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सोमवार, 7 सितंबर 2026
udaydinmaan: ‘शौर्य’ गाथा पर सियासी ‘ड्रामा’
udaydinmaan: ‘शौर्य’ गाथा पर सियासी ‘ड्रामा’: पांच साल तक क्यों अटका सैन्य धाम, 2021 में शिलान्यास, 2023 में पूरा होने का था लक्ष्य तारीखें बढ़ती गईं, लागत भी बढ़ी, अब चुनावी मौसम में फिर ...
‘शौर्य’ गाथा पर सियासी ‘ड्रामा’
पांच साल तक क्यों अटका सैन्य धाम, 2021 में शिलान्यास, 2023 में पूरा होने का था लक्ष्य
तारीखें बढ़ती गईं, लागत भी बढ़ी, अब चुनावी मौसम में फिर सुर्खियों में आ गई परियोजना
सैन्य परंपरा को समर्पित सैन्य धाम पांच साल से सत्ता के दावों और तारीखों के बीच झूल रहा
देहरादून। शहीदों की स्मृति और उत्तराखंड की सैन्य परंपरा को समर्पित देहरादून का सैन्य धाम पांच साल से सत्ता के दावों और तारीखों के बीच झूल रहा है। वर्ष 2021 में जिस परियोजना को दो साल के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, वह 2026 में भी राजनीतिक बहस के केंद्र में है। अब विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सैन्य धाम फिर चर्चा में है तो सवाल भी उतना ही सीधा है। कृअगर यह शहीदों को श्रद्धांजलि का प्रकल्प था तो इसे समय पर पूरा क्यों नहीं किया गया?
सैन्य धाम का शिलान्यास 2021 में किया गया था। बाद में गुनियालगांव में परियोजना को आगे बढ़ाया गया और दिसंबर 2021 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वहां दूसरा शिलान्यास किया। उस समय इसे करीब दो वर्ष में पूरा करने की बात कही गई थी। अगस्त 2022 में राज्यपाल के निरीक्षण के दौरान भी 2023 में सैन्य धाम पूरा करने का लक्ष्य बताया गया था।
लेकिन लक्ष्य की तारीख आती गई और निर्माण पूरा नहीं हुआ। सितंबर 2023 में सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी ने खुद निर्माण की धीमी गति पर नाराजगी जताई और अधिकारियों को उसी वर्ष दिसंबर तक काम पूरा करने के निर्देश दिए। जनवरी 2024 में भी निर्माण करीब 65 प्रतिशत पूरा होने की जानकारी सामने आई और काम दिन-रात चलाने के निर्देश दिए गए। इसके बाद 2024 में परियोजना की लागत को लेकर भी सवाल उठे। आरटीआई आधारित रिपोर्ट के अनुसार परियोजना की लागत 2022 में करीब 48 करोड़ रुपये से बढ़कर 99 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई। यानी देरी के साथ परियोजना की लागत में भी बड़ा उछाल आया।
सरकार की ओर से लगातार यह दावा किया जाता रहा कि सैन्य धाम जल्द प्रदेश को समर्पित किया जाएगा। अगस्त और अक्टूबर 2024 में निर्माण को तय समय में पूरा करने के निर्देश दिए गए। दिसंबर 2024 में भी अंतिम चरण के काम और फिनिशिंग का हवाला देते हुए इसे जल्द जनता को समर्पित करने की बात कही गई। यहीं से सैन्य धाम की कहानी सिर्फ निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि राजनीतिक सवाल भी बन जाती है।
2025 में भी इसके लोकार्पण को लेकर उम्मीदें जताई गईं। अक्टूबर 2025 में निरीक्षण के दौरान नौ नवंबर को राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री के संभावित दौरे के दौरान लोकार्पण का प्रस्ताव सामने आया था। लेकिन अब 2026 में चुनावी माहौल के बीच कांग्रेस ने फिर सरकार को घेरा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने पांच वर्ष की देरी, लागत बढ़ने और चुनावी लाभ के लिए परियोजना को इस्तेमाल किए जाने पर सवाल उठाए हैं।
सैन्य धाम उत्तराखंड के लिए महज एक भवन नहीं है। प्रदेश के हजारों परिवारों की सैन्य परंपरा, शहीदों की स्मृति और युवाओं के लिए प्रेरणा से जुड़ा यह प्रकल्प है। शहीद सम्मान यात्रा के माध्यम से शहीद परिवारों के आंगन की मिट्टी भी यहां लाई गई है। ऐसे में पांच साल की देरी स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करती है कि आखिर परियोजना की योजना, निर्माण और निगरानी में ऐसी कौन-सी अड़चनें थीं जिनके कारण निर्धारित समयसीमा बार-बार आगे बढ़ती रही।
2027 विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं हैं। ऐसे में सैन्य धाम का राजनीतिक महत्व भी बढ़ना स्वाभाविक है। भाजपा इसे सैनिक सम्मान और उत्तराखंड की सैन्य पहचान से जोड़ती रही है, जबकि कांग्रेस अब इसी परियोजना की देरी को सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार बना रही है। यानी आने वाले महीनों में सैन्य धाम सिर्फ शहीदों की स्मृति का केंद्र नहीं रहेगा। यह सत्ता बनाम विपक्ष के चुनावी नैरेटिव का भी बड़ा मैदान बन सकता है। असल सवाल यह नहीं कि सैन्य धाम किसके खाते में जाएगा। असली सवाल यह है कि जिस धाम की नींव शहीदों की स्मृति में रखी गई थी, उसे समय पर पूरा करने की राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति पांच साल तक कहां थी? और अब जब चुनाव सामने हैं, तो सवाल और तीखा हो गया है। क्या सैन्य धाम की रफ्तार सचमुच शहीदों के सम्मान से बढ़ी है या चुनाव की घड़ी ने इसकी गति बढ़ाई है?
गाँव-गाँव में शहीद, शहर में अटका धाम
सैन्य धाम की नींव से चुनावी चर्चा तक पहुंचा सफर
तय समय बीता, तारीखें बदलीं और बढ़ती गई लागत
चुनाव से पहले सैन्य धाम फिर सियासत के केंद्र में
देहरादून। उत्तराखंड की पहचान अगर किसी एक शब्द से सबसे गहराई से जुड़ती है तो वह हैकृसैन्य परंपरा, जिस प्रदेश के हर गांव से सैनिक निकलते हैं और जिसके हजारों परिवारों का रिश्ता सेना से जुड़ा है, उसी प्रदेश में शहीदों की स्मृति में बनने वाला सैन्य धाम पांच साल से निर्माण, घोषणाओं और लोकार्पण की तारीखों के बीच उलझा हुआ है। अब विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सैन्य धाम एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है, जिस परियोजना को शहीदों के सम्मान का प्रतीक बताया गया, उसे समय पर पूरा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति पांच साल तक क्यों नहीं दिखाई दी?
सैन्य धाम का शिलान्यास वर्ष 2021 में हुआ। उस समय परियोजना को लेकर बड़े दावे किए गए। इसे उत्तराखंड के सैनिकों और शहीद परिवारों के सम्मान से जोड़ा गया और जल्द पूरा करने का लक्ष्य सामने रखा गया। बाद में निर्माण स्थल पर दूसरा शिलान्यास भी हुआ। 2023 तक परियोजना पूरी करने की समयसीमा बताई गई। लेकिन समयसीमा गुजर गई और धाम तैयार नहीं हुआ।
इसके बाद हर साल नई उम्मीद और नई तारीख सामने आती रही। कभी निर्माण में तेजी लाने के निर्देश दिए गए, कभी अधिकारियों को समयबद्ध तरीके से काम पूरा करने को कहा गया। निरीक्षण हुए, समीक्षा बैठकें हुईं और जल्द लोकार्पण के दावे किए गए। मगर सैन्य धाम का इंतजार खत्म नहीं हुआ। सवाल यह है कि पांच साल में ऐसा क्या नहीं हो सका, जो एक महत्वपूर्ण और राजनीतिक रूप से प्राथमिकता वाली परियोजना में होना चाहिए था?
सैन्य धाम की कहानी सिर्फ देरी तक सीमित नहीं है। परियोजना की लागत में वृद्धि ने भी सवाल खड़े किए। शुरुआती अनुमान के मुकाबले लागत बढ़ने की खबरें सामने आईं। यानी परियोजना जितनी लंबी खिंचती गई, उसके साथ सरकारी खजाने पर बोझ भी बढ़ता गया। यहां विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिला। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सैन्य धाम को शहीदों के सम्मान के बजाय राजनीतिक परियोजना बना दिया गया। भाजपा स्वाभाविक रूप से इसे सैनिक सम्मान और राष्ट्रवाद से जोड़कर देखती रही। यही वह बिंदु है जहां शहीदों की स्मृति और चुनावी राजनीति एक-दूसरे के सामने खड़ी दिखाई देती हैं।
2027 विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं हैं। उत्तराखंड में सैनिक परिवार और पूर्व सैनिक बड़ा सामाजिक वर्ग हैं। सैन्य धाम इस वर्ग की भावनाओं से सीधे जुड़ा हुआ है। इसलिए इसका राजनीतिक महत्व केवल एक निर्माण परियोजना तक सीमित नहीं है। भाजपा के लिए सैन्य धाम राष्ट्रवाद, सैनिक सम्मान और शहीदों की विरासत का प्रतीक है। वहीं कांग्रेस के लिए यही परियोजना सरकार की कार्यशैली और घोषणाओं की हकीकत पर सवाल उठाने का हथियार बन सकती है। यानी चुनावी मौसम में सैन्य धाम का मुद्दा जितना भावनात्मक है, उतना ही राजनीतिक भी।
सैन्य धाम के लिए प्रदेश के शहीद सैनिकों के घरों से मिट्टी जुटाने का अभियान चलाया गया था। उद्देश्य था कि शहीदों की स्मृति को इस धाम से जोड़ा जाए। यह भावनात्मक पहल थी और इसका संदेश भी स्पष्ट था। प्रदेश अपने बलिदानियों को नहीं भूलेगा। लेकिन अब पांच साल बाद यही सवाल उठ रहा है कि जब शहीदों के घरों से मिट्टी जुटाने में इतनी तत्परता दिखाई गई, तो उस मिट्टी से बनने वाले धाम को आकार देने में इतनी सुस्ती क्यों रही? शहीदों की स्मृति इंतजार नहीं मांगती। राजनीति मांगती हैकृसमय, मंच और चुनाव।
सैन्य धाम का निर्माण यदि निर्धारित समय में पूरा हो जाता तो आज राजनीतिक सवाल शायद इतने तीखे नहीं होते। लेकिन लगातार टलती समयसीमा और चुनाव के नजदीक फिर बढ़ती सक्रियता ने टाइमिंग पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष के लिए यह कहना आसान है कि सरकार ने पांच साल तक परियोजना को लटकाए रखा और अब चुनाव से पहले इसे फिर चर्चा में लाया जा रहा है। सत्ता पक्ष के पास इसका जवाब विकास कार्य की प्रगति और सैनिक सम्मान की अपनी प्राथमिकता के रूप में है। लेकिन जनता के सामने तीसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है। क्या शहीदों के नाम पर बनी परियोजनाओं की सफलता का पैमाना चुनावी लोकार्पण होना चाहिए या समय पर पूरा होना?
सैन्य धाम को लेकर अब सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि निर्माण कितने प्रतिशत पूरा हुआ। जनता जानना चाहेगी कि मूल समयसीमा क्या थी, उसमें देरी क्यों हुई, लागत कितनी बढ़ी, जिम्मेदारी किसकी थी और अब वास्तविक लोकार्पण कब होगा। क्योंकि यह कोई सामान्य सरकारी भवन नहीं है। यह उन सैनिकों के नाम पर बन रहा है जिन्होंने देश के लिए अपना जीवन दिया। इसलिए सवाल सरकार से नहीं, पूरे राजनीतिक तंत्र से हैकृशहीदों के नाम पर घोषणाएं इतनी जल्दी क्यों होती हैं और काम पूरा करने में पांच साल क्यों लगते हैं? 2027 का चुनाव जैसे-जैसे करीब आएगा, सैन्य धाम की राजनीति भी तेज होगी। मंचों पर शहीदों का सम्मान होगा, राष्ट्रवाद के नारे होंगे और लोकार्पण की चर्चा होगी। लेकिन चुनावी शोर के बीच एक सवाल दबना नहीं चाहिए।
युवाओं पर भरोसा, तरीका न थोपेंः भागवत
लंदन में सेलिब्रेशन आफ वननेस कार्यक्रम में बोले संघ प्रमुख
युवाओं को लक्ष्य बताएं, तरीका तय करने की स्वतंत्रता दें
मतभेद छोड़ दुनिया बेहतर बनाने को तैयार है देश के युवा
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने युवा पीढ़ी पर भरोसा जताते हुए कहा है कि आने वाली पीढ़ियां दुनिया को बेहतर बनाने की इच्छा रखती हैं और इस उद्देश्य के लिए अपने छोटे-छोटे मतभेदों को पीछे छोड़ने को तैयार हैं। उन्होंने युवाओं को पुरानी पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार बताते हुए कहा कि उनमें सही बात को पहचानकर उस पर काम करने का साहस अधिक है।
लंदन में रविवार को स्थानीय समयानुसार सेलिब्रेशन आफ वननेस विषय पर आयोजित कम्युनिटी लीडर्स रिसेप्शन और सिविलाइजेशनल डायलॉग में भागवत ने कहा कि पुरानी पीढ़ियां अपने जीवन के अनुभवों और उनसे पैदा हुई आशंकाओं से अधिक प्रभावित रहती हैं। इसके कारण वह किसी कदम के संभावित परिणामों को लेकर ज्यादा सतर्क रहती हैं। इसके विपरीत युवा पीढ़ी इन आशंकाओं से कम बंधी होती है और जब उसे कोई बात सही लगती है तो उस पर आगे बढ़ने के लिए ज्यादा तैयार रहती है।
भागवत ने कहा कि बुजुर्ग पीढ़ी को युवाओं के सामने लक्ष्य स्पष्ट करना चाहिए, लेकिन उस लक्ष्य तक पहुंचने का तरीका उन पर नहीं थोपना चाहिए। युवाओं को आवश्यक जानकारी और मार्गदर्शन देकर उन्हें अपना रास्ता तलाशने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि इस तरह युवा पीढ़ी अपने उद्देश्य को अधिक तेजी और प्रभावी ढंग से हासिल कर सकती है।
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में समाज और दुनिया में एकता के लिए उन बातों पर जोर देने की आवश्यकता बताई जो लोगों को जोड़ती हैं। उन्होंने विविधता को स्वीकार करने और उसका सम्मान करने की बात भी कही। सेलिब्रेशन आफ वननेस कार्यक्रम में उन्होंने भारतीय चिंतन की उस परंपरा का उल्लेख किया जिसमें अलग-अलग विचारों और रास्तों के बावजूद एकता की भावना को महत्व दिया जाता है।
भागवत का युवा पीढ़ी को लेकर यह भरोसा उनके हालिया वक्तव्यों की कड़ी में देखा जा रहा है। इससे पहले भी उन्होंने युवाओं और विशेष रूप से जेन-जी को लेकर सकारात्मक रुख व्यक्त किया था। लंदन में उनका संदेश रहा कि नई पीढ़ी को केवल निर्देश देने के बजाय उस पर विश्वास करना और उसे अपने तरीके से समाधान खोजने का अवसर देना चाहिए।
लंदन में आयोजित कार्यक्रम हिंदू स्वयंसेवक संघ यूके की पहल और इंटीग्रल के सहयोग से हुआ। संघ के अनुसार, इसमें ब्रिटेन की 310 से अधिक सामुदायिक संस्थाओं और संगठनों के शामिल होने की अपेक्षा थी। भागवत के ब्रिटेन दौरे के दौरान उन्होंने धार्मिक नेताओं, शिक्षाविदों और भारतीय मूल के समुदाय से जुड़े लोगों से भी संवाद किया।
संघ के मुताबिक लंदन कार्यक्रम में सामाजिक सद्भाव, सेवा और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना पर भी जोर दिया गया। भागवत ने विविधताओं को स्वीकार करते हुए समाज को उन मूल्यों पर आगे बढ़ाने की बात रखी जो लोगों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं।
भाजपा का ‘अभेद्य’ चुनावी ‘चक्रव्यूह’
भाजपा का मिशन बूथ, चुनाव सिर्फ लक्ष्य नहीं, हर घर से संपर्क का संकल्प, जीत की रणनीति
अंतिम छोर तक पहुंचेगा विकास, भाजपा ने तैयार किया सेवा और संगठन की मजबूती का महा-रोडमैप
बूथ से लेकर गांव तक सक्रिय होगा भाजपा संगठन, जनसेवा को चुनावी रणनीति से जोड़ेगी भाजपा
देहरादून। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने संगठन को जमीन के अंतिम छोर तक मजबूत करने और सरकार की विकास योजनाओं को आमजन तक पहुंचाने का महा-रोडमैप तैयार कर लिया है। पार्टी की रणनीति अब केवल चुनावी तैयारियों तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि सेवा, संपर्क और संगठन को एक साथ जोड़कर बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने की है। लक्ष्य साफ हैकृसरकार के काम का संदेश घर-घर पहुंचे और संगठन का नेटवर्क हर मतदाता तक अपनी पहुंच बनाए। भाजपा की रणनीति में सबसे अधिक जोर बूथ को मजबूत करने पर है। पार्टी के लिए बूथ केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाली इकाई नहीं, बल्कि पूरे साल जनता से संपर्क का माध्यम बनेगा। बूथ समितियों को स्थानीय समस्याओं की जानकारी जुटाने, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संवाद करने और जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाने की जिम्मेदारी दी जाएगी।
भाजपा संगठन की योजना में केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को प्रमुखता से रखा गया है। पार्टी कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर यह बताने की कोशिश करेंगे कि विकास योजनाओं का लाभ किस तरह अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है। साथ ही जहां किसी पात्र व्यक्ति को योजना का लाभ नहीं मिला है, वहां उसकी समस्या को संबंधित स्तर तक पहुंचाने की व्यवस्था पर भी जोर रहेगा। पार्टी का मानना है कि सरकार की उपलब्धियों को केवल मंचों और विज्ञापनों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें जनता के बीच ले जाना जरूरी है। यही कारण है कि संगठन को सेवा गतिविधियों से जोड़ने की रणनीति तैयार की जा रही है।
भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में बूथ, शक्ति केंद्र और मंडल स्तर पर जिम्मेदारियों को और स्पष्ट किया जाएगा। पन्ना प्रमुखों और बूथ कार्यकर्ताओं को अपने-अपने क्षेत्र में नियमित संपर्क का जिम्मा दिया जाएगा। पार्टी की नजर खास तौर पर उन इलाकों पर रहेगी जहां संगठन कमजोर है या जहां राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। इसके साथ ही युवा, महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य सामाजिक समूहों के बीच संगठन की गतिविधियां बढ़ाने की योजना है। पार्टी की कोशिश हर वर्ग के साथ अलग-अलग स्तर पर संवाद स्थापित करने की है।
भाजपा के रोडमैप में एक महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय समस्याओं को राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाना है। पहाड़ में पलायन, रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा और मूलभूत सुविधाओं से जुड़े सवालों पर पार्टी कार्यकर्ताओं को जनता के बीच जाने के निर्देश दिए जा सकते हैं। मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण, यातायात, रोजगार, महंगाई और आधारभूत ढांचे से जुड़े मुद्दों पर फोकस रहेगा। यानी संगठन की रणनीति में एक ही फार्मूला पूरे प्रदेश पर लागू करने के बजाय क्षेत्रवार मुद्दों को प्राथमिकता देने की तैयारी है।
भाजपा के लिए सेवा गतिविधियां संगठन विस्तार का महत्वपूर्ण माध्यम रही हैं। अब इसी मॉडल को और व्यापक स्तर पर लागू करने की तैयारी है। रक्तदान, स्वास्थ्य शिविर, स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण, आपदा राहत और जरूरतमंदों की सहायता जैसी गतिविधियों के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं की जनता के बीच मौजूदगी बढ़ाई जाएगी। इस रणनीति के पीछे राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट है। भाजपा चाहती है कि चुनाव से काफी पहले ही उसका कार्यकर्ता मतदाता के संपर्क में रहे। इससे चुनावी समय में अचानक सक्रिय होने के बजाय संगठन के पास स्थायी जनसंपर्क नेटवर्क तैयार रहेगा। आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की चुनौती से जुड़ा है। ऐसे में संगठन की मजबूती पार्टी की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। सरकार के कामकाज, मुख्यमंत्री के चेहरे और संगठन की सक्रियताकृइन तीनों को एक साथ जोड़कर चुनावी जमीन तैयार करने की रणनीति दिखाई दे रही है।
हालांकि, रोडमैप की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसका क्रियान्वयन कागजों से निकलकर गांव की चौपाल, बूथ की बैठक और आम मतदाता के दरवाजे तक कितनी तेजी से पहुंचता है। भाजपा के सामने चुनौती केवल उपलब्धियां गिनाने की नहीं, बल्कि जनता के बीच मौजूद नाराजगी, स्थानीय असंतोष और विपक्ष के सवालों का जवाब देने की भी होगी। यही वजह है कि भाजपा का नया संगठनात्मक मंत्र केवल सत्ता की वापसी तक सीमित नहीं दिख रहा। पार्टी अब सेवा के जरिये संपर्क, संपर्क के जरिये संगठन और संगठन के जरिये चुनावी बढ़त बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ती नजर आ रही है।
रविवार, 6 सितंबर 2026
udaydinmaan: मुद्दा एक, नैरेटिव दो
udaydinmaan: मुद्दा एक, नैरेटिव दो: हल्द्वानी से निकला एक विवाद अब बेंगलुरु तक पहुंच गया भाजपा-कांग्रे का एफआईआर-एफआईआर का खेल शुरू उत्तराखंड में कांग्रेस, कर्नाटक में भाजपा पर...
