बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: न यूकेडी चली, न बसपा का दांव, न आप का ‘माडल’

udaydinmaan: न यूकेडी चली, न बसपा का दांव, न आप का ‘माडल’: उत्तराखंड में तीसरे विकल्प के बीच आंदोलन की जमीन पर दो दलों का कब्जा राज्य बना, सरकारें बदलीं, लेकिन सत्ता की चाबी नहीं, यूकेडी में होती रह...

udaydinmaan: सपनों के पहाड़ और सियासत के दावों की अधूरी उम्मीदें

udaydinmaan: सपनों के पहाड़ और सियासत के दावों की अधूरी उम्मीदें: 25 साल में भाजपा और कांग्रेस का हिसाब, विकास की रफ्तार और वादों की कसौटी कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस के हाथ में सत्ता, फिर भी पहाड़ के मूल सवा...

udaydinmaan: यूकेडी: संघर्ष, पहचान और वजूद की तलाश

udaydinmaan: यूकेडी: संघर्ष, पहचान और वजूद की तलाश: उत्तराखंड की अलग पहचान की लड़ाई को घर-घर पहुंचाया खुद राजनीतिक जमीन तलाशने को मजबूर है प्रदेश में यूकेडी 2027 के चुनाव में अस्तित्व बचाने, व...

udaydinmaan: भराड़ीसैंण में सत्र: सदन से सड़क तक सियासी संग्राम

udaydinmaan: भराड़ीसैंण में सत्र: सदन से सड़क तक सियासी संग्राम: विधानसभा के घेराव को निकले गोदियाल-माहरा बैरियर पर रोके, धरने पर बैठे कांग्रेसी विधानसभा सत्र शुरू होते ही प्रधान संगठन और यूकेडी ने भी खोला...

भराड़ीसैंण में सत्र: सदन से सड़क तक सियासी संग्राम

विधानसभा के घेराव को निकले गोदियाल-माहरा बैरियर पर रोके, धरने पर बैठे कांग्रेसी विधानसभा सत्र शुरू होते ही प्रधान संगठन और यूकेडी ने भी खोला सरकार के खिलाफ मोर्चा दो दिवसीय सत्र पर लोगों ने किया तंज, बोले-सियासी पिकनिक से नहीं होगा पहाड़ का भला गैरसैंण। उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण में विधानसभा सत्र शुरू होते ही सियासत गरमा गई। सदन के भीतर सरकार के सामने विधायी कामकाज और बजट से जुड़ी चुनौतियां हैं, तो बाहर विपक्ष ने विरोध का मोर्चा खोल दिया। विधानसभा घेराव के लिए भराड़ीसैंण कूच कर रहे कांग्रेसियों को पुलिस ने बैरियर पर रोक दिया। इससे नाराज कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा कार्यकर्ताओं के साथ धरने पर बैठ गए। उधर, मुख्य मार्ग पर प्रधान संगठन और उत्तराखंड क्रांति दल ने भी प्रदर्शन कर सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं। सत्र के पहले ही दिन विरोध के इन स्वरों ने सरकार को राजनीतिक रूप से असहज कर दिया। विधानसभा घेराव के लिए आगे बढ़ रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर बैरियर पर रोक दिया। आगे बढ़ने की अनुमति नहीं मिलने पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने वहीं धरना शुरू कर दिया। गोदियाल और माहरा के धरने पर बैठने से विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक धार मिली। कांग्रेस ने सड़क पर उतरकर साफ संकेत दिया कि वह विधानसभा सत्र को सरकार के खिलाफ जनहित के मुद्दे उठाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है। विपक्ष के लिए यह सत्र इसलिए भी अहम है, क्योंकि विधानसभा चुनाव से पहले सरकार के कामकाज को जनता के बीच मुद्दा बनाने की कोशिश तेज हो रही है। बेरोजगारी, पलायन, भ्रष्टाचार और बुनियादी सुविधाओं जैसे सवालों पर सरकार को घेरने की रणनीति के बीच कांग्रेस का घेराव कार्यक्रम राजनीतिक दबाव बनाने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इन मुद्दों पर सरकार का पक्ष और सत्र में होने वाली चर्चा ही तय करेगी कि विपक्ष अपने अभियान को कितना प्रभावी बना पाता है। विधानसभा सत्र के पहले दिन मुख्य मार्ग पर प्रधान संगठन और उत्तराखंड क्रांति दल के प्रदर्शन ने भी माहौल को गरमा दिया। अलग-अलग संगठनों के सड़क पर उतरने से सरकार के सामने विरोध के कई मोर्चे खुल गए। इन प्रदर्शनों ने क्षेत्रीय मांगों और पहाड़ की समस्याओं को लेकर जारी असंतोष को भी सामने रखा। भराड़ीसैंण में राजनीतिक गतिविधियों के बीच अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है। विधानसभा के दो दिवसीय सत्र को लेकर गैरसैंण क्षेत्र के स्थानीय लोगों ने भी सवाल खड़े किए। कुछ लोगों ने सत्र को सियासी पिकनिक करार देते हुए कहा कि इतने कम समय की कार्यवाही से पहाड़ की समस्याओं का समाधान कैसे होगा। उन्होंने सत्र पर होने वाले खर्च और बजट के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए। स्थानीय लोगों की नाराजगी ने गैरसैंण में विधानसभा सत्र आयोजित करने के उद्देश्य और उसके वास्तविक लाभ को लेकर बहस तेज कर दी है। गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा मिलने के बाद से ही यहां विधानसभा सत्रों को पहाड़ की आकांक्षाओं और विकास की उम्मीदों से जोड़कर देखा जाता रहा है। स्थानीय लोगों की अपेक्षा है कि राजधानी में होने वाली बैठकों का लाभ केवल औपचारिक आयोजनों तक सीमित न रहे, बल्कि रोजगार, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं के रूप में दिखाई दे। ऐसे में सत्र की अवधि से लेकर उसके नतीजों तक पर उठते सवाल सरकार के लिए अहम हैं। बाक्स दो दिन की कार्यवाही, जवाबदेही की परीक्षा भराड़ीसैंण में सत्र शुरू होते ही सरकार को सदन के भीतर विपक्षी सवालों और बाहर विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस का घेराव, प्रधान संगठन और यूकेडी का प्रदर्शन तथा स्थानीय लोगों की नाराजगी ने सत्र का राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। अब असली कसौटी यह होगी कि दो दिन की कार्यवाही में जनहित के मुद्दों पर कितनी ठोस चर्चा होती है और सरकार पहाड़ की अपेक्षाओं को लेकर क्या निर्णय सामने रखती है। सवाल केवल विधानसभा सत्र आयोजित करने का नहीं, बल्कि यह साबित करने का है कि भराड़ीसैंण में होने वाली कार्यवाही पहाड़ की जमीन पर कितना बदलाव ला पाती है।

गैरसैंण में विधायक का ‘विस्फोट’

निर्दलीय विधायक ने विधानसभा सत्र के बीच फेंका सियासी पासा इस्तीफे की घोषणा से सत्ता व विपक्ष दोनों के गलियारों में हलचल निर्दलीय विधायक के एलान से उत्तराखंड की राजनीति में खलबली गैरसैंण। उत्तराखंड की राजनीति में मंगलवार को उस वक्त अचानक उबाल आ गया, जब खानपुर से निर्दलीय विधायक उमेश कुमार ने बुधवार को विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने का एलान कर दिया। गैरसैंण में विधानसभा सत्र के बीच आए इस ऐलान ने प्रदेश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। उमेश कुमार ने इस्तीफे का एलान कर राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस फैसले के पीछे उनका असल मकसद क्या है? यह महज एक विधायक के इस्तीफे की घोषणा है या उत्तराखंड की राजनीति में किसी बड़े घटनाक्रम की पटकथा? उमेश कुमार के इस कदम ने सवालों का ऐसा सिलसिला खड़ा कर दिया है, जिसके जवाब अब बुधवार को उनके अगले कदम और आधिकारिक रुख से मिलने की उम्मीद है। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। बता दें कि गैरसैंण में विधानसभा सत्र चल रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने-अपने मुद्दों पर आमने-सामने हैं। सोशल मीडिया पर चल रही खबरों के अनुसार इसी राजनीतिक माहौल में उमेश कुमार का इस्तीफे का एलान सुर्खियों में आ गया। निर्दलीय विधायक के इस फैसले ने राजनीतिक दलों के सामने भी सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या उमेश कुमार किसी मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराना चाहते हैं, क्या वह सरकार को कोई राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं या फिर इसके पीछे उनकी अपनी सियासी रणनीति है? अभी इन सवालों पर तस्वीर साफ नहीं है। उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक जमीन तैयार होने लगी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने चुनावी समीकरण मजबूत करने में जुटी हैं। ऐसे समय में खानपुर के विधायक का विधानसभा की सदस्यता छोड़ने का एलान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। उमेश कुमार का अगला कदम उनके क्षेत्रीय प्रभाव और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर नई चर्चा छेड़ सकता है। हालांकि, उनके इस्तीफे को किसी नए राजनीतिक दल, गठबंधन या चुनावी रणनीति से जोड़ने के लिए अभी पर्याप्त आधार नहीं है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि उन्होंने इस्तीफे की घोषणा कर प्रदेश की राजनीति में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। उमेश कुमार ने इस्तीफा देने का एलान किया है, लेकिन घोषणा और औपचारिक इस्तीफे के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। अब देखना होगा कि वह बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफा सौंपते हैं या अपने फैसले के साथ कोई विस्तृत राजनीतिक संदेश भी देते हैं। उमेश कुमार ने इस्तीफे का एलान कर सियासी गेंद मैदान में डाल दी है। अब असली परीक्षा उनके अगले कदम की हैकृक्या यह किसी बड़े राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत है या ऐसा दांव, जिसके असली मायने आने वाले दिनों में खुलेंगे?

यूकेडी: संघर्ष, पहचान और वजूद की तलाश

उत्तराखंड की अलग पहचान की लड़ाई को घर-घर पहुंचाया खुद राजनीतिक जमीन तलाशने को मजबूर है प्रदेश में यूकेडी 2027 के चुनाव में अस्तित्व बचाने, विरासत लौटाने की चुनौती देहरादून। उत्तराखंड क्रांति दल की कहानी उत्तराखंड राज्य आंदोलन के संघर्ष, क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति, सत्ता की संभावनाओं और राजनीतिक विफलताओं की कहानी है। जिस दल ने अलग पहाड़ी राज्य की मांग को आंदोलन से जनभावना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वह राज्य बनने के बाद उसी जनभावना को स्थायी राजनीतिक ताकत में नहीं बदल पाया। कभी उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय विकल्प बनने की क्षमता रखने वाला यूकेडी आज भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटी सत्ता की राजनीति में अपनी जगह तलाश रहा है। अब 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सवाल यही है कि क्या यूकेडी अपनी खोई जमीन वापस हासिल कर पाएगा या राज्य आंदोलन की विरासत केवल उसकी राजनीतिक पहचान बनकर रह जाएगी? 25 जुलाई 1979 को स्थापित यूकेडी ने अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को संगठित राजनीतिक आवाज देने में अहम भूमिका निभाई। पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों, रोजगार, पलायन, संसाधनों पर स्थानीय अधिकार और लखनऊ में बैठे सत्ता प्रतिष्ठान की कथित उपेक्षा जैसे सवाल दल की राजनीति के केंद्र में रहे। डा. देवीदत्त पंत, काशी सिंह ऐरी और अन्य आंदोलनकारी नेताओं की अगुआई में दल ने पहाड़ की समस्याओं को अलग राज्य की मांग से जोड़ा। बाद के वर्षों में इंद्रमणि बडोनी और दिवाकर भट्ट जैसे नेताओं ने भी आंदोलन को व्यापक जनाधार देने में भूमिका निभाई। 1990 के दशक में अलग राज्य की मांग ने व्यापक जनांदोलन का रूप लिया। वर्ष 1994 के आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और रामपुर तिराहा कांड ने उत्तराखंड की राजनीति को निर्णायक मोड़ दिया। इस संघर्ष में यूकेडी की भूमिका महत्वपूर्ण रही, लेकिन आंदोलन केवल किसी एक दल का नहीं था। विभिन्न सामाजिक संगठनों, छात्र-युवा समूहों, महिला संगठनों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी ने इसे व्यापक जनआंदोलन बनाया। अंततः नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य बना। मगर जिस राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष किया गया, उसके गठन के बाद क्षेत्रीय राजनीति को मजबूत करने का अवसर यूकेडी के हाथ से निकलने लगा। अलग राज्य बनने के बाद यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती आंदोलनकारी संगठन से प्रभावशाली राजनीतिक दल बनने की थी। जनता को उम्मीद थी कि पहाड़ की समस्याओं, स्थानीय रोजगार, पलायन, गैरसैंण में राजधानी और संसाधनों पर स्थानीय अधिकार जैसे मुद्दों को लेकर खड़ा हुआ दल राज्य की नीतियों को दिशा देगा। लेकिन भाजपा और कांग्रेस की मजबूत चुनावी मशीनरी के सामने यूकेडी अपना स्वतंत्र जनाधार कायम नहीं रख पाया। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में यूकेडी को चार सीटें मिलीं। 2007 में दल के दो विधायक चुने गए और भाजपा को सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया। वर्ष 2012 में भी यूकेडी के विधायकों के समर्थन ने सरकार गठन के समीकरणों में भूमिका निभाई। लेकिन सत्ता के समीकरणों में भागीदारी क्षेत्रीय दल को मजबूत जनाधार में बदलने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुई। यहीं यूकेडी की राजनीति का विरोधाभास सामने आया। जिस दल की पहचान सत्ता प्रतिष्ठान से संघर्ष करने वाले संगठन की थी, वह धीरे-धीरे सरकार बनाने और बचाने के गणित में उलझता दिखाई दिया। सत्ता में हिस्सेदारी के बावजूद वह अपनी मूल मांगों को निर्णायक राजनीतिक एजेंडा नहीं बना पाया। नतीजा यह रहा कि राज्य आंदोलन की विरासत तो उसके पास रही, लेकिन उस विरासत का चुनावी लाभ दूसरी पार्टियां उठाती रहीं। यूकेडी की कमजोरी का एक बड़ा कारण आंतरिक मतभेद और गुटबाजी भी रही। नेतृत्व को लेकर विवाद, अलग-अलग राजनीतिक रास्ते अपनाने और संगठन में टूट ने दल की विश्वसनीयता को प्रभावित किया। राज्य की राजनीति में क्षेत्रीय विकल्प बनने के लिए जिस एकजुट नेतृत्व, मजबूत संगठन और स्पष्ट राजनीतिक दिशा की जरूरत थी, यूकेडी वहां बार-बार पिछड़ता रहा। राजनीतिक विश्लेषणों में भी गुटबाजी और भाजपा-कांग्रेस के साथ बदलते समीकरणों को दल के पतन के प्रमुख कारणों में गिना गया है। इसके साथ ही भाजपा और कांग्रेस ने राज्य आंदोलन से जुड़े मुद्दों को अपने राजनीतिक विमर्श में जगह दी। गैरसैंण, पलायन, स्थानीय रोजगार और पर्वतीय विकास जैसे सवालों पर दोनों राष्ट्रीय दलों ने अपने-अपने तरीके से राजनीतिक दावे किए। इससे यूकेडी के लिए अपनी विशिष्ट पहचान को चुनावी समर्थन में बदलना और कठिन होता गया। 2027 का विधानसभा चुनाव यूकेडी के लिए सामान्य चुनाव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगा। राज्य गठन के बाद एक चौथाई सदी से ज्यादा समय गुजर चुका है। नई पीढ़ी के मतदाताओं के लिए राज्य आंदोलन इतिहास का हिस्सा है, जबकि उनकी प्राथमिकताएं रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और बेहतर बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी हैं। यूकेडी को यह साबित करना होगा कि उसकी क्षेत्रीय राजनीति केवल अतीत के संघर्ष की याद नहीं, बल्कि वर्तमान समस्याओं का व्यावहारिक समाधान भी दे सकती है। दल के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, संगठन को गांवों और नगरों तक सक्रिय करना। दूसरी, युवा मतदाताओं के बीच विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प के रूप में अपनी पहचान बनाना। तीसरी, भाजपा और कांग्रेस से अलग स्पष्ट आर्थिक, सामाजिक और विकास संबंधी एजेंडा पेश करना। केवल क्षेत्रीय अस्मिता का नारा पर्याप्त नहीं होगा। उसे रोजगार, पलायन रोकने, कृषि-बागवानी, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार के सवालों पर ठोस कार्यक्रम देना होगा। गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का सवाल भी यूकेडी की राजनीतिक पहचान से जुड़ा है। लेकिन इस मुद्दे को केवल प्रतीकात्मक बहस तक सीमित रखने के बजाय पर्वतीय क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच, रोजगार और विकास के विकेंद्रीकरण से जोड़ना होगा। पहाड़ के गांव खाली हो रहे हों, युवा रोजगार के लिए बाहर जाने को मजबूर हों और स्वास्थ्य-शिक्षा की सुविधाओं के लिए लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़े, तो क्षेत्रीय दल की प्रासंगिकता उसके समाधान से ही तय होगी। यूकेडी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है कि जिस राज्य की मांग को उसने दशकों तक उठाया, उसी राज्य में वह मजबूत चुनावी शक्ति क्यों नहीं बन पाया। इसका उत्तर केवल भाजपा-कांग्रेस के प्रभाव में तलाशना पर्याप्त नहीं होगा। संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व के मतभेद, बदलते राजनीतिक समीकरण और आंदोलन के बाद स्पष्ट वैकल्पिक शासन माडल पेश करने में असफलता का भी ईमानदार मूल्यांकन करना होगा। उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय मुद्दे आज भी प्रासंगिक हैं। पलायन, स्थानीय रोजगार, जमीन और संसाधनों पर अधिकार तथा पर्वतीय क्षेत्रों में विकास का असंतुलन ऐसे सवाल हैं जिनका समाधान अब भी जनता की प्रमुख अपेक्षाओं में शामिल है। इसलिए यूकेडी के लिए संभावनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। लेकिन संभावनाओं को राजनीतिक ताकत में बदलने के लिए अतीत की उपलब्धियों का स्मरण करने से आगे बढ़ना होगा। राज्य आंदोलन ने यूकेडी को ऐतिहासिक पहचान दी, लेकिन उस पहचान को जनादेश में बदलना अब भी उसकी सबसे बड़ी परीक्षा है। 2027 में दल के सामने केवल सीटें जीतने का लक्ष्य नहीं, बल्कि यह साबित करने की चुनौती भी होगी कि उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति के लिए उसके पास आज भी एक विश्वसनीय और प्रासंगिक विकल्प मौजूद है। वरना जिस आंदोलन की आवाज कभी पहाड़ की राजनीतिक चेतना का प्रतीक थी, वही आवाज चुनावी राजनीति में और कमजोर पड़ सकती है।

