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शुक्रवार, 24 जुलाई 2026
udaydinmaan: यूकेडी का इतिहास ‘हिट’ वजूद ‘फ्लाप’
udaydinmaan: यूकेडी का इतिहास ‘हिट’ वजूद ‘फ्लाप’: यूकेडी के स्थापना दिवस पर विशेष यह है संघर्ष की विरासत और सियासी हाशिए की अनोखी कहानी 47 साल पहले जिस आंदोलन ने उत्तराखंड राज्य का सपना जगाय...
udaydinmaan: लाठियों के खिलाफ ‘खाकी’ की बगावत
udaydinmaan: लाठियों के खिलाफ ‘खाकी’ की बगावत: जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के बीच उत्तराखंड पुलिसकर्मी का ऐतिहासिक फैसला मंच पर बैज रखकर जवान बोला- मैं युवाओं के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता पुलि...
लाठियों के खिलाफ ‘खाकी’ की बगावत
जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के बीच उत्तराखंड पुलिसकर्मी का ऐतिहासिक फैसला
मंच पर बैज रखकर जवान बोला- मैं युवाओं के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता
पुलिस कर्मी बोला-छात्रों पर लाठी नहीं चला सकता, भावुक संबोधन से गूंजा पंडाल
जंतर-मंतर आंदोलन के मंच से उत्तराखंड पुलिस के जवान ने किया इस्तीफा देने का ऐलान
देहरादून। दिल्ली के जंतर-मंतर में पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के बीच एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने पूरे आंदोलन को भावनात्मक मोड़ दे दिया। उत्तराखंड पुलिस के एक जवान ने मंच पर पहुंचकर अपनी वर्दी का बैज उतार दिया और सार्वजनिक रूप से अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी। जवान ने कहा कि वह उन छात्रों के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता, जो अपने भविष्य और न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। सोशल मीडिया में चल रहे इस वीडियो और उसमें कही बातों की पुष्टि नहीं करते हैं। जैसे ही पुलिसकर्मी ने मंच से अपना बैज उतारा, पूरा पंडाल तालियों और नारों से गूंज उठा। बड़ी संख्या में मौजूद छात्रों ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। कई छात्र भावुक हो गए, जबकि मंच पर मौजूद आंदोलन के नेताओं ने इसे युवाओं के संघर्ष के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक बताया।
मंच से बोलते हुए पुलिस जवान ने कहा कि उसने वर्दी पहनते समय संविधान की रक्षा करने और जनता की सेवा करने की शपथ ली थी। लेकिन जब देश के युवा अपने अधिकारों की मांग कर रहे हों और उनके साथ बल प्रयोग हो, तो उसका अंतर्मन उसे चुप रहने की अनुमति नहीं देता। उन्होंने कहा कि छात्रों पर हुए लाठीचार्ज की तस्वीरों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उनका कहना था कि पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वाले युवाओं की आवाज को दबाना उचित नहीं माना जा सकता।
पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहा। देश के विभिन्न राज्यों से युवा, सामाजिक संगठन और कई जनप्रतिनिधि भी इसमें अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। हाल के दिनों में दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज की घटनाओं ने इस आंदोलन को और अधिक चर्चा में ला दिया है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
उत्तराखंड पुलिस के जवान द्वारा मंच से पुलिस कर्मी के इस्तीफा देने की घोषणा को आंदोलन में मौजूद युवाओं ने विशेष महत्व दिया। छात्रों का कहना था कि यह केवल एक व्यक्ति का निर्णय नहीं, बल्कि उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है जिसे देश का युवा महसूस कर रहा है। जवान ने अपने संबोधन में उत्तराखंड के युवाओं का भी उल्लेख करते हुए कहा कि रोजगार और पारदर्शी भर्ती हर युवा का अधिकार है। उन्होंने अपील की कि सरकार युवाओं की आवाज को विरोध नहीं, बल्कि सुझाव के रूप में सुने।
हालांकि उत्तराखंड पुलिस के जवान के इस सार्वजनिक इस्तीफे ने पूरे मामले को नया राजनीतिक और सामाजिक आयाम दे दिया है। यदि इस्तीफा औपचारिक रूप से संबंधित विभाग को सौंपा गया है, तो विभागीय स्तर पर इसकी प्रक्रिया और जांच भी चर्चा का विषय बन सकती है। जंतर-मंतर के मंच पर बैज उतारकर दिया गया यह इस्तीफा अब केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं रह गया है। आंदोलन में शामिल युवाओं के लिए यह व्यवस्था के भीतर से उठी एक ऐसी आवाज बन गया है, जिसने उनके संघर्ष को नया नैतिक बल देने का काम किया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस आंदोलन और उससे जुड़ी भावनाओं को किस तरह संबोधित करती है। फिलहाल इतना तय है कि जंतर-मंतर के मंच से उतरा वह बैज देशभर में युवाओं के आंदोलन की सबसे चर्चित तस्वीरों में शामिल हो चुका है।
यूकेडी का इतिहास ‘हिट’ वजूद ‘फ्लाप’
यूकेडी के स्थापना दिवस पर विशेष
यह है संघर्ष की विरासत और सियासी हाशिए की अनोखी कहानी
47 साल पहले जिस आंदोलन ने उत्तराखंड राज्य का सपना जगाया
वही उत्तराखंड क्रांति दल आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास लिखते समय यदि किसी एक दल को नजरअंदाज कर दिया जाए तो वह इतिहास अधूरा रहेगा। यह दल है उत्तराखंड क्रांति दल। 24-25 जुलाई 1979 को नैनीताल में स्थापित यूकेडी केवल एक राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि पहाड़ की अस्मिता, पहचान और अलग राज्य की आकांक्षा का राजनीतिक मंच था। आज, स्थापना के लगभग पांच दशक बाद, वही दल अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के संघर्ष में है। विडंबना यह है कि जिस राज्य के निर्माण का श्रेय उसके आंदोलन को जाता है, उसी राज्य की सत्ता की राजनीति में वह हाशिए पर पहुंच चुका है।
सत्तर के दशक के अंत में उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं का गंभीर अभाव था। पहाड़ के लोग लगातार पलायन कर रहे थे और प्रशासनिक उपेक्षा का भाव गहराता जा रहा था। इन्हीं परिस्थितियों में 24-25 जुलाई 1979 को उत्तराखंड क्रांति दल का गठन हुआ। यूकेडी ने पहली बार राजनीतिक रूप से यह स्थापित किया कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान अलग राज्य के बिना संभव नहीं है। उस समय राष्ट्रीय दल इस मांग को गंभीरता से नहीं लेते थे, लेकिन यूकेडी ने गांव-गांव जाकर अलग उत्तराखंड राज्य की चेतना जगाई। यही चेतना आगे चलकर 1994 के जनआंदोलन में बदल गई।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास केवल खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा की घटनाओं का इतिहास नहीं है, बल्कि उन वर्षों की राजनीतिक तैयारी का भी इतिहास है, जिसे यूकेडी ने लगातार आगे बढ़ाया। जब राष्ट्रीय दल अलग राज्य की मांग पर स्पष्ट नहीं थे, तब यूकेडी ने विधानसभा से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे को जीवित रखा। आंदोलन के दौरान हजारों कार्यकर्ता जेल गए, लाठियां खाईं और कई ने अपने प्राणों की आहुति दी। इसलिए उत्तराखंड बनने के बाद यह उम्मीद थी कि राज्य की पहली पसंद यूकेडी होगी। लेकिन राजनीति ने अलग दिशा पकड़ ली।
9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया। यह वह क्षण था जिसके लिए यूकेडी दो दशक से अधिक समय तक संघर्ष करता रहा। लेकिन राज्य बनने के बाद जनता ने सत्ता की कमान राष्ट्रीय दलोंकृभाजपा और कांग्रेसकृके हाथों में सौंप दी। यूकेडी कभी सरकार में सहयोगी बना, कभी विपक्ष में रहा, लेकिन वह कभी राज्य की मुख्य राजनीतिक शक्ति नहीं बन पाया। इसके पीछे कई कारण रहे, इसमें लगातार गुटबाजी और नेतृत्व संघर्ष, संगठन का गांव स्तर पर कमजोर होना, नए नेतृत्व को समय पर आगे न बढ़ा पाना, आंदोलन की राजनीति से शासन की राजनीति में प्रभावी बदलाव न कर पान, भाजपा और कांग्रेस द्वारा क्षेत्रीय मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल कर लेना। यही कारण रहा कि धीरे-धीरे यूकेडी का जनाधार सिकुड़ता गया।
यूकेडी की सबसे बड़ी ताकत उसकी वैचारिक पहचान थीकृपहाड़ पहले। जल, जंगल, जमीन, स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन रोकना, मूल निवास, भू-कानून, मजबूत पंचायत व्यवस्था और पर्यावरण आधारित विकासकृये सभी मुद्दे यूकेडी दशकों पहले उठा चुका था। विडंबना यह रही कि समय के साथ यही मुद्दे भाजपा और कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा बन गए, जबकि यूकेडी इन्हें राजनीतिक लाभ में बदलने में पीछे रह गया। आज भी राज्य में जब भू-कानून, मूल निवास, स्थायी राजधानी, पलायन, चारधाम, वनाधिकार और स्थानीय संसाधनों की बात होती है तो यूकेडी के पुराने दस्तावेज और आंदोलन याद किए जाते हैं। लेकिन चुनाव आते-आते चर्चा भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द सिमट जाती है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का दावा कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश में है। आम आदमी पार्टी, बसपा और अन्य दल भी अपनी जमीन तलाश रहे हैं। ऐसे में यूकेडी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वह सरकार बनाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह फिर से जनता के बीच अपनी प्रासंगिकता स्थापित कर पाएगा? पिछले कुछ वर्षों में पार्टी लगातार अनुशासन, नेतृत्व परिवर्तन और संगठनात्मक विवादों से जूझती रही है। कई वरिष्ठ नेता अलग हुए, कई नए चेहरे आए, लेकिन व्यापक जनाधार वापस नहीं लौट पाया। हालांकि पार्टी आज भी राज्य के उन मुद्दों पर मुखर दिखाई देती है जिन्हें क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़ा जाता है।
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क्षेत्रीय राजनीति की वापसी
उत्तराखंड की राजनीति में एक बड़ा प्रश्न लगातार पूछा जा रहा हैकृक्या राज्य फिर किसी मजबूत क्षेत्रीय विकल्प की तलाश करेगा? इसके पीछे कुछ कारण भी हैंकृकि लगातार बढ़ता पलायन,पर्वतीय जिलों में घटती आबादी, रोजगार का संकट, स्थानीय संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण को लेकर बहस, भू-कानून और मूल निवास की मांग, पहाड़ और मैदान के विकास में असंतुलन। यदि यह मुद्दे चुनाव का केंद्रीय एजेंडा बनते हैं तो यूकेडी के पास राजनीतिक अवसर मौजूद हो सकता है। लेकिन केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं होगी। यूकेडी को मजबूत संगठन, युवा नेतृत्व, स्पष्ट चुनावी रोडमैप और आधुनिक राजनीतिक अभियान की आवश्यकता होगी। सोशल मीडिया से लेकर बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाए बिना वापसी आसान नहीं होगी।
इतिहास का सम्मान, भविष्य की चुनौती
यूकेडी की सबसे बड़ी पूंजी उसका इतिहास है, लेकिन चुनाव इतिहास नहीं, वर्तमान संगठन और भविष्य की विश्वसनीयता से जीते जाते हैं। आज की युवा पीढ़ी उत्तराखंड आंदोलन को किताबों और स्मृति दिवसों के माध्यम से जानती है। उसके लिए रोजगार, स्टार्टअप, डिजिटल अवसर, बेहतर शिक्षा और आधुनिक बुनियादी ढांचा अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि यूकेडी अपने मूल विचारकृस्थानीय हित सर्वाेपरिकृको नई पीढ़ी की आकांक्षाओं से जोड़ पाता है, तो उसके लिए राजनीतिक संभावनाएं बन सकती हैं। लेकिन यदि वह केवल आंदोलन की विरासत पर निर्भर रहा तो उसका दायरा स्मृति समारोहों तक सीमित होने का खतरा रहेगा।
भविष्य गढ़ने की चुनौती
24-25 जुलाई केवल एक राजनीतिक दल का स्थापना दिवस नहीं, बल्कि उस विचार का स्मरण है जिसने उत्तराखंड राज्य की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज जब राज्य अपने गठन के ढाई दशक पूरे करने की ओर बढ़ रहा है, तब यह सवाल पहले से अधिक प्रासंगिक हैकृक्या उत्तराखंड की राजनीति में फिर किसी मजबूत क्षेत्रीय आवाज की जरूरत है, या राष्ट्रीय दल ही राज्य की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते रहेंगे? इस प्रश्न का उत्तर 2027 का चुनाव देगा, लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड की राजनीतिक यात्रा में उत्तराखंड क्रांति दल का इतिहास हमेशा सम्मान के साथ दर्ज रहेगा। अब चुनौती इतिहास लिखने की नहीं, बल्कि भविष्य गढ़ने की है।
‘गोठ’ वीरान और पहाड़ की ‘धड़कन’ खामोश
जब गोठ आबाद थे, तब पहाड़ भी आबाद और पशुओं का वह ठिकाना भी
पहाड़ की अर्थव्यवस्था, संस्कृति व आत्मनिर्भर जीवन का था विश्वविद्यालय
आज गोठों के उजड़ने के साथ सूखती जा रही है पहाड़ की जीवन-धारा भी
दूध की बाल्टियों से झाड़ियों के जंगल,उजड़ते गोठों में कैद पहाड़ की कसक
देहरादून। पहाड़ की पहचान केवल बर्फ से ढकी चोटियों, देवदार के जंगलों और कल-कल बहती नदियों से नहीं थी। उसकी असली पहचान उन गोठों से भी थी, जो गांवों से कुछ दूर ऊंची ढलानों, बुग्यालों और जंगलों के किनारे बने होते थे। मिट्टी, पत्थर और लकड़ी से बने यह छोटे-छोटे आश्रय केवल गाय, बैल, भैंस और बकरियों के रहने की जगह नहीं थे, बल्कि पूरे पहाड़ी जीवन की धड़कन थे। आज जब पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर पड़ रहे हैं और पशुपालन सिमटता जा रहा है, तब सबसे पहले वीरान हुए हैं गोठ। जिन गोठों में कभी घंटियों की मधुर आवाज गूंजती थी, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं। जिन चौखटों पर सुबह-सुबह दूध की बाल्टियां रखी जाती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है। गोठ का उजड़ना केवल एक भवन का उजड़ना नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता का मौन हो जाना है।
राज्य के गढ़वाल और कुमाऊं में गोठ सदियों से ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। गांवों के अधिकांश परिवार खेती और पशुपालन पर निर्भर थे। खेतों की उर्वरता पशुओं के गोबर से आती थी, घर का भोजन दूध, दही, घी और छाछ से समृद्ध होता था और खेती का सबसे बड़ा सहारा बैल हुआ करते थे। इसी व्यवस्था का केंद्र था गोठ। बरसात के मौसम में हरी घास का भंडारण, सर्दियों के लिए चारे की व्यवस्था, पशुओं की देखभाल, बछड़ों का पालन और दूध निकालने से लेकर खाद तैयार करने तक का पूरा चक्र गोठ के इर्द-गिर्द चलता था। पहाड़ की अर्थव्यवस्था बैंक खातों से नहीं, गोठों की समृद्धि से मापी जाती थी। किसी परिवार के पास कितनी गायें हैं, कितने बैल हैं और गोठ कितना बड़ा हैकृयही उसकी आर्थिक स्थिति का पैमाना माना जाता था।
शाम ढलते ही गांव के बुजुर्ग गोठ पहुंच जाते थे। युवा पशुओं को चारा डालते और बच्चे वहीं खेलते-कूदते बड़े होते। यहीं लोकगीत गाए जाते, लोककथाएं सुनाई जातीं और जीवन के अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचते। बुजुर्ग बताते थे कि कौन-सी गाय किस नस्ल की है, किस बैल की चाल सबसे तेज है, किस मौसम में कौन-सी घास काटनी चाहिए और जंगल से कितना लेना है, कितना छोड़ना है। यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाया जाता था। यह पीढ़ियों से गोठ की चौखट पर हस्तांतरित होता था। यदि पहाड़ की रीढ़ महिलाएं थीं, तो उनका सबसे बड़ा कार्यस्थल गोठ था। सुबह अंधेरा रहते ही घास काटने जंगल जाना, सिर पर भारी गठरी लेकर लौटना, पशुओं को चारा देना, दूध निकालना, गोबर साफ करना और खाद तैयार करनाकृयह सब रोजमर्रा की दिनचर्या थी। गोठ महिलाओं के श्रम, धैर्य और त्याग का जीवंत प्रतीक था।
आज मशीनों और डेयरी उत्पादों के दौर में शायद उस मेहनत की कल्पना करना भी कठिन है। आज दुनिया आर्गेनिक फार्मिंग की बात करती है, लेकिन पहाड़ इसे सदियों पहले जी चुका था। गोठ में रहने वाले पशुओं का गोबर खेतों की उर्वरता बढ़ाता था। खेतों से अनाज आता था। अनाज का भूसा फिर पशुओं के चारे में जाता था। जंगल से घास आती थी, लेकिन जंगल को नुकसान पहुंचाए बिना। यह प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन का ऐसा माडल था, जिसे आज टिकाऊ विकास कहा जाता है।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद विकास की उम्मीदें जगीं, लेकिन पलायन थम नहीं सका। रोजगार की तलाश में युवा शहरों की ओर निकल गए। खेती छूटती गई। बैल ट्रैक्टर से हार गए। गायों की जगह बाजार का दूध आने लगा। धीरे-धीरे गोठों के दरवाजे बंद होने लगे। आज हजारों गांव ऐसे हैं, जहां कभी दर्जनों गोठ हुआ करते थे, लेकिन अब उनमें केवल टूटी दीवारें बची हैं। कई जगहों पर वह जंगली जानवरों का ठिकाना बन चुके हैं। जब गोठ खत्म हुए तो केवल पशुपालन नहीं घटा। खत्म हो गयाकृ खेतों का प्राकृतिक खाद चक्र, पारंपरिक बीजों की खेती, स्थानीय दुग्ध अर्थव्यवस्था, सामूहिक श्रम की संस्कृति, लोकगीतों और लोककथाओं का जीवंत मंच और बच्चों का प्रकृति से रिश्ता। यानी गोठ के साथ पूरा ग्रामीण जीवन बदल गया।
