रविवार, 9 अगस्त 2026

udaydinmaan: पहाड़ में बचपन की आखिरी आवाज ‘धगुली’

udaydinmaan: पहाड़ में बचपन की आखिरी आवाज ‘धगुली’: स्मार्टफोन के शोर में खो गई धगुली की छनकाहट, सूने पड़े आंगन और स्क्रीन पर सिमटा पहाड़ का बचपन न महंगे खिलौने, न बाजार की जरूरत, खेत-खलिहान और ...

पहाड़ में बचपन की आखिरी आवाज ‘धगुली’

स्मार्टफोन के शोर में खो गई धगुली की छनकाहट, सूने पड़े आंगन और स्क्रीन पर सिमटा पहाड़ का बचपन न महंगे खिलौने, न बाजार की जरूरत, खेत-खलिहान और धगुली से सजता था बच्चों का संसार खाली होते गांव और मोबाइल स्क्रीन का अकेलापन, अब इतिहास बन गई सामूहिक खेलों की वह टोली देहरादून। पहाड़ के गांव में बचपन कभी बहुत महंगा नहीं था। खेलने के लिए बाजार से खिलौने खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती थी। खेत की मेड़, घर का आंगन, जंगल की पगडंडी और पत्थरों के बीच बहता पानी ही बच्चों का खेल का मैदान हुआ करता था। खिलौने भी आसपास की चीजों से बन जाते थे। इन्हीं खिलौनों में एक थी धगुली। धगुली हाथ में आती तो बच्चे की चाल में जैसे कोई उत्सव उतर आता। उसे घुमाने पर निकलती आवाज दूर तक सुनाई देती। वह आवाज सिर्फ धातु की नहीं थी, वह पहाड़ के उस बचपन की आवाज थी जिसमें खेल था, शरारत थी और सामूहिकता थी। आज गांवों में धगुली की आवाज कम सुनाई देती है। उसकी जगह मोबाइल फोन की आवाज ने ले ली है। कभी आंगन में बच्चों की टोली होती थी, अब कई आंगन खाली हैं। कभी एक बच्चा धगुली लेकर निकलता तो चार और उसके पीछे हो लेते थे। अब बच्चे स्क्रीन पर अकेले खेलते हैं। धगुली शायद बहुत मामूली चीज थी, लेकिन पहाड़ के बचपन के लिए उसका महत्व मामूली नहीं था। वह खिलौना बच्चों को किसी दुकान से नहीं मिलता था। घर के बड़े-बुजुर्ग उसे बनाते थे या आसपास से उपलब्ध चीजों से बच्चे खुद अपना खेल तैयार करते थे। यही तो पहाड़ के बचपन की खासियत थीकृकम साधनों में ज्यादा खुशी। आज जब बाजार बच्चों के लिए हजारों तरह के खिलौने बेचता है, तब उस दौर का बच्चा बिना किसी महंगे खिलौने के भी खुश था। धगुली के साथ खेलते हुए बच्चों की टोली गांव की गलियों से गुजरती थी। किसी के घर के आंगन में थोड़ी देर खेलना, फिर दूसरे घर की ओर भाग जाना। रास्ते में किसी दोस्त का इंतजार करना। कभी खेत की मेड़ पर बैठ जाना और कभी जंगल की ओर निकल जाना। बचपन का अपना भूगोल था। उस भूगोल में कोई मोबाइल नेटवर्क नहीं था, लेकिन संवाद खूब था। कोई आनलाइन गेम नहीं था, लेकिन खेलों की कमी नहीं थी। कोई वर्चुअल दोस्त नहीं था, क्योंकि दोस्त सामने होते थे और धगुली की आवाज उन दोस्तों को एक-दूसरे से जोड़ती थी। पहाड़ में बच्चों के खेल कभी केवल खेल नहीं होते थे। उनमें जीवन की छोटी-छोटी सीख छिपी होती थी। बच्चे मिलकर खेलते थे तो उनमें बांटने की आदत आती थी। हारते थे तो अगली बार जीतने की कोशिश करते थे। किसी दोस्त के पास खिलौना नहीं होता तो दूसरा अपना खिलौना उसके साथ साझा कर लेता था। यानी खिलौना छोटा था, लेकिन उससे बनने वाला सामाजिक संसार बड़ा था। आज बच्चे के पास खिलौनों की कमी नहीं है, लेकिन साथ खेलने वाले बच्चों की कमी जरूर हो गई है। यह सिर्फ तकनीक का असर नहीं है। इसके पीछे पहाड़ के गांवों का बदलता जीवन भी है। पलायन ने पहाड़ के कई गांवों से बच्चों की टोली छीन ली। जिन घरों में कभी बच्चों की आवाज गूंजती थी, वहां अब बुजुर्गों की खामोशी है। स्कूलों में छात्र संख्या घटती गई। कई गांवों के रास्तों पर अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं रही। ऐसे में धगुली भी धीरे-धीरे स्मृति का हिस्सा बन गई। आज अगर किसी पहाड़ी गांव में धगुली की चर्चा छेड़ दी जाए तो बुजुर्गों के चेहरे पर एक अलग चमक दिखाई देती है। व अपने बचपन में लौट जाते हैं। उन्हें याद आता है कि कैसे त्योहारों के दिनों में बच्चे नए उत्साह के साथ खेलते थे। कैसे गांव के एक छोर से दूसरे छोर तक बच्चों की टोली निकलती थी। कैसे घर की महिलाएं अपने काम के बीच बच्चों की आवाज सुनकर मुस्कुरा देती थीं। किसी दादी के पास धगुली से जुड़ी कहानी है तो किसी नाना के पास उसके साथ खेले गए खेल की याद। वह दौर अब तस्वीरों में नहीं, स्मृतियों में बचा है और स्मृतियां भी तब तक बचती हैं जब तक कोई उन्हें सुनाने वाला हो। आज पहाड़ का बच्चा भी उसी डिजिटल दुनिया का हिस्सा है, जिसमें शहर का बच्चा है। उसके हाथ में स्मार्टफोन है, स्क्रीन है और आनलाइन मनोरंजन है। इसमें बुराई नहीं कि समय बदल रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बदलते समय के साथ हम अपनी छोटी-छोटी लोक स्मृतियों को भी खोते जा रहे हैं? धगुली कोई ऐतिहासिक धरोहर नहीं होगी। शायद उसका कोई संग्रहालय भी न बने। लेकिन किसी संस्कृति की पहचान केवल बड़ी चीजों से नहीं होती। वह उन छोटी चीजों में भी छिपी होती है जिन्हें लोग सामान्य समझकर भूल जाते हैं। एक खिलौना भी संस्कृति का हिस्सा हो सकता है। एक खेल भी इतिहास हो सकता है। एक आवाज भी किसी पीढ़ी की पहचान बन सकती है। धगुली ऐसी ही एक पहचान है। जरूरी नहीं कि आज के बच्चों को वही पुराने खिलौने दिए जाएं और उनसे कहा जाए कि वे उसी तरह खेलें जैसे उनके दादा-दादी खेलते थे। समय को पीछे नहीं लौटाया जा सकता। लेकिन उस समय की कहानियां जरूर आगे ले जाई जा सकती हैं। स्कूलों में स्थानीय खेलों और खिलौनों पर गतिविधियां हों। गांवों में बुजुर्ग बच्चों को पुराने खेल सिखाएं। स्थानीय मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में पहाड़ के पारंपरिक खिलौनों को जगह मिले। बच्चों को बताया जाए कि उनके गांव में मोबाइल फोन आने से पहले बचपन कैसा था। क्योंकि धगुली को बचाना वास्तव में एक खिलौने को बचाना नहीं है। यह उस बचपन की स्मृति को बचाना है जिसमें खुशियां बाजार से नहीं, अपने आसपास से पैदा होती थीं। पहाड़ बदल रहा है। घर बदल रहे हैं। रास्ते बदल रहे हैं। बच्चों के खेल बदल रहे हैं। लेकिन पहाड़ की स्मृतियों को पूरी तरह बदल जाने देना जरूरी नहीं। कभी किसी पुराने संदूक में पड़ी धगुली को निकालिए। उसे बच्चे के हाथ में दीजिए। शायद वह बच्चा पहले उसे अजीब नजरों से देखे। फिर उसे घुमाए और जब उससे वह पुरानी आवाज निकलेगी, तो संभव है कि पास बैठा कोई बुजुर्ग अचानक मुस्कुरा उठे। उस मुस्कान में उसका पूरा बचपन छिपा होगा। धगुली की वह आवाज शायद लौटकर फिर गांव की गलियों में न गूंजे, लेकिन उसकी कहानी अगली पीढ़ी तक जरूर पहुंच सकती है। क्योंकि पहाड़ सिर्फ पहाड़ नहीं होता। वह उन आवाजों का भी घर है, जो समय बीतने के बाद सुनाई देना बंद हो जाती हैंकृलेकिन खत्म नहीं होतीं।

आस्था की ‘तेज रफ्तार’

आस्था और रफ्तार आमने-सामने,पुलिस के सामने व्यवस्था की अग्निपरीक्षा सड़कों पर उमड़ता जनसैलाब, तेज दौड़ते वाहन और समय की है बड़ी चुनौती पारंपरिक यात्रा से अलग इस दौर में ट्रैफिक और सुरक्षा बनाने का कड़ा मोर्चा देहरादून। सावन आते ही हरिद्वार की सड़कों का रंग बदल जाता है। गंगा घाटों पर आस्था उमड़ती है और कांवड़ियों के जत्थे शहर से गुजरते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं। लेकिन डाक कांवड़ के दौर में यह भीड़ सिर्फ बड़ी नहीं होती, उसकी रफ्तार भी चुनौती बन जाती है। तेज दौड़ते वाहन, सड़कों पर उमड़ता जनसैलाब और हर तरफ गूंजते जयकारे के बीच पुलिस के सामने एक साथ कई मोर्चे खुल जाते हैं। यही वह समय है जब पुलिस की असली अग्नि परीक्षा शुरू होती है। डाक कांवड़ का स्वरूप पारंपरिक कांवड़ यात्रा से अलग है। यहां समय की अहमियत बढ़ जाती है। कांवड़िए तेजी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं और सड़क पर वाहनों की आवाजाही भी प्रभावित होती है। ऐसे में यातायात व्यवस्था, श्रद्धालुओं की सुरक्षा, स्थानीय लोगों की आवाजाही और आपातकालीन सेवाओं को सुचारु रखना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। एक छोटी-सी चूक बड़ी समस्या का कारण बन सकती है। डाक कांवड़ के दौरान पुलिस को सबसे ज्यादा मशक्कत यातायात व्यवस्था को लेकर करनी पड़ती है। एक ओर कांवड़ियों के लिए निर्धारित मार्गों पर भारी भीड़ रहती है, दूसरी ओर स्थानीय और बाहरी वाहनों की आवाजाही भी बनी रहती है। कई स्थानों पर सड़क का एक हिस्सा पूरी तरह कांवड़ियों के लिए सुरक्षित करना पड़ता है। रूट डायवर्जन लागू किए जाते हैं। भारी वाहनों को रोकना पड़ता है। शहर के भीतर यातायात का दबाव बढ़ जाता है। पुलिस के सामने सवाल सिर्फ रास्ता खाली कराने का नहीं होता। सवाल यह होता है कि किसी भी परिस्थिति में श्रद्धालुओं की सुरक्षा से समझौता न हो और आम नागरिक को भी परेशानी कम से कम हो। हरिद्वार से लेकर रुड़की और आगे उत्तर प्रदेश की सीमा तक पुलिस की तैनाती बढ़ जाती है। प्रमुख चौराहों, हाईवे, घाटों और संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त बल लगाया जाता है। पुलिसकर्मी घंटों सड़क पर खड़े रहते हैं। तेज धूप हो या बारिश, उनकी ड्यूटी लगातार चलती रहती है। कई जवानों के लिए यह केवल कुछ घंटों की ड्यूटी नहीं होती। उन्हें लगातार कई शिफ्ट में भीड़ के बीच काम करना पड़ता है। भीड़ का मनोविज्ञान समझना पड़ता है। कहां बैरिकेडिंग करनी है? कहां रास्ता खोलना है? कहां भीड़ को रोकना है? कहां एंबुलेंस को रास्ता देना है? हर निर्णय तत्काल लेना पड़ता है। बड़े धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन सबसे संवेदनशील कामों में से एक है। डाक कांवड़ में यह चुनौती और बढ़ जाती है, क्योंकि श्रद्धालुओं की संख्या के साथ उनकी गति भी तेज होती है। पुलिस के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि किसी अफवाह को फैलने से रोका जाए। सोशल मीडिया के दौर में छोटी-सी गलत सूचना भी कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। ऐसे में पुलिस को केवल सड़क पर नहीं, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी निगरानी रखनी पड़ती है। सीसीटीवी, ड्रोन, कंट्रोल रूम और वायरलेस नेटवर्क के जरिए स्थिति पर नजर रखी जाती है। संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त निगरानी की जरूरत पड़ती है। कांवड़ यात्रा आस्था का पर्व है। पुलिस की भूमिका यहां सिर्फ कानून लागू करने की नहीं, बल्कि आस्था और व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की भी होती है। कांवड़िए देश के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं। उनके लिए हरिद्वार की यात्रा धार्मिक भावनाओं से जुड़ी होती है। ऐसे में पुलिस को भीड़ से संवाद करते हुए व्यवस्था बनाए रखनी होती है। जहां जरूरी हो, सख्ती करनी पड़ती है। लेकिन सख्ती का मतलब संवेदनशीलता खत्म करना नहीं है। यही पुलिस के लिए सबसे कठिन संतुलन है। कांवड़ यात्रा के दौरान पुलिस की चुनौती केवल कांवड़ियों तक सीमित नहीं रहती। स्थानीय नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित होती है। रूट डायवर्जन के कारण लोगों को लंबा रास्ता तय करना पड़ सकता है। बाजारों और मुख्य सड़कों पर यातायात का दबाव बढ़ जाता है। स्कूल, अस्पताल और कार्यालय जाने वालों को भी कई बार वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ते हैं। ऐसे में पुलिस को स्थानीय नागरिकों की सुविधा का भी ध्यान रखना पड़ता है। विशेष रूप से अस्पताल जाने वाली एंबुलेंस और आपातकालीन वाहनों के लिए रास्ता खुला रखना बेहद जरूरी होता है। डाक कांवड़ कुछ दिनों बाद अपने गंतव्य तक पहुंच जाएगी। सड़कें सामान्य हो जाएंगी। बैरिकेड हट जाएंगे। यातायात फिर अपनी पुरानी गति पकड़ लेगा। लेकिन इस पूरे आयोजन के दौरान पुलिस के सामने खड़ी चुनौती छोटी नहीं है। यह केवल भीड़ संभालने की ड्यूटी नहीं। यह धैर्य, अनुशासन, संवेदनशीलता और त्वरित निर्णय क्षमता की परीक्षा है। एक तरफ लाखों लोगों की आस्था है, दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी। एक तरफ तेज रफ्तार डाक कांवड़ है, दूसरी तरफ सड़क पर चलती जिंदगी। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना ही पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। डाक कांवड़ में आस्था की रफ्तार तेज है, लेकिन व्यवस्था की जिम्मेदारी उससे भी बड़ी और इस पूरे सैलाब के बीच अगर यात्रा सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ती है, तो उसके पीछे सिर्फ व्यवस्था नहीं, बल्कि सड़क पर घंटों खड़ी वह खाकी भी होती है, जिसकी अग्नि परीक्षा हर सावन में होती है।

भाजपा की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

धामी ने कसा बूथ का पेच, सुस्त विपक्ष के लिए खतरे की घंटी भाजपा की बैठक में मुख्यमंत्री धामी ने किया चुनावी शंखनाद मिशन 2027 के लिए संगठन को मैदान में उतरने का दिया संदेश देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती भले अभी शुरू न हुई हो, लेकिन सियासी मैदान में तैयारियां तेज हो गई हैं। भाजपा की अहम बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की हुंकार ने साफ कर दिया कि पार्टी अब चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने से लेकर संगठन को बूथ स्तर पर सक्रिय करने तक की रणनीति पर जोर के बीच धामी का संदेश साफ थाकृअब रुकना नहीं है, चुनावी मैदान में उतरना है। धामी की इस हुंकार को सिर्फ कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाला भाषण मानना राजनीतिक भूल होगी। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव का पूरा खाका दिखाई देता है। भाजपा सत्ता में है और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य उसके सामने है। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए जमीन तलाश रही है। ऐसे में भाजपा की यह बैठक विपक्ष के लिए भी संदेश है कि सत्तारूढ़ दल चुनावी लड़ाई को लेकर गंभीर है और संगठन को अभी से सक्रिय करने की तैयारी में जुट गया है। मुख्यमंत्री धामी की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में भाजपा के लिए उत्तराखंड में एक महत्वपूर्ण चुनावी चेहरा बनकर उभरी है। 2022 में पार्टी के सत्ता में लौटने के बाद धामी के नेतृत्व में सरकार ने कई ऐसे फैसलों को राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाया, जिन्हें भाजपा अब जनता के बीच लेकर जाने की तैयारी में है। अब चुनौती यह है कि सरकारी फैसले फाइलों से निकलकर मतदाता तक पहुंचें। यही वजह है कि भाजपा की रणनीति में संगठन को सबसे आगे रखा जा रहा है। धामी का संदेश कार्यकर्ताओं के लिए जितना स्पष्ट था, उतना ही विपक्ष के लिए भीकृभाजपा चुनाव का इंतजार नहीं करेगी, बल्कि चुनाव से पहले ही चुनावी जमीन तैयार करेगी। कांग्रेस लंबे समय से सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे उठा रही है। विपक्ष की कोशिश है कि इन मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जाए। भाजपा अब विपक्ष के इसी नैरेटिव का जवाब अपने विकास और जनकल्याणकारी फैसलों के जरिए देने की तैयारी में है। लेकिन भाजपा के सामने चुनौती भी कम नहीं है। सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद स्थानीय स्तर पर नाराजगी पैदा होना स्वाभाविक राजनीतिक जोखिम है। कई सीटों पर विधायकों के कामकाज को लेकर कार्यकर्ताओं और जनता की राय पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगी। यानी धामी की हुंकार के बाद अब संगठन को केवल विपक्ष से नहीं, अपने भीतर की चुनौतियों से भी मुकाबला करना होगा। भाजपा का चुनावी गणित हमेशा बूथ से शुरू होता है। बड़े नेताओं की रैलियां माहौल बना सकती हैं, लेकिन वोट बूथ पर पड़ता है। इसीलिए पार्टी कमजोर बूथों की पहचान, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और मतदाताओं से लगातार संपर्क पर जोर दे रही है। भाजपा का लक्ष्य साफ हैकृचुनाव की घोषणा से पहले संगठन इतना मजबूत हो जाए कि आखिरी समय में उसे हड़बड़ी में व्यवस्था खड़ी न करनी पड़े। यह रणनीति कांग्रेस के लिए चुनौती है। कांग्रेस अगर चुनाव से कुछ महीने पहले संगठन को सक्रिय करने की कोशिश करती है और भाजपा पहले से बूथ पर पहुंच चुकी होती है, तो चुनावी मुकाबले का अंतर यहीं से बन सकता है। भाजपा की चुनावी रणनीति चाहे जितनी मजबूत हो, अंतिम फैसला जनता को करना है। उत्तराखंड के गांवों में आज भी रोजगार और पलायन बड़ा सवाल है। पहाड़ में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति, शिक्षा, सड़क और पेयजल जैसे मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा बने रहेंगे। युवा रोजगार चाहता है। महिला सुरक्षित और सुविधाजनक जीवन चाहती है। किसान अपनी उपज की कीमत चाहता है। गांव बुनियादी सुविधाएं चाहता है और पहाड़ चाहता है कि विकास केवल घोषणाओं में नहीं, जमीन पर भी दिखाई दे। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती केवल यह बताने की नहीं होगी कि उसने क्या किया। चुनौती यह साबित करने की भी होगी कि सरकार के काम का असर आम आदमी की जिंदगी पर कितना पड़ा। 2027 का चुनाव सिर्फ भाजपा की परीक्षा नहीं होगा। यह मुख्यमंत्री धामी के राजनीतिक नेतृत्व की भी बड़ी परीक्षा होगी। अगर भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटती है तो धामी की राजनीतिक स्थिति और मजबूत होगी। लेकिन अगर पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो स्वाभाविक रूप से नेतृत्व और रणनीति पर सवाल उठेंगे। इसलिए बैठक में धामी की हुंकार के पीछे राजनीतिक दांव भी बड़ा है। यह केवल कार्यकर्ताओं से जोश मांगने का वक्त नहीं है। यह अपने नेतृत्व, संगठन और सरकार के रिपोर्ट कार्ड को जनता की अदालत में ले जाने की तैयारी है। धामी की हुंकार को कांग्रेस शायद इसी वजह से हल्के में नहीं लेना चाहेगी। विपक्ष के सामने अब सवाल है कि वह भाजपा के मजबूत संगठन का मुकाबला किस रणनीति से करेगा? क्या कांग्रेस बूथ स्तर पर भाजपा की बराबरी कर पाएगी? क्या वह स्थानीय असंतोष को वोट में बदल पाएगी? क्या वह सरकार के खिलाफ मुद्दों को एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदल सकेगी? या फिर भाजपा सरकार की योजनाओं और संगठन की ताकत के सामने विपक्ष का हमला बिखर जाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे। भाजपा की बैठक से एक बात साफ हैकृउत्तराखंड की राजनीति अब धीरे-धीरे चुनावी रंग में रंगने लगी है। मुख्यमंत्री ने कार्यकर्ताओं को संदेश दे दिया है। संगठन ने तैयारी शुरू कर दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि यह हुंकार कितनी जल्दी गांव, शहर, बूथ और मतदाता तक पहुंचती है। क्योंकि चुनाव भाषणों से शुरू जरूर होते हैं, लेकिन जीत मतदाता के दरवाजे पर तय होती है। धामी ने हुंकार भर दी है। अब भाजपा के सामने चुनौती है कि इस हुंकार को हर बूथ की आवाज बनाया जाए और विपक्ष के सामने चुनौती है कि वह इस आवाज का जवाब कैसे देता है। उत्तराखंड का 2027 चुनाव अभी दूर दिखाई दे सकता है, लेकिन उसकी सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।

