रविवार, 7 जून 2026

वक्त और फैशन बदला पर नहीं बदला ‘गलोबंद’ का टशन

---सामाजिक पहचान व सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है गलोबंद ---गढ़वाल और कुमाऊं में पारंपरिक महिलाओं का प्रमुख आभूषण ---विशेष रूप से पहना जाता है विवाह व मांगलिक अवसरों पर ---कई परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में है यह संरक्षित ---पहाड़ के लोकगीतों व लोक संस्कृति में है इसका विशेष स्थान देहरादून। उत्तराखंड की समृ( लोक संस्कृति में अनेक ऐसे प्रतीक हैं जो केवल परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज की पहचान भी हैं। इन्हीं में से एक है गलोबंद जो सदियों से पहाड़ की महिलाओं के गले की शोभा बढ़ाने के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बना हुआ है। आधुनिकता की तेज़ रफ्तार के बावजूद गलोबंद आज भी उत्तराखंड की लोक विरासत में अपना विशेष स्थान बनाए हुए है। पहाड़ की महिलाओं का पारंपरिक श्रृंगार विविध आभूषणों से सुसज्जित रहा है। नथ, पौंजी, हंसुली, गुलूबंद, चरेऊ और गलोबंद जैसे आभूषण न केवल सौंदर्य बढ़ाते हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और सामाजिक परंपराओं को भी अभिव्यक्त करते हैं। इनमें गलोबंद सबसे विशिष्ट माना जाता है। काले मखमली कपड़े या मोटे धागे की पट्टी पर सोने, चांदी अथवा धातु के कलात्मक टुकड़ों को पिरोकर बनाया जाने वाला यह आभूषण गले से सटा रहता है और महिलाओं के व्यक्तित्व में अलग ही गरिमा जोड़ देता है। लोक संस्कृति के जानकार बताते हैं कि गलोबंद का इतिहास कई पीढ़ियों पुराना है। पुराने समय में जब पहाड़ के गांवों में आधुनिक आभूषण आसानी से उपलब्ध नहीं थे, तब स्थानीय कारीगर हाथों से गलोबंद तैयार करते थे। प्रत्येक डिजाइन में स्थानीय कला और पारंपरिक सौंदर्यबोध की झलक दिखाई देती थी। कई परिवारों में गलोबंद केवल गहना नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत माना जाता था, जिसे मां अपनी बेटी और सास अपनी बहू को सौंपती थी। उत्तराखंड के विवाह समारोहों में गलोबंद का विशेष महत्व रहा है। दुल्हन के श्रृंगार में इसे शुभता और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। मांगल गीतों और लोक नृत्यों में भी गलोबंद का बार-बार उल्लेख मिलता है। पहाड़ की लोक गायिकाओं द्वारा गाए जाने वाले कई गीतों में महिलाओं के श्रृंगार और आभूषणों का वर्णन मिलता है, जिनमें गलोबंद प्रमुख स्थान रखता है। समय के साथ फैशन बदलता गया, लेकिन गलोबंद की लोकप्रियता कम नहीं हुई। आज यह पारंपरिक परिधान के साथ-साथ आधुनिक परिधानों में भी नए रूप में दिखाई देने लगा है। राज्य के सांस्कृतिक मेलों, उत्तरायणी, नंदा देवी महोत्सव और विभिन्न लोक उत्सवों में युवा पीढ़ी भी गलोबंद पहनकर अपनी संस्कृति से जुड़ाव का प्रदर्शन कर रही है। सोशल मीडिया के दौर में भी पारंपरिक पहाड़ी वेशभूषा और गलोबंद की तस्वीरें व्यापक रूप से पसंद की जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्वीकरण के इस दौर में जब स्थानीय परंपराएं धीरे-धीरे सिमटती जा रही हैं, तब गलोबंद जैसे सांस्कृतिक प्रतीक नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। यह केवल गले का आभूषण नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक स्मृति, लोक कला और महिलाओं की पहचान का जीवंत दस्तावेज है। आज भी जब किसी पर्व, विवाह या सांस्कृतिक आयोजन में पारंपरिक वेशभूषा पहने कोई पहाड़ी महिला गलोबंद धारण करती है, तो उसमें केवल सौंदर्य नहीं झलकता, बल्कि सदियों पुरानी लोक परंपरा की चमक दिखाई देती है। यही कारण है कि गलोबंद उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का ऐसा अनमोल आभूषण है, जिसकी चमक समय के साथ और अधिक निखरती जा रही है। पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, लोकगीतों और पर्वों तक सीमित नहीं है। यहां के पारंपरिक आभूषण भी इस विरासत के महत्वपूर्ण वाहक हैं। गलोबंद उन्हीं में से एक है, जो आज भी पहाड़ की महिलाओं के गले में संस्कृति, गौरव और पहचान बनकर दमक रहा है।

उत्तराखंड में वक्त से पहले चुनावी शंखनाद

भाजपा-कांग्रेस ने कसी कमर, सत्ता और सियासत की बिसात बिछनी शुरू राहुल गांधी के दौरे से लेकर भाजपा के बूथ मैनेजमेंट अभियान तक चुनाव में अभी समय, लेकिन राजनीतिक दल आए चुनावी मोड में देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में भले ही अभी कई महीने शेष हों, लेकिन राज्य की राजनीति में चुनावी शंखनाद साफ सुनाई देने लगा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने स्तर पर तैयारियां तेज कर दी हैं। नेताओं के लगातार दौरे, संगठनात्मक बैठकों का दौर, बूथ स्तर तक पहुंचने की कवायद और चुनावी मुद्दों की तलाश इस बात का संकेत है कि राज्य में चुनावी जंग समय से पहले ही शुरू हो चुकी है। भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ मैदान में है। पार्टी का पूरा फोकस उन बूथों और क्षेत्रों पर है, जहां पिछले चुनावों में उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। संगठन को और मजबूत बनाने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए शीर्ष नेतृत्व लगातार उत्तराखंड का दौरा कर रहा है। हाल के दिनों में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी चुनावी रणनीति को लेकर विशेष बैठकों का सिलसिला शुरू किया है। दूसरी ओर कांग्रेस भी इस चुनाव को अस्तित्व की लड़ाई मानकर चल रही है। कांग्रेस बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने और गुटबाजी को कम करने की रणनीति पर काम कर रही है। 2027 के चुनाव में रोजगार, पलायन, महंगाई, चारधाम यात्रा की व्यवस्थाएं, आपदा प्रबंधन, सैन्य परिवारों से जुड़े विषय और पहाड़-मैदान का संतुलित विकास प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। कांग्रेस बेरोजगारी, अग्निवीर योजना और युवाओं के सवालों को केंद्र में लाने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा विकास परियोजनाओं, सड़क, रेल और धार्मिक पर्यटन को अपनी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 में केवल मुद्दों की नहीं बल्कि नेतृत्व की भी लड़ाई होगी। भाजपा मुख्यमंत्री नेतृत्व और संगठन की मजबूती के सहारे मैदान में उतरेगी, जबकि कांग्रेस को जनता के सामने एकजुट नेतृत्व का संदेश देना होगा। पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस के भीतर चली आ रही गुटबाजी भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। अभी तक चुनावी गतिविधियां बड़े नेताओं के दौरों तक सीमित दिख रही हैं, लेकिन आने वाले महीनों में यह लड़ाई गांवों, बूथों और सोशल मीडिया तक पहुंचने वाली है। राजनीतिक दलों ने अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना शुरू कर दिया है और जनसंपर्क अभियानों की रूपरेखा भी तैयार होने लगी है। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह राज्य के भविष्य के विकास माडल, युवाओं की उम्मीदों और पहाड़ की पहचान से जुड़े सवालों का भी चुनाव होगा। फिलहाल तस्वीर साफ हैकृचुनाव में अभी समय बाकी है, लेकिन चुनावी जंग शुरू हो चुकी है।

