udaydinmaan
शुक्रवार, 15 मई 2026
कैमरों के सामने ‘बचत’ और पीछे ‘शाही ठाठ’
नई राजनीति
देशभर में पीएम की अपील के बाद मची सादगी की होड़
माननीय व अफसरों का आमजन जैसा दिखने का नया दौर
सोशल मीडिया में समाज में अचानक उपज गई नई लहर
जनता पूछ रहीकृक्या यह असली बचत है या ‘फोटो सेशन’
वैश्विक आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और अनिश्चितताओं के दौर में प्रधानमंत्री मोदी की सादगी और बचत संबंधी अपील के बाद देश की राजनीति में एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है। जैसे ही टीवी पर प्रधानमंत्री ने वैश्विक संकट और मितव्ययिता का आह्वान किया तो सोशल मीडिया पर आर्थिक आपातकाल जैसे हालात हो गए है। माननीय से लेकर छोटे-बडे़ नेता और अधिकारियों को अपनी सादगी और मितव्ययिता का डिजिटल पर प्रदर्शन कर देश में एक अनोखा ट्रेड शुरू हो गया है।
अचानक कई माननीयों को सादगी पसंद आने लगी है, जो नेता कल तक बड़े काफिलों और आलीशान व्यवस्थाओं के बीच दिखाई देते थे, वह अब कैमरों के सामने आम आदमी की तरह नजर आने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरों की बाढ़ आ गई है। ऐसा लगने लगा है मानो देश में अचानक सादगी की प्रतियोगिता शुरू हो गई हो। हालांकि जनता भी अब राजनीति की इस पटकथा को समझने लगी है। लोग पूछ रहे हैं कि यदि सादगी सच में अपनानी है, तो क्या केवल कैमरों के सामने क्यों! क्या सरकारी फिजूलखर्ची, बड़े-बड़े काफिले, वीआईपी संस्कृति पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाएगी?
प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद देशभर में नेताओं-अधिकारियों की जीवनशैली में अचानक बदलाव दिखाई देने लगा है। हर कोई पैदल आफिस जाने और अपना काफिला कम करने की फोटो मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पोस्ट करवा रहा है। भाई पीएम की अपील है और उस पर अमल न हो यह तो हो ही नहीं सकता है। क्योंकि यह तो स्टेसस का सवाल जो है।
अकेले उत्तराखंड की बात करें तो यहां तो प्रिंट मीडिया में सायं को जब खबरों का पोस्टमार्टम होता है उस समय माननीय और अधिकारियों की सिफारिशें कि फला-फला... और संपादक जी से लेकर यूनिट हैड तक की सिफारिश आ रही है। यही नहीं सोशल मीडिया के सभी प्लेफार्मों पर तस्वीरों के साथ कई वीडियों माननीय और अफसरों की तैर रही है। आमजन यह देखकर हैरान है कि आखिर एकदम से ऐसा कैसे हो गया। जबकि आमजन तो सदियों से सादगी से जी रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति में जनसंपर्क और प्रतीकात्मक संदेशों की हमेशा बड़ी भूमिका रही है। स्वच्छता अभियान में झाड़ू लगाना हो या सैनिकों के बीच त्योहार मनानाकृइन संदेशों ने आम जनता पर प्रभाव डाला। अब उसी शैली को दूसरे जनप्रतिनिधि भी अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। अधिकारियों के लिए तो यह मजबूरी बन जाती है। आमजन की इस पर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग नेताओं अधिकारियों के इस बदले व्यवहार को सकारात्मक मान रहे हैं, जबकि कई लोगों का कहना है कि दिखावा है और कुछ नहीं।
गुरुवार, 14 मई 2026
अब ‘जुमले’ नहीं ‘जवाब’ मांगेंगे ‘युवा’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-8
उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव 2027 में रोजगार बन सकता है सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा
क्रासर
---डिग्री और डिजिटल दुनिया के बीच खड़ा युवा चुनाव में कर सकता है कुछ अलग
---विधानसभा चुनाव सियासत समझ पाएगी उत्तराखंड के जागरूक युवाओं की नब्ज
---पहाड़ की जवानी अब अपनी शर्तों पर लिखेगी चुनाव में कामयाबी की ई इबारत
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों की राजनीतिक हलचल तेज होने लगी है। राजनीतिक दल भले ही विकास, सड़क, पर्यटन और धार्मिक आयोजनों को अपनी उपलब्धि बता रहे हों, लेकिन पहाड़ के गांवों और शहरों के युवाओं के मन में सबसे बड़ा सवाल आज भी वही हैकृ रोजगार कहां है? आज युवा की सोच आज के दौर में न केवल बदली है, बल्कि यह अधिक स्पष्ट, व्यावहारिक और तकनीकी रूप से जागरूक हो गई है। युवा परंपराओं का सम्मान तो करता है, लेकिन वह अब केवल हौसले के भरोसे नहीं, बल्कि संसाधनों और अवसरों के साथ आगे बढ़ना चाहता है। आगामी विधानसभा चुनाव में युवाओं की सोच राजनैतिक दलों के लिए परेशानी बन सकती है।
बता दें कि राज्य गठन के 25 साल बाद भी उत्तराखंड का युवा नौकरी के लिए दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर है। ऐसे में माना जा रहा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में रोजगार की कमी सबसे बड़ा और निर्णायक मुद्दा बन सकती है। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में लगातार पलायन बढ़ रहा है। गांवों में खेत सूने हैं, स्कूलों में बच्चों की संख्या घट रही है और युवा रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर जा रहे हैं। कई गांव भूतिया गांव बन चुके हैं, जहां अब केवल बुजुर्ग रह गए हैं।
राज्य सरकारें समय-समय पर स्वरोजगार और स्टार्टअप योजनाओं की बात करती रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का प्रभाव सीमित दिखाई देता है। युवाओं का आरोप है कि सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया बेहद धीमी है और कई बार पेपर लीक जैसी घटनाएं विश्वास को तोड़ देती हैं।
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था लंबे समय से पर्यटन, सेना भर्ती और सरकारी नौकरियों पर निर्भर रही है। लेकिन बदलते दौर में युवाओं की संख्या और अपेक्षाएं दोनों बढ़ी हैं। पहाड़ में उद्योगों की कमी, सीमित निजी निवेश और तकनीकी शिक्षा के बाद अवसरों का अभाव बड़ी चुनौती बना हुआ है। देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर जैसे जिलों में कुछ रोजगार अवसर जरूर बने, लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में हालात अभी भी चिंताजनक हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से विकास और पलायन साथ-साथ चर्चा में रहे हैं। सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क और धार्मिक पर्यटन को विकास का माडल बता रही है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन परियोजनाओं से पहाड़ के युवाओं को स्थायी रोजगार मिलेगा? विश्लेषकों का मानना है कि यदि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन नहीं हुआ, तो पलायन और तेज हो सकता है। आगामी चुनाव में युवाओं और क्षेत्रीय मुद्दों को केंद्र में रखने की तैयारी कर रहा है। यूकेडी ने सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का संकेत दिया है और संगठन में युवाओं को जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। सोशल मीडिया और आनलाइन चर्चाओं में भी रोजगार, पलायन और पहाड़ के खाली होते गांवों को लेकर चिंता साफ दिखाई देती है।
उत्तराखंड में बेरोजगारी दर अक्सर राष्ट्रीय औसत के इर्द-गिर्द या उससे ऊपर बनी रहती है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्टों के अनुसार शिक्षित युवाओं में रोजगार की कमी एक बड़ी चिंता है। रिपोर्ट के अनुसार विधानसभा चुनाव में 2027 में लगभग 15-20 लाख युवा मतदाता निर्णायक भूमिका निभाएंगे। यह वर्ग पार्टियों के पारंपरिक वोट बैंक से हटकर डिलीवरी और जवाबदेही के आधार पर मतदान करने की प्रवृत्ति दिखाएंगे। युवाओं की सोच का परिणाम हम नेपाल चुनाव में देख चुके हैं। हालांकि प्रदेश के राजनैतिक दल भी इस पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं, लेकिन परिणाम क्या होंगे यह तो बाद में ही पता चल पाएगा।
बाक्स
सरकारी नौकरी असली रोजगार
पहाड़ में सरकारी नौकरी को ही असली रोजगार माना जाता है। पुलिस, शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग में खाली पड़े हजारों पदों को भरना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना और होमस्टे जैसी योजनाओं ने कुछ उम्मीदें जगाई हैं, लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी के कारण यह योजनाएं हर जिले में सफल नहीं हो पाई हैं। पिछले कुछ वर्षों में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और अन्य भर्ती परीक्षाओं में हुए घोटालों ने युवाओं के मनोबल को चोट पहुँचाई है। पेपर लीक और भ्रष्टाचार के मामलों ने सत्ता पक्ष के लिए बचाव की स्थिति पैदा की है, वहीं विपक्ष इसे युवा विरोधी सरकार के रूप में भुनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि सरकार ने देश का सबसे सख्त नकल विरोधी कानून लागू किया है, लेकिन युवाओं के बीच यह सवाल अब भी बरकरार है कि क्या नई भर्तियां समय पर और पारदर्शी तरीके से पूरी होंगी?
दावों की ‘चकाचौंध’ में खो गया ‘विकास’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-7
उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव 2027 में विकास बनेगा सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा
क्रासर
---उत्तराखंड राज्य के विकास का एक बड़ा और कड़वा सच
---स्किल के दावों के बीच खाली हाथ खड़े हैं पहाड़ के युवा
---सुविधाओं की कसौटी पर सरकार को परखेंगे पहाड़ के वोटर
देहरादून। राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के करीब हैं, लेकिन आज भी पहाड़ के लोग सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उत्तराखंड के विकास का एक कड़वा सच यह है कि विकास का सारा केंद्र देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर तक सिमट कर रह गया है। आज भी दूरस्थ जिलों में रेफरल सेंटर बने अस्पताल और शिक्षकों की कमी से जूझते स्कूल विकास के दावों पर सवाल खड़े करते हैं। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही एक बार फिर विकास को लेकर बहस शुरू हो गई है और आगामी चुनाव में यह सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभर सकता है।
राजनीतिक दल अपने-अपने विकास के दावे कर रहे हैं, लेकिन जनता अब आंकड़ों से ज्यादा जमीनी हकीकत देखना चाहती है। गांव खाली हो रहे हैं, युवाओं का पलायन जारी है और पहाड़ की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर उत्तराखंड का विकास किस दिशा में जा रहा है?
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में पलायन आज भी सबसे गंभीर समस्या बना हुआ है। हजारों गांव आंशिक या पूर्ण रूप से खाली हो चुके हैं। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण युवा शहरों की ओर जा रहे हैं। गांवों में केवल बुजुर्ग और महिलाएं बची हैं। चुनावी सभाओं में राजनीतिक दल रोजगार सृजन और स्थानीय उद्योगों की बात तो करते हैं, लेकिन जमीन पर हालात अब भी चिंताजनक हैं। पहाड़ के लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर राज्य बनने के बाद भी रोजगार के लिए युवाओं को दिल्ली, चंडीगढ़ और देहरादून क्यों जाना पड़ रहा है? सरकारें सड़क निर्माण और कनेक्टिविटी को अपनी उपलब्धि बताती रही हैं, लेकिन कई दूरस्थ गांव आज भी बेहतर सड़क सुविधा से वंचित हैं। बरसात में सड़कें टूट जाती हैं और कई गांवों का संपर्क कट जाता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चुनावी बहस के केंद्र में है। पहाड़ी जिलों में डाक्टरों और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र केवल नाम के सहारे चल रहे हैं। गंभीर मरीजों को घंटों सफर कर बड़े शहरों तक पहुंचना पड़ता है।
सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या और शिक्षकों की कमी भी बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। कई स्कूल बंद होने की कगार पर हैं। उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थानों की कमी के कारण युवाओं को राज्य से बाहर जाना पड़ता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और भर्ती घोटालों ने युवाओं में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ाई है। बेरोजगार युवा अब चुनाव में जवाब मांगने की तैयारी में हैं। सरकारें चारधाम यात्रा, धार्मिक कारिडोर और पर्यटन परियोजनाओं को विकास का चेहरा बता रही हैं। केदारनाथ, बदरीनाथ और अन्य धार्मिक स्थलों पर बड़े स्तर पर निर्माण कार्य हुए हैं। लेकिन विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या विकास केवल पर्यटन केंद्रों तक सीमित रह गया है? स्थानीय लोग चाहते हैं कि पर्यटन से गांवों को भी सीधा लाभ मिले, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले और पारंपरिक संस्कृति को भी संरक्षण मिले। विकास की बहस के साथ भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा भी तेजी से उभर रहा है। पहाड़ में जमीनों की खरीद और बाहरी निवेश को लेकर लोगों में चिंता है। कई सामाजिक संगठन मजबूत भू-कानून की मांग कर रहे हैं। राजनीतिक दल इस मुद्दे को विकास और जनसंख्या संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि चुनाव के करीब आते-आते यह मुद्दा और अधिक गर्माएगा। राज्य में विकास को लेकर सबसे बड़ा आरोप क्षेत्रीय असंतुलन का है। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और हल्द्वानी जैसे क्षेत्रों में तेजी से विकास हुआ, जबकि कई पहाड़ी जिले अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विपक्ष सरकार पर मैदान केंद्रित विकास का आरोप लगा रहा है, जबकि सत्ता पक्ष का दावा है कि दूरस्थ क्षेत्रों तक योजनाएं पहुंचाई जा रही हैं।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2027 के चुनाव में केवल हिंदुत्व या राष्ट्रीय मुद्दे नहीं, बल्कि स्थानीय विकास, रोजगार, पलायन, भू-कानून और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे निर्णायक भूमिका निभाएंगे। पहाड़ की खामोश होती बस्तियां, खाली होते खेत और नौकरी की तलाश में भटकता युवा आने वाले चुनाव की दिशा तय कर सकते हैं।
‘अधूरे वादों’ पर सियासत 25 साल से ‘मौन’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-6
पहाड़ के उजड़ते गांवों की पीड़ा पर सजेगी विधानसभा 2027 की चुनावी बिसात
क्रासर
---पर्वतीय जिलों से लगातार बढ़ रहा पलायन राजनीतिक दलों के लिए बड़ी चुनौती
---सरकारी नौकरियों की कमी और भर्ती विवादों से युवाओं में बढ़ी है नाराजगी
---सीमांत गांवों से पलायन को लेकर सुरक्षा और विकास दोनों पर उठ रहे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। राज्य की राजनीति में पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी हमेशा से केंद्र में रहे हैं। पहाड़ों के खाली होते गांव, युवाओं की बेरोजगारी और बेहतर अवसरों की तलाश में मैदानों व दूसरे राज्यों की ओर बढ़ता पलायन अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। राजनीति में अभी तक वादों और सियासत का खेल चलता रहा है, लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव में सियासत के ‘अधूरे वादों’ जो अभी तक मौन साधा है उस पर प्रश्न उठने लाजमी हैं और हो सकता है कि यह सत्ता के खेल में भारी पड़ सकता है।
उत्तराखंड राज्य गठन के समय लोगों ने उम्मीद की थी कि अलग राज्य बनने से पहाड़ों में रोजगार बढ़ेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं सुधरेंगी और गांव आबाद रहेंगे। लेकिन 25 साल बाद भी तस्वीर काफी हद तक उलट दिखाई देती है। राज्य के पर्वतीय जिलोंकृपौड़ी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ सहित अन्य जिलों में पलायन सबसे अधिक हुआ है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि पलायन सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सामरिक चुनौती भी बन गया है। भारत-चीन सीमा से लगे कई गांव लगभग खाली हो चुके हैं। 2024 में सामने आई एक रिपोर्ट में 11 सीमांत गांव पूरी तरह खाली पाए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमांत क्षेत्रों का खाली होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी चिंता का विषय है।