मेट्रो में पीएम मोदी का सरप्राइज सफर
श्रीराम कालेज के शताब्दी समारोह में शामिल होने पहुंचे पीएम मोदी
शताब्दी समारोह में जाने के लिए पीएम ने चुना सार्वजनिक परिवहन
प्रधानमंत्री मोदी ने छात्र-छात्राओं व मेट्रो में यात्रियों से की बातचीत
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली मेट्रो में सफर करते नजर आए। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कालेज आफ कामर्स के शताब्दी समारोह में शामिल होने के लिए मेट्रो से पहुंचे। सफर के दौरान प्रधानमंत्री ने मेट्रो में मौजूद छात्रों, बच्चों और अन्य यात्रियों से बातचीत की। प्रधानमंत्री के मेट्रो में पहुंचने से यात्रियों के लिए सफर का सामान्य अनुभव अचानक खास बन गया। मेट्रो स्टेशन पर प्रवेश के दौरान उनके हाथ में मेट्रो कार्ड भी नजर आया। करीब 20 मिनट के सफर में उन्होंने सहयात्रियों से बातचीत की और बच्चों के साथ भी सहज अंदाज में संवाद किया।
प्रधानमंत्री का यह मेट्रो सफर ऐसे समय हुआ, जब श्रीराम कालेज आफ कामर्स अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है। समारोह में वर्तमान छात्रों के साथ कॉलेज के पूर्व छात्र, शिक्षक और पूर्व प्राचार्य भी शामिल हुए। प्रधानमंत्री ने समारोह में कालेज की शैक्षणिक परंपरा और उसके योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने संस्थान के पूर्व छात्रों की उपलब्धियों का भी उल्लेख किया। समारोह में कालेज की शताब्दी के अवसर पर स्मारक डाक टिकट भी जारी किया गया। प्रधानमंत्री मोदी का श्रीराम कालेज आफ कामर्स से पुराना जुड़ाव रहा है। वह इससे पहले 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए कालेज पहुंचे थे। अब करीब 13 वर्ष बाद वह दोबारा एसआरसीसी पहुंचे।
मेट्रो से कालेज तक का सफर इस यात्रा को और खास बना गया। प्रधानमंत्री का सार्वजनिक परिवहन के जरिए कार्यक्रम स्थल तक पहुंचना और रास्ते में यात्रियों से संवाद करना सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना। प्रधानमंत्री की इस यात्रा में छात्रों से बातचीत खास तौर पर महत्वपूर्ण रही। शिक्षक दिवस के अवसर पर भी उन्होंने शिक्षकों से बच्चों में नशे की समस्या और अत्यधिक स्क्रीन समय जैसे मुद्दों पर सतर्क रहने का आह्वान किया था। उन्होंने खेल, शारीरिक गतिविधियों और रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा देने पर जोर दिया था। ऐसे में दिल्ली मेट्रो में छात्रों के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी को युवाओं से सीधे संवाद की उनकी शैली के रूप में भी देखा जा रहा है।
एक तरफ राजधानी की रोजमर्रा की मेट्रो यात्रा, दूसरी तरफ देश का प्रधानमंत्रीकृशनिवार को दिल्ली मेट्रो के एक डिब्बे में दोनों दृश्य कुछ देर के लिए एक साथ दिखाई दिए।
भारत की छाती पर बैठा है ‘इंडिया’
साध्वी ऋतम्भरा के बयान से फिर गरमाई भारत बनाम इंडिया की सियासत
देशभर में पहचान और विचारधारा पर छिड़ी भाजपा-कांग्रेस में नई बहस
नाम से शुरू हुई बहस, अब विचारधारा तक पहुंच गई है देशभर में
देहरादून। देश की राजनीति में भारत और इंडिया को लेकर चल रही बहस एक बार फिर सुर्खियों में है। साध्वी ऋतम्भरा के बयानकृभारत की छाती पर इंडिया को बैठाना हमारा दुर्भाग्य हैकृने इस बहस को नया राजनीतिक रंग दे दिया है। बयान सामने आने के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि क्या देश के नाम और पहचान से जुड़े प्रतीकों को लेकर राजनीति आने वाले चुनावों में बड़ा मुद्दा बनने जा रही है? साध्वी ऋतम्भरा का बयान सीधे तौर पर उस वैचारिक टकराव की ओर इशारा करता है, जिसमें भारत को भारतीय सभ्यता, संस्कृति और परंपरा की पहचान के रूप में देखा जाता है, जबकि इंडिया को आधुनिक राजनीतिक-संवैधानिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।
भारत और इंडिया की बहस नई नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह विवाद राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आया है। विपक्षी दलों ने अपने गठबंधन का नाम इस पर रखा तो भाजपा और उसके समर्थक खेमे की ओर से इस नाम को लेकर लगातार सवाल उठाए गए। इसके बाद सरकारी कार्यक्रमों और दस्तावेजों में इंडिया के स्थान पर भारत शब्द के इस्तेमाल को लेकर भी राजनीतिक विवाद हुआ। विपक्ष ने इसे राजनीतिक रणनीति बताया, जबकि भाजपा समर्थक इसे औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति और भारतीय पहचान के पुनर्स्थापन से जोड़ते रहे। साध्वी ऋतम्भरा का ताजा बयान इसी व्यापक वैचारिक बहस को आगे बढ़ाता नजर आता है।
इस विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इंडिया शब्द अब केवल देश के अंग्रेजी नाम के अर्थ में नहीं देखा जा रहा। विपक्षी गठबंधन ने इसे अपने राजनीतिक मंच के रूप में इस्तेमाल किया, जिसके बाद यह शब्द भारतीय राजनीति में एक खास राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन गया। यही वजह है कि भारत बनाम इंडिया की बहस में संविधान, इतिहास, संस्कृति और राजनीतिकृचारों एक साथ दिखाई देने लगे हैं।
देश में आने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने नैरेटिव को धार देने में जुटे हैं। भाजपा जहां राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और सनातन से जुड़े मुद्दों को अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना सकती है, वहीं कांग्रेस संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक समावेशिता को केंद्र में रखकर जवाब देने की कोशिश कर सकती है। यानी नाम की लड़ाई धीरे-धीरे नैरेटिव की लड़ाई में बदलती जा रही है।
इस बहस का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में संवैधानिक रूप से दोनों नाम देश की पहचान का हिस्सा हैं। ऐसे में राजनीतिक बहस का असली प्रश्न यह नहीं कि भारत सही है या इंडिया। सवाल यह है कि इन दोनों शब्दों को राजनीतिक मंचों पर किस अर्थ और उद्देश्य के साथ इस्तेमाल किया जा रहा है। साध्वी ऋतम्भरा का बयान इसी सवाल को फिर सामने ले आया है।
फिलहाल इतना तय है कि भारत और इंडिया के बीच शब्दों की यह लड़ाई महज भाषा की लड़ाई नहीं रह गई है। यह देश की राजनीतिक पहचान, इतिहास और भविष्य की दिशा पर चल रही बड़ी वैचारिक बहस का हिस्सा बन चुकी है और चुनावी राजनीति में जब कोई शब्द विचारधारा का प्रतीक बन जाए, तो उसकी गूंज संसद से लेकर सड़क और सोशल मीडिया तक सुनाई देती है।
मुद्दा एक, नैरेटिव दो
हल्द्वानी से निकला एक विवाद अब बेंगलुरु तक पहुंच गया
भाजपा-कांग्रे का एफआईआर-एफआईआर का खेल शुरू
उत्तराखंड में कांग्रेस, कर्नाटक में भाजपा पर एफआईआर
एफआईआरकृसियासत ने भौगोलिक सीमाएं भी तो तोड़ दी
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में शुरू हुआ शुद्धिकरण विवाद अब एफआईआर की राजनीति का ऐसा चक्र बन गया है, जिसमें उत्तराखंड से निकली राजनीतिक गर्मी कर्नाटक तक पहुंच गई है। पहले हल्द्वानी मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर हुई और अब उसी विवाद को लेकर बेंगलुरु पुलिस ने उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट समेत अन्य के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज कर दी। यानी एक राज्य में कांग्रेस पर कानूनी कार्रवाई और दूसरे राज्य में भाजपा पर एफआईआरकृसियासत ने भौगोलिक सीमाएं तोड़ दी हैं।
राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज मामले में शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित धार्मिक अनुष्ठान को लेकर राहुल गांधी ने जातिगत और सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा देने वाली टिप्पणी की। मामले में भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के साथ एससी/एसटी कानून भी लगाया गया। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक दबाव का नतीजा बताया और एफआईआर के विरोध में आंदोलन किया। भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए राहुल गांधी पर जाति और भेदभाव की राजनीति करने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी इस मुद्दे पर राहुल गांधी पर पलटवार किया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। एफआईआर का जवाब अब दूसरी एफआईआर से आया है।
कांग्रेस से जुड़े एक शिकायतकर्ता की शिकायत पर बेंगलुरु की विधान सौध पुलिस ने उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और पार्टी के अन्य सदस्यों के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि हल्द्वानी में खरगे की सभा के बाद कथित शुद्धिकरण अनुष्ठान के जरिए जातिगत भेदभाव का संदेश गया। मामला एससी/एसटी कानून समेत संबंधित प्रावधानों के तहत दर्ज किया गया और आगे की कार्रवाई के लिए उत्तराखंड भेजे जाने की बात सामने आई है। अब सवाल यह है कि कानून अपना काम कर रहा है या राजनीति कानून के रास्ते अपना काम कर रही है?
कांग्रेस के लिए यह मामला केवल एफआईआर का विरोध नहीं है। पार्टी इसे दलित सम्मान और सामाजिक न्याय के बड़े मुद्दे में बदलना चाहती है। सात सितंबर को कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर बड़े राजनीतिक कार्यक्रम की तैयारी है और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े विवाद को पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के दलित सांसद भी इस मुद्दे पर चर्चा करने वाले हैं। भाजपा की रणनीति भी साफ दिखाई दे रही है। वह राहुल गांधी की टिप्पणी को मुद्दा बनाकर कांग्रेस को घेरना चाहती है और यह संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस जातिगत राजनीति कर रही है। लेकिन बेंगलुरु की जीरो एफआईआर ने भाजपा को बचाव की मुद्रा में ला दिया है।
दिलचस्प यह भी है कि एफआईआर के बाद महेंद्र भट्ट ने अपने पुराने बयान से दूरी बनाते हुए सफाई दी है। उन्होंने कहा कि उनके बयान को संदर्भ से अलग करके पेश किया गया। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए यह विवाद राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। कांग्रेस इसे दलित सम्मान, संविधान और सामाजिक बराबरी के सवाल से जोड़ रही है, जबकि भाजपा राहुल गांधी के बयान को निशाना बनाकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर रही है।
यानी मुद्दा एक, नैरेटिव दो और अब दोनों दलों के पास अपनी-अपनी एफआईआर है। कांग्रेस कह सकती हैकृदेखिए, हमारे नेता पर एफआईआर हुई। भाजपा कह सकती हैकृदेखिए, हमारे प्रदेश अध्यक्ष पर भी एफआईआर कराई गई। लेकिन जनता के सामने असली सवाल इससे बड़ा है। क्या एफआईआर राजनीतिक जवाब का माध्यम बनती जा रही है? लोकतंत्र में एफआईआर का उद्देश्य राजनीतिक हिसाब बराबर करना नहीं, कानून के उल्लंघन की निष्पक्ष जांच शुरू करना होना चाहिए। यदि किसी ने कानून तोड़ा है तो कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे वह सत्ता पक्ष का नेता हो या विपक्ष का। लेकिन यदि एफआईआर ही राजनीतिक संघर्ष का अगला हथियार बन जाए तो असली मुद्दा पीछे छूट जाता है।
उत्तराखंड की राजनीति के लिए यह आने वाले चुनाव का संकेत भी है। 2027 की जंग केवल भाषणों और रैलियों तक सीमित नहीं रहने वाली। नैरेटिव, सोशल मीडिया, कानूनी लड़ाई और एफआईआरकृसभी चुनावी हथियार बनते दिखाई दे रहे हैं। हल्द्वानी से निकला विवाद बेंगलुरु तक पहुंच चुका है। अब देखना यह है कि अगली एफआईआर किस राज्य में और किस राजनीतिक चेहरे पर होती है। सवाल यही हैकृक्या यह कानून का राज है या एफआईआर-एफआईआर का नया चुनावी खेल?