आज यदि उत्तराखंड को पलायन रोकना है तो केवल सड़क और भवन बनाना पर्याप्त नहीं होगा। पारंपरिक पशुपालन को आधुनिक तकनीक, डेयरी उद्योग, जैविक खेती और ग्रामीण पर्यटन से जोड़ना होगा। आज होमस्टे की तरह गोठ अनुभव पर्यटन विकसित किया जा सकता है, जहां पर्यटक पहाड़ी जीवन, पशुपालन, जैविक खेती और स्थानीय भोजन का अनुभव करें। पुराने गोठों का संरक्षण कर उन्हें ग्रामीण संस्कृति के संग्रहालय, प्रशिक्षण केंद्र या सामुदायिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
पहाड़ का दर्द केवल खाली होते गांव नहीं हैं। दर्द यह भी है कि अब शाम ढलते ही कहीं दूर से गायों की घंटियां नहीं सुनाई देतीं, बच्चे गोठ की आग के पास बैठकर दादी की कहानियां नहीं सुनते, बुजुर्ग अब पशुओं के नाम लेकर उन्हें पुकारते नहीं,गोठ की टूटी दीवारें आज भी खड़ी हैं, मानो अपने लोगों की राह देख रही हों। वह पूछती हैंकृक्या विकास का अर्थ अपनी जड़ों को पीछे छोड़ देना है? क्योंकि सच तो यह है कि जब तक गोठ जीवित थे, तब तक पहाड़ केवल बसता नहीं था, बल्कि सांस लेता था और यदि पहाड़ को अपनी आत्मा बचानी है, तो उसे गोठों की स्मृतियों को केवल इतिहास नहीं, भविष्य की विकास नीति का हिस्सा भी बनाना होगा।
‘दावे’ बेमिसाल पर कटघरे में ‘कंट्रोल’
यूटीयू पेपर लीक से लेकर बदरी-केदार मंदिरों के चढ़ावे तक
सरकार के दावों पर उठते सवालों को विपक्ष बना रहा हथियार
विकास की पटकथा पर भारी पड़ रहे हैं तीन सुलगते सवाल
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी शंखनाद अभी औपचारिक रूप से नहीं हुआ है, लेकिन मुद्दों की लड़ाई शुरू हो चुकी है। सत्ता पक्ष विकास, निवेश, चारधाम आल वेदर रोड, समान नागरिक संहिता, धार्मिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे की उपलब्धियों के साथ जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल ऐसे मुद्दों की तलाश में हैं, जो सरकार की विश्वसनीयता पर सीधे सवाल खड़े करें। ऐसे में तीन मुद्दे लगातार राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैंकृयूटीयू पेपर लीक का मामला, बदरी-केदार मंदिरों के चढ़ावे को लेकर उठे विवाद और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल। इन तीनों मुद्दों की प्रकृति अलग है, लेकिन विपक्ष इन्हें एक ही राजनीतिक संदेश में पिरोने की कोशिश कर रहा हैकृसरकार बड़े दावे करती है, लेकिन व्यवस्था पर नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है।
उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाला युवा पहले ही सीमित अवसरों से जूझ रहा है। ऐसे में जब परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठते हैं, तो उसका असर केवल अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हजारों परिवारों तक पहुंचता है। यूटीयू पेपर लीक का मामला इसी कारण राजनीतिक महत्व हासिल कर चुका है। विपक्ष का आरोप है कि यदि परीक्षा प्रणाली सुरक्षित नहीं है तो युवाओं का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा? सरकार का पक्ष है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बनाते हुए लगातार पूछ रहा हैकृजब दावे इतने बड़े थे तो लीक हुआ कैसे? यही सवाल अब गांवों तक पहुंच चुका है।
उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे धामों में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाया गया चढ़ावा केवल आर्थिक विषय नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक भी है। चढ़ावे से जुड़े विवादों और अनियमितताओं के आरोपों ने विपक्ष को सरकार को घेरने का नया अवसर दिया है। सरकार ने जांच, कार्रवाई और जवाबदेही की बात कही है। लेकिन विपक्ष इसे यह कहकर जनता के बीच ले जा रहा है कि जब भगवान का चढ़ावा सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा? यह राजनीतिक नारा भले हो, लेकिन चुनावी सभाओं में इसकी गूंज सुनाई देने लगी है।
भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक प्रोपेगेंडा बताते हुए विकास कार्यों को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रही है। पार्टी का दावा है कि पिछले वर्षों में सड़क, स्वास्थ्य, रेल, चारधाम परियोजनाओं, निवेश और धार्मिक पर्यटन में अभूतपूर्व काम हुआ है। भाजपा का मानना है कि जनता चुनाव में आरोप नहीं, विकास देखेगी। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विकास और जवाबदेही दोनों अलग-अलग विषय नहीं हैं। जनता अब यह भी देखना चाहती है कि यदि कोई गड़बड़ी होती है तो सरकार कितनी तेजी और पारदर्शिता से कार्रवाई करती है।
कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर सरकार के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जाए। पेपर लीक, बेरोजगारी, पलायन, मंदिरों के चढ़ावे, महंगाई और प्रशासनिक फैसलों को जोड़कर कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि राज्य में जवाबदेही कमजोर हुई है। हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौती भी कम नहीं है। उसे केवल सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह परीक्षा प्रणाली, धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन और प्रशासनिक पारदर्शिता में क्या बदलाव करेगी।
उत्तराखंड के चुनाव में हमेशा सैनिक, किसान, महिला मतदाता और क्षेत्रीय संतुलन की चर्चा होती रही है। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे लाखों युवा और उनके परिवार चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं। पेपर लीक का मामला केवल परीक्षा का नहीं, बल्कि विश्वास का संकट बन चुका है। यदि युवा यह महसूस करता है कि उसकी मेहनत सुरक्षित नहीं है, तो उसका असर सीधे मतदान पर पड़ सकता है। 2027 का चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं होगा। यह सरकार की प्रशासनिक विश्वसनीयता की भी परीक्षा होगी। क्या सरकार विवादित मामलों में समयबद्ध जांच पूरी कर पाएगी? क्या दोषियों को सजा मिलेगी? क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रुकेगी? यही वह सवाल हैं, जिनका उत्तर जनता चुनाव से पहले जानना चाहेगी।
उत्तराखंड की राजनीति में कभी सड़क मुद्दा बनी, कभी पलायन, कभी गैरसैंण, कभी भू-कानून। अब ऐसा लगता है कि युवाओं का भविष्य और व्यवस्था की विश्वसनीयता भी उसी सूची में शामिल हो चुके हैं। यदि विपक्ष इन मुद्दों को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने में सफल रहता है और सरकार समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं दिखा पाती, तो 2027 के चुनाव में विकास के साथ-साथ पेपर लीक, चढ़ावा और जवाबदेही भी बड़े चुनावी मुद्दे बन सकते हैं। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार केवल अपने काम से नहीं, बल्कि संकट के समय अपनी जवाबदेही से भी आंकी जाती है।
आधी रात पीएम का ‘मास्टरस्ट्रोक’
पेपर लीक को बताया युवाओं के सपनों पर हमला, कैबिनेट के बड़े फैसले का ऐलान
भारी दबाव के बीच पीएम का छात्रों के नाम आधी रात जारी किया विशेष वीडियो संदेश
प्रधानमंत्री मोदी बोले-युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को नहीं बख्शा जाएगा
नई दिल्ली। देशभर में पेपर लीक को लेकर जारी छात्र आंदोलनों, बढ़ते राजनीतिक दबाव और परीक्षा प्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधी रात छात्रों के नाम एक विशेष वीडियो संदेश जारी कर बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक संकेत दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि पेपर लीक केवल एक अपराध नहीं, बल्कि देश के युवाओं के सपनों पर हमला है, इसलिए केंद्र सरकार की कैबिनेट इस मुद्दे पर सख्त और व्यापक फैसला लेने जा रही है। प्रधानमंत्री का यह संदेश ऐसे समय आया है, जब देश के कई हिस्सों में छात्र संगठनों और युवाओं के विरोध प्रदर्शन जारी हैं। विपक्ष लगातार सरकार पर परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित रखने में विफल रहने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार का दावा है कि पेपर लीक माफिया के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है।
वीडियो संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा कि लाखों युवा वर्षों तक कठिन परिश्रम करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। ऐसे में यदि कुछ संगठित गिरोह प्रश्नपत्र लीक कर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि सरकार इस विषय को केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास और देश के भविष्य से जुड़ा विषय मानती है। इसी कारण कैबिनेट स्तर पर व्यापक चर्चा कर कठोर निर्णय लिए जाएंगे। प्रधानमंत्री के बयान के बाद अब राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि केंद्र सरकार परीक्षा सुरक्षा से जुड़े कानूनों, तकनीकी निगरानी, परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही और पेपर लीक मामलों में त्वरित कार्रवाई जैसे मुद्दों पर नए कदम उठा सकती है।
हालांकि सरकार ने अभी प्रस्तावित फैसलों का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन प्रधानमंत्री के बयान ने संकेत दे दिया है कि इस मुद्दे को शीर्ष स्तर पर गंभीरता से लिया जा रहा है। प्रधानमंत्री के आश्वासन के बावजूद कई राज्यों में छात्र संगठनों के प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ऐसा तंत्र चाहिए जिससे भविष्य में किसी भी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक न हो। युवाओं का कहना है कि वर्षों की तैयारी, आर्थिक कठिनाइयों और मानसिक दबाव के बाद यदि परीक्षा रद्द हो जाती है, तो उसकी भरपाई केवल दोबारा परीक्षा कराने से नहीं होती।
प्रधानमंत्री के वीडियो संदेश पर विपक्ष ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई का स्वागत है, लेकिन जनता अब घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस परिणाम देखना चाहती है। विपक्षी दलों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में गंभीर है तो बड़े नेटवर्क का खुलासा, समयबद्ध जांच, दोषियों की शीघ्र सजा और पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। प्रधानमंत्री का आधी रात का वीडियो संदेश केवल प्रशासनिक घोषणा नहीं, बल्कि युवाओं तक सीधे पहुंचने की राजनीतिक कोशिश भी है। हाल के दिनों में रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक को लेकर युवाओं की नाराजगी खुलकर सामने आई है। ऐसे में प्रधानमंत्री का सीधे छात्रों को संबोधित करना इस संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे को चुनावी बहस नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है।
पेपर लीक के खिलाफ कठोर कानून, तेज जांच और सख्त कार्रवाई की बातें पहले भी कई बार कही गई हैं। इस बार अंतर यह है कि युवाओं का धैर्य पहले से कम और अपेक्षाएं पहले से अधिक हैं। प्रधानमंत्री ने भरोसा दिया है। अब निगाहें कैबिनेट के फैसले पर हैं। क्योंकि देश के करोड़ों अभ्यर्थियों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सरकार ने क्या कहा, बल्कि यह है कि सरकार क्या करेगी।
राजनीति का ‘माइक’ ऑन, छात्रों की ‘आवाज’ म्यूट
पेपर लीक पर देशभर में उबाल बरकरार, सरकार ने की सख्त कार्रवाई की बात
विपक्ष सरकार को घेर रहा, सवाल अब भी वही हैकृयुवाओं का भरोसा लौटेगा
सिस्टम का प्रश्नपत्र, युवाओं के सवाल, राजनीति के शोर में दबी वह आवाज
नई दिल्ली। देश के अलग-अलग शहरों में एक जैसा दृश्य दिखाई दे रहा है। कहीं छात्र हाथों में तख्तियां लिए खड़े हैं, कहीं सड़कों पर मार्च निकाल रहे हैं, कहीं धरना दे रहे हैं। वह किसी एक राज्य के छात्र नहीं हैं। उनकी भाषा अलग हो सकती है, लेकिन उनका प्रश्न एक हैकृक्या मेहनत का कोई मूल्य बचा है? पेपर लीक का मामला अब किसी एक भर्ती परीक्षा का विवाद नहीं रह गया है। यह उस पीढ़ी की बेचौनी बन चुका है, जिसने बचपन से यही सुना कि पढ़-लिख लो, जिंदगी बदल जाएगी। अब वही पीढ़ी पूछ रही है कि अगर प्रश्नपत्र पहले ही बिक जाएगा, तो पढ़ाई किसके लिए करें? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक के खिलाफ और सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है। सरकार कह रही है कि माफिया के खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ बताते हुए सरकार पर लगातार हमलावर हैं। लेकिन इस पूरे राजनीतिक शोर के बीच सबसे कम सुनी जा रही आवाज उसी युवा की है, जिसके लिए यह पूरा विवाद खड़ा हुआ है।
पेपर लीक की हर घटना के बाद एक तयशुदा क्रम दिखाई देता है। सरकार जांच की घोषणा करती है। विपक्ष प्रेस कान्फ्रेंस करता है। सोशल मीडिया पर हैशटैग चलने लगते हैं। कुछ गिरफ्तारियां होती हैं। फिर कुछ दिन बाद एक नया मामला सामने आ जाता है। इस बार फर्क सिर्फ इतना है कि युवाओं का धैर्य पहले जैसा नहीं रहा। व केवल बयान नहीं सुनना चाहते। उन्हें परिणाम चाहिए। उनके लिए यह कोई टीवी डिबेट नहीं है। यह उनकी उम्र का सबसे महत्वपूर्ण समय है। एक भर्ती परीक्षा रद्द होने का मतलब सिर्फ नई तारीख नहीं होता। इसका मतलब हैकृएक और साल की तैयारी, एक और साल का खर्च, परिवार पर बढ़ता आर्थिक बोझ और मानसिक तनाव।
सरकार से सवाल है कि यदि पेपर लीक पर पहले भी कानून बने, एजेंसियां सक्रिय हुईं और गिरफ्तारियां हुईं, तो फिर बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों सामने आती हैं? लेकिन विपक्ष से भी सवाल कम महत्वपूर्ण नहीं है। जब वह सत्ता में था, तब क्या परीक्षा प्रणाली पूरी तरह निष्पक्ष थी? क्या आज का आक्रोश केवल सरकार बदलने का मुद्दा है या व्यवस्था बदलने का? युवा शायद इस राजनीतिक हिसाब-किताब में दिलचस्पी नहीं रखता। उसे इससे फर्क नहीं पड़ता कि प्रेस कान्फ्रेंस कौन कर रहा है। उसे फर्क इससे पड़ता है कि अगली परीक्षा समय पर होगी या नहीं।
यह समझना होगा कि आज का प्रदर्शन केवल पेपर लीक के खिलाफ नहीं है। यह रोजगार, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग भी है। देश का बड़ा युवा वर्ग वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है। कई अभ्यर्थी उम्र सीमा के अंतिम पड़ाव पर हैं। कई परिवार अपनी बचत कोचिंग और रहने-खाने पर खर्च कर चुके हैं। जब ऐसी स्थिति में परीक्षा रद्द होती है या पेपर लीक की खबर आती है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं रहती। यह सामाजिक और आर्थिक संकट भी बन जाती है। लोकतंत्र में जनता सरकार से असहमत हो सकती है, लेकिन सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब जनता व्यवस्था पर ही विश्वास खोने लगे। आज कई युवाओं की सबसे बड़ी चिंता यही है। उन्हें लगने लगा है कि मेहनत और मेरिट से ज्यादा ताकत संगठित गिरोहों की हो गई है। यदि यह भावना गहरी होती गई, तो नुकसान केवल एक सरकार का नहीं होगा। नुकसान उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का होगा, जो समान अवसर देने का दावा करती है।
यह भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए कि विरोध का अधिकार लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन हिंसा उसका विकल्प नहीं हो सकती। यदि किसी आंदोलन की आड़ में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है, पुलिस पर हमला होता है या अराजकता फैलाने की कोशिश होती है, तो कानून को निष्पक्ष तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन इसी के साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार न हो। लोकतंत्र में डंडा और संवादकृदोनों का अपना स्थान है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले कौन आता है।
आने वाले चुनावों में बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दे युवाओं के मतदान व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। कभी जाति चुनाव का केंद्र होती थी, कभी धर्म। अब रोजगार और परीक्षा प्रणाली भी उसी सूची में शामिल होते दिखाई दे रहे हैं। सरकार के लिए यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता का भी प्रश्न है। विपक्ष के लिए भी यह अवसर तभी है, जब वह केवल आरोप लगाने के बजाय ठोस वैकल्पिक व्यवस्था का खाका पेश करे।
इस समय देश की सड़कों पर जो भीड़ दिखाई दे रही है, उसे केवल प्रदर्शनकारी भीड़ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उस भीड़ में कोई किसान का बेटा है, कोई रिक्शा चालक की बेटी, कोई पहाड़ के गांव से आया छात्र, कोई छोटे कस्बे का अभ्यर्थी। वह सरकार बदलने नहीं निकले हैं। वह अपना भविष्य बचाने निकले हैं और लोकतंत्र में जब युवा अपने भविष्य की सुरक्षा मांगने के लिए सड़कों पर उतर आए, तब सबसे पहले राजनीतिक दलों को अपनी आवाज धीमी कर देनी चाहिए और युवाओं की आवाज सुननी चाहिए। क्योंकि चुनाव पांच साल में एक बार आते हैं, लेकिन युवाओं की उम्र दोबारा नहीं आती।
गुरुवार, 23 जुलाई 2026
युवाओं के गुस्से से हिला ‘सिस्टम‘
पीएम मोदी ने फेंका फास्ट ट्रैक का पासा, पर क्या रुक पाएगी धांधली?
