गुरुवार, 20 अगस्त 2026

udaydinmaan: भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू

udaydinmaan: भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू: 19 जिलों में भाजपा की नई तैनाती, चुनावी बिसात पर संगठन प्रभारी-सह प्रभारियों की नियुक्ति महज संगठन विस्तार ही नहीं विस चुनाव से पहले बूथ तक ...

भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू

19 जिलों में भाजपा की नई तैनाती, चुनावी बिसात पर संगठन प्रभारी-सह प्रभारियों की नियुक्ति महज संगठन विस्तार ही नहीं विस चुनाव से पहले बूथ तक पकड़ मजबूत करने की कवायद देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में डालना शुरू कर दिया है। पार्टी ने प्रदेश के 19 सांगठनिक जिलों के लिए प्रभारी और सह प्रभारी नियुक्त कर दिए हैं। पहली नजर में यह सामान्य संगठनात्मक फेरबदल दिखाई दे सकता है, लेकिन चुनावी राजनीति के लिहाज से देखें तो भाजपा का यह कदम काफी महत्वपूर्ण है। पार्टी ने जिलों में ऐसे समय पर जिम्मेदारियां तय की हैं, जब चुनावी मैदान तैयार हो रहा है और टिकट से लेकर बूथ प्रबंधन तक हर स्तर पर राजनीतिक समीकरण तेजी से आकार ले रहे हैं। भाजपा की राजनीति में संगठन केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाला ढांचा नहीं है। बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक लगातार सक्रिय रहने वाला कैडर उसका सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार माना जाता है। यही वजह है कि 19 सांगठनिक जिलों में प्रभारी और सह प्रभारियों की नियुक्ति को 2027 की चुनावी रणनीति की शुरुआती बड़ी कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों का चुनाव केवल बड़े राजनीतिक नारों से नहीं जीता जाता। यहां पहाड़ और मैदान की अलग-अलग राजनीतिक जरूरतें हैं। कुमाऊं और गढ़वाल के भीतर भी क्षेत्रवार मुद्दे और जातीय-सामाजिक समीकरण अलग हैं। ऐसे में प्रदेश मुख्यालय से चुनावी रणनीति बनाने के बजाय उसे जिले और मंडल स्तर तक पहुंचाना भाजपा की प्राथमिकता होगी। नए प्रभारी और सह प्रभारी इसी काम की कड़ी होंगे। उनकी जिम्मेदारी केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहेगी। संगठन की वास्तविक स्थिति, बूथ कमेटियों की सक्रियता, स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल, सरकार की योजनाओं का प्रचार और जनता के बीच पार्टी की पकड़ जैसे मुद्दों पर भी नजर रखनी होगी। यानी भाजपा चुनाव आने से पहले ही यह जान लेना चाहती है कि कौन सा बूथ मजबूत है, कहां संगठन कमजोर है और कहां पार्टी के भीतर ही असंतोष चुनावी नुकसान का कारण बन सकता है। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल संगठन की परीक्षा नहीं है। प्रदेश की सरकार के कामकाज का भी जनमत संग्रह होगा। धामी सरकार डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। लेकिन विपक्ष बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आपदा प्रबंधन और युवाओं से जुड़े सवालों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में जिला प्रभारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें केवल पार्टी का पक्ष जनता तक पहुंचाना नहीं होगा, बल्कि जनता के सवालों और नाराजगी की रिपोर्ट भी ऊपर तक पहुंचानी होगी। क्योंकि चुनावी राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब पार्टी के पास कागजों में मजबूत संगठन हो, लेकिन जमीन पर मतदाता उससे दूरी बनाने लगे। 2027 के चुनाव से पहले भाजपा के सामने एक और बड़ी चुनौती टिकट की होगी। हर विधानसभा क्षेत्र में संभावित दावेदार सक्रिय हो चुके हैं। कई पुराने चेहरे टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं, तो नए नेता भी संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। जिला प्रभारी और सह प्रभारी ऐसे समय में पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें यह भी देखना होगा कि टिकट की होड़ संगठनात्मक गुटबाजी में न बदल जाए। क्योंकि भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष से पहले अपनों की नाराजगी हो सकती है। टिकट कटने के बाद बगावत, भीतरघात या निर्दलीय मैदान में उतरने की स्थिति पार्टी के चुनावी गणित को बिगाड़ सकती है। भाजपा की यह कवायद कांग्रेस के लिए भी राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस अभी संगठन को मजबूत करने और चुनावी चेहरे को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट करने में जुटी है। ऐसे में भाजपा यदि डेढ़ साल पहले ही जिलेवार संगठन की जिम्मेदारी तय कर रही है तो इसका अर्थ साफ हैकृपार्टी चुनाव को अंतिम छह महीने की लड़ाई नहीं मान रही। भाजपा चाहती है कि चुनाव की घोषणा होने से पहले ही उसका संगठन मतदाता तक पहुंच चुका हो। सरकार की उपलब्धियां बूथ तक पहुंचें, लाभार्थियों से संपर्क हो, स्थानीय मुद्दों की पहचान हो और कमजोर सीटों पर पहले से काम शुरू किया जाए। हालांकि भाजपा की संगठनात्मक ताकत किसी से छिपी नहीं है, लेकिन चुनाव केवल संगठन के दम पर नहीं जीते जाते। अंततः मतदाता यह तय करता है कि सरकार ने उसके जीवन में कितना बदलाव किया। 19 जिलों में प्रभारी-सह प्रभारी नियुक्त करना भाजपा की तैयारी का संकेत जरूर है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि 2027 का चुनाव पार्टी के लिए आसान होगा। पहाड़ की नाराजगी, युवाओं के रोजगार के सवाल, सरकारी नौकरियों की भर्ती, पलायन, महिलाओं की सुरक्षा और महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी हवा का रुख बदल सकते हैं। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ संगठन खड़ा करने की नहीं, बल्कि संगठन को जनता की नब्ज पढ़ने वाली मशीन बनाने की है। 2027 की चुनावी बिसात पर भाजपा ने पहली बड़ी चाल चल दी है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रभारी और सह प्रभारी पार्टी के लिए सिर्फ बैठकें और रिपोर्ट तैयार करते हैं या वास्तव में जमीन पर संगठन की कमजोर नसों को पकड़ पाते हैं। क्योंकि चुनाव बूथ पर लड़ा जाएगा, लेकिन उसका फैसला जनता के मन में होगा।

एसआईआर की सुनवाई में कांग्रेस की ‘निगरानी’

कांग्रेस पार्टी की हर दावे-आपत्ति पर नजर रखने की है तैयारी मतदाता सूची को लेकर चुनावी साल में बढ़ेगी सियासी तपिश एसआईआर में आपत्तियों के दौरान मौजूद रहेंगे कांग्रेस प्रतिनिधि देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी हलचल अब और तेज होने के आसार हैं। कांग्रेस ने संकेत दिया है कि एसआईआर के तहत होने वाली सुनवाई के दौरान वह अपने प्रतिनिधियों को मौजूद रखेगी। पार्टी का तर्क है कि मतदाता सूची से जुड़े दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी पात्र मतदाता का नाम प्रभावित न हो। कांग्रेस का यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही हैं। चुनावी राजनीति में मतदाता सूची महज प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया की बुनियाद होती है। ऐसे में एसआईआर की हर गतिविधि अब राजनीतिक दलों की निगाह में रहने वाली है। कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही है। पार्टी सुनवाई के दौरान अपने प्रतिनिधियों के जरिए यह देखने की कोशिश करेगी कि दावे और आपत्तियों पर निर्धारित नियमों के अनुसार कार्रवाई हो रही है या नहीं। कांग्रेस को आशंका है कि प्रक्रिया के दौरान यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटता है या किसी आपत्ति का निस्तारण पारदर्शी तरीके से नहीं होता, तो उसका सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है। यही कारण है कि पार्टी अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय प्रक्रिया के स्तर पर निगरानी बढ़ाने की तैयारी में है। उत्तराखंड में एसआईआर अब सिर्फ प्रशासनिक कवायद नहीं रह गया है। इसके साथ राजनीतिक दलों की चिंता भी जुड़ गई है। चुनाव से पहले मतदाता सूची में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस पहले भी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी की कोशिश है कि सुनवाई के दौरान उसके प्रतिनिधि मौजूद रहें और जरूरत पड़ने पर आपत्ति या शिकायत को संबंधित स्तर तक पहुंचाया जा सके। भाजपा की ओर से इस पर क्या रुख अपनाया जाता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। यदि सत्तारूढ़ दल और विपक्ष एसआईआर को लेकर आमने-सामने आते हैं तो मतदाता सूची आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है। कांग्रेस के लिए यह फैसला केवल प्रशासनिक निगरानी का विषय नहीं है। यह उसके संगठन की जमीनी क्षमता की भी परीक्षा है। प्रतिनिधि नियुक्त करना आसान है, लेकिन उन्हें हर स्तर पर सक्रिय रखना बड़ी चुनौती होगी। उन्हें मतदाता सूची समझनी होगी, दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया की जानकारी रखनी होगी और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं के साथ संपर्क बनाए रखना होगा। यानी एसआईआर कांग्रेस के लिए संगठन को बूथ तक सक्रिय करने का अवसर भी बन सकता है। भाजपा लंबे समय से अपने बूथ संगठन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती रही है। ऐसे में कांग्रेस यदि एसआईआर की सुनवाई में अपने प्रतिनिधियों को सक्रिय करती है तो भाजपा को भी अपने संगठन की सक्रियता बनाए रखनी होगी। 2027 के चुनाव में मुकाबला केवल चुनावी सभाओं और नारों का नहीं होगा। मतदाता सूची से लेकर बूथ प्रबंधन तक हर स्तर पर राजनीतिक दलों की तैयारियां निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान यदि बड़ी संख्या में नाम हटने, जोड़ने या दावों-आपत्तियों को लेकर विवाद सामने आते हैं तो मामला राजनीतिक रंग ले सकता है। कांग्रेस इसे चुनावी पारदर्शिता का सवाल बनाएगी, जबकि भाजपा संभवतः प्रक्रिया को नियमों के तहत होने वाली सामान्य चुनावी कवायद बताएगी। लेकिन असली सवाल यह होगा कि अंतिम मतदाता सूची कितनी विश्वसनीय और स्वीकार्य बनती है। 2027 की चुनावी जंग अभी दूर है, लेकिन मतदाता सूची पर निगरानी की लड़ाई शुरू हो चुकी है। कांग्रेस ने सुनवाई में प्रतिनिधि उतारने का फैसला लेकर साफ कर दिया है कि वह एसआईआर को केवल सरकारी प्रक्रिया मानकर चुप बैठने वाली नहीं है। अब देखना होगा कि यह निगरानी लोकतांत्रिक पारदर्शिता तक सीमित रहती है या आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत का नया चुनावी रणक्षेत्र बन जाती है।

वोट की चोट के नारों से सत्ता में ‘खलबली’

सालों की मेहनत, कोचिंग का कर्ज और लगातार रद्द होती परीक्षाओं से सब्र का बांध टूटा नारों में बदला बेरोजगारों का आक्रोश, 2027 के सियासी समीकरण बिगाड़ने का अल्टीमेटम शहर-शहर मोदी के खिलाफ जनता का गुस्सा, युवाओं की नाराजगी बनी बड़ी चुनौती देहरादून/नई दिल्ली। सियासत में नाराजगी कोई नई चीज नहीं है। लेकिन जब नाराजगी सवाल पूछने लगे, जब सवाल नारे बन जाएं और नारे चुनावी बातचीत का हिस्सा बनने लगें, तब सत्ता को ठहरकर सुनना पड़ता है। आज देश के कई हिस्सों में युवाओं के बीच कुछ ऐसा ही माहौल दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में हैं। कहीं युवा कह रहे हैंकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। कहीं सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं और कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों पर सवाल उठाते हुए युवाओं का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है। इस गुस्से को समझने के लिए सिर्फ राजनीतिक भाषण सुनना काफी नहीं होगा। उस युवा को सुनना होगा जो वर्षों से परीक्षा की तैयारी कर रहा है। वह परिवार सुनना होगा जिसने कोचिंग और रहने पर पैसा खर्च किया। वह अभ्यर्थी सुनना होगा जिसकी परीक्षा रद्द हो गई या जिसकी मेहनत पर प्रश्नपत्र लीक होने की खबर ने पानी फेर दिया। यही वह जगह है जहां पेपर लीक की राजनीति, बेरोजगारी की चिंता और चुनावी नाराजगी एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है। प्रधानमंत्री मोदी की ओर से राजनीतिक विरोधियों पर किए गए तीखे तंजों के बीच विपक्ष और सोशल मीडिया ने भी अपनी शब्दावली गढ़ ली है। काकरोच जनता पार्टी जैसा व्यंग्य इसी राजनीतिक भाषा की नई अभिव्यक्ति है। नाम चाहे जो हो, असली सवाल नाम का नहीं है। सवाल यह है कि जनता किसे वोट देगी और क्यों देगी? लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ सरकार की उपलब्धियों का उत्सव नहीं होते। वह जनता की शिकायतों की सुनवाई भी होते हैं और जब युवा अपने अनुभवों को राजनीतिक सवाल में बदलने लगते हैं तो चुनावी समीकरणों में उसका असर पड़ना स्वाभाविक है। आज का युवा केवल यह नहीं पूछ रहा कि देश कितना आगे बढ़ा। वह यह भी पूछ रहा है कि मेरी नौकरी कहां है? मेरी परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं है? मेरी मेहनत की गारंटी कौन देगा? इन सवालों का जवाब किसी नारे से नहीं दिया जा सकता। पेपर लीक की घटनाओं ने प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। परीक्षा की तैयारी करने वाला युवा सिर्फ किताब नहीं पढ़ता। वह अपनी उम्र के कई साल उस परीक्षा के नाम कर देता है। जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठता है तो नुकसान सिर्फ एक परीक्षा का नहीं होता। नुकसान उस भरोसे का होता है जिसके आधार पर लाखों युवा अपने भविष्य की योजना बनाते हैं। यही वजह है कि पेपर लीक का मुद्दा अब विपक्ष के भाषणों से आगे निकलकर युवाओं की निजी जिंदगी का सवाल बन चुका है। सरकारें जांच की घोषणा कर सकती हैं। एजेंसियां जांच कर सकती हैं। गिरफ्तारियां हो सकती हैं। लेकिन जिस युवा ने दो-तीन साल तैयारी में लगाए, उसके समय का क्या? यही सवाल चुनावी राजनीति में सबसे ज्यादा असहज करने वाला हो सकता है। भाजपा की ताकत उसका संगठन है। उसका बूथ नेटवर्क है। उसका चुनावी प्रबंधन है। उसके पास प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा राजनीतिक चेहरा है। लेकिन दूसरी तरफ एक ऐसा वर्ग भी है जिसे किसी राजनीतिक दल का स्थायी वोटर मान लेना खतरनाक होगाकृयुवा। यह युवा जाति, क्षेत्र और परंपरागत राजनीतिक पहचान से आगे जाकर रोजगार, परीक्षा, शिक्षा और अवसर की भाषा में सवाल पूछ रहा है। सोशल मीडिया ने इस गुस्से को और तेज कर दिया है। एक शहर में हुआ प्रदर्शन दूसरे शहर तक पहुंच जाता है। एक अभ्यर्थी का वीडियो हजारों युवाओं तक पहुंच जाता है। एक पेपर लीक की खबर देखते ही दूसरे राज्यों के युवा अपने अनुभव साझा करने लगते हैं। यानी पहले जिस नाराजगी को सत्ता स्थानीय घटना मानकर टाल सकती थी, वह अब कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन सकती है। शहरों की सड़कों पर दिखाई दे रहा गुस्सा अगर गांवों और कस्बों तक पहुंच गया, और युवाओं की नाराजगी मतदान के फैसले में बदल गई, तो 2027 की राजनीति में यह सिर्फ विपक्ष की कहानी नहीं होगीकृयह सत्ता के लिए सबसे बड़ा सवाल बन सकती है और सवाल वही रहेगाकृकि जिस युवा ने नौकरी के लिए अपनी जवानी लगाई, अगर वह सरकार से कहे कि अब वोट सोच-समझकर देंगे, तो क्या सत्ता उसकी आवाज सुनेगी? वोट नहीं देंगे से किसे देंगे तक का सवाल हालांकि चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है। सरकार से नाराज होना और विपक्ष को वोट देनाकृदो अलग बातें हैं। अगर कोई युवा कहता है कि वह मौजूदा सरकार को वोट नहीं देगा, तो अगला सवाल होगाकृवह किसे वोट देगा?यही विपक्ष की असली परीक्षा है। सत्ता के खिलाफ गुस्सा पैदा करना आसान है। उस गुस्से को राजनीतिक विकल्प में बदलना कठिन है। युवाओं की नाराजगी को वोट में बदलने के लिए विपक्ष को सिर्फ मोदी विरोध से आगे जाना होगा। उसे रोजगार, परीक्षा सुधार, भर्ती कैलेंडर, पेपर लीक पर जवाबदेही और युवाओं के भविष्य का स्पष्ट रोडमैप देना होगा।वरना चुनाव के बाद यही गुस्सा फिर सोशल मीडिया पर लौट सकता है। चुनावी साल में सबसे बड़ा सवाल सियासत में अक्सर बड़े मुद्दों के बीच छोटे-छोटे सवाल दब जाते हैं। लेकिन कभी-कभी वही छोटे सवाल चुनाव का बड़ा मुद्दा बन जाते हैं। एक बेरोजगार युवक का सवाल। एक रद्द हुई परीक्षा का सवाल। एक पेपर लीक से टूटे भरोसे का सवाल। एक परिवार की आर्थिक चिंता का सवाल और फिर वह वाक्यकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। यह वाक्य अपने आप में चुनाव का परिणाम नहीं बताता। लेकिन यह जरूर बताता है कि सत्ता के सामने सवाल खड़े हो चुके हैं। अब देखना यह है कि इन सवालों का जवाब भाषणों से दिया जाता है या नीतियों से। क्योंकि लोकतंत्र में जनता को हमेशा चुप नहीं कराया जा सकता। कभी-कभी जनता चुप रहती है, कभी सड़क पर आती है और कभी ईवीएम के सामने खड़ी होकर जवाब देती है।