सरकार की घेराबंदी का ‘सियासी मंच’
सीएम आवास कूच के लिए कांग्रेस ने कसी कमर
शुद्धिकरण विवाद पर सरकार को घेरने की तैयारी
निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग
देहरादून। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कथित शुद्धिकरण के मामले को लेकर कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सात सितंबर को प्रस्तावित मुख्यमंत्री आवास कूच को सफल बनाने के लिए कांग्रेस ने संगठनात्मक तैयारियां तेज कर दी हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि हल्द्वानी की घटना केवल एक स्थानीय विवाद नहीं है, बल्कि इससे जुड़े सवाल सामाजिक सम्मान, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े हैं। पार्टी ने इसी मुद्दे को लेकर सात सितंबर के कूच को सरकार के खिलाफ बड़े राजनीतिक प्रदर्शन के रूप में तैयार करने की रणनीति बनाई है।
महानगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डा. जसविंदर पाल सिंह गोगी ने भाजपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की विभाजनकारी और जातिवादी राजनीति के खिलाफ कांग्रेस मजबूती से संघर्ष करेगी। गोगी ने कहा कि हल्द्वानी की घटना ने भाजपा की कथित मानसिकता को जनता के सामने उजागर किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक सम्मान के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगी। सात सितंबर का मुख्यमंत्री आवास कूच केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष है।
गोगी ने कहा कि कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर मुकदमे दर्ज कर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इससे कांग्रेस पीछे हटने वाली नहीं है। उन्होंने सरकार से हल्द्वानी प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करने की मांग की।
कांग्रेस ने सात सितंबर के कूच के जरिए सरकार को सीधे राजनीतिक कठघरे में खड़ा करने की तैयारी की है। हल्द्वानी प्रकरण पहले ही राजनीतिक बयानबाजी का केंद्र बन चुका है। अब कांग्रेस इसे प्रदेशव्यापी मुद्दे के रूप में उठाकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ती राजनीतिक सक्रियता के बीच सात सितंबर का प्रदर्शन कांग्रेस के लिए शक्ति प्रदर्शन का मौका भी माना जा रहा है।
कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं को बड़ी संख्या में जुटाने का लक्ष्य तो रखा है, लेकिन अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सात सितंबर को परेड ग्राउंड पर पार्टी कितना बड़ा जमावड़ा कर पाती है। यदि भीड़ जुटती है तो कांग्रेस इसे सरकार के खिलाफ जनआक्रोश के संकेत के तौर पर पेश करेगी और यदि अपेक्षा के अनुरूप भीड़ नहीं जुटी तो सरकार इसे कांग्रेस के कमजोर संगठन की तस्वीर के रूप में प्रचारित कर सकती है।
शनिवार, 5 सितंबर 2026
udaydinmaan: बेचेहरा दल, बेहिसाब चंदा
udaydinmaan: बेचेहरा दल, बेहिसाब चंदा: न सांसद, न विधायक, चुनावी मैदान में मामूली मौजूदगी और करोड़ों की बारिश चुनावी मैदान से गायब छोटी पार्टियों के खातों में छप्परफाड़ फंड 2023-24 ...
बेचेहरा दल, बेहिसाब चंदा
न सांसद, न विधायक, चुनावी मैदान में मामूली मौजूदगी और करोड़ों की बारिश
चुनावी मैदान से गायब छोटी पार्टियों के खातों में छप्परफाड़ फंड
2023-24 में गैर-मान्यता प्राप्त दलों की तिजोरी हो गई है लबालब
छोटे दलों के खातों में सैकड़ों करोड़, राजनीतिक सक्रियता भी नहीं
नई दिल्ली। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का अस्तित्व चुनाव, विचारधारा और जनता के बीच सक्रियता से जुड़ा होता है। लेकिन देश की चुनावी राजनीति में एक ऐसा विरोधाभास सामने आया है, जिसने राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। कुछ छोटे और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के खातों में वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान करोड़ों रुपये का चंदा पहुंचा, जबकि चुनावी राजनीति में उनकी मौजूदगी बेहद सीमित रही। चुनाव आयोग के रिकार्ड में ऐसे दलों की संख्या हजारों में रही है। इनमें से कुछ पार्टियों को मिले चंदे की मात्रा इतनी बड़ी बताई गई कि वह कई स्थापित राजनीतिक दलों की फंडिंग से भी आगे निकल गई।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि इन दलों को कितना पैसा मिला। असली सवाल यह है कि जिस राजनीतिक संगठन की जमीन पर मौजूदगी दिखाई नहीं देती, उसके खाते में इतना पैसा पहुंचा कैसे? कई पड़तालों में ऐसे छह दलों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें बड़ी रकम चंदे के तौर पर मिली। लेकिन इनमें से कई दल चुनावी गतिविधियों में उसी अनुपात में सक्रिय नजर नहीं आए। यही विरोधाभास अब राजनीतिक फंडिंग की मौजूदा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। राजनीतिक दलों की आय और चंदे की जानकारी चुनाव आयोग के सामने प्रस्तुत की जानी होती है। आयोग अपनी वेबसाइट पर राजनीतिक दलों की उपलब्ध कराता है। भारत में किसी राजनीतिक संगठन का पंजीकरण होना और उसका चुनाव में प्रभावी राजनीतिक दल बन जाना दो अलग-अलग बातें हैं। लेकिन विशेषज्ञों की चिंता उन मामलों को लेकर है जहां राजनीतिक गतिविधि और आर्थिक लेनदेन के बीच भारी असमानता दिखाई देती है।
ऐसे मामलों में यह आशंका उठती रही है कि कहीं कुछ संस्थाओं का इस्तेमाल केवल राजनीतिक चंदे के नाम पर धन के लेनदेन के लिए तो नहीं किया जा रहा। मीडिया रिपोर्टों और जांच एजेंसियों के सामने पहले भी ऐसे आरोप आए हैं कि कुछ चंदे का इस्तेमाल कथित तौर पर फर्जी राजनीतिक चंदे, टैक्स से जुड़ी गड़बड़ियों और धन को इधर-उधर करने के लिए किया गया। हालांकि किसी विशेष दल को मनी लान्ड्रिंग, हवाला या टैक्स चोरी में शामिल मान लेना तब तक उचित नहीं होगा जब तक जांच या न्यायिक प्रक्रिया से इसकी पुष्टि न हो।
राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रमुख संस्थान हैं। वित्त वर्ष 2023-24 में राष्ट्रीय दलों ने भी 20 हजार रुपये से अधिक के दान के रूप में हजारों करोड़ रुपये घोषित किए थे। एके विश्लेषण के अनुसार राजनीतिक दलों की फंडिंग का बड़ा हिस्सा बड़े दानदाताओं और विभिन्न औपचारिक चौनलों से आता रहा है। लेकिन जब कोई छोटा दल अचानक बड़ी रकम प्राप्त करता है और उसके बाद उसके चुनावी प्रदर्शन, संगठनात्मक गतिविधियों अथवा सार्वजनिक उपस्थिति में उसका कोई स्पष्ट प्रतिबिंब नहीं दिखता, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता हैकृयह पैसा राजनीति में गया या सिर्फ राजनीतिक दल के खाते से होकर गुजरा?
राजनीतिक फंडिंग की व्यवस्था का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को संसाधन उपलब्ध कराना है, न कि ऐसी वित्तीय संरचनाओं को जन्म देना जिनका वास्तविक राजनीतिक उद्देश्य ही अस्पष्ट हो जाए। हाल के वर्षों में संदिग्ध राजनीतिक चंदे को लेकर जांच एजेंसियों की कार्रवाई भी सामने आई है। यह पूरा विवाद राजनीतिक व्यवस्था के सामने एक असहज सवाल रखता हैकृक्या राजनीतिक दल केवल चुनाव लड़ने वाली संस्थाएं हैं या वह वित्तीय लेनदेन का भी माध्यम बन सकते हैं? अगर किसी दल को करोड़ों रुपये मिलते हैं, तो जनता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि पैसा किसने दिया, क्यों दिया, किस उद्देश्य से दिया गया और उसका इस्तेमाल कहां हुआ।
राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता केवल लेखा-जोखा नहीं है। यह सीधे-सीधे लोकतंत्र में जनता के भरोसे का सवाल है। चुनाव में हार-जीत लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन अगर चुनावी राजनीति से लगभग गायब संगठन करोड़ों की आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में दिखाई देने लगें, तो फिर चुनाव आयोग, आयकर विभाग और अन्य नियामक संस्थाओं के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा होता हैकृ आखिर ये राजनीतिक दल जनता की आवाज हैं या पैसे के उस खेल का पर्दा, जो राजनीति के नाम पर चलता है?
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1700 करोड़ रुपये का चंदा
वित्त वर्ष 2023-24 में देश की कुछ छोटी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां चंदा जुटाने के मामले में बड़े-बड़े स्थापित दलों से आगे निकलती दिखाई देती हैं। हैरानी की बात यह है कि इन दलों के पास न कोई लोकसभा सांसद है और न कोई विधायक। चुनावी राजनीति में भी इनकी सक्रियता बेहद सीमित रही है, लेकिन इनके खातों में करोड़ों रुपये का चंदा पहुंचा। आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात की आम जनमत पार्टी को करीब 620 करोड़ रुपये, सत्यवादी रक्षक पार्टी को 330 करोड़ रुपये और न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी को करीब 200 करोड़ रुपये चंदा मिला। वहीं स्वतंत्र अभिव्यक्ति पार्टी, जिसे एक पेपर पार्टी के रूप में बताया गया है, को 219 करोड़ रुपये, भारतीय नेशनल जनता पार्टी को 191 करोड़ रुपये और गरीब कल्याण पार्टी को करीब 138 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। यानी इन छह दलों को मिलाकर करीब 1700 करोड़ रुपये का चंदा मिला। इसके मुकाबले कांग्रेस को इसी अवधि में करीब 288 करोड़ रुपये चंदा मिलने का आंकड़ा सामने रखा जा रहा है।
दिल्ली के ‘दिग्गजों’ से गरमाएगा पहाड़
2027 की जंग का काउंटडाउन हुआ शुरू, भाजपा की हैट्रिक पर नजर
कांग्रेस की सत्ता वापसी की बेचौनी, राष्ट्रीय नेताओं के दौरों की सियासत
उत्तराखंड में चुनावी राजनीति का राष्ट्रीय चरण अभी से हो गया है शुरू
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन सियासी रणभूमि सजने लगी है। प्रदेश की सियासत अब धीरे-धीरे स्थानीय नेताओं के दायरे से निकलकर राष्ट्रीय नेतृत्व के हाथों में जाती दिखाई दे रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने बड़े चेहरों को उत्तराखंड के मैदान में उतारने की तैयारी में हैं। राष्ट्रीय नेताओं के प्रस्तावित दौरों ने साफ संकेत दे दिया है कि 2027 का चुनाव अब केवल देहरादून की राजनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं रहेगा।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का प्रस्तावित उत्तराखंड दौरा इसी चुनावी सक्रियता की अहम कड़ी माना जा रहा है। संगठनात्मक बैठकों से लेकर अलग-अलग सामाजिक समूहों के कार्यक्रमों तक उनकी सक्रियता को भाजपा की चुनावी तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी तरफ कांग्रेस भी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत राष्ट्रीय नेतृत्व के कार्यक्रमों के जरिए प्रदेश में माहौल बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। यानी सितंबर के साथ उत्तराखंड में चुनावी राजनीति का राष्ट्रीय चरण शुरू होता दिखाई दे रहा है।
राष्ट्रीय नेताओं का कोई भी दौरा अब महज संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं माना जाएगा। किस जिले को चुना गया, किस नेता को मंच पर जगह मिली, किन मुद्दों को उठाया गया और कितनी भीड़ जुटीकृहर तस्वीर और हर बयान के राजनीतिक मायने निकाले जाएंगे। भाजपा जहां अपने संगठन और सरकार की उपलब्धियों को लेकर मैदान में उतरने की तैयारी में है, वहीं कांग्रेस सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने की कोशिश करेगी। इसका सीधा असर प्रदेश की राजनीति पर पड़ेगा। एक दल का कार्यक्रम दूसरे दल पर दबाव बढ़ाएगा और फिर उसके जवाब में दूसरा दल मैदान में उतरेगा। इस तरह आने वाले महीनों में कार्यक्रम, बयान, आरोप और पलटवारकृउत्तराखंड की राजनीति का रोजमर्रा का हिस्सा बनने वाले हैं।
भाजपा के लिए 2027 का चुनाव ऐतिहासिक महत्व रखता है। पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की कोशिश करेगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार अपने कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाएगी, जबकि संगठन बूथ स्तर तक अपनी मशीनरी को मजबूत करने में जुटा है। लेकिन चुनौती भी कम नहीं है। स्थानीय स्तर पर विधायकों को लेकर नाराजगी, टिकट के दावेदारों की बढ़ती संख्या, क्षेत्रीय असंतोष और सरकार के खिलाफ उठने वाले मुद्दे भाजपा के लिए परीक्षा बन सकते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता को संगठन की ग्राउंड रिपोर्ट से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
कांग्रेस के लिए यह चुनाव सत्ता में वापसी का बड़ा अवसर है। पाटरग् यदि भाजपा विरोधी मतों को एकजुट कर पाती है और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी तरीके से चुनावी नैरेटिव में बदलती है तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सुविधाएं, आपदा, सड़कें, शिक्षा और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को कांग्रेस लगातार उठाती रही है। लेकिन कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता और नेतृत्व का सवाल है। राष्ट्रीय नेताओं की सक्रियता तभी प्रभावी होगी, जब उसका फायदा बूथ स्तर के संगठन तक पहुंचे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बड़े नेताओं के आने के बाद चुनाव का एजेंडा किस दिशा में जाएगा? क्या 2027 का चुनाव उत्तराखंड के स्थानीय सवालों पर लड़ा जाएगा या फिर भाजपा-कांग्रेस के बीच राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी लड़ाई का विस्तार बन जाएगा? पहाड़ का मतदाता सड़क, रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और खेती चाहता है। मैदान का मतदाता रोजगार, महंगाई, कानून-व्यवस्था और शहरी सुविधाओं को लेकर सवाल पूछ रहा है। यदि राष्ट्रीय नेतृत्व इन स्थानीय सवालों को अपने चुनावी भाषणों में जगह देता है तो चुनाव का रंग अलग होगा। लेकिन यदि मुकाबला केवल केंद्र की राजनीति और राष्ट्रीय मुद्दों तक सिमट गया तो उत्तराखंड के असली सवाल फिर पीछे छूट सकते हैं।
भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ती सीधी टक्कर के बीच क्षेत्रीय दलों के लिए भी चुनौती बढ़ेगी। उत्तराखंड क्रांति दल समेत छोटे राजनीतिक दल पहाड़, राज्य की अस्मिता, रोजगार और पलायन जैसे सवालों के सहारे अपनी जमीन बचाने की कोशिश करेंगे। इन दलों की भूमिका कई सीटों पर निर्णायक हो सकती है। यही वजह है कि बड़े दल भी क्षेत्रीय समीकरणों को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं होंगे।
राष्ट्रीय नेताओं के दौरों के साथ प्रदेश की सियासत में शक्ति प्रदर्शन का दौर भी तेज होगा। एक बड़ी रैली के जवाब में दूसरी रैली, एक बड़े बयान के जवाब में पलटवार और एक राजनीतिक मुद्दे के जवाब में दूसरा मुद्दाकृयह सिलसिला अगले कई महीनों तक चलने की पूरी संभावना है। 2027 की चुनावी लड़ाई अभी शुरू नहीं हुई है, लेकिन उसके संकेत साफ दिखाई देने लगे हैं। दिल्ली से उतरते बड़े चेहरे अब उत्तराखंड की सियासी जमीन पर अपने-अपने दांव चलेंगे। असली सवाल यह है कि इन दांवों में पहाड़ के मुद्दे भारी पड़ेंगे या राष्ट्रीय राजनीति का शोर?
