पार्टी के लिए सबसे जरूरी यह होगा कि चुनावी तैयारी कागजों और बैठकों तक सीमित न रहे। यदि किसी विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं की नाराजगी है, जनता में असंतोष है या स्थानीय नेतृत्व को लेकर सवाल हैं, तो उनका समाधान चुनाव से पहले करना होगा। चुनाव के ऐन मौके पर डैमेज कंट्रोल की कोशिश कई बार देर से उठाया गया कदम साबित होती है। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता में वापसी का दावा करना और उसे मतों में बदलना दो अलग-अलग बातें हैं। पार्टी के पास मजबूत संगठन और चुनावी प्रबंधन का अनुभव है, मगर विपक्ष को कमजोर मानकर चलना उसके लिए जोखिम भरा हो सकता है। 70 सीटों पर प्रभारियों की घोषणा से भाजपा ने अपनी चुनावी मंशा जाहिर कर दी है। अब असली सवाल यह है कि क्या यह संगठनात्मक कवायद जनता के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत कर पाएगी? क्या प्रभारियों की रिपोर्ट के आधार पर स्थानीय नाराजगी दूर होगी? और क्या भाजपा सरकार के खिलाफ उठने वाले सवालों का प्रभावी जवाब तैयार कर सकेगी? फिलहाल भाजपा ने चुनावी बिसात पर अपने मोहरे सजा दिए हैं। अब मुकाबला संगठन की ताकत, सरकार के कामकाज और जनता के मूड के बीच होगा। 2027 में तीसरी जीत का सपना तभी साकार होगा, जब पार्टी का चुनावी चक्रव्यूह जमीन पर असर दिखाएगा। वरना 70 सीटों पर प्रभारी तैनात करने का शक्ति प्रदर्शन भी चुनावी नतीजों की गारंटी नहीं बन पाएगा।

बूथ से समाज तक पकड़ मजबूत करेगी भाजपा

अनुसूचित और युवा मोर्चा को संगठन की धार बढ़ाने का जिम्मा सरकार की योजनाओं के प्रचार पर दिया जाएगा अधिक जोर सामाजिक समरसता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने पर जोर देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भाजपा ने अपने संगठनात्मक मोर्चों को सक्रिय करने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी अब सरकार के जनकल्याणकारी कामों को जनता तक पहुंचाने के साथ सामाजिक समरसता के संदेश को भी राजनीतिक अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने में जुटी है। इसी रणनीति के तहत भाजपा प्रदेश महामंत्री संगठन ने अनुसूचित मोर्चा और युवा मोर्चा को सरकार की योजनाओं तथा पार्टी की वैचारिक प्रतिबद्धताओं को जन-जन तक पहुंचाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही बूथ संरचना मजबूत करने और समाज निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने पर जोर दिया है। भाजपा की इस पहल को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले संगठन और सरकार के बीच समन्वय मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी जानती है कि चुनावी मुकाबले में केवल सरकार की उपलब्धियों का दावा करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन उपलब्धियों को विभिन्न सामाजिक वर्गों तक पहुंचाना और उनके बीच संगठन की स्वीकार्यता बनाए रखना भी जरूरी है। अनुसूचित मोर्चा और युवा मोर्चा की भूमिका इसी लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अनुसूचित मोर्चा के माध्यम से भाजपा अनुसूचित समाज के बीच सरकारी योजनाओं, सामाजिक न्याय और समरसता से जुड़े अपने संदेश को मजबूत करना चाहती है। वहीं युवा मोर्चा को युवाओं के बीच संगठन की सक्रियता बढ़ाने और सरकार के कामकाज को लेकर संवाद स्थापित करने की जिम्मेदारी दी जा रही है। इन दोनों मोर्चों की सक्रियता पार्टी के लिए सामाजिक आधार को व्यापक बनाने और स्थानीय स्तर पर संपर्क बढ़ाने का माध्यम बन सकती है। राजनीतिक दृष्टि से यह कवायद इसलिए भी अहम है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में सामाजिक समीकरणों और युवा मतदाताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है। भाजपा के सामने चुनौती यह होगी कि योजनाओं के प्रचार के साथ इन वर्गों की वास्तविक समस्याओं और अपेक्षाओं को भी संगठन के एजेंडे में जगह दी जाए। प्रदेश महामंत्री संगठन ने बूथ संरचना को मजबूत करने पर जोर देकर स्पष्ट किया कि पार्टी की चुनावी रणनीति का आधार जमीनी संगठन ही रहेगा। भाजपा की चुनावी कार्यशैली में बूथ स्तर की सक्रियता को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। पार्टी का प्रयास है कि प्रत्येक बूथ पर कार्यकर्ताओं की टीम सक्रिय रहे, लोगों से निरंतर संपर्क बना रहे और सरकार की योजनाओं की जानकारी सीधे लाभार्थियों तक पहुंचे। लेकिन बूथ स्तर पर संगठन की मजबूती केवल बैठकों और कार्यक्रमों से तय नहीं होगी। कार्यकर्ताओं की सक्रियता, जनता के साथ संवाद और स्थानीय समस्याओं के समाधान में उनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। यही वह स्तर है, जहां सरकार के दावों और जनता के अनुभवों के बीच की दूरी सामने आती है। भाजपा सरकार के जनकल्याणकारी कामों को जनता के बीच स्थापित करने की तैयारी कर रही है, लेकिन आगामी चुनाव में विपक्ष भी सरकार को बेरोजगारी, पलायन, भर्ती प्रक्रियाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण सुविधाओं जैसे मुद्दों पर घेरने की कोशिश करेगा। ऐसे में भाजपा के मोर्चों के सामने केवल उपलब्धियों का प्रचार करने की नहीं, बल्कि जनता के सवालों का जवाब देने की चुनौती भी होगी। युवा मोर्चा के लिए रोजगार और भविष्य की संभावनाओं से जुड़े सवाल अहम रहेंगे, जबकि अनुसूचित मोर्चा के सामने सामाजिक सम्मान, समान अवसर और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचने जैसे विषयों पर संवाद स्थापित करने की जरूरत होगी। यदि संगठन इन सवालों को गंभीरता से उठाता है, तो उसकी सक्रियता चुनावी प्रचार से आगे बढ़कर जनसंपर्क का प्रभावी माध्यम बन सकती है। भाजपा की यह कवायद बताती है कि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए अपने विभिन्न मोर्चों की भूमिका तय करने में जुटी है। सरकार की योजनाओं का प्रचार, सामाजिक समरसता का संदेश और बूथ संरचना को मजबूत करने का लक्ष्य एक ही राजनीतिक रणनीति के अलग-अलग हिस्से हैं। अब देखना होगा कि अनुसूचित और युवा मोर्चा इन निर्देशों को धरातल पर किस तरह लागू करते हैं। संगठन के सामने असली कसौटी यह होगी कि वह सरकारी योजनाओं की जानकारी देने के साथ जनता की अपेक्षाओं और शिकायतों को भी कितनी गंभीरता से सुनता है। भाजपा ने मोर्चों को सक्रिय कर चुनावी तैयारी का संकेत दे दिया है। अब सवाल यह है कि सरकार की उपलब्धियों का संदेश जन-जन तक पहुंचाने की यह मुहिम जनता का भरोसा बढ़ाने में कितनी सफल होती है। 2027 की सियासी लड़ाई में बूथ की मजबूती के साथ सामाजिक स्वीकार्यता भी भाजपा के लिए उतनी ही अहम रहने वाली है।

दायित्वों की सौगात, चुनावी जिम्मेदारी

उत्तराखंड में धामी सरकार में लगातार बंट रहीं है कुर्सियां दायित्वधारियों को विधानसभा चुनाव प्रभारी बनाने पर सवाल संगठन की रणनीति या सियासी संतुलन साधने की कवायद देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ भाजपा और धामी सरकार की सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। एक ओर सरकार लगातार दायित्वों का पिटारा खोलकर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां सौंप रही है, तो दूसरी ओर दायित्वधारियों को विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाए जाने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सवाल यह है कि जब सरकार में दायित्वों के जरिए नेताओं को राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियां दी जा रही हैं, तब उन्हीं चेहरों को चुनावी मोर्चे पर उतारने के पीछे संगठन की रणनीति क्या है? क्या यह चुनावी प्रबंधन को मजबूत करने की कवायद है या फिर पार्टी के भीतर राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास? उत्तराखंड में भाजपा के सामने 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की चुनौती है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पार्टी संगठन को मजबूत करने, विधानसभा स्तर पर चुनावी तैयारियां तेज करने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुटी है। इसी क्रम में विधानसभा प्रभारियों की नियुक्ति और संगठनात्मक जिम्मेदारियों का बंटवारा अहम माना जा रहा है। लेकिन जब चुनावी जिम्मेदारियां ऐसे नेताओं को सौंपी जाती हैं, जो पहले से ही सरकार में दायित्व संभाल रहे हैं, तो इन नियुक्तियों के राजनीतिक संदेश पर चर्चा होना स्वाभाविक है। प्रदेश में दायित्वों का वितरण भाजपा के लिए केवल प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि संगठन और सरकार के बीच तालमेल बनाए रखने का माध्यम भी माना जाता है। लंबे समय से पार्टी के लिए काम करने वाले नेताओं, विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाले चेहरों और कार्यकर्ताओं को दायित्व देकर राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश की जाती है। इससे पार्टी के भीतर असंतोष कम करने और नेताओं को संगठन से जोड़े रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, दायित्वों के लगातार वितरण के बीच यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि इन पदों से सरकार को कितनी वास्तविक प्रशासनिक मदद मिल रही है और कितने दायित्व राजनीतिक प्रबंधन का हिस्सा बनकर रह गए हैं। यदि दायित्वधारी सरकारी जिम्मेदारियों के साथ चुनावी मोर्चे पर भी लगाए जाते हैं, तो उनकी प्राथमिकताओं और जवाबदेही को लेकर स्पष्टता जरूरी है। दायित्वधारियों को विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाए जाने के पीछे भाजपा की मंशा अपने अनुभवी नेताओं का उपयोग चुनावी प्रबंधन में करना हो सकती है। सरकार और संगठन के साथ काम करने का अनुभव रखने वाले नेता स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों, कार्यकर्ताओं की समस्याओं और क्षेत्रीय समीकरणों से परिचित होते हैं। ऐसे में पार्टी को उनसे चुनावी तैयारियों में लाभ मिलने की उम्मीद हो सकती है। लेकिन इस रणनीति की सफलता केवल नियुक्तियों से तय नहीं होगी। चुनाव प्रभारी की भूमिका में विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक आकलन, संगठन की मजबूती, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय, स्थानीय मुद्दों की पहचान और चुनावी रणनीति का प्रभावी क्रियान्वयन शामिल होता है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दायित्वधारी इन जिम्मेदारियों को कितना समय दे पाते हैं और उनके कामकाज का आकलन किस आधार पर किया जाता है। दायित्वों के वितरण और चुनावी नियुक्तियों को लेकर विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का अवसर मिल सकता है। वह इसे राजनीतिक नियुक्तियों, पदों के वितरण और चुनावी लाभ के नजरिये से उठाने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, किसी नियुक्ति को केवल दायित्वधारी होने के आधार पर अनुचित नहीं कहा जा सकता। असली सवाल नियुक्ति की प्रक्रिया, जिम्मेदारी की प्रवृति, कार्यक्षमता और उसके परिणामों का है। यदि सरकार और संगठन इन नियुक्तियों के जरिए चुनावी प्रबंधन को मजबूत करना चाहते हैं, तो उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी दायित्वों का निर्वहन प्रभावित न हो। राजनीतिक जिम्मेदारी और सार्वजनिक पद की जवाबदेही के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना जरूरी है। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल है। पार्टी लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। ऐसे में दायित्वों का वितरण, विधानसभा प्रभारियों की नियुक्ति और विभिन्न मोर्चों को सक्रिय करने की कवायद को व्यापक चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन चुनावी रणनीति की असली परीक्षा जनता के बीच होगी। संगठनात्मक नियुक्तियां तभी प्रभावी साबित होंगी, जब वे स्थानीय स्तर पर पार्टी की पकड़ मजबूत करें, कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करें और जनता के सवालों का जवाब देने में मददगार बनें। केवल पद और जिम्मेदारियां बांटने से चुनावी जीत सुनिश्चित नहीं होती। धामी सरकार के सामने अब दोहरी कसौटी हैकृदायित्वों के जरिए संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना और चुनावी प्रबंधन को प्रभावी बनाना। दायित्वधारियों को चुनावी जिम्मेदारी सौंपना भाजपा की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता का फैसला नियुक्तियों की संख्या नहीं, बल्कि उनके परिणाम करेंगे। सवाल यही है कि क्या यह कवायद 2027 की जीत का मजबूत आधार बनेगी या दायित्वों और पदों की राजनीति पर बहस को और तेज करेगी?

सात साल का ‘सड़कनामा’

