शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

udaydinmaan: देवभूमि की ‘अदृश्य’ अदालत

udaydinmaan: देवभूमि की ‘अदृश्य’ अदालत: जब सरकारी तंत्र से आगे निकल आती है ऐड़ी-आछरी की लोक आस्था ऐड़ी-आछरी है पहाड़ों की लोक आस्था, रहस्य व लोकजीवन की जीवंत परंपरा गांवों की चौपाल से...

‘साइलेंट’ मोड में चुनावी ‘बिसात’

कांग्रेस का बूथ मंथन से बदलेगा उत्तराखंड राज्य का सियासी समीकरण वोटर लिस्ट में मतदाताओं को जोड़ने की होड़ में कौन मारेगा बाजी चेहरों का जमावड़ा नहीं, बूथ की घेराबंदी तय करेगी सत्ता की चाबी कांग्रेस के बूथ लेवल एजेंट, विधानसभा प्रभारी और वरिष्ठ नेता सक्रिय देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन कांग्रेस ने चुनावी तैयारियों का पहिया तेजी से घुमाना शुरू कर दिया है। पार्टी ने अपने बूथ लेवल एजेंटों, विधानसभा प्रभारियों, जिला एवं ब्लाक स्तर के पदाधिकारियों और वरिष्ठ नेताओं को विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में पूरी ताकत के साथ झोंक दिया है। कांग्रेस का दावा है कि यह केवल मतदाता सूची का पुनरीक्षण नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव की बुनियादी तैयारी है। पार्टी के भीतर यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि चुनाव केवल बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं, बल्कि बूथ स्तर की मजबूती से जीते जाते हैं। इसी सोच के तहत प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में बूथवार समीक्षा, मतदाता सूची के सत्यापन, नए मतदाताओं को जोड़ने और छूटे हुए नामों को शामिल कराने का अभियान चलाया जा रहा है। कांग्रेस संगठन का मानना है कि पिछले चुनावों में बूथ प्रबंधन की कमजोरियों का खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ा था। इस बार पार्टी किसी भी स्तर पर ढिलाई के मूड में नहीं है। विधानसभा प्रभारियों को प्रत्येक बूथ की नियमित निगरानी, स्थानीय कार्यकर्ताओं से संवाद और मतदाता सूची में होने वाले बदलावों पर नजर रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सूत्रों के अनुसार प्रदेश नेतृत्व ने सभी जिलाध्यक्षों और विधानसभा प्रभारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को केवल औपचारिक प्रक्रिया न समझा जाए। इसे संगठन विस्तार और जनसंपर्क अभियान के रूप में चलाया जाए। बूथ एजेंटों से घर-घर संपर्क, नए मतदाताओं का पंजीकरण और मतदाता सूची में त्रुटियों को दूर कराने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का यह अभियान सीधे तौर पर चुनावी गणित से जुड़ा हुआ है। मतदाता सूची में छोटी-सी चूक भी चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि पार्टी इस बार बूथ स्तर पर मजबूत नेटवर्क खड़ा करने में जुटी है। दूसरी ओर भाजपा पहले से ही अपने बूथ सशक्तिकरण अभियान को आगे बढ़ा रही है। ऐसे में कांग्रेस भी संगठनात्मक स्तर पर कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। प्रदेश की राजनीति अब केवल जनसभाओं और बड़े नारों तक सीमित नहीं रह गई है। असली मुकाबला बूथ प्रबंधन, मतदाता संपर्क और संगठन की सक्रियता पर टिकता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि मतदाता सूची लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। यदि पात्र मतदाता का नाम सूची में नहीं होगा तो लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित होंगे। इसलिए कार्यकर्ताओं से कहा गया है कि वह प्रत्येक बूथ पर सक्रिय रहकर लोगों की सहायता करें और निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में सहयोग दें। कांग्रेस इस अभियान के जरिए दोहरे लक्ष्य पर काम कर रही है। पहला, संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय बनाना और दूसरा, कार्यकर्ताओं में चुनावी ऊर्जा का संचार करना। लंबे समय बाद पार्टी ने बूथ स्तर पर इतनी व्यापक सक्रियता दिखाई है, जिसे आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि कांग्रेस की यह संगठनात्मक कवायद जमीन पर कितना असर छोड़ती है। उत्तराखंड की राजनीति में जहां भाजपा पहले से मजबूत बूथ नेटवर्क का दावा करती रही है, वहीं कांग्रेस की यह नई सक्रियता आने वाले महीनों में राजनीतिक मुकाबले को और दिलचस्प बना सकती है। चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने-अपने मोर्चे संभालने शुरू कर दिए हैं। ऐसे में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान अब केवल निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया नहीं, बल्कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति का नया रणक्षेत्र बनता नजर आ रहा है।

देवभूमि की ‘अदृश्य’ अदालत

जब सरकारी तंत्र से आगे निकल आती है ऐड़ी-आछरी की लोक आस्था ऐड़ी-आछरी है पहाड़ों की लोक आस्था, रहस्य व लोकजीवन की जीवंत परंपरा गांवों की चौपाल से जंगलों तक गूंजती हैं ऐड़ी और आछरी की कथाएं आस्था, लोक संस्कृति व प्रकृति से जुड़ी सदियों विरासत आज भी है जीवित देहरादून। उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, चारधाम और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। यहां का लोकजीवन अपनी समृद्ध लोक परंपराओं, देवी-देवताओं और लोकगाथाओं के कारण भी पूरे देश में अलग स्थान रखता है। इन्हीं लोक मान्यताओं में एक महत्वपूर्ण नाम है ऐड़ी-आछरी का। पहाड़ के गांवों में आज भी जब किसी अनहोनी, रहस्यमयी घटना या जंगल से जुड़े अनुभवों की चर्चा होती है तो ऐड़ी देवता और आछरी का जिक्र स्वतः होने लगता है। कुमाऊं और गढ़वाल के अनेक क्षेत्रों में ऐड़ी देवता को न्याय के देवता और ग्राम रक्षक के रूप में पूजा जाता है। लोकमान्यता है कि ऐड़ी देवता अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और अन्याय करने वालों को दंड देते हैं। गांवों में उनके मंदिर और थान आज भी लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। किसी विवाद या संकट की स्थिति में लोग ऐड़ी देवता के समक्ष मन्नत मांगते हैं और न्याय की गुहार लगाते हैं। आछरी पहाड़ की लोककथाओं का एक रहस्यमय पात्र है। लोकविश्वास के अनुसार आछरी जंगलों, बुग्यालों और निर्जन स्थानों से जुड़ी अलौकिक शक्ति के रूप में वर्णित होती है। पुराने समय में बुजुर्ग बच्चों और चरवाहों को शाम ढलने के बाद जंगलों में न जाने की सलाह देते थे और इसके लिए आछरी की कहानियां सुनाई जाती थीं। इन कथाओं का उद्देश्य केवल रहस्य पैदा करना नहीं, बल्कि कठिन पहाड़ी परिस्थितियों में लोगों को सतर्क रहने की सीख देना भी था। लोक साहित्य के जानकार मानते हैं कि ऐड़ी-आछरी की कहानियां केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि पहाड़ के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा हैं। इन कथाओं में प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक अनुशासन और लोकजीवन के अनुभव छिपे हुए हैं। जंगलों, नदियों और ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों के प्रति सावधानी बरतने का संदेश भी इन्हीं लोककथाओं के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाया गया। समय के साथ आधुनिकता ने गांवों की जीवनशैली बदल दी है। मोबाइल और इंटरनेट के दौर में नई पीढ़ी इन लोककथाओं से दूर होती जा रही है। फिर भी कई गांवों में आज भी जागर, लोकगीत और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान ऐड़ी देवता का स्मरण किया जाता है। लोकगायक अपनी प्रस्तुतियों में ऐड़ी देवता की वीरता और न्यायप्रियता का वर्णन करते हैं, जबकि बुजुर्ग आछरी से जुड़ी कहानियों को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सुनाते हैं। सांस्कृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड की लोकआस्थाएं केवल धार्मिक विषय नहीं हैं, बल्कि वह समाज के इतिहास, पर्यावरण और लोकमनोविज्ञान को समझने का माध्यम भी हैं। ऐड़ी-आछरी की परंपरा इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार लोकविश्वासों ने पहाड़ के कठिन जीवन में सामाजिक संतुलन और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को बनाए रखा। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन लोककथाओं और परंपराओं का वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से दस्तावेजीकरण किया जाए। इन्हें अंधविश्वास के रूप में खारिज करने के बजाय लोकसंस्कृति की अमूल्य विरासत के रूप में संरक्षित किया जाए। पहाड़ की नई पीढ़ी यदि अपनी जड़ों से जुड़ी रहेगी, तभी ऐड़ी-आछरी जैसी लोकगाथाएं आने वाले समय में भी जीवित रह सकेंगी। ऐड़ी-आछरी केवल एक कथा नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों की स्मृतियों, लोकविश्वास, प्रकृति और सांस्कृतिक पहचान का ऐसा अध्याय है, जो आज भी गांवों की हवा, जंगलों की खामोशी और लोकगीतों की धुनों में जीवंत महसूस किया जा सकता है।

‘रोटी-बेटी’ का रिश्ता और लखपति दीदी का ‘सपना’

दार्चुला में भारत-नेपाल मैत्री बैठक व लखपति दीदी सम्मेलन से सीमांत क्षेत्रों को नया संदेश सीमा के दोनों ओर महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सशक्तिकरण पर जोर भारत-नेपाल के पारंपरिक रिश्तों को विकास और आत्मनिर्भरता से जोड़ने की है यह पहल देहरादून। भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने रोटी-बेटी के रिश्तों को नई ऊर्जा देने की दिशा में नेपाल के दार्चुला में आयोजित भारत-नेपाल मैत्री बैठक एवं लखपति दीदी सम्मेलन को सीमांत क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। इस सम्मेलन का उद्देश्य केवल दोनों देशों के पारंपरिक सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना ही नहीं, बल्कि सीमा से लगे क्षेत्रों की महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण, स्वरोजगार और सामाजिक भागीदारी को भी नई दिशा देना रहा। उत्तराखंड के सीमांत जिलों और नेपाल के दार्चुला क्षेत्र के बीच वर्षों से पारिवारिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध रहे हैं। सीमावर्ती गांवों में आज भी दोनों देशों के लोगों के बीच वैवाहिक रिश्ते, सांस्कृतिक मेल-मिलाप और पारंपरिक सहयोग की मजबूत परंपरा देखने को मिलती है। इसी ऐतिहासिक विरासत को आधुनिक विकास और महिला सशक्तिकरण से जोड़ने का प्रयास इस सम्मेलन के माध्यम से किया गया। सम्मेलन में महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता, स्वयं सहायता समूहों की भूमिका, लघु उद्योग, हस्तशिल्प, कृषि आधारित उद्यम, स्थानीय उत्पादों के विपणन और सीमांत क्षेत्रों में आजीविका के नए अवसरों पर विशेष चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि यदि सीमा के दोनों ओर महिलाओं को प्रशिक्षण, बाजार और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए तो सीमांत क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है। बैठक के दौरान भारत और नेपाल के बीच सामाजिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान को और मजबूत करने, पारंपरिक मेलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा महिला समूहों के बीच नियमित संवाद बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। प्रतिभागियों ने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों की साझा सांस्कृतिक विरासत दोनों देशों की सबसे बड़ी ताकत है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने की आवश्यकता है। सीमांत क्षेत्रों का विकास केवल आधारभूत सुविधाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि स्थानीय समाज, महिलाओं और युवाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है। ऐसे सम्मेलन सीमा पार विश्वास, सहयोग और सामाजिक समरसता को मजबूत करने का माध्यम बन सकते हैं। राजनीतिक दृष्टि से भी इस आयोजन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत और नेपाल के बीच समय-समय पर सीमा, व्यापार और कूटनीतिक मुद्दों पर चर्चा होती रही है। ऐसे में सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर होने वाले कार्यक्रम दोनों देशों के बीच जन-से-जन संपर्क को मजबूत करने में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। रोटी-बेटी का रिश्ता केवल एक सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास और साझी विरासत का आधार माना जाता है। सम्मेलन में इस बात पर भी बल दिया गया कि सीमांत क्षेत्रों की महिलाएं केवल परिवार की जिम्मेदारी निभाने वाली सदस्य नहीं हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था, सामाजिक नेतृत्व और सांस्कृतिक संरक्षण की प्रमुख धुरी भी हैं। यदि उन्हें शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल सशक्तिकरण और स्वरोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जाएं तो सीमांत क्षेत्रों में पलायन कम करने और स्थानीय विकास को गति देने में महत्वपूर्ण सफलता मिल सकती है। दार्चुला में आयोजित भारत-नेपाल मैत्री बैठक और लखपति दीदी सम्मेलन ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि सदियों पुराने रिश्ते केवल इतिहास की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के साझा विकास की नींव भी बन सकते हैं। सीमाओं से परे सामाजिक विश्वास, महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक साझेदारी का यह प्रयास आने वाले समय में भारत-नेपाल संबंधों को नई मजबूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

नया ‘कानून’ और पुराना ‘नासूर’

संसद की मुहर से थम जाएगा पेपर लीक का काला कारोबार, पेपर लीक विरोधी कानून पर भाजपा का बड़ा दावा एंटी पेपर लीक बिल पर संसदीय मुहर को भाजपा ने बताया मोदी सरकार की ऐतिहासिक प्रतिबद्धता भाजपा बोलीकृनकल माफिया पर अब कानून का शिकंजा, अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा के लिए उठाया कदम नई दिल्ली। देशभर में वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और नकल माफिया के बढ़ते नेटवर्क को लेकर उठते सवालों के बीच संसद से एंटी पेपर लीक कानून को मंजूरी मिलने के बाद भाजपा ने इसे युवाओं के भविष्य की सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि अब मेहनत करने वाले युवाओं के सपनों से खिलवाड़ करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। भाजपा ने संसदीय मुहर लगने के बाद कहा कि यह केवल एक कानून नहीं, बल्कि देश के करोड़ों विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के प्रति प्रधानमंत्री मोदी की अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण है। पार्टी का दावा है कि लंबे समय से पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं का विश्वास कमजोर किया था, लेकिन अब कठोर कानूनी प्रावधानों के माध्यम से परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाएगा। भाजपा के अनुसार सरकार की प्राथमिकता हमेशा से यह रही है कि योग्य और मेहनती अभ्यर्थियों को समान अवसर मिले। पार्टी नेताओं ने कहा कि पेपर लीक करने वाले गिरोह केवल कानून नहीं तोड़ते, बल्कि लाखों युवाओं की वर्षों की मेहनत और उनके भविष्य पर भी चोट करते हैं। ऐसे में सख्त कानूनी व्यवस्था समय की सबसे बड़ी आवश्यकता थी। पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और तकनीकी सुधारों पर जोर देते रहे हैं। इसी दिशा में यह कानून एक मजबूत आधार तैयार करेगा। भाजपा नेताओं ने उम्मीद जताई कि नई व्यवस्था से भर्ती परीक्षाओं में विश्वास बढ़ेगा और युवाओं को निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का वातावरण मिलेगा। हालांकि, विपक्ष ने कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को सबसे बड़ी चुनौती बताया है। विपक्षी दलों का कहना है कि केवल कठोर कानून बना देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि राज्यों और भर्ती एजेंसियों में जवाबदेही तय करना, समयबद्ध जांच, पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था और दोषियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक होगी। उनका तर्क है कि यदि कानून का ईमानदारी से पालन नहीं हुआ तो केवल सख्त प्रावधान समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन पाएंगे। पेपर लीक का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों में देश की सबसे संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक बहसों में शामिल रहा है। कई राज्यों में भर्ती परीक्षाओं के रद्द होने, युवाओं के विरोध-प्रदर्शनों और नकल माफिया के खुलासों ने सरकारों पर दबाव बढ़ाया था। ऐसे माहौल में संसद से पारित यह कानून राजनीतिक और प्रशासनिककृदोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा अब इस कानून को युवाओं के हित में अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है। पार्टी का कहना है कि सरकार की मंशा स्पष्ट हैकृमेहनत करने वाले युवाओं का भविष्य सुरक्षित करना और परीक्षा प्रणाली को माफिया मुक्त बनाना। वहीं आने वाले समय में इस कानून की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसका क्रियान्वयन कितना प्रभावी होता है और क्या यह वास्तव में पेपर लीक जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाने में सफल साबित होता है।

भाजपा की ‘जीत’ के दावों का ‘गणित’