उत्तराखंड का युवा आज सरकारी नौकरी, सेना भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं पर सबसे ज्यादा निर्भर है। लेकिन भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती घोटाले और सीमित अवसरों ने युवाओं में गहरा असंतोष पैदा किया है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक युवाओं का गुस्सा कई बार देखने को मिला है। विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य में उद्योगों की कमी, पर्वतीय क्षेत्रों में निवेश न होना और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का कमजोर होना बेरोजगारी का बड़ा कारण है। पर्यटन और सेना भर्ती पर अत्यधिक निर्भरता भी राज्य की अर्थव्यवस्था को सीमित करती है।
उत्तराखंड के कई गांव अब घोस्ट विलेज कहलाने लगे हैं। गांवों में सिर्फ बंद मकान और सूने आंगन बच गए हैं। खेत बंजर हो रहे हैं और पारंपरिक खेती खत्म होती जा रही है। हालांकि कुछ गांवों ने उम्मीद भी जगाई है। बागेश्वर जिले के खाती और वाछम जैसे गांवों ने पर्यटन, होमस्टे और जड़ी-बूटी आधारित रोजगार के जरिए पलायन को काफी हद तक रोका है। यहां स्थानीय युवाओं ने गांव छोड़ने के बजाय गांव में ही रोजगार के अवसर बनाए। हालांकि सरकार यह भी दावा कर रही है कि हाल के वर्षों में रिवर्स माइग्रेशन यानी गांवों में वापसी का ट्रेंड बढ़ा है। लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि गांव लौटने वालों की संख्या अभी भी बाहर जाने वालों से काफी कम है।
प्रदेश में होने वाले आगामी चुनाव केवल सड़क और बिजली पर नहीं, बल्कि पहाड़ की स्थिरता पर टिके होंगे। यदि सरकारें पहाड़ों में लघु उद्योगों और आईटी क्लस्टर्स को बढ़ावा देने में विफल रहती हैं, तो पलायन का यह आंकड़ा आने वाले समय में उत्तराखंड की जनसांख्यिकी को पूरी तरह बदल सकता है। इससे आने वाले समय में विधानसभा सहित सभी अन्य चुनावों पर भी फर्क पडे़गा और राजनीति पर भी।
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पलायन की स्थिति है चिंताजनक
उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार राज्य में पलायन की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। 2011 से 2022 के बीच राज्य के लगभग 1792 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, जिन्हें अब घोस्ट विलेज कहा जाता है। 2011 में यह संख्या 1034 थी। अल्मोड़ा, पौड़ी गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल से सबसे अधिक पलायन दर्ज किया गया है। पौड़ी जिले में अकेले 1.5 लाख से अधिक लोगों ने अपने घर छोड़े हैं। लगभग 50 प्रतिशत पलायन का मुख्य कारण आजीविका के अवसरों का अभाव है। इसके बाद स्वास्थ्य और शिक्षा का स्थान आता है। पलायन करने वालों में 26 से 35 वर्ष की आयु के युवाओं की संख्या सबसे अधिक है, जो राज्य की उत्पादक शक्ति को कमजोर कर रही है।
मुद्दों में ‘पहाड़’ और रणनीति में ‘मैदान’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-5
उत्तराखंड की सियासत में फिर आमने-सामने होंगे पहाड़ और मैदान
क्रासर
---चुनावी घोषणाओं में पहाड़, लेकिन रणनीति का केंद्र मैदान
---पहाड़ में पलायन, स्वास्थ्य और रोजगार सबसे बड़े सवाल
---मैदान में उद्योग, किसान और कानून व्यवस्था बड़ी चुनौती
देहरादून। 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने उत्तराखंड राज्य की मूल अवधारणा एक पहाड़ी राज्य की थी, लेकिन चुनावी गणित और आर्थिक विकास की धुरी अक्सर मैदानी जिलों की ओर झुकती नजर आती है। यहां भूगोल, संस्कृति, संसाधनों और असमान विकास की एक अलग कहानी है। आगामी विधानसभा चुनाव में एक बार फिर प्रदेश की राजनीति दो बड़े हिस्सोंकृमैदान और पहाड़कृके मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती दिखेगी। मैदान और पर्वतीय क्षेत्रों की जरूरतें अलग हैं, समस्याएं अलग हैं और राजनीतिक प्राथमिकताएं भी अलग हैं।
प्रदेश में 2027 में विधानसभा के चुनाव होने हैं और इस चुनाव में फिर से पहाड़ बनान मैदान का मुद्दा भी राजनैतिक दलों के घोषणा पत्र में होगा। दलों के घोषणा पत्र में बात और मुद्दे पहाड़ के होंगे और राजनीति की बात आएगी तो वह होगी मैदान की। यह सब राज्य बनने से लेकर अभी तक चलता आया है और आगे भी ऐसा ही होगा। उत्तराखंड का मैदानी क्षेत्र आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत माना जाता है। ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार जैसे जिलों में उद्योग, कृषि, व्यापार और बेहतर सड़क नेटवर्क ने विकास की तस्वीर बनाई है। यहां रोजगार, निवेश, बिजली, सिंचाई, कानून व्यवस्था और औद्योगिक नीतियां मुख्य चुनावी मुद्दे बनते हैं।
वहीं दूसरी ओर पहाड़ी जिलों में पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, बंद होते स्कूल, खराब सड़कें, वन्यजीवों का आतंक, खेती का संकट और रोजगार का अभाव सबसे बड़े सवाल हैं। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन दशकों से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। हजारों गांव खाली हो चुके हैं और कई गांव भूतिया गांव कहलाने लगे हैं। चुनावी सभाओं में हर दल पलायन रोकने की बात करता है, लेकिन जमीनी हालात बहुत नहीं बदले। युवाओं का कहना है कि अगर गांव में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं हों तो वह शहरों की ओर क्यों जाएं? यही कारण है कि इस चुनाव में स्वरोजगार, पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था और स्थानीय उत्पादों को बाजार दिलाने जैसे मुद्दे निर्णायक बन सकते हैं।
दूसरी ओर मैदानी क्षेत्र में उद्योगों की बड़ी भूमिका है। यहां बेरोजगारी के साथ-साथ स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देने का मुद्दा तेजी से उठ रहा है। सिडकुल क्षेत्रों में बाहरी राज्यों के श्रमिकों की अधिक संख्या को लेकर स्थानीय युवाओं में नाराजगी भी देखी जाती है। इसके अलावा किसान गन्ना मूल्य भुगतान, सिंचाई व्यवस्था और कृषि लागत को लेकर सरकारों से जवाब मांग रहे हैं। मैदान का मतदाता सड़क, बिजली और व्यापारिक सुविधाओं के आधार पर सरकार का मूल्यांकन करता है।
पर्वतीय क्षेत्रों में भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा तेजी से राजनीतिक रंग ले चुका है। लोगों का एक बड़ा वर्ग हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर सख्त भू-कानून की मांग कर रहा है। उनका तर्क है कि बाहरी निवेश के नाम पर जमीनों की खरीद बढ़ने से स्थानीय पहचान और संसाधनों पर खतरा पैदा हो रहा है। यह मुद्दा पहाड़ में भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, जबकि तराई क्षेत्र में इसे अलग नजरिए से देखा जाता है। यहां व्यापार और निवेश के लिहाज से लोग कठोर नियमों को लेकर मिश्रित राय रखते हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां सड़क और अस्पताल पहुंचना चुनौती बना हुआ है। गर्भवती महिलाओं को डोली में अस्पताल ले जाने की खबरें सरकारों के विकास दावों पर सवाल खड़े करती हैं। दूसरी ओर मैदान में बेहतर सुविधाओं के बावजूद ट्रैफिक, शहरी अव्यवस्था और बढ़ती आबादी चिंता का विषय है। शिक्षा के क्षेत्र में पहाड़ के सरकारी स्कूल लगातार खाली हो रहे हैं, जबकि निजी स्कूलों का दबदबा बढ़ रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं में डाक्टरों की कमी भी बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।
उत्तराखंड का आगामी विधानसभा चुनाव केवल राजनीतिक दलों की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह विकास माडल की भी परीक्षा होगा। सवाल यह है कि क्या प्रदेश का विकास केवल मैदान तक सीमित रहेगा या पहाड़ भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो पाएंगे? चुनावी मंचों पर वादे बहुत होंगे, लेकिन जनता अब नारे नहीं, जमीन पर बदलाव देखना चाहती है।
शहर ‘चमक’ रहे और पहाड़ हो रहे हैं ‘खाली’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे भाग-4
राज्य गठन के 25 साल बाद भी अधूरा है सपना, विकास में पिछड़ा पहाड़
क्रासर
---विकास की असंतुलित राह बन सकती है इस विस चुनाव में चुनौती
---पलायन, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से आमजन नाराज
---सीमांत जिलों में खाली होते गांव, सरकारों के दावों पर उठा रहे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड राज्य स्थापना के ढाई दशक बाद भी पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी का नारा आज भी एक कड़वी हकीकत के रूप में सामने है। आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के बीच विकास में असमानता फिर से एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर उभर सकता है। राज्य के मैदानी जिलों की चमक-धमक और पर्वतीय क्षेत्रों की बुनियादी सुविधाओं के बीच बढ़ती खाई ने नीति-नियंताओं पर सवाल खड़े कर रही हैं।
आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड का विकास मुख्य रूप से तीन मैदानी जिलोंकृदेहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगरकृतक सिमट कर रह गया है। राज्य की जीडीपी में इन तीन जिलों का योगदान 70 प्रतिशत से अधिक है। राजधानी देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्योगों का तेजी से विस्तार हुआ है। वहीं दूसरी ओर पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी और बागेश्वर जैसे पर्वतीय जिलों में आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ रहा है। गांवों से लगातार हो रहा पलायन इस असमान विकास की सबसे बड़ी तस्वीर पेश करता है।
पहाड़ के लोगों का आरोप है कि सरकारें चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे तो करती हैं, लेकिन योजनाओं का अधिकांश लाभ मैदानी क्षेत्रों तक सीमित रह जाता है। रोजगार के अवसर, बेहतर अस्पताल, उच्च शिक्षा संस्थान और उद्योग आज भी पहाड़ों में सपना बने हुए हैं। यही वजह है कि हजारों गांव खाली हो चुके हैं और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
राज्य के सिडकुल क्षेत्रों का विस्तार केवल मैदानों तक सीमित रहा। पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे उद्योगों या फलोद्यान को बढ़ावा देने के लिए वैसी ठोस नीतियां नहीं दिखीं, जो युवाओं को घर पर रोक सकें। पर्यटन के क्षेत्र में भी )षिकेश और नैनीताल जैसे चुनिंदा केंद्रों पर ही दबाव बढ़ रहा है, जबकि दूरस्थ क्षेत्रों के पर्यटन स्थल बुनियादी सुविधाओं के अभाव में गुमनाम हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार मतदाता केवल सड़क के वादे पर वोट नहीं देगा। अब मांग समान विकास की है। इस बढ़ती असमानता ने ही सख्त भू-कानून की मांग को जन्म दिया है, ताकि पहाड़ की संपदा सुरक्षित रह सके। इसके साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों में डिजिटल कनेक्टिविटी और प्रशासनिक सेवाओं की सुगमता एक बड़ा मुद्दा है। मैदानों में खेती के लिए संसाधन हैं, लेकिन पहाड़ों में बंदरों और सुअरों के आतंक के कारण लोग खेती छोड़ रहे हैं, जिससे आर्थिक असमानता और गहरी हो रही है।
राज्य गठन के 25 साल बाद भी पहाड़ और मैदान के बीच विकास की खाई कम होने के बजाय और गहरी होती दिखाई दे रही है। यही कारण है कि आगामी विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 के चुनाव में संतुलित विकास एक बड़ा चुनावी नारा बन सकता है। विपक्ष जहां सरकार को पहाड़ों की अनदेखी का आरोप लगाकर घेरने की तैयारी में है, वहीं सत्ताधारी दल विकास कार्यों की लंबी सूची गिनाकर जनता को साधने की कोशिश करेगा।
‘तीसरी ताकत’ 2027 का असली ‘सस्पेंस’
विस चुनाव 2027 के प्रमुख मुद्दे भाग-3
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पहाड़ की सियासत में तीसरे मोर्चे की आहट
क्रासर
---पहाड़ पर तीसरे की दस्तक, वोटकटवा या बनेगा सत्ता का सारथी
---इस विस चुनाव चलेगी बदलाव की बयार या फिर वही पुरानी राह
---बागी नेता तीसरे मोर्चे से मिले तो कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प
देहरादून। उत्तराखंड की शांत वादियों में 2027 के विधानसभा चुनावों की राजनीतिक तपिश अभी से महसूस होने लगी है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस बार मुकाबला केवल हाथ और कमल के बीच नहीं है, बल्कि परदे के पीछे से सक्रिय तीसरी ताकत और निर्दलीय दिग्गजों ने बड़े दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। उत्तराखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकले कई क्षेत्रीय दल वर्षों से यह दावा करते रहे हैं कि राष्ट्रीय दल पहाड़ के मूल मुद्दों को समझने में असफल रहे हैं। भू-कानून, मूल निवास, पलायन, बेरोजगारी, गैरसैंण, जल-जंगल-जमीन और पहाड़ी अस्मिता जैसे मुद्दों को लेकर समय-समय पर नई राजनीतिक ताकतें सामने आती रही हैं।
अब 2027 से पहल राजनैतिक दल जनता के बीच यह संदेश देने में जुटे हैं कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उत्तराखंड की उम्मीदों को पूरा नहीं किया। यही कारण है कि क्षेत्रीय विकल्प की जमीन बनाने की कोशिश हो रही है। उत्तराखंड में कई सीटें ऐसी हैं, जहां जीत-हार का अंतर बेहद कम रहता है। ऐसे में तीसरा मोर्चा भले सरकार न बना पाए, लेकिन वह हजारों वोट काटकर समीकरण बदल सकता है। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की नजर छोटे दलों और बागी नेताओं की गतिविधियों पर टिकी हुई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर तीसरा मोर्चा कुछ खास क्षेत्रों जैसे कुमाऊं के पर्वतीय इलाके, गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्र या तराई की कुछ सीटों पर प्रभावी हुआ, तो सीधा असर मुख्य दलों की जीत-हार पर पड़ सकता है। उत्तराखंड में तीसरे मोर्चे की सबसे बड़ी चुनौती संगठन और संसाधनों की कमी रही है। चुनाव के समय मुद्दे तो जनता को आकर्षित करते हैं, लेकिन बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क न होने के कारण क्षेत्रीय दल अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं।
इसके अलावा चुनाव आते-आते कई नेता बड़े दलों में शामिल हो जाते हैं, जिससे तीसरे विकल्प की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। यही कारण है कि अब तक प्रदेश में कोई भी क्षेत्रीय शक्ति स्थायी राजनीतिक विकल्प नहीं बन पाई। इस बार परिस्थितियां कुछ अलग भी नजर आ रही हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, पलायन और स्थानीय अधिकारों के मुद्दे युवाओं के बीच चर्चा में हैं। यदि कोई तीसरा मोर्चा इन मुद्दों को मजबूती से उठाता है और साफ नेतृत्व प्रस्तुत करता है, तो उसे युवाओं और नाराज मतदाताओं का समर्थन मिल सकता है।
हालांकि राजनीति के जानकार मानते हैं कि सिर्फ भावनात्मक मुद्दों से चुनाव नहीं जीते जाते। जनता अब स्थिर नेतृत्व और मजबूत संगठन भी चाहती है। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में टिकट वितरण के बाद असंतोष की संभावना रहती है। ऐसे में बागी नेता यदि तीसरे मोर्चे के साथ आते हैं तो कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। पिछले चुनावों में भी बागियों ने कई जगह मुख्य दलों का गणित बिगाड़ा था।
उत्तराखंड में अभी तक तीसरा मोर्चा सत्ता तक नहीं पहुंच पाया है, लेकिन उसने कई बार चुनावी परिणामों को प्रभावित जरूर किया है। 2027 में भी यह फैक्टर महत्वपूर्ण रहने वाला है। यदि क्षेत्रीय दल साझा रणनीति, मजबूत चेहरा और जमीनी संगठन तैयार कर लेते हैं, तो मुकाबला रोचक हो सकता है। लेकिन यदि वह केवल मुद्दों तक सीमित रहे और एकजुटता नहीं दिखा पाए, तो फिर उन पर वोट कटवा होने का आरोप और मजबूत हो जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में तीसरे मोर्चे की हलचल ने भाजपा और कांग्रेस दोनों की चिंता बढ़ा दी है। 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक विकल्प की तलाश का भी चुनाव बनता नजर आएगा।
बाक्स
चेहरों की भीड़