उत्तराखंड कांग्रेस में ‘हलचल’

कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में हरीश रावत शिरकत ने बढ़ाई सियासी हलचल लंबे राजनीतिक अनुभव के बल पर रावत एक बार फिर पार्टी में अपनी धमक नए नेतृत्व की चर्चाओं के बीच उनकी सक्रियता से समीकरण बदलने के आसार देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की सक्रियता चर्चा में है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में उनकी शिरकत ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत की भूमिका को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाते रहे हैं, ऐसे में पार्टी के शीर्ष मंच पर उनकी मौजूदगी को महज औपचारिकता मानने के बजाय राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल हैं जिनकी प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान और व्यापक राजनीतिक अनुभव है। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री तक की जिम्मेदारी संभाल चुके रावत लगातार प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। हालांकि पिछले कुछ समय में कांग्रेस के भीतर नई पीढ़ी के नेतृत्व और संगठनात्मक बदलाव को लेकर जिस तरह की कवायद हुई है, उसमें रावत की सक्रियता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। बैठक में उनकी मौजूदगी ने इन चर्चाओं को फिर हवा दे दी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस हाईकमान उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत के अनुभव का फिर से अधिक इस्तेमाल करने की तैयारी में है? 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखने और सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में राजनीतिक वोट में बदलने की है। ऐसे में हरीश रावत जैसे अनुभवी नेता की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। रावत प्रदेश के राजनीतिक भूगोल, सामाजिक समीकरण और कांग्रेस संगठन की अंदरूनी राजनीति से लंबे समय से परिचित हैं। पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक उनकी राजनीतिक पहुंच को पार्टी चुनावी रणनीति में इस्तेमाल करना चाहे तो यह कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है। उत्तराखंड कांग्रेस में पिछले कुछ समय से नेतृत्व को लेकर कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिले हैं। नई प्रदेश कार्यकारिणी, संगठन को मजबूत करने की कोशिश और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच पार्टी को पुराने अनुभवी नेताओं और नए नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना होगा। हरीश रावत की सक्रियता इसी संतुलन की राजनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। हालांकि इसका यह अर्थ निकालना जल्दबाजी होगा कि रावत को कोई नई औपचारिक जिम्मेदारी मिलने जा रही है। लेकिन कांग्रेस की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था की बैठक में उनकी भागीदारी यह जरूर बताती है कि पार्टी में उनका राजनीतिक महत्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। उत्तराखंड में अगला विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस सत्ता में लौटने के लिए मजबूत रणनीति बनाने में जुटी है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल भाजपा विरोधी वोट को एकजुट करने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के मतभेदों को नियंत्रित करने का भी है। प्रदेश कांग्रेस में अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। ऐसे में हरीश रावत की भूमिका केवल चुनावी चेहरा होने तक सीमित नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर समन्वय कायम करने में भी महत्वपूर्ण हो सकती है। राजनीति में किसी वरिष्ठ नेता की एक बैठक में मौजूदगी को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होता। लेकिन चुनावी साल की ओर बढ़ते उत्तराखंड में हर राजनीतिक गतिविधि के अपने मायने होते हैं। हरीश रावत की बैठक में मौजूदगी ने कम से कम इतना संकेत जरूर दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्री अभी राजनीतिक पारी के किनारे खड़े होकर सिर्फ घटनाक्रम देखने वाले नेता नहीं हैं। वे राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की गतिविधियों में भागीदारी कर रहे हैं और उत्तराखंड के संदर्भ में उनकी राजनीतिक उपयोगिता भी बनी हुई है। अब नजर इस बात पर होगी कि कांग्रेस हाईकमान आगामी महीनों में रावत को किस भूमिका में देखता है। क्या उन्हें प्रदेश में चुनावी रणनीति की जिम्मेदारी दी जाएगी? क्या वह वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय की भूमिका निभाएंगे? या फिर कांग्रेस उन्हें एक बड़े चुनावी अभियान के चेहरे के तौर पर इस्तेमाल करेगी? फिलहाल इतना तय है कि हरीश रावत की सक्रियता ने उत्तराखंड कांग्रेस की सियासत में पुराने समीकरणों की फाइल फिर खोल दी है। 2027 की चुनावी बिसात जैसे-जैसे बिछेगी, रावत की भूमिका भी उतनी ही ज्यादा चर्चा में आने की संभावना है।

गलती से भी वोट नहीं देंगे

शहर-शहर मोदी के खिलाफ गुस्सा, सड़क पर जनता सत्ता के खिलाफ नाराजगी ने बदली राजनीतिक भाषा प्रदर्शन और सोशल मीडिया के नारों में दिखाअसंतोष अब सवाल सिर्फ विरोध का नहीं, वोट के फैसले का देहरादून। देश की राजनीति में नाराजगी अक्सर भाषणों में दिखाई देती है, लेकिन जब यही नाराजगी सड़क पर उतरने लगे तो सत्ता के लिए सवाल थोड़ा कठिन हो जाता है। इन दिनों अलग-अलग मुद्दों को लेकर शहरों में हो रहे प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर उभरते विरोध के बीच एक वाक्य तेजी से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन रहा हैकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। यह सिर्फ एक नारा है या बदलते जनमत का संकेत, इसका फैसला चुनाव में होगा। लेकिन इतना जरूर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को लेकर विपक्षी राजनीति का स्वर अब पहले से ज्यादा आक्रामक है। महंगाई, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ियां, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे इस नाराजगी को लगातार खाद-पानी दे रहे हैं। आज का राजनीतिक विरोध सिर्फ किसी पार्टी के कार्यालय या बड़ी रैली तक सीमित नहीं है। शहरों में छोटे-छोटे प्रदर्शन हो रहे हैं, युवा अपनी समस्याओं के साथ सामने आ रहे हैं और सोशल मीडिया पर सरकार से सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं। एक समय था जब किसी आंदोलन की आवाज को स्थानीय बताकर नजरअंदाज किया जा सकता था। अब मोबाइल कैमरा उस आंदोलन को कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंचा देता है। यही वजह है कि बेरोजगारी या परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी किसी घटना का असर केवल संबंधित राज्य तक सीमित नहीं रहता। दूसरे राज्यों के युवा भी उसमें अपना भविष्य देखने लगते हैं। युवाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल रोजगार का है। इसके साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसी घटनाओं ने भरोसे को चोट पहुंचाई है। एक अभ्यर्थी के लिए परीक्षा केवल परीक्षा नहीं होती। उसके पीछे वर्षों की तैयारी, परिवार का खर्च और भविष्य की उम्मीद जुड़ी होती है। जब परीक्षा प्रक्रिया सवालों में घिरती है तो गुस्सा सिर्फ व्यवस्था से नहीं, पूरी राजनीतिक व्यवस्था से होने लगता है। यही गुस्सा अब चुनावी सवाल में बदलने की कोशिश हो रही है। नौकरी चाहिए, भाषण नहीं। पेपर लीक बंद करो। भर्ती कैलेंडर दो। ऐसे सवालों का जवाब राजनीतिक नारों से देना मुश्किल है। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता भारतीय राजनीति की बड़ी वास्तविकता है। भाजपा के चुनावी अभियानों का केंद्र भी लंबे समय से मोदी का चेहरा रहा है। ऐसे में उनके खिलाफ उठने वाली आवाज को हल्के में लेना भी संभव नहीं, लेकिन उसे पूरे देश की राय मान लेना भी जल्दबाजी होगी। सड़क पर विरोध करने वाला हर व्यक्ति विपक्ष का मतदाता हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन राजनीति में संकेतों की अपनी अहमियत होती है। यदि सरकार के समर्थक वर्ग के भीतर भी रोजगार, परीक्षा और महंगाई जैसे मुद्दों पर सवाल बढ़ते हैं, तो यह सत्ता के लिए चेतावनी जरूर बन सकता है। यहां विपक्ष के सामने भी बड़ी चुनौती है। सिर्फ यह कहना कि जनता मोदी से नाराज है, पर्याप्त नहीं होगा। जनता पूछेगीकृतो विकल्प क्या है? युवा पूछेगा कि रोजगार पर आपकी नीति क्या है? परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने के लिए क्या करेंगे? पेपर लीक रोकने की जिम्मेदारी किसकी होगी? सरकारी भर्तियां समय पर कैसे होंगी? यानी सत्ता से नाराजगी को वोट में बदलने के लिए विपक्ष को सिर्फ विरोध नहीं, भरोसे का विकल्प भी देना होगा। चुनाव अभी दूर हो सकते हैं, लेकिन राजनीति में माहौल पहले बनता है और मतदान बाद में होता है। आज का प्रदर्शन कल का वोट बनेगा, यह तय नहीं। लेकिन आज का सवाल कल के चुनावी मुद्दे में बदल सकता है। गलती से भी वोट नहीं देंगे कहने वाली भीड़ अगर मतदान के दिन भी उसी गुस्से के साथ खड़ी रही, तो सत्ता के लिए यह सामान्य विरोध नहीं रहेगा। क्योंकि लोकतंत्र में जनता पहले सवाल पूछती है, फिर बहस करती है और अंत में वोट के जरिए फैसला सुनाती है। फिलहाल शहरों की सड़कों पर जो आवाज सुनाई दे रही है, वह सत्ता को हटाने का फैसला नहीं है। मगर यह इतना जरूर कह रही है कि जनता को सिर्फ उपलब्धियों की सूची नहीं, अपने सवालों के जवाब भी चाहिए और चुनावी राजनीति में यही सवाल सबसे भारी पड़ते हैं कि नौकरी कहां है? परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं? महंगाई का बोझ कब घटेगा? और अगर जनता नाराज है, तो क्या सत्ता उसकी आवाज सुन रही है?

बुधवार, 19 अगस्त 2026

udaydinmaan: यूकेडी की 70 सीटों पर ‘अकेले’ हुंकार

udaydinmaan: यूकेडी की 70 सीटों पर ‘अकेले’ हुंकार: उत्तराखंड बचाओ यात्रा से अपनी चुनावी जमीन नापेगा यूकेडी यूकेडी के टिकट दावेदार दिखाएंगे अपने समर्थकों संग ताकत विधानसभा चुनाव से पहले यूकेडी...

यूकेडी की 70 सीटों पर ‘अकेले’ हुंकार

उत्तराखंड बचाओ यात्रा से अपनी चुनावी जमीन नापेगा यूकेडी यूकेडी के टिकट दावेदार दिखाएंगे अपने समर्थकों संग ताकत विधानसभा चुनाव से पहले यूकेडी ने तेज की सियासी सक्रियता यात्रा के जरिए संगठन व टिकट दावेदारों की ताकत को परखेगी देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव का माहौल धीरे-धीरे जमीन पर उतरने लगा है। भाजपा और कांग्रेस के साथ अब राज्य आंदोलन की राजनीतिक विरासत का दावा करने वाला उत्तराखंड क्रांति दल यानी यूकेडी भी अपनी चुनावी जमीन मजबूत करने में जुट गया है। पार्टी ने सभी 70 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ऐसे में प्रस्तावित उत्तराखंड बचाओ यात्रा को केवल जनसंपर्क अभियान नहीं, बल्कि आगामी चुनाव के लिए संगठन और संभावित प्रत्याशियों की ताकत परखने की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है। यात्रा के दौरान यूकेडी के टिकट दावेदार अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों से समर्थकों को जुटाकर संगठन के सामने अपनी राजनीतिक पकड़ का प्रदर्शन कर सकते हैं। यानी यह यात्रा एक तरह से कौन कितना मजबूत का अनौपचारिक इम्तिहान भी बन सकती है। जिन दावेदारों के पीछे कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भीड़ दिखाई देगी, वह पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी दावेदारी को मजबूती से रखने की कोशिश करेंगे। यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि हर विधानसभा क्षेत्र में ऐसा संगठन खड़ा करना है जो मतदान तक सक्रिय रह सके। पार्टी यदि सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ती है तो उसे बड़ी संख्या में मजबूत स्थानीय चेहरों की जरूरत होगी। यही वजह है कि संभावित प्रत्याशियों के लिए अब केवल पार्टी का टिकट मांगना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें यह भी साबित करना होगा कि उनके पास क्षेत्र में कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, स्थानीय मुद्दों की पकड़ और चुनाव लड़ने की क्षमता है। यात्रा इसी शक्ति परीक्षण का मंच बन सकती है। किस विधानसभा क्षेत्र से कितने लोग यात्रा में पहुंचते हैं, कौन-सा दावेदार अपने साथ संगठन के कितने कार्यकर्ताओं को जोड़ पाता है और स्थानीय स्तर पर किस चेहरे को ज्यादा समर्थन मिलता हैकृइन सब पर पार्टी के भीतर स्वाभाविक रूप से नजर रहेगी। यूकेडी ने हाल के महीनों में अपने पुराने क्षेत्रीय मुद्दों को फिर से राजनीतिक केंद्र में लाने की कोशिश की है। मूल निवास, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन, पलायन और उत्तराखंड की विशिष्ट पहचान जैसे सवाल पार्टी के एजेंडे में प्रमुख हैं। जून में पार्टी की बैठकों में भी मूल निवास और जल-जंगल-जमीन पर उत्तराखंडवासियों के अधिकार को प्रमुख मुद्दा बनाने पर जोर दिया गया था। अगस्त में यूकेडी ने संकल्प, नए उत्तराखंड का नाम से अपना नीतिगत एजेंडा जारी करते हुए अनुच्छेद 371 के तहत विशेष संवैधानिक प्रावधान, मूल निवास को कानूनी मान्यता, व्यापक भू-कानून, रोजगार और पलायन रोकने जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी। यानी उत्तराखंड बचाओ यात्रा के जरिए पार्टी कोशिश कर सकती है कि चुनावी बहस को केवल भाजपा बनाम कांग्रेस के द्वंद्व तक सीमित न रहने दिया जाए। यूकेडी के संभावित प्रत्याशियों के लिए यह यात्रा दोहरी परीक्षा होगी। एक तरफ उन्हें पार्टी के मुद्दों को जनता तक पहुंचाना होगा, दूसरी तरफ अपने क्षेत्र में अपनी व्यक्तिगत स्वीकार्यता भी दिखानी होगी। खासकर उन सीटों पर जहां कई नेता टिकट की दौड़ में हैं, वहां समर्थकों की मौजूदगी राजनीतिक संदेश देने का काम कर सकती है। लेकिन भीड़ को वोट में बदलना अलग चुनौती होगी। उत्तराखंड की राजनीति में कई बार बड़े जनसमूह और चुनावी परिणाम के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला है। इसलिए पार्टी के सामने सवाल केवल भीड़ जुटाने का नहीं, बल्कि भीड़ को बूथ तक पहुंचाने वाले संगठन का है। 2027 का चुनाव यूकेडी के लिए राजनीतिक अस्तित्व और पुनर्स्थापना का बड़ा अवसर माना जा सकता है। राज्य गठन के आंदोलन से निकली पार्टी लंबे समय से विधानसभा में अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। इस बार पार्टी जिस तरह 70 सीटों पर अकेले उतरने की बात कर रही है, उससे उसके सामने संभावनाओं के साथ जोखिम भी बढ़ गया है। दूसरी ओर, भाजपा सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है और कांग्रेस भी सत्ता परिवर्तन की तैयारी में है। ऐसे में यूकेडी को दोनों बड़े दलों के बीच अपनी अलग राजनीतिक जगह बनानी होगी। उत्तराखंड बचाओ यात्रा इसलिए सिर्फ एक राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि यूकेडी के लिए अपनी ताकत, संगठन और संभावित प्रत्याशियों की परीक्षा भी बन सकती है। अब देखना यह होगा कि यात्रा खत्म होने के बाद पार्टी के पास सिर्फ तस्वीरों में दिखाई देने वाली भीड़ होगी या फिर विधानसभा क्षेत्रों में खड़ा होने वाला ऐसा संगठन भी, जो 2027 के चुनावी मैदान में मुकाबला कर सके। क्योंकि चुनाव में नारा भीड़ जुटाता है, लेकिन बूथ ही वोट जुटाता है।