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का नेतृत्व, कार्यकर्ताओं का पसीना और उत्तराखंड भाजपा का रिपोर्ट कार्ड संगठन को मिली नई धार, भाजपा ने जीत के नए आयाम गिनाए, विस चुनाव की तैयारियों को दी रफ्तार प्रदेश अध्यक्ष के कार्यकाल को संगठन विस्तार और चुनावी सफलता से जोड़ रही भाजपा देहरादून। उत्तराखंड भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के नेतृत्व को संगठन की मजबूती और चुनावी सफलता का प्रमुख आधार बताते हुए दावा किया है कि उनके कार्यकाल में पार्टी ने जीत के नए आयाम स्थापित किए हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि संगठनात्मक विस्तार, बूथ स्तर तक सक्रियता, कार्यकर्ताओं के साथ लगातार संवाद और चुनावी रणनीति के बेहतर समन्वय ने भाजपा को राजनीतिक रूप से और मजबूत किया है। भाजपा का दावा है कि महेंद्र भट्ट ने प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद संगठन को केवल चुनावी मशीनरी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे गांव, मंडल और बूथ स्तर तक सक्रिय बनाने का प्रयास किया। पार्टी के विभिन्न अभियानों, सदस्यता विस्तार कार्यक्रमों और संगठनात्मक बैठकों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को लगातार सक्रिय रखा गया, जिसका लाभ चुनावी मैदान में भी देखने को मिला। पार्टी नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड जैसे भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण राज्य में संगठन को मजबूत बनाए रखना आसान नहीं होता। इसके बावजूद प्रदेश नेतृत्व ने केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया। भाजपा का दावा है कि इसी रणनीति ने कई चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को मजबूती दी। भाजपा के भीतर यह भी माना जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए संगठनात्मक ढांचे को और अधिक सक्रिय किया जा रहा है। बूथ समितियों के गठन, पन्ना प्रमुख व्यवस्था, प्रशिक्षण शिविरों और जनसंपर्क अभियानों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। पार्टी का मानना है कि मजबूत संगठन ही चुनावी सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी संगठन की वास्तविक परीक्षा चुनाव परिणामों और जनसमर्थन से होती है। उनके अनुसार भाजपा ने संगठन को मजबूत करने के कई प्रयास किए हैं, लेकिन विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में संगठनात्मक मजबूती के साथ जनता के बीच इन मुद्दों का समाधान भी महत्वपूर्ण रहेगा। विपक्ष का कहना है कि भाजपा अपनी उपलब्धियों का प्रचार कर रही है, लेकिन जनता विकास और सुशासन के ठोस परिणामों के आधार पर फैसला करेगी। कांग्रेस का दावा है कि आने वाले चुनाव में स्थानीय मुद्दे और जन असंतोष निर्णायक भूमिका निभाएंगे। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के नेतृत्व को संगठन की उपलब्धियों के रूप में सामने रखकर 2027 के चुनावी अभियान की पृष्ठभूमि तैयार करती दिखाई दे रही है। वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक प्रचार बताते हुए जमीनी मुद्दों पर सरकार की जवाबदेही तय करने की बात कर रहा है। उत्तराखंड की राजनीति अब संगठनात्मक सक्रियता और जनभावनाओंकृदोनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती के दौर में प्रवेश कर चुकी है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि भाजपा का संगठनात्मक माडल और विपक्ष की जनसरोकार आधारित राजनीति में से किसे जनता अधिक स्वीकार करती है।

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

udaydinmaan: पहाड़ का ‘ग्रीन गोल्ड’ है रिंगाल

udaydinmaan: पहाड़ का ‘ग्रीन गोल्ड’ है रिंगाल: अब केवल टोकरी नहीं, स्वरोजगार का नया ब्रांड बन गया है आज रिंगाल घरेलू जरूरतों तक सीमित रहने वाला रिंगाल लाखों के कारोबार का आधार पारंपरिक हस...

पहाड़ का ‘ग्रीन गोल्ड’ है रिंगाल

अब केवल टोकरी नहीं, स्वरोजगार का नया ब्रांड बन गया है आज रिंगाल घरेलू जरूरतों तक सीमित रहने वाला रिंगाल लाखों के कारोबार का आधार पारंपरिक हस्तशिल्प से ग्रीन गोल्ड बनने तक पहाड़ की नई आर्थिक क्रांति पलायन रोकने से लेकर महिलाओं की आजीविका तक है पहाड़ की उम्मीद देहरादून। उत्तराखंड के जंगलों में सदियों से चुपचाप उगने वाला रिंगाल आज केवल एक पौधा नहीं, बल्कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और स्वरोजगार का नया प्रतीक बनता जा रहा है। कभी घरों की टोकरियां, डोका, सूप और खेती के उपकरण बनाने तक सीमित रहने वाला यह हिमालयी बांस अब लाखों रुपये के कारोबार का आधार बन रहा है। सरकार, स्वयं सहायता समूह और युवा उद्यमी मिलकर इसे ग्रीन गोल्ड यानी पहाड़ का हरा सोना बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के ऊंचाई वाले इलाकों में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला रिंगाल सदियों से स्थानीय जीवन का हिस्सा रहा है। पहले गांवों में खेती-किसानी का लगभग हर काम रिंगाल से बने सामान के बिना अधूरा माना जाता था। खेतों में अनाज ढोने के लिए डोका, पशुओं के लिए टोकरियां, फल-सब्जी रखने की टोकरी, अनाज फटकने का सूप और घरेलू उपयोग की अनेक वस्तुएं इसी से तैयार होती थीं। यह केवल एक हस्तशिल्प नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा था। लेकिन आधुनिकता के दौर में प्लास्टिक और मशीनों से बने सस्ते उत्पादों ने रिंगाल की पारंपरिक उपयोगिता को पीछे धकेल दिया। इसके साथ ही कारीगरों की संख्या भी तेजी से घटने लगी। नई पीढ़ी रोजगार की तलाश में शहरों की ओर निकल गई और गांवों में यह पारंपरिक कला सिमटने लगी। अब तस्वीर बदल रही है। देश और दुनिया में पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की बढ़ती मांग ने रिंगाल को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आज रिंगाल से केवल टोकरियां ही नहीं, बल्कि लैंप, फर्नीचर, फूलदान, ट्रे, पेन स्टैंड, वाल हैंगिंग, हैंडबैग, गिफ्ट आइटम, कारपोरेट गिफ्ट और आधुनिक होम डेकोर उत्पाद भी बनाए जा रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे महानगरों के साथ-साथ विदेशों तक इन उत्पादों की मांग बढ़ रही है। उत्तराखंड में कई स्वयं सहायता समूहों ने रिंगाल को महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता का मजबूत माध्यम बनाया है। गांवों की महिलाएं खाली समय में हस्तशिल्प तैयार कर अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं। कई परिवारों की आमदनी का प्रमुख स्रोत आज यही शिल्प बन चुका है। इससे न केवल आर्थिक स्थिति सुधर रही है, बल्कि पारंपरिक कौशल भी नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है। यदि रिंगाल आधारित उद्योग को संगठित बाजार, डिजाइन नवाचार और ई-कामर्स का समर्थन मिले तो यह उत्तराखंड के लिए रोजगार का बड़ा माध्यम बन सकता है। जिस प्रकार पूर्वाेत्तर राज्यों में बांस उद्योग ने हजारों लोगों को रोजगार दिया है, उसी प्रकार उत्तराखंड में भी रिंगाल आधारित क्लस्टर विकसित किए जा सकते हैं। पर्यावरण के लिहाज से भी रिंगाल अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मिट्टी के कटाव को रोकने, पहाड़ी ढलानों को स्थिर रखने और जैव विविधता को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसे पौधों का महत्व और बढ़ जाता है जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ लोगों को रोजगार भी दें। पर्यटन के क्षेत्र में भी रिंगाल नई संभावनाएं खोल रहा है। उत्तराखंड आने वाले पर्यटक स्थानीय हस्तशिल्प को स्मृति चिन्ह के रूप में खरीदना पसंद कर रहे हैं। यदि हर प्रमुख पर्यटन स्थल पर रिंगाल उत्पादों के बिक्री केंद्र विकसित किए जाएं, तो स्थानीय कारीगरों को सीधा लाभ मिलेगा। वोकल फार लोकल और मेक इन इंडिया जैसे अभियानों के साथ इसे जोड़कर बड़ा बाजार तैयार किया जा सकता है। हालांकि चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। कच्चे माल के वैज्ञानिक प्रबंधन, प्रशिक्षित कारीगरों की कमी, आधुनिक डिजाइन, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और आनलाइन मार्केटिंग की सीमाएं इस क्षेत्र की सबसे बड़ी बाधाएं हैं। कई कारीगरों का कहना है कि उत्पाद तैयार हो जाते हैं, लेकिन उन्हें उचित बाजार नहीं मिल पाता। सरकार ने विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और विपणन की पहल की है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी एक समग्र नीति की आवश्यकता है। यदि रिंगाल को उत्तराखंड की विशेष पहचान के रूप में विकसित किया जाए, तो यह राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। जिस पहाड़ ने कभी रिंगाल को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाया था, वही रिंगाल आज पहाड़ के भविष्य की नई कहानी लिख सकता है। पलायन से जूझ रहे गांवों में यदि स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार विकसित करना है, तो रिंगाल जैसे पारंपरिक शिल्प को केवल विरासत नहीं, बल्कि उद्योग के रूप में देखना होगा। उत्तराखंड के पास प्रकृति की अनमोल पूंजी है। जरूरत इस बात की है कि जंगलों में उगने वाले इस हरे सोने को बाजार, तकनीक और ब्रांडिंग का साथ मिले। जिस दिन रिंगाल का उत्पाद देश-विदेश के हर घर तक पहुंचेगा, उस दिन पहाड़ के गांवों में रोजगार भी लौटेगा और संस्कृति भी जीवित रहेगी। क्योंकि रिंगाल केवल बांस नहीं है यह पहाड़ की परंपरा, पर्यावरण और आत्मनिर्भर भविष्य का मजबूत आधार है।

‘ऐतिहासिक’ दावे पर युवाओं की ‘शंका’

संसद से पारित हुआ एंटी पेपर लीक बिल, पर युवाओं का सवाल कानून की सख्ती से खत्म होगी साठगांठ या फिर वही पुराना खेल कानून पास हुआ, भाजपा ने देशभर में बजा दी है जीत की तालियां देहरादून। लोकसभा में एंटी पेपर लीक कानून संशोधन विधेयक पारित होते ही भाजपा ने इसे युवाओं के भविष्य की सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक और निर्णायक कदम बताया। पार्टी नेताओं ने दावा किया कि अब परीक्षा माफिया की कमर टूट जाएगी, नकल उद्योग पर ताला लग जाएगा और मेहनत करने वाले युवाओं को न्याय मिलेगा। लेकिन संसद से लेकर सड़कों तक गूंजता एक सवाल अभी भी वहीं खड़ा हैकृक्या केवल कानून बन जाने से युवाओं का टूटा हुआ भरोसा लौट आएगा? राजनीति में कानून पारित होने के बाद अक्सर जश्न मनाया जाता है। इस बार भी वही हुआ। भाजपा के प्रवक्ताओं ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस नीति का हिस्सा बताया। सोशल मीडिया पर युवाओं की जीत और पेपर माफिया की हार जैसे संदेश चलने लगे। लेकिन इन नारों के बीच देश का वह अभ्यर्थी कहीं दिखाई नहीं दिया, जिसने पिछले पांच वर्षों में दो-दो, तीन-तीन बार एक ही परीक्षा की तैयारी की और हर बार पेपर लीक की खबर सुनकर फिर से शून्य पर लौट आया। पेपर लीक का दर्द आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता। यह उस छात्र की आंखों में दिखता है, जो सुबह चार बजे उठकर पढ़ता है। यह उस पिता के माथे की लकीरों में दिखाई देता है, जिसने बेटे की कोचिंग के लिए खेत गिरवी रख दिया। यह उस बेटी की चुप्पी में सुनाई देता है, जिसने नौकरी की उम्मीद में अपनी उम्र के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष किताबों के बीच गुजार दिए। ऐसे युवाओं के लिए संसद में कानून बनना उम्मीद जरूर है, लेकिन भरोसा नहीं। भरोसा तब लौटेगा, जब परीक्षा समय पर होगी, प्रश्नपत्र सुरक्षित रहेगा और परिणाम बिना विवाद के घोषित होंगे। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक पक्ष भी है। भाजपा इसे अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्ष पूछ रहा है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों? यदि वर्षों से लगातार पेपर लीक हो रहे थे, भर्ती परीक्षाएं रद्द हो रही थीं और माफिया सक्रिय थे, तो क्या व्यवस्था पहले सो रही थी? क्या केवल कानून बना देने से उन संस्थागत कमियों पर पर्दा पड़ जाएगा, जिन्होंने इस अपराध को फलने-फूलने दिया? कानून जितना कठोर है, उतनी ही कठोर परीक्षा अब सरकार की भी होगी। क्योंकि पेपर लीक किसी बंद कमरे में नहीं होता। इसके पीछे प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर छपाई, परिवहन, डिजिटल सर्वर, परीक्षा केंद्र और प्रशासनिक निगरानी तक पूरी एक श्रृंखला होती है। यदि इस श्रृंखला की कमजोर कड़ियां नहीं सुधरेंगी, तो कानून की धार भी कुंद पड़ सकती है। उत्तराखंड इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों ने हजारों युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया। जांच हुई, गिरफ्तारियां हुईं, एसटीएफ सक्रिय हुई, लेकिन युवाओं के मन में जो अविश्वास पैदा हुआ, वह आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। यही कहानी देश के कई अन्य राज्यों में भी दोहराई गई। भाजपा का यह कहना सही है कि अपराधियों को कठोर सजा मिलनी चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो, जिनकी लापरवाही या मिलीभगत से पेपर लीक होता है। यदि हर बार केवल बिचौलिये पकड़े जाएंगे और व्यवस्था के भीतर बैठे जिम्मेदार लोग बच निकलेंगे, तो कानून का संदेश अधूरा रह जाएगा। लोकतंत्र में कानून बनाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन व्यवस्था में विश्वास पैदा करना सबसे कठिन काम है। युवाओं को संसद की कार्यवाही से अधिक अगली भर्ती परीक्षा की चिंता है। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि किस दल ने श्रेय लिया, उन्हें यह जानना है कि अगली बार उनका प्रश्नपत्र सुरक्षित रहेगा या नहीं। भाजपा इस विधेयक को अपनी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में जनता के बीच ले जाएगी। विपक्ष इसकी पृष्ठभूमि और पूर्व की विफलताओं को मुद्दा बनाएगा। लेकिन चुनावी भाषणों और प्रेस कान्फ्रेंसों से अलग, देश का युवा केवल एक जवाब चाहता हैकृक्या अब उसकी मेहनत बिकेगी नहीं? यही वह सवाल है, जिसका उत्तर किसी प्रेस विज्ञप्ति, किसी नारे या किसी सोशल मीडिया अभियान में नहीं मिलेगा। इसका उत्तर मिलेगा अगली परीक्षा के दिन। जब परीक्षा समय पर होगी, पेपर लीक नहीं होगा और चयन केवल योग्यता के आधार पर होगा। लोकसभा ने कानून पास कर दिया है। भाजपा खुश है। विपक्ष सवाल पूछ रहा है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा निर्णायक न संसद होगी, न राजनीतिक दल। निर्णायक होगा वह युवा, जो अगली भर्ती परीक्षा के बाद पहली बार कह सकेकृइस बार मेरी मेहनत सचमुच मेरी थी।

‘विधानसभा’ फतह के लिए की ‘किलाबंदी’