सपनों के पहाड़ और सियासत के दावों की अधूरी उम्मीदें

25 साल में भाजपा और कांग्रेस का हिसाब, विकास की रफ्तार और वादों की कसौटी कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस के हाथ में सत्ता, फिर भी पहाड़ के मूल सवाल बरकरार 2027 के चुनाव से पहले दलों के सामने अपने कामकाज का हिसाब देने की चुनौती देहरादून। उत्तराखंड नौ नवंबर 2000 को अलग राज्य बना तो उम्मीद थी कि पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों, सामाजिक जरूरतों और स्थानीय आकांक्षाओं के अनुरूप विकास का नया माडल तैयार होगा। रोजगार के लिए पलायन रुकेगा, गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचेंगी, गैरसैंण को उसकी राजनीतिक पहचान मिलेगी और प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न प्रदेश के लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। लेकिन राज्य गठन के 26वें वर्ष में प्रवेश के साथ सवाल यह है कि भाजपा और कांग्रेस की सरकारों ने इन उम्मीदों को कितना पूरा किया? दोनों दलों को सत्ता में रहने के अवसर मिले, दोनों ने विकास के दावे किए, लेकिन पहाड़ की समस्याएं आज भी प्रदेश की राजनीति के केंद्र में हैं। उत्तराखंड के गठन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच श्रेय लेने की राजनीति लंबे समय से जारी है। भाजपा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के कार्यकाल में राज्य गठन को अपनी बड़ी उपलब्धि बताती है। वहीं, कांग्रेस राज्य आंदोलन में अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका तथा राज्य गठन से पहले और बाद में किए गए प्रयासों को सामने रखती है। हालांकि, उत्तराखंड का निर्माण किसी एक दल की राजनीतिक उपलब्धि भर नहीं था। इसके पीछे दशकों का संघर्ष, उत्तराखंड क्रांति दल की भूमिका, आंदोलनकारी संगठनों का योगदान और हजारों लोगों का त्याग था। राज्य गठन के राजनीतिक श्रेय से आगे बढ़कर असली सवाल यह है कि सत्ता में आने के बाद दोनों राष्ट्रीय दलों ने आंदोलन की मूल आकांक्षाओं को कितना महत्व दिया। राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 36 सीटें जीतकर सरकार बनाई। नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली सरकार ने औद्योगिक विकास को गति देने और प्रदेश में निवेश आकर्षित करने पर जोर दिया। हरिद्वार, देहरादून और ऊधमसिंह नगर के औद्योगिक क्षेत्रों में निवेश की संभावनाओं को विस्तार मिला। औद्योगिक गतिविधियों ने रोजगार और आर्थिक विकास के नए अवसर पैदा किए। तिवारी सरकार का कार्यकाल इसलिए भी उल्लेखनीय रहा कि वह प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने अपना पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा किया। लेकिन औद्योगिक विकास की चमक पहाड़ के दूरस्थ गांवों तक समान रूप से नहीं पहुंच सकी। मैदानी क्षेत्रों में उद्योगों के विस्तार के मुकाबले पर्वतीय जिलों में रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करना चुनौती बना रहा। यही असंतुलन आगे चलकर पलायन और क्षेत्रीय विकास की बहस का प्रमुख मुद्दा बना। कांग्रेस को यह जवाब देना होगा कि उसके शासनकाल में शुरू हुई विकास की प्रक्रिया को पहाड़ी अर्थव्यवस्था, कृषि, बागवानी और स्थानीय रोजगार से जोड़ने के लिए पर्याप्त प्रयास क्यों नहीं हो सके। वर्ष 2012 में कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी। विजय बहुगुणा के बाद हरीश रावत ने मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान राजनीतिक अस्थिरता, वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद पुनर्निर्माण और वर्ष 2016 के राजनीतिक संकट ने सरकार को लगातार चुनौती दी। आपदा प्रभावित क्षेत्रों का पुनर्वास और चारधाम यात्रा व्यवस्था का पुनर्गठन महत्वपूर्ण विषय रहे। मगर सरकार की उपलब्धियों के साथ नेतृत्व संबंधी विवाद और राजनीतिक अस्थिरता भी कांग्रेस की छवि पर असर डालते रहे। भाजपा ने वर्ष 2007 में सरकार बनाई। बीसी खंडूड़ी और रमेश पोखरियाल निशंक के नेतृत्व में सड़क, आधारभूत ढांचे और प्रशासनिक सुधारों को लेकर कई घोषणाएं हुईं। हालांकि, मुख्यमंत्री बदलने की राजनीति ने सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़े किए। वर्ष 2012 के चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। वर्ष 2017 में भाजपा ने 70 सदस्यीय विधानसभा में 57 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया। इसके बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार चली। वर्ष 2022 में भाजपा ने 47 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाने का इतिहास रचा। इस दौरान सड़क और राजमार्ग परियोजनाओं, चारधाम यात्रा से जुड़े बुनियादी ढांचे, पर्यटन, धार्मिक स्थलों के विकास और निवेश आकर्षित करने पर विशेष जोर दिया गया। धामी सरकार ने समान नागरिक संहिता लागू करने, भर्ती परीक्षाओं में नकल के विरुद्ध सख्त कानून बनाने और महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में क्षैतिज आरक्षण जैसे कदमों को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया है। सरकार का दावा है कि इन फैसलों से सुशासन, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार व्यवस्था को मजबूती मिली है। लेकिन भाजपा के सामने भी कई सवाल हैं। बड़े बुनियादी ढांचा प्रकल्पों और पर्यटन विस्तार के बीच पर्वतीय गांवों में स्थायी रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पलायन की समस्या का समाधान कितना हुआ? भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर युवाओं में पैदा हुए असंतोष ने सरकार की परीक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। इसके अलावा भू-कानून, जमीन की खरीद, पर्यावरणीय संतुलन और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे भी सरकार से ठोस जवाब मांगते हैं। भाजपा और कांग्रेस के शासनकाल की तुलना करते समय यह भी देखना होगा कि राज्य की अर्थव्यवस्था में विस्तार हुआ है और बुनियादी सुविधाओं का दायरा बढ़ा है, लेकिन विकास का लाभ सभी क्षेत्रों और वर्गों तक समान रूप से पहुंचाना अब भी चुनौती है। उद्योग, पर्यटन और निर्माण गतिविधियों से आर्थिक अवसर बढ़े हैं, मगर पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार का स्थायी आधार तैयार करना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में संस्थानों की मौजूदगी के साथ उनकी गुणवत्ता, विशेषज्ञों की उपलब्धता और दूरस्थ गांवों तक पहुंच का सवाल भी बना हुआ है। पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि प्रदेश की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना से जुड़ा प्रश्न है। गांवों से युवाओं का बाहर जाना खेती, स्थानीय बाजारों, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक जीवन को प्रभावित करता है। दोनों दलों ने पलायन रोकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की घोषणाएं की हैं, लेकिन जनता के सामने कसौटी घोषणाएं नहीं, परिणाम हैं। उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि भाजपा और कांग्रेस सत्ता के लिए बारी-बारी से जनादेश हासिल करती रही हैं, लेकिन राज्य आंदोलन के कई मूल सवाल आज भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। भाजपा के पास लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने और बड़े नीतिगत फैसलों का दावा है, तो कांग्रेस के पास अपने शासनकाल के औद्योगिक विस्तार और कल्याणकारी प्रयासों का पक्ष रखने का अवसर है। लेकिन किसी भी दल को केवल अपने दावों के आधार पर सफलता का प्रमाणपत्र नहीं मिल सकता।

न यूकेडी चली, न बसपा का दांव, न आप का ‘माडल’

उत्तराखंड में तीसरे विकल्प के बीच आंदोलन की जमीन पर दो दलों का कब्जा राज्य बना, सरकारें बदलीं, लेकिन सत्ता की चाबी नहीं, यूकेडी में होती रही टूट बसपा का सिमटता आधार व आप पार्टी की नाकामी की यह है असली कहानी देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस राज्य का जन्म क्षेत्रीय अस्मिता और अपने राजनीतिक भविष्य पर खुद फैसला लेने की आकांक्षा से हुआ, वहां ढाई दशक से अधिक समय बाद भी कोई क्षेत्रीय दल सत्ता का विकल्प नहीं बन सका। उत्तराखंड क्रांति दल ने अलग राज्य के लिए संघर्ष किया, बहुजन समाज पार्टी ने मैदानी जिलों में अपना जनाधार बनाया और आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के शासन माडल के सहारे प्रदेश में दस्तक दी। लेकिन विधानसभा की सत्ता तक पहुंचने की बारी आई तो मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही सिमट गया। यह महज छोटे दलों की चुनावी हार की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक व्यवस्था की कहानी भी है, जिसमें मतदाता बदलाव चाहता है, लेकिन बदलाव के लिए वोट डालते समय अक्सर उसी दो-दलीय मुकाबले में लौट जाता है। सवाल है कि क्या उत्तराखंड में तीसरे विकल्प के लिए जमीन नहीं है, या जो दल उस जमीन पर खड़े होने का दावा करते रहे, वह उसे राजनीतिक ताकत में बदलने में नाकाम रहे? उत्तराखंड में 2002 से 2022 तक हुए पांच विधानसभा चुनावों के नतीजे इस राजनीतिक प्रवृत्ति की गवाही देते हैं। भाजपा और कांग्रेस का संयुक्त मत प्रतिशत लगातार बढ़ा, जबकि छोटे और क्षेत्रीय दलों के लिए विधानसभा में जगह बनाना कठिन होता गया। वर्ष 2002 में दोनों राष्ट्रीय दलों को मिलाकर करीब 52 प्रतिशत मत मिले थे, जो 2022 में बढ़कर लगभग 82 प्रतिशत हो गए। इन आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तीसरे विकल्प का संकट केवल सीटों का संकट नहीं है। छोटे दल चुनाव लड़ते रहे, मुद्दे उठाते रहे, लेकिन उनका समर्थन निर्णायक चुनावी शक्ति में नहीं बदल पाया। वर्ष 2022 में 46 दल मैदान में थे, मगर विधानसभा में भाजपा, कांग्रेस और बसपा के अलावा केवल निर्दलीय उम्मीदवारों को जगह मिली। उत्तराखंड क्रांति दल के सामने सबसे बड़ी विडंबना यही है कि अलग राज्य की मांग को राजनीतिक स्वर देने वाला दल राज्य बनने के बाद सत्ता की मुख्य दावेदारी नहीं कर पाया। 2002 में उसे चार सीटें मिलीं। 2007 में तीन विधायक जीते। लेकिन 2012 के बाद उसका विधानसभा में प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया। इसके पीछे कई कारण रहे। आंदोलनकारी संगठन से व्यापक चुनावी दल बनने की चुनौती, नेतृत्व के बीच मतभेद, बार-बार टूट और बदलते राजनीतिक समीकरणों ने उसकी ताकत को कमजोर किया। राज्य आंदोलन के दौरान गैरसैंण, स्थानीय रोजगार, पलायन और पहाड़ के संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दे जनभावनाओं से जुड़े थे। लेकिन इन मुद्दों को बूथ स्तर के संगठन, मजबूत नेतृत्व और विश्वसनीय शासन के विकल्प में बदलना अलग चुनौती थी। यूकेडी के सामने एक और मुश्किल थी। भाजपा ने अलग राज्य के समर्थन और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक ताकत के सहारे पहाड़ी मतदाताओं के बीच जगह बनाई। कांग्रेस के पास भी पुराना संगठन और व्यापक चुनावी नेटवर्क था। ऐसे में यूकेडी जिस क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति पर आगे बढ़ सकता था, उसी के मुद्दों को दोनों राष्ट्रीय दल अपने चुनावी एजेंडे में शामिल करते रहे। नतीजा यह हुआ कि आंदोलन की विरासत यूकेडी के पास रही, लेकिन उसका राजनीतिक लाभ दूसरी पार्टियां उठाती रहीं। उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की चर्चा यूकेडी तक सीमित नहीं रही। बहुजन समाज पार्टी ने हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और मैदानी क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में अपना प्रभाव बनाया। 2002 में सात और 2007 में आठ सीटें जीतकर उसने साबित किया कि भाजपा-कांग्रेस के बाहर भी मतदाताओं का एक आधार मौजूद है। लेकिन 2012 में उसकी सीटें घटकर तीन रह गईं, 2017 में वह खाता नहीं खोल सकी और 2022 में दो सीटों पर सिमट गई। बसपा की चुनौती यह रही कि उसका प्रभाव कुछ सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों में तो दिखाई दिया, लेकिन वह पूरे प्रदेश में समान ताकत वाला विकल्प नहीं बन पाई। उत्तराखंड की राजनीति में पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों के सवाल अलग-अलग रूप में सामने आते हैं। ऐसे में किसी दल को राज्यव्यापी पहचान बनाने के लिए स्थानीय सामाजिक समीकरणों से आगे बढ़कर साझा राजनीतिक कार्यक्रम तैयार करना पड़ता है। बसपा के अनुभव से यह भी स्पष्ट होता है कि कुछ सीटों पर प्रभावशाली होना और सरकार बनाने लायक जनाधार हासिल करना दो अलग बातें हैं। सीमित क्षेत्रों में समर्थन होने के बावजूद जब पार्टी का राज्यव्यापी संगठन कमजोर पड़ता है, तो उसका चुनावी प्रभाव सत्ता के समीकरण बदलने की क्षमता नहीं बना पाता। आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और दिल्ली के शासन माडल को आधार बनाकर राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश की। पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में सभी 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। यह नतीजा बताता है कि किसी दूसरे राज्य में सफल राजनीतिक मॉडल को उत्तराखंड में दोहराना आसान नहीं है। यहां मतदाता केवल सेवाओं और सुविधाओं की घोषणाओं से प्रभावित नहीं होता। स्थानीय नेतृत्व, सामाजिक संपर्क, क्षेत्रीय समस्याओं की समझ और चुनावी संगठन भी महत्वपूर्ण हैं। पहाड़ के दूरस्थ गांवों से लेकर हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर के मैदानी क्षेत्रों तक अलग-अलग अपेक्षाओं को जोड़ना किसी भी नए दल के लिए बड़ी चुनौती है। आप की चुनौती यह भी थी कि भाजपा और कांग्रेस के बीच पहले से मौजूद मुकाबले में उसे अपनी अलग पहचान बनानी थी। चुनाव के दौरान प्रचार और संगठन खड़ा करना एक बात है, लेकिन वर्षों तक गांवों, कस्बों और स्थानीय मुद्दों के बीच मौजूद रहना दूसरी बात। 2022 का परिणाम दिखाता है कि राजनीतिक पहचान को मतों और सीटों में बदलने के लिए केवल प्रचार पर्याप्त नहीं था। इस सवाल का जवाब इतना सरल नहीं है कि उत्तराखंड का मतदाता तीसरे दल को पसंद नहीं करता। बसपा की शुरुआती सफलताएं और यूकेडी की कुछ सीटें बताती हैं कि छोटे दलों के लिए जगह रही है। लेकिन चुनावी मुकाबला जैसे-जैसे भाजपा और कांग्रेस के बीच केंद्रित हुआ, वैसे-वैसे छोटे दलों के सामने एक कठिन गणित खड़ा हो गया। मतदाता अक्सर उस उम्मीदवार को प्राथमिकता दे सकता है जिसे वह जीतने की स्थिति में देखता है। यदि किसी क्षेत्र में मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच माना जा रहा हो, तो तीसरे दल को पसंद करने वाला मतदाता भी अपने वोट के संभावित परिणाम पर विचार कर सकता है। इस तरह छोटे दलों के लिए समर्थन होने के बावजूद वह सीट जीतने की स्थिति तक नहीं पहुंचता। इसे चुनावी ध्रुवीकरण और रणनीतिक मतदान के रूप में समझा जा सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले तीसरे विकल्प के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि भाजपा और कांग्रेस से कितनी नाराजगी है। असली सवाल यह होना चाहिए कि वह इस नाराजगी को विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प में कैसे बदलेगा। इसके लिए तीन बुनियादी शर्तें जरूरी हैं। पहली, प्रदेशव्यापी संगठन और स्थानीय नेतृत्व। दूसरी, रोजगार, पलायन, खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य और जमीन जैसे मुद्दों पर स्पष्ट कार्यक्रम। तीसरी, चुनाव के बाद भी जनता के बीच सक्रिय रहने की राजनीतिक इच्छाशक्ति। किसी दल को केवल चुनाव के समय दिखाई देने से राज्यव्यापी जनाधार नहीं मिलता। उत्तराखंड में तीसरी ताकत की सबसे बड़ी विफलता यह नहीं कि उसे कभी मौका नहीं मिला, बल्कि यह है कि जो मौके मिले, उन्हें स्थायी जनाधार में बदलने की क्षमता विकसित नहीं हो सकी। भाजपा और कांग्रेस की पकड़ का कारण केवल मतदाता की पसंद नहीं, बल्कि संगठन, संसाधन, नेतृत्व और चुनावी प्रतिस्पर्धा का पूरा ढांचा भी है।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: न्याय की लड़ाई पर राजनीतिक ‘बवंडर’ भारी

udaydinmaan: न्याय की लड़ाई पर राजनीतिक ‘बवंडर’ भारी : अंकिता भंडारी हत्याकांड कानूनी कार्रवाई अपनी जगह, सियासी संग्राम अपनी जगह विस चुनाव से पहले राजनीति का बड़ा मुद्दा बना मामला न्याय की मांग ...

