सोमवार, 2 नवंबर 2026

udaydinmaan: सियासत में विवादों के घेरे में ‘नेता’

udaydinmaan: सियासत में विवादों के घेरे में ‘नेता’: अंकिता भंडारी प्रकरण से लेकर नेताओं की विवादित टिप्पणियों और निजी विवादों तक, दोनों दलों के सामने जवाबदेही की चुनौती भाजपा के लिए सत्ता की स...

udaydinmaan: सर्दी की दस्तक संग चढ़ा सियासी पारा

udaydinmaan: सर्दी की दस्तक संग चढ़ा सियासी पारा : 2027 की जंग के लिए भाजपा और कांग्रेस ने खोले दिए हैं अपने-अपने मोर्चे कांग्रेस की न्याय यात्रा और यूकेडी की प्रत्याशी सूची ने बढ़ाई राजनीतिक ...

udaydinmaan: यूकेडी की चुनावी बिसात पर ‘चाल’

udaydinmaan: यूकेडी की चुनावी बिसात पर ‘चाल’: 16 प्रत्याशी उतार भाजपा-कांग्रेस को दी चुनौती, अब अपनी जमीन बचाने की है यूकेडी की परीक्षा 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी के बीच समय से पहल...

यूकेडी की चुनावी बिसात पर ‘चाल’

16 प्रत्याशी उतार भाजपा-कांग्रेस को दी चुनौती, अब अपनी जमीन बचाने की है यूकेडी की परीक्षा 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी के बीच समय से पहले उम्मीदवारों का एलान बना चर्चा का विषय राज्य आंदोलन की विरासत भुनाने की कोशिश या अस्तित्व की लड़ाई में बढ़त लेने की रणनीति देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की घोषणा अभी दूर है, लेकिन उत्तराखंड क्रांति दल ने चुनावी बिसात पर अपनी चाल चल दी है। प्रदेश की 70 विधानसभा सीटों में से 16 पर प्रत्याशियों की घोषणा कर क्षेत्रीय दल ने भाजपा और कांग्रेस से पहले चुनावी मैदान में उतरने का संकेत दिया है। सवाल केवल यह नहीं है कि यूकेडी ने प्रत्याशी जल्दी घोषित क्यों किए, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि आखिर पार्टी को अभी से चुनावी सक्रियता दिखाने की जरूरत क्यों महसूस हुई? क्या यह भाजपा-कांग्रेस के चुनावी वर्चस्व को चुनौती देने की रणनीति है, या फिर राज्य आंदोलन से निकली पार्टी अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए समय से पहले मोर्चा खोल रही है? यूकेडी के इस कदम को सामान्य चुनावी घोषणा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राज्य गठन के आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाने वाले क्षेत्रीय दल के सामने आज सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना यही है कि जिस उत्तराखंड की अस्मिता और अधिकारों के सवालों ने उसे जन्म दिया, उसी प्रदेश की सत्ता की राजनीति में वह लंबे समय से हाशिये पर दिखाई देता रहा है। राज्य बना, सरकारें बदलीं, भाजपा और कांग्रेस ने बारी-बारी से सत्ता संभाली, लेकिन यूकेडी राज्य आंदोलन की विरासत को स्थायी जनसमर्थन में बदलने में सफल नहीं हो पाया। ऐसे में 16 प्रत्याशियों की घोषणा 2027 के चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश भी है और संगठन को जगाने की चुनौती भी। चुनाव से काफी पहले प्रत्याशियों का एलान करने का एक सीधा फायदा है। उम्मीदवारों को अपने क्षेत्र में जनता के बीच पहुंचने, स्थानीय समस्याओं को उठाने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और अपनी स्वीकार्यता मजबूत करने का समय मिलता है। भाजपा और कांग्रेस जैसे संसाधन-संपन्न दलों के मुकाबले यूकेडी के लिए यह रणनीति इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि उसे चुनावी मुकाबले में उतरने से पहले संगठनात्मक कमियों की भरपाई करनी होगी। लेकिन इस फैसले का दूसरा राजनीतिक पहलू भी है। चुनावी चर्चा में बने रहना अपने आप में क्षेत्रीय दल के लिए बड़ी चुनौती है। भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबले में छोटे दलों की आवाज अक्सर दब जाती है। ऐसे में पहले प्रत्याशी घोषित करके यूकेडी यह संदेश देना चाहता है कि वह केवल चुनाव के समय दिखाई देने वाला दल नहीं, बल्कि सत्ता की लड़ाई में अपनी दावेदारी पेश करने के लिए तैयार है। फिर भी, जल्द मैदान में उतरना और चुनावी बढ़त हासिल करना दो अलग बातें हैं। प्रत्याशी घोषित होने से राजनीतिक चर्चा जरूर बन सकती है, लेकिन चर्चा को वोट में बदलने के लिए संगठन, संसाधन, नेतृत्व और मतदाताओं के भरोसे की जरूरत होती है। यूकेडी के सामने यही असली कसौटी है। यूकेडी की राजनीति का सबसे मजबूत आधार उत्तराखंड राज्य आंदोलन की विरासत रही है। मूल निवास, भू-कानून, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार, पलायन और पहाड़ों की उपेक्षा जैसे सवाल आज भी प्रदेश की राजनीति के केंद्र में हैं। इन मुद्दों पर क्षेत्रीय दल के पास अपनी विशिष्ट पहचान बनाने का अवसर मौजूद है। लेकिन राजनीति में विरासत अपने आप में जनादेश नहीं बनती। आंदोलन के दौर में जनता को एकजुट करने वाले सवाल सत्ता की राजनीति में ठोस नीतियों, संगठन और नेतृत्व की मांग करते हैं। यूकेडी की कमजोरी यह रही है कि क्षेत्रीय मुद्दों पर राजनीतिक जगह होने के बावजूद वह उसे व्यापक चुनावी शक्ति में तब्दील नहीं कर पाया। यही वजह है कि 16 प्रत्याशियों की घोषणा के बाद पार्टी से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि उसके पास भाजपा और कांग्रेस से अलग क्या ठोस राजनीतिक कार्यक्रम है? वह रोजगार और पलायन की समस्या का समाधान कैसे करेगी? पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए उसकी योजना क्या है? स्थानीय युवाओं को संसाधनों और रोजगार में अवसर दिलाने के लिए वह कौन-से व्यावहारिक कदम उठाएगी? यदि जवाब केवल राज्य की अस्मिता और राष्ट्रीय दलों की विफलताओं तक सीमित रहे, तो चुनावी राजनीति में यूकेडी की पुरानी चुनौती बरकरार रहेगी। उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला लंबे समय से राजनीति की प्रमुख धुरी रहा है। इस व्यवस्था में किसी क्षेत्रीय दल के लिए तीसरे विकल्प के रूप में उभरना आसान नहीं है। मतदाता किसी दल के विचारों से सहमत होने के बावजूद कई बार जीतने की संभावना, सरकार गठन और चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर मतदान करता है। 2027 का चुनाव यूकेडी के लिए सिर्फ कुछ सीटें जीतने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान को फिर से स्थापित करने की परीक्षा भी है।

सर्दी की दस्तक संग चढ़ा सियासी पारा

2027 की जंग के लिए भाजपा और कांग्रेस ने खोले दिए हैं अपने-अपने मोर्चे कांग्रेस की न्याय यात्रा और यूकेडी की प्रत्याशी सूची ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल सत्ता की हैट्रिक बनाम सत्ता में वापसी की लड़ाई, तीसरे विकल्प की तलाश भी तेज देहरादून। पहाड़ों में सर्दी बढ़ने लगी है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में गर्मी लगातार बढ़ रही है। विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही प्रदेश की सियासत चुनावी मोड में आ चुकी है। भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ संगठन और सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाने में जुटी है, तो कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। उत्तराखंड क्रांति दल ने 70 विधानसभा सीटों में से 16 पर प्रत्याशी घोषित कर अपनी सक्रियता का संकेत दिया है। वहीं, दूसरे क्षेत्रीय और छोटे दल भी राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटे हैं। सियासी तस्वीर साफ हैकृचुनाव की तारीखों का इंतजार जरूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। अब सवाल केवल सरकार बनाने का नहीं, बल्कि चुनाव का एजेंडा तय करने का भी है। भाजपा चाहती है कि मुकाबला सरकार के कामकाज और नेतृत्व के इर्द-गिर्द रहे, जबकि कांग्रेस बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के आरोप, अंकिता भंडारी प्रकरण, जमीन से जुड़े विवादों और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण जैसे मुद्दों पर सरकार को जवाबदेह बनाने की कोशिश कर रही है। यूकेडी की कोशिश क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय अधिकारों के सवालों को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की है। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने 2027 में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की चुनौती है। उत्तराखंड की राजनीति में लगातार दो कार्यकाल के बाद फिर सत्ता हासिल करना पार्टी के लिए सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व की स्वीकार्यता का भी सवाल होगा। भाजपा ने चुनावी तैयारियों को केवल बैठकों तक सीमित रखने के बजाय बूथ स्तर तक पहुंचाने पर जोर दिया है। संगठनात्मक गतिविधियों, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और विधानसभा क्षेत्रों में संपर्क अभियान के जरिए पार्टी चुनाव से पहले अपना आधार मजबूत करना चाहती है। इसी क्रम में पार्टी ने नवंबर के दौरान सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने वाले ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान की घोषणा की है। इसके तहत पदयात्राओं, जनसंपर्क और विभिन्न संवाद कार्यक्रमों के जरिए जनता तक पहुंचने की योजना है। भाजपा की रणनीति के दो प्रमुख पहलू हैं। पहला, सरकार की उपलब्धियों, विकास परियोजनाओं और केंद्र तथा राज्य की योजनाओं को जनता के बीच ले जाना। दूसरा, कांग्रेस के शासनकाल और उसके वर्तमान राजनीतिक अभियानों को निशाने पर रखना। पार्टी की कोशिश है कि चुनावी विमर्श में विपक्ष के आरोपों के बजाय सरकार के कामकाज और राजनीतिक स्थिरता को प्रमुखता मिले। लेकिन भाजपा के सामने चुनौती भी कम नहीं है। बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर युवाओं की अपेक्षाएं, पलायन, पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति तथा भ्रष्टाचार से जुड़े आरोप ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब केवल राजनीतिक प्रचार से नहीं दिया जा सकता। सरकार को यह भरोसा भी दिलाना होगा कि विकास का लाभ दूरस्थ गांवों और आम नागरिकों तक पहुंच रहा है। भाजपा के लिए असली परीक्षा यही होगी कि उसका मजबूत संगठन सरकार के पक्ष में जनसमर्थन में कितना बदल पाता है। चुनावी अभियान की आक्रामकता महत्वपूर्ण है, लेकिन सत्ता में वापसी का फैसला मतदाता अपने अनुभवों और अपेक्षाओं के आधार पर करेगा। मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने भी चुनाव से पहले राजनीतिक संघर्ष तेज कर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा के नेतृत्व में पार्टी सरकार के खिलाफ जनसंपर्क और विरोध कार्यक्रमों को आगे बढ़ा रही है। कांग्रेस ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, अंकिता भंडारी प्रकरण और जमीन से जुड़े कथित विवादों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। पार्टी ने न्याय यात्रा और अन्य विरोध कार्यक्रमों के जरिए इन मुद्दों को जनता तक पहुंचाने की रणनीति बनाई है। कांग्रेस की राजनीतिक गणना स्पष्ट है। वह चाहती है कि चुनाव का केंद्र सरकार की उपलब्धियां नहीं, बल्कि सरकार से जुड़े विवाद और जनता की समस्याएं बनें। पार्टी का मानना है कि यदि बेरोजगारी, महंगाई, महिला सुरक्षा, जमीन और स्थानीय अधिकारों के सवालों पर असंतोष को एक साझा राजनीतिक मुद्दे में बदला जा सके, तो भाजपा के लिए सत्ता बचाना कठिन हो सकता है। उत्तराखंड में सर्दी की शुरुआत के साथ राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। भाजपा ने चुनावी अभियान का खाका सामने रख दिया है, कांग्रेस सरकार के खिलाफ मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरने की तैयारी में है और यूकेडी ने प्रत्याशियों की घोषणा करके अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। छोटे दल भी अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। लेकिन अभी की सक्रियता को चुनावी परिणाम का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। भाजपा के सामने सत्ता विरोधी असंतोष की आशंकाओं का जवाब देने की चुनौती है, कांग्रेस के सामने संगठनात्मक एकजुटता और विश्वसनीय विकल्प पेश करने की कसौटी है, जबकि यूकेडी और दूसरे क्षेत्रीय दलों के सामने अपनी सीमित राजनीतिक मौजूदगी को प्रभावी जनसमर्थन में बदलने का सवाल है। 2027 की जंग में जो दल जनता के वास्तविक सवालों को समझेगा, अपने दावों को तथ्यों और काम से साबित करेगा तथा संगठन को मतदाताओं के भरोसे से जोड़ पाएगा, वही बढ़त हासिल करेगा। फिलहाल उत्तराखंड में चुनावी शतरंज की बिसात सज चुकी है। मोहरे चलने लगे हैं, राजनीतिक हमले तेज हो रहे हैं और हर दल अपनी चाल को निर्णायक बताने में जुटा है। लेकिन अंतिम फैसला नारों, यात्राओं और घोषणाओं से नहीं, जनता के जनादेश से होगा।

सियासत में विवादों के घेरे में ‘नेता’

अंकिता भंडारी प्रकरण से लेकर नेताओं की विवादित टिप्पणियों और निजी विवादों तक, दोनों दलों के सामने जवाबदेही की चुनौती भाजपा के लिए सत्ता की साख बचाने का सवाल, कांग्रेस के लिए आरोपों को चुनावी विश्वसनीयता में बदलने की परीक्षा देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले ही अभी नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनावी परीक्षा शुरू हो चुकी है। इस परीक्षा में केवल सरकार की उपलब्धियां, विपक्ष के आरोप और संगठन की ताकत ही नहीं, बल्कि नेताओं का सार्वजनिक आचरण और विवादों से निपटने का तरीका भी महत्वपूर्ण होगा। भाजपा और कांग्रेस के कई नेता अलग-अलग विवादों के कारण राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। कहीं गंभीर आरोपों ने सरकार और संगठन को असहज किया है, तो कहीं नेताओं की टिप्पणियों ने राजनीतिक मर्यादा और जवाबदेही पर सवाल खड़े किए हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इन विवादों का महत्व इसलिए बढ़ गया है, क्योंकि उत्तराखंड में भाजपा सत्ता बचाने और कांग्रेस सत्ता में वापसी की तैयारी कर रही है। ऐसे में विवादित नेताओं का मुद्दा केवल व्यक्तिगत छवि तक सीमित नहीं रहेगा। यह पार्टी नेतृत्व की निर्णय क्षमता, संगठनात्मक अनुशासन और जनता के सामने जवाबदेही की भी परीक्षा बनेगा। भाजपा के लिए सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों में अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़े सवाल शामिल हैं। वर्ष 2022 में हुई इस हत्या के मामले में तीन आरोपियों को मई 2025 में अदालत ने दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बावजूद कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर उठते सवाल और हाल में सामने आए आरोप राजनीतिक विवाद का विषय बने हुए हैं। इस मामले में भाजपा के पूर्व प्रदेश प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम का नाम लगाए जाने के बाद विवाद ने नया राजनीतिक मोड़ लिया। गौतम ने आरोपों को खारिज किया है और मानहानि की कानूनी कार्रवाई भी की है। इसलिए आरोपों और प्रमाणित न्यायिक निष्कर्षों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। किसी व्यक्ति पर आरोप लगना अपने आप में उसके दोषी होने का प्रमाण नहीं है। अक्टूबर 2026 में गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने के बाद कांग्रेस ने इस फैसले पर सवाल उठाए। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल, हरक सिंह रावत और प्रीतम सिंह सहित कांग्रेस नेताओं ने देहरादून में विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन के संबंध में हरीश रावत समेत कांग्रेस के 30 नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की खबर सामने आई। भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती यह है कि वह इस विवाद का जवाब केवल कांग्रेस पर राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाकर देगी या अंकिता के परिवार की न्याय संबंधी चिंताओं का भी स्पष्ट समाधान प्रस्तुत करेगी। वहीं कांग्रेस के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि उसका अभियान आरोपों की पुनरावृत्ति तक सीमित न रहे, बल्कि जांच, साक्ष्य और जवाबदेही के सवालों पर केंद्रित रहे। अंकिता प्रकरण में राजनीतिक दलों की असली परीक्षा आरोप लगाने या उनका खंडन करने में नहीं, बल्कि न्याय और निष्पक्ष जांच के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करने में है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य महेंद्र भट्ट भी विवादों से अछूते नहीं रहे। जुलाई 2026 में प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं से जुड़े मुद्दे पर उनकी कथित अपमानजनक टिप्पणी को लेकर कांग्रेस तथा बेरोजगार युवाओं के संगठनों ने आलोचना की थी। विरोधियों ने इसे रोजगार और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर संघर्ष कर रहे युवाओं के प्रति असंवेदनशीलता का उदाहरण बताया। यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बेरोजगारी और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता उत्तराखंड की राजनीति के बड़े मुद्दे हैं। हजारों युवा सरकारी नौकरियों की तैयारी करते हैं और भर्ती व्यवस्था में निष्पक्षता की अपेक्षा रखते हैं। ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता की भाषा केवल व्यक्तिगत व्यवहार का विषय नहीं रहती है उसका राजनीतिक संदेश भी निकलता है। भाजपा के नेताओं से जुड़े विवादों पर कांग्रेस हमलावर है, लेकिन विपक्षी दल के लिए भी राजनीतिक मर्यादा और सार्वजनिक आचरण का प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण है। सितंबर 2026 में कांग्रेस नेता आकांक्षा नेगी की एक कथित टिप्पणी को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। इस मामले में पंजाबी समुदाय के प्रतिनिधियों ने आपत्ति जताई और पुलिस से जांच तथा कार्रवाई की मांग की। इस प्रकरण में भी आरोपों और उनके कानूनी निष्कर्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है। हालांकि राजनीतिक दृष्टि से यह घटना बताती है कि सार्वजनिक मंचों पर इस्तेमाल की गई भाषा किस तरह समुदायों की भावनाओं और दलों की छवि से जुड़ सकती है। कांग्रेस भाजपा के नेताओं के विवादों को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है, तो उसे अपने नेताओं के आचरण पर भी समान कसौटी अपनानी होगी। राजनीतिक जवाबदेही की मांग तभी विश्वसनीय बनती है, जब वह अपने और विरोधी दल के लिए अलग-अलग मानक न अपनाए। उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस के बीच चुनावी मुकाबला तेज होने के साथ नेताओं से जुड़े विवाद राजनीतिक हथियार बनते जा रहे हैं। भाजपा कांग्रेस के नेताओं और उसके पुराने शासनकाल से जुड़े सवाल उठाती है, जबकि कांग्रेस भाजपा सरकार और उसके नेताओं पर जवाबदेही से बचने का आरोप लगाती है। लेकिन विवादों से सुर्खियां हासिल करना और जनता का भरोसा जीतना अलग-अलग बातें हैं। किसी नेता का विवाद पार्टी को अस्थायी राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन उसका चुनावी प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि जनता उस मामले को कितना गंभीर मानती है, पार्टी नेतृत्व क्या कार्रवाई करता है और आरोपों के जवाब में तथ्य कितनी स्पष्टता से सामने रखे जाते हैं।