महंगाई, बेरोजगारी और जनमुद्दों को हथियार बना आक्रामक मोड में पार्टी सिर्फ रैलियों से नहीं, जमीनी किलाबंदी से भाजपा को घेरने का बना प्लान चुनावी मोड में कांग्रेस, सत्ता की राह तलाशने निकल गई है कांग्रेस पार्टी देहरादून। लोकसभा चुनावों के बाद अब कांग्रेस ने अपनी पूरी राजनीतिक ऊर्जा आगामी विधानसभा चुनावों पर केंद्रित कर दी है। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं, सामाजिक न्याय और संविधान की रक्षा जैसे मुद्दों को लेकर पार्टी ने देशभर में अपना चुनाव अभियान तेज कर दिया है। कांग्रेस का लक्ष्य स्पष्ट हैकृजनता के बीच यह संदेश पहुंचाना कि वह भाजपा के विकल्प के रूप में खुद को फिर से स्थापित करना चाहती है। पार्टी का चुनाव अभियान केवल रैलियों तक सीमित नहीं है। गांव-गांव जनसंपर्क, सोशल मीडिया पर आक्रामक उपस्थिति, बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय करने और युवाओं, महिलाओं तथा किसानों के बीच अलग-अलग अभियान चलाने की रणनीति पर काम हो रहा है। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि चुनाव केवल बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि बूथ स्तर के संगठन और स्थानीय मुद्दों से जीते जाते हैं। उत्तराखंड जैसे राज्यों में कांग्रेस विशेष रूप से महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है। पार्टी का दावा है कि युवाओं में रोजगार और पारदर्शी भर्ती को लेकर असंतोष है, जिसे वह अपने अभियान का केंद्र बनाएगी। कांग्रेस की रणनीति का दूसरा बड़ा आधार स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाना है। पिछले चुनावों में यह आरोप लगता रहा कि पार्टी का अभियान केंद्रीय नेतृत्व पर अधिक निर्भर रहा। इस बार कोशिश है कि राज्य स्तर के नेताओं को अधिक जिम्मेदारी मिले और स्थानीय समस्याओं को स्थानीय भाषा और स्थानीय संदर्भों में जनता तक पहुंचाया जाए। हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की है। कई राज्यों में गुटबाजी, संसाधनों की कमी और बूथ स्तर पर कमजोर नेटवर्क अभी भी पार्टी के सामने बड़ी बाधा हैं। भाजपा जहां अपने मजबूत संगठन और व्यापक चुनावी मशीनरी के साथ मैदान में उतरती है, वहीं कांग्रेस को हर सीट पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय बनाए रखना होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का चुनाव अभियान तभी प्रभावी होगा जब वह केवल सरकार की आलोचना तक सीमित न रहे, बल्कि शासन, रोजगार, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और सामाजिक कल्याण पर स्पष्ट वैकल्पिक दृष्टि भी प्रस्तुत करे। मतदाता अब केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि ठोस समाधान भी सुनना चाहता है। भाजपा भी कांग्रेस के अभियान का जवाब अपने विकास कार्यों, कल्याणकारी योजनाओं और राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर देने की तैयारी में है। ऐसे में आगामी चुनावों में मुकाबला केवल नारों का नहीं, बल्कि संगठन, नेतृत्व और जनविश्वास का होगा। आने वाले महीनों में कांग्रेस का चुनाव अभियान और अधिक आक्रामक होने की संभावना है। यदि पार्टी स्थानीय मुद्दों, मजबूत संगठन और स्पष्ट वैकल्पिक एजेंडे के साथ जनता के बीच लगातार बनी रहती है, तो कई राज्यों में मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। वहीं यदि आंतरिक मतभेद और संगठनात्मक कमजोरियां हावी रहीं, तो चुनावी चुनौती और कठिन हो जाएगी। फिलहाल इतना तय है कि चुनावी रणभेरी बज चुकी है। भाजपा अपनी उपलब्धियों के साथ मैदान में है, जबकि कांग्रेस जनता के मुद्दों को हथियार बनाकर सत्ता की राह तलाश रही है। अब फैसला अंततः मतदाता के हाथ में होगा कि वह किसकी राजनीति और किसके विजन पर भरोसा करता है।

सोशल मीडिया ‘ट्रेंड’ और चुनावी ‘दावे’

सचमुच बन रही है सत्ता की तस्वीर, या अभी केवल राजनीतिक शोर दावों, चर्चाओं व सोशल मीडिया के बीच यह है चुनाव की हकीकत सोशल मीडिया पर दावों से अलग है उत्तराखंड में जमीनी हकीकत देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर रोज नए दावे सामने आ रहे हैंकृकहीं भाजपा की वापसी तय बताई जा रही है, कहीं कांग्रेस की सरकार बनने की भविष्यवाणी हो रही है, तो कहीं क्षेत्रीय दलों को किंगमेकर बताया जा रहा है। लेकिन जब इन दावों की पड़ताल की जाती है, तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। क्या भाजपा पूरी तरह मजबूत स्थिति में है?भाजपा लगातार तीसरी बार आसानी से सरकार बना लेगी। यह दावा अभी प्रमाणित नहीं कहा जा सकता। भाजपा के पास मजबूत संगठन, बूथ स्तर का नेटवर्क और सत्ता का लाभ है। केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को चुनावी अभियान का आधार बनाया जा रहा है। चारधाम ऑल वेदर रोड, रेल और हवाई संपर्क, निवेश, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास को प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश किया जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्थानीय भर्ती, पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी चुनौतियां विपक्ष को मुद्दे भी दे रही हैं। इसलिए भाजपा की राह पूरी तरह आसान कहना जल्दबाजी होगी। यह भी दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस सत्ता में वापसी के करीब है और जनता पूरी तरह सत्ता परिवर्तन चाहती है। इसका भी अभी कोई ठोस प्रमाण नहीं है। कांग्रेस महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक, पलायन और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। यदि पार्टी संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखती है और बूथ स्तर तक मजबूत अभियान चलाती है, तो मुकाबला कड़ा हो सकता है। लेकिन कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को पूरी तरह सक्रिय रखना और मतदाताओं के सामने स्पष्ट वैकल्पिक कार्यक्रम प्रस्तुत करना है। केवल सत्ता विरोधी माहौल की उम्मीद चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं होती। इसके साथ ही यह भी अभी से दावा किया जा रहा है कि क्षेत्रीय दल इस बार निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं और इस बार क्षेत्रीय दल सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखेंगे। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यह सीट-दर-सीट प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। उत्तराखंड क्रांति दल, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवार कुछ क्षेत्रों में चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकते हैं। यदि मुकाबला बेहद करीबी हुआ और किसी बड़े दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, तो छोटे दलों की भूमिका बढ़ सकती है। हालांकि फिलहाल यह कहना कि वे निश्चित रूप से किंगमेकर बनेंगे, तथ्यों से परे होगा। इसके साथ ही दावा किया जा रहा है कि पेपर लीक और बेरोजगारी सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनेंगे और यह एक मजबूत संभावना है। भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, रोजगार, युवाओं का भविष्य और सरकारी नौकरियों का मुद्दा चुनावी बहस में प्रमुख स्थान पा सकता है। हालांकि चुनाव केवल एक मुद्दे पर नहीं लड़े जाते। विकास, सड़क, स्वास्थ्य, पर्यटन, महिला कल्याण, किसान और स्थानीय पहचान जैसे मुद्दे भी समान रूप से प्रभाव डाल सकते हैं। सोशल मीडिया ही चुनाव का परिणाम तय करेगा यह तो संभव नहीं है। सोशल मीडिया माहौल बना सकता है, लेकिन चुनाव नहीं जिताता। उत्तराखंड में अब भी बूथ प्रबंधन, स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार की छवि और क्षेत्रीय समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वायरल वीडियो और ट्रेंडिंग हैशटैग हमेशा मतपेटी में वोट में नहीं बदलते। भाजपा विकास कार्यों, डबल इंजन सरकार, बुनियादी ढांचे, धार्मिक पर्यटन, निवेश और केंद्र-राज्य समन्वय को अपने अभियान का आधार बनाएगी। संगठनात्मक मजबूती उसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। कांग्रेस रोजगार, महंगाई, पलायन, भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता, किसानों और स्थानीय मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है। उसका प्रयास सत्ता विरोधी भावना को राजनीतिक समर्थन में बदलने का होगा। यूकेडी स्थानीय अस्मिता और पहाड़ के मुद्दों को उठाने की कोशिश करेगा। आम आदमी पार्टी शिक्षा और स्वास्थ्य के माडल की बात कर सकती है। बसपा और निर्दलीय उम्मीदवार कुछ सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं। उत्तराखंड की राजनीति फिलहाल दावों और संभावनाओं के दौर में है, निष्कर्षों के नहीं। भाजपा अपनी उपलब्धियों के भरोसे चुनावी मैदान में उतरेगी। कांग्रेस जनता के मुद्दों को हथियार बनाएगी। क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व और प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करेंगे। लेकिन सबसे बड़ा फैक्ट यही है कि चुनावी नतीजे अभी किसी के पक्ष में तय नहीं हैं। राजनीतिक बयान, सोशल मीडिया ट्रेंड और चुनावी दावे अपनी जगह हैं, पर अंतिम फैसला उत्तराखंड की जनता मतदान वाले दिन करेगी। पहाड़ का मतदाता कई बार ऐसे फैसले देता है जो चुनाव पूर्व सभी राजनीतिक आकलनों को गलत साबित कर देते हैं। इसलिए 2027 की लड़ाई अभी खुली है और हर दल के सामने अवसर भी है, चुनौती भी।

बुधवार, 29 जुलाई 2026

udaydinmaan: पहाड़ की असली ताकत थी ‘साझी संस्कृति’

udaydinmaan: पहाड़ की असली ताकत थी ‘साझी संस्कृति’: पहाड़ की सामूहिक श्रम परंपरा आज भी सिखाती है साथ चलने का मंत्र बिना मजदूरी, बिना अनुबंध और बिना स्वार्थ के रहते थे मिलकर ग्रामीण खेत जोतते, घ...

पहाड़ की असली ताकत थी ‘साझी संस्कृति’

पहाड़ की सामूहिक श्रम परंपरा आज भी सिखाती है साथ चलने का मंत्र बिना मजदूरी, बिना अनुबंध और बिना स्वार्थ के रहते थे मिलकर ग्रामीण खेत जोतते, घर बनाते व संकट में एक-दूसरे का हाथ थामते थे सभी लोग परंपरा भले ही कमजोर हो गई, लेकिन इसकी आत्मा है पहाड़ की पहचान देहरादून। पहाड़ का जीवन केवल ऊंचे-ऊंचे पर्वतों, नदियों और देवस्थलों तक सीमित नहीं है। इसकी सबसे बड़ी ताकत रही है यहां की सामुदायिक संस्कृति। एक समय था जब गांव में किसी के खेत की बुवाई हो, किसी का घर बन रहा हो, छत पर पत्थर चढ़ाने हों, सिंचाई की गूल साफ करनी हो या किसी परिवार पर संकट आया होकृपूरा गांव बिना बुलावे और बिना किसी पारिश्रमिक के एक साथ जुट जाता था। इसे ही पहाड़ में सामूहिक श्रम की परंपरा कहा जाता था। यह केवल काम करने का तरीका नहीं था, बल्कि सामाजिक जीवन का ऐसा सूत्र था जिसने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी गांवों को आत्मनिर्भर बनाए रखा। सामूहिक श्रम ने पहाड़ के लोगों को यह विश्वास दिया कि किसी एक का संकट पूरे गांव का संकट है और किसी एक की खुशी पूरे गांव की खुशी। उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में इस परंपरा को स्थानीय बोलियों में अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा है। कहीं इसे परमा कहा गया, कहीं सहकार, तो कहीं पैंचा या अन्य स्थानीय नाम प्रचलित रहे। नाम भले बदलते रहे हों, लेकिन भावना एक ही थीकृआज मैं तुम्हारे खेत में काम करूंगा, कल तुम मेरे खेत में। धान की रोपाई के दिनों में गांव की महिलाएं कतार बनाकर खेतों में उतरती थीं। लोकगीतों की मधुर धुन के बीच रोपाई होती और पूरा वातावरण उत्सव जैसा हो जाता। पुरुष खेत तैयार करते, पानी की व्यवस्था संभालते या अन्य श्रम कार्य करते। इसी तरह गेहूं की कटाई, मंडाई, घास काटना, जंगल से लकड़ी लाना और पशुओं के लिए चारा जुटाना भी सामूहिक प्रयास का हिस्सा था। पहाड़ में मकान निर्माण भी इसी सहयोग की मिसाल था। आज जहां एक मकान बनाने में ठेकेदार और बड़ी रकम की जरूरत पड़ती है, वहीं पहले पूरा गांव मिलकर पत्थर ढोता, लकड़ी लाता, मिट्टी तैयार करता और छत डालने तक का काम साथ करता था। बदले में केवल आत्मीयता, सम्मान और एक सामूहिक भोजन ही पर्याप्त माना जाता था। सामूहिक श्रम केवल आर्थिक मजबूरी नहीं था। यह सामाजिक सुरक्षा का भी आधार था। किसी परिवार में बीमारी हो, किसी के यहां विवाह हो, किसी के घर शोक का माहौल हो या प्राकृतिक आपदा आ जाएकृगांव के लोग बिना औपचारिक निमंत्रण के मदद के लिए पहुंच जाते थे। यही कारण था कि सीमित संसाधनों के बावजूद पहाड़ का सामाजिक ताना-बाना लंबे समय तक मजबूत बना रहा। हालांकि बदलते समय के साथ इस परंपरा पर असर पड़ा है। गांवों से लगातार हो रहा पलायन, छोटे होते परिवार, नकद अर्थव्यवस्था का विस्तार और आधुनिक जीवनशैली ने सामूहिक श्रम की संस्कृति को कमजोर किया है। अब जिन कार्यों के लिए पहले पूरा गांव जुटता था, वहां मजदूर बुलाने की परंपरा बढ़ गई है। कई गांवों में खेत खाली पड़े हैं और पुराने लोकगीतों की गूंज भी कम सुनाई देती है। इसके बावजूद यह परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज भी कई दूरस्थ गांवों में सिंचाई की नहरों की सफाई, मंदिरों के रख-रखाव, पैदल मार्गों की मरम्मत, जलस्रोतों के संरक्षण, वनाग्नि रोकने और आपदा के समय राहत कार्यों में सामूहिक श्रम की भावना जीवित दिखाई देती है। महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से और युवा विभिन्न सामाजिक अभियानों में मिलकर इस विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। आज के दौर में जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पलायन जैसी चुनौतियों से जूझ रहे उत्तराखंड में सामूहिक श्रम की परंपरा फिर से प्रासंगिक हो सकती है। यदि ग्राम पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से इस संस्कृति को नई ऊर्जा मिले, तो जल संरक्षण, पारंपरिक खेती, वन संरक्षण और ग्रामीण विकास के कई कार्य कम लागत में अधिक प्रभावी ढंग से किए जा सकते हैं। पहाड़ ने हमेशा सिखाया है कि कठिन रास्तों को अकेले नहीं, बल्कि मिलकर पार किया जाता है। यही कारण है कि सामूहिक श्रम केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता भी है। जब समाज साथ खड़ा होता है, तब विकास केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि लोगों की सहभागिता से आगे बढ़ता है।

‘आधी आबादी’ पर भाजपा का ‘फोकस’

लखपति दीदी सम्मेलन से महिला वोट बैंक पर भाजपा की नजर भाजपा ने की उत्तराखंड की 70 विधानसभाओं में मोर्चाबंदी तेज स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं से बढ़ाया राजनीतिक संवाद संगठन विस्तार संग विस चुनाव की तैयारियों को मिल गई नई धार देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट तेज होने के साथ ही भाजपा ने महिला मतदाताओं तक अपनी पहुंच मजबूत करने की रणनीति पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में भाजपा महिला मोर्चा की ओर से आयोजित किए जा रहे लखपति दीदी सम्मेलन को केवल एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण के साथ राजनीतिक संवाद का बड़ा मंच माना जा रहा है। पार्टी की कोशिश है कि स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण महिलाओं के बीच अपनी पकड़ को और मजबूत किया जाए तथा इसका लाभ विधानसभा स्तर तक संगठन को मिले। उत्तराखंड में महिला मतदाता कई चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर मैदानी जिलों तक महिलाओं की मतदान में सक्रिय भागीदारी लगातार बढ़ी है। ऐसे में भाजपा महिला मोर्चा के सम्मेलन को महिला वोट बैंक के साथ सीधे संवाद और संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार सम्मेलन में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं, उद्यमिता से जुड़े लाभार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय महिला नेतृत्व को जोड़ने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल सरकारी योजनाओं की जानकारी देना नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक महिला कार्यकर्ताओं के नेटवर्क को मजबूत करना भी है। भाजपा लंबे समय से बूथ प्रबंधन को अपनी चुनावी ताकत मानती रही है। अब महिला मोर्चा के माध्यम से प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय महिला नेटवर्क तैयार करने की कवायद तेज हो गई है। पार्टी का मानना है कि यदि स्वयं सहायता समूहों और महिला स्वयंसेवकों के माध्यम से गांव-गांव तक संवाद स्थापित होता है तो चुनावी अभियान को भी मजबूती मिलेगी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लखपति दीदी जैसे कार्यक्रम महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की चर्चा के साथ राजनीतिक सहभागिता का भी अवसर बनते हैं। इससे पार्टी को उन वर्गों तक पहुंचने का मौका मिलता है, जो पारंपरिक राजनीतिक गतिविधियों में अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहते हैं। उत्तराखंड के चुनावी परिदृश्य में महिलाओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों के निर्णयों पर महिलाओं का प्रभाव बढ़ा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, स्वयं सहायता समूह, गैस, पेयजल, सड़क और स्वरोजगार जैसे मुद्दे महिला मतदाताओं के लिए प्रमुख रहते हैं। ऐसे में सभी राजनीतिक दल इन मुद्दों को अपने अभियान का हिस्सा बना रहे हैं। भाजपा की कोशिश है कि महिला मोर्चा के कार्यक्रमों के माध्यम से सरकार की विभिन्न योजनाओं की जानकारी लाभार्थियों तक पहुंचाई जाए और स्थानीय स्तर पर संवाद का दायरा बढ़ाया जाए। राजनीतिक दृष्टि से यह भी महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस सहित अन्य दल भी महिला मतदाताओं के बीच अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। ऐसे में महिला मतदाताओं को लेकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है। आने वाले महीनों में विभिन्न दलों की महिला इकाइयों के कार्यक्रमों में भी तेजी देखी जा सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड के चुनाव केवल बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं, बल्कि गांवों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय सामाजिक नेटवर्क तक पहुंच से भी प्रभावित होंगे। इसलिए महिला सम्मेलन जैसे कार्यक्रम राजनीतिक दृष्टि से अहम माने जा रहे हैं। भले ही विधानसभा चुनाव में अभी समय हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति पर काम तेज कर दिया है। भाजपा महिला मोर्चा का लखपति दीदी सम्मेलन इसी व्यापक तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है। संगठन विस्तार, महिला नेतृत्व को सक्रिय करना और लाभार्थी वर्ग से संवाद बढ़ानाकृइन तीनों बिंदुओं पर पार्टी विशेष ध्यान देती दिखाई दे रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि महिला सम्मेलन जैसे कार्यक्रम चुनावी राजनीति में कितना प्रभाव छोड़ते हैं और क्या इनका असर मतदान व्यवहार तक पहुंच पाता है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों पर राजनीतिक गतिविधियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं और महिला मतदाता एक बार फिर सभी दलों की रणनीति के केंद्र में हैं।