राज्य की 70 विधानसभा सीटों पर नजर डालें तो हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे मैदानी जिलों में बहुजन समाज पार्टी और आप का बढ़ता प्रभाव कांग्रेस के कोर वोट बैंक में सेंध लगा रहा है। वहीं, पहाड़ की सीटों पर उत्तराखंड क्रांति दल मूल निवास और सशक्त भू-कानून के भावनात्मक मुद्दों को लेकर भाजपा के राष्ट्रवाद को चुनौती देने की तैयारी में है। पिछली बार के आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तराखंड में कई सीटें ऐसी थीं जहाँ जीत का अंतर 1000 से 2000 वोटों के बीच रहा। 2027 में वोटकटवा की भूमिका निभाने वाले प्रत्याशी निर्णायक साबित होंगे।
‘माटी’ और ‘मानुष’ पर सियासत
क्रासर
---आगामी विधानसभा चुनाव के रण में होगी पहाड़ का पानी और जवानी अब जमीन पर सियासत
---उत्तराखंड की जमीन और संसाधनों पर पहला हक किसका सवाल 25 सालों से है सियासत में तैर रहा
---सूबे की सियासत को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहे हैं अपणी जमीन-अपणो अधिकार जैसे कई अभियान
देहरादून। उत्तराखंड की शांत वादियों में इस समय राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है। सूबे की राजनीति में एक बार फिर भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा चुनावी केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही पहाड़ में जमीन, पहचान और अधिकार को लेकर बहस तेज हो गई है। राज्य गठन के 25 साल बाद भी यह सवाल जनता के बीच जिंदा है कि आखिर उत्तराखंड की जमीन और संसाधनों पर पहला हक किसका होना चाहिए।
बता दें कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदने के मामलों में तेजी आई है। देहरादून, मसूरी, नैनीताल, )षिकेश और चारधाम मार्ग से जुड़े इलाकों में होटल, रिजार्ट और फार्म हाउस संस्कृति बढ़ने से स्थानीय लोगों के बीच अपनी जमीन और संस्कृति के खत्म होने का डर गहरा रहा है। पहाड़ के निवासियों का मानना है कि 2018 के संशोधनों के बाद बाहरी राज्यों के लोगों ने अंधाधुंध जमीनें खरीदी हैं। जनता की मांग है कि हिमाचल की तर्ज पर उत्तराखंड में भी कृषि भूमि की खरीद पर पूर्ण प्रतिबंध लगे। सरकार ने हाल ही में संशोधनों के जरिए सख्ती दिखाई है, लेकिन आंदोलनकारी शपथ पत्र जैसे प्रावधानों से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि जब तक जमीन नहीं बचेगी, तब तक पहाड़ नहीं बचेगा।
वही प्रदेश में स्थायी निवास बनाम मूल निवास की बहस ने युवाओं को सड़कों पर ला दिया है। आंदोलनकारियों का तर्क है कि 1950 को कट-आफ वर्ष माना जाए, ताकि राज्य के सीमित संसाधनों और नौकरियों पर पहला हक उन लोगों का हो जिनके पूर्वजों ने इस राज्य के लिए संघर्ष किया। यह भावनात्मक मुद्दा सीधे तौर पर राज्य के 70 विधानसभा क्षेत्रों में से पहाड़ी सीटों के नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। राज्य में 2026 के बाद होने वाला संभावित परिसीमन एक और बड़ी चिंता है। जनसंख्या आधारित परिसीमन से पहाड़ों की सीटें घटने और मैदानों की बढ़ने का डर है। ऐसे में भू-कानून और मूल निवास के मुद्दे पहाड़ी अस्मिता को बचाने के आखिरी हथियार के रूप में देखे जा रहे हैं।
राजनीतिक दल भी अब इन मुद्दों की संवेदनशीलता को समझ रहे हैं। सत्ता पक्ष जहां भू-कानून में संशोधन और सख्ती की बात कर रहा है, वहीं विपक्ष सरकार पर केवल आश्वासन देने का आरोप लगा रहा है। क्षेत्रीय दल और छात्र संगठन इसे चुनाव का सबसे बड़ा जनभावनात्मक मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि 2027 का चुनाव केवल सड़क, पानी और बिजली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पहाड़ किसका? जैसे सवाल भी वोट की दिशा तय कर सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे को सबसे ज्यादा समर्थन युवा और महिलाएं दे रही हैं। गांव खाली होने, खेती खत्म होने और संस्कृति के कमजोर पड़ने की चिंता अब पारिवारिक चर्चा का हिस्सा बन चुकी है। सोशल मीडिया पर भी अपणी जमीन-अपणो अधिकार जैसे अभियान तेजी से चल रहे हैं।
उत्तराखंड के चुनाव अब तक दिल्ली के चेहरे और केंद्र की योजनाओं पर लड़े जाते रहे हैं। लेकिन 2027 में पहली बार लोकल का शोर सबसे तेज होगा। सोशल मीडिया से लेकर गांव की चौपालों तक, युवा वोटर पूछेगा कि अगर हमारी जमीन और पहचान ही नहीं रही, तो सड़कों और पुलों का हम क्या करेंगे? आने वाले विधानसभा चुनावों में यह साफ होगा कि राजनीतिक दल इन भावनाओं को केवल नारों तक सीमित रखते हैं या वास्तव में कोई ठोस नीति सामने लाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की सियासत में भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा आने वाले दिनों में और ज्यादा गरमाने वाला है।
रोजगार-भू-कानून बनेगे ‘गेमचेंजर’
क्रासर
---पलायन, पहचान, विकास, महिला शक्ति और संगठनकृपर तय होगी सत्ता की राह
---रोजगार और पलायन, पहाड़ में खाली होते गांवों की बढ़ती चिंता पर होगा फोकस
---उत्तराखंड की अस्मिता, युवाओं के सब्र और नेतृत्व की साख का भी होगा टेस्ट
देहरादून। प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की रणभेदी बजने में अभी समय है, लेकिन इस बार का चुनाव उत्तराखंड की राजनीति अब हर पांच साल में बदलाव के मिथक से आगे निकल चुका है। 2027 का रण केवल विकास के दावों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह राज्य की अस्मिता, युवाओं के सब्र और नेतृत्व की साख का टेस्ट भी होगा। इसके साथ ही इस बार का चुनाव पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर आमजन से जुड़े ठोस सवालों पर केंद्रित होता दिख रहा है। पहाड़ की चुनौतियों, सीमित संसाधनों और बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच मतदाता अब सीधे जवाब चाहता है। राजनीतिक दल भी अपनी रणनीतियों को कुछ मुद्दों के इर्द-गिर्द गढ़ रहे हैं, जो सत्ता का रास्ता तय करेंगे।
आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनैतिक दल अपनी तैयारियों में लगे हैं और हर उस रणनीति को तैयार कर रहे हैं जो सत्ता के लिए सही हो। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो इस बार के विधानसभा चुनाव में राज्य के मूद्दों के ज्यादा हावी रहने के संकेत मिल रहे हैं। वैसे भी विपक्ष और प्रदेश के सबसे पुराने क्षेत्रिय दल यूकेडी के यूथ ब्रिगेड की रणनीति राष्ट्रीय दलों पर भारी पड़ सकती है। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो आगामी विधानसभा चुनाव में इन मुद्दों पर ज्यादा बात होने की संभावना है। इसमें राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन सबसे गंभीर चुनौती बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों और सामाजिक अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि कई गांव आंशिक या पूरी तरह खाली हो चुके हैं। युवाओं के सामने रोजगार के सीमित अवसर, भर्तियों में देरी और निजी क्षेत्र का अभाव उन्हें मैदानों और अन्य राज्यों की ओर धकेल रहा है। कृषि और पारंपरिक व्यवसाय भी अब पहले जैसे सहारा नहीं दे पा रहे।
इसके साथ ही राज्य में सख्त भू-कानून की मांग अब जनआंदोलन का रूप ले चुकी है। स्थानीय लोग बाहरी निवेश और जमीन खरीद पर नियंत्रण की मांग कर रहे हैं। यह मुद्दा सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि पहाड़ की पहचान, संस्कृति और संसाधनों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही मूल निवास का सवाल भी इसी के साथ मजबूती से उभर रहा है। खासतौर पर पर्वतीय सीटों पर यह मुद्दा निर्णायक असर डाल सकता है। क्षेत्रीय दल और सामाजिक संगठन इसे चुनावी केंद्र में ला रहे हैं।
वही दूसरी ओर सत्तारूढ़ पक्ष अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाएगा। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन से जुड़े प्रोजेक्ट्स को प्रमुखता दी जा रही है। चारधाम यात्रा, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और निवेश को सरकार अपनी ताकत के रूप में पेश करेगी। हालांकि, विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है।
2027 का चुनाव यह तय करेगा कि उत्तराखंड अपनी मूल पहचान को बचाने के साथ-साथ आधुनिक विकास की दौड़ में कहां खड़ा है। यह चुनाव केवल नारों का नहीं, बल्कि पहाड़ के स्वाभिमान का होगा। यह सब राजनैतिक दलों को पता है और वह इसके लिए अपनी रणनीति तय करने में लगे हैं,ताकी जनता के बीच जाकर अपने आप को ही हीरो साबित कर सके और चुनाव में वोट अपने पक्ष में डलवा सके, लेकिन राज्य की जनता का असली मूड क्या होगा यह तो आने वाले समय में पता चलेगा।
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रोजगार और पलायन, पहाड़ की जवानी का सवाल
भू-कानून और पहचान, सूबे में अस्मिता की लड़ाई
विकास और एंटी-इंकम्बेंसी,10 साल बनाम विकल्प
संगठन व नेतृत्व, चेहरे की चमक बनाम कैडर ताकत
इसके साथ ही महंगाई और अन्य मुद्दे भी होंगे भारी
पड़्याल: पहाड़ की मिट्टी में बसी अपनत्व की मिसाल
एक-दूसरे के खेतों में बिना मजदूरी के मिलकर करते थे सभी लोग काम
रोपाई व कटाई में गूंजते थे लोकगीत, मजबूत होता था सामाजिक रिश्ता
पलायन व बदलती जीवनशैली में खत्म हो गई है पहाड़ की पुरानी परंपरा
देहरादून। पहाड़ में जेठ की तपती दोपहरी हो या सावन की रिमझिम फुहार यहाँ के सीढ़ीदार खेत अकेले आदमी के बस की बात नहीं होते। जब पहाड़ की ऊबड़-खाबड़ ढलानों पर खेती की बात आती है तो यहा कि एक सदियों पुरानी प्रथा पड़्याल जो सामूहिक श्रम, लोक संस्कृति, समानता, पारंपरिक व्यंजन, सामाजिक मजबूती की मिशाल थी। आज के दौर में यह अब एक दिवास्वप्न बन गई है।
कुछ दिनों पहले पहाड़ की यात्रा पर था। खेतों में पानी और तपती दोपहर में खेतों में रौपाई करती कुछ महिलाएं दिखी। लंबे समय बाद पहाड़ जाना हुआ तो मैं भी उन खेतों में चला गया। खेतों में कार्य करती महिलाओं से सवाल-जवाब में पड्याल पर चर्चा की। तो उन्होंने पड़्याल का सरल अर्थ सामूहिक श्रमदान बताया और कहा कि आज यह सब कहां है। पहले जब गांव के किसी एक व्यक्ति के खेत में बुवाई, निराई या कटाई का बड़ा काम होता था, तो पूरा गांव अपनी कुदाल और दराती लेकर उसके खेत में उतर आता है। बदले में कोई पैसा नहीं लिया जाता, बल्कि एक अटूट विश्वास होता है कि आज हम तुम्हारे खेत में हैं, कल तुम हमारे साथ होगे।
महिलाओं ने बताया कि पड़्याल केवल श्रमदान नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज की आत्मा थी। जब किसी परिवार के खेतों में रोपाई, गुड़ाई या कटाई का समय आता, तो गांव के लोग बिना किसी मजदूरी के मदद के लिए पहुंच जाते। बदले में वह परिवार भी दूसरे के खेतों में उसी तरह काम करता। इस परंपरा में न कोई हिसाब था और न कोई सौदा, केवल अपनापन और सहयोग था। रोपाई के दिनों में खेतों से आती महिलाओं की सामूहिक लोकगीतों की आवाजें पूरे गांव को जीवंत कर देती थीं। खेत काम का स्थान कम और मेल-मिलाप का केंद्र ज्यादा लगते थे। कोई पानी पिलाता, कोई बैलों को संभालता और कोई गीत गाते हुए थकान मिटाता। पहाड़ का कठिन जीवन इसी सामूहिक सहयोग से आसान बनता था।
बरसात के दिनों में रोपाई के समय खेतों में महिलाओं के लोकगीत गूंजते थे। पुरुष बैलों और हल के साथ खेत तैयार करते, जबकि महिलाएं कतार में धान रोपती थीं। खेतों में काम के साथ हंसी-मजाक और लोकसंस्कृति भी जीवित रहती थी। उत्तराखंड के पहाड़ों में प्रचलित पड़्याल प्रथा इसी एकजुटता का प्रतीक थी। लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ गई है।
आज के दौर में गांवों से पलायन बढ़ गया है और खेती बंजर होने लगी और आपसी मेलजोल की जगह भागदौड़ वाली जिंदगी ने ले ली। अब खेतों में जहां महिलाएं कार्य करती दिखती हैं वहां सामूहिक गीतों की आवाज कम और सन्नाटा ज्यादा सुनाई देता है। क्योंकि सभी महिलाओं ने अपने-अपने कानों पर मोबाइल की लीड लगाकर चुनके से गीतों का अपने आप आनंद लेती दिखती है। यही कारण है कि आज जब समाज में अकेलापन बढ़ रहा है।
महिलाएं बताती है कि जब पड़्याल जैसी परंपराएं थी उस समय लोगों में आपसी मेल-मिलाप, हसी-ठिठोली और पहाड़ का जीवन जीवंत था, लेकिन आज सब बदल गया है। पहले पहाड़ केवल प्राकृतिक सुंदरता का नाम नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन और आपसी सहयोग की संस्कृति का भी प्रतीक थे और पड्याल परंपरा केवल खेतों में काम करने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि इंसानियत और सामाजिक एकता की मिसाल थी, लेकिन आज वह सब कहा।
बुधवार, 13 मई 2026
‘काफल’ है प्रकृति का ‘अनमोल’ उपहार
उत्तराखंड के पहाड़ों की लाल मिठास और लोकजीवन की धड़कन है काफल
देवभूमि की संस्कृति, लोकगीतों और स्वाद में काफल का एक अलग ही स्थान
उत्तराखंड में 1200 से 2200 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिलता है काफल
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में मिलने वाला काफल प्रकृति का अनमोल उपहार है। यह फल केवल स्वाद नहीं देता, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, लोककथाओं और जीवन शैली को भी जीवित रखता है। काफल की लालिमा में पहाड़ की मिट्टी की महक और लोगों की भावनाएं बसती हैं। मसूरी, नैनीताल और अल्मोड़ा जैसे पर्यटक स्थलों के रास्तों पर काफल बेचते स्थानीय लोग पहाड़ों की जीवंत तस्वीर पेश करते हैं।
उत्तराखंड के पहाड़ केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, बर्फीली चोटियों और देवस्थलों के लिए ही प्रसि( नहीं हैं, बल्कि यहां की वन संपदा और लोक संस्कृति भी पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखती है। इन्हीं पहाड़ी धरोहरों में एक नाम है काफल। लाल-भूरे रंग का यह छोटा सा जंगली फल पहाड़ के लोगों के लिए केवल एक फल नहीं, बल्कि बचपन की याद, लोकगीतों की आत्मा और पहाड़ी जीवन की मिठास है। गर्मियों के मौसम में जब जंगलों में काफल पकता है, तो पहाड़ की वादियां इसकी खुशबू और रंग से जीवंत हो उठती हैं।
काफल हिमालयी क्षेत्रों विशेषकर उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल के पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है। उत्तराखंड में यह लगभग 1200 से 2200 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक मिलता है। इसका पेड़ मध्यम आकार का होता है और फल छोटे-छोटे लाल दानों की तरह दिखाई देते हैं। काफल का स्वाद मीठा और हल्का खट्टापन लिए होता है। यही स्वाद इसे बेहद खास बनाता है। इसे खाने के बाद जो ताजगी महसूस होती है, वह पहाड़ की ठंडी हवा जैसी लगती है।
काफल उत्तराखंड की लोक चेतना का हिस्सा है। एक लोककथा काफल पाको, मैं नी चाखो आज भी हर पहाड़ी की आँखों में आंसू ला देती है। यह कहानी एक माँ और बेटी के निस्वार्थ प्रेम और एक गलतफहमी के कारण हुए दुखद अंत की याद दिलाती है, जिससे काफल का भावनात्मक महत्व और बढ़ जाता है। काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान है। यह मध्यम आकार के पेड़ों पर गुच्छों में उगता है। काफल का स्वाद खट्टा-मीठा और बेहद रसीला होता है। इसे खाने का असली मजा तब है जब इसे सिलबट्टे पर पिसे हुए पहाड़ी नमक के साथ मिलाकर खाया जाए। नमक, मिर्च और सरसों के तेल का मिश्रण जब काफल की मिठास से मिलता है, तो वह स्वाद जुबान पर लंबे समय तक बना रहता है।
गर्मियों के दो महीनों में काफल ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आय का एक बड़ा जरिया बनता है। स्थानीय लोग सुबह-सुबह जंगलों से काफल तोड़ते हैं और फिर उन्हें टोकरियों में भरकर मुख्य सड़कों और बाजारों तक लाते हैं। यह पूरी तरह से प्राकृतिक है, इसलिए इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। काफल को तोड़ना कोई आसान काम नहीं है। इसके पेड़ ऊंचे और अक्सर ढलान वाले जंगलों में होते हैं। ग्रामीण महिलाएं और युवा अपनी जान जोखिम में डालकर इन पेड़ों पर चढ़ते हैं। काफल की शेल्फ-लाइफ बहुत कम होती है, इसलिए इसे तोड़ते ही तुरंत बाजार पहुँचाना पड़ता है।
काफल के पेड़ हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। यह मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और स्थानीय पक्षियों व वन्यजीवों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत हैं। विशेषकर काफल पाको पक्षी की आवाज जंगलों में काफल पकने की सूचना देती है। आज जलवायु परिवर्तन और जंगलों में लगने वाली आग के कारण काफल के पेड़ों पर संकट मंडरा रहा है। बेमौसम बारिश या अत्यधिक गर्मी से इसकी पैदावार प्रभावित हो रही है। इस लाल सोने को बचाने के लिए जंगली प्रजातियों का संरक्षण अनिवार्य है।