udaydinmaan: खरगे की टिप्पणी से तूफान

udaydinmaan: खरगे की टिप्पणी से तूफान: राजनीतिक विरोध की मर्यादा पर छिड़ गई है बहस भाजपा ने मांगा खरगे और राहुल गांधी से माफीनामा कांग्रेस ने टिप्पणी का अलग अर्थ बताते किया बचाव द...

खरगे की टिप्पणी से तूफान

राजनीतिक विरोध की मर्यादा पर छिड़ गई है बहस भाजपा ने मांगा खरगे और राहुल गांधी से माफीनामा कांग्रेस ने टिप्पणी का अलग अर्थ बताते किया बचाव देहरादून/नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की विवादित टिप्पणी ने देश की राजनीति में नया बवंडर खड़ा कर दिया है। बिहार की राजधानी पटना में दिए गए बयान के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर राजनीतिक मर्यादा लांघने का आरोप लगाते हुए मोर्चा खोल दिया है। भाजपा ने सोमवार को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है। वहीं, कांग्रेस ने खरगे के बयान का बचाव करते हुए दावा किया कि उनकी टिप्पणी को संदर्भ से अलग करके पेश किया जा रहा है। इस घटनाक्रम ने भाजपा और कांग्रेस के बीच पहले से जारी राजनीतिक टकराव को और तीखा कर दिया है। यह विवाद रविवार को पटना में बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान शुरू हुआ। अपने संबोधन में खरगे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों पर निशाना साध रहे थे। इसी दौरान श्रोताओं के बीच से एक व्यक्ति ने प्रधानमंत्री के सत्ता से नहीं जाने की बात कही। जवाब में खरगे ने प्रधानमंत्री के पिता का उल्लेख करते हुए विवादित टिप्पणी कर दी। इसके बाद कार्यक्रम में हंगामे की स्थिति पैदा हो गई। खरगे की टिप्पणी सामने आते ही भाजपा ने इसे राजनीतिक शालीनता और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा के खिलाफ बताया। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस राजनीतिक मुद्दों पर प्रधानमंत्री को घेरने के बजाय व्यक्तिगत टिप्पणियों का सहारा ले रही है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने बयान को कांग्रेस की वैचारिक कमजोरी से जोड़ते हुए इसकी आलोचना की। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित भाजपा के अन्य नेताओं ने भी खरगे की टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई और माफी की मांग की। भाजपा इस विवाद को केवल एक बयान तक सीमित नहीं रखना चाहती। पार्टी इसे कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति और प्रधानमंत्री के प्रति उसके रवैये से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है। देशव्यापी विरोध के ऐलान से साफ है कि भाजपा इस मुद्दे को व्यापक राजनीतिक बहस में बदलना चाहती है। भाजपा का तर्क है कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की नीतियों, फैसलों और कार्यशैली की कठोर आलोचना की जा सकती है, लेकिन राजनीतिक बहस में दिवंगत परिजनों को घसीटना उचित नहीं है। पार्टी ने खरगे के साथ राहुल गांधी से भी माफी मांगने की मांग उठाई है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि खरगे की टिप्पणी को उसके संदर्भ में समझा जाना चाहिए। पार्टी की ओर से दावा किया गया कि कार्यक्रम के दौरान खरगे के दिवंगत पिता को लेकर भी अपमानजनक टिप्पणी की गई थी और खरगे की प्रतिक्रिया को प्रधानमंत्री के वैचारिक आधार के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा का उल्लेख करते हुए अपने अध्यक्ष के बयान का बचाव किया। हालांकि, कांग्रेस के इस बचाव के बावजूद विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। सार्वजनिक मंच पर इस्तेमाल की गई भाषा अब पार्टी के लिए राजनीतिक असहजता का कारण बन गई है। सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस इस विवाद से ध्यान हटाकर बेरोजगारी, महंगाई, मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया जैसे मुद्दों पर अपनी राजनीतिक लड़ाई को केंद्रित रख पाएगी? इस विवाद का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि भाजपा और कांग्रेस के बीच संघर्ष अब नीतियों और चुनावी आरोपों से आगे बढ़कर सार्वजनिक भाषा और राजनीतिक आचरण तक पहुंच गया है। भाजपा को इस मुद्दे के जरिए कांग्रेस पर हमला करने का अवसर मिला है, जबकि कांग्रेस इसे बयान के संदर्भ और राजनीतिक प्रतिक्रिया के आधार पर समझाने की कोशिश कर रही है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक बुनियादी सवाल दोनों दलों के सामने हैकृक्या राजनीतिक विरोध की कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए? प्रधानमंत्री और सरकार की आलोचना लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है। विपक्ष का दायित्व है कि वह सत्ता से सवाल पूछे, जबकि सत्तारूढ़ दल को आलोचना का जवाब तथ्यों और तर्कों से देना चाहिए। व्यक्तिगत टिप्पणियां इस बहस को मूल मुद्दों से भटका सकती हैं। खरगे की टिप्पणी ने भाजपा को कांग्रेस की राजनीतिक शैली पर सवाल उठाने का अवसर दे दिया है। देशव्यापी विरोध के जरिए पार्टी इस विवाद को जनचर्चा में बनाए रखने की कोशिश करेगी। दूसरी ओर, कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह अपने अध्यक्ष के बयान पर उठे सवालों का जवाब देते हुए राजनीतिक मुद्दों पर अपनी पकड़ बनाए रखे। फिलहाल, खरगे की एक टिप्पणी ने भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव को नया मोड़ दे दिया है। भाजपा इसे राजनीतिक मर्यादा के उल्लंघन का मुद्दा बना रही है, जबकि कांग्रेस बयान के संदर्भ और उसके राजनीतिक अर्थ पर जोर दे रही है। इस विवाद का असर कितना व्यापक होगा, यह आने वाले दिनों में दोनों दलों की रणनीति और जनता की प्रतिक्रिया से तय होगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि राजनीतिक बहस में भाषा और आचरण भी अब दोनों दलों के लिए बड़ी परीक्षा बन गए हैं।

न्याय यात्रा के नाम पर राजनीतिक ‘ढोंग’

गैरसैंण तक सरकार को घेरने में जुटी कांग्रेस भाजपा ने उठाए आंदोलन की मंशा पर सवाल 2027 के चुनाव से पहले आरोप-प्रत्यारोप तेज देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही सियासी संघर्ष सड़क पर उतर आया है। कांग्रेस की उत्तराखंड न्याय यात्रा को लेकर भाजपा ने मोर्चा खोल दिया है। भाजपा कांग्रेस के आंदोलन को जनन्याय की लड़ाई के बजाय राजनीतिक ढोंग करार दे रही है। सत्तारूढ़ दल का आरोप है कि कांग्रेस जनता के मुद्दों के समाधान के लिए नहीं, बल्कि चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए यात्रा और विरोध प्रदर्शनों का सहारा ले रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस सरकार को महिला सुरक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और जनसमस्याओं के मुद्दों पर घेरने में जुटी है। इस टकराव ने प्रदेश की राजनीति में एक नया सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या न्याय यात्रा कांग्रेस के लिए जनसमर्थन जुटाने का माध्यम बनेगी या भाजपा के हमलों के बीच उसकी राजनीतिक परीक्षा बनकर रह जाएगी? कांग्रेस ने न्याय यात्रा के जरिए धामी सरकार को जनता के सवालों के कठघरे में खड़ा करने की रणनीति अपनाई है। पार्टी अंकिता भंडारी हत्याकांड सहित विभिन्न मुद्दों को उठाकर सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग कर रही है। कांग्रेस का प्रयास है कि इन सवालों को गांवों, कस्बों और शहरों तक पहुंचाकर सरकार के खिलाफ जनमत तैयार किया जाए। भाजपा इस रणनीति को कांग्रेस की चुनावी कवायद के रूप में पेश कर रही है। पार्टी का तर्क है कि जनता के बीच सक्रियता दिखाने और वास्तव में जनता के लिए संघर्ष करने में अंतर होता है। भाजपा के मुताबिक, कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि जिन मुद्दों को लेकर वह आज सड़क पर उतर रही है, उनके समाधान के लिए उसका अपना राजनीतिक दृष्टिकोण और ठोस कार्ययोजना क्या है। हालांकि, कांग्रेस की यात्रा को केवल राजनीतिक ढोंग बताने से उन सवालों का महत्व समाप्त नहीं हो जाता, जिन्हें लेकर विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सत्ता से सवाल पूछना है। असली कसौटी यह है कि कांग्रेस अपने आरोपों को कितने ठोस तथ्यों के साथ जनता के सामने रखती है और भाजपा उनका कितना प्रभावी जवाब देती है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों प्रमुख दलों की रणनीति स्पष्ट होती जा रही है। कांग्रेस जनसमस्याओं और सरकार की कथित विफलताओं को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाना चाहती है। भाजपा दूसरी ओर विपक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर उसके आंदोलन की धार कमजोर करने की कोशिश कर रही है। अंकिता भंडारी प्रकरण इस राजनीतिक संघर्ष का संवेदनशील पक्ष है। कांग्रेस इस मामले में उठ रहे सवालों और न्याय की मांग को लेकर सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास कर रही है। भाजपा के सामने चुनौती है कि वह विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के साथ जनता के बीच मौजूद शंकाओं का भी तथ्यात्मक समाधान प्रस्तुत करे। यही स्थिति बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और विकास से जुड़े सवालों पर भी है। यदि कांग्रेस इन मुद्दों को केवल भाषणों तक सीमित रखती है, तो भाजपा को उसके आंदोलन पर सवाल उठाने का अवसर मिलेगा। लेकिन यदि सरकार विपक्ष के हर सवाल को राजनीतिक स्टंट बताकर खारिज करती है, तो उसे भी जनता की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। भाजपा कांग्रेस की न्याय यात्रा को राजनीतिक ढोंग बता रही है, लेकिन इस आरोप की राजनीतिक उपयोगिता तभी तक है, जब तक पार्टी अपने पक्ष में ठोस तथ्य और उपलब्धियां सामने रख सके। केवल विपक्ष की मंशा पर सवाल उठाने से बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और स्थानीय समस्याओं से जुड़े सवाल खत्म नहीं होंगे। इसी तरह कांग्रेस के लिए भी यात्रा की सफलता भीड़, नारों और राजनीतिक भाषणों से तय नहीं होगी। उसे यह साबित करना होगा कि वह जनसमस्याओं को लेकर लगातार संघर्ष करने और उनका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने में सक्षम है। जनता के सामने केवल सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि वैकल्पिक नीतियों और कार्ययोजना का खाका भी होना चाहिए। उत्तराखंड की राजनीति में न्याय यात्रा को लेकर जारी विवाद का असली केंद्र यही है। कांग्रेस इसे जनता की आवाज बनाने का दावा कर रही है, जबकि भाजपा इसे चुनाव से पहले राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश बता रही है। दोनों दलों के लिए यह आंदोलन अपनी-अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता साबित करने का अवसर भी है और चुनौती भी। 2027 के चुनाव में जनता यह भी देखेगी कि कौन-सा दल उसके सवालों को चुनावी मंच तक सीमित रखता है और कौन उन्हें समाधान तक पहुंचाने का प्रयास करता है। कांग्रेस की न्याय यात्रा की असली परीक्षा उसके उठाए मुद्दों की गंभीरता और निरंतरता में होगी, जबकि भाजपा की परीक्षा इन मुद्दों पर दिए जाने वाले जवाबों और सरकार के कामकाज से होगी। फिलहाल, न्याय यात्रा के बहाने उत्तराखंड में सियासी घमासान तेज है। भाजपा इसे कांग्रेस का राजनीतिक ढोंग बता रही है और कांग्रेस इसे जनता के न्याय की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है। लेकिन इस शोर के बीच सबसे अहम सवाल यही है कि राजनीतिक दलों की लड़ाई से आम जनता को क्या हासिल होगा? चुनावी आरोप-प्रत्यारोप के बीच यदि जनता के वास्तविक सवाल पीछे छूट गए, तो न्याय यात्रा हो या उसका विरोधकृदोनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे।

