मंगलवार, 21 जुलाई 2026

udaydinmaan: यूकेडी में ‘अंदरूनी’ हलचल

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udaydinmaan: देवभूमि में ‘आस्था’ पर ‘सियासत’

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udaydinmaan: उत्तराखंड में ‘इलेक्शन मोड’ आन

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udaydinmaan: जेन जेड की ‘आवाज’ पर राष्ट्रीय बहस

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udaydinmaan: राजनीतिक दलों के ‘वार रूम’ तैयार

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यूकेडी में ‘अंदरूनी’ हलचल

चुनाव से पहले राष्ट्रीय दलों की राह पर उत्तराखंड क्रांति दल आशुतोष नेगी पर कार्रवाई से क्षेत्रीय राजनीति में खलबली 2027 चुनाव से पहले यूकेडी में आपरेशन क्लीन या कुछ ओर देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में अब अनुशासन का डंडा केवल राष्ट्रीय दलों तक सीमित नहीं रह गया है। भाजपा और कांग्रेस में लगातार अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के बाद अब क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल भी उसी राह पर चलता दिखाई दे रहा है। पार्टी ने वरिष्ठ नेता आशुतोष नेगी को केंद्रीय उपाध्यक्ष पद से हटाकर साफ संकेत दे दिया है कि संगठन के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी या समानांतर राजनीति अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश की राजनीति धीरे-धीरे 2027 विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है और हर दल अपने संगठन को मजबूत व अनुशासित दिखाने की कोशिश में जुटा है। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यूकेडी जैसी क्षेत्रीय पार्टी, जो वर्षों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, इस समय अनुशासनात्मक कार्रवाई का जोखिम उठा सकती है? पिछले कुछ महीनों में भाजपा ने कई नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किए और संगठन विरोधी गतिविधियों पर कार्रवाई की। कांग्रेस ने भी कई नेताओं पर अनुशासनात्मक कदम उठाए। अब यूकेडी में आशुतोष नेगी को केंद्रीय उपाध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद यह संदेश गया है कि क्षेत्रीय दल भी अब अंदरूनी असहमति को खुलकर स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल एक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि संगठन के भीतर अनुशासन स्थापित करने की कोशिश है। यूकेडी लंबे समय से गुटबाजी, नेतृत्व विवाद और लगातार कमजोर होते जनाधार से जूझती रही है। ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता पर कार्रवाई दो तरह के संदेश देती है। एक ओर नेतृत्व अपनी पकड़ मजबूत दिखाता है, वहीं दूसरी ओर असंतुष्ट नेताओं का नया खेमा भी तैयार हो सकता है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि पार्टी इस विवाद को समय रहते नहीं संभालती, तो चुनाव से पहले इसका नुकसान संगठनात्मक स्तर पर उठाना पड़ सकता है। उत्तराखंड में यूकेडी कभी राज्य आंदोलन की सबसे मजबूत राजनीतिक आवाज हुआ करती थी। लेकिन समय के साथ पार्टी का जनाधार लगातार सिमटता गया। आज स्थिति यह है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच क्षेत्रीय राजनीति के लिए जगह बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में यदि पार्टी के भीतर ही असंतोष खुलकर सामने आने लगे, तो उसका असर चुनावी तैयारियों पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यूकेडी नेतृत्व अब चुनाव से पहले संगठन को एकजुट और नियंत्रित रखना चाहता है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि व्यक्तिगत बयान या अनुशासनहीनता को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। हालांकि विपक्षी दल इस कार्रवाई को यूकेडी की आंतरिक कमजोरी और नेतृत्व संकट के रूप में भी पेश कर सकते हैं। आशुतोष नेगी को पद से हटाने का फैसला केवल एक संगठनात्मक आदेश नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति में बदलते राजनीतिक व्यवहार का संकेत भी है। अब चाहे राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय, हर पार्टी चुनाव से पहले अनुशासन पहले, असहमति बाद में की नीति पर चलती नजर आ रही है। लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है कि अनुशासन संगठन को मजबूत भी करता है और कभी-कभी असंतोष की नई चिंगारी भी जगा देता है। यूकेडी के लिए यह फैसला किस दिशा में जाएगा, इसका जवाब आने वाले महीनों में पार्टी की एकजुटता और 2027 की चुनावी तैयारियां देंगी।

देवभूमि में ‘आस्था’ पर ‘सियासत’

राजधानी में एक ही दिन में दो मुख्यालयों में घंटों चला ‘सियासी महाभारत’ भाजपा ने कहाकृसत्य सामने आएगा, कांग्रेस बोली चोरी नहीं, सिस्टम की मिलीभगत बदरीनाथ धाम के चढ़ावे में कथित चोरी के मुद्दे पर आमने-सामने आए भाजपा-कांग्रेस देहरादून। बदरीनाथ धाम के चढ़ावे में कथित चोरी का मामला अब केवल जांच का विषय नहीं रहा, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा सियासी हथियार बनता जा रहा है। राजधानी देहरादून में महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित भाजपा और कांग्रेस मुख्यालयों में हुई दो अलग-अलग पत्रकार वार्ताओं ने यह साफ कर दिया कि देवभूमि की आस्था अब राजनीतिक अखाड़े के केंद्र में आ चुकी है।एक ओर भाजपा प्रदेश मुख्यालय में बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी मीडिया के सामने आए और आरोपों को राजनीतिक साजिश करार देते हुए कहा कि जांच चल रही है और सच सामने आएगा। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस मुख्यालय में प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सरकार और बीकेटीसी पर तीखा हमला बोलते हुए पूरे प्रकरण को प्रशासनिक विफलता और जवाबदेही के संकट का प्रतीक बताया। भाजपा की प्रेस वार्ता का मूल संदेश था कि सरकार ने मामले को दबाने के बजाय जांच कराई, आरोपी के खिलाफ कार्रवाई हुई और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। पार्टी ने विपक्ष पर आस्था के मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया। इसके कुछ ही समय बाद कांग्रेस ने उसी मुद्दे पर मोर्चा खोल दिया। गणेश गोदियाल ने सवाल उठाया कि यदि व्यवस्थाएं इतनी मजबूत थीं तो आखिर चढ़ावे की चोरी हुई कैसे? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर देने से जवाबदेही पूरी हो जाती है, या शीर्ष स्तर पर भी नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। बदरीनाथ धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में चढ़ावे में कथित चोरी की घटना स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं से जुड़ा विषय है। लेकिन जिस तरह दोनों प्रमुख दल इसे अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव के अनुरूप पेश कर रहे हैं, उससे यह मामला अब धार्मिक भावना से आगे बढ़कर चुनावी विमर्श का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को सरकार की पारदर्शिता बनाम विपक्ष की राजनीति के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है, जबकि कांग्रेस इसे भ्रष्ट व्यवस्था और जवाबदेही के अभाव का प्रतीक बनाकर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है। विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों की रणनीति स्पष्ट दिखने लगी है। कांग्रेस सरकार की साख पर सवाल खड़े करने के लिए बदरीनाथ प्रकरण को लगातार उठाना चाहती है। वहीं भाजपा यह संदेश देने में जुटी है कि उसने मामले में कार्रवाई कर यह साबित किया है कि भ्रष्टाचार पर उसकी नीति जीरो टालरेंस की है। यानी यह लड़ाई केवल एक चोरी की नहीं, बल्कि विश्वास बनाम जवाबदेही की राजनीतिक लड़ाई बनती जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या बदरीनाथ धाम जैसे पवित्र स्थल से जुड़ा मामला निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तक सीमित रहेगा, या फिर 2027 के चुनाव तक यह भाजपा और कांग्रेस के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा? फिलहाल तस्वीर यही है कि एक मुख्यालय से सफाई दी जा रही है, दूसरे मुख्यालय से सवाल दागे जा रहे हैं। बीच में खड़ी है देवभूमि की जनता, जो यह जानना चाहती है कि आखिर चढ़ावे की सुरक्षा में चूक कैसे हुई, जिम्मेदार कौन है, और भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों इसके लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।

कलाकार नहीं, लोक स्मृति के प्रहरी थे ‘दर्जी’

ढोल की थाप, सुई-धागे का हुनर और लोकगीतों की महककृयही थे पहाड़ में दर्जी जब गांवों का चौक ही बन जाता था रंगमंच और दर्जी होते थे उसके असली नायक गीतों की गूंज, ढोल की थाप, सुई-धागे का हुनर होता था पूरे गांव की मुस्कान देहरादून। हे दर्जी दिदा मीकू तु अंगढी बणै दे मेरि घगरि परै चमकदार मज़री लगै दे..गढ़वाल के इस पुराने गीत की धुन जब भी सुनी जाती है तो पहाड़ के गांवों का जीवन जीने वाले के जहन में पहाड़ के उस दर्जी की याद आती है, जो पहाड़ के लिए एक कलाकार ही नहीं लोक संस्कृति का संरक्षक था। पहाड़ के गांवों में एक समय ऐसा भी था, जब मनोरंजन के लिए न टेलीविजन था, न मोबाइल और न ही डीजे की कानफोड़ू आवाज। तब गांव की असली रौनक बनकर आते थे दर्जी और उनके साथ कुछ कलाकार भी जिन्हें बद्दी और बदयौण कहा जाता था। उत्तराखंड के पहाड़ों में अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था, लेकिन उनका काम एक ही थाकृगीतों, नृत्य, लोककथाओं और अपने हुनर से पूरे गांव को एक सूत्र में पिरो देना। जैसे ही किसी गांव में शादी-ब्याह, मेला, देवी-देवताओं का उत्सव या कोई बड़ा सामाजिक आयोजन होता, दर्जी अपने साथ ढोल, लोकगीत, रंग-बिरंगे वस्त्र और सुई-धागे का हुनर लेकर पहुंच जाते। उनके आने की खबर पूरे गांव में उत्सव का संदेश बन जाती। सूरज ढलते ही गांव का चौक जगमगा उठता। बच्चे सबसे आगे, महिलाएं समूह बनाकर, बुजुर्ग अपने अनुभवों के साथ और युवा उत्साह से भरेकृहर कोई एक जगह इकट्ठा हो जाता। फिर शुरू होता लोकगीतों, नृत्यों और हास्य-व्यंग्य का ऐसा सिलसिला, जो देर रात तक चलता। दर्जी केवल गीत नहीं गाते थे, वह पहाड़ की आत्मा गाते थे। उनके गीतों में प्रेम था, विरह था, देवी-देवताओं की महिमा थी, वीरों की गाथाएं थीं और समाज को जोड़ने वाले संदेश भी थे। उनकी प्रस्तुति में मनोरंजन के साथ लोकशिक्षा भी छिपी होती थी। दर्जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह केवल लोक कलाकार नहीं थे। गांव में ठहरने के दौरान वह कपड़े सिलते, नए वस्त्र तैयार करते, पुराने कपड़ों की मरम्मत करते और शादी-ब्याह के लिए विशेष परिधान भी बनाते थे। आज जिसे मल्टी-स्किल कहा जाता है, वह कला बद्दी सदियों पहले जी रहे थे। वह अपने श्रम से आजीविका कमाते थे और अपनी कला से गांव को आनंद देते थे। दर्जी एक गांव से दूसरे गांव जाते थे। वह केवल कार्यक्रम नहीं करते थे, बल्कि लोककथाएं, नए गीत, सामाजिक संदेश और आसपास के क्षेत्रों की खबरें भी साथ लेकर चलते थे। इस तरह वह पहाड़ के गांवों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी बन जाते थे। उनके आने से केवल एक आयोजन नहीं होता था, बल्कि गांव का सामाजिक जीवन भी जीवंत हो उठता था। समय बदला। गांवों में सड़कें आईं, फिर टेलीविजन, मोबाइल और इंटरनेट ने जगह बना ली। रेडीमेड कपड़ों ने सुई-धागे की जरूरत कम कर दी और डीजे ने लोकधुनों की जगह ले ली। धीरे-धीरे दर्जी की आवाज पहाड़ की घाटियों से ओझल होने लगी। आज गांवों के चौक तो हैं, लेकिन वहां लोकगीतों की वह सामूहिक गूंज नहीं है। नई पीढ़ी बद्दी शब्द से भी अपरिचित होती जा रही है। बद्दी किसी एक व्यक्ति या समुदाय का नाम भर नहीं थे। वह उस पहाड़ की पहचान थे, जहां कला आजीविका भी थी और समाज को जोड़ने का माध्यम भी। उन्होंने बिना किसी मंच, बिना किसी प्रचार और बिना किसी पुरस्कार के पीढ़ियों तक पहाड़ की लोकसंस्कृति को जीवित रखा। आज जब उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की बात कर रहा है, तब जरूरत है कि दर्जी जैसी लोक परंपराओं का दस्तावेजीकरण हो, उन पर शोध हो और उन्हें लोक महोत्सवों, विद्यालयों तथा सांस्कृतिक आयोजनों में सम्मानपूर्वक स्थान मिले।

उत्तराखंड में ‘इलेक्शन मोड’ आन

भाजपा हैट्रिक की तैयारी में और कांग्रेस ने रची सत्ता की व्यूह रचना भाजपा का विकास कार्ड पर कांग्रेस का पलायन व रोजगार पर वार चुनाव में स्थानीय मुद्दों की कसौटी पर होगी सत्ता की असली परीक्षा देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की औपचारिक घोषणा भले अभी दूर हो, लेकिन राज्य की राजनीति पूरी तरह चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। एक ओर भाजपा लगातार तीसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस संगठन को पुनर्जीवित करने, बूथ स्तर तक पहुंच बनाने और स्थानीय मुद्दों को चुनाव का केंद्र बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा का दावा है कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएं, मजबूत संगठन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में किए गए कार्य उसे फिर सत्ता तक पहुंचाएंगे। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, पेपर लीक, स्वास्थ्य और पहाड़ों से जुड़े बुनियादी सवालों पर सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी उसका बूथ नेटवर्क और संगठनात्मक ढांचा है। पार्टी लंबे समय से बूथ प्रबंधन, लाभार्थी संपर्क और कार्यकर्ता-आधारित चुनावी माडल पर काम करती रही है। चुनाव से पहले भी संगठन को गांव-गांव और घर-घर तक सक्रिय करने की कवायद तेज है। भाजपा का आकलन है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ उसे चुनावी बढ़त दिला सकता है। सत्ता में लगातार दो कार्यकाल पूरे करने के बाद किसी भी सरकार के सामने स्वाभाविक रूप से स्थानीय असंतोष की चुनौती आती है। कई क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार, पेयजल, शिक्षा और पलायन जैसे मुद्दे अभी भी प्रमुख चुनावी विषय बने हुए हैं। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ स्थानीय नाराजगी की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में सुनाई देती हैं। ऐसे में भाजपा के लिए उम्मीदवार चयन भी एक अहम चुनौती हो सकता है। कांग्रेस इस बार केवल सरकार विरोधी राजनीति तक सीमित रहने के बजाय बूथ संगठन, मेनिफेस्टो और जनसंपर्क पर विशेष जोर देती दिखाई दे रही है। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व ने संगठनात्मक एकजुटता और चुनावी तैयारी पर विशेष बल दिया है। यदि कांग्रेस स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के साथ संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत कर पाती है, तो कई सीटों पर मुकाबला पहले से अधिक कड़ा हो सकता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार इन मुद्दों की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है। युवाओं के लिए रोजगार और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, पलायन और पर्वतीय क्षेत्रों का विकास, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं, पर्यटन, चारधाम और स्थानीय अर्थव्यवस्था, महिला सुरक्षा और स्वरोजगार, आपदा प्रबंधन और पुनर्वास, महंगाई और किसान हित प्रमुख हैं। भाजपा की रणनीति विकास, संगठन और नेतृत्व पर केंद्रित रहने की संभावना है, जबकि कांग्रेस स्थानीय असंतोष, सामाजिक-आर्थिक मुद्दों और संगठन विस्तार के जरिए चुनावी बढ़त बनाने की कोशिश करेगी। क्षेत्रीय दल भी कुछ सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि 2027 का चुनाव केवल नारों का नहीं, बल्कि माइक्रो मैनेजमेंट बनाम जनभावनाओं की लड़ाई होगा। भाजपा का लक्ष्य अपने मजबूत संगठन को वोट में बदलना होगा, जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वह सरकार विरोधी रुझानों को प्रभावी चुनावी समर्थन में बदल पाए। यानी कि प्रचंड बहुमत का दावा और सत्ता परिवर्तन की उम्मीदकृदोनों की असली परीक्षा अब चुनावी मैदान में होगी। उत्तराखंड की राजनीति का अगला अध्याय बूथों पर लिखा जाएगा, जहां अंतिम फैसला मतदाता करेगा।