रविवार, 1 नवंबर 2026

udaydinmaan: ...और खुलने लगी सियासी दुकानें

udaydinmaan: ...और खुलने लगी सियासी दुकानें: पांच साल तक जनता के बीच नजर नहीं आए दल अब मैदान में सक्रिय राजनीतिक विकल्पों की दस्तक के बीच भाजपा-कांग्रेस की बढ़ी चुनौतियां पांच साल तक राज...

udaydinmaan: अब ‘शब्दबाणों’ की जंग

udaydinmaan: अब ‘शब्दबाणों’ की जंग: आरोप-प्रत्यारोप से गरमाई सियासत,एक-दूसरे को घेरने में जुटे दल एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने की फिराक में भाजपा-कांग्रेस वार-पलटवार के दौर क...

अब ‘शब्दबाणों’ की जंग

आरोप-प्रत्यारोप से गरमाई सियासत,एक-दूसरे को घेरने में जुटे दल एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने की फिराक में भाजपा-कांग्रेस वार-पलटवार के दौर के साथ बढ़त बनाने की सियासी रस्साकस्सी देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज होने लगा है। अभी चुनावी रण पूरी तरह सजा भी नहीं है, लेकिन दोनों प्रमुख दलों ने शब्दों के तीर चलाने शुरू कर दिए हैं। कभी भ्रष्टाचार के आरोप, कभी पुराने घोटालों की फाइलें और कभी नेताओं के बयानों पर पलटवारकृप्रदेश की राजनीति में अब विकास के दावों के साथ आरोपों की जंग भी तेज होती दिख रही है। दोनों दलों की कोशिश साफ है कि चुनावी मुकाबले में बढ़त बनाने के लिए प्रतिद्वंद्वी को कठघरे में खड़ा किया जाए। गैरसैंण के भराड़ीसैंण में विधानसभा सत्र के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा नेताओं के कांग्रेस पर हमलों ने इस सियासी टकराव को और धार दी। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल से जुड़े कथित घोटालों और विवादों को उठाकर भाजपा ने विपक्ष को घेरने की कोशिश की। दूसरी ओर कांग्रेस सरकार के दावों, प्रदेश की मौजूदा समस्याओं और भाजपा के शासनकाल के कामकाज को लेकर सवाल उठा रही है। ऐसे में प्रदेश की राजनीति में आरोपों और जवाबी आरोपों का सिलसिला तेज होने के संकेत हैं। भाजपा की रणनीति में कांग्रेस के पुराने शासनकाल को चुनावी बहस के केंद्र में रखना अहम दिखाई दे रहा है। पार्टी के नेता भ्रष्टाचार और कथित अनियमितताओं का हवाला देकर कांग्रेस की राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं। मुख्यमंत्री धामी के बयानों में भी कांग्रेस के पुराने कार्यकाल को निशाने पर लेने की कोशिश दिखाई दी है। भाजपा का संदेश है कि कांग्रेस को अपने शासनकाल के सवालों का जवाब देना चाहिए, जबकि मौजूदा सरकार अपने कामकाज और फैसलों के आधार पर जनता के बीच जाएगी। भाजपा के लिए यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2027 का चुनाव उसके सामने लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की चुनौती लेकर आएगा। ऐसे में पार्टी कांग्रेस को केवल वर्तमान मुद्दों पर नहीं, बल्कि उसके पुराने कार्यकाल के आधार पर भी घेरना चाहती है। भ्रष्टाचार के आरोपों को चुनावी विमर्श में बनाए रखना भाजपा के लिए विपक्ष की राजनीतिक जमीन सीमित करने का माध्यम बन सकता है। हालांकि, आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी से आगे ले जाने के लिए तथ्यों, जांच और कानूनी निष्कर्षों का महत्व बना रहेगा। किसी भी आरोप को प्रमाणित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। चुनावी बहस में जनता की दिलचस्पी केवल आरोप लगाने में नहीं, बल्कि यह जानने में भी होगी कि संबंधित मामलों में कार्रवाई कहां तक पहुंची और जवाबदेही किसकी तय हुई। कांग्रेस के सामने भाजपा के आक्रामक तेवरों का जवाब देने के साथ अपनी चुनावी जमीन मजबूत करने की दोहरी चुनौती है। पार्टी को यह बताना होगा कि वह भाजपा के आरोपों का तथ्यात्मक जवाब कैसे देगी और राज्य के मौजूदा सवालों पर उसका वैकल्पिक दृष्टिकोण क्या है। बेरोजगारी, पलायन, भर्ती प्रक्रियाओं पर उठते सवाल, महंगाई, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति और भ्रष्टाचार के आरोप ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर विपक्ष सरकार को घेर सकता है। लेकिन कांग्रेस के लिए केवल भाजपा के आरोपों को राजनीतिक दुर्भावना बताना पर्याप्त नहीं होगा। उसे अपने पुराने शासनकाल से जुड़े सवालों पर भी स्पष्टता दिखानी होगी। साथ ही, जनता के सामने यह भरोसा पैदा करना होगा कि सत्ता में आने का अवसर मिलने पर वह शासन और जवाबदेही के मामले में अलग दृष्टिकोण अपनाएगी। कांग्रेस के लिए एक और चुनौती संगठनात्मक एकजुटता है। चुनावी मुकाबले में भाजपा की मजबूत संगठनात्मक तैयारी का सामना करने के लिए पार्टी को स्थानीय मुद्दों, जनसंपर्क और साझा रणनीति पर ध्यान देना होगा। बयानबाजी से राजनीतिक माहौल तो बनाया जा सकता है, लेकिन उसे मतदाताओं के समर्थन में बदलने के लिए जमीनी सक्रियता जरूरी होगी। भाजपा और कांग्रेस के बीच तेज होती बयानबाजी का एक पक्ष यह भी है कि इससे चुनाव से पहले राजनीतिक सक्रियता बढ़ती है। दोनों दल अपने समर्थकों को संदेश देते हैं, अपने मुद्दों को चर्चा में लाते हैं और प्रतिद्वंद्वी की कमजोरियों को उजागर करने की कोशिश करते हैं। लेकिन इस पूरी कवायद में मूल सवाल पीछे छूटने का खतरा भी हैकृउत्तराखंड की जनता के सामने मौजूद चुनौतियों का समाधान क्या है? राज्य गठन के बाद से रोजगार, पलायन, पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की उपलब्धता, किसानों की समस्याएं, आपदा प्रबंधन और स्थानीय संसाधनों पर आधारित अर्थव्यवस्था जैसे प्रश्न लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। मतदाता यह जानना चाहेंगे कि भाजपा इन मुद्दों पर अपने शासनकाल का क्या हिसाब देती है और कांग्रेस इनके समाधान के लिए कौन-सा ठोस विकल्प प्रस्तुत करती है। चुनावी राजनीति में शब्दों की धार का अपना महत्व है, लेकिन केवल तीखे बयानों से जनता का विश्वास हासिल नहीं किया जा सकता। भाजपा को अपने विकास संबंधी दावों के साथ जमीनी परिणामों का हिसाब देना होगा, जबकि कांग्रेस को सरकार की आलोचना के साथ व्यावहारिक विकल्प भी सामने रखने होंगे। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन बयानबाजी बता रही है कि दोनों दल चुनावी विमर्श पर पकड़ बनाने की कोशिश में जुट गए हैं। भाजपा कांग्रेस के अतीत को मुद्दा बनाना चाहती है, जबकि कांग्रेस के सामने वर्तमान सरकार के कामकाज को बहस के केंद्र में लाने की चुनौती है। आने वाले दिनों में नेताओं के बयान, संगठनात्मक गतिविधियां और जनसभाएं इस टकराव को और तेज कर सकती हैं। लेकिन चुनावी लड़ाई का अंतिम फैसला इस आधार पर नहीं होगा कि किसने किस पर ज्यादा तीखा हमला किया। निर्णायक सवाल यह होगा कि किस दल के पास जनता की समस्याओं का विश्वसनीय समाधान, अपने दावों के समर्थन में तथ्य और उन्हें जमीन पर उतारने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है। फिलहाल उत्तराखंड की सियासत में शब्दबाण चलने लगे हैं। अब देखना यह है कि यह जंग आरोपों के शोर तक सीमित रहती है या जनता के असल मुद्दों पर ठोस राजनीतिक बहस का रास्ता भी खोलती है।

...और खुलने लगी सियासी दुकानें

पांच साल तक जनता के बीच नजर नहीं आए दल अब मैदान में सक्रिय राजनीतिक विकल्पों की दस्तक के बीच भाजपा-कांग्रेस की बढ़ी चुनौतियां पांच साल तक राजनीतिक नेपथ्य में रहने वाले दल भी अब हो गए हैं सक्रिय देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू होने से पहले ही प्रदेश का सियासी पारा चढ़ने लगा है। पांच साल तक राजनीतिक नेपथ्य में रहने वाले दल अब अचानक सक्रिय दिखाई देने लगे हैं। कहीं नई पार्टी के गठन की घोषणा हो रही है, कहीं पुराने क्षेत्रीय दल फिर से अपनी ताकत जुटाने में लगे हैं, तो कहीं नए राजनीतिक विकल्प के नाम पर जनता के बीच पहुंचने की तैयारी है। चुनावी मौसम नजदीक आते ही राजनीतिक गतिविधियों में आई इस तेजी ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने वाले ये दल वास्तव में जनता के मुद्दों की लड़ाई लड़ना चाहते हैं या चुनाव के आसपास अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की कवायद कर रहे हैं। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राज्य गठन के बाद से अब तक इन दोनों दलों ने बारी-बारी से सरकार बनाई है। इस दौरान उत्तराखंड क्रांति दल सहित कई क्षेत्रीय और छोटे राजनीतिक दलों ने तीसरे विकल्प के रूप में जगह बनाने की कोशिश की, लेकिन वे सत्ता की निर्णायक दौड़ में अपनी मजबूत उपस्थिति कायम नहीं कर सके। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर राजनीतिक मैदान में नए खिलाड़ियों की आमद शुरू हो गई है। चुनावी राजनीति का एक स्थापित दृश्य हैकृचुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ जाती है। प्रेसवार्ताएं होने लगती हैं, सरकार के खिलाफ बयान जारी होते हैं, नए राजनीतिक समीकरणों की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं और जनता के बीच जाने के संकल्प लिए जाने लगते हैं। उत्तराखंड में भी यही तस्वीर उभरती दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि जो दल पिछले वर्षों में बेरोजगारी, पलायन, भर्ती विवाद, पहाड़ों में स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाली, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा स्थानीय संसाधनों से जुड़े सवालों पर लगातार सक्रिय नहीं दिखे, वह अब चुनावी मैदान में उतरकर जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या उनके पास इन समस्याओं के समाधान का कोई ठोस खाका है, या फिर उनका मकसद केवल चुनावी मुकाबले में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना है? हालांकि, हर नए दल या राजनीतिक पहल को केवल चुनावी अवसरवाद मान लेना भी उचित नहीं होगा। लोकतंत्र में नए विकल्पों का उभरना स्वाभाविक है। लेकिन किसी राजनीतिक दल की विश्वसनीयता उसकी घोषणाओं से नहीं, बल्कि उसके संघर्ष, संगठन, निरंतर जनसंपर्क और जनता के मुद्दों पर किए गए काम से तय होती है। प्रदेश में नए राजनीतिक विकल्पों की चर्चा के पीछे जनता की अपेक्षाओं और असंतोष की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रोजगार की तलाश में पलायन करते युवा, गांवों में घटती आबादी, पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की चुनौतियां और राजनीतिक दलों से बढ़ती जवाबदेही की मांग नए विकल्पों के लिए जमीन तैयार कर सकती हैं। लेकिन उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की राह आसान नहीं रही है। राज्य आंदोलन के दौरान क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय हितों की राजनीति ने उत्तराखंड क्रांति दल को महत्वपूर्ण पहचान दी थी। इसके बावजूद क्षेत्रीय राजनीति उस जनसमर्थन को स्थायी चुनावी ताकत में नहीं बदल सकी, जिसकी उम्मीद राज्य आंदोलन के दौर में दिखाई देती थी। संगठनात्मक कमजोरियां, राजनीतिक बिखराव और व्यापक जनाधार बनाने में कठिनाइयां इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण रहे हैं। अब नए राजनीतिक दलों और पुराने क्षेत्रीय संगठनों के सामने वही पुरानी चुनौती हैकृक्या वे केवल भाजपा और कांग्रेस के विरोध के आधार पर राजनीति करेंगे, या जनता के सामने शासन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन और विकास को लेकर कोई स्पष्ट वैकल्पिक माडल भी रखेंगे? चुनाव से पहले छोटे दलों और नए राजनीतिक संगठनों की सक्रियता भाजपा और कांग्रेस के लिए चुनौती भी बन सकती है और अवसर भी। इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि यह दल किन क्षेत्रों में मजबूत होते हैं, किन सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाते हैं और कितने प्रभावी ढंग से मतदाताओं का विश्वास हासिल कर पाते हैं। यदि नए दल कुछ विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावी जनाधार तैयार करते हैं, तो वह सीधे मुकाबले को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, केवल राजनीतिक गतिविधियों या घोषणाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि वह भाजपा या कांग्रेस के लिए निर्णायक चुनौती बन जाएंगे। चुनावी सफलता के लिए मजबूत संगठन, स्थानीय नेतृत्व, संसाधन, उम्मीदवारों की विश्वसनीयता और बूथ स्तर तक पहुंच जरूरी होती है। भाजपा के पास संगठनात्मक ढांचा और सत्ता में रहने का अनुभव है, जबकि कांग्रेस सरकार के खिलाफ असंतोष को चुनावी समर्थन में बदलने की कोशिश करेगी। ऐसे में नए दलों के सामने दोनों राष्ट्रीय दलों से अलग अपनी पहचान स्थापित करने की कठिन परीक्षा होगी। चुनाव नजदीक आने के साथ राजनीतिक सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन जनता को यह देखने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों की प्राथमिकता क्या है। क्या वे बेरोजगार युवाओं के सवालों पर लगातार संघर्ष करेंगे? क्या वे पलायन से खाली होते गांवों के लिए ठोस नीति पेश करेंगे? क्या पहाड़ों में स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाओं को मजबूत करने की योजना देंगे? क्या वे राज्य के संसाधनों और स्थानीय लोगों के अधिकारों पर स्पष्ट रुख अपनाएंगे? इन सवालों का जवाब केवल चुनावी घोषणापत्र में नहीं, बल्कि दलों के पिछले व्यवहार और वर्तमान गतिविधियों में भी तलाशना होगा। पांच साल तक निष्क्रिय रहने वाला कोई दल यदि चुनाव के कुछ महीने पहले जनता का हितैषी बनने का दावा करता है, तो उसके दावों की कसौटी उसका पुराना रिकार्ड भी होना चाहिए। उत्तराखंड की जनता ने राज्य निर्माण के लिए लंबा संघर्ष किया था। उस आंदोलन के पीछे केवल अलग राज्य का सपना नहीं, बल्कि बेहतर शासन, रोजगार, स्थानीय भागीदारी और पहाड़ों के संतुलित विकास की उम्मीद भी थी। इसलिए प्रदेश की राजनीति में नए दलों का उभरना तभी सार्थक होगा, जब वह इन अधूरे सवालों को अपनी राजनीति के केंद्र में रखेंगे। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड का राजनीतिक मैदान धीरे-धीरे सज रहा है। नए दल अपनी जगह तलाश रहे हैं, क्षेत्रीय संगठन फिर से ताकत जुटाने में लगे हैं और भाजपा-कांग्रेस के बीच भी राजनीतिक मुकाबला तेज होने की जमीन तैयार हो रही है। लेकिन चुनावी राजनीति में सक्रियता और जनाधार के बीच बड़ा अंतर होता है। प्रेसवार्ताओं, घोषणाओं और नारों से राजनीतिक चर्चा तो पैदा की जा सकती है, मगर जनता का विश्वास लंबे संघर्ष और ठोस काम से ही हासिल होता है। उत्तराखंड में अब सवाल केवल यह नहीं है कि चुनाव लड़ने के लिए कितनी पार्टियां मैदान में उतरेंगी। असली सवाल यह है कि इनमें से कितनी पार्टियां अगले पांच साल तक जनता के बीच रहेंगी, जो दल चुनाव के बाद भी बेरोजगारों, किसानों, महिलाओं, युवाओं और पहाड़ के गांवों के सवालों पर संघर्ष करेंगे, वही अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता स्थापित कर पाएंगे। बाकी दलों की सक्रियता चुनावी मौसम की हलचल बनकर रह जाने का खतरा उठाएगी।