फास्ट ट्रैक कोर्ट का ऐलान, लेकिन विपक्ष को अब भी दिखता है झोल
पीएम मोदी के पेपर लीक पर बड़े ऐलान के बाद सीएजेपी का पहला रिएक्शन
बोले-दोषियों को सजा मिले, लेकिन युवाओं का भरोसा भी लौटाना है जरूरी
नई दिल्ली। देशभर में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में धांधली और युवाओं के बढ़ते आक्रोश के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि पेपर लीक के दोषियों को जल्द सजा दिलाने के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे। प्रधानमंत्री के इस बयान को सरकार की ओर से युवाओं के गुस्से को शांत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि, प्रधानमंत्री के इस ऐलान के कुछ ही समय बाद कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से पहली राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आ गई। संगठन ने कहा कि केवल फास्ट ट्रैक कोर्ट बना देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। असली चुनौती परीक्षा प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार, जवाबदेही की कमी और दोषियों तक कार्रवाई पहुंचाने की है। पार्टी के नेताओं ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में पेपर लीक की घटनाएं सामने आईं। लाखों युवाओं का भविष्य प्रभावित हुआ, लेकिन अधिकांश मामलों में कार्रवाई लंबी खिंचती रही। ऐसे में यदि फास्ट ट्रैक कोर्ट वास्तव में समयब( सुनवाई कर दोषियों को सजा दिलाते हैं तो इसका स्वागत किया जाएगा।
संगठन का कहना है कि युवा अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि परिणाम चाहते हैं। यदि परीक्षा माफिया और उनके राजनीतिक संरक्षण पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तो नई व्यवस्था भी केवल कागजों तक सीमित रह सकती है। अपने बयान में कहा कि पेपर लीक का सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि इससे युवाओं का पूरे भर्ती तंत्र पर भरोसा कमजोर होता है। संगठन के अनुसार लाखों अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करते हैं, आर्थिक और मानसिक दबाव झेलते हैं, लेकिन एक पेपर लीक पूरे परिश्रम पर पानी फेर देता है। ऐसे में दोषियों को शीघ्र सजा के साथ-साथ प्रभावित अभ्यर्थियों को समयबद्ध न्याय भी मिलना चाहिए।
सीजेपी ने सरकार से मांग की कि फास्ट ट्रैक कोर्ट के साथ-साथ परीक्षा प्रणाली में भी व्यापक सुधार किए जाएं। संगठन ने सुझाव दिया किकृपरीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय हो। डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था मजबूत बनाई जाए। पेपर तैयार करने से लेकर वितरण तक हर चरण की निगरानी हो। परीक्षा माफिया और उनके नेटवर्क की राष्ट्रीय स्तर पर जांच हो। भर्ती परीक्षाओं का निश्चित कैलेंडर बनाया जाए ताकि युवाओं का समय बर्बाद न हो।
प्रधानमंत्री का यह ऐलान ऐसे समय आया है जब देशभर में पेपर लीक का मुद्दा लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में है। विपक्ष लगातार सरकार पर युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार अब सख्त कानूनी कार्रवाई का संदेश देने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर सीजेपी इस मुद्दे को केवल कानून-व्यवस्था नहीं बल्कि युवा अधिकार और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था के सवाल के रूप में पेश कर रही है। संगठन का मानना है कि यदि सरकार इस बार ठोस कार्रवाई करती है तो युवाओं का विश्वास दोबारा बनाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री के ऐलान और सीजेपी की प्रतिक्रिया के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पेपर लीक का मुद्दा अभी राजनीतिक विमर्श से बाहर नहीं होने वाला। संसद से लेकर सड़कों तक इस पर बहस जारी रहने की संभावना है। सरकार अब फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाना चाहती है, जबकि विपक्ष और छात्र संगठन इस बात पर नजर रखेंगे कि घोषणा जमीन पर कितनी तेजी से लागू होती है और क्या वास्तव में दोषियों को समयबद्ध सजा मिलती है।
पेपर लीक अब केवल कानून और व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है। यह देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य, सरकार की विश्वसनीयता और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। फास्ट ट्रैक कोर्ट का ऐलान एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जांच एजेंसियां कितनी निष्पक्षता और तेजी से काम करती हैं, अभियोजन कितना प्रभावी होता है और अदालतों में मामलों का निस्तारण वास्तव में समयबद्ध हो पाता है या नहीं। युवाओं की नजर अब घोषणा पर नहीं, बल्कि उसके परिणाम पर टिकी है।
‘अब हल्या, हल और बैल भी गुम’
रोपाई के मंगल गीतों से गूंजने वाले खेत अब हो गए है बंजर
गांवों में पीछे छूट कई लोक-समृ(ि और पुरखों की विरासत
पलायन और बंजर खेतों ने छीन ली पहाड़ की कृषि संस्कृति
इतिहास के पन्नों में खो रही पहाड़ के गांवों की आत्मनिर्भरता
देहरादून। कभी पहाड़ के गांवों की सुबह बैलों के गले में बंधे खांखरे की मधुर आवाज से होती थी। खेतों में हल चलता था, महिलाएं रोपाई के गीत गाती थीं और गोठ में बंधी गाय-भैंस गांव की समृ(ि का प्रतीक मानी जाती थीं। गांव का वह परिवार सबसे संपन्न माना जाता था, जिसके पास मजबूत बैलों की जोड़ी होती थी। बैल सिर्फ खेती का साधन नहीं, बल्कि गांव की प्रतिष्ठा, आत्मनिर्भरता और मेहनतकश जीवन का प्रतीक थे। आज वही पहाड़ एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां कई गांवों में बैलों की आखिरी जोड़ी भी गांव छोड़ने को मजबूर है।
पिछले ढाई-तीन दशकों में पहाड़ का ग्रामीण जीवन तेजी से बदला है। शिक्षा, रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में युवाओं का पलायन हुआ। गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं रह गईं। खेती श्रम मांगती है, पशुपालन चौबीस घंटे की जिम्मेदारी है। जब खेत जोतने वाले हाथ ही कम पड़ गए तो बैलों की जरूरत भी खत्म होती चली गई। पहले बैल बिके, फिर गाय-भैंसें कम हुईं और अब अधिकांश गांवों के गोठ खाली पड़े हैं।
पहाड़ में खेती छोड़ने का सबसे बड़ा प्रमाण अब खेतों में दिखने लगा है। जिन खेतों में कभी धान, मंडुवा, झंगोरा, गेहूं और राजमा की फसलें लहलहाती थीं, वहां आज झाड़ियां, चीड़ के पौधे और जंगली वनस्पति उग आई है। वर्षों से बिना जोते खेत धीरे-धीरे जंगल में बदल रहे हैं। इसके साथ ही जंगली जानवरों का आतंक भी बढ़ा है। बंदर, जंगली सूअर, साही और अन्य वन्यजीव बची-खुची खेती को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे में खेती करने की इच्छा रखने वाले किसान भी हतोत्साहित हो रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले परिवार अपनी जरूरत का अधिकांश अनाज खुद पैदा करता था। खेती जीवन का आधार थी। अब सरकारी राशन योजनाओं, बाजार तक आसान पहुंच और रोजगार के नए विकल्पों ने ग्रामीण जीवन की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने गरीब परिवारों को राहत जरूर दी, लेकिन कई क्षेत्रों में खेती पर निर्भरता भी कम होती चली गई। अब मेहनत से खेती करने की बजाय बाजार से अनाज खरीदना आसान विकल्प माना जाने लगा है।
पहाड़ के गांवों से बैलों का गायब होना केवल कृषि संकट नहीं है। इसके साथ ही पहाड़ की सदियों पुरानी संस्कृति भी कमजोर हो रही है। हरेला, रोपाई, सामूहिक श्रम, गोठ संस्कृति, जैविक खेती और पारंपरिक बीजों की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। नई पीढ़ी बैलों से जुड़ी उस जीवनशैली को देख ही नहीं पा रही, जो कभी उत्तराखंड की पहचान थी।
आने वाले समय में पहाड़ के अधिकांश गांवों में बैलों की जोड़ी केवल तस्वीरों और लोकगीतों में ही दिखाई देगी। आज भी कुछ गांवों में कोई बुजुर्ग अपनी बैलों की जोड़ी के साथ खेत जोतता दिखाई देता है। वह केवल अपनी जमीन नहीं जोत रहा होता, बल्कि एक पूरी परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश कर रहा होता है। लेकिन सवाल यह है कि उसके बाद क्या होगा? क्या अगली पीढ़ी फिर कभी हल और बैलों के साथ खेत में उतरेगी, या पहाड़ की खेती इतिहास बनकर रह जाएगी?
पहाड़ के गांवों में घटती बैलों की संख्या केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन का संकेत है जिसमें पलायन, बदलती अर्थव्यवस्था, घटती खेती और बंजर होते खेत मिलकर पहाड़ की आत्मा को धीरे-धीरे खोखला कर रहे हैं।
बाक्स
पहाड़ की बदलती तस्वीर
25-30 वर्ष पहले अधिकांश गांवों में बैलों की कई जोड़ियां होती थीं। आज अनेक गांवों में एक भी बैल नहीं बचा। खाली पड़े खेतों में झाड़ियां और जंगल तेजी से फैल रहे हैं। जंगली जानवर खेती छोड़ने की बड़ी वजह बन रहे हैं। गोठ खाली हैं, पशुपालन लगातार घट रहा है। खेती के साथ लोक संस्कृति और सामुदायिक जीवन भी कमजोर पड़ रहा है। जिस दिन पहाड़ के गांवों से आखिरी बैलों की जोड़ी भी खत्म हो जाएगी, उस दिन केवल एक कृषि परंपरा नहीं टूटेगी, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।
छात्रों के ‘दर्द’ पर सियासत का ‘पहरा’
दिल्ली में लाठियां, देहरादून में हंगामी जंग पर सवाल वही, लड़ाई युवाओं की या चुनाव की
जंतर-मंतर से संसद मार्ग और देहरादून की सड़कों तक छिड़ा राजनीतिक घमासान
सवालों के घेरे में घिरी लाठीतंत्र की तस्वीरें और 2027-2029 की चुनावी गोटियां
देहरादून। दिल्ली में लाठियां चलीं। जंतर-मंतर से संसद मार्ग तक तनाव की तस्वीरें आईं। उसके बाद राजनीति ने वही किया, जो वह अक्सर करती हैकृघटना को मुद्दे में बदला और मुद्दे को चुनाव में। दिल्ली में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए कांग्रेस ने केंद्र सरकार को लोकतंत्र का दमनकारी चेहरा बताया। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री आवास की ओर किए गए विरोध मार्च को लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ बताते हुए पलटवार शुरू कर दिया। इसका असर केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया। भाजपा कार्यकर्ता कांग्रेस मुख्यालय की ओर कूच करने निकले। उधर कांग्रेस कार्यकर्ता भी अपने दफ्तर के बाहर डट गए। पुलिस ने दोनों पक्षों के बीच बैरिकेडिंग कर दी। नारे गूंजे, आरोप लगे, जवाबी आरोप लगे, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह था कि आखिर यह लड़ाई किसके लिए थीकृछात्रों के लिए, लोकतंत्र के लिए या 2027 और 2029 की राजनीति के लिए?