बाजार में काफल की लालिमा और आयुर्वेद
पहाड़ों में अप्रैल से जून के बीच काफल पकता है। गांवों के बच्चे सुबह-सुबह जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं। हाथों में छोटी टोकरी या कपड़ा लेकर वह पेड़ों पर चढ़ते हैं और काफल तोड़ते हैं। कई जगह महिलाएं और बच्चे इसे बाजारों में बेचते भी हैं। सड़क किनारे छोटी दुकानों में नमक और मसाले के साथ बिकता काफल यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। गर्मियों में उत्तराखंड के स्थानीय बाजार काफल की लालिमा से भर जाते हैं। आयुर्वेद में काफल को बेहद लाभकारी बताया गया है। इसमें एंटी-आक्सीडेंट्स की भरपूर मात्रा होती है। यह पेट की समस्याओं और कब्ज में रामबाण है। काफल के पेड़ की छाल का उपयोग चर्म रोग और जुकाम की दवा बनाने में होता है। यह फल तनाव कम करने और याददाश्त बढ़ाने में भी सहायक माना जाता है।
लोकजीवन की मिठास है काफल
शहरीकरण और पलायन के दौर में नई पीढ़ी धीरे-धीरे पहाड़ की पारंपरिक चीजों से दूर होती जा रही है। मोबाइल और इंटरनेट के समय में जंगल जाकर काफल तोड़ने की संस्कृति कम होती दिखाई दे रही है। फिर भी जब कोई पहाड़ लौटता है और सड़क किनारे काफल बेचती बुजुर्ग महिला दिखाई देती है, तो बचपन की यादें ताजा हो उठती हैं। काफल केवल फल नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा है। इसमें गांव की खुशबू, जंगल की ठंडक और लोकजीवन की मिठास छिपी है। आज जरूरत है कि काफल जैसे पारंपरिक फलों और वन संपदा को संरक्षित किया जाए। स्कूलों और गांवों में इसके पौधे लगाए जाएं। स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराया जाए और लोगों को इसके महत्व के बारे में जागरूक किया जाए।
मंगलवार, 12 मई 2026
‘तिबारी’ पहाड़ में घरों की ‘आत्मा’
तिबारी बरामदा नहीं, पहाड़ की सामाजिक चौपाल
लकड़ी की नक्काशी में बसती थी पहाड़ की कला
पलायन और आधुनिकता ने छीनी तिबारी की रौनक
देहरादून। उत्तराखंड के पारंपरिक पहाड़ी घर केवल पत्थर, लकड़ी और मिट्टी से बने मकान नहीं होते थे, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, जीवनशैली और सामाजिक रिश्तों की जीवित तस्वीर होते थे। इन्हीं पारंपरिक घरों की सबसे खास पहचान होती थी तिबारी। आज आधुनिकता की दौड़ में तिबारी धीरे-धीरे पहाड़ के घरों से गायब होती जा रही है, लेकिन एक समय ऐसा था जब हर पहाड़ी घर की रौनक और आत्मा तिबारी ही होती थी।
तिबारी पहाड़ी घर का खुला बरामदा या लकड़ी से बना सामने का हिस्सा होता था। इसे घर की ऊपरी मंजिल में बनाया जाता था, जहां से दूर-दूर तक पहाड़, खेत और गांव दिखाई देते थे। लकड़ी की खूबसूरत नक्काशीदार खिड़कियां और मजबूत खंभे इसकी पहचान होते थे। तिबारी केवल बैठने की जगह नहीं थी, बल्कि यह पहाड़ के सामाजिक जीवन का केंद्र हुआ करती थी। यहां परिवार के लोग बैठकर बातें करते, मेहमानों का स्वागत होता, बच्चे खेलते और बुजुर्ग गांव की खबरों पर चर्चा करते थे।
पुराने समय में जब गांवों में टीवी, मोबाइल और इंटरनेट नहीं थे, तब तिबारी ही लोगों के मेलजोल का सबसे बड़ा स्थान होती थी। शाम होते ही गांव के लोग तिबारी में बैठकर लोकगीत गाते, ढोल-दमाऊ की थाप पर सांस्कृतिक चर्चाएं होतीं और गांव के सुख-दुख साझा किए जाते। तिबारी ने पहाड़ की सामूहिक संस्कृति को जीवित रखने में बड़ी भूमिका निभाई। यहां रिश्ते बनते थे, परंपराएं आगे बढ़ती थीं और नई पीढ़ी बुजुर्गों से लोककथाएं और जीवन के अनुभव सुनती थी।
तिबारी केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृदृष्टि से भी बेहद उपयोगी होती थी। पहाड़ की जलवायु को ध्यान में रखकर इसका निर्माण किया जाता था। गर्मियों में यहां ठंडी हवा मिलती थी, जबकि सर्दियों में धूप का आनंद लिया जाता था। लकड़ी और पत्थर से बने यह घर पर्यावरण के अनुकूल होते थे। तिबारी में बड़ी खिड़कियां और खुलापन होने के कारण घर में प्राकृतिक रोशनी और हवा आसानी से आती थी। यह पहाड़ की पारंपरिक वास्तुकला की अनूठी पहचान थी।
समय बदला, सीमेंट के मकान बनने लगे और पहाड़ की पारंपरिक वास्तुकला धीरे-धीरे पीछे छूटने लगी। आज नए घरों में तिबारी की जगह बालकनी और आधुनिक डिजाइन ने ले ली है। पलायन ने भी इस परंपरा को गहरा आघात पहुंचाया। गांव खाली होने लगे और कई पुराने घर खंडहर बन गए, जिन तिबारियों में कभी लोकगीत गूंजते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा दिखाई देता है। तिबारी केवल एक निर्माण शैली नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत है। यह पहाड़ के सामूहिक जीवन, अपनापन और प्रकृति से जुड़े रहने की सोच का प्रतीक रही है। आज जरूरत इस बात की है कि नई पीढ़ी को तिबारी और पारंपरिक पहाड़ी वास्तुकला के महत्व से परिचित कराया जाए। यदि आधुनिक निर्माण में पारंपरिक शैली को जोड़ा जाए, तो यह विरासत फिर से जीवित हो सकती है।
पहाड़ के घरों की तिबारी केवल लकड़ी का बरामदा नहीं थी, बल्कि वह रिश्तों की गर्माहट, संस्कृति की पहचान और प्रकृति से जुड़े जीवन का प्रतीक थी। बदलते समय के साथ भले ही तिबारियां कम होती जा रही हों, लेकिन पहाड़ की यादों और लोकसंस्कृति में उनका स्थान आज भी अमिट है।
बाक्स
---तिबारी के नक्काशीदार खंभों में आज भी बुजुर्गों की यादें और पहाड़ की संस्कृति की महक
---गांव के बुजुर्ग अक्सर दोपहर की धूप सेंकने या गांव की गपशप के लिए बैठते थे तिबारी में
---घर की ध्याण विदा होते समय अक्सर अपनी तिबारी की लकड़ी को छूकर आशीर्वाद लेती थीं।
सोमवार, 11 मई 2026
सूनी बूढ़ी आंखों को ‘लाल’ का इंतजार
शहरों की नींव में दफन हो रहे हैं पहाड़ के गांवों के पुश्तैनी आंगन
रोजगार की तलाश में शहर गए बेटे, गांव में अकेले रह गए मां-बाप
बुजुर्ग आंखें आज भी हर बस और हर कदम में तलाशती हैं अपनों को
आज के दौर में वीडियो काल को बना दिया है डिजिटल आत्मीयता
देहरादून। पहाड़ की ऊंची चोटियों पर जब कोहरा उतरता है, तो पहाड़ के किसी दूरस्थ गांव की एक धुंधली सी खिड़की में एक बूढ़ा चेहरा टकटकी लगाए नीचे सड़क की ओर देखता मिलता है। वह सड़क जो सालों पहले उनके बेटे को साहब बनाने के लिए शहर ले गई थी। आज सड़क तो चकाचक डामर वाली हो गई है, लेकिन उस पर चलने वाले कदम अब गांव की ओर कम और शहर की ओर ज्यादा बढ़ते हैं।
उत्तराखंड के हजारों गांवों की यही कहानी है। पलायन ने सिर्फ गांव खाली नहीं किए, उसने मां-बाप के जीवन से सहारा भी छीन लिया। जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, आज वही हाथ बुढ़ापे में सहारे को तरस रहे हैं। कई बुजुर्ग ऐसे हैं, जिनके बच्चे साल में सिर्फ एक-दो बार गांव आते हैं। पहाड़ में पलायन ने केवल गांव खाली नहीं किए, उसने बुढ़ापे का लाठी भी छीन ली है। आज उत्तराखंड के हजारों बुजुर्ग पहरेदार बनकर रह गए हैं। वह अपनी पुश्तैनी जमीन और खंडहर होते मकानों की रखवाली कर रहे हैं इस उम्मीद में कि शायद किसी मोड़ पर उनका लाल वापस आएगा।
यह पहाड़ की आज की हकीकत है दो बूढ़े चेहरे एक-दूसरे को निहारते हुए रात काट लेते हैं। आज पहाड़ के गांवों में रिश्तों की डोर व्हाट्सएप वीडियो काल पर टिक गई है। रविवार के दिन जब नेटवर्क साथ देता है, तो शहर में बैठा बेटा चंद मिनटों के लिए अपने बच्चों को दादा-दादी का चेहरा दिखाता है। आज के दौर में बीमार मां या पिता को अस्पताल ले जाने के लिए अब बेटा नहीं, बल्कि गांव का कोई पड़ोसी या टैक्सी वाला सहारा बनता है।
आज गांवों तक सड़क पहुँची तो उम्मीद जागी थी कि दूरियां घटेंगी। लेकिन विडंबना देखिए इन्हीं सड़कों पर सवार होकर पहाड़ की जवानी मैदानों की ओर ऐसी उतरी कि फिर मुड़कर वापस नहीं आई। पीछे छूट गए वह बूढ़े मां-बाप जिन्होंने तिनका-तिनका जोड़कर अपने बच्चों को इस काबिल बनाया कि वह शहर जा सकें। आज उन्हीं बच्चों के पास अपने उन माता-पिता के लिए वक्त नहीं है, जिन्होंने अपनी पूरी उम्र पहाड़ की पथरीली खेती और अभावों में काट दी।
रविवार, 10 मई 2026
‘रोते’ पहाड़ की सूनी ‘पगडंडियां’
खाली आंगन, सूने खेत और लौटते कदमों का इंतजार करता पहाड़
पहाड़ के गांवों से शहरों की ओर बहता जीवन, पीछे छूट गया घर-आंगन
देहरादून। पहाड़ की सुबह आज भी उतनी ही खूबसूरत है। सूरज की पहली किरण जब सीढ़ीनुमा खेतों पर पड़ती है, तो लगता है मानो प्रकृति ने सोने की चादर बिछा दी हो। लेकिन आज इस चमक के पीछे एक गहरा सन्नाटा छिपा हैकृवीरान पगडंडियों का सन्नाटा, बंजर खेतों का सन्नाटा और खाली होते गांवों का सन्नाटा। समय का पहिया ऐसा घूमा कि जो रास्ते कभी घर की ओर ले जाते थे, आज वही पलायन की गवाही दे रहे हैं।
गांव के ऊपर वाले खेतों में अब हल की गूँज सुनाई नहीं देती। वह सीढ़ीदार खेत, जिन्हें पुरखों ने अपने पसीने से सींचकर सोना उगाने लायक बनाया था, आज बंजर पड़े हैं। वहां अब मंडुवा और झंगोरा नहीं, बल्कि जंगली घास उग आई है। पहाड़ के बंजर खेत सिर्फ खेती का संकट नहीं हैं, वह टूटते रिश्तों की कहानी भी हैं। जब गांव से युवा गए, तो खेत भी अकेले पड़ गए। पहले जिन खेतों में त्योहारों के गीत गूंजते थे, वहां अब बंदरों और जंगली सूअरों का आतंक है। मेहनत से बोई फसल रातों-रात उजड़ जाती है। धीरे-धीरे लोगों ने खेती छोड़ दी। शाम ढलते ही गांव का सन्नाटा और भारी हो जाता है। बंद घरों पर लगे ताले हवा में हिलते हैं। आंगन सूने हैं, चूल्हों का धुआं गायब है। गांव की बूढ़ी आंखें हर मोड़ पर किसी अपने के लौटने की राह देखती हैं।
पहाड़ के गांवों की वीरान पगडंडियां सिर्फ रास्ते नहीं हैं, बल्कि उन अधूरे सपनों की गवाह हैं जो रोजगार, शिक्षा और बेहतर जिंदगी की तलाश में शहरों की ओर निकल गए। बरसों पहले जिन खेतों में गेहूं और मंडुवा लहलहाता था, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं। बंदरों और जंगली सूअरों ने खेती की बची उम्मीद भी तोड़ दी।
उत्तराखंड के पहाड़ों में आज सबसे बड़ा दर्द सिर्फ पलायन नहीं, बल्कि धीरे-धीरे खत्म होती गांव की आत्मा है। वीरान पगडंडियां और बंजर खेत एक खामोश सवाल बनकर आज खड़े हैं। आज भी हर साल गर्मियों में जब शहरों से कुछ लोग अपने गांव लौटते हैं, तो पगडंडियां फिर थोड़ी देर के लिए मुस्कुराती हैं। बच्चों के कदम पड़ते हैं, घरों के आंगन खुलते हैं और बूढ़ी आंखों में चमक लौट आती है। गांव जैसे फिर से जी उठता हैकृकुछ दिनों के लिए ही सही।
सूबे में चढ़ने लगा ‘सियासी’ पारा
फ्लैग--चुनावी साल में दल-बदल की राजनीति से अटकलों का बाजार गर्माया
चुनाव की घोषणा से पहले दलों की राजनैतिक तैयारी
भाजपा और कांग्रेस में चलने लगा दल-बदल का खेल
अब दिनभर लगने लगी दलों के मुख्यालयों में भारी भीड़
देहरादून। चुनावी साल में दल-बदल आम बात है और यह राजनीति सभी दलों में देखने को मिलती है। प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के इस ‘खेल’ से जहां सियासी पारा चढ़ने लगा है। चुनाव की घोषणा से पहले दलों की राजनैतिक तैयारी का मतलब ‘हम ही हम हैं बाकी सब कम है’ का संदेश होता है।
प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। सत्तारूढ़ भाजपा की तैयारी जहां सभी सीटों पर जीत दर्ज करने की है वही कांग्रेस भी पीछे कहा रहने वाली है। यही कारण है कि दोनों दलों में तोड़फोड़ अभी से शुरू हो चुकी है, जबकि अभी चुनाव की तारीख तक घोषित नहीं हुई है। चुनावी साल है और इस समय किसी भी कमी का मतलब खतरा होता है। शायद यही कारण है कि दोनों दल सक्रिय हो गए है।
राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो चुनाव की घोषणा से पूर्व सभी राजनैतिक दल जनता में यह संदेश देना चाहते है कि उनका दल सबसे अच्छा है। इसी कारण दल-बदल की राजनीति पर दलों का चुनाव से पूर्व जोर रहता है। सूत्रों की माने तो भाजपा और कांग्रेस में तो दल-बदल की राजनीति को एक मिशन के रूप में लिया जाता है। दलों में इसके लिए स्पेशल विंग तैयार की जाती है, जिसका काम सिर्फ दूसरे दल के लोगों को अपने दल में शामिल करवाना होता है।
अकेले भाजपा की बात करें तो भाजपा संगठन और सरकार की उपलब्धियों को लेकर अपनी तैयारी कर रही है। वही दूसरी ओर कांग्रेस सरकार की नाकामी को मुद्दा बनाकर आमजन के बीच जाकर तोड़फोड़ में लगी है। आजकल कोई ऐसा दिन नहीं है जब एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का क्रम जारी न हो। इसके साथ ही राजनैतिक दलों के मुख्यालयों में पार्टी ज्वांइन करने वालों की लंबी लाइनें न लगी हों। हालांकि मतदाता सब समझता है कि चार साल तक जिसे दुत्कारा जा रहा था आजकल एकदम से वह पूज्यनीय कैसे बन गया। चुनावी साल है और इस समय कुछ भी हो सकता है।
कई लोगों ने ली भाजपा की सदस्यता
भाजपा मुख्यालय में ज्वाइनिंग कार्यक्रम में पाटीं के वरिष्ठ नेता एवं बीस सूत्रीय क्रियान्वहन समिति के उपाध्यक्ष ज्योति गैरोला एवं प्रदेश महामंत्री कुंदन परिहार ने कई लोगों को भाजपा की सदस्यता दिलाई।
भाजपा का दामन थामने वालों में पूर्व लेबर डिप्टी कमिश्नर सुरेश आर्य ने कहा कि पूरी सर्विस के दौरान मुझे लोगों की सेवा का अवसर मिला है। सेवानिवृत्ति के बाद भी में सेवा के कामों को आगे बढ़ाना चाहता था, जिसके लिए मुझे सर्वश्रेष्ठ पार्टी भाजपा महसूस हुईई। पीएम मोदी जैसा नेतृत्व और राज्य में धामी जैसे कर्मशील मुख्यमंत्री, हम सबके यहां आने की महत्वपूर्ण वजह है। भाजपा की सदस्यता लेने वालों में नरेश भारद्वाज आकाश पवार, राहुल पाल, रोशन, अंशुल तिवारी, अंकित तिवारी, पीयूष चौहान, सुनील चौहान, बृजेश कुमार, हिमांशु चंद्र, दीपक कुमार, गोपाल राम, कैलाश चंद्र, चयनिका आर्य, प्रियंका आर्य, भावना आर्य, कैलाश कुमार, सुंदर सिंह, गणेश मेहरा, वीरेंद्र कुमार, जीवन सिंह रावत, सरिता आर्या, मीनू आर्य, ज्योति तिवारी, गीता तिवारी, विक्रम सिंह, कुलदीप सिंह, मेजर सिंह, प्रीतम सिंह, कश्मीर सिंह, संजीव चौहान, कुलविंदर सिंह आदि थे।
‘नेताओं’ को मिल गया ‘रोजगार’
विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले ही नेताओं की पौ बारह
सभी दलों ने अपने छोटे-बड़े सभी नेताओं को मैदान में उतारा
चुनाव लड़ने वाले संभावित प्रत्याशियों ने कर ली है पूरी तैयारी
देहरादून। प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा होनी अभी बाकी है, लेकिन चुनावी साल में नेताओं को समय से पहले ही ‘रोजगार’ मिल गया है। देश की प्रमुख पार्टियों भाजपा हो या कांग्रेस या फिर अन्य दल सभी दलों ने विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। दलों ने अपने छोटे-बड़े सभी नेताओं को मैदान में उतार दिया है। इससे जहां छुटभैया नेताओं सहित कार्यकर्ताओं की मौज आ गई है। अर्थात समय से पहले ‘रोजगार’ मिलने से सभी खुश नजर आ रहे हैं।
बता दें कि उत्तराखंड सहित देश के पांच राज्यों में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने है। इस चुनाव के लिए सभी दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। दलों ने जमीनी कार्यकर्ताओं से लेकर बडे़ नेताओं को जमीन पर उतारने की रणनीति के साथ बूथ स्तर तक टीम खड़ी कर दी है। इसके साथ ही अपने-अपने क्षेत्र में चुनाव लड़ने वाले संभावित प्रत्याशियों ने भी पूरी तैयारी कर ली है। संभावित प्रत्याशियों ने अपने कार्यकर्ताओं के लिए ‘लंगर’ लगाने के साथ-साथ उनकी सुख-सुविधाओं का भी विशेष ख्याल रखा जा रहा है। संभावित प्रत्याशियों ने अभी से जमीनी कार्यकर्ताओं को रोजगार दे दिया है कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अकेले भाजपा की बात करें तो भाजपा की प्रदेश में सरकार है और उसके पास प्रयाप्त संसाधन भी है। इसी के चलते सबसे पहले भाजपा ने अपने सभी संसाधनों को चुनाव की घोषणा से पूर्व सक्रिय कर दिया है। भाजपा ने अपने नेताओं को जहां जिलों की कमान दी है वही जमीनी कार्यकर्ताओं को भी बूथ स्तर तक सरकार की योजनाओं की जानकारी के साथ भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए कह दिया है। इसके साथ ही भाजपा ने बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक कार्यक्रमों को आयोजन कर चुनावी माहौल तैयार कर दिया है। इसके लिए प्रदेश में भाजपा अलग-अलग स्थानों पर अपने बडे़ नेताओं की जनसभाएं भी आयोजित करने लग गई है। ताकी आगामी विधानसभा चुनाव में जीत के लिए अभी से माहौल तैयार हो सके।