‘लोकतंत्र’ की लड़ाई में ‘नैरेटिव’

वोट चोरी की काट में भाजपा का पलटवार विपक्ष के नैरेटिव पर कब्जे की जंग हुई शुरू भाजपा ने की जवाबी घेरेबंदी की पूरी तैयारी राजनीतिक चुनौती संग जनमत की है लड़ाई देहरादून/नई दिल्ली। सियासत में लड़ाई केवल आरोप लगाने की नहीं, बल्कि जनता के बीच उन आरोपों का अर्थ तय करने की भी होती है। विपक्षी गठबंधन इंडिया के महाभियोग संबंधी कदमों के विरोध में भाजपा की प्रस्तावित आक्रामक रणनीति इसी राजनीतिक गणित की ओर इशारा करती है। वोट चोरी के आरोपों से विपक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करना चाहता है, जबकि भाजपा लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओके नारे के साथ पलटवार की जमीन तैयार कर रही है। दिल्ली में माक पार्लियामेंट और देशभर में पदयात्राओं तथा रैलियों की प्रस्तावित योजना को इसी व्यापक राजनीतिक लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा समझती है कि यदि विपक्ष चुनावी प्रक्रिया पर उठाए सवालों को लगातार जनचर्चा के केंद्र में बनाए रखता है, तो बहस का दबाव सत्तापक्ष पर बढ़ सकता है। इसलिए जवाबी रणनीति का मकसद केवल आरोपों का खंडन करना नहीं, बल्कि विपक्ष की राजनीतिक मंशा पर सवाल उठाकर बहस की दिशा बदलना भी है। दूसरी तरफ विपक्ष की कोशिश है कि चुनावी पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही का सवाल राजनीतिक विमर्श से बाहर न जाने पाए।यानी लड़ाई अब केवल वोट चोरी के आरोप और उसके जवाब की नहीं, बल्कि इस बात की है कि जनता लोकतंत्र के सामने असली चुनौती किसे मानती है। भाजपा का लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ नारा विपक्ष के आंदोलन को राजनीतिक रूप से घेरने की कोशिश है। इसके जरिए पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि लोकतंत्र के नाम पर चलाए जा रहे आंदोलनों के उद्देश्यों और तरीकों पर भी सवाल उठने चाहिए। प्रस्तावित जनसभाएं, पदयात्राएं और माक पार्लियामेंट इस संदेश को संगठन से लेकर आम जनता तक पहुंचाने का माध्यम बन सकते हैं। लेकिन भाजपा के सामने एक राजनीतिक जोखिम भी है। यदि विपक्ष के आरोपों का जवाब तथ्यों के बजाय केवल नारों से दिया गया, तो बहस खत्म होने के बजाय और तीखी हो सकती है। चुनावी प्रक्रिया पर उठे सवालों का प्रभावी उत्तर तभी संभव है, जब संबंधित तथ्यों, नियमों और प्रक्रियाओं को स्पष्ट किया जाए। राजनीतिक आक्रामकता समर्थकों को उत्साहित कर सकती है, लेकिन व्यापक जनविश्वास अर्जित करने के लिए प्रमाण और पारदर्शिता जरूरी हैं। विपक्ष के लिए भी चुनौती कम नहीं है। चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप गंभीर होते हैं। उन्हें राजनीतिक मंचों पर दोहराना आसान है, लेकिन विश्वसनीय साक्ष्यों के साथ स्थापित करना कठिन। यदि विपक्ष अपने आरोपों को ठोस तथ्यों से नहीं जोड़ पाया, तो भाजपा उसे राजनीतिक लाभ के लिए संस्थाओं पर सवाल उठाने वाला पक्ष बताने की कोशिश करेगी। देशव्यापी अभियान की तैयारी भाजपा के लिए संगठनात्मक शक्ति दिखाने का अवसर भी है। पदयात्राओं और रैलियों के जरिए पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर सकती है, स्थानीय स्तर पर विपक्ष के आरोपों का जवाब पहुंचा सकती है और अपने समर्थकों के बीच एक साझा राजनीतिक संदेश तैयार कर सकती है। यहां भाजपा की रणनीति का एक अहम पहलू दिखाई देता हैकृविपक्ष को अकेले राजनीतिक मैदान तय नहीं करने देना। यदि विपक्ष वोट चोरी के मुद्दे पर आंदोलन खड़ा करता है, तो भाजपा समानांतर अभियान के जरिए मुकाबले को दोतरफा बनाना चाहती है। इससे मीडिया और सार्वजनिक बहस में विपक्ष के आरोपों के साथ भाजपा का जवाब भी प्रमुखता पा सकता है। हालांकि, सड़क पर भीड़ जुटाना और जनमत जीतना अलग-अलग बातें हैं। किसी अभियान की सफलता केवल रैलियों के आकार या नारों की तीव्रता से तय नहीं होती। जनता यह भी देखती है कि राजनीतिक दल उसके सवालों का जवाब दे रहे हैं या केवल प्रतिद्वंद्वी को घेरने में लगे हैं। भाजपा की इस रणनीति का तात्कालिक लक्ष्य विपक्ष के नैरेटिव की काट तैयार करना और राजनीतिक बहस में अपनी पकड़ मजबूत करना है। लेकिन इसका दीर्घकालिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अभियान जनता के बीच कितना विश्वसनीय साबित होता है। यदि पार्टी केवल विपक्ष की मंशा पर सवाल उठाती है, तो राजनीतिक ध्रुरुवीकरण बढ़ सकता है। यदि वह तथ्यों के आधार पर सवालों का जवाब देती है, तो संस्थागत भरोसे की बहस को मजबूती मिल सकती है। विपक्ष के लिए भी यही कसौटी लागू होती है। केवल आरोपों की तीव्रता बढ़ाकर लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति भरोसा मजबूत नहीं किया जा सकता। उसे स्पष्ट प्रमाण, जिम्मेदार राजनीतिक भाषा और संवैधानिक प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्धता दिखानी होगी। फिलहाल भाजपा ने संदेश दिया है कि वह वोट चोरी के आरोपों को विपक्ष का एकतरफा राजनीतिक हथियार नहीं बनने देगी। लेकिन इस लड़ाई का सबसे अहम सवाल यही हैकृक्या जवाबी अभियान आरोपों का शोर बढ़ाएगा या उन सवालों के तथ्यात्मक उत्तर सामने लाएगा, जिनसे लोकतंत्र में जनता का भरोसा जुड़ा है? क्योंकि अंततः लोकतंत्र की लड़ाई में नैरेटिव कुछ समय के लिए राजनीतिक बढ़त दिला सकता है, लेकिन स्थायी विश्वसनीयता का आधार तथ्यों, पारदर्शिता और जवाबदेही से ही तैयार होता है।

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: ‘हीरा’ नये विकल्प का संकल्प

udaydinmaan: ‘हीरा’ नये विकल्प का संकल्प: उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की नई पटकथा भाजपा-कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती का दावा अब उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने बनाई नई पार्टी पुरानी र...

udaydinmaan: उत्तराखंड में नई सियासी ‘दस्तक’

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धामी के वार से ‘तिलमिलाई’ कांग्रेस

हरक सिंह के बचाव में उतरे गोदियाल, अंकिता प्रकरण पर मुख्यमंत्री को घेरा पुराने जैनी प्रकरण से अंकिता हत्याकांड तक पहुंची उत्तराखंड में सियासी जंग चुनावी साल में पुराने मामलों के बहाने आमने-सामने आए भाजपा और कांग्रेस देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सियासत का तापमान बढ़ने लगा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कांग्रेस नेता डा. हरक सिंह रावत को निशाने पर लेकर जिस राजनीतिक बहस को हवा दी, उसने भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप की लड़ाई को नया मोड़ दे दिया है। धामी के हमले के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने मोर्चा संभालते हुए मुख्यमंत्री पर अंकिता भंडारी हत्याकांड के संवेदनशील मुद्दे पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। अब सवाल केवल हरक सिंह रावत की राजनीतिक भूमिका का नहीं, बल्कि अंकिता को न्याय दिलाने के मुद्दे पर दोनों दलों की जवाबदेही का भी बन गया है। मुख्यमंत्री के बयान को कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेता की राजनीतिक छवि पर हमला माना है। जवाब में गोदियाल ने जैनी प्रकरण और अंकिता हत्याकांड की तुलना पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जैनी प्रकरण में आरोप लगने के बाद हरक सिंह रावत ने तत्काल इस्तीफे की घोषणा कर सीबीआई जांच की मांग की थी। इसके उलट, गोदियाल ने अंकिता प्रकरण में कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों पर मुख्यमंत्री से जवाब मांगा। गोदियाल ने मुख्यमंत्री पर सबूत नष्ट करने और कथित वीआईपी को बचाने जैसे गंभीर आरोप लगाए। हालांकि, यह कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के राजनीतिक आरोप हैं। इनकी सत्यता को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की मातृशक्ति और जनता को गुमराह करने के बजाय सरकार को अंकिता को न्याय दिलाने के सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए। इस राजनीतिक टकराव का केंद्र दो अलग-अलग प्रकरणों को लेकर खड़ा किया गया सवाल है। धामी ने हरक सिंह रावत को निशाने पर लेकर कांग्रेस को घेरने की कोशिश की, जबकि कांग्रेस ने पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री से अंकिता प्रकरण में जवाबदेही तय करने की मांग की। कांग्रेस का तर्क है कि दोनों मामलों की परिस्थितियों को एक जैसा बताकर राजनीतिक बहस को मूल मुद्दे से नहीं भटकाया जाना चाहिए। पार्टी ने हरक सिंह के इस्तीफे की घोषणा और सीबीआई जांच की मांग का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री से पूछा है कि अंकिता प्रकरण में उठ रहे सवालों पर सरकार का रुख क्या है। भाजपा की ओर से हरक सिंह को निशाने पर लेने की राजनीतिक वजह भी स्पष्ट है। चुनावी वर्ष में कांग्रेस के प्रमुख चेहरों की राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करना सत्तारूढ़ दल की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। वहीं, कांग्रेस अंकिता प्रकरण को सरकार की जवाबदेही का मुद्दा बनाकर भाजपा को रक्षात्मक स्थिति में लाने की कोशिश कर रही है। हरक सिंह रावत उत्तराखंड की राजनीति के अनुभवी और चर्चित चेहरों में शामिल हैं। उनका राजनीतिक सफर और अलग-अलग दलों के साथ उनका जुड़ाव उन्हें चुनावी बहस में महत्वपूर्ण बनाता है। ऐसे में उन पर मुख्यमंत्री का हमला केवल एक नेता पर व्यक्तिगत टिप्पणी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कांग्रेस के राजनीतिक बचाव और भाजपा के चुनावी विमर्श से भी जुड़ जाता है। गोदियाल का बयान इसी राजनीतिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने हरक सिंह के बचाव के साथ-साथ बहस को अंकिता भंडारी हत्याकांड की ओर मोड़ दिया। इससे कांग्रेस को भाजपा के हमले का जवाब देने और सरकार को एक संवेदनशील जनमुद्दे पर घेरने का अवसर मिला है। हालांकि, कांग्रेस के लिए भी चुनौती कम नहीं है। उसे केवल मुख्यमंत्री के बयान का विरोध करने के बजाय अंकिता प्रकरण पर अपनी मांगों और तथ्यों को स्पष्ट रूप से सामने रखना होगा। इसी तरह भाजपा को भी आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर उठाए जा रहे सवालों पर तथ्यात्मक जवाब देना होगा। अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड में न्याय, महिलाओं की सुरक्षा और राजनीतिक जवाबदेही से जुड़ा संवेदनशील विषय है। इस मामले में जनता की अपेक्षा है कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया तथ्यों तथा कानून के आधार पर आगे बढ़े। कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब भी संबंधित जांच और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर दिया जाना चाहिए। राजनीतिक दलों के लिए खतरा यह है कि अंकिता को न्याय दिलाने का सवाल चुनावी आरोप-प्रत्यारोप का हथियार बनकर रह जाए। यदि भाजपा कांग्रेस के पुराने प्रकरणों को सामने रखती है, तो कांग्रेस सरकार से वर्तमान सवालों पर जवाब मांगती है। लेकिन जनता के लिए निर्णायक प्रश्न यह है कि आरोपों के बीच वास्तविक तथ्य क्या हैं और न्याय की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ रही है। चुनावी वर्ष में ऐसे मुद्दे राजनीतिक रूप से अधिक तीखे होते हैं, क्योंकि हर बयान का असर नेताओं की छवि और दलों की रणनीति पर पड़ता है। भाजपा हरक सिंह रावत को घेरकर कांग्रेस को असहज करना चाहती है, जबकि कांग्रेस अंकिता प्रकरण के जरिए मुख्यमंत्री और सरकार की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर रही है। फिलहाल, धामी के हमले ने हरक सिंह रावत को लेकर सियासी बहस छेड़ी है, लेकिन गोदियाल के पलटवार ने लड़ाई को अंकिता भंडारी प्रकरण तक पहुंचा दिया है। अब इस राजनीतिक टकराव की असली कसौटी बयानबाजी की तीव्रता नहीं, बल्कि यह होगी कि कौन-सा दल तथ्यों के साथ अपने सवालों का जवाब देता है। चुनावी राजनीति अपनी जगह है, लेकिन अंकिता को न्याय दिलाने का सवाल किसी भी दल की राजनीतिक सुविधा से बड़ा है।

उत्तराखंड में नई सियासी ‘दस्तक’