राजनीति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह हर घटना का अपना अर्थ गढ़ लेती है। छात्र आंदोलन हो तो सत्ता उसे कानून-व्यवस्था का मामला बताती है। विपक्ष उसे लोकतंत्र बचाने की लड़ाई कहता है। जनता दोनों पक्षों को सुनती है और फिर अपने जीवन की ओर लौट जाती है, क्योंकि उसकी रोजमर्रा की समस्याएं न नारों से हल होती हैं और न प्रेस कान्फ्रेंस से। देहरादून में भाजपा का कांग्रेस मुख्यालय की ओर कूच केवल विरोध कार्यक्रम नहीं था। यह अपने कार्यकर्ताओं को संदेश देने का भी कार्यक्रम था कि पार्टी राहुल गांधी की राजनीति का जवाब सड़क पर भी देगी। कांग्रेस ने भी पीछे हटने का संकेत नहीं दिया। कार्यकर्ताओं को मुख्यालय पर जुटाया गया। पुलिस को पहले से अंदेशा था कि दोनों पक्ष आमने-सामने आए तो स्थिति बिगड़ सकती है। इसलिए बैरिकेडिंग पहले लगी, समझाइश बाद में हुई।
उत्तराखंड की राजनीति में यह दृश्य नया नहीं है, लेकिन इसका समय बेहद महत्वपूर्ण है। विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, फिर भी राजनीतिक दल सड़क पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगे हैं। भाजपा जानती है कि यदि छात्र आंदोलनों और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर विपक्ष को खुला मैदान मिल गया तो उसका राजनीतिक असर चुनाव तक जा सकता है। कांग्रेस समझती है कि दिल्ली की हर घटना को उत्तराखंड के युवाओं से जोड़कर सरकार को घेरा जा सकता है। यानी लड़ाई केवल दिल्ली की नहीं है। लड़ाई उस राजनीतिक नैरेटिव की है, जो आने वाले चुनावों में जनता के मन में बैठेगा।
दिलचस्प यह भी है कि दोनों दल लोकतंत्र की रक्षा का दावा कर रहे हैं। कांग्रेस कहती है कि छात्रों पर लाठी चलाना लोकतंत्र की हत्या है। भाजपा कहती है कि प्रधानमंत्री आवास का घेराव लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन है। दोनों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन आम नागरिक पूछ रहा हैकृक्या लोकतंत्र केवल तब खतरे में पड़ता है जब विरोधी दल सड़क पर उतरता है? युवाओं की नजर से देखें तो तस्वीर और अलग दिखाई देती है। उन्हें रोजगार चाहिए, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता चाहिए, शिक्षा व्यवस्था में भरोसा चाहिए। लेकिन राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं में अक्सर मुद्दों से अधिक मुद्दों की राजनीति दिखाई देती है। यही कारण है कि कई बार सड़क पर छात्रों की आवाज पीछे छूट जाती है और राजनीतिक दलों के झंडे आगे निकल जाते हैं।
देहरादून में पुलिस ने दोनों दलों को आमने-सामने आने से रोक दिया। कानून-व्यवस्था के लिहाज से यह जरूरी भी था। लेकिन यह दृश्य एक बड़ा राजनीतिक संकेत छोड़ गया। उत्तराखंड अब केवल पहाड़, पर्यटन और चारधाम की राजनीति तक सीमित नहीं रहने वाला। यहां राष्ट्रीय मुद्दों की सीधी टक्कर भी देखने को मिलेगी। दिल्ली का राजनीतिक तापमान अब देहरादून की सड़कों पर भी महसूस होगा। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सोशल मीडिया ने इस टकराव को और तीखा बना दिया है। हर दल अपने समर्थकों तक अपनी तस्वीरें पहुंचा रहा है। हर वीडियो का अपना राजनीतिक अर्थ निकाला जा रहा है। किसी के लिए यह लोकतंत्र बचाने की लड़ाई है, तो किसी के लिए अराजकता के खिलाफ संघर्ष। लेकिन कैमरे के फ्रेम से बाहर खड़ा नागरिक अभी भी महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सवालों का जवाब तलाश रहा है।
राजनीतिक दलों के लिए सड़क पर उतरना लोकतांत्रिक अधिकार है। विरोध करना भी अधिकार है। लेकिन विरोध तब सार्थक बनता है जब वह जनता के मुद्दों को केंद्र में रखे, न कि केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को घेरने का माध्यम बन जाए। यदि हर प्रदर्शन का अंत केवल नारे, धक्का-मुक्की और प्रेस बयान में होना है, तो लोकतंत्र की ऊर्जा धीरे-धीरे राजनीतिक प्रदर्शन में बदलने लगेगी। देहरादून की बैरिकेडिंग केवल दो दलों के बीच नहीं लगी थी। वह शायद उस दूरी का प्रतीक भी थी, जो राजनीति और जनता के वास्तविक सरोकारों के बीच लगातार बढ़ती जा रही है। एक तरफ सत्ता अपने बचाव में है, दूसरी तरफ विपक्ष अपने हमले में। बीच में खड़ा नागरिक अब भी इंतजार कर रहा है कि कोई उसकी बात भी सुने।
दिल्ली की लाठियों से शुरू हुई बहस देहरादून की सड़कों तक पहुंच चुकी है। आने वाले दिनों में यह टकराव और तेज हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र की असली जीत तब होगी, जब राजनीतिक दल एक-दूसरे के मुख्यालय का घेराव करने से पहले उन सवालों का घेराव करेंगे जो वर्षों से उत्तराखंड और देश के युवाओं के सामने खड़े हैं। क्योंकि आखिर में इतिहास यह नहीं पूछता कि किसने किसका दफ्तर घेरा था। इतिहास यह पूछता है कि सत्ता और विपक्षकृदोनों ने जनता के सवालों का जवाब दिया था या नहीं।
‘सपने’ नीलाम और नीतियां ‘नाकाम’
पेपर लीक-बेरोजगारी के खिलाफ सुलगी देशभर में चिंगारी
सत्ता की खामोशी, विपक्ष का दांव,लटका युवाओं का कल
भाजपा का आरोपकृराहुल छात्रों के कंधों पर कर रहे राजनीति
कांग्रेस पार्टी का जवाबकृयुवाओं की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे
देहरादून। भारतीय राजनीति में कई बार ऐसे क्षण आते हैं, जब कोई एक मुद्दा अचानक चुनावी गणित से बड़ा दिखाई देने लगता है। बेरोजगारी, परीक्षा प्रणाली, भर्ती, शिक्षा और युवाओं का भविष्यकृयह विषय लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। हाल के छात्र आंदोलनों के बाद इन मुद्दों पर राजनीतिक सक्रियता बढ़ी है। कांग्रेस ने इन आंदोलनों के साथ खुलकर अपनी एकजुटता दिखाई है, जबकि भाजपा का आरोप है कि राहुल गांधी छात्रों के मुद्दों का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। यहीं से देश की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।
भाजपा का तर्क साफ है। पार्टी का कहना है कि राहुल गांधी हर आंदोलन को राजनीतिक मंच में बदलना चाहते हैं। उसके अनुसार, छात्रों की चिंताओं का समाधान संवाद और संस्थागत प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि सड़क की राजनीति से। भाजपा नेताओं का आरोप है कि विपक्ष युवाओं के असंतोष को सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन कांग्रेस की रणनीति भी कम स्पष्ट नहीं है। राहुल गांधी लगातार छात्रों, युवाओं और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि यदि युवाओं की आवाज दबाई जाएगी, तो विपक्ष उनके साथ खड़ा होगा। पार्टी इसे केवल छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि भविष्य, अवसर और जवाबदेही का सवाल बता रही है। यहीं राजनीति दिलचस्प हो जाती है।
कई वर्षों तक राष्ट्रीय राजनीति की धुरी मंदिर, राष्ट्रवाद, सुरक्षा, कल्याणकारी योजनाएं और नेतृत्व की छवि के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन यदि युवाओं की रोजमर्रा की चिंताएंकृरोजगार, परीक्षाएं, शिक्षा और अवसरकृचुनावी विमर्श के केंद्र में आती हैं, तो राजनीतिक दलों की रणनीतियों पर भी असर पड़ सकता है। क्या इससे राष्ट्रीय राजनीतिक माहौल बदल रहा है? इसका अंतिम उत्तर अभी देना जल्दबाजी होगी। भारत का चुनावी व्यवहार कई कारकों से प्रभावित होता हैकृस्थानीय मुद्दे, नेतृत्व, गठबंधन, सामाजिक समीकरण और आर्थिक परिस्थितियां, सभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि यह जरूर कहा जा सकता है कि छात्र आंदोलनों ने युवाओं से जुड़े प्रश्नों को राष्ट्रीय बहस में अधिक प्रमुखता से ला दिया है।
भाजपा के सामने चुनौती केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब देना नहीं है, बल्कि यह भी दिखाना है कि वह युवाओं की चिंताओं को गंभीरता से सुन रही है। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं है। यदि वह छात्रों के मुद्दों को अपना राजनीतिक एजेंडा बनाती है, तो उसे केवल विरोध तक सीमित रहने के बजाय ठोस नीतिगत विकल्प भी प्रस्तुत करने होंगे। राहुल गांधी की सार्वजनिक मौजूदगी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में ऊर्जा जरूर पैदा की है। वहीं भाजपा अपने संगठन और सरकार की उपलब्धियों के आधार पर इस नैरेटिव का मुकाबला करने में जुटी है। दोनों दल यह समझते हैं कि भारत की बड़ी युवा आबादी चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या छात्र आंदोलन केवल विरोध का प्रतीक रहेगा, या वह शिक्षा, रोजगार और परीक्षा सुधार जैसे मुद्दों पर स्थायी राजनीतिक बहस को जन्म देगा?
लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन का महत्व केवल उसके नारों से नहीं, बल्कि उससे निकले नीति-परिवर्तनों से तय होता है। यदि इस पूरे घटनाक्रम का परिणाम बेहतर परीक्षा व्यवस्था, अधिक पारदर्शिता, युवाओं के लिए अवसर और जवाबदेही के रूप में सामने आता है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सफलता होगी। यदि यह केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह गया, तो सबसे बड़ा नुकसान उन छात्रों का होगा जिनके सवाल इस बहस की शुरुआत का कारण बने।
राजनीति का नया मोड़ शायद यही हैकृयुवा अब केवल वोटर नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का सक्रिय केंद्र बनते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि कौन-सा दल उनकी आकांक्षाओं को विश्वसनीय ढंग से संबोधित कर पाता है और कौन केवल राजनीतिक संदेश देने तक सीमित रह जाता है।
मंत्री की ‘चौखट’ पर युवाओं की ‘चीख’
अब हक मांगने के लिए जान दांव पर लगाने को मजबूर हो गया है उत्तराखंड का युवा
स्वास्थ्य मंत्री के आवास के बाहर नर्सिंग अभ्यर्थियों की बेबसी है व्यवस्था का आरोप-पत्र
उत्तराखंड में धरने और नारों से भी अब आगे बढ़ गया है नर्सिंग अभ्यर्थियों का आक्रोश
प्रतियोगी परीक्षाओं के फेर में उम्र और सपने गंवाते प्रदेश के युवाओं का फूट गया दर्द
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विरोध-प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है। धरने होते हैं, ज्ञापन दिए जाते हैं, नारे लगते हैं और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन जब किसी मंत्री के सरकारी आवास के बाहर युवा आत्महत्या का प्रयास करने पर मजबूर हो जाएं, तब यह केवल एक प्रदर्शन नहीं रह जाता। यह उस व्यवस्था पर आरोप-पत्र बन जाता है, जो युवाओं को उम्मीद देने के बजाय निराशा की आखिरी सीढ़ी तक पहुंचा रही है। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल के आवास के बाहर नर्सिंग अभ्यर्थियों का प्रदर्शन अचानक उस समय गंभीर मोड़ पर पहुंच गया, जब कुछ अभ्यर्थियों ने आत्महत्या का प्रयास किया। पुलिस और मौके पर मौजूद लोगों ने उन्हें रोक लिया, लेकिन सवाल वहीं रह गयाकृक्या उत्तराखंड का युवा अब अपनी बात सुनाने के लिए जान दांव पर लगाने को मजबूर हो रहा है? यह दृश्य केवल एक विभाग की भर्ती का नहीं था। यह उन हजारों युवाओं की बेचौनी का प्रतीक था, जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं, परिणामों और नियुक्तियों के बीच अपनी उम्र और उम्मीदें गंवा रहे हैं।
राजनीति अक्सर कहती है कि उत्तराखंड युवाओं का राज्य है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह युवाओं के अवसरों का भी राज्य है? नर्सिंग अभ्यर्थी सड़क पर इसलिए नहीं हैं कि उन्हें राजनीति करनी है। वह इसलिए सड़क पर हैं क्योंकि उनके हाथों में डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं। उन्होंने पढ़ाई की, प्रशिक्षण लिया, परीक्षाएं दीं और अब नियुक्ति की उम्मीद में सरकार के दरवाजे खटखटा रहे हैं। जब दरवाजे नहीं खुले तो वह मंत्री के आवास तक पहुंच गए। सरकार की भी अपनी दलील हो सकती है। भर्ती प्रक्रियाओं के अपने नियम हैं, प्रशासनिक बाधाएं हैं, वित्तीय सीमाएं हैं। लेकिन लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल नियम गिनाना नहीं, बल्कि संवाद कायम रखना भी है। यदि युवा यह महसूस करने लगें कि उन्हें सुनने वाला कोई नहीं है, तो असंतोष गहराता है।
उत्तराखंड में यह पहला अवसर नहीं है जब भर्ती से जुड़े मुद्दों ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया हो। पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, नियुक्तियों में देरी और रिक्त पदों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। हर बार सरकार ने कार्रवाई और सुधार का भरोसा दिया। लेकिन जब फिर कोई समूह सड़क पर बैठा दिखाई देता है, तो यह संकेत देता है कि समस्या अभी समाप्त नहीं हुई है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि विरोध का स्वर अब केवल नारों तक सीमित नहीं रह गया। जब कोई युवा आत्महत्या जैसा कदम उठाने की कोशिश करता है, तो यह केवल व्यक्तिगत निराशा नहीं होती यह व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास का संकेत भी हो सकता है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह मुद्दा आने वाले समय में सरकार के लिए चुनौती बन सकता है। विपक्ष निश्चित रूप से इसे बेरोजगारी, रिक्त पदों और युवाओं की उपेक्षा से जोड़कर सरकार पर हमला करेगा। कांग्रेस पहले ही रोजगार और भर्ती के मुद्दों को लगातार उठा रही है। यदि ऐसे घटनाक्रम बढ़ते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संकट भी बन सकते हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी जिम्मेदारी विपक्ष की भी है। केवल सरकार को घेरना पर्याप्त नहीं है। युवाओं की समस्याओं का समाधान केवल प्रेस कान्फ्रेंस और धरनों से नहीं निकलेगा। सत्ता और विपक्षकृदोनों को भर्ती प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, समयब( और विश्वसनीय बनाने पर गंभीर पहल करनी होगी।
उत्तराखंड के पहाड़ों से हर साल हजारों युवा रोजगार की तलाश में राज्य से बाहर जाते हैं। जो यहीं रहकर सरकारी नौकरी का सपना देखते हैं, यदि वही निराशा में डूबने लगें, तो यह किसी भी सरकार के लिए गंभीर चेतावनी है। स्वास्थ्य विभाग की विडंबना भी कम नहीं है। एक ओर अस्पतालों में स्टाफ की कमी की चर्चा होती है, दूसरी ओर प्रशिक्षित नर्सिंग अभ्यर्थी नियुक्ति की मांग को लेकर सड़कों पर हैं। यदि जरूरत और उपलब्ध मानव संसाधन के बीच संतुलन नहीं बन पा रहा, तो यह नीति-निर्माण पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अब सरकार के सामने दो रास्ते हैं। पहलाकृइस घटना को एक सामान्य प्रदर्शन मानकर भूल जाए। दूसराकृइसे एक चेतावनी की तरह ले और संवाद, पारदर्शिता तथा समयब( निर्णय के जरिए युवाओं का भरोसा लौटाने की कोशिश करे। क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी सफलता केवल योजनाएं बनाना नहीं होती, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी होता है कि उसके राज्य का कोई युवा अपने भविष्य के लिए इतना निराश न हो जाए कि उसे जीवन समाप्त करने का विचार आए।
उत्तराखंड को इस घटना को केवल एक विरोध प्रदर्शन के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक चेतावनी के रूप में देखना होगा। क्योंकि जिस राज्य का युवा उम्मीद छोड़ने लगे, वहां केवल नौकरियां नहीं, भरोसा भी संकट में पड़ जाता है।
‘डबल इंजन’ के दावों पर ‘युवा आक्रोश’ भारी
पेपर लीक, छात्रों का गुस्सा और राहुल की सियासत
भाजपा के चुनावी रथ के सामने युवाओं की नाराजगी
दिल्ली में सड़कों से उठे छात्र आंदोलन से आया भूचाल
देहरादून। राजनीति में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो भाषणों से नहीं, तस्वीरों से चुनाव बदल देती हैं। दिल्ली में छात्रों के आंदोलन पर हुई पुलिस कार्रवाई, पेपर लीक को लेकर देशभर में उठे सवाल और उसके बाद विपक्ष की आक्रामक राजनीति ने उत्तराखंड की चुनावी बिसात पर भी नई चाल चल दी है। भाजपा ने शायद सोचा था कि 2027 का चुनाव विकास, डबल इंजन, निवेश, चारधाम और संगठन की मजबूती पर लड़ा जाएगा, लेकिन अचानक पूरा विमर्श बदलता दिखाई दे रहा है। अब चर्चा सड़कों की नहीं, चर्चा स्टार्टअप की नहीं,चर्चा निवेश की नहीं, चर्चा हैकृपेपर लीक, बेरोजगारी और युवाओं के भविष्य की और राजनीति का सबसे खतरनाक सच यही होता है कि जब जनता मुद्दा तय करने लगे, तब राजनीतिक दलों की रणनीतियां अक्सर बिखरने लगती हैं।
उत्तराखंड भाजपा पिछले कई महीनों से चुनावी मोड में दिखाई दे रही थी। बूथ समितियां सक्रिय थीं, लाभार्थी सम्मेलन चल रहे थे, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार जिलों का दौरा कर रहे थे और संगठन चुनावी गणित मजबूत करने में जुटा था। लेकिन दिल्ली में छात्रों पर लाठीचार्ज और पेपर लीक की बहस ने अचानक पूरा राजनीतिक फोकस बदल दिया। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा युवा आखिर सोच क्या रहा है? क्योंकि उत्तराखंड का शायद ही कोई ऐसा गांव होगा, जहां कोई बेटा या बेटी सरकारी नौकरी की तैयारी न कर रहा हो। यानी यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं यह हर घर का मुद्दा है।
कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को चुनावी नैरेटिव में बदलने की कोशिश शुरू कर दी है। धरने,प्रदर्शन, प्रेस कान्फ्रेंस,सोशल मीडिया अभियान, हर मंच से एक ही संदेशकृयुवाओं की लड़ाई अब कांग्रेस की लड़ाई है। राहुल गांधी लगातार छात्रों और युवाओं के मुद्दों पर मुखर दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस की कोशिश है कि छात्र असंतोष को रोजगार, भर्ती और शिक्षा व्यवस्था से जोड़कर सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाए। यही कारण है कि भाजपा लगातार आरोप लगा रही है कि राहुल गांधी छात्रों के मुद्दों पर राजनीति कर रहे हैं। लेकिन राजनीति में सवाल यह नहीं होता कि कौन राजनीति कर रहा है। सवाल यह होता है कि जनता किसकी बात सुन रही है।
उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक सड़क, पलायन, चारधाम, क्षेत्रीय अस्मिता और विकास के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन इस बार तस्वीर अलग है। हर भर्ती, हर परीक्षा,हर नियुक्ति अब केवल प्रशासनिक मामला नहीं रह गई है। वह सीधे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुकी है। युवाओं के बीच यह धारणा बनी कि उनकी मेहनत का सम्मान नहीं हो रहा, तो इसका असर सीधे मतदान पर पड़ सकता है। यही भाजपा की सबसे बड़ी चिंता मानी जा रही है। चुनाव भाषणों से कम और माहौल से ज्यादा जीते जाते हैं। यदि विपक्ष यह माहौल बनाने में सफल हो गया कि सरकार युवाओं के सवालों से बच रही है, तो सत्ता के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि भाजपा अब केवल कांग्रेस का जवाब नहीं दे रही, बल्कि युवाओं तक यह संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रही है कि सरकार रोजगार, भर्ती और पारदर्शिता के मुद्दों पर गंभीर है। यानी चुनावी रणनीति के साथ-साथ डैमेज कंट्रोल भी शुरू हो चुका है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल सरकार बनाम विपक्ष नहीं होगा। यह उम्मीद बनाम निराशा की लड़ाई भी हो सकती है। एक तरफ भाजपा विकास का रिपोर्ट कार्ड लेकर जाएगी। दूसरी तरफ कांग्रेस युवाओं की नाराजगी को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। अब देखना यह होगा कि जनता विकास के दावों पर भरोसा करती है या रोजगार के सवालों पर सरकार से जवाब मांगती है। राजनीति में सरकारें हमेशा विपक्ष से नहीं हारतीं। सरकारें तब मुश्किल में आती हैं, जब युवाओं की उम्मीदें सवाल बन जाती हैं। 2027 के चुनाव में शायद जनता नेताओं से यह नहीं पूछेगी कि कितनी सड़कें बनीं, बल्कि यह पूछेगीकृकि कितने युवाओं को नौकरी मिली? कितनी भर्तियां समय पर पूरी हुईं? पेपर लीक कब रुकेगा? यही वह सवाल हैं जो उत्तराखंड की चुनावी राजनीति का चेहरा बदल सकते हैं।
शांत उत्तराखंड में ‘उबल’ रही है सियासत
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 की जंग से पहले बदला चुनावी मौसम
सत्ता के सामने युवाओं के सवाल और विपक्ष के सामने भरोसे की चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति ऊपर से जितनी शांत दिखाई देती है, भीतर उतनी ही बेचौन है। सचिवालय से लेकर सत्ता के गलियारों तक, भाजपा कार्यालय से लेकर कांग्रेस भवन तक, हर जगह एक ही चर्चा हैकृ2027 की लड़ाई किस मुद्दे पर लड़ी जाएगी? कुछ महीने पहले तक ऐसा लग रहा था कि भाजपा विकास, चारधाम, समान नागरिक संहिता, निवेश, बुनियादी ढांचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनावी आधार बनाएगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सक्रियता भी इसी दिशा में दिखाई दे रही थी। दूसरी ओर कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और सत्ता विरोधी माहौल बनाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन अचानक राजनीतिक समीकरण बदलने लगे हैं।
पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाएं, भर्ती प्रक्रिया, बेरोजगारी, छात्रों का आक्रोश और युवाओं के प्रदर्शन जैसे मुद्दों ने चुनावी बहस में जगह बनानी शुरू कर दी है। राष्ट्रीय स्तर पर उठे इन सवालों की गूंज उत्तराखंड तक पहुंच रही है। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यही निर्णायक चुनावी मुद्दे बनेंगे, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इन विषयों ने राजनीतिक चर्चा का दायरा बढ़ा दिया है। सत्ता विरोधी लहर हर चुनाव में एक स्वाभाविक राजनीतिक चुनौती होती है। भाजपा के सामने भी यह चुनौती है कि वह लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लिए जनता का विश्वास कैसे बनाए रखे।
पार्टी के पक्ष में कुछ मजबूत आधार हैंकृसंगठन की ताकत, केंद्र और राज्य की समन्वित राजनीति, कल्याणकारी योजनाओं का लाभार्थी नेटवर्क और मुख्यमंत्री धामी की सक्रिय छवि। दूसरी ओर उसे यह भी ध्यान रखना होगा कि रोजगार, भर्ती, पलायन, स्वास्थ्य सेवाएं और पर्वतीय क्षेत्रों की मूलभूत समस्याएं जनता की प्राथमिकताओं में बनी हुई हैं। यदि विपक्ष इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाता है, तो भाजपा को केवल उपलब्धियां गिनाने से आगे बढ़कर समाधान और संवाद दोनों पर जोर देना होगा। कांग्रेस के लिए यह अवसर भी है और परीक्षा भी। पार्टी को कई मुद्दे मिले हैंकृबेरोजगारी, भर्ती, महंगाई, पलायन और स्थानीय असंतोष। लेकिन केवल सरकार की आलोचना चुनाव नहीं जिताती। कांग्रेस को यह भी दिखाना होगा कि उसके पास शासन का स्पष्ट विकल्प और विश्वसनीय नेतृत्व है। यदि पार्टी केवल विरोध तक सीमित रहती है, तो उसका असर सीमित रह सकता है। लेकिन यदि वह ठोस नीति, संगठनात्मक एकजुटता और स्थानीय नेतृत्व के साथ मैदान में उतरती है, तो मुकाबला अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकता है।
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दल लंबे समय से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राज्य गठन में उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही, लेकिन चुनावी स्तर पर वह लगातार सीमित होते गए हैं। फिर भी, यदि स्थानीय मुद्देकृजल, जंगल, जमीन, पलायन और पर्वतीय अस्मिताकृअधिक प्रमुखता से उभरते हैं, तो क्षेत्रीय दलों को कुछ क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का अवसर मिल सकता है। राज्य की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार से जुड़ी है। युवाओं की अपेक्षाएं केवल सरकारी नौकरी तक सीमित नहीं हैं। वह पारदर्शी भर्ती, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निजी निवेश, स्थानीय रोजगार और उद्यमिता के अवसर भी चाहते हैं। यदि राजनीतिक दल इन आकांक्षाओं को गंभीरता से लेते हैं, तो चुनावी बहस का स्तर भी बदल सकता है।
राजनीतिक शोर के बीच उत्तराखंड के मूल प्रश्न अब भी वहीं हैं। पलायन कब रुकेगा? सीमांत गांव कैसे आबाद होंगे? खेती और बागवानी को कैसे लाभकारी बनाया जाएगा? स्वास्थ्य सेवाएं पहाड़ तक कब पहुंचेंगी? शिक्षा और रोजगार के लिए युवाओं को राज्य छोड़ना कब बंद होगा? पर्यटन का लाभ स्थानीय समुदाय तक कैसे पहुंचेगा? इन सवालों का उत्तर किसी एक चुनावी भाषण से नहीं मिलेगा। इनके लिए दीर्घकालिक नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों की आवश्यकता है।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि 2027 का चुनाव किस दल के पक्ष में जाएगा। लेकिन इतना निश्चित है कि यह चुनाव केवल नारों का नहीं होगा। जनता विकास भी देखेगी, रोजगार भी पूछेगी। कल्याणकारी योजनाएं भी याद रखेगी, स्थानीय समस्याएं भी। नेतृत्व भी परखेगी और उम्मीदवार भी। उत्तराखंड आज एक ऐसे राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है जहां सत्ता के सामने विश्वास बनाए रखने की चुनौती है और विपक्ष के सामने विश्वसनीय विकल्प बनने की। 2027 की राह अभी लंबी है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस बार चुनाव केवल सरकार बदलने या बचाने का नहीं होगा। यह इस बात की भी परीक्षा होगी कि कौन-सा राजनीतिक दल उत्तराखंड के पहाड़, युवाओं और भविष्य की आकांक्षाओं को सबसे प्रभावी ढंग से समझ और संबोधित कर पाता है।
बुधवार, 22 जुलाई 2026
सुविधाओं के बाजार में यादों का ठिकाना ‘व्यासी’
चारधाम यात्रा की तस्वीर बदली, लेकिन व्यासी में आज भी जिंदा है पुरानी यादों की सोंधी महक
चमचमाती सड़कों और कैफे के दौर में व्यासी, यहाँ आज भी ठहरती हैं यात्रियों की पुरानी यादें
बदरीनाथ हाईवे का व्यासी एक दौर में था गढ़वाल के पहाड़ी गांवों की आत्मीयता का पहला पता
ऋषिकेश-बदरीनाथ मार्ग का वह पड़ाव, जहां पराठों की खुशबू आज भी है हर पहाड़ी के जहन में
देहरादून। चारधाम यात्रा मार्ग पर आज चमचमाती सड़कें हैं। आधुनिक होटल हैं, फूड प्लाजा हैं, कैफे हैं और हर कुछ किलोमीटर पर यात्रियों के लिए नई सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन इन सबके बीच ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित व्यासी आज भी एक ऐसा नाम है, जिसे सुनते ही पुरानी पीढ़ी की आंखों में यादों की पूरी यात्रा उतर आती है। व्यासी केवल एक पड़ाव नहीं था, बल्कि पहाड़ और यात्रियों के बीच आत्मीयता का पहला परिचय था। यह वह स्थान था, जहां पहाड़ की कठिन यात्रा शुरू होने से पहले लोग कुछ पल सुकून से बैठते थे, जहां चूल्हे पर सिकते पराठों की महक भूख ही नहीं, सफर की थकान भी मिटा देती थी।
आज ऋषिकेश से बदरीनाथ की यात्रा पहले की तुलना में कहीं आसान हो गई है। लेकिन तीन-चार दशक पहले यह सफर किसी परीक्षा से कम नहीं होता था। सड़कें संकरी थीं, जगह-जगह कच्चे हिस्से थे और बरसात में घंटों जाम लग जाना सामान्य बात थी। उस दौर में व्यासी यात्रियों के लिए राहत का पहला बड़ा ठिकाना हुआ करता था। चमोली, रुद्रप्रयाग और बदरीनाथ-केदारनाथ, हेमकुड सहित अन्य स्थानों की ओर जाने वाली लगभग हर बस, टैक्सी और ट्रक यहां कुछ देर जरूर रुकते थे। बस रुकते ही यात्री सीधे ढाबों की ओर बढ़ते और कुछ ही देर में पूरे बाजार में चाय की भाप और तवे पर सिकते पराठों की खुशबू फैल जाती थी।
यदि गढ़वाल के किसी बुजुर्ग या पुराने यात्री से व्यासी की पहचान पूछी जाए तो पहला जवाब होगाकृव्यासी के पराठे। देसी घी या मक्खन से सने मोटे पराठे, आलू की सब्जी, घर का बना अचार और कुल्हड़ की चाय। यह भोजन किसी होटल के मेन्यू का हिस्सा नहीं था, बल्कि पहाड़ की मेहमाननवाजी का प्रतीक था। कई परिवारों के बच्चों के लिए गांव की यात्रा का सबसे रोमांचक पड़ाव व्यासी ही होता था। बच्चे बस में बैठकर पूछते रहते थेकृव्यासी कब आएगा? क्योंकि उन्हें मालूम होता था कि अब गर्मागर्म पराठे मिलने वाले हैं। व्यासी केवल तीर्थयात्रियों का पड़ाव नहीं था। गढ़वाल के हजारों लोगों के लिए यह घर लौटने का पहला एहसास था। ऋषिकेश और देहरादून से अपने गांव लौटते लोग जब व्यासी पहुंचते थे, तो मानो उन्हें लगता था कि अब वह सचमुच अपने पहाड़ में प्रवेश कर चुके हैं।
यहां गंगा की कलकल, जंगलों की हरियाली और पहाड़ों से आती ठंडी हवा यात्रियों का स्वागत करती थी। कई लोग भोजन से पहले गंगा किनारे जाकर कुछ देर बैठते थे। किसी के लिए यह विश्राम था, तो किसी के लिए प्रकृति के बीच कुछ पल बिताने का अवसर। चारधाम आल वेदर रोड परियोजना के बाद इस पूरे मार्ग की तस्वीर बदल चुकी है। यात्रा पहले की अपेक्षा तेज और सुविधाजनक हो गई है। नए होटल, आधुनिक रेस्टोरेंट और फूड कोर्ट यात्रियों को आकर्षित कर रहे हैं। आज भी जो लोग वर्षों बाद इस मार्ग से गुजरते हैं, उनकी नजर अनायास ही व्यासी के बोर्ड पर टिक जाती है। कई वाहन यहां धीमे हो जाते हैं, क्योंकि यादें अक्सर रफ्तार से ज्यादा मजबूत होती हैं।
व्यासी ने केवल यात्रियों को भोजन नहीं दिया, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार और पहचान भी दी। यहां के ढाबे, छोटी दुकानें और स्थानीय उत्पाद बेचने वाले परिवार वर्षों तक इस मार्ग की जीवनरेखा बने रहे। यात्रियों और स्थानीय लोगों के बीच जो अपनापन यहां दिखाई देता था, वह आज भी पहाड़ की सामाजिक संस्कृति का उदाहरण माना जाता है। यहां कोई ग्राहक नहीं होता था, हर आने वाला मेहमान होता था। आज की पीढ़ी शायद व्यासी को केवल एक स्थान के रूप में जानती है, लेकिन इसके पीछे दशकों का इतिहास और हजारों यात्राओं की स्मृतियां जुड़ी हैं। यह वह पड़ाव है जिसने चारधाम यात्रा को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय अनुभव भी बनाया।
आज के दौर में भी व्यासी सिखाता है कि यात्राएं केवल मंजिल तक पहुंचने का नाम नहीं होतीं, बल्कि रास्ते में मिलने वाले लोग, स्वाद, दृश्य और पड़ाव ही उन्हें यादगार बनाते हैं। व्यासी आज भी वहीं हैकृगंगा के किनारे, पहाड़ों की गोद में। समय ने उसका स्वरूप बदला होगा, लेकिन उसकी आत्मा आज भी वैसी ही है। जब भी कोई पुराना यात्री इस मार्ग से गुजरता है, उसके मन में एक ही बात कौंधती है। व्यासी इसलिए खास नहीं कि वहां कभी अच्छे पराठे मिलते थे, बल्कि इसलिए कि वहां पहाड़ का अपनापन परोसा जाता था और यही अपनापन उसे आज भी गढ़वाल की यात्रा का सबसे भावनात्मक पड़ाव बनाता है।
‘इस्तीफा दो या गद्दी छोड़ो’
केंद्रीय शिक्षा मंत्री पर अब आर-पार का संग्राम हुआ शुरू, संसद में से लेकर सड़कों पर जंग
भाजपा बोलीदृ-राजनीति चमकाने का हथियार, कांग्रेस ने कहा-जवाबदेही से भाग नहीं सकती सरकार
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर घमासान तेज, पेपर लीक व युवाओं के आंदोलन ने बढ़ाई सियासी तपिश
नई दिल्ली। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग अब केवल विपक्ष का राजनीतिक नारा नहीं रह गई है, बल्कि संसद से लेकर सड़क तक राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुकी है। एक ओर कांग्रेस और विपक्षी दल पेपर लीक प्रकरण, युवाओं के आंदोलन और जंतर-मंतर पर हुई पुलिस कार्रवाई को मुद्दा बनाकर शिक्षा मंत्री की नैतिक जिम्मेदारी तय करने की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी इसे पूरी तरह राजनीति से प्रेरित अभियान बताकर विपक्ष पर युवाओं को गुमराह करने का आरोप लगा रही है। संसद के मानसून सत्र में यह मुद्दा लगातार गूंज रहा है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की, जबकि सदन के बाहर भी प्रदर्शन और राजनीतिक बयानबाजी ने माहौल गरमा दिया है। इससे साफ है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा अब केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है।
भाजपा का कहना है कि विपक्ष पेपर लीक और छात्रों की नाराजगी को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहा है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि केंद्र सरकार परीक्षा प्रणाली में सुधार, तकनीकी निगरानी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए लगातार कदम उठा रही है, लेकिन विपक्ष तथ्यों के बजाय भावनाओं की राजनीति कर रहा है। भाजपा का यह भी कहना है कि किसी भी अनियमितता की जांच एजेंसियां कर रही हैं और केवल राजनीतिक दबाव बनाकर किसी मंत्री का इस्तीफा मांगना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है। पार्टी के अनुसार, विपक्ष का उद्देश्य युवाओं की समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि संसद का कामकाज बाधित करना और सरकार को राजनीतिक रूप से घेरना है।
कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जब लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर हो और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हों, तब सरकार केवल राजनीतिक साजिश का तर्क देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि बार-बार परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर विवाद सामने आ रहे हैं, तो संबंधित मंत्रालय की जवाबदेही तय होना स्वाभाविक है। पार्टी का आरोप है कि सरकार आंदोलनकारियों की बात सुनने के बजाय पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझी हुई है। राहुल गांधी सहित विपक्ष के कई नेताओं ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को नैतिक जवाबदेही का प्रश्न बताया है और कहा है कि सरकार को युवाओं का विश्वास बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए लाठीचार्ज के बाद छात्र और युवा संगठनों के विरोध-प्रदर्शन कई राज्यों तक फैल गए। उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों में भी प्रदर्शन हुए, जहां युवाओं ने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठाई। इसी आंदोलन ने विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का नया अवसर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं के मुद्दे पर यदि आंदोलन लंबा चलता है, तो यह आने वाले चुनावी विमर्श को भी प्रभावित कर सकता है। संसद के भीतर विपक्ष शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़ा है, जबकि सरकार इस मांग को खारिज कर रही है। सदन के बाहर प्रदर्शन, प्रेस कॉन्फ्रेंस और राजनीतिक बयानबाजी ने इस मुद्दे को और अधिक गर्मा दिया है। भाजपा का कहना है कि विपक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं में अविश्वास का माहौल बना रहा है, जबकि कांग्रेस का आरोप है कि सरकार आलोचना को स्वीकार करने के बजाय उसे राजनीतिक षड्यंत्र बताकर टाल रही है।