भाजपा ने सजाई ‘हैट्रिक’ की फील्डिंग

2027 में चुनावी हैट्रिक का संकल्प, भाजपा ने कसी कमर गढ़वाल संभाग की बैठक में सांसद-विधायकों को टास्क भाजपा ने अपनी संगठनात्मक रणनीति को दी अंतिम धार बूथ से लेकर विधानसभा तक सक्रियता बढ़ाने की तैयारी देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी उलटी गिनती के बीच भाजपा ने अपनी चुनावी मशीनरी को पूरी तरह सक्रिय करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। गढ़वाल संभाग की संगठनात्मक बैठक में सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों ने आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति पर मंथन किया। बैठक का केंद्रीय संदेश साफ रहाकृ2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल कर चुनावी हैट्रिक लगानी है। भाजपा के लिए यह बैठक महज संगठनात्मक समीक्षा नहीं, बल्कि चुनावी तैयारी की जमीन पर अंतिम रूपरेखा तय करने की कवायद के तौर पर देखी जा रही है। पार्टी अब सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ बूथ स्तर पर संगठन को और मजबूत करने, कमजोर क्षेत्रों को चिन्हित करने तथा कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने पर जोर दे रही है। गढ़वाल संभाग की बैठक में सांसदों और विधायकों की मौजूदगी ने इसे और महत्वपूर्ण बना दिया। पार्टी नेतृत्व की कोशिश है कि जनप्रतिनिधियों और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए। चुनावी साल में यह तालमेल इसलिए भी अहम है क्योंकि भाजपा की चुनावी रणनीति केवल प्रत्याशियों के भरोसे नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक फैले संगठन पर टिकी होती है। सांसदों और विधायकों को अपने-अपने क्षेत्रों में संगठन के साथ लगातार संवाद बनाए रखने, कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने और सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने पर जोर दिया गया। साथ ही ऐसे क्षेत्रों की पहचान पर भी ध्यान है जहां पार्टी को चुनावी दृष्टि से अतिरिक्त मेहनत की जरूरत पड़ सकती है। भाजपा 2027 में सत्ता की हैट्रिक का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की परंपरा रही है। ऐसे में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटना भाजपा के लिए केवल चुनाव जीतने का लक्ष्य नहीं, बल्कि राज्य की स्थापित राजनीतिक प्रवृत्ति को बदलने की चुनौती भी है। भाजपा लगातार दो विधानसभा चुनाव जीत चुकी है। अब पार्टी की नजर तीसरी जीत पर है। इसके लिए संगठन को सरकार के कामकाज, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक लोकप्रियता के साथ स्थानीय स्तर पर संगठन की पकड़ को चुनावी ताकत में बदलना होगा। भाजपा की रणनीति में एक तरफ सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी है तो दूसरी तरफ संगठन को विपक्ष के हमलों का जवाब देने के लिए तैयार किया जा रहा है। सड़क, चारधाम यात्रा, पर्यटन, महिला सशक्तीकरण, रोजगार, निवेश, समान नागरिक संहिता और राज्य से जुड़े विकास कार्यों को लेकर सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने की कोशिश होगी। इसके साथ ही कांग्रेस के संभावित चुनावी मुद्दों और सरकार विरोधी माहौल को लेकर भी पार्टी संगठन को सक्रिय किया जा रहा है। लेकिन भाजपा के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार की उपलब्धियों का संदेश बूथ तक कितनी मजबूती से पहुंचता है। 2027 के चुनाव में भाजपा की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कमजोर बूथ और कमजोर विधानसभा क्षेत्रों की पहचान हो सकता है, जिन बूथों पर पिछले चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा, वहां संगठनात्मक गतिविधियां बढ़ाने की योजना पर काम किया जा रहा है। पार्टी के लिए बूथ स्तर पर पन्ना प्रमुख से लेकर मंडल और विधानसभा स्तर तक जिम्मेदारियों को सक्रिय रखना महत्वपूर्ण होगा। यही भाजपा का वह संगठनात्मक माडल है जिसने उसे लगातार चुनावी सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भाजपा के चुनावी मोड में आने के साथ कांग्रेस पर भी दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। विपक्ष पहले ही सरकार को महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। ऐसे में भाजपा की रणनीति केवल अपनी उपलब्धियां गिनाने तक सीमित नहीं रहने वाली। पार्टी को विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर नाराजगी और असंतोष को भी संभालना होगा। खासकर टिकट के दावेदारों और मौजूदा विधायकों के बीच तालमेल चुनाव से पहले पार्टी के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी। संगठन की बैठकों के जरिए इसी तरह के संभावित अंतर्विरोधों को समय रहते नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। उत्तराखंड का अगला विधानसभा चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच चेहरे और मुद्दों की लड़ाई नहीं होगा। यह दोनों दलों के संगठनात्मक नेटवर्क की भी परीक्षा होगी। भाजपा के पास मजबूत कैडर और बूथ नेटवर्क की ताकत है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रही है। इसके अलावा क्षेत्रीय दलों और छोटे राजनीतिक समूहों की सक्रियता भी चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकती है। ऐसे में गढ़वाल संभाग की बैठक से भाजपा ने एक संदेश जरूर दिया हैकृ2027 का चुनाव अभी दूर नहीं है और पार्टी अब चुनावी तैयारी को टालने के मूड में नहीं है। अब असली परीक्षा बैठक में बने संकल्प को जमीन पर उतारने की है। सांसद-विधायक से लेकर मंडल अध्यक्ष और बूथ कार्यकर्ता तक यदि एक ही चुनावी रणनीति पर सक्रिय हो जाते हैं तो भाजपा की हैट्रिक की राह मजबूत हो सकती है। लेकिन यदि स्थानीय नाराजगी, टिकट की खींचतान और सरकार विरोधी मुद्दे संगठन की ताकत पर भारी पड़े, तो यही चुनाव भाजपा के लिए सबसे कठिन परीक्षा भी बन सकता है।

कांग्रेस ने की भाजपा की ‘घेराबंदी’

अंकिता भंडारी को साढ़े तीन साल बाद भी न्याय नहीं राहुल गांधी से मुलाकात के बाद भाजपा में है घबराहट युवा आयोग के गठन को कांग्रेस ने बताया डैमेज कंट्रोल देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अंकिता भंडारी हत्याकांड, बेरोजगारी और युवाओं के मुद्दे एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अंकिता भंडारी को साढ़े तीन साल बाद भी न्याय नहीं मिला है। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी से उत्तराखंड के युवाओं की मुलाकात के बाद भाजपा सरकार में बेचौनी दिखाई देने लगी है और अब युवा आयोग का गठन इसी घबराहट में किया गया कदम है। गोदियाल ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में युवाओं की समस्याओं को लेकर गंभीर है तो उसे पहले उन युवाओं से माफी मांगनी चाहिए, जिन पर आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज हुआ और मुकदमे दर्ज किए गए। कांग्रेस नेता ने युवा आयोग के गठन को युवाओं के आक्रोश को शांत करने की कोशिश बताते हुए कहा कि केवल आयोग बना देने से युवाओं के सवाल खत्म नहीं होंगे। कांग्रेस के लिए उत्तराखंड में युवाओं के मुद्दे को राजनीतिक रूप से धार देने का एक बड़ा अवसर राहुल गांधी के साथ बेरोजगार युवाओं की मुलाकात को माना जा रहा है। कांग्रेस का दावा है कि युवाओं ने रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और प्रदेश में रोजगार के अवसरों से जुड़े सवाल सीधे राहुल गांधी के सामने रखे। इसके बाद भाजपा सरकार की ओर से युवाओं को लेकर उठाए गए कदमों को कांग्रेस राजनीतिक दबाव का परिणाम बता रही है। गोदियाल के आरोपों का राजनीतिक अर्थ यही है कि कांग्रेस 2027 के चुनाव में युवा मतदाताओं को एक बड़े चुनावी समूह के रूप में देख रही है। भाजपा लगातार अपने संगठन और सरकार की उपलब्धियों के सहारे चुनावी तैयारी में जुटी है, वहीं कांग्रेस बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं के मुद्दे को सत्ता विरोधी भावना से जोड़ने की कोशिश कर रही है। उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड भावनात्मक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है। कांग्रेस लगातार इस मामले में न्याय की मांग उठाती रही है। गोदियाल ने कहा कि जिस बेटी के मामले ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया, उसके परिवार को न्याय मिलने में देरी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। कांग्रेस इसे केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की बेटियों की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा सवाल बनाकर उठाती रही है। 2027 के चुनाव में इस मुद्दे का प्रभाव कितना होगा, यह आने वाला समय बताएगा, लेकिन कांग्रेस इसे भाजपा सरकार के खिलाफ अपने राजनीतिक नैरेटिव का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा सरकार द्वारा युवा आयोग के गठन की कवायद को कांग्रेस ने सकारात्मक पहल मानने के बजाय सवालों के घेरे में रखा है। कांग्रेस का कहना है कि युवाओं को आयोग नहीं, रोजगार और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था चाहिए। पार्टी की दलील है कि यदि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता हो, परीक्षाएं समय पर हों, रिक्त पदों पर नियुक्तियां हों और युवाओं की आवाज सरकार तक पहुंचे तो अलग से राजनीतिक डैमेज कंट्रोल की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। कांग्रेस का हमला सीधे सरकार की नीयत और नीति दोनों पर है। गोदियाल का सबसे तीखा राजनीतिक संदेश उन युवाओं को लेकर है जो विभिन्न आंदोलनों में सड़कों पर उतरे थे। उनका कहना है कि सरकार को पहले यह स्वीकार करना चाहिए कि युवाओं के आंदोलनों से निपटने में कठोर रवैया अपनाया गया।लाठीचार्ज और मुकदमों का मुद्दा कांग्रेस पहले भी उठाती रही है। अब पार्टी इसे युवा आयोग के मुद्दे के साथ जोड़कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का सवाल हैकृजिस युवा को अपने हक की आवाज उठाने पर मुकदमा झेलना पड़ा, क्या आयोग बनने के बाद उसका मुकदमा खत्म हो जाएगा? जिस युवा पर लाठी चली, क्या सरकार उससे माफी मांगेगी? उत्तराखंड की राजनीति में युवा मतदाता हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। लेकिन बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने इस वर्ग की राजनीतिक चेतना को और मुखर किया है। भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह अपने विकास और रोजगार के दावों को युवाओं के अनुभव से कैसे जोड़ती है। कांग्रेस की चुनौती भी कम नहीं है। केवल सरकार पर आरोप लगाकर युवा मतदाताओं का भरोसा हासिल करना आसान नहीं होगा। युवाओं को ठोस रोजगार नीति, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर अवसर चाहिए। चुनावी घोषणाओं से ज्यादा उनकी नजर इस बात पर होगी कि कौन-सा दल इन समस्याओं का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। अंकिता भंडारी से लेकर बेरोजगारी तक कांग्रेस जिस तरह मुद्दों को जोड़ रही है, उससे साफ है कि 2027 की चुनावी लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन बनाम सत्ता वापसी तक सीमित नहीं रहने वाली। भाजपा जहां संगठन की ताकत और सरकार की उपलब्धियों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस कोशिश कर रही है कि युवाओं, महिलाओं और सरकार से नाराज वर्गों को एक साझा राजनीतिक मंच दिया जाए। गोदियाल का बयान इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। अब भाजपा के सामने सवाल है कि वह कांग्रेस के इन हमलों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से देती है या युवाओं के सवालों पर ठोस कार्रवाई करके। क्योंकि 2027 में युवा केवल भाषण नहीं सुनेंगेकृवह अपने अनुभव का हिसाब भी मांगेंगे।

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

udaydinmaan: पहाड़ से सत्ता की नई पटकथा

udaydinmaan: पहाड़ से सत्ता की नई पटकथा: भारतीय जनता पार्टी के लिए पौड़ी जनपद बन गया है पावर सेंटर गढ़वाल का केंद्र पौड़ी फिर सियासी भविष्य तय करने का आधार राजनीतिक हलचल आगामी विधानसभ...

पहाड़ से सत्ता की नई पटकथा

भारतीय जनता पार्टी के लिए पौड़ी जनपद बन गया है पावर सेंटर गढ़वाल का केंद्र पौड़ी फिर सियासी भविष्य तय करने का आधार राजनीतिक हलचल आगामी विधानसभा चुनाव की दिशा तय करेगी देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में पौड़ी एक बार फिर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। भाजपा की संगठनात्मक गतिविधियों, नेताओं की सक्रियता और पहाड़ की राजनीति को लेकर बन रही रणनीतियों के बीच पौड़ी पर सियासी निगाहें टिक गई हैं। सवाल यह है कि क्या आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा पौड़ी को केवल एक लोकसभा क्षेत्र या राजनीतिक भूगोल के रूप में देख रही है, या फिर इसे पहाड़ की सत्ता-सियासत के नए पावर सेंटर के तौर पर विकसित किया जा रहा है? पौड़ी का राजनीतिक महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह गढ़वाल की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उत्तराखंड की राजनीति में पौड़ी लंबे समय से नेतृत्व की प्रयोगशाला भी रहा है। यहां से निकले कई चेहरे प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं। यही वजह है कि जब भाजपा पहाड़ में अपने संगठन को मजबूत करने और 2027 के विधानसभा चुनाव की जमीन तैयार करने में जुटी है, तब पौड़ी की गतिविधियां अपने आप में राजनीतिक संकेत देने लगी हैं। भाजपा की राजनीति में संगठन सबसे महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है। बूथ से लेकर मंडल और जिला स्तर तक संगठन को मजबूत करने की कवायद लगातार चल रही है। पौड़ी में भी पार्टी की गतिविधियों को इसी नजर से देखा जा रहा है। पार्टी के लिए चुनौती केवल सत्ता विरोधी माहौल को संभालना नहीं है, बल्कि पहाड़ के उन सवालों का राजनीतिक जवाब तलाशना भी है, जो पिछले कुछ वर्षों में लगातार चर्चा में रहे हैं। पलायन, रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, वन अधिकार और स्थानीय युवाओं के अवसर जैसे मुद्दे भाजपा के लिए चुनावी परीक्षा बन सकते हैं। ऐसे में पौड़ी को मजबूत करना गढ़वाल की कई विधानसभा सीटों के राजनीतिक समीकरणों को साधने की रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। पौड़ी की राजनीतिक सक्रियता का एक दूसरा पहलू नेतृत्व से जुड़ा है। उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल और कुमाऊं के बीच संतुलन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। भाजपा के भीतर भी अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले नेताओं की राजनीतिक भूमिका समय-समय पर चर्चा में रहती है। पौड़ी अगर पार्टी के लिए रणनीतिक केंद्र बनता है तो इसका असर केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। इससे गढ़वाल क्षेत्र में टिकट वितरण, संगठनात्मक जिम्मेदारियों और चुनावी नेतृत्व को लेकर भी संकेत निकल सकते हैं। यही कारण है कि पौड़ी की हर राजनीतिक हलचल को अब केवल स्थानीय घटना मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी तैयारी जल्दी शुरू हो जाती है। भाजपा के सामने 2027 में लगातार सत्ता में बने रहने की चुनौती होगी। ऐसे में पार्टी को पहाड़ में अपनी पकड़ बनाए रखने के साथ-साथ उन इलाकों में भी सक्रियता बढ़ानी होगी जहां जनता स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा मुखर है। पौड़ी इस लिहाज से एक महत्वपूर्ण ट्रायल ग्राउंड बन सकता है। पार्टी यदि यहां संगठन, जनसंपर्क और स्थानीय मुद्दों के बीच बेहतर तालमेल बनाने में सफल होती है तो इसका माडल गढ़वाल के दूसरे हिस्सों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष भी इस सक्रियता को केवल संगठनात्मक कवायद के रूप में नहीं देखेगा। कांग्रेस समेत अन्य दल भाजपा के इस राजनीतिक विस्तार की काट तलाशने में जुटेंगे। पौड़ी की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संगठनात्मक ताकत को जमीन के सवालों से जोड़ा जा सकेगा? पौड़ी और पूरे पहाड़ में राजनीतिक चर्चा का केंद्र केवल पार्टी नहीं है। गांवों से पलायन, खाली होते खेत, युवाओं के रोजगार, सरकारी स्कूलों की स्थिति, अस्पतालों में सुविधाओं की कमी और सड़क-संचार की समस्याएं आज भी जनता के बीच महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। यदि भाजपा पौड़ी को पावर सेंटर बनाती है तो उसे इन सवालों के जवाब भी देने होंगे। केवल बैठकों और राजनीतिक कार्यक्रमों से चुनावी जमीन तैयार नहीं होती। जमीन तब तैयार होती है जब जनता को लगता है कि उसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंच रही है। भाजपा की बढ़ती सक्रियता कांग्रेस के लिए भी चुनौती है। कांग्रेस यदि पौड़ी और गढ़वाल में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है तो उसे केवल भाजपा विरोध के भरोसे आगे बढ़ना मुश्किल होगा। उसे स्थानीय नेतृत्व, मुद्दों और संगठनकृतीनों मोर्चों पर सक्रिय होना पड़ेगा। यही वजह है कि पौड़ी आने वाले महीनों में राजनीतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। भाजपा इसे संगठन की मजबूती के लिए इस्तेमाल करती है या चुनावी रणनीति के केंद्रीय मंच के रूप में विकसित करती है, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल इतना साफ है कि पौड़ी की पहाड़ियों में सिर्फ मौसम नहीं बदल रहा, सियासत का तापमान भी बढ़ रहा है। 2027 की लड़ाई जैसे-जैसे करीब आएगी, पौड़ी का राजनीतिक महत्व और बढ़ सकता है। सवाल अब यही हैकृक्या गढ़वाल का यह पहाड़ी शहर उत्तराखंड की अगली सत्ता की पटकथा लिखने वाला नया पावर सेंटर बनेगा?