‘कांवड़ यात्रा’ आस्था की सबसे बड़ा ‘कारवां’

गंगाजल से भरी कांवड़ केवल जल का पात्र नहीं, बल्कि यह है भारत की सांस्कृतिक एकता लोकपरंपराओं, सेवा-भाव और देशभर के करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है कांवड़ यात्रा हरिद्वार से निकलने वाली यह यात्रा बन चुकी है देश को जोड़ने वाली जीवंत सांस्कृतिक धारा देहरादून। सावन का महीना शुरू होते ही उत्तराखंड की धरती पर एक अलग ही उत्साह दिखाई देने लगता है। हरिद्वार की हर की पैड़ी पर गूंजता हर-हर महादेव का जयघोष, गंगा तट पर उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़, कंधों पर सजी रंग-बिरंगी कांवड़ और हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा का संकल्पकृयह दृश्य केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का भी परिचायक है। कांवड़ यात्रा आज दुनिया की सबसे बड़ी वार्षिक धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। करोड़ों श्रद्धालु उत्तराखंड के हरिद्वार, गंगोत्री, ऋषिकेश और अन्य पवित्र स्थलों से गंगाजल लेकर अपने-अपने शिवालयों में जलाभिषेक करने निकलते हैं। लेकिन इस यात्रा का महत्व केवल भगवान शिव की पूजा तक सीमित नहीं है। यह यात्रा भारत की विविधता, सामाजिक समरसता, सेवा-भाव और लोकजीवन की ऐसी झांकी प्रस्तुत करती है, जिसे देखने दुनिया भर से लोग आते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले विष को भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। विष की ज्वाला शांत करने के लिए देवताओं ने पवित्र नदियों का जल भगवान शिव को अर्पित किया। इसी प्रसंग को कांवड़ यात्रा की मूल प्रेरणा माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, त्रेता युग में भगवान परशुराम ने गंगाजल लाकर शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। कई परंपराओं में यह भी माना जाता है कि रावण ने भी कांवड़ में जल भरकर भगवान शिव की आराधना की थी। समय के साथ यह धार्मिक परंपरा जनआस्था के विराट उत्सव में बदल गई। यदि कांवड़ यात्रा की आत्मा कहीं बसती है तो वह उत्तराखंड है। देवभूमि की गोद में बहने वाली मां गंगा का पवित्र जल ही इस यात्रा का केंद्र है। हरिद्वार की हर की पैड़ी, ऋषिकेश के घाट और गंगोत्री धाम से लाखों श्रद्धालु जल भरकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों की ओर निकल पड़ते हैं। सावन के दिनों में हरिद्वार केवल एक धार्मिक नगर नहीं रहता, बल्कि पूरे भारत का सांस्कृतिक संगम बन जाता है। यहां अलग-अलग भाषाएं सुनाई देती हैं, विभिन्न राज्यों की वेशभूषाएं दिखाई देती हैं और हर कदम पर भारत की विविधता का अनुभव होता है। कांवड़ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सांस्कृतिक विविधता है। राजस्थान के केसरिया साफे, पंजाब के ढोल, हरियाणा के अखाड़े, उत्तर प्रदेश की भजन मंडलियां, उत्तराखंड के ढोल-दमाऊं, बिहार की लोकधुनें और मध्य प्रदेश के पारंपरिक भजनकृसब एक ही यात्रा का हिस्सा बन जाते हैं। कई स्थानों पर कलाकार लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं। कहीं शिव तांडव की झांकी निकलती है तो कहीं भगवान शिव और माता पार्वती की झलकियां श्रद्धालुओं का स्वागत करती हैं। उत्तराखंड के लोकवाद्य ढोल-दमाऊं, रणसिंघा और पारंपरिक भजन यात्रा को स्थानीय सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं। यह दृश्य सचमुच एक भारत-श्रेष्ठ भारत की भावना को साकार करता है। कांवड़ यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष सेवा की परंपरा है। यात्रा मार्ग पर हजारों सेवा शिविर लगाए जाते हैं। इनमें श्रद्धालुओं को निःशुल्क भोजन, पानी, दवाइयां, प्राथमिक उपचार, विश्राम, मोबाइल चार्जिंग, दूध, फल और कई स्थानों पर रात्रि विश्राम तक की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है। इन शिविरों को धार्मिक संस्थाएं, सामाजिक संगठन, स्थानीय व्यापारी, स्वयंसेवी समूह और ग्रामीण मिलकर संचालित करते हैं। कई परिवार वर्षों से अपने निजी संसाधनों से सेवा शिविर लगाते आ रहे हैं। उनके लिए यह दान नहीं, बल्कि भगवान शिव की सेवा का माध्यम है। यही सेवा-भाव भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को जीवित रखता है जिसमें अतिथि, साधु और यात्री की सेवा को पुण्य माना गया है। कांवड़ यात्रा का एक बड़ा आर्थिक पक्ष भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। सावन के दौरान उत्तराखंड के हजारों छोटे व्यापारियों, होटल संचालकों, ढाबों, फल विक्रेताओं, फूल-माला विक्रेताओं, हस्तशिल्प कारोबारियों, परिवहन सेवाओं और स्थानीय दुकानदारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। रंग-बिरंगी कांवड़, भगवा वस्त्र, पूजा सामग्री, धार्मिक झंडे, ढोल, शिव प्रतिमाएं, प्रसाद और स्मृति चिह्नों का कारोबार कई गुना बढ़ जाता है। अस्थायी रोजगार के अवसर भी पैदा होते हैं। स्थानीय युवाओं को परिवहन, लाजिस्टिक्स, खानपान और अन्य सेवाओं में काम मिलता है।

2027 की राह में कांग्रेस की ‘अग्निपरीक्षा’

सत्ता विरोधी माहौल की उम्मीद, लेकिन संगठनात्मक मजबूती एकजुटता और जमीनी सक्रियता ही तय करेगी कांग्रेस की दिशा भाजपा के बूथ अभियान के बीच कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति धीरे-धीरे वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है। भाजपा जहां संगठन विस्तार, लाभार्थी संपर्क अभियान और विभिन्न सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस भी सत्ता में वापसी की रणनीति तैयार कर रही है। हालांकि पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा का मुकाबला करने से पहले अपने संगठन को पूरी तरह सक्रिय और एकजुट बनाए रखने की है। किसी भी चुनाव में केवल सरकार के खिलाफ माहौल पर्याप्त नहीं होता। विपक्ष को जनता के सामने विश्वसनीय विकल्प भी प्रस्तुत करना पड़ता है। उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने यही सबसे बड़ी परीक्षा है। प्रदेश कांग्रेस ने पिछले कुछ समय में जिला और ब्लाक स्तर पर संगठन को सक्रिय करने की कोशिशें तेज की हैं। विभिन्न मुद्दोंकृबेरोजगारी, महंगाई, भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकासकृको लेकर पार्टी लगातार सरकार पर सवाल उठा रही है। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इन मुद्दों को चुनावी लाभ में बदलने के लिए बूथ स्तर तक मजबूत संगठन और लगातार जनसंपर्क आवश्यक होगा। उत्तराखंड जैसे राज्य में स्थानीय कार्यकर्ताओं की सक्रियता चुनाव परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। उत्तराखंड कांग्रेस के सामने समय-समय पर नेतृत्व और समन्वय की चुनौतियां भी चर्चा में रही हैं। चुनाव नजदीक आते ही कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं बढ़ती हैं और टिकट की संभावनाओं को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं। यदि पार्टी नेतृत्व सभी वरिष्ठ नेताओं और युवा कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने में सफल रहता है, तो संगठन को मजबूती मिल सकती है। लेकिन यदि आंतरिक मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आते हैं, तो उसका राजनीतिक नुकसान भी हो सकता है। कांग्रेस की राजनीति फिलहाल जनसरोकारों के मुद्दों पर केंद्रित दिखाई दे रही है। इनमें प्रमुख रूप सेकृ बेरोजगारी और रोजगार के अवसर, पलायन और खाली होते गांव, शिक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सड़क, पेयजल और बुनियादी सुविधाएं, आपदा प्रबंधन और पुनर्वास हैं। पार्टी इन मुद्दों के माध्यम से सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। हालांकि चुनावी असर इस बात पर निर्भर करेगा कि यह मुद्दे मतदाताओं तक किस प्रभावी तरीके से पहुंचते हैं। दूसरी ओर भाजपा लगातार बूथ प्रबंधन, लाभार्थी संपर्क और सामाजिक वर्गों के बीच संगठन विस्तार पर जोर दे रही है। महिला, युवा, किसान और अनुसूचित वर्गों तक पहुंच बढ़ाने के लिए अलग-अलग मोर्चे सक्रिय किए जा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने केवल सरकार की आलोचना करने से आगे बढ़कर वैकल्पिक दृष्टि और स्पष्ट विकास एजेंडा प्रस्तुत करने की चुनौती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं और महिला मतदाताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। रोजगार, शिक्षा, स्वरोजगार, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे इन वर्गों के मतदान व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। यदि कांग्रेस इन वर्गों के बीच प्रभावी संवाद स्थापित कर पाती है, तो उसे राजनीतिक लाभ मिल सकता है। वहीं भाजपा भी इन्हीं वर्गों पर विशेष फोकस बनाए हुए है। उत्तराखंड में पलायन आज भी सबसे गंभीर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों में शामिल है। खाली होते गांव, खेती का संकट और सीमांत क्षेत्रों में घटती आबादी लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं। कांग्रेस इन मुद्दों को राजनीतिक बहस का केंद्र बनाने का प्रयास कर रही है। लेकिन मतदाता केवल समस्या नहीं, बल्कि उसके व्यावहारिक समाधान भी सुनना चाहेंगे। राजनीतिक दृष्टि से अभी चुनाव में समय है और आने वाले महीनों में परिस्थितियां बदल सकती हैं। संगठनात्मक बदलाव, स्थानीय समीकरण, राष्ट्रीय राजनीति, सरकार के फैसले और जनभावनाएं चुनावी तस्वीर को प्रभावित करेंगी। फिलहाल उत्तराखंड कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह अपने संगठन को पूरी तरह सक्रिय कर भाजपा के मुकाबले मजबूत विकल्प के रूप में उभर पाएगी, या फिर आंतरिक चुनौतियां उसकी चुनावी तैयारी को प्रभावित करेंगी। उत्तराखंड की राजनीति अब तैयारी के दौर में प्रवेश कर चुकी है। भाजपा सत्ता बरकरार रखने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस वापसी का अवसर तलाश रही है। लेकिन चुनावी सफलता केवल नारों या आरोप-प्रत्यारोप से तय नहीं होगी। जनता उस दल पर भरोसा करेगी जो मजबूत संगठन, स्पष्ट नेतृत्व, विश्वसनीय नीतियां और स्थानीय समस्याओं के व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करेगा। 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस अवसर को जनसमर्थन में बदल पाती है या नहीं।

कागजों पर ‘युद्धस्तर’ और जमीन पर ‘आफत’

हर साल मानसून में वही मातम, आखिर कब सीखेगा सिस्टम बारिश ने फिर खोली तैयारियों की पोल, पहाड़ों पर जिंदगी ठप आपदा के साथ अब राजनीतिक जवाबदेही भी है बड़ा सवाल देहरादून। उत्तराखंड में मानसून का मौसम हर साल आता है। पहाड़ों पर बादल हर वर्ष बरसते हैं। नदियां उफान पर आती हैं। भूस्खलन होता है। सड़कें टूटती हैं। गांवों का संपर्क कटता है। लोग घंटों नहीं, कई बार दिनों तक फंसे रहते हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि हर साल सरकारी बयान बदल जाते हैं, लेकिन तस्वीरें नहीं। इस बार भी वही हो रहा है। राज्य के कई जिलों में लगातार हो रही बारिश ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। पहाड़ दरक रहे हैं, सड़कें मलबे में दबी हैं, नदी-नाले खतरे के निशान के करीब बह रहे हैं और प्रशासन युद्धस्तर पर राहत कार्यों का दावा कर रहा है। लेकिन सवाल राहत कार्यों का नहीं, बल्कि उस तैयारी का है, जो हर मानसून से पहले की जानी चाहिए थी। उत्तराखंड में मानसून कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। मौसम विभाग हर वर्ष पहले से चेतावनी देता है। संवेदनशील स्थानों की सूची भी तैयार रहती है। फिर भी हर बार वही मार्ग बंद होते हैं, वही पुल क्षतिग्रस्त होते हैं और वही गांव अलग-थलग पड़ जाते हैं। आखिर क्यों? राज्य में आपदा प्रबंधन पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। जिला स्तर पर नियंत्रण कक्ष बनाए जाते हैं। मशीनें खरीदी जाती हैं। राहत दलों को प्रशिक्षित किया जाता है। समीक्षा बैठकें होती हैं। लेकिन पहली तेज बारिश के बाद ही पूरा तंत्र दबाव में दिखाई देता है। प्रश्न यह नहीं कि बारिश कितनी हुई। प्रश्न यह है कि जिन स्थानों को वर्षों से भूस्खलन संभावित क्षेत्र माना जाता है, वहां स्थायी समाधान क्यों नहीं हो पाया? जिन सड़कों पर हर मानसून में मलबा आता है, वहां वैज्ञानिक सुरक्षा उपाय कितने प्रभावी साबित हुए? यदि हर वर्ष एक जैसी समस्या सामने आती है, तो क्या उसे केवल प्राकृतिक आपदा कहकर टाला जा सकता है? उत्तराखंड पिछले कुछ वर्षों में तेजी से आधारभूत ढांचा विकसित करने वाले राज्यों में शामिल रहा है। सड़कें चौड़ी हुईं, सुरंगें बनीं, चारधाम संपर्क परियोजनाओं ने नई रफ्तार पकड़ी। इन परियोजनाओं का उद्देश्य बेहतर संपर्क और आर्थिक विकास है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय संतुलन और भू-वैज्ञानिक सुरक्षा पर लगातार चर्चा होती रही है। विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि हिमालय युवा पर्वतमाला है। यहां निर्माण कार्यों में अतिरिक्त सावधानी, प्रभावी जल निकासी, ढलानों का वैज्ञानिक उपचार और नियमित निगरानी आवश्यक है। यदि इन पहलुओं की अनदेखी होती है, तो भारी वर्षा के दौरान जोखिम बढ़ सकता है। यह बहस विकास के विरोध की नहीं, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ विकास की है। बारिश के दौरान सबसे अधिक परेशानी उस व्यक्ति को होती है जिसकी खबर शायद सबसे कम बनती है। दूरस्थ गांव की गर्भवती महिला, जिसे अस्पताल तक पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। वह छात्र, जिसकी परीक्षा सड़क बंद होने से छूट जाती है। वह किसान, जिसकी खेत की मेड़ बारिश में बह जाती है। वह टैक्सी चालक, जिसकी पूरी कमाई पर्यटन पर निर्भर है। वह दुकानदार, जिसका सामान सड़क बंद होने के कारण समय पर नहीं पहुंच पाता। सरकारी आंकड़ों में ये केवल प्रभावित लोग होते हैं, लेकिन पहाड़ की जिंदगी में यही असली संकट है। उत्तराखंड में वर्ष 2013 की विनाशकारी आपदा के बाद यह उम्मीद बनी थी कि राज्य आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक नई मिसाल बनेगा। कई सुधार भी हुए। एसडीआरएफ की क्षमता बढ़ी, संचार व्यवस्था बेहतर हुई, मौसम चेतावनी प्रणाली मजबूत हुई और राहत अभियानों में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा। फिर भी हर मानसून यह महसूस होता है कि सबसे कठिन चुनौती आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने की नहीं, बल्कि आपदा के प्रभाव को पहले से कम करने की है। यदि किसी सड़क पर लगातार पांच वर्षों से भूस्खलन हो रहा है, तो उसे केवल मशीन भेजकर खोल देना समाधान नहीं कहा जा सकता। यदि किसी गांव का संपर्क हर बरसात में टूटता है, तो वहां स्थायी सुरक्षा व्यवस्था विकसित करना ही वास्तविक तैयारी होगी। आज बदलते जलवायु पैटर्न के कारण कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे पर्वतीय राज्यों में जोखिम और बढ़ जाता है। ऐसे में पारंपरिक योजनाओं से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीक, भू-वैज्ञानिक अध्ययन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक योजना पर आधारित रणनीति की आवश्यकता है। सिर्फ राहत पैकेज घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता उस मॉडल की है जिसमें विकास, पर्यावरण और आपदा सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक बनें। क्या मानसून पूर्व तैयारियों का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए? क्या संवेदनशील मार्गों का वार्षिक सुरक्षा आडिट सार्वजनिक किया जाना चाहिए? क्या निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की व्यवस्था पर्याप्त है? क्या जिला स्तर पर स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन में अधिक भूमिका दी जानी चाहिए? क्या हर वर्ष दोहराई जाने वाली समस्याओं के लिए समयबद्ध स्थायी कार्ययोजना बनाई गई है? यह सवाल किसी एक सरकार या एक विभाग तक सीमित नहीं हैं। यह उत्तराखंड के भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं। इस समय प्राथमिकता लोगों की सुरक्षा, राहत और आवश्यक सेवाओं की बहाली है। राहत दल लगातार काम कर रहे हैं और कई स्थानों पर कठिन परिस्थितियों में जान जोखिम में डालकर मार्ग खोलने और लोगों तक सहायता पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका योगदान महत्वपूर्ण है। लेकिन जब बारिश थमेगी, मलबा हट जाएगा और सड़कें फिर खुल जाएंगी, तब असली परीक्षा शुरू होगी। क्या इस बार भी समीक्षा बैठकों के बाद फाइलें बंद हो जाएंगी? या फिर उन कारणों पर गंभीरता से काम होगा जो हर मानसून में उत्तराखंड को एक जैसी त्रासदी के सामने खड़ा कर देते हैं? क्योंकि पहाड़ की जनता अब केवल यह नहीं पूछ रही कि बारिश कितनी हुई। वह यह भी पूछ रही है कि तैयारी कितनी थी और शायद यही सवाल आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति, प्रशासन और विकास माडलकृतीनों की सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाला है।

