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सोमवार, 28 सितंबर 2026
udaydinmaan: तीसरी जीत की ‘राह’ में हर बाधा पर भाजपा की नजर
udaydinmaan: तीसरी जीत की ‘राह’ में हर बाधा पर भाजपा की नजर: प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर कोर कमेटियां बनी 15 प्रमुख विभागों में संयोजक व सह-संयोजक नियुक्त किए उत्तराखंड में बूथ से लेकर केंद्रीय ...
तीसरी जीत की ‘राह’ में हर बाधा पर भाजपा की नजर
प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर कोर कमेटियां बनी
15 प्रमुख विभागों में संयोजक व सह-संयोजक नियुक्त किए
उत्तराखंड में बूथ से लेकर केंद्रीय स्तर तक सक्रिय हुई भाजपा
देहरादून। उत्तराखंड में लगातार तीसरी विधानसभा जीत का लक्ष्य भाजपा के लिए अब महज राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि संगठन के स्तर पर चल रहा विस्तृत चुनावी अभियान बन चुका है। वर्ष 2027 के रण में उतरने से पहले पार्टी ने अपनी तैयारियों को बूथ से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक कई स्तरों पर कसना शुरू कर दिया है। लक्ष्य साफ हैकृसत्ता विरोधी संभावित रुझानों, कमजोर सीटों, संगठनात्मक असंतोष और बदलते सामाजिक समीकरणों को चुनाव से पहले ही साध लिया जाए।
भाजपा ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर कोर कमेटियों का गठन पहले ही कर दिया है। इन कमेटियों के जरिए स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों, संगठन की स्थिति और बूथ स्तर की तैयारियों की समीक्षा की जा रही है। इसके साथ ही पार्टी ने संगठन के 15 प्रमुख विभागों में संयोजक और सह-संयोजक नियुक्त कर चुनाव प्रबंधन को अलग-अलग स्तरों पर सक्रिय किया है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी जीती हुई सीटों को सुरक्षित रखने के साथ पिछली बार हाथ से निकली सीटों पर वापसी की है। सितंबर में हुई संगठनात्मक बैठकों में पार्टी ने 47 जीती सीटों को सुरक्षित रखने और 23 सीटों पर वापसी की रणनीति पर चर्चा की। इसके साथ ही डैमेज कंट्रोल और विपक्ष द्वारा बनाए जा रहे संभावित राजनीतिक माहौल पर भी नजर रखने का संदेश दिया गया। यानी भाजपा की रणनीति केवल अपने मजबूत क्षेत्रों पर निर्भर रहने की नहीं है। पार्टी कमजोर कड़ियों को पहले से चिन्हित कर वहां संगठन, जनसंपर्क और राजनीतिक संदेश को मजबूत करना चाहती है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उत्तराखंड दौरों को भी इसी व्यापक चुनावी तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है। कुमाऊं दौरे के दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों और संगठन पदाधिकारियों से संवाद किया। सरकारी योजनाओं के जमीनी असर, विकास कार्यों और जनता की अपेक्षाओं पर फीडबैक लेने की बात सामने आई। अब चुनाव से करीब एक वर्ष पहले प्रदेश प्रभारी के स्तर पर भी बड़ा बदलाव किया गया है। राम माधव को उत्तराखंड का नया प्रभारी तथा अरविंद मेनन और बांसुरी स्वराज को सह प्रभारी बनाया गया है। पार्टी के अनुसार नई टीम के सामने संगठन और सरकार के बीच समन्वय, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, चुनावी मुद्दों और सामाजिक समीकरणों को साधने की चुनौती होगी।
भाजपा की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बूथ प्रबंधन है। पार्टी चुनाव को केवल बड़े नेताओं की सभाओं और नारों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती। बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता, कार्यकर्ताओं की उपलब्धता और मतदाताओं तक सरकार के कामकाज का संदेश पहुंचाने पर जोर है। अगस्त-सितंबर के लिए पार्टी ने विस्तृत संगठनात्मक कार्यक्रम भी तैयार किया था। इसके साथ ही पहाड़ और मैदान के अलग-अलग राजनीतिक सवालों को एक ही चुनावी रणनीति में पिरोना भाजपा के लिए महत्वपूर्ण होगा। बेरोजगारी, पलायन, भू-कानून, मूल निवास, विकास, सड़क और स्वास्थ्य जैसे स्थानीय मुद्दों के साथ राष्ट्रीय मुद्दों का संतुलन भी चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकता है।
भाजपा के सामने एक दूसरी चुनौती सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दे में बदलने की है। पार्टी ने 2027 के लिए विकास, सुशासन और सामाजिक समरसता को अपने प्रमुख एजेंडे में रखने की बात कही है। लेकिन चुनावी राजनीति में घोषणाएं तभी प्रभावी होती हैं जब उनका स्थानीय स्तर पर अनुभव दिखाई दे। सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा और पलायन जैसे मुद्दों पर जनता की अपेक्षाएं अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती हैं। इसलिए सरकार की उपलब्धियों का प्रचार और जनता की शिकायतों का समाधानकृदोनों साथ चलाना भाजपा के लिए जरूरी होगा।
लगातार सत्ता में रहने के बाद किसी भी दल के सामने संगठनात्मक असंतोष और स्थानीय स्तर पर नाराजगी को नियंत्रित रखने की चुनौती आती है। टिकट की दावेदारी, स्थानीय नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा, कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं और सरकार से जुड़ी शिकायतें चुनाव के समय राजनीतिक समीकरण बदल सकती हैं। इसीलिए भाजपा की मौजूदा कवायद में केवल चुनावी प्रचार नहीं, बल्कि डैमेज कंट्रोल भी महत्वपूर्ण हिस्सा दिखाई दे रहा है। पार्टी जितनी जल्दी असंतोष के कारणों को पहचानकर उन्हें दूर करने में सफल होगी, उतना ही चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारना आसान होगा।
भाजपा की तैयारियों के समानांतर कांग्रेस समेत विपक्षी दल भी सरकार के खिलाफ मुद्दे तलाश रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती केवल अपनी उपलब्धियां गिनाने की नहीं, बल्कि विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की भी होगी। आने वाले महीनों में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, कानून-व्यवस्था, भू-कानून, मूल निवास, पलायन और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में रह सकते हैं। यही वजह है कि भाजपा ने चुनावी तैयारी को अंतिम समय की गतिविधि बनाने के बजाय अभी से संगठन के विभिन्न स्तरों पर सक्रिय कर दिया है। तीसरी जीत की राह में भाजपा के सामने असली चुनौती विपक्ष से अधिक अपने संगठन और सरकार के बीच तालमेल, स्थानीय असंतोष और जनता की बदलती अपेक्षाओं को साधने की होगी। पार्टी ने तैयारी का ढांचा खड़ा कर दिया है और अब उसकी अगली परीक्षा इस बात की होगी कि यह संगठनात्मक मशीनरी जमीन पर जनता के सवालों का कितना प्रभावी जवाब दे पाती है।
भाजपा-कांग्रेस में बढ़ी ‘सियासी’ चौकसी
उत्तराखंड में भविष्य नहीं, वर्तमान की सक्रिय राजनीति बना चुनाव
एक-दूसरे के हर दांव को काउंटर करने में जुटे हैं भाजपा व कांग्रेस
हालिया कोर कमेटी की बैठक में कांग्रेस के राजनीतिक नैरेटिव पर गंभीर
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट अब राजनीतिक दलों के लिए भविष्य की तैयारी नहीं, बल्कि वर्तमान की सक्रिय राजनीति बन चुकी है। वर्ष 2027 के चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों एक-दूसरे की हर राजनीतिक गतिविधि, संगठनात्मक कदम और जनसरोकार से जुड़े अभियान पर नजर रख रहे हैं। कौन सा मुद्दा उठाया जा रहा है, किस क्षेत्र में कौन नेता सक्रिय है, किस वर्ग से संवाद बढ़ाया जा रहा है और किस बयान का जवाब कैसे दिया जाएकृराजनीतिक दलों की निगाह अब इन सभी पहलुओं पर है। भाजपा की हालिया कोर कमेटी की बैठक में कांग्रेस के राजनीतिक नैरेटिव और उसके संभावित प्रभाव पर गंभीर चर्चा इसका संकेत है। पार्टी संगठन ने विपक्ष के हर दांव पर नजर रखने और उसके राजनीतिक संदेश का जवाब देने की रणनीति पर जोर दिया है।
दूसरी ओर कांग्रेस भी चुनावी जमीन तैयार करने में पीछे नहीं रहना चाहती। पार्टी ने राष्ट्रीय नेताओं को उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय करने की तैयारी की है। मैदानी क्षेत्रों में रोजगार, महंगाई और विकास तथा पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन, महिलाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर राजनीतिक अभियान आगे बढ़ाने की योजना सामने आई है।
आगामी चुनाव में सबसे दिलचस्प मुकाबला मुद्दों की राजनीति को लेकर हो सकता है। कांग्रेस सरकार के कामकाज पर सवाल उठाकर बेरोजगारी, भर्ती, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों को धार देने की कोशिश कर रही है। भाजपा की रणनीति इन आरोपों का तत्काल राजनीतिक जवाब देने और सरकार की उपलब्धियों को सामने रखने की है। हाल के दिनों में बिजली समझौते जैसे मुद्दों पर कांग्रेस के आरोपों का मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से जवाब दिया जाना भी इसी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। चुनाव नजदीक आने के साथ आरोप और प्रत्यारोप का यह सिलसिला और तेज होने की संभावना है।
अब दोनों दलों के लिए संगठनात्मक कार्यक्रम भी राजनीतिक संदेश बन गए हैं। भाजपा ने बूथ सशक्तीकरण से लेकर हर घर तक संपर्क का अभियान शुरू किया है। पार्टी का घोषित लक्ष्य संगठन को चुनाव के अंतिम छोर यानी बूथ तक सक्रिय करना है। भाजपा की ओर से 2022 में हारी 23 सीटों पर विशेष ध्यान और वरिष्ठ नेताओं के रात्रि प्रवास की तैयारी को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी का प्रयास है कि जिन क्षेत्रों में पिछली बार नुकसान हुआ, वहां संगठनात्मक कमजोरियों और स्थानीय असंतोष को समय रहते समझा जाए। कांग्रेस के लिए चुनौती इसके उलट है। उसे सरकार विरोधी माहौल को केवल नारों और आरोपों से आगे ले जाकर बूथ स्तर के संगठन और स्थानीय नेतृत्व में बदलना होगा। बड़े नेताओं की सभाओं को वोट में बदलने के लिए विधानसभा क्षेत्रों में मजबूत संगठन उसकी महत्वपूर्ण जरूरत होगी।
2027 की तैयारी में नेताओं के दौरे भी रणनीतिक संकेत दे रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उत्तराखंड दौरे और संगठनात्मक बैठकों के बाद पार्टी ने जमीनी तैयारियों को और गति दी है। कांग्रेस भी राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं के संभावित कार्यक्रमों के माध्यम से चुनावी माहौल बनाने की तैयारी कर रही है। यानी दोनों दल अब केवल प्रदेश स्तर के नेताओं के भरोसे चुनावी जमीन तैयार नहीं कर रहे, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता को भी स्थानीय राजनीतिक संदेश से जोड़ रहे हैं।
इस चुनाव में राजनीतिक चौकसी केवल सार्वजनिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है। दलबदल, टिकट के दावेदार, असंतुष्ट नेता, स्थानीय गुटबाजी और पुराने राजनीतिक संबंध भी दोनों दलों के लिए महत्वपूर्ण हैं। हाल के महीनों में दोनों ओर नेताओं के पाला बदलने से कई विधानसभा क्षेत्रों के समीकरणों में बदलाव की चर्चा हुई है। यही वजह है कि भाजपा कांग्रेस के भीतर की गतिविधियों पर नजर रख रही है और कांग्रेस भाजपा के संगठन तथा सरकार से जुड़े घटनाक्रम को बारीकी से देख रही है। किस नेता की नाराजगी कहां है, कौन सा क्षेत्र असंतोष का केंद्र बन रहा है और किस मुद्दे को जनता के बीच ज्यादा प्रतिक्रिया मिल रही हैकृइन सवालों के जवाब दोनों दल अपनी चुनावी रणनीति में तलाश रहे हैं।
हल्द्वानी के रामलीला मैदान से जुड़ा शुद्धिकरण विवाद भी इस बात का उदाहरण है कि कोई स्थानीय घटना किस तरह व्यापक राजनीतिक मुद्दे में बदल सकती है। कांग्रेस ने इसे सामाजिक न्याय और दलित सम्मान से जोड़कर उठाया, जबकि भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों और उसकी राजनीतिक व्याख्या पर सवाल उठाए। विवाद ने दोनों दलों को अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव को धार देने का अवसर दिया। आगे भी ऐसे स्थानीय मुद्दे चुनावी राजनीति में तेजी से बड़े विमर्श का रूप ले सकते हैं।2027 की चुनावी लड़ाई अभी दूर है, लेकिन उसकी राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है। भाजपा सत्ता में होने के कारण अपने कामकाज और संगठन की ताकत को चुनावी आधार बनाने की कोशिश करेगी। कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल और जनता के स्थानीय असंतोष को राजनीतिक विकल्प में बदलने की कोशिश करेगी।
इस पूरी प्रक्रिया में एक बात स्पष्ट हैकृअब भाजपा कांग्रेस के हर कदम को पढ़ रही है और कांग्रेस भाजपा की हर चाल का जवाब तलाश रही है। आने वाले महीनों में यह निगरानी और चौकसी और बढ़ेगी। क्योंकि चुनाव के मैदान में केवल यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि कौन क्या कह रहा है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि किस मुद्दे पर कौन पहले पहुंचता है, किसकी बात जमीन तक पहुंचती है और कौन अपने संगठन को मतदाता तक प्रभावी ढंग से ले जा पाता है।
कांग्रेस के ‘सवाल’ पर भाजपा का ‘पलटवार’
एसआईआर की निष्पक्षता पर कांग्रेस के सवाल
भाजपा बोलीकृझूठ का सहारा ले रही कांग्रेस पार्टी
चुनाव से पहले हो रही भ्रम फैलाने की राजनीतिक
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। कांग्रेस जहां एसआईआर की प्रक्रिया और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लेकर गंभीर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए इसे चुनाव से पहले भ्रम फैलाने की राजनीतिक कोशिश बताया है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस और राहुल गांधी के आरोपों को पूरी तरह मनगढ़ंत और झूठ बताते हुए कहा कि विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े कर राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। उनके मुताबिक, कांग्रेस को एसआईआर को लेकर भ्रम फैलाने के बजाय पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में सुनिश्चित कराने के लिए जमीन पर काम करना चाहिए। भट्ट का हमला ऐसे समय हुआ है जब उत्तराखंड में एसआईआर को लेकर राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची का मुद्दा अब भाजपा और कांग्रेस के बीच व्यापक राजनीतिक बहस का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। भाजपा का तर्क है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक वैधानिक प्रक्रिया है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना है। कांग्रेस इसके तौर-तरीकों और संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठा रही है।
उत्तराखंड में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में फार्म-7 आवेदन सामने आने के बाद भी राजनीतिक बहस तेज हुई है। निर्वाचन कार्यालय के अनुसार, करीब 1.73 लाख फार्म-7 आवेदनों में 95 हजार से अधिक को जांच के दौरान अपात्र श्रेणी में रखा गया। निर्वाचन कार्यालय ने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि संबंधित मतदाता का नाम स्वतः हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। पात्र व्यक्ति निर्धारित प्रक्रिया के तहत फार्म-6 के माध्यम से मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का दावा कर सकता है।
महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी पहले चुनाव परिणामों को ईवीएम से जोड़ती रही और अब एसआईआर को लेकर सवाल उठाकर भविष्य के चुनाव परिणामों के लिए राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है। उन्होंने कांग्रेस से सवाल किया कि यदि किसी पात्र मतदाता को एसआईआर के दौरान परेशानी आ रही है तो पार्टी उसकी मदद के लिए कितने स्तर पर अभियान चला रही है।
भाजपा का यह हमला सीधे तौर पर कांग्रेस की चुनावी रणनीति को निशाने पर लेने वाला है। पार्टी का संदेश साफ है कि एसआईआर को लेकर उठ रहे सवालों को वह केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहने देना चाहती, बल्कि इसे कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में पेश कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस का कहना है कि एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का स्पष्ट और पारदर्शी जवाब मिलना चाहिए। कांग्रेस ने निर्वाचन कार्यालय के घेराव और प्रदर्शन के जरिए इस मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी राहुल गांधी और विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग तथा एसआईआर को लेकर सवाल उठाए हैं। इसके जवाब में भाजपा नेताओं ने आरोपों को निराधार बताया है। निर्वाचन आयोग की ओर से भी एसआईआर से जुड़े निर्णयों को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया गया है। उत्तराखंड में अब एसआईआर केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच यह राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बन चुकी है। भाजपा इसे मतदाता सूची को व्यवस्थित करने की संवैधानिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि कांग्रेस प्रक्रिया की पारदर्शिता और संभावित प्रभावों पर सवाल उठा रही है।
यही वजह है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर दोनों दलों के बीच बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं। भाजपा जहां कांग्रेस पर भ्रम फैलाने का आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस निर्वाचन आयोग से जुड़े अपने सवालों को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है। 2027 के चुनावी रण में बेरोजगारी, पलायन, भू-कानून और विकास के साथ अब मतदाता सूची और एसआईआर भी बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता दिख रहा है। सवाल केवल यह नहीं कि सूची में किसका नाम है, बल्कि यह भी है कि चुनाव से पहले इस पूरी प्रक्रिया को लेकर जनता के बीच किस दल का राजनीतिक नैरेटिव ज्यादा प्रभाव डालता है।
रविवार, 27 सितंबर 2026
udaydinmaan: बदरीनाथ में डीजे कान्सर्ट पर घमासान
udaydinmaan: बदरीनाथ में डीजे कान्सर्ट पर घमासान: डीएम ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग आफिसर को भेजा नोटिस बिना अनुमति कैसे हुआ बदरीनाथ धाम में डीजे कान्सर्ट का आयोजन ऊंची आवाज में साउंड सिस्...