न्याय की लड़ाई पर राजनीतिक ‘बवंडर’ भारी

अंकिता भंडारी हत्याकांड कानूनी कार्रवाई अपनी जगह, सियासी संग्राम अपनी जगह विस चुनाव से पहले राजनीति का बड़ा मुद्दा बना मामला न्याय की मांग और राजनीतिक लाभ की कोशिशें धुंधली देहरादून। उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्याय की मांग अब केवल अदालत, जांच और अभियोजन तक सीमित नहीं रह गई है। यह मामला प्रदेश की राजनीति के केंद्र में है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक, विपक्ष के राजनीतिक मंचों से लेकर सत्तारूढ़ भाजपा के जवाबी हमलों तक, अंकिता के नाम पर सियासी संघर्ष तेज होता जा रहा है। सवाल यह है कि जिस मामले में जनता निष्पक्ष जांच, दोषियों को सजा और कथित वीआईपी की भूमिका पर स्पष्टता चाहती है, उसमें न्याय की मांग और राजनीतिक लाभ की कोशिशों के बीच की रेखा लगातार धुंधली क्यों पड़ रही है? अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड के लिए महज एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि महिला सुरक्षा, सत्ता की जवाबदेही और व्यवस्था पर जनता के भरोसे की कसौटी बन चुका है। यही कारण है कि मामले से जुड़ा कोई भी घटनाक्रम राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा करता है। कांग्रेस इसे सरकार को घेरने के अवसर के रूप में देख रही है, जबकि भाजपा जांच और कानूनी कार्रवाई का हवाला देकर विपक्ष पर मामले का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाती रही है। इस टकराव में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अंकिता को न्याय दिलाने के लिए राजनीतिक दलों की घोषणाएं ठोस नतीजों में कितनी बदल रही हैं? मामले को लेकर अंकिता के माता-पिता की मांगों ने राजनीतिक बहस को और तेज किया है। कथित वीआईपी की भूमिका की जांच और सीबीआई जांच को लेकर उठ रहे सवालों ने प्रदेश की राजनीति में नए सिरे से हलचल पैदा की है। अंकिता के माता-पिता की आवाज को राजनीतिक बयानबाजी में सीमित नहीं किया जा सकता। उनकी मांगों का परीक्षण तथ्यों, साक्ष्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आरोपों का निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलना चाहिए। दूसरी ओर, विपक्ष का तर्क है कि जब तक मामले से जुड़े सभी सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तब तक जनता की शंकाएं दूर नहीं होंगी। कांग्रेस इस मुद्दे को सरकार की जवाबदेही से जोड़ रही है। न्याय यात्रा और विरोध प्रदर्शनों के जरिए वह अंकिता प्रकरण को जनभावनाओं से जोड़ने की कोशिश में है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह आंदोलन न्याय की मांग को निर्णायक दिशा दे पाएगा या चुनावी राजनीति के शोर में उलझकर रह जाएगा? सत्तारूढ़ भाजपा के सामने चुनौती केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की नहीं है। उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि जनता के मन में उठ रहे सवालों का तथ्यपरक और विश्वसनीय समाधान सामने आए। सरकार और भाजपा की ओर से जांच तथा कानूनी कार्रवाई का हवाला दिया जाता रहा है, लेकिन किसी संवेदनशील मामले में केवल कार्रवाई गिनाना पर्याप्त नहीं होता। जनता यह जानना चाहती है कि जांच के निष्कर्ष क्या हैं, न्यायिक प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ी है और जिन सवालों को लेकर असंतोष है, उनका जवाब किस आधार पर दिया जा रहा है। भाजपा यदि विपक्ष पर राजनीतिक रोटियां सेंकने का आरोप लगाती है, तो उसे भी यह समझना होगा कि अंकिता का मामला किसी एक दल की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह उत्तराखंड की बेटी को न्याय दिलाने और व्यवस्था के प्रति विश्वास बनाए रखने का सवाल है। इसी तरह विपक्ष को भी आरोपों को राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर अपनी बात रखनी होगी। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच अंकिता भंडारी हत्याकांड का राजनीतिक महत्व बढ़ना तय है। कांग्रेस इसे महिला सुरक्षा और सरकार की जवाबदेही से जोड़कर भाजपा को घेरने की कोशिश करेगी। भाजपा की रणनीति विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक अवसरवाद बताकर अपने पक्ष को मजबूत करने की होगी। दूसरे राजनीतिक दल भी जनभावनाओं से जुड़े इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन चुनावी राजनीति में इस मामले का इस्तेमाल करने और न्याय की मांग को जीवित रखने में अंतर है। यदि राजनीतिक दलों की सक्रियता केवल बयान, आरोप-प्रत्यारोप, धरना और प्रदर्शन तक सीमित रहती है, तो इससे जनता की बेचौनी कम होने के बजाय बढ़ सकती है। इसके विपरीत, यदि राजनीतिक दबाव का परिणाम पारदर्शिता, जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया में जनता के विश्वास को मजबूत करने के रूप में सामने आता है, तो यह लोकतांत्रिक राजनीति की सार्थक भूमिका होगी। अंकिता भंडारी हत्याकांड ने उत्तराखंड की राजनीति को एक असहज सवाल के सामने खड़ा कर दिया है। क्या राजनीतिक दल इस मामले को न्याय की मांग के रूप में देखेंगे या इसे चुनावी जीत-हार का औजार बना देंगे? क्या सत्ता पक्ष जनता की शंकाओं का जवाब तथ्यों से देगा और क्या विपक्ष अपने आरोपों को प्रमाणों के आधार पर आगे बढ़ाएगा? इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया को राजनीतिक बयानबाजी से अलग रखते हुए चलना चाहिए। जांच से जुड़े तथ्यों, अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायिक निष्कर्षों को ही निर्णायक महत्व मिलना चाहिए। साथ ही, जनता के सवालों को केवल राजनीतिक विरोध बताकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा। अंकिता के नाम पर राजनीति हो रही है या राजनीति के दबाव से न्याय की मांग मजबूत हो रही हैकृइसका फैसला नारों से नहीं, नतीजों से होगा। उत्तराखंड की जनता को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर पारदर्शी जवाब, जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा चाहिए। 2027 के चुनाव में राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर अपनी-अपनी परीक्षा देनी होगी, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष चुनाव नहीं, अंकिता को न्याय दिलाने का सवाल है।

सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: न्याय यात्रा से सत्ता की ‘घेराबंदी’

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udaydinmaan: सत्र से पहले सियासी संग्राम: सदन की कार्यवाही से पहले ही आमने-सामने सत्ता पक्ष और विपक्ष सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस की गैरमौजूदगी ने बढ़ाई सियासी तल्खी विधानसभा सत्र से प...

सत्र से पहले सियासी संग्राम

सदन की कार्यवाही से पहले ही आमने-सामने सत्ता पक्ष और विपक्ष सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस की गैरमौजूदगी ने बढ़ाई सियासी तल्खी विधानसभा सत्र से पहले ही आरोप-प्रत्यारोप की पटकथा है तैयार देहरादून। गैरसैंण में विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले ही उत्तराखंड का सियासी पारा चढ़ने लगा है। सदन के भीतर सरकार को घेरने की तैयारी कर रही कांग्रेस सर्वदलीय बैठक से नदारद रही, तो इस गैरमौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ने सरकार के साथ बैठकर सत्र की कार्यवाही पर चर्चा करने से दूरी बनाई है या फिर यह गैरमौजूदगी सरकार के खिलाफ किसी बड़े राजनीतिक संदेश का हिस्सा है? वजह जो भी हो, इतना तय है कि गैरसैंण सत्र की शुरुआत से पहले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तल्खी साफ दिखाई देने लगी है। गैरसैंण उत्तराखंड की भावनाओं, पहाड़ की आकांक्षाओं और राज्य आंदोलन के सपनों से जुड़ा सवाल है। ऐसे में यहां होने वाला विधानसभा सत्र महज विधायी कार्यवाही नहीं, बल्कि सरकार और विपक्ष दोनों के लिए राजनीतिक संदेश देने का अवसर भी होता है। सरकार जहां सत्र को विकास और जनहित के मुद्दों पर अपनी उपलब्धियां सामने रखने के मंच के रूप में देखेगी, वहीं कांग्रेस की कोशिश बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और जनसमस्याओं के सवालों पर सरकार को घेरने की होगी। लेकिन सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस की अनुपस्थिति ने इस टकराव को सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सर्वदलीय बैठक का उद्देश्य सदन की कार्यवाही को सुचारु बनाने, विभिन्न दलों के बीच समन्वय स्थापित करने और विधायी कामकाज को व्यवस्थित करने का होता है। ऐसे में प्रमुख विपक्षी दल की गैरमौजूदगी स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करती है। क्या कांग्रेस बैठक में शामिल न होकर सरकार को राजनीतिक संदेश देना चाहती है? क्या विपक्ष पहले से ही आक्रामक रणनीति के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर चुका है? या फिर इस दूरी के पीछे कोई अलग राजनीतिक वजह है? इन सवालों के जवाब कांग्रेस के रुख और सरकार की प्रतिक्रिया से ही स्पष्ट होंगे। हालांकि, बैठक में शामिल नहीं होने को अपने आप में कांग्रेस की राजनीतिक कमजोरी या सरकार की सफलता मान लेना भी जल्दबाजी होगी। विपक्ष की वास्तविक ताकत का आकलन सदन में उठाए जाने वाले मुद्दों, तथ्यों के साथ सरकार को घेरने की क्षमता और जनहित के सवालों पर उसकी सक्रियता से होगा। लेकिन कांग्रेस के सामने यह चुनौती जरूर रहेगी कि उसकी गैरमौजूदगी को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब वह अपनी ठोस राजनीतिक रणनीति से दे। सर्वदलीय बैठक से कांग्रेस की दूरी के बीच सरकार के सामने भी कम चुनौतियां नहीं हैं। गैरसैंण में सत्र आयोजित करना राजनीतिक और भावनात्मक महत्व रखता है, लेकिन पहाड़ की समस्याओं का समाधान केवल सत्र आयोजित करने से नहीं होगा। पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, सड़क संपर्क, आपदा प्रबंधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दे सरकार की परीक्षा लेंगे। विपक्ष इन सवालों को कितनी आक्रामकता से उठाता है और सरकार उनका कितना ठोस जवाब देती है, इससे सत्र की राजनीतिक दिशा तय होगी। सत्तापक्ष के लिए विपक्ष की गैरमौजूदगी पर सवाल उठाना आसान हो सकता है, लेकिन इससे जनसमस्याओं से जुड़े सवाल खत्म नहीं हो जाते। इसी तरह कांग्रेस के लिए सरकार पर हमला करना पर्याप्त नहीं होगा। उसे यह भी दिखाना होगा कि उसके पास समस्याओं के समाधान को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण और वैकल्पिक नीतियां हैं। राजनीतिक बयानबाजी के बीच जनता यह देखना चाहेगी कि उसके मुद्दों पर कौन गंभीर है और कौन केवल सियासी बढ़त बनाने में जुटा है। गैरसैंण सत्र से पहले का घटनाक्रम संकेत दे रहा है कि इस बार मुकाबला केवल सदन के भीतर तक सीमित नहीं रहने वाला। कांग्रेस यदि सड़क और सदन दोनों जगह सरकार को घेरने की रणनीति अपनाती है, तो भाजपा भी विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के साथ उसके राजनीतिक रुख पर सवाल उठा सकती है। ऐसे में विधानसभा की कार्यवाही के साथ-साथ दोनों दलों की बयानबाजी भी सियासी माहौल को गर्म रखेगी। आखिरकार, सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस की गैरमौजूदगी से उठा विवाद एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता हैकृक्या उत्तराखंड की राजनीति में जनहित के मुद्दे प्राथमिकता पाएंगे या राजनीतिक टकराव ही सत्र की पहचान बनेगा? गैरसैंण की धरती पर होने वाली कार्यवाही का महत्व तभी सार्थक होगा, जब सत्ता पक्ष अपनी जवाबदेही निभाए और विपक्ष अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करे। जनता को बैठकों में मौजूदगी या गैरमौजूदगी से अधिक इस बात से मतलब है कि उसके सवाल सदन में कितनी मजबूती से उठते हैं और सरकार उन पर क्या कार्रवाई करती है।

न्याय यात्रा से सत्ता की ‘घेराबंदी’

धामी सरकार के खिलाफ सड़क पर कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन बेरोजगारी से भ्रष्टाचार तक मुद्दों की धार तेज करने की तैयारी न्याय यात्रा से 2027 की सियासी जमीन तलाश रहा है विपक्ष देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती भले अभी शुरू न हुई हो, लेकिन सियासी बिसात बिछने लगी है। सत्ता में वापसी की राह देख रही कांग्रेस ने धामी सरकार को घेरने के लिए न्याय यात्रा को अपने राजनीतिक अभियान का अहम हथियार बनाया है। सड़क पर उतरकर जनता के मुद्दे उठाने, सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े करने और भाजपा के चुनावी दावों को चुनौती देने की कोशिश में जुटी कांग्रेस के लिए यह यात्रा महज विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव का माहौल तैयार करने की कवायद भी है। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति के साथ संगठन को मजबूत करने और अपनी उपलब्धियां गिनाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस सरकार के खिलाफ असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश कर रही है। न्याय यात्रा के जरिए पार्टी का निशाना साफ हैकृसरकार को उसके कामकाज के आधार पर कठघरे में खड़ा करना और यह संदेश देना कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का विकल्प मौजूद है। हालांकि, कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार के खिलाफ उठाए जा रहे सवालों को जनता के बीच भरोसेमंद राजनीतिक विकल्प के रूप में कैसे स्थापित किया जाए। उत्तराखंड में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप, महंगाई, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा और पहाड़ों से पलायन जैसे मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। कांग्रेस इन्हीं सवालों को धार देकर सरकार की घेराबंदी करना चाहती है। पार्टी का प्रयास है कि अलग-अलग क्षेत्रों की समस्याओं को एक साझा राजनीतिक अभियान से जोड़ा जाए, ताकि सरकार के खिलाफ असंतोष को व्यापक स्वर मिल सके। कांग्रेस के लिए न्याय यात्रा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि केवल प्रेसवार्ता और राजनीतिक बयानबाजी के सहारे चुनावी जमीन तैयार करना आसान नहीं है। पार्टी को गांवों, कस्बों और शहरों तक पहुंचकर जनता की शिकायतों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाना होगा। बेरोजगार युवाओं, महिलाओं, किसानों, कर्मचारियों और पहाड़ के दूरस्थ इलाकों में रहने वाले लोगों की समस्याओं को केंद्र में रखकर ही वह अपने अभियान को जनाधार दे सकती है। लेकिन यहां कांग्रेस के सामने एक अहम सवाल भी है। क्या यात्रा के दौरान उठाए जाने वाले मुद्दे चुनाव तक लगातार राजनीतिक एजेंडे में बने रहेंगे या फिर यह अभियान कुछ दिनों के प्रदर्शन और भाषणों तक सीमित रह जाएगा? जनता के बीच प्रभाव पैदा करने के लिए कांग्रेस को केवल आरोप नहीं, बल्कि ठोस तथ्य, स्पष्ट जवाबदेही और समस्याओं के समाधान का अपना खाका भी सामने रखना होगा। न्याय यात्रा भाजपा के लिए भी राजनीतिक चुनौती पेश करती है। धामी सरकार विकास, जनकल्याणकारी योजनाओं और अपने फैसलों के आधार पर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। ऐसे में कांग्रेस का आक्रामक अभियान सरकार को अपनी उपलब्धियों के साथ-साथ विवादित मुद्दों पर भी जवाब देने के लिए मजबूर कर सकता है। भाजपा की रणनीति कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक हताशा बताकर खारिज करने की हो सकती है। लेकिन चुनावी राजनीति में केवल विपक्ष के अभियान पर सवाल उठाना पर्याप्त नहीं होता। सरकार को यह भी बताना होगा कि बेरोजगारी, पलायन, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवालों पर जमीन पर कितना बदलाव आया है। विपक्ष यदि ठोस मुद्दों के साथ दबाव बनाता है, तो सरकार के लिए हर सवाल को राजनीतिक आरोप बताकर टालना आसान नहीं होगा। दूसरी ओर, कांग्रेस की यात्रा भाजपा को विपक्ष की सक्रियता और जनसंपर्क की रणनीति का जवाब देने के लिए भी प्रेरित करेगी। इस तरह न्याय यात्रा प्रदेश की राजनीति में चुनाव से पहले मुद्दों की लड़ाई को तेज कर सकती है। कांग्रेस की न्याय यात्रा की सफलता का आकलन केवल इसमें शामिल नेताओं की संख्या या सभाओं में जुटी भीड़ से नहीं होगा। असली कसौटी यह होगी कि पार्टी इस अभियान के जरिए कितना जनसमर्थन जुटाती है और उसे संगठनात्मक मजबूती में कितना बदल पाती है। उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने गुटबाजी, नेतृत्व के बीच समन्वय और बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने जैसी चुनौतियां भी हैं। यदि वरिष्ठ नेता एक मंच पर दिखाई देते हैं, स्थानीय कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी मिलती है और यात्रा के दौरान उठाए गए मुद्दों पर लगातार अभियान चलता है, तो कांग्रेस सरकार के खिलाफ प्रभावी माहौल बनाने में सफल हो सकती है। लेकिन यदि अभियान के केंद्र में केवल नेताओं के भाषण और राजनीतिक आरोप रहे, तो उसका असर सीमित रह सकता है। कांग्रेस को यह भी साबित करना होगा कि वह केवल भाजपा विरोध के आधार पर नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक दृष्टिकोण और वैकल्पिक नीतियों के दम पर चुनाव लड़ना चाहती है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि सत्ता में आने पर पार्टी रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला सुरक्षा के सवालों पर क्या करेगी। न्याय यात्रा को उत्तराखंड की चुनावी राजनीति के शुरुआती शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा सकता है। कांग्रेस के लिए यह अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने, जनता के बीच सक्रियता बढ़ाने और सरकार के खिलाफ राजनीतिक विमर्श तैयार करने का अवसर है। वहीं भाजपा के लिए यह अपने कामकाज का बचाव करने और विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की चुनौती लेकर आई है। हालांकि, सड़क पर भीड़ जुटा लेना और चुनाव में वोट हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं। कांग्रेस को यह समझना होगा कि सरकार की आलोचना अपने आप में सत्ता तक पहुंचने का रास्ता नहीं बनाती। इसके लिए विश्वसनीय नेतृत्व, एकजुट संगठन, स्थानीय मुद्दों की समझ और जनता के सामने स्पष्ट विकल्प प्रस्तुत करना जरूरी है। न्याय यात्रा से कांग्रेस ने धामी सरकार के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा जरूर खोल दिया है, लेकिन इस संघर्ष का असली परिणाम चुनावी मैदान में ही सामने आएगा। यदि कांग्रेस जनता के मुद्दों को लगातार उठाती है और उन्हें ठोस राजनीतिक विकल्प से जोड़ पाती है, तो यह यात्रा भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है। अन्यथा, चुनाव से पहले का यह शोर भी राजनीतिक गतिविधियों की लंबी सूची में एक और अभियान बनकर रह जाएगा। 2027 की लड़ाई में निर्णायक सवाल यही होगा कि कांग्रेस सरकार को घेरने में कितनी सफल होती है और इस घेराबंदी को जनता के भरोसे में कितना बदल पाती है।