‘ठंडी हवा’ के बीच चढ़ा ‘सियासी पारा’

कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे की कुमाऊं रैली ने कांग्रेस में फूंकी नई जान अब सवालकृजोश वोट में बदलेगा या फिर रह जाएगा मंच तक ही कुमाऊं से कांग्रेस का चुनावी संदेश कार्यकर्ताओं में दिखा उत्साह प्रदेश भाजपा के सामने विपक्ष की सक्रियता बढ़ाने की होगी चुनौती देहरादून। कुमाऊं की जमीन पर कांग्रेस की राजनीति को एक बार फिर आवाज मिली है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली ने पार्टी के उन कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने की कोशिश की है, जो लंबे समय से सत्ता पक्ष के सामने खुद को कमजोर महसूस कर रहे थे। मंच पर भाषण थे, नारे थे, भीड़ थी और चुनावी दावे भी। लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या यह रैली कांग्रेस के भीतर पैदा हुई राजनीतिक सुस्ती को सचमुच तोड़ पाएगी? या फिर कुछ घंटों की राजनीतिक गर्मी के बाद पहाड़ की ठंडी हवा सब कुछ पहले जैसा कर देगी? यही सवाल कांग्रेस के सामने है। कुमाऊं उत्तराखंड की राजनीति में सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। यहां की विधानसभा सीटें प्रदेश की सत्ता का रास्ता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का कुमाऊं पहुंचना अपने आप में राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस यह बताना चाहती है कि वह 2027 की लड़ाई के लिए तैयार हो रही है। लेकिन चुनाव की तैयारी मंच से ज्यादा जमीन पर दिखाई देती है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी जरूरत इस समय केवल भाषण नहीं, भरोसा है। कार्यकर्ता पूछता हैकृपार्टी की रणनीति क्या है?कौन नेतृत्व करेगा? उम्मीदवारों का चयन कैसे होगा? बूथ पर संगठन कितना मजबूत है? और सबसे बड़ा सवालकृक्या कांग्रेस इस बार भाजपा को सीधी चुनौती देने की स्थिति में है? खड़गे की रैली ने कम से कम इतना जरूर किया कि पार्टी के भीतर यह संदेश गया कि केंद्रीय नेतृत्व उत्तराखंड को नजरअंदाज नहीं कर रहा। कार्यकर्ता के लिए बड़े नेता का मैदान में उतरना सिर्फ राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होता। वह इसे अपने संघर्ष की स्वीकृति के रूप में भी देखता है। यही वजह है कि रैली के बाद कांग्रेस के भीतर उत्साह दिखाई देना स्वाभाविक है। लेकिन उत्साह और चुनावी संगठन के बीच काफी लंबी दूरी होती है। कुमाऊं की जनता के सामने मुद्दे किसी रैली के साथ पैदा नहीं हुए हैं। रोजगार का सवाल पुराना है। पलायन का दर्द पुराना है। स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी पुरानी है। युवाओं की प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर चिंता पुरानी है। सड़क, पानी और शिक्षा के सवाल भी पुराने हैं। राजनीतिक दल आते हैं, भाषण करते हैं, वादे करते हैं और चले जाते हैं। जनता फिर वही सवाल लेकर खड़ी रह जाती है। इसलिए खड़गे की रैली का राजनीतिक असर इस बात से तय नहीं होगा कि मंच पर कितने नारे लगे। असर इस बात से तय होगा कि कांग्रेस इन सवालों को कितनी मजबूती से गांव तक लेकर जाती है। कांग्रेस के सामने एक आसान रास्ता हैकृभाजपा सरकार की आलोचना करना। सत्ता में रहने वाली पार्टी से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी। लेकिन सिर्फ सवाल पूछने से विपक्ष मजबूत नहीं होता। जनता को यह भी बताना पड़ता है कि अगर सत्ता मिली तो क्या बदलेगा? पलायन रोकने की ठोस नीति क्या होगी? युवा को रोजगार कैसे मिलेगा? पहाड़ के अस्पतालों में डाक्टर कैसे पहुंचेंगे? सरकारी स्कूल कैसे मजबूत होंगे? स्थानीय अर्थव्यवस्था को कैसे खड़ा किया जाएगा? महिलाओं की आय और सुरक्षा के लिए क्या किया जाएगा? कांग्रेस अगर इन सवालों के स्पष्ट जवाब जनता के सामने रखती है तो खड़गे की रैली एक बड़े राजनीतिक अभियान की शुरुआत बन सकती है। वरना यह भी दूसरी राजनीतिक रैलियों की तरह भीड़ और भाषणों की खबर बनकर रह जाएगी। कांग्रेस जानती है कि भाजपा को उत्तराखंड में चुनौती देना केवल विधानसभा स्तर पर उम्मीदवार उतारने से संभव नहीं होगा। भाजपा का संगठन बूथ तक फैला हुआ है। उसके पास कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है। सरकार के पास योजनाओं और उपलब्धियों का अपना नैरेटिव है। ऐसे में कांग्रेस को मुकाबले के लिए केवल बड़े नेताओं की रैलियां नहीं, बल्कि हर बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ता चाहिए। खड़गे की रैली अगर इस संगठनात्मक कमजोरी को दूर करने की शुरुआत करती है तो इसका राजनीतिक महत्व बढ़ जाएगा। वरना राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी से कुछ घंटों का उत्साह तो पैदा किया जा सकता है, लेकिन चुनाव नहीं जीता जा सकता। उत्तराखंड कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती कई बार विपक्ष से ज्यादा उसके भीतर दिखाई देती रही है। नेताओं के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। समर्थकों के अपने-अपने समूह हैं। टिकट को लेकर दावेदारियां हैं और हर नेता की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह स्थानीय नेताओं को एक मंच पर कितना ला पाता है। कांग्रेस अगर 2027 को सत्ता में वापसी का चुनाव बनाना चाहती है तो उसे पहले अपने भीतर एकता का चुनाव जीतना होगा। क्योंकि जनता उस पार्टी पर भरोसा करने में हिचक सकती है जो खुद अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट दिखाई न दे। खड़गे की कुमाऊं रैली ने कांग्रेस को निश्चित रूप से ऊर्जा दी है। कार्यकर्ताओं को यह संदेश मिला है कि लड़ाई अभी बाकी है। लेकिन राजनीति में भीड़ शुरुआत होती है, परिणाम नहीं। अब कांग्रेस को इस उत्साह को बूथ समितियों में बदलना होगा। रैली के नारों को घर-घर के संपर्क में बदलना होगा। मंच पर उठे सवालों को गांव की चौपाल तक ले जाना होगा और सबसे जरूरीकृजनता के सवालों को सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं, अपनी राजनीतिक प्राथमिकता बनाना होगा। क्योंकि पहाड़ का मतदाता भाषण सुनता जरूर है, लेकिन अंततः अपने अनुभव से फैसला करता है। उसे याद रहता है कि चुनाव से पहले कौन उसके गांव आया था और चुनाव के बाद कौन गायब हो गया। खड़गे की कुमाऊं रैली ने कांग्रेस में नई जान जरूर डाली है। लेकिन राजनीति में नई जान और नई जीत के बीच एक पूरा रास्ता होता है। उस रास्ते पर संगठन चाहिए। स्थानीय नेतृत्व चाहिए। स्पष्ट मुद्दे चाहिए। विश्वसनीय चेहरा चाहिए और सबसे बढ़कर जनता के बीच लगातार मौजूद रहने की क्षमता चाहिए। कांग्रेस के लिए खड़गे की रैली इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने पार्टी को फिर से मैदान में उतरने का आत्मविश्वास दिया है। अब देखना यह है कि कांग्रेस इस ऊर्जा को कितने दिन बचाकर रखती है। क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में रैली की भीड़ अगले दिन घर चली जाती है। चुनाव की असली भीड़ तब बनती है, जब कार्यकर्ता महीनों तक जनता के दरवाजे पर खड़ा रहता है। खड़गे ने कुमाऊं से आवाज दी है। अब कांग्रेस को तय करना है कि यह आवाज सिर्फ हल्द्वानी के मैदान तक रहेगी या पहाड़ के गांव-गांव तक पहुंचेगी। क्योंकि 2027 की लड़ाई भाषणों से नहीं, जनता के भरोसे से जीती जाएगी।

शनिवार, 8 अगस्त 2026

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udaydinmaan: पहाड़ की बेटी के गले का ‘गलोबंद’: यह गहना नहीं, मां की संदूकची से निकली हुई है एक पूरी पीढ़ी गले का गलोबंद सिर्फ गहना नहीं, पहाड़ के पीढ़ियों की कहानी मायके की सोंधी महक, पीढ़िय...

पहाड़ की बेटी के गले का ‘गलोबंद’

यह गहना नहीं, मां की संदूकची से निकली हुई है एक पूरी पीढ़ी गले का गलोबंद सिर्फ गहना नहीं, पहाड़ के पीढ़ियों की कहानी मायके की सोंधी महक, पीढ़ियों का दुलार और धुंधलाती यादें देहरादून। पहाड़ की महिलाओं के गले में सजा गलोबंद कभी परिवार की पहचान हुआ करता था। सोने-चांदी के छोटे-छोटे टुकड़ों में बुनी यह परंपरा आज फैशन की दुनिया में भले लौट रही हो, लेकिन इसके पीछे छिपी पहाड़ की स्मृतियां धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं। पहाड़ की सुबह जितनी सादगी भरी होती है, वहां की स्त्री का श्रृंगार उतना ही अर्थपूर्ण। माथे की बिंदी, नाक की नथ, कानों के झुमके और गले में सजा गलोबंद यह सिर्फ आभूषण नहीं थे। इनमें पहाड़ की अर्थव्यवस्था, परिवार की हैसियत, कारीगर की मेहनत और महिलाओं की पीढ़ियों पुरानी स्मृतियां दर्ज होती थीं। गलोबंद को देखिए तो पहली नजर में यह गले में पहना जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण लगता है। लेकिन पहाड़ के गांवों में इसकी कहानी इससे कहीं बड़ी रही है। कभी बेटी की शादी में मायके से आने वाले गहनों में गलोबंद का खास स्थान होता था। मां का गलोबंद बेटी तक पहुंचता था और उसके साथ सिर्फ सोना या चांदी नहीं जाती थीकृजाती थी एक पूरी पीढ़ी की कहानी। दादी ने पहना, मां ने संभाला और बेटी ने विरासत में पाया। यही तो पहाड़ के गहनों की खासियत थी। आज जब बाजार में आभूषण डिजाइन बदल रहे हैं और पारंपरिक गहने आधुनिक फैशन के साथ दोबारा दिखाई देने लगे हैं, तब गलोबंद भी नई पीढ़ी के बीच अपनी जगह बना रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या गलोबंद सिर्फ फैशन बनकर रह जाएगा या इसके पीछे की संस्कृति भी बच पाएगी? परंपरागत गलोबंद के निर्माण में कारीगरी का अपना महत्व रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसके डिजाइन, आकार और इस्तेमाल की शैली में अंतर देखने को मिलता है। इसमें धातु के छोटे-छोटे हिस्सों को जोड़कर या कपड़े/धागे के आधार पर सजाकर गले का आभूषण तैयार किया जाता था। इसकी खूबसूरती केवल चमक में नहीं थी। उसकी असली खूबसूरती उस हाथ में थी, जिसने उसे बनाया था। पहाड़ में आभूषण बनाने वाले कारीगरों की अपनी दुनिया थी। पीढ़ियों से चली आ रही यह कला उनके हुनर और धैर्य की परीक्षा लेती थी। एक-एक डिजाइन के पीछे घंटों की मेहनत होती थी। आज मशीन से बने आभूषण बाजार में जल्दी उपलब्ध हो जाते हैं। कीमत भी कई बार कम होती है। ऐसे में हाथ से तैयार पारंपरिक गहनों के सामने बाजार की चुनौती बढ़ी है। लेकिन गलोबंद की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बल्कि नई पीढ़ी ने इसे नए अंदाज में अपनाना शुरू किया है। पहाड़ की पारंपरिक पोशाक के साथ पहना जाने वाला गलोबंद अब सिर्फ गांव की शादी तक सीमित नहीं है। आधुनिक डिजाइनरों ने इसे नए कपड़ों और नए फैशन के साथ जोड़ना शुरू किया है। कई युवतियां इसे साड़ी, सूट और पारंपरिक परिधानों के साथ पहनना पसंद करती हैं। यानी जिस आभूषण को कभी पहाड़ की बहू-बेटियों की पहचान माना जाता था, वह अब शहरों के फैशन में भी जगह बना रहा है। लेकिन इस बदलाव के साथ एक खतरा भी है।कहीं ऐसा न हो कि गलोबंद बच जाए और उसकी कहानी खो जाए। किस धातु का इस्तेमाल होता था? किस अवसर पर पहना जाता था? इसे कौन बनाता था? शादी में इसका क्या महत्व था? मायके और ससुराल के बीच इसका क्या रिश्ता था? इन सवालों के जवाब भी उसी विरासत का हिस्सा हैं। पहाड़ के समाज में आभूषण केवल सजने के लिए नहीं होते थे। कई बार वह परिवार की आर्थिक सुरक्षा भी होते थे। मुश्किल समय में गहने बेचकर परिवार ने अपनी जरूरतें पूरी कीं। लेकिन भावनात्मक मूल्य का कोई बाजार नहीं होता। एक मां के लिए अपनी शादी का गलोबंद सिर्फ एक आभूषण नहीं था। उसमें उसके मायके की यादें थीं। बेटी की शादी में जब वही गहना उसे दिया जाता था तो वह एक तरह से परिवार की स्मृति को आगे बढ़ाना होता था। यही कारण है कि पहाड़ के पुराने संदूकों में रखे गहनों को खोलते समय सिर्फ धातु की चमक नहीं दिखाई देती थी। उनमें पुरानी तस्वीरें, पुरानी शादियां और पुरानी पीढ़ियां दिखाई देती थीं। उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन ने केवल खेत और गांव नहीं बदले। उसने पहनावे और आभूषणों की दुनिया को भी प्रभावित किया जो परिवार गांव से शहर आ गए, उनकी अगली पीढ़ी का जीवन अलग हो गया। पारंपरिक पहनावा रोजमर्रा की जिंदगी से बाहर होता गया। उसके साथ पारंपरिक गहनों का इस्तेमाल भी कम हुआ। आज कई घरों में दादी-नानी के पुराने गहने संदूकों में सुरक्षित हैं, लेकिन उन्हें पहनने वाली पीढ़ी कम होती जा रही है। इसलिए गलोबंद की कहानी केवल एक आभूषण की कहानी नहीं है। यह उस पहाड़ की कहानी है, जो अपनी पुरानी चीजों को बचाने की कोशिश कर रहा है। गलोबंद को बचाने का मतलब यह नहीं कि नई पीढ़ी को पुराने तरीके से ही जीने के लिए कहा जाए। परंपरा तभी जीवित रहती है जब वह समय के साथ बदलती है। जरूरत है कि स्थानीय कारीगरों को बाजार मिले, पारंपरिक डिजाइन का दस्तावेजीकरण हो और स्कूल-कालेजों तथा सांस्कृतिक आयोजनों में उत्तराखंड के पारंपरिक आभूषणों के बारे में नई पीढ़ी को बताया जाए। क्योंकि जब किसी समाज की चीजें सिर्फ संग्रहालय में रह जाती हैं, तो संस्कृति का एक हिस्सा जीवित होकर भी रोजमर्रा की जिंदगी से गायब हो जाता है। गलोबंद आज फिर फैशन में लौट रहा है। यह अच्छी खबर है। लेकिन उससे भी बड़ी खबर तब होगी जब इसके साथ उसकी कहानी भी लौटे। धातु की चमक से कहीं ज्यादा इसमें उन हाथों की गर्माहट है, जिन्होंने इसे बनाया। उन माताओं की ममता है, जिन्होंने इसे बेटी को दिया। उन बेटियों की यादें हैं, जिन्होंने इसे संभालकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाया। इसलिए अगली बार जब किसी पहाड़ी महिला के गले में गलोबंद दिखाई दे, तो उसे सिर्फ एक आभूषण मत समझिएगा। उसमें एक गांव है, एक परिवार है, एक मां है, एक बेटी है और पहाड़ की कई पीढ़ियों की कहानी है।