भाजपा में गढ़वाल का दबदबा

उत्तराखंड तके 2027 से पहले सियासी समीकरणों की नई तस्वीर क्षेत्रीय संतुलन की सियासत, गढ़वाल पर टिकी भाजपा की नजर सत्ता-संगठन के संवेदनशील संतुलन को साधने में जुटी है पार्टी देहरादून। उत्तराखंड भाजपा की मौजूदा राजनीति में गढ़वाल क्षेत्र की भूमिका लगातार चर्चा के केंद्र में है। संगठन से लेकर सरकार तक गढ़वाल के नेताओं की सक्रियता ने पार्टी के भीतर क्षेत्रीय संतुलन और राजनीतिक प्रभाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा जिस तरह पहाड़ के राजनीतिक समीकरणों को साधने में जुटी है, उसमें गढ़वाल का बढ़ता प्रभाव पार्टी की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल और कुमाऊं का संतुलन हमेशा संवेदनशील विषय रहा है। राज्य गठन के बाद सत्ता और संगठन में दोनों मंडलों की हिस्सेदारी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में भाजपा के भीतर गढ़वाल के नेताओं की बढ़ती सक्रियता को केवल संयोग मानना आसान नहीं है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कुमाऊं से आते हैं, लेकिन भाजपा की प्रदेश राजनीति में गढ़वाल से जुड़े कई प्रभावशाली चेहरे सक्रिय हैं। सरकार, संगठन और पार्टी के विभिन्न राजनीतिक अभियानों में इन नेताओं की भूमिका लगातार दिखाई देती रही है। गढ़वाल की राजनीतिक ताकत का एक कारण यह भी है कि क्षेत्र में भाजपा का संगठन लंबे समय से मजबूत रहा है। पहाड़ की कई विधानसभा सीटों पर पार्टी का कैडर नेटवर्क चुनावी राजनीति में उसकी बड़ी ताकत माना जाता है। यही संगठनात्मक ढांचा भाजपा को चुनाव के समय बढ़त दिलाने में मदद करता रहा है। पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून के पर्वतीय हिस्से भाजपा की रणनीति में इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन क्षेत्रों का असर गढ़वाल की व्यापक राजनीतिक दिशा पर पड़ता है। गढ़वाल की राजनीति में पौड़ी का महत्व अलग है। यह क्षेत्र लंबे समय से राज्य की राजनीति को नेतृत्व देने वाले नेताओं की जमीन रहा है। भाजपा के लिए भी पौड़ी केवल एक लोकसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि गढ़वाल की राजनीतिक नब्ज समझने का महत्वपूर्ण केंद्र है। पौड़ी में संगठनात्मक सक्रियता बढ़ना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पार्टी 2027 से पहले गढ़वाल के राजनीतिक समीकरणों को और मजबूत करना चाहती है। लेकिन यहां एक सवाल भी हैकृक्या भाजपा गढ़वाल के प्रभावशाली नेताओं के बीच बेहतर समन्वय बना पाएगी? क्योंकि सत्ता और संगठन में प्रभाव बढ़ने के साथ भीतर की प्रतिस्पर्धा भी बढ़ना स्वाभाविक है। गढ़वाल के बढ़ते प्रभाव की चर्चा के साथ क्षेत्रीय संतुलन का सवाल भी उठता है। उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल बनाम कुमाऊं का विमर्श नया नहीं है। दोनों क्षेत्रों की अपनी राजनीतिक पहचान और सामाजिक-राजनीतिक अपेक्षाएं हैं। भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह गढ़वाल में अपने प्रभाव को बढ़ाते हुए कुमाऊं को किसी तरह की राजनीतिक उपेक्षा का संदेश न जाने दे। मुख्यमंत्री का कुमाऊं से होना पार्टी के लिए क्षेत्रीय संतुलन का एक महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होगा। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल सत्ता में वापसी का चुनाव नहीं होगा। पार्टी के सामने लगातार दो सरकारों के बाद जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने की चुनौती होगी। गढ़वाल में पार्टी को जहां अपने मजबूत संगठन का लाभ मिल सकता है, वहीं स्थानीय मुद्दे भी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आपदा और पर्यटन के सवाल पहाड़ के मतदाताओं के लिए लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में गढ़वाल के नेताओं के सामने केवल पार्टी का पक्ष रखने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि जनता के स्थानीय सवालों का जवाब देने की भी जिम्मेदारी होगी। उत्तराखंड भाजपा में गढ़वाल का बढ़ता दबदबा फिलहाल एक राजनीतिक संकेत जरूर है, लेकिन इसे स्थायी सत्ता समीकरण मानना जल्दबाजी होगी। चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते हैं। फिर भी मौजूदा तस्वीर यह बताती है कि भाजपा गढ़वाल को अपनी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण आधार मानकर चल रही है। संगठन की मजबूती, स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय मुद्दों को साथ जोड़ना पार्टी के लिए निर्णायक हो सकता है। 2027 की जंग में भाजपा के लिए गढ़वाल सिर्फ सीटों का गणित नहीं, सत्ता की चाबी भी है। अब देखना यह होगा कि पार्टी इस दबदबे को चुनावी बढ़त में बदल पाती है या फिर गढ़वाल के भीतर उठ रहे स्थानीय सवाल ही उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाते हैं।

उत्तराखंड भाजपा में बदलाव की ‘आहट’

केंद्रीय टीम से दुष्यंत गौतम का नाम कटते ही उत्तराखंड भाजपा में सुगबुगाहट तेज लंबे समय से राज्य के समीकरण साध रहे गौतम की विदाई के सियासी मायने अहम आधिकारिक घोषणा का इंतजार, लेकिन संगठन के भीतर प्रभारी को लेकर चर्चाएं गर्म देहरादून। भाजपा की नई केंद्रीय कार्यकारिणी की तस्वीर सामने आने के बाद उत्तराखंड भाजपा के सियासी गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। उत्तराखंड के मौजूदा प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम का नाम नई केंद्रीय कार्यकारिणी में शामिल नहीं होने के बाद अब उनके प्रदेश प्रभारी पद को लेकर भी अटकलें शुरू हो गई हैं। हालांकि पार्टी की ओर से इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन संगठन के भीतर संभावित बदलाव को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। दुष्यंत गौतम पिछले कुछ समय से उत्तराखंड भाजपा की चुनावी और संगठनात्मक रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में केंद्रीय स्तर पर नई टीम में उनका नाम नहीं होना राजनीतिक नजरिए से अहम माना जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या केंद्रीय संगठन में उनकी भूमिका बदलने के साथ उत्तराखंड में भी प्रभारी के स्तर पर बदलाव किया जाएगा? उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। भाजपा के लिए लगातार सत्ता में बने रहने की चुनौती है। ऐसे समय में प्रदेश प्रभारी का पद बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रभारी की भूमिका केवल संगठनात्मक बैठकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि टिकट चयन, चुनावी रणनीति, केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन के बीच समन्वय तथा अंदरूनी राजनीतिक समीकरणों को साधने में भी अहम होती है। यही वजह है कि दुष्यंत गौतम के भविष्य को लेकर चल रही चर्चाओं को 2027 की चुनावी तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। भाजपा में केंद्रीय संगठन में बदलाव के बाद कई नेताओं की जिम्मेदारियों में फेरबदल होना सामान्य संगठनात्मक प्रक्रिया है। किसी नेता का केंद्रीय कार्यकारिणी में शामिल न होना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि उसे किसी प्रदेश के प्रभारी पद से भी हटाया जा रहा है। लेकिन राजनीति में समय और परिस्थितियां संकेत जरूर देती हैं। यदि भाजपा केंद्रीय संगठन को नई ऊर्जा और नई जिम्मेदारियों के साथ आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है, तो राज्यों के प्रभारियों में भी बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड के मामले में यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि प्रदेश भाजपा में 2027 को लेकर संगठनात्मक तैयारियां पहले ही शुरू हो चुकी हैं। उत्तराखंड भाजपा में संभावित प्रभारी बदलाव की चर्चा के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि नया प्रभारी नियुक्त होता है तो उसका राजनीतिक और क्षेत्रीय प्रोफाइल क्या होगा? गढ़वाल और कुमाऊं के बीच संतुलन उत्तराखंड की राजनीति में हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। भाजपा भी संगठनात्मक नियुक्तियों में इस संतुलन को ध्यान में रखती रही है। ऐसे में नए प्रभारी के चयन में राजनीतिक अनुभव के साथ-साथ उत्तराखंड के दोनों मंडलों की राजनीतिक संवेदनशीलता को समझने की क्षमता भी अहम हो सकती है। उत्तराखंड भाजपा के लिए आने वाला समय बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार के सामने उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की चुनौती है तो संगठन के सामने सत्ता विरोधी भावनाओं को रोकने की। विपक्ष लगातार बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा जैसे मुद्दों पर सरकार को घेर रहा है। ऐसे में यदि प्रभारी बदला जाता है तो इसे केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि 2027 के लिए भाजपा की नई चुनावी टीम तैयार करने की कवायद के तौर पर भी देखा जा सकता है। फिलहाल दुष्यंत गौतम को उत्तराखंड प्रभारी पद से हटाए जाने को लेकर कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है। इसलिए मौजूदा चर्चाओं को अभी अटकलों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन इतना जरूर है कि केंद्रीय कार्यकारिणी की नई तस्वीर ने उत्तराखंड भाजपा के संगठनात्मक भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि आने वाले दिनों में प्रदेश प्रभारी बदला जाता है तो यह 2027 से पहले भाजपा की रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत होगा। अब निगाहें भाजपा हाईकमान के अगले फैसले पर टिकी हैं।

‘शुद्धिकरण’ पर बढ़ा घमासान

कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सचिवालय और पुलिस मुख्यालय का घेराव कर सरकार को घेरा 21वीं सदी में भी इंसान की मौजूदगी से मंच को पवित्र और अशुद्ध मानने वाली सोच पर सवाल अनुसूचित जाति विभाग के आह्वान के बाद विरोध-प्रदर्शन तेज, घटनाक्रम ने राजनीति का पारा चढ़ाया देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक मंच ने ऐसा क्या कर दिया कि उसके शुद्धिकरण की जरूरत पड़ गई? सवाल मंच का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जो किसी व्यक्ति के वहां खड़े होने के बाद मंच को ‘शुद्ध’ करने की जरूरत महसूस करती है। हल्द्वानी की घटना अब देहरादून पहुंच चुकी है। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के आह्वान पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सचिवालय और पुलिस मुख्यालय का घेराव किया। नारे लगे। विरोध हुआ। सरकार से जवाब मांगा गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल शायद यह है कि हम 2026 में खड़े हैं या उस मानसिकता में, जहां इंसान की मौजूदगी से जगह अशुद्ध और किसी दूसरे की मौजूदगी से पवित्र हो जाती है? कांग्रेस ने इस घटना को सामाजिक भेदभाव और दलित सम्मान से जोड़ते हुए प्रदेशभर में विरोध का फैसला किया है। जाहिर है, चुनावी राजनीति में हर मुद्दे का अपना गणित होता है। लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हें केवल चुनावी गणित से नहीं देखा जा सकता। किसी सार्वजनिक मंच का शुद्धिकरण अगर किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान से जुड़ा है, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं रह जाती। यह समाज के सामने आईना रख देती है। राजनीति में मंच इसलिए बनाया जाता है कि वहां से जनता की बात की जाए। भाषण दिए जाएं। सवाल उठाए जाएं। सरकार की योजनाएं बताई जाएं। विपक्ष अपनी बात रखे। लेकिन अगर उसी मंच पर खड़े होने वाले व्यक्ति की जाति मंच को अशुद्ध बना देती है, तो फिर सवाल मंच पर नहीं, उस सोच पर होना चाहिए और अगर कांग्रेस इस सवाल को उठाती है तो भाजपा को भी इसका जवाब देना चाहिए। जवाब राजनीतिक आरोपों से नहीं, साफ शब्दों में। क्या ऐसी किसी घटना का समर्थन किया जाता है? क्या ऐसी सोच स्वीकार्य है? क्या संविधान के सामने जाति के आधार पर पवित्र और अपवित्र की कोई श्रेणी बची है? इन सवालों के जवाब जरूरी हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का सचिवालय और पुलिस मुख्यालय तक पहुंचना बताता है कि पार्टी इस मुद्दे को सिर्फ सोशल मीडिया की बहस बनाकर छोड़ना नहीं चाहती। कांग्रेस इसे सामाजिक सम्मान और संविधान के सवाल के रूप में पेश कर रही है। लेकिन यहां कांग्रेस के सामने भी सवाल है। क्या यह लड़ाई केवल प्रदर्शन और नारों तक सीमित रहेगी? क्या पार्टी गांवों में जाकर बताएगी कि सामाजिक बराबरी का मतलब क्या है? क्या पार्टी अपने भीतर भी जातिगत भेदभाव के सवालों पर उतनी ही गंभीर होगी? क्योंकि सामाजिक न्याय सिर्फ सत्ता के खिलाफ भाषण देने से नहीं आता। उसके लिए समाज के भीतर भी लड़ाई लड़नी पड़ती है। उत्तराखंड खुद को देवभूमि कहता है। यहां मंदिर हैं, तीर्थ हैं, परंपराएं हैं। लेकिन इसी समाज में अगर किसी इंसान की मौजूदगी के बाद किसी मंच को शुद्ध करने की जरूरत पड़ती है तो यह सवाल देवभूमि से ज्यादा समाज की मानसिकता पर खड़ा होता है। धर्म और आस्था निजी विषय हो सकते हैं। लेकिन जब सार्वजनिक जीवन में जाति के आधार पर सम्मान और अपमान तय होने लगे तो लोकतंत्र बीच में आ जाता है और लोकतंत्र का संविधान कहता हैकृनागरिक बराबर हैं।न मंच किसी जाति का है, न सड़क किसी जाति की है, न सचिवालय किसी जाति का है और न पुलिस मुख्यालय। फिर शुद्धिकरण किसका? मंच का या मानसिकता का? उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ रही है। ऐसे में सामाजिक न्याय, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श का हिस्सा बनेंगे। मंच शुद्धिकरण का यह विवाद भी राजनीतिक रंग ले चुका है। कांग्रेस इसे दलित सम्मान और संविधान की लड़ाई बताएगी। भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति बता सकती है। लेकिन जनता के सामने सवाल इससे बड़ा है। क्या राजनीति जाति के नाम पर मंच धोती रहेगी या समाज से जाति का मैल धोने की कोशिश भी करेगी? सच तो यह है कि पानी से मंच साफ हो सकता है, लेकिन सदियों की सोच पानी से नहीं धुलती। उसके लिए संविधान पढ़ना पड़ता है। बराबरी को स्वीकार करना पड़ता है। और सबसे जरूरीकृइंसान को इंसान समझना पड़ता है।

काकरोच के बाद अब ‘दिमागी नक्सल’ पार्टी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तंज से निकली नई सियासी कहानी बयान अब समर्थकों और विरोधियों की राजनीतिक पहचान संसद से निकलकर राजनीति अब सोशल मीडिया में शिफ्ट विरोधी पक्ष ऐसे बयानों को सत्ता के खिलाफ आक्रामक मुद्दा देहरादून। भारतीय राजनीति में तंज, विशेषण और राजनीतिक जुमलों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में यही शब्द कभी-कभी सत्ता के खिलाफ नए राजनीतिक नैरेटिव का आधार भी बन जाते हैं। काकरोच जैसे राजनीतिक तंज के बाद अब दिमागी नक्सल शब्द भी इसी तरह चर्चा में है। प्रधानमंत्री की ओर से किए गए तंज के बाद इस नाम से एक राजनीतिक मंच/समूह के गठन और उससे बड़ी संख्या में लोगों के जुड़ने के दावे ने सियासी बहस को नया मोड़ दे दिया है। यह घटनाक्रम अपने आप में इस बात का संकेत है कि आज की राजनीति केवल संसद, रैलियों और चुनावी सभाओं तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया पर बोले गए एक शब्द को समर्थक अपने तरीके से राजनीतिक पहचान में बदल सकते हैं और विरोधी उसी शब्द को सत्ता के खिलाफ हथियार बना सकते हैं। राजनीति में किसी विरोधी को निशाना बनाने के लिए दिए गए विशेषण अक्सर कुछ समय के लिए सुर्खियां बनते हैं। लेकिन जब वही शब्द विरोध करने वाले समूह की पहचान बन जाए तो मामला दिलचस्प हो जाता है। दिमागी नक्सल को लेकर सामने आए राजनीतिक प्रयोग को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। समर्थकों का दावा है कि प्रधानमंत्री के तंज के बाद बड़ी संख्या में लोग इस मंच से जुड़े हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संगठन की वास्तविक सदस्य संख्या को अलग-अलग तरीके से देखना जरूरी है। सवाल यह है कि क्या यह महज सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया है या फिर आने वाले समय में इसका कोई संगठित राजनीतिक रूप भी दिखाई देगा? भारतीय राजनीति में कई बार किसी दल या नेता को दिए गए विरोधी के विशेषण ने ही उसकी पहचान को मजबूत किया है। राजनीतिक विरोधियों के आरोपों को पलटकर अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चुनावी रणनीति का हिस्सा रहा है। दिमागी नक्सल को लेकर भी यही प्रयोग दिखाई देता है, जिस शब्द का इस्तेमाल आलोचना या तंज के रूप में किया गया, उसी को समर्थक राजनीतिक व्यंग्य और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं। यह सोशल मीडिया राजनीति के उस नए दौर को दिखाता है जहां नकारात्मक प्रचार भी कभी-कभी राजनीतिक ब्रांडिंग में बदल सकता है। इस नए राजनीतिक मंच से लाखों लोगों के जुड़ने का दावा किया जा रहा है। अगर यह संख्या वास्तविक और सक्रिय राजनीतिक समर्थन में बदलती है तो निश्चित तौर पर यह मुख्यधारा की पार्टियों के लिए विचार करने का विषय होगा। लेकिन किसी डिजिटल प्लेटफार्म पर फालोअर या सदस्य संख्या और वास्तविक चुनावी समर्थन में बड़ा अंतर होता है। चुनाव बूथ पर लड़ा जाता है, जहां संगठन, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और मतदाता का भरोसा निर्णायक होता है। यही इस नए राजनीतिक प्रयोग की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। देश की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबले के बीच कई छोटे राजनीतिक प्रयोग समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कुछ आंदोलनों ने राजनीतिक दल का रूप लिया तो कुछ सोशल मीडिया की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ पाए। दिमागी नक्सल नाम से सामने आया राजनीतिक प्रयोग भी अब इसी कसौटी पर देखा जाएगा। क्या यह केवल प्रधानमंत्री के बयान की प्रतिक्रिया तक सीमित रहेगा या बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक मुद्दों को लेकर अपना स्वतंत्र राजनीतिक एजेंडा तैयार करेगा? यदि यह मंच केवल एक राजनीतिक तंज का जवाब बनकर रह गया तो इसकी उम्र सीमित हो सकती है। लेकिन यदि यह अपने नाम से आगे निकलकर नीति, संगठन और जमीन से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट कार्यक्रम तैयार करता है, तब इसकी राजनीतिक प्रासंगिकता बढ़ सकती है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि राजनीति में शब्दों को हल्के में लेना अब आसान नहीं है। सत्ता का एक तंज सोशल मीडिया में हजारों पोस्ट, मीम और अभियान का आधार बन सकता है और वही अभियान किसी दिन राजनीतिक संगठन का रूप लेने का दावा भी कर सकता है। लेकिन लोकतंत्र में अंततः फैसला नारों से नहीं, जनता के वोट से होता है। इसलिए दिमागी नक्सल नाम का यह प्रयोग कितना बड़ा राजनीतिक विकल्प बनता है, यह आने वाला समय बताएगा। फिलहाल इतना जरूर है कि जिस शब्द को राजनीतिक तंज के रूप में इस्तेमाल किया गया, वही अब विरोध की पहचान बनने की कोशिश कर रहा है। काकरोच से लेकर दिमागी नक्सल तक की यह राजनीति बताती है कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक भाषा का नया दौर शुरू हो चुका हैकृजहां सत्ता का तंज भी कभी-कभी विपक्ष की नई कहानी लिख देता है।

सोमवार, 17 अगस्त 2026

udaydinmaan: ‘देवभूमि में डर्टी पालिटिक्स’

udaydinmaan: ‘देवभूमि में डर्टी पालिटिक्स’: प्रदेश में आपदा, बदहाल सड़कें और पलायन जैसे गंभीर मुद्दे वही दिल्ली से लेकर दून तक राजनीतिक बयानबाजी चरम पर कांग्रेस ने कई मुद्दों को ढाल ब...