दूसरी ओर कांग्रेस भी मैदान में कूद गई है। हालांकि अभी कांग्रेस के अंदर एकजुटता का अभाव दिख रहा है, लेकिन उसके बाद भी कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस के बडे़े नेताओं के साथ-साथ जमीन से जुडे़ नेताओं को एकजुट कर बूथ स्तर तक पकड़ को मजबूत करने में लगे हुए हैं। यह अलग बात है कि कांग्रेस अध्यक्ष अपनी टीम लंबे समय बाद भी तैयार नहीं कर पाए है। इसके बाद भी प्रदेश अध्यक्ष प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर जाकर कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के साथ-साथ सरकार की नाकामियों को जिक्र कर जनता को भाजपा की नामामियां गिनाकर कांग्रेस के पक्ष में खड़ा कर रहे है।
वही चुनावी साल में अन्य दल भी अपनी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरने के लिए जोर लगा रहे हैं। प्रदेश के एकमात्र क्षेत्रिय दल यूकेडी की यूथ ब्रिगेड ने तो एक साल पहले ही चुनाव का माहौल तैयार कर दिया था और गांव-गांव जाकर लोगों को इस बार चुनाव में भाजपा-कांग्रेस को दरकिनार करने का आहवान कर रही है। यूकेडी के साथ अभी आमजन का भी पूरा समर्थन मिल रहा है, लेकिन चुनाव के समय यह जनसमर्थन मिलेगा या नहीं यह तो समय ही बताएगा।
वैसे भी चुनाव छोटा हो या फिर बड़ा, जमीनी कार्यकर्ताओं के बिना जीत पाना आसान नहीं होता है। शायद यही कारण है कि संभावित प्रत्याशियों ने कार्यकर्ताओं के एकजुट करने के साथ-साथ गांव-गांव दस्तक दे दी है, जिसका विधानसभा चुनाव में उनको फायदा मिलेगा।
उत्तराखंड के इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार
मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष में हो रही हैं भारी अनियमितताएं: डा. हरक सिंह
कहा-उधमसिह नगर और चम्पावत जनपदों में ही मिल रहा है मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष का लाभ
इन जिलों में भाजपा से जुडे हुए पदााधिकारियों और उनके परिजनों को प्रतिवर्ष मिल रहा है मुख्यमंत्री विवेकाधीनकोष से लाभ
देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड के इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष में हो रहा है। अगर मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए ताकि सच्चाई जनता के सामने आ सके।
पत्रकारों से बातचीत में डा.रावत ने सूचना के अधिकार के तहत मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष के प्राप्त दस्तावेजों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष में भारी अनियमितता हुई है। दस्तावेजों के अनुसार केवल उधम सिंह नगर और चंपावत जिलों के आंकड़े ही यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि इस कोष की किस प्रकार बंदरबांट की जा रही है। उन्होंने बताया कि सूचना के अधिकार में उधम सिंह नगर और चम्पावत जनपद से सूचनाएं मागी गई कि किन-किन लाभार्थियों को मुख्यमंत्री विवेकाधिन कोष का लाभ मिला है। पहले तो सूचनाएं देने में विलंब किया गया फिर आधी अधूरी सूचनाएं दी गई, लेकिन जो सूचनाए प्राप्त हुईई वह बहुत चौकाने वाली व लंबी सूची है।
उन्होंने बताया कि उधमसिह नगर और चम्पावत जनपद मुख्यमंत्री से संबंधित जनपद है, क्योकि खटीमा से वह पहले विधायक रहे है और चम्पावत से वर्तमान में विधायक है और दोनो ही जनपदों में भाजपा से जुडे हुए पदााधिकारियों और उनके परिजनों को प्रतिवर्ष मुख्यमंत्री विवेकाधीनकोष से लाभ दिया जा रहा है जो जनता के धन का दुरुप्रयोग है।
उन्होंने सीएम विवेकाधीन कोष के लाभार्थियों के नाम भी गिनाये, जिसमें सुबोध मजुमदार, भारत सिह, गोदावरी, कान्ता रानी, भरत बांगा, कामील खान, गजेन्द्र सिह बिष्ट, पूरन सिह, संतोष कुमार अग्रवाल,ं मुकेश शर्मा, शान्ता बडोला, राजेन्द्र प्रसाद आदि को 05 लाख रुपए और हयात सिह मेहरा जो भाजपा कापरेटिव से संबंधित है, को 04 लाख रुपए की सहायता दी गईई है। इसके अतिरिक्त तारा देवी, जसवीर चौधरी, निकिता खडायत, कुसुम देवी, हेम लता जैसे लाभार्थियों को भी 04 लाख, 03 लाख, 02 लाख जैसी बडी रकम दी गई। चम्पावत मंेे बिना नाम के व्यक्ति को 2023-24 में 03 लाख और एक जगह चम्पावत में ही अध्यक्ष नाम से 02 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी गई है। उन्होंने कहा कि यह तो मात्र चंद उदाहरण रखे गए है, पूरी सूची चौकाने वाली है। इससे साबित होता है कि उत्तराखंड के इतिहास का यह सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है।
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कांग्रेस का ट्रैक रिकार्ड जगजाहिर
भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान ने कहा कि मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष को लेकर कांग्रेस का ट्रैक रिकार्ड जगजाहिर है और उसे दो कार्यकाल मे जनता ने इसी वजह से सबक सिखाया था। कांग्रेस को पुराने कार्यकाल को याद करने की जरूरत है। चौहान ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि पहली निर्वाचित कांग्रेस सरकार मे राज्य से बाहर दूसरे प्रदेश मे भी राहत कोष बंटा और जमकर सरकारी धन की बंदरबांट हुई। यही कारण रहा कि आखिकार जनता ने कांग्रेस को विदा कर दिया। उन्होंने कहा कि 2012 मे कांग्रेस सरकार आई तो सिलसिला नहीं रुका। सीएम के अलावा तत्कालीन विस अध्यक्ष ने अपनी विस क्षेत्र में करोड़ो रुपये अपने चहेतों को बांट दिये। लेकिन तब जनता ने ऐसा सबक कांग्रेस को सिखाया कि वह अस्तित्व की तलाश मे जूझ रही है। अब भाजपा को विवेकाधीन कोष के मामले मे कांग्रेस मिथ्या आरोपों के जरिये घेरने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेसियों की ‘सियासी स्वाद’ से दूरी
राजनैतिक बयानबाजी से मचे घमासान से कांग्रेसी अभी भी चुप
कांग्रेस नेता हरीश रावत ने आयोजित की थी दून में फल पार्टी
कांग्रेस के बडे़ नेताओं के नहीं पहुंचने से आपसी ‘खटास’ दिखी
देहरादून। कांग्रेस नेताओं के बीच बयानबाजी से मचा घमासान जारी है। कांग्रेसियों के लिए पूर्व सीएम हरीश रावत द्वारा आयोजित ‘सियासी स्वाद’ पार्टी में कांग्रेस के बडे़े नेताओं ने दूरी बनाए रखी, जबकि राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस पार्टी का आयोजन कांग्रेस में मचे घमासान को कम करना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस के बडे़ नेताओं के पार्टी में नहीं पहुंचने से आपसी ‘खटास’ साफ देखी गई।
बता दें कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व सीएम हरीश रावत ने फल पार्टी का आयोजन किया था। इसका मकसद सभी कांग्रेस नेताओं को एकजुट कर चुनाव के लिए एकता का संदेश देना था, लेकिन पार्टी में समर्थक और कार्यकर्ता तो भारी संख्या में पहुंचे मगर पार्टी के बडे़ नेताओं की नाराजगी पार्टी में नहीं आने से साफ दिखी।
ज्ञात हो कि पूर्व सीएम हरीश रावत पार्टी से नाराज होकर राजनैतिक अवकाश पर चले गए थे। इसके बाद पार्टी में बयानबाजी का दौर शुरू हुआ और यह बडे़ घमासान के रूप में सामने आयी। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के सूबे में बैठकों के माध्यम से पार्टी में एकता का संदेश दिया गया, लेकिन यह जमीन पर कही नहीं दिखा। हरदा की फल पार्टी से यह साबित हो गया कि कांग्रेस में अभी भी अंदर खाने खटपट चल रही है और यह आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बडे़ खतरे का संकेत है।
राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो हरदा के राजनैतिक अवकाश के बाद कांग्रेस को एकजुट करने के लिए हरदा की फल पार्टी राजधानी में आयोजित की गई। लेकिन इस पार्टी में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह, चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरक सिंह रावत सहित कई बडे़ नेता उपस्थित नहीं थे। इससे साफ संकेत जाता है कि कांग्रेस पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है और यह पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं है।
दूसरी ओर राजनैतिक विशेषज्ञों की मानें तो राजनीतिक अवकाश के बाद आयोजित हरदा की फल पार्टी से एक बड़ा संदेश जा रहा है कि अब हरीश रावत फिर से राजनीति में सक्रिय हो गए हैं। पार्टी का आयोजन कर स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के साथ ही आम जनता से जुड़ने की कोशिशें कर चुके हैं। एक बार फिर अपनी राजनीतिक सक्रियता का संदेश तो दिया गया, लेकिन पार्टी में कांग्रेस के बडे़ नेताओं की अनुपस्थिति से यह भी संदेश गया है कि घमासान अभी कम नहीं हुआ है।
चुनावी मोड में भाजपा और कांग्रेस
बीजेपी बना रही है हैट्रिक लगाकर तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने का प्लान
कांग्रेस अपनी खोयी हुई जमीन तलाशने और सत्ता वापसी की बना रही रणनीति
कांग्रेस चुनावी तैयारियों में जुटी, बीजेपी नजर रही पूरी तरह से चुनावी मोड में
देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 की हालांकि अभी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस अभी से मैदान में कूद गए है। 2027 का विधानसभा चुनाव बीजेपी और कांग्रेस के लिए अहम है। बीजेपी 2027 में हैट्रिक लगाकर तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने का प्लान कर रही है, तो वहीं कांग्रेस अपनी खोयी हुई जमीन तलाशने में लगी हुई है, ताकि उसे भी सत्ता वापस मिल सके।
चुनावी साल में कोई कोर-कसर बाकी न रहे इसके लिए राजनैतिक दल समय से पहले ही अपनी तैयारियों में लग जाते है। प्रदेश में कांग्रेस भले ही अभी चुनावी तैयारियों जुटी हो, लेकिन बीजेपी पूरी तरह से चुनावी मोड में नजर आ रही है। भाजपा सत्ता को अपने पास रखने की रणनीति पर काम कर रही है और कांग्रेस खोई जमीन तलाशने के लिए जंग के मैदान में कूद गई है। हालांकि दोनों दलों के अंदर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। इसके बाद भी दोनों दल चुनावी मोड में दिख रहे है। कांग्रेस के साथ भाजपा अपने बडे़ नेताओं का दौरा करवाने में लगे है।
अकेले भाजपा की बात करें तो चुनाव से पहले सरकार की उपलब्धियों को व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करने की भाजपा और सरकार तैयारी कर रही है। प्रदेश सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि राज्य में बुनियादी ढांचे, पर्यटन, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी योजनाओं को गति दी गई है और कई परियोजनाएं अब जमीन पर दिखाई देने लगी हैं। चुनावी साल में भाजपा को जनता के बीच जाना है और इसके लिए रणनीति पहले से अगर पक्की नहीं होगी तो भाजपा को इसके दुष्परिणाम देखने को मिल सकते है। इसके लिए भाजपा सरकार की उपलब्धियों को अपना चुनावी हथियार बनाने की दिशा में कार्य कर रही है।
दूसरी ओर सरकार की इस कवायद पर विपक्षी दल कांग्रेस ने सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस का कहना है कि सरकार केवल दावे कर रही है, जबकि धरातल पर विकास कार्यों की स्थिति उतनी मजबूत नहीं है। कांग्रेस ने सरकार से मांग की है कि वह अब तक किए गए कामों का पूरा लेखा-जोखा जनता के सामने रखने के लिए श्वेत पत्र जारी करे। कांग्रेस की इस मांग को हालांकि भाजपा सिरे से खारिज कर रही है, लेकिन कांग्रेस के आक्रामक रूख के चलते भाजपा के लिए यह समस्या बड़ी हो सकती है।
प्रदेश में विधानसभा चुनाव कब होंगे इसकी अभी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन लगभग एक साल का समय अभी है और इसी के चलते भाजपा और कांग्रेस अभी से चुनावी मोड में आ गए है। प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा सरकार के कामों को लेकर जनता के बीच जाएगा और चुनावी रण में जीत के लिए दाव खेलेगी। वही कांग्रेस सरकार के कामों को नाकामी बताते हुए मैदान में कूदेगी। आने वाले समय में चुनावी रण में भाजपा और कांग्रेस की रणनीति देखने को मिलेगी और विधानसभा चुनाव की घोषणा तक यह जंग के रूप में बदल जाएगी।
‘सब कुछ ठीक नहीं’
फ्लैग--भाजपा-कांग्रेस में पार्टी कार्यकर्ता नाराज, दलों को छोड़ने का सिलसिला शुरू
क्रासर--सूबे में 2027 में विधानसभा चुनाव से पहले राजनैतिक दलों में हलचल शुरू
--भाजपा के असंतुष्ठ बने भाजपा के लिए मुसीबत, कांग्रेस के कार्यकर्ता भी है नाराज
--कांग्रेस में प्रदेश की टीम का अता-पता नहीं, भाजपा से भी जमीनी कार्यकर्ता हैं नाखुश
देहरादून। प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनावी साल में राजनैतिक दलों में सब कुछ ठीक नहीं है। एक ओर जहां पार्टियों खासकर भाजपा और कांग्रेस में दलों के जमीनी कार्यकर्ता नाराज हैं, वहीं पार्टी छोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया है। चुनावी साल में दलों में हलचल से पार्टियों के लिए बड़ी समस्या है।
बता दें कि राज्य गठन के बाद से सूबे में बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस ने राज किया है। राज्य गठन को लेकर आमजन की भावना के अनुरूप राज्य आज दिन तक नहीं बना, लेकिन दोनों दलों ने आमजन में अपनी पकड़ मजबूत की। इसी के चलते दलों को सत्ता का सुख भोगने को मिला। सबसे बड़ी बात यह है कि आमजन को पता है कि राज्य उनकी भावनाओं के अनुरूप नहीं बना और विकास भी राजनैतिक दलों के हिसाब से हो रहा है। उसके बाद भी लोग दलों के साथ जुडे़ हैं और हर चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को सपोट करते आ रहे है।
प्रदेश में जहां भाजपा ने राज्य बनने के बाद अपनी मजबूत पकड़ बनायी वही कांग्रेस के पुराने कार्यकताओं के चलते सूबे में खुद को मजबूत रखने में आज दिनतक कायम है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव राज्य की जनता पर पड़ा और भाजपा का परिवार बढ़ता गया। आज भाजपा की प्रदेश में सरकार है, लेकिन सरकार के कामकाज को लेकर आमजन नाराज तो है ही भाजपा के अपने जमीनी कार्यकर्ता भी नाराज चल रहे हैं। इसके कई उदाहरण पिछले कुछ समय से सामने आ रहे है। भाजपा में सिर्फ जमीनी कार्यकर्ता ही नहीं पदाधिकारी से लेकर पूर्व मंत्री से लेकर आम कार्यकर्ता भी नाराज चल रहे हैं।
यही हाल कांग्रेस का भी है। कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है यह हमारा दावा नहीं बल्कि कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं का है। एक तो सत्ता से लंबे समय से दूरी कांग्रेस हाईकमान की नीतियां जमीनी कार्यकर्ता बताते है। वही दूसरी और प्रदेश नेतृत्व को भी इसके लिए जमीनी कार्यकर्ता जिम्मेदार मानते हैं। कांग्रेस जहां अपनी रणनीति नहीं बना पा रही है वहीं नेतृत्व और अनावश्यक बयानबाजी भी दल के लिए खतरा बनता जा रहा है। इससे भी कार्यकर्ता नाराज नजर आ रहे हैं।
चुनावी साल में भाजपा और कांग्रेस में जमीनी कार्यकर्ताओं की नाराजगी दलों को भारी पड़ सकती है। क्योंकि एक ओर जहां भाजपा लगातार दो बार विधानसभा चुनाव में विजय हासिल कर सरकार में है और उसके जमीनी कार्यकर्ता नाराज चल रहे हैं उससे भाजपा को विधानसभा चुनाव में इसका असर देखने को मिल सकता है। दूसरी और कांग्रेस ने प्रदेश हाईकमान तो बदला, लेकिन लंबे समय बाद भी टीम को तैयार नहीं कर पाना यह दर्शाता है कि दल में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है और आने वाले विधानसभा चुनाव में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी’
क्रासर--भाजपा नेता अजेंद्र की नई सोशल मीडिया पोस्ट ने राजनैतिक गलियारों में मचाया तहलका
--पार्टी के लिए ‘अपने’ ही मुसीबत खड़ी करते आ रहे है और इसे हलके में ले रही है पार्टी
--सोशल मीडिया पोस्ट में दस्तावेजों और विषयों को सार्वजनिक करने की बात भी लिखी