दलों के बीच राजनीतिक ‘शब्दयुद्ध’ और तेज
शुद्धिकरण विवाद की आंच अब दूसरे राज्यों तक पहुंचेगी
उत्तराखंड में उठी चिंगारी को चुनावी मुद्दा बनाएगी कांग्रेस
दूसरे राज्यों में भाजपा के खिलाफ नैरेटिव को धार देगी
देहरादून। उत्तराखंड के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में कथित शुद्धिकरण, हवन-यज्ञ और उसके बाद उठे राजनीतिक विवाद की तपिश अब प्रदेश की सीमाओं से बाहर निकलने की तैयारी में है। विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ रहे राज्यों में कांग्रेस इस प्रकरण को सिर्फ उत्तराखंड की स्थानीय घटना के तौर पर नहीं, बल्कि भाजपा शासन में सामाजिक सौहार्द, प्रशासनिक निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों पर उठ रहे सवालों के उदाहरण के तौर पर पेश कर सकती है। उत्तराखंड में शुरू हुआ विवाद कांग्रेस के लिए एक ऐसा राजनीतिक हथियार बन सकता है, जिसे वह चुनावी राज्यों में भाजपा के खिलाफ अपने बड़े नैरेटिव से जोड़ने की कोशिश करे। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श से कैसे जोड़ा जाए। रामलीला मैदान प्रकरण कांग्रेस को इसी के लिए एक नया संदर्भ दे सकता है।
कांग्रेस पहले ही उत्तराखंड में इस मामले को लेकर सरकार पर हमलावर है। पार्टी का आरोप है कि धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवाद में प्रशासन का रवैया निष्पक्ष नहीं रहा और सत्तारूढ़ दल से जुड़े लोगों के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। भाजपा की ओर से इन आरोपों को राजनीतिक रंग देने की कोशिश बताया जा सकता है। यही टकराव अब कांग्रेस की रणनीति का आधार बन सकता है। पार्टी इस सवाल को दूसरे राज्यों तक ले जा सकती है कि क्या सत्ता और धर्म के सवाल पर प्रशासन का रवैया समान रहता है? क्या राजनीतिक प्रभाव रखने वालों पर कानून उसी तरह लागू होता है जैसे आम नागरिकों पर? यानी स्थानीय विवाद को कांग्रेस एक बड़े सवाल में बदलने की कोशिश करेगी।
आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला केवल सरकारों के कामकाज तक सीमित नहीं रहने वाला। रोजगार, महंगाई, किसान, महिला सुरक्षा और सामाजिक न्याय के साथ-साथ सामाजिक ध्रुवीकरण और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता भी विपक्ष के प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकते हैं। उत्तराखंड का विवाद कांग्रेस को इसी मोर्चे पर भाजपा को घेरने का मौका देता है।
कांग्रेस की रणनीति यदि आगे बढ़ती है तो उत्तराखंड के घटनाक्रम को दूसरे राज्यों में उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है। पार्टी का संदेश यह हो सकता है कि भाजपा के शासन में धार्मिक पहचान को राजनीतिक संघर्ष का औजार बनाया जा रहा है। हालांकि कांग्रेस के लिए यह रणनीति जोखिम से खाली नहीं होगी। भाजपा इसे धर्म और आस्था के खिलाफ कांग्रेस की राजनीति बताकर पलटवार कर सकती है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर दोनों दलों के बीच राजनीतिक शब्दयुद्ध और तेज होने की संभावना है।
भाजपा के लिए चुनौती यह नहीं होगी कि कांग्रेस इस मुद्दे को कितना बड़ा बनाती है। असली चुनौती यह होगी कि जनता के बीच इस घटनाक्रम की धारणा क्या बनती है। यदि विवाद लगातार सुर्खियों में रहता है और कांग्रेस इसे कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक निष्पक्षता तथा सामाजिक सौहार्द के सवाल से जोड़ने में सफल होती है, तो भाजपा को रक्षात्मक स्थिति में आना पड़ सकता है। विशेषकर उन राज्यों में जहां पहले से ही सामाजिक और धार्मिक मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा हैं, कांग्रेस इस प्रकरण को अपने अभियान में प्रतीकात्मक उदाहरण के रूप में इस्तेमाल कर सकती है।
कांग्रेस के लिए इस मुद्दे की राजनीतिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इसे किस भाषा में पेश करती है। यदि इसे केवल शुद्धिकरण विवाद तक सीमित रखा गया तो इसका असर उत्तराखंड तक ही रह सकता है। लेकिन यदि पार्टी इसे सत्ता के संरक्षण में सामाजिक विभाजन बनाम संवैधानिक लोकतंत्र के फ्रेम में रखती है, तो इसका दायरा बड़ा हो सकता है। यही कारण है कि उत्तराखंड कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के बयानों से आगे राष्ट्रीय नेतृत्व भी इस प्रकरण को उठाता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी।
भाजपा के लिए स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड को लंबे समय से हिंदुत्व और धार्मिक पर्यटन की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण राज्य माना जाता है। चारधाम, समान नागरिक संहिता और धार्मिक स्थलों से जुड़े मुद्दों के बीच रामलीला मैदान विवाद विपक्ष को भाजपा के व्यापक राजनीतिक माडल पर सवाल उठाने का अवसर देता है। यदि कांग्रेस इस मामले को अन्य चुनावी राज्यों तक ले जाती है तो भाजपा को एक साथ दो मोर्चों पर जवाब देना पड़ेगाकृउत्तराखंड में स्थानीय विवाद का राजनीतिक समाधान और दूसरे राज्यों में उसके राष्ट्रीय नैरेटिव का जवाब।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वह इस विवाद को केवल आरोप-प्रत्यारोप में फंसने से बचाकर कानून के समान अनुप्रयोग और सामाजिक सद्भाव के सवाल से जोड़े। लेकिन पार्टी के लिए खतरा भी उतना ही बड़ा है। यदि अभियान अत्यधिक धार्मिक रंग लेता है तो भाजपा इसे कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति के पुराने आरोपों से जोड़ सकती है। इसलिए कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से प्रभावी रास्ता यही होगा कि वह व्यक्ति या समुदाय विशेष के खिलाफ आरोप लगाने के बजाय प्रशासन की भूमिका, कानून के राज और संवैधानिक मूल्यों पर सवाल केंद्रित करे। रामलीला मैदान का विवाद अभी उत्तराखंड की राजनीति में ही गर्म है, लेकिन विधानसभा चुनावों का मौसम इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना सकता है। कांग्रेस के लिए यह महज एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि भाजपा के खिलाफ अपने व्यापक नैरेटिव को धार देने का अवसर है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस इस मुद्दे को कितनी दूर तक ले जाती है और भाजपा इसका जवाब किस राजनीतिक भाषा में देती है।
शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
udaydinmaan: खाकी पर ‘सवाल’
udaydinmaan: खाकी पर ‘सवाल’: दिल्ली के साकेत थाने में महिला पत्रकारों से कथित मारपीट, दिल्ली पुलिस पर उठे सवाल रिपोर्टर नफीसा खान व शाहीन खान ने पुलिस पर लगाया हिरासत मे...
खाकी पर ‘सवाल’
दिल्ली के साकेत थाने में महिला पत्रकारों से कथित मारपीट, दिल्ली पुलिस पर उठे सवाल
रिपोर्टर नफीसा खान व शाहीन खान ने पुलिस पर लगाया हिरासत में लेकर पीटने का आरोप
वीवीआईपी सुरक्षा के नाम पर पत्रकारिता पर लगाम या सुरक्षा व्यवस्था में वास्तविक बाधा
दिल्ली पुलिस ने आरोप नकारे, कहा-निकास रोकने और स्कूटी खड़ी करने से बिगड़ी स्थिति
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में पुलिस और पत्रकारों के बीच टकराव का एक गंभीर मामला सामने आया है। दक्षिण दिल्ली के साकेत में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के एक कार्यक्रम के आसपास दो महिला पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस पर बदसलूकी, मारपीट और हिरासत में लेने के गंभीर आरोप लगाए हैं। पत्रकारों का आरोप है कि कार्यक्रम की कवरेज के दौरान पुलिसकर्मियों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और बाद में उन्हें हिरासत में ले लिया। घटना विगत दिवस की बताई जा रही है। पत्रकारों के आरोपों के बाद मामला इसलिए भी गंभीर हो गया है क्योंकि यह पूरा घटनाक्रम एक मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के आसपास वीवीआईपी सुरक्षा व्यवस्था के दौरान हुआ।
दोनों महिला पत्रकारों ने आरोप लगाया कि वह मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के कार्यक्रम की कवरेज के लिए साकेत पहुंची थीं। इसी दौरान पुलिस के साथ उनका विवाद हुआ और स्थिति बिगड़ गई। पत्रकारों का दावा है कि पुलिस ने उनके साथ कथित तौर पर मारपीट की और उन्हें हिरासत में ले लिया। महिला पत्रकारों द्वारा लगाए गए आरोपों ने दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर यह सवाल कि क्या पत्रकारों को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया गया और यदि किया गया तो उसकी जरूरत और वैधानिक आधार क्या था? दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस ने पत्रकारों के आरोपों को खारिज किया है। पुलिस का कहना है कि दोनों पत्रकारों को उनके पत्रकार होने या सवाल पूछने के कारण हिरासत में नहीं लिया गया।
पुलिस के मुताबिक दोनों ने कथित तौर पर निकास मार्ग को बाधित किया और वीवीआईपी मूवमेंट रूट पर अपनी स्कूटी खड़ी कर दी। मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों द्वारा हटने को कहे जाने के दौरान कथित तौर पर दोनों की पुलिसकर्मियों से कहासुनी भी हुई। पुलिस का तर्क है कि वीवीआईपी सुरक्षा व्यवस्था के दौरान निर्धारित रूट पर किसी भी तरह का अवरोध सुरक्षा के लिहाज से गंभीर माना जाता है। इसी वजह से दोनों पत्रकारों को हिरासत में लिया गया। यदि पुलिस का पक्ष सही है और पत्रकारों ने वीवीआईपी रूट बाधित किया था, तो उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए कानून और निर्धारित प्रक्रिया मौजूद है। लेकिन दूसरी तरफ यदि पत्रकारों के साथ हिरासत के दौरान मारपीट या बदसलूकी हुई है, तो यह मामला केवल एक सामान्य विवाद नहीं रह जाता।
हिरासत में लिए गए व्यक्ति के साथ पुलिस का व्यवहार कानून के दायरे में होना चाहिएकृचाहे वह पत्रकार हो या आम नागरिक। यही वजह है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच जरूरी हो गई है। क्या स्कूटी से निकास मार्ग बाधित हुआ था और मौके की सीसीटीवी फुटेज क्या कहती है? क्या पत्रकारों ने पुलिस निर्देशों का पालन करने से इनकार किया या स्थिति किसी अन्य कारण से बिगड़ी? यदि पत्रकारों के साथ मारपीट का आरोप है तो मेडिकल रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज और मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों के बाडी-कैमरा/वीडियो रिकार्ड जैसे साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे।
वीवीआईपी कार्यक्रमों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी होना स्वाभाविक है। पुलिस के लिए हर संदिग्ध गतिविधि और अवरोध को नियंत्रित करना जिम्मेदारी का हिस्सा है। लेकिन दूसरी ओर लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने और सवाल पूछने की स्वतंत्रता भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में दोनों पक्षों के दावों के बीच सबसे निर्णायक भूमिका सबूतों की होगी। यदि पत्रकारों ने सुरक्षा व्यवस्था में बाधा डाली थी तो उसका प्रमाण सामने आना चाहिए। यदि पुलिस ने अपनी शक्ति का कथित तौर पर दुरुपयोग किया तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
साकेत की यह घटना एक बड़े सवाल को जन्म देती हैकृक्या वीवीआईपी सुरक्षा और पत्रकारिता की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम करने में पुलिस नाकाम हो रही है? पत्रकारों के आरोप सही हैं तो मामला गंभीर है। पुलिस का पक्ष सही है तो उसे भी रिकार्ड और साक्ष्यों के साथ स्पष्ट किया जाना चाहिए। क्योंकि खाकी की ताकत कानून से आती है और पत्रकार की ताकत सवाल पूछने के अधिकार से। दोनों के बीच टकराव में सच दबना नहीं चाहिए।
शुद्धिकरण विवाद के बीच ‘शक्ति प्रदर्शन’
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का दो दिवसीय दौरा तय, सियासी पारा भी चढ़ा
खड़गे के चुनावी बिगुल के बाद अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संभालेंगे हल्द्वानी में मोर्चा
शुद्धिकरण कांड पर जारी रार के बीच भाजपा की कार्यसमिति बैठक से तय होगी रणनीति
हल्द्वानी। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की हल्द्वानी रैली के बाद रामलीला मैदान में कथित शुद्धिकरण को लेकर छिड़ा सियासी संग्राम अब नए दौर में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है, जिस हल्द्वानी में कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की सभा के जरिए चुनावी बिगुल फूंकने की कोशिश की थी, उसी हल्द्वानी में अब भाजपा अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के जरिए संगठनात्मक ताकत का प्रदर्शन करने जा रही है। नबीन 9 सितंबर को हल्द्वानी पहुंचेंगे और दो दिवसीय दौरे के दौरान भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में हिस्सा लेंगे। पार्टी की इस अहम बैठक को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन इस बार हल्द्वानी में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति महज एक संगठनात्मक बैठक नहीं होगी। इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। वजह साफ हैकृखड़गे की सभा, उसके बाद कथित शुद्धिकरण और उस पर कांग्रेस के लगातार हमले।
कांग्रेस इस पूरे घटनाक्रम को दलित सम्मान और संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर भाजपा पर निशाना साध रही है। खड़गे ने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र लिखकर कथित शुद्धिकरण मामले में कार्रवाई और एफआईआर की मांग तक की है। कांग्रेस का आरोप है कि संसद में कार्रवाई के आश्वासन के बावजूद मामले में अपेक्षित कदम नहीं उठाया गया। भाजपा दूसरी तरफ इस विवाद को कांग्रेस के राजनीतिक नैरेटिव के रूप में देख रही है। पार्टी का कहना है कि नबीन का दौरा संगठनात्मक गतिविधियों और विभिन्न सम्मेलनों से जुड़ा है। लेकिन राजनीति में समय और स्थान अक्सर अपने आप में संदेश बन जाते हैं। ऐसे में खड़गे के दौरे के बाद नबीन का हल्द्वानी आना भाजपा के लिए भी एक राजनीतिक अवसर बन गया है।
हल्द्वानी और कुमाऊं की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के लिए हल्द्वानी को चुनकर अपने कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने का संदेश दे सकती है। बैठक में बूथ स्तर तक संगठन की सक्रियता, आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति, केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने और विपक्ष के आरोपों का राजनीतिक जवाब देने जैसे मुद्दे प्रमुख रह सकते हैं। भाजपा के लिए चुनौती केवल कांग्रेस का मुकाबला करना नहीं है। उसे कुमाऊं में अपने संगठन की पकड़ को और मजबूत करते हुए उन मुद्दों पर भी जवाब देना होगा, जिन पर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है।
हल्द्वानी का विवाद अब केवल रामलीला मैदान तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है। खड़गे ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कार्रवाई की मांग की है। राहुल गांधी की ओर से भी इस मुद्दे पर कार्रवाई की मांग किए जाने की रिपोर्टें सामने आई हैं। यही कारण है कि नबीन का हल्द्वानी दौरा भाजपा के लिए असहज सवालों से बचने के बजाय अपने राजनीतिक एजेंडे को सामने रखने का मौका भी हो सकता है। सवाल यह भी रहेगा कि क्या भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व इस विवाद पर कोई स्पष्ट राजनीतिक संदेश देता है? क्या संगठन इस मुद्दे को शांत करने की कोशिश करेगा या कांग्रेस के आरोपों का आक्रामक जवाब देगा?
उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर दिखाई देता है, लेकिन दोनों प्रमुख दलों ने राजनीतिक तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के दौरों के जरिए कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा करने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा संगठनात्मक बैठकों और चुनावी रणनीति के जरिए अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में हल्द्वानी अब सिर्फ कुमाऊं का राजनीतिक केंद्र नहीं रह गया है। यह 2027 की चुनावी प्रयोगशाला बनता जा रहा है। खड़गे की सभा से कांग्रेस ने संदेश दिया कि वह भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रामक मोर्चा खोलने जा रही है। अब नबीन की मौजूदगी में भाजपा का जवाब होगाकृसंगठन, सरकार और चुनावी रणनीति के साथ मैदान में उतरने का।
हल्द्वानी में नेताओं के आने-जाने और मंचों पर भाषणों से कहीं बड़ी परीक्षा दोनों दलों के जमीनी संगठन की है। 2027 में पहाड़ से लेकर मैदान तक मुद्दों की लंबी फेहरिस्त होगीकृरोजगार, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई और स्थानीय अस्मिता से लेकर कानून-व्यवस्था तक। इसलिए नबीन की बैठक का असली अर्थ मंच से दिए जाने वाले भाषणों में नहीं, बल्कि बैठक के बाद भाजपा की बूथ से लेकर विधानसभा स्तर तक की रणनीति में दिखाई देगा। फिलहाल इतना तय है कि खड़गे की हल्द्वानी रैली से उठी राजनीतिक चिंगारी अभी बुझी नहीं है। शुद्धिकरण विवाद ने इसे और हवा दे दी है। अब उसी हल्द्वानी में भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व पहुंच रहा है। खड़गे ने जहां सवाल खड़े किए थे, वहां नबीन संगठन की ताकत दिखाएंगे और इसी के साथ हल्द्वानी में 2027 की चुनावी लड़ाई का एक और अध्याय खुलता दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक डैमेज कंट्रोल की ‘अग्निपरीक्षा’
शुद्धिकरण’ पर घिरी भाजपा, कांग्रेस का तंजकृमाफी मांगने हल्द्वानी आ रहे नितिन नबीन
नबीन के दौरे से गरमाई सियासत, कांग्रेस बोलीकृखड़गे के अपमान का जवाब दे भाजपा
हल्द्वानी बनेगा भाजपा और कांग्रेस के राजनीतिक संदेशों और जवाबी नैरेटिव का बड़ा मंच
देहरादून। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की हल्द्वानी रैली के बाद रामलीला मैदान में कथित शुद्धिकरण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के हल्द्वानी दौरे से और गरमा गया है। नबीन के प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में शामिल होने के लिए हल्द्वानी पहुंचने से पहले कांग्रेस ने भाजपा पर सीधा राजनीतिक हमला बोल दिया है। कांग्रेस ने तंज कसते हुए कहा है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हल्द्वानी में शुद्धिकरण विवाद पर माफी मांगने आ रहे हैं। हालांकि भाजपा की ओर से नबीन के दौरे को संगठनात्मक कार्यक्रम बताया जा रहा है और उनके दौरे को माफी से जोड़ने की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन कांग्रेस ने जिस तरह नबीन के दौरे को विवाद से जोड़ दिया है, उससे साफ है कि हल्द्वानी में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति अब सिर्फ संगठन की बैठक नहीं रहने वाली। यह बैठक राजनीतिक संदेशों और जवाबी नैरेटिव का बड़ा मंच बन सकती है।
खड़गे की हल्द्वानी सभा के बाद रामलीला मैदान में कथित शुद्धिकरण को लेकर विवाद ने कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का मौका दे दिया। कांग्रेस ने इसे दलित सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ते हुए भाजपा को कठघरे में खड़ा किया है। कांग्रेस का आरोप है कि देश की सबसे पुरानी पार्टियों में से एक के राष्ट्रीय अध्यक्ष और दलित समाज से आने वाले वरिष्ठ नेता की सभा के बाद इस तरह की कार्रवाई का कथित तौर पर होना बेहद गंभीर है। अब कांग्रेस इसी मुद्दे को लेकर नबीन के हल्द्वानी दौरे पर सवाल खड़े कर रही है।
कांग्रेस का कहना है कि भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष को पहले इस पूरे घटनाक्रम पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। पार्टी नेताओं का दावा है कि यदि भाजपा इसे गलत मानती है तो उसे सार्वजनिक रूप से इसकी निंदा करनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए। नबीन का हल्द्वानी दौरा ऐसे समय हो रहा है जब उत्तराखंड की राजनीति धीरे-धीरे 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है। प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में संगठन को चुनावी मोड में लाने, बूथ स्तर पर तैयारियों और विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की रणनीति पर मंथन की उम्मीद है। लेकिन कांग्रेस ने पहले ही बैठक के राजनीतिक एजेंडे में शुद्धिकरण विवाद को शामिल कर दिया है। यानी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने चुनौती सिर्फ कार्यकर्ताओं को चुनावी संदेश देने की नहीं होगी। कांग्रेस के हमले का जवाब देना भी राजनीतिक मजबूरी बन सकता है।
यदि भाजपा इस मुद्दे पर चुप रहती है तो कांग्रेस इसे माफी से बचने के रूप में प्रचारित कर सकती है। यदि राष्ट्रीय नेतृत्व इस विवाद पर कोई टिप्पणी करता है तो मामला और राष्ट्रीय सुर्खियों में आ सकता है। कांग्रेस के लिए यह विवाद महज एक स्थानीय घटना नहीं है। पार्टी इसे भाजपा की विचारधारा, सामाजिक समरसता और संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। खड़गे के हल्द्वानी दौरे को कांग्रेस पहले ही कुमाऊं में अपने संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के अभियान के रूप में देख रही थी। अब शुद्धिकरण विवाद ने उसे भाजपा पर हमला करने के लिए एक अतिरिक्त मुद्दा दे दिया है। कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही हैकृखड़गे के कथित अपमान को 2027 के चुनावी विमर्श से जोड़ना।
भाजपा की ओर से नबीन का दौरा संगठनात्मक गतिविधियों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। प्रदेश कार्यसमिति में आगामी चुनाव को लेकर संगठन की दिशा तय होगी। सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने और विपक्ष के आरोपों का राजनीतिक जवाब देने की रणनीति पर भी चर्चा संभव है। लेकिन कांग्रेस ने नबीन के हल्द्वानी पहुंचने से पहले ही सवाल खड़ा कर दिया हैकृकि क्या राष्ट्रीय अध्यक्ष सिर्फ संगठन की बैठक करने आ रहे हैं या शुद्धिकरण विवाद पर भाजपा का रुख भी स्पष्ट करेंगे? यही सवाल अब हल्द्वानी की सियासत के केंद्र में है।
कांग्रेस के लिए राजनीतिक गणित भी दिलचस्प है। यदि भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष इस विवाद पर खेद या माफी जैसा कोई बयान देते हैं तो कांग्रेस इसे अपनी राजनीतिक जीत के रूप में पेश कर सकती है। दूसरी तरफ यदि भाजपा इसे विपक्ष की राजनीतिक साजिश बताकर खारिज करती है तो कांग्रेस हमले को और तेज कर सकती है। इसलिए नबीन का हल्द्वानी दौरा भाजपा के लिए संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन के साथ-साथ राजनीतिक डैमेज कंट्रोल की परीक्षा भी बनता दिखाई दे रहा है। हल्द्वानी में खड़गे आए थे तो कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोला था। अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उसी शहर में आ रहे हैं। मंच भाजपा का होगा, लेकिन कांग्रेस ने सवाल पहले ही उछाल दिया हैकृशुद्धिकरण पर जवाब कब?