बदरीनाथ में डीजे कान्सर्ट पर घमासान
डीएम ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग आफिसर को भेजा नोटिस
बिना अनुमति कैसे हुआ बदरीनाथ धाम में डीजे कान्सर्ट का आयोजन
ऊंची आवाज में साउंड सिस्टम लगाने का भी डीएम ने मांगा जवाब
देहरादून। बदरीनाथ धाम में आयोजित देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव के दौरान डीजे और तेज ध्वनि में संगीत कार्यक्रम को लेकर विवाद अब प्रशासनिक स्तर तक पहुंच गया है। कार्यक्रम के वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद धार्मिक संगठनों और संतों की आपत्ति के बीच चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग आफिसर को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। डीएम ने पूछा है कि बदरीनाथ धाम क्षेत्र में इस तरह के आयोजन के लिए सक्षम स्तर से अनुमति ली गई थी या नहीं और कार्यक्रम में उच्च ध्वनि वाले साउंड सिस्टम का इस्तेमाल क्यों किया गया।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि कार्यक्रम के सांस्कृतिक हिस्से के आयोजन और भुगतान में जिला प्रशासन तथा राज्य सरकार की भूमिका नहीं थी। डीएम के अनुसार 19 और 20 सितंबर को भारतीय सेना की ओर से बामणी और माणा क्षेत्र में वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। जिला प्रशासन की भूमिका केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए स्टाल लगाने तक सीमित थी। बदरीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में 19 और 20 सितंबर को देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026 आयोजित किया गया था। यह आयोजन भारतीय सेना की आपरेशन सद्भावना पहल के तहत किया गया था। इसका घोषित उद्देश्य सीमांत क्षेत्रों की लोक संस्कृति, परंपराओं, स्थानीय उत्पादों और पर्यटन को बढ़ावा देना था। कार्यक्रम में उत्तराखंड की लोक गायिका प्रियंका मेहर की प्रस्तुति भी हुई। कार्यक्रम के दौरान तेज संगीत और नृत्य के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद विवाद खड़ा हुआ।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी बदरीनाथ पहुंचे थे। उन्होंने मंदिर में पूजा-अर्चना की और कार्यक्रम में शामिल हुए। यही वजह है कि आयोजन की जिम्मेदारी और अनुमति को लेकर उठे सवालों ने राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा तेज कर दी है। चमोली प्रशासन की ओर से गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग आफिसर को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि बदरीनाथ धार्मिक आस्था का केंद्र है और वहां इस तरह के सामूहिक आयोजन तथा उच्च ध्वनि वाले साउंड सिस्टम का इस्तेमाल धाम की गरिमा के अनुरूप नहीं है। डीएम ने कार्यक्रम के औचित्य और अनुमति से संबंधित जानकारी मांगी है। साथ ही भविष्य में इस प्रकार की पुनरावृत्ति न होने देने को कहा गया है।
डीएम ने यह भी पूछा है कि कार्यक्रम के लिए सक्षम स्तर से अनुमति ली गई थी या नहीं तथा तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल का कारण क्या था। प्रशासन ने आगे ऐसे आयोजनों के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था पर भी जोर दिया है। कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने आपत्ति जताई है। महापंचायत का कहना है कि उसका विरोध सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन से नहीं, बल्कि बदरीनाथ जैसे धार्मिक स्थल पर उसके स्वरूप और तेज ध्वनि वाले मनोरंजन कार्यक्रम से है। ज्योतिर्मठ से जुड़े संतों की ओर से भी आयोजन को लेकर आपत्ति जताई गई है और धार्मिक परंपराओं तथा धाम की मर्यादा के अनुरूप कार्यक्रम कराने की मांग की गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी ने भी बदरीनाथ में ऐसे संगीत कार्यक्रम पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार से धार्मिक स्थलों की मर्यादा बनाए रखने की मांग की।
विवाद अब सिर्फ डीजे या संगीत कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। प्रशासन के नोटिस के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि बदरीनाथ जैसे धार्मिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में इतने बड़े आयोजन की अनुमति की प्रक्रिया क्या थी और कार्यक्रम के स्वरूप को अंतिम मंजूरी किस स्तर से मिली? एक ओर प्रशासन का कहना है कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों का निर्धारण सेना की ओर से किया गया था, वहीं उपलब्ध रिपोर्टों में इस आयोजन को सेना, जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग के सहयोग से आयोजित बताया गया है। यही अंतर अब जांच और स्पष्टीकरण का विषय बन गया है। प्रशासन ने फिलहाल सेना से जवाब मांगा है। सेना की ओर से आधिकारिक जवाब आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आयोजन की अनुमति किस स्तर से ली गई थी और कार्यक्रम में तेज ध्वनि वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल का निर्णय किस आधार पर लिया गया। बदरीनाथ में संस्कृति के नाम पर आयोजन को लेकर उठा विवाद अब धार्मिक मर्यादा बनाम मनोरंजन के सवाल से आगे बढ़कर प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा बन गया है।
मां की तस्वीर पर सियासत
ईडी कार्यालय जाते समय हरीश रावत के मां की तस्वीर साथ रखने पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का हमला
वर्ष 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा से जुड़े मामले में पूछताछ के लिए पहुंचे
रावत ने कहा था कि वह अपनी मां, मां जगदंबा और धरती मां का स्मरण करते हुए ईडी कार्यालय पहुंचे
देहरादून। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के प्रवर्तन निदेशालय कार्यालय में पूछताछ के लिए पहुंचने के दौरान अपनी दिवंगत मां की तस्वीर साथ रखने को लेकर उत्तराखंड की सियासत गरमा गई है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने रावत पर निशाना साधते हुए इसे राजनीति के लिए भावनाओं के इस्तेमाल का मामला बताया है। उन्होंने कहा कि निजी भावनाओं और पारिवारिक स्मृतियों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं है। रावत शनिवार को वर्ष 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा से जुड़े मामले में पूछताछ के लिए ईडी कार्यालय पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने अपनी मां की तस्वीर गले में रखी थी। रावत ने कहा था कि वह अपनी मां, मां जगदंबा और धरती मां का स्मरण करते हुए ईडी कार्यालय पहुंचे हैं और मां का आशीर्वाद लेकर जांच एजेंसी के सामने उपस्थित हुए हैं।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने इसी को आधार बनाते हुए हरीश रावत पर राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने कहा कि राजनीति में व्यक्तिगत भावनाओं को इस तरह सामने लाना दुर्भाग्यपूर्ण है। भट्ट के बयान ने पहले से ही ईडी की कार्रवाई को लेकर चल रहे कांग्रेस-भाजपा विवाद को नया राजनीतिक रंग दे दिया है। भाजपा का कहना है कि ईडी की पूछताछ एक जांच प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे राजनीतिक भावनाओं से जोड़ना उचित नहीं है। वहीं कांग्रेस और रावत लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि चुनाव से पहले केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई को राजनीतिक दबाव के तौर पर देखा जाना चाहिए। इन आरोपों पर जांच एजेंसी का अंतिम निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।
ईडी कार्यालय पहुंचने से पहले रावत ने कहा था कि वह अपनी मां की तस्वीर लेकर आए हैं। उन्होंने इसे किसी राजनीतिक प्रदर्शन के बजाय मां का आशीर्वाद लेने की अपनी भावना से जोड़ा। रावत ने यह भी कहा कि उन्होंने किसी को नहीं बुलाया और केवल अपनी मां को साथ लेकर आए हैं। ईडी की पूछताछ वर्ष 2016 की वीपीडीओ भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े धनशोधन मामले के सिलसिले में है। इस मामले में रावत के तत्कालीन ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े परिसरों पर भी ईडी ने तलाशी ली थी। ईडी की कार्रवाई के बाद रावत ने जांच एजेंसी के सामने अपना पक्ष रखने की बात कही थी।
हरीश रावत और भाजपा के बीच यह जुबानी जंग ऐसे समय तेज हुई है, जब उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोर पकड़ रही हैं। ईडी की कार्रवाई और उसके बाद रावत के बयान को कांग्रेस राजनीतिक कार्रवाई बता रही है, जबकि भाजपा जांच प्रक्रिया का बचाव कर रही है। अब मां की तस्वीर को लेकर महेंद्र भट्ट के बयान ने इस विवाद को भावनात्मक और राजनीतिक बहस में बदल दिया है। एक तरफ भाजपा रावत के कदम को राजनीतिक प्रतीकवाद बता रही है, तो दूसरी ओर रावत इसे अपनी मां और मातृशक्ति के प्रति श्रद्धा के रूप में पेश कर रहे हैं। ईडी की पूछताछ का कानूनी पक्ष जांच पूरी होने के बाद स्पष्ट होगा, लेकिन इतना तय है कि मां की तस्वीर को लेकर शुरू हुई राजनीतिक बहस ने उत्तराखंड में चुनावी तापमान और बढ़ा दिया है।
ईडी से चुनावी रण तक
हरीश रावत की पेशी के बाद भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
आरोप-प्रत्यारोप ने 2027 के चुनावी माहौल को दी नई धार
सूबे में कार्रवाई चुनावी राजनीति का अहम मुद्दा बनने जा रही
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव का एक नया मोर्चा खुल गया है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की प्रवर्तन निदेशालय के समक्ष पेशी के बाद जिस तरह दोनों दल आमने-सामने आए हैं, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई भी प्रदेश की चुनावी राजनीति का अहम मुद्दा बनने जा रही है। 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े धनशोधन मामले में ईडी ने हरीश रावत को पूछताछ के लिए बुलाया। 26 सितंबर को रावत ईडी कार्यालय पहुंचे। इस दौरान वह अपनी दिवंगत मां की तस्वीर साथ लेकर पहुंचे और कहा कि वह अपनी मां, मां जगदंबा और धरती मां का स्मरण करते हुए कार्यालय आए हैं।
पेशी के बाद रावत ने केंद्र और भाजपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि चुनाव नजदीक आते ही जांच एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं। इससे पहले भी वह ईडी की कार्रवाई को उत्तराखंड की चुनावी राजनीति से जोड़ चुके हैं। कांग्रेस ने भी कार्रवाई को राजनीतिक दबाव के रूप में पेश किया है। हालांकि जांच एजेंसी की कार्रवाई के पीछे राजनीतिक मंशा होने का अंतिम निष्कर्ष अभी स्थापित नहीं हुआ है। रावत के आरोपों के बाद भाजपा ने भी मोर्चा खोल दिया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने रावत के ईडी कार्यालय जाते समय मां की तस्वीर साथ रखने पर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक सहानुभूति हासिल करने की कोशिश बताया। भाजपा का कहना है कि जांच एक कानूनी प्रक्रिया है और इसे राजनीतिक भावनाओं के साथ जोड़ना उचित नहीं। यहीं से विवाद केवल ईडी की पूछताछ तक सीमित नहीं रहा। मां की तस्वीर, जांच एजेंसी की कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपकृइन तीनों ने मिलकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बयानबाजी को और तीखा कर दिया है।
ईडी की कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब कांग्रेस 2027 के लिए सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने की तैयारी में है। पार्टी बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, पलायन, भू-कानून और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। लेकिन रावत से जुड़े प्रकरण ने कांग्रेस के चुनावी विमर्श में एक नया आयाम जोड़ दिया है। इससे पहले रावत ने अपने पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े ईडी प्रकरण के बाद कांग्रेस के संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश भी की थी। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर भी चर्चा को जन्म दिया था। अब रावत की ईडी पेशी के बाद कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह जांच से जुड़े सवालों और भाजपा के राजनीतिक हमलों का जवाब देते हुए अपने चुनावी मुद्दों को किस तरह आगे बढ़ाती है।
दूसरी ओर भाजपा इस प्रकरण को कांग्रेस और रावत के खिलाफ राजनीतिक सवालों के रूप में उठा रही है। भाजपा की ओर से यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि जांच एजेंसियों की कार्रवाई को राजनीति से जोड़ने के बजाय संबंधित मामले में सामने आने वाले तथ्यों पर बात होनी चाहिए। हालांकि, चुनावी राजनीति में जांच एजेंसियों की कार्रवाई का राजनीतिक असर होने से इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस इसे विपक्ष पर दबाव की कार्रवाई के रूप में देख रही है, जबकि भाजपा इसे जांच की सामान्य प्रक्रिया बता रही है। दोनों पक्षों के इन दावों के बीच अंतिम तस्वीर जांच के निष्कर्ष और उपलब्ध दस्तावेजों से ही स्पष्ट होगी।
उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत अब भी कांग्रेस के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल हैं। ऐसे में उनके खिलाफ या उनसे जुड़े किसी भी जांच प्रकरण का राजनीतिक असर स्वाभाविक रूप से व्यापक होता है। भाजपा के लिए रावत पर हमला कांग्रेस के पुराने शासन और उससे जुड़े सवालों को उठाने का अवसर है, जबकि कांग्रेस के लिए रावत की पेशी केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाने का आधार बन रही है। इस तरह ईडी कार्यालय से शुरू हुआ विवाद अब सीधे चुनावी मैदान की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बहस जांच के तथ्यों तक सीमित रहती है या भाजपा-कांग्रेस की चुनावी रणनीति का स्थायी हिस्सा बनती है। फिलहाल इतना जरूर है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी मुकाबले में एक नया अध्याय जुड़ गया हैकृईडी की कार्रवाई बनाम राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप।
शनिवार, 26 सितंबर 2026
udaydinmaan: एक सीट, 24 दावेदार
udaydinmaan: एक सीट, 24 दावेदार: राज्यसभा के एक टिकट ने भाजपा के भीतर बढ़ाई दावेदारों की बेचौनी कोर कमेटी में नहीं बनी सहमति,अब सीएम धामी-भट्ट-शर्मा तय करेंगे नाम उत्तराखंड म...