जेन जेड की ‘आवाज’ पर राष्ट्रीय बहस

जंतर-मंतर से युवाओं की हुंकार से सोशल मीडिया पर गूंजा देश राहुल गांधी से लेकर बालीवुड सितारे तक जेन जेड के समर्थन में सरकार पर दबाव, पुलिस बोली-कानून-व्यवस्था थी प्राथमिकता नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन अब केवल छात्रों का प्रदर्शन नहीं रह गया है। सोशल मीडिया की ताकत ने इसे राष्ट्रीय बहस में बदल दिया है। विपक्षी नेताओं, फिल्मी हस्तियों और छात्र संगठनों के खुलकर सामने आने से केंद्र सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है। वहीं सरकार और पुलिस अपने कदमों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक बता रही है। प्रदर्शन के दौरान सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी है। एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर आंदोलन से जुड़े हैशटैग लगातार ट्रेंड करते रहे। हजारों लोग छात्रों के समर्थन में पोस्ट साझा करते दिखे, जबकि सत्ता पक्ष के समर्थकों ने पुलिस कार्रवाई को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी बताया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और युवाओं की आवाज को दबाने के बजाय उसे सुना जाना चाहिए। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार संवाद की जगह दमन का रास्ता अपना रही है। कांग्रेस के अलावा अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर उठाने के संकेत दिए हैं। सिर्फ राजनीति ही नहीं, फिल्म जगत की कई चर्चित हस्तियां भी छात्रों के समर्थन में सामने आईं। अभिनेता सोनू सूद ने कहा कि छात्रों को लाठियां नहीं, गले लगाने वाले हाथ चाहिए। अभिनेता रितेश देशमुख ने लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का समर्थन किया। वरिष्ठ अभिनेत्री शबाना आजमी ने असहमति के सम्मान की बात कही, जबकि अभिनेता प्रकाश राज ने सरकार से छात्रों के साथ संवाद स्थापित करने की अपील की। इन प्रतिक्रियाओं के बाद आंदोलन को सोशल मीडिया पर और अधिक गति मिली। विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन इसलिए भी अलग दिखाई दे रहा है क्योंकि इसकी सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया बन गया है। प्रदर्शन स्थल से लाइव वीडियो, पुलिस कार्रवाई के दृश्य और छात्रों के बयान कुछ ही मिनटों में देशभर में पहुंच गए। कई विश्वविद्यालयों के छात्र संगठनों ने भी आनलाइन समर्थन अभियान शुरू कर दिया है। हालांकि सरकार और दिल्ली पुलिस ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने बैरिकेडिंग पार करने और प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर बढ़ने का प्रयास किया था। ऐसे में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की गई। पुलिस का दावा है कि किसी भी प्रकार की कार्रवाई नियमानुसार की गई और सार्वजनिक सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता थी। सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का सम्मान करती है, लेकिन किसी भी प्रदर्शन को कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सरकार का यह भी आरोप है कि कुछ राजनीतिक दल छात्रों के आंदोलन को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आंदोलन को जिस तरह विपक्ष और सामाजिक क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों का समर्थन मिला है, उससे सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ा है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष इस मुद्दे को कानून-व्यवस्था और राजनीतिक उकसावे के नजरिए से देख रहा है। ऐसे में संसद सत्र के दौरान इस मुद्दे पर तीखी टकराहट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल छात्र संगठन अपने आंदोलन को जारी रखने पर अड़े हैं और सरकार की ओर से भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात दोहराई जा रही है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या दोनों पक्षों के बीच संवाद का रास्ता निकलता है या यह आंदोलन आने वाले दिनों में और व्यापक रूप लेता है। बाक्स यह है पूरा मामला देशभर से छात्र अपनी विभिन्न मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की और हिरासत की घटनाएं सामने आईं। कार्रवाई के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ा, जबकि सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। आंदोलन अभी जारी है और इस पर देशभर की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।

राजनीतिक दलों के ‘वार रूम’ तैयार

विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर दलों ने जारी किया जंग का ब्लूप्रिंट कांग्रेस ने बदली चाल, सरकार विरोधी माहौल को वोट में बदलेगी पार्टी अब मेनिफेस्टो से माहौल और बूथ से वोट साधने की तैयारी में है कांग्रेस भाजपा के मजबूत संगठन के सामने कांग्रेस की असली परीक्षा बूथ पर देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। सत्ता में बैठी भाजपा जहां संगठन और लाभार्थी नेटवर्क के भरोसे लगातार अपनी चुनावी मशीनरी को धार दे रही है, वहीं कांग्रेस ने अब अपनी रणनीति का केंद्र दो मोर्चों को बनाया हैकृजनता से सीधे जुड़े मुद्दों पर आधारित मेनिफेस्टो और बूथ स्तर तक संगठन का पुनर्गठन। पार्टी के भीतर यह समझ बन रही है कि केवल सरकार के खिलाफ माहौल बनाना पर्याप्त नहीं होगा। यदि उस असंतोष को मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचाया गया, तो राजनीतिक लाभ सीमित रह सकता है। यही वजह है कि कांग्रेस अब भाषणों से ज्यादा बूथ और घोषणा पत्र की राजनीति पर जोर देती दिखाई दे रही है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस इस बार घोषणा पत्र को चुनाव के आखिरी दिनों में जारी होने वाला औपचारिक दस्तावेज नहीं रहने देना चाहती। पार्टी चाहती है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं, स्थानीय रोजगार, महिला सुरक्षा और युवाओं के अवसर जैसे मुद्दों पर पहले जनसंपर्क किया जाए और उसी आधार पर घोषणा पत्र तैयार हो। रणनीति यह है कि जब कार्यकर्ता गांव-गांव और वार्ड-वार्ड जाएंगे, तो वह केवल प्रचार नहीं करेंगे, बल्कि लोगों की प्राथमिकताओं को भी दर्ज करेंगे। इससे पार्टी को यह संदेश देने का अवसर मिलेगा कि उसका एजेंडा ऊपर से तय नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी से तैयार हुआ है। उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बेहद कम रहा है। ऐसे में बूथ प्रबंधन का महत्व और बढ़ जाता है। कांग्रेस का आकलन है कि यदि प्रत्येक बूथ पर सक्रिय टीम, नियमित मतदाता संपर्क और मतदान दिवस की प्रभावी तैयारी हो, तो कई सीटों पर मुकाबला बदला जा सकता है। इसी कारण पार्टी बूथ समितियों के पुनर्गठन, निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और नए स्वयंसेवकों को जोड़ने पर जोर दे रही है। संगठन के भीतर यह संदेश दिया जा रहा है कि चुनाव केवल बड़े नेताओं की रैलियों से नहीं, बल्कि मतदान केंद्र तक पहुंचने वाले नेटवर्क से जीते जाते हैं। दूसरी ओर भाजपा के सामने अलग तरह की चुनौती है। सत्ता विरोधी रुझान की चर्चा के बीच पार्टी अपने संगठित ढांचे, लाभार्थी संपर्क अभियानों और बूथ नेटवर्क पर भरोसा बनाए हुए है। भाजपा लंबे समय से बूथ सशक्तीकरण, पन्ना प्रमुख और नियमित संगठनात्मक बैठकों के माडल पर काम करती रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका चुनावी प्रबंधन है, जबकि कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यही क्षेत्र रहा है। इसलिए 2027 का मुकाबला केवल नारों का नहीं, बल्कि संगठनात्मक क्षमता की परीक्षा भी होगा। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है। यदि पार्टी केवल सरकार की आलोचना तक सीमित रहती है, तो उसका लाभ सीमित हो सकता है। लेकिन यदि वह रोजगार, शिक्षा, पलायन, स्वास्थ्य, पर्यटन, कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर स्पष्ट और विश्वसनीय रोडमैप पेश करती है, तो वह चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकती है। वहीं भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपनी उपलब्धियों और विकास के दावों के साथ-साथ स्थानीय असंतोष का भी प्रभावी जवाब दे। चुनाव नजदीक आते-आते उम्मीदवार चयन, स्थानीय समीकरण और क्षेत्रीय मुद्दे भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आने वाले महीनों में दोनों दलों की सक्रियता गांवों, कस्बों और बूथों पर सबसे अधिक दिखाई देगी। बड़े मंचों और सोशल मीडिया से आगे बढ़कर घर-घर संपर्क, स्थानीय बैठकों और संगठन विस्तार पर जोर बढ़ सकता है। ऐसे में 2027 की चुनावी तस्वीर केवल राजधानी की राजनीतिक हलचल से तय नहीं होगी, बल्कि उन हजारों बूथों पर लिखी जाएगी जहां मतदाता अंतिम फैसला करेंगे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस का यह बदलाव एक संदेश भी हैकृपार्टी चुनाव को केवल सरकार बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं, बल्कि संगठन बनाम संगठन की चुनौती के रूप में देख रही है। दूसरी ओर भाजपा अपने स्थापित चुनावी ढांचे को और मजबूत करने में जुटी है। यानी 2027 की लड़ाई का पहला दौर शुरू हो चुका है। अभी मंचों पर भाषण कम हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के वार रूम पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि किस दल की रणनीति जनता के बीच अधिक प्रभाव छोड़ती है और कौन अपने संगठन को मतदान के दिन तक सबसे प्रभावी ढंग से सक्रिय रख पाता है।

सोमवार, 20 जुलाई 2026

udaydinmaan: श्रम, संघर्ष और संस्कृति की प्रतीक है ‘घस्यारी’

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udaydinmaan: बाहर जेन जेड और सदन के भीतर विपक्ष ने सरकार को घेरा

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udaydinmaan: हैट्रिक के ‘ख्वाब’ में चुनौतियों का ‘पहाड़’

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udaydinmaan: सत्ता परिवर्तन के संदेश संग कांग्रेस मैदान में

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udaydinmaan: पहाड़ में ‘सेर’ और ‘पाथा’

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udaydinmaan: सात मोड़ पर ‘सियासत’ सात सौ पर ‘सन्नाटा’

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udaydinmaan: संसद चलो पर ‘डंडे’ की दीवार

udaydinmaan: संसद चलो पर ‘डंडे’ की दीवार: जंतर-मंतर से खदेड़े गए प्रदर्शनकारी, कई लोग हिरासत में बैरिकेड तोड़ संसद की ओर बढ़ी भीड़, पुलिस का लाठीचार्ज राजधानी रणक्षेत्र में तब्दील, संसद ...

संसद चलो पर ‘डंडे’ की दीवार

जंतर-मंतर से खदेड़े गए प्रदर्शनकारी, कई लोग हिरासत में बैरिकेड तोड़ संसद की ओर बढ़ी भीड़, पुलिस का लाठीचार्ज राजधानी रणक्षेत्र में तब्दील, संसद सत्र के पहले दिन चढ़ा पारा नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन देश की राजधानी का राजनीतिक तापमान उबाल पर पहुंच गया। काकरोच जनता पार्टी के संसद चलो मार्च को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग तक अभेद्य सुरक्षा घेरा खड़ा कर दिया। जैसे ही हजारों प्रदर्शनकारी बैरिकेड पार कर संसद की ओर बढ़ने लगे, पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज किया। कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, जबकि पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। सुबह से ही जंतर-मंतर पर देशभर से आए छात्रों, युवाओं और काकरोच जनता पार्टी समर्थकों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया था। मंच से लगातार शांतिपूर्ण मार्च का आह्वान किया जा रहा था, लेकिन जैसे ही भीड़ संसद मार्ग की ओर बढ़ी, पुलिस ने पहले बैरिकेडिंग से रोकने की कोशिश की। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड हटाने का प्रयास किया, जिसके बाद सुरक्षा बलों ने भीड़ को पीछे धकेलने के लिए बल प्रयोग किया। कई स्थानों पर लाठीचार्ज के दृश्य सामने आए और दर्जनों लोगों को पुलिस वाहनों में बैठाकर ले जाया गया। दिल्ली पुलिस पहले ही स्पष्ट कर चुकी थी कि संसद चलो मार्च की कोई अनुमति नहीं दी गई है। नई दिल्ली जिले में बीएनएसएस की धारा 163 लागू होने तथा संसद क्षेत्र को हाई-सिक्योरिटी जोन घोषित किए जाने का हवाला देते हुए पुलिस ने किसी भी जुलूस को अवैध बताया था। इसी के मद्देनजर जंतर-मंतर, संसद भवन, इंडिया गेट और आसपास के इलाकों में भारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई थी। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि भी कम राजनीतिक नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर हुई परीक्षा अनियमितताओं और पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन अब शिक्षा व्यवस्था, युवाओं के रोजगार और सरकारी जवाबदेही का बड़ा प्रतीक बन चुका है। आंदोलन को नया बल तब मिला जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को उनके अनशन के दौरान अस्पताल ले जाया गया। उनके समर्थकों का आरोप है कि यह कार्रवाई आंदोलन को कमजोर करने के लिए की गई, जबकि प्रशासन का कहना है कि स्वास्थ्य कारणों से चिकित्सकीय हस्तक्षेप जरूरी था। सोमवार को वांगचुक की अनुपस्थिति में भी प्रदर्शनकारियों का उत्साह कम नहीं दिखा। उनकी पत्नी भी आंदोलन स्थल पर पहुंचीं और समर्थकों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की अपील की। दूसरी ओर काकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व ने दावा किया कि उनका मार्च पूरी तरह अहिंसक था और टकराव प्रशासन की सख्ती का परिणाम है। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा घेरा तोड़ने का प्रयास किया, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पैदा हुई। अधिकारियों के अनुसार संसद सत्र के पहले दिन किसी भी तरह की सुरक्षा चूक स्वीकार्य नहीं थी, इसलिए आवश्यक बल प्रयोग किया गया। हालांकि सोशल मीडिया और विभिन्न वीडियो में लाठीचार्ज और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने के दृश्य तेजी से वायरल हुए, जिससे सरकार की कार्रवाई पर सवाल भी उठने लगे। घटनाक्रम के बीच विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर लोकतांत्रिक विरोध को दबाने का आरोप लगाया। कई विपक्षी नेताओं ने कहा कि यदि युवाओं को अपनी बात संसद तक पहुंचाने से रोका जाएगा तो असंतोष और बढ़ेगा। वहीं भाजपा और सरकार समर्थक नेताओं ने पुलिस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि संसद की सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता है और बिना अनुमति किसी भी भीड़ को संवेदनशील क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने दिया जा सकता। दिल्ली मेट्रो ने भी सुरक्षा कारणों से कुछ समय के लिए कई स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद कर दिए, जिससे आम यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। राजधानी के वीआईपी क्षेत्र में यातायात लंबे समय तक प्रभावित रहा। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत जिस तरह सड़कों पर टकराव के साथ हुई है, उसने साफ संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं का असंतोष संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने वाला है। सरकार इसे कानून-व्यवस्था का मामला बता रही है, जबकि आंदोलनकारी इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश के रूप में पेश कर रहे हैं। यही टकराव अब राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचता दिखाई दे रहा है।

सात मोड़ पर ‘सियासत’ सात सौ पर ‘सन्नाटा’