इस पूरे विवाद में दोनों पक्ष केवल एक मंत्री के इस्तीफे की लड़ाई नहीं लड़ रहे, बल्कि युवाओं के बीच अपना राजनीतिक संदेश स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि सरकार व्यवस्था सुधारने के लिए प्रतिबद्ध है और विपक्ष मुद्दों का राजनीतिकरण कर रहा है। कांग्रेस और विपक्ष यह दिखाना चाहते हैं कि वे युवाओं की आवाज के साथ खड़े हैं और सरकार जवाबदेही से बच रही है। यानी, लड़ाई केवल धर्मेंद्र प्रधान के पद पर बने रहने या न रहने की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक नैरेटिव की है, जो आने वाले समय में युवाओं की राजनीति को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल भाजपा अपने रुख पर कायम है और इस्तीफे की मांग को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित बता रही है। दूसरी ओर कांग्रेस और विपक्ष इस मुद्दे को छोड़ने के संकेत नहीं दे रहे। यदि युवाओं का आंदोलन जारी रहता है और संसद में गतिरोध बना रहता है, तो यह टकराव और तेज हो सकता है।
स्पष्ट है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा अब प्रशासनिक निर्णय से अधिक राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह बहस केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहती है या परीक्षा व्यवस्था और युवाओं की चिंताओं पर ठोस नीति-स्तर की चर्चा भी आगे बढ़ती है।
दिल्ली से उठी चिंगारी, देशभर में फैली
जंतर-मंतर लाठीचार्ज के बाद कई राज्यों में जेन जेड का प्रदर्शन तेज
पेपर लीक पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग ने पकड़ लिया है तूल
उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में भी युवाओं ने विरोध-प्रदर्शन हुआ शुरू
नई दिल्ली/देहरादून। दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर संसद कूच कर रहे युवाओं पर हुए लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ने की गूंज अब राजधानी की सीमाओं से निकलकर पूरे देश में सुनाई देने लगी है। जिस आंदोलन को शुरुआत में दिल्ली तक सीमित माना जा रहा था, वह अब राष्ट्रीय युवा असंतोष का रूप लेता दिखाई दे रहा है। कई राज्यों में छात्रों और युवाओं ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं, जबकि उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में भी युवाओं ने विरोध-प्रदर्शन कर पेपर लीक मामलों की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठानी शुरू कर दी है।
संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने बैरिकेडिंग की, लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में भी लिया गया। लेकिन इस कार्रवाई के बाद आंदोलन कमजोर पड़ने के बजाय और व्यापक हो गया। अगले ही दिन जंतर-मंतर पर फिर बड़ी संख्या में युवा जुटे। सोशल मीडिया पर आंदोलन के समर्थन में अभियान तेज हो गया और देश के कई विश्वविद्यालयों तथा छात्र संगठनों ने भी प्रदर्शन की घोषणा कर दी। युवाओं का कहना है कि उनका आंदोलन केवल किसी एक परीक्षा या एक भर्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग का आंदोलन है।
दिल्ली की घटना के बाद विभिन्न राज्यों में छात्र संगठनों, युवा मंचों और सामाजिक संगठनों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। कई स्थानों पर मशाल जुलूस निकाले गए, धरने दिए गए और जिलाधिकारियों के माध्यम से ज्ञापन सौंपे गए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि राजधानी में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर बल प्रयोग किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवाल खड़े करता है। आंदोलन अब केवल पेपर लीक का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि युवाओं के सम्मान, भविष्य और शासन की जवाबदेही का प्रतीक बनता जा रहा है।
देवभूमि उत्तराखंड भी इस आंदोलन की आंच से अछूता नहीं रहा। देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, श्रीनगर और अन्य स्थानों पर छात्र संगठनों और युवाओं ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। कई जगहों पर केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी हुई और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपे गए। उत्तराखंड के युवाओं का कहना है कि राज्य पहले ही भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और पेपर लीक जैसी घटनाओं का दंश झेल चुका है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर उठ रहे आंदोलन के प्रति उनका समर्थन स्वाभाविक है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि परीक्षा प्रणाली पर भरोसा ही खत्म हो जाए, तो युवाओं के सामने सबसे बड़ा संकट उनके भविष्य का होता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को भी सरकार को घेरने का बड़ा अवसर दिया है। संसद के भीतर और बाहर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया और सरकार पर युवाओं की आवाज दबाने का आरोप लगाया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार आंदोलन को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है, जबकि असली मुद्दा युवाओं का भविष्य और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता है।
सरकार की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है और किसी को भी संसद की सुरक्षा व्यवस्था भंग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि केवल प्रशासनिक कार्रवाई से यह आंदोलन थमता नहीं दिख रहा। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती हैकृएक ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखना और दूसरी ओर युवाओं के बीच बढ़ते असंतोष को संवाद के माध्यम से कम करना। यदि आंदोलन और राज्यों में फैलता है, तो यह केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक चुनौती भी बन सकता है।
प्रदर्शन कर रहे युवाओं का कहना है कि वर्षों की मेहनत के बाद यदि परीक्षाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान उन लाखों अभ्यर्थियों का होता है जिन्होंने ईमानदारी से तैयारी की है। उनका तर्क है कि भर्ती और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि लगातार विवाद सामने आते हैं, तो युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठने लगता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच शीघ्र संवाद स्थापित नहीं हुआ, तो यह आंदोलन और व्यापक हो सकता है। विशेष रूप से ऐसे समय में, जब युवाओं के मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। दिल्ली से उठी यह आवाज अब कई राज्यों तक पहुंच चुकी है। उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों में शुरू हो रहे प्रदर्शन संकेत दे रहे हैं कि यह केवल राजधानी का आंदोलन नहीं रहा। जंतर-मंतर पर चली लाठियों की गूंज अब देशभर के विश्वविद्यालयों, सड़कों और जनसभाओं तक सुनाई दे रही है। सवाल केवल यह नहीं कि प्रदर्शन कब थमेगा, बल्कि यह है कि क्या सरकार युवाओं की नाराजगी को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानेगी या उसे लोकतांत्रिक संवाद का अवसर समझेगी। आने वाले दिनों में इसी सवाल का जवाब इस आंदोलन की दिशा और देश की राजनीति दोनों तय कर सकते हैं।
सड़क से संसद तक ‘संग्राम’
युवाओं पर लाठीचार्ज के बाद भड़क गया जनआक्रोश
राहुल गांधी के नेतृत्व में पीएम आवास का किया घेराव
युवाओं के आक्रोश ने सत्ता को कमरों से बाहर निकली
नई दिल्ली। संसद के भीतर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं, लेकिन असली लड़ाई अब संसद से निकलकर सड़कों पर दिखाई देने लगी है। संसद कूच कर रहे युवाओं पर हुए लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल के बाद जो आंदोलन थमता हुआ दिखाई दे रहा था, उसने अब नया राजनीतिक मोड़ ले लिया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पूरा विपक्ष प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च करता दिखा और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर चौतरफा हमला बोला।
दिल्ली की सड़कों पर उठते नारों ने यह संदेश दे दिया है कि यह केवल छात्रों या युवाओं का विरोध नहीं रह गया है, बल्कि अब यह राजनीतिक प्रतिरोध का बड़ा मंच बनता जा रहा है। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिस आंदोलन को शुरुआती दौर में सीमित मानकर देखा जा रहा था, उसी आंदोलन के बढ़ते दबाव ने सत्ता पक्ष के नेताओं और सरकार के प्रतिनिधियों को भी एयर-कंडीशन दफ्तरों से निकलकर सड़क पर आने और प्रदर्शनकारियों से संवाद करने के लिए मजबूर कर दिया। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत है।
लोकतंत्र में सरकारें संसद के बहुमत से चलती हैं, लेकिन राजनीतिक माहौल अक्सर सड़क का मूड तय करता है। पिछले कुछ दिनों में यही देखने को मिला। संसद मार्ग पर लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस छोड़ी गई, बैरिकेड लगाए गए, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। लेकिन इसके बाद भी आंदोलन खत्म नहीं हुआ। जंतर-मंतर पर युवाओं की भीड़ लगातार जुटती रही। आंदोलनकारियों के बीच एक नारा तेजी से लोकप्रिय हुआकृलाठी खाई है, झुकेंगे नहीं। यह केवल नारा नहीं, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध का संकेत है जिसने आंदोलन को नई ऊर्जा दी। सरकार शायद यह मानकर चल रही थी कि पुलिस कार्रवाई के बाद विरोध कमजोर पड़ जाएगा, लेकिन घटनाक्रम ने ठीक उलटा संदेश दिया। हर लाठीचार्ज के बाद आंदोलन और व्यापक होता दिखाई दिया।
विपक्ष लंबे समय से ऐसे किसी बड़े मुद्दे की तलाश में था, जिस पर वह सरकार को एक साथ घेर सके। युवाओं के आंदोलन ने वह अवसर उपलब्ध करा दिया। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों का एकजुट होकर प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च करना केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं था। इसका स्पष्ट राजनीतिक संदेश था कि विपक्ष अब युवाओं के असंतोष को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। लोकसभा के भीतर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर तीखे हमले हुए और सदन के बाहर इस्तीफे की मांग ने आंदोलन को राजनीतिक धार दे दी। यह वही रणनीति है, जिसे विपक्ष पिछले कुछ वर्षों से अपनाता रहा हैकृजनता के किसी बड़े असंतोष को राजनीतिक आंदोलन में बदलना।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार ने इस आंदोलन की गंभीरता को देर से समझा? जिन नेताओं को अब तक केवल प्रेस कान्फ्रेंस और सोशल मीडिया के जरिए प्रतिक्रिया देते देखा जा रहा था, वे अब आंदोलनकारियों से बातचीत करते नजर आने लगे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया। दरअसल, सरकार को यह एहसास होने लगा है कि यदि युवाओं का असंतोष लंबा खिंचता है, तो उसका असर केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले विधानसभा चुनावों और भविष्य की राजनीति पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। युवा किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत होते हैं। जब यही वर्ग सड़कों पर उतर आता है, तो सरकारें केवल प्रशासनिक कार्रवाई के भरोसे स्थिति को नियंत्रित नहीं रख सकतीं।
सरकार लगातार यह कह रही है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। यह तर्क अपनी जगह सही भी है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हर विरोध का जवाब पुलिस बल से दिया जा सकता है? यदि हजारों युवा अपनी बात कहने के लिए राजधानी तक पहुंच रहे हैं, तो यह केवल सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि भरोसे का संकट भी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे आंदोलनों में सबसे बड़ी गलती तब होती है, जब सत्ता उन्हें केवल प्रशासनिक चुनौती मानकर देखती है। यदि संवाद की जगह टकराव हावी हो जाए, तो आंदोलन का दायरा और बढ़ जाता है।
लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष लगातार सरकार को घेरने के लिए नए मुद्दों की तलाश में था। युवाओं का आंदोलन अब उसके लिए एक मजबूत राजनीतिक नैरेटिव बनता दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी लगातार युवाओं, छात्रों और रोजगार के मुद्दों को उठाते रहे हैं। अब सड़क पर चल रहे आंदोलन ने उनकी राजनीति को नई जमीन दे दी है। यदि यह आंदोलन लंबे समय तक जारी रहता है, तो विपक्ष इसे ष्युवा बनाम सरकारष् के राजनीतिक फ्रेम में बदलने की कोशिश करेगा। राजनीति में कई बार सबसे बड़ा नुकसान विरोध से नहीं, बल्कि विरोध को कम आंकने से होता है। सरकार के सामने चुनौती केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नहीं, बल्कि यह भरोसा दिलाने की भी है कि युवाओं की आवाज सुनी जा रही है। यदि सरकार केवल पुलिस कार्रवाई के सहारे आंदोलन को नियंत्रित करने की कोशिश करती है, तो इससे विपक्ष को और बड़ा राजनीतिक अवसर मिल सकता है। वहीं यदि संवाद, समाधान और पारदर्शिता की दिशा में ठोस पहल होती है, तो स्थिति सामान्य होने की संभावना भी बन सकती है।
दिल्ली की सड़कों पर पिछले कुछ दिनों में जो तस्वीर बनी है, उसका संदेश स्पष्ट हैकृलाठी से भीड़ हट सकती है, लेकिन असंतोष नहीं। जब युवा लगातार सड़कों पर डटे रहें, विपक्ष उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर मार्च करे और सरकार के प्रतिनिधियों को भी बातचीत के लिए मैदान में उतरना पड़े, तो यह केवल एक आंदोलन नहीं रहता, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति का महत्वपूर्ण क्षण बन जाता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस चुनौती का जवाब केवल प्रशासनिक कदमों से देती है या संवाद और राजनीतिक पहल के जरिए। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी होगा कि विपक्ष इस मुद्दे को रचनात्मक समाधान की दिशा में ले जाता है या केवल राजनीतिक लाभ तक सीमित रखता है। फिलहाल इतना तय है कि संसद के भीतर की बहस अब सड़क पर उतर चुकी है, और सड़क की गूंज संसद की दीवारों तक साफ सुनाई दे रही है।
सत्ता की ‘होड़’ और अन्य दलों का ‘खेल’
भाजपा-कांग्रेस ही नहीं, बसपा, सपा और आप भी उतरी मैदान में
संगठन विस्तार, कार्यकर्ता सम्मेलन और जनसंपर्क अभियान तेज
2027 की सत्ता की जंग का बिगुल उत्तराखंड में समय से पहले बजा
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी रणभूमि में अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। सत्तारूढ़ भाजपा जहां अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और क्षेत्रीय दल भी अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने के लिए लगातार सक्रियता बढ़ा रहे हैं। इस बार चुनावी मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा। भले ही सत्ता की सीधी लड़ाई इन्हीं दो दलों के बीच मानी जा रही हो, लेकिन छोटे दल कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बनाकर परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और प्रदेश नेतृत्व लगातार संगठनात्मक बैठकों, कार्यकर्ता सम्मेलनों और जनसंपर्क अभियानों में व्यस्त हैं। भाजपा की रणनीति साफ हैकृसरकार की योजनाओं, चारधाम परियोजनाओं, सड़क, रेल, पर्यटन, निवेश और महिला कल्याण कार्यक्रमों को चुनावी मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाना। पार्टी गांव-गांव और घर-घर पहुंचने की रणनीति पर काम कर रही है। बूथ समितियों को सक्रिय करने के साथ-साथ युवा, महिला और सोशल मीडिया नेटवर्क को भी मजबूत किया जा रहा है। भाजपा का मानना है कि मजबूत संगठन और लाभार्थी वर्ग उसके लिए सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, किसानों और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर है। प्रदेश स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ता सम्मेलन, संवाद कार्यक्रम और जनसभाओं के जरिए सरकार की नीतियों को जनता के सामने चुनौती देने की कोशिश कर रही है। पार्टी का प्रयास है कि सत्ता विरोधी भावना को एक संगठित राजनीतिक अभियान में बदला जाए। हालांकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व के बीच तालमेल बनाए रखना भी है।