उत्तराखंड की 2027 की चुनावी लड़ाई में यह विवाद कितना बड़ा मुद्दा बनता है, इसका फैसला आने वाले दिनों में होगा। फिलहाल इतना जरूर है कि हल्द्वानी की सियासत में खड़गे के बाद नबीन की एंट्री ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है।
चुनावी दहलीज पर ‘उबला’ उत्तराखंड
कांग्रेसी मुख्यमंत्री आवास का घेराव कर दिखाएगी आर-पार का दम
दलित सम्मान के मुद्दे पर सरकार की चुप्पी को कांग्रेस ने बनाया ढाल
कांग्रेस पार्टी ने जांच व एफआईआर की मांग पर प्रदेश सरकार को घेरा
देहरादून। हल्द्वानी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद कथित शुद्धिकरण को लेकर शुरू हुआ विवाद थमने के बजाय अब उत्तराखंड की सियासत के केंद्र में पहुंच गया है। कांग्रेस ने मामले में कार्रवाई की मांग को लेकर 7 सितंबर को मुख्यमंत्री आवास कूच का ऐलान कर दिया है। वहीं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई न किया जाना इस बात का प्रमाण है कि सरकार का संबंधित धार्मिक संगठन के साथ कहीं न कहीं गठजोड़ है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के इस बयान ने विवाद को और राजनीतिक रंग दे दिया है। गोदियाल का कहना है कि यदि सरकार इस पूरे मामले को गंभीरता से लेती तो अब तक जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो चुकी होती। लेकिन सरकार की चुप्पी और कार्रवाई का अभाव कई सवाल खड़े कर रहा है।
गोदियाल ने सवाल उठाया कि सार्वजनिक स्थल पर आयोजित राजनीतिक कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण जैसी गतिविधि को लेकर शिकायतें सामने आने के बावजूद सरकार कार्रवाई से पीछे क्यों हट रही है। कांग्रेस का आरोप है कि मामला केवल एक मैदान में पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान का नहीं है। सवाल यह है कि क्या किसी राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सभा के बाद उस स्थल को अपवित्र मानकर शुद्धिकरण किया जाना सामाजिक और राजनीतिक रूप से स्वीकार्य है? कांग्रेस इसी सवाल को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ाने की तैयारी में है। गोदियाल ने आरोप लगाया कि सरकार अगर निष्पक्ष है तो उसे बिना किसी दबाव के पूरे मामले की जांच करानी चाहिए और जो भी दोषी हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।
कांग्रेस ने अब इस मुद्दे को विधानसभा और पार्टी कार्यालयों की बयानबाजी से निकालकर सड़क पर ले जाने का फैसला किया है। पार्टी ने 7 सितंबर को मुख्यमंत्री आवास कूच का आह्वान किया है। पार्टी की कोशिश है कि हल्द्वानी के विवाद को केवल स्थानीय घटना न रहने दिया जाए, बल्कि इसे सामाजिक सम्मान, संविधान और सरकार की जवाबदेही के बड़े मुद्दे के रूप में जनता के सामने रखा जाए। कांग्रेस के लिए यह आंदोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को आक्रामक मोड में लाने की कोशिश कर रही है।
विवाद अब सीधे भाजपा सरकार की जवाबदेही से जुड़ गया है। कांग्रेस लगातार पूछ रही है कि आखिर सरकार ने कथित शुद्धिकरण मामले में क्या कार्रवाई की? क्या पूरे घटनाक्रम की जांच हुई? जिम्मेदार लोगों की पहचान हुई या नहीं? और अगर पहचान हुई तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह कांग्रेस के आरोपों को सिर्फ राजनीतिक बयान बताकर खारिज करे या पूरे मामले पर अपना स्पष्ट पक्ष सामने रखे। क्योंकि कांग्रेस ने अब एक ऐसा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब केवल हल्द्वानी तक सीमित नहीं रहेगा।
खड़गे की हल्द्वानी रैली के बाद शुरू हुआ विवाद अब कुमाऊं से निकलकर देहरादून पहुंच चुका है। कांग्रेस मुख्यमंत्री आवास कूच के जरिए सीधे सरकार के दरवाजे पर दस्तक देने जा रही है। दिलचस्प यह है कि इसी बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के हल्द्वानी दौरे और प्रदेश कार्यसमिति की बैठक को लेकर भी राजनीतिक हलचल तेज है। ऐसे में कांग्रेस का आंदोलन और भाजपा का संगठनात्मक कार्यक्रम एक-दूसरे के समानांतर राजनीतिक संदेश देने की स्थिति बना रहे हैं।
कांग्रेस जहां शुद्धिकरण विवाद को सामाजिक सम्मान और संवैधानिक मूल्यों से जोड़ रही है, वहीं भाजपा के सामने संगठन को चुनावी रूप से मजबूत करने के साथ विपक्ष के हमलों का जवाब देने की चुनौती है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। ऐसे में हल्द्वानी का विवाद कांग्रेस के लिए भाजपा को घेरने का नया हथियार बन गया है। कांग्रेस की रणनीति साफ हैकृरामलीला मैदान से उठे सवाल को मुख्यमंत्री आवास तक ले जाना। अब देखना यह है कि 7 सितंबर को कांग्रेस का आंदोलन कितना बड़ा रूप लेता है और सरकार इस पूरे विवाद पर क्या रुख अपनाती है। फिलहाल हल्द्वानी का रामलीला मैदान उत्तराखंड की राजनीति का नया अखाड़ा बन चुका है।
एक तरफ कांग्रेस कार्रवाई की मांग को लेकर सड़क पर उतरने की तैयारी में है, दूसरी तरफ भाजपा संगठनात्मक ताकत के साथ मैदान में उतर रही है और इस पूरे राजनीतिक टकराव के बीच सबसे बड़ा सवाल वही हैकृ शुद्धिकरण किसका हुआ और अब सरकार की चुप्पी किस चीज को साफ कर रही है?
गुरुवार, 3 सितंबर 2026
udaydinmaan: ‘शुद्धिकरण’ पर हाईकोर्ट का चाबुक !
udaydinmaan: ‘शुद्धिकरण’ पर हाईकोर्ट का चाबुक !: हल्द्वानी रामलीला मैदान शुद्धिकरण कांड रामलीला मैदान के शुद्धिकरण पर हाईकोर्ट की चौखट पर डा. बैजनाथ, सात सितंबर को होगी सुनवाई डा.बैजनाथ ने ...
‘शुद्धिकरण’ पर हाईकोर्ट का चाबुक !
हल्द्वानी रामलीला मैदान शुद्धिकरण कांड
रामलीला मैदान के शुद्धिकरण पर हाईकोर्ट की चौखट पर डा. बैजनाथ, सात सितंबर को होगी सुनवाई
डा.बैजनाथ ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद कथित शुद्धिकरण यज्ञ को दी हाईकोर्ट में चुनौती
स्वतंत्र जांच से लेकर साक्ष्य सुरक्षित रखने की मांग, पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में
सत्ता के नशे में चूर नेताओं की शह, खाकी की संदिग्ध खामोशी और प्रशासनिक लीपापोती का भांडाफोड़
जनहित याचिका ने पूरी व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी, कुर्सी बचाने में जुटे सूबे के आला अफसर
देहरादून। हल्द्वानी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में शुद्धिकरण और हवन-यज्ञ के नाम पर परोसे गए नफरती खेल की आंच अब सीधे उत्तराखंड हाईकोर्ट के दरवाजे तक जा पहुंची है। सत्ता के नशे में चूर नेताओं की शह, खाकी की संदिग्ध खामोशी और प्रशासनिक लीपापोती का भांडाफोड़ करते हुए जनहित याचिका ने पूरी व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। सात सितंबर को होने जा रही सुनवाई से पहले शासन-प्रशासन के शीर्ष आकाओं की नींद उड़ चुकी है और पूरे महकमे में हड़कंप मचा हुआ है।
बता दें कि हल्द्वानी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा के बाद कथित तौर पर कराए गए शुद्धिकरण यज्ञ/हवन का विवाद अब उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है। मामले में डा. बैजनाथ ने जनहित याचिका दायर कर पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की है। याचिका पर 7 सितंबर को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई प्रस्तावित है। ई-कोर्ट रिकार्ड के अनुसार मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति जस्टिस सुभाष उपाध्याय की डिवीजन बेंच के समक्ष सूचीबद्ध है। डा. बैजनाथ की ओर से अधिवक्ता रक्षित जोशी पैरवी कर रहे हैं।
याचिका में अदालत से मांग की गई है कि खड़गे की सभा के बाद रामलीला मैदान में हुए कथित शुद्धिकरण यज्ञ/हवन की जांच स्थानीय थाने से जुड़े पुलिसकर्मियों के बजाय किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या ऐसी स्वतंत्र टीम से कराई जाए, जिसका स्थानीय पुलिस स्टेशन से संबंध न हो। यानी याचिका ने सीधे उस सवाल को अदालत के सामने ला खड़ा किया है कि आखिर सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रम के बाद शुद्धिकरण कराने की जरूरत क्यों पड़ी और इस पूरी कवायद के पीछे वास्तविक मंशा क्या थी?
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि याचिका में जांच के दौरान यदि कानूनन अपराध के तत्व सामने आते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनों के तहत कार्रवाई की मांग की गई है। डा. बैजनाथ की याचिका में अदालत से घटनाक्रम से जुड़े तमाम साक्ष्यों को तत्काल सुरक्षित रखने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। इसमें सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकार्डिंग, फोटो, इलेक्ट्रानिक संचार, सोशल मीडिया सामग्री, पुलिस रिकार्ड, शिकायतें, रिपोर्ट, अनुमति संबंधी दस्तावेज और अन्य इलेक्ट्रानिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य शामिल हैं।
यह मांग मामले को महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे ले जाती है। अब सवाल यह भी है कि घटना के समय क्या रिकार्ड हुआ, किसने क्या किया, प्रशासन और पुलिस को क्या जानकारी थी और बाद में पूरे घटनाक्रम पर क्या कार्रवाई हुई। याचिका में राज्य सरकार के साथ जिलाधिकारी, नैनीताल, एसएसपी नैनीताल, पुलिस महानिदेशक और संबंधित थाना प्रभारी को भी प्रतिवादी बनाया गया है। इससे साफ है कि याचिकाकर्ता केवल घटना की जांच नहीं, बल्कि प्रशासन और पुलिस की भूमिका की भी न्यायिक निगरानी में पड़ताल चाहता है।
याचिका का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पक्ष यह है कि राज्य सरकार को उत्तराखंड में छुआछूत के संवैधानिक निषेध को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश देने की मांग की गई है। इसके साथ ही राज्य के दायित्वों के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग भी अदालत से की गई है। यानी हल्द्वानी का यह विवाद अब केवल किसने हवन कराया और क्यों कराया तक सीमित नहीं है। याचिका ने इसे समानता, सामाजिक सम्मान और छुआछूत के खिलाफ संवैधानिक व्यवस्था के सवाल से जोड़ दिया है।
रामलीला मैदान में सामाजिक सौहार्द को तार-तार करने वाले इस विवादित घटनाक्रम पर अब तक पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना तमाशा देख रहा था। नेताओं की चौखट पर नतमस्तक पुलिस जिस मामले में एफआईआर तक दर्ज करने से कतरा रही थी, उसी मामले को डा. बैजनाथ की याचिका ने सीधे हाईकोर्ट की चौखट पर खींच लिया है। याचिका ने साफ कर दिया है कि हल्द्वानी में कानून-व्यवस्था का जनाजा ऐसे ही नहीं निकला, बल्कि इसके पीछे नीचे से लेकर ऊपर तक प्रशासनिक नाकामी का पूरा तंत्र शामिल था। याचिका का प्रहार इतना सटीक और मारक है कि इसमें किसी छोटे कर्मचारी को बलि का बकरा बनाने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी गई है। सत्ता और पुलिस प्रशासन के पांच सबसे बड़े आकाओं को एक साथ कटघरे में खड़ा कर दिया गया है।
हाईकोर्ट के ई-कोर्ट रिकार्ड के मुताबिक याचिका दर्ज हो चुकी है। याचिका दाखिल होते ही जिस बुलेट ट्रेन की रफ्तार से इसका रजिस्ट्रेशन हुआ है, उससे साफ है कि अदालत इस प्रशासनिक लापरवाही को बख्शने के मूड में बिल्कुल नहीं है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की डिवीजन बेंच करने जा रही है। सात सितंबर को हाईकोर्ट की बेंच ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए आला अफसरों से हलफनामा मांगा है। इससे कई बड़े अधिकारियों का नपना तय माना जा रहा है।
बता दें कि रामलीला मैदान विवाद में अब तक पर्दे के पीछे बैठकर तमाशा देखने वाले अफसरों के पास अब भागने का कोई रास्ता नहीं बचा है। पूरे उत्तराखंड की निगाहें अब 7 सितंबर को होने वाले न्यायिक प्रहार पर टिकी हैं। कि क्या हाईकोर्ट राज्य सरकार और पुलिस के शीर्ष आकाओं को समन भेजकर निजी रूप से तलब करेगा? क्या सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वालों और उन्हें संरक्षण देने वाले अफसरों पर सख्त कार्रवाई का चाबुक चलेगा?