देहरादून। अंतरकलह से गुजर रही भाजपा के लिए कफील आज़र अमरोहवी के गजल की यह लाइन ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी’ आने वाले चुनाव में भारी पड़ सकती है। चुनावी साल में सभी पार्टियां जहां सोच-समझकर कार्य करती है वही भाजपा अपनों के रूठने को हलके में ले रही है। लंबे समय से भाजपा के लिए उसके ‘अपने’ ही मुसीबत खड़ी करते आ रहे है और पार्टी इसे चुनावी साल में हलके में ले रही है। हाल ही में भाजपा नेता अजेंद्र अजय की सोशल मीडिया पोस्ट की चर्चा जहां राजनैतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई थी। इसके बाद भाजपा नेता अजेंद्र की नई सोशल मीडिया पोस्ट ने फिर से राजनैतिक गलियारों में तहलका मचा दिया है।
बता दें कि भाजपा के वरिष्ठ नेता अजेंद्र अजय की नई सोशल मीडिया पोस्ट से राज्य में हलचल पैदा कर दी है। सूत्रों के अनुसार भाजपा नेता अजेंद्र अजय, पार्टी और सरकार से नाराज चल रहे हैं। भाजपा नेता अजेंद्र अजय का कहना है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त किया था। इसके बाद से ही उन्हें हर तरह से घेरने का प्रयास किया जा रहा है। अजेंद्र अजय ने लिखा है कि कि उनके बारे में मीडिया एवं सोशल मीडिया के जरिए यह भी प्रचारित करने की कोशिश हो रही है कि अजेंद्र अजय फलां गुट का है और फलां का आदमी है।
सोशल मीडिया पोस्ट में अजेंद्र अजय ने लिखा है कि किन विषयों को लेकर उनकी नाराजगी है, इस बात को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के साथ ही अन्य स्तरों पर भी व्यक्त कर चुके हैं। यही नहीं, जिन विषयों को लेकर उनकी नाराजगी है और उन्होंने जिन विषयों को उठाया है वह कोई उनका व्यक्तिगत मामला नहीं बल्कि सार्वजनिक महत्व का मामला है। ऐसे में इन सब विषयों से संबंधित कुछ दस्तावेज प्राप्त होने के बाद जल्द ही दस्तावेजों और विषयों को सार्वजनिक करेंगे।
सोशल मीडिया पर दस्तावेजों वाली लाइन लिखकर भाजपा नेता अजेंद्र ने एक नई सनसनी फैला दी है। राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा है कि किसी भी सरकार में सब कुछ ठीक तो होता नहीं है और भाजपा में भी कुछ गलत हुआ है। इस ओर भाजपा नेता की सोशल मीडिया पोस्ट का यही मतलब होता है। अगर यह सब सार्वजनिक हुआ तो आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। लेकिन पार्टी इसे हलके में ले रही है। एक ओर जहां भाजपा की ओर से पूरे मामले में अभी तक कोई बयान नहीं आया है। वही दूसरी ओर भाजपा नेता अपनी उल जूलूल बयानबाजी से पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं।
‘पैराशूट’ नेताओं को ‘फरमान’
फ्लैग--एआई के दौर में राजनैतिक दलों को बदलनी पड़ रही है अपनी राीति-नीति
क्रासर--सोशल मीडिया के ‘लाइव’ कांसेप्ट नेताओं के लिए मुसीबत
--एआई नेता की कुंडली खंगाल कर आमजन के सामने रखेगा
--राजनैतिक दलों की मजबूरी बनी जमीनी नेताओं पर दाव खेलना
देहरादून। चुनावी साल में राजनैतिक दल अपनी रणनीति तैयार करने में लगे है। आज के एआई दौर में मतदाताओं को रिझाने के लिए दलों को जी-जान लगाने पडे़गी। क्योंकि एआई ने अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली है कि उसके सामने अब किसी की नहीं चलने वाली है। शायद यही कारण है कि राजनैतिक दल इस बार ‘पैराशूट’ के बजाय जमीनी नेताओं पर ‘दाव’ खेलने के मूड़ में है। इसके लिए पार्टियों ने फरमान तक जारी कर दिए हैं। राजनीति के विशेषज्ञों की माने तो पार्टियों के लिए आने वाला विधानसभा चुनाव किसी पहाड़ से कम नहीं है।
गांव-गांव, घर-घर और शहर-शहर में आमजन अब बहुत जागरूक हो गया है और हर जगह से ‘लाइव’ का कांसेप्ट इस चुनाव में नेताओं को भारी पड़ सकता है। सोशल मीडिया के साथ एआई की मजबूत पकड़ इस बार के चुनाव में साफ देखने को मिलेगी। सोशल मीडिया के ‘लाइव’ कांसेप्ट नेताओं के लिए जहां मुसीबत बन सकती है। वही एआई किस समय किस नेता की कुंडली खंगाल कर आमजन के सामने रख दे पता नहीं है। इसके अभी से संकेत दिखने लगे है। हालांकि अभी चुनाव में लंबा समय है, लेकिन दलों की अभी से जो रणनीति उसमें स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।
बता दें कि विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आने के लिए विधायकों के टिकट के बंटवारे में अपनी रणनीति बदलने की योजना है। इसके चलते उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में पैराशूट की बजाए जमीनी नेताओं पर भाजपा दांव लगाने की रणनीति पर चर्चा हो रही है।
पार्टी में टिकट वितरण में असंतोष को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत नेताओं को तवज्जो देने की रणनीति बनाई जा रही है। पार्टी हाईकमान के आदेश पर उत्तराखंड में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट इसके लिए सभी मंत्री और विधायकों को अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता साबित करने को कहा गया है। इसकी शुरूआत भाजपा ने हरिद्वार से कर दी है।
पार्टी सूत्रों ने बताया कि हाल में हुई कोर ग्रुप की बैठक से पहले ही शीर्ष नेतृत्व साफ कर चुका है कि इस बार किसी भी मंत्री, विधायक को सीट बदलने की इजाजत नहीं दी जाएगी। इसके अलावा अलग अलग सीटों के मजबूत चेहरों को भी अपने अपने विधानसभा क्षेत्रों में ही सक्रियता के लिए कहा गया है। भाजपा ने पिछले चुनावों में कुछ नेताओं की सीट बदली थी तो कुछ दूसरे दलों से आए नेताओं को ऐन वक्त पर टिकट दे दिया था। इस वजह से कईई जगह पार्टी को आंतरिक असंतोष का भी सामना करना पड़ा। इसे देखते हुए इस बार केवल स्थानीय स्तर पर मजबूत और सक्रिय चेहरों पर ही दांव लगाने की योजना पर काम किया जा रहा है।
पार्टी के मंत्री, विधायकों को तो इस संदर्भ में साफ तौर पर संकेत दिए जा चुके हैं। भाजपा के करीब आधा दर्जन मंत्री और विधायक अपनी मौजूदा सीट को छोड़कर दूसरे स्थान से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। लेकिन शीर्ष नेतृत्व के फरमान की वजह से उनकी योजना को तगड़ा झटका लगा है। इसके साथ ही अपने क्षेत्र से बाहर तैयारी कर रहे नेताओं को भी इससे निराशा हाथ लग सकती है।
यही हाल कांग्रेस का भी है। कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस भी जमीनी नेताओं को तबज्जों देकर अपनी जीत सुनिश्चित करने की योजना बना रही है। हालांकि कांग्रेस की रणनीति अभी सिर्फ आक्रामक दिख रही है, लेकिन सूत्र बताते है कि आने वाले समय में कांग्रेस की बैठकों में स्पष्ट हो जाएगा कि चुनावी रण में उतरने के लिए क्या सही है और क्या गलत है। बता दें कि भाजपा जहां चुनावी रथ को तेजी के साथ आगे बढ़ा रही है वहीं कांग्रेस अभी रणनीति बनाने पर ही लगी है। इसका फायदा आने वाले विधानसभा चुनाव में किसे मिलेगा यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। लेकिन यह अवश्य है कि भाजपा और कांग्रेस सोशल मीडिया के लाइन कांसेप्ट और एआई की पहुंच को लेकर अपनी-अपनी रणनीति तय करने में लगी है।
बीजेपी में ‘भगदड़’ कांग्रेस में ‘फूट’
चुनाव से पूर्व राजनैतिक दलों का यह ट्रेंड आज नया नहीं
पार्टियों में ‘बगावत’ आम बात, प्रजातंत्र की है एक प्रक्रिया
दलों में जुड़ने व टूटने का सिलसिला रहता है लगातार जारी
देहरादून। राजनीति के अपने ही अलग और अनोखे रंग चुनावी साल में बार-बार दिखते है। उत्तराखंड में विधानसभा के चुनाव की घोषणा से पूर्व भाजपा में जहां ‘भगदड़’ मची है, वही कांग्रेस में ‘फूट’ भी सार्वजनिक हो गई है। चुनाव से पूर्व राजनैतिक दलों का यह ट्रेंड आज नया नहीं है। देश के इतिहास में अभी तक हुए चुनावों में यह सामान्य रूप से चलता आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा। क्योंकि यह राजनीति का ही एक अनोखा रूप है।
बता दें कि उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव से पूर्व सभी दल अपनी हलचलें तेज कर देते हैं और चुनाव आते-आते यह अपने चरम पर होती है। प्रदेश में दो प्रमुख दलों के बीच मुख्य मुकाबला होता है और यह मुकाबला किसी महाभारत से कम नहीं होता है। राजनैतिक दल इसके लिए एक साल से तैयारियों में लगे रहते है। एक-दूसरे दल से लोगों को तोड़ना और जोड़ना चुनाव से पूर्व लगा रहता है। इससे दलों में फूट और भगदड़ मचना स्वाभाविक है। प्रदेश में वैसे भी भाजपा और कांग्रेस में यह साफ देखा जाता है। हालांकि प्रदेश में क्षेत्रिय दल भी है, लेकिन इस दल से जुडे़ लोग दल में लंबे समय से है और दल के प्रति अपनी निष्ठा को निभाते है।
दूसरी ओर चुनावी साल में भाजपा-कांग्रेस में नेताओं का आना और जाना लगा रहता है। पहले यहां भाजपा की बात करें तो भाजपा वर्तमान समय में सत्ता में है और सत्ता के बल पर आगामी विधानसभा चुनाव में जीत के लिए अपनी पकड़ बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाने में लगी है। सरकार में रहते हुए भाजपा सभी कार्यकर्ताओं और नेताओं को तो खुश नहीं कर सकती है। इसलिए भाजपा से नाराज लोगों का कांग्रेस में जाना स्वाभाविक है। यह कहा जाए कि चुनावी साल में भाजपा में भगदड़ मची है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भी पिछले दिनों सामने आया है। भाजपा के छह बडे़ नेता कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके साथ ही अगर कांग्रेस के दावों को सच माने तो कई भाजपा नेता कांग्रेस में शामिल होने के लिए कांग्रेस के संपर्क में है। यह अपने आप में यह दर्शाता है कि भाजपा में भगदड़ मची है और आगे ओर भी भगदड़ मचेगी।
दूसरी ओर कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस में छह भाजपा नेताओं के शामिल होने के साथ ही फूट पड़ गई और यह फूट सावजनिक हो गई है। कांग्रेस के बडे़ नेता के राजनैतिक अवकाश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके साथ ही कांग्रेस ने प्रदेश की अपनी नये अध्यक्ष के साथ टीम अभी तक खड़ी नहीं की। इससे साफ संदेश जाता है कि कांग्रेस के अंदर फूट है और कांग्रेस में सब ठीक नहीं चल रहा है। कांग्रेस नेताओं के नाराज होने का क्रम जारी है और यह विधानसभा चुनाव में टिकट बटवारे तक जारी रह सकती है। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो पार्टियों में फूट,भगदड़ से राजनैतिक माहौल खराब होता ही है। इसके साथ ही चुनाव के समय इससे नुकसान भी होता है और यह क्रम दोनों दलों में जारी रहता है।
चुनावी साल में पार्टियों में ‘बगावत’ आम बात है और प्रजातंत्र की यह एक प्रक्रिया है। छोटे चुनाव हो या बडे़ यह होता ही है। देश की प्रमुख पार्टियों पर सभी की नजरें रहती हैं, लेकिन चुनाव के समय सभी दलों में यह सब चलता रहता है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के समय तो देश के प्रमुख दलों में अंतरकलह समान्य बात है और दलों में जुड़ने और टूटने का सिलसिला लगातार जारी रहता है। इसके फायदे और नुकसान चुनाव के समय दलों को होता है।
अंदरूनी असंतोष से बीजेपी में ‘विद्रोह’
क्रासर--भाजपा नेता के पीएम मोदी के बयान को कोट कर सन्यास लेने की धमकी से बना मामला संवदनशील
--अंदरूनी नाराजगी का चेहरा बने भाजपा नेता अजेंद्र अजय, कांग्रेस भी हो गई है मामले में सक्रिय
--आंतरिक कलह सार्वजनिक होने से भाजपा असहज, हाईकमान तक पहुंच गया है मामला
देहरादून। चुनावी साल में पार्टियों के नेताओं की नाराजगी कोई नई बात नहीं है। भाजपा में अंदरूनी असंतोष का हम पहले ही खुलासा कर चुके हैं, लेकिन इसके बाद भी पार्टी के अंदर किस तरह के हालात है यह बीकेटीसी के पूर्व अध्यक्ष की सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के बयान को कोट कर सन्यास लेने की धमकी से स्पष्ट हो गई है। वही दूसरी ओर कांग्रेस भी भाजपा के अंदरूनी असंतोष के मुद्दे को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए तैयार हो गई है।
राजनीतिक जानकार बताते है कि भाजपा आंतरिक कलह आज कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कई नेता सरकार और पार्टी को असहज कर चुके हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता अरविंद पांडे,बिशन सिंह चुफाल, चैंपियन,पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत सहित कई ऐसा नेता है जो समय-समय पर अपनी ही पार्टी और सरकार के खिलाफ बयानवाजी कर राजनीतिक हलकों में सुर्खियां बटोरते रहे हैं। इस बार मामला भाजपा के लिए पीएम मोदी के नाम का जिक्र होने के कारण संवेदनशील हो गया है।
बता दें कि उत्तराखंड राज्य में भाजपा की राजनीतिक स्थिति मजबूत मानी जाती है। दूसरी ओर समय-समय पर पार्टी के भीतर से उठने वाली नाराजगी की आवाजें नेतृत्व के लिए चुनौती बनती रही हैं। इसी कड़ी में अब अजेंद्र अजय का बयान चर्चा का विषय बन गया है, जो अंदरूनी असंतोष का परिणाम है। चुनावी साल में पार्टियों में खींचतान लगी रहती है। कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा में यह स्थिति बनना आम बात है। इस बार चुनाव से पहले भाजपा में खींचतान एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। बीकेटीसी के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा नेता अजेंद्र अजय के एक बयान ने न केवल पार्टी के अंदर हलचल मचा दी है, बल्कि विपक्ष को भी भाजपा पर हमला करने का मौका दे दिया है।
ज्ञात हो कि अजेंद्र अजय वाले प्रकरण में खास बात यह रही कि अजेंद्र ने अपनी नाराजगी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान से भी जोड़ा, जिसमें उन्होंने कहा था कि आने वाला दशक उत्तराखंड का दशक होगा। अजेंद्र अजय का कहना था कि यदि सच में राज्य के लिए यह दशक महत्वपूर्ण बनने वाला है, तो राज्य में व्यवस्थाओं और कामकाज में भी उसी स्तर की गंभीरता दिखाई देनी चाहिए। अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ाकर अजेंद्र ने जहां पार्टी के अंदर हलचल पैदा कर दी है। वहीं दूसरी ओर विपक्ष को भी हमलावर होने का मौका दे दिया है।
बाक्स
मामले में की कांग्रेस ने एंट्री
भाजपा में हलचल के बीच कांग्रेस सक्रिय होकर सरकार और भाजपा को घेरने की रणनीति बना रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा के भीतर बढ़ती नाराजगी का संकेत बताया है। उन्होंने कहा कि अजेंद्र अजय ने जो कहा है, वह केवल उनकी व्यक्तिगत राय नहीं है, बल्कि भाजपा के कई कार्यकर्ताओं की भावना को दर्शाता है।
उत्तराखंड में बढ़ने लगी चुनावी ‘सरगर्मी’
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027
भाजपा और कांग्रेस चुनावी मोड में
पार्टियों के बडे़ नेताओं के दौरे शुरू
देहरादून। चुनावी साल में भाजपा और कांग्रेस की गतिविधियां तेज हो गई हैं। एक ओर भाजपा जहां तेज गति से अभी से चुनावी गतिविधियों में जुट गई है वहीं कांग्रेस भी चुनाव की तैयारियों में जुट गई है। गैरसैंण में बजट सत्र के बाद राजनीतिक गलियारों में गतिविधियां तेज होने की संभावना है।
उत्तराखंड में चुनावी सरगर्मी बढ़ती दिखाईईदे रही है, बीजेपी जहां संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर पूरी सक्रियता के साथ मैदान में उतर चुकी है तो वहीं कांग्रेस भी अपनी तैयारियों को गति देने की कोशिश में लगी है। पार्टियों के बड़े नेताओं की मौजूदगी, संगठनात्मक गतिविधियों और राजनीतिक कार्यक्रमों को देखें तो दोनों दलों सक्रिय हो गये हैं। प्रदेश में जहां बीजेपी अपनी मौजूदा सरकार के चार साल पूरे होने का जश्न मनाने की तैयारी में जुटी हुई है और इसे चुनावी हवा तैयार करने की दिशा में कार्य कर रही है।
दरअसल, वर्तमान सरकार को 23 मार्च को चार साल पूरे होने जा रहे हैं। ऐसे में सरकार अपनी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान चलाने की तैयारी कर रही है। विभिन्न जिलों में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें सरकार के चार साल के कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाया जा रहा है। भाजपा इसे पूर्ण रूप से भूनाने के मूड में है।
वही कांग्रेस प्रदेश स्तर पर कुछ सक्रिय जरूर दिख रही है, लेकिन पार्टी अभी तक चुनावी मोड में नजर नहीं आ रही है और संगठनात्मक गतिविधियों की रफ्तार बीजेपी की तुलना में काफी धीमी दिखाई देती है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सक्रिय हैं, लेकिन पार्टी अभी तक चुनावी मोड में कम दिख रही है।
कांग्रेस और बीजेपी में ‘जंग’
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां में अभी से आ गई है तेजी