उत्तराखंड में सियासी भूचाल

भाजपा और कांग्रेस आ गए हैं आमने-सामने पहाड़ की अस्मिता पर छिड़ गई सियासी जंग बयान के बहाने भाजपा का कांग्रेस पर निशाना विपक्ष के पलटवार से गरमाई चुनावी राजनीति देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है। अब समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव के बयान ने प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। बयान के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है और भाजपा-कांग्रेस एक बार फिर आमने-सामने आ गई हैं। राजनीतिक दल इस विवाद को अपने-अपने तरीके से भुनाने में जुटे हैं। सवाल यह है कि अखिलेश के बयान पर छिड़ी यह बहस केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहेगी या उत्तराखंड की अस्मिता और क्षेत्रीय भावनाओं को केंद्र में रखकर चुनावी मुद्दा बन जाएगी? उत्तराखंड की राजनीति में राज्य की पहचान, पहाड़ की अस्मिता और अलग राज्य आंदोलन का इतिहास हमेशा संवेदनशील विषय रहे हैं। पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग के पीछे पहाड़ी समाज की विशिष्ट परिस्थितियों, विकास की आकांक्षाओं और राजनीतिक उपेक्षा के विरुद्ध लंबा संघर्ष रहा है। ऐसे में प्रदेश से जुड़े किसी भी विवादित बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज होना स्वाभाविक है। अखिलेश यादव के बयान के बाद भी यही स्थिति बनती दिखाई दे रही है। हालांकि, बयान के वास्तविक संदर्भ और पूरे आशय को सामने रखकर ही उसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव का आकलन किया जाना चाहिए। भाजपा के लिए यह विवाद कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने का अवसर बन सकता है। सत्तारूढ़ दल इस सवाल को उठा सकता है कि उत्तराखंड के सम्मान और पहचान से जुड़े विषयों पर कांग्रेस का रुख क्या है। चुनावी राजनीति में ऐसे मुद्दे अक्सर दलों के बीच वैचारिक और भावनात्मक मुकाबले का आधार बनते हैं। भाजपा की कोशिश हो सकती है कि इस विवाद के जरिए वह प्रदेश की अस्मिता के सवाल को अपने राजनीतिक एजेंडे से जोड़े और कांग्रेस को सफाई देने की स्थिति में लाए। लेकिन भाजपा के सामने भी यह चुनौती होगी कि वह केवल बयानबाजी तक सीमित न रहे। उत्तराखंड की अस्मिता की बात करने के साथ उसे रोजगार, पलायन, महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और पहाड़ों में बुनियादी सुविधाओं जैसे सवालों पर भी अपनी उपलब्धियों का हिसाब देना होगा। जनता भावनात्मक मुद्दों पर राजनीतिक रुख जरूर देखती है, लेकिन अंततः सरकार के कामकाज का मूल्यांकन भी करती है। अखिलेश यादव के बयान पर जारी विवाद ने कांग्रेस के सामने भी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। यदि भाजपा इस मुद्दे को कांग्रेस से जोड़कर हमला करती है, तो विपक्ष को अपना रुख स्पष्ट करना पड़ सकता है। कांग्रेस के लिए जरूरी होगा कि वह बयान के संदर्भ, उत्तराखंड की अस्मिता और प्रदेश के हितों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। साथ ही उसे यह भी देखना होगा कि विवाद के कारण बेरोजगारी, महंगाई और अन्य जनहित के मुद्दे राजनीतिक विमर्श से बाहर न हो जाएं। विपक्ष की रणनीति भाजपा पर मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगाने की हो सकती है। लेकिन ऐसी दलील तभी प्रभावी होगी, जब कांग्रेस विवाद पर स्पष्ट प्रतिक्रिया देने के साथ सरकार से जुड़े सवालों को भी मजबूती से उठाए। केवल पलटवार करने से राजनीतिक बढ़त हासिल करना आसान नहीं होगा। उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय पहचान का महत्व किसी से छिपा नहीं है। राज्य आंदोलन की विरासत ने यहां की राजनीतिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया है। यही कारण है कि अस्मिता से जुड़े सवाल राजनीतिक दलों के लिए संवेदनशील भी हैं और प्रभावशाली भी। ऐसे मुद्दों पर जनता की भावनाएं तेजी से प्रतिक्रिया देती हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए जरूरी है कि वे तथ्यों और संदर्भों को सामने रखकर बात करें। अखिलेश यादव के बयान पर छिड़ा विवाद इस बात का संकेत है कि विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दल उन मुद्दों को तलाश रहे हैं, जिनके जरिए मतदाताओं के बीच अपनी स्थिति मजबूत की जा सके। भाजपा के लिए यह विपक्ष को घेरने का अवसर है, जबकि कांग्रेस के लिए अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट करने की परीक्षा। ऐसे में बयान के मूल संदर्भ से आगे बढ़कर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति कितनी दूर जाती है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ रही है। भाजपा सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश में जुटी है। इस बीच अखिलेश यादव के बयान से उपजा विवाद चुनावी विमर्श को नया मोड़ दे सकता है। हालांकि, किसी एक बयान का चुनावी असर कितना होगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। सियासत का असली सवाल यह है कि राजनीतिक दल उत्तराखंड की अस्मिता को केवल चुनावी हथियार बनाएंगे या राज्य की पहचान, सम्मान और विकास से जुड़े सवालों पर गंभीर विमर्श भी करेंगे। बयान पर वार-पलटवार से राजनीतिक माहौल जरूर गर्म हो सकता है, लेकिन जनता के लिए निर्णायक वही होगा जो उसके हितों और प्रदेश के भविष्य के सवालों पर स्पष्ट जवाब देगा।

udaydinmaan: सूबे के गांव-गांव यूकेडी की ‘हुंकार’

udaydinmaan: सूबे के गांव-गांव यूकेडी की ‘हुंकार’: भाजपा-कांग्रेस की नींद उड़ाने का है दावा 2027 की जंग में क्षेत्रीय अस्मिता का दांव सत्ता की सियासत में खोई जमीन की जंग देहरादून। उत्तराखंड क...

रविवार, 25 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: सूबे के गांव-गांव यूकेडी की ‘हुंकार’

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udaydinmaan: दून के नामी स्कूल की छात्रा से छेड़छाड़

udaydinmaan: दून के नामी स्कूल की छात्रा से छेड़छाड़: शिकायत पहुंची पुलिस तक, दर्ज हुई एफआईआर स्कूल प्रबंधन के खिलाफ एनएसयूआई का मोर्चा 15 छात्राओं नेे हस्ताक्षर कर स्कूल में दी शिकायत देहरादून...

दून के नामी स्कूल की छात्रा से छेड़छाड़

शिकायत पहुंची पुलिस तक, दर्ज हुई एफआईआर स्कूल प्रबंधन के खिलाफ एनएसयूआई का मोर्चा 15 छात्राओं नेे हस्ताक्षर कर स्कूल में दी शिकायत देहरादून। राजधानी के प्रतिष्ठित एक स्कूल में छात्रा से कथित छेड़छाड़ का मामला अब स्कूल प्रबंधन के लिए भी सवालों का घेेरा बनता जा रहा है। छात्रा की शिकायत, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की काउंसलिंग, पुलिस में तहरीर और प्राथमिकी दर्ज होने के बाद प्रकरण ने नया मोड़ ले लिया है। एनएसयूआई से जुड़े छात्रों ने स्कूल के बाहर प्रदर्शन कर प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। मामला अब केवल आरोप और सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्राओं की सुरक्षा और स्कूल की जवाबदेही का सवाल भी बन गया है। बता दें कि पीड़ित परिवार के अनुसार, 23 अक्टूबर को छात्रा अपनी मां के साथ स्कूल पहुंची और शिक्षक के खिलाफ प्रबंधन से लिखित शिकायत की। परिवार का दावा है कि शिकायत पर 15 छात्राओं के हस्ताक्षर हैं। आरोप है कि इससे पहले 15 अक्टूबर को भी शिक्षक के खिलाफ शिकायत की गई थी। उस समय स्कूल प्रबंधन ने शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया था, लेकिन परिवार का आरोप है कि कार्रवाई करने के बजाय छात्रा पर ही दबाव बनाया जाने लगा। परिजनों ने यह भी आरोप लगाया कि स्कूल के निदेशक ने शिक्षक का पक्ष लेते हुए अपनी बात रखी। इससे नाराज परिवार ने संबंधित शिक्षक को बर्खास्त करने और निदेशक से विद्यालय की प्रार्थना सभा में सभी विद्यार्थियों के सामने सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है। नामी स्कूल में छात्राओं के साथ कथित अनुचित व्यवहार का मामला सामने आने के बाद चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने छात्रा की काउंसलिंग की। इसके बाद छात्रा ने पुलिस को तहरीर दी, जिसके आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई। अब पुलिस के सामने आरोपों की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाने की चुनौती है। छात्रा के बयान, आरोपी शिक्षक का पक्ष और उपलब्ध साक्ष्य इस जांच की दिशा तय करेंगे। आरोपी शिक्षक का कहना है कि उनके खिलाफ पहले कभी इस तरह की शिकायत नहीं आई। उन्होंने अपने व्यवहार से किसी को ठेस पहुंचने की स्थिति में माफी भी मांगी है। इस प्रकरण में स्कूल प्रबंधन की भूमिका भी जांच और सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में है। किसी भी शैक्षणिक संस्थान की प्राथमिक जिम्मेदारी विद्यार्थियों को सुरक्षित माहौल देना है। शिकायत सामने आने पर उस पर क्या कार्रवाई हुई, छात्रा की बात किस तरह सुनी गई और उसकी सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गएकृइन सवालों के स्पष्ट जवाब जरूरी हैं। प्रतिष्ठित संस्थान होने भर से किसी भी प्रबंधन को सवालों से छूट नहीं मिल सकती। मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। एनएसयूआई से जुड़े छात्रों ने स्कूल के बाहर प्रदर्शन कर प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई। प्रदर्शनकारियों का जोर इस बात पर रहा कि छात्रा को न्याय मिले और पूरे प्रकरण में जिम्मेदारी तय हो। इससे स्कूल प्रशासन पर मामले को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखने का दबाव बढ़ा है। नामी स्कूल प्रकरण ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों की शिकायतों को कितनी गंभीरता से लिया जाता है। प्राथमिकी दर्ज होना जांच की शुरुआत है, अंतिम निष्कर्ष नहीं। पुलिस को बिना दबाव के तथ्यों की पड़ताल करनी होगी और स्कूल प्रबंधन को भी अपनी कार्रवाई का स्पष्ट ब्योरा देना चाहिए। छात्रा के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो और विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएकृअब पूरे मामले में यही सबसे अहम कसौटी है।

न्याय यात्रा में गरज रहे कांग्रेसी दिग्गज

धामी सरकार पर हमले से साधा चुनावी निशाना 2027 की जंग से पहले कांग्रेस ने तेज की घेराबंदी जनहित के मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ सियासी पारा चढ़ने लगा है। कांग्रेस की न्याय यात्रा के जरिए पार्टी के दिग्गज नेताओं ने पुष्कर सिंह धामी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार करने का संदेश देने की कोशिश की। मंच से सरकार पर हमलों की बौछार हुई और बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगाई तथा जनसमस्याओं को लेकर भाजपा को कठघरे में खड़ा किया गया। कांग्रेस ने न्याय यात्रा को जनता की आवाज बताते हुए सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपने राजनीतिक एजेंडे को धार देने का प्रयास किया। न्याय यात्रा के बहाने कांग्रेस का मकसद केवल सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि जनता के बीच अपनी राजनीतिक सक्रियता और विपक्ष की भूमिका को प्रभावी ढंग से पेश करना भी है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के तेवरों से साफ है कि कांग्रेस अब चुनावी मुकाबले को लेकर आक्रामक रणनीति अपनाने के मूड में है। भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कांग्रेस नेताओं ने प्रदेश के युवाओं, कर्मचारियों, किसानों और आम लोगों से जुड़े सवालों को प्रमुखता से उठाने की कोशिश की। कांग्रेस के लिए बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ऐसे मुद्दे हैं, जिनके सहारे वह धामी सरकार को चुनावी चुनौती देने की तैयारी में है। पार्टी लगातार सरकार से जवाब मांग रही है कि रोजगार, महंगाई और जनसुविधाओं से जुड़े सवालों पर उसकी उपलब्धियां क्या हैं। न्याय यात्रा में इन मुद्दों को उठाकर कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की कि प्रदेश की जनता की समस्याएं उसके राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में हैं। हालांकि, कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन मुद्दों को केवल भाषणों और विरोध प्रदर्शनों तक सीमित न रखने की है। जनता के बीच प्रभावी विकल्प बनने के लिए पार्टी को आरोपों के साथ ठोस तथ्य, स्पष्ट नीतियां और समाधान भी सामने रखने होंगे। भाजपा सरकार को घेरना एक राजनीतिक रणनीति हो सकती है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए जनता का भरोसा हासिल करना उससे कहीं बड़ी चुनौती है। न्याय यात्रा कांग्रेस के लिए अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का अवसर भी है। प्रदेश में पार्टी लंबे समय से भाजपा के मजबूत संगठन और चुनावी रणनीति का मुकाबला करने की तैयारी में जुटी है। ऐसे में वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी और सरकार के खिलाफ आक्रामक तेवर कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा करने की कोशिश के रूप में देखे जा रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा के पास सत्ता और संगठन की ताकत के साथ अपनी उपलब्धियां गिनाने का अवसर है। ऐसे में कांग्रेस की चुनौती केवल सरकार के खिलाफ माहौल बनाने तक सीमित नहीं रहेगी। उसे यह भी साबित करना होगा कि वह भाजपा के मुकाबले अधिक विश्वसनीय और सक्षम विकल्प दे सकती है। उत्तराखंड में कांग्रेस की न्याय यात्रा को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सियासी जमीन तैयार करने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। सरकार पर हमले, जनसमस्याओं को लेकर लामबंदी और वरिष्ठ नेताओं की सक्रियता के जरिए कांग्रेस चुनावी मुकाबले को धार देने में जुटी है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या न्याय यात्रा का राजनीतिक शोर मतदाताओं के समर्थन में भी बदलेगा? क्या कांग्रेस अपने नेताओं के तेवरों को बूथ स्तर की ताकत में बदल पाएगी? और क्या भाजपा सरकार के खिलाफ उठाए जा रहे सवाल प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की लहर पैदा कर सकेंगे? इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं। इतना जरूर है कि न्याय यात्रा के जरिए कांग्रेस ने चुनाव से पहले अपनी लड़ाई का बिगुल बजा दिया है। अब असली परीक्षा सड़क पर दिखने वाली भीड़ की नहीं, बल्कि जनता के बीच बनने वाले भरोसे की होगी।