नया प्रयोग देहरादून की 40 सड़कों का जिम्मा निजी कंपनी के हवाले 102 किलोमीटर सड़क नेटवर्क की देखरेख प्राइवेट हाथ में गुणवत्ता बिगड़ी तो जवाबदेही तय करने का किया गया है दावा देहरादून। राजधानी की सड़कों पर गड्ढे, उखड़ता डामर और बार-बार मरम्मत की समस्या से निजात दिलाने के लिए लोक निर्माण विभाग ने एक नया प्रयोग शुरू किया है। शहर की 40 प्रमुख सड़कों के रख-रखाव, सुधारीकरण और डामरीकरण की जिम्मेदारी अब सात साल के लिए एक निजी संस्था सरकायास को सौंपी गई है। 102 किलोमीटर लंबे सड़क नेटवर्क के लिए 89 करोड़ रुपये का अनुबंध किया गया है। यह महज सड़क मरम्मत का ठेका नहीं, बल्कि राजधानी की सड़कों के रखरखाव की पूरी व्यवस्था बदलने की कोशिश है। अब तक सड़क निर्माण और मरम्मत के लिए अलग-अलग कार्यों पर टेंडर आमंत्रित किए जाते थे। इससे विभाग को बार-बार निविदा प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था और मरम्मत के काम में समय लगने की शिकायतें सामने आती थीं। नए माडल में एक ही संस्था को लंबे समय तक सड़कों के रख-रखाव की जिम्मेदारी देकर जवाबदेही तय करने की कोशिश की गई है। हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि सात साल तक सड़कों की गुणवत्ता कितनी बनी रहती है और जनता को गड्ढों से कितनी राहत मिलती है। इस अनुबंध की सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी अवधि है। सामान्य तौर पर सड़क निर्माण के बाद कुछ समय बीतते ही मरम्मत की जरूरत सामने आने लगती है। इसके बाद विभागीय प्रक्रिया, बजट और टेंडर के बीच काम अटकने की शिकायतें भी होती हैं। ऐसे में लंबे समय के रख-रखाव का अनुबंध संबंधित संस्था को सड़क की स्थिति बनाए रखने के लिए जवाबदेह बनाने का माध्यम बन सकता है। परफार्मेंस बेस्ड मेंटेनेंस कान्ट्रैक्ट यानी प्रदर्शन आधारित रख-रखाव अनुबंध का मूल विचार यही है कि सड़क की देखरेख केवल निर्माण तक सीमित न रहे, बल्कि उसकी गुणवत्ता और उपयोगिता पर भी ध्यान दिया जाए। हालांकि, इस माडल में भुगतान की शर्तें, गुणवत्ता के मानक, खराब सड़क पर दंड और अनुबंध उल्लंघन की कार्रवाई कितनी प्रभावी है, यह जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है। 102 किलोमीटर लंबी सड़कों के लिए 89 करोड़ रुपये का अनुबंध अपने आप में बड़ा वित्तीय दायित्व है। सात साल की अवधि के हिसाब से यह औसतन लगभग 12.71 करोड़ रुपये सालाना बैठता है। हालांकि, वास्तविक खर्च का आकलन अनुबंध की शर्तों, कार्यों के दायरे और भुगतान की निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है। सवाल यह है कि इस राशि के बदले सड़कों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने कौन-से मापदंड तय किए हैं? क्या सड़क की सतह, गड्ढों, जल निकासी और डामर की गुणवत्ता की नियमित जांच होगी? क्या नागरिकों की शिकायतों के निस्तारण की समयसीमा तय की गई है? इन बिंदुओं पर स्पष्ट व्यवस्था इस परियोजना को प्रभावी बनाने के लिए जरूरी होगी। लोनिवि के मुख्य अभियंता दयानंद के अनुसार, सड़कों की गुणवत्ता और निगरानी के लिए नेटवर्क सर्वे व्हीकल का इस्तेमाल किया जाएगा। इस तकनीक के माध्यम से सड़क नेटवर्क की स्थिति का आकलन कर रखरखाव की जरूरतों को पहचानने में मदद मिल सकती है। लेकिन तकनीक की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं है। सर्वे के निष्कर्षों का नियमित सार्वजनिक खुलासा, खराब सड़कों की पहचान और सुधार की समयसीमा भी तय होनी चाहिए। यदि निरीक्षण रिपोर्ट केवल विभागीय फाइलों तक सीमित रह गई, तो आम जनता के लिए यह जानना मुश्किल होगा कि 89 करोड़ रुपये के अनुबंध से वास्तव में कितना सुधार हुआ। देहरादून में इस माडल को लागू करने के पीछे सड़क रख-रखाव की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की मंशा है। यदि यहां इसके परिणाम संतोषजनक रहते हैं, तो इसे राज्य के दूसरे क्षेत्रों में भी लागू करने पर विचार किया जा सकता है। ऐसे में यह परियोजना केवल राजधानी की 40 सड़कों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि प्रदेश में सड़क रखरखाव के भविष्य के माडल के रूप में भी देखी जा सकती है। हालांकि, देहरादून में सफल प्रयोग का दावा करने से पहले इसके परिणामों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन जरूरी होगा। सड़क की मौजूदा स्थिति, मरम्मत के बाद उसकी गुणवत्ता, शिकायतों की संख्या और निर्धारित समय में किए गए सुधार जैसे संकेतकों के आधार पर ही इसकी सफलता तय की जानी चाहिए। राजधानी की सड़कों को लेकर आम नागरिकों की अपेक्षा साफ हैकृसड़कें टिकाऊ हों, गड्ढे समय पर भरे जाएं और मरम्मत के नाम पर बार-बार सरकारी धन खर्च न करना पड़े। निजी संस्था को सात साल का जिम्मा सौंपने से विभाग की जवाबदेही समाप्त नहीं होती। सार्वजनिक धन के उपयोग, अनुबंध की निगरानी और काम की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी लोनिवि की बनी रहेगी। अब असली परीक्षा अनुबंध की नहीं, नतीजों की है। 89 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद यदि सड़कें बार-बार उखड़ती हैं, तो नया माडल भी पुरानी व्यवस्था से अलग साबित नहीं होगा। लेकिन यदि सात साल तक गुणवत्ता बनी रहती है, शिकायतों का समय पर समाधान होता है और खर्च का पूरा हिसाब सार्वजनिक रहता है, तो देहरादून की यह पहल प्रदेश में सड़क रखरखाव की तस्वीर बदल सकती है।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: ‘हैट्रिक’ के लिए भाजपा का ‘मास्टर प्लान’

udaydinmaan: ‘हैट्रिक’ के लिए भाजपा का ‘मास्टर प्लान’: 2027 की जंग के लिए संगठन से बूथ तक चुनावी बिसात बिछाने में जुटी भाजपा शक्ति केंद्रों की मजबूती, सरकार की उपलब्धियों से सत्ता में वापसी का लक...

‘हैट्रिक’ के लिए भाजपा का ‘मास्टर प्लान’

2027 की जंग के लिए संगठन से बूथ तक चुनावी बिसात बिछाने में जुटी भाजपा शक्ति केंद्रों की मजबूती, सरकार की उपलब्धियों से सत्ता में वापसी का लक्ष्य उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ तेज की तैयारियां देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही भाजपा ने लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम तेज कर दिया है। पार्टी के सामने चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि सत्ता विरोधी रुझानों, बेरोजगारी, महंगाई और स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों के बीच अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत बनाए रखने की भी है। इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने, शक्ति केंद्रों को मजबूत बनाने, कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की बहुस्तरीय रणनीति पर आगे बढ़ रही है। भाजपा की रणनीति का मूल मंत्र साफ हैकृचुनाव की तैयारी चुनावी घोषणा के बाद नहीं, बल्कि उससे काफी पहले शुरू होनी चाहिए। पार्टी संगठन को जितना अधिक सक्रिय और चुनावी दृष्टि से तैयार रखा जाएगा, मतदान के समय उसका लाभ मिलने की संभावना उतनी ही बढ़ेगी। इसी सोच के तहत विस्तारक योजना को अहम माना जा रहा है। संगठन के भीतर जिम्मेदारियों का बंटवारा, क्षेत्रवार समन्वय और बूथों पर पार्टी की पकड़ मजबूत करना इस अभियान के प्रमुख हिस्से हैं। भाजपा की चुनावी राजनीति में बूथ प्रबंधन लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। पार्टी अब इसी माडल को और प्रभावी बनाने की कोशिश में है। शक्ति केंद्रों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना, मतदाताओं से निरंतर संपर्क बनाए रखना और केंद्र तथा राज्य सरकार की योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाना इस रणनीति के प्रमुख बिंदु हैं। पार्टी की कोशिश है कि चुनाव के समय संगठन अचानक सक्रिय होने के बजाय पूरे साल जनता के बीच मौजूद रहे। इसके लिए कार्यकर्ताओं को क्षेत्रवार जिम्मेदारी देना और संगठनात्मक गतिविधियों की नियमित समीक्षा करना महत्वपूर्ण होगा। भाजपा जानती है कि विधानसभा चुनाव में प्रदेशव्यापी मुद्दों के साथ स्थानीय समीकरण भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में बूथ स्तर पर कमजोर कड़ियों की पहचान और उनका समाधान पार्टी की प्राथमिकता बन सकता है। भाजपा की विस्तारक योजना को चुनावी तैयारी के महत्वपूर्ण औजार के रूप में देखा जा रहा है। प्रदेश स्तर पर संयोजकों और सह-संयोजकों की जिम्मेदारी तय करने का उद्देश्य संगठनात्मक गतिविधियों में समन्वय बढ़ाना और पार्टी की रणनीति को जमीनी स्तर तक पहुंचाना है। इस योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि संगठन की योजनाएं कागजों से निकलकर मतदाताओं के बीच कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती हैं। कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल और जनता की समस्याओं पर त्वरित प्रतिक्रिया ही इस रणनीति की वास्तविक सफलता तय करेगी। केवल बैठकों और संगठनात्मक घोषणाओं से चुनावी माहौल नहीं बनता। इसके लिए जनता के बीच निरंतर संवाद जरूरी है। भाजपा की तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार का प्रदर्शन होगा। पार्टी केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं, विकास कार्यों और अपने राजनीतिक एजेंडे को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाना चाहेगी। लेकिन चुनाव में उपलब्धियों का प्रचार तभी प्रभावी होगा, जब मतदाता उन्हें अपने जीवन में महसूस भी करें। रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पेयजल जैसे मुद्दे उत्तराखंड की राजनीति में महत्वपूर्ण बने हुए हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों को लेकर जनता की अपेक्षाएं भी बड़ी हैं। भाजपा के सामने चुनौती होगी कि वह इन सवालों पर ठोस जवाब दे और सरकार के कामकाज को लेकर उठने वाली आलोचनाओं का तथ्यात्मक ढंग से सामना करे। उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों पर जीत का गणित केवल प्रदेश नेतृत्व के चेहरे से तय नहीं होगा। उम्मीदवारों की स्वीकार्यता, स्थानीय गुटबाजी, जातीय और क्षेत्रीय समीकरण तथा मौजूदा विधायकों के प्रति जनता का रुख भी चुनावी परिणाम को प्रभावित करेगा। ऐसे में टिकट वितरण भाजपा के लिए सबसे संवेदनशील चरणों में से एक हो सकता है। पार्टी के सामने यह संतुलन साधने की चुनौती रहेगी कि संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को पूरा किया जाए, जीतने की क्षमता को प्राथमिकता मिले और स्थानीय असंतोष को भी नियंत्रित रखा जाए। टिकट को लेकर नाराजगी या बगावत की स्थिति बनने पर मजबूत संगठन भी कई सीटों पर दबाव में आ सकता है। भाजपा की चुनावी रणनीति के सामने कांग्रेस की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। यदि कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, भर्ती प्रक्रियाओं, भ्रष्टाचार के आरोपों और क्षेत्रीय विकास के सवालों को लेकर प्रभावी अभियान खड़ा करती है, तो मुकाबला कई सीटों पर कड़ा हो सकता है। विपक्ष की एकजुटता, स्थानीय नेतृत्व का तालमेल और उम्मीदवारों का चयन चुनावी परिणामों पर असर डालेंगे। भाजपा के लिए चुनौती केवल अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की नहीं, बल्कि उन मतदाताओं का विश्वास बनाए रखने की भी होगी, जो सरकार के कामकाज का आकलन स्थानीय अनुभवों के आधार पर करते हैं। वहीं कांग्रेस के सामने इन असंतोषों को वोट में बदलने और संगठनात्मक कमजोरी से पार पाने की चुनौती रहेगी। भाजपा की तीसरी बार सत्ता में वापसी की तैयारी यह संकेत देती है कि पार्टी 2027 के चुनाव को लेकर संगठनात्मक स्तर पर कोई ढिलाई नहीं बरतना चाहती। बूथ प्रबंधन, विस्तारक योजना, शक्ति केंद्रों की सक्रियता और सरकार की उपलब्धियों का प्रचार उसके चुनावी अभियान के प्रमुख आधार बन सकते हैं। हालांकि, चुनावी रणनीति की असली परीक्षा जनता के बीच होगी। संगठन की मजबूती तभी परिणाम देगी, जब वह मतदाताओं की अपेक्षाओं और समस्याओं से जुड़ सके। भाजपा के लिए हैट्रिक का रास्ता संगठनात्मक ताकत के साथ-साथ सरकार के कामकाज, उम्मीदवारों की विश्वसनीयता और स्थानीय मुद्दों के समाधान से होकर गुजरेगा। 2027 में भाजपा की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह अपने संगठनात्मक आत्मविश्वास को जनता के भरोसे में कितना बदल पाती है। हैट्रिक का लक्ष्य तय करना एक बात है, लेकिन उत्तराखंड की जनता से तीसरी बार जनादेश हासिल करना दूसरी।

‘चुनावी मोर्चे’ पर भाजपा

विधानसभा विस्तारकों और प्रभारियों की होगी कार्यशाला राष्ट्रीय महामंत्री संगठन व प्रदेश प्रभारी देंगे जीत का मंत्र संगठन, रणनीति और चुनावी प्रबंधन पर होगा गहन मंथन देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी को लेकर भाजपा ने संगठनात्मक गतिविधियों को धार देना शुरू कर दिया है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ पार्टी अब चुनावी रणनीति को जमीनी स्तर पर उतारने की तैयारी में जुटी है। इसी क्रम में काशीपुर में नवनियुक्त विधानसभा विस्तारकों और प्रभारियों की कार्यशाला आयोजित की जा रही है। इसमें राष्ट्रीय महामंत्री संगठन और प्रदेश प्रभारी का मार्गदर्शन प्राप्त होगा। अलग-अलग सत्रों में संगठनात्मक मजबूती, राजनीतिक परिस्थितियों, चुनावी रणनीति और चुनावी संरचना को लेकर विस्तृत प्रशिक्षण दिया जाएगा। भाजपा की इस कवायद को केवल संगठनात्मक प्रशिक्षण तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा। विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी अपने कार्यकर्ताओं और जिम्मेदार पदाधिकारियों को एक साझा रणनीति के तहत तैयार करना चाहती है, ताकि प्रदेश नेतृत्व की योजना का क्रियान्वयन विधानसभा क्षेत्रों और बूथों तक प्रभावी ढंग से हो सके। विस्तारकों और प्रभारियों की भूमिका इस लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है कि उन्हें संगठन की चुनावी तैयारी और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों के बीच समन्वय स्थापित करना होगा। उत्तराखंड में भाजपा के सामने 2027 में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की चुनौती है। पार्टी के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सत्ता में बने रहने के लिए उसे अपने परंपरागत समर्थन आधार को मजबूत रखने के साथ नए मतदाताओं और असंतुष्ट वर्गों के बीच भी भरोसा कायम करना होगा। काशीपुर की कार्यशाला इसी व्यापक तैयारी का हिस्सा है। अलग-अलग सत्रों में दिए जाने वाले प्रशिक्षण के माध्यम से संगठनात्मक जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने, चुनावी परिस्थितियों का आकलन करने और विधानसभा स्तर पर रणनीति को प्रभावी बनाने पर जोर रहने की संभावना है। पार्टी की कोशिश होगी कि विस्तारक और प्रभारी केवल निर्धारित जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाले पदाधिकारी न रहें, बल्कि क्षेत्र की राजनीतिक नब्ज समझते हुए संगठन को लगातार सक्रिय रखने में भी भूमिका निभाएं। चुनाव में जीत का रास्ता बूथों से होकर गुजरता है। भाजपा की संगठनात्मक रणनीति में बूथ प्रबंधन, शक्ति केंद्रों की सक्रियता और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ऐसे में विधानसभा विस्तारकों और प्रभारियों को प्रशिक्षण देने की पहल का उद्देश्य चुनावी तैयारियों को अधिक व्यवस्थित बनाना है। विधानसभा स्तर पर संगठन की स्थिति, स्थानीय नेतृत्व की सक्रियता, मतदाताओं के साथ संवाद और क्षेत्रीय मुद्दों की जानकारी चुनावी रणनीति के अहम हिस्से होंगे। यदि पार्टी का संगठन इन मोर्चों पर प्रभावी ढंग से काम करता है, तो उसे चुनाव के समय अपनी रणनीति लागू करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, प्रशिक्षण का वास्तविक परिणाम इस बात से तय होगा कि कार्यशाला में तय दिशा-निर्देश जमीन पर किस हद तक लागू किए जाते हैं। भाजपा के लिए चुनावी तैयारी का अर्थ केवल संगठन को सक्रिय करना नहीं होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज को लेकर जनता की प्रतिक्रिया भी आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों पर मतदाताओं की अपेक्षाएं बनी हुई हैं। ऐसे में पार्टी के विस्तारकों और प्रभारियों के लिए स्थानीय स्तर पर जनता के सवालों और राजनीतिक माहौल को समझना जरूरी होगा। संगठन यदि केवल सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करता है और जनता की शिकायतों को नजरअंदाज करता है, तो चुनावी रणनीति की प्रभावशीलता सीमित रह सकती है। इसके उलट, स्थानीय समस्याओं की पहचान कर उन्हें संबंधित नेतृत्व तक पहुंचाना पार्टी के जनसंपर्क अभियान को मजबूती दे सकता है। भाजपा की सक्रियता का असर विपक्ष की चुनावी तैयारियों पर भी पड़ सकता है। सत्तारूढ़ दल यदि समय रहते विधानसभा स्तर पर अपनी टीमों को सक्रिय कर लेता है, तो कांग्रेस के लिए राजनीतिक मुकाबले में प्रभावी चुनौती खड़ी करना और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा। विपक्ष को भी अपने संगठन, उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों पर स्पष्ट रणनीति बनानी होगी। हालांकि, केवल कार्यशालाओं और संगठनात्मक बैठकों के आधार पर चुनावी नतीजों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। चुनाव में सरकार का प्रदर्शन, उम्मीदवारों की छवि, स्थानीय समीकरण और विपक्ष की रणनीति जैसे कई कारक निर्णायक होते हैं। फिलहाल काशीपुर की कार्यशाला के जरिए भाजपा का संदेश स्पष्ट हैकृ2027 की चुनावी लड़ाई में संगठन को अंतिम समय के बजाय पहले से तैयार रखना है। राष्ट्रीय महामंत्री संगठन और प्रदेश प्रभारी का मार्गदर्शन इस तैयारी को दिशा देने में अहम हो सकता है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि प्रशिक्षण से निकली रणनीति विधानसभा क्षेत्रों में कितनी प्रभावी साबित होती है और भाजपा का हैट्रिक का लक्ष्य जमीनी स्तर पर कितना मजबूत बन पाता है।