जहाँ तक आराम से दौड़ सकती हैं एसी गाड़ियाँ, कैमरे व बयानबाजी का पाखंड सिर्फ वहीं तक जनता ने नेताओं को फर्श से अर्श पर पहुँचाया, बदले में मिलीं सिर्फ अधूरी सड़कें उत्तराखंड का हाल, जहां सड़क नहीं पहुंची, वहां राजनीति भी नहीं पहुंचती देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का भी अपना एक भूगोल है। यह भूगोल नक्शे से नहीं, बल्कि सड़कों से तय होता है। जहां तक एसी वाली गाड़ियां आराम से पहुंच जाती हैं, वहां धरना भी होता है, प्रदर्शन भी होता है, कैमरे भी पहुंचते हैं और नेताओं के बयान भी। लेकिन जहां पहुंचने के लिए सात सौ मोड़ पार करने पड़ें, जहां सड़क आज भी अधूरी हो, जहां एंबुलेंस नहीं पहुंचती और मरीजों को चारपाई पर ढोना पड़ता हो, वहां न कोई आंदोलन दिखाई देता है और न कोई राजनीतिक संवेदना। प्रदेश बनने के बाद से लेकर आज तक पुरोला की जनता ने हर दल और हर चेहरे पर भरोसा किया। कभी कांग्रेस को मौका दिया, कभी भाजपा को। मालामाल नेताओं को जनता ने वोट देकर विधानसभा और संसद तक पहुंचाया। किसी को विधायक बनाया, किसी को सांसद। चुनाव दर चुनाव उम्मीद यही रही कि अब शायद गांव तक सड़क पहुंचेगी, अस्पताल बेहतर होंगे, पलायन रुकेगा और पहाड़ की जिंदगी आसान होगी। नेता बदलते रहे, सरकारें बदलती रहीं, चुनावी नारे बदलते रहे, मगर पुरोला के कई गांवों की तस्वीर नहीं बदली। जिन नेताओं को जनता ने सिर आंखों पर बैठाया, वह राजधानी की राजनीति में रम गए। उनके परिवार शहरों में बस गए। बच्चों की पढ़ाई महानगरों में हुई, इलाज बड़े अस्पतालों में हुआ और सुविधाओं से भरपूर जीवन उनकी नई पहचान बन गया। दूसरी ओर, जिन लोगों के वोट से यह राजनीतिक सफर तय हुआ, वह आज भी सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हाल के दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में सड़क और प्रदर्शन दोनों चर्चा का विषय बने हैं। लेकिन एक सवाल बार-बार उठता हैकृक्या आंदोलन भी अब सड़क देखकर तय होंगे? जहां तक आरामदायक सड़क है, वहां प्रदर्शन करना आसान है। मीडिया पहुंच जाएगा, कैमरे लग जाएंगे, सोशल मीडिया पर वीडियो बन जाएंगे और कुछ घंटे बाद सब अपने-अपने घर लौट जाएंगे। लेकिन प्रदेश के पुरोला जैसे इलाकों में, जहां गांव तक पहुंचने के लिए सैकड़ों मोड़ और कई किलोमीटर पैदल रास्ता तय करना पड़ता है, वहां कौन जाएगा? क्या किसी बड़े नेता ने कभी दोणी जैसे दूरस्थ गांवों तक जाकर वहां की वास्तविक स्थिति देखने की कोशिश की? बता दें कि पुरोला क्षेत्र का दोणी गांव केवल एक गांव नहीं, बल्कि उस विकास माडल पर सवाल है, जिसमें राजधानी चमकती है लेकिन सीमांत अंधेरे में रह जाता है। बताया जाता है कि आज भी गांव के लोग सड़क के अभाव में गंभीर कठिनाइयों का सामना करते हैं। बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना किसी परीक्षा से कम नहीं। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की तकलीफें चुनावी भाषणों का हिस्सा तो बनती हैं, लेकिन समाधान का नहीं। जब कोई मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाता, तब वह केवल एक व्यक्ति की नहीं, पूरे सिस्टम की असफलता होती है। आज का दौर सोशल मीडिया का है। नेताओं के वीडियो वायरल होते हैं। कहीं पेड़ के चारों ओर घूमकर रील बनाई जाती है, कहीं विकास के दावे कैमरे के सामने दोहराए जाते हैं। लेकिन पहाड़ की असली रील कोई कैमरा रिकार्ड नहीं करता। वह रील उस मरीज की है जिसे चार लोग कंधे पर उठाकर सड़क तक ला रहे हैं। वह रील उस बुजुर्ग की है जो इलाज के लिए घंटों सफर करता है। वह रील उस छात्र की है जिसे पढ़ाई के लिए गांव छोड़ना पड़ता है। वह रील उस मां की है जो बारिश में फिसलते रास्तों पर राशन ढोती है। यह रील वायरल नहीं होती, क्योंकि यहां कैमरे कम और तकलीफें ज्यादा हैं। कल्पना कीजिए, यदि दोणी गांव तक अच्छी सड़क होती, यदि वहां एसी कारें पहुंच सकतीं, यदि राजनीतिक काफिले आसानी से पहुंच जाते, तो शायद वहां भी मंच सजता, नारे लगते, फोटो खिंचती और सरकार पर दबाव बनाने के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते। शायद किसी राष्ट्रीय नेता का काफिला रोकने की घोषणा भी होती। शायद संसद में आवाज उठाने की चेतावनी भी दी जाती। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यह गांव सात मोड़ों पर नहीं, सात सौ मोड़ों के पार है। वहां पहुंचना कठिन है, इसलिए वहां की पीड़ा भी राजनीति की प्राथमिकता नहीं बन पाती। उत्तराखंड सरकार लगातार विकसित उत्तराखंड, अंतिम छोर तक विकास और सड़क हर गांव तक जैसे दावे करती रही है। कई सड़क परियोजनाओं की घोषणाएं भी हुई हैं। लेकिन यदि राज्य बनने के ढाई दशक बाद भी सीमांत गांव सड़क के लिए तरस रहे हैं, तो सवाल केवल किसी एक गांव का नहीं, बल्कि विकास की पूरी अवधारणा का है। क्या विकास केवल चारधाम मार्ग तक सीमित रहेगा? क्या राजधानी और पर्यटन क्षेत्रों की चमक ही विकास का पैमाना होगी?क्या सीमांत क्षेत्रों का नागरिक केवल चुनाव के समय याद किया जाएगा? प्रदेश में पुरोला, दोणी और ऐसे ही अनेक गांव अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होंगे। उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उनकी सड़क कब बनेगी, एंबुलेंस कब पहुंचेगी, अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता कब आसान होगा और उनके बच्चों को भी वही सुविधाएं कब मिलेंगी जो राजधानी के लोगों को सहज उपलब्ध हैं। क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा राजधानी की चौड़ी सड़कों पर नहीं, बल्कि उन सात सौ मोड़ों के पार होती है जहां आज भी विकास पहुंचने का इंतजार कर रहा है।

पहाड़ में ‘सेर’ और ‘पाथा’

जब तराजू नहीं, भरोसा तौलता था सौदा, गांव की अर्थव्यवस्था का आधार था ‘पाथा’ न डिजिटल तराजू थे, न इलेक्ट्रानिक कांटे, फिर भी व्यापार में थी ईमानदारी की मिसाल डिजिटल जमाने ने छीन लिया पहाड़ के ‘सेर-पाथा’ वाला वह आपसी विश्वास देहरादून। आज जब हर दुकान पर डिजिटल मशीनें लगी हैं और वजन ग्रामों में मापा जाता है, तब नई पीढ़ी शायद यह भी नहीं जानती कि कभी उत्तराखंड के पहाड़ों में सेर और पाथा ही व्यापार और जीवन का आधार हुआ करते थे। ये केवल वजन और माप की इकाइयां नहीं थीं, बल्कि पहाड़ की सामाजिक संस्कृति, विश्वास और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की पहचान थीं। पहाड़ के गांवों में धान, झंगोरा, मंडुवा, गेहूं, राजमा, गहत, भट्ट और मसूर जैसे अनाज का लेन-देन अक्सर पाथा से होता था। लकड़ी से बना एक विशेष पात्र होता था, जिसे पाथा कहा जाता था। उसमें अनाज भरकर मापा जाता था। किसी ने दो पाथा मंडुवा दिया, किसी ने पांच पाथा गेहूं उधार लिया। गांव की छोटी-बड़ी खरीद-बिक्री का यही सबसे विश्वसनीय तरीका था। उस समय न रसीद होती थी, न बिल। केवल जुबान और भरोसा ही सबसे बड़ा दस्तावेज होता था। जब गांव से लोग कस्बों के बाजार पहुंचते थे, तब वहां सेर का बोलबाला होता था। घी, तेल, गुड़, चीनी, नमक और दालें सेर के हिसाब से खरीदी जाती थीं। दुकानदार लोहे के बाट और तराजू से सामान तौलता था। एक सेर, आधा सेर, पाव और छटांक जैसी इकाइयां हर घर की महिलाओं और किसानों की जुबान पर रहती थीं। आज की पीढ़ी किलो और ग्राम जानती है, लेकिन कभी पूरे पहाड़ की अर्थव्यवस्था सेर के इर्द-गिर्द घूमती थी। उस दौर की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि व्यापार केवल लाभ कमाने का माध्यम नहीं था। दुकानदार जानता था कि सामने वाला ग्राहक उसका पड़ोसी भी है। किसान जानता था कि अगली फसल तक उधार भी मिल जाएगा। यदि किसी के घर शादी होती, तो पूरा गांव अनाज पाथा-पाथा जोड़कर मदद करता। यदि किसी परिवार की फसल खराब हो जाती, तो पड़ोसी बिना हिसाब-किताब के अनाज दे देते। यही पहाड़ की असली सामाजिक पूंजी थी। पहाड़ के दूरस्थ इलाकों में नकदी का प्रचलन बहुत कम था। कई बार लोहार, बढ़ई, दर्जी और अन्य पारंपरिक कारीगरों को मजदूरी पैसे से नहीं, बल्कि अनाज में दी जाती थी। इसे स्थानीय स्तर पर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों से जाना जाता था। कटाई के मौसम में पूरा गांव श्रमदान करता और बाद में पाथा के हिसाब से अनाज बांटा जाता। यह केवल लेन-देन नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का हिस्सा था। स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे भारत में मीट्रिक प्रणाली लागू हुई। सेर की जगह किलोग्राम और पाथा जैसे पारंपरिक मापों का स्थान आधुनिक मानकों ने ले लिया। बाजार आधुनिक हुए, पैकेजिंग आई, इलेक्ट्रानिक तराजू आए और पुरानी माप-तौल की प्रणालियां इतिहास बनने लगीं। आज गांवों के बुजुर्ग ही शायद बता सकें कि एक पाथा में कितना अनाज आता था या एक सेर का वास्तविक महत्व क्या था। सेर और पाथा के खत्म होने के साथ केवल माप-तौल नहीं बदली, बल्कि गांवों की जीवनशैली भी बदल गई। अब उधार मोबाइल ऐप में दर्ज होता है। रिश्ते बैंक खाते से मापे जाने लगे हैं। सामुदायिक सहयोग की जगह बाजार ने ले ली है। विश्वास की जगह लिखित अनुबंध ने ले ली है। पहाड़ की पारंपरिक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे आधुनिक बाजार में समा गई। आज जब उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की बात करता है, तब केवल लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक वेशभूषा ही नहीं, बल्कि सेर, पाथा, नाली, मुट्ठी, छटांक जैसी पारंपरिक माप प्रणालियां भी हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। स्कूलों में स्थानीय इतिहास पढ़ाया जाए, संग्रहालयों में पुराने बाट, तराजू और पाथा प्रदर्शित किए जाएं, और गांवों के बुजुर्गों की स्मृतियों को दस्तावेज़ बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि पहाड़ की पहचान केवल हिमालय नहीं, बल्कि उसकी जीवन-पद्धति भी है। पहाड़ का सेर केवल वजन नहीं था और पाथा केवल माप नहीं था। वे उस दौर के प्रतीक थे, जब इंसान की नीयत तराजू से भारी होती थी, भरोसा किसी रसीद का मोहताज नहीं था और गांव की समृद्धि केवल धन से नहीं, बल्कि आपसी विश्वास से मापी जाती थी। शायद यही कारण है कि पुराने लोग आज भी कहते हैंकृपहाड़ बदल गया है, लेकिन सेर और पाथा के साथ जो अपनापन गया, उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी।

सत्ता परिवर्तन के संदेश संग कांग्रेस मैदान में

विधानसभा चुनाव की आहट के साथ कांग्रेस ने झोंकी ताकत सत्ता परिवर्तन का संदेश लेकर सड़कों पर उतरने की रणनीति सिर्फ रैलियां नहीं, सुस्त पड़े कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा फूंककर संगठन को जमीनी स्तर पर री-बूट करने की कोशिश देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव-2027 की आहट के बीच कांग्रेस ने प्रदेश में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। पार्टी की परिवर्तन संकल्प यात्रा को आगामी चुनाव के लिए माहौल बनाने और सत्ता परिवर्तन के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने की बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस इस यात्रा के माध्यम से भाजपा सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, परिवर्तन संकल्प यात्रा प्रदेश के विभिन्न जिलों और विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरेगी। यात्रा का उद्देश्य केवल सरकार के खिलाफ माहौल बनाना नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरना और संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करना भी है। कांग्रेस का मानना है कि प्रदेश में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, बढ़ती महंगाई और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर जनता में नाराजगी है। पार्टी इन्हीं मुद्दों को यात्रा का प्रमुख आधार बनाकर जनता के बीच जाने की रणनीति बना रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह यात्रा केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनता की आवाज को विधानसभा तक पहुंचाने का अभियान होगी। पार्टी का दावा है कि प्रदेश में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है और परिवर्तन संकल्प यात्रा उसी जनभावना को स्वर देने का प्रयास है। पिछले कुछ चुनावों में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता रही है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व इस यात्रा के जरिए कार्यकर्ताओं और नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यात्रा का एक बड़ा उद्देश्य कार्यकर्ताओं में यह संदेश देना भी है कि पार्टी चुनावी मोड में आ चुकी है और सत्ता में वापसी के लिए गंभीरता से तैयारी कर रही है। परिवर्तन संकल्प यात्रा के दौरान कांग्रेस सरकार की नीतियों, बढ़ती बेरोजगारी, पलायन, कृषि संकट और नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाएगी। पार्टी यह संदेश देने का प्रयास करेगी कि प्रदेश को एक वैकल्पिक राजनीतिक दिशा की आवश्यकता है। दूसरी ओर भाजपा कांग्रेस की इस यात्रा को राजनीतिक नौटंकी बताते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने रखने की तैयारी में है। भाजपा का कहना है कि विकास कार्यों और बड़े निर्णयों के दम पर वह तीसरी बार भी जनता का विश्वास हासिल करेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि परिवर्तन संकल्प यात्रा को केवल एक संगठनात्मक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह कांग्रेस के लिए चुनावी शंखनाद भी है और कार्यकर्ताओं के लिए एकजुटता का संदेश भी। हालांकि, यात्रा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कांग्रेस अपने भीतर की गुटबाजी को कितना नियंत्रित कर पाती है और जनता के बीच एक मजबूत विकल्प के रूप में खुद को कितनी प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर पाती है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की राजनीति अब पूरी तरह चुनावी रंग में रंगने लगी है और कांग्रेस की परिवर्तन संकल्प यात्रा आने वाले दिनों में प्रदेश की सियासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने जा रही है। यह यात्रा केवल सड़कों पर चलने वाला राजनीतिक कारवां नहीं, बल्कि 2027 की सत्ता की लड़ाई का पहला बड़ा संदेश भी मानी जा रही है।

हैट्रिक के ‘ख्वाब’ में चुनौतियों का ‘पहाड़’

लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के ऐतिहासिक लक्ष्य के साथ भाजपा ने झोंकी ताकत समय से पहले चुनावी तैयारी के बावजूद सत्ता विरोधी लहर का डर पार्टी के भीतर बरकरार धरातल पर स्थानीय मुद्दे, पलायन और बेरोजगारी जैसे तीखे सवाल हैं सबसे बड़ी चुनौती एंटी इनकंबेंसी को विकास और हिंदुत्व के एजेंडे से संतुलित करने की चल रही है तैयारी देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी कुछ समय दूर हो, लेकिन भाजपा ने चुनावी शंखनाद समय से पहले ही कर दिया है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर भाजपा ने बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक अपनी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। पार्टी का मानना है कि यदि संगठन मजबूत रहा और सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा, तो सत्ता की हैट्रिक का रास्ता आसान हो सकता है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी माहौल एंटी इनकंबेंसी, स्थानीय मुद्दे और बेरोजगारी जैसे सवाल भाजपा के सामने बड़ी चुनौती बने रहेंगे। भाजपा का पहला फोकस संगठन को पूरी तरह चुनावी मोड में लाना है। बूथ समितियों के पुनर्गठन, पन्ना प्रमुखों को सक्रिय करने और शक्ति केंद्रों को मजबूत करने का अभियान तेज किया जा रहा है। पार्टी की रणनीति साफ हैकृचुनाव प्रचार शुरू होने से पहले हर बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ता तैयार हों। प्रदेश नेतृत्व लगातार जिला, मंडल और बूथ स्तर की बैठकों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को संदेश दे रहा है कि चुनाव केवल नेताओं के भरोसे नहीं, बल्कि बूथ की मजबूती से जीते जाते हैं। भाजपा चाहती है कि चुनावी बहस विकास, आधारभूत ढांचे, चारधाम परियोजना, निवेश, पर्यटन, महिला सशक्तीकरण और केंद्र-राज्य के समन्वय पर केंद्रित रहे। पार्टी का प्रयास होगा कि सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को चुनावी समर्थन में बदला जाए। इसके साथ ही प्रधानमंत्री की योजनाओं, सड़क, रेल और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को भी चुनावी अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाया जाएगा। 2027 के चुनाव में बड़ी संख्या में पहली बार मतदान करने वाले युवा शामिल होंगे। भाजपा की रणनीति इस वर्ग तक सोशल मीडिया, डिजिटल अभियान और युवा सम्मेलनों के जरिए पहुंचने की है। हालांकि यही वर्ग बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और रोजगार के अवसरों जैसे मुद्दों पर सबसे अधिक सवाल भी पूछ रहा है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती केवल प्रचार नहीं, बल्कि विश्वास कायम रखने की भी होगी। महिला स्वयं सहायता समूह, उज्ज्वला, आवास, जल जीवन मिशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े लाभार्थियों तक सीधा संवाद भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी का मानना है कि महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार सुविधाएं लंबे समय से पर्वतीय क्षेत्रों के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। भाजपा इन क्षेत्रों में विकास कार्यों को प्रमुखता से सामने लाने की तैयारी कर रही है। लेकिन विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि अनेक गांव आज भी सड़क, डॉक्टर और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में चुनावी मुकाबले में स्थानीय मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण रहेंगे जितने बड़े विकास परियोजनाएं। राजनीतिक संकेत बताते हैं कि भाजपा विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के मुद्दों को भी अपने अभियान का हिस्सा बनाए रख सकती है। चारधाम, देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत, समान नागरिक संहिता जैसे विषय समर्थक वर्ग के बीच प्रमुख मुद्दे बने रह सकते हैं। भाजपा की रणनीति केवल अपने संगठन को मजबूत करने तक सीमित नहीं है। पार्टी कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों की गतिविधियों पर भी करीबी नजर रखे हुए है। यदि विपक्ष साझा मुद्दों पर एकजुट होता है, तो चुनावी मुकाबला अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। लगातार सत्ता में रहने वाली किसी भी सरकार के सामने सबसे बड़ा जोखिम सत्ता विरोधी रुझान होता है। स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी, अधूरी घोषणाएं, भर्ती, बेरोजगारी, पलायन और महंगाई जैसे मुद्दे भाजपा के लिए चुनौती बन सकते हैं। यही कारण है कि पार्टी संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर दे रही है, ताकि असंतोष को समय रहते कम किया जा सके। भाजपा का लक्ष्य केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि चुनाव का नैरेटिव तय करना है। पार्टी चाहती है कि मुकाबला विकास बनाम वादों के आधार पर हो, जबकि विपक्ष सरकार से रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और स्थानीय समस्याओं पर जवाब मांगने की तैयारी में है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 का रण धीरे-धीरे आकार ले रहा है। भाजपा ने संगठनात्मक तैयारी और चुनावी रणनीति पर काम तेज कर दिया है, लेकिन अंतिम फैसला जनता करेगी। सत्ता पक्ष के सामने उपलब्धियों को भरोसे में बदलने की चुनौती है, जबकि विपक्ष के सामने असंतोष को वोट में बदलने की। अगले महीनों में यही तय करेगा कि 2027 में उत्तराखंड की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।