एसआईआर पर सियासत तेज

पूर्व सीएम की बेटी विधायक अनुपमा ने लगाए गंभीर आरोप स्कैम और साजिश के दावे से गरमाया सूबे का चुनावी माहौल देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी बहस लगातार तेज होती जा रही है। अब एक पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की बेटी की विधायक अनुपमा रावत ओर से प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए जाने के बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। उन्होंने इसे कथित तौर पर बड़ा स्कैम बताते हुए आरोप लगाया कि मतदाताओं की आपत्तियों के नाम पर एक सुनियोजित प्रक्रिया चल रही है। उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया पहले ही राजनीतिक दलों के बीच बहस का विषय बनी हुई है। निर्वाचन विभाग की ओर से मतदाता सूची के सत्यापन और आवश्यक दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया को चुनावी सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाने की कवायद बताया जा रहा है। वहीं विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में आम मतदाता, खासकर बुजुर्गों और ऐसे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है जिनके पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी विधायक अनुपमा रावत की टिप्पणी ने राजनीतिक विवाद को नया आयाम दे दिया है। उनका आरोप है कि आपत्ति की प्रक्रिया का इस्तेमाल सामान्य मतदाता सत्यापन से आगे जाकर राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और निर्वाचन प्रक्रिया के संबंध में अंतिम स्थिति निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकार्ड और जांच से ही स्पष्ट होगी। एसआईआर को लेकर सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि मतदाता सूची में कितने नाम जुड़ेंगे या हटेंगे। बड़ा सवाल यह है कि पूरी प्रक्रिया पर आम मतदाता कितना भरोसा कर पाएगा। लोकतंत्र में मतदाता सूची महज नामों की सूची नहीं होती। यही वह आधार है जिसके सहारे नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल करता है। इसलिए किसी भी मतदाता को यह आशंका नहीं होनी चाहिए कि दस्तावेजों की कमी, प्रशासनिक गलती या किसी आपत्ति के कारण उसका नाम सूची से बाहर हो सकता है। यही वजह है कि एसआईआर जैसी प्रक्रिया में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण है। निर्वाचन आयोग और प्रशासन को यह साफ करना होगा कि किसी मतदाता के खिलाफ आपत्ति किस आधार पर दर्ज की जा रही है, उसे अपनी बात रखने का कितना अवसर मिलेगा और अंतिम निर्णय से पहले उसकी सुनवाई किस स्तर पर होगी। साजिश और स्कैम जैसे आरोप राजनीतिक रूप से बेहद गंभीर हैं। ऐसे आरोप केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहने चाहिए। यदि किसी के पास ठोस तथ्य, दस्तावेज या प्रक्रिया में अनियमितता के प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए और सक्षम निर्वाचन अधिकारियों के सामने रखा जाना चाहिए। दूसरी ओर निर्वाचन मशीनरी की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि प्रक्रिया नियमों के तहत चल रही है। जब समाज में संदेह पैदा हो जाए तो प्रशासन को तथ्यों के साथ उस संदेह का समाधान करना पड़ता है। उत्तराखंड में चुनावी राजनीति पहले ही 2027 विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी विवाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक रंग लेगा। इसलिए एसआईआर की प्रक्रिया को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर रखकर संचालित करना जरूरी है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में समस्या का एक अलग सामाजिक पक्ष भी है। बड़ी संख्या में परिवारों के पुराने रिकार्ड अलग-अलग स्थानों पर हैं। पलायन के कारण लोगों के पते बदले हैं। कई बुजुर्गों के पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में यदि सत्यापन की प्रक्रिया कठोर होती है तो सबसे पहले वही नागरिक प्रभावित हो सकते हैं जो प्रशासनिक प्रक्रियाओं तक आसानी से नहीं पहुंच पाते। इसलिए एसआईआर में दस्तावेज मांगने के साथ-साथ नागरिकों की वास्तविक परिस्थितियों को भी समझना होगा। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ एसआईआर अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है। सत्ता पक्ष इसे मतदाता सूची को शुद्ध करने की कवायद बता सकता है, जबकि विपक्ष इसे मताधिकार और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर सवाल उठा रहा है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन मतदाता सूची का सवाल उससे कहीं बड़ा है। यदि कोई अपात्र व्यक्ति सूची में है तो उसे हटाया जाना चाहिए। यदि कोई पात्र नागरिक छूट गया है तो उसका नाम जोड़ा जाना चाहिए। लेकिन दोनों काम एक समान पारदर्शिता और निष्पक्षता से होने चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी के आरोपों ने इस बहस को जरूर तेज कर दिया है, लेकिन अब गेंद निर्वाचन तंत्र के पाले में है। आरोपों का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि आंकड़ों, प्रक्रिया और पारदर्शिता से देना होगा। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि कौन किस पर आरोप लगा रहा है। सबसे बड़ा सवाल होता हैकृक्या हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित है? और एसआईआर की पूरी प्रक्रिया का जवाब इसी एक सवाल में छिपा है।

कांग्रेस हाईकमान का उत्तराखंड पर फोकस

राहुल गांधी के दौरे और मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद पार्टी ने राज्य में चुनावी गतिविधियां तेज की कांग्रेस उत्तराखंड को केवल राज्य इकाई न मानकर सत्ता में वापसी का मुख्य अवसर देख रही कांग्रेस को सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के साथ-साथ करना होगा बूथ संगठन को भी मजबूत देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश की सियासत पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। पिछले कुछ समय में राष्ट्रीय नेतृत्व के नेताओं की सक्रियता, संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों ने संकेत दिया है कि कांग्रेस अब उत्तराखंड को केवल एक राज्य इकाई के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता में वापसी की अहम राजनीतिक संभावना के तौर पर देख रही है। जून में राहुल गांधी के दौरे और उसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी रैली के बाद पार्टी की चुनावी गतिविधियों में तेजी आई है। कांग्रेस के लिए उत्तराखंड इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में भाजपा लगातार दूसरी बार सरकार बनाने के बाद अब सत्ता की हैट्रिक की कोशिश में है। ऐसे में कांग्रेस के सामने सिर्फ सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की चुनौती नहीं है, बल्कि उसे अपने संगठन को बूथ तक मजबूत करके चुनावी मुकाबले को बराबरी पर लाना होगा। उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से संगठन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। प्रदेश कार्यकारिणी के गठन में देरी भी पार्टी के भीतर चर्चा का विषय रही। जून में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक हाईकमान प्रदेश में छोटी लेकिन सक्रिय टीम बनाकर नेताओं की जिम्मेदारियां तय करने पर जोर दे रहा था। अब राष्ट्रीय नेतृत्व का फोकस केवल संगठन घोषित करने तक सीमित नहीं दिख रहा। विधानसभा स्तर पर आंतरिक सर्वे के जरिए पार्टी यह जानने की कोशिश कर रही है कि किस सीट पर संगठन की स्थिति क्या है, कौन से नेता प्रभावी हैं और जनता के बीच कौन से मुद्दे चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। यह बदलाव महत्वपूर्ण है। कांग्रेस यदि इस बार पुराने राजनीतिक समीकरणों के भरोसे चुनाव लड़ने के बजाय सीटवार रणनीति तैयार करती है तो मुकाबले की तस्वीर बदल सकती है। उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह भाजपा विरोध को वोट में कैसे बदले। बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, महंगाई और पहाड़ की बुनियादी समस्याएं कांग्रेस के लिए मुद्दे हैं। लेकिन मुद्दा उठाना और उसे चुनावी संगठन के जरिए मतदाता तक पहुंचाना दो अलग बातें हैं। कांग्रेस को यह भी तय करना होगा कि उसका चुनावी नैरेटिव क्या होगा। क्या पार्टी केवल सरकार की कमियां गिनाएगी या उत्तराखंड के अगले पांच वर्षों के लिए कोई स्पष्ट राजनीतिक और विकास माडल भी सामने रखेगी? यही वह सवाल है जिसका जवाब हाईकमान को प्रदेश नेतृत्व से चाहिए। कांग्रेस के सामने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न नेतृत्व का है। पार्टी में कई वरिष्ठ नेता हैं और हर नेता का अपना क्षेत्रीय प्रभाव है। लेकिन चुनावी राजनीति में सामूहिक नेतृत्व और मुख्यमंत्री चेहरे की बहस के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। हाईकमान के सामने चुनौती यह भी है कि टिकट वितरण से पहले नेताओं के बीच खींचतान को कैसे रोका जाए। एक परिवार, एक टिकट जैसे मुद्दे भी पार्टी के भीतर चर्चा में रहे हैं। यदि टिकट को लेकर अंतिम समय तक असमंजस रहा तो संगठनात्मक तैयारी प्रभावित हो सकती है। इसलिए हाईकमान शायद इस बार पहले से फीडबैक लेकर सीटों और संभावित उम्मीदवारों पर काम करना चाहता है। कांग्रेस पर दबाव इसलिए भी है क्योंकि भाजपा ने भी 2027 के लिए संगठन को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। हाल में भाजपा ने अपनी प्रदेश कार्यकारिणी का विस्तार किया है और संगठनात्मक स्तर पर चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाया है। ऐसे में कांग्रेस के लिए समय कम है। चुनाव चाहे निर्धारित समय पर हों या समय से पहले होने की अटकलें राजनीतिक माहौल में बनी रहें, विपक्षी दल को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना होगा। फिलहाल चुनाव समय से पहले कराने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं है। उत्तराखंड की राजनीति को केवल देहरादून या मैदानी क्षेत्रों के राजनीतिक समीकरणों से नहीं समझा जा सकता। पहाड़ की नाराजगी, मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षाएं, युवाओं का रोजगार संकट, पलायन और महिलाओं की राजनीतिक भूमिकाकृये सभी चुनावी परिणाम तय करने वाले मुद्दे हो सकते हैं। कांग्रेस यदि हाईकमान के फोकस को जमीन तक ले जाना चाहती है तो उसे हर विधानसभा क्षेत्र की अलग राजनीतिक कहानी समझनी होगी। पहाड़ की सीट पर पहाड़ का मुद्दा और मैदानी सीट पर स्थानीय मुद्देकृएक ही नारे से पूरा उत्तराखंड नहीं जीता जा सकता। राष्ट्रीय नेतृत्व का उत्तराखंड की ओर देखना कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन हाईकमान की सक्रियता अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं है। असल परीक्षा प्रदेश कांग्रेस की है। क्या वरिष्ठ नेता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर एकजुट होंगे? क्या संगठन बूथ स्तर तक पहुंचेगा? क्या टिकट वितरण में सर्वे और जमीनी फीडबैक को महत्व मिलेगा? क्या कांग्रेस युवाओं और महिलाओं के लिए ठोस राजनीतिक एजेंडा तैयार करेगी? और सबसे अहमकृक्या पार्टी भाजपा के खिलाफ नाराजगी को अपने पक्ष में मतदान में बदल पाएगी? उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए 2027 केवल सत्ता में वापसी का चुनाव नहीं है। यह संगठन की विश्वसनीयता और राजनीतिक अस्तित्व की भी बड़ी परीक्षा है। हाईकमान ने अगर उत्तराखंड पर फोकस बढ़ाया है तो अब प्रदेश कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि दिल्ली से आया फोकस पहाड़ के गांवों तक पहुंच भी रहा है। क्योंकि चुनाव हाईकमान की बैठकों में नहीं, आखिरकार बूथ और मतदाता के बीच जीता जाता है।

भाजपा का ‘मंथन’ और 2027 का ‘रोडमैप’

130 मंडलों के अध्यक्ष जुटे, 2027 की तैयारी को बूथ तक ले जाने की कवायद सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का आह्वान बैठक के दौरान जमीनी स्तर की समस्याओं, संगठन की मौजूदा स्थिति पर चर्चा देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने संगठन को जमीन पर और मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। भाजपा के कुमाऊं संभाग के जिला अध्यक्षों और मंडल अध्यक्षों की महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक हुई। बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की मौजूदगी में संगठन की स्थिति, आगामी कार्यक्रमों और चुनावी रणनीति पर विस्तार से मंथन किया गया। बैठक में कुमाऊं संभाग के आठ जिलों से जिला अध्यक्षों के साथ करीब 130 मंडल अध्यक्ष शामिल हुए। भाजपा नेतृत्व के स्तर पर इसे संगठन को बूथ तक सक्रिय करने की दिशा में महत्वपूर्ण बैठक माना जा रहा है। बैठक का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और राष्ट्रगीत वंदे मातरम के साथ हुआ। मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि भाजपा कैडर आधारित पार्टी है और संगठन को लगातार मजबूत करने के लिए इस तरह की बैठकें जरूरी हैं। उन्होंने पदाधिकारियों से सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने तथा जमीनी स्तर पर संगठन को और प्रभावी बनाने का आह्वान किया। बैठक में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक गतिविधियों पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने जिला और मंडल अध्यक्षों से संगठन की मौजूदा स्थिति, जमीनी समस्याओं और आगामी कार्ययोजना पर सीधे संवाद करने को कहा। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के संवाद से सरकार तक जमीनी स्तर की समस्याएं और सुझाव पहुंचते हैं। संगठन और सरकार के बीच यह संवाद लगातार मजबूत होना चाहिए। भाजपा के लिए कुमाऊं का राजनीतिक महत्व काफी अधिक है। ऐसे में आठ जिलों और 130 मंडलों के पदाधिकारियों को एक मंच पर बुलाकर संगठन की समीक्षा करना महज नियमित बैठक से आगे की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ने बैठक में सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए पदाधिकारियों से इन्हें जन-जन तक पहुंचाने की अपील की। उनका जोर इस बात पर रहा कि सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और संगठन कार्यकर्ता सरकार और जनता के बीच प्रभावी सेतु की भूमिका निभाएं। भाजपा की चुनावी रणनीति में यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सत्ता में रहते हुए पार्टी को सरकार के कामकाज का लाभ चुनावी मैदान में लेने के लिए संगठनात्मक मशीनरी को सक्रिय रखना होगा। कांग्रेस पर धामी का हमला मुख्यमंत्री धामी ने कांग्रेस पर भी निशाना साधा। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से भाजपा और दलितों से जुड़े मुद्दों पर दिए गए बयानों को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा और आरोपों को खारिज किया। धामी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के संकल्प के साथ काम कर रही है। उन्होंने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के अपमान, सनातन और महिला विरोधी होने तथा एक विशेष समुदाय के वोट बैंक की राजनीति करने जैसे आरोप भी लगाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस लगातार चुनावी हार के बावजूद अपनी गलतियों से सीखने को तैयार नहीं है। यानी संगठन की बैठक में भी भाजपा का राजनीतिक संदेश साफ रहाकृसंगठन को मजबूत करो और साथ ही विपक्ष के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव को भी धार दो। संगठन को लेकर दिया रोडमैप भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि पार्टी संगठन लगातार विस्तार और मजबूती की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने मंडल और जिला स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने तथा संगठनात्मक कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से संचालित करने पर जोर दिया। बैठक में सरकार के काम को जनता तक पहुंचाने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की रणनीति पर भी चर्चा हुई। भाजपा नेतृत्व की कोशिश साफ दिखाई देती है कि चुनाव से काफी पहले संगठन के हर स्तर को सक्रिय किया जाए, ताकि अंतिम समय में केवल प्रत्याशी और चुनावी मुद्दों के भरोसे न रहना पड़े। आठ जिले, 130 मंडल और चुनावी संदेश बैठक में नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, काशीपुर, चंपावत, पिथौरागढ़, रानीखेत, अल्मोड़ा और बागेश्वर समेत कुमाऊं संभाग के आठ जिलों के जिला अध्यक्ष और 130 मंडल अध्यक्ष शामिल हुए। कुमाऊं में भाजपा का यह संगठनात्मक मंथन कांग्रेस के लिए भी राजनीतिक संदेश माना जा सकता है। कांग्रेस जहां 2027 की तैयारी में संगठन को मजबूत करने और सीटवार समीकरणों पर काम करने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा ने पहले से ही अपने संगठनात्मक ढांचे को सक्रिय करने पर जोर बढ़ा दिया है। अब देखना यह होगा कि 130 मंडलों में तैयार की जा रही रणनीति जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है।