चुनावी मोर्चे पर भाजपा की नई ‘घेराबंदी’

विस्तारक योजना के लिए प्रदेश संयोजकों और सह-संयोजकों को जिम्मेदारी विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने की तैयारी विधानसभा स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी भारतीय जनता पार्टी देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने अपनी संगठनात्मक तैयारियों को तेज करना शुरू कर दिया है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ पार्टी अब संगठन की चुनावी मशीनरी को व्यवस्थित करने और विधानसभा स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत करने में जुट गई है। इसी कड़ी में भाजपा ने विस्तारक योजना के समन्वय के लिए प्रदेश संयोजकों एवं सह-संयोजकों को जिम्मेदारी सौंपी है। इस कदम को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को सक्रिय करने और चुनावी रणनीति को जमीनी स्तर तक पहुंचाने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा की रणनीति स्पष्ट है कि चुनावी तैयारी केवल चुनाव घोषित होने के बाद शुरू नहीं होगी। पार्टी पहले से ही संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियां तय करने और विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करने पर जोर दे रही है। विस्तारक योजना इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रदेश स्तर पर समन्वय की जिम्मेदारी तय होने से योजना के संचालन, संगठनात्मक गतिविधियों और क्षेत्रीय इकाइयों के बीच तालमेल बेहतर बनाने की कोशिश होगी। भाजपा की चुनावी सफलता में बूथ प्रबंधन की अहम भूमिका रही है। पार्टी अब इसी आधार को मजबूत करते हुए विधानसभा स्तर पर संगठन की सक्रियता बढ़ाना चाहती है। विस्तारकों के माध्यम से स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों, संगठन की स्थिति और मतदाताओं के साथ संपर्क की गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। प्रदेश संयोजकों और सह-संयोजकों की जिम्मेदारी इस व्यवस्था में समन्वयकारी भूमिका निभाने की होगी। संगठन की प्राथमिकताओं को संबंधित इकाइयों तक पहुंचाना, गतिविधियों में एकरूपता बनाए रखना और निर्धारित कार्यों की प्रगति पर नजर रखना इस योजना को प्रभावी बनाने के महत्वपूर्ण पहलू होंगे। उत्तराखंड में भाजपा के सामने 2027 में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की चुनौती है। राज्य की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की परंपरा को देखते हुए पार्टी के लिए यह लक्ष्य आसान नहीं होगा। उसे सरकार के कामकाज के साथ-साथ संगठन की मजबूती और जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता को भी साबित करना होगा। विस्तारक योजना के लिए जिम्मेदारियां तय करना इसी व्यापक तैयारी का संकेत है। भाजपा चाहती है कि चुनाव के समय संगठन के पास सक्रिय कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क हो और विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी अभियान को तेजी से आगे बढ़ाया जा सके। पार्टी के लिए यह भी जरूरी होगा कि संगठनात्मक सक्रियता केवल बैठकों तक सीमित न रहे, बल्कि जनता के बीच नियमित संवाद में दिखाई दे। भाजपा आगामी चुनाव में केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं तथा विकास कार्यों को प्रमुखता देना चाहेगी। लेकिन उत्तराखंड में रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और ग्रामीण सुविधाओं जैसे मुद्दे भी राजनीतिक बहस के केंद्र में रहेंगे। इन सवालों पर मतदाताओं की प्रतिक्रिया चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में विस्तारकों के लिए स्थानीय स्तर पर जनता की अपेक्षाओं और असंतोष को समझना महत्वपूर्ण होगा। संगठन की मजबूती का वास्तविक आकलन इसी बात से होगा कि वह जनता के सवालों को कितनी गंभीरता से सुनता है और उन्हें नेतृत्व तक पहुंचाने में कितनी प्रभावी भूमिका निभाता है। भाजपा की इस पहल को कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के मुकाबले संगठनात्मक बढ़त हासिल करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। चुनाव में केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर्याप्त नहीं होते मतदाताओं तक पहुंच, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता भी निर्णायक होती है। हालांकि, संगठनात्मक नियुक्तियां अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं हैं। भाजपा को स्थानीय गुटबाजी, टिकट की दावेदारी और संभावित असंतोष जैसे सवालों से भी निपटना होगा। इसके साथ ही सरकार के प्रदर्शन को लेकर जनता की प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ेगा। कुल मिलाकर, विस्तारक योजना के समन्वय के लिए प्रदेश संयोजकों और सह-संयोजकों की जिम्मेदारी तय करके भाजपा ने 2027 के चुनाव की तैयारी को संगठनात्मक स्तर पर गति देने का संकेत दिया है। अब इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रदेश स्तर पर बनी रणनीति विधानसभा क्षेत्रों और बूथों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है। हैट्रिक का लक्ष्य हासिल करने के लिए भाजपा को संगठन की ताकत के साथ जनता का भरोसा भी बनाए रखना होगा।

राहुल के बयान पर आर-पार के मूड में भाजपा

राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर घिरी कांग्रेस, भाजपा ने आचरण पर उठाए सवाल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को लेकर राहुल गांधी की टिप्पणी पर भाजपा का हमला कांग्रेस नेता के बयान को देश की सुरक्षा-संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान पर सवाल देहरादून। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को लेकर राहुल गांधी की कथित टिप्पणी ने राजनीतिक विवाद को हवा दे दी है। भाजपा ने इस टिप्पणी को देश की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण पद की गरिमा के खिलाफ बताते हुए इसे देशविरोधी कृत्य करार दिया है। इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ दल और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ने के आसार हैं। भाजपा ने राहुल गांधी की भाषा और राजनीतिक आचरण पर सवाल उठाते हुए कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर जिम्मेदार नेताओं को संयम और गंभीरता का परिचय देना चाहिए। भाजपा का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद देश की सुरक्षा नीति, रणनीतिक चुनौतियों और महत्वपूर्ण सुरक्षा मामलों से जुड़ा है। ऐसे पद पर आसीन व्यक्ति को लेकर सार्वजनिक मंच से की गई टिप्पणी केवल किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उससे संबंधित संस्था की गरिमा पर भी सवाल उठ सकते हैं। पार्टी का कहना है कि विपक्ष के नेता को सरकार की नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, लेकिन आलोचना और व्यक्तिगत अपमान के बीच अंतर बनाए रखना भी जरूरी है। भाजपा की आपत्ति राहुल गांधी की टिप्पणी के राजनीतिक संदेश को लेकर है। पार्टी का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर राजनीतिक मतभेदों को इस तरह व्यक्त नहीं किया जाना चाहिए, जिससे संवेदनशील संस्थाओं के प्रति अविश्वास का माहौल बने। भाजपा ने कांग्रेस नेतृत्व से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल किस राजनीतिक उद्देश्य से किया गया। सत्तारूढ़ दल इस मुद्दे को केवल बयानबाजी का विवाद नहीं, बल्कि विपक्ष की राजनीतिक जिम्मेदारी से जोड़कर देख रहा है। भाजपा की रणनीति यह संदेश देने की हो सकती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर राजनीतिक दलों को एक न्यूनतम मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। हालांकि, किसी टिप्पणी को देशविरोधी कृत्य बताना एक राजनीतिक आरोप है। उसकी गंभीरता का आकलन वास्तविक शब्दों, संदर्भ और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। भारत जैसे देश में राष्ट्रीय सुरक्षा हमेशा महत्वपूर्ण राजनीतिक विषय रही है। सीमा सुरक्षा, आतंकवाद, खुफिया तंत्र और रणनीतिक नीति से जुड़े मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार से जवाब मांगना और उसकी नीतियों की समीक्षा करना भी है। लेकिन इस बहस का दूसरा पहलू भी है। सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा और तथ्यों की जिम्मेदारी सभी राजनीतिक दलों पर लागू होती है। सरकार की आलोचना को देश के विरोध के समान नहीं माना जा सकता, उसी तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हर राजनीतिक टिप्पणी को बिना संदर्भ जांचे उचित या अनुचित ठहराना भी लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर कर सकता है। भाजपा के हमले के बाद कांग्रेस के सामने राहुल गांधी की टिप्पणी का संदर्भ स्पष्ट करने और अपने राजनीतिक रुख को सामने रखने की चुनौती है। पार्टी इस विवाद को विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश बताती है या टिप्पणी के शब्दों और संदर्भ पर स्पष्टीकरण देती है, इससे आगे की राजनीतिक बहस की दिशा प्रभावित हो सकती है। वहीं भाजपा इस मुद्दे के जरिए कांग्रेस को राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर घेरने की कोशिश करेगी। आगामी चुनावी माहौल में इस तरह के विवाद राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन मतदाताओं के लिए रोजगार, महंगाई, विकास और सुरक्षा जैसे ठोस मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण रहेंगे। फिलहाल इस विवाद का केंद्र राहुल गांधी की टिप्पणी और उस पर भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया है। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीतिक दलों के बीच बहस होना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी बयान को देशविरोधी करार देने से पहले उसके सटीक शब्दों और संदर्भ की पुष्टि जरूरी है। राजनीतिक आरोप अपनी जगह हैं, मगर तथ्य और जवाबदेही ही इस बहस की विश्वसनीयता तय करेंगे।

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: कांग्रेस की ‘कलह’ पर भाजपा का ‘दांव’

udaydinmaan: कांग्रेस की ‘कलह’ पर भाजपा का ‘दांव’: कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी खींचतान को चुनावी हथियार बनाने में जुटी भाजपा हरदा के तीखे तेवरों से गरमाई सियासत, 2027 से पहले एकजुटता पर सवाल ...

कांग्रेस की ‘कलह’ पर भाजपा का ‘दांव’

कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी खींचतान को चुनावी हथियार बनाने में जुटी भाजपा हरदा के तीखे तेवरों से गरमाई सियासत, 2027 से पहले एकजुटता पर सवाल देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती के बीच कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान भाजपा के लिए राजनीतिक अवसर बनती दिखाई दे रही है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के तीखे संदेश ने पार्टी के भीतर नेतृत्व, सम्मान और भूमिका को लेकर चल रही बहस को हवा दी है। कांग्रेस के नेता जहां इस घटनाक्रम पर अलग-अलग राय रख रहे हैं, वहीं भाजपा इस पूरे प्रकरण को विपक्ष की अंदरूनी कमजोरी के रूप में पेश करने की रणनीति पर आगे बढ़ सकती है। सत्तारूढ़ दल के लिए यह केवल कांग्रेस पर हमला करने का अवसर नहीं, बल्कि चुनाव से पहले मतदाताओं के बीच विपक्ष की विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े करने का मौका भी है। उत्तराखंड में भाजपा के सामने 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की चुनौती है। इसके लिए पार्टी संगठन को मजबूत करने, चुनावी रणनीति तैयार करने और सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने में जुटी है। ऐसे समय में कांग्रेस के भीतर नेताओं की भूमिका और आपसी तालमेल को लेकर उठते सवाल भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी साबित हो सकते हैं। हरीश रावत प्रदेश कांग्रेस के सबसे अनुभवी और चर्चित नेताओं में शामिल हैं। उनके राजनीतिक संदेशों को पार्टी की सामान्य बयानबाजी मानकर खारिज करना आसान नहीं है। जब ऐसा वरिष्ठ नेता अपनी भूमिका को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाता है, तो उसका असर कार्यकर्ताओं से लेकर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों तक दिखाई देता है। भाजपा इसी घटनाक्रम के सहारे यह सवाल उठा सकती है कि जो पार्टी अपने नेताओं के बीच तालमेल नहीं बना पा रही, वह प्रदेश की समस्याओं का समाधान कैसे करेगी? हालांकि, कांग्रेस में मतभेदों का होना अपने आप में चुनावी हार का प्रमाण नहीं है, लेकिन चुनाव से पहले इन मतभेदों का सार्वजनिक होना भाजपा को हमलावर होने का अवसर जरूर देता है। हरीश रावत के संदेश में उनकी राजनीतिक भूमिका को लेकर दिखाई देने वाली बेचौनी ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को फिर चर्चा में ला दिया है। रावत ने पार्टी के लिए अपनी उपयोगिता का फैसला नेतृत्व पर छोड़ने की बात कही। इस संदेश को लेकर कांग्रेस के भीतर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आने से यह स्पष्ट हुआ कि वरिष्ठ नेताओं की भूमिका और संगठन की रणनीति के बीच तालमेल बनाना पार्टी के लिए आसान नहीं है। यात्राओं और संगठनात्मक कार्यक्रमों को लेकर पहले से चल रही चर्चा ने इस विवाद को और राजनीतिक महत्व दे दिया है। कांग्रेस नेतृत्व की ओर से संगठन के साथ समन्वय पर जोर दिया गया, जबकि रावत के संदेश ने उनकी भूमिका को लेकर बहस को नया आधार दिया। अब भाजपा के पास कांग्रेस को घेरने के लिए एक ऐसा मुद्दा है, जिसका संबंध सीधे विपक्षी एकता और नेतृत्व की विश्वसनीयता से जोड़ा जा सकता है। कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान से भाजपा को दो स्तरों पर लाभ मिल सकता है। पहला, वह प्रदेश सरकार के खिलाफ कांग्रेस की ओर से उठाए जाने वाले मुद्दों की धार कमजोर करने की कोशिश कर सकती है। दूसरा, वह मतदाताओं के सामने कांग्रेस को नेतृत्व और रणनीति के स्तर पर असमंजस से जूझती पार्टी के रूप में पेश कर सकती है। चुनावी राजनीति में केवल सरकार का कामकाज ही निर्णायक नहीं होता, विपक्ष की तैयारी और विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण होती है। यदि कांग्रेस अपने नेताओं के मतभेदों को सुलझाने के बजाय सार्वजनिक बयानबाजी में उलझी रहती है, तो भाजपा को अपनी उपलब्धियों और चुनावी एजेंडे पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अतिरिक्त राजनीतिक अवसर मिल सकता है। इसके उलट, यदि कांग्रेस समय रहते मतभेदों को दूर कर एक साझा रणनीति के साथ मैदान में उतरती है, तो भाजपा के लिए इस मुद्दे को लंबे समय तक भुनाना आसान नहीं होगा। भाजपा के लिए कांग्रेस की कलह को मुद्दा बनाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उत्तराखंड में चुनावी मुकाबला केवल सरकार के कामकाज पर नहीं, बल्कि दोनों दलों के संगठनात्मक दमखम पर भी निर्भर करेगा। भाजपा को अपनी सत्ता विरोधी नाराजगी की आशंकाओं, बेरोजगारी और जनसमस्याओं से जुड़े सवालों का जवाब देना होगा। कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई इन मुद्दों से ध्यान हटाने में उसके लिए मददगार हो सकती है। लेकिन कांग्रेस की कमजोरी को भुनाने की रणनीति तभी प्रभावी होगी, जब भाजपा खुद संगठनात्मक एकजुटता और सरकार के प्रदर्शन के सवालों पर मजबूत स्थिति में हो। केवल विपक्ष की कलह को सामने रखकर चुनाव नहीं जीता जा सकता। मतदाता अंततः सरकार के कामकाज, स्थानीय समस्याओं और भविष्य की उम्मीदों के आधार पर भी निर्णय लेते हैं। कांग्रेस के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। उसे तय करना होगा कि वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का इस्तेमाल किस तरह किया जाए, संगठनात्मक अनुशासन कैसे बनाए रखा जाए और चुनाव से पहले जनता के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में कैसे लाया जाए। उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला अभी लंबा है। हरीश रावत के संदेश से पैदा हुई राजनीतिक गर्मी आगे किस दिशा में जाएगी, यह कांग्रेस नेतृत्व की प्रतिक्रिया और दोनों दलों की रणनीति पर निर्भर करेगा। भाजपा इस घटनाक्रम को कांग्रेस की कमजोरी के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर सकती है, जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह अपनी अंदरूनी बहस को सार्वजनिक विवाद बनने से रोके। फिलहाल कांग्रेस की कलह भाजपा के लिए सियासी हथियार बनती दिख रही है। भाजपा की कोशिश होगी कि चुनाव से पहले कांग्रेस के नेतृत्व संबंधी सवालों को जनता के बीच पहुंचाया जाए। वहीं कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह भाजपा को अपनी अंदरूनी लड़ाई भुनाने का अवसर देने के बजाय संगठन की एकजुटता और जनहित के मुद्दों के आधार पर चुनावी मुकाबले में उतरे। 2027 की लड़ाई में यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस अपनी कलह से बाहर निकलती है या भाजपा इसी कमजोरी को अपनी चुनावी बढ़त में बदलने में सफल होती है।