ऋषभ पंत की ‘गूगली’

आधी रात को मदद की मांग, मैदान से दूर घर लौटने की छटपटाहट सवाल सिर्फ एक क्रिकेटर का नहीं, पहाड़ लौटने वालों की राह का स्टार क्रिकेटर पंत की आधी रात की पोस्ट ने खड़े किए कई सवाल देहरादून। रात के 12 बजकर 46 मिनट। जब ज्यादातर लोग अपने फोन को एक तरफ रखकर दिन खत्म कर चुके होते हैं, सोशल मीडिया पर भारतीय क्रिकेटर ऋषभ पंत की एक पोस्ट सामने आती है। पोस्ट में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मदद की मांग की जाती है। यह सिर्फ एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं थी। इसे पढ़ने वालों के लिए यह एक अलग तरह की कहानी थी। एक तरफ श्रीलंका का दौरा है। मैदान है। क्रिकेट है। टीम है। वार्मअप मैच हैं। दूसरी तरफ अपने घर लौटने की इच्छा है और उस इच्छा के बीच खड़ी कोई ऐसी परेशानी, जिसके समाधान के लिए राज्य के मुख्यमंत्री तक बात पहुंचानी पड़ रही है। अगर पंत सचमुच दिल्ली से दोबारा उत्तराखंड शिफ्ट होना चाहते हैं, तो सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी दिक्कत है, जिसने उत्तराखंड के इस स्टार क्रिकेटर को आधी रात सोशल मीडिया के जरिए मुख्यमंत्री से मदद मांगने को मजबूर किया? और यही वह सवाल है, जिस पर क्रिकेट की चमक से बाहर निकलकर बात करने की जरूरत है। ऋषभ पंत का नाम उत्तराखंड से सिर्फ इसलिए नहीं जुड़ा है कि वह देश के बड़े क्रिकेटरों में शामिल हैं। वह उस पहाड़ से आते हैं, जहां से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाना आसान नहीं होता। पहाड़ में अक्सर एक कहानी सुनाई जाती हैकृबेटा बाहर जाता है, पढ़ता है, नौकरी करता है, बड़ा आदमी बनता है और फिर एक दिन गांव लौटना चाहता है। लेकिन लौटने की राह में कई बार वही पुरानी मुश्किलें खड़ी मिलती हैं। सड़क,व्यवस्था, कागज,जमीन व स्थानीय प्रशासन और सबसे बड़ा सवालकृक्या पहाड़ में वापस आने वाले व्यक्ति के लिए व्यवस्था उतनी ही सहज है, जितनी बाहर जाने वाले के लिए? पंत की पोस्ट को इसी बड़े सवाल के संदर्भ में देखना चाहिए। क्योंकि यह मामला सिर्फ एक सेलिब्रिटी का नहीं है। मान लीजिए किसी आम पहाड़ी परिवार का बेटा वर्षों दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ या किसी दूसरे शहर में रहने के बाद अपने राज्य में लौटना चाहता है। उसे अगर किसी जमीन, घर, दस्तावेज, प्रशासनिक प्रक्रिया या स्थानीय समस्या के समाधान के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें तो उसके पास किसे टैग करने का विकल्प है? क्या वह आधी रात मुख्यमंत्री को टैग करके लिख सकता हैकृमुख्यमंत्री जी, मदद करिए? शायद नहीं। ऋषभ पंत कर सकते हैं क्योंकि उनके पास लाखों लोगों तक पहुंचने वाला सोशल मीडिया है। उनका एक पोस्ट खबर बन जाता है। मुख्यमंत्री तक बात पहुंच जाती है। प्रशासन भी शायद तुरंत सक्रिय हो जाए। लेकिन यहां असली सवाल यही हैकृजिस काम के लिए एक क्रिकेटर को मुख्यमंत्री को सोशल मीडिया पर पुकारना पड़ रहा है, उसी काम के लिए एक सामान्य नागरिक क्या करता होगा? यह सवाल पंत पर नहीं, व्यवस्था पर है और शायद इसीलिए इस पोस्ट को सिर्फ वायरल पोस्ट मानकर आगे बढ़ जाना ठीक नहीं होगा। उत्तराखंड सरकार लगातार प्रवासियों को वापस पहाड़ लाने, निवेश बढ़ाने और रिवर्स माइग्रेशन को प्रोत्साहित करने की बात करती रही है। सरकार चाहती है कि पहाड़ से बाहर गया व्यक्ति वापस आए। अपने गांव में बसे। जमीन का इस्तेमाल करे। रोजगार पैदा करे। लेकिन रिवर्स माइग्रेशन सिर्फ भाषणों से नहीं होता। लोगों को लौटने के लिए भरोसा चाहिए। उन्हें जमीन चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा साफ व्यवस्था चाहिए। उन्हें सड़क चाहिए, इंटरनेट चाहिए, स्कूल चाहिए, अस्पताल चाहिए, रोजगार चाहिए और ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी काम के लिए किसी बड़े आदमी की पहचान जरूरी न हो। ऋषभ पंत अगर उत्तराखंड लौटना चाहते हैं तो यह राज्य के लिए खुशी की बात होनी चाहिए। लेकिन उनकी घर वापसी अगर किसी प्रशासनिक अड़चन में फंसती है, तो यह भी सोचने का मौका है कि उन हजारों-लाखों लोगों का क्या होता होगा जो उत्तराखंड लौटना चाहते हैं, लेकिन उनके पास पंत जैसी आवाज नहीं है। पहाड़ का पलायन केवल गांव खाली होने की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की भी कहानी है जो लौटना चाहते हैं। कई लोग कहते हैं कि पहाड़ छोड़ना आसान है, लौटना मुश्किल। क्यों? क्योंकि बाहर शहर में आपकी पहचान आपकी नौकरी, आपका कारोबार और आपकी मेहनत से बनती है। पहाड़ लौटकर वही व्यक्ति कई बार जमीन, दस्तावेज, स्थानीय व्यवस्था और सरकारी प्रक्रियाओं के बीच उलझ जाता है और फिर वह सोचता हैकृक्या वापस आना गलती थी? ऋषभ पंत की पोस्ट को इसी नजरिए से पढ़ना चाहिए। यहां किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह जानना भी जरूरी है कि उनकी वास्तविक परेशानी क्या है। क्या मामला संपत्ति से जुड़ा है? दस्तावेज से? प्रशासनिक अनुमति से? किसी अन्य प्रक्रिया से? जब तक पंत या मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आती, तब तक सोशल मीडिया की अटकलों को तथ्य मान लेना पत्रकारिता नहीं होगी। लेकिन एक बात जरूर पूछी जानी चाहिए। अगर पंत का घर उत्तराखंड है तो उन्हें अपने घर लौटने के लिए मदद क्यों मांगनी पड़ी? और अगर मुख्यमंत्री उनकी मदद करते हैं, तो क्या उसी प्रक्रिया को इतना सरल बनाया जा सकता है कि अगली बार किसी दूसरे प्रवासी को मुख्यमंत्री को टैग न करना पड़े? क्योंकि उत्तराखंड को सिर्फ ऋषभ पंत की वापसी की खबर नहीं चाहिए। उत्तराखंड को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें हर ऋषभ पंत अपने घर लौट सके। रात के 12 बजकर 46 मिनट पर लिखा गया एक सोशल मीडिया पोस्ट सुबह की खबर बन गया। लेकिन असली खबर शायद वह पोस्ट नहीं है। असली खबर वह सवाल है, जो पोस्ट के पीछे खड़ा हैकृअपने पहाड़ लौटने की इच्छा रखने वाले आदमी के रास्ते में आखिर कौन खड़ा है? और अगर रास्ते में व्यवस्था खड़ी है, तो उसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है? मुख्यमंत्री की, सरकार की, प्रशासन की और शायद उन सभी की, जो वर्षों से कहते आए हैंकृ पहाड़ वापस आओ। अब सवाल यह है कि जब कोई वापस आना चाहता है, तो क्या पहाड़ और उसकी व्यवस्था उसके लिए दरवाजा खोलती है? या फिर दरवाजे तक पहुंचने के लिए भी किसी ऋषभ पंत का होना जरूरी है?

सैन्यभूमि के युवाओं को ‘सहारा’

उत्तराखंड में अग्निवीरों के लिए पुनर्राेजगार सेल गठित, सेवा के बाद मिलेगा रोजगार देश के पहले अग्निवीर पुनर्राेजगार सेल से हर सैनिक को रोजगार से जोड़ने की तैयारी सेवा के बाद भविष्य सुरक्षित करने पर जोर, रोजगार के लिए बन रहा है मजबूत तंत्र देहरादून। उत्तराखंड को सैनिकों की भूमि के रूप में पहचान दिलाने वाले राज्य में अग्निवीरों के भविष्य को लेकर सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य में स्थापित अग्निवीर पुनर्राेजगार सेल का उद्देश्य सेना में सेवा पूरी करने वाले अग्निवीरों को उनके कौशल और योग्यता के अनुरूप रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है। सरकार की इस पहल का फोकस सिर्फ अग्निवीरों को रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि सेना में मिले अनुशासन, प्रशिक्षण और तकनीकी दक्षता को नागरिक क्षेत्र में उपयोगी रोजगार से जोड़ना भी है। उत्तराखंड जैसे सैन्य बहुल राज्य के लिए यह पहल खास महत्व रखती है। राज्य के हजारों परिवारों की पीढ़ियां सेना से जुड़ी रही हैं। ऐसे में अग्निवीर योजना के तहत सेवा में जाने वाले युवाओं के लिए सेवा अवधि के बाद रोजगार और भविष्य की सुरक्षा बड़ा विषय रहा है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने पुनर्राेजगार की व्यवस्था को संस्थागत रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। अग्निवीरों को सेना में सीमित अवधि की सेवा के दौरान सैन्य प्रशिक्षण के साथ अनुशासन, नेतृत्व, तकनीकी दक्षता और टीमवर्क का अनुभव मिलता है। सरकार का प्रयास है कि सेवा समाप्त होने के बाद इन कौशलों को रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाए। इसके लिए पुनर्राेजगार सेल विभिन्न विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों, निजी क्षेत्र और अन्य रोजगार प्रदाताओं के साथ समन्वय की भूमिका निभा सकता है। अग्निवीरों की योग्यता और कौशल के आधार पर उन्हें उपयुक्त अवसरों की जानकारी उपलब्ध कराने, रोजगार मेलों से जोड़ने और आवश्यक मार्गदर्शन देने पर जोर रहेगा। उत्तराखंड में सेना सिर्फ रोजगार का माध्यम नहीं रही है। यहां सेना के प्रति भावनात्मक जुड़ाव भी गहरा है। पर्वतीय क्षेत्रों के अनेक परिवारों में आज भी सेना की वर्दी गौरव का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में अग्निवीरों के भविष्य को लेकर राज्य सरकार की पहल का सामाजिक महत्व भी है। सरकार का संदेश है कि जो युवा देश की सुरक्षा के लिए अपनी सेवाएं देंगे, उनके भविष्य को लेकर राज्य भी अपनी जिम्मेदारी निभाएगा। यही वजह है कि पुनर्राेजगार सेल को केवल सरकारी योजना के रूप में नहीं, बल्कि पूर्व सैनिकों और अग्निवीरों के लिए रोजगार का पुल बनाने की पहल के तौर पर देखा जा रहा है। सरकारी क्षेत्र में रोजगार की सीमित संभावनाओं को देखते हुए निजी क्षेत्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। अग्निवीरों के सैन्य प्रशिक्षण और कौशल का इस्तेमाल सुरक्षा सेवाओं, आपदा प्रबंधन, लाजिस्टिक्स, तकनीकी कार्यों, प्रशासनिक जिम्मेदारियों और अन्य क्षेत्रों में किया जा सकता है। राज्य सरकार की कोशिश होगी कि निजी कंपनियां भी प्रशिक्षित अग्निवीरों को रोजगार के लिए प्राथमिकता दें और उनके कौशल का उपयोग करें। अगर यह माडल प्रभावी ढंग से लागू होता है तो उत्तराखंड देश के अन्य राज्यों के सामने एक उदाहरण भी प्रस्तुत कर सकता है। उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौतियों में पलायन शामिल है। रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में युवा मैदानी शहरों और दूसरे राज्यों की ओर जाते हैं। सेना में सेवा के बाद यदि युवाओं को राज्य में ही रोजगार के बेहतर अवसर मिलते हैं तो इसका सीधा असर पलायन पर भी पड़ सकता है। खासकर पहाड़ी जिलों के युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर तैयार करना जरूरी है। अग्निवीरों के पास अनुशासन और प्रशिक्षण के साथ कार्य करने का अनुभव होगा। ऐसे युवाओं को राज्य के रोजगार तंत्र से जोड़ना स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। हालांकि किसी भी सरकारी पहल की सफलता इस बात से तय होगी कि वह जमीन पर कितना प्रभाव डालती है। सिर्फ सेल बन जाना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी यह होगा कि अग्निवीरों को वास्तविक रोजगार के अवसर मिलें। निजी क्षेत्र के साथ ठोस समझौते हों। रोजगार की जानकारी समय पर मिले और युवाओं को आवेदन से लेकर चयन तक उचित मार्गदर्शन उपलब्ध हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अग्निवीरों की योग्यता के अनुरूप सम्मानजनक और स्थायी रोजगार के अवसर तैयार किए जाएं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में शुरू की गई यह पहल उत्तराखंड की सैन्य पृष्ठभूमि और युवाओं की आकांक्षाओं से सीधे जुड़ी है। सरकार के सामने अब चुनौती इस पहल को एक प्रभावी रोजगार मॉडल में बदलने की है। अगर हर सेवा पूर्ण करने वाले अग्निवीर को उसकी योग्यता के अनुसार रोजगार का अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस व्यवस्था बनती है तो यह राज्य के युवाओं के लिए बड़ा भरोसा बन सकती है। क्योंकि सैनिक बनना सिर्फ वर्दी पहनना नहीं है। इसके पीछे एक परिवार की उम्मीद होती है। एक गांव का सपना होता है और देश की सेवा का संकल्प होता है। ऐसे में सेवा पूरी होने के बाद उस युवा से यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि अब आप नौकरी तलाशिए। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जो उससे कहेकृ देश की सेवा आपने की है, अब आपके कौशल को रोजगार से जोड़ना हमारी जिम्मेदारी है। यही अग्निवीर पुनर्राेजगार सेल की सबसे बड़ी कसौटी होगी।

‘कुमाऊं की सियासी नब्ज’

कांग्रेस की चुनावी रणनीति में कुमाऊं पर खास फोकस विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का है शक्ति प्रदर्शन संगठन और कार्यकर्ताओं में जोश,भाजपा को देंगे संदेश देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस अब कुमाऊं की धरती से चुनावी अभियान को धार देने की तैयारी में है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के हल्द्वानी दौरे को इसी रणनीति की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। हल्द्वानी को कांग्रेस ने इसके लिए चुना है तो इसके पीछे केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कुमाऊं की राजनीतिक नब्ज को साधने की कोशिश भी मानी जा रही है। कुमाऊं में कांग्रेस की पारंपरिक पकड़, स्थानीय मुद्दों और संगठन की मौजूदा स्थिति को देखते हुए पार्टी हाईकमान यहां से कार्यकर्ताओं को बड़ा राजनीतिक संदेश देना चाहता है। कांग्रेस की कोशिश है कि हल्द्वानी से ऐसा माहौल तैयार किया जाए, जिसकी राजनीतिक गूंज अल्मोड़ा से लेकर पिथौरागढ़, नैनीताल, बागेश्वर, चंपावत और ऊधम सिंह नगर तक सुनाई दे। कुमाऊं की राजनीति में हल्द्वानी का अपना अलग महत्व है। इसे कुमाऊं का प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक केंद्र माना जाता है। मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच संपर्क का बड़ा केंद्र होने के कारण हल्द्वानी का राजनीतिक संदेश पूरे कुमाऊं में तेजी से पहुंचता है। कांग्रेस इसी राजनीतिक और भौगोलिक महत्व का लाभ उठाना चाहती है। पार्टी की रणनीति में हल्द्वानी सिर्फ कार्यक्रम स्थल नहीं, बल्कि कुमाऊं में चुनावी अभियान के लान्चिंग पैड की भूमिका निभा सकता है। लंबे समय से कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की रही है। सत्ता में वापसी के लिए पार्टी को केवल बड़े नेताओं के भाषणों पर निर्भर रहने के बजाय जमीनी संगठन को सक्रिय करना होगा। मल्लिकार्जुन खरगे का दौरा इसी लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कार्यकर्ताओं के साथ संवाद, संगठन को चुनाव के लिए तैयार करने का संदेश और भाजपा सरकार के खिलाफ मुद्दों को जनता के बीच ले जाने की रणनीति पर पार्टी नेतृत्व जोर दे सकता है। कांग्रेस चाहती है कि कार्यकर्ता चुनावी मोड में अभी से उतरें और विधानसभा स्तर पर मतदाताओं के साथ संपर्क अभियान तेज करें। कुमाऊं की राजनीति में स्थानीय मुद्दों का प्रभाव हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई, युवाओं के रोजगार और पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। इसके अलावा जमीन और स्थानीय पहचान से जुड़े मुद्दे भी चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं। कांग्रेस का प्रयास रहेगा कि राष्ट्रीय राजनीति के बजाय उत्तराखंड के स्थानीय सवालों को चुनाव का केंद्र बनाया जाए। हल्द्वानी से राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यक्रम कांग्रेस की ओर से भाजपा को सीधा राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की रणनीति पर काम कर रही है। संगठन को बूथ स्तर पर मजबूत करने और हारी हुई सीटों पर विशेष फोकस की उसकी तैयारी सामने आ चुकी है। ऐसे में कांग्रेस भी यह दिखाना चाहती है कि वह चुनाव से पहले संगठन को सक्रिय कर रही है और मुकाबले के लिए तैयार है। खरगे की मौजूदगी से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के साथ कांग्रेस नेतृत्व यह संदेश देने की कोशिश करेगा कि उत्तराखंड का चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ राज्य इकाई का चुनाव नहीं, बल्कि केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकता भी है। उत्तराखंड की राजनीति में कुमाऊं क्षेत्र कांग्रेस के लिए लंबे समय तक महत्वपूर्ण आधार रहा है। हालांकि पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा ने यहां मजबूत प्रदर्शन किया। अब कांग्रेस के सामने चुनौती पुराने राजनीतिक आधार को दोबारा सक्रिय करने की है। इसके लिए पार्टी को सिर्फ बड़े नेताओं की सभाओं से आगे बढ़ना होगा। स्थानीय नेतृत्व, पूर्व प्रत्याशी, विधायक, जिला और ब्लॉक संगठन तथा बूथ कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल मजबूत करना होगा। हल्द्वानी का कार्यक्रम इसी बड़े अभियान की शुरुआत बन सकता है। उत्तराखंड में चुनावी राजनीति अक्सर गढ़वाल और कुमाऊं के क्षेत्रीय संतुलन के इर्द-गिर्द भी देखी जाती है। ऐसे में हल्द्वानी से कांग्रेस का बड़ा कार्यक्रम यह संकेत दे सकता है कि पार्टी कुमाऊं में अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए अलग रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस के सामने लक्ष्य स्पष्ट हैकृकुमाऊं की अधिक से अधिक विधानसभा सीटों पर मुकाबले को मजबूत करना। इसके लिए पार्टी को स्थानीय असंतोष को राजनीतिक मुद्दे में बदलना होगा और संगठन को चुनावी मशीनरी में तब्दील करना होगा। मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी यात्रा का महत्व सिर्फ उनके भाषण तक सीमित नहीं रहेगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कार्यक्रम के बाद कांग्रेस संगठन कितनी तेजी से सक्रिय होता है। क्या बूथ स्तर पर नई जिम्मेदारियां तय होंगी? क्या स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद कम होंगे?क्या युवाओं और महिला मतदाताओं के लिए अलग अभियान तैयार होगा?क्या कांग्रेस भाजपा सरकार के खिलाफ स्थानीय मुद्दों को लगातार जनता के बीच ले जाएगी? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि हल्द्वानी का यह कार्यक्रम महज एक राजनीतिक सभा था या 2027 के चुनावी अभियान का वास्तविक आगाज। फिलहाल कांग्रेस का संदेश साफ दिखाई दे रहा हैकृ कुमाऊं की जमीन पर लौटना है, संगठन को जगाना है और भाजपा के सामने सीधी चुनौती पेश करनी है। हल्द्वानी से उठने वाली यह राजनीतिक आवाज आने वाले महीनों में कुमाऊं की चुनावी हवा किस दिशा में मोड़ती है, इस पर अब सबकी नजर रहेगी।