बड़ा दावा,बड़ी चुनौती राजनीति में एक नई पार्टी की ‘एंट्री’ से सियासी हलचल बढ़ाने के संकेत उत्तराखंड राज्य में सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ेगी सर्वजन सनातन पार्टी भाजपा-कांग्रेस के मुकाबले तीसरा राजनीतिक विकल्प बनने की तैयारी असली चुनौती जनाधार, संगठन व वोटों में तब्दील होने वाले समर्थन की देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच प्रदेश की राजनीति में एक नई पार्टी की एंट्री ने सियासी हलचल बढ़ाने के संकेत दिए हैं। सर्वजन सनातन पार्टी ने राज्य की सभी 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। पार्टी का यह निर्णय ऐसे समय सामने आया है, जब भाजपा और कांग्रेस दोनों ही 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी रणनीति मजबूत करने में जुटी हैं। ऐसे में नई पार्टी की घोषणा ने प्रदेश में तीसरे राजनीतिक विकल्प की संभावनाओं पर चर्चा शुरू कर दी है। हालांकि, सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान करना और उन सीटों पर प्रभावी चुनौती पेश करना दो अलग-अलग बातें हैं। उत्तराखंड की राजनीति में इससे पहले भी कई दलों और क्षेत्रीय संगठनों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता का मुख्य मुकाबला बना रहा है। ऐसे में सर्वजन सनातन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक घोषणा को मजबूत संगठन, विश्वसनीय नेतृत्व और मतदाताओं के समर्थन में बदलने की होगी। सभी विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान पार्टी की व्यापक राजनीतिक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। इससे पार्टी प्रदेश के हर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने और राज्यव्यापी मुद्दों पर राजनीतिक विमर्श खड़ा करने की कोशिश कर सकती है। लेकिन पहाड़ से मैदान तक फैले उत्तराखंड में चुनाव लड़ने के लिए केवल उम्मीदवारों की सूची पर्याप्त नहीं होती। बूथ स्तर का संगठन, स्थानीय नेतृत्व, चुनाव प्रबंधन, संसाधन और मतदाताओं के बीच लगातार संपर्क भी जरूरी हैं। सर्वजन सनातन पार्टी को यह स्पष्ट करना होगा कि उसका राजनीतिक कार्यक्रम केवल धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान तक सीमित रहेगा या वह रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और पहाड़ी क्षेत्रों के विकास जैसे सवालों पर भी ठोस नीतियां पेश करेगी। उत्तराखंड में सनातन परंपरा और धार्मिक पर्यटन का विशेष महत्व है। चारधाम, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं और क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत प्रदेश की पहचान का हिस्सा हैं। लेकिन चुनाव में सांस्कृतिक पहचान के साथ रोजमर्रा के सवाल भी निर्णायक होते हैं। मतदाता यह जानना चाहेंगे कि नई पार्टी उनकी समस्याओं के समाधान के लिए क्या अलग प्रस्ताव रखती है। नई पार्टी की एंट्री का राजनीतिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि उसे किन क्षेत्रों और किन सामाजिक समूहों में समर्थन मिलता है। यदि वह भाजपा के पारंपरिक समर्थकों के बीच जगह बनाती है, तो सत्तारूढ़ दल के लिए कुछ सीटों पर चुनौती पैदा हो सकती है। वहीं, यदि उसका प्रभाव कांग्रेस समर्थकों या भाजपा-कांग्रेस दोनों से असंतुष्ट मतदाताओं में बढ़ता है, तो विपक्षी राजनीति के समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सर्वजन सनातन पार्टी किस दल के वोट काटेगी या किसे राजनीतिक लाभ पहुंचाएगी। इसका आकलन पार्टी के उम्मीदवारों, संगठन, प्रचार अभियान और क्षेत्रवार समर्थन की स्थिति सामने आने के बाद ही किया जा सकेगा। उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की राजनीति का इतिहास भी नई पार्टी के सामने चुनौती खड़ी करता है। राज्य गठन आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले उत्तराखंड क्रांति दल को भी लंबे समय तक राज्यव्यापी सत्ता का विकल्प बनने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इससे स्पष्ट होता है कि क्षेत्रीय भावनाओं या वैचारिक पहचान के आधार पर समर्थन जुटाना और उसे विधानसभा की सीटों में बदलना अलग-अलग राजनीतिक परीक्षाएं हैं। सर्वजन सनातन पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल उसकी वैचारिक पहचान और व्यावहारिक राजनीतिक कार्यक्रम का है। सनातन परंपरा के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी को यह बताना होगा कि वह धार्मिक-सांस्कृतिक मूल्यों को शासन, सामाजिक समरसता और विकास की नीतियों से किस तरह जोड़ेगी। उत्तराखंड में धार्मिक आस्था एक महत्वपूर्ण सामाजिक शक्ति है, लेकिन यहां के मतदाताओं की अपेक्षाएं बहुआयामी हैं। युवाओं को रोजगार चाहिए, गांवों को बुनियादी सुविधाएं चाहिए, किसानों और छोटे कारोबारियों को आर्थिक अवसर चाहिए तथा महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान के साथ बेहतर सुविधाएं चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता जैसे मुद्दे भी चुनावी विमर्श का हिस्सा रहेंगे। यदि पार्टी इन सवालों पर स्पष्ट नीति, समयबद्ध कार्यक्रम और जवाबदेह नेतृत्व पेश करती है, तो उसे अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करने का अवसर मिल सकता है। इसके विपरीत, यदि अभियान केवल नारों और पहचान की राजनीति तक सीमित रहता है, तो सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा का चुनावी प्रभाव सीमित रह सकता है। सर्वजन सनातन पार्टी की असली परीक्षा 70 सीटों पर चुनाव लड़ने के ऐलान से नहीं, बल्कि यह साबित करने से होगी कि उसके पास उत्तराखंड के लिए क्या नया राजनीतिक विचार, कैसा संगठन और जनता के सवालों के क्या ठोस जवाब हैं। चुनावी मैदान में दस्तक देना पहला कदम है और जनविश्वास हासिल करना ही असली राजनीति है।

‘हीरा’ नये विकल्प का संकल्प

उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की नई पटकथा भाजपा-कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती का दावा अब उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने बनाई नई पार्टी पुरानी राजनीतिक व्यवस्था मिलेगी एक नई चुनौती देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नए राजनीतिक विकल्पों की दस्तक तेज होने लगी है। भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की अदला-बदली के स्थापित राजनीतिक ढांचे में अपनी जगह बनाने की कोशिश करते हुए उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने राज्य स्वराज पार्टी का शुभारंभ किया है। नये विकल्प का संकल्प कार्यक्रम के साथ शुरू हुई इस राजनीतिक पहल में पार्टी का चुनाव चिह्न हीरा भी जारी किया गया। पार्टी ने प्रदेश के विकास, जनहित और जनभागीदारी को अपनी प्राथमिकता बताया है। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में असली सवाल नए दल के गठन का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक खालीपन का है, जिसे भरने के दावे बार-बार किए जाते रहे हैं। राज्य गठन के आंदोलन ने जिस क्षेत्रीय स्वाभिमान, स्थानीय भागीदारी और पहाड़ के हितों की राजनीति को जन्म दिया था, वह सत्ता के गलियारों तक पहुंचकर व्यापक जनादेश में क्यों नहीं बदल सकी? और क्या राज्य स्वराज पार्टी इस अधूरे राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दे पाएगी? नई पार्टी का शुभारंभ ऐसे समय हुआ है, जब प्रदेश में भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की रणनीति पर काम कर रही है और कांग्रेस सत्ता में वापसी की संभावनाएं तलाश रही है। इस बीच तीसरे विकल्प की नई कोशिश राजनीतिक समीकरणों में हलचल पैदा कर सकती है। हालांकि, उसे तत्काल भाजपा या कांग्रेस के लिए चुनौती मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। उसकी वास्तविक ताकत संगठन, नेतृत्व, उम्मीदवारों और जनसमर्थन से तय होगी। उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की कहानी राज्य गठन के साथ जुड़ी है। उत्तराखंड क्रांति दल ने अलग राज्य की मांग को राजनीतिक स्वर देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आंदोलन के दौरान क्षेत्रीय आकांक्षाओं और स्थानीय अस्मिता को जो समर्थन मिला, वह स्वतंत्र राज्य की स्थापना के बाद स्थायी चुनावी शक्ति में तब्दील नहीं हो सका। इसके बाद भी कई राजनीतिक प्रयास हुए, लेकिन भाजपा और कांग्रेस का संगठनात्मक विस्तार तथा राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी उनकी ताकत क्षेत्रीय दलों के लिए बड़ी चुनौती बनी रही। इसका अर्थ यह नहीं कि उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की जरूरत समाप्त हो गई है। रोजगार, पलायन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े सवाल आज भी राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। असली समस्या यह है कि इन मुद्दों पर असंतोष को एकजुट राजनीतिक विकल्प में बदलने के लिए निरंतर संगठन, स्पष्ट नेतृत्व और विश्वसनीय कार्यक्रम की जरूरत होती है। राज्य स्वराज पार्टी के सामने भी यही परीक्षा है। क्या वह केवल भाजपा-कांग्रेस के विकल्प की घोषणा करेगी, या इन दोनों दलों से अलग अपनी नीतियों और राजनीतिक कार्यशैली का ठोस खाका पेश करेगी? क्या उसका प्रभाव कुछ स्थानीय क्षेत्रों तक सीमित रहेगा, या वह पूरे प्रदेश में संगठन खड़ा कर पाएगी? इन सवालों के जवाब ही उसके राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेंगे। पार्टी ने हीरे को अपने चुनाव चिह्न के रूप में प्रस्तुत किया है। चुनाव चिह्न मतदाताओं के बीच पहचान बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में केवल प्रतीक के सहारे जनाधार तैयार नहीं किया जा सकता। इसके लिए ऐसा नेतृत्व चाहिए, जिसकी राजनीतिक विश्वसनीयता हो। ऐसा संगठन चाहिए, जो चुनाव के बाद भी जनता के बीच सक्रिय रहे और ऐसा कार्यक्रम चाहिए, जो प्रदेश की वास्तविक समस्याओं के समाधान की दिशा दिखाए। भाजपा और कांग्रेस के पास दशकों का संगठनात्मक अनुभव, स्थानीय नेताओं का नेटवर्क और चुनाव प्रबंधन की स्थापित व्यवस्था है। इनके मुकाबले नई पार्टी को अपनी राजनीतिक पहचान बनाने के लिए कहीं अधिक मेहनत करनी होगी। उसे केवल असंतोष की राजनीति से आगे बढ़कर यह बताना होगा कि सत्ता मिलने पर वह शासन की प्राथमिकताओं में क्या बदलाव करेगी। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज होना स्वाभाविक है। नई पार्टी का शुभारंभ इसी व्यापक चुनावी हलचल का हिस्सा है। मगर राजनीतिक दलों की संख्या बढ़ना और लोकतांत्रिक विकल्प मजबूत होना एक ही बात नहीं है। विकल्प तभी सार्थक होता है, जब वह मतदाता के सामने नीतिगत स्पष्टता और जवाबदेही का नया मानक रखे। राज्य स्वराज पार्टी को अब अपना नेतृत्व, संगठनात्मक ढांचा, चुनावी रणनीति और प्रदेश के प्रमुख मुद्दों पर नीतिगत दृष्टिकोण स्पष्ट करना होगा। उसे बताना होगा कि पहाड़ में पलायन रोकने, युवाओं को रोजगार देने, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं सुधारने तथा स्थानीय संसाधनों से प्रदेश की अर्थव्यवस्था मजबूत करने के लिए उसके पास क्या ठोस योजना है। उत्तराखंड की राजनीति में तीसरे विकल्प की गुंजाइश पर बहस नई नहीं है। नई बात तभी होगी, जब कोई दल इस बहस को जमीनी संगठन और विश्वसनीय राजनीतिक कार्यक्रम में बदल सके। राज्य स्वराज पार्टी ने हीरा चुनाव चिह्न के साथ राजनीतिक मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है। लेकिन 2027 की चुनावी कसौटी पर उसकी चमक का फैसला नारों से नहीं, जनसमर्थन से होगा। भाजपा और कांग्रेस के बीच जगह बनाना चुनौती है, मगर उससे बड़ी चुनौती जनता को यह विश्वास दिलाना है कि नया विकल्प केवल सत्ता के समीकरण बदलने नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति की कार्यशैली बदलने आया है। यही वह सवाल है, जिसका जवाब राज्य स्वराज पार्टी को अपने संगठन, नीतियों और जनता के बीच काम से देना होगा। वरना उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की कहानी में एक नया नाम तो जुड़ जाएगा, लेकिन राजनीति के पुराने समीकरण जस के तस रहेंगे।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: चुनाव आते ही निशाने पर कांग्रेस का ‘अतीत’

udaydinmaan: चुनाव आते ही निशाने पर कांग्रेस का ‘अतीत’: सीएम धामी के बयानों ने प्रदेश की राजनीति में चुनावी संघर्ष की आहट कांग्रेस के पाप धो रही प्रदेश सरकार के बयान से विपक्ष ने बढ़ाया दबाव प्रदेश...

udaydinmaan: चुनाव सिर पर और सत्ता ‘बेखबर’

udaydinmaan: चुनाव सिर पर और सत्ता ‘बेखबर’: 2027 की जंग से पहले प्रदेश की बदहाली भाजपा के लिए चुनौती कांग्रेस के लिए सियासी हथियार से व्यवस्था पर उठाती रही सवाल सत्ता और विपक्ष दोनों स...

udaydinmaan: सड़कों पर वीआईपी और फुटपाथ पर दुकानें

udaydinmaan: सड़कों पर वीआईपी और फुटपाथ पर दुकानें: मरीजों को ले जाती एंबुलेंसी को नहीं मिलता रास्ता व्यवस्था नहीं बदलती और जनता यूं ही पिस रही देहरादून की यातायात व्यवस्था पर उठे कई सवाल जाम ...

सड़कों पर वीआईपी और फुटपाथ पर दुकानें

मरीजों को ले जाती एंबुलेंसी को नहीं मिलता रास्ता व्यवस्था नहीं बदलती और जनता यूं ही पिस रही देहरादून की यातायात व्यवस्था पर उठे कई सवाल जाम में फंसता आम आदमी तो जवाबदेही किसकी देहरादून। दून की सड़कों पर आम आदमी का चलना मुश्किल है। कहीं वीआईपी वाहनों का सड़क के बीचोंबीच जमावड़ा है, तो कहीं फुटपाथ पर दुकानदारों का कब्जा। नतीजा यह कि पैदल चलने वालों को सड़क पर उतरना पड़ता है और वाहन चालकों को कदम-कदम पर जाम से जूझना पड़ता है। शहर की सड़कों पर अतिक्रमण और बेतरतीब पार्किंग ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसमें परेशानी आमजन की है, लेकिन व्यवस्था की जवाबदेही तय होती नजर नहीं आती। देहरादून की पहचान कभी अपेक्षाकृत शांत और व्यवस्थित शहर के रूप में होती थी। आज शहर की व्यस्त सड़कों पर निकलना किसी चुनौती से कम नहीं। बाजारों में खरीदारी के लिए निकले लोग हों, दफ्तर पहुंचने की जल्दबाजी में कर्मचारी या स्कूल-कालेज जाने वाले विद्यार्थीकृहर किसी को जाम के झाम से गुजरना पड़ता है। कई जगह सड़क के किनारे खड़े वाहन और फुटपाथ पर फैली दुकानें पहले से सीमित रास्ते को और संकरा कर देती हैं। शहर में यातायात की समस्या का एक बड़ा पहलू बेतरतीब पार्किंग है। वीआईपी और अन्य वाहनों के सड़क किनारे या सड़क के बीचोंबीच खड़े होने से यातायात की रफ्तार प्रभावित होती है। जहां वाहन खड़े करने के लिए निर्धारित स्थान उपलब्ध नहीं हैं या उनका उपयोग नहीं किया जा रहा, वहां सड़क ही पार्किंग स्थल बन जाती है। सवाल यह है कि सार्वजनिक सड़क पर इस तरह वाहन खड़े करने की छूट आखिर किस आधार पर मिलती है? नियम यदि आम नागरिक के लिए हैं, तो उनका पालन रसूखदारों से भी क्यों नहीं कराया जाता? दूसरी ओर, फुटपाथ पर दुकानों और अस्थायी कारोबार का फैलाव पैदल चलने वालों के अधिकार को सीमित कर रहा है। फुटपाथ का उद्देश्य लोगों को सुरक्षित रास्ता देना है, न कि उसे व्यापारिक गतिविधियों के लिए खुला छोड़ देना। जब फुटपाथ पर चलने की जगह नहीं बचती, तो पैदल यात्रियों को मजबूरन सड़क पर उतरना पड़ता है। इससे यातायात बाधित होने के साथ दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ता है। जाम का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है, जिनके पास समय और संसाधनों की सीमित गुंजाइश होती है। दफ्तर जाने वाले कर्मचारी देर से पहुंचते हैं, विद्यार्थियों की दिनचर्या प्रभावित होती है और मरीजों को अस्पताल पहुंचने में परेशानी हो सकती है। ईंधन की बर्बादी और वाहनों से निकलने वाला धुआं अलग समस्या है। यानी अतिक्रमण और अव्यवस्थित पार्किंग का नुकसान केवल कुछ मिनट की देरी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शहर की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और नागरिकों की दिनचर्या पर भी पड़ता है। सबसे बड़ा सवाल नगर निगम, यातायात पुलिस और संबंधित विभागों की भूमिका को लेकर है। यदि फुटपाथ पर अतिक्रमण है, तो उसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि सड़क पर वाहन बेतरतीब खड़े हैं, तो चालान और कार्रवाई क्यों प्रभावी नहीं दिखती? और यदि किसी खास व्यक्ति या वाहन को नियमों से छूट मिल रही है, तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा? शहर की यातायात व्यवस्था केवल त्योहारों, विशेष आयोजनों या वीआईपी आवागमन के दौरान सक्रिय रहने से नहीं सुधर सकती। इसके लिए रोजाना निगरानी और नियमों का समान रूप से पालन जरूरी है। देहरादून में यातायात का दबाव बढ़ने के साथ पार्किंग स्थलों की उपलब्धता, फुटपाथों की सुरक्षा और बाजारों में अतिक्रमण का समाधान प्राथमिकता बनना चाहिए। अवैध पार्किंग पर नियमित कार्रवाई, पैदल यात्रियों के लिए फुटपाथ खाली रखने, दुकानदारों के लिए निर्धारित स्थानों की व्यवस्था और व्यस्त बाजारों में यातायात प्रबंधन जैसे कदम जरूरी हैं। केवल अभियान चलाकर कुछ दिन रास्ते खाली करा देना स्थायी समाधान नहीं है। कार्रवाई निरंतर होनी चाहिए और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ बिना भेदभाव के लागू होनी चाहिए। राजधानी होने का अर्थ केवल सरकारी कार्यालयों और वीआईपी आवाजाही का केंद्र होना नहीं है। राजधानी की असली पहचान इस बात से बनती है कि वहां आम नागरिक कितनी आसानी से, सुरक्षित ढंग से और सम्मान के साथ आवागमन कर सकता है। सड़कें किसी रसूखदार की निजी पार्किंग नहीं और फुटपाथ किसी दुकानदार की निजी संपत्ति नहीं हैं। दोनों पर पहला अधिकार सार्वजनिक उपयोग का है। देहरादून की सड़कों पर आज सबसे बड़ा सवाल यही हैकृकि क्या शहर की सड़कें और फुटपाथ आम जनता के लिए हैं, या उनका इस्तेमाल वही करेगा जिसके पास रसूख है या जो नियमों को ताक पर रख सकता है? जब तक इस सवाल का जवाब कार्रवाई के रूप में नहीं मिलता, तब तक आम आदमी जाम में फंसता रहेगा और राजधानी की यातायात व्यवस्था बदहाली की कीमत उससे वसूलती रहेगी।

चुनाव सिर पर और सत्ता ‘बेखबर’