‘देवभूमि में डर्टी पालिटिक्स’

प्रदेश में आपदा, बदहाल सड़कें और पलायन जैसे गंभीर मुद्दे वही दिल्ली से लेकर दून तक राजनीतिक बयानबाजी चरम पर कांग्रेस ने कई मुद्दों को ढाल बनाकर सरकार की घेराबंदी तेज प्रदेश में राज्य के जमीनी मुद्दे फिलहाल हाशिए पर नजर आ रहे देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड इन दिनों सिर्फ बारिश, आपदा, सड़क और पहाड़ की बदहाल जिंदगी के सवालों से नहीं जूझ रहा, बल्कि सियासत का तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। प्रदेश की राजनीति अब देहरादून की सीमाओं से निकलकर दिल्ली तक पहुंचती दिखाई दे रही है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप की ऐसी जंग छिड़ी है, जिसमें विकास और जनसरोकार के मुद्दे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति तेज कर दी है। भाजपा जहां संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस सरकार को घेरने के लिए बेरोजगारी, शिक्षा, पलायन, महंगाई, आपदा और सरकारी व्यवस्थाओं को मुद्दा बना रही है। दोनों दलों की सक्रियता से साफ है कि आने वाले महीनों में प्रदेश की राजनीति और ज्यादा आक्रामक होने वाली है। राजनीति में आरोप लगना नई बात नहीं है, लेकिन उत्तराखंड में जिस तरह व्यक्तिगत हमले, बयानबाजी और एक-दूसरे की राजनीतिक नीयत पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उसने बहस का स्तर जरूर बदल दिया है। सत्ता पक्ष विपक्ष पर भ्रम फैलाने और राजनीतिक अवसरवाद का आरोप लगा रहा है। विपक्ष सरकार पर जनमुद्दों से ध्यान भटकाने और सत्ता का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए करने का आरोप लगा रहा है। इस सियासी शोर में असली सवाल यह है कि पहाड़ के गांवों में क्या बदल रहा है? क्या युवाओं को रोजगार मिल रहा है? क्या सरकारी स्कूल सुरक्षित हैं? क्या पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं सुधरी हैं? क्या पलायन रुका है? क्या बरसात में हर साल टूटने वाली सड़क और पुलों की समस्या का स्थायी समाधान हुआ है? इन सवालों के जवाब राजनीतिक नारों से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले काम से मिलेंगे। उत्तराखंड छोटा राज्य जरूर है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में इसकी राजनीतिक अहमियत लगातार बढ़ी है। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का असर सिर्फ देहरादून तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिल्ली की राजनीति में भी उसकी गूंज सुनाई देती है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही उत्तराखंड को 2027 की बड़ी राजनीतिक लड़ाई की प्रयोगशाला के रूप में देख रहे हैं। भाजपा के लिए सत्ता बरकरार रखना चुनौती है तो कांग्रेस के सामने लंबे समय से सत्ता से बाहर रहने के बाद वापसी की चुनौती है। यही वजह है कि प्रदेश के छोटे-बड़े राजनीतिक घटनाक्रम दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक पहुंच रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व की नजर उत्तराखंड के संगठन, सरकार और विपक्ष की गतिविधियों पर बनी हुई है। इस लड़ाई का एक नया मैदान सोशल मीडिया भी है। नेताओं के बयान, वीडियो, पोस्ट और आरोप कुछ ही मिनटों में प्रदेशभर में पहुंच रहे हैं। राजनीतिक दल अपने समर्थकों के जरिए नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया की यह आक्रामक राजनीति वास्तव में जनता के सवालों का समाधान करेगी? लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है और सत्ता पक्ष का दायित्व जनता को अपने काम का हिसाब देना। लेकिन जब दोनों पक्षों की राजनीति सिर्फ एक-दूसरे को नीचा दिखाने तक सीमित हो जाए, तो लोकतांत्रिक बहस कमजोर होती है। 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसकी तैयारी शुरू हो चुकी है। टिकट के दावेदार सक्रिय हैं। संगठनात्मक बैठकों का दौर चल रहा है। नेताओं के दौरे बढ़ रहे हैं। बूथ स्तर पर समीकरण बनाए जा रहे हैं। पुराने नेताओं की भूमिका और नए चेहरों की संभावनाओं पर चर्चा तेज है। भाजपा के सामने सरकार के कामकाज को लेकर जनता के बीच भरोसा बनाए रखने की चुनौती है। कांग्रेस के सामने सरकार विरोधी माहौल को वोट में बदलने की चुनौती है। क्षेत्रीय दलों और छोटे राजनीतिक समूहों के सामने अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने की चुनौती है। ऐसे में आने वाले दिनों में बयान और पलटवार और तीखे होंगे। उत्तराखंड की राजनीति में दिल्ली का प्रभाव हो सकता है, लेकिन अंतिम फैसला पहाड़, मैदान और गांव-कस्बों की जनता करेगी। जनता यह देखेगी कि कौन उसके मुद्दों पर खड़ा है और कौन सिर्फ चुनाव के समय उसके दरवाजे पर पहुंचता है। देवभूमि को डर्टी पालिटिक्स नहीं, साफ राजनीति चाहिए। आरोपों की राजनीति नहीं, जवाबदेही की राजनीति चाहिए। मंचों पर बड़े-बड़े दावों के बजाय स्कूल, अस्पताल, सड़क, रोजगार और सुरक्षित जीवन चाहिए। 2027 की लड़ाई में सबसे बड़ा सवाल यही होगाकृकौन किसे हराएगा, यह बाद की बात है, पहले यह तय होगा कि जनता के असली सवालों पर कौन खड़ा दिखाई देता है। क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति का फैसला दिल्ली के बंद कमरों में नहीं, पहाड़ के गांवों और मैदान के बूथों पर होगा।

रविवार, 16 अगस्त 2026

udaydinmaan: ‘जंदरू’ मशीनों के शोर सेे ‘खामोश’

udaydinmaan: ‘जंदरू’ मशीनों के शोर सेे ‘खामोश’: आधुनिकता की भेंट चढ़ी पर्वतीय जीवन-शैली व अपनों का साथ पहाड़ में सूरज से पहले जागता था पहाड़ का स्वाभिमान और श्रम चक्की के पत्थरों के साथ पिस ग...

‘जंदरू’ मशीनों के शोर सेे ‘खामोश’

आधुनिकता की भेंट चढ़ी पर्वतीय जीवन-शैली व अपनों का साथ पहाड़ में सूरज से पहले जागता था पहाड़ का स्वाभिमान और श्रम चक्की के पत्थरों के साथ पिस गई गाँव की सदियों पुरानी परंपराएँ पहाड़ के बुजुर्गों के दिलों में आज भी जीवंत है जंदरू का वह संगीत देहरादून। जंदरू सिर्फ अनाज पीसने की मशीन नहीं था। यह पहाड़ के घर-आंगन की वह आवाज थी, जिसमें मेहनत भी थी, अपनापन भी और सामूहिक जीवन की धड़कन भी। आज मशीनों ने काम आसान कर दिया है, लेकिन जंदरू की घरघराहट के साथ पहाड़ की एक पूरी जीवन-शैली भी धीरे-धीरे खामोश हो रही है। पहाड़ की सुबह कभी सिर्फ सूरज की पहली किरण से नहीं होती थी। वह शुरू होती थी आंगन में बंधी गाय की घंटी से, चूल्हे में जलती लकड़ी की महक से और कहीं दूर से आती जंदरू की घर्र-घर्र आवाज से। किसी घर में गेहूं पिस रहा है, कहीं मंडुवा, कहीं झंगोरा। महिलाएं अपने रोजमर्रा के काम में जुटी हैं और जंदरू अपनी लय में घूमता जा रहा है। यह दृश्य आज भले ही पहाड़ के गांवों में कम दिखाई देता हो, लेकिन बुजुर्गों की स्मृतियों में जंदरू आज भी उसी तरह जिंदा है। जंदरू यानी हाथ से या पारंपरिक तरीके से अनाज पीसने का वह साधन, जिसने पहाड़ के परिवारों को पीढ़ियों तक आत्मनिर्भर बनाए रखा। इसमें सिर्फ अनाज नहीं पिसता था, रिश्ते भी जुड़ते थे। पहाड़ के पुराने गांवों में जीवन सामूहिक था। किसी के घर जंदरू चल रहा है तो पड़ोस की महिलाएं भी वहां पहुंच जाती थीं। काम के साथ बातचीत होती, सुख-दुख बांटे जाते और गांव की छोटी-बड़ी खबरें भी वहीं मिल जाती थीं। किसी के घर शादी है तो चर्चा जंदरू के पास। किसी के घर बच्चा हुआ तो खबर जंदरू तक। खेत में फसल कैसी हुई, किसके बेटे की नौकरी लगी, किसकी बेटी की शादी तय हुईकृगांव की अपनी छोटी-सी न्यूज एजेंसी भी जैसे यही हुआ करती थी। आज सोशल मीडिया पर सेकंडों में खबर फैल जाती है, लेकिन उस दौर की खबरों में एक चीज ज्यादा थीकृअपनापन। जंदरू का रिश्ता पहाड़ के पारंपरिक खान-पान से भी गहरा था। मंडुवा, झंगोरा, गेहूं और दूसरे स्थानीय अनाजों को पीसने में इसका इस्तेमाल होता था। आज जब मिलेट्स को लेकर देश-दुनिया में चर्चा हो रही है और पहाड़ी अनाजों को स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में फिर पहचान मिल रही है, तब जंदरू की याद भी लौटती है। कभी यही अनाज पहाड़ के गरीब परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि उसकी खाद्य-सुरक्षा का आधार थे। घर का अनाज घर में ही तैयार होता था। खेत से खलिहान और खलिहान से जंदरू तक की यह यात्रा पहाड़ की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का हिस्सा थी। जंदरू चलाना आसान काम नहीं था। इसमें श्रम लगता था। समय लगता था। शरीर की ताकत लगती थी। लेकिन उस मेहनत का अपना संतोष था। आज बटन दबाते ही आटा तैयार हो जाता है। सुविधा बढ़ी है, इसमें कोई संदेह नहीं। पहाड़ की महिलाओं के लिए मशीनों ने कठिन श्रम को कम किया है। यह बदलाव जरूरी भी था। लेकिन सुविधा की इस दौड़ में हमने कुछ चीजें खो भी दीं। जंदरू की आवाज चली गई और उसके साथ सामूहिक श्रम की संस्कृति भी कमजोर होती चली गई। पहाड़ के कई गांवों में पुराने जंदरू अब घरों के कोनों में पड़े मिल जाते हैं। कहीं उन्हें लकड़ी के सामान की तरह संभालकर रखा गया है तो कहीं वह धीरे-धीरे टूट रहे हैं। नई पीढ़ी के बच्चों के लिए यह सवाल स्वाभाविक हैकृयह क्या है? यही सवाल बताता है कि बदलाव कितना बड़ा है, जिस वस्तु के बिना कभी घर का भोजन पूरा नहीं होता था, वह आज नई पीढ़ी के लिए पहचान से बाहर होती जा रही है। जरूरत इस बात की है कि जंदरू को केवल संग्रहालय की वस्तु बनाकर न रखा जाए। इसे पहाड़ की लोक-संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान के हिस्से के रूप में दर्ज किया जाए। गांवों में पुराने जंदरू, ओखली, सिलबट्टे, हल और दूसरे पारंपरिक उपकरण सिर्फ लकड़ी-पत्थर के सामान नहीं हैं। इनके साथ कृषि, भोजन, श्रम और सामाजिक जीवन की पूरी कहानी जुड़ी हुई है। अगर आज इन्हें दर्ज नहीं किया गया तो कल इतिहास की किताबों में इनके नाम तो मिल जाएंगे, लेकिन इनके पीछे की जिंदगी नहीं मिलेगी। शायद जंदरू पहले की तरह हर घर में वापस न आए। आधुनिक जीवन में इसकी जरूरत भी पहले जैसी नहीं है। लेकिन पहाड़ के किसी गांव में अगर किसी दिन फिर जंदरू की घर्र-घर्र सुनाई दे, तो समझिए सिर्फ अनाज नहीं पिस रहा है। उस आवाज में पहाड़ अपनी स्मृति पीसकर आटा नहीं बना रहा होगा, बल्कि अपनी जड़ों को अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहा होगा। क्योंकि पहाड़ की पहचान सिर्फ उसके पहाड़ों, नदियों और देवस्थलों में नहीं है। उसकी पहचान उन आवाजों में भी है जो कभी गांव की सुबह को जीवंत करती थीं। जंदरू की घरघराहट ऐसी ही एक आवाज हैकृजो अब कम सुनाई देती है, लेकिन पहाड़ की यादों में आज भी लगातार घूम रही है।

तराई से पहाड़ तक ‘घेराबंदी’

कमजोर सीटों पर विशेष नजर, भाजपा ने तय की 2027 की पटकथा कार्यकर्ताओं से संवाद, जमीनी हकीकत से तय होगा टिकट का फार्मूला जहां पिछड़े थे 2022 में, वहां से 2027 की नींव मजबूत कर रही भाजपा सीएम धामी और संगठन के दिग्गजों की हुंकार, कस ली चुनावी लगाम देहरादून। कुमाऊं मंडल में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों को लेकर भाजपा ने अपनी सक्रियता तेज कर दी है। नैनीताल में पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ सांसदों, विधायकों और संगठन के प्रमुख पदाधिकारियों ने चुनावी रणनीति पर चर्चा करेंगे। बैठक में कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद कर जमीनी स्तर पर पार्टी की स्थिति, सरकार की योजनाओं और जनता के बीच बने माहौल का फीडबैक भी लिया गया। बैठक को केवल संगठनात्मक कार्यक्रम के बजाय आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कुमाऊं की राजनीति में नैनीताल समेत तराई और पर्वतीय क्षेत्रों की सीटों को लेकर भाजपा ने अभी से अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी का जोर उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष रूप से है, जहां पिछले चुनाव में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले थे। मुख्यमंत्री धामी ने कार्यकर्ताओं से संवाद करते हुए सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने और स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए सक्रिय भूमिका निभाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संगठन की ताकत बूथ स्तर के कार्यकर्ता हैं और चुनाव में जीत का आधार भी यही कार्यकर्ता तैयार करते हैं। बैठक में सांसदों और विधायकों से उनके क्षेत्रों की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर भी फीडबैक लिया गया। स्थानीय स्तर पर सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, पलायन और विकास से जुड़े मुद्दों को लेकर जनता की अपेक्षाओं पर चर्चा हुई। कार्यकर्ताओं ने भी अपने क्षेत्रों की समस्याएं और राजनीतिक परिस्थितियां नेतृत्व के सामने रखीं। भाजपा के लिए कुमाऊं मंडल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों की राजनीति अलग-अलग मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती है। नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और ऊधमसिंह नगर की विधानसभा सीटों पर स्थानीय समीकरण लगातार बदल रहे हैं। पार्टी नेतृत्व की कोशिश है कि सरकार की योजनाओं और संगठन की गतिविधियों को बूथ स्तर तक मजबूत किया जाए। इसके लिए सांसदों और विधायकों को भी कार्यकर्ताओं के साथ लगातार संवाद बनाए रखने का संदेश दिया गया है। बैठक का एक अहम पहलू कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद रहा। भाजपा नेतृत्व अब केवल ऊपर से चुनावी रणनीति तय करने के बजाय बूथ और विधानसभा स्तर से फीडबैक जुटाने पर जोर दे रहा है। कार्यकर्ताओं से पूछा जा रहा है कि जनता के बीच सरकार को लेकर क्या धारणा है, किन मुद्दों पर नाराजगी है और किन योजनाओं का प्रभाव दिखाई दे रहा है। राजनीतिक जानकारों की नजर में यह कवायद 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के संगठनात्मक रोडमैप का हिस्सा है। कांग्रेस जहां सत्ता विरोधी माहौल और बेरोजगारी, महंगाई, पलायन तथा स्थानीय मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी कर रही है, वहीं भाजपा सरकार के कामकाज और संगठन की मजबूती को चुनावी आधार बनाने की कोशिश में है। बैठक में मुख्यमंत्री धामी की मौजूदगी को भी राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। मुख्यमंत्री लगातार अलग-अलग क्षेत्रों में संगठन और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद कर रहे हैं। इससे यह संकेत मिल रहा है कि चुनावी साल नजदीक आने से पहले भाजपा सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर विशेष ध्यान दे रही है। बैठक से निकला सबसे बड़ा संदेश यही है कि भाजपा ने कुमाऊं में चुनावी तैयारियों को अब केवल चर्चा तक सीमित नहीं रखा है। संगठन को बूथ स्तर पर सक्रिय करने, विधायकों और सांसदों की जवाबदेही बढ़ाने तथा कार्यकर्ताओं से लगातार फीडबैक लेने की रणनीति पर काम शुरू हो चुका है। अब देखना यह होगा कि नैनीताल की बैठक में बनी रणनीति जमीन पर कितनी तेजी से उतरती है और कुमाऊं की जनता के बीच भाजपा के लिए यह राजनीतिक संवाद कितना असरदार साबित होता है।