‘घर लौटने’ की राह में खड़ी ‘दीवार’

सरकार के दावों की हकीकत ऋषभ पंत की आधी रात की गुहार और उत्तराखंड के दावों का कड़वा सच उत्तराखंड राज्य के बड़े आयकरदाता को लगानी पड़ी गुहार तो आमजन कहा सवालकृजब एक स्टार क्रिकेटर को घर लौटने में दिक्कत तो आम पहाड़ी कहां देहरादून। रात के 12 बजकर 46 मिनट। देश के सबसे चर्चित क्रिकेटरों में शामिल ऋषभ पंत श्रीलंका दौरे पर हैं। टीम इंडिया के साथ क्रिकेट के मैदान पर मौजूद हैं। लेकिन इसी बीच उनका एक सोशल मीडिया पोस्ट उत्तराखंड की व्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल खड़ा कर देता है। पंत ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मदद की अपील की। यह सिर्फ एक क्रिकेटर की व्यक्तिगत परेशानी की कहानी नहीं है। यह उस उत्तराखंड की कहानी भी है, जो लगातार प्रवासियों से कहता हैकृलौट आइए, अपने पहाड़ आइए, अपने गांव आइए। लेकिन जब कोई लौटना चाहता है तो उसके रास्ते में कौन-कौन सी दीवारें खड़ी हो जाती हैं?और इस सवाल को और गंभीर बना देता है ऋषभ पंत का कद। ऋषभ पंत कोई सामान्य नाम नहीं हैं। वह उत्तराखंड से निकलकर भारतीय क्रिकेट के बड़े सितारे बने। उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व किया, दुनिया के बड़े क्रिकेट मैदानों पर अपनी पहचान बनाई और उत्तराखंड के नाम को भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के नक्शे पर पहुंचाया। आयकर के लिहाज से भी पंत को उत्तराखंड के प्रमुख करदाताओं में गिना जाता रहा है। ऐसे में अगर राज्य का इतना बड़ा नाम अपने ही राज्य में लौटने से जुड़ी किसी परेशानी के लिए मुख्यमंत्री से सार्वजनिक रूप से मदद मांग रहा है, तो सवाल सिर्फ पंत का नहीं रह जाता। सवाल व्यवस्था का हो जाता है। सोचिए सरकार कहती है कि उत्तराखंड में रिवर्स माइग्रेशन होगा। सरकार कहती है कि पहाड़ खाली नहीं होने दिए जाएंगे। सरकार कहती है कि प्रवासी उत्तराखंडियों को वापस लाया जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ अगर देश का एक बड़ा क्रिकेट स्टार अपने राज्य में दोबारा बसने की कोशिश में किसी अड़चन का सामना कर रहा है और उसे मुख्यमंत्री को सोशल मीडिया पर पुकारना पड़ रहा है, तो हमें एक मिनट रुककर पूछना चाहिएकृकि क्या उत्तराखंड में वापस आना सचमुच इतना आसान है? ऋषभ पंत के पास अपनी बात सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचाने की ताकत है। उनके पोस्ट को कुछ ही मिनटों में हजारों लोग देख सकते हैं। मीडिया उसे खबर बना देता है, सरकार संज्ञान ले सकती है और प्रशासन सक्रिय हो सकता है। लेकिन उस पहाड़ी नौजवान का क्या, जो दिल्ली, मुंबई या देहरादून से अपने गांव लौटना चाहता है? उसके पास कितने फालोअर हैं? वह मुख्यमंत्री को टैग करके कितनी आसानी से अपनी समस्या बता सकता है? शायद यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है। उत्तराखंड का पलायन सिर्फ रोजगार की कहानी नहीं है। यह व्यवस्था की कहानी भी है। लोग पहाड़ छोड़कर शहरों में गए, किसी ने नौकरी की, किसी ने कारोबार किया, किसी ने बच्चों को पढ़ाया, किसी ने मकान बनाया और अब कई लोग वापस लौटना चाहते हैं। लेकिन लौटने के साथ जमीन के कागज सामने आते हैं। राजस्व विभाग सामने आता है। स्थानीय अनुमति सामने आती है। सड़क और बिजली की समस्या सामने आती है। स्कूल और अस्पताल का सवाल सामने आता है और सबसे ऊपर आती है सरकारी प्रक्रिया। अगर किसी बड़े क्रिकेटर को भी इन प्रक्रियाओं में मदद की जरूरत पड़ रही है, तो आम आदमी की मुश्किल का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां ऋषभ पंत को लेकर सहानुभूति जताना ही पर्याप्त नहीं है। उनकी परेशानी को एक केस स्टडी की तरह देखना चाहिए। क्योंकि अगर उत्तराखंड सच में चाहता है कि उसके बाहर गए लोग वापस आएं, तो उसे सिर्फ यह कहने से काम नहीं चलेगा किकृ पना पहाड़ आपको बुला रहा है। पहाड़ बुला रहा है तो रास्ता भी आसान करना होगा। यह सवाल थोड़ा असहज है, लेकिन पूछा जाना चाहिए कि जिस राज्य का नागरिक बाहर रहकर कमाता है, निवेश करता है, टैक्स देता है और फिर अपने घर लौटना चाहता हैकृक्या राज्य की मशीनरी उसके लिए इतनी सरल नहीं हो सकती कि उसे मुख्यमंत्री के दरवाजे तक अपनी बात लेकर न जाना पड़े? ऋषभ पंत की लोकप्रियता के कारण यह मामला सामने आ गया। लेकिन उत्तराखंड में ऐसे कितने लोग हैं जिनकी परेशानियां कभी सोशल मीडिया तक पहुंचती ही नहीं? कितने पूर्व प्रवासी अपने गांव लौटकर जमीन और प्रशासनिक उलझनों में फंस जाते हैं? कितने लोग वापस आने का विचार इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां काम करवाना मुश्किल है? इन सवालों का जवाब किसी वायरल पोस्ट से नहीं मिलेगा। इसके लिए सरकार को अपनी व्यवस्था देखनी होगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए यह सिर्फ एक व्यक्ति की मदद करने का मामला नहीं होना चाहिए। यह अवसर है। अगर ऋषभ पंत उत्तराखंड में वापस आना चाहते हैं तो सरकार उनकी समस्या का समाधान करे। लेकिन उसके साथ-साथ ऐसी व्यवस्था भी बनाए जिसमें अगला व्यक्ति मुख्यमंत्री को टैग करने के बजाय एक सरल पोर्टल, एक हेल्पडेस्क या एकल खिड़की के जरिए अपना काम करा सके। क्योंकि रिवर्स माइग्रेशन पोस्टर से नहीं, सिस्टम से आएगा। उत्तराखंड को ऐसे पहाड़ की जरूरत है जहां किसी ऋषभ पंत को भी अपने घर लौटने के लिए आधी रात को गुहार न लगानी पड़े और अगर पंत जैसे बड़े नाम को आवाज उठानी पड़ रही है, तो उन हजारों सामान्य उत्तराखंडियों के बारे में सोचना जरूरी है जिनकी आवाज मुख्यमंत्री तक कभी पहुंचती ही नहीं। रात के 12 बजकर 46 मिनट पर ऋषभ पंत की पोस्ट वायरल हुई। अब देखना यह है कि सरकार इसे सिर्फ एक क्रिकेटर की समस्या समझती है या उत्तराखंड में घर वापसी की पूरी व्यवस्था पर उठे सवाल के रूप में देखती है। क्योंकि असली सवाल यह नहीं है किकृऋषभ पंत को मदद मिलेगी या नहीं? असली सवाल यह हैकृ जब उत्तराखंड का सबसे बड़ा नाम भी अपने घर लौटने के लिए गुहार लगाए, तो उस आम पहाड़ी की क्या स्थिति होगी जिसके पास न करोड़ों की कमाई है, न सोशल मीडिया की ताकत और न मुख्यमंत्री तक सीधे पहुंच? यही सवाल ऋषभ पंत की आधी रात की पोस्ट को एक क्रिकेट खबर से कहीं बड़ी खबर बना देता है।

एसआईआर में 75 साल के बुजुर्ग से दस्तावेज मांगने पर उठ रहे हजारों सवाल

75 साल की उम्र, 50 साल का वोट व एक हाईस्कूल मार्कशीट की जलालत सरकारें चुनने वाला बुजुर्ग अब खुद की पहचान साबित करने को है मोहताज लोकतंत्र के सामने नागरिक को अपनी पहचान साबित करने को किया मजबूर देहरादून। एक आदमी 75 साल का हो चुका है। उसके बाल सफेद हैं। चेहरे पर उम्र की लकीरें हैं। जिंदगी का बड़ा हिस्सा उसने इसी देश में गुजारा है। उसने सरकारें बदलते देखीं। प्रधानमंत्रियों को आते-जाते देखा। मुख्यमंत्रियों के चेहरे बदले। चुनाव के नारों को बदलते देखा। गांवों को कस्बों में बदलते देखा और कस्बों को शहर बनते देखा और इन तमाम बदलावों के बीच एक चीज नहीं बदलीकृउसका वोट। करीब पांच दशक तक वह चुनाव आया तो मतदान केंद्र तक गया। कतार में खड़ा हुआ। पहचान बताई। वोट डाला और घर लौट आया। लेकिन आज, 75 साल की उम्र में व्यवस्था उसके सामने एक नया सवाल लेकर खड़ी हैकृ हाईस्कूल की मार्कशीट दिखाइए। यह सिर्फ एक कागज मांगने की कहानी नहीं है। यह उस रिश्ते की कहानी है जो नागरिक और लोकतंत्र के बीच बनता है और सवाल यह है कि क्या पांच दशक तक वोट देने वाला नागरिक आज एक मार्कशीट से छोटा हो गया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना है। फर्जी नाम हटें, मृत मतदाताओं के नाम हटें, गलत प्रविष्टियां सुधरें और वास्तविक मतदाता सूची में रहेंकृइस उद्देश्य पर सवाल नहीं होना चाहिए। सवाल उस तरीके पर है, जिसमें प्रक्रिया आम आदमी के लिए भय और परेशानी का कारण बनने लगे। एक 75 वर्षीय व्यक्ति से हाईस्कूल की मार्कशीट मांगना शायद कागज पर एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लगे। लेकिन उस व्यक्ति की जिंदगी में जाकर देखिए। उसने हाईस्कूल किस साल पास किया होगा। उस समय स्कूलों में रिकार्ड आज की तरह डिजिटल नहीं थे। कितने स्कूलों की पुरानी इमारतें आज भी मौजूद हैं। कितने स्कूलों के पुराने रजिस्टर सुरक्षित हैं। कितने लोगों के पास 50-60 साल पुराने प्रमाणपत्र आज भी सुरक्षित होंगे और अगर वह कागज खो गया तो क्या नागरिकता, मतदाता पहचान और लोकतांत्रिक अधिकार का पूरा भार अब एक पुराने कागज पर टिका दिया जाएगा। व्यवस्था कह सकती हैकृदस्तावेज तो चाहिए, ठीक है। लेकिन फिर अगला सवाल भी पूछा जाना चाहिएकृकि दस्तावेज जुटाने की जिम्मेदारी किसकी है। 75 साल का बुजुर्ग सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाए, स्कूल की पुरानी फाइल खोजे, तहसील जाए, ब्लाक जाए, जन्म प्रमाणपत्र तलाशे, पुराने रिकार्ड निकलवाए और अगर रिकार्ड किसी दफ्तर में उपलब्ध ही नहीं है तो फिर क्या। क्या उसे यह साबित करना होगा कि वह पिछले 50 वर्षों से वोट क्यों देता आया। क्या वह अपनी जिंदगी की गवाही लेकर सरकारी दफ्तर में खड़ा होगा। यह वही देश है जहां गांव का एक बुजुर्ग पूरे इलाके को पहचानता है और पूरा गांव उसे पहचानता है। लेकिन कागज की दुनिया कहती हैकृ गांव तुम्हें जानता हो तो जानता रहे, पहले दस्तावेज दिखाओ। यहीं से लोकतंत्र और कागजी व्यवस्था के बीच की खाई दिखाई देती है। लोकतंत्र में नागरिक राज्य का मालिक माना जाता है। वह वोट देता है, वह टैक्स देता है, वह कानून मानता है, वह सरकार चुनता है। लेकिन धीरे-धीरे एक ऐसी प्रशासनिक भाषा विकसित होती जा रही है, जिसमें नागरिक से पहले पूछा जाता हैकृआप साबित कीजिए कि आप वही हैं जो आप कहते हैं। यह सवाल सुनने में सामान्य है, लेकिन इसके पीछे छिपा डर बहुत बड़ा है। क्योंकि गरीब के पास दस्तावेज कम हो सकते हैं। बुजुर्ग के कागज खो सकते हैं। गांव में रहने वाले व्यक्ति के रिकार्ड पुराने हो सकते हैं। महिलाओं के नाम विवाह के बाद बदल सकते हैं। परिवारों के पते बदल सकते हैं। गांवों के नाम बदल सकते हैं और कई लोगों के जीवन में दस्तावेज हमेशा उनकी जिंदगी से पीछे चलते रहे हैं। तो क्या अब दस्तावेजों की कमी को नागरिक की कमी मान लिया जाएगा। मतदाता सूची में गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए। यह लोकतंत्र की पहली शर्तों में से एक है। लेकिन मतदाता सूची को साफ करने की प्रक्रिया में अगर वास्तविक मतदाता ही डरने लगे तो प्रशासन को एक बार रुककर सोचना चाहिए। क्योंकि चुनाव आयोग के सामने सिर्फ कागज नहीं हैं। कागज के पीछे इंसान हैं। एक बुजुर्ग है। एक विधवा है। एक प्रवासी मजदूर है। एक पहाड़ी गांव का परिवार है। एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अपना अधिकांश जीवन गांव में बिताया और अब उसके बच्चे शहरों में रहते हैं। इन लोगों से दस्तावेज मांगना गलत नहीं है। लेकिन उन्हें दस्तावेज जुटाने की सहायता दिए बिना सिर्फ नोटिस थमा देना सवाल जरूर खड़ा करता है। कल्पना कीजिए, एक बुजुर्ग के घर बीएलओ आता है। हाथ में नोटिस है। कहता हैकृदस्तावेज जमा करने होंगे। बुजुर्ग कागजों की पुरानी पेटी खोलता है। एक-एक कागज निकालता है। कुछ पढ़ने लायक हैं। कुछ फट चुके हैं। कुछ पर स्याही धुंधली हो चुकी है। कुछ मिलते ही नहीं। फिर घर में सवाल शुरू होता हैकृअब क्या होगा,नाम कट तो नहीं जाएगा ,वोट दे पाएंगे या नहीं, बच्चों को बुलाना पड़ेगा, दफ्तर कौन जाएगा। एक सरकारी प्रक्रिया धीरे-धीरे परिवार की चिंता बन जाती है। यही वह बिंदु है जहां प्रशासन को समझना होगा कि कानून और प्रक्रिया की भाषा एक जैसी नहीं होती।कानून कागज मांग सकता है। लेकिन प्रशासन को इंसान भी दिखाई देना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यही है। यदि कोई व्यक्ति दशकों से मतदाता सूची में दर्ज है, लगातार चुनावों में मतदान करता रहा है, उसके पास दूसरे सरकारी दस्तावेज हैं, स्थानीय स्तर पर उसकी पहचान है, तो इन तमाम तथ्यों का महत्व क्या है। क्या हर पीढ़ी को अपने अस्तित्व का नया प्रमाण देना होगा। क्या 75 साल की उम्र में भी नागरिक कहेगा मैं हूं और सरकार जवाब देगीकृपहले साबित करो। फिर लोकतंत्र किसके लिए है। क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव के दिन वोट डालना है। या लोकतंत्र का मतलब यह भी है कि राज्य अपने नागरिक पर भरोसा करे। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। यहां हजारों गांवों की सामाजिक स्मृति कागजों से नहीं चलती। गांव में किसी व्यक्ति की पहचान उसके घर, परिवार, खेत, रिश्तों और पीढ़ियों से होती है। एक बुजुर्ग के बारे में गांव का बच्चा तक जानता है कि वह कौन है। लेकिन सरकारी फार्म पर उसका अस्तित्व कुछ कालम में बंट जाता हैकृनाम,पिता का नाम,जन्मतिथि,पता,दस्तावेज संख्या और फिर एक बाक्सकृ में प्रमाण संलग्न करें। जिस आदमी की जिंदगी 75 साल की है, उसकी पहचान एक बाक्स में समा जाती है और अगर उस बाक्स में कागज नहीं है तो क्या उसकी पूरी जिंदगी अधूरी मान ली जाएगी।

हारी सीटों पर भाजपा की ‘किलेबंदी’