बहुजन समाज पार्टी भी प्रदेश में अपने संगठन को दोबारा सक्रिय करने में जुट गई है। पार्टी दलित, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है। बसपा की रणनीति उन विधानसभा क्षेत्रों पर केंद्रित है जहां उसका परंपरागत वोट प्रतिशत चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखता है। पार्टी छोटे-छोटे कार्यकर्ता सम्मेलनों और सदस्यता अभियानों के जरिए अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। समाजवादी पार्टी भी सीमित संगठन होने के बावजूद उत्तराखंड में अपनी राजनीतिक उपस्थिति बनाए रखने का प्रयास कर रही है। विशेषकर तराई और सीमावर्ती क्षेत्रों में पार्टी कार्यकर्ताओं के माध्यम से जनसंपर्क अभियान चलाया जा रहा है। सपा का लक्ष्य फिलहाल बड़े पैमाने पर सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक मौजूदगी और वोट आधार को मजबूत करना माना जा रहा है।
दिल्ली और पंजाब की राजनीति के बाद उत्तराखंड में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के बावजूद आम आदमी पार्टी ने अपनी सक्रियता पूरी तरह समाप्त नहीं की है। पार्टी शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और रोजगार जैसे मुद्दों पर फिर से जनता के बीच जाने की तैयारी में है। हालांकि पिछले चुनाव के बाद संगठन कमजोर हुआ है, लेकिन पार्टी नए चेहरों और स्थानीय नेतृत्व के सहारे अपनी पहचान फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रही है। उत्तराखंड क्रांति दल सहित अन्य क्षेत्रीय दल भी राज्य की अस्मिता, मूल निवास, भू-कानून, रोजगार, जल-जंगल-जमीन और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर सक्रिय हैं। हालांकि पिछले चुनावों में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव सीमित रहा, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि स्थानीय मुद्दे चुनाव के केंद्र में आए तो कुछ क्षेत्रों में उनका प्रभाव बढ़ सकता है।
इस बार लगभग सभी दलों की रणनीति में दो वर्ग सबसे महत्वपूर्ण दिखाई दे रहे हैंकृयुवा और महिलाएं। युवाओं के लिए रोजगार, भर्ती, शिक्षा और स्वरोजगार प्रमुख मुद्दे हैं, जबकि महिलाओं के लिए महंगाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा, स्वयं सहायता समूह और कल्याणकारी योजनाएं चुनावी एजेंडे का हिस्सा बन रही हैं। राजनीतिक दलों का मानना है कि यही दो वर्ग चुनाव परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। गढ़वाल और कुमाऊं के साथ-साथ पहाड़ और मैदान के मुद्दों का संतुलन साधना हर दल की मजबूरी है। पलायन, खाली होते गांव, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन जैसे मुद्दे पर्वतीय क्षेत्रों में चुनावी बहस का केंद्र बन सकते हैं, जबकि तराई क्षेत्रों में कृकृषि, उद्योग और रोजगार प्रमुख विषय रहेंगे। राजनीतिक दलों की लगातार बढ़ती गतिविधियां इस बात का संकेत हैं कि 2027 का चुनाव अब केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि राजनीतिक तैयारी का वर्तमान बन चुका है। बैठकों, रैलियों, सदस्यता अभियानों, जनसंवाद कार्यक्रमों और सोशल मीडिया अभियानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड में चुनावी शंखनाद समय से पहले हो चुका है।
उत्तराखंड की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता अब केवल चुनावी घोषणाओं से नहीं, बल्कि संगठन की मजबूती, स्थानीय मुद्दों की समझ और जनता के बीच लगातार मौजूदगी से तय होगा। भाजपा अपनी सरकार के कामकाज पर भरोसा जता रही है, कांग्रेस बदलाव की उम्मीद जगाने में लगी है, जबकि बसपा, सपा, आप और क्षेत्रीय दल इस मुकाबले में अपनी प्रासंगिकता साबित करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। आने वाले महीनों में यह सक्रियता और तेज होने की संभावना है, क्योंकि 2027 की लड़ाई का पहला दौर अब मैदान में उतर चुका है।
भाजपा ‘अपनों’ के ही बयानों में उलझी
खेल मंच से उठी चिंगारी ने सुलगाई बयानबाजी की सियासत, संगठन को देनी पड़ी सफाई
कैबिनेट मंत्री भरत चौधरी की टिप्पणी पर भाजपा नेता रामशरण नौटियाल का पलटवार
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता को देनी पड़ी सफाई, विस चुनाव से पहले पार्टी के भीतर रार
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच भाजपा के भीतर बयानबाजी का नया विवाद सामने आ गया है। खेलकूद प्रतियोगिता के एक मंच से कैबिनेट मंत्री भरत चौधरी के दिए गए बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। मामला तब और तूल पकड़ गया जब भाजपा नेता, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रामशरण नौटियाल ने सार्वजनिक रूप से मंत्री के बयान का विरोध करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। विवाद बढ़ता देख भाजपा प्रदेश प्रवक्ता नवीन ठाकुर को भी पार्टी का पक्ष स्पष्ट करने के लिए सामने आना पड़ा। घटनाक्रम ने यह संदेश दिया है कि चुनावी तैयारियों के बीच भाजपा में केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि अपने नेताओं के बीच भी बयानबाजी चर्चा का विषय बन रही है।
खेलकूद प्रतियोगिता जैसे गैर-राजनीतिक मंच पर दिए गए मंत्री के बयान को शुरुआत में सामान्य टिप्पणी माना गया, लेकिन जैसे ही उसकी राजनीतिक व्याख्या शुरू हुई, मामला संगठन तक पहुंच गया। भाजपा नेता रामशरण नौटियाल ने सार्वजनिक रूप से मंत्री की टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए इसे अनुचित बताया। उन्होंने संकेत दिए कि पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा स्वीकार नहीं की जा सकती। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी दल में आंतरिक मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन जब वे सार्वजनिक मंचों पर सामने आने लगें, तो विपक्ष को हमला बोलने का अवसर मिल जाता है।
मामला बढ़ने के बाद भाजपा प्रदेश प्रवक्ता नवीन ठाकुर ने बयान जारी कर पार्टी का पक्ष रखा और यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा एक अनुशासित संगठन है तथा व्यक्तिगत बयानों को पार्टी की आधिकारिक लाइन नहीं माना जाना चाहिए। इसके बावजूद राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की रही कि यदि सब कुछ सामान्य था, तो प्रदेश नेतृत्व को सफाई देने की आवश्यकता क्यों पड़ी? विपक्ष ने भी इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा की आंतरिक खींचतान से जोड़ते हुए कहा कि चुनाव से पहले पार्टी के भीतर असंतोष सतह पर आने लगा है। चकराता विधानसभा सीट हमेशा से राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील मानी जाती रही है। यहां स्थानीय नेतृत्व, संगठन और चुनावी समीकरणों का विशेष महत्व रहता है। ऐसे में पूर्व प्रत्याशी और मंत्री के बीच सार्वजनिक मतभेद की चर्चा ने स्थानीय राजनीति को नई दिशा दे दी है। कार्यकर्ताओं के बीच भी इस घटनाक्रम को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी वर्ष में स्थानीय नेताओं की नाराजगी को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि बूथ स्तर की सक्रियता ही चुनावी जीत-हार का आधार बनती है। कांग्रेस ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भाजपा पहले अपने घर को संभाले। विपक्ष का आरोप है कि सरकार और संगठन के भीतर समन्वय की कमी अब सार्वजनिक रूप से दिखाई देने लगी है। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि पार्टी के भीतर संवाद की परंपरा है और किसी एक बयान को लेकर राजनीतिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 के नजदीक आते ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। ऐसे समय में नेताओं के हर बयान का राजनीतिक अर्थ निकाला जा रहा है। भाजपा जहां संगठन को मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों के आधार पर चुनावी तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल बनाने में जुटी है। ऐसे में सत्ता पक्ष के भीतर किसी भी प्रकार का सार्वजनिक मतभेद विपक्ष के लिए राजनीतिक हथियार बन सकता है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासित संगठन माना जाता है। लेकिन यदि स्थानीय स्तर पर नेताओं के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आते हैं, तो संगठन को समय रहते उन्हें सुलझाना होगा।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी नेतृत्व का प्रयास यही रहेगा कि किसी भी विवाद को लंबा न खिंचने दिया जाए और कार्यकर्ताओं के बीच एकजुटता का संदेश जाए। खेलकूद प्रतियोगिता के मंच से शुरू हुआ एक बयान अब उत्तराखंड की राजनीति का मुद्दा बन चुका है। मंत्री भरत चौधरी की टिप्पणी, रामशरण नौटियाल की सार्वजनिक नाराजगी और उसके बाद प्रदेश प्रवक्ता की सफाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनावी मौसम में शब्दों का राजनीतिक वजन कई गुना बढ़ जाता है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि भाजपा नेतृत्व इस विवाद को केवल बयानबाजी मानकर आगे बढ़ता है या संगठनात्मक स्तर पर संवाद के जरिए इसे शांत करता है। क्योंकि चुनावी राजनीति में कई बार विपक्ष से ज्यादा चुनौती अपने घर के भीतर उठे सवाल बन जाते हैं।
मंगलवार, 21 जुलाई 2026
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udaydinmaan: राजनीतिक दलों के ‘वार रूम’ तैयार
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यूकेडी में ‘अंदरूनी’ हलचल
चुनाव से पहले राष्ट्रीय दलों की राह पर उत्तराखंड क्रांति दल
आशुतोष नेगी पर कार्रवाई से क्षेत्रीय राजनीति में खलबली
2027 चुनाव से पहले यूकेडी में आपरेशन क्लीन या कुछ ओर
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में अब अनुशासन का डंडा केवल राष्ट्रीय दलों तक सीमित नहीं रह गया है। भाजपा और कांग्रेस में लगातार अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के बाद अब क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल भी उसी राह पर चलता दिखाई दे रहा है। पार्टी ने वरिष्ठ नेता आशुतोष नेगी को केंद्रीय उपाध्यक्ष पद से हटाकर साफ संकेत दे दिया है कि संगठन के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी या समानांतर राजनीति अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश की राजनीति धीरे-धीरे 2027 विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है और हर दल अपने संगठन को मजबूत व अनुशासित दिखाने की कोशिश में जुटा है। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यूकेडी जैसी क्षेत्रीय पार्टी, जो वर्षों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, इस समय अनुशासनात्मक कार्रवाई का जोखिम उठा सकती है?
पिछले कुछ महीनों में भाजपा ने कई नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किए और संगठन विरोधी गतिविधियों पर कार्रवाई की। कांग्रेस ने भी कई नेताओं पर अनुशासनात्मक कदम उठाए। अब यूकेडी में आशुतोष नेगी को केंद्रीय उपाध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद यह संदेश गया है कि क्षेत्रीय दल भी अब अंदरूनी असहमति को खुलकर स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल एक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि संगठन के भीतर अनुशासन स्थापित करने की कोशिश है। यूकेडी लंबे समय से गुटबाजी, नेतृत्व विवाद और लगातार कमजोर होते जनाधार से जूझती रही है। ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता पर कार्रवाई दो तरह के संदेश देती है। एक ओर नेतृत्व अपनी पकड़ मजबूत दिखाता है, वहीं दूसरी ओर असंतुष्ट नेताओं का नया खेमा भी तैयार हो सकता है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि पार्टी इस विवाद को समय रहते नहीं संभालती, तो चुनाव से पहले इसका नुकसान संगठनात्मक स्तर पर उठाना पड़ सकता है। उत्तराखंड में यूकेडी कभी राज्य आंदोलन की सबसे मजबूत राजनीतिक आवाज हुआ करती थी। लेकिन समय के साथ पार्टी का जनाधार लगातार सिमटता गया। आज स्थिति यह है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच क्षेत्रीय राजनीति के लिए जगह बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में यदि पार्टी के भीतर ही असंतोष खुलकर सामने आने लगे, तो उसका असर चुनावी तैयारियों पर भी पड़ सकता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यूकेडी नेतृत्व अब चुनाव से पहले संगठन को एकजुट और नियंत्रित रखना चाहता है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि व्यक्तिगत बयान या अनुशासनहीनता को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। हालांकि विपक्षी दल इस कार्रवाई को यूकेडी की आंतरिक कमजोरी और नेतृत्व संकट के रूप में भी पेश कर सकते हैं। आशुतोष नेगी को पद से हटाने का फैसला केवल एक संगठनात्मक आदेश नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति में बदलते राजनीतिक व्यवहार का संकेत भी है। अब चाहे राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय, हर पार्टी चुनाव से पहले अनुशासन पहले, असहमति बाद में की नीति पर चलती नजर आ रही है।
लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है कि अनुशासन संगठन को मजबूत भी करता है और कभी-कभी असंतोष की नई चिंगारी भी जगा देता है। यूकेडी के लिए यह फैसला किस दिशा में जाएगा, इसका जवाब आने वाले महीनों में पार्टी की एकजुटता और 2027 की चुनावी तैयारियां देंगी।
देवभूमि में ‘आस्था’ पर ‘सियासत’
राजधानी में एक ही दिन में दो मुख्यालयों में घंटों चला ‘सियासी महाभारत’
भाजपा ने कहाकृसत्य सामने आएगा, कांग्रेस बोली चोरी नहीं, सिस्टम की मिलीभगत
बदरीनाथ धाम के चढ़ावे में कथित चोरी के मुद्दे पर आमने-सामने आए भाजपा-कांग्रेस
देहरादून। बदरीनाथ धाम के चढ़ावे में कथित चोरी का मामला अब केवल जांच का विषय नहीं रहा, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा सियासी हथियार बनता जा रहा है। राजधानी देहरादून में महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित भाजपा और कांग्रेस मुख्यालयों में हुई दो अलग-अलग पत्रकार वार्ताओं ने यह साफ कर दिया कि देवभूमि की आस्था अब राजनीतिक अखाड़े के केंद्र में आ चुकी है।एक ओर भाजपा प्रदेश मुख्यालय में बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी मीडिया के सामने आए और आरोपों को राजनीतिक साजिश करार देते हुए कहा कि जांच चल रही है और सच सामने आएगा। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस मुख्यालय में प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सरकार और बीकेटीसी पर तीखा हमला बोलते हुए पूरे प्रकरण को प्रशासनिक विफलता और जवाबदेही के संकट का प्रतीक बताया।
भाजपा की प्रेस वार्ता का मूल संदेश था कि सरकार ने मामले को दबाने के बजाय जांच कराई, आरोपी के खिलाफ कार्रवाई हुई और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। पार्टी ने विपक्ष पर आस्था के मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया। इसके कुछ ही समय बाद कांग्रेस ने उसी मुद्दे पर मोर्चा खोल दिया। गणेश गोदियाल ने सवाल उठाया कि यदि व्यवस्थाएं इतनी मजबूत थीं तो आखिर चढ़ावे की चोरी हुई कैसे? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर देने से जवाबदेही पूरी हो जाती है, या शीर्ष स्तर पर भी नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
बदरीनाथ धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में चढ़ावे में कथित चोरी की घटना स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं से जुड़ा विषय है। लेकिन जिस तरह दोनों प्रमुख दल इसे अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव के अनुरूप पेश कर रहे हैं, उससे यह मामला अब धार्मिक भावना से आगे बढ़कर चुनावी विमर्श का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को सरकार की पारदर्शिता बनाम विपक्ष की राजनीति के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है, जबकि कांग्रेस इसे भ्रष्ट व्यवस्था और जवाबदेही के अभाव का प्रतीक बनाकर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है।
विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों की रणनीति स्पष्ट दिखने लगी है। कांग्रेस सरकार की साख पर सवाल खड़े करने के लिए बदरीनाथ प्रकरण को लगातार उठाना चाहती है। वहीं भाजपा यह संदेश देने में जुटी है कि उसने मामले में कार्रवाई कर यह साबित किया है कि भ्रष्टाचार पर उसकी नीति जीरो टालरेंस की है। यानी यह लड़ाई केवल एक चोरी की नहीं, बल्कि विश्वास बनाम जवाबदेही की राजनीतिक लड़ाई बनती जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या बदरीनाथ धाम जैसे पवित्र स्थल से जुड़ा मामला निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तक सीमित रहेगा, या फिर 2027 के चुनाव तक यह भाजपा और कांग्रेस के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा?