एक सीट, 24 दावेदार
राज्यसभा के एक टिकट ने भाजपा के भीतर बढ़ाई दावेदारों की बेचौनी
कोर कमेटी में नहीं बनी सहमति,अब सीएम धामी-भट्ट-शर्मा तय करेंगे नाम
उत्तराखंड में भाजपा के भीतर राज्यसभा की एक सीट ने सियासी हलचल तेज
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भाजपा के भीतर राज्यसभा की एक सीट ने सियासी हलचल तेज कर दी है। एक सीट और दावेदार करीब दो दर्जन। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि राज्यसभा की कुर्सी को लेकर पार्टी के भीतर कितनी जोरदार दावेदारी है। शुक्रवार को हुई भाजपा की प्रदेश कोर कमेटी की बैठक में करीब 24 नामों पर मंथन हुआ, लेकिन किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन सकी। आखिरकार अब संभावित दावेदारों में से तीन या पांच नामों का पैनल तैयार करने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और प्रदेश महामंत्री संगठन फणींद्रनाथ शर्मा को सौंपी गई है।
राज्यसभा सांसद नरेश बंसल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद यह सीट खाली होगी। इसके लिए भाजपा के भीतर दावेदारों की लंबी फेहरिस्त सामने आना महज टिकट की सामान्य दावेदारी नहीं माना जा रहा। 2027 के विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ी भाजपा के लिए राज्यसभा का यह चयन संगठन, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय संतुलनकृतीनों को साधने की चुनौती भी है। भाजपा ने आधिकारिक रूप से दावेदारों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं। पार्टी की ओर से इतना जरूर बताया गया है कि सामने आए करीब 24 नामों में महिला, अनुसूचित जाति-जनजाति और युवा वर्ग समेत विभिन्न सामाजिक समूहों से जुड़े चेहरे शामिल हैं। यानी अंतिम चयन केवल व्यक्तिगत दावेदारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व का गणित भी महत्वपूर्ण होगा।
इसके साथ ही गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन का सवाल भी चर्चा में है। मीडिया रिपोर्टों में कुमाऊं को प्रतिनिधित्व देने और वैश्य समाज के चेहरे को मौका देने जैसे अलग-अलग समीकरणों की चर्चा है। पूर्व मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल का नाम भी चर्चाओं में आया है, हालांकि पार्टी ने किसी नाम को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की है। राज्यसभा का टिकट ऐसे समय में सामने आया है जब भाजपा उत्तराखंड में 2027 की चुनावी तैयारी को तेज कर रही है। ऐसे में राज्यसभा का एक टिकट केवल उच्च सदन की सदस्यता नहीं, बल्कि संगठन के भीतर राजनीतिक महत्व और भविष्य की भूमिका से भी जुड़ा माना जा रहा है।
यही वजह है कि पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर संगठन के वरिष्ठ नेताओं और अलग-अलग सामाजिक समूहों के चेहरों तक के नामों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। मीडिया रिपोर्टों में रमेश पोखरियाल निशंक, तीरथ सिंह रावत, नरेश बंसल, अनिल गोयल, मदन कौशिक, ज्योति प्रसाद गैरोला, बलराज पासी और केदार जोशी समेत कई नामों की चर्चा हुई है। हालांकि इनमें से किसी नाम को भाजपा ने प्रत्याशी के रूप में घोषित नहीं किया है। कोर कमेटी के सामने करीब 24 नाम आने के बाद अब सबसे कठिन काम नाम छांटने का है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और प्रदेश महामंत्री संगठन फणींद्रनाथ शर्मा तीन या पांच नामों का पैनल तैयार करेंगे। इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व अंतिम नाम पर निर्णय करेगा। यानी प्रदेश भाजपा के भीतर चल रही दावेदारी का पहला दौर खत्म हो चुका है, लेकिन असली राजनीतिक परीक्षा अब शुरू होगी। दो दर्जन से अधिक दावेदारों में से कुछ नाम पैनल तक पहुंचेंगे और अंततः एक चेहरे पर केंद्रीय नेतृत्व की मुहर लगेगी।
इस पूरी कवायद का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि भाजपा के सामने अगले वर्ष विधानसभा चुनाव है। राज्यसभा के लिए चुना जाने वाला चेहरा संगठन के भीतर पार्टी की प्राथमिकताओं का संकेत भी माना जाएगा। महिला, युवा, एससी-एसटी, क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाते हुए पार्टी किस तरह का संदेश देती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल तस्वीर यही हैकृकि सीट एक है, दावेदार करीब 24। नामों की कतार लंबी है और अंतिम फैसला दिल्ली में होना है। लेकिन उससे पहले उत्तराखंड भाजपा के भीतर चल रही दावेदारी ने यह जरूर साफ कर दिया है कि राज्यसभा की यह सीट पार्टी के नेताओं के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो चुकी है।
गंगा किनारे से हरदा की ‘हुंकार’
गंगा पूजन के बाद भावुक हुए पूर्व मुख्यमंत्री, बोलेकृहरिद्वार से चुनाव लड़ने की है इच्छा
अंतिम फैसला परिस्थितियों पर, अंतिम यात्रा भी हरिद्वार के प्रतिनिधि के तौर पर निकले
अंतिम निर्णय उस समय की परिस्थितियों, समय, स्वास्थ्य और उम्र को देखते हुए लिया जाएगा
देहरादून। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हरिद्वार से आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताने के अगले ही दिन हरकी पैड़ी पहुंचकर मां गंगा का विधि-विधान से पूजन किया। गंगा पूजन के बाद पत्रकारों से बातचीत में रावत ने अपनी राजनीतिक इच्छा के साथ ही हरिद्वार से अपने पुराने रिश्ते को भावुक अंदाज में सामने रखा। उन्होंने कहा कि उनके मन में हरिद्वार से चुनाव लड़ने की इच्छा जरूर है, लेकिन अंतिम निर्णय उस समय की परिस्थितियों, समय, स्वास्थ्य और उम्र को देखते हुए लिया जाएगा। रावत ने इससे भी आगे बढ़कर कहा कि उनकी इच्छा है कि जीवन के अंतिम समय में उनकी अंतिम यात्रा हरिद्वार के प्रतिनिधि के तौर पर निकले। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियां तेज हो रही हैं और कांग्रेस के भीतर संभावित उम्मीदवारों तथा चुनावी नेतृत्व को लेकर मंथन का दौर चल रहा है।
हरीश रावत ने एक दिन पहले ही इंटरनेट मीडिया पोस्ट के माध्यम से हरिद्वार से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी। उन्होंने 2009 से 2014 के बीच हरिद्वार से लोकसभा प्रतिनिधित्व के दौर को अपने राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम काल बताया और कहा कि उस दौरान मतदाताओं के साथ उनके व्यक्तिगत रिश्ते बने। उन्होंने हरिद्वार को विधानसभा में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने और क्षेत्र के लिए अपनी योजनाओं पर काम करने की इच्छा भी व्यक्त की। यानी शुक्रवार को हरकी पैड़ी पहुंचना महज धार्मिक यात्रा भर नहीं रहा। इसके साथ रावत ने अपनी राजनीतिक मंशा को भी सार्वजनिक रूप से दोहराया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव लड़ने का अंतिम फैसला परिस्थितियों के अनुसार ही होगा।
हरिद्वार हरीश रावत के राजनीतिक सफर का महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। वर्ष 2009 से 2014 तक वह हरिद्वार के सांसद रहे। अब विधानसभा चुनाव से पहले उसी क्षेत्र से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताना उनके लिए राजनीतिक रूप से एक नए अध्याय की संभावना खोलता है। रावत के बयान का दूसरा पहलू कांग्रेस के लिए है। यदि वह वास्तव में हरिद्वार की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय लेते हैं तो पार्टी को संबंधित सीट के संभावित दावेदारों और स्थानीय संगठन के समीकरणों के साथ तालमेल बैठाना होगा। फिलहाल रावत ने अपनी ओर से अंतिम उम्मीदवारी घोषित नहीं की है, इसलिए इसे दावेदारी की सार्वजनिक इच्छा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
रावत की राजनीति में हरिद्वार का भावनात्मक पक्ष पहले से मौजूद रहा है। लेकिन इस बार उनका बयान ऐसे समय आया है जब चुनावी राजनीति धीरे-धीरे टिकट और सीटों के समीकरण की ओर बढ़ रही है। ऐसे में उनके हरिद्वार पहुंचने और गंगा पूजन के बाद दिए गए बयान ने उनकी राजनीतिक सक्रियता को लेकर चर्चा को जरूर तेज किया है। हाल के दिनों में रावत ने 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी के निर्णय को सर्वाेपरि बताते हुए कांग्रेस की चुनावी भूमिका पर भी बात की है। इससे संकेत मिलता है कि वह चुनावी राजनीति से अपने जुड़ाव को सार्वजनिक रूप से बनाए हुए हैं। रावत यदि हरिद्वार से चुनाव लड़ने का निर्णय लेते हैं तो कांग्रेस के सामने दो स्तरों पर समीकरण साधने की चुनौती होगी। पहला, संबंधित विधानसभा सीट का स्थानीय संगठन और संभावित दावेदार। दूसरा, रावत के लंबे राजनीतिक अनुभव और उनके समर्थक आधार को चुनावी रणनीति में किस तरह जोड़ा जाए।
हालांकि अभी कांग्रेस ने हरिद्वार की किसी सीट से रावत की उम्मीदवारी घोषित नहीं की है। इसलिए फिलहाल यह मामला हरीश रावत की इच्छा बनाम कांग्रेस के अंतिम निर्णय के बीच है। हरीश रावत ने हरिद्वार के साथ अपने पुराने राजनीतिक रिश्ते को याद करते हुए जिस तरह अपनी बात रखी है, उसमें व्यक्तिगत भावना और राजनीतिक संकेत दोनों दिखाई देते हैं। एक तरफ वह हरिद्वार को अपने राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय बता रहे हैं, दूसरी तरफ चुनाव लड़ने के अंतिम निर्णय को पार्टी और परिस्थितियों पर छोड़ रहे हैं। लेकिन उनकी यह सार्वजनिक इच्छा अब कांग्रेस की चुनावी चर्चा का हिस्सा बन चुकी है।गंगा के किनारे खड़े होकर हरीश रावत ने सिर्फ अपनी पुरानी यादें नहीं दोहराईं, बल्कि 2027 की राजनीति के लिए हरिद्वार का दरवाजा भी अपने लिए खुला रखा है। अब देखना यह होगा कि यह इच्छा चुनावी मैदान तक पहुंचती है या कांग्रेस का अंतिम निर्णय कोई दूसरा रास्ता तय करता है।
रविवार को ‘कैद’
आरबीआई की मंजूरी से कर्मचारियों की छुट्टी खत्म
27 सितंबर को बैंक खोलने के फैसले पर कानूनी पेच
सेवा शर्तों व साप्ताहिक अवकाश को लेकर उठे सवाल
देहरादून। देशभर में प्रस्तावित राष्ट्रव्यापी बैंक हड़ताल से ठीक पहले 27 सितंबर, रविवार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को खोलने के केंद्र सरकार के फैसले ने नया कानूनी सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि रविवार को बैंक खोला जा सकता है या नहीं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय रिजर्व बैंक की मंजूरी के आधार पर बैंक प्रबंधन अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को रविवार को अनिवार्य रूप से ड्यूटी करने के लिए बाध्य कर सकता है? अधिवक्ता डा. बैजनाथ के अनुसार दोनों सवालों का जवाब एक जैसा नहीं है और विवाद का असली केंद्र कर्मचारियों की सेवा शर्तें तथा साप्ताहिक अवकाश का अधिकार है।
वित्त मंत्रालय की आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक आरबीआई ने 27 सितंबर को बैंक शाखाओं, कार्यालयों, एटीएम-लिंक शाखाओं और करेंसी चेस्ट को संचालित रखने की मंजूरी दी है। सरकार ने इसका कारण 28 से 30 सितंबर की प्रस्तावित बैंक हड़ताल के बीच बैंकिंग सेवाओं की निरंतरता बनाए रखना बताया है। यानी लगातार कई दिनों तक बैंक बंद रहने से ग्राहकों को होने वाली परेशानी को देखते हुए रविवार को बैंकिंग व्यवस्था चालू रखने का फैसला किया गया है। लेकिन यहीं से कर्मचारियों के अधिकारों का सवाल सामने आता है।
डा.बैजनाथ के मुताबिक नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 25 में रविवार को सार्वजनिक अवकाश माना गया है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि रविवार को बैंकिंग कारोबार करना ही गैरकानूनी है। आरबीआई के बैंकिंग संबंधी निर्देशों में भी रविवार को बैंकिंग संचालन की व्यवस्था का उल्लेख है। इसलिए केवल रविवार होने के आधार पर 27 सितंबर को बैंक खोलने के फैसले को चुनौती देना कमजोर कानूनी आधार हो सकता है। असल सवाल कर्मचारी से अनिवार्य काम कराने का है। आरबीआई की ओर से बैंक शाखाओं को संचालित रखने की मंजूरी को कर्मचारियों को व्यक्तिगत रूप से रविवार को ड्यूटी करने का स्वतः आदेश नहीं माना जा सकता। बैंक कर्मचारियों की सेवा शर्तें बाइपार्टाइट सेटलमेंट, ज्वाइंट नोट, सेवा नियमों और अन्य लागू औद्योगिक समझौतों से भी निर्धारित होती हैं। ऐसे में बैंक प्रबंधन द्वारा रविवार की अनिवार्य ड्यूटी का आदेश जारी किए जाने पर उसके कानूनी आधार की जांच जरूरी होगी।
मामला साप्ताहिक अवकाश के अधिकार से भी जुड़ता है। आक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड, 2020 में साप्ताहिक विश्राम और कार्य दिवसों से संबंधित प्रावधान हैं। रविवार को कर्मचारी से काम लिया जाता है तो यह देखना होगा कि उसे वैधानिक वैकल्पिक या प्रतिपूरक अवकाश दिया गया है या नहीं, उसके काम के घंटे निर्धारित सीमा में हैं या नहीं और ओवरटाइम संबंधी प्रावधानों का पालन हुआ है या नहीं। डा. बैजनाथ के मुताबिक आरबीआई के अपने निर्देशों में भी बैंकिंग समय अथवा कार्य दिवसों में बदलाव करते समय लागू स्थानीय कानूनों और कर्मचारियों से संबंधित औद्योगिक पुरस्कारों एवं समझौतों का पालन करने की आवश्यकता को मान्यता दी गई है। ऐसे में आरबीआई की प्रशासनिक मंजूरी को कर्मचारियों के पहले से लागू सेवा अधिकारों से ऊपर मान लेना अपने आप में सवाल खड़ा कर सकता है।
हड़ताल से ठीक पहले रविवार को काम कराने का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा संबंध बैंक यूनियनों के प्रस्तावित औद्योगिक आंदोलन से है। सरकार इसे बैंकिंग सेवाओं की निरंतरता बनाए रखने का कदम बता रही है, जबकि कर्मचारियों की दृष्टि से वास्तविक सवाल यह होगा कि रविवार की ड्यूटी किस वैधानिक और सेवा नियम के तहत अनिवार्य की गई है। इसलिए विवाद का केंद्र अब बैंक रविवार को खुलेगा या नहीं से ज्यादा रविवार को कर्मचारी से किस अधिकार के तहत काम कराया जाएगा बन गया है। यदि किसी बैंक का आदेश लागू बाइपार्टाइट सेटलमेंट, ज्वाइंट नोट, सेवा नियमों अथवा साप्ताहिक विश्राम संबंधी वैधानिक प्रावधानों से टकराता है और उसके अनुरूप प्रतिपूरक अवकाश की व्यवस्था नहीं है, तो उसकी वैधानिकता को चुनौती देने का गंभीर आधार बन सकता है। अंतिम स्थिति संबंधित बैंक के वास्तविक आदेश और उस पर लागू सेवा शर्तों की जांच के बाद ही तय होगी।
शुक्रवार, 25 सितंबर 2026
udaydinmaan: निर्वाचन आयोग में ‘दरार’
udaydinmaan: निर्वाचन आयोग में ‘दरार’: वोट चोरी के आरोपों के बीच निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट ने बढ़ाया सियासी तापमान गंभीर आरोपों और विपक्ष के हमलों के बीच विवाद का एक औ...
निर्वाचन आयोग में ‘दरार’
वोट चोरी के आरोपों के बीच निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट ने बढ़ाया सियासी तापमान
गंभीर आरोपों और विपक्ष के हमलों के बीच विवाद का एक और महत्वपूर्ण पक्ष भी आया सामने
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने खोला मोर्चा,अब सवाल संस्था की विश्वसनीयता का
देहरादून। चुनावी राजनीति में वोट चोरी के आरोपों के बीच निर्वाचन आयोग को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, फार्म-6 में बदलाव तथा मतदाता सूची से जुड़े तकनीकी तंत्र जैसे महत्वपूर्ण विषयों से था। रिपोर्ट सामने आते ही विपक्ष ने इसे निर्वाचन आयोग के भीतर गंभीर मतभेद का संकेत बताते हुए केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर हमला तेज कर दिया है। विपक्षी दलों की ओर से अब मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संसदीय प्रक्रिया शुरू करने की बात भी सामने आई है। लेकिन इस पूरे विवाद में एक दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
निर्वाचन आयोग ने रिपोर्ट के बाद स्पष्ट किया कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय और सुझाव आना निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। आयोग के मुताबिक पिछले एक वर्ष में लिए गए निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए और केवल कुछ आंतरिक टिप्पणियों को सामने रखकर पूरी प्रक्रिया की तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। यानी अब राजनीतिक सवाल सीधे निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर आ खड़ा हुआ हैकृकि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार आपत्ति दर्ज की, तो उन आपत्तियों पर क्या हुआ? क्या उन्हें स्वीकार किया गया? क्या उन्हें खारिज किया गया?अगर खारिज किया गया तो उसके कारण क्या थे?और सबसे बड़ा सवालकृक्या इन आपत्तियों से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किए जा सकते हैं?यही सवाल इस पूरे विवाद को गंभीर बनाता है।
मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि आपत्तियां किसी सामान्य प्रशासनिक फैसले को लेकर नहीं थीं। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने तथा मतदाता डेटा की तकनीकी व्यवस्था जैसे चुनावी प्रक्रिया के मूल हिस्से शामिल थे। वहीं, आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक वैधानिक प्रक्रिया है और मतदाता सूची को अद्यतन करना उसका संवैधानिक दायित्व है। एसआईआर को लेकर विपक्ष लंबे समय से सवाल उठा रहा है, जबकि आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है। यहीं से वोट चोरी की राजनीतिक बहस और निर्वाचन आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता एक-दूसरे से जुड़ जाती है।
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलावों का इस्तेमाल चुनावी लाभ के लिए किया जा सकता है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता और सत्यापन चुनाव प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा है। इन दोनों दावों के बीच असली कसौटी दस्तावेज और पारदर्शिता है। लोकतंत्र में चुनाव आयोग पर सवाल उठना अपने आप में लोकतंत्र का संकट नहीं है। बल्कि किसी भी संवैधानिक संस्था से सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। संकट तब पैदा होता है जब सवालों के जवाब अस्पष्ट रह जाएं और संस्था के भीतर की असहमति पर भी जनता को पर्याप्त जानकारी न मिले। 14 आपत्तियों की खबर ने इसी पारदर्शिता की मांग को और बड़ा कर दिया है।
राजनीतिक रूप से देखें तो विपक्ष को इसमें सरकार और चुनाव आयोग पर हमला करने का नया आधार मिला है। दूसरी ओर सत्तापक्ष और आयोग के पास यह कहने का आधार है कि आंतरिक विमर्श को संस्थागत मतभेद या निर्णयों की वैधता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। आयोग ने खुद कहा है कि अलग-अलग राय निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए। लेकिन जनता के लिए सवाल इससे आगे का है।
चुनाव कौन जीतता है, यह बाद का सवाल है। चुनाव कैसे हुआ और हर मतदाता को अपने वोट के अधिकार का समान अवसर मिला या नहींकृयह उससे पहले का सवाल है। यही कारण है कि वोट चोरी जैसे राजनीतिक नारों से ऊपर उठकर मतदाता सूची, एसआईआर और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की स्वतंत्र और तथ्याधारित पड़ताल जरूरी है। चुनाव आयोग देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का निर्णायक प्रहरी है। उसकी विश्वसनीयता किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्षकृदोनों की चुनावी वैधता अंततः उसी व्यवस्था से आती है। इसलिए 14 आपत्तियों की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यही हैकृकि अब बहस आरोप बनाम आरोप की नहीं, दस्तावेज बनाम दस्तावेज की होनी चाहिए। यदि आपत्तियां गलत थीं तो उनके खारिज किए जाने का पूरा आधार सामने आए। यदि आपत्तियों में दम था तो सुधार की प्रक्रिया सार्वजनिक हो और यदि आयोग के सभी निर्णय वास्तव में सर्वसम्मति से हुए, तो उन फैसलों की प्रक्रिया और संबंधित रिकार्ड जनता के सामने रखने में संकोच नहीं होना चाहिए। क्योंकि चुनाव में हारने वाला दल पांच साल इंतजार कर सकता है, लेकिन मतदाता का खोया हुआ भरोसा लोकतंत्र के लिए कहीं ज्यादा महंगा पड़ता है। वोट चोरी का आरोप सच है या राजनीतिक नाराकृइसका फैसला राजनीतिक मंच नहीं, पारदर्शी तथ्य और संवैधानिक प्रक्रिया ही कर सकती है।
गुरुवार, 24 सितंबर 2026
udaydinmaan: उत्तराखंड में चुनावी उल्टी गिनती शुरू
udaydinmaan: उत्तराखंड में चुनावी उल्टी गिनती शुरू: मिशन-2027 के लिए बूथ तक पहुंच गई है भाजपा कांग्रेस ने भी तेज की सरकार को घेरने की कवायद देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की उल्ट...