‘खामोशी’ टूटी और ‘सियासत’ गर्माई

अंकिता भंडारी मुद्दे पर कांग्रेस का बड़ा दांव, दिल्ली से देहरादून तक हड़कंप अंकिता के माता-पिता का दर्द थाम कांग्रेस ने खोला सरकार के खिलाफ मोर्चा 2022 से जल रही आग अब 2027 के विधानसभा चुनाव में गरमाएगा यह मुद्दा अंकिता भंडारी के माता-पिता से नेताप्रतिपक्ष राहुल संग 45 मिनट की मुलाकात देहरादून। दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की अंकिता भंडारी के माता-पिता से मुलाकात ने उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर उस दर्द को चुनावी बहस के केंद्र में ला दिया है, जो 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ। राहुल गांधी ने अंकिता के माता-पिता से करीब 45 मिनट तक अकेले में बातचीत की और उनकी पीड़ा सुनी। मुलाकात के बाद कांग्रेस ने इसे केवल एक परिवार से मुलाकात नहीं, बल्कि उत्तराखंड की बेटियों की सुरक्षा, न्याय और सरकार की जवाबदेही से जुड़ा सवाल बताया। अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड की राजनीति में पहले से ही संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच राहुल गांधी का अंकिता के माता-पिता से सीधे मिलना कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पार्टी इस मुद्दे को पहाड़ की बेटी, महिला सुरक्षा और न्याय के सवाल से जोड़कर भाजपा सरकार को घेरने की कोशिश कर सकती है। राहुल गांधी ने माता-पिता से अकेले में करीब 45 मिनट बातचीत की। इस मुलाकात का राजनीतिक संदेश इसलिए भी बड़ा है क्योंकि अंकिता भंडारी का मामला उत्तराखंड में सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं रह गया है। यह महिला सुरक्षा, सत्ता और प्रभावशाली लोगों के दबाव तथा न्याय व्यवस्था को लेकर जनता के बीच उठते सवालों का प्रतीक बन चुका है। कांग्रेस इस मुलाकात को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर आगे बढ़ाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। पार्टी का प्रयास होगा कि अंकिता के माता-पिता की आवाज को विधानसभा चुनाव की बहस में प्रमुख स्थान मिले और इसे उत्तराखंड की महिलाओं और युवाओं के सवालों से जोड़ा जाए। अंकिता प्रकरण भाजपा के लिए इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि मामले से जुड़े आरोपों और राजनीतिक विवादों ने सरकार को लंबे समय तक विपक्ष के निशाने पर रखा। कांग्रेस अब एक बार फिर सवाल उठा रही है कि क्या अंकिता के परिवार को वह न्याय मिला, जिसकी उम्मीद उसने की थी? राहुल गांधी की मुलाकात के बाद यह मुद्दा सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक तेजी से उभर सकता है। कांग्रेस के लिए यह भाजपा सरकार के खिलाफ केवल एक आरोप का विषय नहीं, बल्कि महिला सम्मान और न्याय की लड़ाई का राजनीतिक नैरेटिव बनाने का अवसर है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे पहले से ही महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। लेकिन अंकिता भंडारी प्रकरण इन सभी मुद्दों के बीच भावनात्मक और राजनीतिक रूप से अलग प्रभाव रखता है। कांग्रेस की कोशिश हो सकती है कि वह इस मामले को उत्तराखंड की बेटी के सवाल के रूप में पेश करे। राहुल गांधी की मुलाकात इसी रणनीति की शुरुआत मानी जा रही है। पार्टी यदि इस मुद्दे को महिला सुरक्षा, रोजगार और पहाड़ की बेटियों के भविष्य से जोड़ने में सफल रहती है तो भाजपा के लिए जवाब देना आसान नहीं होगा। हालांकि भाजपा के सामने भी इसका राजनीतिक जवाब मौजूद है। सरकार लगातार यह कहती रही है कि अंकिता मामले में जांच और न्यायिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई हुई है। इसलिए चुनावी मंच पर कांग्रेस के आरोपों का जवाब भाजपा कानूनी कार्रवाई और सरकार की ओर से उठाए गए कदमों के आधार पर देने की कोशिश करेगी। इस मुलाकात के बाद सवाल कांग्रेस से भी होगा। क्या पार्टी अंकिता के परिवार की पीड़ा को केवल चुनावी मुद्दा बनाएगी या इसे न्याय और महिला सुरक्षा के व्यापक अभियान में बदलेगी? उत्तराखंड की जनता इस फर्क को समझती है। राहुल गांधी की मुलाकात ने फिलहाल भाजपा के सामने एक पुराना लेकिन संवेदनशील सवाल फिर खड़ा कर दिया है। 2027 में मुकाबला सिर्फ सरकार बनाने का नहीं होगा, बल्कि जनता की स्मृतियों और भावनाओं पर भी होगा। अंकिता का नाम उत्तराखंड की राजनीति में फिर सामने है। सवाल यह है कि 2027 के चुनाव में यह नाम सिर्फ भाषणों में गूंजेगा या महिला सुरक्षा और न्याय की राजनीति का स्थायी मुद्दा बनेगा?

udaydinmaan: ‘गंगाजल, गौमूत्र और सियासी जहर’

udaydinmaan: ‘गंगाजल, गौमूत्र और सियासी जहर’: मंच के शुद्धिकरण पर सियासत तेज,सवाल मंच का नहीं, राजनीति की सोच का भाषणों व नारों से आगे बढ़ी जंग, विरोधियों को अपवित्र ठहराने का नया पैंतरा...

बेटी बचाओ का ‘पाखंड’

गंगोलीहाट में सिस्टम का जनाजा, टपकती छत के नीचे घुटती शिक्षा नारों में देश प्रथम, गंगोलीहाट में टपकती छत के नीचे बेटियाँ लाचार खंडहर में पढ़ने को मजबूर बेटियां, बारिश में कक्षाओं में टपकता पानी देहरादून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देशभर में बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा को लेकर सरकार की प्राथमिकता बताता है। लेकिन उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट में राजकीय बालिका इंटर कालेज की तस्वीर इस दावे के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। यहां स्कूल भवन की हालत इतनी खराब बताई जा रही है कि बारिश के दौरान पानी कक्षाओं के भीतर तक पहुंच रहा है और छात्राओं को खस्ताहाल भवन में पढ़ाई करनी पड़ रही है। पर्वतीय क्षेत्र में शिक्षा की यह तस्वीर सिर्फ एक भवन की बदहाली नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो सरकारी योजनाओं और बड़े नारों के बीच स्कूल की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में पीछे छूटती दिखाई देती है। गंगोलीहाट के बालिका विद्यालय में बारिश के दौरान छत से पानी टपकने की समस्या छात्राओं और शिक्षकों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। कक्षाओं में पानी आने से पढ़ाई प्रभावित होने के साथ ही विद्यालय भवन की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं। पर्वतीय इलाकों में लगातार बारिश और भूस्खलन के बीच पुराने भवनों की स्थिति पहले से ही चिंता का विषय रहती है। ऐसे में किसी बालिका विद्यालय का भवन जर्जर हालत में होना केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि छात्राओं की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। देश में बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से लगातार अभियान चलाए जाते हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ इसी सोच का प्रमुख हिस्सा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि बेटी को पढ़ाने के लिए सबसे पहले उसे सुरक्षित और सम्मानजनक स्कूल का वातावरण कौन देगा? गंगोलीहाट की तस्वीर इसी बुनियादी सवाल को सामने लाती है। अगर स्कूल की छत बारिश में पानी रोकने में सक्षम नहीं है, भवन की हालत खराब है और छात्राओं को असुरक्षित माहौल में पढ़ना पड़ रहा है, तो योजनाओं के प्रचार और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी साफ दिखाई देती है। उत्तराखंड में भाजपा की डबल इंजन सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के दावे करती रही है। लेकिन गंगोलीहाट का यह विद्यालय उन दावों की जमीनी परीक्षा ले रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सवाल यह है कि पर्वतीय जिलों के सरकारी विद्यालयों की वास्तविक स्थिति की नियमित निगरानी क्यों नहीं हो रही? पुराने और जर्जर भवनों की मरम्मत तथा पुनर्निर्माण के लिए समयबद्ध व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा रही? शिक्षा व्यवस्था केवल स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड या नई योजनाओं से मजबूत नहीं होती। उसकी पहली शर्त एक सुरक्षित भवन, पर्याप्त शिक्षक, पीने का पानी, शौचालय और ऐसा वातावरण है जिसमें बच्चे बिना डर के पढ़ सकें। सरकारें अपने कामकाज को जनता तक पहुंचाने के लिए प्रचार और जनसंपर्क पर खर्च करती हैं। राजनीतिक दल भी उपलब्धियों को लेकर बड़े-बड़े दावे करते हैं। लेकिन एक सरकारी स्कूल की छत अगर बारिश में टपक रही हो तो वहां पढ़ने वाली छात्रा के लिए सरकारी विज्ञापन का कोई अर्थ नहीं रह जाता। गंगोलीहाट की छात्राओं को भाषण नहीं, सुरक्षित कक्षा चाहिए। उन्हें नारे नहीं, ऐसी छत चाहिए जो बारिश में टपके नहीं। उन्हें योजनाओं की सूची नहीं, ऐसा स्कूल चाहिए जिसमें वे अपने भविष्य की नींव रख सकें। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में शिक्षा और सरकारी स्कूलों की स्थिति भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकती है। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में जहां सरकारी स्कूलों पर ही बड़ी संख्या में परिवार निर्भर हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भाजपा सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों पर घेरने की कोशिश करेंगे। भाजपा के सामने चुनौती होगी कि वह अपने विकास के दावों को पहाड़ के गांवों और कस्बों में मौजूद सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति से साबित करे। गंगोलीहाट का बालिका विद्यालय इसलिए एक स्थानीय खबर भर नहीं है। यह उस बड़े सवाल का प्रतीक है कि क्या पहाड़ की बेटियों को उनके गांव-कस्बे में सुरक्षित और बेहतर शिक्षा का अधिकार मिल पा रहा है? बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा तभी सार्थक होगा, जब बेटी को पढ़ने के लिए एक ऐसी छत मिले जो उसके सिर पर भरोसे से टिकी हो। गंगोलीहाट में टपकती छत उस भरोसे पर ही सवाल खड़ा कर रही है।

शनिवार, 15 अगस्त 2026

udaydinmaan: ‘गंगाजल, गौमूत्र और सियासी जहर’

udaydinmaan: ‘गंगाजल, गौमूत्र और सियासी जहर’: मंच के शुद्धिकरण पर सियासत तेज,सवाल मंच का नहीं, राजनीति की सोच का भाषणों व नारों से आगे बढ़ी जंग, विरोधियों को अपवित्र ठहराने का नया पैंतरा...

‘गंगाजल, गौमूत्र और सियासी जहर’

मंच के शुद्धिकरण पर सियासत तेज,सवाल मंच का नहीं, राजनीति की सोच का भाषणों व नारों से आगे बढ़ी जंग, विरोधियों को अपवित्र ठहराने का नया पैंतरा जनमंच भी किसी एक की बपौती बना, जनता की आवाज की पवित्रता का क्या सत्ता और विपक्ष की इस गंदी लड़ाई में जनहित के असली मुद्दे चढ़ रहे हैं बलि देहरादून। उत्तराखंड में अब राजनीति सिर्फ भाषणों और नारों तक सीमित नहीं रह गई है। मंच भी राजनीतिक संदेश देने लगे हैं और मंच के शुद्धिकरण की तस्वीरें राजनीति का नया हथियार बनती दिखाई दे रही हैं। किसी सार्वजनिक मंच पर कौन खड़ा हुआ, किसने क्या कहा और उसके बाद मंच को शुद्ध करने की जरूरत क्यों महसूस हुईकृइन सवालों ने सियासत को फिर गरमा दिया है। मुद्दा केवल इतना नहीं है कि मंच का शुद्धिकरण किसने कराया। असली सवाल यह है कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की मौजूदगी को इतना अशुद्ध कैसे मान लिया गया कि उसके जाने के बाद मंच को पवित्र करने की जरूरत पड़ गई? राजनीति में मतभेद होते हैं। विचार अलग होते हैं। चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ प्रचार भी होता है। लेकिन जब राजनीतिक विरोध धीरे-धीरे सामाजिक और वैचारिक दूरी का प्रतीक बनने लगे, तब सवाल केवल राजनीति का नहीं रह जाता। सार्वजनिक मंच किसी एक पार्टी की निजी संपत्ति नहीं होता। वह जनता का मंच होता है। वहां सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसान हो या छात्र, कर्मचारी हो या सामाजिक कार्यकर्ताकृहर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। किसी के मंच पर आने से मंच अपवित्र और किसी दूसरे के आने से श्पवित्रश् हो जाता है तो फिर लोकतंत्र की पवित्रता का क्या होगा? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीति में प्रतीक बहुत मायने रखते हैं। मंच धोया जा सकता है, पानी से साफ किया जा सकता है, धार्मिक अनुष्ठान कराया जा सकता है, लेकिन समाज के भीतर पैदा की जा रही दूरी को किस पानी से धोया जाएगा? राजनीतिक विरोध लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन विरोध को नफरत में बदल देना लोकतंत्र की कमजोरी है। उत्तराखंड की राजनीति में यह घटनाक्रम इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राज्य की सामाजिक संरचना रिश्तों और साझा जीवन पर टिकी रही है। पहाड़ के गांव में राजनीतिक विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन शादी-ब्याह, दुख-सुख और सामाजिक जीवन में लोग एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं। चुनाव खत्म होने के बाद भी गांव को उसी गांव में रहना होता है। फिर राजनीति ऐसी भाषा क्यों पैदा करे जिसमें सामने वाला राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि अशुद्ध दिखाई देने लगे? यही वह जगह है जहां सवाल भाजपा बनाम कांग्रेस से आगे निकल जाता है। सवाल किसी एक दल के चरित्र का नहीं, बल्कि हमारी राजनीतिक संस्कृति का है। आज यदि किसी नेता के भाषण से असहमति है तो जवाब भाषण से दिया जाना चाहिए। किसी नीति से विरोध है तो उसके खिलाफ आंदोलन होना चाहिए। किसी बयान पर आपत्ति है तो लोकतांत्रिक तरीके से विरोध होना चाहिए। लेकिन मंच को शुद्ध करके हम आखिर किसे संदेश दे रहे हैं? क्या जनता को यह बताया जा रहा है कि राजनीति में विरोधी के साथ बैठना भी अपवित्रता है? अगर ऐसा है तो फिर लोकतंत्र में संवाद कहां बचेगा? आज राजनीतिक दल संविधान की बात करते हैं, लोकतंत्र की बात करते हैं, जनता की बात करते हैं। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावी मंच पर नहीं, विरोधी के सम्मान में होती है, जिस दिन हम अपने विरोधी को बोलने का अधिकार देना बंद कर देंगे, उस दिन लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कमजोर हो जाएगा। मंच का शुद्धिकरण शायद कुछ लोगों के लिए धार्मिक या राजनीतिक कर्मकांड हो सकता है। लेकिन जनता के लिए यह एक बड़ा सवाल छोड़ जाता हैकृक्या राजनीति अब विचारों की लड़ाई से निकलकर छुआछूत जैसी मानसिकता की तरफ बढ़ रही है? इस सवाल का जवाब राजनीतिक दलों को देना होगा। क्योंकि मंच चाहे जितनी बार धोया जाए, इतिहास तस्वीरों को नहीं धोता। तस्वीर में अगर कोई राजनीतिक विरोधी खड़ा था तो उसे मिटाया नहीं जा सकता और अगर उस तस्वीर के बाद मंच को शुद्ध करने की जरूरत पड़ी, तो आने वाली पीढ़ियां मंच से ज्यादा उस मानसिकता के बारे में सवाल करेंगी जिसने शुद्ध-अशुद्ध का यह पैमाना बनाया। लोकतंत्र में मंच की पवित्रता किसी व्यक्ति से तय नहीं होती। उसकी पवित्रता इस बात से तय होती है कि वहां हर नागरिक की आवाज के लिए जगह है या नहीं। मंच धोने से मंच साफ हो सकता है। लेकिन राजनीति में बढ़ती नफरत साफ नहीं होती। उसके लिए सोच बदलनी पड़ती है।