कांग्रेस प्रदेश सरकार की नाकामियों को लेकर भाजपा को घेरने की कर रही तैयारीं
भाजपा ने बनाई सरकार की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जाने की रणनीति
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसकी सरगर्मियां अभी से तेज हो गई हैं। चुनाव से पहले कांग्रेस और बीजेपी ने एक दूसरे को घेरने के लिए अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस भाजपा सरकार की नामामियों को उजागर करने की रणनीति पर कार्य कर रही है। दूसरी ओर भाजपा अपनी उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड जनता के बीच ले जाने को तैयार है।
बता दें कि चुनावी साल में देश के प्रमुख दलों में ‘जंग’ होना स्वाभाविक है। इसके लिए दोनों दल चुनाव से एक साल पहले ही तैयारी कर लेते हैं और चुनाव आते-आते दोनों दलों की जंग तेज हो जाती है। अकेले उत्तराखंड की बात करें तो सूबे में सत्ता पर बारी-बारी से अभी तक भाजपा और कांग्रेस ने राज किया है। पिछले दो चुनाव हालांकि भाजपा ने जीतकर कांग्रेस को पटखनी अवश्य दी है, लेकिन इस बार भाजपा के लिए भी विधानसभा चुनाव की जंग आसान नहीं है। क्योंकि सत्ता से दूर बैठी कांग्रेस पिछले लंबे समय से प्रदेश में सरकार विरोधी हवा बनाने में लगी है और चुनाव से पूर्व इसकी लपटें भाजपा के अभियान को प्रभावित कर सकती हैं।
चुनाव की घोषणा से पूर्व भाजपा कांग्रेस की जंग तेज होती दिख रही है। भाजपा जहां अपने पिछले चुनाव के वायदों को पूरा करने के साथ ही प्रदेश सरकार की उपलब्धियों को लेकर मैदान में जाने की तैयारी कर रही है। भाजपा प्रदेश सरकार के कई फैसलों को लेकर जनता के बीच जाने का मन बना चुकी है। क्योंकि प्रदेश की सरकार के कई फैसले देश में नजीर बने हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो आगामी चुनाव में इसका भाजपा को फायदा भी मिलेगा। वही दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश सरकार की उपलब्धियों को मात्र दिखावा मान रही है। कांग्रेस सूत्रों की माने तो विधानसभा चुनाव में प्रदेश सरकार की नाकामियों को लेकर उतरा जाएगा। प्रदेश सरकार और भाजपा चाहे जितने भी दावे कर ले, लेकिन प्रदेश की जनता आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। इसके साथ ही प्रदेश सरकार ने जिस तरह की कार्यसंस्कृत को ईजाद किया है यह प्रदेश के भविष्य के लिए हानिकारक है।
सूबे में विधानसभा चुनाव की अभी घोषणा होना बाकी है। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस की जंग शुरू हो गई है। विधानसभा चुनाव तक यह जंग विकराल रूप धारण कर लेगी और इसके दुष्परिणाम चुनाव परिणाम पर पडे़गे। सत्ता भाजपा के हाथ में रहती है या फिर कांग्रेस के हाथ चली जाएगी, यह तो बाद में पता चलेगा। लेकिन चुनावी मैदान में उतरने से पहले दोनों ही दल अपनी-अपनी तैयारियों में लगकर खुद को मजबूत करने में लगे हैं। हालांकि दोनों दल मैदान में उतर चुके हैं और अपनी उपस्थिति जनता के सामने प्रदर्शित कर रहे हैं, जबकि विधानसभा के चुनाव की घोषणा होना अभी बाकी है।
पिटकुल मामले में ‘जन प्रहार’
हाईकोर्ट के आदेश के बाद पिटकुल और शासन-प्रशासन में मची है खलबली
दून में आयोजित पत्रकार वार्ता में जन प्रहार ने मामले में की पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग
जन प्रहार ने प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर खडे़ किए कई सवाल
देहरादून। पिटकुल को लेकर जन प्रहार ने सरकार पर निशाना साधते हुए एक बड़ी अनियमितता की आशंका जताई है। प्रदेश में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के बहुत दावे हो रहे है, लेकिन शासन-प्रशासन प्रकरण में क्या कर रहा है। यह स्पष्ट नहीं है। दून में आयोजित पत्रकार वार्ता में जन प्रहार के प्रदेश सयोजक सुजाता पाल और सह सयोजक पंकज क्षेत्री ने प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खडे़ किए हैं।
बता दें कि उत्तराखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पिटकुल के एमडी प्रकाश चंद्र ध्यानी की नियुक्ति को 2021 के चयन नियमों का उल्लंघन माना, जिसके अनुसार एमडी के पास इंजीनियरिंग की डिग्री होनी चाहिए। कोर्ट ने सरकार को बार-बार निर्देश देने के बावजूद, 3 साल से तैनात अधिकारी को न हटाने पर सख्त रुख अपनाया और प्रमुख सचिव ऊर्जा आर. मीनाक्षी सुंदरम को 19 मार्च तक पेश होने को कहा है। यहां सबसे खास बात यह है कि पिटकुल एक तकनीकी संस्था है, लेकिन पीसी ध्यानी के पास अपेक्षित योग्यता नहीं थी। इसका संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने आदेश जारी किए।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद पिटकुल में खलबली मच गई और उस दिन से लेकर आज दिन में पिटकुल में अपनों को फायदा दिलाने के लिए अलग ही घटनाक्रम चल रहा है। इन घटनाक्रमों के बीच यह भी सामने आ रहा है कि सरकार द्वारा पिटकुल के प्रबंध निदेशक पद से संबंधित नियमों में नए सिरे से बदलाव करने के पश्चात नई नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की जा रही है। पूरे प्रशासनिक घटनाक्रम की पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े होते हैं। यदि वास्तव में नियमों में बदलाव किसी एक व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया जा रहा है, तो यह प्रशासनिक सि(ांतों और न्यायिक व्यवस्था की भावना के विपरीत है।
पत्रकार वार्ता में हाईकोर्ट में मामले के केस में पक्षकार दीप्ति पोखरियाल, सुजाता पाल, पंकज सिंह क्षेत्री, प्रदेश प्रवक्ता रविंद्र सिंह गुंसाई आदि थे।
पूरे मामले का यह है घटनाक्रम
18 फरवरी -उच्च न्यायालय उत्तराखंड ने पिटकुल के प्रबंध निदेशक प्रकाश चंद्र ध्यानी की नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया।
22 फरवरी-मामले में जन प्रहार द्वारा मीडिया के माध्यम से सरकार से स्पष्टीकरण मांगा गया और न्यायालय के आदेश के अनुपालन को लेकर प्रश्न उठाए गए।
23 फरवरी-प्रकरण की जानकारी महालेखा परीक्षक को भी प्रेषित की गई ताकि मामले की निष्पक्ष जांच हो सके।
24 फरवरी-मुख्य सचिव से मुलाकात कर उन्हें पूरे मामले से अवगत कराया गया और न्यायालय के आदेश के अनुपालन को लेकर स्थिति स्पष्ट करने का आग्रह किया गया।
26 फरवरी-कैबिनेट बैठक के सभी निर्णय सार्वजनिक किए, लेकिन राज्य के तीनों निगमों के प्रबंध निदेशक और निदेशक पदों के नियम के बदलाव सार्वजनिक नहीं किया गया।
27 फरवरी प्रमुख सचिव ऊर्जा को समन जारी कर 19 मार्च को न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया।
जन प्रहार ने पिटकुल मुख्यालय के बाहर ऊर्जा मंत्री का प्रतीकात्मक पुतला दहन कर विरोध दर्ज किया
3 मार्च - पिटकुल और यूपीसीएल के निदेशक पदों पर नियुक्ति की चल रही प्रक्रिया के अंतर्गत चयन साक्षात्कार स्थगित।
जन प्रहार ने की मांग
-पिटकुल के एमडी पद से जुड़े सभी आदेश और निर्णय सार्वजनिक किए जाएं।
-नियमों में हालिया बदलाव की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जाए।
-न्यायालय के आदेश के अनुपालन की स्थिति स्पष्ट की जाए।
-यदि किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो इसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए।
-आवेदन करते समय अभ्यर्थियों की उम्र 45 से 58 वर्ष से 45 से 60 वर्ष क्यों कर दी गईई?
-टेक्निकल पद पर टेक्निकल क्वालिफिकेशन की अर्हता क्यों समाप्त की गई?
मुख्य सचिव से भी मिल चुका है मामले में जन प्रहार का प्रतिनिधिमंडल
बता दें कि इससे पूर्व भी जन प्रहार उत्तराखंड के प्रतिनिधिमंडल ने मामले में मुख्य सचिव से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा और पिटकुल एमडी प्रकाश चंद्र ध्यानी को तत्काल बर्खास्त करने की मांग की है। आदेश में पिटकुल के प्रबंध निदेशक प्रकाश चंद्र ध्यानी की नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया गया है। जन प्रहार के सह संयोजक पंकज सिंह क्षेत्री ने कहा कि यह मामला पिटकुल के एमडी प्रकाश चंद्र ध्यानी की नियुक्ति का ही नहीं, बल्कि उनके पद पर लगातार कार्यरत रहकर सामान्य रूप से कार्य करने से शासन की पारदर्शिता, नियमों के पालन और सार्वजनिक धन की सुरक्षा से जुड़े सवालों को खड़ा करता है।
राजधानी पर भाजपा-कांग्रेस की ‘चुप्पी’
हर चुनाव में राजनैतिक दलों का मुद्दा बन जाता है गैरसैंण
चुनाव खत्म होते ही राजधानी पर नहीं करता है कोई भी बात
हकीकत में प्रदेश के आमजन की हसरत आज भी है अधूरी
देहरादून। चुनावी साल में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर यह तो प्रजातंत्र में नेताओं के लिए खजाना है और इस खजाने से कब कौन सा अस्त्र बाहर निकालना है यह नेताओं को खूब पता होता है। बात चली है तो भाजपा और कांग्रेस के उस सफेद झूठ के बारे में करते हैं, जिसे बोलकर सत्ता पर काबिज होना इन दोनों दलों को अच्छी तरह से आता है। यह मुद्दा है प्रदेश की राजधानी की। राज्य बने 25 साल हो गए, लेकिन आज भी राज्य की राजधानी का मुद्दा हर चुनाव के समय उठ जाता है और शुरू हो जाता है आरोप-प्रत्यारोपों का दौर।
बता दें कि वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बना और राज्य की देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाया गया। उस समय भी यह उम्मीद जताईई गई थी कि भविष्य में राजधानी के प्रश्न पर व्यापक विचार किया जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे समय बीतता गया और अस्थायी राजधानी स्थायी व्यवस्था का रूप लेती चली गई। राज्य के लोगों की गैरसैंण राजधानी की मांग धूमिल होती चली गई। नेताओं को अपने ठाठ-बाठ के लिए पहाड़ चढ़ना मंजूर नहीं था और नेतागिरी करने के लिए यह मुद्दा तो लंबा चलाना था। साल-दर-साल चुनाव होते रहे, गैरसैंण का मुद्दा चुनाव के समय उठता रहा, लेकिन हकीकत आज भी यह है कि आमजन की हसरत आज भी अधूरी है।
इसके साथ ही जब-जब गैरसैंण पर बात हुई तो कुछ न कुछ हुआ और इसी का परिणाम था कि जब भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन का निर्माण हुआ तो पहाड़ के लोगों के भीतर एक नईई आशा जगी। उन्हें लगा कि शायद अब राज्य की सत्ता धीरे-धीरे पहाड़ की ओर लौटेगी। लेकिन आज भी कभी कभार सपने की तरह यहां नेताओं को हुजूम उमड़ता है और कुछ दिन मौज-मस्ती पर फिर गैरसैंण बीरान हो जाता है।
आज की स्थिति यह है कि भराड़ीसैंण का विधानमंडल परिसर अत्यंत भव्य और आधुनिक है। वहां विधानसभा भवन, विधायक आवास, अधिकारियों के आवास और कईई अन्य बुनियादी ढांचे विकसित किए गए हैं। इन परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। लेकिन इन सबके बावजूद साल भर में केवल कुछ ही दिनों के लिए वहां विधानसभा सत्र आयोजित होता है।
अब चुनावी साल है और भाजपा कांग्रेस का यह फिर मुद्दा होगा, लेकिन सिर्फ चुनावी। चुनाव खत्म होते ही सभी नेता देहरादून में एसी की हवा खाने में मस्त हो जाएंगे और पांच साल तक चप्पी साधे रहेंगे। हर चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ने गैरसैंण को लेकर सफेद झूठ बोला है और आगे भी बोलेंगे। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर राजनैतिक दलों ने गैरसैंण की समस्या का समाधान कर दिया तो आने वाले समय में किस बात की राजनीति करेंगे। शायद यही कारण है कि आज भी इस मुद्दे को दोनों दल अलझाये हुए हैं।
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लंबे समय बाद दिखे भाजपा प्रदेश प्रभारी दुष्यंत
लंबे समय बाद भाजपा के प्रदेश प्रभारी एवं राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत गौतम प्रदेश में दिखे। भाजपा की संगठनात्मक बैठक में भाग लेने के लिए पहुंचे थे। देहरादून में कुआंवाला में आयोजित बैठक में गौतम ने मुख्यमंत्री धामी को 4 वर्ष पूरे करने वाले पाटीं के पहले मुख्यमंत्री बनने की बधाईई दी। उनके कार्यकाल की प्रशंसा करते हुए कहा, वह आंदोलनकारियों के सपनों के अनुरूप राज्य का निर्माण कर रहे हैं। े जनता के मन जीतने का तो काम कर ही रहे हैं, साथ ही पीएम मोदी के कहे अनुशार उत्तराखंड का दशक लाने के लिए जी जान से जुटे हैं। उनके नेतृत्व में आपदा का भी समाधान निकालकर, राज्य आज विकसित भारत के मिशन में सर्वोपरि नामों में शुमार है।
टिकट बंटवारे का ‘फार्मूला’ फिलहाल फाइनल
फ्लैग--आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टियों की रणनीति तय
--भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेता स्थानीय नेताओं की खंगाल रहे कुंडली
--पार्टी हाईकमान प्रदेश में जिताउ और टिकाउ प्रत्याशी की कर रही खोज
--भाजपा संगठन संभावित प्रत्याशियों के ग्राउंड जीरों की ले रही है टोह
--कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का दल भी प्रदेश के दौरों में हो गया है व्यस्त
देहरादून। चुनावी साल में राजनैतिक दलों की तैयारियां दिन-प्रतिदिन तेज हो रही है। राजनैतिक दल अपनी रणनीति तय करने के लिए स्थानीय और हाईकमान स्तर पर बैठकों में तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगे है। राजनैतिक विशेषज्ञों की मानें तो पार्टियों के लिए सबसे बड़ी समस्या टिकट बंटवारा होता है। इसके लिए दलों ने अपना फार्मूला तय कर दिया है। कांग्रेस और भाजपा के सूत्रों की माने तो टिकट को लेकर फाइनल गाइडलाइन जारी कर दी गई है।
बता दें कि सूबे में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। हालांकि अभी चुनाव आयोग ने इसकी घोषणा तो नहीं की है, लेकिन राजनैतिक दलों ने अभी से अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। क्योंकि टिकट बटवारे को लेकर भाजपा और कांग्रेस में घमासान मच जाता है। शायद इसी कारण पार्टियों ने अपना फार्मूला तय कर दिया है। हालांकि चुनाव की घोषणा होते-होते इसमें कई बदलाव देखने को मिलते है, लेकिन राजनैतिक दलों की पहली प्राथमिकता रहती है कि टिकट बंटवारे को लेकर घमासान कम मचे। इसलिए सभी दल पहले से यह तय कर लेते हैं कि किस मापदंड के हिसाब से टिकटों का बंटवारा करना है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा और कांग्रेस में अंदरखाने चल रही बैठकों में यह तय हो गया है और इसके लिए भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेताओं को संभावित प्रत्याशियों की कुंडली खंगालने के काम पर लगा दिया गया है।
राजनैतिक सूत्र बताते हैं कि पार्टी हाईकमान मैदान में उन्हीं नेताओं को उतारेगी, जो जिताउ हो और सीट पक्की हो। इसके लिए दल सभी बिंदूओं पर कार्य कर रही है। क्षेत्र में जिस नेता की जितनी पकड़ उतनी उस नेता के जीतने के चांस ज्यादा रहते है। भाजपा की बात करें तो भाजपा की वर्तमान में सरकार है और भाजपा में ही सबसे अधिक टिकट को लेकर घमासान मचने की संभावना है। इसी को देखते हुए भाजपा ने अपनी टीम को सक्रिय कर दिया है। भाजपा की टीम अंदरखाने संभावित प्रत्याशियों की कुंडली खंगालने का कार्य कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस के बडे़ नेताओं की उत्तराखंड दौरे भी इसी कारण लग रहे है। कांग्रेस भी चाहती है कि उनका संभावित प्रत्याशी वह हो जो जीत दर्ज कर सके। इसके लिए कांग्रेस भी हर एंगिल से जांच करने में जुटी है।
ज्ञात हो कि विधानसभा चुनाव के समय टिकट बंटवारों को लेकर दलों में घमासान मचता है। इसको कम करने के लिए दल अभी से तैयारी में लग जाते है। वर्तमान एआई के युग में हालांकि यह सब बहुत सरल हो गया है, लेकिन जमीनी हकीकत के लिए जमीन पर जाना आवश्यक है। इसी रणनीति के तहत दल कार्य कर रहे है। प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेताओं के दौरों को लेकर राजनैतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों दल अपनी जीत को पक्की करने के लिए सभी हथकंडे अपना रहे हैं। प्रत्याशियों की खोज जमीन पर जाकर ही पूरी हो सकती है। इसके लिए पार्टी जिताउ और टिकाउ संभावित प्रत्याशी की खोज कर रही है। भाजपा संगठन और कांग्रेस संगठन ग्राउंड जीरों का कार्यकर्ताओं की टोह लेने में लगी है। इसके लिए दोनों दलों के नेताओं और संगठन के पदाधिकारियों के प्रदेश में दौरे शुरू हो गए है।