उत्तराखंड में चुनावी उल्टी गिनती शुरू
मिशन-2027 के लिए बूथ तक पहुंच गई है भाजपा
कांग्रेस ने भी तेज की सरकार को घेरने की कवायद
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। चुनाव आयोग की घोषणा अभी बाकी है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनावी मौसम दस्तक दे चुका है। सत्ता की हैट्रिक के लक्ष्य के साथ भाजपा संगठन को बूथ से लेकर घर तक सक्रिय करने में जुटी है, तो कांग्रेस सरकार के कामकाज, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था और जनसरोकारों के मुद्दों को लेकर मैदान तैयार कर रही है। विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल मार्च 2027 में पूरा होना है। सामान्य चुनावी कार्यक्रम के हिसाब से इससे पहले मतदान होना है। फिलहाल समय से पहले चुनाव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में आने वाले महीने दोनों प्रमुख दलों के लिए संगठन, मुद्दों और उम्मीदवारों की जमीन तैयार करने के लिहाज से निर्णायक होंगे।
भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। पार्टी ने बूथ सशक्तीकरण, शक्ति केंद्रों की बैठक और घर-घर संपर्क जैसे कार्यक्रमों को गति दी है। सितंबर में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उत्तराखंड दौरे के दौरान भी संगठन और आगामी चुनाव की रणनीति पर मंथन हुआ। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने का नहीं, बल्कि सत्ता में लगातार दो कार्यकाल के बाद स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाली नाराजगी और अपेक्षाओं को साधने का भी होगा। पार्टी विकास, सांस्कृतिक पहचान और सरकार के फैसलों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस भी अब चुनावी तैयारी को गति दे रही है। प्रदेश संगठन को मजबूत करने, मोर्चों और विभागों को सक्रिय करने तथा राज्यभर में जनसंपर्क बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महिला सुरक्षा और सरकार के कामकाज को प्रमुख मुद्दों के रूप में उठा रहा है।
राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के प्रस्तावित दौरों से भी कांग्रेस चुनावी माहौल को गर्म करने की तैयारी में है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि सरकार विरोधी मुद्दों को केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित न रखते हुए उन्हें बूथ स्तर के संगठन और स्थानीय नेतृत्व के साथ किस तरह जोड़ा जाए। 2027 का चुनाव केवल सत्ता और विपक्ष की पारंपरिक लड़ाई तक सीमित रहने के संकेत नहीं दे रहा। उत्तराखंड में भू-कानून, मूल निवास, पलायन, रोजगार, भर्ती परीक्षाएं, महिला सुरक्षा, चारधाम और पर्यटन, ग्रामीण सड़कें, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा राज्य की सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दे पहले ही राजनीतिक विमर्श में जगह बना चुके हैं। हल्द्वानी रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच हुआ विवाद भी राजनीतिक टकराव का हिस्सा बन चुका है। इस मुद्दे को लेकर दोनों दलों की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आई हैं।
भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई के बावजूद क्षेत्रीय और छोटे दलों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड क्रांति दल समेत अन्य राजनीतिक संगठन अपने-अपने मुद्दों के साथ चुनावी जमीन तलाश रहे हैं। कई सीटों पर तीसरे विकल्प की मौजूदगी मुकाबले का गणित प्रभावित कर सकती है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, टिकटों को लेकर दलों के भीतर दावेदारियों का दबाव बढ़ेगा। मौजूदा विधायकों का प्रदर्शन, स्थानीय संगठन की स्थिति, जातीय-सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय असंतोष और जीत-हार का पिछला रिकार्ड टिकट वितरण में महत्वपूर्ण कारक बन सकते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ और मैदान का संतुलन हमेशा अहम रहा है। कुमाऊं और गढ़वाल के साथ मैदानी जिलों की राजनीतिक प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं। ऐसे में कोई भी दल केवल राज्यव्यापी नारे के सहारे चुनावी गणित नहीं साध सकता।
चुनावी शंखनाद चाहे दल कर रहे हों, अंतिम फैसला मतदाता को करना है। आने वाले महीनों में राजनीतिक दल अपने-अपने दावे जनता के सामने रखेंगे। भाजपा अपने कार्यकाल और नीतियों का हिसाब देगी, कांग्रेस सरकार की कमियां गिनाएगी और क्षेत्रीय दल अपने मुद्दों को केंद्र में लाने की कोशिश करेंगे। अब उत्तराखंड की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू हो चुका हैकृदावों से ज्यादा उनके प्रमाण, नारों से ज्यादा जमीन पर काम और आरोपों से ज्यादा जनता के सवालों का जवाब। 2027 का चुनाव अभी दूर दिखाई देता है, लेकिन उसकी राजनीतिक घड़ी चल पड़ी है। अब हर बूथ पर सवाल होगा, हर सीट पर गणित होगा और हर दल को अपने दावों का हिसाब जनता के सामने रखना होगा।
उत्तराखंड बीजेपी का नया नेतृत्व
विधानसभा चुनाव-2027 की तैयारी के बीच बदली भाजपा की टीम
रण से पहले भाजपा ने बदली टीम, उत्तराखंड में राम माधव की एंट्री
दुष्यंत गौतम की विदाई, बांसुरी स्वराज व अरविंद मेनन बने सह-प्रभारी
चुनावी तैयारी के बीच संगठन में बदलाव के कई मायने तलाशे जा रहे
देहरादून। विधानसभा चुनाव-2027 की उल्टी गिनती के बीच भाजपा ने उत्तराखंड संगठन में बड़ा फेरबदल किया है। पार्टी ने लंबे समय से प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे दुष्यंत गौतम को हटाकर वरिष्ठ नेता राम माधव को उत्तराखंड का नया प्रभारी बनाया है। इसके साथ ही सांसद बांसुरी स्वराज और वरिष्ठ नेता अरविंद मेनन को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। नई नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से लागू होंगी। भाजपा का यह बदलाव ऐसे समय हुआ है, जब उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के लिए संगठनात्मक तैयारियां तेज हो चुकी हैं। लिहाजा नई प्रभारी टीम की तैनाती को केवल सामान्य संगठनात्मक फेरबदल के बजाय चुनावी तैयारियों के अगले चरण से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, पार्टी ने नियुक्तियों के पीछे कोई विस्तृत कारण सार्वजनिक नहीं किया है।
दुष्यंत गौतम करीब छह वर्ष तक उत्तराखंड भाजपा के प्रभारी रहे। उनके कार्यकाल में पार्टी ने कई संगठनात्मक और राजनीतिक गतिविधियां संचालित कीं। हालांकि, हाल के समय में उनके नाम को लेकर राज्य की राजनीति में विवाद भी सामने आए। विशेष रूप से अंकिता भंडारी प्रकरण से संबंधित सोशल मीडिया सामग्री को लेकर विवाद हुआ था। गौतम ने इन आरोपों को खारिज किया था और कानूनी कार्रवाई भी की थी। ऐसे में उनकी जगह बदलाव को लेकर राजनीतिक चर्चाएं स्वाभाविक हैं, लेकिन भाजपा ने आधिकारिक रूप से इसे विवादों से जोड़कर कोई कारण नहीं बताया है।
अब पार्टी ने राम माधव को उत्तराखंड की कमान सौंपी है। राम माधव भाजपा के वरिष्ठ संगठनात्मक नेताओं में रहे हैं और इससे पहले जम्मू-कश्मीर सहित विभिन्न राजनीतिक-संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। अगस्त 2026 में उन्हें भाजपा की राष्ट्रीय टीम में उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली थी। उत्तराखंड के साथ उन्हें तमिलनाडु की संगठनात्मक जिम्मेदारी भी दी गई है।
प्रभारी के साथ सह-प्रभारियों की टीम भी बदल दी गई है। बांसुरी स्वराज और अरविंद मेनन को उत्तराखंड का सह-प्रभारी बनाया गया है। इससे पहले रेखा वर्मा यह जिम्मेदारी संभाल रही थीं। नई व्यवस्था में रेखा वर्मा को मध्य प्रदेश का सह-प्रभारी बनाया गया है। बांसुरी स्वराज दिल्ली से भाजपा सांसद हैं और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। वहीं अरविंद मेनन लंबे समय से भाजपा के संगठनात्मक कामकाज से जुड़े रहे हैं। नई टीम में एक ओर वरिष्ठ संगठनात्मक अनुभव है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े नए चेहरे को उत्तराखंड में जिम्मेदारी दी गई है।
2027 का चुनाव नई प्रभारी टीम के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा होगा। उसके सामने सरकार और संगठन के बीच समन्वय, बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय रखना, कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को साधना और चुनावी मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाना जैसी चुनौतियां होंगी। इसके साथ ही टिकट वितरण से पहले पार्टी के भीतर दावेदारियों का दबाव भी बढ़ेगा। मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन, स्थानीय संगठन की स्थिति, क्षेत्रीय समीकरण और संभावित प्रत्याशियों की स्वीकार्यता जैसे मुद्दे नई टीम के सामने होंगे।
उत्तराखंड में पहाड़ और मैदान की अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए संगठन के लिए क्षेत्रीय संतुलन भी महत्वपूर्ण होगा। गढ़वाल, कुमाऊं और मैदानी जिलों की राजनीतिक प्राथमिकताओं को एक चुनावी रणनीति में पिरोना नई टीम की अहम जिम्मेदारी होगी। भाजपा पहले ही संगठनात्मक बैठकों, बूथ स्तर की तैयारियों और जनसंपर्क गतिविधियों को तेज कर चुकी है। ऐसे समय में केंद्रीय नेतृत्व की नई टीम की तैनाती का अर्थ यह भी है कि चुनावी तैयारियों की निगरानी के लिए संगठन के शीर्ष स्तर से उत्तराखंड पर फोकस बढ़ा है।
अब देखना यह होगा कि राम माधव के नेतृत्व वाली नई टीम प्रदेश संगठन, सरकार और कार्यकर्ताओं के बीच किस तरह तालमेल बनाती है और आने वाले महीनों में भाजपा की चुनावी रणनीति किस रूप में सामने आती है। प्रभारी बदला है, सह-प्रभारी बदले हैंकृअब नजर इस पर होगी कि क्या भाजपा की चुनावी रणनीति भी उसी अनुपात में बदलेगी। 2027 के रण में संगठन की यह नई टीम कितनी निर्णायक भूमिका निभाती है, इसका जवाब आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति देगी।
बुधवार, 23 सितंबर 2026
udaydinmaan: सर्वे की ‘चमक’ और जमीन की ‘हकीकत’
udaydinmaan: सर्वे की ‘चमक’ और जमीन की ‘हकीकत’: एक मीडिया सर्वे में भाजपा आगे, जमीन पर सवाल बरकरार 2027 से पहले आंकड़ों ने बढ़ाया भाजपा का आत्मविश्वास लेकिन रोजगार, पलायन और भर्ती जैसे सवाल ...
सर्वे की ‘चमक’ और जमीन की ‘हकीकत’
एक मीडिया सर्वे में भाजपा आगे, जमीन पर सवाल बरकरार
2027 से पहले आंकड़ों ने बढ़ाया भाजपा का आत्मविश्वास
लेकिन रोजगार, पलायन और भर्ती जैसे सवाल अब भी सामने
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक सर्वेक्षणों की बाढ़ आ गई है। अधिकांश चर्चित सर्वे भाजपा को बढ़त दिखा रहे हैं। कहीं भाजपा को स्पष्ट बहुमत के करीब बताया जा रहा है तो कहीं उसे 50 से अधिक सीटों का अनुमान दिया जा रहा है। भाजपा भी इन आंकड़ों को अपने पक्ष में माहौल का प्रमाण बता रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सर्वे की यह चमक उत्तराखंड की जमीन पर भी उतनी ही दिखाई दे रही है? एक सर्वे में भाजपा को 54 और कांग्रेस को 14 सीटों का अनुमान लगाया गया है। वहीं दूसरे सर्वे में दोनों दलों के बीच मत-समर्थन का अंतर काफी कम बताया गया। आंकड़ों का यह अंतर खुद बता रहा है कि चुनाव से कई महीने पहले किए गए सर्वे को अंतिम राजनीतिक सच्चाई मानना जोखिम भरा है। सवाल सरकार से भी है और सर्वे करने वालों से भी।
यदि भाजपा के पक्ष में इतना मजबूत जनमत है तो पहाड़ के गांवों से लेकर शहरों तक रोजगार, सरकारी भर्तियों, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, भू-कानून और मूल निवास जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में क्यों हैं? यदि सरकार की नीतियों को लेकर व्यापक संतोष है तो विपक्ष को लगातार इन मुद्दों पर सरकार को घेरने का अवसर क्यों मिल रहा है? यहां सरकार के सामने एक दूसरा पक्ष भी है। सत्ता में रहने का अर्थ केवल योजनाओं और उपलब्धियों की सूची पेश करना नहीं, बल्कि जनता के रोजमर्रा के सवालों का जवाब देना भी है। उत्तराखंड का मतदाता सड़क, रोजगार, स्कूल और अस्पताल को आंकड़ों से नहीं, अपने अनुभव से मापता है।
भाजपा संगठन और चुनावी तैयारी में काफी आगे दिखाई देती है। बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने की कोशिश, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और लगातार राजनीतिक कार्यक्रम पार्टी को चुनावी मशीनरी के स्तर पर बढ़त दे सकते हैं। लेकिन संगठन की ताकत और मतदाता की संतुष्टि एक ही चीज नहीं हैं। सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास के सरकारी दावों का लाभ आम मतदाता को उतना महसूस हो रहा है, जितना सरकारी प्रचार में दिखाई देता है? भर्ती परीक्षाओं और युवाओं के रोजगार से जुड़े विवाद, पहाड़ों में पलायन, बंद होते स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और आपदा के बाद पुनर्निर्माण जैसे सवाल किसी सर्वे की एक पंक्ति से खत्म नहीं होते। इनका जवाब जमीन पर चाहिए।
भाजपा के लिए सर्वे निश्चित रूप से राजनीतिक राहत का संदेश हैं। लेकिन यही आंकड़े पार्टी के सामने एक चुनौती भी रखते हैं। यदि चुनाव तक यही बढ़त कायम रहती है तो उसे वास्तविक मतों में बदलना होगा। टिकट वितरण, स्थानीय उम्मीदवारों के प्रति नाराजगी, क्षेत्रीय समीकरण और सरकार के प्रति स्थानीय असंतोष कई सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं। कांग्रेस के लिए भी तस्वीर आसान नहीं है। केवल सरकार विरोधी मुद्दे गिनाने से चुनावी मुकाबला नहीं बनता। उसे संगठन, प्रत्याशी और स्थानीय मुद्दों को मतदाताओं के भरोसे में बदलना होगा।
राजनीतिक दल सर्वे के आंकड़ों को अपने-अपने पक्ष में पढ़ सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम कसौटी सर्वे नहीं, मतदाता है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह सर्वे की बढ़त के भरोसे सवालों को हल्का न समझे। क्योंकि सत्ता के गलियारों में लोकप्रियता का दावा और गांव की चौपाल पर जनता का अनुभवकृदोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते। 2027 की लड़ाई अभी बाकी है। फिलहाल सर्वे भाजपा को आगे दिखा रहे हैं, लेकिन उत्तराखंड के सामने सवालों की लंबी सूची भी खड़ी है। इन सवालों का जवाब आंकड़ों से नहीं, सरकार के काम और जनता के अनुभव से तय होगा। सर्वे चाहे जिस दिशा में इशारा करें, अंतिम सवाल यही रहेगाकृक्या सरकार के दावे मतदाता के अनुभव से भी मेल खाते हैं?