राहुल के बयान पर भाजपा का ‘प्रहार’

राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद राहुल गांधी के बयान पर संग्राम वोट चोरी के आरोपों के प्रमाण सार्वजनिक करने की दी चुनौती राष्ट्रपति से मुलाकात पर राहुल के बयान से भड़क गई भाजपा देहरादून/नई दिल्ली। राष्ट्रपति जैसे सर्वाेच्च संवैधानिक पद को लेकर राजनीतिक बयानबाजी अब नए टकराव का रूप लेती दिखाई दे रही है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा हमला बोला है। भाजपा ने राहुल पर मुलाकात की बातों को अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप पेश करने का आरोप लगाते हुए इसे राजनीति में नैतिक पतन की पराकाष्ठा करार दिया है। भाजपा का कहना है कि चुनावी अनियमितताओं के आरोपों को लेकर विपक्ष के पास यदि ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें सामने रखना चाहिए, न कि राष्ट्रपति से हुई मुलाकात को अपनी राजनीतिक दलीलों की पुष्टि के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। दरअसल, विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और कथित मतदाता अनियमितताओं के मुद्दे पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने दावा किया कि राष्ट्रपति ने विपक्ष के वोट चोरी संबंधी आरोपों को खारिज नहीं किया और उनसे प्रमाण देने को कहा। राहुल के इस बयान के बाद भाजपा ने इसे राष्ट्रपति के रुख की अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करने की कोशिश बताया। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी पर संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक विवाद में घसीटने और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया। वहीं भाजपा नेता सीआर केसवन ने राहुल के बयान को राष्ट्रपति पद की गरिमा से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए उन पर गलत तरीके से तथ्यों को प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं का कहना है कि राष्ट्रपति से मुलाकात को राजनीतिक लाभ का माध्यम बनाना विपक्ष की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इस पूरे विवाद का केंद्र केवल राहुल गांधी का बयान नहीं, बल्कि विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे चुनावी अनियमितताओं के आरोप भी हैं। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल एसआईआर की प्रक्रिया तथा मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा इन आरोपों को निराधार बताते हुए विपक्ष से प्रमाण पेश करने की मांग कर रही है। चुनाव आयोग और भाजपा ने मतदाता सूची में पक्षपात के आरोपों को भी खारिज किया है। ऐसे में राहुल गांधी के सामने चुनौती है कि वे अपने आरोपों को तथ्यों और प्रमाणों के साथ मजबूती से रखें। वहीं भाजपा को भी केवल राजनीतिक पलटवार तक सीमित रहने के बजाय उठाए जा रहे सवालों का तथ्यात्मक जवाब देना होगा। लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता महत्वपूर्ण है और उससे जुड़े किसी भी आरोप की जांच तथ्यों के आधार पर ही होनी चाहिए। राष्ट्रपति का पद संवैधानिक व्यवस्था की गरिमा का प्रतीक है। इसलिए राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद किसी भी नेता की टिप्पणी स्वाभाविक रूप से राजनीतिक महत्व हासिल करती है। लेकिन मुलाकात में किसी आरोप को सुना जाना और उस आरोप को सही मान लेना दो अलग बातें हैं। इसी अंतर को लेकर भाजपा राहुल गांधी को घेर रही है। हालांकि, मुलाकात के दौरान क्या कहा गया और किस संदर्भ में कहा गया, इसका अंतिम निष्कर्ष केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर नहीं निकाला जा सकता। राहुल गांधी ने अपना पक्ष रखा है, जबकि भाजपा ने उनकी व्याख्या को चुनौती दी है। ऐसे में पूरे घटनाक्रम का निष्पक्ष आकलन तथ्यों और संबंधित पक्षों के आधिकारिक वक्तव्यों के आधार पर ही संभव है। भाजपा इस विवाद के जरिए राहुल गांधी की राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की कोशिश कर रही है। पार्टी का तर्क है कि विपक्ष को संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए अपने आरोपों को प्रमाणों के आधार पर आगे बढ़ाना चाहिए। भाजपा के लिए यह मुद्दा कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति पर हमला करने का अवसर भी है। दूसरी ओर, कांग्रेस का तर्क है कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाना विपक्ष की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। ऐसे में विवाद का वास्तविक समाधान राजनीतिक विशेषणों और व्यक्तिगत हमलों से नहीं, बल्कि आरोपों की तथ्यात्मक जांच और पारदर्शी जवाबदेही से ही निकल सकता है। फिलहाल राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद राहुल गांधी के बयान ने भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव को और तेज कर दिया है। भाजपा इसे नैतिकता और संवैधानिक मर्यादा का प्रश्न बना रही है, जबकि विपक्ष चुनावी प्रक्रिया पर अपने सवालों को महत्वपूर्ण बता रहा है। राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों को प्रमाणित करना कठिन। राष्ट्रपति के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश हुई या मुलाकात के बयान को गलत अर्थों में पेश किया गयाकृइसका फैसला केवल तीखी बयानबाजी से नहीं हो सकता। लोकतंत्र में न विपक्ष को सवाल उठाने से रोका जा सकता है और न ही किसी संवैधानिक पद के रुख को बिना ठोस आधार के अपनी राजनीतिक दलील का प्रमाण बताया जाना चाहिए।

हमारे आंतरिक मामलों में दखल न दें

दिल्ली प्रदर्शन पर भारत ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र को सुनाया, मानवाधिकार कार्यालय की टिप्पणी खारिज शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान से सुरक्षित, लेकिन कानून-व्यवस्था के लिए उचित प्रतिबंध भी जरूरी भारत ने संयुक्त राष्ट्र से निष्पक्षता बरतने और दुनिया के अन्य हिस्सों में हो रहे प्रदर्शनों पर भी समान ध्यान देने को कहा नई दिल्ली/देहरादून। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने के मामले पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र को कड़ा जवाब दिया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की टिप्पणी को भारत ने अनुचित बताते हुए अपने आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करार दिया है। जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने स्पष्ट किया कि भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश है, जहां संवैधानिक संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। भारत का यह जवाब ऐसे समय आया है, जब दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले और उसके दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठे हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने इन घटनाओं पर चिंता जताते हुए शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का सम्मान करने और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों को तत्काल रिहा करने की अपील की थी। भारत ने इस टिप्पणी को खारिज करते हुए इसे देश के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप बताया। जिनेवा स्थित भारत के स्थायी मिशन ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और प्रदर्शन करने का अधिकार संविधान से प्राप्त है। हालांकि, किसी भी लोकतंत्र में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं। भारत ने कहा कि देश में कानून लागू करने वाली एजेंसियां कानूनी प्रावधानों के अनुरूप काम करती हैं। यदि किसी व्यक्ति को किसी कार्रवाई से शिकायत है, तो उसके निवारण के लिए न्यायालयों का दरवाजा खुला है। ऐसे में देश की संवैधानिक व्यवस्था और कानूनी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाने वाली अंतरराष्ट्रीय टिप्पणियां उचित नहीं हैं। भारत ने केवल अपनी कार्रवाई का बचाव ही नहीं किया, बल्कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। भारत ने कहा कि मानवाधिकार कार्यालय को दुनिया के दूसरे हिस्सों में हो रहे बड़े प्रदर्शनों पर भी तुलनात्मक रूप से समान ध्यान देना चाहिए। उसकी भूमिका निष्पक्षता और बिना भेदभाव के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए। भारत का यह रुख इस बात का संकेत है कि वह अपने घरेलू राजनीतिक और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों पर बाहरी टिप्पणियों को लेकर सख्त रुख अपनाने के पक्ष में है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र की चिंता प्रदर्शनकारियों की हिरासत और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार से जुड़ी थी, जबकि भारत ने अपने जवाब में संवैधानिक अधिकारों के साथ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत के जवाब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने आंतरिक मामलों में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की टिप्पणियों को लेकर असहज है। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय का पक्ष प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और हिरासत की परिस्थितियों से संबंधित है। ऐसे में विवाद केवल भारत और संयुक्त राष्ट्र के बीच बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि किसी लोकतंत्र में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के विरोध के अधिकार के बीच संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जाए। भारत ने अपने रुख से साफ संदेश दिया है कि घरेलू मामलों पर निर्णय लेने के लिए उसकी संवैधानिक संस्थाएं और न्यायिक व्यवस्था मौजूद हैं। वहीं, इस प्रकरण में आगे की बहस इस बात पर केंद्रित रह सकती है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई के साथ नागरिक अधिकारों की रक्षा किस तरह सुनिश्चित की जाती है।

राहुल का ‘ऐलान’ सड़कों पर उतरेगा विपक्ष

एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे पर आर-पार की लड़ाई के संकेत दिल्ली में प्रदर्शनकारियों की हिरासत और पुलिस कार्रवाई पर कांग्रेस ने केंद्र को घेरा राहुल बोलेकृ न डरेंगे, न पीछे हटेंगे, मुख्य न्यायाधीश से भी मुलाकात करेगा विपक्ष देहरादून/नई दिल्ली। दिल्ली में काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि 12 अक्टूबर को कांग्रेस, पूरा विपक्षी गठबंधन इंडिया और देश के युवा एक बार फिर सड़कों पर उतरेंगे। राहुल गांधी ने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने और पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने साफ कहा कि विपक्ष पीछे हटने वाला नहीं है और इस बार विरोध की आवाज पहले से अधिक बुलंद होगी। राहुल गांधी का यह ऐलान ऐसे समय आया है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक टकराव बढ़ता जा रहा है। शनिवार को दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन से पहले पुलिस ने कई नेताओं, कार्यकर्ताओं, विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया था। इस कार्रवाई के बाद कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर विरोध की आवाज दबाने का आरोप लगाया है। राहुल गांधी ने सामाजिक माध्यम पर जारी अपने बयान में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली पुलिस को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस प्रदर्शनकारियों के साथ सख्ती कर रही है और भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों को भी महिलाओं तथा युवाओं के खिलाफ हिंसा करने की छूट दी जा रही है। यह राहुल गांधी के आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। उन्होंने चुनौती भरे अंदाज में कहा कि सरकार चाहे जितनी पुलिस तैनात कर ले, विपक्ष और युवा डरने वाले नहीं हैं। राहुल के मुताबिक, यह लड़ाई अब रुकने वाली नहीं है और लोकतंत्र तथा संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा। सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था। प्रदर्शनकारियों ने एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव से लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। वहीं, निर्वाचन आयोग मतदाता सूची के सत्यापन की प्रक्रिया का बचाव करता रहा है और भाजपा विपक्ष के आरोपों को खारिज करती है। ऐसे में मतदाता सूची का मुद्दा अब प्रशासनिक प्रक्रिया से आगे बढ़कर राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख विषय बन गया है। राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत से मुलाकात करने की भी बात कही है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के साथ हुई कथित हिंसा और हिरासत के मामलों में जवाबदेही तय होनी चाहिए। कांग्रेस नेता का कहना है कि संविधान और लोकतंत्र से जुड़े सवालों पर विपक्ष चुप नहीं बैठ सकता। प्रस्तावित मुलाकात के जरिए विपक्ष प्रदर्शनकारियों के साथ हुए व्यवहार और पुलिस कार्रवाई के मामले को न्यायपालिका के समक्ष उठाना चाहता है। 12 अक्टूबर का प्रदर्शन केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच जारी टकराव को नया मोड़ दे सकता है। एक ओर कांग्रेस और इंडिया गठबंधन इसे युवाओं, मतदाताओं के अधिकारों तथा लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था और कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होगी। राहुल गांधी के ऐलान से इतना स्पष्ट है कि एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे का मुद्दा फिलहाल ठंडा पड़ने वाला नहीं है। आने वाले दिनों में यह विवाद संसद से लेकर सड़कों तक राजनीतिक बहस का केंद्र बना रह सकता है।