मैदान में आप की दस्तक, कांग्रेस-भाजपा की बढ़ी धड़कन

2027 की जंग से पहले मैदानी जिलों में सक्रियता बढ़ाने में जुटी आप तीसरे विकल्प की तलाश और वोटों के नए समीकरण पर रहेगी नजर भाजपा-कांग्रेस, दोनों के चुनावी समीकरणों पर पड़ने की है संभावना देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच आम आदमी पार्टी ने मैदानी जिलों में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने की कोशिश तेज कर दी है। भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर वाले प्रदेश के सियासी मैदान में आप की बढ़ती हलचल नए समीकरणों की संभावनाएं तलाश रही है। पार्टी की नजर खासतौर पर उन मतदाताओं पर है, जो परंपरागत राजनीतिक विकल्पों से असंतुष्ट हैं और बदलाव की राजनीति की तलाश में हैं। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या आम आदमी पार्टी आगामी चुनाव में तीसरे विकल्प के रूप में अपनी जमीन मजबूत कर पाएगी या उसकी सक्रियता केवल चुनावी सरगर्मी तक सीमित रह जाएगी? हरिद्वार, देहरादून और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्रों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के साथ सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन जिलों में शहरी मतदाताओं, युवाओं, व्यापारियों, कर्मचारियों और ग्रामीण आबादी के मुद्दे अलग-अलग हैं। रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली-पानी और स्थानीय निकायों से जुड़े सवाल राजनीतिक दलों के लिए समर्थन जुटाने का आधार बन सकते हैं। आम आदमी पार्टी इन्हीं जनमुद्दों को अपनी राजनीति का आधार बनाकर मतदाताओं तक पहुंचने की संभावनाएं तलाश सकती है। दिल्ली और पंजाब में शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जनसुविधाओं के मुद्दों पर अपनी राजनीति खड़ी करने वाली पार्टी के सामने उत्तराखंड में भी इसी तरह की पहचान स्थापित करने की चुनौती है। हालांकि, दूसरे राज्यों का राजनीतिक अनुभव उत्तराखंड में अपने आप चुनावी सफलता की गारंटी नहीं बन सकता। उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस का संगठनात्मक आधार लंबे समय से मजबूत रहा है। दोनों दलों के पास प्रदेशव्यापी नेतृत्व, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और विधानसभा क्षेत्रों में स्थापित राजनीतिक चेहरे हैं। ऐसे में आप के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल राजनीतिक बयानबाजी करना नहीं, बल्कि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में मजबूत संगठन तैयार करना है। पार्टी को यह भी तय करना होगा कि उसका मुख्य चुनावी मुद्दा क्या होगा और वह भाजपा तथा कांग्रेस से किस तरह अलग राजनीतिक विकल्प पेश करेगी। यदि आप स्थानीय समस्याओं पर लगातार संघर्ष करती है, जनहित के मुद्दों पर ठोस कार्यक्रम प्रस्तुत करती है और अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करती है, तभी उसकी सक्रियता को राजनीतिक विस्तार में बदलने का अवसर मिलेगा। आप की सक्रियता का सबसे दिलचस्प पहलू उसका संभावित चुनावी प्रभाव है। यदि पार्टी कुछ विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावी उम्मीदवार उतारने और अपने पक्ष में मतदाताओं को लामबंद करने में सफल रहती है, तो मुकाबले का गणित प्रभावित हो सकता है। इसका असर भाजपा और कांग्रेस, दोनों के चुनावी समीकरणों पर पड़ने की संभावना रहेगी। हालांकि, आप को केवल वोट काटने वाली पार्टी मान लेना भी जल्दबाजी होगी। तीसरे विकल्प के रूप में उभरने के लिए उसे स्थानीय नेतृत्व, विश्वसनीय उम्मीदवार, निरंतर जनसंपर्क और स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि विकसित करनी होगी। चुनाव के दौरान दिखाई देने वाली सक्रियता और चुनाव के बीच के वर्षों में कायम रहने वाला जनाधार दो अलग-अलग कसौटियां हैं। 2027 का विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए उत्तराखंड में अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता साबित करने का अवसर हो सकता है। मैदानी जिलों में सक्रियता बढ़ाने से पार्टी को अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का मौका मिलेगा, लेकिन असली सवाल यह है कि वह इस मौजूदगी को कितने प्रभावी जनाधार में बदल पाती है। भाजपा और कांग्रेस के लिए भी आप की गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी होगा, लेकिन किसी तीसरे दल की सक्रियता से चुनावी परिणाम स्वतः प्रभावित होंगे, ऐसा मानना उचित नहीं है। चुनावी असर पार्टी के संगठन, उम्मीदवारों, मुद्दों और मतदाताओं के वास्तविक समर्थन पर निर्भर करेगा। फिलहाल उत्तराखंड के मैदानी जिलों में आप की सक्रियता ने तीसरे विकल्प की संभावनाओं पर चर्चा जरूर तेज कर दी है। अब देखना होगा कि पार्टी चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर पाती है या फिर भाजपा-कांग्रेस के वर्चस्व वाले मुकाबले में सीमित भूमिका निभाती है। 2027 की सियासी जंग में आप की असली ताकत नारों से नहीं, बल्कि जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता से तय होगी।

सूबे के गांव-गांव यूकेडी की ‘हुंकार’

भाजपा-कांग्रेस की नींद उड़ाने का है दावा 2027 की जंग में क्षेत्रीय अस्मिता का दांव सत्ता की सियासत में खोई जमीन की जंग देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की चुनावी जंग जैसे-जैसे करीब आ रही है, वैसे-वैसे क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई भी तेज होने लगी है। उत्तराखंड क्रांति दल गांव-गांव दस्तक देकर उस राजनीतिक जमीन को फिर हासिल करने की कोशिश में जुटा है, जिस पर कभी अलग राज्य आंदोलन के दौरान उसका मजबूत दावा था। जिस दल ने उत्तराखंड की अलग पहचान के लिए संघर्ष किया, वही आज सत्ता की राजनीति में हाशिये पर खड़ा दिखाई देता है। अब सवाल यह है कि क्या यूकेडी अपनी आंदोलनकारी विरासत को चुनावी हथियार बना पाएगा या फिर भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की लड़ाई में क्षेत्रीय राजनीति एक बार फिर नारों तक सिमट जाएगी? यूकेडी की गांव-गांव पहुंचने की कोशिश को महज जनसंपर्क अभियान मानना राजनीतिक तस्वीर को अधूरा पढ़ना होगा। इसके पीछे उस असंतोष को राजनीतिक आवाज देने की संभावना है, जो पहाड़ में पलायन, बेरोजगारी, जमीनों पर बढ़ते दबाव, स्थानीय युवाओं के भविष्य और विकास के असमान स्वरूप को लेकर मौजूद है। यही वे सवाल हैं, जिनके आधार पर क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों से अलग अपनी पहचान बना सकता है। लेकिन इस संभावना को वास्तविक राजनीतिक ताकत में बदलना आसान नहीं है। यूकेडी की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि अलग उत्तराखंड की मांग को जनांदोलन बनाने में उसकी ऐतिहासिक भूमिका रही, लेकिन राज्य गठन के बाद वह सत्ता की निर्णायक ताकत नहीं बन सका। राज्य आंदोलन की विरासत उसके पास रही, मगर उसका राजनीतिक लाभ भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल उठाते रहे। नतीजा यह कि जिस क्षेत्रीय चेतना ने उत्तराखंड के निर्माण की जमीन तैयार की, वह विधानसभा की राजनीति में स्थायी जनादेश में तब्दील नहीं हो पाई। यह यूकेडी की सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता भी है और 2027 से पहले उसके सामने सबसे बड़ा सवाल भी। आखिर जनता क्षेत्रीय अस्मिता की बात करने वाले दल को सत्ता के विकल्प के रूप में क्यों नहीं स्वीकार कर सकी? क्या नेतृत्व की खींचतान, संगठन की कमजोरी और चुनावी रणनीति की असफलता ने दल को पीछे धकेला? या फिर भाजपा-कांग्रेस का मजबूत चुनावी ढांचा क्षेत्रीय राजनीति पर भारी पड़ा? इन सवालों से आंख चुराकर यूकेडी अपनी खोई जमीन वापस नहीं पा सकता। उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस की राजनीति लंबे समय से सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती रही है। चुनाव आते ही रोजगार, पलायन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जमीन और स्थानीय अधिकारों जैसे मुद्दे चर्चा में आते हैं, लेकिन जनता के सामने सवाल बना रहता है कि इन समस्याओं का स्थायी समाधान कब निकलेगा। यूकेडी इसी राजनीतिक असंतोष को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर सकता है। लेकिन यहां एक बड़ा पेच है। भाजपा और कांग्रेस से नाराज मतदाता अपने आप यूकेडी के समर्थक नहीं बन जाते। असंतोष को वोट में बदलने के लिए भरोसेमंद नेतृत्व, मजबूत प्रत्याशी, बूथ स्तर का संगठन और स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम चाहिए। यदि यूकेडी केवल राष्ट्रीय दलों को कोसने और क्षेत्रीय अस्मिता की दुहाई देने तक सीमित रहा, तो उसका अभियान चुनावी शोर से आगे नहीं बढ़ पाएगा। पलायन से खाली होते गांव, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार की कमी, जमीनों को लेकर चिंता और संसाधनों पर स्थानीय अधिकारकृये उत्तराखंड की राजनीति के बुनियादी प्रश्न हैं। यूकेडी के पास इन मुद्दों को राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में लाने का अवसर है। मगर उसे यह भी बताना होगा कि सत्ता मिलने पर वह क्या बदलेगा, कैसे बदलेगा और उसके प्रस्तावों को लागू करने का रास्ता क्या होगा। जनता अब केवल भावनात्मक नारों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। उसे यह जानना है कि गांवों में रोजगार कैसे पैदा होगा, पलायन कैसे रुकेगा, पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे सुधरेंगी तथा स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा के लिए कौन-सी ठोस नीतियां बनाई जाएंगी। यूकेडी इन सवालों के स्पष्ट जवाब दे सका, तभी उसकी क्षेत्रीय राजनीति भाजपा-कांग्रेस के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। यूकेडी की राह में सबसे बड़ी बाधा केवल भाजपा-कांग्रेस का वर्चस्व नहीं, बल्कि अपनी संगठनात्मक क्षमता को प्रभावी बनाने की चुनौती भी है। गांवों में पहुंचना जरूरी है, लेकिन उस संपर्क को स्थायी संगठन में बदलना उससे भी ज्यादा जरूरी है। कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व का विस्तार, उम्मीदवारों का चयन और चुनाव के बाद भी जनता के बीच मौजूदगीकृयही तय करेंगे कि दल कितना आगे बढ़ सकता है। यदि यूकेडी चुनाव से पहले सक्रिय और चुनाव के बाद निष्क्रिय रहने वाली राजनीति से बाहर निकलता है, तो उसे क्षेत्रीय मुद्दों पर अपना आधार बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। लेकिन यदि संगठन बिखरा रहा और नेतृत्व एकजुट रणनीति पेश नहीं कर पाया, तो भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ पैदा होने वाला असंतोष भी उसके लिए राजनीतिक लाभ नहीं बन पाएगा। आगामी विधानसभा चुनाव यूकेडी के लिए केवल कुछ सीटें जीतने का मुकाबला नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता साबित करने की परीक्षा भी है। गांव-गांव दस्तक इस दिशा में पहला कदम हो सकती है, लेकिन असली लड़ाई मतदाताओं के विश्वास की है। दल को साबित करना होगा कि वह उत्तराखंड की क्षेत्रीय अस्मिता का नाम लेने भर वाला संगठन नहीं, बल्कि प्रदेश की समस्याओं का व्यावहारिक समाधान देने में सक्षम राजनीतिक विकल्प है। भाजपा और कांग्रेस के लिए भी क्षेत्रीय मुद्दों की अनदेखी करना आसान नहीं होगा, लेकिन यूकेडी की सक्रियता से दोनों दलों की चुनावी जमीन हिल जाएगी, यह मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। उसका वास्तविक प्रभाव संगठन के विस्तार, प्रत्याशियों की ताकत और मतदाताओं के समर्थन से ही सामने आएगा। उत्तराखंड की सियासत का सबसे बड़ा सवाल यही हैकृजिस दल ने अलग राज्य का सपना जनांदोलन बनाया, क्या वह अब उसी राज्य की सत्ता में निर्णायक भूमिका निभा पाएगा? यूकेडी के सामने इतिहास को दोहराने का नहीं, अपनी राजनीतिक गलतियों से आगे निकलने का मौका है। गांवों की चौपाल से उठने वाली आवाज यदि विधानसभा तक पहुंचानी है, तो उसे नारों से आगे बढ़कर संगठन, नेतृत्व और नीतियों की ठोस जमीन तैयार करनी होगी। वरना राज्य आंदोलन की विरासत का हवाला देने वाला दल, राज्य की सत्ता की लड़ाई में हाशिये पर खड़ा एक और चुनाव देखता रह जाएगा।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: दूनघाटी में महिला जज भी ‘असुरक्षित’

udaydinmaan: दूनघाटी में महिला जज भी ‘असुरक्षित’: दून में वर्दी का खौफ खत्म, सड़कों पर बेखौफ अपराधी महिला जाज से अभद्रता, धमकी, अपहरण की कोशिश मामले से खुली राजधानी की कानून-व्यवस्था की पोल ...

udaydinmaan: ...और भाजपा को याद आई ‘वोट चोरी’

udaydinmaan: ...और भाजपा को याद आई ‘वोट चोरी’: कांग्रेस पर हमलावर हुई भाजपा, मतदाता सूची के विवाद ने पकड़ा सियासी तूल भाजपा ने शुरू कर दिया है कांग्रेस पर वोट चोरी के आरोप लगाकर पलटवार यह ...

संगठन को ‘धार’ देने में जुटी भाजपा

2027 के लिए बिछने लगी सियासी बिसात बूथ से विधानसभा तक संगठन होगा मजबूत कार्यकर्ताओं की सक्रियता पर पार्टी का जोर देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही भाजपा ने अपनी चुनावी तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। सत्ता में वापसी की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ पार्टी अब सरकार के कामकाज के साथ संगठन की मजबूती पर भी खास ध्यान दे रही है। बूथ स्तर से लेकर विधानसभा क्षेत्रों तक संगठनात्मक ढांचे को सक्रिय करने, कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय करने और चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने की कवायद तेज हो गई है। भाजपा की कोशिश है कि चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही संगठन को इस स्थिति में पहुंचा दिया जाए कि चुनावी मोर्चे पर उसे किसी तरह की ढिलाई का सामना न करना पड़े। भाजपा के सामने 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की चुनौती है। पार्टी इसे केवल सरकार के कामकाज के आधार पर नहीं, बल्कि मजबूत संगठन, सक्रिय कार्यकर्ताओं और बूथ स्तर पर प्रभावी प्रबंधन के दम पर जीतने की रणनीति बना रही है। यही वजह है कि प्रदेश संगठन चुनावी तैयारियों को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ा रहा है। प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाने के लिए विस्तारक योजना को अहम हथियार बनाया गया है। इस योजना के तहत पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की तैनाती और विधानसभा स्तर पर संगठन की गतिविधियों को गति देने पर जोर है। पार्टी का मकसद केवल चुनाव के समय कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना नहीं, बल्कि अभी से मतदाताओं के बीच संपर्क बढ़ाना और स्थानीय स्तर पर संगठन की पकड़ मजबूत करना है। भाजपा की रणनीति में बूथ प्रबंधन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। पार्टी जानती है कि प्रदेश में सत्ता बरकरार रखने के लिए केवल बड़े नेताओं की सभाओं और राजनीतिक नारों से काम नहीं चलेगा। इसके लिए प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय मुद्दों की समझ और मतदाताओं से लगातार संवाद जरूरी होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाना भी संगठन की प्राथमिकताओं में शामिल है। पार्टी सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने की तैयारी में है। इसके साथ ही संगठनात्मक बैठकों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद के जरिए चुनावी संदेश को एकरूप बनाने की कोशिश की जा रही है। भाजपा के लिए यह भी जरूरी है कि सरकार की उपलब्धियों के साथ जनता की शिकायतों और स्थानीय समस्याओं पर भी ध्यान दिया जाए। बेरोजगारी, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोप विपक्ष के प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। ऐसे में संगठन की मजबूती का असली इम्तिहान केवल बैठकों और अभियानों की संख्या नहीं, बल्कि जनता के बीच पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाने में होगा। भाजपा के सामने एक तरफ लगातार तीसरी जीत का लक्ष्य है, तो दूसरी तरफ सत्ता विरोधी रुझान को नियंत्रित रखने की चुनौती भी है। पार्टी नेतृत्व संगठन को चुनाव के लिए तैयार कर रहा है, लेकिन उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय बना रहे तथा टिकट की दावेदारी को लेकर संभावित असंतोष समय रहते संभाला जा सके। उत्तराखंड की राजनीति में स्थानीय समीकरण, क्षेत्रीय असंतोष और प्रत्याशियों की छवि अक्सर चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं। इसलिए भाजपा की रणनीति में प्रदेशव्यापी अभियान के साथ विधानसभा क्षेत्रों की अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार तैयारी करना भी महत्वपूर्ण होगा। कांग्रेस सहित विपक्षी दल सरकार को बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और जनहित के मुद्दों पर घेरने की तैयारी में हैं। ऐसे में भाजपा संगठन को अधिक सक्रिय बनाकर विपक्ष के हमलों का जवाब देने और अपने पक्ष में राजनीतिक माहौल तैयार करने की कोशिश करेगी। फिलहाल भाजपा का जोर संगठनात्मक ढांचे को चुस्त-दुरुस्त करने, कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपने और चुनावी प्रबंधन को मजबूत बनाने पर है। पार्टी के लिए असली परीक्षा यह होगी कि संगठन की यह सक्रियता कितनी प्रभावी ढंग से जमीन पर दिखाई देती है। 2027 की चुनावी लड़ाई में भाजपा की रणनीति का निर्णायक पहलू यही होगा कि वह अपने संगठनात्मक दावों को वोट में बदलने में कितनी सफल रहती है।

...और भाजपा को याद आई ‘वोट चोरी’