2027 की जंग से पहले प्रदेश की बदहाली भाजपा के लिए चुनौती कांग्रेस के लिए सियासी हथियार से व्यवस्था पर उठाती रही सवाल सत्ता और विपक्ष दोनों से जवाब मांग रही है प्रदेश की आम जनता देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट तेज हो रही है। भाजपा सत्ता में वापसी के लिए संगठन को धार देने और अपनी उपलब्धियां गिनाने की तैयारी में जुटी है, वहीं कांग्रेस सरकार को घेरकर सत्ता में लौटने की जमीन तलाश रही है। लेकिन चुनावी रणनीतियों, राजनीतिक समीकरणों और सत्ता के दावों के बीच राजधानी देहरादून की सड़कें एक अलग ही कहानी कह रही हैं। उत्तराखंड की राजनीति में राजधानी का अपना महत्व है। देहरादून केवल प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि प्रदेश की सत्ता, नौकरशाही और राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र भी है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों, विधायकों और वरिष्ठ अधिकारियों तक की मौजूदगी इसी शहर में रहती है। इसके बावजूद आम नागरिक का जाम से जूझना, फुटपाथ पर सुरक्षित रास्ता नहीं मिलना और पार्किंग की अव्यवस्था से परेशान होना राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े करता है। यह परेशानी अब केवल यातायात तक सीमित नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं से जुड़ा राजनीतिक प्रश्न बन सकती है। प्रदेश में भाजपा की सरकार है। लिहाजा देहरादून की यातायात व्यवस्था और अतिक्रमण पर उठने वाले सवालों की सीधी राजनीतिक जिम्मेदारी सरकार पर आएगी। भाजपा 2027 के चुनाव में विकास, सुशासन और मजबूत नेतृत्व को अपनी ताकत के रूप में पेश करना चाहेगी। लेकिन विपक्ष के पास यह पूछने का अवसर रहेगा कि जब राजधानी में ही सड़क और फुटपाथ व्यवस्थित नहीं हो पा रहे, तो विकास के दावों का लाभ आम नागरिक तक किस हद तक पहुंचा है? वीआईपी वाहनों की बेतरतीब पार्किंग का सवाल इस बहस को और राजनीतिक बनाता है। यदि आम नागरिक के वाहन पर नियमों के उल्लंघन के लिए कार्रवाई होती है, तो रसूखदारों के मामले में भी वैसी ही सख्ती क्यों नहीं दिखाई देनी चाहिए? सार्वजनिक सड़क किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। नियमों का पालन सबके लिए समान होना चाहिए। यदि प्रशासनिक कार्रवाई में किसी तरह का भेदभाव दिखाई देता है, तो यह सरकार की छवि और कानून के समान अनुपालनकृदोनों के लिए चुनौती बनता है। भाजपा के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। उसे एक ओर अपने विकास कार्यों का राजनीतिक बचाव करना होगा, तो दूसरी ओर उन कमियों पर भी जवाब देना होगा, जो नागरिकों को रोजाना परेशान करती हैं। चुनाव से पहले इन समस्याओं का समाधान करना सरकार के लिए केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश देने का अवसर भी है। विपक्षी कांग्रेस के लिए देहरादून की बदहाल यातायात व्यवस्था सरकार को घेरने का मुद्दा बन सकती है। रोजगार, महंगाई, पलायन और बुनियादी सुविधाओं के सवालों के साथ राजधानी में जाम और अतिक्रमण की समस्या को जोड़कर कांग्रेस सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा सकती है। यह ऐसा मुद्दा है, जिसे जनता को समझाने के लिए लंबे राजनीतिक भाषणों की जरूरत नहीं। नागरिक खुद सड़कों पर इसकी कीमत चुका रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के सामने भी राजनीतिक चुनौती कम नहीं है। केवल भाजपा को कठघरे में खड़ा करने से सत्ता का रास्ता नहीं खुलेगा। उसे यह बताना होगा कि उसकी सरकार बनने पर शहर की यातायात व्यवस्था कैसे बदलेगी, पार्किंग की समस्या का समाधान क्या होगा, फुटपाथों को अतिक्रमण से कैसे मुक्त रखा जाएगा और नियम तोड़ने वालों पर बिना भेदभाव कार्रवाई कैसे सुनिश्चित होगी। विपक्ष के लिए सबसे बड़ा अवसर यही है कि वह विरोध की राजनीति से आगे बढ़कर वैकल्पिक शहरी नीति पेश करे। यदि कांग्रेस इन मुद्दों को केवल चुनावी बयानबाजी तक सीमित रखती है, तो जनता के बीच उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे। देहरादून की अव्यवस्था का सबसे तीखा राजनीतिक पहलू वीआईपी संस्कृति और आम नागरिक के अनुभव के बीच का अंतर है। सत्ता के गलियारों में बैठकों, योजनाओं और विकास के दावों पर चर्चा होती है, जबकि सड़क पर निकलने वाला नागरिक जाम में अपना समय गंवाता है। फुटपाथ पर कब्जे के कारण पैदल चलने वालों को सड़क पर उतरना पड़ता है। सार्वजनिक स्थानों के उपयोग में यह असंतुलन एक बुनियादी सवाल खड़ा करता हैकृक्या राजधानी की व्यवस्था आम जनता की सुविधा के लिए है या प्रभावशाली लोगों की सहूलियत के हिसाब से चल रही है? यह सवाल चुनावी राजनीति में इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि नागरिकों का शासन से सीधा संपर्क इन्हीं रोजमर्रा की परिस्थितियों में होता है। बड़ी परियोजनाएं और घोषणाएं राजनीतिक विमर्श में जगह बना सकती हैं, लेकिन सड़क पर रोज होने वाली परेशानी शासन के प्रति नागरिक की धारणा को भी प्रभावित करती है। हालांकि, इस असंतोष का चुनावी नतीजों पर कितना असर पड़ेगा, यह स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवारों और दूसरे मुद्दों पर भी निर्भर करेगा। आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के सामने शहरी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की चुनौती होगी। देहरादून का विस्तार, बढ़ता यातायात, पार्किंग की कमी और फुटपाथों पर अतिक्रमण ऐसे मुद्दे हैं, जिनका समाधान केवल अस्थायी अभियान से नहीं हो सकता। इसके लिए दीर्घकालीन नियोजन, सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने, पार्किंग व्यवस्था विकसित करने और नगर निगम तथा यातायात पुलिस के बीच प्रभावी समन्वय की जरूरत है। राजनीतिक दलों को यह भी स्पष्ट करना होगा कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित तो नहीं रहेगी और क्या सार्वजनिक स्थानों पर नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रभावशाली लोगों पर भी समान कार्रवाई होगी। साथ ही, छोटे कारोबारियों की आजीविका और पैदल यात्रियों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी? इन सवालों के जवाब किसी भी राजनीतिक दल की शहरी नीति की गंभीरता को सामने लाएंगे। 2027 का चुनाव अभी भविष्य में है, लेकिन उसकी राजनीतिक तैयारी शुरू हो चुकी है। भाजपा के लिए चुनौती अपने शासन की उपलब्धियों के साथ उन समस्याओं का जवाब देना है, जिन्हें जनता रोज महसूस करती है। कांग्रेस के लिए अवसर इन समस्याओं को सरकार की जवाबदेही से जोड़ने और ठोस विकल्प पेश करने का है। दोनों दलों के लिए यह समझना जरूरी होगा कि राजधानी की अव्यवस्था केवल नगर निगम या यातायात पुलिस का विषय बताकर राजनीतिक जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। चुनावी सवाल साफ हैकृभाजपा विकास के दावों के बीच राजधानी की बदहाली का जवाब कैसे देगी और कांग्रेस इस बदहाली को सत्ता परिवर्तन के मुद्दे में बदलने के लिए क्या ठोस विकल्प रखेगी? देहरादून की सड़कें फिलहाल किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में फैसला नहीं सुना रहीं। लेकिन वह सत्ता और विपक्ष, दोनों से जवाब जरूर मांग रही हैं। 2027 में यह मुद्दा कितना बड़ा राजनीतिक रूप लेगा, यह आने वाले महीनों में दलों की रणनीति और प्रशासन की कार्रवाई से स्पष्ट होगा। फिलहाल इतना तय है कि राजधानी की सड़कों पर आम आदमी की परेशानी को अनदेखा करना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा और इसे चुनावी मुद्दा बनाने वाली कांग्रेस भी समाधान की जिम्मेदारी से बच नहीं सकेगी।

चुनाव आते ही निशाने पर कांग्रेस का ‘अतीत’

सीएम धामी के बयानों ने प्रदेश की राजनीति में चुनावी संघर्ष की आहट कांग्रेस के पाप धो रही प्रदेश सरकार के बयान से विपक्ष ने बढ़ाया दबाव प्रदेश में अब तक के भ्रष्टाचार के आरोपों पर दलों को देना होगा हिसाब देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा का सत्र समाप्त हुआ, लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बयानों ने प्रदेश की राजनीति में चुनावी संघर्ष की आहट तेज कर दी है। कांग्रेस के विरोध-प्रदर्शन पर सवाल उठाते हुए धामी ने कहा कि उनकी सरकार कांग्रेस के पाप धोने का काम कर रही है और सफाई आगे भी जारी रहेगी। यह महज एक राजनीतिक तंज नहीं, बल्कि विपक्ष को उसके अतीत के कठघरे में खड़ा करने की रणनीति का संकेत है। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा भ्रष्टाचार के सवाल पर कांग्रेस को रक्षात्मक स्थिति में लाना चाहती है, जबकि कांग्रेस मौजूदा सरकार की जवाबदेही को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश में है। इस राजनीतिक टकराव की खास बात यह है कि दोनों दल भ्रष्टाचार को हथियार बना रहे हैं, लेकिन दोनों के लिए यही मुद्दा राजनीतिक परीक्षा भी बन सकता है। भाजपा कांग्रेस के शासनकाल और पुराने विवादों का हिसाब मांगना चाहती है। कांग्रेस का जोर मौजूदा सरकार पर लगे आरोपों और उन पर कार्रवाई की स्थिति को लेकर सवाल उठाने पर है। अब मुकाबला केवल आरोप लगाने का नहीं, बल्कि अपने दावों को तथ्यों से साबित करने का है। मुख्यमंत्री के बयान के राजनीतिक मायने उनकी भाषा से आगे जाते हैं। भाजपा कांग्रेस को केवल कमजोर विपक्ष के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे दल के रूप में पेश करना चाहती है, जिसे भ्रष्टाचार और पुराने विवादों पर जवाब देना चाहिए। इस रणनीति से कांग्रेस के लिए सरकार की आलोचना करते समय अपने शासनकाल का बचाव करना भी जरूरी हो जाता है। धामी का संदेश यह है कि कांग्रेस यदि भाजपा सरकार से हिसाब मांगती है, तो उसे अपने अतीत के सवालों का सामना भी करना होगा। यह चुनावी राजनीति का जाना-पहचाना तरीका हैकृविपक्ष के वर्तमान आरोपों का जवाब उसके पुराने रिकॉर्ड से देना। लेकिन इसकी सीमा भी है। किसी पूर्ववर्ती सरकार पर लगे आरोप मौजूदा सरकार के कामकाज का स्वतः प्रमाणपत्र नहीं बन जाते। भाजपा को अपनी उपलब्धियों और जवाबदेही का हिसाब अलग से देना होगा। हरक सिंह रावत से जुड़े जैनी प्रकरण का उल्लेख इस सियासी बहस को और संवेदनशील बनाता है। ऐसे विवाद नेताओं की सार्वजनिक छवि और राजनीतिक विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकते हैं। भाजपा के लिए यह कांग्रेस से जुड़े नेताओं पर सवाल उठाने का अवसर है, जबकि कांग्रेस के लिए अपने नेताओं के पक्ष को स्पष्ट करने की चुनौती। लेकिन यहां राजनीतिक आरोप और कानूनी निष्कर्ष के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। उपलब्ध पुष्ट जानकारी के आधार पर इस प्रकरण को कांग्रेस के भ्रष्टाचार का निर्णायक प्रमाण नहीं कहा जा सकता। किसी भी आरोप की गंभीरता का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों, जांच और कानूनी निष्कर्षों से ही होना चाहिए। यही भाजपा की रणनीति की कसौटी भी है। यदि पार्टी पुराने विवादों को चुनावी मुद्दा बनाती है, तो उसे तथ्य सामने रखने होंगे। केवल आरोप दोहराने से राजनीतिक शोर तो पैदा हो सकता है, लेकिन उससे जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होती। विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस ने भ्रष्टाचार सहित विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश की। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना और उसके फैसलों की जांच करना है। लेकिन इस भूमिका का प्रभाव तभी बढ़ता है, जब विरोध के साथ ठोस तथ्य, स्पष्ट मांगें और वैकल्पिक नीतियां भी सामने रखी जाएं। सदन में हंगामे के बीच 7,844.18 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट और विभिन्न विधायी प्रस्ताव पारित हुए। सत्र के दौरान विपक्ष ने चर्चा की मांग उठाई, जबकि सरकार ने विधायी कार्यवाही आगे बढ़ाई। इस घटनाक्रम ने यह प्रश्न भी छोड़ा कि भ्रष्टाचार और जनहित से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त तथा सार्थक चर्चा हो पाई या नहीं। कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह सरकार के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रमाणों और तथ्यों के साथ जनता के सामने रखे। उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि सत्ता में आने पर पारदर्शिता, जांच और जवाबदेही के लिए उसकी नीति क्या होगी। केवल भाजपा पर हमला करने से वह अपने राजनीतिक अतीत से जुड़े प्रश्नों से मुक्त नहीं हो सकती। धामी सरकार के सामने भी सवाल कम नहीं हैं। कांग्रेस के शासनकाल के विवादों का उल्लेख करना राजनीतिक रूप से प्रभावी हो सकता है, लेकिन इससे वर्तमान सरकार के खिलाफ उठने वाले सवाल समाप्त नहीं होते। भाजपा को यह बताना होगा कि उसके शासन में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, जांच कितनी आगे बढ़ी और प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए। यदि मुख्यमंत्री अपनी सरकार को घोटालों से मुक्त बताते हैं, तो इस दावे की विश्वसनीयता केवल राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था और निष्पक्ष कार्रवाई से मजबूत होगी। इसी तरह कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों का मूल्यांकन भी प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। दोनों दलों के लिए एक ही कसौटी होनी चाहिएकृआरोप किसी पर भी हों, जांच निष्पक्ष हो और जवाबदेही तय हो। उत्तराखंड में 2027 का चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक विश्वसनीयता की लड़ाई भी बनने जा रहा है। भाजपा कांग्रेस के पुराने विवादों को सामने रखकर सत्ता में वापसी की जमीन मजबूत करना चाहेगी। कांग्रेस मौजूदा सरकार के कामकाज, रोजगार, पलायन, महंगाई और शासन से जुड़े सवालों के आधार पर भाजपा को चुनौती देने की कोशिश करेगी। लेकिन चुनावी रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राजनीतिक दल जनता की प्राथमिकताओं से कितना जुड़ते हैं। भ्रष्टाचार महत्वपूर्ण मुद्दा है, पर मतदाता के लिए रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पलायन और स्थानीय विकास भी उतने ही अहम हैं। केवल एक-दूसरे के अतीत को उछालने से इन सवालों का समाधान नहीं निकलता। धामी ने भराड़ीसैंण से कांग्रेस को उसके अतीत का हिसाब देने की चुनौती दी है। अब भाजपा को अपने वर्तमान का हिसाब देना होगा और कांग्रेस को अपने आरोपों के प्रमाण सामने रखने होंगे। 2027 की चुनावी लड़ाई में निर्णायक बढ़त उसी पक्ष को मिल सकती है, जो आरोपों के शोर से आगे बढ़कर अपने दावों की विश्वसनीयता साबित करे। सदन में सियासी वार शुरू हो चुका है। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम फैसला न मुख्यमंत्री के तीखे बयान से होता है, न विपक्ष की नारेबाजी से। फैसला इस बात से होता है कि जनता के सवालों का जवाब किसने दिया, किसके दावे तथ्यों पर टिके और किसने जवाबदेही से बचने के बजाय उसका सामना किया।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: सियासी शोर में दबे ‘पहाड़’ के सवाल

udaydinmaan: सियासी शोर में दबे ‘पहाड़’ के सवाल: रोजगार-पलायन तक सरकार के सामने सवालों की कतार सियासी तपिश के बीच बुनियादी सवालों पर लोगों की आस राजनीतिक शोर के बीच जनता की मूलभूत समस्याएं ...

udaydinmaan: टिकट की जंग में ‘नई पीढ़ी’

udaydinmaan: टिकट की जंग में ‘नई पीढ़ी’: 2027 में भाजपा-कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती पुराने दिग्गजों की कुर्सी पर नए दावेदारों की नजर टिकट कटा तो बिगड़ सकता है चुनावी गणित देहराद...

udaydinmaan: टिकटों की जंग से बदलेगा ‘चुनावी गणित’

udaydinmaan: टिकटों की जंग से बदलेगा ‘चुनावी गणित’: भाजपा और कांग्रेस के सामने प्रत्याशी चयन की चुनौती यूकेडी का 70 सीटों पर लड़ने का एलान से बढ़ी चिंता आप और उमेश कुमार की नई पार्टी से बढ़ेगी हल...