हरदा के तेवर से कांग्रेस में घमासान

चुनाव से पहले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के संदेश ने बढ़ा दी हैं कांग्रेस पार्टी में बेचौनी कोई सम्मानजनक भूमिका का पक्षधर तो कोई संगठन के फैसले को सर्वाेपरि मानने की दे रहा नसीहत देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस की मुश्किलें भाजपा से मुकाबले के बजाय अपने ही घर में बढ़ती दिखाई दे रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के एक संदेश ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। रावत के तीखे तेवरों को लेकर कांग्रेस के भीतर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। कोई उन्हें पार्टी का अनुभवी और अपरिहार्य नेता बताते हुए उनकी भूमिका स्पष्ट करने की पैरवी कर रहा है, तो कोई चुनाव से पहले संगठनात्मक अनुशासन और सामूहिक नेतृत्व को सर्वाेपरि मानने की बात कर रहा है। हरीश रावत ने अपने संदेश में कहा कि वह लुढ़कते-लुढ़कते और घिसते-घिसते शून्य में मिल सकते हैं, लेकिन टूट नहीं सकते। उन्होंने खुद को पार्टी के लिए पूरक बताते हुए कहा कि उनका इस्तेमाल करना है या नहीं, यह नेतृत्व को तय करना है। उनके इस संदेश को कांग्रेस में अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर चल रही असहजता और नेतृत्व को दिए गए संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, रावत ने सीधे तौर पर पार्टी छोड़ने की घोषणा नहीं की है। हरीश रावत की नाराजगी का संदर्भ समझने के लिए पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है। रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा और कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने संगठन के साथ समन्वय पर जोर दिया था। पार्टी नेतृत्व का संदेश स्पष्ट था कि विधानसभा चुनाव की तैयारी में व्यक्तिगत अभियानों के बजाय कांग्रेस के बैनर तले सामूहिक कार्यक्रम चलाए जाएं। रावत ने अपनी यात्रा की आगे की कुछ प्रस्तावित गतिविधियां स्थगित करने की घोषणा भी की थी। इसके बावजूद उनके सार्वजनिक संदेशों ने पार्टी के भीतर उनकी भूमिका, संगठन की सक्रियता और वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल को लेकर नई बहस खड़ी कर दी है। यहां सवाल सिर्फ एक यात्रा का नहीं है। सवाल यह भी है कि प्रदेश में चुनावी मुकाबले की तैयारी कर रही कांग्रेस अपने अनुभवी नेताओं की राजनीतिक ऊर्जा का इस्तेमाल किस तरह करना चाहती है। हरीश रावत लंबे समय से प्रदेश की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं। उनके समर्थकों के लिए उनकी सक्रियता पार्टी की ताकत है, जबकि संगठनात्मक अनुशासन पर जोर देने वाले नेताओं के लिए जरूरी है कि कोई भी अभियान पार्टी की साझा रणनीति से अलग दिखाई न दे। हरीश रावत के संदेश पर कांग्रेस के भीतर सामने आ रही प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि मामला केवल व्यक्तिगत असंतोष तक सीमित नहीं है। एक पक्ष मानता है कि रावत के अनुभव, जनाधार और राजनीतिक संपर्कों का चुनाव में उपयोग होना चाहिए। इस पक्ष के मुताबिक, वरिष्ठ नेता की भूमिका स्पष्ट करने से कार्यकर्ताओं में भ्रम कम होगा और चुनावी तैयारी को गति मिलेगी। दूसरी ओर, पार्टी के भीतर यह राय भी है कि किसी नेता का कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, चुनाव सामूहिक नेतृत्व और संगठन के आधार पर ही लड़ा जाना चाहिए। यदि हर नेता अपने स्तर पर अलग अभियान चलाएगा, तो मतदाताओं और कार्यकर्ताओं के बीच नेतृत्व को लेकर असमंजस पैदा हो सकता है। ऐसे में हाईकमान को समय रहते स्पष्ट व्यवस्था बनानी चाहिए। इन दोनों विचारों के बीच कांग्रेस नेतृत्व की चुनौती यही है कि वह अनुभव और संगठनात्मक अनुशासन के बीच संतुलन कैसे कायम करे। हरीश रावत को नजरअंदाज करने का संदेश जाता है तो पार्टी के एक प्रभावशाली वर्ग में असंतोष बढ़ सकता है। दूसरी ओर, यदि संगठन की घोषित रणनीति से अलग गतिविधियों को लेकर स्पष्टता नहीं बनती, तो सामूहिक नेतृत्व का दावा कमजोर पड़ सकता है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान भाजपा के लिए राजनीतिक अवसर बन सकती है। सत्तारूढ़ भाजपा जहां तीसरी बार सरकार बनाने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस के सामने संगठन को एकजुट करने, सरकार के खिलाफ मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने और जनता के बीच विश्वसनीय विकल्प पेश करने की चुनौती है। ऐसे समय में यदि पार्टी की चर्चा बेरोजगारी, पलायन, भर्ती, भ्रष्टाचार और जनसमस्याओं के बजाय वरिष्ठ नेताओं की भूमिका और आपसी मतभेदों तक सिमट जाती है, तो इसका नुकसान चुनावी तैयारी को हो सकता है। भाजपा इस घटनाक्रम को कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, केवल इस विवाद के आधार पर चुनावी नतीजे तय मान लेना जल्दबाजी होगी। हरीश रावत के संदेश में सबसे महत्वपूर्ण बात उनकी यह टिप्पणी है कि वह पार्टी के लिए पूरक हैं और उनका उपयोग करना है या नहीं, यह नेतृत्व को तय करना है। इस कथन में निष्ठा का दावा भी है और अपनी भूमिका को लेकर उठती बेचौनी का संकेत भी। इसे सीधे विद्रोह कहना उचित नहीं होगा, लेकिन इसे सामान्य राजनीतिक टिप्पणी मानकर नजरअंदाज करना भी कांग्रेस के लिए आसान नहीं है। कांग्रेस को अब यह तय करना होगा कि हरीश रावत जैसे अनुभवी नेता को चुनावी रणनीति में क्या जिम्मेदारी दी जाएगी और प्रदेश के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ समन्वय कैसे बनाया जाएगा। पार्टी के सामने चुनौती किसी एक नेता को बड़ा या छोटा साबित करने की नहीं, बल्कि सभी नेताओं की ताकत को एक साझा चुनावी लक्ष्य से जोड़ने की है। उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह चुनाव से पहले कांग्रेस की अंदरूनी स्थिति पर सवाल खड़े करता है। पार्टी के लिए असली परीक्षा यह नहीं कि कौन किसके बयान का समर्थन करता है, बल्कि यह है कि क्या वह इन मतभेदों को समय रहते सुलझाकर जनता के मुद्दों पर केंद्रित चुनावी अभियान खड़ा कर पाएगी। फिलहाल हरदा के तेवरों ने कांग्रेस नेतृत्व के सामने असहज सवाल खड़ा कर दिया हैकृपार्टी को अनुभवी नेताओं की जरूरत है या नेतृत्व की एकरूपता के नाम पर उनकी भूमिका सीमित रखने की? इस सवाल का जवाब बयानबाजी से नहीं, संगठन के फैसलों और आने वाले दिनों की राजनीतिक गतिविधियों से मिलेगा।

महिला सम्मान पर कांग्रेस का दोहरा चेहरा

बड़ी-बड़ी बातें करने वाली कांग्रेस अपने नेताओं पर लगे आरोपों पर क्यों है खामोश भाजपा ने राहुल गांधी और पार्टी नेतृत्व को घेरा, जवाबदेही तय करने की उठाई मांग देहरादून। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के सवाल पर राजनीति करने वाली कांग्रेस अब खुद भाजपा के निशाने पर है। महिलाओं के अधिकार, समानता और पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ आवाज उठाने वाली कांग्रेस पर भाजपा ने दोहरे रवैये का आरोप लगाया है। भाजपा का सवाल है कि जब महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा की बात आती है, तब कांग्रेस विरोधियों को कठघरे में खड़ा करने में देर नहीं करती, लेकिन जब आरोप उसकी अपनी पार्टी के नेताओं से जुड़े हों, तो नेतृत्व की आवाज कमजोर क्यों पड़ जाती है? महिला सुरक्षा के मुद्दे पर भाजपा ने कांग्रेस की कथनी और करनी के बीच अंतर को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। यह विवाद उस समय और तेज हुआ है, जब भाजपा महिला मोर्चा ने कांग्रेस के खिलाफ प्रदर्शन कर पार्टी नेतृत्व से महिलाओं से जुड़े आरोपों पर स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की। भाजपा ने कांग्रेस पर महिला सम्मान को राजनीतिक सुविधा के हिसाब से देखने का आरोप लगाया है। भाजपा का हमला कांग्रेस नेता राहुल गांधी के महिला सुरक्षा संबंधी बयानों और पार्टी के भीतर महिलाओं से जुड़े विवादों पर नेतृत्व की प्रतिक्रिया को लेकर केंद्रित है। भाजपा महिला मोर्चा की नेताओं ने सवाल उठाया है कि महिलाओं को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित करने वाले राहुल गांधी अपनी पार्टी से जुड़े गंभीर आरोपों पर स्पष्ट जवाब क्यों नहीं देते? भाजपा की हिमाचल प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष दैजी ठाकुर ने कांग्रेस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान आरोप लगाया कि कांग्रेस महिला सम्मान की बात तो करती है, लेकिन अपनी पार्टी से जुड़े मामलों में उसका रवैया अलग दिखाई देता है। उन्होंने महिलाओं की शिकायतों पर कार्रवाई और पार्टी नेतृत्व की जवाबदेही तय करने की मांग की। भाजपा का तर्क है कि महिला सशक्तीकरण केवल मंचों से भाषण देने, नारे लगाने और राजनीतिक विरोधियों पर आरोप लगाने से साबित नहीं होता। इसकी असली परीक्षा तब होती है, जब किसी महिला की शिकायत अपनी पार्टी, अपने संगठन या अपने प्रभावशाली नेताओं से जुड़ी हो। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और स्पष्ट कार्रवाई की मांग करना ही महिला सम्मान के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता का प्रमाण है। भाजपा ने दिल्ली में विपक्षी दलों के प्रदर्शन के दौरान महिला पुलिसकर्मियों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोपों को भी कांग्रेस के खिलाफ अपने हमले का आधार बनाया है। आठ अक्टूबर को भाजपा नेताओं ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के व्यवहार पर सवाल उठाए और कांग्रेस के महिला सम्मान संबंधी नारों पर निशाना साधा। भाजपा ने इस प्रकरण को महिला सुरक्षा पर कांग्रेस के दावों से जोड़ते हुए सार्वजनिक जवाबदेही की मांग की। हालांकि, इस घटनाक्रम में लगाए गए आरोपों और उनकी स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्यात्मक स्थिति के बीच अंतर करना जरूरी है। राजनीतिक आरोप अपने आप में किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं हैं। फिर भी, भाजपा इस विवाद को कांग्रेस की राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर रही है। महिला सुरक्षा का मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। महिलाओं के खिलाफ अपराध, उत्पीड़न और भेदभाव के मामलों में सरकार, विपक्ष, राजनीतिक संगठनों और संस्थानोंकृसभी की जवाबदेही होनी चाहिए। किसी भी महिला की शिकायत को राजनीतिक पहचान के आधार पर कमतर नहीं आंका जा सकता। भाजपा कांग्रेस से जिन सवालों के जवाब मांग रही है, उनका राजनीतिक महत्व अपनी जगह है। लेकिन यही कसौटी भाजपा सहित सभी दलों पर भी लागू होनी चाहिए। यदि किसी नेता पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो निष्पक्ष जांच, पीड़ित की गरिमा की रक्षा और कानून के अनुरूप कार्रवाई होनी चाहिए। महिला सुरक्षा को दलगत राजनीति से ऊपर रखने का अर्थ भी यही है। कांग्रेस के सामने चुनौती केवल भाजपा के आरोपों का जवाब देने की नहीं है। उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के मामले में उसके संगठनात्मक मानदंड क्या हैं और शिकायतें सामने आने पर वह किस तरह जवाबदेही सुनिश्चित करती है। दूसरी ओर, भाजपा को भी यह दिखाना होगा कि महिला सम्मान के सवाल पर उसका रुख राजनीतिक विरोधियों तक सीमित नहीं, बल्कि सभी मामलों में समान है। महिला सुरक्षा का सवाल उत्तराखंड समेत पूरे देश की राजनीति में महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दल महिलाओं के समर्थन को अपनी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा मानते हैं। ऐसे में एक-दूसरे पर महिला विरोधी रवैये का आरोप लगाना आसान है, लेकिन जनता के सामने अपनी प्रतिबद्धता साबित करना कठिन। भाजपा कांग्रेस के इस विवाद को चुनावी विमर्श में भुनाने की कोशिश कर सकती है। उसका संदेश होगा कि महिला सम्मान की बात करने वाले दलों को पहले अपने संगठन के भीतर जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। कांग्रेस के लिए जरूरी होगा कि वह इन आरोपों का तथ्यों के साथ जवाब दे और महिला सुरक्षा पर अपनी नीति तथा व्यवहार के बीच सामंजस्य दिखाए। महिला सम्मान कोई चुनावी नारा नहीं, सामाजिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है। किसी भी दल की असली परीक्षा उसके भाषणों से नहीं, बल्कि महिलाओं की शिकायतों पर उसके व्यवहार से होती है। कांग्रेस पर भाजपा के आरोप राजनीतिक हैं, लेकिन उनसे उठा जवाबदेही का सवाल महत्वपूर्ण है। इस सवाल का उत्तर केवल बयानबाजी से नहीं, निष्पक्ष जांच, पारदर्शिता और कार्रवाई से ही दिया जा सकता है।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: अघोषित इमरजेंसी

udaydinmaan: अघोषित इमरजेंसी : दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन, गिरफ्तारी और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर गरमाई सियासत सरकार की कार्रवाई और नागरिक अधिकारों के बीच टकराव बना राजनी...

चुनावी बिगुल से पहले भाजपा की बढ़ी ‘रफ्तार’

संगठन, सरकार और चुनावी रणनीति पर फोकस 60 पार के लक्ष्य के साथ तीसरी जीत की तैयारी देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही भारतीय जनता पार्टी ने अपनी राजनीतिक गतिविधियां तेज कर दी हैं। संगठनात्मक बैठकों से लेकर सरकार के कामकाज के प्रचार और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने तक, पार्टी का जोर चुनावी तैयारी को समय रहते धार देने पर है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की भाजपा की रणनीति अब राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। पार्टी नेतृत्व की ओर से 60 पार का लक्ष्य सामने रखे जाने के बीच संगठन और सरकार के सामने इस नारे को जमीनी समर्थन में बदलने की चुनौती भी है। भाजपा की रणनीति केवल चुनाव के नजदीक आने पर प्रचार अभियान शुरू करने तक सीमित नहीं दिखती। पार्टी संगठन को सक्रिय रखने, केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने, बूथ प्रबंधन मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाने पर जोर दे रही है। पार्टी के लिए यह तैयारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन की परंपरा को तोड़कर लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने के बाद अब तीसरी जीत का लक्ष्य उसके सामने है। भाजपा नेतृत्व की ओर से 2027 के चुनाव में 60 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य पार्टी की चुनावी महत्वाकांक्षा को तो जाहिर करता है, लेकिन इसके साथ ही संगठन के सामने बड़ी जिम्मेदारी भी खड़ी करता है। 70 सदस्यीय विधानसभा में इतनी बड़ी संख्या में सीटें हासिल करने के लिए पार्टी को अपने मौजूदा जनाधार को बनाए रखने के साथ उन क्षेत्रों में भी समर्थन बढ़ाना होगा, जहां स्थानीय असंतोष, विकास संबंधी शिकायतें या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा उसके लिए चुनौती बन सकती हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा सरकार अपने कार्यकाल के फैसलों, विकास योजनाओं और केंद्र सरकार के सहयोग को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने की तैयारी में है। वहीं प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और संगठन के अन्य पदाधिकारियों की जिम्मेदारी कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने तथा पार्टी की रणनीति को बूथ स्तर तक पहुंचाने की है। चुनावी तैयारियों में भाजपा का परंपरागत संगठनात्मक ढांचा अहम भूमिका निभाने वाला है। शक्ति केंद्रों, बूथ समितियों और स्थानीय कार्यकर्ताओं के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश पार्टी की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संगठन के स्तर पर बैठकों, जिम्मेदारियों के निर्धारण और सरकार के कार्यक्रमों को जनता के बीच ले जाने की गतिविधियों से पार्टी चुनावी माहौल तैयार करना चाहती है। भाजपा के लिए चुनौती यह भी है कि संगठन की सक्रियता केवल बैठकों और कार्यक्रमों तक सीमित न रहे। बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं, पलायन, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों जैसे मुद्दों पर जनता के सवालों का जवाब देना भी चुनावी तैयारी का हिस्सा होगा। इन विषयों पर विपक्ष लगातार सरकार को घेरता रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस भाजपा की चुनावी तैयारियों के बीच अपने संगठन को एकजुट करने और सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने की कोशिश में है। कांग्रेस के सामने नेतृत्व, आपसी समन्वय और प्रदेशव्यापी अभियान को प्रभावी बनाने की चुनौती है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं। भाजपा जहां एसआईआर को मतदाता सूची दुरुस्त करने की प्रक्रिया बता रही है, वहीं कांग्रेस ने नामों में कमी को लेकर सवाल उठाए हैं। इस मुद्दे पर चुनावी राजनीति के साथ-साथ निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के नाम सूची में बने रहने का सवाल भी महत्वपूर्ण है। चुनावी तैयारी के बीच भाजपा के लिए सरकार की उपलब्धियों को सामने रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी जनता की नाराजगी और स्थानीय समस्याओं को समझना भी है। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के सवाल लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में घटते छात्र नामांकन, युवाओं के रोजगार और पलायन जैसे विषयों पर सरकार के दावों तथा जमीनी अनुभवों के बीच अंतर को विपक्ष चुनावी मुद्दा बना सकता है। ऐसे में भाजपा की रणनीति की असली परीक्षा प्रचार की गति से आगे बढ़कर जनता के बीच उसके संदेश की स्वीकार्यता में होगी। पार्टी के सामने अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने, स्थानीय असंतोष को संबोधित करने और सरकार के कामकाज का राजनीतिक लाभ लेने की चुनौती है। विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले राजनीतिक गतिविधियों में तेजी को भाजपा की समयपूर्व चुनावी तैयारी के रूप में देखा जा सकता है। पार्टी के लिए शुरुआती तैयारी का उद्देश्य संगठन को चुनावी मोड में रखना और विपक्ष से पहले अपना राजनीतिक एजेंडा स्थापित करना है। हालांकि, चुनावी लक्ष्य और वास्तविक जनसमर्थन के बीच की दूरी का आकलन जनता के मुद्दों, स्थानीय परिस्थितियों और चुनाव के दौरान बनने वाले राजनीतिक समीकरणों से ही होगा। उत्तराखंड की राजनीति में अब नजर इस बात पर रहेगी कि भाजपा अपनी संगठनात्मक सक्रियता को कितनी प्रभावी ढंग से जनसंपर्क में बदलती है और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल उसके मुकाबले किस तरह अपनी रणनीति तैयार करते हैं। चुनाव की औपचारिक घोषणा में अभी समय हो, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच तैयारी और मुद्दों को लेकर प्रतिस्पर्धा का दौर शुरू हो चुका है।