कोर कमेटी को विधानसभावार संगठनात्मक प्रवास की जिम्मेदारी कमजोर बूथों से लेकर नाराज कार्यकर्ताओं तक की होगी पड़ताल विस चुनाव 2027 से पहले हार वाली सीटों पर भाजपा का फोकस देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने अपनी चुनावी तैयारियों को और धार देना शुरू कर दिया है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ पार्टी अब उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष नजर रख रही है, जहां पिछले चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इन सीटों को जीत में बदलने के लिए पार्टी संगठन ने जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ाने की रणनीति बनाई है। इसी कड़ी में भाजपा कोर कमेटी के सदस्यों को विधानसभावार संगठनात्मक प्रवास की जिम्मेदारी दिए जाने की तैयारी है। संबंधित वरिष्ठ नेता अपने-अपने निर्धारित विधानसभा क्षेत्रों में जाकर संगठन की वास्तविक स्थिति का आकलन करेंगे। बूथ स्तर की सक्रियता, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय, स्थानीय मुद्दों और चुनावी माहौल की जानकारी जुटाने के साथ ही पिछले चुनाव में हार के कारणों की भी पड़ताल की जाएगी। भाजपा के लिए यह कवायद इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं है। पार्टी सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस समेत विपक्षी दल भी संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं। चुनाव में किसी सीट पर हार सिर्फ उम्मीदवार की हार नहीं होती। उसके पीछे संगठन की कमजोरी, स्थानीय नाराजगी, बूथ प्रबंधन, टिकट को लेकर असंतोष और चुनावी रणनीति की कमी जैसे कई कारण हो सकते हैं। भाजपा अब इन्हीं पहलुओं की समीक्षा करना चाहती है। कोर कमेटी के सदस्य जब विधानसभा क्षेत्रों में प्रवास करेंगे तो वहां पार्टी पदाधिकारियों, मंडल और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से संवाद किया जाएगा। स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से यह समझने की कोशिश होगी कि आखिर पिछले चुनाव में पार्टी कहां कमजोर रही। क्या प्रत्याशी को लेकर नाराजगी थी?क्या स्थानीय संगठन सक्रिय नहीं था?क्या बूथ प्रबंधन में कमी रह गई? क्या पार्टी के पक्ष में माहौल होने के बावजूद वोटों का सही प्रबंधन नहीं हो पाया? या फिर स्थानीय स्तर पर कोई ऐसा मुद्दा था, जिसने चुनावी समीकरण बदल दिया? इन सभी सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश होगी। भाजपा की चुनावी राजनीति में बूथ प्रबंधन को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में हारी हुई विधानसभा सीटों पर पार्टी की रणनीति का केंद्र बूथ ही रहने वाला है। कहां पार्टी के बूथ कमजोर हैं, किन बूथों पर कार्यकर्ता सक्रिय नहीं हैं, किन क्षेत्रों में मतदाताओं के साथ संपर्क कमजोर है और किन इलाकों में विपक्ष को बढ़त मिली थीकृइन बिंदुओं पर फोकस किया जाएगा। पार्टी की कोशिश होगी कि चुनाव से काफी पहले बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत कर दिया जाए, ताकि चुनाव के समय अचानक सक्रिय होने के बजाय कार्यकर्ता लगातार मतदाताओं के संपर्क में रहें। किसी भी चुनाव में संगठन की सबसे बड़ी ताकत कार्यकर्ता होता है। लेकिन चुनाव हारने के बाद कई बार कार्यकर्ताओं में निराशा और स्थानीय नेतृत्व को लेकर नाराजगी भी सामने आती है। भाजपा की संगठनात्मक प्रवास योजना में ऐसे कार्यकर्ताओं से संवाद को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी यह जानना चाहेगी कि स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की क्या शिकायतें हैं। विधायक, पूर्व प्रत्याशी और संगठन के बीच तालमेल कैसा है। स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद तो नहीं हैं और कार्यकर्ताओं को चुनावी अभियान में किस तरह अधिक प्रभावी भूमिका दी जा सकती है। क्योंकि चुनाव सिर्फ बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं जीता जाता। चुनाव बूथ पर खड़ा कार्यकर्ता जिताता है। उत्तराखंड की राजनीति में स्थानीय मुद्दों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। सड़क, रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि, पेयजल और क्षेत्रीय विकास जैसे मुद्दे विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करते हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का प्रवास इसलिए भी अहम होगा कि पार्टी को प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की अलग राजनीतिक तस्वीर मिल सके। एक सीट पर जो मुद्दा महत्वपूर्ण है, जरूरी नहीं कि दूसरी सीट पर भी वही मुद्दा चुनावी प्रभाव रखता हो। इसलिए विधानसभा स्तर पर अलग रणनीति बनाने की दिशा में भी पार्टी आगे बढ़ सकती है। संगठनात्मक प्रवास का उद्देश्य केवल रिपोर्ट तैयार करना नहीं माना जा रहा। पार्टी की कोशिश समस्याओं की पहचान के साथ उनके समाधान की दिशा में भी काम करने की होगी जहां संगठन कमजोर है, वहां नए सिरे से जिम्मेदारी तय की जा सकती है, जहां कार्यकर्ताओं में नाराजगी है, वहां संवाद बढ़ाया जा सकता है, जहां बूथ कमजोर हैं, वहां बूथ समितियों को सक्रिय किया जा सकता है और जहां स्थानीय स्तर पर नेतृत्व को लेकर असंतोष है, वहां वरिष्ठ नेताओं के माध्यम से स्थिति संभालने की कोशिश होगी। उत्तराखंड में भाजपा लगातार दो विधानसभा चुनावों में सरकार बनाने में सफल रही है। अब पार्टी के सामने 2027 में सत्ता की हैट्रिक लगाने की चुनौती है। लेकिन तीसरी बार सत्ता में लौटने के लिए पार्टी को केवल अपनी मजबूत सीटों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। उसे उन सीटों पर भी प्रदर्शन सुधारना होगा, जहां पिछले चुनाव में उसे झटका लगा था। यही वजह है कि हारी हुई विधानसभा सीटें अब भाजपा की चुनावी रणनीति के केंद्र में आती दिख रही हैं। पार्टी की कोशिश साफ हैकृजहां पिछली बार कमी रह गई, वहां इस बार कोई गुंजाइश न छोड़ी जाए। भाजपा की यह कवायद विपक्ष के लिए भी एक राजनीतिक संकेत है। जब सत्तारूढ़ दल चुनाव से महीनों पहले हारी हुई सीटों पर संगठनात्मक प्रवास शुरू कर रहा है, तो इसका अर्थ है कि पार्टी चुनाव को लेकर पूरी तरह सक्रिय मोड में आ चुकी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के लिए भी यह चुनौती होगी कि वह इन विधानसभा क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करें और भाजपा की रणनीति का मुकाबला करने के लिए बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करें। 2027 का चुनाव अभी सामने नहीं आया है, लेकिन उसकी तैयारी जमीन पर शुरू हो चुकी है। भाजपा का संदेश साफ हैकृकि पिछली हार को भूलना नहीं है, उससे सीखना है। हारी हुई सीटों पर संगठन को भेजना है। कमजोर बूथों को मजबूत करना है। नाराज कार्यकर्ताओं को साथ लाना है। स्थानीय मुद्दों को समझना है और फिर उस पूरी तैयारी को चुनावी जीत में बदलना है। अब देखना होगा कि भाजपा की यह संगठनात्मक कवायद 2027 में कितनी सीटों का राजनीतिक गणित बदल पाती है।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

udaydinmaan: गांव की ‘धार’ पर ‘लास्ट पोस्ट’

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udaydinmaan: 1940 का पहाड़ और 2026 की ‘नौकरशाही’: डिजिटल इंडिया उत्तराखंड में एसआईआर के नोटिसों पर खड़ा हुआ एक सवाल कागज देने लाठी टेककर आओ और नोटिस देने हम खुद आएँगे चुनाव में एक-एक वोट के ...

1940 का पहाड़ और 2026 की ‘नौकरशाही’

डिजिटल इंडिया उत्तराखंड में एसआईआर के नोटिसों पर खड़ा हुआ एक सवाल कागज देने लाठी टेककर आओ और नोटिस देने हम खुद आएँगे चुनाव में एक-एक वोट के लिए दादाजी के पैर छूने वाली सरकार न गांव में सड़कें थीं, न अस्पताल, न जन्म पंजीकरण की व्यवस्था 1940 के दशक के जन्में बुजुर्ग से जन्म प्रमाण पत्र मांगना उत्पीड़न देहरादून। पचासी साल का एक बुजुर्ग...सरकारी नौकरी की। पूरी ईमानदारी से की। रिटायर हुए पच्चीस साल हो गए। सरकार ने नौकरी दी, सेवा पुस्तिका बनाई, वेतन दिया, पेंशन दी। हर महीने बैंक में पेंशन पहुंचती रही। हर चुनाव में वोट डाला। राशन कार्ड बना। आधार बना। बैंक खाता खुला। बिजली का बिल भरा। जीवन भर सरकार के रिकॉर्ड में नागरिक रहे। लेकिन अब अचानक सरकार कह रही हैकृजन्म प्रमाण पत्र लेकर आइए। सवाल यह नहीं है कि दस्तावेज क्यों मांगा जा रहा है। सवाल यह है कि 85 साल के उस नागरिक से, जिसका जन्म उस दौर में हुआ जब गांवों में जन्म का सरकारी पंजीकरण लगभग न के बराबर था, उससे आज आप कौन-सा कागज मांग रहे हैं? क्या उत्तराखंड के पहाड़ों में 1940 के दशक में हर गांव में जन्म प्रमाण पत्र बनते थे? क्या उस समय अस्पतालों में जन्म होना आम बात थी? क्या सरकार के पास इसका जवाब है? अगर नहीं, तो फिर यह नोटिस किस समझ के आधार पर लिखा गया? और कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बीएलओ घर तक आया। नोटिस देकर चला गया। लेकिन दस्तावेज लेने नहीं आएगा। अब 85 साल का बुजुर्ग खुद दफ्तर पहुंचे। मतलब सरकार का कागज घर-घर जाएगा, लेकिन नागरिक का कागज घर से नहीं उठेगा। इसे सुविधा कहते हैं या संवेदनहीनता? जिस सरकार ने चुनाव के समय घर-घर संपर्क का नारा दिया, वही सरकार अब कह रही हैकृदादा जी, आप खुद लाइन में आइए। अब कुछ अलग बात करते हैं क्या कभी किसी मंत्री से कहा गया कि अपनी उम्र साबित कीजिए? कभी किसी अधिकारी से कहा गया कि 80 साल पहले का जन्म प्रमाण पत्र लाइए? नहीं। लेकिन एक बूढ़े नागरिक से कहा जा रहा है कि पहले अपने जन्म का सबूत दो। यह सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। यह उस सोच का आईना है जिसमें नागरिक पर भरोसा कम और फाइल पर भरोसा ज्यादा है। विडंबना देखिए...जिस व्यक्ति की पूरी सेवा सरकार के रिकार्ड में दर्ज है, जिसकी पेंशन सरकारी खजाने से निकल रही है, उसी सरकार को अब उसके जन्म पर संदेह हो गया है। तो क्या इतने वर्षों तक सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को पेंशन देती रही जिसकी पहचान उसे पता ही नहीं थी? अगर पहचान थी, तो फिर नया प्रमाण क्यों? अगर पहचान नहीं थी, तो इतने वर्षों तक सरकारी रिकार्ड किस आधार पर चलता रहा? उत्तराखंड के गांवों में हजारों ऐसे बुजुर्ग हैं जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। उनके पास स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र हो सकता है। भूमि के रिकार्ड हो सकते हैं। मतदाता सूची में नाम हो सकता है। सेवा पुस्तिका हो सकती है। पेंशन का रिकार्ड हो सकता है। लेकिन क्या इन सबकी अब कोई कीमत नहीं बची? क्या हर नागरिक को फिर से शून्य से अपनी पहचान साबित करनी होगी? यह सवाल सिर्फ एक बुजुर्ग का नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था का है जो हर कुछ वर्षों में अपने ही नागरिक से पूछती हैकृबताओ, तुम कौन हो? लोकतंत्र में सरकार नागरिक के दरवाजे पर सम्मान लेकर जाती है, संदेह नहीं। अगर किसी 85 वर्षीय बुजुर्ग को सिर्फ इसलिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें कि उसके जन्म के समय सरकारी रजिस्टर ही नहीं बनते थे, तो यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह जाती, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता की परीक्षा बन जाती है। उत्तराखंड की सरकार से सवाल हैकृकि क्या एसआईआर का उद्देश्य रिकार्ड दुरुस्त करना है या बुजुर्गों को दफ्तरों की कतार में खड़ा करना? क्या ऐसे मामलों में घर-घर दस्तावेज सत्यापन की व्यवस्था नहीं हो सकती? क्या सेवा रिकार्ड, पेंशन रिकार्ड और दशकों पुराने सरकारी अभिलेखों को वैकल्पिक प्रमाण नहीं माना जा सकता? क्योंकि लोकतंत्र की ताकत फाइलों से नहीं, नागरिकों के विश्वास से चलती है और जब एक 85 साल का बुजुर्ग अपनी लाठी के सहारे यह साबित करने निकले कि मैं पैदा हुआ था, तब सवाल सरकार पर उठते हैं, उस बुजुर्ग पर नहीं। उत्तराखंड में चल रहे एसआईआर में ऐसी कई खामियां सामने आ रही हैं, जिससे लोग सकते हैं और यह सोच रहे है कि आगे वोट दें या नहीं। जब प्रदेश के एक आईएएस को नोटिश दिया जा सकता है तो आम आदमी तो नौकरशाहों के लिए चीटी के समान ही तो है। हालांकि कुछ दिन पूर्व प्रदेश के मुख्य चुनाव आयुक्त ने एसआईआर में बुजुर्गों के लिए घर पर ही व्यवस्था की प्रेस रिलीज जारी की थी, लेकिन शायद वह सिर्फ अखबारों में छापने के लिए थी। हकीकत में जमीन पर काम कैसे होता है यह तो बीएलओ ही जानता है।

कांग्रेस का नया सियासी ‘वार-रूम’

सिर्फ भाषणबाजी ही नहीं, अब बूथों पर सीधी होगी आमने-सामने की जंग बीजेपी के मजबूत सांगठनिक ढांचे को चुनौती देने उतरेगी कांग्रेस की फौज उत्तराखंड कांग्रेस का नया दांव दे पाएगा सत्ता की रणनीति को सीधे चुनौती देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव अभी कुछ दूरी पर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। भारतीय जनता पार्टी जहां बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और लगातार चुनावी अभियान की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस भी अब केवल बयानबाजी की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी ने चुनावी संघर्ष के लिए अपनी फौज तैयार करने का दावा किया है। यह फौज बंदूक लेकर मैदान में नहीं उतरेगी, बल्कि कानून, संगठन, बूथ प्रबंधन और चुनावी प्रक्रिया के मोर्चे पर सक्रिय दिखाई देगी। राजनीतिक गलियारों में इसे कांग्रेस की चुनावी तैयारी का दूसरा चरण माना जा रहा है। पहला चरण था कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना, दूसरा चरण है चुनावी प्रक्रिया पर निगरानी रखने के लिए प्रशिक्षित टीम तैयार करना। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि चुनाव केवल रैलियों और नारों से नहीं जीते जाते। मतदान केंद्रों से लेकर मतदाता सूची, नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया, शिकायतों, आचार संहिता और निर्वाचन संबंधी नियमों तक हर स्तर पर प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होती है। यही कारण है कि पार्टी अब अधिवक्ताओं, चुनावी जानकारों और संगठन के अनुभवी कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रही है। पार्टी का संदेश स्पष्ट हैकृयदि कहीं चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी की आशंका होगी, तो उसका जवाब केवल राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि कानूनी और संस्थागत तरीके से दिया जाएगा। दूसरी ओर भाजपा ने भी चुनावी तैयारी तेज कर दी है। बूथ सशक्तीकरण अभियान, विकास यात्रा, महिला समूहों के सम्मेलन और संगठनात्मक बैठकों के जरिए पार्टी अपने कैडर को सक्रिय कर रही है। सत्ता पक्ष का दावा है कि सरकार के विकास कार्य और संगठन की मजबूती उसे लगातार तीसरी बार जनादेश दिला सकती है। यानी मुकाबला केवल सरकार बनाम विपक्ष का नहीं, बल्कि दो अलग-अलग चुनावी रणनीतियों का भी होगा। कांग्रेस के लिए केवल फौज तैयार कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या पार्टी अपने भीतर की गुटबाजी को नियंत्रित कर पाएगी? क्या सभी वरिष्ठ नेता एक मंच पर दिखाई देंगे? क्या टिकट वितरण के समय असंतोष नहीं उभरेगा? उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि कांग्रेस कई बार संगठनात्मक मतभेदों का नुकसान उठा चुकी है। यदि चुनाव से पहले यही स्थिति दोहराई गई, तो मजबूत चुनावी ढांचा भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगा। आज का चुनाव डेटा, बूथ प्रबंधन, सोशल मीडिया, कानूनी तैयारी और जमीनी नेटवर्क का चुनाव है। जिस दल के पास मतदान केंद्र तक प्रशिक्षित कार्यकर्ता होंगे, वही मतदाताओं तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच पाएगा। कांग्रेस शायद इसी बदलते चुनावी गणित को समझ चुकी है। इसलिए वह अपने कार्यकर्ताओं को केवल राजनीतिक भाषण देने के लिए नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की तकनीकी समझ के साथ मैदान में उतारना चाहती है। हालांकि अंतिम फैसला किसी संगठन या कानूनी टीम से नहीं होगा। उत्तराखंड का मतदाता महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा प्रबंधन, भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर भी अपनी राय बनाएगा। यदि कांग्रेस इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाती है और भाजपा अपनी उपलब्धियों को विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत करती है, तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। उत्तराखंड में चुनावी रण अभी औपचारिक रूप से शुरू नहीं हुआ है, लेकिन दोनों प्रमुख दलों की तैयारियां बता रही हैं कि राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। भाजपा संगठन की मजबूती पर भरोसा कर रही है, जबकि कांग्रेस चुनावी प्रक्रिया की निगरानी और संगठनात्मक पुनर्सक्रियता के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस की यह नई फौज केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा बनकर रह जाती है या वास्तव में मैदान में उतरकर राजनीतिक समीकरण बदलने की क्षमता भी दिखाती है।

गांव की ‘धार’ पर ‘लास्ट पोस्ट’