बाहर जेन जेड और सदन के भीतर विपक्ष ने सरकार को घेरा

संसद के बाहर युवाओं हल्ला, भीतर सरकार पर विपक्ष का वार रोजगार, पेपर लीक, शिक्षा के मुद्दे पर दिल्ली में गरमाया माहौल संसद के मानसून सत्र के पहले दिन सड़क व सदन में महासंग्राम नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के साथ ही देश की राजनीति में सड़क और सदन दोनों का तापमान बढ़ गया। एक ओर लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष ने केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश की, तो दूसरी ओर जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में जुटे नई पीढ़ी के युवाओं ने इन्हीं सवालों को लेकर अपनी आवाज बुलंद की। इससे यह संदेश गया कि जिन मुद्दों पर संसद के भीतर बहस हो रही है, वही मुद्दे संसद के बाहर भी युवाओं के आक्रोश का कारण बने हुए हैं। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि डिग्री हासिल करने के बाद भी रोजगार के अवसर सीमित हैं, सरकारी भर्तियां समय पर पूरी नहीं हो रहीं और पेपर लीक जैसी घटनाओं ने लाखों युवाओं के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनकी लड़ाई किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि अपने भविष्य और अधिकारों के लिए है। संसद के मानसून सत्र के पहले दिन लोकसभा और राज्यसभा में विपक्षी दलों ने युवाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की कोशिश की। विपक्ष का कहना था कि देश का सबसे बड़ा वर्ग रोजगार, शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर चिंतित है और सरकार को इन सवालों पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। सत्ता पक्ष ने अपनी योजनाओं, कौशल विकास, स्टार्टअप, डिजिटल इंडिया और रोजगार सृजन की पहलों का हवाला देते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज किया। जंतर-मंतर पर सबसे ज्यादा गूंजा सवाल थाकृडिग्री है... नौकरी कहां है? युवाओं का कहना था कि प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार विवाद, भर्तियों में देरी और रिक्त पदों को समय पर न भरने से लाखों अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। उनका आरोप था कि सरकार घोषणाएं तो करती है, लेकिन युवाओं को समय पर अवसर नहीं मिल रहे। इस प्रदर्शन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें बड़ी संख्या में ऐसे युवा शामिल दिखे जो पहली बार किसी बड़े जन आंदोलन का हिस्सा बने। सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाली यह पीढ़ी अब केवल आनलाइन विरोध तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि नीतिगत फैसलों में अपनी भागीदारी और जवाबदेही भी चाहती है। संसद के भीतर विपक्ष की आक्रामकता और संसद के बाहर युवाओं का प्रदर्शन आने वाले समय की राजनीति का संकेत माना जा सकता है। देश में करोड़ों युवा मतदाता हैं और उनकी प्राथमिकताएं अब रोजगार, शिक्षा, पारदर्शी भर्ती और बेहतर अवसरों पर अधिक केंद्रित होती दिखाई दे रही हैं। ऐसे में यह वर्ग 2027 के विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। जंतर-मंतर का प्रदर्शन और संसद में चली बहस, दोनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि युवाओं के मुद्दे अब केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रह गए हैं। चुनौती यह है कि इन सवालों का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर नीतिगत फैसलों और समयबद्ध कार्रवाई के रूप में सामने आए।

udaydinmaan: यहाँ मूर्तियाँ नहीं, प्रकृति है पहला भगवान

udaydinmaan: यहाँ मूर्तियाँ नहीं, प्रकृति है पहला भगवान: देवभूमि का लोकपर्व हरेला और प्रकृति से है देवत्व का नाता आधुनिक पर्यावरण संकट को रास्ता दिखाती पहाड़ की परंपराएँ पहाड़ में जंगल देवता, नदियाँ ...

शनिवार, 18 जुलाई 2026

पेपरलीक बनाम किरदारलीक

राहुल के सवालों से ध्यान भटकाने की कोशिश या भाजपा की रणनीतिक चूक लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बयान के बाद सियासी जंग तेज कांग्रेस पार्टी ने साधा निशानाकृपेपरलीक पर जवाब नहीं, विरोध की राजनीति देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में राहुल गांधी के पेपरलीक मुद्दे ने एक बार फिर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी जुबानी जंग छेड़ दी है। कांग्रेस का आरोप है कि राहुल गांधी द्वारा युवाओं के रोजगार, भर्ती घोटालों और पेपरलीक जैसे मुद्दों पर सवाल उठाने के बाद भाजपा ने मूल मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश की। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि दून में बड़े आयोजन और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के जरिए युवाओं के सवालों को दबाने का प्रयास किया गया। कांग्रेस के सोशल मीडिया और पार्टी नेताओं की ओर से यह भी कहा गया कि भारी बारिश के बीच महिला कार्यकर्ताओं को विरोध प्रदर्शन के लिए उतारना भाजपा की राजनीतिक मजबूरी को उजागर करता है। कांग्रेस ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि पेपरलीक की क्लास से ध्यान भटकाने की कोशिश में भाजपा का किरदारलीक हो गया। राहुल गांधी ने अपने उत्तराखंड दौरे के दौरान राज्य में भर्ती परीक्षाओं में पेपरलीक, बेरोजगारी और युवाओं के भविष्य को प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं और युवाओं का विश्वास कमजोर हुआ है। कांग्रेस का दावा है कि इन्हीं सवालों ने भाजपा को असहज कर दिया। दूसरी ओर भाजपा ने राहुल गांधी के आरोपों को राजनीतिक नौटंकी करार दिया। भाजपा नेताओं का कहना है कि राज्य सरकार ने भर्ती घोटालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है, दोषियों को जेल भेजा गया है और देश का सबसे कड़ा नकल विरोधी कानून लागू किया गया है। भाजपा का दावा है कि कांग्रेस युवाओं को गुमराह करने का प्रयास कर रही है और उसका विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है। हालांकि कांग्रेस इस जवाब से संतुष्ट नहीं है। पार्टी का कहना है कि यदि सरकार के पास उपलब्धियां हैं तो उन्हें तथ्यों के साथ सामने रखा जाना चाहिए, न कि विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक आयोजनों के जरिए विमर्श को दूसरी दिशा में मोड़ा जाए। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि जनता अब रोजगार, महंगाई और शिक्षा जैसे मुद्दों पर स्पष्ट जवाब चाहती है। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह टकराव केवल राहुल गांधी के दौरे तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक आने के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों युवाओं को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। भर्ती परीक्षाएं, पेपरलीक, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में आते दिख रहे हैं। भाजपा का फोकस राहुल गांधी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का है, जबकि कांग्रेस सरकार की जवाबदेही तय करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में असली सवाल यही है कि चुनावी बहस का केंद्र पेपरलीक, बेरोजगारी और युवाओं का भविष्य रहेगा या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और विरोध प्रदर्शन।

श्रम, संघर्ष और संस्कृति की प्रतीक है ‘घस्यारी’

देवभूमि की असली देवी है घस्यारी, बुग्यालों से भी भारी है इनका हौसला खूबसूरत नज़ारों के पीछे छिपा संघर्ष, जिसने सदियों से बचा कर रखी है पहाड़ की साख पहाड़ की घस्यारी का सिर पर घास का गट्ठर, कंधों पर पूरे पहाड़ का जीवन देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल हिमालय, देवदार, बुग्याल और मंदिरों से नहीं है। इस प्रदेश की असली ताकत उन महिलाओं में बसती है, जिन्हें गांवों में प्यार से घस्यारी कहा जाता है। घस्यारीकृयानी वह महिला जो रोज जंगलों से पशुओं के लिए घास काटकर लाती है। यह शब्द छोटा है, लेकिन इसके भीतर संघर्ष, साहस, श्रम और पूरे पहाड़ की अर्थव्यवस्था का इतिहास समाया हुआ है। सुबह के चार या पांच बजे का समय। गांव अभी नींद में डूबा होता है, लेकिन घस्यारी की दिनचर्या शुरू हो चुकी होती है। चूल्हा जलाना, परिवार के लिए भोजन बनाना, बच्चों को तैयार करना और फिर हाथ में दरांती, पीठ पर रस्सी और सिर पर टोकरा लेकर जंगल की ओर निकल पड़ना। कई किलोमीटर की चढ़ाई, फिसलन भरे रास्ते, जंगली जानवरों का डर और मौसम की मारकृयह सब उसके लिए रोजमर्रा की बात है। जंगल पहुंचकर वह घंटों खड़ी ढलानों पर घास काटती है। फिर 30 से 40 किलो तक का घास का गट्ठर सिर या पीठ पर बांधकर वापस गांव लौटती है। यह केवल घास नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की आजीविका होती है। पशु उसी घास से पलते हैं, खेतों के लिए गोबर की खाद बनती है और वही खाद अगली फसल की उम्मीद बन जाती है। पहाड़ की खेती का पूरा चक्र घस्यारी के श्रम पर टिका है। विडंबना यह है कि जिस महिला के श्रम से गांव की अर्थव्यवस्था चलती है, उसका नाम शायद ही किसी सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण में दिखाई देता हो। वह किसान भी है, पशुपालक भी, वन संरक्षण की प्रहरी भी और परिवार की आधारशिला भी, लेकिन उसके काम को अक्सर ष्घर का कामष् कहकर अनदेखा कर दिया जाता है। पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन ने घस्यारी का बोझ और बढ़ा दिया है। रोजगार की तलाश में पुरुष शहरों की ओर चले गए। गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं बचीं। खेतों की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है, पशुओं की देखभाल भी और जंगल से चारा लाने का काम भी। एक महिला अब कई भूमिकाएं अकेले निभा रही है। घस्यारी का जंगल से रिश्ता केवल जरूरत का नहीं, बल्कि संवेदनाओं का भी है। वह जानती है कि किस पेड़ की टहनी काटनी है और किसे छोड़ देना है। कौन-सी घास पशुओं के लिए पौष्टिक है और किस मौसम में कौन-सा चारा सुरक्षित रहेगा। यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय ने नहीं दिया, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव ने सिखाया है। उत्तराखंड का प्रसिद्ध चिपको आंदोलन भी इन्हीं पहाड़ की महिलाओं की चेतना का परिणाम था। जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का स्रोत नहीं थे, बल्कि पानी, मिट्टी, पशुधन और जीवन का आधार थे। इसलिए जब पेड़ों पर कुल्हाड़ी चली, तो सबसे पहले घस्यारी ही पेड़ों से लिपट गई। उसने दुनिया को सिखाया कि पर्यावरण संरक्षण किताबों से नहीं, जीवन से सीखा जाता है। आज आधुनिकता गांवों तक पहुंच रही है। सड़कें बनी हैं, गैस सिलेंडर पहुंचे हैं, कुछ जगह चारा काटने की मशीनें भी हैं, लेकिन पहाड़ की घस्यारी का संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। कई गांव आज भी ऐसे हैं जहां रोज घंटों पैदल चलकर घास लानी पड़ती है। बारिश हो या बर्फबारी, यह सिलसिला नहीं रुकता। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमने कभी घस्यारी के श्रम का वास्तविक मूल्यांकन किया? क्या उसकी मेहनत को आर्थिक पहचान मिली? क्या उसके लिए सुरक्षित जंगल मार्ग, आधुनिक उपकरण, चारा विकास योजनाएं और स्वास्थ्य सुविधाएं पर्याप्त हैं? यदि नहीं, तो विकास की तस्वीर अभी अधूरी है। पहाड़ की घस्यारी केवल एक महिला नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवंत संस्कृति है। उसके सिर पर रखा घास का गट्ठर केवल चारा नहीं, बल्कि पहाड़ की सभ्यता, खेती, पशुपालन और आत्मनिर्भरता का भार है। जिस दिन गांव की घस्यारी जंगल जाना छोड़ देगी, उस दिन पहाड़ का पारंपरिक जीवन भी बदल जाएगा। आज जरूरत केवल उसकी प्रशंसा करने की नहीं, बल्कि उसके श्रम को सम्मान, सुरक्षा और नीति में उचित स्थान देने की है। क्योंकि सच यही है कि उत्तराखंड के पहाड़ आज भी घस्यारी के कदमों की आहट पर सांस लेते हैं।

‘युवा दांव’ से मचा ‘सियासी शोर’

देशभर से पहुंचे छात्र, पेपर लीक व बेरोजगारी पर राहुल का सीधा हमला देश के युवाओं का भविष्य छीना गया तो सत्ता से हिसाब भी युवा ही लेंगे देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम की गवाह नहीं बनी, बल्कि उस बेचौनी का मंच बन गई जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के भीतर पल रही है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम ने यह संदेश देने की कोशिश की कि 2027 की चुनावी लड़ाई केवल नेताओं के भाषणों से नहीं, बल्कि युवाओं के सवालों से तय होगी। दून में सुबह से ही छात्रों का उत्साह देखने लायक था। उत्तराखंड के अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश से पहुंचे छात्र अपने हाथों में तख्तियां लिए दिखाई दिए। किसी के पोस्टर पर पेपर लीक बंद करो लिखा था, तो कोई मेहनत का हक चाहिए की मांग कर रहा था। मंच से पहले मैदान बोल रहा था। राहुल गांधी ने अपने भाषण में सीधे सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि आज देश का युवा नौकरी नहीं, न्याय मांग रहा है। मेहनत छात्र करता है, लेकिन व्यवस्था उसकी उम्मीदों पर ताला लगा देती है। पेपर लीक केवल एक अपराध नहीं, यह लाखों युवाओं के सपनों की चोरी है। उन्होंने कहा कि जिस देश का युवा निराश होगा, उस देश का भविष्य भी कमजोर होगा। युवाओं की आवाज दबाकर लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। राहुल ने अपने संबोधन में बार-बार छात्रों को संघर्ष जारी रखने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जब युवा सवाल पूछता है तो सत्ता असहज हो जाती है। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, अधिकार है। कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि मंच पर भाषण से अधिक चर्चा छात्रों के अनुभवों की हुई। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे कई युवाओं ने अपनी समस्याएं साझा कीं। किसी ने वर्षों से अटकी भर्ती का दर्द बताया तो किसी ने परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग उठाई। माहौल कई बार राजनीतिक सभा से अधिक छात्र संवाद जैसा दिखाई दिया। राहुल गांधी के कार्यक्रम के समानांतर भाजपा ने भी राजनीतिक मोर्चा संभाला। कांग्रेस का आरोप है कि राहुल के कार्यक्रम की धार कम करने के लिए समानांतर गतिविधियों और विरोध प्रदर्शनों पर जोर दिया गया। भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि उसने केवल राहुल गांधी के बयानों का लोकतांत्रिक विरोध किया और राज्य सरकार भर्ती घोटालों पर सख्त कार्रवाई कर चुकी है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की रही कि राहुल गांधी जिस मुद्दे को लेकर आए थेकृपेपर लीक, बेरोजगारी और युवाओं का भविष्यकृवही कार्यक्रम के बाद सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। कांग्रेस इसे अपनी रणनीतिक सफलता मान रही है, जबकि भाजपा सरकार की ओर से नकल विरोधी कानून, दोषियों पर कार्रवाई और भर्ती सुधारों को अपनी उपलब्धि के रूप में सामने रखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक सड़क, धर्म, विकास और क्षेत्रीय अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन अब रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता भी बड़े चुनावी मुद्दे बनते दिख रहे हैं। राहुल गांधी ने अपने पूरे भाषण में यही संदेश देने की कोशिश की कि यदि युवा नाराज है तो सत्ता की सबसे मजबूत कुर्सी भी डगमगा सकती है। कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दीकृयुवाओं के आक्रोश को राजनीतिक मुद्दा बनाना। देहरादून का छात्रों की गूंज कार्यक्रम भीड़ जुटाने की कवायद भर नहीं था। यह सत्ता को यह याद दिलाने की कोशिश थी कि प्रतियोगी परीक्षा देने वाला युवा अब केवल अभ्यर्थी नहीं, बल्कि एक जागरूक मतदाता भी है। आने वाले विधानसभा चुनाव में वह रोजगार, भर्ती और शिक्षा जैसे मुद्दों पर जवाब मांग सकता है। अब नजर भाजपा पर है। क्या वह इस चुनौती का जवाब केवल राजनीतिक पलटवार से देगी या युवाओं के सामने ठोस उपलब्धियों और नई घोषणाओं के साथ उतरेगी? क्योंकि चुनावी मौसम में नारे कुछ दिन चलते हैं, लेकिन युवाओं के सवाल लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़ते।