उच्यणू है ‘अनहोनी’ का ‘पहाड़ी’ इलाज

जब आधुनिक दवाएं भी हार मान लें, वहां उम्मीद की आखिरी किरण जगाती है देवभूमि की यह थाती लंबी बीमारी हो या अचानक आया कोई बड़ा संकट ‘उच्यणू’ की एक पोटली में छिपी होती है सुकून की उम्मीद संकट के वक्त जब समझ न आए कोई रास्ता, तब ईष्ट देवों के आगे शीश नवाकर ऐसे रखा जाता है उच्यणू आधुनिक चिकित्सा के दौर में भी उत्तराखंड के कई गांवों में जीवित है यह अनोखा लोकविश्वास लोकसंस्कृति, आस्था और सामुदायिक विश्वास का अनूठा संगम है पहाड़ की अनोखी परंपरा देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में आज भी ऐसी अनेक परंपराएं जीवित हैं, जो आधुनिकता की तेज रफ्तार के बावजूद लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं। इन्हीं में से एक है ‘उच्यणू’। जब किसी व्यक्ति की बीमारी लंबे समय तक ठीक नहीं होती, परिवार पर लगातार संकट आते हैं या किसी अनहोनी का कारण समझ नहीं आता, तब गांवों में आज भी उच्यणू रखा जाता है। गढ़वाल और कुमाऊं के अनेक ग्रामीण इलाकों में प्रचलित यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। लोगों का विश्वास है कि कभी-कभी कुलदेवता, ग्रामदेवता या स्थानीय देवी-देवताओं के रूठ जाने से परिवार पर संकट आ सकता है। ऐसे में देवताओं की इच्छा और नाराजगी का कारण जानने के लिए उच्यणू आयोजित किया जाता है। उच्यणू के दौरान गांव के जागरिया, पश्वा या देववक्ता को बुलाया जाता है। ढोल-दमाऊं और मंत्रोच्चारण के बीच देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। लोकमान्यता है कि इस प्रक्रिया में देवता पश्वा पर अवतरित होकर परिवार की समस्या का कारण बताते हैं और उसके समाधान का मार्ग भी सुझाते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जब चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, तब उच्यणू सामाजिक और मानसिक सहारे का माध्यम भी था। बीमारी के दौरान पूरा गांव एक परिवार के साथ खड़ा होता था। लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द में सहभागी बनते थे और सामूहिक रूप से समाधान खोजने का प्रयास करते थे। समाजशास्त्रियों के अनुसार उच्यणू केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी है। इसके माध्यम से लोकपरंपराएं, लोकसंगीत, लोकभाषा और सांस्कृतिक विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही हैं। हालांकि नई पीढ़ी के बीच वैज्ञानिक सोच और आधुनिक चिकित्सा के प्रसार के कारण इस परंपरा का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में कम हुआ है, फिर भी दूरस्थ गांवों में उच्यणू आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। कई परिवार आधुनिक उपचार के साथ-साथ देवताओं का आशीर्वाद लेने के लिए भी इस परंपरा का सहारा लेते हैं। उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में उच्यणू केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पहाड़ के उस जीवन दर्शन का हिस्सा है जिसमें प्रकृति, देवता और मनुष्य एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए माने जाते हैं। बदलते समय में भी यह परंपरा पहाड़ की लोकआस्था और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का कार्य कर रही है।

पहाड़ की ‘अनमोल’ विरासत है ‘फाणु’

---फाणु है पहाड़ की थाली का स्वाद, सेहत और संस्कृति का अनमोल संगम ---गढ़वाल-कुमाऊं की रसोई से निकलकर आधुनिक खानपान में भी अपनी पहचान बना रहा है फाणु ---कभी ग्रामीण जीवन की जरूरत था तो आज बन रहा है पहाड़ी विरासत का सबसे बड़ा प्रतीक देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल हिमालय, देवालय और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। यहां की संस्कृति और खानपान भी उतने ही समृ( हैं। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में एक नाम है फाणु जो सदियों से पहाड़ी रसोई का अभिन्न हिस्सा रहा है। आज जब लोग फास्ट फूड और आधुनिक व्यंजनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तब भी फाणु अपनी पौष्टिकता और विशिष्ट स्वाद के कारण लोगों की थाली में सम्मानजनक स्थान बनाए हुए है। फाणु केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ के जीवन संघर्ष, प्रकृति से जुड़ाव और पारंपरिक ज्ञान का प्रतीक है। यह व्यंजन मुख्य रूप से गहत, भट्ट, उड़द और अन्य स्थानीय दालों से तैयार किया जाता है। दालों को भिगोकर पीसा जाता है और फिर धीमी आंच पर मसालों के साथ पकाया जाता है। इसकी गाढ़ी बनावट और अनूठा स्वाद इसे अन्य दालों से अलग पहचान देता है। पुराने समय में पहाड़ का जीवन कठिन था। खेतों में घंटों काम करना, दूर-दूर तक पैदल चलना और सीमित संसाधनों में जीवन यापन करना आम बात थी। ऐसे में शरीर को भरपूर ऊर्जा देने वाले भोजन की आवश्यकता होती थी। फाणु इसी जरूरत को पूरा करता था। प्रोटीन और पोषक तत्वों से भरपूर यह व्यंजन किसानों और मेहनतकश लोगों के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत माना जाता था। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि सर्दियों के दिनों में फाणु और मंडुवे की रोटी का स्वाद और ताकत दोनों ही बेजोड़ होते थे। यही कारण है कि यह व्यंजन पीढ़ी दर पीढ़ी पहाड़ी परिवारों में बनता चला आ रहा है। आधुनिक पोषण विशेषज्ञ भी फाणु को स्वास्थ्यवर्धक भोजन मानते हैं। गहत और भट्ट जैसी दालों में भरपूर प्रोटीन, फाइबर और खनिज तत्व पाए जाते हैं। यह पाचन तंत्र को मजबूत करने के साथ-साथ शरीर को आवश्यक पोषण भी प्रदान करता है। पहाड़ में इसे पारंपरिक रूप से स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में देखा जाता रहा है। एक समय ऐसा था जब फाणु केवल गांवों और पारंपरिक रसोई तक सीमित था, लेकिन अब उत्तराखंड के कई होटल, होम-स्टे और रेस्तरां इसे विशेष व्यंजन के रूप में परोस रहे हैं। पर्यटन के बढ़ते प्रभाव के साथ देश-विदेश से आने वाले पर्यटक भी पहाड़ के इस पारंपरिक स्वाद को पसंद कर रहे हैं। बदलती जीवनशैली और आधुनिक खानपान के प्रभाव के कारण कई पारंपरिक व्यंजन धीरे-धीरे लोगों की थाली से गायब हो रहे हैं। हालांकि फाणु अभी भी अपनी पहचान बनाए हुए है, लेकिन नई पीढ़ी को इससे जोड़ना बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय व्यंजनों को पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाए तो न केवल उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत भी संरक्षित रहेगी। फाणु केवल दालों से बना एक व्यंजन नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की मिट्टी, मेहनत और परंपरा का स्वाद है, जिस तरह हिमालय पहाड़ की पहचान है, उसी तरह फाणु पहाड़ की रसोई की आत्मा है। बदलते समय में इस पारंपरिक व्यंजन को बचाए रखना केवल स्वाद का नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संजोने का भी प्रश्न है।

पहाड़ में ‘रिसोर्स’ नहीं, मां के रूप में है ‘प्रकृति’

जब तक पहाड़ की जीवनशैली जिंदा रहेगी तब तक सुरक्षित रहेगा पर्यावरण क्रासर ---पहाड़ के गांवों में पर्यावरण संरक्षण कोई सरकारी योजना या अभियान नहीं जीवन का है हिस्सा ---पहाड़ के गांवों में लोग जीते आ रहे हैं सदियों से प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का जीवन ---पहाड़ के लोग केवल पर्यावरण के उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े संरक्षक देहरादून। आज दुनिया पर्यावरण संरक्षण के लिए नई तकनीकों और नीतियों पर अरबों रुपये खर्च कर रही है। लेकिन पहाड़ के लोगों ने बिना किसी बड़े बजट और प्रचार के सदियों तक जंगल, पानी और जैव विविधता को बचाकर रखा। उनकी जीवनशैली, परंपराएं और प्रकृति के प्रति सम्मान ही पर्यावरण संरक्षण का सबसे प्रभावी माडल है। हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों में पर्यावरण संरक्षण कोई सरकारी योजना या अभियान नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा रहा है। यहां जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, नदियां केवल पानी का माध्यम नहीं हैं और पहाड़ केवल भूमि का टुकड़ा नहीं हैं। यहां प्रकृति को मां, देवता और जीवनदाता के रूप में देखा जाता है। आज जब जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं, तब पहाड़ के लोगों का जीवन दर्शन दुनिया को एक महत्वपूर्ण संदेश देता हैकृप्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सामंजस्य ही विकास का आधार होना चाहिए। उत्तराखंड में अनेक जंगल, जलस्रोत और पर्वत धार्मिक आस्था से जुड़े हैं। गांवों के आसपास बने देववन और बुग्याल केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं बल्कि सामुदायिक संरक्षण के उदाहरण हैं। वर्षों तक लोगों ने इन्हें अपनी आस्था और परंपराओं के माध्यम से सुरक्षित रखा। ग्रामीण समाज में पेड़ों को काटने से पहले अनुमति लेने, जलस्रोतों को साफ रखने और जंगलों के संरक्षण की परंपरा आधुनिक पर्यावरणीय कानूनों से कहीं पहले से मौजूद रही है। जब पर्यावरण संरक्षण की बात होती है तो उत्तराखंड का नाम स्वतः सामने आ जाता है। 1970 के दशक में हुआ चिपको आंदोलन केवल एक आंदोलन नहीं था, बल्कि प्रकृति और समाज के रिश्ते का प्रतीक था। गांव की महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर जंगलों को बचाने का जो संदेश दिया, उसने पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का नया रास्ता दिखाया। यह आंदोलन साबित करता है कि पहाड़ के लोग जंगलों को संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानते हैं। विडंबना यह है कि जिन लोगों ने सदियों तक जंगलों और जलस्रोतों की रक्षा की, आज वही लोग पलायन के कारण गांव छोड़ने को मजबूर हैं। खाली होते गांवों के साथ पारंपरिक संरक्षण व्यवस्था भी कमजोर हो रही है। कई स्थानों पर जलस्रोत सूख रहे हैं, खेती की जमीन बंजर हो रही है और जंगलों की निगरानी कम होती जा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पहाड़ को बचाना है तो पहाड़ के लोगों को गांवों में टिकाए रखना होगा। सड़क, बिजली, पर्यटन और आधारभूत सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन हिमालय की संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर किया गया विकास भविष्य में बड़े संकट पैदा कर सकता है। हाल के वर्षों में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं ने यह संकेत दिया है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है। स्थानीय समुदायों का अनुभव और पारंपरिक ज्ञान इस संतुलन को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हिमालय को बचाने की लड़ाई केवल पेड़ों और नदियों को बचाने की लड़ाई नहीं है। यह उन लोगों को बचाने की लड़ाई भी है जिन्होंने पीढ़ियों तक प्रकृति की रक्षा की है। यदि पहाड़ के गांव जीवित रहेंगे, तो जंगल भी सुरक्षित रहेंगे, जलस्रोत भी बहते रहेंगे और हिमालय की आत्मा भी जीवित रहेगी। पर्यावरण के सबसे सच्चे रक्षक आज भी पहाड़ के लोग ही हैं।