चरवाहे गए, गीत थमे और पहाड़ के गांव का समाचार कक्ष भी वीरान मोबाइल की घंटी और पलायन के सन्नाटे के बीच एक संस्कृति खत्म बिना इंटरनेट के जो धार पूरे गाँव को जोड़ती थी आज वह हो गई वीरान जहाँ से सूरज सबसे पहले झाँकता था आज वहीं अब पसर गया है सन्नाटा पहाड़ों में धार में पीढ़ियों की स्मृतियों, संस्कृति और जीवन दर्शन भी ठप देहरादून। पहाड़ में अगर किसी से पूछा जाए कि गाँव कहाँ है, तो अक्सर जवाब मिलता हैकृउस धार के उस पार। यह जवाब केवल दिशा नहीं बताता, बल्कि पहाड़ की पूरी सभ्यता का परिचय देता है। धार... यानी पहाड़ की वह ऊँची रेखा, जहाँ खड़े होकर एक साथ कई गाँव दिखाई देते हैं। जहाँ से सूरज सबसे पहले झाँकता है और शाम की आखिरी किरण भी सबसे देर तक ठहरती है। जहाँ हवा सिर्फ चलती नहीं, बल्कि लोकगीत गाती है, जहाँ से बादल नीचे दिखाई देते हैं और इंसान को अपनी सीमाओं का एहसास होता है। पहाड़ के गाँवों में धार केवल भूगोल नहीं, जीवन का केंद्र रही है। कभी इसी धार पर चरवाहे अपने पशु लेकर निकलते थे। महिलाएँ घास के गट्ठर सिर पर रखकर लौटती थीं। बच्चे स्कूल जाते समय यहीं खेलते थे। बुजुर्ग पत्थरों पर बैठकर मौसम का अनुमान लगाते थे। दूर कहीं धुआँ उठता दिखता तो पता चल जाताकृकिसी घर में चूल्हा जल चुका है। धार, पहाड़ का सबसे बड़ा समाचार कक्ष भी थी। किस गाँव में शादी है, कहाँ देवता की डोली निकलेगी, किस खेत में पहली जुताई हुई, कहाँ बारिश हुई और कहाँ नहींकृइन सबकी खबरें मोबाइल नहीं, धार पर मिलती थीं। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। आज उसी धार पर घास पहले से अधिक उग आई है, क्योंकि वहाँ चलने वाले पैरों की संख्या कम हो गई है। जिन पगडंडियों पर कभी बच्चों की चहल-पहल होती थी, वहाँ अब झाड़ियाँ हैं। कई गाँवों में घर बंद हैं। ताले लगे हैं। लोग रोजगार की तलाश में मैदानों और महानगरों की ओर चले गए। धार अब भी वहीं है, लेकिन उसे देखने वाली आँखें कम हो गई हैं। पहाड़ का पलायन केवल आबादी का कम होना नहीं है। यह स्मृतियों का भी पलायन है। जब गाँव खाली होते हैं, तो केवल मकान नहीं सूने होते, बल्कि धार भी अनाथ हो जाती है। क्योंकि धार को जीवित रखने के लिए पत्थर नहीं, लोग चाहिए। फिर भी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आज कई युवा वापस गाँव लौट रहे हैं। कोई सेब और कीवी की खेती कर रहा है, कोई होमस्टे चला रहा है, कोई मंडुवा और झंगोरा को फिर से पहचान दिला रहा है। कुछ लोग लोकगीतों और लोकभाषा को डिजिटल दुनिया तक पहुँचा रहे हैं। यह वापसी छोटी है, लेकिन महत्वपूर्ण है। गाँव की धार आज भी उनका इंतजार कर रही है। पर्यटन बढ़ रहा है, लेकिन चुनौती यह है कि विकास ऐसा हो जो धार की आत्मा को न तोड़े। यदि हर धार पर कंक्रीट ही उग आया, यदि हर पगडंडी सड़क बन गई और हर जंगल केवल सेल्फ़ी का स्थान रह गया, तो पहाड़ अपनी पहचान खो देगा। धार हमें धैर्य भी सिखाती है। वहाँ खड़े होकर समझ आता है कि जीवन केवल भागने का नाम नहीं है। पहाड़ की हवा बताती है कि ऊँचाई का अर्थ अहंकार नहीं, दृष्टि होता है, जो जितना ऊपर होता है, उसे उतना ही दूर तक देखना पड़ता है। शायद यही कारण है कि पहाड़ के लोग कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराना जानते हैं। उनकी सबसे बड़ी पूँजी बैंक का खाता नहीं, बल्कि गाँव की धार से जुड़ी यादें हैं। आज जब पूरी दुनिया तेजी से बदल रही है, तब पहाड़ के गांव की धार हमें यह याद दिलाती है कि विकास का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। क्योंकि किसी भी समाज की असली पहचान उसकी सबसे ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उन सबसे ऊँची धारों से होती है, जहाँ खड़े होकर लोग अपने अतीत को याद करते हैं और भविष्य का रास्ता तलाशते हैं। जब अगली बार आप किसी पहाड़ी गाँव जाएँ, तो केवल मंदिर या पर्यटन स्थल ही न देखें। एक बार गाँव की धार पर भी जाकर खड़े होइए। हो सकता है, वहाँ आपको पहाड़ का सबसे सुंदर दृश्य नहीं, बल्कि उसकी सबसे गहरी आत्मा दिखाई दे जाए। शायद मेरी भी गांव की धार पर यह लास्ट पोस्ट होगी, गांव की तस्वीर भी लास्ट होगी, गांव की संस्कृति, सभ्यता और पुरखों की स्मृतियों के साथ जीवन दर्शन का नजरियां भी लास्ट ही होगा।

बीजेपी का ‘नो सिफारिश’ वाला दाव

भाजपा की निष्पक्षता का संदेश या अंदरूनी गुटबाजी की स्वीकारोक्ति चुनाव से पहले टिकट की होड़, सर्वे और संगठन की कसौटी का पैंतरा अपनों को साधने और सिफारिशी संस्कृति को छिपाने का है यह नाटक देहरादून। कोई सिफारिश नहीं चलेगी।राजनीति में कई बार सबसे छोटी लाइन सबसे लंबी कहानी लिख देती है। उत्तराखंड भाजपा से आगामी विधानसभा चुनाव के टिकट बंटवारे को लेकर ऐसा ही संदेश सामने आया है। कहा गया है कि टिकट के लिए सिफारिश नहीं चलेगी। संगठन और सर्वे की कसौटी पर ही दावेदारों का भविष्य तय होगा। सुनने में यह एक सामान्य संगठनात्मक निर्देश लगता है। लेकिन राजनीति में कोई भी संदेश सामान्य नहीं होता। हर संदेश किसी न किसी समस्या की स्वीकारोक्ति भी होता है। अगर यह कहना पड़ रहा है कि सिफारिश नहीं चलेगी, तो इसका मतलब यह भी है कि सिफारिश की संस्कृति मौजूद है। वरना ऐसी घोषणा की जरूरत ही क्यों पड़ती? उत्तराखंड में चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन टिकट की राजनीति शुरू हो चुकी है। पार्टी कार्यालयों में चहल-पहल बढ़ रही है। दिल्ली और देहरादून के बीच नेताओं की आवाजाही तेज है। कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्र में सक्रिय हैं। सोशल मीडिया पर उपलब्धियों की पोस्टें बढ़ गई हैं। हर संभावित उम्मीदवार जनता के बीच अपनी तस्वीर मजबूत करने में जुटा है। लेकिन जनता से पहले एक और परीक्षा होती हैकृपार्टी की और उसी परीक्षा का पहला प्रश्न हैकृटिकट किसे मिलेगा? भाजपा का कहना है कि टिकट का आधार प्रदर्शन, संगठन के प्रति समर्पण, जनस्वीकृति और जीतने की क्षमता होगी। यह सिद्धांत किसी भी लोकतांत्रिक दल के लिए आदर्श माना जा सकता है। लेकिन राजनीति केवल सिद्धांतों से नहीं चलती,वह स्थानीय समीकरणों, जातीय संतुलन, क्षेत्रीय प्रभाव, संगठनात्मक निष्ठा और चुनावी गणित से भी संचालित होती है। यही वजह है कि हर चुनाव से पहले टिकट सबसे बड़ा संघर्ष बन जाता है। उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि टिकट वितरण के बाद सबसे अधिक नाराजगी भी यहीं से शुरू होती है। कई नेता निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं, कई दल बदल लेते हैं और कई वर्षों की निष्ठा का हिसाब टिकट से जोड़कर देखने लगते हैं। ऐसे में नो सिफारिश का संदेश केवल अनुशासन का नहीं, बल्कि संभावित असंतोष को पहले से नियंत्रित करने की कोशिश भी माना जा सकता है। लेकिन एक और सवाल है। क्या केवल सिफारिश रोक देने से टिकट वितरण पूरी तरह निष्पक्ष हो जाएगा? राजनीति में सिफारिश हमेशा किसी चिट्ठी या फोन काल का नाम नहीं होती। कई बार प्रभाव, संगठन में पकड़, जनाधार, नेतृत्व का विश्वास और स्थानीय समीकरण भी निर्णय को प्रभावित करते हैं। इसलिए पारदर्शिता की असली कसौटी केवल घोषणा नहीं, बल्कि अंतिम सूची होती है। अगर वास्तव में सर्वे, संगठन की रिपोर्ट और जनता की राय को प्राथमिकता मिलेगी, तो यह उन कार्यकर्ताओं के लिए सकारात्मक संकेत होगा, जिन्होंने वर्षों तक बिना किसी पद के पार्टी के लिए काम किया है। लेकिन यदि अंतिम सूची में वही पुराने चेहरे, वही प्रभावशाली समूह और वही स्थापित समीकरण दिखाई दिए, तो नो सिफारिश का संदेश भी एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा। इस पूरी कहानी में विपक्ष भी चुप नहीं बैठेगा। कांग्रेस और अन्य दल टिकट वितरण में असंतोष को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश करेंगे। हर चुनाव में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो टिकट न मिलने के बाद नई राजनीतिक राह चुन लेते हैं। इसलिए भाजपा के लिए चुनौती केवल टिकट देना नहीं, बल्कि टिकट के बाद संगठन को एकजुट रखना भी होगी। उत्तराखंड का मतदाता भी पहले जैसा नहीं रहा। वह केवल पार्टी का चेहरा नहीं देखता, उम्मीदवार की साख भी देखता है। क्षेत्र में उसकी उपलब्धियाँ, जनता से संवाद और स्थानीय मुद्दों पर उसकी सक्रियता भी चुनावी परिणाम को प्रभावित करती है। इसलिए इस बार का संदेश केवल भाजपा के नेताओं के लिए नहीं है। यह उन हजारों कार्यकर्ताओं के लिए भी है, जो वर्षों से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन मेहनत का पुरस्कार मिलेगा। अब नजर उस दिन पर होगी, जब टिकटों की सूची जारी होगी। क्योंकि राजनीति में असली बयान प्रेस कान्फ्रेंस नहीं देती, उम्मीदवारों की सूची देती है और वहीं पता चलता है कि नो सिफारिश केवल एक संदेश था, या सचमुच उत्तराखंड की राजनीति में टिकट वितरण की नई संस्कृति की शुरुआत।

‘नई बोतल में पुरानी शराब वाला पैंतरा’

कांग्रेस की नई कार्यकारिणी बचा पाएगी उत्तराखंड में डूबती नैया सोशल मीडिया व बैठकों से निकलकर मैदानी परीक्षा में उतरे नेता संतुलन के नाम पर बनाई गई कांग्रेस की इस नई टीम का पूरा सच चुनावी रण से पहले संगठन में ऊर्जा या पुराने समीकरणों की वापसी देहरादून। विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही उत्तराखंड की राजनीति में संगठनात्मक गतिविधियां भी रफ्तार पकड़ चुकी हैं। इसी क्रम में उत्तराखंड कांग्रेस ने अपनी नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा कर दी है। नई टीम के गठन को पार्टी ने आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी का अहम कदम बताया है, लेकिन इसके साथ ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या यह कार्यकारिणी कांग्रेस में नई जान फूंकेगी या फिर केवल पुराने चेहरों और गुटीय संतुलन का दस्तावेज बनकर रह जाएगी। प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व का दावा है कि नई कार्यकारिणी में अनुभव और युवा ऊर्जा का संतुलन बनाया गया है। विभिन्न क्षेत्रों, जातीय और सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधित्व का भी ध्यान रखा गया है ताकि पार्टी बूथ स्तर तक मजबूत हो सके। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर है कि संगठन में जगह पाने वाले नेताओं की असली परीक्षा अब मैदान में होगी। उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से संगठनात्मक कमजोरी से जूझती रही है। कई जिलों में पार्टी के पदाधिकारी सक्रिय नहीं दिखे, जबकि बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल भी लगातार चर्चा का विषय रहा। भाजपा जहां लगातार बूथ सशक्तिकरण अभियान चला रही है, वहीं कांग्रेस अब नई कार्यकारिणी के सहारे संगठन को गति देने की कोशिश कर रही है। नई टीम के सामने सबसे पहला काम निष्क्रिय इकाइयों को सक्रिय करना और कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाना होगा। राजनीति में कार्यकारिणी की घोषणा जितनी आसान होती है, उसे जमीन पर उतारना उतना ही कठिन। कांग्रेस के सामने चुनौती केवल पद बांटने की नहीं बल्कि पदाधिकारियों से परिणाम लेने की है। प्रदेश के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अब हर पदाधिकारी के काम का मूल्यांकन होना चाहिए जो नेता अपने क्षेत्र में संगठन मजबूत नहीं कर पाए, उन्हें केवल राजनीतिक समीकरणों के आधार पर बचाने की बजाय जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। भाजपा की लगातार बैठकों, बूथ जीतो अभियान, विकास यात्रा की तैयारी और चुनावी रणनीति के बीच कांग्रेस की नई कार्यकारिणी को पार्टी का जवाब माना जा रहा है। भाजपा पहले ही चुनावी मोड में दिखाई दे रही है। ऐसे में कांग्रेस के लिए केवल नई सूची जारी कर देना पर्याप्त नहीं होगा। उसे गांव-गांव, वार्ड-वार्ड और बूथ-बूथ तक अपनी मौजूदगी दर्ज करानी होगी। यदि नई कार्यकारिणी में युवाओं और महिलाओं को पर्याप्त जिम्मेदारी मिली है, तो यह कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है। उत्तराखंड के मतदाताओं में बड़ी संख्या युवा वोटरों की है, जबकि महिला मतदाता भी चुनावी नतीजों में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि इन्हें केवल नाममात्र की जिम्मेदारी देकर छोड़ दिया गया, तो इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा। उत्तराखंड कांग्रेस में समय-समय पर गुटबाजी की चर्चा होती रही है। नई कार्यकारिणी के गठन के बाद सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या सभी नेता मिलकर चुनाव लड़ेंगे या फिर अंदरूनी खींचतान संगठन की गति को प्रभावित करेगी। यदि सभी वरिष्ठ नेता एक मंच पर दिखाई देते हैं और जिला स्तर तक समन्वय बना रहता है, तो कांग्रेस के लिए यह कार्यकारिणी चुनावी मजबूती का आधार बन सकती है। राजनीति में किसी भी संगठन की असली पहचान उसके पदाधिकारियों की सूची से नहीं, बल्कि जनता के बीच उसकी सक्रियता से होती है। नई कार्यकारिणी की घोषणा के बाद अब कांग्रेस के पास बहाने कम और जिम्मेदारियां ज्यादा हैं। प्रदेश के बेरोजगार युवाओं, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल और स्थानीय मुद्दों पर यदि संगठन लगातार जनता के बीच दिखाई देता है, तभी नई टीम का असर चुनाव में नजर आएगा। उत्तराखंड कांग्रेस की नई कार्यकारिणी पाटरग् के लिए एक नई शुरुआत का अवसर है। लेकिन चुनावी राजनीति में केवल नई टीम बना देने से जीत नहीं मिलती। जीत तब मिलती है जब संगठन बूथ तक सक्रिय हो, कार्यकर्ता उत्साहित हों और जनता को यह भरोसा हो कि विपक्ष केवल सवाल नहीं उठा रहा, बल्कि विकल्प भी प्रस्तुत कर रहा है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि नई कार्यकारिणी अगले कुछ महीनों में कागज से निकलकर मैदान में कितनी सक्रिय दिखाई देती है। विधानसभा चुनाव से पहले यही सक्रियता तय करेगी कि कांग्रेस संगठनात्मक मजबूती की ओर बढ़ रही है या फिर यह बदलाव केवल पदों के पुनर्वितरण तक सीमित रह जाएगा।

काकरोच पार्टी का नया ‘स्टंट’

अब क्या बोलती पब्लिक अब सीजीपी देश की जनता के कंधे पर बंदूक रखकर चलाएगी राजनीति काकरोच जनता पार्टी का नया दांव या नई राजनीतिक भाषा की तलाश जनता से सीधे संवाद का अभियान, सवाल पूछना व जवाब सुनना बराबर नई दिल्ली। राजनीति बदल रही है। पहले नेता मंच से बोलते थे और जनता सुनती थी। फिर सोशल मीडिया आया, जहाँ नेता भी बोले और जनता ने भी जवाब देना शुरू किया। अब कुछ राजनीतिक दल एक कदम और आगे बढ़ रहे हैं। वह कह रहे हैंकृअब क्या बोलती पब्लिक? काकरोच जनता पार्टी ने इसी नाम से अपना नया जनसंवाद अभियान शुरू किया है। नाम जितना अलग है, संदेश भी उतना ही अलग दिखाने की कोशिश की जा रही है। दावा है कि पार्टी जनता की राय सीधे सुनेगी, शिकायतें दर्ज करेगी और उन्हीं के आधार पर अपनी राजनीतिक रणनीति तय करेगी। सवाल यह नहीं है कि अभियान का नाम क्या है। सवाल यह है कि क्या राजनीति सचमुच जनता को सुनना चाहती है, या केवल जनता को यह एहसास दिलाना चाहती है कि उसे सुना जा रहा है? यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। देश में चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि भरोसे और उम्मीद के बीच भी लड़ा जाता है। अकेले उत्तराखंड में पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आपदा प्रबंधन और पहाड़-मैदान का संतुलनकृये ऐसे मुद्दे हैं जो हर चुनाव में लौट आते हैं। ऐसे में यदि कोई दल अब क्या बोलती पब्लिक? का अभियान चलाता है, तो जनता भी शायद यही पूछेगीकृकि क्या हमारी बात केवल रिकार्ड होगी या उस पर कार्रवाई भी होगी? राजनीतिक अभियानों का इतिहास बताता है कि हर चुनाव से पहले संवाद यात्रा, जन आशीर्वाद यात्रा, परिवर्तन यात्रा, विकास यात्रा और जन संपर्क अभियान निकलते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही संवाद की गति भी अक्सर धीमी पड़ जाती है। यही वजह है कि जनता अब केवल अभियान नहीं देखती, उसका परिणाम भी देखना चाहती है। काकरोच जनता पार्टी का यह अभियान यदि केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहता है, तो वह भीड़ तो जुटा सकता है, लेकिन विश्वास नहीं। यदि यह गाँव-गाँव, कस्बों और शहरों तक जाकर लोगों की वास्तविक समस्याएँ सुनता है, उन्हें दस्तावेज बनाता है और समाधान की दिशा में स्पष्ट रोडमैप देता है, तब यह अभियान राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकता है। लेकिन राजनीति में एक और सच है। जनता केवल बोलना नहीं चाहती, वह चाहती है कि उसकी बात सुनी भी जाए और उससे भी आगे, उस पर अमल भी हो। आज का मतदाता पहले से अधिक जागरूक है। वह किसी भी दल से एक ही सवाल पूछता हैकृआपकी प्राथमिकता क्या है? केवल सत्ता या समाज? यदि अब क्या बोलती पब्लिक? अभियान जनता की आवाज को चुनावी नारे से आगे ले जाकर नीति निर्माण तक पहुँचाने का प्रयास करता है, तो यह एक सार्थक पहल साबित हो सकती है। लेकिन यदि यह केवल प्रचार का नया पैकेज बनकर रह गया, तो चुनाव बीतने के साथ इसका असर भी फीका पड़ जाएगा। राजनीति में सबसे कठिन काम बोलना नहीं, सुनना होता है और उससे भी कठिन काम है सुनी हुई बात को स्वीकार करना। इसलिए इस अभियान की असली परीक्षा पोस्टर, नारे और सोशल मीडिया की पहुँच से नहीं होगी। उसकी परीक्षा तब होगी, जब जनता अपने सवाल रखेगी और पार्टी उनके जवाब देने के साथ-साथ समाधान की दिशा भी दिखाएगी। आखिरकार लोकतंत्र में सबसे बड़ी आवाज किसी नेता की नहीं होतीकृसबसे बड़ी आवाज जनता की होती है और हर चुनाव में आखिरी शब्द भी वही बोलती है मतपेटी के भीतर।

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

udaydinmaan: पहाड़ की ‘घी की कमोली’ नए दौर में गुम

udaydinmaan: पहाड़ की ‘घी की कमोली’ नए दौर में गुम: पहाड़ में यह सिर्फ बर्तन नहीं, घर की शान और समृद्धि की थी कभी पहचान मिट्टी, लकड़ी व धातु के पात्र में पकता शुद्ध घी और महकती पहाड़ी विरासत आधुन...