कांग्रेस पर हमलावर हुई भाजपा, मतदाता सूची के विवाद ने पकड़ा सियासी तूल भाजपा ने शुरू कर दिया है कांग्रेस पर वोट चोरी के आरोप लगाकर पलटवार यह दलों की जुबानी जंग अब राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल बनती दिख रही देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट तेज होते ही भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी घमासान भी तेज होने लगा है। अब तक कांग्रेस जहां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सवाल उठाती रही है, वहीं भाजपा नेताओं ने भी कांग्रेस पर वोट चोरी के आरोप लगाकर पलटवार शुरू कर दिया है। चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर छिड़ी यह जुबानी जंग अब राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल बनती दिख रही है। सवाल यह है कि मतदाताओं के अधिकारों की चिंता करने वाले राजनीतिक दलों की प्राथमिकता वास्तव में पारदर्शी चुनाव व्यवस्था है या फिर मतदाता सूची के बहाने एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने की सियासी कवायद? उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद बड़ी संख्या में नाम हटने और नए नाम जुड़ने के आंकड़ों ने राजनीतिक दलों को आमने-सामने ला दिया है। कांग्रेस लगातार मतदाता सूची में नाम काटे जाने को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी की आशंका है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया का असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर भाजपा कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश के रूप में पेश कर रही है और अब खुद भी वोट चोरी का आरोप लगाकर विपक्ष को घेर रही है। मतदाता सूची में संशोधन निर्वाचन प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन जब बड़े पैमाने पर नाम हटने की बात सामने आए तो यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलती से न कटे। इसी तरह राजनीतिक दलों को भी आरोप लगाने से पहले ठोस तथ्य सामने रखने चाहिए। केवल राजनीतिक बयानबाजी से न तो किसी का आरोप साबित होता है और न ही मतदाताओं की शंकाओं का समाधान। भाजपा नेताओं की ओर से कांग्रेस पर वोट चोरी के आरोप ऐसे समय लगाए जा रहे हैं, जब दोनों दलों ने 2027 की चुनावी लड़ाई के लिए अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने में जुटी है। कांग्रेस बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और जनहित के मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। ऐसे में मतदाता सूची का विवाद दोनों दलों के लिए एक-दूसरे पर राजनीतिक बढ़त बनाने का माध्यम बनता दिखाई दे रहा है। भाजपा की रणनीति कांग्रेस को रक्षात्मक स्थिति में लाने की हो सकती है, जबकि कांग्रेस मतदाता सूची में गड़बड़ी की आशंकाओं को लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर उठा रही है। मगर इस राजनीतिक टकराव के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल पीछे छूटना नहीं चाहिए कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटे हैं, उनमें कितने अपात्र थे और कितने पात्र मतदाताओं के नाम किसी त्रुटि के कारण कटे हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े आंकड़े चुनावी बहस का केंद्र बन चुके हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों को आंकड़ों की अपनी-अपनी व्याख्या करने के बजाय उन मामलों को सामने लाना चाहिए, जिनमें कथित गड़बड़ी हुई है। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है तो उसकी बहाली सुनिश्चित होनी चाहिए। वहीं, यदि किसी राजनीतिक दल के पास वोट चोरी के प्रमाण हैं तो उन्हें संबंधित निर्वाचन अधिकारियों के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में मतदाता सूची की विश्वसनीयता चुनाव की निष्पक्षता की बुनियाद है। इस पर संदेह पैदा करने वाले आरोप गंभीर हैं और उनका निपटारा भी तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाकर राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला जैसे-जैसे नजदीक आएगा, वैसे-वैसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के और तीखे होने की संभावना है। भाजपा सत्ता में वापसी की तैयारी कर रही है तो कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में जुटी है। मतदाता सूची का विवाद अब इसी चुनावी रणनीति का हिस्सा बनता जा रहा है। लेकिन जनता के लिए असली मुद्दा यह नहीं है कि कौन-सी पार्टी किस पर वोट चोरी का आरोप लगा रही है। असली सवाल यह है कि क्या प्रत्येक पात्र मतदाता को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने का अवसर मिलेगा? लोकतंत्र में वोट किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं, जनता का अधिकार है। इस अधिकार पर सवाल उठे तो उसका जवाब नारों से नहीं, निष्पक्ष जांच, पारदर्शी प्रक्रिया और ठोस प्रमाणों से दिया जाना चाहिए।

‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’

विस चुनाव से पहले कांग्रेस पर हमलावर हो गई है भाजपा सियासी संग्राम को सड़क से सदन तक ले जाने की तैयारी कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक मोर्चेबंदी तेज कर दी है। ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान के जरिए भाजपा विपक्ष को घेरने और कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में जुटी है। कांग्रेस की न्याय यात्रा से लेकर विधानसभा घेराव तक को भाजपा जहां राजनीतिक हताशा से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष सरकार पर जनहित के मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगाता रहा है। ऐसे में प्रदेश की राजनीति में मुद्दों की लड़ाई अब आरोपों और प्रत्यारोपों के नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है। भाजपा के लिए यह अभियान केवल कांग्रेस के विरोध का कार्यक्रम नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव से पहले राजनीतिक विमर्श की दिशा तय करने की कोशिश भी है। पार्टी चाहती है कि चुनावी बहस बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सरकार के खिलाफ विपक्ष के आरोपों तक सीमित न रहे, बल्कि कांग्रेस के आंदोलनों, उसके राजनीतिक आचरण और विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल उठें। कांग्रेस प्रदेश में न्याय यात्रा और विधानसभा घेराव जैसे कार्यक्रमों के जरिए सरकार को घेरने में जुटी है। भाजपा इन आंदोलनों को जनसमस्याओं के समाधान की लड़ाई के बजाय राजनीतिक प्रदर्शन करार दे रही है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद जनता के सवालों का ठोस समाधान नहीं दे पाई और अब आंदोलनों के जरिए राजनीतिक जमीन तलाश रही है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस को जनता के मुद्दों से अधिक राजनीतिक टकराव में दिलचस्पी है। हालांकि, विपक्ष के आंदोलनों को केवल राजनीतिक नाटक बताने से उन सवालों का जवाब नहीं मिल जाता, जिन्हें लेकर कांग्रेस सरकार को घेर रही है। यही वह मोर्चा है, जहां भाजपा को अपने आरोपों के साथ सरकार के कामकाज और उपलब्धियों का हिसाब भी जनता के सामने रखना होगा। ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ जैसे नारे के जरिए भाजपा कांग्रेस को राजनीतिक रूप से घेरना चाहती है। इस संदेश में विपक्ष के आंदोलनों को अराजकता से जोड़ने और सत्तारूढ़ दल को लोकतांत्रिक व्यवस्था के पक्षधर के रूप में पेश करने की कोशिश दिखाई देती है। लेकिन लोकतंत्र में सरकार का विरोध करना, जनसमस्याओं पर सवाल उठाना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना विपक्ष का संवैधानिक अधिकार भी है। ऐसे में अभियान की राजनीतिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भाजपा विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई किसी कथित अव्यवस्था के ठोस तथ्य सामने रख पाती है या फिर यह अभियान केवल चुनावी नारेबाजी तक सीमित रह जाता है। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले दोनों पक्षों की जवाबदेही है कि वह राजनीतिक विरोध और अराजकता के बीच का अंतर स्पष्ट रखें। उत्तराखंड में भाजपा के सामने लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की चुनौती है, जबकि कांग्रेस सरकार को घेरकर सत्ता परिवर्तन की उम्मीद लगाए बैठी है। भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने में जुटी है। दूसरी ओर कांग्रेस आंदोलनों के जरिए सरकार के खिलाफ माहौल तैयार करना चाहती है। इसी टकराव के बीच भाजपा का नया अभियान चुनाव से पहले विपक्ष की धार कुंद करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। पार्टी चाहती है कि कांग्रेस को जनता के सामने अपने आंदोलनों का औचित्य साबित करना पड़े। वहीं कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह अपने विरोध प्रदर्शनों को केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन तक सीमित न रखकर जनता के ठोस सवालों से जोड़कर रखे। चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के अभियान तेज होना स्वाभाविक है, लेकिन जनता के लिए नारों से ज्यादा महत्व उन समस्याओं का है, जिनसे उसका रोजमर्रा का जीवन प्रभावित होता है। बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, भ्रष्टाचार और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति जैसे सवाल चुनावी बहस के केंद्र में बने रहेंगे। भाजपा का ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान कांग्रेस को राजनीतिक रूप से घेरने में कितना सफल होगा, यह आने वाला समय बताएगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2027 की लड़ाई अब केवल सरकार बनाम विपक्ष नहीं रह गई है। यह जनता के सामने अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता साबित करने और चुनावी विमर्श पर पकड़ बनाने की लड़ाई भी बनती जा रही है।

कमल थामने वालों का ‘सैलाब’

हैट्रिक के दावे से गरमा गई सियासत कसक मिटाने के लिए शक्ति प्रदर्शन मिथक टूटने से पहले जीत का दावा देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने अपने इरादे जाहिर करने शुरू कर दिए हैं। कमल थामने वालों की बढ़ती संख्या को पार्टी अपनी ताकत और विपक्ष की कमजोरी के संकेत के रूप में पेश कर रही है। भाजपा नेताओं का दावा है कि जिस राजनीतिक मिथक को हरिद्वार में तोड़ने की कसक पिछली बार रह गई थी, इस बार सत्ता की हैट्रिक के साथ उसे भी ध्वस्त कर दिया जाएगा। यानी चुनाव से पहले ही भाजपा ने जीत का नैरेटिव गढ़ना शुरू कर दिया है। सवाल यह है कि कमल थामने वालों का सैलाब वास्तव में भाजपा की लोकप्रियता का संकेत है या फिर चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं में जोश भरने की सियासी कवायद? भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी अपनी चुनावी ताकत के विस्तार के रूप में दिखा रही है। हर नए चेहरे के साथ संगठन यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि 2027 की लड़ाई में कमल की ओर आकर्षण बढ़ रहा है। दूसरी तरफ, दूसरे दलों से आने वालों की संख्या को लेकर भाजपा के भीतर भी यह सवाल उठ सकता है कि नए चेहरों को जगह देने के साथ पुराने कार्यकर्ताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का संतुलन कैसे साधा जाएगा। सियासत में किसी नेता का दल बदलना अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं होता। नए लोगों के आने से संगठन का विस्तार जरूर हो सकता है, लेकिन उसका वोटों में कितना रूपांतरण होगा, यह क्षेत्रीय समीकरण, प्रत्याशी की छवि और स्थानीय मुद्दे तय करते हैं। इसलिए भाजपा के लिए असली चुनौती केवल कमल थामने वालों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि इस राजनीतिक जमावड़े को चुनावी समर्थन में बदलना होगा। उत्तराखंड की राजनीति में हरिद्वार का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यहां बड़ी संख्या में विधानसभा सीटें हैं, बल्कि इसलिए भी है कि जिले के चुनावी समीकरण प्रदेश की सत्ता की लड़ाई को प्रभावित करते हैं। भाजपा के लिए हरिद्वार में अपनी स्थिति मजबूत करना और पिछली चुनावी चुनौतियों से पार पाना रणनीतिक रूप से अहम है। पार्टी नेताओं का हैट्रिक का दावा इसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को उजागर करता है। भाजपा चाहती है कि चुनाव से पहले ही यह संदेश स्थापित हो जाए कि प्रदेश में सत्ता की वापसी को लेकर संगठन आश्वस्त है। मगर हरिद्वार की जमीन पर जीत का रास्ता केवल दावों से नहीं निकलेगा। यहां जातीय और सामाजिक समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, ग्रामीण समस्याएं तथा मतदाताओं की नाराजगी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं। भाजपा के लिए लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटना अपने आप में बड़ी राजनीतिक उपलब्धि होगी। पार्टी इसे सरकार के कामकाज, संगठन की मजबूती और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व से जोड़कर पेश कर सकती है। लेकिन सत्ता में वापसी की राह में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के आरोप, स्थानीय असंतोष और विपक्ष के हमले जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं। कमल थामने वालों की तस्वीरें और हैट्रिक के नारे कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा कर सकते हैं, लेकिन मतदाता का मन पढ़ने का कोई आसान तरीका नहीं है। चुनावी राजनीति में कई बार मंच पर दिखाई देने वाला उत्साह मतदान केंद्र तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर पड़ जाता है। इसलिए भाजपा को यह साबित करना होगा कि नए राजनीतिक साथियों का जुड़ना केवल सुर्खियां बनाने का माध्यम नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर संगठन और जनसमर्थन बढ़ने का संकेत है। यदि भाजपा में दूसरे दलों के नेताओं का प्रवेश लगातार जारी रहता है तो विपक्ष के लिए यह राजनीतिक चुनौती बन सकता है। इससे कांग्रेस के संगठन और संभावित प्रत्याशियों के मनोबल पर असर पड़ने की संभावना है। हालांकि, दल-बदल को सीधे विपक्ष के कमजोर होने का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। कई बार स्थानीय स्तर पर नए समीकरण पुराने राजनीतिक आधार को भी चुनौती देते हैं। भाजपा का संदेश साफ हैकृइस बार केवल सत्ता में वापसी नहीं, बल्कि पिछली कसक मिटाकर इतिहास रचने का लक्ष्य है। मगर सियासत में जीत की घोषणा पहले और परिणाम बाद में आते हैं। कमल थामने वालों का सैलाब यदि वोटों की सुनामी में बदलता है, तभी हैट्रिक का दावा हकीकत बनेगा। वरना चुनाव से पहले किए गए बड़े-बड़े दावे नतीजों के बाद राजनीतिक आत्ममंथन का कारण भी बन सकते हैं।

दूनघाटी में महिला जज भी ‘असुरक्षित’

दून में वर्दी का खौफ खत्म, सड़कों पर बेखौफ अपराधी महिला जाज से अभद्रता, धमकी, अपहरण की कोशिश मामले से खुली राजधानी की कानून-व्यवस्था की पोल देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में जब एक महिला न्यायाधीश की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो जाएं, तो आम महिलाओं की सुरक्षा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। स्मार्ट सिटी के दावों, पुलिस की मुस्तैदी के बखान और कानून-व्यवस्था के सरकारी भरोसों के बीच राजधानी की सड़कों पर महिलाओं की सुरक्षा आखिर कहां खड़ी है? महिला न्यायाधीश के साथ कथित अभद्रता, धमकी, छेड़छाड़ और अपहरण के प्रयास का मामला सामने आने के बाद पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। देहरादून में तैनात अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश एडीजे-5 ने डालनवाला थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई है। शिकायत के अनुसार, एक रैपिडो चालक ने तय किराये से दोगुने पैसे मांगे। आरोप है कि इसके बाद चालक उन्हें सुनसान और अंधेरे रास्ते की ओर ले गया तथा धमकाने और गलत इरादे से व्यवहार करने की कोशिश की। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने आरोपी की तलाश शुरू कर दी है। यह मामला महज किराये को लेकर हुए विवाद तक सीमित नहीं है। शिकायत में जिस तरह के आरोप लगाए गए हैं, वह राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा और सार्वजनिक परिवहन सेवाओं की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। यदि यात्रा के लिए बुक की गई सेवा ही किसी महिला के लिए भय और असुरक्षा का कारण बनने लगे, तो फिर सुरक्षा के दावों की हकीकत पर सवाल उठना लाजिमी है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि मामला न्यायपालिका से जुड़ी एक महिला अधिकारी का है। जब कानून की रक्षा करने वाली व्यवस्था से जुड़ी महिला को ही ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़े, तो आम महिला के मन में सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा होना स्वाभाविक है। हालांकि, आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही होगी, लेकिन घटना ने पुलिस की जवाबदेही का सवाल जरूर सामने ला दिया है। राजधानी में पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी अपराध होने के बाद आरोपी को तलाशना ही नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था तैयार करना भी है। सवाल यह है कि सार्वजनिक परिवहन सेवाओं से जुड़े चालकों के सत्यापन, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और महिलाओं की आपातकालीन सुरक्षा के इंतजाम कितने प्रभावी हैं? अगर पुलिस केवल प्राथमिकी दर्ज करने और आरोपी की तलाश शुरू करने तक सीमित रह जाती है, तो महिलाओं में भरोसा कैसे कायम होगा? जरूरत इस बात की है कि आरोपी को जल्द गिरफ्तार कर निष्पक्ष जांच की जाए और शिकायत में लगाए गए प्रत्येक आरोप की गंभीरता से पड़ताल हो। देहरादून तेजी से फैलता शहर है। आबादी बढ़ रही है, यातायात का दबाव बढ़ रहा है और सार्वजनिक परिवहन के नए माध्यम भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था को भी उसी अनुपात में मजबूत होना चाहिए। लेकिन महिला न्यायाधीश से जुड़े इस मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था बदलते शहरी हालात के अनुरूप तैयार है? महिलाओं की सुरक्षा केवल सरकारी विज्ञापनों, बैठकों और दावों से सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए सड़कों पर प्रभावी पुलिस गश्त, संवेदनशील इलाकों में निगरानी, परिवहन सेवाओं के चालकों का सत्यापन और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई जरूरी है। देहरादून में महिला न्यायाधीश से जुड़े इस मामले की निष्पक्ष जांच और आरोपी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई अब पुलिस की कसौटी है। राजधानी की महिलाओं को भरोसा चाहिए कि उनकी सुरक्षा केवल कागजों और दावों तक सीमित नहीं है। सवाल सिर्फ एक महिला अधिकारी का नहीं, बल्कि उस हर महिला का है, जिसे देहरादून की सड़कों पर बिना किसी डर के सफर करने का अधिकार है।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: अंकिता केस पर चुनावी रण की आहट

udaydinmaan: अंकिता केस पर चुनावी रण की आहट: 2027 के चुनाव से पहले फिर गरमाएगा अंकिता भंडारी प्रकरण न्याय की मांग के बहाने सरकार को घेरने की रणनीति में विपक्ष सड़कों से विधानसभा तक उठ सक...

udaydinmaan: 200 करोड़ की संपत्ति पर सियासी भूचाल

udaydinmaan: 200 करोड़ की संपत्ति पर सियासी भूचाल: कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या के पति के आरोपों से सरकार असहज विपक्ष ने मांगा हिसाब तो निष्पक्ष जांच की मांग ने बढ़ाया दबाव संपत्ति के स्रोत से ले...