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

‘हरदा’ ने छोड़ा अपना पोस्ट ‘अस्त्र’

हरीश रावत की एक पोस्ट से गरमाई राजनीति बहुगुणा परिवार पर छिड़ गई नई सियासी जंग इतिहास, विरासत और नेतृत्व पर बहस हुई तेज देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में सोशल मीडिया अब केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश, शक्ति प्रदर्शन और वैचारिक संघर्ष का सबसे बड़ा मंच बन चुका है। इसी कड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने राज्य की राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है। बहुगुणा परिवार का जिक्र करते हुए लिखी गई इस पोस्ट ने न केवल कांग्रेस के भीतर नई बहस को जन्म दिया है, बल्कि भाजपा को भी विपक्ष पर हमला करने का एक नया अवसर दे दिया है। राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर चुनाव से ठीक पहले ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरों में शामिल हरीश रावत को सार्वजनिक मंच पर ऐसी टिप्पणी करनी पड़ी, जिसकी गूंज पूरे प्रदेश में सुनाई देने लगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक सोशल मीडिया पोस्ट का नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, विरासत और राजनीतिक वर्चस्व की उस खींचतान का संकेत है, जो समय-समय पर सामने आती रही है। उत्तराखंड बनने के बाद से बहुगुणा परिवार का राज्य की राजनीति में विशेष प्रभाव रहा है। दूसरी ओर हरीश रावत भी कांग्रेस के सबसे बड़े जनाधार वाले नेताओं में गिने जाते हैं। ऐसे में जब दोनों राजनीतिक धाराएं किसी मुद्दे पर आमने-सामने दिखाई देती हैं तो उसका असर केवल पार्टी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति पर पड़ता है। सूत्रों की मानें तो हरीश रावत की पोस्ट को कांग्रेस के भीतर अलग-अलग नजरिये से देखा जा रहा है। एक वर्ग इसे पार्टी के भीतर वैचारिक स्पष्टता की कोशिश बता रहा है, जबकि दूसरा इसे अनावश्यक विवाद मान रहा है। हालांकि किसी नेता ने खुलकर सार्वजनिक प्रतिक्रिया देने से फिलहाल परहेज किया है, लेकिन अंदरखाने चर्चाओं का दौर तेज बताया जा रहा है। उधर भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की आंतरिक कलह का नया प्रमाण बताते हुए हमला तेज कर दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस आज भी अपने अतीत के विवादों से बाहर नहीं निकल पाई है और पार्टी के वरिष्ठ नेता ही एक-दूसरे की राजनीतिक विरासत पर सवाल खड़े कर रहे हैं। भाजपा इस मुद्दे को 2027 के विधानसभा चुनाव तक जीवित रखने की रणनीति पर काम कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड की राजनीति में व्यक्तित्व आधारित नेतृत्व हमेशा प्रभावी रहा है। ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता की सार्वजनिक टिप्पणी का असर कार्यकर्ताओं के मनोबल और संगठनात्मक एकजुटता पर भी पड़ता है। यदि यह विवाद लंबा खिंचता है तो कांग्रेस को चुनावी तैयारियों के बीच अनावश्यक राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब राज्य में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे गति पकड़ रही हैं। भाजपा लगातार संगठन विस्तार और बूथ प्रबंधन पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटी है। ऐसे समय पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार का सार्वजनिक मतभेद विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर बन सकता है। सोशल मीडिया ने इस विवाद को और हवा दे दी है। समर्थक और विरोधी अपने-अपने तर्कों के साथ पोस्ट साझा कर रहे हैं। पुराने राजनीतिक घटनाक्रम, ऐतिहासिक फैसले और नेताओं के पुराने बयान फिर से चर्चा में आ गए हैं। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा केवल एक पोस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है। कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह इस विवाद को व्यक्तिगत मतभेद बनने से रोके और संगठनात्मक एकता का संदेश दे। यदि पार्टी समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं करती है तो विरोधी दल इसे कांग्रेस की कमजोरी के प्रतीक के रूप में पेश करने की कोशिश करेंगे। उत्तराखंड की राजनीति में यह पहला अवसर नहीं है जब किसी सोशल मीडिया पोस्ट ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा किया हो। पिछले कुछ वर्षों में कई बार नेताओं की डिजिटल टिप्पणियां अखबारों की सुर्खियां और टीवी की बहस बन चुकी हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आज राजनीतिक लड़ाई केवल जनसभाओं में नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़ी जा रही है। फिलहाल इतना तय है कि हरीश रावत की इस पोस्ट ने उत्तराखंड की राजनीति में नया विमर्श छेड़ दिया है। आने वाले दिनों में बहुगुणा परिवार की प्रतिक्रिया, कांग्रेस नेतृत्व का रुख और भाजपा की आक्रामक रणनीति इस विवाद की दिशा तय करेगी। 2027 के चुनावी रण से पहले यह सियासी टकराव केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत, नेतृत्व और जनधारणा की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है।

‘न चिट्ठी आयी तेरी, न रैबार...’

अब मोबाइल आया और वह रैबार खो गया कभी एक संदेश जोड़ देता था पूरे गांव को व्हाट्सऐप मैसेज से रिश्तों की गर्माहट गुम देहरादून। गढ़वाली गीत ‘न चिट्ठी आयी तेरी, न रैबार...’ यह एक लोकगीत की पंक्ति भर नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों की सदियों पुरानी पीड़ा, प्रतीक्षा और अपनत्व का जीवंत दस्तावेज है। इस एक पंक्ति में उस मां की बेचौनी छिपी है, जो परदेस गए बेटे की राह तकती थी, उस पत्नी की आंखों का इंतजार है, जिसका पति फौज की सीमा पर तैनात था और उस पूरे गांव की धड़कन है, जो किसी राहगीर के मुंह से अपने लोगों का हाल सुनने के लिए उत्सुक रहता था। पहाड़ में रैबार केवल संदेश नहीं होता था, वह रिश्तों की सांस था। किसी के हाथ में आई चिट्ठी सिर्फ एक परिवार की नहीं होती थी, उसे पढ़ने और सुनने में पूरा गांव शामिल होता था। जब कोई देहरादून, दिल्ली, मुंबई या लखनऊ से लौटता था, तो लोग सबसे पहले पूछते थेकृहमारे लिए क्या संदेश लाए हो? उस समय न मोबाइल था, न इंटरनेट और न ही हर गांव तक डाक की नियमित सुविधा। लेकिन रिश्ते इतने मजबूत थे कि कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था। कोई किसी की बेटी का संदेश लाता, कोई फौज में तैनात जवान का हाल सुनाता, तो कोई शहर में नौकरी कर रहे बेटे की कुशलक्षेम बताता। वह रैबार केवल शब्द नहीं होता था, उसमें घर की खुशबू, गांव की मिट्टी और अपनों की धड़कन समाई होती थी। आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। हर हाथ में स्मार्टफोन है। एक बटन दबाते ही वीडियो काल हो जाती है। दुनिया सिमटकर हथेली में आ गई है, लेकिन विडंबना यह है कि रिश्तों के बीच की दूरी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। पहले एक चिट्ठी आने पर पूरा गांव खुश हो जाता था, आज दिनभर सैकड़ों संदेश आते हैं, लेकिन उनमें वह अपनापन नहीं मिलता जो किसी रैबार में हुआ करता था। पहाड़ की संस्कृति में रैबार केवल संचार का माध्यम नहीं था, बल्कि सामाजिक एकता की मजबूत कड़ी था। गांव का हर व्यक्ति दूसरे के सुख-दुख का सहभागी होता था। यदि किसी घर में शहर से चिट्ठी आती, तो पढ़ा-लिखा युवक उसे सबके सामने पढ़कर सुनाता। अगर किसी परिवार में खुशी की खबर होती, तो वह पूरे गांव की खुशी बन जाती और यदि कोई दुखद समाचार आता, तो पूरा गांव उस परिवार के साथ खड़ा दिखाई देता। यही पहाड़ की असली ताकत थीकृसाझेदारी, संवेदना और सामूहिक जीवन। लेकिन विकास और पलायन ने इस व्यवस्था को गहराई से बदल दिया। रोजगार की तलाश में लाखों युवा पहाड़ छोड़कर महानगरों की ओर चले गए। जिन गांवों में कभी रैबार पहुंचाने वाले कदमों की आहट सुनाई देती थी, वहां आज ताले लटके हैं। सूने आंगन, बंद घर और वीरान खेत मानो पूछ रहे होंकृअब किसके लिए आएगा रैबार? सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि नई पीढ़ी रैबार शब्द का अर्थ तो जानती है, लेकिन उसकी आत्मा से परिचित नहीं है। उनके लिए संदेश का मतलब मोबाइल नोटिफिकेशन है, जबकि पुरानी पीढ़ी जानती है कि कभी एक रैबार के लिए महीनों तक इंतजार किया जाता था। उस इंतजार में बेचौनी थी, लेकिन विश्वास भी था कि कोई न कोई अपने गांव लौटेगा और अपनों का हाल जरूर सुनाएगा। आज भी उत्तराखंड के लोकगीतों में रैबार जीवित है। लोकगायक जब मंच पर रैबार का जिक्र करते हैं, तो बुजुर्गों की आंखें नम हो जाती हैं। क्योंकि उन्हें याद आ जाता है वह दौर, जब रिश्ते नेटवर्क से नहीं, भरोसे से चलते थे, जब संदेश मोबाइल टावर नहीं, इंसान लेकर चलता था और जब पहाड़ की असली पहचान उसकी सामुदायिक संस्कृति थी। तकनीक का विरोध नहीं किया जा सकता और न ही करना चाहिए। समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में यदि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत खो दें, तो विकास अधूरा रह जाता है। उत्तराखंड को केवल सड़कें, सुरंगें और इंटरनेट ही नहीं चाहिए, बल्कि वह सामाजिक ताना-बाना भी चाहिए जिसने सदियों तक कठिन पहाड़ी जीवन को आसान बनाया। आज जरूरत इस बात की है कि रैबार को केवल लोकगीतों तक सीमित न रहने दिया जाए। स्कूलों में स्थानीय संस्कृति पढ़ाई जाए, गांवों के सांस्कृतिक मेलों में रैबार की परंपरा को जीवित रखा जाए और नई पीढ़ी को बताया जाए कि पहाड़ की असली पहचान उसकी बोली, उसके लोकगीत और उसके रिश्तों की गर्माहट है। शायद अब कोई राहगीर हाथ में चिट्ठी लेकर गांव न पहुंचे, शायद डाकिए की घंटी पहले जैसी उत्सुकता न जगाए, लेकिन यदि हम एक-दूसरे का हाल पूछना नहीं छोड़ेंगे, गांव से अपना रिश्ता नहीं तोड़ेंगे और अपने बुजुर्गों की आवाज सुनते रहेंगे, तो रैबार कभी खत्म नहीं होगा। क्योंकि रैबार कागज पर लिखे कुछ शब्द नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा है। जिस दिन यह आत्मा खो गई, उस दिन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान का एक अमूल्य अध्याय भी इतिहास बन जाएगा।

‘फुल सिस्टम क्रैश’