मौसम ने रोकी राहुल गांधी की उड़ान

राहुल गांधी ने मोबाइल से किया अल्मोड़ा की जनसभा को संबोधित मोबाइल से दिए गए संदेश ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा खराब मौसम के कारण राहुल का अल्मोड़ा कार्यक्रम स्थगित, पंतनगर से हुए वापस देहरादून। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का प्रस्तावित अल्मोड़ा दौरा गुरुवार को खराब मौसम की भेंट चढ़ गया। लगातार खराब मौसम और उड़ान संबंधी बाधाओं के कारण राहुल गांधी अल्मोड़ा नहीं पहुंच सके, लेकिन उन्होंने तकनीक के माध्यम से जनसभा को संबोधित कर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों का उत्साह बनाए रखा। पंतनगर एयरपोर्ट के डायरेक्टर पवन कुमार ने बताया कि पंतनगर एयरपोर्ट पर उतरने के बाद राहुल गांधी अल्मोड़ा के लिए हेलीकाप्टर से निकले थे लेकिन खराब मौसम के कारण उनका हेलीकाप्टर वहां उतर नहीं पाया और वापस पंतनगर एयरपोर्ट आकर लौट गए हैं। अल्मोड़ा में आयोजित कांग्रेस की विशाल जनसभा में हजारों कार्यकर्ता और समर्थक राहुल गांधी के इंतजार में जुटे थे। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण जब उनका हेलीकाप्टर उड़ान नहीं भर सका तो कांग्रेस नेतृत्व ने वैकल्पिक व्यवस्था करते हुए राहुल गांधी का संबोधन मोबाइल फोन के माध्यम से जनसभा स्थल पर सुनवाया। राहुल गांधी ने अपने संक्षिप्त लेकिन प्रभावी संबोधन में उत्तराखंड के मुद्दों, बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती जैसे विषयों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मैं आप सभी के बीच अल्मोड़ा व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना चाहता था। मौसम खराब होने के कारण मेरा हेलीकाप्टर लैंड नहीं कर पाया, जिसके लिए मैं आप सभी से क्षमा प्रार्थी हूँ। लेकिन मौसम हमारी शारीरिक दूरी तो बढ़ा सकता है, दिल का रिश्ता नहीं। इतनी खराब परिस्थितियों में भी जो हज़ारों की संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक यहां डटे रहे, मैं उनके इस जज्बे को सलाम करता हूँ। आप सभी कांग्रेस की रीढ़ हैं। तानाशाह ताकतों के सामने झुकना हमारी फितरत नहीं है। मौसम खराब है, लेकिन हमारा हौसला बुलंद है। मैं जल्द ही दोबारा अल्मोड़ा आने का कार्यक्रम बनाऊंगा और आप सब के बीच आकर आपकी बात सुनूंगा। तब तक आप जनता की आवाज बनकर लड़ते रहिए। राहुल गांधी के संबोधन से पहले प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के कई कांग्रेस नेताओं ने सभा को संबोधित किया। वक्ताओं ने राज्य में बढ़ती बेरोजगारी, पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन, महंगाई और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर भाजपा सरकार पर सवाल उठाए। नेताओं ने कहा कि उत्तराखंड की जनता अब बदलाव चाहती है और आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरेगी। सभा में मौजूद नेताओं ने राहुल गांधी के उत्तराखंड से विशेष लगाव का उल्लेख करते हुए कहा कि मौसम खराब होने के बावजूद उन्होंने जनसभा को संबोधित कर कार्यकर्ताओं के प्रति अपनी प्रतिब(ता दिखाई है। अल्मोड़ा की जनसभा को कांग्रेस शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि मौसम ने राहुल गांधी की भौतिक उपस्थिति को रोक दिया, लेकिन डिजिटल माध्यम से उनका संबोधन पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए संदेश देने में सफल रहा। अपने संबोधन में राहुल गांधी ने कहा कि उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार, किसानों को बेहतर सुविधाएं और पहाड़ों को पलायन से मुक्ति दिलाना कांग्रेस की प्राथमिकता है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से जनता के बीच जाकर उनके मुद्दों को उठाने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने का आह्वान किया।

वर्चुअल’ रणभूमि में उतरे ‘सियासी यो(ा’

उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की जंग के लिए सोशल मीडिया का मैदान तैयार ---भाजपा और कांग्रेस ने डिजिटल सेना को किया सक्रिय ---फेसबुक-एक्स-इंस्टाग्राम पर शुरू हुई नैरेटिव की लड़ाई ---डिजिटल वालंटियर लगातार प्रचार अभियान चला रहे देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी भले ही समय बाकी हो, लेकिन चुनावी जंग की शुरुआत सोशल मीडिया पर हो चुकी है। राजनीतिक दलों ने यह समझ लिया है कि आज के दौर में चुनावी माहौल केवल जनसभाओं और रैलियों से नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर बनने वाले नैरेटिव से भी तय होता है। यही कारण है कि भाजपा, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने अपनी डिजिटल टीमों को सक्रिय कर दिया है। बीते कुछ महीनों में उत्तराखंड की राजनीति से जुड़े मुद्दों पर सोशल मीडिया गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार की उपलब्धियों, यूसीसी, चारधाम यात्रा, सड़क और रेल परियोजनाओं को लेकर भाजपा समर्थक पेज और डिजिटल वालंटियर लगातार प्रचार अभियान चला रहे हैं। वहीं कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं और पर्वतीय क्षेत्रों की बदहाली को प्रमुख मुद्दा बनाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। भाजपा नेतृत्व भी अपने कार्यकर्ताओं को सोशल मीडिया पर संयम और अनुशासन बनाए रखने के निर्देश दे चुका है, जिससे डिजिटल मोर्चे को चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव उत्तराखंड में पहला ऐसा विधानसभा चुनाव हो सकता है, जिसमें सोशल मीडिया की भूमिका निर्णायक स्तर पर दिखाई दे। राज्य के लाखों युवा मतदाता फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं। ऐसे में पार्टियां केवल भाषण नहीं, बल्कि वीडियो, रील्स, पाडकास्ट और शार्ट कंटेंट के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं। विशेष बात यह है कि इस बार राजनीतिक दलों के साथ-साथ समर्थक समूह, स्थानीय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और क्षेत्रीय डिजिटल प्लेटफार्म भी चुनावी विमर्श को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक घटनाओं पर मिनटों में प्रतिक्रियाएं, वीडियो क्लिप और पोस्ट वायरल हो रहे हैं। इससे मुद्दों की लड़ाई अब गांव की चौपाल से निकलकर मोबाइल की स्क्रीन तक पहुंच गई है। हालांकि सोशल मीडिया की इस राजनीति के साथ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। फेक न्यूज, भ्रामक सूचनाएं और ट्रोलिंग जैसे खतरे भी बढ़ रहे हैं। चुनाव नजदीक आने के साथ इन गतिविधियों में और तेजी आने की संभावना है। इसलिए राजनीतिक दलों के साथ निर्वाचन आयोग और प्रशासन की नजर भी डिजिटल मंचों पर बनी रहेगी। उत्तराखंड की राजनीति में कभी जाति, क्षेत्र और संगठनात्मक ताकत चुनावी सफलता का आधार मानी जाती थी, लेकिन 2027 की लड़ाई यह संकेत दे रही है कि अब डिजिटल प्रभाव भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सोशल मीडिया का यह महासंग्राम वास्तविक वोटों में किस हद तक बदल पाता है। उत्तराखंड में फेसबुक की टाइमलाइन, इंस्टाग्राम की रील्स, एक्स की पोस्ट और यूट्यूब के वीडियो में भी चुनाव की अभी से गूंज सुनाई देने लगी है। राजनीतिक दलों ने अपनी डिजिटल तलवारें निकाल ली हैं, अब देखना यह है कि वर्चुअल यु( का असली विजेता कौन बनता है।

‘अग्निवीर’ के बहाने कांग्रेस की सियासी ‘बिसात’