फिलहाल तस्वीर यही है कि एक मुख्यालय से सफाई दी जा रही है, दूसरे मुख्यालय से सवाल दागे जा रहे हैं। बीच में खड़ी है देवभूमि की जनता, जो यह जानना चाहती है कि आखिर चढ़ावे की सुरक्षा में चूक कैसे हुई, जिम्मेदार कौन है, और भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों इसके लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।
कलाकार नहीं, लोक स्मृति के प्रहरी थे ‘दर्जी’
ढोल की थाप, सुई-धागे का हुनर और लोकगीतों की महककृयही थे पहाड़ में दर्जी
जब गांवों का चौक ही बन जाता था रंगमंच और दर्जी होते थे उसके असली नायक
गीतों की गूंज, ढोल की थाप, सुई-धागे का हुनर होता था पूरे गांव की मुस्कान
देहरादून। हे दर्जी दिदा मीकू तु अंगढी बणै दे मेरि घगरि परै चमकदार मज़री लगै दे..गढ़वाल के इस पुराने गीत की धुन जब भी सुनी जाती है तो पहाड़ के गांवों का जीवन जीने वाले के जहन में पहाड़ के उस दर्जी की याद आती है, जो पहाड़ के लिए एक कलाकार ही नहीं लोक संस्कृति का संरक्षक था। पहाड़ के गांवों में एक समय ऐसा भी था, जब मनोरंजन के लिए न टेलीविजन था, न मोबाइल और न ही डीजे की कानफोड़ू आवाज। तब गांव की असली रौनक बनकर आते थे दर्जी और उनके साथ कुछ कलाकार भी जिन्हें बद्दी और बदयौण कहा जाता था। उत्तराखंड के पहाड़ों में अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था, लेकिन उनका काम एक ही थाकृगीतों, नृत्य, लोककथाओं और अपने हुनर से पूरे गांव को एक सूत्र में पिरो देना। जैसे ही किसी गांव में शादी-ब्याह, मेला, देवी-देवताओं का उत्सव या कोई बड़ा सामाजिक आयोजन होता, दर्जी अपने साथ ढोल, लोकगीत, रंग-बिरंगे वस्त्र और सुई-धागे का हुनर लेकर पहुंच जाते। उनके आने की खबर पूरे गांव में उत्सव का संदेश बन जाती।
सूरज ढलते ही गांव का चौक जगमगा उठता। बच्चे सबसे आगे, महिलाएं समूह बनाकर, बुजुर्ग अपने अनुभवों के साथ और युवा उत्साह से भरेकृहर कोई एक जगह इकट्ठा हो जाता। फिर शुरू होता लोकगीतों, नृत्यों और हास्य-व्यंग्य का ऐसा सिलसिला, जो देर रात तक चलता। दर्जी केवल गीत नहीं गाते थे, वह पहाड़ की आत्मा गाते थे। उनके गीतों में प्रेम था, विरह था, देवी-देवताओं की महिमा थी, वीरों की गाथाएं थीं और समाज को जोड़ने वाले संदेश भी थे। उनकी प्रस्तुति में मनोरंजन के साथ लोकशिक्षा भी छिपी होती थी।
दर्जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह केवल लोक कलाकार नहीं थे। गांव में ठहरने के दौरान वह कपड़े सिलते, नए वस्त्र तैयार करते, पुराने कपड़ों की मरम्मत करते और शादी-ब्याह के लिए विशेष परिधान भी बनाते थे। आज जिसे मल्टी-स्किल कहा जाता है, वह कला बद्दी सदियों पहले जी रहे थे। वह अपने श्रम से आजीविका कमाते थे और अपनी कला से गांव को आनंद देते थे। दर्जी एक गांव से दूसरे गांव जाते थे। वह केवल कार्यक्रम नहीं करते थे, बल्कि लोककथाएं, नए गीत, सामाजिक संदेश और आसपास के क्षेत्रों की खबरें भी साथ लेकर चलते थे। इस तरह वह पहाड़ के गांवों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी बन जाते थे। उनके आने से केवल एक आयोजन नहीं होता था, बल्कि गांव का सामाजिक जीवन भी जीवंत हो उठता था।
समय बदला। गांवों में सड़कें आईं, फिर टेलीविजन, मोबाइल और इंटरनेट ने जगह बना ली। रेडीमेड कपड़ों ने सुई-धागे की जरूरत कम कर दी और डीजे ने लोकधुनों की जगह ले ली। धीरे-धीरे दर्जी की आवाज पहाड़ की घाटियों से ओझल होने लगी। आज गांवों के चौक तो हैं, लेकिन वहां लोकगीतों की वह सामूहिक गूंज नहीं है। नई पीढ़ी बद्दी शब्द से भी अपरिचित होती जा रही है। बद्दी किसी एक व्यक्ति या समुदाय का नाम भर नहीं थे। वह उस पहाड़ की पहचान थे, जहां कला आजीविका भी थी और समाज को जोड़ने का माध्यम भी। उन्होंने बिना किसी मंच, बिना किसी प्रचार और बिना किसी पुरस्कार के पीढ़ियों तक पहाड़ की लोकसंस्कृति को जीवित रखा।
आज जब उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की बात कर रहा है, तब जरूरत है कि दर्जी जैसी लोक परंपराओं का दस्तावेजीकरण हो, उन पर शोध हो और उन्हें लोक महोत्सवों, विद्यालयों तथा सांस्कृतिक आयोजनों में सम्मानपूर्वक स्थान मिले।
उत्तराखंड में ‘इलेक्शन मोड’ आन
भाजपा हैट्रिक की तैयारी में और कांग्रेस ने रची सत्ता की व्यूह रचना
भाजपा का विकास कार्ड पर कांग्रेस का पलायन व रोजगार पर वार
चुनाव में स्थानीय मुद्दों की कसौटी पर होगी सत्ता की असली परीक्षा
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की औपचारिक घोषणा भले अभी दूर हो, लेकिन राज्य की राजनीति पूरी तरह चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। एक ओर भाजपा लगातार तीसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस संगठन को पुनर्जीवित करने, बूथ स्तर तक पहुंच बनाने और स्थानीय मुद्दों को चुनाव का केंद्र बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा का दावा है कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएं, मजबूत संगठन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में किए गए कार्य उसे फिर सत्ता तक पहुंचाएंगे। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, पेपर लीक, स्वास्थ्य और पहाड़ों से जुड़े बुनियादी सवालों पर सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी उसका बूथ नेटवर्क और संगठनात्मक ढांचा है। पार्टी लंबे समय से बूथ प्रबंधन, लाभार्थी संपर्क और कार्यकर्ता-आधारित चुनावी माडल पर काम करती रही है। चुनाव से पहले भी संगठन को गांव-गांव और घर-घर तक सक्रिय करने की कवायद तेज है। भाजपा का आकलन है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ उसे चुनावी बढ़त दिला सकता है। सत्ता में लगातार दो कार्यकाल पूरे करने के बाद किसी भी सरकार के सामने स्वाभाविक रूप से स्थानीय असंतोष की चुनौती आती है। कई क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार, पेयजल, शिक्षा और पलायन जैसे मुद्दे अभी भी प्रमुख चुनावी विषय बने हुए हैं।
इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ स्थानीय नाराजगी की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में सुनाई देती हैं। ऐसे में भाजपा के लिए उम्मीदवार चयन भी एक अहम चुनौती हो सकता है। कांग्रेस इस बार केवल सरकार विरोधी राजनीति तक सीमित रहने के बजाय बूथ संगठन, मेनिफेस्टो और जनसंपर्क पर विशेष जोर देती दिखाई दे रही है। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व ने संगठनात्मक एकजुटता और चुनावी तैयारी पर विशेष बल दिया है। यदि कांग्रेस स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के साथ संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत कर पाती है, तो कई सीटों पर मुकाबला पहले से अधिक कड़ा हो सकता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार इन मुद्दों की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है। युवाओं के लिए रोजगार और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, पलायन और पर्वतीय क्षेत्रों का विकास, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं, पर्यटन, चारधाम और स्थानीय अर्थव्यवस्था, महिला सुरक्षा और स्वरोजगार, आपदा प्रबंधन और पुनर्वास, महंगाई और किसान हित प्रमुख हैं। भाजपा की रणनीति विकास, संगठन और नेतृत्व पर केंद्रित रहने की संभावना है, जबकि कांग्रेस स्थानीय असंतोष, सामाजिक-आर्थिक मुद्दों और संगठन विस्तार के जरिए चुनावी बढ़त बनाने की कोशिश करेगी। क्षेत्रीय दल भी कुछ सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि 2027 का चुनाव केवल नारों का नहीं, बल्कि माइक्रो मैनेजमेंट बनाम जनभावनाओं की लड़ाई होगा। भाजपा का लक्ष्य अपने मजबूत संगठन को वोट में बदलना होगा, जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वह सरकार विरोधी रुझानों को प्रभावी चुनावी समर्थन में बदल पाए। यानी कि प्रचंड बहुमत का दावा और सत्ता परिवर्तन की उम्मीदकृदोनों की असली परीक्षा अब चुनावी मैदान में होगी। उत्तराखंड की राजनीति का अगला अध्याय बूथों पर लिखा जाएगा, जहां अंतिम फैसला मतदाता करेगा।
जेन जेड की ‘आवाज’ पर राष्ट्रीय बहस
जंतर-मंतर से युवाओं की हुंकार से सोशल मीडिया पर गूंजा देश
राहुल गांधी से लेकर बालीवुड सितारे तक जेन जेड के समर्थन में
सरकार पर दबाव, पुलिस बोली-कानून-व्यवस्था थी प्राथमिकता
नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन अब केवल छात्रों का प्रदर्शन नहीं रह गया है। सोशल मीडिया की ताकत ने इसे राष्ट्रीय बहस में बदल दिया है। विपक्षी नेताओं, फिल्मी हस्तियों और छात्र संगठनों के खुलकर सामने आने से केंद्र सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है। वहीं सरकार और पुलिस अपने कदमों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक बता रही है। प्रदर्शन के दौरान सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी है। एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर आंदोलन से जुड़े हैशटैग लगातार ट्रेंड करते रहे। हजारों लोग छात्रों के समर्थन में पोस्ट साझा करते दिखे, जबकि सत्ता पक्ष के समर्थकों ने पुलिस कार्रवाई को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी बताया।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और युवाओं की आवाज को दबाने के बजाय उसे सुना जाना चाहिए। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार संवाद की जगह दमन का रास्ता अपना रही है। कांग्रेस के अलावा अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर उठाने के संकेत दिए हैं। सिर्फ राजनीति ही नहीं, फिल्म जगत की कई चर्चित हस्तियां भी छात्रों के समर्थन में सामने आईं। अभिनेता सोनू सूद ने कहा कि छात्रों को लाठियां नहीं, गले लगाने वाले हाथ चाहिए। अभिनेता रितेश देशमुख ने लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का समर्थन किया। वरिष्ठ अभिनेत्री शबाना आजमी ने असहमति के सम्मान की बात कही, जबकि अभिनेता प्रकाश राज ने सरकार से छात्रों के साथ संवाद स्थापित करने की अपील की। इन प्रतिक्रियाओं के बाद आंदोलन को सोशल मीडिया पर और अधिक गति मिली।
विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन इसलिए भी अलग दिखाई दे रहा है क्योंकि इसकी सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया बन गया है। प्रदर्शन स्थल से लाइव वीडियो, पुलिस कार्रवाई के दृश्य और छात्रों के बयान कुछ ही मिनटों में देशभर में पहुंच गए। कई विश्वविद्यालयों के छात्र संगठनों ने भी आनलाइन समर्थन अभियान शुरू कर दिया है।
हालांकि सरकार और दिल्ली पुलिस ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने बैरिकेडिंग पार करने और प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर बढ़ने का प्रयास किया था। ऐसे में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की गई। पुलिस का दावा है कि किसी भी प्रकार की कार्रवाई नियमानुसार की गई और सार्वजनिक सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता थी। सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का सम्मान करती है, लेकिन किसी भी प्रदर्शन को कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सरकार का यह भी आरोप है कि कुछ राजनीतिक दल छात्रों के आंदोलन को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आंदोलन को जिस तरह विपक्ष और सामाजिक क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों का समर्थन मिला है, उससे सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ा है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष इस मुद्दे को कानून-व्यवस्था और राजनीतिक उकसावे के नजरिए से देख रहा है। ऐसे में संसद सत्र के दौरान इस मुद्दे पर तीखी टकराहट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल छात्र संगठन अपने आंदोलन को जारी रखने पर अड़े हैं और सरकार की ओर से भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात दोहराई जा रही है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या दोनों पक्षों के बीच संवाद का रास्ता निकलता है या यह आंदोलन आने वाले दिनों में और व्यापक रूप लेता है।
बाक्स
यह है पूरा मामला
देशभर से छात्र अपनी विभिन्न मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की और हिरासत की घटनाएं सामने आईं। कार्रवाई के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ा, जबकि सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। आंदोलन अभी जारी है और इस पर देशभर की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।
राजनीतिक दलों के ‘वार रूम’ तैयार
विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर दलों ने जारी किया जंग का ब्लूप्रिंट
कांग्रेस ने बदली चाल, सरकार विरोधी माहौल को वोट में बदलेगी पार्टी
अब मेनिफेस्टो से माहौल और बूथ से वोट साधने की तैयारी में है कांग्रेस
भाजपा के मजबूत संगठन के सामने कांग्रेस की असली परीक्षा बूथ पर
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। सत्ता में बैठी भाजपा जहां संगठन और लाभार्थी नेटवर्क के भरोसे लगातार अपनी चुनावी मशीनरी को धार दे रही है, वहीं कांग्रेस ने अब अपनी रणनीति का केंद्र दो मोर्चों को बनाया हैकृजनता से सीधे जुड़े मुद्दों पर आधारित मेनिफेस्टो और बूथ स्तर तक संगठन का पुनर्गठन। पार्टी के भीतर यह समझ बन रही है कि केवल सरकार के खिलाफ माहौल बनाना पर्याप्त नहीं होगा। यदि उस असंतोष को मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचाया गया, तो राजनीतिक लाभ सीमित रह सकता है। यही वजह है कि कांग्रेस अब भाषणों से ज्यादा बूथ और घोषणा पत्र की राजनीति पर जोर देती दिखाई दे रही है।
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस इस बार घोषणा पत्र को चुनाव के आखिरी दिनों में जारी होने वाला औपचारिक दस्तावेज नहीं रहने देना चाहती। पार्टी चाहती है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं, स्थानीय रोजगार, महिला सुरक्षा और युवाओं के अवसर जैसे मुद्दों पर पहले जनसंपर्क किया जाए और उसी आधार पर घोषणा पत्र तैयार हो। रणनीति यह है कि जब कार्यकर्ता गांव-गांव और वार्ड-वार्ड जाएंगे, तो वह केवल प्रचार नहीं करेंगे, बल्कि लोगों की प्राथमिकताओं को भी दर्ज करेंगे। इससे पार्टी को यह संदेश देने का अवसर मिलेगा कि उसका एजेंडा ऊपर से तय नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी से तैयार हुआ है।
उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बेहद कम रहा है। ऐसे में बूथ प्रबंधन का महत्व और बढ़ जाता है। कांग्रेस का आकलन है कि यदि प्रत्येक बूथ पर सक्रिय टीम, नियमित मतदाता संपर्क और मतदान दिवस की प्रभावी तैयारी हो, तो कई सीटों पर मुकाबला बदला जा सकता है। इसी कारण पार्टी बूथ समितियों के पुनर्गठन, निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और नए स्वयंसेवकों को जोड़ने पर जोर दे रही है। संगठन के भीतर यह संदेश दिया जा रहा है कि चुनाव केवल बड़े नेताओं की रैलियों से नहीं, बल्कि मतदान केंद्र तक पहुंचने वाले नेटवर्क से जीते जाते हैं।
दूसरी ओर भाजपा के सामने अलग तरह की चुनौती है। सत्ता विरोधी रुझान की चर्चा के बीच पार्टी अपने संगठित ढांचे, लाभार्थी संपर्क अभियानों और बूथ नेटवर्क पर भरोसा बनाए हुए है। भाजपा लंबे समय से बूथ सशक्तीकरण, पन्ना प्रमुख और नियमित संगठनात्मक बैठकों के माडल पर काम करती रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका चुनावी प्रबंधन है, जबकि कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यही क्षेत्र रहा है। इसलिए 2027 का मुकाबला केवल नारों का नहीं, बल्कि संगठनात्मक क्षमता की परीक्षा भी होगा। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है। यदि पार्टी केवल सरकार की आलोचना तक सीमित रहती है, तो उसका लाभ सीमित हो सकता है। लेकिन यदि वह रोजगार, शिक्षा, पलायन, स्वास्थ्य, पर्यटन, कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर स्पष्ट और विश्वसनीय रोडमैप पेश करती है, तो वह चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकती है।
वहीं भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपनी उपलब्धियों और विकास के दावों के साथ-साथ स्थानीय असंतोष का भी प्रभावी जवाब दे। चुनाव नजदीक आते-आते उम्मीदवार चयन, स्थानीय समीकरण और क्षेत्रीय मुद्दे भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आने वाले महीनों में दोनों दलों की सक्रियता गांवों, कस्बों और बूथों पर सबसे अधिक दिखाई देगी। बड़े मंचों और सोशल मीडिया से आगे बढ़कर घर-घर संपर्क, स्थानीय बैठकों और संगठन विस्तार पर जोर बढ़ सकता है। ऐसे में 2027 की चुनावी तस्वीर केवल राजधानी की राजनीतिक हलचल से तय नहीं होगी, बल्कि उन हजारों बूथों पर लिखी जाएगी जहां मतदाता अंतिम फैसला करेंगे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस का यह बदलाव एक संदेश भी हैकृपार्टी चुनाव को केवल सरकार बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं, बल्कि संगठन बनाम संगठन की चुनौती के रूप में देख रही है। दूसरी ओर भाजपा अपने स्थापित चुनावी ढांचे को और मजबूत करने में जुटी है।
यानी 2027 की लड़ाई का पहला दौर शुरू हो चुका है। अभी मंचों पर भाषण कम हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के वार रूम पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि किस दल की रणनीति जनता के बीच अधिक प्रभाव छोड़ती है और कौन अपने संगठन को मतदान के दिन तक सबसे प्रभावी ढंग से सक्रिय रख पाता है।
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