‘स्ट्रांग रूम’ बना सियासी रणभूमि
बेहड़ को थप्पड़ के आरोप से किच्छा की राजनीति में भूचाल
पूर्व विधायक शुक्ला और कांग्रेस विधायक बेहड़ आमने-सामने
पुलिस के सामने हाथापाई के आरोप, दोनों पर कार्रवाई का दबाव
देहरादून। नगर निकाय चुनाव में मतपेटियों की सुरक्षा के लिए बनाया गया स्ट्रांग रूम मंगलवार को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निगरानी का केंद्र बनने के बजाय सियासी टकराव का अखाड़ा बन गया। कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ और भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के समर्थकों के बीच विवाद इतना बढ़ा कि हाथापाई की नौबत आ गई। बेहड़ ने आरोप लगाया कि शुक्ला के साथ मौजूद एक युवक ने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में उन्हें थप्पड़ मारा। घटना के बाद किच्छा की सियासत गरमा गई और दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। विवाद की शुरुआत स्ट्रांग रूम के बाहर लगाए गए पर्दे को लेकर हुई। बेहड़ ने इसकी पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए आपत्ति दर्ज कराई। इसी दौरान पूर्व विधायक राजेश शुक्ला समर्थकों के साथ मौके पर पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच कहासुनी शुरू हुई और देखते ही देखते माहौल तनावपूर्ण हो गया। आरोप है कि इसी दौरान शुक्ला के साथ आए एक समर्थक ने बेहड़ के साथ धक्का-मुक्की की और उन्हें थप्पड़ मारा।
मामला यहीं नहीं रुका। दोनों पक्षों के समर्थक आमने-सामने आ गए। पुलिस और अधिकारियों ने बीच-बचाव किया, लेकिन तनाव इतना बढ़ गया कि पुलिस को भीड़ हटाने के लिए लाठियां फटकारनी पड़ीं। बाद में पुलिस ने पूर्व विधायक राजेश शुक्ला को हिरासत में लिया। धरने पर बैठे विधायक बेहड़ को भी पुलिस अपने साथ कोतवाली ले गई। देर शाम दोनों को छोड़े जाने की जानकारी सामने आई। इस पूरे घटनाक्रम ने किच्छा की पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को फिर सामने ला दिया है। बेहड़ और शुक्ला के बीच राजनीतिक टकराव नया नहीं है और दोनों के बीच पुरानी तनातनी का जिक्र स्थानीय रिपोर्टों में भी सामने आया है। लेकिन इस बार विवाद की गंभीरता इसलिए बढ़ गई कि मामला चुनावी प्रक्रिया से जुड़े स्ट्रांग रूम के बाहर हुआ और आरोप पुलिस-प्रशासन की मौजूदगी में मारपीट तक पहुंचने का है। सवाल केवल यह नहीं है कि थप्पड़ किसने मारा, बल्कि यह भी है कि चुनावी प्रक्रिया की संवेदनशील जगह पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच तनाव इस स्तर तक कैसे पहुंचा?
बेहड़ ने घटना पर कार्रवाई की मांग करते हुए पुलिस को तहरीर देने की बात कही है। वहीं पुलिस ने उपलब्ध साक्ष्यों और सीसीटीवी के आधार पर कार्रवाई की बात कही है। किच्छा का यह घटनाक्रम अब केवल दो नेताओं की भिड़ंत नहीं रह गया है। यह कांग्रेस और भाजपा के स्थानीय शक्ति-संतुलन, राजनीतिक वर्चस्व और चुनावी मर्यादा पर भी सवाल खड़े कर रहा है। मतपेटियां स्ट्रांग रूम में पहुंच चुकी हैं, लेकिन किच्छा की सियासत का तापमान अभी नीचे आता नहीं दिख रहा।
सियासी जंग की ‘नई फाइल’
उत्तराखंड की सियासत
विकास के दावों से दाग तक सिमट रही है अब जंग
दूसरों पर आरोप लगाने से पहले अपना हिसाब देखे
2027 से पहले आरोपों की सियासत ने पकड़ा जोर
किसके दामन में कितने दाग के सवाल तक पहुंचा
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 का चुनाव अभी सामने नहीं आया, लेकिन सियासी बारूद बिछना शुरू हो गया है। कांग्रेस सरकार पर सवाल दाग रही है और भाजपा अब सवालों का जवाब देने के बजाय कांग्रेस के राजनीतिक अतीत की फाइलें खोलने में जुट गई है। इसी क्रम में भाजपा ने कांग्रेस पर ऐसा तंज कसा है, जिसने सियासी बहस को सरकार के कामकाज से उठाकर किसके दामन में कितने दाग के सवाल तक पहुंचा दिया है। भाजपा ने व्यंग्य करते हुए कहा कि लगता है कांग्रेस नेता अपने ही ऊपर लगे आरोपों की चार्जशीट लेकर घूम रहे हैं।
एक लाइन का यह तंज दरअसल 2027 की राजनीति की बदलती भाषा का संकेत है। कांग्रेस सरकार से हिसाब मांग रही है तो भाजपा पलटकर कांग्रेस से उसके पुराने हिसाब का जवाब मांग रही है। यानी चुनावी मैदान में अब आरोपों की फाइल बनाम उपलब्धियों की फाइल खुलने लगी है। कांग्रेस की ओर से सरकार पर लगातार कई मुद्दों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। रोजगार, भर्ती, महंगाई, पलायन और जनहित से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष सरकार को घेर रहा है। भाजपा का जवाब हैकृसिर्फ सरकार पर उंगली उठाने से राजनीति की जवाबदेही पूरी नहीं होती। विपक्ष को अपने नेताओं और अपने कार्यकाल से जुड़े सवालों का भी जवाब देना चाहिए। यानी भाजपा ने कांग्रेस के हमले की दिशा बदलने की कोशिश की है। सवाल सरकार से था, जवाब कांग्रेस के अतीत की तरफ मोड़ दिया गया।
राजनीतिक दल चुनाव से पहले जनता के सामने अपनी-अपनी कहानी रखने की तैयारी में हैं। भाजपा अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को मुद्दा बनाएगी, जबकि कांग्रेस सरकार की कमियों और जनता से जुड़े सवालों को केंद्र में रखने की कोशिश करेगी। लेकिन भाजपा के ताजा हमले से साफ है कि चुनावी मुकाबला केवल विकास और योजनाओं तक सीमित रहने वाला नहीं है। पुराने विवाद, नेताओं के बयान और एक-दूसरे के कार्यकाल का रिकार्ड भी चुनावी हथियार बन सकता है। यही राजनीति का वह मोड़ है जहां सवाल बदलते देर नहीं लगती कि किसने क्या किया से लेकर किसने क्या किया था तक।
इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जनता के सवाल हैं। उत्तराखंड का युवा रोजगार और भर्ती चाहता है। पहाड़ पलायन और बुनियादी सुविधाओं का जवाब मांगता है। किसान, कर्मचारी, व्यापारी और आम परिवार अपनी-अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद करता है। ऐसे में राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जितना तेज होगा, उतना ही बड़ा सवाल यह रहेगा कि क्या चुनावी बहस जनता के वास्तविक मुद्दों पर टिकेगी या फिर एक-दूसरे की राजनीतिक चार्जशीट पढ़ने में ही पूरा चुनाव निकल जाएगा?
भाजपा का चार्जशीट वाला तंज इस बात का संकेत है कि 2027 की लड़ाई में राजनीतिक हमले और धारदार होने वाले हैं। कांग्रेस सरकार के पांच साल का हिसाब मांगेगी तो भाजपा कांग्रेस के पुराने रिकार्ड का हिसाब सामने रखेगी। आगे यह टकराव किस स्तर तक जाएगा, यह आने वाले महीनों में साफ होगा। फिलहाल दोनों दलों ने अपनी-अपनी राजनीतिक तलवारें निकाल ली हैं। अब मुकाबला सिर्फ कौन सही का नहीं, बल्कि कौन किसका हिसाब खोलता है का भी है और उत्तराखंड की जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा।
मंगलवार, 22 सितंबर 2026
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भाजपा के भीतर खिंची ‘लकीरें’
चकराता के लोगों को सदस्यता दिलाने पहुंचे नेता लौटे बैरंग
एक दिन पहले किया प्रदर्शन, अगले दिन ज्वाइनिंग पर रोक
चुनावी साल में संगठन बनाम स्थानीय समीकरण की परीक्षा
मैं तो सस्ता आदमी हूं कहकर सवाल टाल गए मंत्री खजान दास
देहरादून। चुनावी साल में भाजपा एक तरफ संगठन की मजबूती और 2027 में भारी बहुमत से सत्ता में वापसी के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ चकराता प्रकरण ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को सार्वजनिक मंच पर ला दिया है। करीब 60 लोगों की भाजपा में प्रस्तावित ज्वाइनिंग रुकना महज एक सदस्यता कार्यक्रम का टलना नहीं, बल्कि संगठन और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के बीच बढ़ती दूरी का संकेत बनकर सामने आया है। चकराता क्षेत्र से करीब 26 परिवारों के लगभग 60 लोगों को भाजपा में शामिल कराने के लिए प्रदेश कार्यालय लाया गया था। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मधु चौहान और दर्जाधारी राज्य मंत्री गीता राम गौड़ के नेतृत्व में पहुंचे इन लोगों को उम्मीद थी कि पार्टी कार्यालय में बाकायदा सदस्यता ग्रहण कराई जाएगी। लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही पूरा घटनाक्रम बदल गया और ज्वाइनिंग टल गई।
रिपोर्टों के मुताबिक, कैबिनेट मंत्री खजान दास को जब चकराता से आए लोगों की सदस्यता की जानकारी मिली तो वह प्रदेश कार्यालय पहुंचे और ज्वाइनिंग का विरोध किया। इसके बाद सदस्यता कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सका और लोगों को वापस लौटना पड़ा। मामला यहीं नहीं रुका। जब मंत्री से ज्वाइनिंग रोके जाने को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने पहले सवाल को टालने की कोशिश की और भाजपा के 2027 में फिर सरकार बनाने का दावा किया। लेकिन ज्वाइनिंग के सवाल पर उनका मैं तो सस्ता आदमी हूं वाला जवाब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया।
इस पूरे घटनाक्रम की टाइमिंग ने सवाल और गहरे कर दिए हैं। ज्वाइनिंग से ठीक एक दिन पहले चकराता क्षेत्र से जुड़े भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने खजान दास के सरकारी आवास के बाहर प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों ने समाज कल्याण विभाग की योजनाओं में क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं और उनके प्रस्तावों की कथित अनदेखी के आरोप लगाए थे। कुछ प्रदर्शनकारियों ने योजनाओं में कथित कमीशनखोरी के आरोप भी लगाए, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। खजान दास ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि यदि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों में एक प्रतिशत भी सच्चाई साबित होती है तो वह मंत्री पद से इस्तीफा देने तक को तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह पूरे प्रदेश के मंत्री हैं और योजनाओं की स्वीकृति संबंधित क्षेत्रों से मिले प्रस्तावों के आधार पर हुई है।
मामले में भाजपा संगठन ने इसे अलग तरीके से रखा है। प्रदेश महामंत्री कुंदन परिहार के मुताबिक प्रदेश कार्यालय में ज्वाइनिंग की पूर्व सूचना संगठन को नहीं दी गई थी और प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट उस समय कार्यालय में मौजूद नहीं थे। इसलिए कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ाया गया। संगठन का यह स्पष्टीकरण अपने स्थान पर है, लेकिन राजनीतिक सवाल इससे खत्म नहीं होते। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि करीब 60 लोगों को सदस्यता दिलाने की तैयारी प्रदेश कार्यालय तक पहुंची और ऐन वक्त पर कार्यक्रम रोकना पड़ा? यदि कार्यक्रम की सूचना संगठन को नहीं थी तो लोगों को प्रदेश कार्यालय तक किस स्तर से लाया गया? और यदि यह केवल प्रक्रिया का मामला था तो मंत्री के हस्तक्षेप की नौबत क्यों आई?
उत्तराखंड भाजपा पहले ही 2027 की तैयारी में संगठन को मजबूत करने और बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने पर जोर दे रही है। ऐसे समय में किसी विधानसभा क्षेत्र के नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी खुलकर सामने आना पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। चकराता में घटनाक्रम अब दो अलग-अलग तस्वीरें सामने रख रहा हैकृएक तरफ भाजपा का केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व संगठन की एकजुटता का संदेश दे रहा है, दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर विरोध, प्रदर्शन और सदस्यता कार्यक्रम के रुकने जैसी घटनाएं राजनीतिक संदेश को उलझा रही हैं। यह घटनाक्रम भाजपा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव केवल बड़े नेताओं के भाषणों और प्रदेश कार्यालय के कार्यक्रमों से नहीं जीते जाते। बूथ तक संगठन की स्वीकार्यता और स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
भाजपा लगातार अपने संगठन को अनुशासित और मजबूत राजनीतिक ढांचे के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ऐसे में जब पार्टी में शामिल होने के लिए पहुंचे लोगों को सदस्यता लिए बिना लौटना पड़े और उसी घटनाक्रम में पार्टी के एक मंत्री का विरोध सामने आए, तो स्वाभाविक रूप से संगठनात्मक समन्वय पर सवाल उठते हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि ज्वाइनिंग रुकने को सीधे किसी बड़े संगठनात्मक संकट का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। भाजपा संगठन ने इसे सूचना और प्रक्रिया का मामला बताया है और बातचीत से समाधान की बात सामने आई है। लेकिन राजनीतिक संदेश को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। चुनावी दहलीज पर खड़ी भाजपा के लिए असली चुनौती विरोधियों के आरोपों से ज्यादा अपने ही घर में उठती आवाजों को समय रहते संभालने की है। चकराता की 60 सदस्यताओं पर लगा ब्रेक इसलिए चर्चा में है, क्योंकि सवाल केवल 60 लोगों का नहीं है। सवाल यह है कि चुनावी मैदान में उतरने से पहले भाजपा अपने स्थानीय समीकरणों, नाराज कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच तालमेल को किस तरह साधती है। एक दिन प्रदर्शन, अगले दिन ज्वाइनिंग पर रोक और फिर संगठन की सफाईकृचकराता का घटनाक्रम फिलहाल भाजपा के लिए असहज राजनीतिक तस्वीर जरूर पेश कर रहा है।
कांग्रेस में ‘उत्साह’ भाजपा में ‘बेचैनी’
हरदा बनाम भाजपा, या कांग्रेस के भीतर भी एक संदेश
उत्तराखंड में चुनावी दहलीज पर पुराने चेहरे की वापसी
हरदा के स्वागत में शक्ति प्रदर्शन या कांग्रेस का है संदेश
2027 से पहले फिर आमने-सामने पुराने सियासी चेहरे
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में कुछ चेहरे ऐसे हैं जिनकी मौजूदगी भर से राजनीतिक तापमान बदल जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की लंबे समय बाद उत्तराखंड वापसी ने एक बार फिर यही साबित किया है। दिल्ली से प्रदेश लौटे रावत का रास्ते भर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया और देहरादून में रोड शो के जरिए अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई। रावत की वापसी ऐसे समय हुई है, जब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो चुकी हैं और कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, चेहरे और राजनीतिक रणनीति को लेकर चर्चाएं लगातार चल रही हैं। ऐसे में उनके स्वागत को भाजपा जहां शक्ति प्रदर्शन और कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस के नेता इसे वरिष्ठ नेता के प्रति कार्यकर्ताओं के सम्मान और समर्थन के तौर पर पेश कर रहे हैं। यानी हरदा लौटे तो सिर्फ स्वागत नहीं हुआ,सियासी संदेश भी पढ़े जाने लगे।
भाजपा नेताओं ने रावत के रोड शो को सीधे कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जोड़ दिया है। भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने सवाल उठाया कि यदि कांग्रेस में रावत को पूरा सम्मान और महत्व मिल रहा है तो शक्ति प्रदर्शन की जरूरत क्यों पड़ी? भाजपा ने यह सवाल भी उठाया कि इस प्रदर्शन का संदेश आखिर किसे दिया जा रहा हैकृकांग्रेस आलाकमान को, प्रदेश नेतृत्व को या पार्टी के भीतर अपने समर्थकों को? भाजपा विधायक विनोद चमोली ने इससे भी तीखा हमला करते हुए रावत के रोड शो को राजनीतिक ड्रामा बताया और उनके हालिया इस्तीफे से जुड़े घटनाक्रम को मुद्दा बनाया। भाजपा का आरोप है कि रावत कांग्रेस के भीतर अपने राजनीतिक प्रभाव को फिर से स्थापित करने के लिए शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान ने भी रोड शो को कांग्रेस की गुटीय रस्साकशी से जोड़ते हुए निशाना साधा।
कांग्रेस के नजरिए से देखें तो तस्वीर दूसरी है। पार्टी के कार्यकर्ताओं का सड़क पर उतरकर किसी वरिष्ठ नेता का स्वागत करना यह बताता है कि रावत की राजनीतिक पकड़ और समर्थक आधार को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खुद रावत ने हरिद्वार पहुंचने पर कहा कि वह पार्टी के सिपाही हैं और पार्टी का निर्णय सर्वाेपरि है। यही बयान भाजपा के हमलों के बीच कांग्रेस के लिए राजनीतिक जवाब भी बनता है। रावत ने पार्टी से दूरी बनाने के बजाय खुद को संगठन के साथ खड़ा बताया है। इसलिए भाजपा जिस रोड शो को शक्ति प्रदर्शन बता रही है, कांग्रेस उसी दृश्य को वरिष्ठ नेता के प्रति कार्यकर्ताओं के भरोसे के रूप में देख रही है।
रावत की वापसी का समय भी महत्वपूर्ण है। उनके पूर्व ओएसडी से जुड़े परिसर में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद उत्तराखंड की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए हैं। रावत ने इस कार्रवाई को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा और चुनाव से पहले केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए। दूसरी तरफ भाजपा नेता इस प्रकरण को उनके राजनीतिक बचाव और कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जोड़ रहे हैं। यहां एक बात स्पष्ट हैकृईडी की कार्रवाई और उससे जुड़े आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी से अलग रखकर देखा जाना चाहिए। जांच में सामने आने वाले तथ्यों और किसी राजनीतिक दल के आरोपों में अंतर है।
हरीश रावत की वापसी ने कांग्रेस के भीतर एक पुराना सवाल फिर जीवित कर दिया हैकृक्या उत्तराखंड कांग्रेस चुनावी राजनीति में उनके अनुभव और जनसंपर्क का कितना इस्तेमाल करेगी? दूसरी ओर भाजपा के लिए रावत अब भी एक ऐसा राजनीतिक चेहरा हैं, जिस पर हमला करके कांग्रेस की पुरानी राजनीति, नेतृत्व और कथित गुटबाजी को निशाना बनाया जा सकता है। यही वजह है कि रावत के स्वागत का कार्यक्रम भी भाजपा के लिए राजनीतिक मुद्दा बन गया। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस अभी अपने भीतर की नेतृत्व संबंधी चर्चाओं से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है। ऐसे में रावत की सक्रिय वापसी इन चर्चाओं को और गति दे सकती है।
रावत का रोड शो भाजपा के खिलाफ संदेश है या कांग्रेस के भीतर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता का प्रदर्शनकृइसका अंतिम अर्थ राजनीतिक परिस्थितियां तय करेंगी। लेकिन इतना जरूर है कि सड़क पर उमड़ी भीड़ ने दोनों दलों को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर किया है। भाजपा इसे कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे रावत के प्रति कार्यकर्ताओं के समर्थन के रूप में देख रही है। दोनों के दावों के बीच असली राजनीतिक सवाल यही है कि क्या यह स्वागत केवल भावनात्मक था या 2027 की चुनावी रणनीति का शुरुआती संकेत भी?