---देवभूमि के सैन्य परंपरा वाले समाज के बीच अग्निवीर योजना को बनाया प्रमुख मुद्दा ---उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने खोला नया मोर्चा ---उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में सैनिक परिवारों को साधने की रहेगी पूरी कोशिश देहरादून। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। अल्मोड़ा में आयोजित जनसभा को मोबाइल के माध्यम से संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने केंद्र सरकार की अग्निवीर योजना पर एक बार फिर सवाल खड़े किए। उनके इस बयान को राजनीतिक विश्लेषक केवल एक चुनावी टिप्पणी नहीं, बल्कि उत्तराखंड जैसे सैनिक बहुल राज्य में कांग्रेस की दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति के रूप में देख रहे हैं। राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि अग्निवीर योजना युवाओं के भविष्य और सेना की पारंपरिक भर्ती व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि चार साल की सेवा के बाद अधिकांश युवाओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा। कांग्रेस लगातार इस योजना को युवाओं और सैनिक परिवारों के हितों के खिलाफ बताती रही है और उत्तराखंड दौरे में भी राहुल गांधी ने इसी मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उत्तराखंड को देश के सबसे बड़े सैनिक योगदान देने वाले राज्यों में गिना जाता है। गढ़वाल और कुमाऊं के हजारों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सेना से जुड़े हुए हैं। राज्य के लगभग हर गांव से युवा सेना में भर्ती होने का सपना देखते हैं। ऐसे में अग्निवीर योजना यहां केवल राष्ट्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक विषय भी बन गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी ने उत्तराखंड में इस मुद्दे को उठाकर सैनिक परिवारों और सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं तक सीधा संदेश पहुंचाने का प्रयास किया है। कांग्रेस का आकलन है कि सेना भर्ती की पुरानी व्यवस्था को लेकर युवाओं के बीच मौजूद असंतोष उसे राजनीतिक लाभ दिला सकता है। दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि अग्निवीर योजना सेना को आधुनिक बनाने और युवाओं को नए अवसर देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि योजना के माध्यम से युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण, अनुशासन और रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं तथा कई राज्यों और संस्थानों ने अग्निवीरों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था भी बनाई है। दरअसल, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को देखते हुए कांग्रेस ऐसे मुद्दों की तलाश में है जो सीधे जनता के जीवन और भावनाओं से जुड़े हों। बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और अग्निवीर जैसे विषय पार्टी की राजनीतिक रणनीति के केंद्र में दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी के दौरे में अग्निवीर योजना पर विशेष फोकस इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति में अग्निवीर मुद्दा और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है। कांग्रेस इसे युवाओं और सैनिक परिवारों के बीच ले जाएगी, जबकि भाजपा इसके लाभ गिनाकर जवाबी अभियान चलाएगी। ऐसे में 2027 के चुनावी संग्राम में विकास, रोजगार और पलायन के साथ-साथ अग्निवीर योजना भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन सकती है। राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा केवल संगठनात्मक मजबूती तक सीमित नहीं दिखा। अग्निवीर योजना पर हमला कर उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की है कि कांग्रेस सैनिक बहुल राज्य में उन मुद्दों को प्रमुखता से उठाएगी, जो सीधे युवाओं और फौजी परिवारों से जुड़े हैं। अब देखना यह होगा कि यह मुद्दा चुनावी मैदान में कितना प्रभाव छोड़ पाता है।

‘फेस वैल्यू’ वर्सेस ‘ग्राउंड रियलिटी’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-25 राज्य गठन से अब तक का इतिहास गवाह, विकास पीछे छूटा, हर बार नेतृत्व परिवर्तन बना बड़ा मुद्दा ---रोजगार और जमीनी मुद्दों के बीच, वोटर तलाश रहा है एक मजबूत और क्रेडिबल चेहरा ---एंटी-इंकम्बेंसी और संगठन की अंदरूनी कलह के बीच ‘चेहरे’ की ब्रांडिंग भी है आवश्यक ---पलायन का दर्द और सियासत की चाल, आम मतदाता की नजर रहेगी सिर्फ ‘कैप्टन’ पर ---उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में नेतृत्व को लेकर बढ़ रही हैं चर्चाएं देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में एक सवाल तेजी से चर्चा का विषय बनता जा रहा हैकृआखिर चुनाव में नेतृत्व का चेहरा कितना महत्वपूर्ण होगा? राज्य गठन के बाद से उत्तराखंड की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। ऐसे में आगामी चुनाव में विकास, रोजगार और पलायन के साथ-साथ नेतृत्व की लड़ाई भी प्रमुख चुनावी मुद्दा बन सकती है। राज्य की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां मुख्यमंत्री बदलने की घटनाएं आम रही हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल समय-समय पर नेतृत्व परिवर्तन के प्रयोग करते रहे हैं। ऐसे में 2027 के चुनाव में मतदाता केवल दल नहीं, बल्कि नेतृत्व की स्थिरता और विश्वसनीयता को भी परख सकते हैं। भाजपा फिलहाल सत्ता में है और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार काम कर रही है। धामी ने युवा नेतृत्व की पहचान बनाने की कोशिश की है, लेकिन चुनाव नजदीक आते-आते पार्टी के भीतर और बाहर यह चर्चा भी तेज होगी कि क्या भाजपा पूरी तरह धामी के चेहरे पर चुनाव लड़ेगी या सामूहिक नेतृत्व की रणनीति अपनाएगी। हालांकि शीर्ष नेतृत्व धामी के नाम पर मोहर लगा चुका है, लेकिन भाजपा के अंदर कुछ भी हो सकता है। वहीं कांग्रेस में स्थिति और अधिक दिलचस्प दिखाई देती है। पार्टी के पास कई अनुभवी नेता हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार कौन होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसा नेतृत्व प्रस्तुत करने की होगी जो संगठन को एकजुट रख सके और जनता के बीच भरोसे का वातावरण बना सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में अब मतदाता केवल चुनावी घोषणाओं से प्रभावित नहीं होते। वह यह भी देखना चाहते हैं कि सरकार का नेतृत्व कौन करेगा और संकट की परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता किसके पास है। चारधाम यात्रा, आपदा प्रबंधन, बेरोजगारी, पलायन और निवेश जैसे मुद्दों पर नेतृत्व की कार्यशैली भी जनता के मूल्यांकन का हिस्सा बन सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में क्षेत्रीय संतुलन भी नेतृत्व की बहस को प्रभावित करता है। गढ़वाल और कुमाऊं के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न समय-समय पर सामने आता रहा है। ऐसे में चुनाव के दौरान नेतृत्व का सवाल केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों से भी जुड़ सकता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार यदि चुनाव त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता है तो नेतृत्व का प्रभाव और अधिक बढ़ सकता है। ऐसे हालात में मजबूत और स्वीकार्य चेहरा चुनावी लाभ दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। फिलहाल भाजपा और कांग्रेस दोनों ही विकास, संगठन विस्तार और जनसंपर्क अभियानों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव करीब आएंगे, नेतृत्व को लेकर चर्चाएं और तेज होना तय है। उत्तराखंड की राजनीति में यह प्रश्न बार-बार उठता रहा है कि जनता पार्टी को वोट देती है या चेहरे को। 2027 का चुनाव इस बहस का नया अध्याय लिख सकता है। बाक्स आमने सामने भाजपा सत्ता विरोधी माहौल को नेतृत्व के जरिए संतुलित करने की चुनौती सीएम धामी के कार्यकाल का मूल्यांकन चुनावी बहस का भी हिस्सा संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखने की चुनौती कांग्रेस मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर स्पष्टता की मांग बढ़ेगी वरिष्ठ व युवा नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना होगा सत्ता का विकल्प बनने के लिए नेतृत्व पर भरोसा नेतृत्व विकास का मुद्दा उत्तराखंड में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे हमेशा चुनावी केंद्र में रहते हैं। लेकिन यदि राजनीतिक दलों के भीतर नेतृत्व को लेकर असमंजस या प्रतिस्पर्धा बढ़ती है तो चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा नेतृत्व की बहस की ओर भी मुड़ सकता है। ऐसे में 2027 का चुनाव केवल नीतियों का नहीं, बल्कि भरोसेमंद नेतृत्व की तलाश का चुनाव भी बन सकता है।

उत्तराखंड में समय से पहले ‘महासंग्राम’

विधानसभा चुनाव अभी दूर, लेकिन दिल्ली के दिग्गजों ने पहाड़ में डाला डेरा ---बीजेपी के चक्रव्यूह को भेदने मैदान में उतरे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ---पहाड़ की ढलान और मैदान की बिसात पर सीधी नजर, भाजपा सकते में दिखी ---भगवा खेमे की ताबड़तोड़ सक्रियता के बीच राहुल गांधी की एंट्री होगी दिलचस्प ---भाजपा के मजबूत चुनावी अभियान के बीच कांग्रेस का उत्तराखंड में चुनावी बिगुल देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इस समय भाजपा और कांग्रेस दोनों चुनावी मोड में दिखाई दे रही हैं। हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी राज्य में लगातार दौरे कर संगठन को सक्रिय किया है। ऐसे में राहुल गांधी का दौरा स्पष्ट संकेत देता है कि 2027 का चुनावी संग्राम समय से पहले शुरू हो चुका है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाधी का दो दिवसीय उत्तराखंड दौरा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विधानसभा चुनाव 2027 के लिए कांग्रेस के चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के लगातार तीसरे कार्यकाल की तैयारी के बीच कांग्रेस के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई जैसा है। 2017 और 2022 में हार का सामना कर चुकी कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट करना और जनता के बीच भरोसा वापस हासिल करना है। इसी कारण राहुल गांधी का यह दौरा जनसभा से अधिक संगठनात्मक मजबूती पर केंद्रित दिखाई दे रहा है। कांग्रेस ने राहुल गांधी के कार्यक्रमों को रणनीतिक रूप से तैयार किया है। अल्मोड़ा में जनसभा के माध्यम से कुमाऊं क्षेत्र को साधने की कोशिश है, जबकि पौड़ी में पूर्व सैनिकों से संवाद के जरिए सेना और अग्निपथ योजना से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में लाने का प्रयास किया जा रहा है। अगले दिन देहरादून में पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने का संदेश दिया जाएगा। कांग्रेस इस दौरे के माध्यम से महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, भ्रष्टाचार, महिलाओं की सुरक्षा और चारधाम यात्रा व्यवस्थाओं जैसे मुद्दों को केंद्र में लाना चाहती है। वहीं भाजपा इसे राहुल गांधी की पारंपरिक राजनीतिक यात्रा बताते हुए ज्यादा महत्व नहीं दे रही है। लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि राहुल गांधी की मौजूदगी से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार होना तय है। वास्तव में यह दौरा केवल दो दिनों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की दिशा तय करने वाला राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस पहाड़ की नाराजगी, युवाओं की बेचौनी और संगठन की नई संरचना के सहारे सत्ता वापसी का सपना देख रही है, जबकि भाजपा अपने विकास और स्थिरता के एजेंडे पर जनता का समर्थन बनाए रखने की कोशिश में जुटी है। ऐसे में राहुल गांधी का उत्तराखंड आगमन चुनावी शतरंज की नई चाल के रूप में देखा जा रहा है।