जब दूनघाटी में बच्चे स्कूल पहुंचे तब जागा प्रशासन बारिश में राजधानी बेहाल, डीएम का अवकाश आदेश देर से आया भीगते रहे छात्र-छात्राएं व मासूम नौनिहाल, जाम में फंसे अभिभावक सड़कें बनीं दरिया, स्कूल पहुंचे बच्चों को फिर लौटना पड़ा अपने घर सवालकृजब आसमान रात से बरस रहा था तो फैसला सुबह देर से क्यों देहरादून। राजधानी में मूसलाधार बारिश ने केवल सड़कों को ही नहीं डुबोया, बल्कि प्रशासन की आपदा प्रबंधन व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए। सुबह से तेज बारिश के बीच हजारों बच्चे रोज की तरह स्कूल के लिए निकल पड़े। कई स्कूलों में प्रार्थना सभा भी हो गई, कक्षाएं शुरू हो गईं और तभी जिला प्रशासन की ओर से स्कूलों में अवकाश का आदेश जारी हुआ। नतीजा यह हुआ कि जिन बच्चों को सुरक्षित घरों में होना चाहिए था, वह बारिश, जलभराव और ट्रैफिक जाम के बीच फंस गए। राजधानी की कई प्रमुख सड़कें कुछ ही घंटों में नदी का रूप ले चुकी थीं। नालों का पानी सड़कों पर बह रहा था। वाहन रेंग रहे थे और जगह-जगह लंबा जाम लगा था। सबसे अधिक परेशानी उन अभिभावकों को हुई, जिन्होंने अपने बच्चों को स्कूल छोड़ दिया था। अवकाश की सूचना मिलते ही उन्हें दोबारा स्कूलों की ओर दौड़ लगानी पड़ी। कई परिवार घंटों तक जाम में फंसे रहे, जबकि छोटे-छोटे बच्चे भीगते हुए स्कूल से घर लौटे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मौसम विभाग लगातार भारी बारिश की चेतावनी जारी कर रहा था और रात से ही राजधानी में तेज बारिश हो रही थी, तब अवकाश का निर्णय समय रहते क्यों नहीं लिया गया? यदि सुबह स्कूल खुलने से पहले आदेश जारी हो जाता, तो हजारों बच्चों और अभिभावकों को इस परेशानी से बचाया जा सकता था। यह पहला अवसर नहीं है जब देहरादून में बारिश के दौरान प्रशासनिक निर्णयों के समय को लेकर सवाल उठे हों। हर मानसून में राजधानी की वही तस्वीर सामने आती हैकृजलभराव, बंद नालियां, घंटों लंबा ट्रैफिक जाम और फिर आपात बैठकें। फर्क सिर्फ इतना है कि हर साल दावे नए होते हैं और समस्याएं पुरानी। अभिभावकों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भारी नाराजगी देखी गई। उनका कहना था कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा फैसला सबसे पहले होना चाहिए। यदि प्रशासन मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रख रहा था, तो स्कूल खुलने से पहले ही स्पष्ट आदेश जारी किया जाना चाहिए था। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने सवाल उठाए कि आखिर निर्णय लेने में इतनी देरी क्यों हुई। राजधानी की सड़कों की हालत ने भी नगर निकायों और संबंधित विभागों की तैयारियों की पोल खोल दी। जहां-जहां कुछ देर की बारिश में सड़कें तालाब बन गईं, वहां वर्षों से चल रहे ड्रेनेज सुधार और जल निकासी के दावों पर सवाल खड़े हो गए। लोगों का कहना है कि हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई और जलभराव रोकने की योजनाओं की बात होती है, लेकिन पहली तेज बारिश ही पूरी व्यवस्था की वास्तविकता सामने ला देती है। अभिभावकों का कहना है कि मौसम आधारित निर्णयों के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध प्रोटोकाल होना चाहिए। यदि भारी बारिश की संभावना हो, तो स्कूलों में अवकाश या समय परिवर्तन का निर्णय सुबह बच्चों के घरों से निकलने से पहले लिया जाना चाहिए। इससे भ्रम की स्थिति भी नहीं बनेगी और अनावश्यक जोखिम भी टाला जा सकेगा। राजधानी में आज जो हुआ, उसने एक बार फिर यह याद दिलाया कि आपदा केवल प्राकृतिक नहीं होती, कई बार निर्णय लेने में हुई देरी भी संकट को बढ़ा देती है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बारिश कितनी हुई, बल्कि यह भी है कि प्रशासन ने समय पर फैसला क्यों नहीं लिया? देहरादून की सड़कों पर बहता पानी कुछ घंटों में उतर जाएगा, ट्रैफिक भी सामान्य हो जाएगा, लेकिन उन अभिभावकों के मन में उठे सवाल आसानी से नहीं मिटेंगे, जिन्होंने अपने बच्चों को सुरक्षित स्कूल भेजा था और कुछ ही देर बाद उन्हें बाढ़ जैसे हालात में वापस लाना पड़ा। मानसून हर साल आएगा, लेकिन क्या हर साल फैसले भी इतने ही देर से आएंगेकृयही सबसे बड़ा सवाल है।

राष्ट्रवाद की ‘नई पिच’ पर भाजपा

भाजपा का स्वतंत्रता दिवस से पहले गांव-गांव पहुंचेगा अभियान देशभक्ति के संदेश के साथ भाजपा की संगठन विस्तार की रणनीति भाजपा बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की है तैयारी में देहरादून। स्वतंत्रता दिवस से पहले भाजपा उत्तराखंड में एक बार फिर हर घर तिरंगा अभियान को व्यापक जनअभियान का स्वरूप देने जा रही है। पार्टी का दावा है कि इस अभियान का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक में राष्ट्रभक्ति की भावना को मजबूत करना और आजादी के अमृतकाल के संकल्पों को जन-जन तक पहुंचाना है। वहीं, राजनीतिक जानकार इसे केवल राष्ट्रीय अभियान नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने की भाजपा की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, राज्य के सभी जिलों, मंडलों और बूथों पर कार्यकर्ताओं को अभियान की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। घर-घर तिरंगा पहुंचाने के साथ-साथ तिरंगे के सम्मान, स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों और भारत की उपलब्धियों पर जनसंपर्क कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी वार्डों तक प्रभात फेरियां, तिरंगा यात्राएं और युवा सम्मेलन आयोजित करने की भी तैयारी है। भाजपा नेताओं का कहना है कि तिरंगा किसी दल का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की पहचान है। इसलिए अभियान को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि प्रत्येक नागरिक को अपने घर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए प्रेरित करना ही इसका मूल उद्देश्य है। हालांकि विपक्ष इस अभियान को अलग नजरिये से देख रहा है। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रवाद को चुनावी राजनीति से जोड़ने का प्रयास करती रही है। उनका कहना है कि देशभक्ति किसी अभियान की मोहताज नहीं होती, बल्कि सरकार को महंगाई, बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों पर भी समान गंभीरता से काम करना चाहिए। उत्तराखंड जैसे सैन्य परंपरा वाले राज्य में हर घर तिरंगा अभियान का विशेष महत्व माना जा रहा है। राज्य के हजारों परिवारों का सेना से सीधा जुड़ाव रहा है और सीमाओं की रक्षा में उत्तराखंड के सैनिकों का योगदान देशभर में सम्मान के साथ याद किया जाता है। ऐसे में भाजपा इस अभियान के माध्यम से पूर्व सैनिकों, युवाओं और छात्रों को भी जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा लंबे समय से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय गौरव के मुद्दों को अपनी राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा बनाती रही है। अयोध्या में राम मंदिर, अनुच्छेद 370, समान नागरिक संहिता और राष्ट्रीय पर्वों से जुड़े अभियानों के बाद अब हर घर तिरंगा भी उसी व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। उत्तराखंड में जहां अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं, वहां इस तरह के जनसंपर्क अभियान संगठन को कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय बनाए रखने में भी मदद करेंगे। भाजपा के लिए यह अभियान केवल ध्वजारोहण तक सीमित नहीं है। इसके जरिए पार्टी बूथ स्तर पर अपनी सक्रियता बढ़ाने, नए स्वयंसेवकों को जोड़ने और राष्ट्रीय मुद्दों के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंच बनाने का प्रयास करेगी। दूसरी ओर विपक्ष की चुनौती यह होगी कि वह इस अभियान का विरोध किए बिना अपनी राजनीतिक बात जनता तक कैसे पहुंचाए। स्पष्ट है कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर शुरू होने वाला हर घर तिरंगा अभियान इस बार केवल राष्ट्रीय उत्सव नहीं रहेगा, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति में भी इसकी गूंज सुनाई देगी। जहां भाजपा इसे राष्ट्रभक्ति का महाअभियान बता रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा मान रहा है। अंतिम फैसला हमेशा की तरह जनता को ही करना है कि वह इसे राष्ट्रीय भावना का उत्सव मानती है या चुनावी माहौल में राजनीतिक संदेश का विस्तार।

सोमवार, 27 जुलाई 2026

उत्तराखंड में पेपर लीक पर ‘क्लेश’

दिल्ली में धर्मेंद्र प्रधान गए, अब क्या उत्तराखंड में धन सिंह रावत की बारी तकनीकी विवि कांड के बाद सड़क पर विपक्ष, मंत्री की कुर्सी पर खतरा पेपर लीक से गरमाई राजनीति, उत्तराखंड में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग देहरादून। देशभर में पेपर लीक के खिलाफ उठी युवा आवाज अब उत्तराखंड की राजनीति के केंद्र में पहुंच गई है। केंद्र में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब उत्तराखंड के उच्च शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री डा. धन सिंह रावत के इस्तीफे की मांग भी तेज हो गई है। हाल में वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय की परीक्षा के कथित पेपर लीक मामले में गिरफ्तारी और उसके बाद विपक्ष के विरोध प्रदर्शन ने राज्य की राजनीति को नया मुद्दा दे दिया है। कांग्रेस ने मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने की मांग की है। यह मुद्दा केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रह गया है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग भर्ती घोटाला, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप और अब विश्वविद्यालय स्तर पर पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं के बीच यह धारणा मजबूत की है कि मेहनत के बावजूद परीक्षा प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर उभरे परीक्षा सुधार आंदोलन की गूंज अब उत्तराखंड में भी सुनाई दे रही है।दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्र असंतोष अब राज्यों की राजनीति को भी प्रभावित कर रहा है। हाल के घटनाक्रमों में परीक्षा सुधार, जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग ने सरकारों पर दबाव बढ़ाया है। इसी व्यापक माहौल में उत्तराखंड में भी शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा सुरक्षा पर सवाल तेज हुए हैं। देहरादून में विपक्ष ने पेपर लीक प्रकरण को लेकर मार्च निकाला और तकनीकी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई। विपक्ष का तर्क है कि जब परीक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक सामने आई है, तब राजनीतिक जवाबदेही तय होनी चाहिए। दूसरी ओर सरकार का पक्ष यह हो सकता है कि मामले में जांच चल रही है, गिरफ्तारियां हुई हैं और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, इसलिए जांच पूरी होने से पहले निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। यह विवाद केवल एक मंत्री तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं और युवाओं से जुड़े मुद्दे चुनावी विमर्श का केंद्र बनते जा रहे हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में देरी और पेपर लीक जैसे विषय विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दे रहे हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि आज का युवा केवल सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं है। सीधे जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई की मांग कर रही है। यही दबाव राष्ट्रीय राजनीति में दिखाई दिया और अब उसका असर राज्यों में भी महसूस किया जा रहा है। उत्तराखंड में भी छात्र संगठनों और विपक्ष ने इसी भावना को राजनीतिक मुद्दे में बदलने की कोशिश शुरू कर दी है। राज्य सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। पहली, दोषियों के खिलाफ त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई कर यह संदेश देना कि परीक्षा प्रणाली से समझौता नहीं होगा। दूसरी, युवाओं का भरोसा फिर से जीतना। केवल गिरफ्तारी या जांच की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही पर ठोस सुधार दिखाई देने होंगे। फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति में यह बहस तेज है कि क्या नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए या जांच पूरी होने तक इंतजार किया जाना चाहिए। इतना तय है कि पेपर लीक अब केवल कानून-व्यवस्था या शिक्षा विभाग का मुद्दा नहीं रहा। यह युवाओं के विश्वास, रोजगार और आने वाले चुनावों का बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन चुका है। युवाओं का असंतोष लगातार बढ़ता है और परीक्षा सुधार की मांग राज्य की सड़कों से चुनावी मंचों तक पहुंचती है, तो उत्तराखंड की 2027 की राजनीति में यह मुद्दा रोजगार के साथ सबसे प्रभावी चुनावी एजेंडा बन सकता है।

सदियों से ‘जैविक’ है पहाड़ की खेती

अब दुनिया सीख रही है पहाड़ का माडल रसायनों से दूर रही पहाड़ के गांवों में कृषि मंडुवा-झंगोरा, राजमा और गहत सुपरफूड देहरादून। जब पूरी दुनिया रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों से जूझ रही है और आर्गेनिक खाद्य पदार्थों की मांग लगातार बढ़ रही है, तब उत्तराखंड के पहाड़ों की ओर दुनिया की नजरें फिर से उठने लगी हैं। कारण साफ हैकृयहां की खेती किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा से जैविक रही है, जिस खेती को आज आधुनिक दुनिया आर्गेनिक फार्मिंग कहकर करोड़ों रुपये के कारोबार में बदल रही है, वह पहाड़ के किसानों की जीवनशैली का हिस्सा रही है। पहाड़ के गांवों में वर्षों तक खेतों में न तो रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग हुआ और न ही कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल। गोबर की खाद, पत्तियों से बनी जैविक खाद, पशुपालन और मिश्रित खेती ने यहां की कृषि को स्वाभाविक रूप से जैविक बनाए रखा। यही कारण है कि पहाड़ का मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, चौलाई, राजमा और लाल चावल आज देश ही नहीं, विदेशों में भी सुपरफूड के रूप में पहचान बना रहे हैं। विडंबना यह है कि जिस किसान ने सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर खेती की, वही आज सबसे अधिक आर्थिक संकट से जूझ रहा है। गांव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर पड़ रहे हैं और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जैविक खेती की पहचान तो बनी, लेकिन उसका आर्थिक लाभ किसान तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। पहाड़ की कृषि केवल अन्न उत्पादन नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का भी माडल है। यहां की सीढ़ीनुमा खेती मिट्टी के कटाव को रोकती है। जंगल, जलस्रोत और खेती एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। यही कारण है कि उत्तराखंड की पारंपरिक कृषि जलवायु परिवर्तन के दौर में भी टिकाऊ खेती का उदाहरण मानी जाती है। आज दुनिया मिलेट्स श्री अन्न को भविष्य का भोजन बता रही है। संयुक्त राष्ट्र ने भी मोटे अनाजों के महत्व को स्वीकार किया है। लेकिन उत्तराखंड का किसान सदियों से मंडुवा और झंगोरा खाता और उगाता आया है, जो भोजन कभी गरीबी की पहचान समझा जाता था, वही अब बड़े शहरों के सुपरमार्केट और पांच सितारा होटलों में ऊंचे दामों पर बिक रहा है। उत्तराखंड की जैविक खेती को वैज्ञानिक तकनीक, बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ा जाए तो यह राज्य की अर्थव्यवस्था की नई रीढ़ बन सकती है। स्थानीय उत्पादों को भौगोलिक पहचान, ई-कामर्स और निर्यात बाजार से जोड़कर किसानों की आय में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। छोटे जोत, जंगली जानवरों का बढ़ता आतंक, सिंचाई की कमी, परिवहन की दिक्कत और विपणन व्यवस्था की कमजोरी किसानों का मनोबल तोड़ रही है। कई गांवों में खेत इसलिए खाली हैं क्योंकि खेती लाभ का सौदा नहीं रह गई है। राज्य सरकार समय-समय पर जैविक खेती को बढ़ावा देने की योजनाएं चलाती रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल उत्पादन बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। असली जरूरत किसान को बाजार, उचित मूल्य और ब्रांड पहचान दिलाने की है। यदि पहाड़ के उत्पाद सीधे उपभोक्ता तक पहुंचें तो किसान की आय कई गुना बढ़ सकती है। उत्तराखंड में पर्यटन और कृषि का मेल भी नई संभावनाएं पैदा कर सकता है। एग्री-टूरिज्म, होमस्टे के साथ स्थानीय भोजन, जैविक उत्पादों की बिक्री और पारंपरिक खेती का अनुभव पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है। इससे गांवों में रोजगार भी बढ़ेगा और पलायन पर भी कुछ हद तक रोक लग सकती है। आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पहाड़ में जैविक खेती होती है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम उस किसान को पहचान और सम्मान दे पा रहे हैं, जिसने बिना किसी प्रमाणपत्र के सदियों से धरती, पानी और पर्यावरण की रक्षा करते हुए प्राकृतिक खेती को जीवित रखा है। उत्तराखंड की पहचान केवल देवभूमि या पर्यटन तक सीमित नहीं है। इसकी असली ताकत इसकी पारंपरिक जैविक कृषि है। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और बाजार मिलकर इस विरासत को आधुनिक अर्थव्यवस्था से जोड़ दें, तो उत्तराखंड न केवल देश का अग्रणी जैविक राज्य बन सकता है, बल्कि पलायन जैसी गंभीर समस्या का स्थायी समाधान भी खोज सकता है। पहाड़ की खेती को दया नहीं, सही दाम, मजबूत बाजार और वैश्विक पहचान की जरूरत है। यही उत्तराखंड के ग्रामीण भविष्य की सबसे मजबूत नींव साबित हो सकती है।