अंकिता केस पर चुनावी रण की आहट

2027 के चुनाव से पहले फिर गरमाएगा अंकिता भंडारी प्रकरण न्याय की मांग के बहाने सरकार को घेरने की रणनीति में विपक्ष सड़कों से विधानसभा तक उठ सकता है अंकिता का यह मुद्दा देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर सियासत के केंद्र में आता दिख रहा है। न्याय की मांग को लेकर उठती आवाजों और राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने इस प्रकरण को फिर गरमा दिया है। संकेत हैं कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा सड़क से सदन तक गूंज सकता है। विपक्ष जहां इसे सरकार की जवाबदेही से जोड़कर चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है, वहीं भाजपा के सामने इस मामले में उठ रहे सवालों का जवाब देने और जनता के बीच अपना पक्ष मजबूती से रखने की चुनौती है। अंकिता भंडारी प्रकरण उत्तराखंड में केवल एक आपराधिक मामला नहीं रह गया है। यह महिला सुरक्षा, सत्ता की जवाबदेही और कथित वीआइपी की भूमिका से जुड़े सवालों का प्रतीक बन चुका है। मामले में दोषी ठहराए गए तीन आरोपितों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है, लेकिन कथित वीआइपी की भूमिका को लेकर उठती मांगों और सीबीआइ जांच से जुड़ी चर्चाओं ने इस प्रकरण को राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाए रखा है। ऐसे में चुनाव से पहले इस मुद्दे का फिर उभरना प्रदेश की राजनीति में नए टकराव की जमीन तैयार कर सकता है। अंकिता के माता-पिता की ओर से न्याय की मांग और मामले से जुड़े शेष सवालों को लेकर उठती आवाजें राजनीतिक दलों के लिए भी अहम हो गई हैं। हाल के घटनाक्रम में अंकिता के माता-पिता को दिल्ली में इंडिया गेट पर धरना शुरू करने के दौरान पुलिस ने हिरासत में लिया था। इस घटनाक्रम ने मामले को प्रदेश की सीमाओं से बाहर भी चर्चा में ला दिया। विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने का नया आधार मिला है, जबकि सत्तारूढ़ दल के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह जांच और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष स्पष्ट करे। कांग्रेस पहले से ही इस प्रकरण को लेकर भाजपा पर हमलावर रही है। पार्टी का जोर इस सवाल पर है कि यदि दोषियों को सजा मिल चुकी है, तो कथित वीआइपी की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों का अंतिम और स्पष्ट जवाब कब मिलेगा? कांग्रेस इस मुद्दे को महिला सम्मान, न्याय और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, आरोपों और आशंकाओं को प्रमाणित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। मामले में जो कुछ न्यायिक रूप से स्थापित है और जो जांच के दायरे में है, दोनों के बीच अंतर बनाए रखना भी जरूरी है। भाजपा के लिए अंकिता प्रकरण इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में महिला सम्मान और पहाड़ की बेटी को न्याय दिलाने का भाव व्यापक जनभावनाओं से जुड़ा है। पार्टी के नेता पहले भी कांग्रेस पर इस मामले का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगाते रहे हैं। भाजपा का तर्क रहा है कि सरकार ने एसआइटी गठित कर जांच कराई और आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई हुई। लेकिन विपक्ष का संभावित सवाल इससे आगे का हैकृक्या मामले से जुड़े सभी सवालों का संतोषजनक जवाब मिल गया है? यही वह बिंदु है, जहां सरकार का प्रशासनिक पक्ष और विपक्ष का राजनीतिक हमला आमने-सामने आ सकते हैं। सरकार के लिए केवल पूर्व में की गई कार्रवाई गिनाना पर्याप्त नहीं होगा। उसे जांच की वर्तमान स्थिति और कानूनी प्रक्रिया से संबंधित तथ्यों को स्पष्टता से सामने रखना होगा। दूसरी ओर, विपक्ष को भी आरोपों की राजनीति से आगे बढ़कर तथ्यों और जवाबदेही के आधार पर अपनी बात रखनी होगी। यदि अंकिता प्रकरण को लेकर आंदोलन तेज होता है, तो विधानसभा के आगामी सत्र में भी इसकी गूंज सुनाई दे सकती है। विपक्ष सरकार से जांच की स्थिति, सीबीआइ की भूमिका और कथित वीआइपी से संबंधित सवालों पर जवाब मांग सकता है। सदन के भीतर सवाल, स्थगन प्रस्ताव या अन्य संसदीय माध्यमों से सरकार को घेरने की कोशिश हो सकती है। हालांकि, इस मुद्दे पर किसी औपचारिक रणनीति या कार्यक्रम की घोषणा होने तक इसे संभावित राजनीतिक दिशा के रूप में ही देखा जाना चाहिए। सड़क पर आंदोलन और सदन में सवालों का दबाव एक साथ बना, तो सरकार के लिए राजनीतिक मोर्चे पर मुश्किलें बढ़ सकती हैं। खासकर तब, जब विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीने शेष रहने पर हर बड़ा मुद्दा जनमत को प्रभावित करने की क्षमता रखता हो। अंकिता प्रकरण में भावनात्मक पहलू भी मजबूत है, इसलिए राजनीतिक दलों की रणनीति का असर उनके समर्थकों से आगे व्यापक मतदाता वर्ग पर पड़ सकता है। 2027 के चुनाव में अंकिता भंडारी हत्याकांड कितना प्रभाव डालेगा, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह मुद्दा भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक संघर्ष का एक अहम हिस्सा बन सकता है। कांग्रेस इसे सरकार की जवाबदेही का सवाल बनाना चाहेगी, जबकि भाजपा की कोशिश होगी कि मामले में हुई कार्रवाई को सामने रखकर विपक्ष के आरोपों का जवाब दिया जाए। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि अंकिता को न्याय दिलाने की मांग राजनीतिक नारेबाजी तक सीमित न रह जाए। परिवार के सवालों का तथ्यात्मक जवाब, जांच की पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा बहाल करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। चुनावी राजनीति अपनी जगह है, लेकिन किसी बेटी को न्याय दिलाने का सवाल किसी दल के राजनीतिक हित से बड़ा है। फिलहाल संकेतों की राजनीति शुरू हो चुकी है। यदि आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला और विपक्ष ने इसे संगठित तरीके से उठाया, तो अंकिता प्रकरण चुनाव से पहले सड़क से सदन तक सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि विपक्ष इस मुद्दे पर आंदोलन की औपचारिक घोषणा कब करता है और सरकार उठते सवालों का जवाब किस तरह देती है।

बैन बेअसर, केदारनाथ में रीलबाजों का खेला

प्रतिबंध के बावजूद धाम में नहीं थम रहा रील बनाने का सिलसिला जारी आस्था के केंद्र को सोशल मीडिया का मंच बनाने वालों पर कार्रवाई कब जिम्मेदार तंत्र की निगरानी के बावजूद रीलबाजों के हौसले इतने बुलंद कैसे देहरादून। बाबा केदार के दरबार में नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं। केदारनाथ धाम में मोबाइल फोन के इस्तेमाल और रील बनाने पर प्रतिबंध के बावजूद कैमरे चमक रहे हैं, वीडियो बन रहे हैं और आस्था के इस पवित्र केंद्र को सोशल मीडिया पर लोकप्रियता बटोरने का मंच बनाया जा रहा है। सवाल यह है कि जब प्रतिबंध लगा दिया गया है, तो उसका पालन कौन कराएगा? आखिर जिम्मेदार तंत्र की निगरानी के बावजूद रीलबाजों के हौसले इतने बुलंद कैसे हैं? केदारनाथ धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां लोग बाबा के दर्शन, पूजा-अर्चना और आध्यात्मिक शांति की तलाश में पहुंचते हैं। लेकिन कुछ लोगों के लिए धाम की यात्रा भक्ति से ज्यादा सोशल मीडिया पर दिखावे का जरिया बनती नजर आ रही है। कभी कैमरे के सामने अभिनय, कभी आकर्षक दृश्यों के साथ वीडियो और कभी लाइक व फालोअर बढ़ाने की होड़कृइन गतिविधियों ने धार्मिक मर्यादा और व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल प्रतिबंध के प्रभावी क्रियान्वयन का है। यदि धाम में रील बनाने पर रोक है, तो नियम तोड़ने वालों को रोका क्यों नहीं जा रहा? क्या निगरानी की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है या फिर कार्रवाई के अभाव में प्रतिबंध केवल कागजी आदेश बनकर रह गया है? प्रशासन को स्पष्ट करना होगा कि नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई है और आगे निगरानी के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है। सिर्फ प्रतिबंध की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं होता। नियम तभी प्रभावी होते हैं, जब उनका पालन सुनिश्चित कराया जाए। यदि कोई व्यक्ति खुलेआम नियम तोड़ता है और उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, तो दूसरे लोगों को भी यही संदेश जाता है कि आदेशों की अनदेखी करने पर कोई खास परेशानी नहीं होगी। केदारनाथ जैसे संवेदनशील धार्मिक स्थल पर ऐसी ढिलाई व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। सोशल मीडिया के दौर में हर पल को कैमरे में कैद करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। लेकिन क्या हर जगह कैमरा चलाना जरूरी है? धार्मिक स्थलों की अपनी मर्यादा और व्यवस्थाएं होती हैं। यहां श्रद्धालुओं की सुविधा, पूजा-पद्धति और आध्यात्मिक वातावरण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। लोकप्रियता की दौड़ में यदि लोग इन बातों को भूल रहे हैं, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि धार्मिक संवेदनशीलता की अनदेखी भी है। हालांकि, यह भी जरूरी है कि प्रशासन प्रतिबंध के दायरे और उसके लागू होने की शर्तों को स्पष्ट करे। सामान्य मोबाइल इस्तेमाल, फोटोग्राफी और प्रतिबंधित क्षेत्र में रील बनाने के नियमों के बीच भ्रम नहीं रहना चाहिए। नियम स्पष्ट होंगे, तभी उनका निष्पक्ष और प्रभावी पालन कराया जा सकेगा। केदारनाथ में व्यवस्थाओं की निगरानी करने वाले अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। प्रतिबंध के बावजूद यदि रील बनाने की घटनाएं सामने आ रही हैं, तो प्रशासन को निगरानी व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए। संवेदनशील स्थानों पर स्पष्ट सूचना-पट्ट, नियमित निगरानी और उल्लंघन की स्थिति में नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है। साथ ही, सोशल मीडिया मंचों पर धार्मिक स्थलों के नाम पर लोकप्रियता हासिल करने की होड़ को बढ़ावा देने वालों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हर दृश्य को मनोरंजन और प्रचार की सामग्री में बदलना जरूरी नहीं है। आस्था का सम्मान केवल माथा टेकने से नहीं, बल्कि उस स्थान की मर्यादा और नियमों का पालन करने से भी होता है। केदारनाथ धाम की गरिमा बनाए रखना प्रशासन और श्रद्धालुओं, दोनों की जिम्मेदारी है। लेकिन जब प्रतिबंध के बावजूद नियम टूटने की खबरें सामने आती हैं, तो पहला सवाल व्यवस्था से ही पूछा जाएगा। आखिर कब तक आदेश जारी होते रहेंगे और नियम टूटते रहेंगे? बाबा केदार के दरबार में आस्था सर्वाेपरि होनी चाहिए, न कि लाइक, व्यूज और फालोअर की भूख। अब जरूरत केवल प्रतिबंध दोहराने की नहीं, बल्कि उसे जमीन पर प्रभावी बनाने की है।

200 करोड़ की संपत्ति पर सियासी भूचाल

कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या के पति के आरोपों से सरकार असहज विपक्ष ने मांगा हिसाब तो निष्पक्ष जांच की मांग ने बढ़ाया दबाव संपत्ति के स्रोत से लेकर विभागीय कामकाज तक उठ रहे सवाल देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या से जुड़ा विवाद अब सरकार के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है। पति गिरधारी लाल साहू की ओर से करीब 210 करोड़ रुपये की कथित अवैध संपत्ति अर्जित करने के आरोप लगाए जाने के बाद मामला केवल पारिवारिक विवाद तक सीमित नहीं रहा। आरोपों की जांच की मांग सतर्कता अधिष्ठान तक पहुंच चुकी है। कांग्रेस सरकार को घेर रही है, वहीं निष्पक्ष जांच की मांग ने सत्ता पक्ष के सामने भी जवाबदेही का सवाल खड़ा कर दिया है। मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि आरोप किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ने नहीं, बल्कि मंत्री के पति ने लगाए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से कथित संपत्ति और विभाग में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कराने की मांग की है। हालांकि, 210 करोड़ रुपये की कथित संपत्ति और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में जांच के जरिए ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है। विवाद की शुरुआत तब हुई, जब रेखा आर्या ने अपने पति गिरधारी लाल साहू के खिलाफ मारपीट, उत्पीड़न, जातिसूचक टिप्पणी और जान से मारने की धमकी देने के आरोपों में मुकदमा दर्ज कराया। इसके बाद गिरधारी लाल साहू ने वीडियो जारी कर मंत्री पर कथित अवैध संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया और जांच की मांग की। पुलिस ने मंत्री की शिकायत पर जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया है। इस घटनाक्रम ने भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ मंत्री की शिकायत पर पुलिस कार्रवाई और जांच चल रही है, दूसरी तरफ उन्हीं पर लगाए गए आर्थिक अनियमितताओं के आरोपों ने राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया है। अब सरकार के सामने चुनौती है कि वह दोनों पक्षों से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे और किसी भी सवाल को अनुत्तरित न छोड़े। कांग्रेस ने इस प्रकरण को लेकर मुख्यमंत्री और भाजपा नेतृत्व की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि जब एक मंत्री के खिलाफ इतनी बड़ी राशि की कथित अवैध संपत्ति के आरोप सामने आए हैं, तो सरकार को जांच के संबंध में स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। विपक्ष यह भी सवाल उठा रहा है कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं। कांग्रेस के लिए यह मामला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पार्टी इसे भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और सरकार की जवाबदेही से जोड़कर उठा सकती है। हालांकि, विपक्ष के आरोपों और मंत्री के पति के दावों को जांच से पहले प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। मामले में 17 अक्टूबर को अधिवक्ता पंकज सिंह क्षेत्री ने सतर्कता अधिष्ठान में शिकायत देकर कथित संपत्ति के स्रोतों की जांच की मांग की। शिकायत में चल-अचल संपत्तियों, बैंक खातों, निवेश, कंपनियों, शेयरों और अन्य वित्तीय हितों से संबंधित अभिलेखों की पड़ताल करने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता ने यह भी मांग की है कि संपत्तियों का मिलान संबंधित व्यक्तियों की ज्ञात और वैध आय से किया जाए। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब विवाद राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर जांच की मांग के औपचारिक स्तर तक पहुंच गया है। लेकिन शिकायत दर्ज होने या जांच की मांग किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि आरोप साबित हो गए हैं। वास्तविक स्थिति दस्तावेजों, वित्तीय रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के जवाबों की जांच के बाद ही सामने आएगी। इस प्रकरण में सरकार की भूमिका पर निगाहें टिकी हैं। यदि आरोप निराधार हैं, तो जांच से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। यदि दस्तावेजों में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। राजनीतिक पद या प्रभाव किसी को जांच से छूट देने का आधार नहीं बनना चाहिए। मंत्री रेखा आर्या ने भ्रष्टाचार के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा है कि उनकी आय और संपत्ति से संबंधित विवरण चुनावी घोषणापत्रों में सार्वजनिक किए गए हैं। उन्होंने आरोप साबित होने पर कार्रवाई का सामना करने की बात भी कही है। ऐसे में जांच में उनके चुनावी हलफनामों, घोषित संपत्तियों और उपलब्ध वित्तीय अभिलेखों का मिलान महत्वपूर्ण हो सकता है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच इस विवाद का राजनीतिक असर पड़ना स्वाभाविक है। भाजपा जहां विपक्ष के हमले का जवाब देने की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस इसे सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही से जोड़ सकती है। लेकिन इस पूरे मामले की दिशा राजनीतिक बयानों से ज्यादा जांच के नतीजों पर निर्भर करेगी। अब असली सवाल तीन हैंकृ210 करोड़ रुपये की कथित संपत्ति का आधार क्या है, उसकी जांच किस स्तर पर पहुंचेगी और सरकार इस पूरे प्रकरण में कितनी पारदर्शिता दिखाएगी? फिलहाल, आरोपों ने सत्ता और विपक्ष दोनों के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। जांच निष्पक्ष हुई तो सच सामने आएगा, लेकिन यदि मामला केवल बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप में उलझा रहा, तो जवाबदेही को लेकर उठे सवाल और गहरे हो सकते हैं।