दिल्ली पहुंची ‘काकरोच’ की डिजिटल सेना

जनमुद्दों की लड़ाई को दिया राष्ट्रीय मंच, न कोई बड़ा नेता, न राजनीतिक वंश क्रासर ---बिना नेता के आंदोलन ने खींचा ध्यान, जनआंदोलनों की तर्ज पर सभी मुद्दें ---पारंपरिक राजनीति से मोहभंग के बीच नई तरह की जनभागीदारी का दावा ---शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के मुद्दे पर दिल्ली में चल रहा अनोखा प्रदर्शन देहरादून। सोशल मीडिया से जन्मी कांकरोच जनता पार्टी अब देश की राजधानी दिल्ली पहुंच गई है। अपने अनोखे नाम और पारंपरिक राजनीति से अलग अंदाज के कारण चर्चा में रहने वाला यह संगठन अब जनमुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए दिल्ली पहुंच चुका है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर काकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर काकरोच ने सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। बता दें कि कुछ ही दिनों पहले तक काकरोच जनता पार्टी को इंटरनेट पर एक व्यंग्य और मजाक के रूप में देखा जा रहा था वह अब लाखों युवाओं के समर्थन के साथ एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक अभियान का रूप लेता दिखाई दे रहा है। काकरोच जनता पार्टी की शुरुआत उस समय हुई जब सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान सीजेआई द्वारा कुछ युवाओं को लेकर की गई टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इसके बाद अभिजित दिपके ने व्यंग्यात्मक अंदाज में काकरोच जनता पार्टी नाम से अभियान शुरू किया। देखते ही देखते इसके सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर करोड़ों फालोअर्स जुड़ गए और अब यह शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को लेकर खुलकर आवाज उठा रहा है। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि काकरोच जनता पार्टी भविष्य में चुनावी राजनीति में कदम रखेगी या नहीं, लेकिन भारतीय राजनीति के इतिहास में कई बड़े राजनीतिक दल जन आंदोलनों से ही जन्मे और बाद में सत्ता तक पहुंचे। ज्ञात हो कि लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी ताकत जनता होती है। इतिहास बताता है कि जब जनता अपने मुद्दों के लिए संगठित होकर आवाज उठाती है, तो सत्ता को उसकी बात सुननी पड़ती है। यही कारण है कि जनमुद्दों पर खड़े हुए आंदोलन केवल विरोध का माध्यम नहीं होते, बल्कि वह राजनीतिक बदलाव की नई इबारत भी लिखते हैं। डिजिटल प्लेटफार्म से बनी कांकरोच जनता पार्टी का आंदोलन पहले सोशल मीडिया पर चल रहा था जो अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों तक पहुंच गया है। किसी बड़े चेहरे, स्थापित नेता या राजनीतिक परिवार के बिना चल रहा यह आंदोलन अपने अनोखे नाम और पारंपरिक राजनीति के खिलाफ मुखर तेवरों के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है। दिल्ली में कांकरोच जनता पार्टी के बैनर तले जुटे कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने दावा किया कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि उन मुद्दों के लिए है जिन्हें मुख्यधारा की राजनीति लगातार नजरअंदाज करती रही है। आज के बदलते दौर में सोशल मीडिया पर आमजन का जमावड़ा इतिहास बदलने की ओर अग्रसर है। दिल्ली में आयोजित प्रदर्शन यह साबित करने के लिए काफी है। कांकरोच जनता पार्टी के समर्थक अपने आंदोलन की उन आंदोलनों से कर रहे है जो किसी एक नेता की नहीं थी, बल्कि जनभावनाओं और जनसहभागिता का परिणाम थी। उस दौर में गांव-गांव से लोग बिना किसी राजनीतिक लाभ की अपेक्षा के सड़कों पर उतरे थे। आज कांकरोच आंदोलन भी उसी भावना को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। युवाओं के बीच पारंपरिक दलों के प्रति असंतोष नई तरह की राजनीतिक अभिव्यक्तियों को जन्म दे रहा है। बाक्स कांकरोच जनता पार्टी का दावा कांकरोच जनता पार्टी से जुडे़ युवाओं का दावा है कि उसका आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष या राजनीतिक महत्वाकांक्षा का आंदोलन नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज है जो वर्षों से अपनी समस्याओं के समाधान का इंतजार कर रहे हैं। संगठन का मानना है कि जब तक जनमुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक उन पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाएगा। इसी सोच के साथ कांकरोच जनता पार्टी ने राजधानी दिल्ली में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। प्रदर्शन के दौरान युवाओं ने रोजगार, पलायन और बढ़ती आर्थिक असमानता के मुद्दों को जोरदार ढंग से उठाया। कांकरोच जनता पार्टी की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जा रही है कि यह किसी एक बड़े नेता के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। संगठन अपने आप को जनआधारित मंच बताता है, जहां मुद्दों को व्यक्ति से ऊपर रखा जाता है। यही कारण है कि दिल्ली में भी संगठन ने किसी बड़े राजनीतिक चेहरे को आगे करने के बजाय सामूहिक नेतृत्व का संदेश देने का प्रयास किया। दिल्ली की सड़कों पर गूंजे इस आंदोलन ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या भारतीय राजनीति में मुद्दों पर आधारित नए जनआंदोलनों के लिए जगह बन रही है, या फिर यह भी समय के साथ एक प्रतीकात्मक पहल बनकर रह जाएगा। आंदोलनों ने राजनीतिक व्यवस्था को बदला उत्तराखंड राज्य आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 1990 के दशक में पहाड़ के लोगों ने अलग राज्य की मांग को लेकर लंबा संघर्ष किया। इस आंदोलन का कोई एक सर्वमान्य नेता नहीं था, बल्कि गांव-गांव से उठी जनभावनाओं ने इसे शक्ति दी। महिलाओं, युवाओं, कर्मचारियों और छात्रों ने आंदोलन को जनआंदोलन बनाया। अंततः केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ। इस आंदोलन ने न केवल एक नया राज्य बनाया बल्कि उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण भी बदल दिए। इसके साथ ही 1974 में शुरू हुआ संपूर्ण क्रांति आंदोलन भी जनशक्ति की ताकत का बड़ा उदाहरण है। महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया। आंदोलन के प्रभाव ने तत्कालीन केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। इसके बाद देश ने आपातकाल और फिर सत्ता परिवर्तन का दौर देखा। यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े राजनीतिक बदलावों में गिना जाता है। 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ चला आंदोलन भी जनभावनाओं की ताकत का उदाहरण बना। दिल्ली के रामलीला मैदान से उठी आवाज पूरे देश में गूंजी। लाखों लोगों ने इसमें भागीदारी की। इस आंदोलन ने न केवल भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया बल्कि देश में नई राजनीतिक शक्तियों के उभरने का रास्ता भी तैयार किया। हाल के वर्षों में किसान आंदोलन ने भी यह साबित किया कि संगठित जनदबाव सरकारों को अपने फैसले बदलने के लिए मजबूर कर सकता है। लंबे आंदोलन और लगातार जनसमर्थन के बाद केंद्र सरकार को कृषि कानून वापस लेने पड़े। यह लोकतंत्र में जनशक्ति की प्रभावशीलता का ताजा उदाहरण माना जाता है।