अब ‘ई-20’ जनता पार्टी

देश में जन्म ले रहा है युवाओं का नया राजनीतिक आंदोलन डेढ़ लाख फालोअर्स के दावे ने बढ़ा दी है सियासी हलचल बेरोजगारी और पेपर लीक के मुद्दे के बाद अब नई गोलबंदी देहरादून। देश की राजनीति में पिछले कुछ महीनों से युवाओं के गुस्से ने जिस तरह नए-नए रूप धारण किए हैं, उसने पारंपरिक राजनीतिक दलों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। पहले सोशल मीडिया पर काकरोच आंदोलन ने सत्ता और विपक्ष दोनों का ध्यान अपनी ओर खींचा। अब उसी सिलसिले में ई-20 जनता पार्टी नाम से चल रहा एक नया डिजिटल अभियान तेजी से चर्चा के केंद्र में है। बेहद कम समय में करीब डेढ़ लाख फालोअर्स जुटाने के दावे और बड़े आंदोलन की तैयारियों की चर्चाओं ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। हालांकि इस मंच का वास्तविक संगठनात्मक ढांचा, सदस्य संख्या और राजनीतिक भविष्य अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना तय है कि सोशल मीडिया की ताकत ने इसे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया है। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताएं, पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर चलाया जा रहा यह अभियान आने वाले दिनों में सियासी समीकरण बदलने की क्षमता रखता है या नहीं, इस पर सभी दलों की नजर टिकी हुई है। देश में पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं के रद्द होने, पेपर लीक के आरोपों और नौकरियों में देरी जैसे मुद्दों ने लाखों युवाओं को प्रभावित किया है। कई राज्यों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए और सोशल मीडिया के जरिए अपनी आवाज राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाई। कहते है कि जब पारंपरिक राजनीतिक दल किसी वर्ग की अपेक्षाओं को समय पर संबोधित नहीं कर पाते, तब ऐसे डिजिटल अभियान तेजी से लोकप्रिय होने लगते हैं। ई-20 जनता पार्टी की बढ़ती चर्चा को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। पहले आंदोलनों को गांव-गांव और शहर-शहर तक पहुंचने में महीनों लग जाते थे। अब एक वायरल वीडियो, एक प्रभावी नारा और कुछ घंटों की डिजिटल सक्रियता लाखों लोगों तक संदेश पहुंचा देती है। ई-20 जनता पार्टी के नाम से चल रहे अभियान ने भी यही रणनीति अपनाई है। छोटे-छोटे वीडियो, युवाओं की समस्याओं पर केंद्रित पोस्ट, लाइव चर्चा और लगातार डिजिटल संवाद के जरिए समर्थकों का दायरा बढ़ाने की कोशिश हो रही है। यही कारण है कि कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोग इस मंच से जुड़ने का दावा किया जा रहा है। काकरोच आंदोलन ने यह साबित किया कि प्रतीकात्मक विरोध भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन सकता है। एक अलग प्रतीक, आक्रामक नारे और सोशल मीडिया की तेज रणनीति ने उसे चर्चा के केंद्र में ला दिया। अब ई-20 जनता पार्टी उसी डिजिटल ऊर्जा को एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में बदलने का प्रयास करती दिखाई दे रही है। यदि यह अभियान केवल सोशल मीडिया तक सीमित न रहकर राज्यों में संगठन खड़ा करता है, तो इसकी राजनीतिक प्रासंगिकता बढ़ सकती है। अकेले उत्तराखंड लंबे समय से भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा है। राज्य के हजारों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता का मुद्दा लगातार उठता रहा है। सत्ता पक्ष के लिए युवाओं की नाराजगी को कम करना उतना ही जरूरी है, जितना विपक्ष के लिए उस असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलना। यदि युवाओं का बड़ा वर्ग किसी स्वतंत्र मंच के साथ खड़ा होता है, तो पारंपरिक दलों के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है। यही कारण है कि छात्र आंदोलनों और सोशल मीडिया अभियानों पर अब राष्ट्रीय दल भी लगातार नजर बनाए हुए हैं। फिलहाल इस सवाल का कोई स्पष्ट उत्तर उपलब्ध नहीं है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि यह पहल एक औपचारिक राजनीतिक दल का रूप ले रही है, किसी संगठन का अभियान है या केवल एक डिजिटल जन-अभियान है। चुनाव लड़ने, संगठन विस्तार या नेतृत्व संरचना को लेकर भी अभी स्पष्ट और आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। फिर भी, भारतीय राजनीति में कई ऐसे उदाहरण रहे हैं जहां सामाजिक या जन आंदोलनों ने बाद में राजनीतिक स्वरूप ग्रहण किया। इसलिए इस पहल के भविष्य को लेकर अटकलें स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारतीय राजनीति अब केवल रैलियों और जनसभाओं तक सीमित नहीं रही। इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म जनमत निर्माण के महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। युवा वर्ग की भागीदारी बढ़ने के साथ डिजिटल अभियानों का प्रभाव भी बढ़ा है। ऐसे माहौल में कोई भी अभियान यदि युवाओं की वास्तविक समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाता है, तो वह कम समय में बड़ी पहचान बना सकता है। हालांकि, डिजिटल लोकप्रियता और स्थायी जनाधार एक ही बात नहीं हैं। किसी भी मंच की वास्तविक ताकत का आकलन उसके जमीनी संगठन, नेतृत्व और दीर्घकालिक सक्रियता से ही होगा। काकरोच आंदोलन के बाद ई-20 जनता पार्टी की चर्चा इस बात का संकेत है कि देश का युवा वर्ग अपनी बात कहने के लिए नए मंच तलाश रहा है। यह मंच भविष्य में कितना प्रभावी होगा, इसका आकलन अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तय है कि रोजगार, शिक्षा और पारदर्शिता जैसे मुद्दे अब केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ चुके हैं। जो भी दल इन सवालों का विश्वसनीय समाधान प्रस्तुत करेगा, वही आने वाले वर्षों में युवाओं का अधिक भरोसा जीतने की स्थिति में होगा।

‘बवाल’ बढ़ा तो बदल गए ‘सुर’

चौतरफा घिरे बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने मांगी माफी, इस्तीफे की मांग पर अड़े थे युवा सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक घमासान के बाद बैकफुट पर संगठन, कप्तानी पर संकट भाजपा प्रदेश अध्यक्षकृश्यदि मेरी बात से किसी की भावना आहत हुई है तो मुझे खेद: महेंद्र देहरादून। उत्तराखंड भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को आखिरकार अपने विवादित बयान पर सफाई देते हुए युवाओं से माफी मांगनी पड़ी। पिछले कुछ दिनों युवाओं को लेकर दिए बयान को लेकर प्रदेश की राजनीति में जबरदस्त हलचल मची हुई थी। सोशल मीडिया पर लगातार विरोध, छात्र-युवा संगठनों की नाराजगी और विपक्ष के हमलों के बीच मामला इतना बढ़ गया कि कई स्थानों पर उनके इस्तीफे की मांग भी उठने लगी। राजनीतिक दबाव बढ़ने के बाद महेंद्र भट्ट ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यदि उनके बयान से किसी भी युवा या किसी वर्ग की भावनाएं आहत हुई हैं तो उन्हें इसका खेद है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं था और उनके बयान को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। हालांकि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की इस सफाई के बाद भी राजनीतिक बहस थमी नहीं है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह माफी स्वेच्छा से नहीं, बल्कि जनता और युवाओं के बढ़ते दबाव का परिणाम है। विपक्ष का कहना है कि यदि विरोध नहीं होता तो भाजपा नेतृत्व इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहता। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका युवाओं की रही। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बड़ी संख्या में युवाओं ने बयान का विरोध किया। कई छात्र संगठनों ने इसे युवाओं के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताते हुए प्रदेश अध्यक्ष से इस्तीफे की मांग की। देखते ही देखते यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और युवाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों से भी जुड़ने लगा। भाजपा ने विवाद को लंबा खिंचने देने के बजाय नुकसान की आशंका को देखते हुए तत्काल सफाई देने की रणनीति अपनाई। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और पार्टी किसी भी ऐसे विवाद को चुनावी मुद्दा बनने से रोकना चाहती है, जिससे युवा मतदाता प्रभावित हों। भाजपा के लिए युवा मतदाता बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। राज्य में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और रोजगार के अवसर पहले से ही चर्चा के विषय हैं। ऐसे माहौल में किसी भी विवादित बयान का राजनीतिक असर अपेक्षा से अधिक हो सकता है। यही कारण है कि संगठन ने विवाद बढ़ने के बाद तुरंत डैमेज कंट्रोल की कोशिश की। वहीं, विपक्ष इस मुद्दे को यहीं समाप्त करने के पक्ष में नहीं दिख रहा। कांग्रेस ने कहा है कि केवल माफी मांग लेने से मामला खत्म नहीं हो जाता। विपक्ष का दावा है कि जनता ने भाजपा नेतृत्व को अपना रुख बदलने के लिए मजबूर किया है और आने वाले समय में युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार को लगातार घेरा जाएगा। घटनाक्रम उत्तराखंड की बदलती राजनीति का संकेत भी है। अब सोशल मीडिया पर उठने वाली जनभावनाएं सीधे राजनीतिक फैसलों और नेताओं की प्रतिक्रियाओं को प्रभावित कर रही हैं। पहले जिन बयानों पर लंबे समय तक सफाई नहीं आती थी, अब उन पर कुछ ही दिनों में प्रतिक्रिया देनी पड़ रही है।

विवादों की ‘आंधी’ में डगमगा रही ‘कुर्सी’

उत्तराखंड भाजपा में नए प्रदेश अध्यक्ष की चर्चाएं तेज सोशल मीडिया पर दावेदारों की लंबी सूची, संगठन चुप बदलाव होगा या महेंद्र भट्ट पर ही जताया जाएगा भरोसा देहरादून। उत्तराखंड भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर इन दिनों राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कई नेताओं के नाम चर्चा में हैं, तो दूसरी ओर पार्टी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक गलियारों में भी संगठन में संभावित बदलाव को लेकर कयासों का दौर जारी है। हालांकि, पार्टी की ओर से अब तक प्रदेश अध्यक्ष बदलने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। राजनीतिक चर्चाओं को उस समय और बल मिला, जब हाल के दिनों में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट अपने एक विवादित बयान को लेकर विपक्ष और युवाओं के निशाने पर आए। बढ़ते विवाद के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से सफाई दी और युवाओं से खेद भी व्यक्त किया। इसके बाद सोशल मीडिया पर यह चर्चा और तेज हो गई कि क्या पार्टी संगठन आगामी राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए नेतृत्व में बदलाव कर सकता है। उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन भाजपा ने चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। संगठन विस्तार, बूथ प्रबंधन और नए सामाजिक समीकरणों पर लगातार काम हो रहा है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का पद बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही कारण है कि जैसे ही संगठन में बदलाव की संभावनाओं की चर्चा शुरू हुई, कई नेताओं के नाम सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। हालांकि, भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि पार्टी में संगठनात्मक नियुक्तियां तय प्रक्रिया के तहत होती हैं और सोशल मीडिया की चर्चाओं के आधार पर कोई निर्णय नहीं लिया जाता। पार्टी नेतृत्व फिलहाल सार्वजनिक रूप से यही संदेश दे रहा है कि संगठन पूरी तरह एकजुट है और सभी नेता आगामी चुनावी तैयारियों में जुटे हैं। भाजपा के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, सरकार की उपलब्धियों को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना और दूसरी, युवाओं के बीच पार्टी की सकारात्मक छवि को मजबूत बनाए रखना। भर्ती परीक्षाओं, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे पहले ही राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। ऐसे में संगठन का नेतृत्व किसके हाथ में होगा, यह केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है। विपक्ष भी इन चर्चाओं पर पैनी नजर बनाए हुए है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है और नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं संगठन के अंदरूनी असंतोष का संकेत हैं। वहीं भाजपा इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे विपक्ष की राजनीतिक व्याख्या बता रही है। सोशल मीडिया ने इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बना दिया है। अलग-अलग दावेदारों के समर्थन में पोस्ट, वीडियो और संदेश लगातार साझा किए जा रहे हैं। कई पोस्ट में संभावित नामों का दावा किया जा रहा है, लेकिन इनमें से किसी भी दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। सोशल मीडिया का माहौल और संगठन का वास्तविक निर्णय हमेशा एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं होता। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की कार्यशैली को देखते हुए यह भी माना जा रहा है कि यदि संगठन में कोई बदलाव होता है तो उसका फैसला अचानक और औपचारिक घोषणा के साथ सामने आएगा। वहीं यदि पार्टी मौजूदा नेतृत्व पर ही भरोसा कायम रखती है, तो सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं पर स्वतः विराम लग सकता है। उत्तराखंड भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चल रही चर्चाओं ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले संगठन का हर कदम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाएगा। फिलहाल बदलाव की चर्चाएं अटकलों के स्तर पर हैं और पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है। ऐसे में आने वाले दिनों में भाजपा का संगठनात्मक फैसला ही यह तय करेगा कि सोशल मीडिया की अटकलें सही साबित होती हैं या फिर मौजूदा नेतृत्व पर ही भरोसा कायम रखा जाता है।

शनिवार, 25 जुलाई 2026

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धर्मेंद्र प्रधान ने पीएम मोदी को भेजी इस्तीफे की चिट्ठी

जंतर-मंतर पर काकरोच संग्राम के बाद बड़ा फैसला धर्मेंद्र ने चिट्ठी भेजकर अपना पद छोड़ने की इच्छा जताई पीएमओ से अभी तक नहीं हो पाई है इसकी काई भी पुष्टि नई दिल्ली। राजधानी के जंतर-मंतर पर पिछले कई दिनों से चल रहे अनोखे प्रदर्शन के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। शिक्षा नीति और पेपर लीक विवादों के बीच, जंतर-मंतर पर शुरू हुए काकरोच संग्राम ने ऐसा तूल पकड़ा कि आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफे की पेशकश करनी पड़ी। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक भावुक चिट्ठी भेजकर अपना पद छोड़ने की इच्छा जताई है। दरअसल, नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने इस बार विरोध का एक बेहद अजीब तरीका निकाला। छात्रों ने आरोप लगाया था कि देश की परीक्षा प्रणाली में दीमक और काकरोच की तरह भ्रष्टाचार घर कर चुका है। इसके विरोध स्वरूप जंतर-मंतर पर हजारों की संख्या में प्रतीकात्मक काकरोच के पोस्टर, कट-आउट और डिब्बों में बंद काकरोच लाकर अनोखा प्रदर्शन किया गया। काकरोच हटाओ, परीक्षा बचाओ के नारों से पूरा जंतर-मंतर गूंज उठा। इस अजीबोगरीब प्रदर्शन ने न केवल मीडिया का ध्यान खींचा, बल्कि सोशल मीडिया पर भी यह संग्राम ट्रेंड करने लगा, जिससे सरकार पर भारी नैतिक दबाव बन गया। प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी गई चिट्ठी में धर्मेंद्र प्रधान ने लिखा है कि वह छात्रों के आक्रोश और जंतर-मंतर पर बने हालात से बेहद आहत हैं। परीक्षाओं में पारदर्शिता बनाए रखना मेरी सर्वाेच्च प्राथमिकता थी। लेकिन जिस तरह से छात्रों का विश्वास डगमगाया है और जिस तरह के विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं, उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मैं अपने पद से त्यागपत्र दे रहा हूँ। धर्मेंद्र प्रधान के इस अप्रत्याशित कदम के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने इसे छात्र शक्ति की जीत करार देते हुए कहा कि केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से बात नहीं बनेगी, बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र को ध्वस्त कर नए सिरे से बनाना होगा। सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने फिलहाल इस चिट्ठी पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। खबर लिखे जाने तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि प्रधानमंत्री ने इस्तीफा स्वीकार किया है या नहीं। फिलहाल, जंतर-मंतर पर छात्रों का जमावड़ा बना हुआ है और सबकी नजरें अब पीएमओ के अगले कदम पर टिकी हैं।

भाइयों-बहनों से अब ‘फ्रेंड्स’