अंकिता केस में ‘वीआईपी’ का रहस्य

सीबीआई मुख्यालय में पांच घंटे आशुतोष नेगी से पूछताछ कथित वीआईपी का नाम उजागर करने की मांग फिर तेज तीन दोषियों को सजा, फिर भी कथित वीआईपी पर सवाल नई दिल्ली/देहरादून। अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित वीआईपी की पहचान का सवाल फिर सुर्खियों में है। उत्तराखंड क्रांति दल डेमोक्रेटिक के केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आशुतोष नेगी ने दिल्ली स्थित केंद्रीय जांच ब्यूरो मुख्यालय में करीब पांच घंटे तक चली पूछताछ के दौरान अपने बयान दर्ज कराए। अंकिता प्रकरण में कथित वीआईपी का नाम स्पष्ट करने की मांग के बीच इस घटनाक्रम ने एक बार फिर जांच के उन सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जिनके जवाब का इंतजार प्रदेश को है। अंकिता भंडारी हत्याकांड में कानूनी कार्रवाई के बावजूद कथित वीआईपी की पहचान को लेकर सार्वजनिक बहस थमी नहीं है। आखिर वह कौन था, जिसकी चर्चा इस मामले में लगातार होती रही? क्या जांच में सामने आए सभी तथ्यों का पूरी तरह खुलासा हुआ है? और क्या उन सवालों के जवाब मिल पाएंगे, जिन्हें लेकर अंकिता को न्याय दिलाने की मांग उठती रही है? आशुतोष नेगी लंबे समय से इस प्रकरण में कथित वीआईपी का नाम स्पष्ट करने की मांग करते रहे हैं। दिल्ली में सीबीआई मुख्यालय में पांच घंटे तक पूछताछ और बयान दर्ज होने के बाद अब निगाहें जांच एजेंसी की अगली कार्रवाई पर हैं। हालांकि, पूछताछ के दौरान नेगी ने कौन-से तथ्य या साक्ष्य प्रस्तुत किए और सीबीआई ने उनसे किन बिंदुओं पर सवाल किए, इसकी विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने आना बाकी है। अंकिता हत्याकांड उत्तराखंड की संवेदनाओं से जुड़ा मामला है। ऐसे में कथित वीआईपी की पहचान को लेकर उठते सवालों का जवाब केवल अटकलों से नहीं, बल्कि जांच के प्रमाणित तथ्यों और आधिकारिक निष्कर्षों से मिलना चाहिए। किसी व्यक्ति का नाम बिना प्रमाण सामने रखना न्याय और जांचकृदोनों के लिहाज से उचित नहीं होगा। अब सवाल सीधा हैकृक्या सीबीआई की जांच कथित वीआईपी को लेकर बने संशय पर निर्णायक स्थिति स्पष्ट करेगी? पांच घंटे की पूछताछ के बाद आशुतोष नेगी के बयान जांच का हिस्सा बन चुके हैं। अब देखना होगा कि इन बयानों से जांच को क्या दिशा मिलती है और अंकिता प्रकरण के अनुत्तरित सवालों पर कब तक स्थिति साफ होती है।

टिकटों की जंग से बदलेगा ‘चुनावी गणित’

भाजपा और कांग्रेस के सामने प्रत्याशी चयन की चुनौती यूकेडी का 70 सीटों पर लड़ने का एलान से बढ़ी चिंता आप और उमेश कुमार की नई पार्टी से बढ़ेगी हलचल देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की बिसात बिछने लगी है। सत्ता की हैट्रिक लगाने की रणनीति बना रही भाजपा हो या सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए कांग्रेस, दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि सही प्रत्याशियों के चयन की भी होगी। टिकट वितरण में जरा-सी चूक कई सीटों पर जीत की संभावनाओं को कमजोर कर सकती है। इसी बीच उत्तराखंड क्रांति दल का सभी 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान, आम आदमी पार्टी की सक्रियता और खानपुर के निर्दलीय विधायक उमेश कुमार की नई पार्टी बनाने की घोषणा ने चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। सवाल यह है कि क्या 2027 का चुनाव एक बार फिर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला रहेगा या छोटे दलों और नए राजनीतिक विकल्पों की दस्तक समीकरणों में बड़ा बदलाव लाएगी? उत्तराखंड की राजनीति में अब तक सत्ता का मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहा है। राज्य गठन के बाद दोनों दल बारी-बारी से सरकार बनाते रहे हैं। लेकिन इस बार चुनावी परिदृश्य में कई ऐसे कारक उभर रहे हैं, जो दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए चुनौती बन सकते हैं। क्षेत्रीय अस्मिता, बेरोजगारी, पलायन, भर्ती प्रक्रियाओं पर उठे सवाल, ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की असमानता और स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं। इन मुद्दों पर छोटे दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों की रणनीति भी बड़े दलों के लिए परेशानी पैदा कर सकती है। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी की महत्वाकांक्षा से जुड़ा है। पार्टी संगठन को मजबूत करने, बूथ स्तर पर तैयारी और चुनावी रणनीति को धार देने में जुटी है। लेकिन चुनावी तैयारियों के बीच टिकट वितरण सबसे कठिन परीक्षा साबित हो सकता है। मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन, क्षेत्रीय जनाधार, जनता की नाराजगी, संगठन के भीतर दावेदारों की संख्या और जातीय-सामाजिक समीकरणों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। सत्तारूढ़ दल के पास सरकार के कामकाज को उपलब्धियों के रूप में पेश करने का अवसर है, लेकिन उसे सत्ता विरोधी रुझान की आशंका से भी निपटना होगा। यदि किसी सीट पर मौजूदा विधायक के खिलाफ असंतोष है तो टिकट बदलने का दबाव बनेगा। वहीं, टिकट काटे जाने की स्थिति में नाराज दावेदार निर्दलीय उतर सकते हैं या किसी दूसरे दल का रुख कर सकते हैं। भाजपा के लिए चुनौती केवल मजबूत उम्मीदवार चुनने की नहीं, बल्कि टिकट से वंचित नेताओं और उनके समर्थकों को एकजुट रखने की भी होगी। कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी का रास्ता प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया से होकर गुजरता है। पार्टी के सामने भाजपा के खिलाफ जन असंतोष को चुनावी समर्थन में बदलने का अवसर है, लेकिन इसके लिए उसे संगठनात्मक एकजुटता और मजबूत उम्मीदवारों की जरूरत होगी। गुटीय खींचतान, कई सीटों पर एक से अधिक दावेदार और स्थानीय स्तर पर नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा टिकट वितरण को मुश्किल बना सकती है। कांग्रेस यदि समय रहते उम्मीदवारों की पहचान, क्षेत्रवार रणनीति और चुनावी मुद्दों पर स्पष्टता कायम करती है तो मुकाबले में अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है। इसके विपरीत, टिकट घोषित होने के बाद बगावत और असंतुष्ट नेताओं की सक्रियता पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकती है। कांग्रेस के लिए यह भी अहम होगा कि वह केवल भाजपा विरोध के सहारे चुनाव लड़ने के बजाय रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं पर अपना ठोस विकल्प जनता के सामने रखे। उत्तराखंड क्रांति दल का सभी 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान क्षेत्रीय राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है। राज्य आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकले यूकेडी के पास क्षेत्रीय अस्मिता और पहाड़ के हितों की राजनीति करने की विरासत है। लेकिन इस विरासत को चुनावी सफलता में बदलना उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है। राज्य गठन के बाद यूकेडी अपनी आंदोलनकारी पहचान को व्यापक जनाधार में बदलने में सफल नहीं रहा। संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व की चुनौतियां और चुनावों में सीमित प्रभाव ने उसे सत्ता के मुख्य मुकाबले से दूर रखा। अब सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा को जमीन पर उतारने के लिए पार्टी को मजबूत उम्मीदवार, बूथ स्तर का संगठन, पर्याप्त संसाधन और स्पष्ट राजनीतिक एजेंडा तैयार करना होगा। यूकेडी की असली परीक्षा यह होगी कि वह पहाड़ के मुद्दों को केवल भावनात्मक अपील तक सीमित रखता है या उन्हें रोजगार, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार, पलायन रोकने और विकेंद्रीकृत विकास की व्यावहारिक योजना से जोड़ पाता है। यदि पार्टी कुछ क्षेत्रों में भी प्रभावी जनाधार तैयार कर लेती है तो वह भाजपा और कांग्रेस के मतों में सेंध लगा सकती है। हालांकि, उसका प्रभाव किस सीट पर किस दल को नुकसान पहुंचाएगा, यह स्थानीय उम्मीदवारों और मतदाताओं की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा। आम आदमी पार्टी की सक्रियता भी चुनावी मुकाबले में एक अतिरिक्त आयाम जोड़ सकती है। पार्टी के सामने दिल्ली और पंजाब के अनुभव को उत्तराखंड की स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रस्तुत करने की चुनौती होगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली-पानी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर उसका प्रचार कितना असर पैदा करता है, यह उसके संगठन, स्थानीय नेतृत्व और उम्मीदवारों की स्वीकार्यता से तय होगा। पिछले चुनावी अनुभवों से स्पष्ट है कि केवल प्रचार और राजनीतिक दावों के आधार पर उत्तराखंड में मजबूत जनाधार बनाना आसान नहीं है। इसी क्रम में खानपुर के निर्दलीय विधायक उमेश कुमार की अलग राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा पर भी निगाहें रहेंगी। एक निर्दलीय विधायक के रूप में अपनी पहचान बना चुके उमेश कुमार के सामने अब व्यक्तिगत जनाधार को संगठनात्मक ताकत में बदलने की चुनौती होगी। नई पार्टी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितनी सीटों पर मजबूत प्रत्याशी उतार पाती है, उसका राजनीतिक एजेंडा क्या होता है और उसे दूसरे क्षेत्रों में कितना समर्थन मिलता है। नई पार्टी के गठन से स्थानीय स्तर पर नए समीकरण बन सकते हैं। खासकर उन सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है, जहां किसी उम्मीदवार का व्यक्तिगत प्रभाव पार्टी के पारंपरिक जनाधार से अधिक महत्वपूर्ण हो। लेकिन किसी एक क्षेत्र में मिली सफलता को पूरे प्रदेश में विस्तार की गारंटी नहीं माना जा सकता। 2027 के चुनाव में छोटे दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वे कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि उनके उम्मीदवार कहां मजबूत हैं और किन सीटों पर भाजपा या कांग्रेस के असंतुष्ट नेता उनके साथ जुड़ते हैं। उत्तराखंड की कई सीटों पर जीत का अंतर कम रहने की स्थिति में मतों का सीमित बंटवारा भी परिणाम बदल सकता है। हालांकि, मतों का बंटवारा हमेशा एक ही दिशा में काम नहीं करता। किसी तीसरे दल की मौजूदगी भाजपा को नुकसान पहुंचा सकती है तो किसी दूसरी सीट पर कांग्रेस के वोट प्रभावित हो सकते हैं। इसी तरह क्षेत्रीय दलों का उभार स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देकर बड़े दलों पर दबाव भी बना सकता है। इसलिए छोटे दलों की भूमिका का वास्तविक आकलन सीटवार राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर ही किया जा सकेगा। इस पूरे चुनावी परिदृश्य में भाजपा और कांग्रेस के लिए सबसे अहम सवाल प्रत्याशी चयन का है। मजबूत संगठन के बावजूद यदि दोनों दल स्थानीय जनभावनाओं की अनदेखी करते हैं तो बागी उम्मीदवार उनके समीकरण बिगाड़ सकते हैं। दूसरी ओर, यूकेडी, आप और उमेश कुमार की प्रस्तावित पार्टी के लिए भी केवल अधिक सीटों पर प्रत्याशी उतारना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें भरोसेमंद चेहरों, स्थानीय मुद्दों और स्पष्ट राजनीतिक विकल्प के साथ जनता के बीच जाना होगा। उत्तराखंड का मतदाता अब तक सत्ता के मुख्य विकल्प के रूप में भाजपा और कांग्रेस के बीच ही चुनाव करता आया है। तीसरी राजनीतिक ताकत की संभावनाएं तभी मजबूत होंगी, जब वह चुनाव के समय दिखाई देने वाली सक्रियता से आगे बढ़कर लगातार जनहित के मुद्दों पर काम करे और भरोसेमंद संगठन खड़ा करे। 2027 का चुनाव इसलिए केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता में वापसी की लड़ाई नहीं होगा। यह छोटे दलों की राजनीतिक प्रासंगिकता, नए नेतृत्व की स्वीकार्यता और राष्ट्रीय दलों की संगठनात्मक क्षमता की भी परीक्षा बनेगा। अंततः चुनावी परिणाम इस बात से तय होंगे कि कौन-सा दल जनता के असंतोष को विश्वसनीय विकल्प में बदल पाता है, कौन सही प्रत्याशी चुनता है और कौन टिकट वितरण के बाद अपने संगठन को एकजुट रख पाता है। उत्तराखंड की सियासत में फिलहाल मुकाबले की जमीन तैयार हो रही है, लेकिन असली तस्वीर उम्मीदवारों के नाम सामने आने और चुनावी मैदान में उतरने के बाद ही स्पष्ट होगी।

टिकट की जंग में ‘नई पीढ़ी’

2027 में भाजपा-कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती पुराने दिग्गजों की कुर्सी पर नए दावेदारों की नजर टिकट कटा तो बिगड़ सकता है चुनावी गणित देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की असली लड़ाई अभी जनता के बीच नहीं, राजनीतिक दलों के भीतर आकार ले रही है। टिकट की दावेदारी ने नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं। पुराने दिग्गज अपनी राजनीतिक जमीन बचाने में जुटे हैं तो नई पीढ़ी विधानसभा पहुंचने के लिए पूरा दम लगा रही है। वर्षों तक संगठन का झंडा उठाने वाले युवा नेता अब केवल चुनाव प्रचार में भीड़ जुटाने और वरिष्ठ नेताओं के स्वागत तक सीमित रहने को तैयार नहीं हैं। उनकी नजर सीधे विधानसभा की कुर्सी पर है। यही महत्वाकांक्षा भाजपा और कांग्रेस के लिए नई चुनौती बन रही है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि किसे टिकट मिलेगा, बल्कि यह भी है कि टिकट कटने के बाद कौन पार्टी में रहेगा और कौन अपने ही दल के चुनावी समीकरणों पर चोट करेगा। चुनावी साल में हर दावेदार खुद को जिताऊ बता रहा है। कोई अपने जनसंपर्क को ताकत बता रहा है तो कोई संगठन में वर्षों की मेहनत को टिकट का आधार मान रहा है। कुछ चेहरे अपनी राजनीतिक विरासत के सहारे दावेदारी मजबूत कर रहे हैं तो कुछ युवा नेता बदलाव की जरूरत को अपना हथियार बना रहे हैं। लेकिन इन दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक दल वास्तव में नई पीढ़ी को अवसर देना चाहते हैं या युवाओं का इस्तेमाल केवल चुनावी भीड़ और प्रचार अभियान तक ही सीमित रहेगा? सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही भाजपा के लिए टिकट वितरण आसान नहीं होगा। मौजूदा विधायकों का प्रदर्शन, क्षेत्र में नाराजगी, संगठन की पसंद, नए चेहरों की दावेदारी और जीतने की संभावना के बीच संतुलन बनाना होगा। पार्टी के सामने एक तरफ सत्ता विरोधी रुझान की आशंका है, दूसरी तरफ उन नेताओं की महत्वाकांक्षा, जो लंबे समय से टिकट की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि पार्टी मौजूदा विधायकों पर फिर भरोसा करती है तो नए दावेदारों की नाराजगी बढ़ सकती है। यदि बड़े पैमाने पर चेहरे बदले जाते हैं तो पुराने नेताओं और उनके समर्थकों को साधना मुश्किल होगा। टिकट कटने की स्थिति में बागी उम्मीदवार खड़े होने का जोखिम भी रहेगा। भाजपा की चुनौती इसलिए दोहरी हैकृउसे जिताऊ प्रत्याशी भी चुनना है और टिकट न पाने वाले नेताओं को चुनाव के दौरान पार्टी के खिलाफ सक्रिय होने से भी रोकना है। यहां एक और सवाल महत्वपूर्ण है। क्या संगठन की मजबूती के नाम पर हर मौजूदा विधायक को दोबारा मौका मिलना चाहिए या जनता के बीच कमजोर पड़ चुके चेहरों की जगह नए लोगों को आगे बढ़ाना चाहिए? इसका जवाब केवल संगठनात्मक आकलन से नहीं, क्षेत्रीय जनमत और उम्मीदवारों के वास्तविक प्रदर्शन से मिल सकता है। कांग्रेस के सामने चुनौती और भी संवेदनशील है। पार्टी को सत्ता में वापसी के लिए भाजपा के खिलाफ असंतोष को अपने पक्ष में बदलना है, लेकिन टिकट वितरण के दौरान अपने ही नेताओं के बीच सहमति बनाना बड़ी परीक्षा होगी। कई सीटों पर पुराने नेताओं की दावेदारी के साथ युवा चेहरों की महत्वाकांक्षा टकरा सकती है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा जोखिम यह होगा कि टिकट का फैसला चुनावी योग्यता के बजाय गुटीय समीकरणों के चश्मे से देखा जाए। यदि किसी दावेदार को लगता है कि उसकी अनदेखी हुई है तो वह बगावत कर सकता है, दूसरे दल का रुख कर सकता है या भीतर रहकर ही पार्टी की चुनावी सक्रियता को कमजोर कर सकता है। ऐसी स्थिति में नुकसान केवल एक सीट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास की सीटों पर भी संगठन और प्रचार अभियान प्रभावित हो सकते हैं। कांग्रेस के सामने असली कसौटी यह होगी कि वह युवा नेतृत्व को कितनी जगह देती है और अनुभवी नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता का किस तरह आकलन करती है। केवल नए चेहरों को आगे करना समाधान नहीं, लेकिन योग्य युवाओं को लगातार पीछे रखना भी पार्टी के लिए भविष्य की चुनौती बन सकता है। उत्तराखंड की राजनीति में इस बार छोटे दलों और नए राजनीतिक मंचों की सक्रियता भी टिकट की लड़ाई को प्रभावित कर सकती है। उत्तराखंड क्रांति दल का सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान, आम आदमी पार्टी की सक्रियता और निर्दलीय विधायक उमेश कुमार की नई पार्टी बनाने की घोषणा ने संभावित दावेदारों के सामने वैकल्पिक रास्तों की चर्चा को बढ़ाया है। भाजपा और कांग्रेस से टिकट न मिलने पर कुछ नेता इन मंचों की ओर रुख कर सकते हैं। ऐसे नेताओं के पास स्थानीय पहचान और व्यक्तिगत समर्थकों का आधार हो तो वह मुकाबले को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, बड़े दल से निकलना और नए दल के टिकट पर जीत हासिल करना अलग-अलग चुनौतियां हैं। किसी नेता का व्यक्तिगत प्रभाव हर राजनीतिक मंच पर समान रूप से काम करेगा, इसकी गारंटी नहीं है। नई पीढ़ी की बढ़ती दावेदारी राजनीतिक दलों के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा करती हैकृक्या युवाओं को नेतृत्व में वास्तविक हिस्सेदारी मिलेगी या उन्हें केवल चुनावी नारों में जगह दी जाएगी? युवा होना अपने आप में जीत की गारंटी नहीं है, लेकिन अनुभव के नाम पर नए चेहरों के लिए रास्ते बंद कर देना भी राजनीतिक जड़ता को बढ़ा सकता है। राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चुनते समय उम्र से अधिक जनाधार, काम, संगठनात्मक क्षमता और जनता के बीच विश्वसनीयता को महत्व देना होगा। नई पीढ़ी के दावेदारों को भी यह साबित करना होगा कि उनकी महत्वाकांक्षा केवल विधानसभा पहुंचने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके पास क्षेत्र की समस्याओं का ठोस समाधान भी है। 2027 के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को विपक्षी दलों से मुकाबला करने से पहले अपने भीतर के असंतोष से निपटना होगा। भाजपा के लिए सत्ता में वापसी की रणनीति को टिकट वितरण के साथ संतुलित करना चुनौती होगी, जबकि कांग्रेस के लिए गुटीय प्रतिस्पर्धा के बीच एकजुटता बनाए रखना जरूरी होगा। छोटे दलों के सामने असंतुष्ट नेताओं की ताकत को अपने पक्ष में बदलने का अवसर होगा, लेकिन इसके लिए उन्हें संगठन और जनाधार भी खड़ा करना पड़ेगा।