बुधवार, 3 जून 2026

आखिर कौन है असली उत्तराखंडी’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-25 मूल निवास, भू-कानून और क्षेत्रीय अस्मिता पर सिमट सकता है सियासी विमर्श ---राज्य आंदालन की मूल भावना को फिर से मिल रही है आवाज ---विकास के साथ अस्मिता भी बनेगी इस बार विस चुनाव में मुद्दा ---पलायन, जमीन व सांस्कृतिक अस्तित्व के मुद्दों पर बढे़गा दबाव देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, प्रदेश की राजनीति में पहचान और अस्मिता का मुद्दा केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ वर्षों में मूल निवास, सशक्त भू-कानून, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार में प्राथमिकता और पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान को बचाने की मांग लगातार मजबूत हुई है। यही कारण है कि राजनीतिक दल अब विकास के साथ-साथ पहचान आधारित मुद्दों पर भी अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल भावना में भी क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार का प्रश्न शामिल था। राज्य गठन के इतने साल बाद भी बड़ी संख्या में लोग मानते हैं कि उनकी अपेक्षाएं पूरी तरह पूरी नहीं हुई हैं। विशेषकर पहाड़ी जिलों में पलायन, भूमि खरीद की बढ़ती प्रवृत्ति और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर चिंताएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। प्रदेश में मूल निवास 1950 की मांग और मजबूत भू-कानून को लेकर कई सामाजिक संगठनों ने आंदोलन किए हैं। इन आंदोलनों ने युवाओं और प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच भी व्यापक समर्थन हासिल किया है। यही कारण है कि राजनीतिक दल इन मुद्दों को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं हैं। भाजपा सरकार ने समान नागरिक संहिता, भू-कानून में संशोधन और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण जैसे कदमों को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया है। वहीं कांग्रेस सरकार को घेरते हुए यह सवाल उठा रही है कि राज्य आंदोलन की मूल भावना के अनुरूप स्थानीय लोगों को कितना लाभ मिला। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल सड़क, बिजली और पानी तक सीमित नहीं रहेगा। कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों में स्थानीय पहचान, रोजगार में स्थानीय युवाओं की भागीदारी और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दे मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि चुनाव में विकास, महिला मतदाता, अनुसूचित जाति वोट बैंक और सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, लेकिन पहचान का प्रश्न इन सभी मुद्दों को जोड़ने वाला साझा राजनीतिक सूत्र बन सकता है। भाजपा का दावा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को मजबूत करने के लिए कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए हैं। पार्टी इन उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। वही कांग्रेस का कहना है कि पहचान केवल नारों से नहीं बल्कि स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन रोकने और संसाधनों पर स्थानीय अधिकार सुनिश्चित करने से मजबूत होगी। पार्टी इन सवालों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है। उत्तराखंड राज्य का गठन पहाड़ के पानी और पहाड़ की जवानी को बचाने के संकल्प के साथ हुआ था। लेकिन आज राज्य की जनता के सामने दो बड़े संकट हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बाहरी लोग आकर पहाड़ों में अंधाधुंध जमीनें खरीद रहे हैं, जिससे डेमोग्राफी बदल रही है। लोग हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर सख्त भू-कानून की मांग कर रहे हैं, ताकि कृकृषि और आवासीय जमीनों को सुरक्षित रखा जा सके। इसके आंदोलनकारियों की मांग है कि राज्य में नौकरियों और अन्य संसाधनों पर पहला हक उनका हो जिनके पूर्वज 1950 से यहां रह रहे हैं, न कि उनका जो कुछ साल पहले आकर बस गए हैं। 2027 का चुनाव विकास के दावों बनाम क्षेत्रीय अस्मिता के बीच लड़ा जा सकता है और जो भी दल पहाड़ के युवाओं को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहेगा कि वह उनकी जमीन और नौकरी की रक्षा कर सकता है, सत्ता की चाबी उसी के पास जाएगी। 2027 के उत्तराखंड चुनाव केवल इस बात पर तय नहीं होंगे कि कितनी सड़कें बनीं या कितने रोजगार मिले, बल्कि इस बात पर भी तय होंगे कि उत्तराखंड का भविष्य किसके हाथों में सुरक्षित है।

देवभूमि पर ‘टिप्पणी’ से आया ‘भूचाल’

भाजपा के वरिष्ठ नेता तीरथ सिंह रावत के एक बयान ने छेड़ दी नई बहस ---देवभूमि अब देवभूमि नहीं रही जैसी टिप्पणी ने न केवल राजनीतिक दल आए आमने-सामने ---पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की पीड़ा या सरकार पर परोक्ष प्रहार, बयान के कई राजनीतिक मायने ---सत्ता पक्ष के एक वरिष्ठ नेता राज्य की पहचान पर सवाल उठाए तो स्वाभाविक है राजनीतिक गलियारों में हलचल देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता तीरथ सिंह रावत के एक बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। देवभूमि अब देवभूमि नहीं रही जैसी टिप्पणी ने न केवल राजनीतिक दलों को आमने-सामने ला दिया है, बल्कि शासन-प्रशासन की कार्यशैली और राज्य की बदलती सामाजिक तस्वीर पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। तीरथ सिंह रावत ने इस स्थिति के लिए शासन और प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है। उत्तराखंड को देशभर में देवभूमि के नाम से जाना जाता है। चारधाम, हरिद्वार, )षिकेश और अनगिनत धार्मिक स्थलों के कारण यह पहचान राज्य की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पूंजी रही है। ऐसे में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा ही देवभूमि की अवधारणा पर चिंता जताना साधारण राजनीतिक बयान नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तीरथ सिंह रावत का बयान केवल कानून-व्यवस्था या प्रशासनिक व्यवस्था पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह राज्य की बदलती सामाजिक परिस्थितियों, बढ़ते अपराध, नैतिक मूल्यों के क्षरण और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। यही कारण है कि इस बयान की गूंज सत्ता और संगठन दोनों के भीतर सुनाई दे रही है। विपक्ष ने इस बयान को लपक लिया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री स्वयं राज्य की स्थिति पर चिंता जता रहे हैं तो सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए। विपक्ष इसे सरकार की विफलताओं की स्वीकारोक्ति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है। दूसरी ओर भाजपा के भीतर भी इस बयान को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं। कुछ नेता इसे राज्य के प्रति एक वरिष्ठ नेता की चिंता बता रहे हैं, जबकि राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे सरकार और प्रशासन को चेतावनी के रूप में भी देख रहे हैं। यह पहला अवसर नहीं है जब तीरथ सिंह रावत का कोई बयान व्यापक राजनीतिक चर्चा का कारण बना हो। मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनके कई वक्तव्य राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बने थे। 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच आया यह बयान भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। पार्टी जहां विकास, निवेश और धार्मिक पर्यटन को अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश कर रही है, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री का बयान विपक्ष को नया राजनीतिक हथियार दे सकता है। कांग्रेस अब इस मुद्दे को कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जवाबदेही से जोड़कर सरकार को घेरने की रणनीति बना सकती है। पार्टी नेताओं का मानना है कि जब सवाल सत्ता पक्ष के वरिष्ठ नेता की ओर से उठे हैं तो उनकी राजनीतिक गंभीरता और बढ़ जाती है। क्या तीरथ सिंह रावत का यह बयान केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है या फिर उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति को लेकर भाजपा के भीतर मौजूद बेचौनी का संकेत? इसका जवाब आने वाले दिनों की राजनीति तय करेगी। देवभूमि की पहचान केवल मंदिरों और तीर्थों से नहीं, बल्कि समाज की आस्था, संस्कृति और व्यवस्था से भी बनती है। पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत के बयान ने इसी पहचान को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। अब देखना यह होगा कि यह बहस राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहती है या सरकार को आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है।

पहाड़ में पलायन ने छीनी ‘बचपन की छांव’

---पहाड़ के गांवों में दादा-दादी और नाना-नानी से दूर हो रहे नौनिहाल, टूट रहे रिश्तों के अनकहे धागे ---रोजगार की तलाश में शहरों की ओर बढ़ते कदमों ने बच्चों के बचपन से भी बुजुर्गों का स्नेह छीना ---पहाड़ की सामाजिक संस्कृति की सबसे मजबूत कड़ी पर लग गई है आज पलायन की नजर देहरादून। पहाड़ के चमोली जिले के दरमोड़ा गांव में 75 वषीय कमला देवी हर शाम घर के आंगन में बैठकर सड़क की ओर देखती हैं। उनकी आंखें किसी राहगीर को नहीं, बल्कि उस उम्मीद को तलाशती हैं कि शायद इस बार छुट्टियों में उनका पोता घर आ जाए। पोता अब देहरादून के एक निजी स्कूल में पढ़ता है। साल में एक-दो बार ही गांव आ पाता है। मोबाइल पर बात तो होती है, लेकिन कमला देवी कहती हैं, फोन में बच्चे की आवाज सुनाई देती है, उसकी हंसी नहीं दिखती। उत्तराखंड के पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन ने केवल गांवों की आबादी कम नहीं की है, बल्कि पीढ़ियों के बीच मौजूद आत्मीय रिश्तों को भी कमजोर कर दिया है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में हजारों परिवार शहरों में बस गए हैं। इसके साथ ही बच्चों और उनके दादा-दादी, नाना-नानी के बीच का वह रिश्ता भी दूर होता जा रहा है, जो कभी पहाड़ की सामाजिक संस्कृति की सबसे मजबूत कड़ी हुआ करता था। एक समय था जब गांवों के आंगन बच्चों की किलकारियों से गूंजते थे। दादी की कहानियां, नानी के लोकगीत, दादा के अनुभव और नाना की सीख बच्चों के व्यक्तित्व का हिस्सा बनते थे। आज इन आंगनों में सन्नाटा है। बुजुर्ग अकेले हैं और बच्चे शहरों की भागदौड़ में अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। पौड़ी जिले के पाटयों गांव में रहने वाले 82 वर्षीय मोहन सिंह बताते हैं कि उनका नाती दिल्ली में रहता है। जब वह छोटा था तो हर गर्मियों में गांव आता था। अब पढ़ाई और कोचिंग के कारण वर्षों निकल जाते हैं। कभी-कभी वीडियो कॉल पर बात हो जाती है, लेकिन वह बात कहां जो गोद में बैठकर होती थी। समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं, भावनात्मक भी है। बच्चों को बुजुर्गों का अनुभव और संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं, वहीं बुजुर्ग अकेलेपन और उपेक्षा की भावना से जूझ रहे हैं। संयुक्त परिवारों के टूटने और पलायन की बढ़ती प्रवृत्ति ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया है। पहाड़ की लोक संस्कृति में बुजुर्ग केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि परंपराओं और लोक ज्ञान के जीवित स्रोत होते थे। लोककथाएं, रीति-रिवाज, त्योहारों की परंपराएं और स्थानीय इतिहास बच्चों तक इन्हीं के माध्यम से पहुंचता था। अब यह श्रृंखला धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पहाड़ों में रोजगार और शिक्षा के बेहतर अवसर विकसित किए जाएं तो पलायन की गति को कम किया जा सकता है। इससे न केवल गांवों की रौनक लौटेगी, बल्कि परिवारों के बिखरते रिश्तों को भी नई मजबूती मिलेगी। आज भी पहाड़ के हजारों गांवों में कई दादा-दादी और नाना-नानी अपने बच्चों और पोते-पोतियों की राह देख रहे हैं। उनके लिए सबसे बड़ी खुशी कोई सरकारी योजना या आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि घर के आंगन में गूंजती अपने बच्चों की किलकारी है। पलायन ने पहाड़ के गांवों से केवल लोगों को नहीं छीना, उसने बच्चों के बचपन से दादी की कहानियां, नानी की ममता और दादा के अनुभवों की वह अमूल्य धरोहर भी छीन ली है, जो किसी किताब या मोबाइल स्क्रीन पर नहीं मिल सकती।