जंतर-मंतर पर ‘लोकतंत्र’ की घेराबंदी

अस्पताल पहुंचे सोनम वांगचुक, आंदोलन स्थल खाली कराने से उठे सवाल 21 दिन के अनशन के बाद पुलिस ने सोनम वांगचुक को अस्पताल पहुंचाया प्रदर्शनकारियों को हटाने की कार्रवाई से विपक्ष ने किया सरकार पर हमलाकृ नई दिल्ली। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी असहमति को सुनने की क्षमता मानी जाती है। लेकिन शनिवार को राजधानी के जंतर-मंतर से जो तस्वीर सामने आई, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या देश में विरोध दर्ज कराने की लोकतांत्रिक जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है? 21 दिनों से अनशन पर बैठे शिक्षाविद सोनम वांगचुक को पुलिस सफदरजंग अस्पताल ले गई और इसके साथ ही जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन को हटाने की कार्रवाई शुरू हो गई। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक और संवैधानिक बहस को तेज कर दिया है। पुलिस का कहना है कि वांगचुक की तबीयत गंभीर हो रही थी और डाक्टरों की सलाह पर उन्हें अस्पताल ले जाना आवश्यक था। प्रशासन का तर्क है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन की रक्षा उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन आंदोलनकारियों का आरोप है कि यह केवल चिकित्सीय हस्तक्षेप नहीं, बल्कि आंदोलन की धार कुंद करने की कोशिश थी। उनके अनुसार, प्रदर्शनकारियों को हटाकर उस आवाज को कमजोर करने का प्रयास किया गया जो पिछले कई दिनों से सत्ता के सामने असहज सवाल खड़े कर रही थी। जंतर-मंतर वर्षों से देश में लोकतांत्रिक विरोध का प्रतीक माना जाता रहा है। किसान आंदोलन हो, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान हो या छात्र और सामाजिक संगठनों के प्रदर्शनकृयहीं से कई राष्ट्रीय बहसों ने जन्म लिया। ऐसे में किसी आंदोलन का इस तरह अचानक समाप्त होना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक प्रश्न खड़े करता है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यदि किसी अनशनकारी की हालत गंभीर हो जाए, तो प्रशासन पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी होती है। सवाल केवल इतना नहीं कि सोनम वांगचुक अस्पताल क्यों पहुंचे। बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी आंदोलन की सबसे प्रभावशाली घड़ी वही होती है, जब उसे प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ता है? इतिहास बताता है कि कई बार आंदोलनों को रोकने की कोशिशों ने उन्हें और अधिक राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। विपक्ष ने इस कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट बताते हुए सरकार को घेरा है। दूसरी ओर सरकार समर्थक पक्ष का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और किसी भी नागरिक की जान की रक्षा करना प्रशासन का दायित्व है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं, लेकिन इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि असहमति और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बीच संतुलन बनाना लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा है। राजनीतिक ष्टि से भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। जब देश में युवाओं, परीक्षाओं, रोजगार और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर बहस तेज है, तब किसी प्रमुख आंदोलन का इस तरह समाप्त होना स्वाभाविक रूप से सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव को और तीखा करेगा। यह भी संभव है कि जंतर-मंतर से हटी आवाज अब संसद, अदालतों, सोशल मीडिया और देशभर के विश्वविद्यालयों तक और व्यापक रूप से पहुंचे। फिलहाल तस्वीर साफ हैकृसोनम वांगचुक अस्पताल में हैं, जंतर-मंतर खाली कराया जा रहा है, लेकिन जिन सवालों को लेकर आंदोलन शुरू हुआ था, वह अभी भी देश की राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में बने हुए हैं। लोकतंत्र की असली कसौटी अब यही होगी कि इन सवालों का जवाब संवाद से मिलता है या टकराव से।

इधर ‘छात्रों की गूंज’ उधर ‘युवा अग्निवीर संवाद’

विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड में युवाओं को साधने के लिए सियासी जंग तेज राहुल गांधी ने बेरोजगारी, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था को बनाया चुनावी मुद्दा सीएम धामी ने संवाद के जरिए राष्ट्रसेवा और रोजगार के अवसरों का संदेश दिया देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति दो समानांतर राजनीतिक आयोजनों के नाम रहा। एक ओर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का छात्रों की गूंजश् कार्यक्रम था, जहां हजारों छात्र-युवाओं की मौजूदगी में पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाए गए। दूसरी ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का युवा अग्निवीर संवाद था, जहां सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं और अग्निवीरों के साथ संवाद कर राष्ट्रसेवा, अनुशासन और भविष्य के अवसरों का संदेश दिया गया। पहली नजर में यह दो अलग-अलग कार्यक्रम दिखाई देते हैं, लेकिन राजनीतिक मायने कहीं अधिक गहरे हैं। दोनों आयोजनों का लक्ष्य एक ही थाकृउत्तराखंड का युवा मतदाता जो 2027 के विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने बार-बार प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, बेरोजगारी और युवाओं के भविष्य का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वर्षों तक मेहनत करने वाले युवाओं के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए और यदि व्यवस्था उनकी मेहनत का सम्मान नहीं कर पाती, तो सरकारों को जवाब देना होगा। राहुल ने अपने संबोधन में कहा कि देश का युवा नौकरी की भीख नहीं मांग रहा, वह अपनी मेहनत का अधिकार मांग रहा है। पेपर लीक केवल एक परीक्षा नहीं बिगाड़ता, बल्कि लाखों परिवारों का भरोसा भी तोड़ देता है। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएं और लोकतांत्रिक तरीके से सवाल पूछते रहें। कांग्रेस का पूरा प्रयास इस कार्यक्रम के जरिए युवाओं की नाराजगी को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का था। उधर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने युवा अग्निवीर संवाद में सेना में जाने की तैयारी कर रहे युवाओं और अग्निवीरों से संवाद किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान वीरभूमि की रही है और यहां का युवा देश की सुरक्षा में हमेशा अग्रणी रहा है। धामी ने अग्निवीर योजना से जुड़े युवाओं का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि राज्य सरकार पूर्व अग्निवीरों को विभिन्न सरकारी सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में प्राथमिकता देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने युवाओं से अनुशासन, कौशल विकास और आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। भाजपा का संदेश स्पष्ट था कि युवा केवल सरकारी नौकरी का उम्मीदवार नहीं, बल्कि उद्यमिता, कौशल, सेना और नए अवसरों के माध्यम से भी अपना भविष्य बना सकता है। उत्तराखंड देश के उन राज्यों में है जहां बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। सेना में भर्ती की परंपरा भी यहां बेहद मजबूत रही है। इसके साथ ही पलायन, सीमित औद्योगिक विकास और रोजगार के अवसरों की कमी जैसे मुद्दे लंबे समय से चर्चा में हैं। यही कारण है कि आज राज्य का युवा केवल रोजगार ही नहीं, बल्कि पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और सम्मानजनक अवसरों की भी अपेक्षा रखता है। भाजपा और कांग्रेस दोनों इस मनोविज्ञान को समझ रही हैं और उसी के अनुरूप अपनी रणनीति तैयार कर रही हैं। देहरादून में हुए दोनों कार्यक्रमों ने एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर दीकृउत्तराखंड की राजनीति का केंद्र अब युवा है। एक मंच से व्यवस्था से सवाल पूछने का संदेश दिया गया, तो दूसरे मंच से राष्ट्र निर्माण और अवसरों का भरोसा जगाने की कोशिश हुई। अब असली परीक्षा राजनीतिक दलों की नहीं, बल्कि उनके वादों की है। क्योंकि आज का युवा केवल भाषण नहीं सुनता, वह परिणाम भी देखता है। चुनावी मंचों पर तालियां बज सकती हैं, लेकिन मतदान केंद्र तक वही मुद्दे पहुंचते हैं जो युवाओं के जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं। 2027 की चुनावी बिसात पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपनी चाल चल दी है। अब देखना यह है कि उत्तराखंड का युवा किस नैरेटिव पर अधिक भरोसा करता हैकृव्यवस्था से जवाब मांगने वाले संदेश पर या अवसर और राष्ट्रनिर्माण के वादे पर। बाक्स दो मंच, दो विचारधाराएं और लक्ष्य एक देहरादून में जो श्य दिखाई दिया, वह आने वाले चुनाव की दिशा का संकेत भी था। राहुल गांधी ने युवाओं की नाराजगी, असंतोष और जवाबदेही को राजनीतिक मुद्दा बनाया। मुख्यमंत्री धामी ने युवाओं की आकांक्षा, राष्ट्रसेवा और अवसरों को केंद्र में रखा। कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की कि सरकार युवाओं की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है, जबकि भाजपा ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि सरकार अवसर पैदा कर रही है और युवाओं को नई दिशा दे रही है। आगामी चुनाव युवाओं के इर्द-गिर्द राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का विधानसभा चुनाव जातीय या पारंपरिक समीकरणों के साथ-साथ युवाओं के मुद्दों पर भी लड़ा जाएगा। भाजपा अपने शासन, योजनाओं, निवेश, सैन्य परंपरा और रोजगार सृजन के प्रयासों को चुनावी मुद्दा बनाएगी, जबकि कांग्रेस बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था को सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी के रूप में पेश करने का प्रयास करेगी। यानी आने वाले महीनों में युवाओं को लेकर दोनों दलों के बीच राजनीतिक मुकाबला और तेज होने की पूरी संभावना है।

‘पंदेरा’ था पहाड़ का ‘सोशल नेटवर्क’

यहां रिश्तों की मिठास व लोकगीतों की गूंज से बुझती थी प्यास पहाड़ के उसकी कहानी जो कभी था सामाजिक विश्वविद्यालय यहां पहाड़ का मीठा पानी और यहां सजती थी रिश्तों की चौपाल आज नल बुझा रहे हैं प्यास, लेकिन सूख गए रिश्तों के वह झरने देहरादून। पहाड़ में अगर किसी बुजुर्ग से पूछिए कि गांव की सबसे जीवंत जगह कौन-सी थी, तो शायद वह मंदिर, चौपाल या बाजार का नाम न ले। वह मुस्कुराते हुए कहेगाकृपंदेरा। पंदेरा... यानी वह पत्थरों से बना प्राकृतिक जलस्रोत, जहां पहाड़ की छाती से रिसता हुआ मीठा पानी पूरे गांव की प्यास बुझाता था। लेकिन पंदेरा केवल पानी भरने की जगह नहीं था। वह गांव का सामाजिक विश्वविद्यालय था, जहां जीवन बहता था, रिश्ते बनते थे, गीत गूंजते थे और पूरे गांव की धड़कन सुनाई देती थी। सुबह की पहली किरण के साथ सिर पर गागर और कमर पर डलिया लिए महिलाएं पंदेरे की ओर निकल पड़ती थीं। रास्ते भर हंसी-मजाक, लोकगीत और पहाड़ी बोली की मिठास बिखरी रहती थी। कोई अपनी बहू की तारीफ कर रही होती, कोई बेटी की शादी की चिंता साझा करती, तो कोई खेतों की फसल का हाल सुनाती। गांव की आधी खबरें अखबार से पहले पंदेरे पर पहुंच जाती थीं। पंदेरा केवल जलस्रोत नहीं था, बल्कि समाज को जोड़ने वाली अदृश्य डोर था। यहां कोई बड़ा-छोटा नहीं होता था। अमीर-गरीब का भेद मिट जाता था। सबकी गागर एक ही धार से भरती थी। नई-नवेली बहुओं के लिए पंदेरा गांव को समझने की पहली पाठशाला था। यहीं उन्हें रिश्तों की पहचान मिलती, रीति-रिवाजों की सीख मिलती और गांव की संस्कृति से परिचय होता। बुजुर्ग महिलाओं का अनुभव और युवतियों का उत्साह मिलकर एक ऐसा संसार रचते थे, जिसे किसी किताब में नहीं पढ़ाया जा सकता। पहाड़ के अनेक लोकगीतों में पंदेरा बार-बार आता है। पानी भरती महिलाओं की सामूहिक आवाजें घाटियों में गूंजती थीं। वे गीत केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि दुख-सुख बांटने का माध्यम भी थे। कई प्रेम कहानियों की शुरुआत भी पंदेरे की पगडंडियों से हुई और कई सामाजिक रिश्तों की नींव भी यहीं पड़ी। समय बदला। जल जीवन मिशन और पाइपलाइन गांव-गांव पहुंची। यह विकास की बड़ी उपलब्धि थी। महिलाओं का श्रम कम हुआ, पानी घर तक पहुंचा और जीवन आसान हुआ। लेकिन इस सुविधा के साथ अनजाने में एक सामाजिक विरासत भी पीछे छूट गई। अब गागर की जगह प्लास्टिक की टंकी है। पंदेरे की जगह रसोई का नल है। लोकगीतों की जगह मोबाइल की रिंगटोन है। गांव की खबरें अब सोशल मीडिया से मिलती हैं, लेकिन उनमें वह अपनापन नहीं है जो पंदेरे की बैठकों में होता था। आज उत्तराखंड के हजारों पारंपरिक नौले, धारे और पंदेरे उपेक्षा का शिकार हैं। कहीं झाड़ियां उग आई हैं, कहीं पानी का स्रोत ही सूख गया है। कुछ जगहों पर सीमेंट और निर्माण ने प्राकृतिक जलधाराओं का रास्ता रोक दिया है। विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि इन पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी पहाड़ में पंदेरा नाम की भी कोई जगह होती थी। जरूर इसके लिए केवल सरकारी योजनाएं ही नहीं, बल्कि सामुदायिक भागीदारी भी जरूरी है। गांव के लोग यदि अपने पंदेरों की सफाई, संरक्षण और पुनर्जीवन का संकल्प लें, तो ये जलस्रोत फिर से जीवित हो सकते हैं। कई गांवों ने यह कर भी दिखाया है। इसके साथ ही, पंदेरे को केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। स्कूलों के बच्चे वहां जाएं, लोकगीत गाए जाएं, पारंपरिक जल संरक्षण की शिक्षा दी जाए और स्थानीय त्योहारों में इन स्थलों का सम्मान हो। क्योंकि पहाड़ का पंदेरा सिर्फ पत्थरों के बीच बहता पानी नहीं था। वह पहाड़ की सामूहिक स्मृति था। वहां से केवल गागरें नहीं भरती थीं, मन भी भरते थे। वहां केवल पानी नहीं बहता था, बल्कि अपनापन, संवाद और संस्कृति भी बहती थी। आज जब हम आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, तब यह याद रखना होगा कि विकास का अर्थ केवल नई सुविधाएं नहीं होता। विकास वह भी है, जिसमें हम अपनी जड़ों को बचाकर आगे बढ़ें। क्योंकि जिस दिन पहाड़ का आखिरी पंदेरा सूख जाएगा, उस दिन केवल एक जलस्रोत नहीं, बल्कि पहाड़ की एक पूरी संस्कृति भी इतिहास बन जाएगी।