सियासी शोर में दबे ‘पहाड़’ के सवाल

रोजगार-पलायन तक सरकार के सामने सवालों की कतार सियासी तपिश के बीच बुनियादी सवालों पर लोगों की आस राजनीतिक शोर के बीच जनता की मूलभूत समस्याएं खड़ी गैरसैंण। उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण में विधानसभा का सत्र शुरू हो चुका है। सदन में अनुपूरक बजट, विधायी कार्यवाही और सत्ता-विपक्ष के बीच सियासी टकराव है। सदन के बाहर भी प्रदर्शन और विरोध की राजनीति गरमा रही है। लेकिन इस राजनीतिक शोर के बीच पहाड़ की जनता के सवाल अपनी जगह खड़े हैं। बेरोजगारी से जूझते युवा रोजगार मांग रहे हैं, गांव पलायन की मार झेल रहे हैं, मरीज बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के इंतजार में हैं और दूरस्थ क्षेत्रों के लोग सड़क, पेयजल तथा संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं। ऐसे में विधानसभा के इस सत्र की सबसे बड़ी कसौटी यही है कि भराड़ीसैंण में कितनी राजनीतिक गर्मी पैदा हुई, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि यहां से जनता के जीवन में बदलाव लाने वाले कितने फैसले निकले। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड ने विकास के कई पड़ाव पार किए हैं, लेकिन पहाड़ की मूल समस्याओं का पूरी तरह समाधान अब भी चुनौती बना हुआ है। जिस अलग राज्य की कल्पना रोजगार, बेहतर सुविधाओं और क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के संकल्प के साथ की गई थी, उसकी कसौटी आज भी गांवों की स्थिति और युवाओं के भविष्य से तय होती है। भराड़ीसैंण में बैठने वाली सरकार से अपेक्षा भी यही है कि वह पर्वतीय क्षेत्रों की जरूरतों को प्राथमिकता दे। ऐसे में सत्र केवल विधेयकों को पारित करने और बजट की औपचारिकताएं पूरी करने तक सीमित नहीं रह सकता। सरकार ने लगभग 7412 करोड़ रुपये के अनुपूरक बजट को मंजूरी दी है। अब सवाल यह है कि अतिरिक्त धनराशि से प्रदेश की किन जरूरतों को पूरा किया जाएगा और इसका लाभ आम जनता तक कैसे पहुंचेगा। बजट का आकार सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं का संकेत देता है, लेकिन विकास की वास्तविक तस्वीर आवंटित धन के इस्तेमाल और उससे मिलने वाले परिणामों से बनती है। प्रदेश में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और रोजगार जैसे क्षेत्रों में जरूरतें व्यापक हैं। दूरस्थ पर्वतीय इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता, विद्यालयों में शिक्षकों की तैनाती और गांवों तक नियमित परिवहन जैसी समस्याएं लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं। ऐसे में जनता यह जानना चाहेगी कि अनुपूरक बजट से इन क्षेत्रों में कितनी राहत मिलेगी, कौन-सी योजनाएं प्राथमिकता पर पूरी होंगी और उनके क्रियान्वयन की समयसीमा क्या होगी। सरकार के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि बजट केवल सरकारी खातों में दर्ज अतिरिक्त प्रावधान नहीं, बल्कि विकास कार्यों को गति देने का माध्यम बनेगा। योजनाओं के लिए धन उपलब्ध कराने के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उसका समय पर और प्रभावी उपयोग हो। उत्तराखंड में बेरोजगारी ऐसा मुद्दा है, जिसे चुनावी बहस से अलग नहीं रखा जा सकता। सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे युवाओं की अपेक्षाएं, भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और निजी क्षेत्र में सीमित अवसर रोजगार के सवाल को लगातार प्रासंगिक बनाए हुए हैं। चुनाव से पहले सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाएगी और विपक्ष कमियों को सामने रखेगा, लेकिन युवाओं के लिए असली सवाल अवसरों का है। कितने युवाओं को स्थायी रोजगार मिला, कौशल प्रशिक्षण के बाद कितनों को काम मिला और स्वरोजगार की योजनाओं से कितने उद्यम स्थापित हुएकृइन सवालों के जवाब जरूरी हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यटन, बागवानी, कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण और डिजिटल सेवाओं के जरिए स्थानीय रोजगार बढ़ाने की संभावनाएं हैं। इसके लिए प्रशिक्षण के साथ बाजार, पूंजी और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी। युवाओं को केवल सरकारी नौकरी की प्रतीक्षा में रहने के लिए छोड़ देना समाधान नहीं है। सरकार को ऐसे अवसर विकसित करने होंगे, जिनसे युवा अपने ही क्षेत्र में सम्मानजनक आजीविका हासिल कर सकें। पलायन उत्तराखंड के विकास मॉडल के सामने सबसे गंभीर सवालों में से एक है। गांवों से लोगों का बाहर जाना केवल रोजगार की कमी का परिणाम नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और बाजार जैसी सुविधाओं की अनुपलब्धता से भी जुड़ा है। जब गांव में बच्चों की पढ़ाई और परिवार के उपचार की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती, तब बेहतर भविष्य की तलाश में शहरों की ओर जाना मजबूरी बन जाता है। ऐसे में पलायन रोकने की नीति को केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने, कृषि और बागवानी को बाजार से जोड़ने, छोटे उद्यमों को प्रोत्साहन देने तथा पर्यटन से स्थानीय परिवारों की आय बढ़ाने की जरूरत है। सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि अब तक घोषित योजनाओं से कितने गांवों में आजीविका के अवसर बढ़े और उनके परिणामों का आकलन किस आधार पर किया जा रहा है। भराड़ीसैंण के सत्र में इन सवालों पर गंभीर चर्चा और ठोस निर्णय पहाड़ की जनता के भरोसे को मजबूत कर सकते हैं। सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव स्वाभाविक है। सरकार का दायित्व अपनी नीतियों और योजनाओं का हिसाब देना है, जबकि विपक्ष की जिम्मेदारी जनता से जुड़े मुद्दों पर जवाब मांगना है। लेकिन लोकतंत्र में दोनों की भूमिका केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं हो सकती। यदि विपक्ष सदन में बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा के सवाल उठाता है तो उसे तथ्यों के साथ सरकार को जवाबदेह बनाने की कोशिश करनी चाहिए। वहीं सरकार को भी राजनीतिक आलोचना का जवाब केवल उपलब्धियों की सूची से नहीं, बल्कि स्पष्ट आंकड़ों और योजनाओं की प्रगति से देना होगा। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन उसका परिणाम जनता की समस्याओं के समाधान के रूप में सामने आना चाहिए। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह सत्र राजनीतिक दलों के लिए अपनी प्राथमिकताएं सामने रखने का अवसर भी है। सत्ता पक्ष के लिए विकास कार्यों का हिसाब देने और विपक्ष के लिए जनता की समस्याओं को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की चुनौती है। लेकिन मतदाता अंततः यह देखेगा कि उसके जीवन में कितना बदलाव आया।

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

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udaydinmaan: भराड़ीसैंण में सत्र: सदन से सड़क तक सियासी संग्राम

udaydinmaan: भराड़ीसैंण में सत्र: सदन से सड़क तक सियासी संग्राम: विधानसभा के घेराव को निकले गोदियाल-माहरा बैरियर पर रोके, धरने पर बैठे कांग्रेसी विधानसभा सत्र शुरू होते ही प्रधान संगठन और यूकेडी ने भी खोला...

भराड़ीसैंण में सत्र: सदन से सड़क तक सियासी संग्राम

विधानसभा के घेराव को निकले गोदियाल-माहरा बैरियर पर रोके, धरने पर बैठे कांग्रेसी विधानसभा सत्र शुरू होते ही प्रधान संगठन और यूकेडी ने भी खोला सरकार के खिलाफ मोर्चा दो दिवसीय सत्र पर लोगों ने किया तंज, बोले-सियासी पिकनिक से नहीं होगा पहाड़ का भला गैरसैंण। उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण में विधानसभा सत्र शुरू होते ही सियासत गरमा गई। सदन के भीतर सरकार के सामने विधायी कामकाज और बजट से जुड़ी चुनौतियां हैं, तो बाहर विपक्ष ने विरोध का मोर्चा खोल दिया। विधानसभा घेराव के लिए भराड़ीसैंण कूच कर रहे कांग्रेसियों को पुलिस ने बैरियर पर रोक दिया। इससे नाराज कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा कार्यकर्ताओं के साथ धरने पर बैठ गए। उधर, मुख्य मार्ग पर प्रधान संगठन और उत्तराखंड क्रांति दल ने भी प्रदर्शन कर सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं। सत्र के पहले ही दिन विरोध के इन स्वरों ने सरकार को राजनीतिक रूप से असहज कर दिया। विधानसभा घेराव के लिए आगे बढ़ रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर बैरियर पर रोक दिया। आगे बढ़ने की अनुमति नहीं मिलने पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने वहीं धरना शुरू कर दिया। गोदियाल और माहरा के धरने पर बैठने से विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक धार मिली। कांग्रेस ने सड़क पर उतरकर साफ संकेत दिया कि वह विधानसभा सत्र को सरकार के खिलाफ जनहित के मुद्दे उठाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है। विपक्ष के लिए यह सत्र इसलिए भी अहम है, क्योंकि विधानसभा चुनाव से पहले सरकार के कामकाज को जनता के बीच मुद्दा बनाने की कोशिश तेज हो रही है। बेरोजगारी, पलायन, भ्रष्टाचार और बुनियादी सुविधाओं जैसे सवालों पर सरकार को घेरने की रणनीति के बीच कांग्रेस का घेराव कार्यक्रम राजनीतिक दबाव बनाने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इन मुद्दों पर सरकार का पक्ष और सत्र में होने वाली चर्चा ही तय करेगी कि विपक्ष अपने अभियान को कितना प्रभावी बना पाता है। विधानसभा सत्र के पहले दिन मुख्य मार्ग पर प्रधान संगठन और उत्तराखंड क्रांति दल के प्रदर्शन ने भी माहौल को गरमा दिया। अलग-अलग संगठनों के सड़क पर उतरने से सरकार के सामने विरोध के कई मोर्चे खुल गए। इन प्रदर्शनों ने क्षेत्रीय मांगों और पहाड़ की समस्याओं को लेकर जारी असंतोष को भी सामने रखा। भराड़ीसैंण में राजनीतिक गतिविधियों के बीच अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है। विधानसभा के दो दिवसीय सत्र को लेकर गैरसैंण क्षेत्र के स्थानीय लोगों ने भी सवाल खड़े किए। कुछ लोगों ने सत्र को सियासी पिकनिक करार देते हुए कहा कि इतने कम समय की कार्यवाही से पहाड़ की समस्याओं का समाधान कैसे होगा। उन्होंने सत्र पर होने वाले खर्च और बजट के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए। स्थानीय लोगों की नाराजगी ने गैरसैंण में विधानसभा सत्र आयोजित करने के उद्देश्य और उसके वास्तविक लाभ को लेकर बहस तेज कर दी है। गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा मिलने के बाद से ही यहां विधानसभा सत्रों को पहाड़ की आकांक्षाओं और विकास की उम्मीदों से जोड़कर देखा जाता रहा है। स्थानीय लोगों की अपेक्षा है कि राजधानी में होने वाली बैठकों का लाभ केवल औपचारिक आयोजनों तक सीमित न रहे, बल्कि रोजगार, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं के रूप में दिखाई दे। ऐसे में सत्र की अवधि से लेकर उसके नतीजों तक पर उठते सवाल सरकार के लिए अहम हैं। बाक्स दो दिन की कार्यवाही, जवाबदेही की परीक्षा भराड़ीसैंण में सत्र शुरू होते ही सरकार को सदन के भीतर विपक्षी सवालों और बाहर विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस का घेराव, प्रधान संगठन और यूकेडी का प्रदर्शन तथा स्थानीय लोगों की नाराजगी ने सत्र का राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। अब असली कसौटी यह होगी कि दो दिन की कार्यवाही में जनहित के मुद्दों पर कितनी ठोस चर्चा होती है और सरकार पहाड़ की अपेक्षाओं को लेकर क्या निर्णय सामने रखती है। सवाल केवल विधानसभा सत्र आयोजित करने का नहीं, बल्कि यह साबित करने का है कि भराड़ीसैंण में होने वाली कार्यवाही पहाड़ की जमीन पर कितना बदलाव ला पाती है।

गैरसैंण में विधायक का ‘विस्फोट’

निर्दलीय विधायक ने विधानसभा सत्र के बीच फेंका सियासी पासा इस्तीफे की घोषणा से सत्ता व विपक्ष दोनों के गलियारों में हलचल निर्दलीय विधायक के एलान से उत्तराखंड की राजनीति में खलबली गैरसैंण। उत्तराखंड की राजनीति में मंगलवार को उस वक्त अचानक उबाल आ गया, जब खानपुर से निर्दलीय विधायक उमेश कुमार ने बुधवार को विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने का एलान कर दिया। गैरसैंण में विधानसभा सत्र के बीच आए इस ऐलान ने प्रदेश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। उमेश कुमार ने इस्तीफे का एलान कर राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस फैसले के पीछे उनका असल मकसद क्या है? यह महज एक विधायक के इस्तीफे की घोषणा है या उत्तराखंड की राजनीति में किसी बड़े घटनाक्रम की पटकथा? उमेश कुमार के इस कदम ने सवालों का ऐसा सिलसिला खड़ा कर दिया है, जिसके जवाब अब बुधवार को उनके अगले कदम और आधिकारिक रुख से मिलने की उम्मीद है। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। बता दें कि गैरसैंण में विधानसभा सत्र चल रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने-अपने मुद्दों पर आमने-सामने हैं। सोशल मीडिया पर चल रही खबरों के अनुसार इसी राजनीतिक माहौल में उमेश कुमार का इस्तीफे का एलान सुर्खियों में आ गया। निर्दलीय विधायक के इस फैसले ने राजनीतिक दलों के सामने भी सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या उमेश कुमार किसी मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराना चाहते हैं, क्या वह सरकार को कोई राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं या फिर इसके पीछे उनकी अपनी सियासी रणनीति है? अभी इन सवालों पर तस्वीर साफ नहीं है। उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक जमीन तैयार होने लगी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने चुनावी समीकरण मजबूत करने में जुटी हैं। ऐसे समय में खानपुर के विधायक का विधानसभा की सदस्यता छोड़ने का एलान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। उमेश कुमार का अगला कदम उनके क्षेत्रीय प्रभाव और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर नई चर्चा छेड़ सकता है। हालांकि, उनके इस्तीफे को किसी नए राजनीतिक दल, गठबंधन या चुनावी रणनीति से जोड़ने के लिए अभी पर्याप्त आधार नहीं है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि उन्होंने इस्तीफे की घोषणा कर प्रदेश की राजनीति में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। उमेश कुमार ने इस्तीफा देने का एलान किया है, लेकिन घोषणा और औपचारिक इस्तीफे के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। अब देखना होगा कि वह बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफा सौंपते हैं या अपने फैसले के साथ कोई विस्तृत राजनीतिक संदेश भी देते हैं। उमेश कुमार ने इस्तीफे का एलान कर सियासी गेंद मैदान में डाल दी है। अब असली परीक्षा उनके अगले कदम की हैकृक्या यह किसी बड़े राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत है या ऐसा दांव, जिसके असली मायने आने वाले दिनों में खुलेंगे?