ध्याण: मैत की ‘महक’ और ससुराल की ‘साख’
उत्तराखंड के पहाड़ों की परंपरा का अनोखा और अटूट रिश्ता
---बेटी ससुराल जाती है ‘ध्याण’ बनकर जोड़ती है दो रिश्तों को
---दो परिवारों, दो गांवों और दो संस्कृतियों का है आपसी मिलन
---पहाड़ के गांवों में ध्याण का मायके से रिश्ता होता है बेहद खास
संतोष बेंजवाल
देहरादून। पहाड़ के लोक-जीवन में ‘ध्याण’ मात्र एक शब्द नहीं, बल्कि एक संपूर्ण संस्कृति और सम्मान का प्रतीक है। हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों में जब कोई बेटी ब्याह कर ससुराल की देहरी लांघती है, तो वह केवल एक ‘वधू’ की नई पहचान नहीं पाती, बल्कि अपने मायके के लिए वह ‘ध्याण’ के एक पूजनीय और भावनात्मक रिश्ते में बंध जाती है।
पहाड़ की परंपराओं के अनुसार विवाहित बेटी को ध्याण कहा जाता है। वह एक ऐसा जीवंत सेतु है जो दो परिवारों, दो गांवों और दो संस्कृतियों को आपस में जोड़ती है। बुजुर्ग कहते हैं कि जिस घर की ध्याण खुशहाल होती है, उस घर की सात पीढ़ियां तर जाती हैं। मैत के लिए वह आज भी वही छोटी बच्ची है जो कभी गांव की पगडंडियों पर दौड़ती थी, जबकि ससुराल के लिए वह घर की मर्यादा और लक्ष्मी का रूप है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में बोली जाने वाली भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भावनाओं की गहराई को व्यक्त करने का जरिया भी है। यहां के शब्दों में रिश्तों की गर्माहट और जीवन की सादगी साफ झलकती है। पहाड़ी समाज में ‘ध्याण’ का अर्थ केवल एक विवाहित बेटी नहीं, बल्कि वह भावनात्मक पहचान है, जिसमें बेटी दूर रहकर भी अपने घर की आत्मा बनी रहती है। विवाह के बाद उसका घर बदल जाता है, जिम्मेदारियां बदल जाती हैं, लेकिन मायके के प्रति उसका स्नेह और अधिकार वैसा ही बना रहता है।
पहाड़ के गांवों में ध्याण का मायके से रिश्ता बेहद खास होता है। साल भर में जब भी वह मायके आती है, तो घर का माहौल बदल जाता है। उसके आने से आंगन में फिर से रौनक लौट आती है। मां-बाप के चेहरे पर संतोष और खुशी दिखाई देती है, जबकि भाई-बहनों के लिए यह मिलन पुराने दिनों की यादों को ताजा कर देता है। पहाड़ में त्योहार, मेलों और विशेष अवसरों पर ध्याण को मायके बुलाने की परंपरा रही है। यह सिर्फ एक सामाजिक रिवाज नहीं, बल्कि उस भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है, जो समय और दूरी के बावजूद कायम रहता है।
पहाड़ी समाज में बेटी की विदाई हमेशा भावुक क्षण होता है। ध्याण के रूप में उसकी पहचान उस दर्द को भी समेटे होती है, जो उसे मायके से दूर होने पर महसूस होता है। लेकिन यही दूरी हर मुलाकात को और भी खास बना देती है। जब ध्याण मायके लौटती है, तो वह सिर्फ एक बेटी नहीं, बल्कि खुशियों का पूरा संसार लेकर आती है। उसकी उपस्थिति घर के हर कोने को जीवंत कर देती है।
‘ध्याण’ का आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी जड़ों के प्रति उसका लगाव कम नहीं हुआ है। वह आज भी अपनी लोक-संस्कृति की सबसे बड़ी संवाहक है। ‘ध्याण’ आज भी पहाड़ की संस्कृति और संवेदना यह उस अटूट रिश्ते की पहचान है, जो बेटी के ससुराल जाने के बाद भी मायके से कभी नहीं टूटता। आज बेटियां शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं। इसके बावजूद ध्याण की परंपरा और उससे जुड़ी भावनाएं आज भी पहाड़ों में उतनी ही मजबूत हैं।
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लोक गीतों में ध्याण की गूंज
पहाड़ की अस्मिता और ध्याण का रिश्ता इतना गहरा है कि हमारे लोक गीत इसके बिना अधूरे हैं। उंची डांडियों मा बांज-बुरांश फूलिगे, पर मेरो भाई भिटौली ले के नी औई...। यह पंक्तियां उस ध्याण की पीड़ा और प्रतीक्षा को दर्शाती हैं, जो ससुराल के कठिन श्रम के बीच अपने मायके की यादों में डूबी रहती है।
नंदा है देवभूमि की सबसे बड़ी ध्याण
उत्तराखंड की आराध्य देवी मां नंदा को भी राज्य की ध्याण माना जाता है। नंदा राजजात यात्रा दरअसल एक ध्याण की अपने ससुराल जाने की ही विदाई यात्रा है। जब मां नंदा को विदा किया जाता है, तो हर पहाड़ी की आंख इसलिए नम होती है क्योंकि वह अपनी ही घर की बेटी यानी ध्याण को विदा कर रहा होता है।
राज्यों के चुनाव नतीजों ने बदली देश की राजनीति
बंगाल में ‘कमल’, तमिलनाडु में विजय का ‘धमाका’
केरल में उलटफेर, असम-पाडुचेरी में एनडीए का दबदबा
परिणामों से बदला पावर बैलेंस, दलों के लिए नई चुनौती
विस चुनाव परिणामों में दिख गया मतदाता का बदला मूड
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों ने देश की राजनीति की दिशा बदलने की उम्मीद है। पांच राज्यों के चुनावी समर में जहाँ पश्चिम बंगाल में सत्ता का ऐतिहासिक परिवर्तन देखने को मिल रहा है, वहीं तमिलनाडु में फिल्मी पर्दे से राजनीति में उतरे अभिनेता विजय ने सबको चौंका दिया है।
पांच राज्यों में हुए विधानसभा के चुनाव परिणाम के रुझानों के अनुसार
इस बार सबसे बड़ा उलटफेर पश्चिम बंगाल में होने वाला है, जहाँ भाजपा ने दो-तिहाई बहुमत के साथ टीएमसी के 15 साल के शासन को उखाड़ फेंकने की दिशा में आगे बढ़ रही है। रुझानों के अनुसार बीजेपी 190 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की ओर है। सोनार बांग्ला के नारे ने इस बार जमीन पर काम किया और ममता बनर्जी का खेला उन पर ही भारी पड़ता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हार की संभावना और तृणमूल के बड़े मंत्रियों का पिछड़ना इस बात का संकेत है कि जनता ने पूरी तरह से बदलाव के लिए वोट किया है।
दूसरी ओर दक्षिण भारत की राजनीति में आज एक नया सितारा उभरा है। अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्टी कड़गम ने अपने पहले ही चुनाव में द्रविड़ राजनीति के दिग्गजोंकृको कड़ी टक्कर दी है। उनकी पार्टी 100 से ज्यादा सीटों पर आगे चल रही है, जिससे एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता से बाहर होती दिख रही है। इसके साथ ही केरल में हर पांच साल में सत्ता बदलने का रिवाज फिर से लौटने वाला है। पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली एलडीएफ को इस बार बड़ी शिकस्त मिल रही है। यहां लोगों ने एंटी-इंकंबेंसी और भ्रष्टाचार के मुद्दों ने केरल की जनता को विकल्प चुनने पर मजबूर किया।
पूर्वाेत्तर में बीजेपी का किला अभेद्य बना हुआ है। असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन ने 80 से अधिक सीटें जीतकर हैट्रिक की ओर है। वही पाडुचेरी में यहाँ एन. रंगासामी की पार्टी और बीजेपी गठबंधन फिर से सरकार बनाने जा रही है।
बता दें कि पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम से बंगाल में बीजेपी की जीत और तमिलनाडु में विजय का उदय आने वाले 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए एक नया नैरेटिव तैयार हो रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभी तक के चुनाव परिणाम आने वाले राष्ट्रीय चुनावों के लिए संकेतक साबित हो सकते हैं, जहां भाजपा अपने संगठन विस्तार और योजनाओं के दम पर आगे बढ़ने की कोशिश करेगी, वहीं विपक्षी दल इन नतीजों से सीख लेकर अपनी रणनीति को धार देंगे। पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय लोकतंत्र में मतदाता का मिजाज तेजी से बदल रहा हैकृऔर यही बदलाव आने वाले समय में राजनीति की दिशा तय करेगा।
सूखती ‘जल धाराएं’ और प्यासे ‘पहाड़’
सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां भी हो गई लुप्त
पहाड़ के गांवों में सदियों पुरानी जल संस्कृति पर संकट
अनियोजित विकास और जलवायु परिवर्तन बना कारण
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ी गांव पलायन के कारण आज खाली हो गए हैं और इसके साथ ही पहाड़ की वह विरासत भी खत्म होने के कगार पर है। आज वह विरासत भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही जो सदियों से यहां के गांवों की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र होती थी। यहां बात हो रही है हिमालय की वादियों में स्थित गांवों में सदियों से प्यास बुझाते आ रहे पारंपरिक जल स्रोत ‘धारा’ और ‘नौले’ की। यह प्राकृतिक जल स्रोत, आधुनिकता की चकाचौंध और जलवायु परिवर्तन की मार के कारण धीरे-धीरे सूखने की कगार पर हैं।
पहाड़ के जीवन में पारंपरिक जल स्रोत ‘धारा’ और ‘नौले’ का विशेष महत्व रहा है। यह ‘धारा’ और ‘नौले’ सिर्फ प्यास ही नहीं बुझाते थे, बल्कि यह गांवों में सामुहिकता की एक मिशाल थी। सुबह-शाम ‘धारा’ और ‘नौले’ के आसपास महिलाओं और ग्रामीणों का जमावड़ा लगता था, जिससे आपसी संवाद और सामुदायिक एकता मजबूत होती थी। कई स्थानों पर धाराओं के पास देवस्थल भी बनाए गए, जहां लोग जल को पवित्र मानकर उसकी पूजा करते हैं।
गांवों में स्थानीय लोगों ने पीढ़ियों से इन जल स्रोतों को संरक्षित रखने के लिए प्राकृतिक संतुलन बनाए रखा। धारा के आसपास के जलग्रहण क्षेत्र में पेड़-पौधों का संरक्षण किया जाता था और वहां किसी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं होने दिया जाता था। यही कारण था कि यह स्रोत सालभर पानी उपलब्ध कराते थे। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में यह सब नहीं हो रहा है और लोग मोबाइल और टीबी पर चिपके रहते हैं। इस कारण प्राकृतिक जलस्रोत भी आज अकेले होकर दम तोड़ने लग गए है।
विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ यही एक कारण नहीं है बल्कि वनों की अंधाधुंध कटाई, सड़क और भवन निर्माण, और जलवायु परिवर्तन इसके प्रमुख कारण हैं। पहाड़ों में हो रहे अनियोजित विकास ने जलग्रहण क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाया है। इसके अलावा, गांवों से हो रहे पलायन के चलते इन स्रोतों की नियमित देखरेख भी कम हो गई है। धाराओं के सूखने से गांवों में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। कई क्षेत्रों में अब लोगों को दूर-दराज से पानी लाना पड़ता है या फिर सरकारी टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इससे न केवल दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है, बल्कि पारंपरिक जीवनशैली भी टूट रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते इन स्रोतों के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है। जलग्रहण क्षेत्रों में पौधरोपण, वर्षा जल संचयन और पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देने जैसे उपाय कारगर साबित हो सकते हैं। साथ ही, स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी बेहद जरूरी है।
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प्रकृति का अद्भुत इंजीनियरिंग कौशल
पहाड़ में पानी के प्राकृति स्रोत केवल पानी निकालने की जगह नहीं, बल्कि प्राचीन इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना हैं। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, पहाड़ की आंतरिक परतों से छनकर आने वाला यह पानी न केवल मिनरल्स से भरपूर होता है, बल्कि प्राकृतिक रूप से फिल्टर भी होता है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि धाराओं का पानी औषधीय गुणों से युक्त होता है, जो पेट की बीमारियों और पथरी जैसी समस्याओं में रामबाण माना जाता था।
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संस्कृति और परम्परा का संगम
पहाड़ में धाराओं का महत्व केवल प्यास बुझाने तक सीमित नहीं है। देवभूमि की परंपराओं में धारा पूजन का विशेष स्थान है। नवविवाहित वधू का पहली बार धारा पर जाकर पूजा करना इस बात का प्रतीक है कि जल ही जीवन का मूल है। सिंहमुख और गरुड़मुख जैसी कलाकृतियों से सजे ये स्रोत स्थापत्य कला का भी उत्कृष्ट उदाहरण पेश करते हैं।
‘आस्था’ के द्वार से ‘सियासी’ दस्तक
फ्लैग---कांग्रेस ने बदला अपना गेम प्लान, अब मंदिर की सीढ़ियों से करेगी चुनावी शंखनाद
---कांग्रेस के लिए प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा का गढ़वाल दौरा अहम
---उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल से इस बार से सियासत का नया अध्याय
---कांग्रेस पार्टी अब आस्था के जरिए जनता से जुड़ने की कोशिश करेगी
देहरादून। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल से इस बार सियासत का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। कांग्रेस ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर जैसे प्रमुख धामों से करने का फैसला लिया है, जिससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि इस बार आस्था के केंद्र सियासी संदेशों के प्रमुख मंच बनेंगे।
कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा का गढ़वाल दौरा प्रमुख धार्मिक स्थलों पर केंद्रित रहेगा, जो यह संकेत देगा है कि पार्टी अब आस्था के जरिए जनता से जुड़ने की कोशिश करेगी। ज्ञात हो कि अब तक उत्तराखंड की राजनीति में धार्मिक मुद्दों और सनातन आस्था के प्रतीकों पर मुख्य रूप से भाजपा की पकड़ मजबूत मानी जाती रही है। भाजपा ने लंबे समय से धार्मिक आयोजनों और आस्था से जुड़े प्रतीकों को अपनी राजनीति का अहम हिस्सा बनाया है, लेकिन अब कांग्रेस भी उसी पिच पर उतरती नजर आ रही है, जिससे सियासी मुकाबला और दिलचस्प होने की संभावना है।
बता दें कि कांग्रेस की गढ़वाल क्षेत्र के रुद्रप्रयाग, चमोली और अन्य जिलों में प्रस्तावित बैठकों को केवल संगठनात्मक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जा रहा है। यह कार्यक्रम स्थानीय भावनाओं को समझने और उनसे जुड़ने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इन इलाकों में धार्मिक आस्था का गहरा प्रभाव है, ऐसे में यहां से सियासी संदेश देना बेहद प्रभावी माना जाता है। कुमारी शैलजा का यह दौरा 6 मई से शुरू होने जा रहा है। वह सबसे पहले )षिकेश पहुंचेंगी, जहां वह रात्रि विश्राम करेंगी। इसके बाद 7 मई से उनके राजनीतिक कार्यक्रमों की शुरुआत होगी। इस दिन वह श्रीनगर में जिला कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करेंगी और संगठन की स्थिति का जायजा लेंगी।
8 मई को उनका कार्यक्रम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब वह केदारनाथ धाम पहुंचेंगी और वहां पूजा-अर्चना करेंगी। यह दौरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दृदृष्टि से भी अहम होगा। इसी दिन वह अगस्त्यमुनि में कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगी और इसके बाद रुद्रप्रयाग में भी जिला स्तर के नेताओं के साथ बैठक करेंगी। इसके अगले दिन यानी 9 मई को उनका दौरा चमोली जिले में रहेगा, जहां वह बदरीनाथ धाम पहुंचेंगी और वहीं रात्रि विश्राम करेंगी। 10 मई को सुबह वह बदरीनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगी और इसके बाद जोशीमठ में कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगी। इस दौरान पार्टी की रणनीतियों और आगामी चुनावों को लेकर चर्चा की जाएगी।
11 मई को कुमारी शैलजा टिहरी गढ़वाल के चंबा में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करेंगी। इस तरह करीब 5 से 6 दिनों के इस दौरे में वह पौड़ी, रुद्रप्रयाग, चमोली और टिहरी जैसे महत्वपूर्ण जिलों में जाकर संगठन की स्थिति का आकलन करेंगी और कार्यकर्ताओं की नब्ज टटोलेंगी। हालांकि इस पूरे दौरे का सबसे अहम पहलू बदरीनाथ और केदारनाथ धाम में होने वाले कार्यक्रम हैं। यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि इसके जरिए कांग्रेस एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह भी आस्था और परंपरा के साथ खड़ी है और जनता की भावनाओं को समझती है।
उत्तराखंड की राजनीति में अब तक भाजपा को ही धर्म के मोर्चे पर मजबूत माना जाता रहा है, लेकिन कांग्रेस ने बदरीनाथ और केदारनाथ धाम से अपने अभियान की शुरुआत कर यह साफ कर दिया है कि वह अब गढ़वाल के धार्मिक महत्व को अपनी सियासत का मुख्य आधार बनाने जा रही है। यह महज एक यात्रा नहीं, बल्कि देवभूमि के जनमानस को यह बताने की कोशिश है कि आस्था पर किसी का एकाधिकार नहीं है।
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