दून से राहुल गांधी का युवा दांव

छात्रों की गूंज’ में बेरोजगारी, पेपर लीक और भविष्य की राजनीति पर करेंगे संवाद उत्तराखंड से 2027 का चुनावी नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रही है कांग्रेस देहरादून। देहरादून एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया, जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी छात्रों की गूंज कार्यक्रम के माध्यम से युवाओं और छात्रों से सीधा संवाद करना है। कार्यक्रम का घोषित उद्देश्य छात्रों की समस्याओं को सुनना और उनकी आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाना है, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे केवल एक छात्र संवाद नहीं, बल्कि आगामी चुनावों की रणनीतिक भूमिका के रूप में भी देख रहे हैं। राहुल गांधी ने संवाद के दौरान बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा करेंगे। वह छात्रों से सवाल भी लेंगे और उनके अनुभव भी सुनेंगे। कार्यक्रम में मौजूद कई छात्रों ने प्रतियोगी परीक्षाओं में हो रही देरी, बार-बार पेपर लीक होने और रोजगार के सीमित अवसरों को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त करेंगे। देश भर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई भर्ती परीक्षाएं पेपर लीक विवादों में घिरी हैं। उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं रहा। यूकेएसएसएससी भर्ती घोटाले से लेकर अन्य भर्ती प्रक्रियाओं पर उठे सवालों ने युवाओं के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा किया है। इसी पृष्ठभूमि में राहुल गांधी ने कहा कि पेपर लीक केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि युवाओं के सपनों पर हमला है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब मेहनत करने वाला छात्र वर्षों तैयारी करता है और फिर परीक्षा रद्द हो जाती है, तो केवल एक परीक्षा नहीं टूटती, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें टूटती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी का यह कार्यक्रम केवल छात्र हितों तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं। कांग्रेस युवाओं, बेरोजगारों और प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों को एक बड़े राजनीतिक वर्ग के रूप में देख रही है। उत्तराखंड में बेरोजगारी लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रही है। पहाड़ों से पलायन, सीमित औद्योगिक विकास और सरकारी नौकरियों की घटती संख्या के कारण युवाओं में असंतोष बढ़ा है। कांग्रेस इसी असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक सड़क, बिजली, पानी और क्षेत्रीय अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन अब कांग्रेस युवाओं, रोजगार और शिक्षा को चुनावी विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास कर रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि कांग्रेस बेरोजगारी, पेपर लीक और पलायन जैसे मुद्दों पर युवाओं को संगठित करने में सफल होती है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में यह एक महत्वपूर्ण फैक्टर बन सकता है।

राहुल गांधी के ‘छात्र संवाद’ पर बीजेपी की घेराबंदी

राहुल से पूछिए कांग्रेस राज के घोटालों का भी हिसाब छात्रों की गूंज से पहले भाजपा का राहुल पर पलटवार कहा-संवाद हो तो सवाल एकतरफा नहीं होने चाहिए देहरादून। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के देहरादून में प्रस्तावित छात्रों की गूंज कार्यक्रम से पहले उत्तराखंड की राजनीति गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के छात्र संवाद को राजनीतिक कार्यक्रम बताते हुए छात्रों से अपील की है कि वह केवल वर्तमान सरकार से ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के शासनकाल से जुड़े विवादों और घोटालों पर भी राहुल गांधी से सवाल पूछें। भाजपा का कहना है कि यदि यह कार्यक्रम वास्तव में छात्रों के सवाल सुनने का मंच है, तो उसमें सवालों पर किसी प्रकार की वैचारिक या राजनीतिक सीमा नहीं होनी चाहिए। छात्रों को यह अधिकार होना चाहिए कि वह वर्तमान सरकार के साथ-साथ पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल, भर्ती प्रक्रियाओं, भ्रष्टाचार के आरोपों और शासन की कार्यशैली पर भी जवाब मांगें। राहुल गांधी का छात्रों की गूंज कार्यक्रम बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर केंद्रित बताया जा रहा है। कांग्रेस इसे युवाओं की आवाज को राष्ट्रीय मंच देने की पहल बता रही है। लेकिन भाजपा इसे आगामी चुनावों से जोड़कर देख रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यदि कार्यक्रम निष्पक्ष संवाद है, तो उसमें केवल भाजपा सरकारों की आलोचना नहीं, बल्कि कांग्रेस के शासनकाल का भी मूल्यांकन होना चाहिए। भाजपा नेताओं का तर्क है कि लोकतंत्र में संवाद तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसमें असहज सवाल पूछने की भी पूरी स्वतंत्रता हो। यदि छात्रों को प्रश्न पूछने का अवसर दिया जा रहा है, तो उन्हें यह भी पूछना चाहिए कि कांग्रेस शासन के दौरान युवाओं के लिए कौन-से स्थायी सुधार किए गए, भर्ती प्रक्रियाओं की स्थिति क्या थी और भ्रष्टाचार के आरोपों पर कांग्रेस का पक्ष क्या है। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच युवा मतदाता दोनों प्रमुख दलों की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। कांग्रेस बेरोजगारी, पेपर लीक और रोजगार को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा अपने विकास कार्यों, पारदर्शी भर्ती प्रणाली और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को सामने रख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच वैचारिक संघर्ष अब और तेज होगा। कांग्रेस सरकार की जवाबदेही तय करने की बात कर रही है, जबकि भाजपा विपक्ष से उसके अतीत का हिसाब मांग रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि छात्र केवल वर्तमान सरकार से ही नहीं, बल्कि राहुल गांधी से भी कुछ अहम सवाल पूछ सकते हैंकृ। भाजपा का कहना है कि लोकतंत्र में जवाबदेही सभी राजनीतिक दलों की होनी चाहिए, केवल सत्ता पक्ष की नहीं। दूसरी ओर कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी छात्रों की वास्तविक समस्याओं को सुनने और उन्हें राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने के लिए संवाद कर रहे हैं। पार्टी का कहना है कि बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दे किसी दल के नहीं, बल्कि पूरे देश के युवाओं के हैं।

राहुल के बहाने कांग्रेस में लौटी ‘रौनक’

उत्तराखंड दौरे ने कार्यकर्ताओं में भरेंगे जोश छात्रों की गूंज से कांग्रेस देगी राजनीतिक संदेशकृ युवाओं के मुद्दों पर सीधे मैदान में उतरेगा विपक्ष देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी कुछ समय दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। इसी क्रम में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा कांग्रेस के लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संगठन में नई ऊर्जा भरने वाला अवसर बन गया है। लंबे समय बाद ऐसा देखने को मिला कि प्रदेश कांग्रेस का लगभग पूरा संगठन एक ही मंच पर सक्रिय और उत्साहित दिख रहा है। राहुल गांधी के देहरादून आगमन और छात्रों की गूंज कार्यक्रम ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया उत्साह पैदा कर दिया है। कांग्रेस भले इस कार्यक्रम को छात्रों के मुद्दों पर संवाद बता रही हो, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके जरिए पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह आगामी चुनाव में बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा और युवाओं के भविष्य को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है। उत्तराखंड में लंबे समय से बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर असंतोष रहा है। कांग्रेस इन्हीं मुद्दों को सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। राहुल गांधी के दौरे का सबसे बड़ा असर संगठनात्मक स्तर पर देखने को मिलेगा। पिछले कुछ समय से गुटबाजी और निष्क्रियता के आरोप झेल रही प्रदेश कांग्रेस में इस कार्यक्रम के बहाने नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ गई है। जिला इकाइयों से लेकर प्रदेश नेतृत्व तक तैयारियों में जुटा दिखाई दिया। कार्यकर्ताओं का मानना है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रिय मौजूदगी से संगठन में मनोबल बढ़ा है और चुनावी तैयारियों को गति मिलेगी। हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षक यह भी मानते हैं कि किसी एक दौरे से संगठन की पुरानी चुनौतियां स्वतः समाप्त नहीं हो जातीं। कांग्रेस के सामने अभी भी बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करना, गुटीय मतभेदों को कम करना और एकजुट चुनावी रणनीति बनाना जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। राहुल गांधी के दौरे को भाजपा ने राजनीतिक कार्यक्रम करार देते हुए उस पर सवाल उठाए हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस युवाओं के मुद्दों का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस का रिकार्ड भी जनता के सामने है। यानी राहुल गांधी के दौरे ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह जितना बढ़ाया है, उतना ही भाजपा को भी अपनी राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज करने का अवसर दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड का चुनाव केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहेगा। राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। राहुल गांधी के प्रस्तावित दौरे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस इस बार चुनावी तैयारी आखिरी समय पर नहीं, बल्कि काफी पहले से शुरू करना चाहती है। यदि राहुल गांधी भविष्य में भी उत्तराखंड का नियमित दौरा करते हैं और पार्टी युवाओं, महिलाओं, किसानों तथा पलायन जैसे स्थानीय मुद्दों पर लगातार अभियान चलाती है, तो कांग्रेस को संगठनात्मक लाभ मिल सकता है। राहुल गांधी के दौरे ने कांग्रेस में उत्साह का संचार जरूर किया है, लेकिन चुनाव केवल उत्साह से नहीं जीते जाते। उत्साह को संगठन में, संगठन को जनसमर्थन में और जनसमर्थन को वोट में बदलना सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा होती है। उत्तराखंड की राजनीति में यह अक्सर देखा गया है कि बड़े नेताओं की सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ हमेशा चुनावी परिणामों में नहीं बदलती। इसलिए कांग्रेस के लिए यह दौरा शुरुआत तो माना जा सकता है, लेकिन मंजिल नहीं। राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा कांग्रेस के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त और संगठनात्मक ऊर्जा का स्रोत बनकर उभर सकता है। इससे कार्यकर्ताओं में जोश लौटेगा और पार्टी को एक नया चुनावी नैरेटिव गढ़ने का अवसर मिलेगा। अब यह कांग्रेस की रणनीति और संगठनात्मक क्षमता पर निर्भर करेगा कि वह इस उत्साह को 2027 के विधानसभा चुनाव तक कितनी मजबूती से बनाए रख पाती है। फिलहाल इतना तय है कि राहुल गांधी के प्रस्तावित दौरे ने उत्तराखंड कांग्रेस में नई हलचल पैदा कर दी है और यही हलचल आने वाले महीनों में राज्य की राजनीति का तापमान तय करने में भूमिका निभा सकती है।

भाजपा में बाहर ‘आल इज वेल’ भीतर हलचल

सत्ता बचाने से पहले संगठन संभालने की चुनौती विधायकों की नाराजगी, कार्यकर्ताओं की चुप्पी पार्टी में टिकट की दौड़ ने बढ़ाई सियासी धड़कन देहरादून। उत्तराखंड भाजपा बाहर से जितनी अनुशासित और आत्मविश्वास से भरी दिखाई देती है, भीतर की तस्वीर उतनी ही जटिल बताई जा रही है। सत्ता में लगातार दूसरा कार्यकाल पूरा कर रही पार्टी अब 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है, लेकिन चुनावी रणनीति बनाने से पहले उसे अपने ही घर की कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। भाजपा सार्वजनिक मंचों पर संगठन सबसे ऊपर का संदेश दे रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी विकास योजनाओं और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों के सहारे चुनावी माहौल बनाने में जुटे हैं। दूसरी ओर संगठन बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का दावा कर रहा है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि पार्टी के भीतर कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब अभी तलाशा जाना बाकी है। भाजपा के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा टिकट वितरण को लेकर है। कई मौजूदा विधायक अपने क्षेत्रों में बढ़ते असंतोष का सामना कर रहे हैं। दूसरी तरफ संगठन के भीतर ऐसे नेता भी हैं, जो मानते हैं कि यदि जीत दोहरानी है तो कई सीटों पर नए चेहरे उतारने होंगे। यही वजह है कि चुनाव भले अभी दूर हो, लेकिन टिकट की दौड़ अभी से शुरू हो चुकी है। कई दावेदार संगठन में अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं, तो कई दिल्ली और देहरादून के बीच राजनीतिक संपर्क मजबूत करने में लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन माना जाता है। लेकिन लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद कई क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं की यह शिकायत सुनाई देती है कि उनकी भूमिका चुनाव तक सीमित होकर रह गई है। कुछ कार्यकर्ता यह भी मानते हैं कि स्थानीय स्तर पर उनकी बात प्रशासन तक नहीं पहुंच रही। हालांकि पार्टी नेतृत्व लगातार संवाद और संगठनात्मक बैठकों के जरिए इस दूरी को कम करने की कोशिश कर रहा है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती स्वाभाविक सत्ता-विरोधी माहौल एंटी-इनकंबेंसी से निपटना है। महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, स्थानीय विकास और सरकारी सेवाओं से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। पार्टी की रणनीति इन मुद्दों का जवाब विकास परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे और कानून-व्यवस्था के रिकॉर्ड के आधार पर देने की है। लेकिन चुनावी मैदान में स्थानीय मुद्दों की अहमियत हमेशा बनी रहती है। भाजपा के भीतर एक और चर्चा यह है कि क्या 2027 का चुनाव पुराने राजनीतिक चेहरों के भरोसे लड़ा जाएगा या युवाओं और नए नेतृत्व को अधिक अवसर मिलेगा। यह फैसला आसान नहीं होगा। पुराने नेताओं का अनुभव पार्टी की ताकत है, जबकि नए चेहरों की मांग कार्यकर्ताओं के एक वर्ग की अपेक्षा है। दोनों के बीच संतुलन बनाना नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती होगी। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि चुनाव विपक्ष से पहले अपने संगठन से जीते जाते हैं। यदि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रखती है, स्थानीय असंतोष को समय रहते संबोधित करती है और टिकट वितरण में संतुलन बना पाती है, तो चुनावी मुकाबले में उसे लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि आंतरिक मतभेद सार्वजनिक असंतोष में बदलते हैं, तो विपक्ष को राजनीतिक अवसर मिल सकता है। भाजपा 2027 में विकास, स्थिरता और नेतृत्व को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है। वहीं कांग्रेस बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई और स्थानीय असंतोष को मुद्दा बनाने की तैयारी में है। ऐसे में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल विपक्ष का मुकाबला करना नहीं, बल्कि अपने संगठन की एकजुटता और कार्यकर्ताओं के भरोसे को मजबूत बनाए रखना भी होगी। 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह सत्ता की स्वाभाविक चुनौतियों के बीच संगठनात्मक ऊर्जा और आंतरिक समन्वय को उसी मजबूती से बनाए रख पाएगी, जिसने उसे पिछले चुनावों में सफलता दिलाई थी।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

पहाड़ में ‘कुयेड़ी’ है जादुई ‘स्वप्नलोक’