अंदरूनी ‘उलझनों’ में कांग्रेस

चुनाव की तैयारी के बीच नेतृत्व, यात्राओं और संगठनात्मक तालमेल पर सवाल भाजपा को घेरने से पहले अपनों के बीच समन्वय की चुनौती देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने लगी हैं, लेकिन कांग्रेस के सामने सरकार को घेरने के साथ-साथ अपने भीतर के मतभेदों को संभालने की चुनौती भी खड़ी हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर पार्टी नेतृत्व की आपत्ति ने संगठन के भीतर समन्वय और नेतृत्व की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी। चुनाव से कुछ महीने पहले सामने आया यह विवाद कांग्रेस की उस रणनीति के लिए अहम है, जिसके तहत पार्टी भाजपा के सामने एकजुट विकल्प पेश करना चाहती है। हरीश रावत की यात्रा को लेकर प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रमों के बीच किसी अलग अभियान से संगठनात्मक तालमेल प्रभावित हो सकता है। यात्रा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल से चर्चा किए बिना आगे बढ़ाने पर भी आपत्ति जताई गई। दूसरी ओर, हरीश रावत ने अपने कार्यक्रम को जनसंपर्क और शुभचिंतकों के प्रति आभार व्यक्त करने की पहल बताया। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर व्यक्तिगत राजनीतिक पहलों और सामूहिक संगठनात्मक अनुशासन के बीच तनाव को सार्वजनिक कर दिया। हरीश रावत की यात्रा का विवाद महज एक कार्यक्रम को लेकर असहमति तक सीमित नहीं रहा। इसके साथ यह सवाल भी जुड़ गया कि चुनाव से पहले पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक गतिविधियों का संचालन किस तरह होगा और प्रदेश में अभियान की दिशा कौन तय करेगा। यात्रा को लेकर हाईकमान की आपत्ति के बावजूद हरीश रावत ने जसपुर से हल्द्वानी तक अपना कार्यक्रम आगे बढ़ाया। इस दौरान पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह की मौजूदगी ने घटनाक्रम को अतिरिक्त राजनीतिक महत्व दिया। वहीं, प्रदेश कांग्रेस के दूसरे प्रमुख नेताओं की अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर चर्चा को हवा दी। हालांकि, केवल किसी कार्यक्रम में मौजूदगी या गैरमौजूदगी से नेताओं के बीच मतभेदों की पूरी तस्वीर तय नहीं की जा सकती। कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है। एक ओर वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक सक्रियता और उनके समर्थकों की भूमिका को साथ लेकर चलना है, तो दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना है कि चुनावी अभियान किसी एक नेता की पहल के बजाय साझा रणनीति के तहत आगे बढ़े। राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से संकेत दिया गया है कि उत्तराखंड में पार्टी के अभियान सामूहिक रूप से चलाए जाने चाहिए। इस संदेश के पीछे संगठनात्मक एकजुटता और चुनावी तैयारियों में तालमेल बनाए रखने की जरूरत दिखाई देती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या निर्देश जारी करने भर से अलग-अलग नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, कार्यशैली और प्राथमिकताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो पाएगा? भाजपा जहां संगठन और बूथ स्तर पर अपनी चुनावी तैयारियों को गति देने में जुटी है, वहीं कांग्रेस के लिए सरकार के खिलाफ मुद्दों को एक साझा अभियान में बदलना जरूरी है। बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं, पलायन, ग्रामीण सुविधाओं और भ्रष्टाचार से जुड़े सवालों पर विपक्ष सरकार को घेरता रहा है। इन मुद्दों को प्रदेशव्यापी राजनीतिक अभियान का रूप देने के लिए नेताओं के बीच स्पष्ट जिम्मेदारी और तालमेल की जरूरत होगी। कांग्रेस की चुनौती यह भी है कि सरकार के खिलाफ जन असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने के लिए उसे केवल आरोपों तक सीमित नहीं रहना होगा। जनता के सामने वैकल्पिक नीतियों, रोजगार और विकास को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण रखना भी जरूरी होगा। यदि पार्टी का सार्वजनिक विमर्श बार-बार आंतरिक विवादों की ओर लौटता है, तो उसके मुद्दों और संगठनात्मक संदेश को पर्याप्त जगह मिलना कठिन हो सकता है।

सड़क पर आ गई ‘वोट’ की लड़ाई

एसआईआर पर दिल्ली में सियासी टकराव सरकार की जवाबदेही को लेकर नई बहस सीजेपी का प्रदर्शन बन गया बहस का केंद्र मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग नई दिल्ली/देहरादून। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर छिड़ी सियासी जंग अब सड़कों तक पहुंच गई है। दिल्ली में काकरोच जनता पार्टी और उससे जुड़े छात्र संगठनों के प्रदर्शन ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाताओं के अधिकार और सरकार की जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने से यह विवाद और गहरा गया। सवाल अब सिर्फ मतदाता सूची में नाम घटने-बढ़ने का नहीं, बल्कि यह भी है कि लोकतंत्र में मतदाता के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी कौन और किस तरह निभाएगा? सीजेपी ने एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की कार्रवाई की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। संगठन का कहना है कि मतदाता सूची में सुधार के नाम पर किसी पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग के जरिए संगठन ने निर्वाचन व्यवस्था की जवाबदेही को सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब मतदाता सूची का पुनरीक्षण कई राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का विषय बना हुआ है। विपक्षी दलों की चिंता है कि यदि नाम हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं रही, तो पात्र मतदाताओं को नुकसान हो सकता है। दूसरी ओर, पुनरीक्षण के समर्थकों का तर्क है कि मृत, स्थानांतरित और अपात्र मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को शुद्ध करना आवश्यक है। दोनों पक्षों के दावों के बीच निर्णायक महत्व इस बात का है कि नाम हटाने के कारणों का सत्यापन कैसे हुआ और प्रभावित नागरिकों को अपना नाम वापस जुड़वाने का कितना प्रभावी अवसर मिला। दिल्ली में प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने के बाद विवाद का दूसरा मोर्चा खुल गया। पुलिस ने कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक सुरक्षा और आवेदन से जुड़ी प्रक्रियागत वजहों का हवाला दिया। वहीं, सीजेपी ने प्रशासन के रुख पर सवाल उठाए। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरों ने भी घटनाक्रम को चर्चा में ला दिया। यहां प्रशासन और आंदोलनकारियों, दोनों की भूमिका की कसौटी तय होनी चाहिए। कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन किसी प्रदर्शन पर रोक के कारण स्पष्ट और न्यायसंगत होने चाहिए। इसी तरह, लोकतांत्रिक विरोध करने वाले संगठनों से भी अपेक्षा की जाती है कि वह कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखें। विरोध की आवाज और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को मजबूत करता है। एसआईआर को लेकर जारी विवाद ने राजनीतिक दलों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और क्या प्रत्येक पात्र मतदाता को अपना नाम सूची में बनाए रखने या कटने की स्थिति में उसे दोबारा जुड़वाने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है? इन सवालों का जवाब राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग के आंकड़ों, सत्यापन की प्रक्रिया और शिकायतों के निस्तारण से मिलना चाहिए। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसे बहाल करने की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। वहीं, यदि किसी नाम को नियमों के तहत हटाया गया है, तो उसका कारण भी स्पष्ट होना चाहिए। लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता और प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार की सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही व्यवस्था के दो अनिवार्य पक्ष हैं। एसआईआर पर विवाद का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि मतदाता सूची चुनावी प्रक्रिया की बुनियाद है। राजनीतिक दलों के लिए यह केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। विपक्ष निर्वाचन आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठा रहा है, जबकि पुनरीक्षण के समर्थक इसे चुनावी व्यवस्था को दुरुस्त करने की प्रक्रिया बता रहे हैं। लेकिन इस बहस में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष आम मतदाता है। उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए कि उसका नाम किस राजनीतिक दल के लिए फायदेमंद है या नुकसानदेह। उसकी चिंता यह है कि पात्र होने के बावजूद उसका नाम सूची से न कटे और वह अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सके। किसी भी राजनीतिक दल को मतदाता के इस अधिकार को अपने आरोप-प्रत्यारोप से छोटा नहीं करना चाहिए। दिल्ली में सीजेपी का प्रदर्शन भले ही एक संगठन की राजनीतिक पहल हो, लेकिन इससे उठे सवाल व्यापक हैं। निर्वाचन आयोग को अपनी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता बनाए रखनी होगी, राजनीतिक दलों को प्रमाणों के आधार पर सवाल उठाने होंगे और प्रशासन को विरोध के अधिकार तथा कानून-व्यवस्था के बीच उचित संतुलन कायम करना होगा। लोकतंत्र की ताकत केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि इस भरोसे में है कि प्रत्येक पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित है और निर्वाचन प्रक्रिया निष्पक्ष है। मतदाता सूची पर उठे सवालों का जवाब नारों से नहीं, तथ्यों से देना होगा। क्योंकि लोकतंत्र में सरकारें बदल सकती हैं, राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप भी बदलते रहते हैं, लेकिन मतदाता के मताधिकार पर जनता का भरोसा कमजोर नहीं पड़ना चाहिए।

अघोषित इमरजेंसी

दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन, गिरफ्तारी और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर गरमाई सियासत सरकार की कार्रवाई और नागरिक अधिकारों के बीच टकराव बना राजनीतिक बहस का केंद्र जंतर-मंतर से उठी बहस, राजधानी में सुरक्षा का अभूतपूर्व घेरा,हिरासत में लिए गए कई लोग नई दिल्ली/देहरादून। लोकतंत्र की असली कसौटी सत्ता के सामने उठने वाले सवालों से तय होती है। सरकार की नीतियों का विरोध, असहमति की आवाज और शांतिपूर्ण प्रदर्शन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी पहचान हैं। लेकिन जब विरोध करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होती है, गिरफ्तारियों की खबरें सामने आती हैं और नागरिक स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठने लगते हैं, तो बहस केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहती। सवाल यह भी उठता है कि क्या असहमति के लिए लोकतांत्रिक जगह लगातार सिमट रही है? दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन और पुलिस की कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवालों ने इसी बहस को फिर तेज किया है। विपक्षी दलों और सरकार के आलोचकों की ओर से ऐसी परिस्थितियों को अघोषित इमरजेंसी की संज्ञा दी जा रही है। उनका आरोप है कि असहमति जताने वालों पर कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की हिरासत और विरोध की आवाज को सीमित करने की कोशिशें लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय हैं। दूसरी ओर, सरकार और प्रशासन की ओर से ऐसी कार्रवाइयों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा लागू कानूनी प्रावधानों के तहत उचित ठहराया जा सकता है। ऐसे में जरूरी है कि आरोपों और सरकारी दलीलों की जांच तथ्यों, कानूनी आधार और नागरिक अधिकारों की कसौटी पर की जाए। दिल्ली में काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन से पहले जिस स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था की गई, उसने राजनीतिक टकराव को नया आयाम दे दिया। प्रदर्शनकारी मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। उनका विरोध मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर है। प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने के बाद पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी। दो अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान भी बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया था। द वीक की रिपोर्ट के अनुसार, उस दिन 700 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबर थी। वहीं, 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले भी पुलिस ने व्यापक स्तर पर कार्रवाई की। प्रदर्शन से पहले राजधानी में हजारों पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों की तैनाती, सड़कों पर अवरोधक, यातायात में बदलाव और कुछ मेट्रो सेवाओं पर प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं की गईं। जनपथ-कर्तव्य पथ क्षेत्र के चार किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को भी निर्धारित अवधि के लिए निलंबित किए जाने की खबर आई। इन कदमों का उद्देश्य प्रशासन की ओर से संभावित अव्यवस्था को रोकना बताया गया। यही वह बिंदु है जहां सरकार और उसके आलोचकों के तर्क आमने-सामने हैं। प्रशासन के सामने सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और संभावित हिंसा या अव्यवस्था को रोकने की जिम्मेदारी है। लेकिन इस जिम्मेदारी के निर्वहन में यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि शांतिपूर्ण विरोध करने और अपनी बात रखने के संवैधानिक अधिकार का अनावश्यक हनन न हो। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्वक और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं। इसलिए किसी कार्रवाई की वैधता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि पुलिस तैनात थी या प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी। यह भी देखना होगा कि प्रतिबंध का आधार क्या था, कार्रवाई कितनी आवश्यक और आनुपातिक थी तथा हिरासत में लिए गए लोगों के कानूनी अधिकारों का पालन हुआ या नहीं। दिल्ली की घटना ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया है। यदि किसी संगठन के प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका है, तो प्रशासन को उसे नियंत्रित करने का अधिकार है। लेकिन क्या आशंका के आधार पर व्यापक प्रतिबंधों और धरपकड़ को सामान्य प्रशासनिक उपाय मान लिया जाना चाहिए? इस सवाल का जवाब ठोस तथ्यों और कार्रवाई की स्वतंत्र जांच से ही मिल सकता है। विपक्षी दलों और आंदोलनकारियों की ओर से इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश लगाने की कोशिश बताया जा रहा है। दूसरी ओर, पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने के पीछे प्रक्रियागत खामियों और कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताओं का हवाला दिया है। ऐसे में अघोषित इमरजेंसी का आरोप राजनीतिक बहस का हिस्सा है, लेकिन इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए व्यापक और प्रमाणित साक्ष्यों की जरूरत होगी। फिर भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि लोकतंत्र में विरोध की अनुमति, पुलिस की जवाबदेही और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि असहमति के अधिकार की रक्षा करने से भी तय होती है। सरकार के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन नागरिकों के लिए यह भरोसा भी उतना ही जरूरी है कि शांतिपूर्ण सवाल पूछना अपने आप में अपराध नहीं है। दिल्ली का घटनाक्रम इसी संतुलन की परीक्षा ले रहा है।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: भाजपा-कांग्रेस में आंकड़ों का ‘द्वंद’

udaydinmaan: भाजपा-कांग्रेस में आंकड़ों का ‘द्वंद’: एसआईआर पर कांग्रेस के आरोपों को भाजपा की चुनौती 7,522 नामों पर आपत्ति मंजूर, नौ लाख के दावे पर घेरा महेंद्र बोलेकृफार्म-7 से लाखों नाम काटने...