उत्तराखंड की राजनीति में चुनाव के पहले पुराने चेहरे अक्सर नए समीकरण पैदा करते हैं। हरीश रावत की वापसी भी उसी क्रम का हिस्सा बनती दिख रही है। उनके समर्थकों का उत्साह कांग्रेस के लिए राजनीतिक ऊर्जा का संकेत है, जबकि भाजपा का लगातार हमला बताता है कि वह रावत की सक्रियता को चुनावी विमर्श से बाहर नहीं रहने देना चाहती। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि रावत की वापसी के बाद कांग्रेस में उनकी भूमिका क्या रहती है, प्रदेश नेतृत्व के साथ उनका तालमेल किस दिशा में जाता है और पार्टी 2027 की लड़ाई में उनके अनुभव को किस तरह इस्तेमाल करती है। फिलहाल तस्वीर साफ हैकृहरदा की वापसी से कांग्रेस में उत्साह है, भाजपा में बेचौनी नहीं तो कम से कम राजनीतिक सक्रियता जरूर बढ़ी है और उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में एक पुराना अध्याय फिर से सुर्खियों में आ गया है।
भाजपा फिर ‘नमो फैक्टर’ के भरोसे
अब उत्तराखंड में 300 जगहों पर नमो सेवा-अनकही कहानियां
प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले जनसंपर्क का नया प्रयोग
स्थानीय मुद्दों के बीच मोदी का चेहरा बनेगा भाजपा का सहारा
भाजपा की रणनीति साफकृचेहरा राष्ट्रीय, मैदान होगा स्थानीय
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट तेज होने के साथ भाजपा ने एक बार फिर अपनी राजनीति के सबसे बड़े चेहरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जनसंवाद के केंद्र में लाने की कवायद शुरू कर दी है। इस बार चुनावी मंच भाषणों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रंगमंच के जरिए मोदी के सार्वजनिक जीवन की कहानी जनता तक पहुंचाई जाएगी। भाजपा के सेवा संकल्प अभियान के तहत नमो सेवा-अनकही कहानियां कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों से जुड़े प्रसंगों को नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से पेश करने की योजना है। उत्तराखंड में 17 अक्टूबर के बीच सभी विधानसभा क्षेत्रों में स्कूलों, महाविद्यालयों, सामुदायिक भवनों, पंचायत भवनों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर करीब 300 मंचन प्रस्तावित हैं। यानी भाजपा अब मोदी के राजनीतिक सफर को सिर्फ भाषणों में नहीं, बल्कि संवाद, अभिनय और भावनात्मक प्रस्तुति के जरिए घर-घर तक पहुंचाने की तैयारी में है।
भाजपा की चुनावी राजनीति में नरेंद्र मोदी का चेहरा लंबे समय से केंद्रीय भूमिका में रहा है। उत्तराखंड में भी पार्टी की राष्ट्रीय नेतृत्व वाली राजनीति और स्थानीय संगठन के बीच मोदी की लोकप्रियता को जोड़ने की रणनीति दिखाई देती रही है। अब जबकि 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है, नमो सेवा-अनकही कहानियां को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम मानना राजनीतिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा। इसकी व्यापकता खुद बताती है कि यह एक बड़े जनसंपर्क अभियान का हिस्सा है। भाजपा प्रधानमंत्री के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों को सेवा, समर्पण, सुशासन और जनकल्याण के प्रसंगों के रूप में प्रस्तुत करने जा रही है।
उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा के सामने एक दिलचस्प चुनौती है। एक तरफ प्रदेश सरकार का अपना कामकाज, स्थानीय विधायक, मंत्री और संगठन हैं, तो दूसरी तरफ पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्रीय चेहरा है। ऐसे में मोदी के जीवन और सार्वजनिक सेवा की कहानी को विधानसभा स्तर तक ले जाना इस अंतर को पाटने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। यानी संदेश कुछ ऐसा हैकृकि चुनाव विधानसभा का हो सकता है, लेकिन भाजपा के राजनीतिक अभियान की धुरी मोदी ही रहेंगे। हालांकि इस रणनीति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मोदी के 25 वर्षों की कहानी स्थानीय राजनीतिक सवालों को पीछे कर पाएगी?
उत्तराखंड में बेरोजगारी, पलायन, भू-कानून, मूल निवास, भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता, ग्रामीण सड़कों, स्वास्थ्य सेवाओं और पहाड़ में शिक्षा जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं। 2027 में मतदाता इन सवालों पर भी दलों से जवाब मांगेंगे। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती केवल मोदी की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की नहीं होगी, बल्कि मोदी के राष्ट्रीय विमर्श और उत्तराखंड के स्थानीय सरोकारों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाने की भी होगी। राजनीतिक दलों ने लंबे समय से जनसभाओं, यात्राओं, इंटरनेट मीडिया और बूथ अभियानों का इस्तेमाल किया है। अब भाजपा ने रंगमंच को भी राजनीतिक संवाद के माध्यम के रूप में जोड़ा है।
नाट्य मंचन का असर भाषण से अलग होता है। कहानी, पात्र, संवाद और भावनात्मक प्रसंग किसी राजनीतिक यात्रा को अधिक सहज तरीके से लोगों तक पहुंचा सकते हैं। भाजपा इसी माध्यम से मोदी के सार्वजनिक जीवन की ऐसी घटनाओं को सामने लाने की तैयारी में है, जिन्हें पार्टी अनकही कहानियां के रूप में प्रस्तुत कर रही है। यही वजह है कि स्कूल से पंचायत भवन और सामुदायिक भवन से सार्वजनिक स्थल तक मंचन की योजना को केवल कार्यक्रमों की सूची नहीं, बल्कि व्यापक जनसंपर्क अभियान के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा की रणनीति से यह संकेत जरूर मिलता है कि पार्टी आगामी चुनाव में मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व को अपने अभियान का महत्वपूर्ण आधार बनाए रखना चाहती है। हालांकि मोदी लहर जैसी राजनीतिक धारणा का वास्तविक प्रभाव चुनावी परिणामों से ही आंका जा सकता है।
फिलहाल पार्टी ने मोदी के जन्मदिन से जुड़े सेवा कार्यक्रमों को एक महीने तक चलाने का फैसला किया है और उत्तराखंड में भी कई कार्यक्रमों के जरिए संगठन को सक्रिय किया जा रहा है। इसमें नमो सेवा-अनकही कहानियां सबसे अलग इसलिए है क्योंकि यहां मोदी की राजनीतिक यात्रा को कहानी बनाकर जनता के सामने रखने की कोशिश हो रही है। भाजपा के इस अभियान का दूसरा राजनीतिक असर विपक्ष पर पड़ना स्वाभाविक है। कांग्रेस के सामने चुनौती होगी कि वह भाजपा के मोदी-केंद्रित अभियान का जवाब केवल आलोचना के जरिए देती है या अपने वैकल्पिक नेतृत्व, स्थानीय मुद्दों और राज्य से जुड़े सवालों को समान प्रभावी ढंग से जनता के बीच ले जाती है। 2027 का चुनाव इसलिए दिलचस्प हो सकता है कि एक ओर भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व और सरकार की उपलब्धियों को केंद्र में रखेगी, जबकि विपक्ष के सामने स्थानीय मुद्दों और प्रदेश सरकार के कामकाज को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाने की चुनौती होगी।
भाजपा मोदी के 25 साल के सार्वजनिक जीवन को मंच पर उतारने जा रही है। लेकिन असली राजनीतिक परीक्षा मंच से बाहर होगी। क्या नाट्य मंचन लोगों को चुनावी मुद्दों से जोड़ पाएगा? क्या मोदी का चेहरा स्थानीय असंतोष और क्षेत्रीय सवालों पर भी उतना ही प्रभावी रहेगा? और क्या भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता को विधानसभा स्तर के राजनीतिक समीकरणों में बदल पाएगी? इन सवालों का जवाब आने वाले महीनों में राजनीतिक जमीन देगी। फिलहाल इतना जरूर है कि चुनाव से पहले भाजपा ने अपनी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पत्ता खोल दिया है उत्तराखंड के विधानसभा मैदान में फिर एक बार नमो फैक्टर को जनसंपर्क के रंगमंच पर उतारने की तैयारी है।
826 स्कूल बंद सरकार ‘मौन’
स्कूल बंद होने का दावा, सरकार की चुप्पी पर गरमाया सवाल
बच्चे कहां गए, गांव कैसे बचेंगे और सरकार जवाब कब देगी
स्कूल ठीक करो अभियान ने 10 दिन में मांगा सरकार से हिसाब
रोडमैप नहीं मिला तो दो अक्टूबर के बाद आंदोलन की चेतावनी
देहरादून। उत्तराखंड में एक तरफ शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने के दावे हैं, दूसरी तरफ गांवों में स्कूलों के दरवाजे बंद होने का सवाल खड़ा है। स्कूल ठीक करो अभियान के तहत काकरोच जनता पार्टी ने दावा किया है कि पिछले पांच वर्षों में 826 प्राथमिक विद्यालय बंद हुए हैं। संगठन ने सरकार से इस आंकड़े पर स्पष्ट जवाब और विद्यालयवार स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है। यह आंकड़ा सही है तो सवाल बेहद सीधा हैकृकि 826 स्कूल आखिर बंद क्यों हुए? और अगर यह आंकड़ा गलत है तो सरकार सामने आकर इसे गलत साबित क्यों नहीं करती?
मामला सिर्फ 826 भवनों का नहीं है। मामला उन बच्चों का है जिनकी पहली पाठशाला बंद हुई। मामला उन अभिभावकों का है जिन्हें अपने बच्चों को दूसरे विद्यालयों तक भेजना पड़ा। मामला उन गांवों का है जहां स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि गांव की मौजूदगी और भविष्य का भी प्रतीक है। स्कूल बंद करने का निर्णय कागज पर शायद एक प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकता है, लेकिन पहाड़ में उसका असर कहीं बड़ा होता है। एक स्कूल बंद होता है तो बच्चे दूसरे विद्यालय तक पहुंचने के लिए अधिक दूरी तय कर सकते हैं। परिवारों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आती है और छोटे गांवों में शिक्षा की सुविधा कमजोर होती है। इसलिए सरकार को केवल स्कूलों की संख्या बताने से काम नहीं चलेगा।
उसे बताना होगा कि बंद हुए 826 विद्यालयों में कितने बच्चे पढ़ते थे, उन्हें किन विद्यालयों में भेजा गया, कितनी दूरी तय करनी पड़ रही है और कितने शिक्षकों की तैनाती प्रभावित हुई। यही वह हिसाब है, जिसका इंतजार अब सरकार से किया जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल बनाने की बातें अपनी जगह हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों की बुनियादी जरूरतें आज भी सवाल बनकर खड़ी हैं। अभियान ने शिक्षक, पेयजल, शौचालय, बिजली और सुरक्षित भवन जैसी सुविधाओं को लेकर समयबद्ध योजना की मांग की है। सवाल यह है कि जिस स्कूल में शिक्षक पर्याप्त नहीं, पानी नहीं, शौचालय उपयोग लायक नहीं या भवन सुरक्षित नहीं, वहां आधुनिक शिक्षा के बड़े-बड़े दावे आखिर कितने कारगर होंगे?बच्चे को डिजिटल पाठ पढ़ाने से पहले उसे सुरक्षित स्कूल देना होगा।
सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या कम होने को विद्यालय बंद करने का कारण माना जाता है तो अगला सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता हैकृकि सरकारी स्कूलों से बच्चों का भरोसा क्यों घट रहा है? क्या वजह शिक्षक की कमी है? क्या वजह सुविधाओं की कमी है? क्या वजह निजी स्कूलों की ओर बढ़ता आकर्षण है? या फिर सरकारी शिक्षा व्यवस्था में लगातार हुई उपेक्षा ने अभिभावकों को विकल्प तलाशने पर मजबूर किया? इन सवालों का जवाब केवल शिक्षा विभाग नहीं, पूरी सरकार को देना होगा।
काकरोच जनता पार्टी ने सरकार को दस दिन के भीतर रिपोर्ट और शिक्षा सुधार का रोडमैप देने की मांग की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि जवाब नहीं मिला तो दो अक्टूबर के बाद शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया जाएगा। अब सरकार के सामने दो रास्ते हैंकृया तो आंकड़ों के साथ स्थिति स्पष्ट करे और बताए कि विद्यालयों को बचाने तथा सुधारने के लिए क्या समयबद्ध योजना है, या फिर विपक्षी संगठनों और जनता के सवालों का सामना करे। लेकिन इस बार सवाल केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
उत्तराखंड ने वर्षों से पलायन, गांवों की खाली होती आबादी और पहाड़ में घटती सुविधाओं की चिंता देखी है। ऐसे में यदि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की संख्या भी लगातार घट रही है तो इसे केवल शिक्षा विभाग की प्रशासनिक कवायद मानकर आगे बढ़ जाना गंभीर सवालों को अनदेखा करना होगा। 826 स्कूल बंद होने का दावा एक आंकड़ा नहीं, सरकार की जवाबदेही की परीक्षा है। सरकार बताएकृकि कितने स्कूल बंद हुए? क्यों बंद हुए? उन स्कूलों के बच्चे अब कहां पढ़ रहे हैं? कितने विद्यालयों में शिक्षक कम हैं? कितने स्कूलों में पानी, बिजली और शौचालय की समस्या है? कितने भवन बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं?
सरकार को इन सवालों का जवाब भाषण से नहीं, आंकड़ों और समयबद्ध कार्ययोजना से देना होगा। क्योंकि जिस पहाड़ से बच्चे स्कूल जाने के लिए निकलते हैं, उसी पहाड़ से अगर स्कूल ही गायब होते गए तो फिर विकास की मंजिल किसके लिए बनाई जा रही है?
सोमवार, 21 सितंबर 2026
udaydinmaan: डिजिटल क्रांति में भी ‘चढ़ावा’
udaydinmaan: डिजिटल क्रांति में भी ‘चढ़ावा’: 25 साल के उत्तराखंड में जीरो टालरेंस का ढोंग और तहसीलों का नंगानाच राजस्व तंत्र में दीमक, सरकार की निगरानी पर सवाल राज्य बनने से पहले से चली...