लोकतंत्र में ‘मालिक’ लाचार

चुनाव से पहले उत्तराखंड में सरकारी चूक का हर्जाना भर रहा है आम मतदाता एआई ने पकड़ी गड़बड़ी, पर सवाल यह कि कंप्यूटर के कीबोर्ड पर उंगलियां किसकी थीं मालिक को किराएदार बना दिया, अब हर मोड़ पर साबित करना पड़ रहा है अपना वजूद सरकारी बाबुओं ने बनाया, फोटो गलत उन्होंने लगाई, फिर चक्कर दफ्तरों के वोटर काट रहे देहरादून। मतदाता... लोकतंत्र का सबसे बड़ा मालिक कहा जाता है। लेकिन हमारे यहां मालिक की हालत अक्सर उस किराएदार जैसी हो जाती है, जिसे हर महीने यह साबित करना पड़ता है कि वह इसी घर में रहता है। उत्तराखंड में इन दिनों यही हो रहा है। हजारों लोगों के घर चुनाव आयोग के नोटिस पहुंच रहे हैं। नाम में गलती, पिता के नाम में गलती, स्पेलिंग में गलती, फोटो किसी और की, पता अधूरा और अब एआई कह रहा हैकृआपत्ति है। लेकिन सवाल यह है कि एआई को यह गलती किसने सिखाई? सोशल मीडिया पर सलीम सैफी ने एक लंबी पोस्ट लिखी है। पोस्ट किसी राजनीतिक दल की प्रेस विज्ञप्ति नहीं है। वह एक सवाल है। सवाल यह कि अगर मतदाता सूची में गलती सरकारी कर्मचारियों ने की थी, तो उसकी सजा मतदाता क्यों भुगत रहा है? सोचिए...जब वोटर कार्ड बन रहा था, तब क्या मतदाता खुद कंप्यूटर के सामने बैठकर अपना नाम टाइप कर रहा था? क्या उसने खुद अपनी फोटो अपलोड की थी? क्या उसने खुद अपने पिता का नाम बदल दिया था? नहीं। यह काम सरकारी मशीनरी ने किया। डेटा एंट्री आपरेटर ने किया। चुनाव विभाग ने किया। लेकिन आज वही विभाग कह रहा है कि आप साबित कीजिए कि आप वही हैं, जो पिछले बीस साल से वोट डालते आ रहे हैं। यह कहानी सिर्फ एक नोटिस की नहीं है। यह उस व्यवस्था की कहानी है, जिसमें गलती ऊपर होती है और जवाब नीचे मांगा जाता है। आज एआई बड़ी चर्चा में है। कहा जा रहा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता लोकतंत्र को और मजबूत करेगी। लेकिन अगर मशीन के सामने गलत डेटा रख दिया जाए, तो मशीन सच नहीं निकालेगी, वह सिर्फ गलती को और तेजी से पहचानकर नोटिस भेज देगी। एआई को फर्क नहीं पड़ता कि मोहन और मोहन सिंह के बीच एक बिंदु किसने छोड़ा। एआई यह नहीं जानता कि किसी बुजुर्ग महिला की फोटो गलती से पड़ोसी के नाम पर कैसे चढ़ गई। एआई यह भी नहीं समझता कि पहाड़ के दूर-दराज गांव में रहने वाला आदमी एक नोटिस मिलने पर तहसील तक आने के लिए पूरा दिन और मजदूरी गंवा देता है। मशीन सिर्फ कहती हैकृमिसमेच, लेकिन लोकतंत्र सिर्फ मशीन से नहीं चलता। लोकतंत्र इंसानों से चलता है और इंसानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती हैकृअपनी गलती स्वीकार करना। उत्तराखंड में सवाल यह नहीं है कि मतदाता सूची शुद्ध होनी चाहिए या नहीं। बिल्कुल होनी चाहिए। सवाल यह है कि शुद्धिकरण का बोझ किसके कंधों पर डाला जा रहा है? अगर विभाग की लापरवाही से किसी का नाम गलत दर्ज हुआ, तो सुधार विभाग के स्तर पर क्यों नहीं हो सकता? अगर लाखों रिकार्ड में गलती है, तो क्या यह सिर्फ मतदाताओं की गलती है? या फिर यह वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही का आईना है? चुनाव आयोग की जिम्मेदारी सिर्फ चुनाव कराना नहीं है। मतदाता का विश्वास बनाए रखना भी है। क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ वोटिंग मशीन से नहीं चलता। लोकतंत्र विश्वास से चलता है और विश्वास तब कमजोर पड़ता है, जब एक आम नागरिक को अपनी पहचान बार-बार साबित करनी पड़े। उत्तराखंड के गांवों में आज भी लोग कहते हैंकृसरकारी दफ्तर जाने का मतलब है पूरा दिन खत्म। अब वही लोग एसआईआर नोटिस लेकर लाइन में खड़े हैं। कोई अपनी रोजी छोड़कर आया है। कोई मजदूरी छोड़कर। कोई बुजुर्ग अपने बेटे के सहारे दफ्तर पहुंचा है। किसलिए? सिर्फ इसलिए कि सरकारी रिकार्ड में कभी किसी ने एक अक्षर गलत लिख दिया था। अगर यह सच है, तो यह सिर्फ तकनीकी गलती नहीं है। यह प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल है और चुनाव से पहले यह सवाल और बड़ा हो जाता है। क्योंकि मतदाता सूची लोकतंत्र की नींव है। नींव कमजोर होगी, तो बहस भी होगी और अविश्वास भी बढ़ेगा। इसलिए जरूरत एआई की तारीफ करने से पहले डेटा की गुणवत्ता सुधारने की है। जरूरत नोटिस भेजने से पहले अपनी फाइलें देखने की है और जरूरत यह स्वीकार करने की है कि हर गलती मतदाता की नहीं होती। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत मतदाता है। अगर वही अपनी पहचान साबित करने में लगा रहेगा, तो फिर लोकतंत्र अपनी पहचान कैसे बचाएगा? यही सवाल है।

पहाड़ की ‘घी की कमोली’ नए दौर में गुम

पहाड़ में यह सिर्फ बर्तन नहीं, घर की शान और समृद्धि की थी कभी पहचान मिट्टी, लकड़ी व धातु के पात्र में पकता शुद्ध घी और महकती पहाड़ी विरासत आधुनिकता की दौड़ में ओझल हुआ पहाड़ के सम्मान व स्वाभिमान का प्रतीक पहाड़ के गांवों में कभी कमोली में रखा घी बनता था रिश्तों व समृद्धि का प्रतीक देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, मेलों और लोकगीतों तक सीमित नहीं है। यहां रसोई में बनने वाली हर चीज अपने भीतर एक इतिहास, एक परंपरा और जीवन-दर्शन समेटे हुए है। इन्हीं परंपराओं में एक नाम है घी की कमोली। आज की नई पीढ़ी के लिए यह शायद एक अपरिचित शब्द हो, लेकिन कभी पहाड़ के गांवों में कमोली केवल घी रखने का बर्तन नहीं, बल्कि समृद्धि, आत्मनिर्भरता और पारिवारिक सम्मान का प्रतीक मानी जाती थी। पहाड़ के पुराने घरों में जब गाय या भैंस का दूध मथा जाता था, तो उससे निकले मक्खन को धीमी आंच पर पकाकर शुद्ध घी बनाया जाता था। यह घी किसी प्लास्टिक के डिब्बे या स्टील के कंटेनर में नहीं, बल्कि विशेष प्रकार के पारंपरिक पात्रकृकमोलीकृमें सुरक्षित रखा जाता था। मिट्टी, लकड़ी या धातु से बनी यह कमोली लंबे समय तक घी को सुरक्षित रखने में सहायक होती थी और घर की रसोई की शान मानी जाती थी। कहावत थीकृजिस घर की कमोली भरी, उस घर की रसोई कभी खाली नहीं। यह केवल कहावत नहीं थी, बल्कि पहाड़ की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का प्रतिबिंब थी। उस समय नकदी कम होती थी, लेकिन घर में अनाज, दाल, घी और मंडुवे का आटा ही असली संपत्ति माने जाते थे। पहाड़ के हरेला, घी संक्रांति, इगास, भिटौली और विवाह जैसे शुभ अवसरों पर कमोली का घी विशेष रूप से निकाला जाता था। इसी घी से पूरी, अरसा, रोट, सिंगल, झंगोरे की खीर और कई पारंपरिक व्यंजन बनते थे। मेहमानों का स्वागत भी इसी घी से बने भोजन से किया जाता था। यह केवल स्वाद नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक था। पहाड़ की एक खूबसूरत परंपरा यह भी रही कि विवाह के समय बेटी को दहेज के दिखावे की बजाय घर का बना शुद्ध घी दिया जाता था। कई परिवार कमोली भरकर घी अपनी बेटी को विदा करते थे। यह संदेश होता था कि बेटी अपने नए घर में भी मायके के स्नेह और संस्कारों की मिठास साथ लेकर जाए। समय बदला, संयुक्त परिवार टूटे, पशुपालन कम हुआ और बाजार का पैकेटबंद घी घरों तक पहुंच गया। इसके साथ ही कमोली भी धीरे-धीरे रसोई से गायब होने लगी। अब अधिकांश परिवार दूध और घी बाजार से खरीदते हैं। नई पीढ़ी के बहुत से बच्चों ने कमोली का नाम तक नहीं सुना। यह बदलाव केवल एक बर्तन का गायब होना नहीं है। यह उस आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कमजोर होने का संकेत भी है, जहां हर घर अपनी जरूरत का दूध, दही, मक्खन और घी स्वयं तैयार करता था। कमोली हमें सिखाती है कि समृद्धि केवल बैंक बैलेंस से नहीं मापी जाती। आत्मनिर्भरता, श्रम, प्रकृति से जुड़ाव और संसाधनों का सम्मान भी किसी समाज की असली पूंजी होते हैं। आज जब आर्गेनिक उत्पादों और पारंपरिक खान-पान की मांग बढ़ रही है, तब पहाड़ की यह विरासत फिर से प्रासंगिक हो गई है। यदि गांवों में पशुपालन को बढ़ावा मिले, स्थानीय दुग्ध उत्पादों को बाजार मिले और पारंपरिक बर्तनों व हस्तशिल्प को संरक्षण दिया जाए, तो कमोली केवल संग्रहालय की वस्तु नहीं रहेगी, बल्कि फिर से पहाड़ की रसोई में अपनी जगह बना सकती है। घी की कमोली केवल एक पात्र नहीं थी, बल्कि पहाड़ के जीवन की खुशबू थी। उसमें रखा घी मेहनत का स्वाद, मां के हाथों का स्नेह और गांव की आत्मनिर्भरता की कहानी सुनाता था। आधुनिकता की दौड़ में यदि हम ऐसी परंपराओं को भूल गए, तो हम केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी खो देंगे। शायद अब समय आ गया है कि पहाड़ अपनी कमोली को फिर से याद करेकृक्योंकि विरासत वही नहीं होती जो किताबों में लिखी हो, विरासत वह भी होती है जो कभी हमारी रसोई में महकती थी।

उत्तराखंड में होगी आर-पार की ‘जंग’

भाजपा को हैट्रिक की अकड़ व कांग्रेस को वजूद की फिक्र सूबे में रणनीति की चौपड़ पर आमने-सामने दो दिग्गज दल टूटेगा इतिहास का तिलस्म या सत्ता की हैट्रिक से गूंजेगा पहाड़ भाजपा की मिशन रिपीट तो कांग्रेस की वापसी की है तैयारी देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी कुछ महीने का समय भले ही शेष हो, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी तापमान तेजी से बढ़ने लगा है। सत्ता पर लगातार तीसरी बार कब्जा जमाने का लक्ष्य लेकर भाजपा मैदान में उतर चुकी है, जबकि पिछले दो विधानसभा चुनावों में हार का सामना करने वाली कांग्रेस इस बार सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। दोनों दलों ने संगठन, रणनीति और जनसंपर्क के स्तर पर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इस बार मुकाबला केवल चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे की परीक्षा का भी होगा। बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई, चारधाम यात्रा, भू-कानून और मूल निवास जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रहने की संभावना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा मिशन रिपीट की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने, लाभार्थी वर्ग से सीधा संवाद बढ़ाने और केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने पर विशेष जोर दे रही है। हाल के महीनों में पार्टी ने संगठनात्मक बैठकों और चुनावी रणनीति को समय से पहले गति दी है। भाजपा की रणनीति का दूसरा बड़ा आधार हिंदुत्व, विकास और मजबूत नेतृत्व की छवि है। पार्टी चारधाम आल वेदर रोड, रेलवे परियोजनाओं, निवेश, पर्यटन और बुनियादी ढांचे को अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के सामने रख रही है। हालांकि पार्टी के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय असंतोष, टिकट की संभावित दावेदारी, महंगाई और रोजगार जैसे मुद्दे विपक्ष को हमला करने का अवसर दे सकते हैं। कांग्रेस ने भी चुनावी मोर्चा संभाल लिया है। पार्टी ने चुनाव अभियान कार्यालय शुरू कर संगठन को सक्रिय करने, कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारने और जनता के बीच लगातार पहुंच बनाने की रणनीति बनाई है। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व की सक्रियता और चुनावी अभियान को तेज करने के संकेत मिले हैं। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश कर रही है। पार्टी बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महंगाई, पलायन, किसानों की समस्याओं और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है। कांग्रेस का मानना है कि यदि संगठन बूथ स्तर तक मजबूत हुआ और गुटबाजी नियंत्रित रही, तो मुकाबला पहले की तुलना में अधिक कड़ा हो सकता है। उत्तराखंड की राजनीति में उत्तराखंड क्रांति दल, निर्दलीय उम्मीदवार और कुछ क्षेत्रीय संगठन भी कई सीटों पर प्रभाव डाल सकते हैं। भले ही मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच माना जा रहा हो, लेकिन कुछ विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय चेहरे चुनावी गणित बदलने की क्षमता रखते हैं। इस चुनाव में मतदाता केवल नारों से प्रभावित होंगे, इसकी संभावना कम दिखाई देती है। प्रदेश के युवाओं की निगाह रोजगार पर है। पहाड़ के गांव आज भी पलायन से जूझ रहे हैं। महिलाएं स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी और महंगाई जैसे मुद्दों पर जवाब चाहती हैं। सीमांत क्षेत्रों में सड़क, संचार और मूलभूत सुविधाएं अब भी बड़ी चुनौती हैं। राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि वे इन मुद्दों पर केवल घोषणाएं करते हैं या ठोस समाधान का भरोसा भी दिला पाते हैं। फिलहाल उम्मीदवारों की सूची सामने नहीं आई है और कई सीटों पर राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। टिकट वितरण, दल-बदल, स्थानीय असंतोष और चुनावी गठबंधन जैसे कारक अंतिम परिणाम को प्रभावित करेंगे। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अब केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बन चुका है। एक ओर भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का सपना देख रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी का अवसर तलाश रही है। आने वाले महीनों में रैलियां, घोषणाएं, आरोप-प्रत्यारोप और जनसंपर्क अभियान तेज होंगे, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा की तरह उत्तराखंड की जनता के हाथ में होगा। चुनावी शोर के बीच मतदाता यह देखेगा कि कौन उसके मुद्दों को समझता है और कौन केवल चुनावी वादों तक सीमित रहता है।

अलर्ट की ‘भाषा’ से परे पहाड़ का ‘खौफ’