‘जनसंवाद’ का सच या राजनीतिक ‘पैंतरा’

उमेश कुमार ने ड्रामेबाज और नौटंकीबाज कहकर बोला हमला कांग्रेस हाईकमान की नाराजगी के बाद नौ धन्यवाद यात्राएं स्थगित पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की राजनीतिक शैली पर छिड़ी बहस देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। एक तरफ अपनी ही पार्टी के हाईकमान के साथ धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर खींचतान, दूसरी तरफ खानपुर के विधायक उमेश कुमार के तीखे व्यक्तिगत हमले। रावत की राजनीतिक शैली पर सवाल उठाते हुए उमेश कुमार ने उन्हें ड्रामेबाज और नौटंकीबाज तक कह दिया। उनके इन शब्दों ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या हरीश रावत की राजनीतिक सक्रियता कांग्रेस को एकजुट कर रही है या उनके तौर-तरीके पार्टी के भीतर ही असहजता पैदा कर रहे हैं? हरीश रावत की राजनीति में बयान, प्रतीक, यात्राएं और राजनीतिक संदेश हमेशा अहम रहे हैं। वह जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए अलग अंदाज अपनाते रहे हैं। लेकिन इस बार उनकी धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा खुद उनके लिए राजनीतिक असहजता का कारण बन गई। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा ने यात्रा को लेकर आपत्ति जताई। पार्टी नेतृत्व की चिंता थी कि चुनाव से पहले व्यक्तिगत कार्यक्रमों के बजाय सभी नेताओं को संगठन के साझा मंच से काम करना चाहिए। इसके बावजूद रावत पांच अक्टूबर को जसपुर से हल्द्वानी तक यात्रा लेकर आगे बढ़े। बाद में हाईकमान के सख्त रुख के बीच उन्होंने अपनी प्रस्तावित नौ और यात्राएं स्थगित करने की घोषणा कर दी। इस पूरे घटनाक्रम ने उनकी राजनीतिक रणनीति को लेकर सवाल खड़े किए। राजनीति में अपनी बात पर अड़े रहना नेतृत्व का गुण माना जा सकता है, लेकिन संगठनात्मक अनुशासन की भी अपनी अहमियत है। यदि कोई वरिष्ठ नेता पार्टी को जगाने के लिए यात्रा निकालता है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि उस अभियान पर पार्टी नेतृत्व को पहले विश्वास में क्यों नहीं लिया गया और यदि यात्रा का मकसद कांग्रेस को सक्रिय करना था, तो उसके लिए संगठन के साथ तालमेल बनाने में आखिर परेशानी कहां थी? रावत ने अपनी यात्रा का उद्देश्य कांग्रेस में नई ऊर्जा भरना और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना बताया। उनका तर्क था कि लंबे समय से बड़े जनसंपर्क अभियान की जरूरत महसूस की जा रही थी। दूसरी तरफ पार्टी नेतृत्व का जोर साझा कार्यक्रमों पर रहा। इस टकराव में दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं, लेकिन राजनीतिक नुकसान की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी बीच विधायक उमेश कुमार ने हरीश रावत पर तीखा हमला बोलते हुए उनके लिए ड्रामेबाज और नौटंकीबाज जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने रावत की राजनीतिक भूमिका और कांग्रेस में उनकी गतिविधियों पर सवाल उठाए। ये उमेश कुमार के राजनीतिक आरोप हैं, जिन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। लेकिन इन आरोपों ने पहले से गरम राजनीतिक माहौल में नया विवाद जरूर जोड़ दिया है। यहां सवाल केवल तीखे शब्दों का नहीं है। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप आम हैं, लेकिन जनता यह भी देखती है कि नेताओं के दावे और उनके कदम कितने मेल खाते हैं। राजनीतिक यात्राओं का मकसद जनता के सवाल उठाना है या पार्टी के भीतर अपनी ताकत का संदेश देनाकृयह बहस अब रावत के ताजा घटनाक्रम के साथ फिर सामने है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती भाजपा का मुकाबला करने के साथ अपना संगठन मजबूत रखना है। ऐसे समय में वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद सार्वजनिक होना पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। हरीश रावत के पास लंबा राजनीतिक अनुभव है और प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव रहा है। लेकिन अनुभव के साथ यह अपेक्षा भी जुड़ी है कि उनकी सक्रियता संगठन की रणनीति को मजबूती दे। अब रावत के सामने चुनौती केवल अपने राजनीतिक विरोधियों को जवाब देने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की भी है कि उनकी पहल कांग्रेस के व्यापक हित में है। दूसरी ओर, उमेश कुमार के आरोपों को भी राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए। किसी नेता को नौटंकीबाज या ड्रामेबाज कह देना राजनीतिक हमला तो हो सकता है, लेकिन इससे अपने आप कोई आरोप सच साबित नहीं हो जाता। असली कसौटी नेता के सार्वजनिक आचरण, उसके फैसलों, उसके दावों और जनता के मुद्दों पर उसके काम की होती है। हरीश रावत की धन्यवाद यात्रा, हाईकमान की आपत्ति और फिर नौ यात्राओं का स्थगन एक ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम है, जिस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन इस बहस का अंतिम फैसला व्यक्तिगत विशेषणों से नहीं, बल्कि तथ्यों और राजनीतिक परिणामों से होना चाहिए। उत्तराखंड की जनता को नेताओं के बीच आरोपों की जंग से ज्यादा रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के सवालों पर जवाब चाहिए। चुनावी राजनीति में अंततः वही नेता अपनी विश्वसनीयता मजबूत कर पाएगा, जो इन सवालों का ठोस जवाब देगा।

भाजपा-कांग्रेस में आंकड़ों का ‘द्वंद’

एसआईआर पर कांग्रेस के आरोपों को भाजपा की चुनौती 7,522 नामों पर आपत्ति मंजूर, नौ लाख के दावे पर घेरा महेंद्र बोलेकृफार्म-7 से लाखों नाम काटने का आरोप भ्रामक स्थानांतरित मतदाताओं के आंकड़ों पर कांग्रेस से मांगा जवाब देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी संग्राम तेज हो गया है। मतदाता सूची से लाखों नाम कम होने पर कांग्रेस के सवालों के जवाब में भाजपा ने आंकड़ों के साथ पलटवार किया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि फार्म-7 के जरिए लाखों मतदाताओं के नाम काटने का आरोप वास्तविक आंकड़ों से मेल नहीं खाता। उनके अनुसार, फार्म-7 के तहत प्राप्त 96,704 आवेदनों में से जांच के बाद केवल 7,522 नाम हटाने की आपत्तियां स्वीकार की गईं, जबकि 89,182 आवेदन निरस्त कर दिए गए। भाजपा ने कांग्रेस से सवाल किया है कि यदि पुनरीक्षण के दौरान अनुपस्थित, स्थानांतरित या मृत बताए गए मतदाता वास्तव में उत्तराखंड में रह रहे हैं, तो कांग्रेस उन्हें खोजकर निर्वाचन आयोग के सामने पेश करे। भट्ट ने आरोप लगाया कि कांग्रेस मतदाता सूची के आंकड़ों को राजनीतिक रंग देकर भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है। भाजपा का कहना है कि मतदाता सूची को अद्यतन करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे राजनीतिक विवाद का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। भाजपा की दलील है कि फार्म-7 के आंकड़ों और पूरी मतदाता सूची में आई कमी को एक ही नजरिये से देखना गलत है। निर्वाचन आयोग के अनुसार, एसआईआर के दौरान 8,26,977 मतदाता अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टि वाली श्रेणियों में चिह्नित किए गए थे। अंतिम मतदाता सूची में 71,58,949 मतदाता दर्ज हैं। आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, प्रारूप सूची के बाद 1,29,872 नए मतदाता जोड़े गए, जबकि 1,04,708 नाम हटाए गए। इनमें 7,522 नाम फार्म-7 पर स्वीकार की गई आपत्तियों के आधार पर हटाए गए। भाजपा इसी अंतर को कांग्रेस के आरोपों के जवाब के रूप में पेश कर रही है। पार्टी का तर्क है कि पूरी सूची में आई कमी को केवल फार्म-7 के जरिए नाम काटने की कार्रवाई बताना सही नहीं है। हालांकि, कांग्रेस की ओर से मतदाता सूची में संभावित गड़बड़ियों और पात्र मतदाताओं के नाम हटने की आशंकाएं उठाई गई हैं। ऐसे में विवाद का अंतिम समाधान राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग के सत्यापन और शिकायतों के निष्पक्ष निस्तारण से ही होगा। महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस को चुनौती दी कि यदि पार्टी को लगता है कि सूची से हटाए गए लोग वास्तव में पात्र मतदाता हैं और उत्तराखंड में ही रह रहे हैं, तो वह उन्हें ढूंढकर आयोग के सामने पेश करे। भाजपा के इस बयान को कांग्रेस के आरोपों पर सीधा राजनीतिक पलटवार माना जा रहा है। भाजपा का सवाल है कि यदि नाम हटाने की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है, तो कांग्रेस को संबंधित मतदाताओं और उनके मामलों के आधार पर शिकायतें सामने रखनी चाहिए। वहीं, कांग्रेस की आशंकाओं की जांच करना और यह सुनिश्चित करना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि कोई पात्र मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित न रहे। उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची का मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है। भाजपा जहां पुनरीक्षण को सूची दुरुस्त करने की प्रक्रिया बता रही है, वहीं कांग्रेस की चिंता पात्र मतदाताओं के नाम छूटने को लेकर है। इस विवाद में दोनों दल अपने-अपने राजनीतिक तर्क रख रहे हैं, लेकिन सबसे अहम सवाल उन नागरिकों का है जिनके नाम नई सूची में नहीं हैं। लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी प्रत्येक पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार सुरक्षित रखना भी है। इसलिए भाजपा की चुनौती और कांग्रेस के आरोपों के बीच अब निगाहें निर्वाचन आयोग की जांच, नामों के पुनर्सत्यापन और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने के प्रयासों पर रहेंगी।

चुनावी ‘बिसात’ पर उत्तराखंड में ‘नई चालें’

सरकार के फैसलों के बीच चुनाव की बिसात बिछाने में जुटे सियासी दल भाजपा की सत्ता वापसी की जंग बनाम कांग्रेस के अंतर्कलह की चुनौती भाजपा तीसरी बार के लिए तैयार, कांग्रेस के सामने एकजुटता का सवाल देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी नहीं हुई है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी तापमान लगातार बढ़ रहा है। भाजपा तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति को धार देने में जुटी है तो कांग्रेस सरकार को घेरने के साथ अपने संगठन और नेतृत्व के समीकरण साधने की चुनौती से जूझ रही है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से लेकर बेरोजगारी, पलायन, भ्रष्टाचार और राजनीतिक यात्राओं तक, हर मुद्दा अब चुनावी चश्मे से देखा जा रहा है। सियासी मैदान में सवाल सिर्फ सरकार के कामकाज का नहीं, बल्कि विपक्ष की एकजुटता और दोनों दलों की राजनीतिक विश्वसनीयता का भी है। प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने शासन के पक्ष में माहौल बनाए रखने और सत्ता विरोधी असंतोष को सीमित करने की है। पार्टी संगठन बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व को चुनावी अभियान का प्रमुख आधार बनाया जा रहा है। लेकिन भाजपा के लिए केवल संगठनात्मक मजबूती का दावा पर्याप्त नहीं होगा। बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं पर उठते सवाल, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर जनता जवाब भी मांगेगी। सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि विकास और जनकल्याण के दावों को जमीन पर हुए काम से जोड़कर पेश करे। चुनावी नारों की असली परीक्षा जनता के अनुभवों के बीच ही होगी। विपक्षी कांग्रेस के पास सरकार को घेरने के लिए कई मुद्दे हैं। पार्टी बेरोजगारी, पलायन, भर्ती विवाद, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार पर हमलावर रही है। मगर इन मुद्दों को चुनावी ताकत में बदलने के लिए कांग्रेस को अपने भीतर के मतभेदों पर भी नियंत्रण रखना होगा। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर पार्टी नेतृत्व की नाराजगी इसी चुनौती को उजागर करती है। रावत ने पांच अक्टूबर को जसपुर से हल्द्वानी तक यात्रा की, जबकि कांग्रेस नेतृत्व ने इसे संगठन से अलग समानांतर कार्यक्रम मानते हुए आपत्ति जताई। बाद में रावत ने प्रस्तावित नौ यात्राएं स्थगित करने की घोषणा की। इस घटनाक्रम ने चुनाव से पहले पार्टी के भीतर नेतृत्व, अनुशासन और राजनीतिक भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस के लिए जरूरी है कि वह सरकार विरोधी माहौल बनाने के साथ जनता के सामने एक स्पष्ट नेतृत्व, साझा चुनावी कार्यक्रम और भरोसेमंद विकल्प भी प्रस्तुत करे। यदि पार्टी के नेता सार्वजनिक मंचों पर ही अपनी राजनीतिक जगह को लेकर उलझे रहेंगे, तो सरकार के खिलाफ उठाए गए मुद्दों की धार कमजोर पड़ सकती है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ने भाजपा और कांग्रेस के बीच एक और मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस ने मतदाता सूची से नाम कम होने पर सवाल उठाए हैं, जबकि भाजपा इसे सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया बता रही है। दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हैं। इस विवाद में राजनीतिक बयानबाजी से अधिक महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि कोई पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न रहे। मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टियों की पहचान जरूरी है, लेकिन किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से हटने पर उसे सुधारने की प्रक्रिया भी सरल और प्रभावी होनी चाहिए। चुनाव से पहले इस मुद्दे पर निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता और निष्पक्षता की अहम भूमिका रहेगी। उत्तराखंड की राजनीति में बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता जैसे सवाल चुनावी बहस के केंद्र में रहने वाले हैं। भाजपा अपने शासन और विकास के दावों के साथ जनता के बीच जाएगी, जबकि कांग्रेस सरकार की कमियों को उजागर कर सत्ता परिवर्तन की संभावना तलाशेगी। लेकिन दोनों दलों के सामने एक समान कसौटी है। जनता यह जानना चाहेगी कि रोजगार के कितने अवसर बने, पहाड़ के गांवों में बुनियादी सुविधाएं कितनी सुधरीं, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच कितनी बढ़ी और युवाओं का भरोसा जीतने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए। इन सवालों का जवाब केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं दिया जा सकता। उत्तराखंड की सियासत में अभी से आरोपों, यात्राओं, संगठनात्मक बैठकों और राजनीतिक दावों का दौर तेज हो गया है। भाजपा सत्ता बचाने की रणनीति पर काम कर रही है तो कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए अपने मुद्दों और संगठन को मजबूत करने की कोशिश में है। छोटे दलों और क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों की भूमिका भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। फिलहाल, प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है कि कौन-सा दल जनता के मुद्दों को विश्वसनीय समाधान में बदल पाता है। भाजपा के लिए शासन के रिकार्ड का हिसाब देना चुनौती है तो कांग्रेस के लिए अपने भीतर एकजुटता और मजबूत विकल्प पेश करना। चुनावी बिसात पर चालें भले अभी से चली जा रही हों, लेकिन अंतिम कसौटी जनता की अपेक्षाएं, नेताओं की जवाबदेही और जमीन पर किए गए काम ही होंगे।

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: ‘गंगाजल’ की कसम, भाजपा की ‘घेराबंदी’

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udaydinmaan: नाना पाटेकर के आखिरी पल का ‘रहस्य’

udaydinmaan: नाना पाटेकर के आखिरी पल का ‘रहस्य’: सीने में दर्द के बाद दोस्त को किया संदेश 45 मिनट तक चला उनको बचाने का प्रयास निधन के बाद दर्ज हुआ मेडिको-लीगल केस मुंबई/देहरादून। करीब पांच ...