कमीशनखोरी की बलि चढ़े ‘गरीब’
मंत्री खजान दास के खिलाफ पार्टी कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूटा
कार्यकर्ताओं का दावा,कृकांग्रेसियों को बांटे जा रहे 80 प्रतिशत काम
अपनों के ही निशाने पर कैबिनेट मंत्री, आवास के बाहर उग्र प्रदर्शन
मंत्री खजान दास बोले- आरोप साबित हुए तो मंत्री पद ही छोड़ दूंगा
देहरादून। भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन के बाद अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण योजनाओं में कथित कमीशनखोरी को लेकर प्रदेश की सियासत गरमा गई है। प्रदर्शनकारियों ने कैबिनेट मंत्री खजान दास के सरकारी आवास के बाहर प्रदर्शन करते हुए योजनाओं के लाभार्थी चयन और विकास कार्यों के आवंटन में अनियमितता के गंभीर आरोप लगाए। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि योजनाओं के काम आवंटित करने में 15 से 20 प्रतिशत तक कमीशन लिया जा रहा है और इसके चलते करीब 80 प्रतिशत काम कांग्रेस से जुड़े लोगों को दिए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पात्र लाभार्थियों को योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है, जबकि राजनीतिक रूप से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है। उनका कहना था कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए संचालित योजनाओं का उद्देश्य जरूरतमंद और पात्र लोगों तक सरकारी सहायता पहुंचाना है, लेकिन कथित अनियमितताओं के कारण वास्तविक लाभार्थी पीछे छूट रहे हैं।
मंत्री खजान दास ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए बेहद कड़ा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों में यदि एक भी आरोप साबित हो जाता है तो वह मंत्री पद से इस्तीफा देने को तैयार हैं। मंत्री ने इससे भी आगे बढ़कर कहा कि आरोप साबित होने पर वह आत्महत्या तक कर लेंगे। मंत्री के इस बयान के बाद मामला और अधिक राजनीतिक चर्चा में आ गया है। चकराता क्षेत्र से आए भाजपा नेताओं का मंत्री के आवास के बाहर प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि आरोप विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं की ओर से लगाए गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने योजनाओं में पारदर्शिता, पात्र लोगों को लाभ और कामों के निष्पक्ष आवंटन की मांग उठाई।
उनका कहना है कि यदि योजनाओं में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं है तो लाभार्थी चयन और कामों के आवंटन की प्रक्रिया सार्वजनिक की जानी चाहिए। इसके साथ ही कथित कमीशनखोरी और राजनीतिक पक्षपात के आरोपों की जांच कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। मंत्री खजान दास के बयान ने अब विवाद को सीधे आरोप बनाम प्रमाण के सवाल में बदल दिया है। मंत्री ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को चुनौती देते हुए कहा है कि यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो वह अपने पद पर बने रहने का अधिकार नहीं समझेंगे। हालांकि, आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि या जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है।
मामले ने भाजपा के भीतर चकराता विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक खींचतान को भी सतह पर ला दिया है। एक ओर पार्टी से जुड़े नेता मंत्री पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, वहीं मंत्री आरोपों को पूरी तरह नकारते हुए सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं। अब निगाह इस बात पर है कि लगाए गए आरोपों की कोई औपचारिक जांच होती है या नहीं और सरकार अथवा संबंधित विभाग लाभार्थी चयन तथा कार्य आवंटन से जुड़े रिकार्ड सार्वजनिक कर इस विवाद की तस्वीर साफ करता है या नहीं। फिलहाल कमीशनखोरी के आरोप और मंत्री का बेहद कठोर बयान देहरादून की सियासत के केंद्र में आ गए हैं।
भाजपा में ‘अपनों’ की ही अनदेखी पर ‘महासंग्राम’
अपनी ही सरकार पर भड़कीं भाजपा नेता मधु चौहान, वायरल वीडियो से मचा हड़कंप
अपनी ही सरकार के खिलाफ भाजपा कार्यकर्ताओं का फूटा गुस्सा, संगठन में उथल-पुथल।
सरकारी योजनाओं में तवज्जो न मिलने से नाराज कार्यकर्ताओं ने खोल दिया है मोर्चा
देहरादून। भाजपा कार्यकर्ताओं का अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो को लेकर चर्चा में है। भाजपा नेता मधु चौहान के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन के दौरान उन्होंने सरकार की योजनाओं में कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर अपेक्षित अवसर नहीं मिलने का मुद्दा उठाया। प्रदर्शन के दौरान दिया गया उनका बयान अब सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है। वायरल वीडियो में मधु चौहान यह कहते हुए सुनाई दे रही हैं कि भाजपा का कार्यकर्ता पार्टी के हर कार्यक्रम में पूरी निष्ठा के साथ जुटता है। कभी उसे दीया जलाओ, कभी थाली बजाओ जैसे कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए कहा जाता है और कार्यकर्ता पूरे उत्साह के साथ पार्टी के कार्यक्रमों में अपनी भूमिका निभाता है। लेकिन जब सरकार की योजनाओं से जुड़े काम कार्यकर्ताओं को देने की बात आती है तो कथित तौर पर कांग्रेस से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है।
उन्होंने कहा कि पार्टी का कार्यकर्ता लगातार संगठन के लिए मेहनत करता है, लेकिन सरकार की योजनाओं और कामों में उसे अपेक्षित भागीदारी नहीं मिल रही है। इससे कार्यकर्ताओं के भीतर असंतोष और निराशा बढ़ रही है। उनका कहना था कि कार्यकर्ताओं की इसी नाराजगी का परिणाम है कि उन्हें अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है। मधु चौहान के बयान ने भाजपा के भीतर कार्यकर्ताओं की भूमिका और सरकार के स्तर पर उन्हें मिलने वाले अवसरों को लेकर बहस छेड़ दी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि चुनाव और संगठन के कार्यक्रमों के दौरान कार्यकर्ताओं से पूरी ताकत के साथ काम लिया जाता है, लेकिन सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और कामों के आवंटन में उनकी उपेक्षा की जा रही है।
चकराता क्षेत्र में योजनाओं के लाभार्थी चयन और कामों के आवंटन को लेकर पहले से ही भाजपा नेताओं की नाराजगी सामने आ रही है। ऐसे में मधु चौहान का वीडियो सामने आने से मामला और तूल पकड़ गया है। यह विवाद कैबिनेट मंत्री खजान दास के उस बयान के बाद और चर्चा में है, जिसमें उन्होंने अपने ऊपर लगाए जा रहे कमीशनखोरी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यदि उनके खिलाफ लगाया गया एक भी आरोप साबित हो जाता है तो वह मंत्री पद से इस्तीफा देने के साथ आत्महत्या तक कर लेंगे। एक तरफ भाजपा नेताओं की ओर से योजनाओं के कामों में कथित पक्षपात और कांग्रेस से जुड़े लोगों को प्राथमिकता देने के आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं मंत्री इन आरोपों को पूरी तरह नकार रहे हैं। ऐसे में मधु चौहान का वायरल वीडियो भाजपा के भीतर चल रहे असंतोष को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ले आया है।
हालांकि वीडियो में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अब सवाल यह है कि सरकार और संगठन इस नाराजगी को किस तरह देखते हैं और क्या योजनाओं के लाभार्थी चयन तथा कार्य आवंटन की प्रक्रिया को लेकर कोई स्पष्ट जांच या तथ्य सार्वजनिक किए जाते हैं। फिलहाल चकराता से उठी कार्यकर्ताओं की आवाज देहरादून की सियासत में चर्चा का नया विषय बन गई है।
उत्तराखंड में ‘मुन्नाभाइयों’ की सेंधमारी
फर्जी डोमिसाइल के सहारे डाक्टरी की सीट पर कब्जा करने का आरोप
एमबीबीएस की 370 सीटों के डोमिसाइल पर उठे सवाल, जांच के आदेश
एनईईटी के बाद दाखिले में इस्तेमाल प्रमाणपत्रों पर घपले का जताया अंदेशा
देहरादून एसडीएम और पटवारी की भूमिका भी आ गई है सवालों के घेरे में
देहरादून। उत्तराखंड में एमबीबीएस दाखिलों से जुड़े डोमिसाइल प्रमाणपत्रों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एनईईटी के बाद राज्य में एमबीबीएस की 855 सीटों में से करीब 370 सीटों के लिए इस्तेमाल किए गए डोमिसाइल प्रमाणपत्रों में कथित गड़बड़ी का अंदेशा सामने आया है। मामले में प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया और संबंधित राजस्व अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। मामले को लेकर पत्रकार प्रदीप बहुगुणा ने स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल से मुलाकात कर उन्हें पूरे प्रकरण की जानकारी दी और निष्पक्ष जांच की मांग की। उन्होंने मंत्री के समक्ष यह सवाल उठाया कि यदि दाखिले के लिए प्रस्तुत डोमिसाइल प्रमाणपत्रों में किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो इसकी जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जानी चाहिए।
स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी देहरादून को पूरे प्रकरण की जांच के निर्देश दिए हैं। मंत्री के अनुसार जिलाधिकारी को एक सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने को कहा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान यदि किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। मंत्री ने कहा कि प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में यदि किसी स्तर पर अनियमितता या लापरवाही पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा।
मामले में डोमिसाइल प्रमाणपत्र जारी करने के दौरान राजस्व विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। आरोपों के मुताबिक कुछ प्रमाणपत्रों को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या संबंधित आवेदकों की पात्रता और स्थायी निवास से जुड़े दस्तावेजों का नियमानुसार सत्यापन किया गया था या नहीं। ऐसे में जांच में प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया, संबंधित दस्तावेज, राजस्व अभिलेख और सत्यापन रिपोर्ट की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी। एसडीएम और पटवारी स्तर पर हुई कार्रवाई भी जांच का हिस्सा बन सकती है।
एमबीबीएस की कुल 855 सीटों में से 370 सीटों से जुड़े डोमिसाइल प्रमाणपत्रों पर सवाल उठना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मेडिकल दाखिलों में राज्य कोटे की सीटों के लिए पात्रता से जुड़े दस्तावेज अहम भूमिका निभाते हैं। यदि जांच में प्रमाणपत्रों में अनियमितता साबित होती है तो इसका असर संबंधित दाखिलों की वैधता पर भी पड़ सकता है।
हालांकि फिलहाल यह घपला साबित नहीं हुआ है और पूरे मामले की वास्तविक स्थिति जिलाधिकारी की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी। जांच का दायरा कितना व्यापक रखा जाता है और किन-किन प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच होती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। स्वास्थ्य मंत्री के स्तर से जांच के आदेश के बाद अब निगाह एक सप्ताह में आने वाली रिपोर्ट पर टिकी है। यदि जांच में किसी अधिकारी या अन्य स्तर पर गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो कार्रवाई के साथ यह भी स्पष्ट होगा कि डोमिसाइल प्रमाणपत्रों के सत्यापन की व्यवस्था में चूक कहां हुई।
डिजिटल क्रांति में भी ‘चढ़ावा’
25 साल के उत्तराखंड में जीरो टालरेंस का ढोंग और तहसीलों का नंगानाच
राजस्व तंत्र में दीमक, सरकार की निगरानी पर सवाल
राज्य बनने से पहले से चली आ रही शिकायतें बरकरार
तहसीलों में काम के बदले सुविधा शुल्क के हैं आरोप
शासन तक शिकायतों के बावजूद जवाबदेही पर सवाल
देहरादून। उत्तराखंड को अलग राज्य बने ढाई दशक से अधिक समय हो गया। इस दौरान सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, मुख्य सचिव बदले और प्रशासनिक ढांचे में कई सुधार हुए। डिजिटल व्यवस्था आई, आनलाइन प्रमाणपत्र और राजस्व सेवाओं का विस्तार हुआ, अधिकारियों को जवाबदेह बनाने के दावे हुए और भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस की नीति भी घोषित होती रही। लेकिन जमीन पर राजस्व तंत्र को लेकर आम आदमी की शिकायतों का चरित्र बहुत नहीं बदला। जमीन की पैमाइश हो, दाखिल-खारिज हो, विरासत का मामला हो, खसरा-खतौनी में सुधार हो या प्रमाणपत्र से जुड़ा कामकृराजस्व कार्यालयों के चक्कर काटने वाले नागरिकों की शिकायतें आज भी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शासन-प्रशासन तक ऐसी शिकायतें पहुंचती रही हैं तो फिर इस कथित सिस्टम को तोड़ने के लिए निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती?
यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राजस्व व्यवस्था सीधे आम नागरिक की संपत्ति और अधिकारों से जुड़ी है। एक रिकार्ड की गलती परिवारों को वर्षों तक विवाद में उलझा सकती है। एक लंबित आवेदन किसान, भूमिधर या ग्रामीण को बार-बार कार्यालय पहुंचने के लिए मजबूर कर सकता है। यही वह बिंदु है जहां पारदर्शिता की कमी और कथित बिचौलिया संस्कृति नागरिक के लिए सबसे बड़ी परेशानी बनती है। राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार को लेकर शिकायतें समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर उठती रही हैं। सवाल यह नहीं कि शिकायत किसने की या किस कर्मचारी पर आरोप लगा। असली सवाल यह है कि शिकायत मिलने के बाद सिस्टम ने क्या किया?
यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ लगातार शिकायतें आती हैं और फिर भी वह उसी तरह संवेदनशील काम करता रहता है, तो सवाल केवल उस कर्मचारी पर नहीं, बल्कि उसे निगरानी में रखने वाले पूरे प्रशासनिक ढांचे पर उठता है। सरकार का भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख प्रशासनिक बैठकों और सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देता है। लेकिन शासन की नीति की वास्तविक परीक्षा सचिवालय में नहीं, तहसील की चौखट पर होती है। आम आदमी के लिए मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव की भ्रष्टाचार विरोधी घोषणाओं का मतलब तभी है जब उसका असर उस कर्मचारी तक दिखाई दे जो उसकी फाइल देख रहा है। यहीं सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता हैकृकि क्या भ्रष्टाचार विरोधी अभियान बड़े मामलों और सुर्खियों तक सीमित है या रोजमर्रा के प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर भी उतनी ही कठोर निगरानी है?
राजस्व सेवाओं को ऑनलाइन करने के पीछे मकसद यही था कि नागरिक को दफ्तरों के चक्कर कम लगाने पड़ें और प्रक्रिया पारदर्शी बने। लेकिन डिजिटल व्यवस्था के बावजूद जहां अंतिम सत्यापन, रिपोर्ट, रिकार्ड सुधार या मौके की कार्रवाई अधिकारी-कर्मचारी के स्तर पर निर्भर रहती है, वहां मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश बनी रहती है। यही कारण है कि सरकार को सिर्फ यह बताने से काम नहीं चलेगा कि कितनी सेवाएं आनलाइन कर दी गईं। उसे यह भी बताना होगा कि आनलाइन व्यवस्था के बाद शिकायतों की संख्या कितनी बदली, कितने अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई और कितने मामलों में समयसीमा का उल्लंघन हुआ। भ्रष्टाचार की शिकायत सामने आने पर किसी एक कर्मचारी पर कार्रवाई करना जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं। यदि समस्या किसी प्रक्रिया में है तो व्यक्ति बदलने से प्रक्रिया नहीं बदलती। जरूरत इस बात की है कि सरकार तहसीलवार ऐसे मामलों का स्वतंत्र परीक्षण कराए जिनमेंकृ एक ही काम के लिए बार-बार कार्यालय बुलाने की शिकायत हो। आवेदन लंबे समय तक लंबित रहे हों। रिकार्ड में बार-बार संशोधन हुआ हो। बिचौलियों की भूमिका की शिकायत हो। अधिकारियों के खिलाफ बार-बार शिकायतें आई हों। शिकायत के बाद भी कार्रवाई का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध न हो। ऐसी समीक्षा से यह सामने आ सकता है कि समस्या कुछ व्यक्तियों तक सीमित है या प्रक्रिया के भीतर ही कोई ऐसी खामी है जिसका फायदा उठाया जा रहा है।
यदि सरकार वास्तव में राजस्व तंत्र को भ्रष्टाचार से मुक्त करने को लेकर गंभीर है तो उसे जिलावार आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। पिछले पांच वर्षों में राजस्व विभाग के खिलाफ कितनी भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतें मिलीं? कितनी शिकायतों की जांच हुई? कितनी सही पाई गईं? कितने कार्मिक निलंबित हुए? कितनों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई? कितने मामलों में मुकदमा दर्ज हुआ? और कितने मामलों में शिकायत निराधार पाई गई? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने पर ही यह पता चलेगा कि शिकायतों को लेकर सरकार की निगरानी व्यवस्था वास्तव में कितनी प्रभावी है। उत्तराखंड में जमीन का सवाल केवल कागज का सवाल नहीं है। पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन परिवार, खेती, आवास और भविष्य से जुड़ी है। मैदानी इलाकों में भी जमीन से संबंधित विवाद और रिकार्ड आम नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे में राजस्व कार्यालयों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी का सीधा असर नागरिक के अधिकारों पर पड़ सकता है कि जिस व्यक्ति के पास पैसा, पहुंच या प्रभाव नहीं है, उसके लिए सरकारी कार्यालय की प्रक्रिया सरल होना सुशासन की पहली शर्त है। अगर उसे अपने वैधानिक काम के लिए किसी बिचौलिए का सहारा लेना पड़े, तो यह सिर्फ प्रशासनिक असुविधा नहीं बल्कि शासन की विश्वसनीयता का सवाल है। उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई के दावे लगातार किए जाते रहे हैं। लेकिन राजस्व तंत्र में शिकायतों की वास्तविक स्थिति और उन पर हुई कार्रवाई का पूरा आंकड़ा जनता के सामने आना चाहिए। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर मुख्य सचिव और जिलाधिकारी कार्यालय तक शिकायतें पहुंचने की बात यदि सही है, तो सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि उन शिकायतों का परिणाम क्या हुआ। किस अधिकारी ने जांच की? क्या रिपोर्ट बनी? क्या कार्रवाई हुई? अगर कार्रवाई नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई? और अगर शिकायतें गलत थीं तो शिकायतकर्ताओं को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई? सरकार से अब सिर्फ जीरो टालरेंस’ का बयान नहीं, कार्रवाई का हिसाब चाहिए। क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे प्रभावी संदेश भाषण नहीं, कार्रवाई का रिकार्ड होता है। और यदि किसी सरकारी तंत्र के खिलाफ वर्षों से एक जैसी शिकायतें आती रहें, तो समस्या सिर्फ उस तंत्र में काम करने वालों की नहीं रहतीकृवह उस व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर भी सवाल बन जाती है। उत्तराखंड के राजस्व तंत्र पर लगे इन आरोपों की निष्पक्ष, समयबद्ध और तहसीलवार जांच अब सिर्फ प्रशासनिक जरूरत नहीं, शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा भी है।
रविवार, 20 सितंबर 2026
udaydinmaan: कागजों पर ‘नकली हकदार’
udaydinmaan: कागजों पर ‘नकली हकदार’: उत्तराखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों का बड़ा खेल सरकारी तंत्र की बहुस्तरीय जांच दरकिनार, पात्रों के हक पर डाका नौकरी से लेकर दाखिले और सरकारी योज...