चुनावी वैतरणी में ‘आल वेदर रोड’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-24 चारधाम आल वेदर रोड परियोजनाः विकास की पहचान या जनसरोकारों का सवाल ---भाजपा बताएगी अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि, कांग्रेस उठा सकती है पर्यावरण और विस्थापन के सवाल ---सड़क चौड़ीकरण, पर्यटन और रोजगार के दावे बनाम भूस्खलन और पारिस्थितिकी की चिंता ---देश-विदेश के हजारों तीर्थयात्रियों की सुविधा और पहाड़ की संवेदनशीलता के बीच होगी चुनावी जंग देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही विकास और पर्यावरण के मुद्दे फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आने लगे हैं। लगभग 12000 करोड़ रुपये की लागत वाली 900 किलोमीटर लंबी चारधाम आल वेदर रोड परियोजना इस समय सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए सबसे बड़ा चुनावी हथियार बन चुकी है। एक तरफ जहां यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सुगम धार्मिक पर्यटन का मुख्य जरिया बनी है, वहीं दूसरी तरफ यह पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है, जिससे जनता के बीच कशमकश की स्थिति है। सत्ता पक्ष चीन सीमा से सटे )षिकेश-माना और गंगोत्री मार्गों की 10 मीटर चौड़ाई को देश की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य बता रहा है। रिकार्ड तोड़ धार्मिक पर्यटन और होमस्टे क्रांति को रिवर्स-पलायन का जरिया बताकर भाजपा इसे अपना सबसे मजबूत चुनावी ट्रंप कार्ड मान रही है। भाजपा के लिए यह महत्वाकांक्षी परियोजना चुनावी वैतरणी पार करने का एक मजबूत आधार है। सरकार इसे अपनी डबल इंजन सरकार की सबसे बड़ी बुनियादी ढांचागत उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। इसके केंद्र में पहला मुद्दा सामरिक महत्व का है। )षिकेश-माना-गंगोत्री और टनकपुर-पिथौरागढ़ जैसे मार्ग सीधे चीन सीमा को जोड़ते हैं। हाल के वर्षों में भारत-चीन सीमा पर उपजे विवादों के मद्देनजर, सेना के भारी टैंक, मिसाइल लान्चर और सैन्य रसद को सीमा तक तेजी से पहुंचाने के लिए इन सड़कों का डबल-लेन होना बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी दिसंबर 2021 में देश की सुरक्षा चिंताओं को सर्वाेपरि मानते हुए इस चौड़ाई को हरी झंडी दी थी। दूसरा बड़ा पहलू धार्मिक पर्यटन और आर्थिकी का है। आल वेदर रोड बनने से चारधाम की यात्रा अब बारहमासी और अत्यधिक सुगम होने का दावा किया जा रहा है। यात्रा सुगम होने से राज्य में रिकार्ड तोड़ श्र(ालु पहुंच रहे हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर होटल, होमस्टे, टैक्सी आपरेटरों और छोटे व्यापारियों की आर्थिकी में अभूतपूर्व उछाल आया है। सरकार इसे पहाड़ से होने वाले पलायन को रोकने वाले एक बड़े आर्थिक हथियार के रूप में जनता के सामने रख रही है। विपक्ष और पर्यावरणविदों का आरोप है कि पहाड़ों को 90 डिग्री के सीधे वर्टिकल कट दिए जाने से सैकड़ों नए लैंडस्लाइड जोन बन गए हैं। भागीरथी इको-सेंसिटिव जोन में जंगलों का कटान और नदियों में मलबे की डंपिंग से धराली जैसी फ्लैश फ्लड की घटनाएं बढ़ रही हैं। पर्यावरणविदों के अनुसार सड़कों को चौड़ा करने के लिए पहाड़ों को अवैज्ञानिक तरीके से सीधे वर्टिकल कट दिए जा रहे हैं, जिससे संवेदनशील और कच्चे हिमालयी पहाड़ पूरी तरह अस्थिर हो चुके हैं। इसके कारण चारधाम मार्गों पर सैकड़ों नए भूस्खलन क्षेत्र पैदा हो गए हैं, जो बरसात के दिनों में यात्रियों और स्थानीय निवासियों की जान के लिए खतरा बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, सड़क चौड़ीकरण से निकलने वाले लाखों टन मलबे को सीधे नदियों और बरसाती गदेरों में डंप किया जा रहा है। इससे नदियों का तल उथला हो रहा है, पानी के प्राकृतिक स्रोत सूख रहे हैं और जोशीमठ जैसी जमीन धंसने की घटनाएं अन्य संवेदनशील गांवों में भी पैर पसार रही हैं। उत्तराखंड का मतदाता इस समय एक बेहद अजीब द्वंद्व से गुजर रहा है। पहाड़ का आम नागरिक बेहतर बुनियादी ढांचा, चौड़ी सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार की आकांक्षा तो रखता है, लेकिन वह हालिया वर्षों में आई प्राकृतिक आपदाओं और अपने पुश्तैनी गांवों के दरकने से डरा हुआ भी है। सीमावर्ती जिलों जैसे उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग के स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि सड़कें सुगम होने से व्यापारिक गतिविधियां निश्चित रूप से बढ़ी हैं, लेकिन मानसून आते ही जब पहाड़ दरकते हैं, तो हफ्तों तक जिंदगी थम जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 2027 के चुनाव में यह मुद्दा केवल खोखली बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि सत्तारूढ़ दल राष्ट्रीय सुरक्षा और सुगम धार्मिक आर्थिकी के अपने राष्ट्रवाद प्रेरित नैरेटिव से जनता का भरोसा बरकरार रख पाता है, या विपक्ष पहाड़ के अस्तित्व, मलबे की डंपिंग और पर्यावरणीय तबाही के स्थानीय मुद्दों को वोट बैंक में तब्दील करने में कामयाब होता है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में चारधाम प्रोजेक्ट दो अलग-अलग राजनीतिक नैरेटिव के रूप में सामने आ सकता है। भाजपा इसे विकास, धार्मिक पर्यटन और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की सफलता के रूप में प्रचारित करेगी, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल पर्यावरणीय चुनौतियों, भू-स्खलन और स्थानीय चिंताओं को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करेंगे। स्पष्ट है कि उत्तराखंड की राजनीति में चारधाम प्रोजेक्ट केवल एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि विकास, आस्था, पर्यावरण और जनसरोकारों के बीच संतुलन की बहस का प्रतीक बन चुका है। यही वजह है कि 2027 के चुनावी रण में यह मुद्दा मतदाताओं के बीच व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है। बाक्स भाजपा का दावा और कांग्रेस के सवाल भाजपा का दावा है कि चारधाम प्रोजेक्ट के कारण यात्रा मार्ग पहले की तुलना में अधिक सुगम हुए हैं, यात्रा समय कम हुआ है और पर्यटन तथा स्थानीय कारोबार को नई गति मिली है। पार्टी आगामी चुनाव में इसे अपनी उपलब्धियों की सूची में प्रमुख स्थान दे सकती है। साथ ही यह संदेश देने का प्रयास होगा कि केंद्र और राज्य सरकार ने धार्मिक पर्यटन को नई पहचान दी है। दूसरी ओर कांग्रेस और विभिन्न सामाजिक संगठन परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि सड़क चौड़ीकरण के दौरान बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई और पहाड़ों की अनियोजित कटिंग से कई स्थानों पर भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। विपक्ष का कहना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय लोगों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पहाड़ काटकर हो रही अवैध प्लाटिंग