हल्द्वानी के रामलीला मैदान से उठा यह बवंडर अब प्रशासनिक दफ्तरों को उखाड़ फेंकने के लिए हाईकोर्ट पहुंच चुका है। 7 सितंबर को यह तय हो जाएगा कि कानून का राज चलेगा या फिर खाकी और खादी की जुगलबंदी यूं ही कानून की धज्जियां उड़ाती रहेगी।
चुनावी गणित में ‘मोदी फैक्टर’
मोदी के जन्मदिन पर भाजपा का मेगा प्लान, सेवा के बहाने चुनावी जमीन मजबूत करने की तैयारी
17 सितंबर से महीनेभर चलेगा जनसंपर्क अभियान, वडनगर-वाराणसी यात्रा से कार्यकर्ताओं में भरेंगे जोश
देहरादून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर को भाजपा इस बार सिर्फ उत्सव तक सीमित रखने के बजाय इसे बड़े राजनीतिक और संगठनात्मक अभियान में बदलने की तैयारी में है। पार्टी देशभर में सेवा संकल्प अभियान के जरिए जनसंपर्क बढ़ाने के साथ सरकार की योजनाओं और मोदी सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने की कवायद करेगी। अभियान का सिलसिला सितंबर से अक्टूबर तक चलने की तैयारी है। राजनीतिक रूप से इस अभियान की टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण है। अगले विधानसभा चुनावों की तैयारियां तेज होने के बीच भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने और लाभार्थियों से दोबारा संपर्क साधने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री के जन्मदिन को पार्टी ने सेवा से संगठन और संगठन से चुनाव की रणनीति के लिए बड़े अवसर के रूप में लिया है।
भाजपा की योजना 17 सितंबर से व्यापक जनसंपर्क अभियान शुरू करने की है। इस दौरान स्वच्छता अभियान, रक्तदान, स्वास्थ्य शिविर, पौधरोपण, सेवा कार्यक्रम, लाभार्थी संपर्क और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के जरिए कार्यकर्ताओं को जनता के बीच पहुंचाने की तैयारी है। पार्टी की यह कवायद प्रधानमंत्री मोदी के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन से भी जोड़ी जा रही है। यानी भाजपा का संदेश साफ हैकृमोदी का जन्मदिन केवल मोदी के व्यक्तित्व का उत्सव नहीं, बल्कि संगठन की सक्रियता का राष्ट्रीय अभियान बने। इस अभियान का सबसे चर्चित हिस्सा वडनगर से वाराणसी तक प्रस्तावित जनसंपर्क यात्रा है। गुजरात का वडनगर प्रधानमंत्री मोदी की जन्मस्थली है, जबकि वाराणसी उनका लोकसभा क्षेत्र है। योजना के मुताबिक दोनों दिशाओं से टीमें निकलकर जनसंपर्क करेंगी और यात्रा को एक महीने तक चलाने की तैयारी है। राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट हैकृमोदी की राजनीतिक यात्रा को संगठन की जमीनी यात्रा से जोड़ना।
यात्रा के जरिए भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आम लोगों तक सरकार की उपलब्धियां पहुंचाने और संगठन की मौजूदगी मजबूत करने का प्रयास करेगी। खास बात यह है कि अगले साल होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा के लिए यह अभियान कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने का भी माध्यम बन सकता है। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय मुद्दों और सरकार के प्रदर्शन के साथ अपने सबसे बड़े राजनीतिक चेहरे यानी प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को जोड़ना है। पार्टी पहले भी विधानसभा चुनावों में मोदी की छवि, केंद्र सरकार की योजनाओं और संगठन की बूथ मशीनरी को एक साथ इस्तेमाल करती रही है। इस बार भी रणनीति कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है। सेवा कार्यक्रमों के जरिए सामाजिक संपर्क, लाभार्थी संपर्क के जरिए योजनाओं का प्रचार और मोदी के नेतृत्व के जरिए व्यापक राजनीतिक संदेशकृइन तीनों को एक साथ जोड़ने की कोशिश होगी।
भाजपा के सामने चुनौती यह भी है कि केवल मोदी के नाम पर चुनावी माहौल तैयार करने के बजाय स्थानीय नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों को भी साथ लेकर चला जाए। यही वजह है कि सेवा अभियान में केंद्रीय नेतृत्व के संदेश के साथ प्रदेश और जिला स्तर के संगठन को भी बड़ी भूमिका देने की तैयारी है। भाजपा के लिए यह अभियान सिर्फ जनता से संपर्क का कार्यक्रम नहीं है। इसे संगठन की ताकत परखने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है। कौन सा बूथ कितना सक्रिय है, कितने कार्यकर्ता मैदान में उतरते हैं, लाभार्थियों तक संगठन की पहुंच कितनी है और सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक पार्टी का संदेश कितनी तेजी से पहुंचता हैकृअभियान इन सभी मोर्चों पर संगठन को परखने का अवसर देगा। यही वजह है कि भाजपा का यह मेगा प्लान विपक्ष के लिए भी राजनीतिक संकेत है। कांग्रेस समेत अन्य दलों को अब अपनी चुनावी रणनीति और संगठनात्मक सक्रियता बढ़ानी होगी।
भाजपा की राजनीति में सेवा कार्यक्रम नए नहीं हैं। लेकिन चुनाव से पहले ऐसे अभियानों की राजनीतिक अहमियत बढ़ जाती है। प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन को केंद्र में रखकर देशव्यापी कार्यक्रम और जनसंपर्क अभियान पार्टी को एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने का अवसर देगा। पहलाकृमोदी का नेतृत्व अभी भी भाजपा की सबसे बड़ी चुनावी पूंजी है। दूसराकृभाजपा का संगठन चुनाव से काफी पहले मैदान में उतर चुका है और तीसराकृपार्टी सरकार की योजनाओं को सीधे लाभार्थियों और आम मतदाताओं तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है।
अब देखना होगा कि सेवा संकल्प का यह मेगा अभियान भाजपा के लिए कितनी राजनीतिक जमीन तैयार करता है। क्योंकि चुनावी राजनीति में केवल भीड़ जुटाना पर्याप्त नहीं होता, असली परीक्षा बूथ पर होती है। भाजपा ने फिलहाल अपना अभियान शुरू करने का संकेत दे दिया है। 17 सितंबर से सेवा के मंच पर शुरू होने वाला यह अभियान आने वाले विधानसभा चुनावों की चुनावी पटकथा का पहला बड़ा अध्याय बन सकता है।
पोस्टर बने गुटबाजी का ‘अखाड़ा’
अपने ही नेताओं के पोस्टर फाड़ रहे कांग्रेस नेता
चुनाव से पहले घर की लड़ाई आ गई सड़कों पर
भीतर सब कुछ ठीक होने के दावों पर उठे सवाल
देहरादून। चुनावी तैयारियों के बीच कांग्रेस जिस एकजुटता का दावा कर रही है, जमीन पर तस्वीर उससे अलग दिखाई देने लगी है। पार्टी के भीतर खींचतान और गुटबाजी अब बंद कमरों से निकलकर सड़कों तक पहुंचती नजर आ रही है। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि कुछ कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अपने ही पार्टी नेताओं के पोस्टर फाड़ दिए।
पोस्टर फाड़े जाने की घटना को महज राजनीतिक नाराजगी मानकर नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा। क्योंकि चुनावी मौसम में पोस्टर केवल प्रचार सामग्री नहीं होते, बल्कि पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन और स्वीकार्यता का भी संकेत देते हैं। जब कार्यकर्ता विपक्षी दल के पोस्टर हटाने के बजाय अपने ही नेताओं के पोस्टर फाड़ने लगें तो सवाल संगठन की एकजुटता पर ही उठता है।
कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी के आरोपों से जूझती रही है। प्रदेश स्तर पर अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने समर्थक हैं और राजनीतिक कार्यक्रमों में भी कई बार शक्ति प्रदर्शन की तस्वीर सामने आती रही है। अब पोस्टर विवाद ने इस अंदरूनी खींचतान को और खुलकर सामने ला दिया है। पार्टी नेतृत्व भले ही इसे स्थानीय विवाद बताकर किनारा करे, लेकिन चुनाव से पहले ऐसी घटनाएं कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकती हैं। कार्यकर्ताओं का संदेश यदि यह जाता है कि पार्टी अपने ही नेताओं को लेकर एकमत नहीं है, तो उसका सीधा असर चुनावी अभियान पर पड़ सकता है।
भाजपा के लिए कांग्रेस की अंदरूनी कलह किसी राजनीतिक अवसर से कम नहीं है। भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर नेतृत्व संकट और गुटबाजी का आरोप लगाती रही है। अब अपने नेताओं के पोस्टर फाड़े जाने की घटना विपक्ष को कांग्रेस पर हमला करने के लिए नया मुद्दा दे सकती है। कांग्रेस के सामने असली चुनौती केवल पोस्टर विवाद को रोकने की नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के भीतर पैदा हो रही नाराजगी को संभालने की है। चुनाव केवल बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं जीते जाते। बूथ पर वही कार्यकर्ता पार्टी का झंडा लेकर खड़ा होता है, जिसे नेतृत्व पर भरोसा हो।
राजनीतिक हलकों में इस तरह के विवादों को आगामी विधानसभा चुनाव की टिकट राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। चुनाव नजदीक आते ही दावेदारों की संख्या बढ़ती है और नेताओं के बीच प्रभाव क्षेत्र को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज होती है। ऐसे में पोस्टर, बैनर और कार्यक्रमों में चेहरे को लेकर विवाद कई बार अंदरूनी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाते हैं। यदि यही स्थिति आगे बढ़ी तो कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती होगीकृएक तरफ भाजपा का चुनावी संगठन और दूसरी तरफ अपने ही खेमों को एक मंच पर लाने की चुनौती।
पोस्टर फाड़ने की राजनीति देखने में छोटी घटना लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश बड़ा है। चुनाव से पहले किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे जरूरी उसकी एकजुटता की छवि होती है। जनता के सामने यदि पार्टी अपने ही नेताओं को लेकर बंटी दिखाई दे तो विपक्ष को हमला करने का मौका मिलता है और कार्यकर्ताओं का उत्साह भी प्रभावित होता है। कांग्रेस को अब तय करना होगा कि वह इस विवाद को स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी मानकर छोड़ती है या इसके पीछे मौजूद असंतोष की तह तक जाती है। क्योंकि विपक्ष के पोस्टर फाड़ना राजनीतिक संघर्ष है, लेकिन अपने ही नेताओं के पोस्टर फाड़ना संगठन के भीतर चल रहे संघर्ष का संकेत।
चुनाव की लड़ाई अभी शुरू भी नहीं हुई और कांग्रेस के भीतर पोस्टर ही आपसी मुकाबले का मैदान बनने लगे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही हैकृकांग्रेस भाजपा से लड़ेगी या पहले अपने घर की लड़ाई खत्म करेगी?
रणनीतिक ‘खामोशी’ के पीछे सुलग रही ‘सियासत’
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर मुकदमे दर्ज होने से देश में बड़े राजनीतिक टकराव के हैं आसार
कांग्रेस का आरोपकृमुकदमा राजनीतिक प्रतिशोध,भाजपा का जवाबकृकानून के दायरे से कोई ऊपर नहीं
सड़क से अदालत तक लड़ाई के संकेत, कांग्रेस के सामने चुनौतीकृकानूनी मोर्चे को राजनीतिक मुद्दा कैसे बनाए
देहरादून। कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जुड़े मुकदमे को लेकर प्रदेश कांग्रेस फिलहाल सार्वजनिक तौर पर भले ही संयम बरत रही हो, लेकिन पार्टी के भीतर नाराजगी कम नहीं है। कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का मानना है कि राजनीतिक मुद्दों पर लगातार मुखर रहने वाले राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज मुकदमे को केवल कानूनी प्रक्रिया मानकर चुप बैठना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। यही वजह है कि आने वाले दिनों में यह मामला राजनीतिक टकराव का नया केंद्र बन सकता है। कांग्रेस की चुप्पी को फिलहाल रणनीतिक चुप्पी माना जा रहा है। पार्टी सीधे टकराव में उतरने से पहले कानूनी स्थिति, प्रदेश संगठन की भूमिका और राष्ट्रीय नेतृत्व के अगले कदम को देख रही है। लेकिन कार्यकर्ताओं के बीच इस मामले को लेकर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस का आरोप है कि राहुल गांधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को राजनीतिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता। पार्टी नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी लगातार केंद्र और भाजपा सरकार के खिलाफ सवाल उठाते रहे हैं और ऐसे में उनके खिलाफ होने वाली हर कार्रवाई को कांग्रेस राजनीतिक रूप से भी देखेगी। दूसरी ओर भाजपा का तर्क है कि कानून अपना काम करता है और राजनीतिक नेता होने का अर्थ यह नहीं कि किसी को कानूनी प्रक्रिया से बाहर रखा जाए। यही वह बिंदु है जहां मामला अदालत से निकलकर राजनीतिक बहस में बदल जाता है। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह अदालत की प्रक्रिया का सम्मान करते हुए अपने राजनीतिक विरोध को किस तरह जनता के बीच रखती है।
उत्तराखंड में कांग्रेस पहले से ही आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है। ऐसे में राहुल गांधी से जुड़ा मामला प्रदेश संगठन के लिए भी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने का अवसर बन सकता है। पार्टी यदि इसे लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक प्रतिशोध का मुद्दा बनाती है तो कार्यकर्ताओं को लामबंद करने की कोशिश होगी। कांग्रेस के सामने एक और सवाल हैकृक्या वह इस मुद्दे को प्रदेश के स्थानीय सवालों से जोड़ पाएगी? बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा जैसे मुद्दों के बीच राहुल गांधी का मुकदमा पार्टी के लिए कितना बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा, यह उसकी रणनीति पर निर्भर करेगा।
फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी ने ही राजनीतिक अटकलों को जन्म दिया है। पार्टी के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि यदि मुकदमे को राजनीतिक कार्रवाई माना जा रहा है तो फिर संगठन सड़क पर कब उतरेगा? कांग्रेस के लिए यह फैसला आसान नहीं है। बहुत ज्यादा आक्रामकता से मामला केवल कानूनी विवाद के बजाय राजनीतिक टकराव में बदल सकता है और भाजपा को कांग्रेस पर न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप का आरोप लगाने का मौका मिल सकता है। वहीं पूरी तरह चुप रहने से कार्यकर्ताओं में संदेश जा सकता है कि पार्टी अपने शीर्ष नेतृत्व के मुद्दे पर प्रभावी राजनीतिक प्रतिरोध करने में असमर्थ है।
भाजपा के लिए भी यह मामला कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि कांग्रेस इसे बड़ा राजनीतिक आंदोलन बनाती है तो भाजपा जवाबी अभियान के जरिए इसे कानून बनाम राजनीति की बहस में बदल सकती है। भाजपा का प्रयास यही रहेगा कि राहुल गांधी के मामले को व्यक्तिगत कानूनी प्रकरण के रूप में रखा जाए, जबकि कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक और राजनीतिक संघर्ष के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकती है। यानी असली लड़ाई अदालत से बाहर राजनीतिक नैरेटिव की होगी। राहुल गांधी का मुकदमा कांग्रेस के लिए केवल एक नेता का कानूनी मामला नहीं, बल्कि नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक रणनीति की परीक्षा भी बन सकता है। पार्टी को तय करना होगा कि इस मुद्दे पर कितना आक्रामक होना है और किस सीमा तक इसे चुनावी एजेंडे में शामिल करना है।
अभी कांग्रेस खामोश है, लेकिन यह खामोशी कितने दिन चलेगी, यह बड़ा सवाल है। क्योंकि राजनीति में कई बार चुप्पी भी रणनीति होती है और कई बार कमजोरी का संकेत भी। राहुल गांधी के मुकदमे पर कांग्रेस की अगली चाल यह तय करेगी कि पार्टी इसे अदालत की चारदीवारी में रहने देती है या फिर उत्तराखंड की सियासत में इसे नया राजनीतिक मोर्चा बना देती है। फिलहाल कांग्रेस चुप है, कार्यकर्ता नाराज हैं और भाजपा कांग्रेस की अगली चाल का इंतजार कर रही है। सवाल सिर्फ इतना हैकृयह चुप्पी कब टूटेगी और टूटेगी तो कितने जोर से?
‘20 करोड़‘ का बम
उत्तराखंड में वायरल वीडियो-आडियो ने बढ़ाई सनसनी
निष्कासन के बाद आशुतोष नेगी ने लगाए हैं गंभीर आरोप
यूकेडी पर राष्ट्रीय दलों से कथित साठगांठ का किया दावा
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो,सियासी हलचल बढ़ी
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव-2027 से पहले उत्तराखंड क्रांति दल यानी यूकेडी के भीतर छिड़ी जंग अब पार्टी की चौखट से निकलकर सोशल मीडिया के मैदान में पहुंच गई है। पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित किए गए आशुतोष नेगी के कथित बयानों और उनसे जुड़े वीडियो-आडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रदेश की क्षेत्रीय राजनीति में सनसनी फैल गई है। सबसे ज्यादा चर्चा उस 20 करोड़ के कथित लेन-देन और राजनीतिक साठगांठ को लेकर है, जिसका आरोप नेगी की ओर से लगाया गया है। यूकेडी ने नेगी को अनुशासनहीनता और सार्वजनिक मंचों पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ कथित भ्रामक एवं तथ्यहीन बयान देने के आरोप में छह वर्ष के लिए निष्कासित किया है। लेकिन निष्कासन के बाद नेगी के तेवर नरम होने के बजाय और तीखे हो गए हैं।
सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो और कथित आडियो को लेकर यूकेडी के समर्थकों से लेकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक बहस तेज है। वायरल सामग्री में नेगी से जुड़े बयानों और पार्टी के भीतर चल रहे विवाद को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। हालांकि, वायरल वीडियो या आडयो की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, इसलिए इनमें किए गए दावों को तथ्य के रूप में नहीं बल्कि आरोप और दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन राजनीति में वायरल सामग्री का असर कई बार उसकी सत्यता की जांच से पहले ही दिखाई देने लगता है। यही इस समय यूकेडी के साथ हो रहा है।
नेगी ने आरोप लगाया है कि उन्हें राजनीतिक रूप से निबटाने के लिए 20 करोड़ रुपये की कथित सुपारी का खेल हुआ। उन्होंने इसके लिए यूकेडी के कुछ नेताओं पर राष्ट्रीय दलों के साथ कथित साठगांठ का आरोप भी लगाया है। यही आरोप अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। क्योंकि यदि आरोप निराधार हैं तो यूकेडी नेतृत्व के सामने उन्हें स्पष्ट रूप से खारिज करने और स्थिति जनता के सामने रखने की चुनौती है। दूसरी ओर, यदि नेगी अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण सामने लाते हैं तो विवाद का राजनीतिक असर कहीं बड़ा हो सकता है। फिलहाल 20 करोड़ रुपये के कथित लेन-देन की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
यूकेडी उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति और राज्य आंदोलन की विरासत से जुड़ा दल है। ऐसे में उसके नेताओं पर राष्ट्रीय दलों से कथित साठगांठ के आरोप सामान्य राजनीतिक बयान से कहीं ज्यादा गंभीर माने जाएंगे। 2027 के चुनाव में यूकेडी खुद को भाजपा और कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व और राजनीतिक निष्ठा पर सवाल उठना संगठन के लिए बड़ी चुनौती है। नेगी प्रकरण ने एक और सवाल खड़ा किया हैकृकि क्या उक्रांद चुनावी जमीन मजबूत करने से पहले अपने घर की राजनीतिक लड़ाई सुलझा पाएगा?