नाना पाटेकर के आखिरी पल का ‘रहस्य’

सीने में दर्द के बाद दोस्त को किया संदेश 45 मिनट तक चला उनको बचाने का प्रयास निधन के बाद दर्ज हुआ मेडिको-लीगल केस मुंबई/देहरादून। करीब पांच दशक के लंबे फिल्मी सफर में नाना पाटेकर ने अपनी अलग पहचान बनाई। परिंदा, क्रांतिवीर, तिरंगा, अब तक छप्पन, अपहरण और वेलकम जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है। दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन ने फिल्म जगत को स्तब्ध कर दिया है। अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उनके आखिरी कुछ घंटे अब कई सवाल छोड़ गए हैं। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, देर रात नाना पाटेकर ने अपने एक करीबी दोस्त को संदेश भेजकर तबीयत खराब होने की जानकारी दी थी। इसके बाद सुबह जब दोस्त उनके घर पहुंचा तो उनकी हालत गंभीर थी। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने करीब 45 मिनट तक उन्हें बचाने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। नाना पाटेकर को सुबह अस्पताल पहुंचाए जाने के बाद डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हालांकि, उनकी मौत की परिस्थितियों को लेकर फिलहाल आधिकारिक तौर पर अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। इसी वजह से अस्पताल की ओर से मेडिको-लीगल केस दर्ज किया गया और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। बताया जा रहा है कि नाना पाटेकर ने रात करीब ढाई बजे अपने दोस्त को संदेश भेजकर सीने में दर्द और बेचौनी की बात कही थी। दोस्त ने बाद में संदेश देखा और तड़के उनके घर पहुंचा। वहां नाना की हालत देखकर तत्काल चिकित्सकीय मदद बुलाई गई। घर पर ही उन्हें सीपीआर दिया गया और फिर अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल पहुंचने के बाद डाक्टरों की टीम ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की। करीब 45 मिनट तक उपचार और पुनर्जीवन के प्रयास किए गए, लेकिन उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पिता के निधन की खबर मिलने के बाद नाना पाटेकर के बेटे मल्हार गोवा के लिए रवाना हुए। शुरुआती जानकारी के अनुसार, मल्हार ने कहा कि उन्हें अभी यह स्पष्ट रूप से पता नहीं है कि पिता के साथ आखिरी समय में वास्तव में क्या हुआ। वह गोवा पहुंचने के बाद ही पूरी स्थिति जान पाएंगे। नाना पाटेकर की मौत के बाद मेडिको-लीगल केस दर्ज किए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। दरअसल, एमएलसी दर्ज होना अपने आप में किसी आपराधिक मामले या किसी पर आरोप का संकेत नहीं है। जब किसी व्यक्ति को अस्पताल में ऐसी परिस्थिति में लाया जाता है, जहां मौत का कारण या परिस्थितियां पूरी तरह स्पष्ट नहीं होतीं, तो चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रिया के तहत पुलिस को सूचना देकर एमएलसी दर्ज की जा सकती है। इसी प्रक्रिया के तहत पोस्टमार्टम कराया जा रहा है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिस की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मौत की परिस्थितियों और चिकित्सकीय कारण को लेकर तस्वीर और साफ हो सकेगी। नाना पाटेकर हाल तक सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रिय नजर आए थे। गोवा में भी उन्होंने कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। ऐसे में कुछ ही दिनों के भीतर उनके अचानक निधन की खबर से उनके प्रशंसकों और फिल्म जगत में शोक की लहर है।

नवरात्रि में करेगी भाजपा चुनावी ‘शंखनाद’

2027 के रण के लिए विधानसभा विस्तार योजना का आगाज बूथ से लेकर शक्ति केंद्र तक संगठन को धार देने की तैयारी देहरादून। शुभ नवरात्रि के पावन अवसर पर भाजपा उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को औपचारिक रूप से रफ्तार देने जा रही है। पार्टी अपनी महत्वपूर्ण पूर्णकालिक विधानसभा विस्तार योजना का शुभारंभ कर चुनावी अभियान की आधारभूमि तैयार करेगी। योजना के जरिए पार्टी का फोकस केवल चुनावी प्रचार तक सीमित रहने के बजाय विधानसभा स्तर पर संगठन की पकड़ मजबूत करने, बूथ नेटवर्क को सक्रिय करने और मतदाताओं के बीच लगातार संपर्क बढ़ाने पर रहेगा। भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी नेतृत्व की कोशिश है कि चुनावी वर्ष शुरू होने से पहले प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में संगठन की स्थिति, बूथवार नेटवर्क और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों का आकलन कर लिया जाए। पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की तैनाती इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है। विधानसभा विस्तार योजना के तहत पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को विधानसभा क्षेत्रों में जिम्मेदारी देकर संगठन के कार्यक्रमों को जमीन तक पहुंचाने पर जोर रहेगा। यह कार्यकर्ता पार्टी और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की कड़ी के रूप में काम करेंगे। साथ ही केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों, युवाओं, महिलाओं, पूर्व सैनिकों और विभिन्न सामाजिक समूहों तक संपर्क बढ़ाने की रणनीति पर भी काम किया जाएगा। भाजपा की चुनावी रणनीति में बूथ प्रबंधन को सबसे अहम कड़ी माना जा रहा है। पार्टी पहले ही बूथ जीतो, चुनाव जीतो की रणनीति के तहत संगठन को मजबूत करने पर जोर देती रही है। ऐसे में विधानसभा विस्तार योजना के जरिए बूथ समितियों की सक्रियता, पन्ना स्तर तक संपर्क और स्थानीय मुद्दों की पहचान को भी गति मिलने की उम्मीद है। 2027 के चुनाव में भाजपा नेतृत्व ने 60 पार का लक्ष्य सामने रखा है। 70 सदस्यीय विधानसभा में इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पार्टी को पिछली चुनावी सफलता को दोहराने के साथ-साथ उन सीटों पर भी सेंध लगानी होगी, जहां मुकाबला अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण माना जाता है। विधानसभा विस्तार योजना को इसी व्यापक लक्ष्य की जमीनी तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी का जोर उन क्षेत्रों में संगठनात्मक कमियों को दूर करने पर भी रहेगा, जहां पिछले चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हुआ था। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर नाराजगी, क्षेत्रीय मुद्दे और मतदाताओं की अपेक्षाओं का फीडबैक संगठन तक पहुंचाने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी। नवरात्रि के शुभ अवसर पर योजना की शुरुआत का राजनीतिक संदेश भी महत्वपूर्ण है। भाजपा चुनावी तैयारियों को शुभ मुहूर्त से जोड़ते हुए संगठन को धीरे-धीरे पूरी तरह चुनावी मोड में ले जाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। प्रदेश नेतृत्व से लेकर विधानसभा और बूथ स्तर तक जिम्मेदारियां तय कर कार्यकर्ताओं को लक्ष्य आधारित काम सौंपे जाने की तैयारी है। हालांकि चुनाव में अभी समय है, लेकिन भाजपा की रणनीति स्पष्ट है कि अंतिम समय में संगठन को सक्रिय करने के बजाय लंबे समय तक लगातार क्षेत्र में मौजूद रहकर चुनावी आधार तैयार किया जाए। इसके लिए संगठनात्मक विस्तार, जनसंपर्क और सरकार के कामकाज को मतदाताओं तक पहुंचाने की कवायद समानांतर चलने वाली है। भाजपा के सामने संगठन को मजबूत करने के साथ सरकार के खिलाफ संभावित नाराजगी को लेकर भी चुनौती रहेगी। बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाएं और स्थानीय स्तर की शिकायतें विपक्ष के प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। ऐसे में विधानसभा विस्तार योजना के जरिए पार्टी केवल अपने संगठन को मजबूत करेगी या जनता के बीच मौजूद असंतोष का फीडबैक लेकर सरकार तक भी पहुंचाएगी, यह चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा होगा। दूसरी ओर कांग्रेस समेत विपक्षी दल भाजपा के लगातार सत्ता में बने रहने को चुनौती देने की तैयारी में हैं। ऐसे में 2027 का चुनाव केवल सरकार के कामकाज का जनादेश नहीं होगा, बल्कि संगठनात्मक ताकत, स्थानीय समीकरण और मतदाताओं के बीच सीधी पहुंच की भी परीक्षा होगा। नवरात्रि में भाजपा का यह शंखनाद इसलिए महत्वपूर्ण है कि पार्टी 2027 के चुनाव को अब दूर की राजनीतिक संभावना के बजाय संगठनात्मक स्तर पर शुरू हो चुका अभियान मानकर आगे बढ़ रही है। विधानसभा विस्तार योजना इसकी पहली बड़ी कड़ी है।

‘फर्जी वोटरों’ के मोह में विरोध

मतदाता सूची साफ करने की संवैधानिक कवायद पर है ऐतराजकृ हार पची नहीं, तो निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया की साख पर लगा रहे दाग जनता का भरोसा खोकर अब पूरी व्यवस्था पर दाग लगाने का खेल देश की लोकतांत्रिक छवि को नुकसान पहुंचाने में जुटी है कांग्रेस पार्टी देहरादून। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर चुनावी प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल खड़े कर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास का माहौल बनाने का आरोप लगाया है। भाजपा का कहना है कि चुनावी राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर पाने के बाद कांग्रेस अब संवैधानिक संस्थाओं और निर्वाचन प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा करने की रणनीति अपना रही है। भाजपा प्रदेश नेतृत्व ने कांग्रेस के एसआईआर के विरोध को इसी राजनीतिक रणनीति से जोड़ते हुए कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसी संवैधानिक प्रक्रिया का विरोध केवल इसलिए नहीं किया जा सकता कि उससे राजनीतिक नुकसान की आशंका हो। पार्टी का तर्क है कि मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखना निष्पक्ष चुनाव की बुनियादी आवश्यकता है। भाजपा नेताओं के अनुसार कांग्रेस को यदि मतदाता सूची में किसी नाम को लेकर आपत्ति है तो उसके लिए निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया मौजूद है। आपत्तियों और दावों को उचित मंच पर उठाने के बजाय सार्वजनिक तौर पर निर्वाचन प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े करना लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकता है। उत्तराखंड में एसआईआर के बाद मतदाता सूची में हुए बदलावों को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है। कांग्रेस का आरोप है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर सवाल हैं। भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे चुनावी राजनीति से प्रेरित बता रही है। भाजपा का कहना है कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से छूटा है तो विशेष अभियान और निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसे जोड़ने का रास्ता खुला है। ऐसे में पूरी प्रक्रिया को ही संदिग्ध बताना उचित नहीं है। भाजपा ने कांग्रेस से सवाल किया है कि चुनावी प्रक्रिया में खामियां हैं तो वह उनके प्रमाण निर्वाचन आयोग के सामने क्यों नहीं रखती। पार्टी का कहना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए राजनीतिक दलों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने से पहले ठोस तथ्यों को सामने रखना जरूरी है। वहीं कांग्रेस की ओर से एसआईआर को लेकर उठाए जा रहे सवालों का आधार मतदाता अधिकार और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना बताया जा रहा है। कांग्रेस का कहना है कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से नहीं हटना चाहिए और पुनरीक्षण प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस राजनीतिक टकराव ने उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले चुनावी प्रक्रिया को भी राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। भाजपा जहां कांग्रेस के विरोध को चुनावी हार की आशंका और राजनीतिक निराशा से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस इसे मतदाता अधिकारों की रक्षा का सवाल बता रही है। चुनावी मैदान में यह मुद्दा आने वाले दिनों में दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नया मोर्चा बन सकता है।

‘गंगाजल’ की कसम, भाजपा की ‘घेराबंदी’

कांग्रेस का महासंग्राम, वोट बचाओ यात्रा से फूंका चुनावी बिगुल वोट बचाओ, देश बचाओ यात्रा से कांग्रेस ने तेज कर दिया संघर्ष कांग्रेस पाटी ने हरिद्वार से किया प्रदेशव्यापी अभियान का आगाज देहरादून। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर कांग्रेस का आंदोलन अब सड़क से लेकर गंगा तट तक पहुंच गया है। बुधवार को हरिद्वार से कांग्रेस ने वोट बचाओ, देश बचाओ यात्रा शुरू की। शिवमूर्ति चौक से सुभाष घाट तक निकली यात्रा में प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। यात्रा के दौरान कांग्रेस नेताओं ने गंगा तट पर गंगाजल हाथ में लेकर भाजपा सरकार को सत्ता से हटाने का संकल्प लिया। कांग्रेस नेताओं ने इसे लोकतंत्र और मताधिकार की रक्षा के संघर्ष से जोड़ा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि पार्टी मतदाता सूची और मतदान के अधिकार से जुड़े सवालों को लेकर अपना आंदोलन जारी रखेगी। कांग्रेस का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं और इससे पात्र मतदाताओं के मतदान अधिकार पर सवाल खड़े हुए हैं। पार्टी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और कार्रवाई की मांग भी उठाई है। कांग्रेस ने उत्तराखंड में लोकतंत्र बचाओ सप्ताह के तहत जिला और महानगर स्तर पर मार्च निकालने की घोषणा पहले ही की थी। इन कार्यक्रमों में संविधान के अनुच्छेद 326 का सार्वजनिक वाचन भी किया जा रहा है, जो वयस्क मताधिकार से संबंधित है। हरिद्वार में गंगा के बीच खड़े होकर नेताओं का संकल्प लेना महज विरोध कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों संदेशों से जोड़ा। पार्टी का कहना है कि मतदाता का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है। दूसरी तरफ भाजपा एसआईआर के विरोध को राजनीतिक मुद्दा बनाए जाने पर कांग्रेस पर सवाल उठा रही है और निर्वाचन प्रक्रिया का विरोध करने के बजाय निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आपत्तियां दर्ज कराने की बात कहती रही है। यात्रा के दौरान कांग्रेस नेताओं के बीच विवाद भी सामने आया। शिवमूर्ति चौक पर दो कांग्रेस नेताओं के समर्थकों के बीच कहासुनी के बाद हाथापाई हो गई। घटना के समय प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा और प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल समेत वरिष्ठ नेता मौजूद थे। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर विवाद शुरू करने के आरोप लगाए। ऐसे में कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती हैकृएक ओर एसआईआर और मतदाता सूची को लेकर अपने आंदोलन को प्रदेशव्यापी मुद्दा बनाना और दूसरी ओर संगठन के भीतर सामने आ रही खींचतान को नियंत्रित रखना। कांग्रेस ने साफ किया है कि हरिद्वार से शुरू हुई यात्रा को प्रदेश के दूसरे हिस्सों तक ले जाया जाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी ने 10 अक्टूबर से 26 नवंबर तक वोट बचाओ, देश बचाओ अभियान को व्यापक रूप देने की घोषणा की है। इसके तहत ब्लॉक, जिला और बूथ स्तर तक कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। उत्तराखंड में यह अभियान आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए संगठन को सक्रिय करने का भी माध्यम बन रहा है। मतदाता सूची, एसआईआर और निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सियासी टकराव अब प्रदेश की चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस इसे लोकतंत्र और मताधिकार का प्रश्न बता रही है, जबकि भाजपा प्रक्रिया को राजनीतिक रंग देने के आरोप लगा रही है।