पहाड़ की सुबह का जादुई स्वप्नलोक, प्रकृति का ध्यानमग्न रूप जब देवदार और बुरांश के जंगलों पर छाता है प्रकृति का जादू पहाड़ की सुबह का रहस्यमयी सौंदर्य जो अब होता जा रहा दुर्लभ देहरादून। पहाड़ की सुबह का अपना एक अलग ही जादू होता है। सूरज निकलने से पहले जब ऊँचे पर्वत की ऊपरी धार और चोटियाँ सफेद धुंध की चादर से ढक जाती हैं, तो स्थानीय लोग कहते हैंकृआज कुयेड़ी छाई छ। यह केवल धुंध नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, लोकभाषा और प्रकृति का ऐसा हिस्सा है, जो सदियों से पहाड़ के जीवन को आकार देता आया है। आज भी बरसात और सर्दियों की सुबह जब कुयेड़ी घाटियों से उठकर डांडि-कांठ्यूँ को अपने आगोश में ले लेती है, तो पूरा वातावरण किसी स्वप्नलोक जैसा दिखाई देता है। दूर-दूर तक फैले देवदार, बुरांश और बांज के जंगल धुंध में ऐसे खो जाते हैं, मानो प्रकृति स्वयं ध्यानमग्न हो गई हो। गढ़वाली और कुमाऊँनी बोली में कुयेड़ी का अर्थ है घना कोहरा या धुंध। लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह केवल मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति का एक जीवंत रूप है। सुबह-सुबह खेतों में काम करने वाले किसान कहते हैं कि यदि कुयेड़ी देर तक बनी रहे तो दिन में मौसम सुहावना रहने की संभावना रहती है। वहीं कभी-कभी यही कुयेड़ी तेज बारिश का संकेत भी मानी जाती है। पहाड़ के ऊँचे डांडि-कांठ्यूँ पर जब कुयेड़ी उतरती है, तो ऐसा लगता है जैसे बादल धरती पर आ गए हों। पहाड़ की चोटियाँ कभी दिखाई देती हैं, तो अगले ही पल पूरी तरह गायब हो जाती हैं। सूरज की पहली किरण जब इस धुंध को चीरती हुई निकलती है, तो पूरा आकाश सुनहरे रंग में रंग जाता है। यही दृश्य हर साल हजारों पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को पहाड़ की ओर खींच लाता है। गढ़वाली और कुमाऊँनी लोकगीतों में कुयेड़ी का विशेष स्थान है। लोकगीतों में प्रेमिका अपने प्रिय का इंतजार करते हुए कहती है कि डांडि-कांठ्यूँ में छाई कुयेड़ी रास्ता रोक रही है। कई गीतों में यह विरह का प्रतीक है तो कहीं मिलन का संदेश लेकर आती है। स्थानीय लोककथाओं में भी धुंध को देवताओं की उपस्थिति और प्रकृति की पवित्रता से जोड़कर देखा गया है। पहाड़ों में कुयेड़ी केवल सुंदरता नहीं लाती, बल्कि खेती के लिए भी महत्वपूर्ण होती है। यह वातावरण में नमी बनाए रखती है। फसलों को अत्यधिक तापमान से बचाती है। जंगलों और घास के मैदानों में प्राकृतिक नमी बनाए रखने में मदद करती है। कई जंगली पौधों और औषधीय वनस्पतियों के विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि पहले बरसात और सर्दियों में कई-कई दिनों तक डांडि-कांठ्यूँ कुयेड़ी से ढके रहते थे। लेकिन अब मौसम में बदलाव साफ दिखाई देने लगा है। जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और बढ़ते तापमान के कारण धुंध बनने का प्राकृतिक चक्र भी प्रभावित हो रहा है। कई क्षेत्रों में पहले जैसी घनी कुयेड़ी अब कम दिखाई देती है। पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि जंगलों का संरक्षण नहीं किया गया तो भविष्य में यह प्राकृतिक दृश्य केवल तस्वीरों तक सीमित हो सकता है। पहाड़ में बर्फबारी और फूलों की घाटी जितनी लोकप्रिय है, उतनी ही आकर्षक कुयेड़ी से ढकी पहाड़ों की सुबह भी हो सकती है। यदि राज्य सरकार और पर्यटन विभाग इस प्राकृतिक धरोहर को मार्निंग मिस्ट टूरिज्म या क्लाउड व्यू ट्रेल जैसी अवधारणाओं से जोड़ें, तो यह ग्रामीण पर्यटन को नई दिशा दे सकती है। स्थानीय होमस्टे, ट्रैकिंग मार्ग और गाँवों की अर्थव्यवस्था को भी इसका लाभ मिल सकता है। पहाड़ की पहचान केवल हिमालय, मंदिर और नदियाँ नहीं हैं। डांडि-कांठ्यूँ में उतरती कुयेड़ी भी पहाड़ की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। जब अगली बार किसी पहाड़ी गाँव की सुबह कुयेड़ी में लिपटी दिखाई दे, तो उसे केवल धुंध समझकर आगे न बढ़ जाएँ। वह प्रकृति का एक ऐसा संदेश है, जो हमें याद दिलाता है कि पहाड़ की असली खूबसूरती उसकी सादगी, उसकी लोकसंस्कृति और उसके बदलते मौसम में बसती है।

कांग्रेस के लिए संजीवनी या ‘सियासी पिकनिक’

विधानसभा चुनाव की आहट के बीच राहुल गांधी का देहरादून दौरा कांग्रेस की साख और राहुल गांधी के सामने खड़ी पहाड़ जैसी चुनौतियाँ देहरादून में कांग्रेस नेता राहुल गांधी क्या बदल पाएंगे कांग्रेस की तकदीर क्या राहुल गांधी करेंगे उत्तराखंड में कांग्रेस के चुनावी रण का शंखनाद देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का प्रस्तावित देहरादून दौरा उत्तराखंड की राजनीति में नई हलचल पैदा कर रहा है। इसे केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कांग्रेस के चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी का यह दौरा उत्तराखंड में कांग्रेस को नई ऊर्जा देगा या फिर यह भी पिछले दौरों की तरह केवल राजनीतिक संदेश तक सीमित रह जाएगा? उत्तराखंड में कांग्रेस पिछले कई चुनावों से सत्ता से दूर है। पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की चुनौती है। ऐसे में राहुल गांधी का दौरा कार्यकर्ताओं में जोश भरने और चुनावी रणनीति को धार देने का प्रयास माना जा रहा है। कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि यदि 2027 में सत्ता की वापसी करनी है तो उसे केवल भाजपा विरोधी माहौल पर निर्भर रहने के बजाय जनता के बीच मजबूत वैकल्पिक एजेंडा भी पेश करना होगा। राहुल गांधी इन दिनों देशभर में छात्रों की गूंज अभियान के जरिए युवाओं और छात्रों से संवाद कर रहे हैं। उत्तराखंड में भी उनका फोकस युवाओं, बेरोजगारी, पेपर लीक, पलायन, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर रहने की संभावना है। प्रदेश में लंबे समय से सरकारी भर्तियों में देरी, रोजगार के सीमित अवसर और पलायन जैसे मुद्दे कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकते हैं। राहुल गांधी का दौरा भाजपा के लिए भी एक अवसर बन सकता है। भाजपा पहले से ही कांग्रेस पर चुनावी राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। संभावना है कि राहुल के दौरे के दौरान भाजपा केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियोंकृचारधाम आल वेदर रोड, रेल परियोजनाएं, रोपवे, निवेश, पर्यटन और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) जैसे मुद्दों को प्रमुखता से सामने रखे। भाजपा यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि कांग्रेस केवल सवाल पूछती है, जबकि विकास भाजपा करती है। राहुल गांधी की सभाएं भीड़ जुटा सकती हैं, लेकिन चुनाव केवल भीड़ से नहीं जीते जाते। उत्तराखंड कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुटबाजी को नियंत्रित करना है। यदि प्रदेश नेतृत्व एकजुट नहीं दिखा तो राहुल गांधी का संदेश भी सीमित प्रभाव छोड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी के मंच पर प्रदेश के सभी बड़े नेताओं की एकजुट मौजूदगी कार्यकर्ताओं के लिए बड़ा संदेश होगी। भाजपा अब तक राष्ट्रवाद, विकास, धार्मिक पर्यटन और मजबूत नेतृत्व के मुद्दे पर चुनावी बढ़त बनाए हुए है। राहुल गांधी कोशिश करेंगे कि चुनाव की बहस को स्थानीय मुद्दों की ओर मोड़ा जाएकृमहंगाई, बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, किसानों की समस्याएं और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर। यदि कांग्रेस इन मुद्दों को जनआंदोलन का रूप देने में सफल रही, तो चुनावी मुकाबला अधिक रोचक हो सकता है। उत्तराखंड की जनता अब केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं सुनना चाहती। वह यह भी जानना चाहती है कि कांग्रेस सत्ता में आने पर रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर क्या ठोस रोडमैप पेश करेगी। राहुल गांधी का दौरा तभी प्रभावी माना जाएगा, जब उनके भाषण में केवल भाजपा की आलोचना नहीं, बल्कि उत्तराखंड के भविष्य का स्पष्ट विजन भी दिखाई देगा। राहुल गांधी का दून दौरा केवल राजधानी का कार्यक्रम नहीं होगा। इसके राजनीतिक संदेश पूरे उत्तराखंड में जाएंगे। यह दौरा तय करेगा कि कांग्रेस 2027 के चुनाव में आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए कितनी तैयार है और भाजपा इस चुनौती का जवाब किस रणनीति से देती है। फिलहाल इतना तय है कि दून की यह राजनीतिक दस्तक आने वाले महीनों में उत्तराखंड की चुनावी सियासत का तापमान और बढ़ाने वाली है।

‘उत्सव’ के बीच पेड़ों पर ‘प्रहार’

विकास की बलिवेदी पर कटते पेड़ों ने खड़ा किया ब्लैक हरेला का सवाल ऋषिकेश-देहरादून हाईवे पर उजड़ती हरियाली पर बढ़ रहा है जन-आक्रोश एक तरफ उत्सव, दूसरी तरफ हजारों पेड़ों की बलि पर युवाओं का विरोध देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड इन दिनों अपने सबसे बड़े लोकपर्व हरेला की तैयारी में जुटा है। सरकार हरियाली का संदेश दे रही है, लाखों पौधे लगाने के दावे किए जा रहे हैं, एक पेड़ माँ के नामष् अभियान की चर्चा हो रही है। लेकिन इसी बीच ऋषिकेश-देहरादून हाईवे पर हजारों हरे-भरे पेड़ों पर आरी चल रही है। विडंबना यह है कि जिस समय पूरे प्रदेश में पेड़ों को जीवन का प्रतीक मानकर हरेला मनाने की तैयारी हो रही है, उसी समय विकास के नाम पर वर्षों पुराने वृक्षों की कतारें धराशायी हो रही हैं। यही विरोधाभास अब सड़क पर उतर आया है। पर्यावरण प्रेमियों, युवाओं और सामाजिक संगठनों ने हरेला पर्व से ठीक पहले ब्लैक हरेला अभियान शुरू कर सरकार और व्यवस्था के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या पेड़ काटकर हरियाली का पर्व मनाया जाएगा? उत्तराखंड की संस्कृति में हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था का पर्व है। इस दिन लोग पौधे लगाते हैं, धरती को प्रणाम करते हैं और हरियाली के संरक्षण का संकल्प लेते हैं। लेकिन ऋषिकेश-देहरादून मार्ग पर तस्वीर बिल्कुल उलट है। सड़क चौड़ीकरण के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है। कई ऐसे पेड़ भी कट रहे हैं, जिन्होंने दशकों तक राहगीरों को छाया दी, पक्षियों को आश्रय दिया और इस क्षेत्र की जैव विविधता को जीवित रखा। युवाओं का कहना है कि यदि विकास का मतलब केवल पेड़ों की बलि है, तो यह विकास नहीं, पर्यावरणीय घाटा है। काली पट्टी बांधकर विरोध कर रहे युवाओं का संदेश साफ हैकृहरेला केवल पौधे लगाने का सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि पेड़ों को बचाने का सामाजिक संकल्प होना चाहिए। उनका सवाल है कि यदि हजारों परिपक्व पेड़ काट दिए जाएंगे और बदले में कुछ छोटे पौधे लगा दिए जाएंगे, तो क्या दोनों की बराबरी की जा सकती है? एक 40-50 वर्ष पुराने पेड़ की पारिस्थितिक भूमिका को कोई पौधा वर्षों तक पूरा नहीं कर सकता। यह सच है कि सड़कें बननी चाहिए। बेहतर कनेक्टिविटी भी जरूरी है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में आधारभूत ढांचे का विकास विकास यात्रा का अहम हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का मॉडल ऐसा नहीं हो सकता, जिसमें पेड़ों की कटाई न्यूनतम हो? क्या सड़क की डिजाइन, वैकल्पिक संरेखण या वैज्ञानिक योजना से बड़ी संख्या में पेड़ों को बचाया नहीं जा सकता? पर्यावरणविदों का कहना है कि दुनिया के कई देशों में सड़कें जंगलों के बीच से गुजरती हैं, लेकिन पेड़ों को बचाने के लिए इंजीनियरिंग समाधान अपनाए जाते हैं। उत्तराखंड में यह सोच अभी भी सीमित दिखाई देती है। आज सरकारी समारोहों में पौधरोपण की तस्वीरें खूब दिखाई दे रही हैं। मंत्री, अधिकारी और जनप्रतिनिधि पौधे लगाकर सोशल मीडिया पर हरियाली के संदेश साझा कर रहे हैं, लेकिन जनता यह भी देख रही है कि दूसरी ओर बुलडोजर और मशीनें वर्षों पुराने पेड़ों को गिरा रही हैं। यही विरोधाभास ब्लैक हरेला आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बन गया है। वन विशेषज्ञ लगातार कहते रहे हैं कि पौधरोपण और वन संरक्षण दोनों अलग-अलग बातें हैं। एक ओर हजारों परिपक्व पेड़ काट देना और दूसरी ओर कुछ पौधे लगा देना पर्यावरणीय संतुलन की भरपाई नहीं करता। सरकार का पक्ष यह हो सकता है कि सड़क परियोजनाएँ जनहित में हैं और जहाँ पेड़ काटे जा रहे हैं, वहाँ प्रतिपूरक पौधरोपण किया जाएगा। लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि प्रतिपूरक पौधरोपण तभी प्रभावी होगा जब लगाए गए पौधों का वर्षों तक संरक्षण हो और उनकी जीवित रहने की दर सुनिश्चित की जाए। केवल संख्या घोषित कर देने से जंगल वापस नहीं आ जाते। उत्तराखंड के बुजुर्ग कहा करते थेकृपेड़ काटने से पहले सौ बार सोचो, लगाने के बाद सौ साल तक बचाओ। आज यही संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक है। यदि हरेला केवल सरकारी आयोजन बनकर रह गया और पेड़ों की सुरक्षा पीछे छूट गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे पूछेंगी कि हमने हरियाली का पर्व मनाया था या हरियाली का अंतिम संस्कार?

विपक्ष के सियासी सुर ‘बेसुरे’

धामी की तारीफ कर कांग्रेस विधायक बुटोला ने अपनी ही पार्टी को किया क्लीन बोल्ड कांग्रेस की घेराबंदी के बीच सीएम धामी के मुरीद हुए विधायक लखपत बुटोला भाजपा को मिला मुफ्त का सर्टिफिकेट,विधायक के बयान ने भाजपा का मनोबल बढ़ाया उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी संदेशों की नई जंग हो गई शुरू देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में बयान कई बार विपक्ष से ज्यादा सत्ता पक्ष के काम आ जाते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ गोपेश्वर में, जहां बदरीनाथ क्षेत्र से कांग्रेस विधायक लखपत बुटोला ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की खुले मंच से जमकर तारीफ कर राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी। जिस वक्त कांग्रेस पूरे प्रदेश में धामी सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर घेरने की रणनीति बना रही है, उसी समय पार्टी के एक विधायक का मुख्यमंत्री की कार्यशैली की सराहना करना कई सवाल खड़े कर रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस के भीतर सरकार को लेकर एक जैसी सोच नहीं है, या फिर यह चुनावी मौसम में बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत है? राजनीति में विरोधी दल के नेता की तारीफ साधारण घटना नहीं होती। खासकर तब, जब विधानसभा चुनाव में डेढ़ साल से भी कम समय बचा हो। विधायक लखपत बुटोला के बयान को भाजपा निश्चित रूप से यह कहकर भुनाने की कोशिश करेगी कि जब कांग्रेस के विधायक ही मुख्यमंत्री धामी के काम की तारीफ कर रहे हैं, तो विपक्ष के आरोपों का क्या आधार बचता है? यानी भाजपा को बिना मांगे एक ऐसा राजनीतिक प्रमाणपत्र मिल गया, जिसे वह आने वाले दिनों में जनता के बीच बार-बार दोहरा सकती है। कांग्रेस का पूरा राजनीतिक नैरेटिव इस समय धामी सरकार की नीतियों की आलोचना पर आधारित है। पार्टी लगातार सरकार को हर मोर्चे पर घेरने की कोशिश कर रही है। ऐसे में यदि उसी पार्टी का विधायक मुख्यमंत्री की प्रशंसा करता है, तो कार्यकर्ताओं में भी भ्रम की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है। विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत उसका एकजुट संदेश होता है। लेकिन यदि अलग-अलग नेता अलग-अलग संदेश देंगे, तो राजनीतिक हमला स्वतः कमजोर पड़ जाता है। संभव है कि विधायक ने किसी विशेष विकास कार्य या मुख्यमंत्री के किसी निर्णय की सराहना की हो। लोकतंत्र में अच्छे काम की प्रशंसा करना असामान्य नहीं है। लेकिन राजनीति में समय, मंच और शब्दकृतीनों का अपना महत्व होता है। चुनावी माहौल में दिया गया हर बयान केवल शिष्टाचार नहीं माना जाता, बल्कि उसके राजनीतिक अर्थ भी निकाले जाते हैं। यही वजह है कि बुटोला के बयान को लेकर कांग्रेस के भीतर भी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पिछले कुछ समय से लगातार जनसंपर्क, विकास परियोजनाओं और राजनीतिक अभियानों के जरिए अपनी छवि मजबूत करने में जुटे हैं। यदि विपक्ष के नेता भी सार्वजनिक मंच से उनकी प्रशंसा करने लगें, तो भाजपा इसे धामी की बढ़ती स्वीकार्यता के रूप में पेश करेगी। यह भाजपा की चुनावी रणनीति के लिए एक मजबूत प्रचार सामग्री बन सकती है। कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब चुनौती केवल भाजपा से लड़ने की नहीं, बल्कि अपने नेताओं के बयानों में एकरूपता बनाए रखने की भी है। यदि ऐसे बयान लगातार आते रहे, तो भाजपा विपक्ष पर यह तंज कसने से नहीं चूकेगी कि जो सरकार को असफल बताते हैं, उनके अपने विधायक ही सरकार की तारीफ कर रहे हैं। उत्तराखंड की राजनीति में कई बार एक बयान महीनों तक चुनावी मुद्दा बना रहता है। विधायक लखपत बुटोला की टिप्पणी भी अब सामान्य राजनीतिक बयान नहीं रही। यह भाजपा के लिए हथियार और कांग्रेस के लिए असहज सवाल बन चुकी है। वैसे भी राजनीति में विरोधी की तारीफ करना गलत नहीं, लेकिन चुनावी मौसम में की गई तारीफ कई बार अपने ही तर्कों की नींव हिला देती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इसे व्यक्तिगत राय बताकर आगे बढ़ती है या भाजपा इसे 2027 तक अपने चुनावी भाषणों का हिस्सा बना लेती है।