यूकेडी की अनुशासनात्मक कार्रवाई के बावजूद नेगी के तेवर आक्रामक बने हुए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए खुद को अब भी उक्रांद की विचारधारा से जुड़ा बताया है। दूसरी ओर पार्टी का कहना है कि निष्कासन के बाद वह यूकेडी के नाम, झंडे और चुनाव चिह्न का अधिकृत रूप से इस्तेमाल नहीं कर सकते। यानी लड़ाई अब केवल एक नेता के पार्टी से बाहर होने की नहीं रही। यह नेतृत्व बनाम असहमति, संगठन बनाम व्यक्तिगत राजनीतिक दावे और क्षेत्रीय दल की विश्वसनीयता की लड़ाई बनती जा रही है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और आडियो ने इस विवाद को तेजी से जनता तक पहुंचा दिया है। हालांकि वायरल सामग्री की प्रमाणिकता की जांच जरूरी है, लेकिन इससे पैदा हुई राजनीतिक बहस को नजरअंदाज करना यूकेडी के लिए आसान नहीं होगा। 2027 के चुनाव में यदि यूकेडी जनता के बीच तीसरे विकल्प की बात लेकर जाता है तो उसे सबसे पहले यह साबित करना होगा कि उसके फैसले और उम्मीदवार किसी राष्ट्रीय दल की छाया में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के मुद्दों पर स्वतंत्र राजनीतिक लाइन पर खड़े हैं। आशुतोष नेगी के आरोपों ने इसी सवाल को सबसे ज्यादा हवा दी है।
20 करोड़ का दावा सच है या सियासी विस्फोटकृइसका जवाब जांच और प्रमाण देंगे। लेकिन इतना तय है कि वायरल वीडियो-आडियो ने 2027 से पहले यूकेडी के भीतर की आग को सार्वजनिक बहस में जरूर ला दिया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि नेगी अगला खुलासा करते हैं या यूकेडी नेतृत्व इन आरोपों का कोई ठोस जवाब सामने रखता है।
बुधवार, 2 सितंबर 2026
खिसकती जमीन और सत्ता की छटपटाहट
गंगाजल व हवन के बहाने राजनीतिक हिसाब-किताब
मुद्दों की सियासत पर भारी पड़ा शुद्धिकरण का दांव
देवभूमि में नीयत व विचारधारा का सीधा मुकाबला
भाजपा बोली-सत्ता की भूख, कांग्रेस का पलटवार
देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े शुद्धिकरण प्रकरण ने उत्तराखंड की सियासत को गरमा दिया है। मंच पर गंगाजल छिड़कने और शुद्धिकरण हवन को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। मामला अब महज एक राजनीतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके बहाने दोनों दल एक-दूसरे की विचारधारा, राजनीति और नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा जहां इसे कांग्रेस की सत्ता की बेचौनी और तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस इसे भाजपा की सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति का उदाहरण बता रही है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस इस मुद्दे को लगातार राजनीतिक रंग देकर जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से हटाना चाहती है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को जनता के बीच अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का अहसास हो चुका है, इसलिए वह ऐसे मुद्दों के सहारे राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेताओं ने इसे कांग्रेस की सत्ता की भूख से जोड़ते हुए कहा कि जनता अब इस तरह की राजनीति को स्वीकार करने वाली नहीं है।
भाजपा का कहना है कि उत्तराखंड की जनता ने हमेशा धार्मिक आस्था का सम्मान किया है और किसी भी धार्मिक प्रतीक को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश उचित नहीं है। पार्टी नेताओं के मुताबिक कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि धार्मिक भावनाओं से जुड़े विषयों पर राजनीति करने के बजाय उसे अपने शासन और नीतियों का हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए। भाजपा के निशाने पर कांग्रेस के साथ-साथ राहुल गांधी और पार्टी नेतृत्व भी है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस एक तरफ संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की बात करती है, दूसरी तरफ धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाती है।
कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा खुद इस मामले को लगातार राजनीतिक मुद्दा बना रही है और अब कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा को महंगाई, बेरोजगारी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्तराखंड के विकास जैसे मुद्दों पर जवाब देना चाहिए, लेकिन वह धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों के जरिए राजनीतिक ध्रुवीकरण का माहौल तैयार करना चाहती है।
कांग्रेस नेताओं के मुताबिक लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को धार्मिक भावनाओं के नाम पर दूसरे दल को कठघरे में खड़ा करने का अधिकार नहीं है। पार्टी का कहना है कि भाजपा को इस पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी तय करने के बजाय इसे राजनीतिक प्रचार का हथियार बनाने से बचना चाहिए। शुद्धिकरण प्रकरण की राजनीतिक गूंज उत्तराखंड से बाहर भी सुनाई दे रही है। कांग्रेस और भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की बयानबाजी के बाद यह विवाद अब राज्य की राजनीति में एक बड़े प्रतीकात्मक मुद्दे का रूप लेता दिखाई दे रहा है। एक तरफ भाजपा इसे कांग्रेस की कथित सत्ता की हताशा बता रही है, दूसरी ओर कांग्रेस इसे भाजपा की धर्म आधारित राजनीति के रूप में पेश कर रही है। दोनों दलों के लिए यह विवाद आगामी राजनीतिक संघर्ष की जमीन तैयार करने का अवसर भी बन गया है।
इस विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या धर्म और आस्था से जुड़े प्रतीकों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाया जाना चाहिए? गंगाजल और शुद्धिकरण जैसे धार्मिक प्रतीकों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब आरोप-प्रत्यारोप के ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां दोनों दल एक-दूसरे की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा इसे कांग्रेस की सत्ता पाने की बेचौनी बता रही है तो कांग्रेस भाजपा पर धार्मिक धु्रवीकरण का आरोप लगा रही है। दरअसल, उत्तराखंड की राजनीति में धर्म और आस्था हमेशा संवेदनशील विषय रहे हैं। ऐसे में दोनों दलों के लिए चुनौती यह है कि राजनीतिक लाभ के लिए उठाए गए कदम कहीं सामाजिक विभाजन को और गहरा न कर दें।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज होने के साथ ही इस विवाद का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है। भाजपा सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में ‘शुद्धिकरण’ विवाद दोनों दलों के लिए एक-दूसरे पर हमला बोलने का नया हथियार बन गया है। आने वाले दिनों में यह विवाद कितना लंबा खिंचता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। लेकिन इतना तय है कि हल्द्वानी का शुद्धिकरण अब केवल एक धार्मिक प्रतीक का विवाद नहीं रहाकृयह उत्तराखंड की सियासत में सत्ता, धर्म और विचारधारा की लड़ाई का नया मोर्चा बन चुका है।
सेवा संकल्प के लिए भाजपा ने उतारी ‘फौज’
सेवा संकल्प अभियान के सहारे चुनावी मोड में बीजेपी, मंत्रियों,दिग्गजों को कमान
जमीनी स्तर पर उतरेगी पूरी टीम, सरकार और संगठन मिलकर साधेंगे लक्ष्य
सेवा संकल्प के दम पर जनता के बीच रिपोर्ट कार्ड लेकर जाएगी भाजपा
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच भारतीय जनता पार्टी ने संगठन को अब पूरी तरह चुनावी मोड में लाने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी ने सेवा संकल्प अभियान को जमीन तक पहुंचाने के लिए मंत्रियों से लेकर वरिष्ठ पदाधिकारियों और प्रमुख भाजपा नेताओं तक को जिम्मेदारियां सौंपकर पूरी टीम मैदान में उतारने की तैयारी कर ली है। पार्टी का जोर अभियान को केवल संगठनात्मक कार्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय इसे सरकार के कामकाज और संगठन की सक्रियता से जोड़कर जनता तक पहुंचाने पर है। भाजपा नेतृत्व ने अभियान की सफलता के लिए जिम्मेदारियां तय करते हुए नेताओं को अलग-अलग क्षेत्रों और गतिविधियों की कमान सौंपी है। सरकार के मंत्री जहां अपने विभागीय कामकाज और सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच रखने की भूमिका निभाएंगे, वहीं संगठन के पदाधिकारी बूथ और मंडल स्तर तक अभियान की गतिविधियों को गति देने का काम करेंगे।
भाजपा की रणनीति साफ हैकृसरकार की उपलब्धियों का संदेश संगठन के नेटवर्क के जरिए घर-घर तक पहुंचाया जाए। इसके लिए मंत्री, विधायक, सांसद, प्रदेश पदाधिकारी, जिला संगठन और मंडल स्तर के कार्यकर्ताओं को अभियान से जोड़ने की तैयारी है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि चुनावी वर्ष से पहले सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय ही राजनीतिक संदेश को प्रभावी बना सकता है। इसी कारण अभियान में जनप्रतिनिधियों के साथ संगठन के कार्यकर्ताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रखी गई है।
सेवा संकल्प अभियान में मंत्रियों को विशेष जिम्मेदारी दिए जाने को भाजपा की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। मंत्रियों से अपेक्षा की जा रही है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जनता के बीच पहुंचकर सरकार की योजनाओं की जानकारी दें और स्थानीय स्तर पर लोगों की समस्याओं को भी सुनें। पार्टी के लिए यह अभियान सरकार और जनता के बीच संवाद बढ़ाने का माध्यम भी है। संगठन की कोशिश है कि सरकार की योजनाओं का लाभ लेने वाले लोगों तक सीधे पहुंच बनाई जाए और उनसे फीडबैक लिया जाए।
भाजपा की असली ताकत उसका बूथ स्तर का संगठन माना जाता है। यही वजह है कि सेवा संकल्प अभियान को बूथ तक ले जाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। मंडल और जिला स्तर के पदाधिकारियों को अभियान की निगरानी और समन्वय की जिम्मेदारी दी जा रही है। कार्यकर्ताओं के जरिए केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं, जनकल्याणकारी कार्यक्रमों तथा संगठन की सेवा गतिविधियों को जनता के बीच ले जाने की रणनीति बनाई गई है।
राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो सेवा संकल्प अभियान केवल जनसंपर्क कार्यक्रम नहीं है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा अपने संगठन को लगातार सक्रिय रखने और जनता के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सरकार के खिलाफ बनने वाली संभावित नाराजगी को समय रहते समझना और उसे दूर करना है। ऐसे में लगातार जनसंपर्क अभियान संगठन को जनता की नब्ज टटोलने का अवसर भी देगा। विपक्ष जहां सरकार पर महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के मुद्दों को लेकर सवाल उठा रहा है, वहीं भाजपा सेवा और सरकार की उपलब्धियों को अपने राजनीतिक संदेश का आधार बनाने की तैयारी में है।
पार्टी नेतृत्व की ओर से संगठन को सक्रिय रखने का संदेश स्पष्ट हैकृचुनाव की घोषणा का इंतजार नहीं करना है, बल्कि उससे पहले ही जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करनी है। मंत्रियों से लेकर प्रदेश पदाधिकारियों और बूथ कार्यकर्ताओं तक जिम्मेदारी बांटने की रणनीति इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। भाजपा की कोशिश है कि चुनाव आने तक संगठन का हर स्तर सक्रिय रहे और पार्टी के पास सरकार के कामकाज के साथ-साथ जमीनी फीडबैक का मजबूत नेटवर्क मौजूद हो।
उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की लड़ाई के लिए दोनों प्रमुख दलों की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। कांग्रेस जहां सरकार को घेरने के लिए मुद्दे तलाश रही है, वहीं भाजपा लगातार संगठनात्मक गतिविधियों और जनसंपर्क अभियानों के जरिए अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में सेवा संकल्प अभियान भाजपा के लिए सिर्फ सेवा का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सरकार-संगठन-कार्यकर्ता को एक साथ मैदान में उतारने की रणनीति भी है। अब सवाल यही है कि भाजपा की यह फौज जनता तक सरकार का संदेश पहुंचाने में कितनी सफल होती है और क्या यह अभियान 2027 की चुनावी जंग में पार्टी के लिए राजनीतिक बढ़त तैयार कर पाता है?
सूखे राजनीतिक मैदान में ‘संजीवनी’
राहुल गांधी की गिरफ्तारी से मिलेगी कांग्रेस को आक्सीजन
उत्तराखंड में भाजपा के सामने आ सकता है सियासी संकट
मुद्दा एफआईआर से निकलकर सूबे की सियासत में पहुंचेगा
एक बड़ा राजनीतिक चेहरे के साथ मिलेगा भावनात्मक नैरेटिव
आरोपी से ज्यादा राजनीतिक प्रतीक बन जाएंगे राहुल गांधी
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 की चुनावी बिसात अभी पूरी तरह बिछी भी नहीं है कि एक ऐसा मुद्दा आकार लेने लगा है, जो आने वाले दिनों में दोनों प्रमुख दलों के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर अगर वह उत्तराखंड पहुंचकर गिरफ्तारी देने का राजनीतिक फैसला लेते हैं, तो यह महज कानूनी कार्रवाई नहीं रहेगी। इसके राजनीतिक मायने कहीं ज्यादा बड़े होंगे। कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम सूखे राजनीतिक मैदान में संजीवनी साबित हो सकता है, जबकि भाजपा के सामने ऐसा मुद्दा खड़ा हो सकता है, जिसे संभालना आसान नहीं होगा। खासकर तब, जब गिरफ्तारी को कांग्रेस राजनीतिक प्रतिशोध के तौर पर जनता के बीच ले जाने की कोशिश करे।
राहुल गांधी यदि खुद उत्तराखंड पहुंचकर गिरफ्तारी देने का ऐलान करते हैं, तो कांग्रेस के पास इसे बड़े राजनीतिक अभियान में बदलने का अवसर होगा। प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लामबंद करने से लेकर राष्ट्रीय नेताओं की सक्रियता तक, पूरा घटनाक्रम तेजी से प्रदेश की राजनीति का केंद्र बन सकता है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लंबे समय से सरकार के खिलाफ उठाए जा रहे बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों के साथ उसे एक बड़ा राजनीतिक चेहरा और भावनात्मक नैरेटिव भी मिल जाएगा। यानी कांग्रेस जिस मुद्दे को अभी प्रदेश की सीमा में लड़ रही है, राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी उसे राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा सकती है।
भाजपा के सामने मुश्किल यह होगी कि वह इस मामले को कितना कानूनी और कितना राजनीतिक रहने देती है। कार्रवाई होती है तो कांग्रेस इसे राजनीतिक दमन बताएगी और कार्रवाई नहीं होती तो भाजपा पर कानून के सवाल उठ सकते हैं। यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी राजनीतिक पेचीदगी है। भाजपा चाहेगी कि मामला कानून और एफआईआर तक सीमित रहे। कांग्रेस की कोशिश स्वाभाविक रूप से इसे लोकतंत्र, अभिव्यक्ति और राजनीतिक संघर्ष का मुद्दा बनाने की होगी। अगर कांग्रेस अपना नैरेटिव स्थापित करने में सफल होती है तो भाजपा को रक्षात्मक स्थिति में आना पड़ सकता है।
राहुल गांधी का उत्तराखंड पहुंचना अपने आप में कांग्रेस संगठन के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर होगा। प्रदेशभर से कार्यकर्ताओं के जुटने, प्रदर्शन और विरोध की राजनीति शुरू हो सकती है। राष्ट्रीय मीडिया की निगाहें भी उत्तराखंड पर टिकेंगी। कांग्रेस इसे डरेंगे नहीं, लड़ेंगे जैसे राजनीतिक संदेश में बदल सकती है। इससे प्रदेश संगठन में नई ऊर्जा आने की संभावना है। विशेषकर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए यह महत्वपूर्ण है। पार्टी को एक ऐसे मुद्दे की जरूरत है, जो संगठन को सड़क पर उतार सके और अलग-अलग गुटों को एक मंच पर ला सके। राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी ऐसा ही मुद्दा बन सकती है।
कांग्रेस को यह भी ध्यान रखना होगा कि सिर्फ राजनीतिक नारे से चुनाव नहीं जीते जाते। गिरफ्तारी का मुद्दा तभी राजनीतिक लाभ देगा, जब पार्टी इसे उत्तराखंड के स्थानीय मुद्दों से जोड़ सके। अगर पूरा अभियान केवल राहुल गांधी बनाम भाजपा तक सीमित रह गया, तो भाजपा इसे कांग्रेस की व्यक्तिवादी राजनीति बताकर पलटवार कर सकती है। भाजपा का तर्क होगा कि कानून अपना काम करेगा और किसी नेता को राजनीतिक पहचान के आधार पर विशेष छूट नहीं मिल सकती। यहीं से असली राजनीतिक मुकाबला शुरू होगा।
उत्तराखंड में भाजपा लगातार संगठन को मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश में है। ऐसे समय में राहुल गांधी से जुड़ा कोई बड़ा घटनाक्रम कांग्रेस के लिए मुद्दों की कमी से निकलने का रास्ता बन सकता है। भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ राहुल गांधी नहीं होंगे। चुनौती होगी उस राजनीतिक नैरेटिव की, जो उनकी गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस तैयार कर सकती है।
अगर कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र और राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया तो भाजपा को हर बयान सोच-समझकर देना होगा। एक गलत राजनीतिक प्रतिक्रिया कांग्रेस को और ताकत दे सकती है। राजनीति में कई बार कानूनी कार्रवाई का असर अदालत से बाहर ज्यादा दिखाई देता है। राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी भी ऐसा ही मोड़ पैदा कर सकती है। कांग्रेस इसे संघर्ष की शुरुआत बताएगी, भाजपा कानून की कार्रवाई। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारने की कोशिश करेगी, भाजपा संगठनात्मक ताकत से मुकाबला करेगी और उत्तराखंड इस टकराव का केंद्र बन सकता है। यही कारण है कि राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी कांग्रेस के लिए संजीवनी और भाजपा के लिए गले की फांस बन सकती है।
लेकिन अंतिम फैसला अदालत, कानून और संबंधित जांच प्रक्रिया के दायरे में ही होगा। राजनीतिक दल इस घटनाक्रम को किस तरह जनता के सामने पेश करते हैं, असली लड़ाई वहीं तय होगी। उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में यह मामला अब सिर्फ एफआईआर का नहींकृनैरेटिव की लड़ाई का मामला बनता दिख रहा है।
मंगलवार, 1 सितंबर 2026
udaydinmaan: हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार
udaydinmaan: हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार: अल्मोड़ा के लोधिया में जर्जर छत के नीचे भविष्य गढ़ने को मजबूर 200 मासूम अल्मोड़ा के स्कूल का जर्जर भवन कभी भी बन सकता है हादसे का सबब 200 से ज्...