कागजों पर ‘नकली हकदार’
उत्तराखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों का बड़ा खेल
सरकारी तंत्र की बहुस्तरीय जांच दरकिनार, पात्रों के हक पर डाका
नौकरी से लेकर दाखिले और सरकारी योजनाओं तक पहुंच रहे फर्जी दस्तावेज
सत्यापन व्यवस्था पर उठ रहे सवाल, असली हकदारों के अधिकार पर भी संकट
सिर्फ फर्जी प्रमाणपत्र धारक नहीं, उत्तराखंड में जारी करने वाला भी कटघरे में
देहरादून। उत्तराखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों का मामला केवल कुछ जालसाजों तक सीमित नहीं है। जाति, मूल निवास, स्थायी निवास, जन्म, शैक्षिक योग्यता और अन्य दस्तावेजों से जुड़े फर्जीवाड़े की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसे प्रमाणपत्र तैयार कैसे हो जाते हैं और सरकारी तंत्र की कई स्तरों वाली सत्यापन व्यवस्था के बावजूद वह संबंधित संस्थानों तक पहुंच कैसे जाते हैं? सरकारी नौकरी, शैक्षणिक प्रवेश, आरक्षण, छात्रवृत्ति और विभिन्न सरकारी योजनाओं में प्रमाणपत्र व्यक्ति की पात्रता तय करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। ऐसे में किसी एक फर्जी प्रमाणपत्र का इस्तेमाल केवल कागजों में हेराफेरी नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के अवसर पर भी असर डाल सकता है जो वास्तव में उस पात्रता का हकदार है।
फर्जी प्रमाणपत्रों के मामलों में सबसे बड़ा सवाल किसी एक दस्तावेज के गलत होने से आगे बढ़कर यह है कि इसके पीछे पूरा तंत्र कैसे काम करता है। प्रमाणपत्र बनाने से लेकर उसमें दर्ज जानकारी का सत्यापन, संबंधित कार्यालय में रिकॉर्ड की उपलब्धता और नियुक्ति या प्रवेश के समय दस्तावेजों की जांचकृहर चरण की अपनी जिम्मेदारी है। यदि कोई व्यक्ति गलत प्रमाणपत्र के आधार पर लाभ हासिल कर लेता है तो यह जांचना जरूरी है कि प्रमाणपत्र जारी करने वाले स्तर पर क्या हुआ, दस्तावेज का रिकार्ड वास्तविक था या नहीं और सत्यापन के दौरान संबंधित संस्था ने किन दस्तावेजों को आधार बनाया।
सरकारी नौकरियों में आरक्षण या विशेष श्रेणी का लाभ लेने के लिए प्रस्तुत प्रमाणपत्रों की सत्यता बेहद महत्वपूर्ण है। फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्ति मिलने की स्थिति में मामला केवल नियुक्त व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इससे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों के अधिकार पर सवाल खड़ा होता है। उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां सरकारी नौकरी को लेकर युवाओं में भारी प्रतिस्पर्धा है, वहां प्रमाणपत्रों की जांच व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेजों का डिजिटल सत्यापन, संबंधित विभाग के मूल रिकार्ड से मिलान और संदिग्ध प्रमाणपत्रों की अनिवार्य पुनः जांच जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
जब जमीन के रिकार्ड से लेकर आधारभूत सरकारी सेवाओं तक का बड़ा हिस्सा डिजिटल हो चुका है, तब प्रमाणपत्र सत्यापन की व्यवस्था भी तकनीक आधारित होनी चाहिए। प्रत्येक प्रमाणपत्र को एक विशिष्ट डिजिटल पहचान दी जा सकती है, जिसे संबंधित विभाग ऑनलाइन सत्यापित कर सके। इससे प्रमाणपत्र में छेड़छाड़ या किसी दूसरे व्यक्ति के दस्तावेज का इस्तेमाल करने की संभावना कम की जा सकती है।
फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन जांच यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए। यदि प्रमाणपत्र किसी सरकारी या अधिकृत व्यवस्था से जारी हुआ है तो यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि उसमें गलत जानकारी दर्ज होने की जिम्मेदारी किसकी थी। फर्जी प्रमाणपत्र का लाभार्थी सामने दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे का सिस्टम अक्सर दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि प्रत्येक बड़े मामले में प्रमाणपत्र की पूरी आडिट ट्रेल सामने आनी चाहिएकृआवेदन किसने किया, सत्यापन किसने किया, प्रमाणपत्र किस स्तर से जारी हुआ और बाद में उसका सत्यापन किस अधिकारी या संस्था ने किया।
फर्जी प्रमाणपत्रों के खेल का सबसे कम चर्चा वाला पक्ष उन युवाओं का है जो वास्तविक पात्रता रखते हुए भी प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट सकते हैं। एक गलत प्रमाणपत्र किसी दूसरे व्यक्ति को वह लाभ दिला सकता है, जिसके लिए वह पात्र नहीं है। इसलिए इसे केवल प्रशासनिक या कानूनी गड़बड़ी मानकर छोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। यह समान अवसर और भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता का सवाल भी है।
उत्तराखंड में संवेदनशील श्रेणी के प्रमाणपत्रों का चरणबद्ध डिजिटल ऑडिट किया जाना चाहिए। विशेष रूप से उन प्रमाणपत्रों की पुनः जांच जरूरी है जिनके आधार पर सरकारी नौकरी, आरक्षण अथवा अन्य महत्वपूर्ण सरकारी लाभ हासिल किया गया है। इसके साथ ही फर्जी प्रमाणपत्रों के मामलों में दोष सिद्ध होने पर लाभार्थी के साथ-साथ प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में शामिल जिम्मेदार लोगों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि फर्जी प्रमाणपत्र किसने बनाया। बड़ा सवाल यह है कि सरकारी रिकार्ड की दीवारों को पार कर वह प्रमाणपत्र सिस्टम के भीतर पहुंचा कैसे? उत्तराखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों के खिलाफ कार्रवाई तभी प्रभावी मानी जाएगी, जब सरकार कुछ मामलों में कार्रवाई करके रुकने के बजाय पूरी व्यवस्था की जड़ तक पहुंचे।
विधायक निधि के 573 करोड़ ‘अनयूज्ड’
पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की रफ्तार सुस्त, विधायक निधि खर्च में पहाड़ पीछे, मैदान आगे
आरटीआई में सामने आई तस्वीर,1664 करोड़ की निधि उपलब्ध, खर्च हुए करीब 1091 करोड़
पहाड़ का रिपोर्ट कार्ड, 34 विधानसभा क्षेत्रों में 62 फीसदी ही बजट का हुआ है इस्तेमाल
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले विधायक निधि के इस्तेमाल का आंकड़ा विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक अहम सवाल खड़ा कर रहा है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2022-23 से जून 2026 तक प्रदेश के विधायकों के लिए करीब 1,664 करोड़ रुपये की विधायक निधि उपलब्ध रही, लेकिन इसमें से करीब 1,091.29 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके। यानी लगभग 573 करोड़ रुपये की राशि खर्च नहीं हो सकी।
आरटीआई से सामने आए आंकड़ों में सबसे बड़ा अंतर भौगोलिक आधार पर दिखाई देता है। उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ के 34 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 807.5 करोड़ रुपये उपलब्ध रहे, जिनमें से लगभग 501.07 करोड़ रुपये खर्च हुए। यानी खर्च की दर करीब 62 प्रतिशत रही। प्रति विधायक औसत खर्च करीब 14.74 करोड़ रुपये रहा।
इसके उलट हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर के 20 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 475 करोड़ रुपये की निधि उपलब्ध रही और लगभग 337.86 करोड़ रुपये खर्च हुए। यहां खर्च की दर करीब 71.1 प्रतिशत रही और प्रति विधायक औसत खर्च लगभग 16.88 करोड़ रुपये रहा। यानी पहाड़ और मैदान के बीच औसत खर्च में करीब 2.14 करोड़ रुपये प्रति विधायक का अंतर सामने आया।
देहरादून और नैनीताल के मिश्रित भौगोलिक स्वरूप वाले 16 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 66.4 प्रतिशत निधि खर्च हुई। इससे तस्वीर यह बनती है कि विधायक निधि खर्च की रफ्तार में मैदान सबसे आगे और पर्वतीय क्षेत्र सबसे पीछे रहे। हालांकि यह आंकड़ा खर्च की स्थिति बताता है कि इससे कम खर्च के कारण अपने आप साबित नहीं होते। भौगोलिक पहुंच, प्रशासनिक प्रक्रियाएं और परियोजनाओं की प्रकृति जैसे कई कारण हो सकते हैं।
राजनीतिक दलों के हिसाब से आंकड़ों को देखें तो तस्वीर और दिलचस्प है। विधायकवार दर्ज खर्च प्रतिशत के साधारण औसत में कांग्रेस विधायकों का आंकड़ा करीब 68.4 प्रतिशत, जबकि भाजपा विधायकों का करीब 64.4 प्रतिशत बताया गया है। यानी इस गणना में कांग्रेस विधायक करीब चार प्रतिशत अंक आगे हैं। हालांकि इसे दोनों दलों की कुल विधायक निधि की अंतिम या भारित व्यय दर नहीं माना जाना चाहिए। दोनों दलों के विधायकों की संख्या अलग है और विधानसभा क्षेत्रवार उपलब्ध निधि तथा खर्च भी अलग-अलग है।
दिलचस्प बात यह है कि सबसे अधिक खर्च प्रतिशत वाले विधायकों में दोनों प्रमुख दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं। उपलब्ध आरटीआई आंकड़ों के अनुसार भाजपा के रुड़की विधायक प्रदीप बत्रा और कांग्रेस के पिरान कलियर विधायक फुरकान अहमद करीब 77 प्रतिशत खर्च के स्तर पर हैं। कांग्रेस के रवि बहादुर और काजी निजामुद्दीन करीब 76 प्रतिशत पर दर्ज हैं। यानी विधायक निधि खर्च को केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष की लड़ाई के चश्मे से देखना तस्वीर को अधूरा कर देगा। असली अंतर विधानसभा क्षेत्र और भौगोलिक परिस्थितियों के स्तर पर अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
दूसरी तरफ कई विधानसभा क्षेत्रों में खर्च की रफ्तार काफी कम है। उपलब्ध आंकड़ों में टिहरी विधानसभा क्षेत्र में करीब 30 प्रतिशत, यमकेश्वर में 44 प्रतिशत, चकराता में 51 प्रतिशत, कपकोट में 52 प्रतिशत और चंपावत में करीब 53 प्रतिशत खर्च दर्ज है। यहां सवाल केवल विधायक निधि खर्च होने का नहीं, बल्कि उस धनराशि से क्षेत्र की कौन-सी प्राथमिकताएं पूरी हुईं और किन कारणों से राशि खर्च नहीं हो पाई, इसका भी है।
विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही समय बचा है। ऐसे में विधायक निधि का यह आंकड़ा विधायकों के विकास कार्यों के दावों की पड़ताल का एक आधार जरूर बन सकता है। लेकिन अधिक खर्च का अर्थ अपने आप बेहतर विकास और कम खर्च का अर्थ अपने आप खराब प्रदर्शन नहीं है। यह जानना भी जरूरी है कि खर्च किस काम पर हुआ, काम की गुणवत्ता कैसी रही और उसका वास्तविक लाभ जनता तक कितना पहुंचा। सबसे बड़ा सवाल पहाड़ के लिए है। राज्य गठन के बाद से पर्वतीय क्षेत्रों के विकास और पलायन पर लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे में यदि उपलब्ध विधायक निधि का बड़ा हिस्सा समय रहते खर्च नहीं हो पाता, तो सरकार और विधायकोंकृदोनों के सामने जवाबदेही का सवाल खड़ा होता है। विधायक निधि बढ़ाना आसान हो सकता है, लेकिन उसे समय पर, पारदर्शी तरीके से और जरूरत के मुताबिक जमीन पर उतारना असली परीक्षा है। आरटीआई के आंकड़े फिलहाल इतना जरूर बता रहे हैं कि उत्तराखंड में विकास की रकम उपलब्ध होने के बावजूद उसके इस्तेमाल की रफ्तार पहाड़ और मैदान में एक जैसी नहीं है।
‘घर वापसी’ पर सियासी संग्राम
हरदा के शक्ति प्रदर्शन पर भाजपा का तंज, सम्मान की वापसी या भ्रष्टाचार के सवालों का जवाब
हरीश रावत कि भाजपा ने रोड शो को लेकर कांग्रेस की अंदरूनी सियासत पर साधा निशाना
मुन्ना सिंह चौहान बोलेकृकांग्रेस को स्पष्ट करना चाहिए शक्ति प्रदर्शन का संदेश किसके लिए
देहरादून। पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत के उत्तराखंड लौटने और प्रस्तावित स्वागत कार्यक्रम को लेकर सियासत गरमा गई है। भाजपा ने रावत के कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने सवाल उठाया कि यदि रावत को कांग्रेस में पूरा सम्मान और महत्व मिल रहा है तो उनके स्वागत के नाम पर शक्ति प्रदर्शन की जरूरत क्यों पड़ रही है? भाजपा ने इसे कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और राजनीतिक वर्चस्व की खींचतान से जोड़ते हुए सवाल किया कि इस शक्ति प्रदर्शन का संदेश आखिर किसे दिया जा रहा है।
भाजपा के इस हमले की टाइमिंग भी महत्वपूर्ण है। रावत लंबे स्वास्थ्य अवकाश के बाद 20 सितंबर को रामपुर तिराहा से उत्तराखंड की यात्रा शुरू कर रहे हैं। वहीं, पिछले दिनों उनके पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े मामले में ईडी की कार्रवाई के बाद रावत ने कांग्रेस के कुछ सांगठनिक पदों से हटने की पेशकश की थी। हालांकि उन्होंने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा देने की बात नहीं कही थी।
भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि रावत के स्वागत में प्रस्तावित शक्ति प्रदर्शन का उद्देश्य क्या है। पार्टी के अनुसार यदि यह महज एक वरिष्ठ नेता के स्वास्थ्य लाभ के बाद प्रदेश लौटने का स्वागत है तो इसे लेकर इतनी राजनीतिक चर्चा क्यों हो रही है और यदि यह शक्ति प्रदर्शन है तो इसका संदेश कांग्रेस के भीतर किसे दिया जा रहा है। भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने इसी सवाल को आधार बनाकर कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर निशाना साधा। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव को लेकर खींचतान पहले से दिखाई दे रही है और रावत का कार्यक्रम इसी अंतर्कलह को सामने ला रहा है।
रावत की वापसी ऐसे समय हो रही है जब उनके पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना के खिलाफ ईडी की कार्रवाई राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बनी हुई है। ईडी की कार्रवाई 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मनी लान्ड्रिंग मामले की जांच के सिलसिले में हुई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कार्रवाई में नकदी, सोना और महंगी घड़ियां बरामद किए जाने की बात सामने आई है। रावत ने इस प्रकरण के बाद कहा था कि उनकी वजह से कांग्रेस के भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए, इसलिए उन्होंने प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी सदस्य और कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य पदों से हटने की पेशकश की। उन्होंने मामले की सच्चाई जांच से सामने आने की बात भी कही।
इसके बाद रावत ने अपने ऊपर नौकरी के बदले पैसे लेने के आरोपों से सार्वजनिक रूप से इनकार करते हुए सोशल मीडिया पर भावनात्मक प्रतिक्रिया दी और अपनी मां की सौगंध का उल्लेख किया। अब भाजपा इसी घटनाक्रम को कांग्रेस की आंतरिक राजनीति से जोड़ रही है। भाजपा का सवाल है कि जिस नेता ने हाल में पार्टी के महत्वपूर्ण सांगठनिक पदों से हटने की पेशकश की, उनके लिए अचानक बड़े स्तर पर स्वागत और शक्ति प्रदर्शन की जरूरत क्यों महसूस हुई? भाजपा की ओर से इसे रावत के कांग्रेस में अपने राजनीतिक महत्व और सम्मान को लेकर चल रही कवायद के रूप में पेश किया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि यदि संगठन में रावत की भूमिका और सम्मान को लेकर कोई असमंजस नहीं है तो फिर शक्ति प्रदर्शन के जरिए राजनीतिक संदेश देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के सामने दो स्तरों की चुनौती खड़ी की है। एक ओर उसे 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सरकार के खिलाफ अपना राजनीतिक नैरेटिव मजबूत करना है, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय और नेतृत्व के सवाल को संभालना है। रावत के समर्थकों की सक्रियता कांग्रेस के लिए राजनीतिक ऊर्जा का माध्यम बन सकती है, लेकिन भाजपा इसे पार्टी की अंदरूनी खींचतान के तौर पर प्रचारित कर रही है। हालिया राजनीतिक विश्लेषणों में भी रावत की भूमिका, कांग्रेस के चुनावी नैरेटिव और संगठन में उनके समर्थक खेमे को लेकर सवाल उठाए गए हैं। रामपुर तिराहा पर उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि देकर रावत प्रदेश की यात्रा शुरू करेंगे। इसके बाद उनका कार्यक्रम हरिद्वार और देहरादून तक है। लंबे स्वास्थ्य अवकाश के बाद उनकी यह वापसी ऐसे समय हो रही है जब प्रदेश की राजनीति 2027 के चुनाव की ओर बढ़ रही है। यही वजह है कि रावत के स्वागत का कार्यक्रम केवल स्वागत समारोह तक सीमित नहीं रह गया है। भाजपा ने इसे कांग्रेस के भीतर चल रही राजनीतिक हलचल से जोड़ दिया है।
अब सवाल भाजपा ने उछाला है, जवाब कांग्रेस और रावत के पास हैकृयह आयोजन सिर्फ एक वरिष्ठ नेता की वापसी का स्वागत है, भ्रष्टाचार से जुड़े सवालों के बीच राजनीतिक समर्थन का प्रदर्शन है, या कांग्रेस के भीतर अपने राजनीतिक सम्मान और प्रभाव को फिर से स्थापित करने की कवायद? रामपुर तिराहा से हरदा की वापसी के साथ यह सवाल भी उत्तराखंड की सियासत में कदम रख चुका है।
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