जेन-जी को साधने के लिए पीएम मोदी ने बदला अंदाज पीएम मोदी की देश के युवाओं को साधने की नई कोशिश 24 घंटे में पीएम का दूसरा वीडियो, युवाओं को कहा थैंक यू देहरादून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे के भीतर लगातार दूसरा वीडियो संदेश जारी कर एक बार फिर देश के युवाओं, खासकर जेन जी से सीधे संवाद करने की कोशिश की। पहले वीडियो में पेपर लीक और परीक्षा सुधारों पर बात करने के बाद अब उन्होंने दूसरे वीडियो में युवाओं द्वारा दिए गए सुझावों और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पिछले वीडियो पर मिले सकारात्मक सुझावों और समर्थन ने उनके साथ युवाओं के रिश्ते को और मजबूत किया है। यह पहली बार है जब प्रधानमंत्री ने इतने कम समय के अंतराल में एक ही मुद्दे पर लगातार दो वीडियो जारी किए हैं। यह केवल धन्यवाद संदेश नहीं, बल्कि उस युवा वर्ग तक पहुंचने की कोशिश है, जो पिछले कुछ दिनों से पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था को लेकर सबसे अधिक मुखर दिखाई दे रहा है। अपने वीडियो में प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके पहले वीडियो पर युवाओं ने जिस तरह सकारात्मक सुझाव दिए, उससे उन्हें खुशी हुई। उन्होंने भरोसा जताया कि यह संवाद आगे भी जारी रहेगा और युवाओं का स्नेह तथा विश्वास बना रहेगा। इस बार सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री की भाषा और अंदाज की रही। वर्षों तक मेरे प्यारे देशवासियों, भाइयों और बहनों और मित्रों से शुरुआत करने वाले प्रधानमंत्री ने अब सीधे थैंक यू फ्रेंड्स कहकर युवाओं को संबोधित किया। इसे सोशल मीडिया की भाषा और जेन जी से जुड़ने की एक नई शैली के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री का पहला वीडियो ऐसे समय आया था जब देशभर में पेपर लीक के मुद्दे पर छात्र आंदोलन तेज है। सरकार पहले ही परीक्षा प्रणाली में सुधार, कड़े कानून और फास्ट-ट्रैक अदालतों जैसी घोषणाएं कर चुकी है। दूसरे वीडियो में प्रधानमंत्री ने इन घोषणाओं को दोहराने के बजाय सीधे युवाओं की प्रतिक्रिया को महत्व दिया। सरकार अब केवल प्रशासनिक फैसलों पर नहीं, बल्कि भावनात्मक संवाद के जरिए भी युवाओं का भरोसा जीतने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री के पहले वीडियो को सोशल मीडिया पर करोड़ों लोगों ने देखा और उसके बाद उनके सोशल मीडिया खातों पर बड़ी संख्या में नए फालोअर्स भी जुड़े। इसके बाद सरकार के भीतर भी डिजिटल माध्यमों पर युवाओं से संवाद बढ़ाने की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि विपक्ष का कहना है कि केवल वीडियो संदेशों से छात्रों की नाराजगी दूर नहीं होगी और सरकार को जवाबदेही तय करनी होगी। दूसरी ओर, सरकार का दावा है कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार और युवाओं के साथ सीधा संवाद ही विश्वास बहाल करने का रास्ता है। 24 घंटे में दो वीडियो यह संकेत देते हैं कि केंद्र सरकार युवाओं के मुद्दों को लेकर संवाद की गति बढ़ाना चाहती है। अब देखना यह होगा कि यह डिजिटल संवाद केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहता है या परीक्षा प्रणाली में दिखने वाले बदलावों के साथ युवाओं का भरोसा भी वापस ला पाता है। फिलहाल इतना तय है कि जेन जी केवल दर्शक नहीं, बल्कि एजेंडा तय करने वाली ताकत बनकर उभर रही है और प्रधानमंत्री का लगातार दूसरा वीडियो इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य का संकेत माना जा रहा है।

पहाड़ के हर घर था अपना ‘बीज बैंक’

बाजार के दौर में भी नहीं बदला पहाड़ की खेती का वह मूलमंत्र बाजार के हाइब्रिड दौर में भी जिंदा है पारंपरिक बीजों की विरासत खेतों से लेकर संस्कृति तक बचाए हुए हैं पहाड़ के गांवों की पहचान देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में खेती केवल अन्न उगाने का माध्यम नहीं रही, बल्कि यह संस्क्ृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता की जीवनरेखा रही है। यहां हर गांव में कभी बीजों का अपना खजाना हुआ करता था। एक किसान के पास यदि मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, राजमा, चौलाई, रामदाना, जख्या, तिल, उड़द और स्थानीय धान की किस्में सुरक्षित थीं, तो उसे समृद्ध माना जाता था। आज जब बाजार हाइब्रिड बीजों और रासायनिक खेती की ओर बढ़ चुका है, तब भी पहाड़ के कुछ गांव ऐसे हैं, जहां पारंपरिक बीजों की यह विरासत अब भी सांस ले रही है। यह केवल खेती की कहानी नहीं, बल्कि उस विश्वास की कहानी है कि बीज बचेंगे, तभी पहाड़ बचेगा। पहाड़ की महिलाएं फसल कटने के बाद सबसे पहले अगले साल के लिए सबसे स्वस्थ और अच्छे दानों को अलग रखती थीं। इन बीजों को राख, नीम की पत्तियों, भांग की पत्तियों या मिट्टी के बर्तनों में सुरक्षित रखा जाता था। न कोई कंपनी, न कोई पैकेट और न ही हर साल बीज खरीदने की मजबूरी। गांवों में बीजों का लेन-देन भी रिश्तों की तरह होता था। यदि किसी किसान का बीज खराब हो जाए तो पड़ोसी बिना किसी कीमत के उसे बीज दे देता था। इसे केवल मदद नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी माना जाता था। पहाड़ के पारंपरिक बीज केवल फसल नहीं, बल्कि स्थानीय जलवायु के अनुरूप विकसित हुई पीढ़ियों की बुद्धिमत्ता हैं। मंडुवादृ कम पानी में भी अच्छी पैदावार, कैल्शियम और आयरन से भरपूर,झंगोरा सूखे क्षेत्रों का भरोसेमंद अनाज,गहतदृ दाल ही नहीं, पारंपरिक चिकित्सा का भी हिस्सा,भट्टदृ पहाड़ी व्यंजनों की शान और प्रोटीन का बड़ा स्रोत,चौलाई और रामदानादृ पोषण से भरपूर और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाली फसलें,जख्या उत्तराखंड के स्वाद की पहचान। इन बीजों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पहाड़ की कठोर जलवायु में भी टिके रहते हैं और कम संसाधनों में खेती संभव बनाते हैं। पिछले दो दशकों में कृषि बाजार तेजी से बदला। अधिक उत्पादन के वादे के साथ हाइब्रिड बीज गांवों तक पहुंचे। धीरे-धीरे किसानों ने पारंपरिक किस्मों की जगह बाजार से खरीदे जाने वाले बीजों को अपनाना शुरू किया। इसके कई दुष्परिणाम सामने आएकृहै। इसमें हर साल नया बीज खरीदने की मजबूरी, रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरत, स्थानीय किस्मों का तेजी से लुप्त होना, खेती की लागत में लगातार वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के प्रति फसलों की संवेदनशीलता प्रमुख है। आज कई गांव ऐसे हैं जहां कभी उगने वाली स्थानीय धान या गेहूं की किस्मों के नाम तक नई पीढ़ी नहीं जानती। विशेषज्ञ मानते हैं कि पारंपरिक बीज जलवायु परिवर्तन के दौर में सबसे अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं। अनियमित बारिश, सूखा और तापमान में बदलाव जैसी परिस्थितियों में स्थानीय बीज अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल रहते हैं। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक अब फिर से स्थानीय बीजों के संरक्षण और उनके वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण पर जोर दे रहे हैं। पहाड़ की ग्रामीण महिलाओं ने इस विरासत को बचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। स्वयं सहायता समूह, महिला मंगल दल और कई स्थानीय संगठन गांव-गांव में बीज संरक्षण अभियान चला रहे हैं। कुछ स्थानों पर सामुदायिक बीज बैंक बनाए गए हैं, जहां किसान पारंपरिक बीज जमा भी करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर वापस भी लेते हैं। इससे बीजों की विविधता बनी रहती है। पहाड़ में जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ पारंपरिक बीजों की मांग भी बढ़ रही है। महानगरों में मंडुवा, झंगोरा, गहत और भट्ट जैसे उत्पाद अब ष्सुपर फूडष् के रूप में बिक रहे हैं। विडंबना यह है कि जिन अनाजों को कभी गरीब का भोजन कहा जाता था, वही आज स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन ने पारंपरिक खेती को सबसे बड़ा झटका दिया है। खेत खाली हुए तो बीज भी गायब होने लगे। जिन परिवारों ने पीढ़ियों तक बीजों को संभाला, उनके गांव छोड़ने के साथ वह ज्ञान भी धीरे-धीरे समाप्त होता गया। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। गांव स्तर पर बीज मेलों, स्थानीय बीज बैंक, स्कूलों में कृषि शिक्षा और किसानों को पारंपरिक बीजों के संरक्षण के लिए प्रोत्साहन जैसी पहल जरूरी हैं। यदि आज इन बीजों को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी उत्तराखंड के खेतों में सैकड़ों स्थानीय किस्में उगती थीं। पहाड़ का भविष्य केवल सड़कों, सुरंगों और बड़े निवेश से तय नहीं होगा। वह इस बात से भी तय होगा कि क्या हम अपनी मिट्टी के मूल बीज बचा पाए। पारंपरिक बीज केवल कृषि की धरोहर नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, लोक संस्कृति और आत्मनिर्भरता का आधार हैं। पहाड़ के लिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अगली फसल कौन-सी होगी, बल्कि यह है कि अगली पीढ़ी के पास अपने खेतों के मूल बीज बचेंगे भी या नहीं।

‘अपने’ ही करने लगे ‘अपनों’ का विरोध

पेपर लीक पर एबीवीपी ने फूंका पुतला दिल्ली के आंदोलन की गूंज अब पहाड़ों में अपनी ही सरकार के खिलाफ उतरा संगठन देहरादून। देशभर में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब केवल दिल्ली के जंतर-मंतर या संसद मार्ग तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा। इसकी गूंज अब उत्तराखंड के पहाड़ों तक सुनाई देने लगी है। मसूरी में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का पुतला फूंके जाने की घटना ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या युवाओं का यह असंतोष अब राजनीतिक सीमाओं को भी पार करने लगा है। यदि मसूरी में यह प्रदर्शन वास्तव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया है, तो यह इसलिए चर्चा का विषय बना क्योंकि भारतीय विद्यार्थी परिषद को व्यापक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा छात्र संगठन माना जाता है और उसकी वैचारिक निकटता भाजपा से मानी जाती है। हालांकि, इस घटना को लेकर संबंधित संगठन का आधिकारिक पक्ष और स्थानीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं। पिछले कुछ सप्ताहों में देशभर के लाखों छात्र और युवा पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में देरी और पारदर्शिता की मांग को लेकर सड़क पर उतरे हैं। जंतर-मंतर से लेकर सोशल मीडिया तक यह आंदोलन लगातार चर्चा में रहा। युवाओं ने इसे केवल एक परीक्षा का सवाल नहीं, बल्कि अपने भविष्य और व्यवस्था पर भरोसे का मुद्दा बताया। अब मसूरी की घटना को उसी व्यापक छात्र असंतोष की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। यह संकेत देता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी चिंताएं केवल विपक्षी राजनीति का विषय नहीं रहीं, बल्कि छात्र समुदाय के भीतर व्यापक चर्चा का हिस्सा बन चुकी हैं। लंबे समय तक छात्र राजनीति को वैचारिक खांचों में देखा जाता रहा, लेकिन ळमर्द की नई पीढ़ी रोजगार, पारदर्शिता, मेरिट और जवाबदेही जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देती दिखाई दे रही है। यही वजह है कि विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े छात्र भी परीक्षा प्रणाली और भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह आंदोलन किसी एक संगठन या दल का नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का आंदोलन बनता जा रहा है, जो सोशल मीडिया के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। उत्तराखंड में भाजपा लगातार युवा मतदाताओं को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती रही है। लेकिन यदि पार्टी के वैचारिक दायरे से जुड़े छात्र संगठनों के कार्यकर्ता भी परीक्षा व्यवस्था को लेकर सार्वजनिक विरोध दर्ज कराते हैं, तो यह सरकार के लिए एक राजनीतिक संकेत हो सकता है कि युवाओं के बीच भरोसा बनाए रखना अब पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण होगा। हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी एक स्थानीय प्रदर्शन के आधार पर भाजपा के भीतर व्यापक असहमति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यह देखना होगा कि आने वाले दिनों में पार्टी, सरकार और छात्र संगठन इस मुद्दे पर क्या आधिकारिक रुख अपनाते हैं। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पेपर लीक और पलायन पहले से ही युवाओं के प्रमुख मुद्दे हैं। यदि आंदोलन इसी तरह गति पकड़ता है, तो यह चुनावी विमर्श को भी प्रभावित कर सकता है। विरोध सिर्फ एक प्रतीकात्मक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस बेचौनी का संकेत माना जा सकता है जो देशभर के युवाओं में दिखाई दे रही है। दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी आवाज अब उत्तराखंड के पहाड़ों तक पहुंचती दिख रही है। यदि सरकार समय रहते परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, समयबद्ध भर्तियां और जवाबदेही सुनिश्चित करने में सफल होती है, तो यह असंतोष शांत हो सकता है। लेकिन यदि युवाओं का भरोसा लगातार कमजोर पड़ता गया, तो जेन जी आंदोलन आने वाले समय में केवल छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श भी बन सकता है।

वायरल काप के ड्रामे का नया ‘चैप्टर’

परचून की दुकान में मिलते हैं पेपर कहने वाला पुलिसकर्मी खुद जांच के घेरे में जंतर-मंतर पर इस्तीफे का ऐलान करने वाले कांस्टेबल की खुल गई अब पोल कांस्टेबल पहले बना आंदोलन का चेहरा, फिर कुछ ही घंटे में बन गया आरोपी देहरादून। पेपर लीक के खिलाफ चल रहे देशव्यापी आंदोलन के बीच जंतर-मंतर पर उत्तराखंड पुलिस के जिस कांस्टेबल ने मंच से अपना बैज उतारकर नौकरी छोड़ने की घोषणा की थी और यह दावा किया था कि उत्तराखंड में परचून की दुकान पर भी पेपर मिल जाते हैं, अब वही पुलिसकर्मी खुद कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ गया है। इस घटनाक्रम ने छात्र आंदोलन, राजनीतिक बहस और कानून-व्यवस्था को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। यह वही पुलिसकर्मी था जिसने जंतर-मंतर के आंदोलन में छात्रों के समर्थन में भावनात्मक भाषण दिया था। उसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और कई लोगों ने इसे व्यवस्था के खिलाफ एक साहसिक कदम बताया। लेकिन अब उसके खिलाफ दर्ज मामले के बाद पूरा घटनाक्रम नए सवाल खड़े कर रहा है। जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन में कांस्टेबल ने सार्वजनिक रूप से अपना पुलिस बैज उतारते हुए इस्तीफे की घोषणा की थी। उसने आरोप लगाया था कि भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक ने युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया है और उत्तराखंड में स्थिति इतनी खराब है कि परचून की दुकान में भी पेपर मिल जाते हैं। उसका यह बयान कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। छात्र संगठनों और आंदोलनकारियों ने इसे व्यवस्था के भीतर से उठी आवाज बताया। अब, उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू होने के बाद बहस का केंद्र बदल गया है। प्रशासन का कहना है कि पुलिसकर्मी के खिलाफ सेवा नियमों और अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा रही है। दूसरी ओर, आंदोलन से जुड़े लोग इसे आवाज उठाने वालों पर कार्रवाई के रूप में देख रहे हैं। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी भी आरोप का अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगा। केवल मामला दर्ज होना किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं है। देशभर में चल रहा आंदोलन अब केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं रह गया है। यह आंदोलन पारदर्शिता, जवाबदेही और युवाओं के भविष्य से जुड़े व्यापक सवाल उठा रहा है। जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ एक वर्दीधारी पुलिसकर्मी का खड़ा होना आंदोलन के लिए एक प्रतीकात्मक क्षण था। वहीं, उसके खिलाफ कार्रवाई ने आंदोलन को एक नया राजनीतिक और कानूनी आयाम दे दिया है। उत्तराखंड पहले ही भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक के मामलों को लेकर राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है। विपक्ष लगातार सरकार पर सवाल उठा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाया जा रहा है। इस बीच, छात्र संगठनों के विरोध प्रदर्शन और हाल में मसूरी में केंद्रीय शिक्षा मंत्री के खिलाफ हुए प्रदर्शन ने भी यह संकेत दिया है कि युवाओं का असंतोष अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया हैकृकि क्या व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाला हर व्यक्ति कानून के दायरे में आएगा, या फिर यदि उसके बयान तथ्यों से परे पाए जाते हैं तो उनके लिए भी जवाबदेही तय होगी? इन दोनों सवालों का जवाब तथ्यों, जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही तय होगा। जंतर-मंतर से उठी एक आवाज ने पूरे देश का ध्यान खींचा था। अब उसी आवाज का कानूनी परीक्षण शुरू हो गया है। यह घटनाक्रम केवल एक पुलिसकर्मी की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर का आईना है जिसमें जेन जी के आंदोलन, पेपर लीक, राजनीतिक जवाबदेही और कानूनकृचारों एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। आने वाले दिनों में जांच के निष्कर्ष और सरकारी कार्रवाई तय करेगी कि यह मामला केवल एक अनुशासनात्मक कार्रवाई बनकर रह जाता है या फिर छात्र आंदोलन की दिशा और राजनीतिकृदोनों पर स्थायी असर छोड़ता है।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

udaydinmaan: यूकेडी का इतिहास ‘हिट’ वजूद ‘फ्लाप’

udaydinmaan: यूकेडी का इतिहास ‘हिट’ वजूद ‘फ्लाप’: यूकेडी के स्थापना दिवस पर विशेष यह है संघर्ष की विरासत और सियासी हाशिए की अनोखी कहानी 47 साल पहले जिस आंदोलन ने उत्तराखंड राज्य का सपना जगाय...