बारिश में ‘धंस’ रहा उत्तराखंड

हाईवे से बाजार और घरों तक मंडराया खतरा, बारिश ने की परीक्षा लेनी शुरू कहीं हाईवे का हिस्सा धंस रहा है तो कहीं सड़क के नीचे की जमीन खिसक रही बाजार व आबादी वाले इलाकों पर खतरा बढ़ा, कई जगह भवनों की नींव हिली देहरादून। मानसून उत्तराखंड के लिए इस बार सिर्फ बारिश नहीं, बल्कि पहाड़ की कमजोर होती जमीन का इम्तिहान बनता जा रहा है। लगातार हो रही बारिश के बीच प्रदेश के कई हिस्सों में जमीन धंसने और भूस्खलन की घटनाएं सामने आ रही हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर ग्रामीण सड़कों तक कहीं सड़क धंस रही है तो कहीं सड़क के नीचे की जमीन खिसक रही है। सबसे बड़ी चिंता उन बाजारों और आबादी वाले क्षेत्रों को लेकर है, जहां पहाड़ी ढलानों पर वर्षों से निर्माण होता आया है। सड़क कटने या जमीन धंसने का असर अब सिर्फ यातायात तक सीमित नहीं रह गया है। कई जगह आसपास बने भवनों की नींव पर भी खतरा मंडराने लगा है। बारिश के दौरान पहाड़ी सड़कों पर दरारें पड़ना और सड़क का हिस्सा धंसना नया नहीं है। लेकिन लगातार सामने आ रही घटनाओं ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पहाड़ों में सड़क निर्माण के दौरान भूगर्भीय स्थिति और जल निकासी को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है? जहां सड़क के किनारे पानी की निकासी की व्यवस्था कमजोर है, वहां बारिश का पानी पहाड़ के भीतर पहुंचकर मिट्टी और चट्टानों को कमजोर कर सकता है। इसके बाद ढलान का संतुलन बिगड़ते ही जमीन खिसकने लगती है। कई स्थानों पर सड़क को बचाने के लिए तत्काल डामर या मलबा डाल दिया जाता है। इससे रास्ता कुछ समय के लिए चलने लायक तो हो जाता है, लेकिन यदि मूल समस्या का उपचार नहीं हुआ तो अगली बारिश में वही संकट फिर सामने आ जाता है। पहाड़ी कस्बों में बाजार अक्सर सड़क के दोनों ओर विकसित हुए हैं। सड़क के नीचे दुकानें और ऊपर मकानकृऐसी तस्वीर उत्तराखंड के कई कस्बों में दिखाई देती है। ऐसे में सड़क का एक हिस्सा धंसता है तो उसका असर सिर्फ सड़क पर नहीं पड़ता। नीचे बनी दुकानों, मकानों और अन्य निर्माणों तक खतरा पहुंच जाता है। व्यापारियों की चिंता भी बढ़ रही है। सड़क बंद हुई तो बाजार का संपर्क टूटता है, ग्राहक नहीं पहुंचते और सामान की आपूर्ति प्रभावित होती है। वहीं भवनों के आसपास जमीन खिसकने लगे तो कारोबार के साथ लोगों की सुरक्षा का सवाल खड़ा हो जाता है। पहाड़ों में निर्माण की सबसे बड़ी चुनौती ढलान है। यदि पहाड़ काटकर सड़क या भवन बनाया गया है और उसके बाद पर्याप्त रिटेनिंग वॉल, ड्रेनेज और ढलान सुरक्षा नहीं की गई तो भारी बारिश में जोखिम बढ़ जाता है। कई जगह जमीन में छोटी दरारें शुरुआत में मामूली दिखाई देती हैं। लेकिन लगातार बारिश के बाद यही दरारें बड़े भूस्खलन का संकेत बन सकती हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय से बारिश के मौसम में संवेदनशील ढलानों और भवनों की निगरानी की जरूरत बताते रहे हैं। हर बार पहाड़ टूटने के बाद सबसे आसान जवाब होता हैकृभारी बारिश के कारण भूस्खलन हुआ। लेकिन सवाल यह है कि क्या बारिश अकेली जिम्मेदार है? प्राकृतिक बारिश को रोका नहीं जा सकता। लेकिन बारिश के पानी को पहाड़ के भीतर जाने से रोकना, जल निकासी व्यवस्था मजबूत करना, संवेदनशील ढलानों की पहचान करना और निर्माण के दौरान भूगर्भीय जोखिम को समझना इंसानी जिम्मेदारी है। अगर हर मानसून में सड़क धंसे और हर बार हम बारिश को दोष देकर आगे बढ़ जाएं तो समस्या का समाधान कब होगा? उत्तराखंड को सड़कें चाहिए। बेहतर कनेक्टिविटी चाहिए। पर्यटन और चारधाम यात्रा के लिए मजबूत बुनियादी ढांचा चाहिए। लेकिन सवाल सड़क बनाने का नहीं, सुरक्षित सड़क बनाने का है। पहाड़ को मैदान की तरह काटकर सड़क बनाना और फिर बारिश आने पर सुरक्षा कार्य शुरू करना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। जरूरत है कि संवेदनशील क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वे हो। सड़क निर्माण से पहले भूगर्भीय अध्ययन हो। पानी की निकासी को प्राथमिकता दी जाए और पुराने भूस्खलन क्षेत्रों की नियमित निगरानी हो। बारिश थम जाएगी। धूप निकलेगी। सड़कें फिर सामान्य हो जाएंगी। बाजारों में रौनक लौट आएगी। लेकिन जो पहाड़ बारिश के दौरान कमजोर हुआ है, वह खतरा खत्म होने के बाद भी कमजोर रह सकता है। इसलिए अभी किए गए अस्थायी मरम्मत कार्यों के साथ-साथ दीर्घकालिक सुरक्षा योजना जरूरी है। क्योंकि उत्तराखंड में सवाल सिर्फ सड़क बचाने का नहीं है। सवाल सड़क के किनारे बसे बाजारों, दुकानों और घरों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा का भी है। बारिश हर साल आएगी। पहाड़ भी अपनी जगह रहेगा। अब फैसला यह करना है कि विकास की हमारी रफ्तार पहाड़ की सहनशीलता के साथ चलेगी या हर मानसून हमें फिर उसी सवाल के सामने खड़ा करेगीकृकि सड़क बची या पहाड़? और अगर पहाड़ ही खिसक गया तो सड़क किसके लिए?

गले में ‘डिग्रियां’ और आंखों में ‘आक्रोश’

उत्तराखंड में युवा वोट की नई कहानी, बेरोजगारों ने की राहुल गांधी से मुलाकात धांधली और पेपर लीक से टूटे सब्र के बांध ने युवाओं को दिल्ली तक दौड़ाया 2027 के चुनाव में बैकफुट पर खड़ी कांग्रेस को संजीवनी देंगे राज्य के युवा आखिर क्यों स्थानीय नेताओं के बजाय राहुल गांधी से गुहार लगाने पहुंचे बेरोजगार देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी साल का कैलेंडर अभी पूरी तरह चुनावी नहीं हुआ है, लेकिन बेरोजगार युवाओं की बेचौनी ने सियासत का मौसम जरूर बदल दिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से उत्तराखंड के बेरोजगार युवाओं की मुलाकात को इसी बदलते माहौल की एक तस्वीर के तौर पर देखा जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि कुछ बेरोजगार युवा राहुल गांधी से मिले। सवाल यह है कि वह अपनी बात लेकर राहुल गांधी तक क्यों पहुंचे? और उससे भी बड़ा सवालकृक्या रोजगार, भर्ती, परीक्षा और युवाओं के भविष्य का मुद्दा कांग्रेस को उस वोटर के करीब ले जा रहा है, जिससे पिछले चुनावों में वह पर्याप्त दूरी पर दिखाई दी थी? देहरादून में राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम का केंद्र भी यही मुद्दे रहे थे। शिक्षा, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितता और पेपर लीक जैसे सवालों पर युवाओं ने अपनी बात रखी। कार्यक्रम में एक बेरोजगार युवक का डिग्रियों की माला पहनकर पहुंचना भी चर्चा का विषय बना था। यानी राहुल गांधी के सामने युवाओं की नाराजगी कोई अचानक पैदा हुई राजनीतिक कहानी नहीं है। कांग्रेस ने इसे सुनने और राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश पहले से शुरू कर रखी है। यहां एक सावधानी जरूरी है। युवाओं की कांग्रेस से नजदीकी दिखाई देना और युवाओं का कांग्रेस के साथ आ जानाकृदो अलग बातें हैं। बेरोजगार युवा पहले नौकरी चाहता है, फिर राजनीति करता है। उसके लिए भाजपा या कांग्रेस से ज्यादा महत्वपूर्ण भर्ती की तारीख है। परीक्षा होगी या नहीं, परिणाम आएगा या नहीं, नियुक्ति मिलेगी या नहींकृउसकी राजनीति इन सवालों के आसपास घूमती है। इसलिए राहुल गांधी से मुलाकात को सीधे कांग्रेस के पक्ष में वोट का संकेत मान लेना जल्दबाजी होगी। लेकिन भाजपा के लिए इसमें खतरे का संकेत जरूर है। क्योंकि जब किसी सरकार के खिलाफ असंतोष बनता है तो विपक्ष को हमेशा अपना वोट बैंक बनाने की जरूरत नहीं पड़ती। कभी-कभी सत्ता के खिलाफ जमा हो रहा सवाल ही विपक्ष के लिए राजनीतिक जगह बना देता है। उत्तराखंड में भाजपा लगातार सत्ता में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार 2027 के चुनाव की तैयारी में है। कांग्रेस भी संगठन और चुनावी रणनीति को सक्रिय कर चुकी है। ऐसे में बेरोजगारी कांग्रेस के लिए केवल एक मुद्दा नहीं, बल्कि भाजपा को घेरने का संभावित राजनीतिक रास्ता बन सकती है। लेकिन भाजपा की परेशानी सिर्फ विपक्ष के सवालों से नहीं होगी। असली परेशानी तब होगी जब यही सवाल युवा मतदाता की निजी अनुभूति बन जाए, जिस युवा ने वर्षों प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की है, जिसने फीस भरी है, फार्म भरा है, परीक्षा की तैयारी की है और फिर भर्ती प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते देखे हैंकृउसके लिए बेरोजगारी अखबार की खबर नहीं है। वह उसकी जिंदगी है। राजनीति में यही फर्क बहुत बड़ा होता है। उत्तराखंड में रोजगार का सवाल पलायन से भी जुड़ा है। पहाड़ का युवा नौकरी के लिए देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली और दूसरे शहरों की ओर जाता है। गांव खाली होते हैं और चुनाव के समय यही गांव राजनीतिक भाषणों में विकास की कहानी बन जाते हैं। लेकिन युवा पूछ सकता हैकृअगर विकास हुआ है तो रोजगार मेरे गांव में क्यों नहीं है? यही सवाल कांग्रेस को राजनीतिक अवसर देता है और यही सवाल भाजपा के लिए चुनौती भी बन सकता है। राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में छात्रों और युवाओं के सवालों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश की है। उत्तराखंड में छात्रों की गूंज कार्यक्रम भी इसी रणनीति का हिस्सा था। लेकिन राजनीति में संवाद और वोट के बीच लंबी दूरी होती है। युवा राहुल गांधी को सुन सकता है, बेरोजगारी पर कांग्रेस से सहमत हो सकता है, सरकार से नाराज भी हो सकता हैकृलेकिन मतदान के समय वह दूसरे मुद्दों पर फैसला कर सकता है। उत्तराखंड में राष्ट्रवाद, सैनिक पृष्ठभूमि, धार्मिक पर्यटन, स्थानीय नेतृत्व, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और क्षेत्रीय समीकरण भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसलिए कांग्रेस के लिए सबसे कठिन काम होगाकृयुवाओं की नाराजगी को स्थायी राजनीतिक भरोसे में बदलना। राहुल गांधी से बेरोजगारों की मुलाकात को भाजपा के लिए खतरे की घंटी कहा जा सकता है, लेकिन चुनाव का परिणाम नहीं। खतरा तब बनेगा जब बेरोजगारी का सवाल जाति, क्षेत्र और स्थानीय समीकरणों से ऊपर उठकर व्यापक युवा मुद्दा बन जाए। खतरा तब बनेगा जब युवा यह तय कर ले कि उसकी सबसे बड़ी समस्या सरकार की नीति है और उसका राजनीतिक विकल्प कांग्रेस है। अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि उत्तराखंड का युवा अब सिर्फ भाषण सुनने वाला युवा नहीं है। वह सवाल पूछ रहा है और लोकतंत्र में सत्ता के लिए सबसे कठिन समय वही होता है, जब सवाल पूछने वाला मतदाता सवाल के साथ मतदान केंद्र तक पहुंचता है। कांग्रेस के लिए यह अवसर है। भाजपा के लिए चेतावनी और बेरोजगार युवाओं के लिए शायद यह सिर्फ एक राजनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि अपनी आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने की कोशिश है। आखिर चुनाव में नेता बहुत कुछ कहते हैं। लेकिन फैसला उस युवा को करना है, जिसने डिग्री हाथ में लेकर वर्षों इंतजार किया हैकृनौकरी का, न्याय का और अपने भविष्य का।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

udaydinmaan: पहाड़ के ‘कल्यो’ के स्वाद में बसा है अपनापन

udaydinmaan: पहाड़ के ‘कल्यो’ के स्वाद में बसा है अपनापन: पेट भरने का जरिया नहीं, मौसम, मिट्टी और पीढ़ियों की जीवनशैली का संगम जब बाजार दूर थे, तब स्थानीय अनाज और दालों से तैयार हुआ अनूठा जायका पारंप...

पहाड़ के ‘कल्यो’ के स्वाद में बसा है अपनापन

पेट भरने का जरिया नहीं, मौसम, मिट्टी और पीढ़ियों की जीवनशैली का संगम जब बाजार दूर थे, तब स्थानीय अनाज और दालों से तैयार हुआ अनूठा जायका पारंपरिक ज्ञान बुजुर्ग महिलाओं से अगली पीढ़ी तक पहुंच रही पहाड़ की परंपरा देहरादून। पहाड़ का खाना सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं रहा। इसमें मौसम है, मिट्टी है, मेहनत है और पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली भी है। पहाड़ की रसोई में ऐसे कई व्यंजन हैं, जिनके नाम सुनते ही पुराने गांव, लकड़ी का चूल्हा और घर के आंगन की याद ताजा हो जाती है। इन्हीं में एक नाम है पैणु, जिसे कई इलाकों में कल्यो के नाम से भी जाना जाता है। पैणु पहाड़ी खानपान की उसी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें उपलब्ध स्थानीय अनाज और दालों से स्वादिष्ट भोजन तैयार किया जाता रहा है। पहाड़ में जब बाजार दूर थे और हर चीज आसानी से उपलब्ध नहीं होती थी, तब घर की रसोई स्थानीय संसाधनों पर ही निर्भर रहती थी। यही मजबूरी धीरे-धीरे पहाड़ की विशिष्ट पाक संस्कृति बन गई। पैणु या कल्यो की सबसे बड़ी खासियत इसका घरेलू स्वाद है। यह ऐसा भोजन है जिसमें बहुत अधिक मसालों या सजावट की जरूरत नहीं होती। स्थानीय सामग्री और पारंपरिक तरीके से पकाने पर इसका स्वाद अपने आप अलग पहचान बना लेता है। पहाड़ की बुजुर्ग महिलाएं आज भी ऐसे व्यंजनों को केवल पकाती नहीं हैं, बल्कि उनके साथ जुड़ी पूरी परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाती हैं। किस मौसम में कौन सा अनाज उपयोग करना है, किस तरह भिगोना है और चूल्हे पर कितनी देर पकाना हैकृये बातें किसी किताब से नहीं, बल्कि अनुभव से सीखी जाती थीं। पहाड़ के पारंपरिक भोजन की कहानी वहां की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी है। गांवों में खेती सीमित थी। जो पैदा होता था, उसी से सालभर का भोजन तैयार किया जाता था। मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, मसूर, जौं और दूसरी स्थानीय उपज पहाड़ी भोजन का आधार रही हैं। इसलिए पैणु या कल्यो जैसे व्यंजन केवल स्वाद की चीज नहीं थे। वह स्थानीय आत्मनिर्भरता की पहचान भी थे। आज बाजार में पैकेटबंद खाद्य सामग्री की भरमार है। लेकिन जिस समय पहाड़ में बाजार तक पहुंचना कठिन था, उस समय घर की रसोई ही सबसे बड़ा बाजार थी। खेत से अनाज आया और सीधे चूल्हे तक पहुंचा। पहाड़ की रसोई में भोजन अकेले नहीं बनता था। घर की महिलाएं मिलकर खाना तैयार करती थीं। एक तरफ चूल्हे पर दाल या सब्जी पकती, दूसरी तरफ अनाज साफ होता और आंगन में बच्चे खेलते रहते। पैणु या कल्यो जैसे व्यंजन इस सामूहिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। इसलिए इनके स्वाद में केवल सामग्री नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट भी शामिल है। आज गैस चूल्हे और आधुनिक रसोई ने जीवन आसान कर दिया है। समय बचा है, मेहनत कम हुई है। लेकिन उसी के साथ सामूहिक रसोई की वह संस्कृति भी धीरे-धीरे कमजोर हुई है। पलायन ने पहाड़ के खानपान को भी प्रभावित किया है। गांव खाली हुए तो कई पारंपरिक व्यंजन भी घरों की रसोई से गायब होने लगे। नई पीढ़ी को स्थानीय भोजन के बजाय बाजार के स्वाद की आदत अधिक होने लगी। ऐसे में पैणु या कल्यो जैसे व्यंजन केवल पुरानी याद नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत हैं। इन्हें बचाने का मतलब सिर्फ किसी एक पकवान को बचाना नहीं, बल्कि पहाड़ की खेती, बोली, परंपरा और जीवनशैली को बचाना है। आज जरूरत है कि पहाड़ी व्यंजनों को घरों तक सीमित न रखा जाए। स्थानीय मेलों, स्कूलों, पर्यटन स्थलों और पहाड़ी भोजनालयों में इन्हें पहचान मिले। स्थानीय किसानों को पारंपरिक अनाज उगाने के लिए बेहतर बाजार मिले और युवा इन व्यंजनों को नए अंदाज में लोगों तक पहुंचाएं। पैणु या कल्यो की कहानी हमें बताती है कि पहाड़ की असली पहचान केवल उसकी ऊंची चोटियों और खूबसूरत वादियों में नहीं है। उसकी पहचान उसकी रसोई में भी छिपी है। जिस भोजन को कभी पहाड़ की मजबूरी समझा जाता था, आज वही भोजन बदलते दौर में उसकी खास पहचान बन सकता है। क्योंकि पहाड़ का स्वाद जितना पुराना है, उतना ही भविष्य के लिए जरूरी भी। पैणु हो या कल्योकृयह सिर्फ एक व्यंजन का नाम नहीं, पहाड़ की उस रसोई की कहानी है जहां सादगी में स्वाद और कम साधनों में आत्मनिर्भरता पैदा होती थी।