udaydinmaan: हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार
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हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार
अल्मोड़ा के लोधिया में जर्जर छत के नीचे भविष्य गढ़ने को मजबूर 200 मासूम
अल्मोड़ा के स्कूल का जर्जर भवन कभी भी बन सकता है हादसे का सबब
200 से ज्यादा छात्र-छात्राएं, बारिश के बीच आज सिर्फ 25 पहुंचे स्कूल
वर्षों से स्कूल के मरम्मत की गुहार, विभाग आज दिन तक है इससे बेखबर
केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा का क्षेत्र, राज्य मंत्री कुंदन लटवाल का भी गृह क्षेत्रकृफिर भी बच्चों की सुरक्षा पर क्यों खामोशी
देहरादून। पहाड़ में बारिश कहर बरपा रही है और इसी बारिश के बीच अल्मोड़ा के लोधिया में सरकारी स्कूल की जर्जर इमारत बच्चों के सिर पर सवाल बनकर खड़ी है। नगर से महज तीन किलोमीटर दूर स्थित राजकीय इंटर कालेज लोधिया का भवन ऐसी हालत में है कि किसी भी समय गंभीर हादसे की आशंका बनी हुई है। विद्यालय में 200 से अधिक बच्चे अध्ययनरत हैं, लेकिन सोमवार को बारिश और भवन की खस्ताहाली के चलते सिर्फ 25 बच्चे ही स्कूल पहुंचे। यह आंकड़ा सिर्फ उपस्थिति रजिस्टर का नंबर नहीं है। यह उस डर की गवाही है, जो अभिभावकों के मन में अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बैठ चुका है।
सबसे चुभने वाली बात यह है कि भवन की हालत अचानक खराब नहीं हुई। विद्यालय और अभिभावक लंबे समय से इसे दुरुस्त कराने की मांग कर रहे हैं। शिकायतें हुईं, आवाजें उठीं, लेकिन सरकारी तंत्र की नींद नहीं टूटी। अब लगातार बारिश ने जर्जर भवन को और जोखिम भरा बना दिया है। आखिर जिम्मेदार विभाग को किस चीज का इंतजार है? क्या किसी बच्चे के घायल होने का? क्या भवन का कोई हिस्सा गिरने का? या फिर उस दिन का, जब प्रशासन मौके पर पहुंचकर राहत-बचाव की तस्वीरें जारी करे?हादसा होने के बाद कार्रवाई करना प्रशासनिक सफलता नहीं, व्यवस्था की विफलता होगी। जब भवन की स्थिति को लेकर स्कूल और अभिभावक पहले से चेतावनी दे रहे हैं तो फिर समय रहते मरम्मत क्यों नहीं हुई? बारिश शुरू होने के बाद भी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
स्कूल में 200 से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। लेकिन सोमवार को स्कूल पहुंचने वाले बच्चों की संख्या सिर्फ 25 रह गई। बाकी बच्चे कहां हैं? जवाब किसी सरकारी रिपोर्ट में नहीं, बल्कि अभिभावकों के डर में छिपा है, जिस स्कूल की इमारत देखकर माता-पिता अपने बच्चों को घर पर रोकने को मजबूर हो जाएं, वहां शिक्षा व्यवस्था की सफलता के दावे कितने खोखले हैं, यह समझना मुश्किल नहीं। स्कूल बच्चों के लिए ज्ञान का मंदिर होना चाहिए, लेकिन लोधिया में वही भवन बच्चों और अभिभावकों के लिए चिंता का कारण बन गया है।
लोधिया कोई ऐसा दूरदराज का इलाका नहीं है जहां प्रशासन की नजर पहुंचना मुश्किल हो। यह अल्मोड़ा नगर से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर है और राजनीतिक सवाल इससे भी बड़ा है। यह क्षेत्र केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा से जुड़ा हुआ है। हाल में राज्य मंत्री बने कुंदन लटवाल का घर भी इसी क्षेत्र में बताया जाता है। तो फिर सवाल स्वाभाविक हैकृकि जब सत्ता के इतने करीब होने के बावजूद एक सरकारी स्कूल की इमारत वर्षों से बदहाल है, तब पहाड़ के दूरस्थ गांवों के सरकारी स्कूलों की हालत कौन पूछेगा? क्या जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में बच्चों की सुरक्षा शामिल है? अगर शामिल है तो लोधिया कालेज अब तक क्यों नहीं सुधरा?
उत्तराखंड में सरकारी भवनों की बदहाली कोई नई कहानी नहीं है। हर बरसात में स्कूल, अस्पताल, पंचायत भवन और दूसरी सरकारी इमारतें अपनी जर्जर हालत का सच सामने लाती हैं। लोधिया कालेज भी उसी व्यवस्था की तस्वीर बन गया है, जहां शिकायत पहले होती है और कार्रवाई हादसे के बाद। यह सवाल सिर्फ शिक्षा विभाग से नहीं है। प्रशासन, शिक्षा महकमा और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधिकृसभी को जवाब देना होगा कि जब भवन को लेकर लगातार मांग उठ रही थी तो अब तक क्या किया गया? क्या भवन का तकनीकी निरीक्षण हुआ? क्या इसे सुरक्षित घोषित किया गया है? अगर सुरक्षित है तो अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से क्यों डर रहे हैं? अगर असुरक्षित है तो स्कूल में कक्षाएं क्यों चल रही हैं? और सबसे बड़ा सवालकृकि अगर बारिश के बीच भवन गिर गया तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
सरकारें अक्सर बजट, प्रस्ताव, स्वीकृति और टेंडर की लंबी प्रक्रिया का हवाला देती हैं। लेकिन बच्चों की सुरक्षा किसी फाइल की गति की मोहताज नहीं हो सकती। एक जर्जर स्कूल भवन को ठीक कराने के लिए अगर महीनों-वर्षों लगते हैं, तो सवाल भवन की उम्र का नहीं, व्यवस्था की प्राथमिकताओं का है। लोधिया के अभिभावक अपने बच्चों के लिए कोई विशेष सुविधा नहीं मांग रहे। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनके बच्चे जिस स्कूल में पढ़ने जाएं, उसकी छत उनके सिर पर सुरक्षित रहे।
बारिश के बीच 200 से ज्यादा बच्चों वाले स्कूल में सिर्फ 25 बच्चों का पहुंचना प्रशासन के लिए खतरे की घंटी होना चाहिए। अब जरूरत निरीक्षण की औपचारिकता की नहीं, तत्काल सुरक्षा व्यवस्था की है। जब तक भवन सुरक्षित नहीं होता, बच्चों के लिए वैकल्पिक कक्षाओं की व्यवस्था हो। भवन की तकनीकी जांच कराई जाए। यदि पुनर्निर्माण आवश्यक है तो प्रक्रिया तत्काल शुरू हो। क्योंकिकृबच्चों की जिंदगी किसी सरकारी फाइल से छोटी नहीं है और लोधिया के अभिभावक अब यह सवाल पूछ रहे हैं।
अपमान पर पर्दा, सवाल उठाने पर केस
कांग्रेस द्वारा इसे महज उत्तराखंड का मामला न मानकर राष्ट्रीय स्तर पर उठा रही
खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण और सामाजिक बराबरी के मुद्दे पर
विवाद को राष्ट्रीय पहचान देने और कांग्रेस के आगामी रणनीतिक का है बड़ा प्लान
देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाले नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर दर्ज एफआईआर ने उत्तराखंड की सियासत को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। कांग्रेस ने अब इस पूरे विवाद को महज उत्तराखंड का स्थानीय मामला मानने से इनकार करते हुए इसे दलित सम्मान, सामाजिक बराबरी और संविधान की लड़ाई से जोड़ दिया है। राहुल गांधी के खिलाफ हल्द्वानी में एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होने के बाद कांग्रेस का आक्रोश और बढ़ गया है। पार्टी का आरोप है कि खड़गे के कार्यक्रम के बाद हुए कथित शुद्धिकरण पर कार्रवाई करने के बजाय राहुल गांधी की आवाज को एफआईआर के जरिए दबाने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए आंदोलन को देशव्यापी स्वर देने का फैसला किया है।
कांग्रेस की रणनीति अब साफ दिखाई दे रही है। पार्टी इस विवाद को केवल मंच शुद्धिकरण तक सीमित नहीं रखना चाहती। उसका निशाना अब सीधे भाजपा की राजनीतिक और वैचारिक राजनीति पर है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कथित शुद्धिकरण में शामिल लोगों के खिलाफ एफआईआर की मांग की थी। कांग्रेस का कहना है कि जब इस मांग के बाद राहुल गांधी पर ही मुकदमा दर्ज कर दिया गया, तो इससे सवाल और बड़ा हो गया है कि क्या विपक्ष के नेता को सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने का भी अधिकार नहीं है? कांग्रेस नेताओं ने इसी सवाल को लेकर विरोध-प्रदर्शन का सिलसिला शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में प्रदर्शन हुआ तो झारखंड के धनबाद तक इसका असर दिखाई दिया। कई राज्यों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एफआईआर और कथित शुद्धिकरण के खिलाफ आवाज उठाई।
राजनीतिक तौर पर देखें तो कांग्रेस को एक ऐसा मुद्दा मिल गया है, जिसके जरिए वह भाजपा को सीधे सामाजिक न्याय और संविधान के सवाल पर घेरना चाहती है। खड़गे स्वयं दलित समुदाय से आने वाले राष्ट्रीय नेता हैं। ऐसे में कांग्रेस का तर्क है कि उनके कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण की घटना को सामान्य राजनीतिक विवाद मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। पार्टी इसे सामाजिक भेदभाव के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है। राहुल गांधी ने भी इसे इसी बड़े विमर्श से जोड़ा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर समेत कई नेताओं ने घटना की आलोचना की है। अब पार्टी की कोशिश इस सवाल को गांव, शहर और प्रदेश स्तर तक ले जाने की है। अगर संविधान समानता की गारंटी देता है तो जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के सम्मान को लेकर अलग व्यवहार क्यों?
इस विवाद का सबसे सीधा असर उत्तराखंड की राजनीति पर पड़ना तय है। कांग्रेस पहले ही हल्द्वानी की घटना को लेकर आक्रामक है और देहरादून में सचिवालय घेराव का ऐलान कर चुकी है। कांग्रेस के लिए यह आंदोलन केवल भाजपा विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने राजनीतिक नैरेटिव को धार देने का अवसर भी बन गया है। भाजपा जहां कांग्रेस पर मामले को जातिगत राजनीति के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस इसे भाजपा की कथित सामाजिक सोच का आईना बता रही है। यानी आने वाले दिनों में यह विवाद कानूनी लड़ाई से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई बन सकता है।
कांग्रेस का हमला अब दो सवालों पर केंद्रित हैकृपहला, खड़गे के कार्यक्रम के बाद हुए कथित शुद्धिकरण पर क्या कार्रवाई हुई? दूसरा, राहुल गांधी के बयान पर एफआईआर क्यों? भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह इस विवाद को केवल राहुल गांधी के बयान तक सीमित रखकर कांग्रेस के राजनीतिक हमले को रोक पाएगी या नहीं। क्योंकि कांग्रेस अब इसे राहुल बनाम भाजपा का विवाद नहीं रहने देना चाहती। वह इसे सामाजिक सम्मान बनाम भेदभाव के सवाल में बदलने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस ने साफ संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे पर पीछे हटने वाली नहीं है। पार्टी ने देशभर में प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं और एफआईआर को ही आंदोलन का राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी है। कांग्रेस का कहना है कि उसके नेताओं पर कार्रवाई हो सकती है तो कथित शुद्धिकरण के लिए जिम्मेदार लोगों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। यानी हल्द्वानी का विवाद अब उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर निकल चुका है। एक तरफ भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीतिक अवसरवादिता बता रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस इसे संविधान और सामाजिक सम्मान की लड़ाई बना रही है। आने वाले दिनों में असली मुकाबला अदालत या थाने से ज्यादा जनता की अदालत में नैरेटिव तय करने का होगा और यही इस पूरे विवाद को 2027 की उत्तराखंड विधानसभा चुनावी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण बना देता है।
एफआईआर बन गई नया ‘रणक्षेत्र’
भाजपा बोलीकृसियासत के लिए समाज को मत बांटो, कानून से ऊपर कौन
राहुल की एफआईआर पर कांग्रेस के हंगामे को बताया राजनीतिक नौटंकी
देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद सामने आए कथित शुद्धिकरण विवाद ने उत्तराखंड की सियासत को सड़क से लेकर राजधानी तक गर्म कर दिया है। कांग्रेस ने जहां इसे सामाजिक अपमान, दलित सम्मान और संविधान की लड़ाई का नाम देकर भाजपा को घेरना शुरू किया है, वहीं भाजपा ने पलटवार करते हुए कांग्रेस के इस अभियान को राजनीतिक मुद्दे को जातीय रंग देने की कोशिश करार दिया है। भाजपा का हमला सीधा हैकृकांग्रेस के पास जनता के बीच जाने के लिए मुद्दे नहीं बचे तो अब विवादों को चुनावी हथियार बनाया जा रहा है। भाजपा नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड की शांत सामाजिक व्यवस्था को राजनीतिक फायदे के लिए जाति के चश्मे से देखना प्रदेश के हित में नहीं है। पार्टी ने कांग्रेस से सवाल किया है कि क्या हर राजनीतिक विवाद को जातिगत संघर्ष में बदल देना ही उसकी राजनीति का नया एजेंडा है? कांग्रेस जिस घटना को दलित सम्मान से जोड़कर राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुटी है, भाजपा ने उसी नैरेटिव को पलटने की कोशिश शुरू कर दी है।
भाजपा का कहना है कि किसी व्यक्ति या संगठन की ओर से कानून का उल्लंघन हुआ है तो जांच होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई भी। लेकिन इसके नाम पर पूरे राजनीतिक दल या समाज को कटघरे में खड़ा करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। पार्टी का तर्क है कि कानून अपना रास्ता तय करेगा, राजनीतिक मंच अदालत नहीं बन सकता। यही वह लाइन है जिसके जरिए भाजपा कांग्रेस के आंदोलन की धार कुंद करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज एफआईआर ने विवाद को और बड़ा राजनीतिक आयाम दे दिया है। कांग्रेस इसे बदले की राजनीति बता रही है और कार्रवाई की मांग कर रही है। भाजपा का जवाब है कि लोकतंत्र में राजनीतिक कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि कांग्रेस राहुल गांधी की एफआईआर को लेकर देशभर में आंदोलन की तैयारी कर रही है। ऐसे में भाजपा इस लड़ाई को कानून बनाम राजनीतिक दबाव के फ्रेम में रखने की कोशिश कर रही है। भाजपा का संदेश हैकृएफआईआर को लेकर सड़क पर दबाव बनाने से कानून की प्रक्रिया नहीं बदलेगी। भाजपा ने कांग्रेस के आंदोलन के पीछे राजनीतिक मंशा भी तलाशनी शुरू कर दी है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस सामाजिक न्याय के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करना चाहती है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को यदि वास्तव में सामाजिक सद्भाव की चिंता है तो उसे ऐसे मुद्दों को हवा देने के बजाय प्रदेश में भाईचारे की राजनीति करनी चाहिए। भाजपा के हमले का सार यही हैकृसम्मान के सवाल पर राजनीति नहीं, कानून के आधार पर फैसला होना चाहिए।
इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक संदर्भ 2027 का विधानसभा चुनाव है। उत्तराखंड में चुनावी तैयारी शुरू होते ही भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक नैरेटिव मजबूत करने में जुटे हैं। कांग्रेस के लिए यह विवाद भाजपा को सामाजिक न्याय के मोर्चे पर घेरने का अवसर है। भाजपा के लिए चुनौती है कि कांग्रेस इसे दलित बनाम भाजपा के सवाल में तब्दील न कर पाए। इसीलिए भाजपा अब रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक हो गई है। पार्टी कांग्रेस से पूछ रही है कि अगर हर विवाद को जाति से जोड़कर आंदोलन किया जाएगा तो क्या इससे समाज में दूरी नहीं बढ़ेगी?
भाजपा की कोशिश इस पूरे विवाद को विकास बनाम विवाद की बहस में बदलने की है। पार्टी का कहना है कि जनता रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और पर्यटन जैसे मुद्दों पर जवाब चाहती है, जबकि कांग्रेस राजनीतिक विवादों को हवा देकर चुनावी जमीन तैयार कर रही है। यानी भाजपा का निशाना केवल कांग्रेस नहीं, बल्कि उसका चुनावी नैरेटिव है। कांग्रेस जहां पूछ रही है कि कथित शुद्धिकरण करने वालों पर कार्रवाई कब होगी, वहीं भाजपा पलटकर पूछ रही है कि क्या राहुल गांधी कानून से ऊपर हैं? यही सवाल अब आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।
फिलहाल दोनों दल पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। कांग्रेस सड़क पर उतरने की तैयारी में है तो भाजपा भी जवाबी राजनीतिक अभियान की जमीन तैयार कर रही है। एक घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैंकृसामाजिक सम्मान का, राजनीतिक मर्यादा का, कानून का और सबसे बढ़कर 2027 के चुनावी नैरेटिव का। हल्द्वानी का विवाद अब केवल शुद्धिकरण तक सीमित नहीं है। कांग्रेस इसे भाजपा की वैचारिक राजनीति का प्रतीक बता रही है, जबकि भाजपा इसे कांग्रेस की विवाद पैदा करो और राजनीतिक लाभ लो रणनीति के रूप में पेश कर रही है। उत्तराखंड की सियासत में अब असली मुकाबला सिर्फ बयानबाजी का नहीं, बल्कि इस बात का है कि जनता किस नैरेटिव को स्वीकार करती है। एक तरफ कांग्रेस का सवालकृखड़गे के कथित अपमान पर कार्रवाई कब? दूसरी तरफ भाजपा का पलटवारकृराजनीति के लिए समाज को कब तक बांटोगे? और इसी सवाल-जवाब के बीच 2027 का चुनावी रण धीरे-धीरे आकार लेता दिख रहा है।
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