यूकेडी: संघर्ष, पहचान और वजूद की तलाश

उत्तराखंड की अलग पहचान की लड़ाई को घर-घर पहुंचाया खुद राजनीतिक जमीन तलाशने को मजबूर है प्रदेश में यूकेडी 2027 के चुनाव में अस्तित्व बचाने, विरासत लौटाने की चुनौती देहरादून। उत्तराखंड क्रांति दल की कहानी उत्तराखंड राज्य आंदोलन के संघर्ष, क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति, सत्ता की संभावनाओं और राजनीतिक विफलताओं की कहानी है। जिस दल ने अलग पहाड़ी राज्य की मांग को आंदोलन से जनभावना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वह राज्य बनने के बाद उसी जनभावना को स्थायी राजनीतिक ताकत में नहीं बदल पाया। कभी उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय विकल्प बनने की क्षमता रखने वाला यूकेडी आज भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटी सत्ता की राजनीति में अपनी जगह तलाश रहा है। अब 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सवाल यही है कि क्या यूकेडी अपनी खोई जमीन वापस हासिल कर पाएगा या राज्य आंदोलन की विरासत केवल उसकी राजनीतिक पहचान बनकर रह जाएगी? 25 जुलाई 1979 को स्थापित यूकेडी ने अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को संगठित राजनीतिक आवाज देने में अहम भूमिका निभाई। पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों, रोजगार, पलायन, संसाधनों पर स्थानीय अधिकार और लखनऊ में बैठे सत्ता प्रतिष्ठान की कथित उपेक्षा जैसे सवाल दल की राजनीति के केंद्र में रहे। डा. देवीदत्त पंत, काशी सिंह ऐरी और अन्य आंदोलनकारी नेताओं की अगुआई में दल ने पहाड़ की समस्याओं को अलग राज्य की मांग से जोड़ा। बाद के वर्षों में इंद्रमणि बडोनी और दिवाकर भट्ट जैसे नेताओं ने भी आंदोलन को व्यापक जनाधार देने में भूमिका निभाई। 1990 के दशक में अलग राज्य की मांग ने व्यापक जनांदोलन का रूप लिया। वर्ष 1994 के आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और रामपुर तिराहा कांड ने उत्तराखंड की राजनीति को निर्णायक मोड़ दिया। इस संघर्ष में यूकेडी की भूमिका महत्वपूर्ण रही, लेकिन आंदोलन केवल किसी एक दल का नहीं था। विभिन्न सामाजिक संगठनों, छात्र-युवा समूहों, महिला संगठनों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी ने इसे व्यापक जनआंदोलन बनाया। अंततः नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य बना। मगर जिस राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष किया गया, उसके गठन के बाद क्षेत्रीय राजनीति को मजबूत करने का अवसर यूकेडी के हाथ से निकलने लगा। अलग राज्य बनने के बाद यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती आंदोलनकारी संगठन से प्रभावशाली राजनीतिक दल बनने की थी। जनता को उम्मीद थी कि पहाड़ की समस्याओं, स्थानीय रोजगार, पलायन, गैरसैंण में राजधानी और संसाधनों पर स्थानीय अधिकार जैसे मुद्दों को लेकर खड़ा हुआ दल राज्य की नीतियों को दिशा देगा। लेकिन भाजपा और कांग्रेस की मजबूत चुनावी मशीनरी के सामने यूकेडी अपना स्वतंत्र जनाधार कायम नहीं रख पाया। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में यूकेडी को चार सीटें मिलीं। 2007 में दल के दो विधायक चुने गए और भाजपा को सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया। वर्ष 2012 में भी यूकेडी के विधायकों के समर्थन ने सरकार गठन के समीकरणों में भूमिका निभाई। लेकिन सत्ता के समीकरणों में भागीदारी क्षेत्रीय दल को मजबूत जनाधार में बदलने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुई। यहीं यूकेडी की राजनीति का विरोधाभास सामने आया। जिस दल की पहचान सत्ता प्रतिष्ठान से संघर्ष करने वाले संगठन की थी, वह धीरे-धीरे सरकार बनाने और बचाने के गणित में उलझता दिखाई दिया। सत्ता में हिस्सेदारी के बावजूद वह अपनी मूल मांगों को निर्णायक राजनीतिक एजेंडा नहीं बना पाया। नतीजा यह रहा कि राज्य आंदोलन की विरासत तो उसके पास रही, लेकिन उस विरासत का चुनावी लाभ दूसरी पार्टियां उठाती रहीं। यूकेडी की कमजोरी का एक बड़ा कारण आंतरिक मतभेद और गुटबाजी भी रही। नेतृत्व को लेकर विवाद, अलग-अलग राजनीतिक रास्ते अपनाने और संगठन में टूट ने दल की विश्वसनीयता को प्रभावित किया। राज्य की राजनीति में क्षेत्रीय विकल्प बनने के लिए जिस एकजुट नेतृत्व, मजबूत संगठन और स्पष्ट राजनीतिक दिशा की जरूरत थी, यूकेडी वहां बार-बार पिछड़ता रहा। राजनीतिक विश्लेषणों में भी गुटबाजी और भाजपा-कांग्रेस के साथ बदलते समीकरणों को दल के पतन के प्रमुख कारणों में गिना गया है। इसके साथ ही भाजपा और कांग्रेस ने राज्य आंदोलन से जुड़े मुद्दों को अपने राजनीतिक विमर्श में जगह दी। गैरसैंण, पलायन, स्थानीय रोजगार और पर्वतीय विकास जैसे सवालों पर दोनों राष्ट्रीय दलों ने अपने-अपने तरीके से राजनीतिक दावे किए। इससे यूकेडी के लिए अपनी विशिष्ट पहचान को चुनावी समर्थन में बदलना और कठिन होता गया। 2027 का विधानसभा चुनाव यूकेडी के लिए सामान्य चुनाव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगा। राज्य गठन के बाद एक चौथाई सदी से ज्यादा समय गुजर चुका है। नई पीढ़ी के मतदाताओं के लिए राज्य आंदोलन इतिहास का हिस्सा है, जबकि उनकी प्राथमिकताएं रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और बेहतर बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी हैं। यूकेडी को यह साबित करना होगा कि उसकी क्षेत्रीय राजनीति केवल अतीत के संघर्ष की याद नहीं, बल्कि वर्तमान समस्याओं का व्यावहारिक समाधान भी दे सकती है। दल के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, संगठन को गांवों और नगरों तक सक्रिय करना। दूसरी, युवा मतदाताओं के बीच विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प के रूप में अपनी पहचान बनाना। तीसरी, भाजपा और कांग्रेस से अलग स्पष्ट आर्थिक, सामाजिक और विकास संबंधी एजेंडा पेश करना। केवल क्षेत्रीय अस्मिता का नारा पर्याप्त नहीं होगा। उसे रोजगार, पलायन रोकने, कृषि-बागवानी, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार के सवालों पर ठोस कार्यक्रम देना होगा। गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का सवाल भी यूकेडी की राजनीतिक पहचान से जुड़ा है। लेकिन इस मुद्दे को केवल प्रतीकात्मक बहस तक सीमित रखने के बजाय पर्वतीय क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच, रोजगार और विकास के विकेंद्रीकरण से जोड़ना होगा। पहाड़ के गांव खाली हो रहे हों, युवा रोजगार के लिए बाहर जाने को मजबूर हों और स्वास्थ्य-शिक्षा की सुविधाओं के लिए लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़े, तो क्षेत्रीय दल की प्रासंगिकता उसके समाधान से ही तय होगी। यूकेडी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है कि जिस राज्य की मांग को उसने दशकों तक उठाया, उसी राज्य में वह मजबूत चुनावी शक्ति क्यों नहीं बन पाया। इसका उत्तर केवल भाजपा-कांग्रेस के प्रभाव में तलाशना पर्याप्त नहीं होगा। संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व के मतभेद, बदलते राजनीतिक समीकरण और आंदोलन के बाद स्पष्ट वैकल्पिक शासन माडल पेश करने में असफलता का भी ईमानदार मूल्यांकन करना होगा। उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय मुद्दे आज भी प्रासंगिक हैं। पलायन, स्थानीय रोजगार, जमीन और संसाधनों पर अधिकार तथा पर्वतीय क्षेत्रों में विकास का असंतुलन ऐसे सवाल हैं जिनका समाधान अब भी जनता की प्रमुख अपेक्षाओं में शामिल है। इसलिए यूकेडी के लिए संभावनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। लेकिन संभावनाओं को राजनीतिक ताकत में बदलने के लिए अतीत की उपलब्धियों का स्मरण करने से आगे बढ़ना होगा। राज्य आंदोलन ने यूकेडी को ऐतिहासिक पहचान दी, लेकिन उस पहचान को जनादेश में बदलना अब भी उसकी सबसे बड़ी परीक्षा है। 2027 में दल के सामने केवल सीटें जीतने का लक्ष्य नहीं, बल्कि यह साबित करने की चुनौती भी होगी कि उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति के लिए उसके पास आज भी एक विश्वसनीय और प्रासंगिक विकल्प मौजूद है। वरना जिस आंदोलन की आवाज कभी पहाड़ की राजनीतिक चेतना का प्रतीक थी, वही आवाज चुनावी राजनीति में और कमजोर पड़ सकती है।

सपनों के पहाड़ और सियासत के दावों की अधूरी उम्मीदें

25 साल में भाजपा और कांग्रेस का हिसाब, विकास की रफ्तार और वादों की कसौटी कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस के हाथ में सत्ता, फिर भी पहाड़ के मूल सवाल बरकरार 2027 के चुनाव से पहले दलों के सामने अपने कामकाज का हिसाब देने की चुनौती देहरादून। उत्तराखंड नौ नवंबर 2000 को अलग राज्य बना तो उम्मीद थी कि पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों, सामाजिक जरूरतों और स्थानीय आकांक्षाओं के अनुरूप विकास का नया माडल तैयार होगा। रोजगार के लिए पलायन रुकेगा, गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचेंगी, गैरसैंण को उसकी राजनीतिक पहचान मिलेगी और प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न प्रदेश के लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। लेकिन राज्य गठन के 26वें वर्ष में प्रवेश के साथ सवाल यह है कि भाजपा और कांग्रेस की सरकारों ने इन उम्मीदों को कितना पूरा किया? दोनों दलों को सत्ता में रहने के अवसर मिले, दोनों ने विकास के दावे किए, लेकिन पहाड़ की समस्याएं आज भी प्रदेश की राजनीति के केंद्र में हैं। उत्तराखंड के गठन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच श्रेय लेने की राजनीति लंबे समय से जारी है। भाजपा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के कार्यकाल में राज्य गठन को अपनी बड़ी उपलब्धि बताती है। वहीं, कांग्रेस राज्य आंदोलन में अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका तथा राज्य गठन से पहले और बाद में किए गए प्रयासों को सामने रखती है। हालांकि, उत्तराखंड का निर्माण किसी एक दल की राजनीतिक उपलब्धि भर नहीं था। इसके पीछे दशकों का संघर्ष, उत्तराखंड क्रांति दल की भूमिका, आंदोलनकारी संगठनों का योगदान और हजारों लोगों का त्याग था। राज्य गठन के राजनीतिक श्रेय से आगे बढ़कर असली सवाल यह है कि सत्ता में आने के बाद दोनों राष्ट्रीय दलों ने आंदोलन की मूल आकांक्षाओं को कितना महत्व दिया। राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 36 सीटें जीतकर सरकार बनाई। नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली सरकार ने औद्योगिक विकास को गति देने और प्रदेश में निवेश आकर्षित करने पर जोर दिया। हरिद्वार, देहरादून और ऊधमसिंह नगर के औद्योगिक क्षेत्रों में निवेश की संभावनाओं को विस्तार मिला। औद्योगिक गतिविधियों ने रोजगार और आर्थिक विकास के नए अवसर पैदा किए। तिवारी सरकार का कार्यकाल इसलिए भी उल्लेखनीय रहा कि वह प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने अपना पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा किया। लेकिन औद्योगिक विकास की चमक पहाड़ के दूरस्थ गांवों तक समान रूप से नहीं पहुंच सकी। मैदानी क्षेत्रों में उद्योगों के विस्तार के मुकाबले पर्वतीय जिलों में रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करना चुनौती बना रहा। यही असंतुलन आगे चलकर पलायन और क्षेत्रीय विकास की बहस का प्रमुख मुद्दा बना। कांग्रेस को यह जवाब देना होगा कि उसके शासनकाल में शुरू हुई विकास की प्रक्रिया को पहाड़ी अर्थव्यवस्था, कृषि, बागवानी और स्थानीय रोजगार से जोड़ने के लिए पर्याप्त प्रयास क्यों नहीं हो सके। वर्ष 2012 में कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी। विजय बहुगुणा के बाद हरीश रावत ने मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान राजनीतिक अस्थिरता, वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद पुनर्निर्माण और वर्ष 2016 के राजनीतिक संकट ने सरकार को लगातार चुनौती दी। आपदा प्रभावित क्षेत्रों का पुनर्वास और चारधाम यात्रा व्यवस्था का पुनर्गठन महत्वपूर्ण विषय रहे। मगर सरकार की उपलब्धियों के साथ नेतृत्व संबंधी विवाद और राजनीतिक अस्थिरता भी कांग्रेस की छवि पर असर डालते रहे। भाजपा ने वर्ष 2007 में सरकार बनाई। बीसी खंडूड़ी और रमेश पोखरियाल निशंक के नेतृत्व में सड़क, आधारभूत ढांचे और प्रशासनिक सुधारों को लेकर कई घोषणाएं हुईं। हालांकि, मुख्यमंत्री बदलने की राजनीति ने सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़े किए। वर्ष 2012 के चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। वर्ष 2017 में भाजपा ने 70 सदस्यीय विधानसभा में 57 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया। इसके बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार चली। वर्ष 2022 में भाजपा ने 47 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाने का इतिहास रचा। इस दौरान सड़क और राजमार्ग परियोजनाओं, चारधाम यात्रा से जुड़े बुनियादी ढांचे, पर्यटन, धार्मिक स्थलों के विकास और निवेश आकर्षित करने पर विशेष जोर दिया गया। धामी सरकार ने समान नागरिक संहिता लागू करने, भर्ती परीक्षाओं में नकल के विरुद्ध सख्त कानून बनाने और महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में क्षैतिज आरक्षण जैसे कदमों को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया है। सरकार का दावा है कि इन फैसलों से सुशासन, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार व्यवस्था को मजबूती मिली है। लेकिन भाजपा के सामने भी कई सवाल हैं। बड़े बुनियादी ढांचा प्रकल्पों और पर्यटन विस्तार के बीच पर्वतीय गांवों में स्थायी रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पलायन की समस्या का समाधान कितना हुआ? भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर युवाओं में पैदा हुए असंतोष ने सरकार की परीक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। इसके अलावा भू-कानून, जमीन की खरीद, पर्यावरणीय संतुलन और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे भी सरकार से ठोस जवाब मांगते हैं। भाजपा और कांग्रेस के शासनकाल की तुलना करते समय यह भी देखना होगा कि राज्य की अर्थव्यवस्था में विस्तार हुआ है और बुनियादी सुविधाओं का दायरा बढ़ा है, लेकिन विकास का लाभ सभी क्षेत्रों और वर्गों तक समान रूप से पहुंचाना अब भी चुनौती है। उद्योग, पर्यटन और निर्माण गतिविधियों से आर्थिक अवसर बढ़े हैं, मगर पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार का स्थायी आधार तैयार करना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में संस्थानों की मौजूदगी के साथ उनकी गुणवत्ता, विशेषज्ञों की उपलब्धता और दूरस्थ गांवों तक पहुंच का सवाल भी बना हुआ है। पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि प्रदेश की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना से जुड़ा प्रश्न है। गांवों से युवाओं का बाहर जाना खेती, स्थानीय बाजारों, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक जीवन को प्रभावित करता है। दोनों दलों ने पलायन रोकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की घोषणाएं की हैं, लेकिन जनता के सामने कसौटी घोषणाएं नहीं, परिणाम हैं। उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि भाजपा और कांग्रेस सत्ता के लिए बारी-बारी से जनादेश हासिल करती रही हैं, लेकिन राज्य आंदोलन के कई मूल सवाल आज भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। भाजपा के पास लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने और बड़े नीतिगत फैसलों का दावा है, तो कांग्रेस के पास अपने शासनकाल के औद्योगिक विस्तार और कल्याणकारी प्रयासों का पक्ष रखने का अवसर है। लेकिन किसी भी दल को केवल अपने दावों के आधार पर सफलता का प्रमाणपत्र नहीं मिल सकता।