मानसून में सिर्फ बारिश नहीं, चट्टानों से मौत भी लुढ़क कर नीचे आती है पहाड़ी क्षेत्रों में रेड-आरेंज अलर्ट नहीं समझता पहाड़ी मन, बादल घिरते ही सहम जाती हैं छतें और ढलानें स्कूल गए बच्चे, सड़क पर दौड़ती टैक्सी, रात को बेघर होने की आशंका में बिसूरते बुजुर्ग पहाड़ में आफत बनकर बरसती है बारिश, विकास के दावों के बीच मौत का अनवरत पहरा देहरादून। उत्तराखंड में बारिश का मौसम शुरू होते ही मौसम विभाग का एक नया शब्द हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता हैकृआरेंज अलर्ट, रेड अलर्ट, भारी से बहुत भारी बारिश। लेकिन पहाड़ का आदमी मौसम विभाग की भाषा नहीं समझता। वह सिर्फ इतना जानता है कि जब बादल घिरते हैं तो उसके घर की छत, खेत की मेड़, सड़क का किनारा और पहाड़ की ढलानकृसब एक साथ डराने लगते हैं। यह डर काल्पनिक नहीं है। यह डर उस बच्चे का है जो स्कूल गया है और शाम तक घर नहीं लौटा। यह डर उस मां का है, जिसका बेटा टैक्सी चलाकर परिवार पालता है और हर बारिश में भूस्खलन वाले रास्तों से गुजरता है। यह डर उस बुजुर्ग का है, जिसे रात में यह नहीं पता कि सुबह तक उसका घर उसी जगह रहेगा या मलबे में दब जाएगा। पहाड़ में बारिश सिर्फ आसमान से नहीं गिरती। मौत भी पहाड़ की चट्टानों से लुढ़कती हुई नीचे आती है। बरसात शुरू होते ही सड़कें बंद होने लगती हैं। कहीं पहाड़ दरक जाता है, कहीं पुल बह जाता है, कहीं नदी अपना रास्ता बदल देती है। प्रशासन हर साल कहता है कि तैयारी पूरी है। मशीनें तैनात हैं। आपदा प्रबंधन अलर्ट पर है। लेकिन सवाल यह है कि अगर तैयारी पूरी है, तो हर साल वही तस्वीरें क्यों दोहराई जाती हैं? क्यों हर मानसून में सैकड़ों गांव दुनिया से कट जाते हैं? क्यों मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते? क्यों गर्भवती महिलाओं को डोली में उठाकर कई किलोमीटर चलना पड़ता है? क्यों बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है? पहाड़ का आदमी बारिश से नहीं हारता। वह व्यवस्था की लापरवाही से हारता है। उत्तराखंड की त्रासदी यह है कि यहां सड़क बनती भी है तो अगली बरसात में बह जाती है। पुल बनता है तो पहली बाढ़ में कमजोर पड़ जाता है। पहाड़ काटे जाते हैं, लेकिन यह सोचने की फुर्सत कम दिखाई देती है कि प्रकृति का भी अपना संतुलन होता है। विकास जरूरी है, लेकिन विकास का मतलब यह नहीं कि पहाड़ की छाती को बिना समझे काट दिया जाए। आज पहाड़ का नागरिक एक अजीब मनःस्थिति में जी रहा है। वह घर से निकलते समय यह नहीं सोचता कि कितनी देर में पहुंचेगा। वह यह सोचता है कि पहुंच भी पाएगा या नहीं। आप जरा कल्पना कीजिए। एक बस में बैठे यात्री को यह पता नहीं कि अगले मोड़ पर सड़क होगी या नहीं। एक टैक्सी चालक को नहीं पता कि जिस पहाड़ के नीचे से वह गुजर रहा है, वह अगले पांच मिनट में वहीं रहेगा या टूटकर उसके ऊपर आ जाएगा। यह सिर्फ यात्रा नहीं है, यह हर दिन मौत के साथ समझौता है। और सबसे दुखद बात यह है कि कुछ दिन बाद सब सामान्य हो जाता है। टीवी चैनलों पर दूसरी खबरें आ जाती हैं। सोशल मीडिया पर नई बहस शुरू हो जाती है। पहाड़ में मारे गए लोगों के नाम धीरे-धीरे सरकारी फाइलों में बदल जाते हैं। क्या पहाड़ की जिंदगी इतनी सस्ती है?क्या हर मानसून में कुछ लोगों की मौत को हमने नियति मान लिया है?क्या आपदा केवल राहत राशि बांटने का अवसर है? सवाल केवल प्राकृतिक आपदा का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या हमने पहाड़ के लिए ऐसी विकास नीति बनाई है जो उसकी भौगोलिक संवेदनशीलता को समझती हो? क्या सड़क निर्माण, भवन निर्माण और पर्यटन परियोजनाओं में वैज्ञानिक सलाह को पर्याप्त महत्व दिया जाता है? क्या जोखिम वाले क्षेत्रों में समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की गंभीर योजना है? पहाड़ केवल पर्यटन स्थल नहीं है। वहां लाखों लोग रहते हैं। उनके सपने हैं, उनका संघर्ष है, उनका जीवन है। हर बरसात में उन्हें यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उनका सबसे बड़ा दुश्मन बादल नहीं, बल्कि व्यवस्था की तैयारी की कमी है। बारिश पर किसी का बस नहीं चलता। लेकिन बारिश को आपदा बनने से रोकने की तैयारी इंसान के हाथ में है। जब तक सड़कें मौसम के हिसाब से नहीं बनेंगी, जब तक पहाड़ की प्रकृति को समझकर विकास नहीं होगा, जब तक चेतावनी के साथ सुरक्षित विकल्प भी नहीं होंगे, तब तक उत्तराखंड में मानसून का मतलब रहेगाकृसिर पर मंडराती मौत। और शायद पहाड़ का सबसे बड़ा दर्द यही है कि यहां लोग बारिश की बूंदें नहीं गिनते, बल्कि हर बरसात में यह गिनते हैं कि इस बार मौत किस गांव का पता पूछते हुए आई।

मानसून के साथ ‘डेंगू’

बारिश के बीच डेंगू का बढ़ता खतरा,हाई अलर्ट पर प्रशासन बारिश बनी राहत भी, आफत भी,अस्पतालों में बढ़ी निगरानी उत्तराखंड के नगर निकायों को युद्धस्तर पर अभियान के निर्देश देहरादून। उत्तराखंड में लगातार हो रही मानसूनी बारिश जहां गर्मी से राहत लेकर आई है, वहीं इसके साथ एक नया खतरा भी तेजी से सिर उठाने लगा हैकृडेंगू। बारिश के कारण जगह-जगह जलभराव, नालियों में ठहरा पानी, निर्माण स्थलों पर जमा वर्षा जल और घरों के आसपास रखे खुले बर्तनों में पानी भरने से एडीज मच्छरों के पनपने की आशंका बढ़ गई है। इसी खतरे को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन हाई अलर्ट पर हैं। अस्पतालों में विशेष निगरानी बढ़ा दी गई हैए जबकि नगर निकायों और स्वास्थ्य टीमों को रोकथाम के लिए व्यापक अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। प्रदेश के कई जिलों में स्वास्थ्य विभाग ने डेंगू की रोकथाम को लेकर सर्विलांस तेज कर दिया है। सरकारी अस्पतालों में बुखार से पीड़ित मरीजों की जांच बढ़ाई जा रही है, जबकि निजी अस्पतालों से भी संदिग्ध मामलों की नियमित जानकारी मांगी जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान थोड़ी सी लापरवाही भी संक्रमण को तेजी से फैलने का मौका दे सकती है। डेंगू से लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं जीती जा सकती। इसकी असली लड़ाई घरों, गलियों और मोहल्लों में लड़ी जाती है। प्रशासन ने नगर निगमए नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों को जलभराव वाले स्थानों की पहचान कर तत्काल सफाई, फागिंग और एंटी लार्वा दवा के छिड़काव के निर्देश दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीमें घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करने में जुटी हैं। एडीज मच्छर साफ और ठहरे हुए पानी में पनपता है। इसलिए घरों की छतों, कूलर, गमलों, टायरों, पानी की टंकियों और अन्य पात्रों में जमा पानी नियमित रूप से खाली करना सबसे प्रभावी उपाय है। सरकारी अस्पतालों में डेंगू जांच की व्यवस्था मजबूत की जा रही है। चिकित्सकों को निर्देश दिए गए हैं कि तेज बुखार, शरीर में दर्द, सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द या प्लेटलेट्स कम होने जैसे लक्षणों वाले मरीजों की समय पर जांच सुनिश्चित की जाए। स्वास्थ्य विभाग का जोर इस बात पर है कि संदिग्ध मरीजों की पहचान शुरुआती चरण में हो, ताकि गंभीर स्थिति बनने से पहले इलाज शुरू किया जा सके। उत्तराखंड में मानसून के दौरान अक्सर लोग भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं पर अधिक ध्यान देते हैंए लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि डेंगू जैसी बीमारियां भी उतनी ही गंभीर चुनौती बन सकती हैं। यदि समय रहते रोकथाम नहीं की गई, तो मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि डेंगू की रोकथाम केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है। यदि लोग सप्ताह में एक दिन अपने घर और आसपास जमा पानी की जांच करें, पानी की टंकियों को ढककर रखें, पूरी बाजू के कपड़े पहनें और मच्छररोधी उपाय अपनाएंए तो संक्रमण का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है। हर वर्ष मानसून के साथ डेंगू का खतरा सामने आता है। सवाल यह है कि क्या हमारी तैयारी भी हर साल उतनी ही मजबूत होती है क्या नालों की सफाई समय पर होती है क्या जलभराव वाले स्थानों की स्थायी पहचान कर समाधान निकाला जाता है क्या शहरी विकास योजनाओं में जल निकासी को पर्याप्त महत्व दिया जाता है। यदि इन सवालों के जवाब संतोषजनक नहीं हैं, तो केवल फागिंग और जागरूकता अभियान से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। मानसून प्रकृति का उत्सव है, लेकिन लापरवाही इसे बीमारी का मौसम भी बना सकती है। डेंगू के खिलाफ प्रशासन की सक्रियता जरूरी है पर उससे भी अधिक जरूरी है नागरिकों की भागीदारी। यदि सरकार की तैयारी और जनता की जागरूकता साथ चले तभी इस मानसून में डेंगू के खतरे को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। वरना बारिश की बूंदों के साथ मच्छरों का खतरा भी हर घर की दस्तक बन सकता है।

उत्तराखंड बीजेपी का ‘आपरेशन आल ओके’

आल इज वैल के दावों के बीच विधायकों की नाराजगी दूर करने का बना मास्टर प्लान बैठक में विकास यात्रा के साथ-साथ विधायकों के खिलाफ स्थानीय गुस्से पर मंथन चुनाव अभी दूर है, लेकिन भाजपा को जनता की नाराजगी की आहट सुनाई देने लगी उत्तराखंड में बूथ जीतो अभियान के बहाने सत्ता बचाने की सबसे बड़ी कवायद शुरू देहरादून। चुनाव की तारीख अभी घोषित नहीं हुई है। चुनाव आयोग ने अभी बिगुल नहीं बजाया है। लेकिन भाजपा ने उत्तराखंड में चुनावी रणभेरी बजा दी है। दिल्ली में संगठन की उत्तराखंड कोर ग्रुप की बैठक केवल एक संगठनात्मक बैठक नहीं थी, बल्कि यह उस चिंता का संकेत भी थी जिसे सत्ता पक्ष सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार नहीं करता। तीन घंटे चली बैठक में कई बातें हुई बूथ जीतो अभियान, विकास यात्रा, लखपति दीदी सम्मेलन, सांसदों और विधायकों का क्षेत्रवार प्रवास और सबसे अहम... विधायकों के खिलाफ स्थानीय नाराजगी को कैसे कम किया जाए? यहीं से असली कहानी शुरू होती है। अगर सब कुछ ठीक चल रहा है, अगर सरकार के काम से जनता पूरी तरह संतुष्ट है, अगर विकास हर गांव तक पहुंच चुका है, तो फिर स्थानीय नाराजगी दूर करने के लिए अलग रणनीति बनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? राजनीति में बैठकों की भाषा और जनता की भाषा अलग होती है। प्रेस विज्ञप्ति कहती हैकृ संगठन मजबूत होगा। लेकिन बंद कमरे की चर्चा अक्सर यह होती है कि कौन-सा विधायक जनता के बीच कमजोर पड़ रहा है, किस सीट पर खतरा बढ़ रहा है और किस इलाके में नाराजगी चुनावी नुकसान में बदल सकती है। यही वजह है कि भाजपा ने चुनाव से काफी पहले बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ाने का फैसला किया है। उत्तराखंड में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि सत्ता विरोधी माहौल है। लगातार सरकार में रहने के कारण जनता अब घोषणाओं से आगे बढ़कर जवाब मांग रही है। युवाओं के सवाल हैंकृरोजगार कहां है? पहाड़ पूछ रहा हैकृपलायन कब रुकेगा? किसान पूछ रहा हैकृआय कैसे बढ़ेगी? महिलाएं पूछ रही हैंकृमहंगाई से राहत कब मिलेगी? और कई क्षेत्रों में लोग अपने विधायक से पूछ रहे हैंकृपांच साल में आप हमारे गांव कितनी बार आए? शायद यही कारण है कि बैठक में विधायकों के क्षेत्रीय प्रवास पर विशेष जोर दिया गया। चुनाव से पहले जनता तक पहुंचने की कवायद तेज होगी। गांवों में बैठकें होंगी, चौपाल लगेंगी, विकास यात्रा निकलेगी और लाभार्थियों से संवाद बढ़ाया जाएगा। भारतीय जनता पार्टी अच्छी तरह जानती है कि चुनाव टीवी स्टूडियो में नहीं, बूथ पर जीते जाते हैं। एक-एक बूथ, एक-एक मतदाता और एक-एक कार्यकर्ता... यही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत रही है। इसलिए संगठन पहले बूथ को मजबूत करेगा और फिर चुनावी मैदान में उतरेगा। भाजपा की चुनावी मशीनरी उम्मीदवार घोषित होने का इंतजार नहीं करती। वह उससे बहुत पहले बूथ स्तर पर गणित बैठाना शुरू कर देती है। बैठक में लखपति दीदी सम्मेलन आयोजित करने की योजना भी बनी। सरकार इसे महिला सशक्तिकरण का अभियान बताएगी और इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन राजनीति में समय बहुत कुछ कह देता है। जब चुनाव नजदीक आते हैं तो हर सामाजिक कार्यक्रम का राजनीतिक अर्थ भी निकलने लगता है। महिलाओं का वोट बैंक उत्तराखंड की राजनीति में निर्णायक माना जाता है और भाजपा इस वर्ग के साथ अपने संपर्क को और मजबूत करना चाहती है। भाजपा की यह सक्रियता कांग्रेस के लिए भी एक संदेश है। यदि विपक्ष अभी भी केवल सरकार की आलोचना तक सीमित रहा और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत नहीं कर पाया, तो सत्ता विरोधी माहौल होने के बावजूद चुनावी लाभ उठाना आसान नहीं होगा। चुनाव केवल नाराजगी से नहीं जीते जाते, संगठन और रणनीति से भी जीते जाते हैं। इन बैठकों में विकास यात्रा की बात होती है। लेकिन क्या विकास की यात्रा गांव तक पहुंची? इन बैठकों में नाराजगी दूर करने की बात होती है। लेकिन क्या नाराज़गी का कारण समझने की कोशिश भी होगी? क्या जनता को सिर्फ चुनाव से पहले याद किया जाएगा? या फिर चुनाव के बाद भी गांवों की वही सड़कें, वही अस्पताल, वही स्कूल और वही पलायन चर्चा का विषय बने रहेंगे? उत्तराखंड की राजनीति अब चुनावी मोड़ पर पहुंच चुकी है। भाजपा जीत की हैट्रिक लगाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। संगठन सक्रिय है, रणनीति तैयार है और बूथ स्तर तक पहुंचने की योजना बन चुकी है। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम रणनीति किसी पार्टी के दफ्तर में नहीं बनती। वह बनती है उस मतदाता के मन में, जो हर चुनाव से पहले नेताओं की बातें सुनता है, वादे याद रखता है और मतदान वाले दिन चुपचाप अपनी उंगली से तय करता है कि हैट्रिक होगी या इतिहास बदलेगा।

बुधवार, 5 अगस्त 2026

udaydinmaan: अब विलुप्त हो गई ‘चिरान’ की धुन

udaydinmaan: अब विलुप्त हो गई ‘चिरान’ की धुन: पहाड़ की सदियों पुरानी पारंपरिक कला ने तोड़ा दम मशीनों के शोर में दब गई हाथ के आरे की आवाज कोठार, गौशाला और नक्काशीदार दरवाजे अब कहां देहराद...

अब विलुप्त हो गई ‘चिरान’ की धुन

पहाड़ की सदियों पुरानी पारंपरिक कला ने तोड़ा दम मशीनों के शोर में दब गई हाथ के आरे की आवाज कोठार, गौशाला और नक्काशीदार दरवाजे अब कहां देहरादून। पहाड़ों में सदियों से चली आ रही चिरान की पारंपरिक कला को दर्शाती है। दो लोग, एक ऊपर और एक नीचे, बड़े आरे से लकड़ी के मोटे लट्ठे को चीर रहे हैं। यही वह तकनीक है, जिससे कभी पूरे पहाड़ के घर, दरवाजे, खिड़कियाँ, अनाज के कोठार, गौशालाएँ और मंदिरों की नक्काशीदार लकड़ियाँ तैयार होती थीं। आज जब लकड़ी की हर चीज फैक्ट्री से बनकर आ जाती है, तब शायद नई पीढ़ी को अंदाजा भी नहीं होगा कि कभी पहाड़ में लकड़ी का हर तख्ता इंसानी मेहनत से निकलता था। पहाड़ों में इसे चिरान कहा जाता है। इसमें एक व्यक्ति लकड़ी के ऊपर खड़ा रहता है और दूसरा नीचे। दोनों एक लंबे आरे को ऊपर-नीचे खींचते हैं। कई घंटों की मेहनत के बाद एक मोटा लट्ठा धीरे-धीरे मजबूत पट्टों में बदल जाता है। यह केवल श्रम नहीं था, बल्कि धैर्य, तालमेल और अनुभव का अद्भुत उदाहरण था। एक समय ऐसा था जब बिजली नहीं थी, सड़कें नहीं थीं और मशीनें भी नहीं पहुँच सकती थीं। तब गाँव के चिरानी ही इंजीनियर थे। वह पेड़ की नसों को देखकर बता देते थे कि लकड़ी किस दिशा में चिरेगी, कहाँ गाँठ है और कौन-सा हिस्सा घर की बल्ली बनेगा। किसी घर का निर्माण शुरू होने से पहले सबसे बड़ा काम होता थाकृअच्छी लकड़ी का चयन और उसकी चिरान। पहाड़ का पारंपरिक मकान केवल पत्थर से नहीं बनता था। उसकी पूरी मजबूती लकड़ी पर टिकी होती थी। छत की बल्ली, दरवाजे, खिड़कियाँ, चौखट, अनाज रखने के संदूक, मंदिरों की नक्काशी, खेतों के औजार इन सबकी शुरुआत इसी चिरान से होती थी। गाँवों में चिरानी केवल मजदूर नहीं माना जाता था। वह हुनरमंद कारीगर होता था। उसके बिना किसी का घर नहीं बन सकता था। चिरान के मौसम में लोग कई-कई दिनों तक एक-दूसरे के घरों में श्रमदान करते थे। बदले में मजदूरी के साथ भोजन और सम्मान मिलता था। यह केवल काम नहीं, सामुदायिक सहयोग की परंपरा थी। अब सड़कें हैं, आरा मशीनें हैं, प्लाईवुड है और तैयार फर्नीचर है। नतीजा यह हुआ कि चिरान की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई। आज गाँवों में ऐसे कारीगर उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। नई पीढ़ी इस कठिन काम को सीखना नहीं चाहती क्योंकि मेहनत अधिक और आमदनी कम है। जब कोई पारंपरिक कला खत्म होती है तो केवल रोजगार नहीं जाता, बल्कि उसके साथ एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति भी समाप्त हो जाती है। आज संग्रहालयों में पुराने औजार तो मिल जाएंगे, लेकिन उन्हें चलाने वाले हाथ शायद ही कहीं दिखाई दें। तस्वीर आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक फोटो नहीं, बल्कि इतिहास का दस्तावेज है। यदि सरकार और समाज चाहें तो इस पारंपरिक कौशल को बचाया जा सकता है। इसके लिए पारंपरिक चिरानी कारीगरों का दस्तावेजीकरण किया जाए। ग्रामीण पर्यटन में इस कला का प्रदर्शन कराया जाए। आईटीआई और कौशल विकास कार्यक्रमों में पारंपरिक लकड़ी शिल्प को शामिल किया जाए। स्थानीय देवालयों और पारंपरिक भवनों के संरक्षण में इन कारीगरों को प्राथमिकता दी जाए। लोक संस्कृति मेलों में चिरान की जीवंत प्रदर्शनी आयोजित की जाए। पहाड़ केवल प्राकृतिक सुंदरता का नाम नहीं है। पहाड़ उन मेहनतकश हाथों का नाम है जिन्होंने बिना मशीनों के सभ्यता को खड़ा किया। आज जब विकास की दौड़ में परंपराएँ पीछे छूट रही हैं, तब जरूरत है कि हम चिरान जैसी लोक तकनीकों को केवल याद न करें, बल्कि उन्हें सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित भी करें। क्योंकि जिस दिन आखिरी चिरानी अपना आरा रख देगा, उस दिन केवल एक पेशा नहीं, बल्कि पहाड़ की लोक स्मृति का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।