सोनम के आंदोलन पर राहुल ‘खामोश’

युवाओं की बात करने वाले राहुल गांधी, वांगचुक पर हैं चुप सोनम की भूख हड़ताल पर राहुल गांधी की चुप्पी आखिर क्यों? देहरादून। राजनीति में समय का बड़ा महत्व होता है। कब बोलना है, किस मुद्दे पर बोलना है और किस मुद्दे पर चुप रहना हैकृयही किसी नेता की प्राथमिकताओं को तय करता है। इन दिनों कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी देशभर में छात्रों की गूंज अभियान के जरिए छात्रों से संवाद कर रहे हैं। वह शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य पर सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। तस्वीरें आ रही हैं, वीडियो वायरल हो रहे हैं और संदेश दिया जा रहा है कि कांग्रेस छात्रों की आवाज़ बनना चाहती है। लेकिन इसी दौरान देश के चर्चित शिक्षाविद सोनम वांगचुक छात्रों और व्यापक जनहित से जुड़े मुद्दों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। शिक्षा सुधार और युवाओं के भविष्य पर वर्षों से काम करने वाला एक व्यक्ति सड़क पर बैठा है, लेकिन राहुल गांधी की ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। यही चुप्पी अब सबसे बड़ा सवाल बन गई है। राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि मंच पर छात्र याद आते हैं, लेकिन सड़क पर बैठा शिक्षाविद नहीं। यदि छात्रों की बात करनी है तो क्या केवल राजनीतिक मंचों पर करनी है? क्या छात्र केवल तब महत्वपूर्ण हैं जब उनके बीच कैमरे लगे हों? क्या शिक्षा सुधार केवल चुनावी भाषणों का विषय है? और यदि नहीं, तो फिर सोनम वांगचुक के आंदोलन पर यह असहज मौन क्यों? राहुल गांधी अक्सर कहते हैं कि वह नफरत के खिलाफ मोहब्बत की राजनीति कर रहे हैं और जनता की आवाज सुन रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र में केवल अपनी पसंद की आवाज सुनना संवाद नहीं कहलाता। असली लोकतंत्र तो तब है जब आप उन लोगों की भी सुनें, जो सत्ता से नहीं बल्कि व्यवस्था से सवाल पूछ रहे हों। सोनम वांगचुक कोई अचानक सुर्खियों में आए आंदोलनकारी नहीं हैं। वे शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार के प्रतीक रहे हैं। उनका काम किताबों से ज्यादा प्रयोगशालाओं में दिखाई देता है। उन्होंने शिक्षा को रोजगार और जीवन से जोड़ने की बात की। ऐसे व्यक्ति की भूख हड़ताल पर यदि देश का सबसे बड़ा विपक्ष मौन रहे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। विडंबना देखिए, एक तरफ छात्रों की गूंज का मंच सजा है, दूसरी तरफ एक शिक्षाविद की भूख हड़ताल की गूंज सुनाई नहीं दे रही। क्या यह चयनात्मक संवेदनशीलता नहीं है? राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि विपक्ष जनता की आवाज होता है। लेकिन यदि विपक्ष भी केवल उन्हीं मुद्दों पर बोले, जहाँ राजनीतिक लाभ की संभावना हो, तो फिर सत्ता और विपक्ष के आचरण में अंतर क्या रह जाएगा? यह प्रश्न केवल राहुल गांधी से नहीं, पूरे विपक्ष से है। आखिर शिक्षा पर गंभीर बहस कब होगी? क्या हर मुद्दा केवल सरकार को घेरने का औजार बनकर रह जाएगा? क्या शिक्षा सुधार पर कोई राष्ट्रीय सहमति नहीं बन सकती? इतना ही नहीं, यह सवाल सत्ता पक्ष से भी उतनी ही मजबूती से पूछा जाना चाहिए। यदि कोई प्रतिष्ठित शिक्षाविद भूख हड़ताल पर बैठा है, तो सरकार की भी जिम्मेदारी है कि संवाद करे। लोकतंत्र में किसी आंदोलन को नजरअंदाज करना समाधान नहीं होता। लेकिन विपक्ष से अपेक्षा इसलिए अधिक होती है क्योंकि उसका काम ही जनता के मुद्दों को उठाना है। यदि विपक्ष भी चुप रहेगा तो फिर लोकतंत्र में आवाज़ कौन उठाएगा? आज का छात्र बहुत समझदार है। वह केवल भाषण नहीं सुनता, बल्कि नेताओं के आचरण को भी देखता है। वह पूछ रहा हैकृजो नेता छात्रों की चिंता की बात करते हैं, क्या वे हर छात्र और हर शिक्षाविद की चिंता भी करते हैं? या फिर चिंता भी राजनीतिक सुविधा देखकर तय होती है? राजनीति में मौन कई बार शब्दों से ज्यादा बोलता है। राहुल गांधी यदि सोनम वांगचुक के आंदोलन से असहमत हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखना चाहिए। यदि सहमत हैं, तो समर्थन देना चाहिए। लेकिन चुप्पी... लोकतंत्र में सबसे कमजोर जवाब मानी जाती है। दिक्कत यह है कि आज राजनीति में मुद्दे नहीं, इवेंट ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। संवाद भी वहीं होता है जहाँ कैमरे हों। धरना भी वहीं दिखाई देता है जहाँ राजनीतिक लाभ हो। बाकी मुद्दे धीरे-धीरे समाचारों की भीड़ में खो जाते हैं। लोकतंत्र में छात्र किसी दल की संपत्ति नहीं होते। उनका भविष्य किसी विचारधारा का बंधक नहीं हो सकता। यदि शिक्षा वास्तव में राष्ट्रीय मुद्दा है, तो उस पर खड़े हर सवाल का जवाब भी राष्ट्रीय स्तर पर ही देना होगा। राहुल गांधी के सामने आज अवसर है कि वह इस चुप्पी को तोड़ें। यदि वे स्वयं को छात्रों का प्रतिनिधि मानते हैं, तो उन्हें उन शिक्षाविदों की आवाज़ भी सुननी होगी, जो वर्षों से शिक्षा सुधार की लड़ाई लड़ रहे हैं। अन्यथा छात्रों की गूंज का संदेश भी केवल राजनीतिक कार्यक्रम बनकर रह जाएगा। सवाल केवल इतना हैकृक्या छात्रों की आवाज़ वहीं तक सुनी जाएगी, जहाँ तक कैमरे पहुँचते हैं? या फिर उस भूख हड़ताल की आवाज़ भी सुनी जाएगी, जहाँ लोकतंत्र अपनी संवेदनशीलता की परीक्षा दे रहा है?

बदरीनाथ मामले में ‘शब्दभेदी बाणों’ की बौछार

बदरीनाथ चढ़ावा प्रकरण में आमने-सामने गोदियाल-द्विवेदी आस्था से शुरू हुआ विवाद अब सियासी संग्राम में तब्दील आरोपों और पलटवारों से गरमा गई उत्तराखंड की राजनीति देहरादून। बदरीनाथ धाम के चढ़ावा प्रकरण ने अब पूरी तरह राजनीतिक रंग ले लिया है। पहले यह मामला मंदिर की व्यवस्था, पारदर्शिता और जांच तक सीमित था, लेकिन अब यह कांग्रेस और भाजपा के बीच तीखे राजनीतिक हमलों का नया अखाड़ा बन गया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के बीच बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। दोनों दल एक-दूसरे पर आरोपों के शब्दभेदी बाण चला रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बदरीनाथ का चढ़ावा अब श्र(ा से ज्यादा सियासी रणनीति का मुद्दा बनता जा रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि बदरीनाथ धाम के चढ़ावे से जुड़ा मामला केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि करोड़ों श्र(ालुओं की आस्था से जुड़ा प्रश्न है। पार्टी का कहना है कि यदि मंदिर समिति के भीतर गड़बड़ियां हुई हैं, तो केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। पूरे मामले की निष्पक्ष और जवाबदेह जांच होनी चाहिए। गणेश गोदियाल लगातार सरकार से पूछ रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी घटना के लिए जवाबदेह कौन है और जिम्मेदारी तय कब होगी? भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए पलटवार किया है। पार्टी का कहना है कि सरकार ने शिकायत सामने आते ही जांच बैठाई, कार्रवाई शुरू की और दोषियों के खिलाफ कदम उठाए। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस आस्था के विषय पर भी राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है। हेमंत द्विवेदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता सब देख रही है और विपक्ष हर मुद्दे में राजनीति खोज रहा है। बदरीनाथ चढ़ावा प्रकरण पर अब दोनों दलों की भाषा भी लगातार तीखी होती जा रही है। प्रेस वार्ताओं, सोशल मीडिया पोस्ट और सार्वजनिक मंचों से एक-दूसरे पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक आने के साथ धार्मिक और जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर बयानबाजी और तेज हो सकती है। बदरीनाथ धाम केवल उत्तराखंड का नहीं, बल्कि देशभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में इस तरह के विवादों पर राजनीति होना स्वाभाविक रूप से संवेदनशील विषय बन जाता है। किसी भी अनियमितता की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक दलों को भी अपने बयान इस तरह देने चाहिए कि श्रद्धालुओं का विश्वास कमजोर न हो। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस इस मुद्दे को सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता से जोड़कर आगे बढ़ाना चाहती है, जबकि भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि उसने शिकायत मिलते ही कार्रवाई की और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। यानी आने वाले दिनों में यह विवाद केवल जांच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चुनावी सभाओं और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा भी बन सकता है। बदरीनाथ चढ़ावा प्रकरण की जांच अपनी जगह चल रही है, लेकिन राजनीति ने अपनी रफ्तार पकड़ ली है। अब गोदियाल और द्विवेदी के बीच शब्दभेदी बाणों की बौछार यह संकेत दे रही है कि उत्तराखंड में 2027 की चुनावी लड़ाई केवल विकास और रोजगार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आस्था से जुड़े मुद्दे भी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहेंगे। फिलहाल सवाल यही हैकृक्या इस सियासी शोर में बदरीनाथ धाम की आस्था और निष्पक्ष जांच का मूल मुद्दा कहीं पीछे तो नहीं छूट जाएगा?

यहाँ मूर्तियाँ नहीं, प्रकृति है पहला भगवान

देवभूमि का लोकपर्व हरेला और प्रकृति से है देवत्व का नाता आधुनिक पर्यावरण संकट को रास्ता दिखाती पहाड़ की परंपराएँ पहाड़ में जंगल देवता, नदियाँ माँ और पेड़ है जीवन का आधार पहाड़ के गांवों में सदियों से होती आ रही है प्रकृति की पूजा देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में यदि किसी ने सबसे पहले पूजा जाना सीखा, तो वह पत्थर की मूर्तियाँ नहीं थीं, बल्कि प्रकृति थी। यहाँ के लोगों ने सदियों पहले ही समझ लिया था कि जंगल बचेंगे तो जीवन बचेगा, नदियाँ बहेंगी तो सभ्यता बचेगी और पेड़ रहेंगे तो आने वाली पीढ़ियाँ सांस ले सकेंगी। इसलिए देवभूमि के लोगों ने प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि देवत्व का दर्जा दिया। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब पहाड़ के गांवों की सदियों पुरानी परंपराएँ आधुनिक विज्ञान को यह संदेश दे रही हैं कि प्रकृति का संरक्षण कानूनों से नहीं, संस्कारों से होता है। उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सावन के आगमन से पहले घरों में सात या नौ प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। दस दिन बाद जब उनकी हरी-भरी पौध निकलती है, तो उसे देवताओं को अर्पित किया जाता है और परिवार के बुजुर्ग उसे आशीर्वाद स्वरूप सबके सिर पर रखते हैं। इसी दिन पौधे लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आज सरकारें करोड़ों रुपये खर्च कर वृक्षारोपण अभियान चलाती हैं, लेकिन पहाड़ का समाज यह काम बिना किसी सरकारी आदेश के पीढ़ियों से करता आया है। पहाड़ के गांवों में आज भी पीपल, बरगद, बांज, बुरांश, देवदार, आंवला, बेल और तुलसी जैसे वृक्षों की पूजा की जाती है। कई गांवों में ऐसे देववन हैं जहाँ पेड़ काटना तो दूर, सूखी लकड़ी तक उठाना वर्जित माना जाता है। मान्यता है कि इन जंगलों में स्थानीय देवताओं का वास होता है। शायद यही कारण है कि जहाँ कानून जंगल नहीं बचा पाए, वहाँ आस्था ने सदियों तक उन्हें सुरक्षित रखा। गंगा, यमुना, सरयू, रामगंगा, कोसी, अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी और पिंडर जैसी नदियाँ उत्तराखंड में केवल जल का स्रोत नहीं हैं। यहाँ उन्हें माँ कहा जाता है। नदी किनारे दीपदान, जल पूजा और स्नान की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जल के प्रति सम्मान का प्रतीक है। पहाड़ का समाज जानता था कि नदी गंदी होगी तो जीवन भी दूषित होगा। खेती शुरू करने से पहले खेत की पूजा, हल की पूजा और बीज बोने से पहले भूमि को प्रणाम करना आज भी कई गांवों में परंपरा है। पहाड़ का किसान धरती को कभी जीतने की वस्तु नहीं मानता। वह उसे माता कहकर संबोधित करता है। उत्तराखंड के अधिकांश लोकदेवता जंगलों, पर्वतों, जलस्रोतों और चरागाहों से जुड़े हुए हैं। गोलू देवता, नरसिंह देवता, गंगनाथ, ऐड़ी देवता, महासू देवता, नागराजा और स्थानीय ग्राम देवताओं की पूजा में प्रकृति का विशेष स्थान होता है। कई मंदिर आज भी घने जंगलों के बीच बने हुए हैं, जहाँ पहुँचने के लिए प्रकृति के बीच से गुजरना पड़ता है। जब जंगलों पर संकट आया, तब पहाड़ की महिलाओं ने पेड़ों को गले लगाकर उन्हें बचाया। चिपको आंदोलन केवल पर्यावरण आंदोलन नहीं था। यह उस संस्कृति का विस्तार था, जिसमें पेड़ को परिवार का सदस्य माना जाता है। गौरा देवी और उनकी साथियों ने दुनिया को बता दिया कि जंगल लकड़ी का ढेर नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक विकास की दौड़ में प्रकृति के प्रति वही संवेदनशीलता धीरे-धीरे कम होती जा रही है। पहाड़ों में अंधाधुंध सड़क कटान, जंगलों की कटाई, अनियोजित निर्माण और बढ़ते प्रदूषण ने पारंपरिक प्रकृति संरक्षण की व्यवस्था को कमजोर किया है। आज जिन पहाड़ों पर कभी घने जंगल थे, वहाँ कई स्थानों पर केवल मलबा दिखाई देता है। जहाँ कभी पक्षियों का कलरव सुनाई देता था, वहाँ अब मशीनों की आवाज़ गूंजती है। हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण संरक्षण पर कोई कानून नहीं लिखा। उन्होंने केवल इतना कहाकृपेड़ मत काटो, उनमें देवता रहते हैं। यह एक धार्मिक वाक्य नहीं था, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का सबसे सरल और प्रभावी सूत्र था। आज विज्ञान भी यही कह रहा है कि यदि पृथ्वी को बचाना है तो जंगल बचाने होंगे, जलस्रोत बचाने होंगे और जैव विविधता बचानी होगी। आज जब सरकारें एक पेड़ माँ के नाम, हरेला महोत्सव और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चला रही हैं, तब यह याद रखना भी जरूरी है कि पौधा लगाना पर्याप्त नहीं हैकृउसे बचाना भी उतना ही आवश्यक है। पहाड़ की संस्कृति हमें यही सिखाती है कि प्रकृति का उपयोग करो, लेकिन उसका शोषण मत करो। पहाड़ की असली पहचान केवल चारधाम, बर्फीली चोटियाँ या पर्यटन नहीं हैं। उसकी सबसे बड़ी पहचान वह जीवन-दर्शन है, जिसमें प्रकृति को ईश्वर का रूप माना गया। यदि हम इस परंपरा को बचा सके, तो केवल पहाड़ ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। क्योंकि पहाड़ के बुजुर्ग आज भी कहते हैंकृजंगल बचेंगे तो जल बचेगा, जल बचेगा तो कल बचेगा।