पेड़ों का किया जा रहा अवैध कटान, भूस्खलन की चपेट में है पहाड़ी जमीनों के अंधाधुंध दोहन को लेकर सियासत एक बार फिर गरमाई टिहरी के मदन नेगी के ग्राम रौलाकोट में हो रही है बेतरतीब प्लाटिंग देहरादून। उत्तराखंड में मजबूत भू-कानून की मांग और जमीनों के अंधाधुंध दोहन को लेकर सियासत एक बार फिर गरमा गई है। युवा नेता मोहित डिमरी ने जिला टिहरी के मदन नेगी तहसील अंतर्गत ग्राम रौलाकोट में हो रही बेतरतीब प्लाटिंग को लेकर सरकार, प्रशासन और भू-माफियाओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने ऐतिहासिक डोबरा-चांठी पुल के ठीक ऊपर हो रहे इस निर्माण कार्य को भविष्य की बड़ी तबाही का संकेत बताया है। युवा नेता मोहित डिमरी ने सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफार्म्स के जरिए अपनी चिंता साझा करते हुए कहा कि जिस डोबरा-चांठी पुल को टिहरी की जनता ने दशकों के इंतजार के बाद अपनी अस्मिता का प्रतीक माना, आज उसी के ठीक ऊपर पूरा पहाड़ काटकर पर्यावरण की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ग्रामीणों से करीब 80 से 100 नाली जमीन कौड़ियों के दाम पर खरीदी गई और अब पैसों की हवस में अंधा होकर वहाँ बेतरतीब तरीके से पेड़ काटे जा रहे हैं। पहाड़ का सीना चीरा जा रहा है, जिससे झींवाली-औखला मोटरमार्ग भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो रहा है। डिमरी ने क्षेत्र की संवेदनशीलता का हवाला देते हुए सरकार से तीखे सवाल किए। उन्होंने कहा कि यह पूरा इलाका बेहद संवेदनशील और लैंडस्लाइड-प्रोन जोन में आता है। क्या हम विकास के नाम पर विनाश का वो मंजर भूल गए जो हमने हाल ही में जोशीमठ में देखा था? अगर यह पूरा पहाड़ दरक कर नीचे डोबरा-चांठी पुल और टिहरी झील में समा गया, तो इस भारी तबाही की जिम्मेदारी कौन लेगा? प्रशासन और भू-माफिया इस सच से आंखें मूंदे बैठे हैं। जमीन के इस खेल के आर्थिक गणित को सामने रखते हुए पूर्व विधायक प्रत्याशी ने कहा कि ग्रामीणों को बहला-फुसलाकर औने-पौने दाम पर जमीनें ली गईं। आज उसी जमीन पर 120 गज के प्लाट 30 से 35 लाख रुपये में बेचे जा रहे हैं। यहाँ सिर्फ प्लाटिंग ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े रसूखदारों के लिए लग्जरी डुप्लेक्स, विला और कमर्शियल कंस्ट्रक्शन की बड़ी तैयारी चल रही है। उत्तराखंड में लंबे समय से चल रही हिमाचल की तर्ज पर सशक्त भू-कानून की मांग को दोहराते हुए मोहित डिमरी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार को भी कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा क्या यही है धामी का नया भू-कानून? जहाँ एक तरफ हमारी कृषि भूमि और जंगलों को बचाने की बात होती है, वहीं दूसरी ओर रसूखदारों के आलीशान होटल और रौलाकोट जैसी अंधाधुंध प्लाटिंग को छूट मिली हुई है। भू-माफिया यहाँ आते हैं, प्रकृति का दोहन करते हैं, जेबें भरते हैं और चले जाते हैं। लेकिन इसका सीधा नुकसान यहाँ के मूल निवासियों को भुगतना पड़ रहा है। हमारी सांस्कृतिक पहचान खत्म हो रही है और राज्य की डेमोग्राफी बदल रही है। मोहित डिमरी ने टिहरी जिला प्रशासन और उत्तराखंड सरकार से मांग की है कि ग्राम रौलाकोट में डोबरा-चांठी पुल के ऊपर हो रही इस अवैध प्लाटिंग और पेड़ों के कटान को प्रभाव से रोका जाए। इस बात की उच्च स्तरीय जांच हो कि भू-धंसाव वाले इस संवेदनशील क्षेत्र में कमर्शियल प्लाटिंग और विला बनाने की अनुमति किसने और किस आधार पर दी? उन्होंने पहाड़ के सीधे-सादे ग्रामीणों से भावुक अपील करते हुए कहा कि वे पैसों के प्रलोभन में आकर अपनी पुश्तैनी जमीनें न बेचें। आज भले ही कुछ लाख रुपये मिल रहे हैं, लेकिन कल जब बच्चों के पास पैर रखने की जमीन नहीं होगी, तो हमारी नस्लें हमें माफ नहीं करेंगी। यह जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं, हमारी अस्मिता और पुरखों की विरासत है, जिसे माफियाओं के हवाले नहीं किया जा सकता।

स्वाद में ‘देसी’ और डिमांड में ‘विदेशी’

कोदे की रोटी: कभी मोटा अनाज कहकर थाली से बाहर किया, आज वही बनी महंगा सुपरफूड ---कभी मजबूरी का भोजन मानी जाती थी मड़ुआ की रोटी, आज स्वास्थ्यवर्धक आहार के रूप में बढ़ी मांग ---कैल्शियम, आयरन और फाइबर से भरपूर कोदा बना आधुनिक जीवनशैली का पसंदीदा अनाज ---उत्तराखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति को नई पहचान दिला रही है कोदे की रोटी ---आज इंटरनेट पर ट्रेंड कर रहा पहाड़ का कोदा, फिटनेस फ्रीक्स भी हुए इसके दीवाने ---पिज्जा-बर्गर छोड़ अब मड़ुए की रोटी के पीछे भाग रही है पूरी दुनिया देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में सदियों से लोगों के जीवन और संस्कृति का हिस्सा रही कोदे की रोटी आज फिर चर्चा में है। कभी ग्रामीण परिवारों के दैनिक भोजन का प्रमुख हिस्सा रही यह पारंपरिक रोटी अब सुपरफूड के रूप में देश-दुनिया में पहचान बना रही है। बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच कोदा, जिसे मड़ुआ या रागी भी कहा जाता है, एक बार फिर लोगों की थाली में लौट रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में कोदे की खेती किसानों के लिए हमेशा सहारा रही है। कम पानी, कम संसाधनों और प्रतिकूल मौसम में भी यह फसल आसानी से तैयार हो जाती है। यही कारण है कि उत्तराखंड के गांवों में लंबे समय तक कोदा मुख्य खाद्यान्न के रूप में उपयोग किया जाता रहा। पारंपरिक रूप से कोदे के आटे से बनी रोटी को घी, भांग की चटनी, गहत की दाल या पहाड़ी सब्जियों के साथ खाया जाता है। इसका स्वाद जितना सादा होता है, पोषण उतना ही अधिक। विशेषज्ञों के अनुसार रागी में कैल्शियम, आयरन, प्रोटीन और फाइबर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। मधुमेह और मोटापे जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए भी इसे लाभकारी माना जाता है। समय के साथ जब बाजार में गेहूं और चावल की उपलब्धता बढ़ी तो कोदे की खेती और इसके सेवन में कमी आने लगी। कई परिवारों ने इसे पिछड़ेपन और गरीबी से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। लेकिन अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पोषण वैज्ञानिकों की सलाह के बाद इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। राज्य सरकार और विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाएं भी मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए अभियान चला रही हैं। स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के प्रयासों से किसानों को बेहतर मूल्य मिलने लगा है। देहरादून, )षिकेश और अन्य शहरों के कई रेस्तरां और होटल भी अपने मेन्यू में कोदे की रोटी को शामिल कर रहे हैं। ग्रामीण महिलाओं के स्वयं सहायता समूह कोदे से बने बिस्कुट, कुकीज, लड्डू और अन्य उत्पाद तैयार कर स्वरोजगार के नए अवसर भी पैदा कर रहे हैं। इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है, बल्कि पारंपरिक कृषि और खानपान संस्कृति का संरक्षण भी हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में कोदा जैसे मोटे अनाज भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। कम संसाधनों में उत्पादन और उच्च पोषण मूल्य इसे अन्य फसलों से अलग बनाता है। उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा और स्वास्थ्य का प्रतीक बन चुकी कोदे की रोटी आज नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी बन रही है। कभी पहाड़ की साधारण थाली में परोसी जाने वाली यह रोटी अब वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में पहचान बना रही है।

‘कैलाश’ की राह पर फिर लौटे ‘कारवां’

सदियों पुराने लिपुलेख दर्रे पर फिर होगा व्यापार, तिब्बत तक दिखेगा असर, पिथौरागढ़ प्रशासन को मिले 300 ट्रेड पास ---पौराणिक विरासत से आधुनिक व्यापार तक खुला सीमांत समृ(ि का द्वार ---कोरोना व गलवान तनाव के बाद सात वर्षों से ठप पड़ा था सीमांत कारोबार ---तीर्थयात्रियों और व्यापारियों के सदियों पुराने इस ऐतिहासिक रूट पर फिर होगी हलचल ---भारत से मध्य एशिया को जोड़ने वाले ऐतिहासिक रूट पर व्यापारिक गतिविधियां होंगी शुरू देहरादून। हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच स्थित लिपुलेख दर्रा केवल एक व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और सभ्यताओं के संवाद का जीवंत प्रतीक रहा है। यही वह रास्ता है जिससे सदियों पहले व्यापारी, तीर्थयात्री और सांस्कृतिक दूत भारत से तिब्बत और आगे मध्य एशिया तक पहुंचते थे। अब वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इसी ऐतिहासिक मार्ग पर व्यापारिक गतिविधियां फिर से शुरू होने जा रही हैं। पिथौरागढ़ प्रशासन को विदेश मंत्रालय की ओर से 300 ट्रेड पास प्राप्त हो चुके हैं। जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगांई के अनुसार इसी सप्ताह से सीमा व्यापार की शुरुआत होने की संभावना है। कोरोना महामारी और वर्ष 2020 के गलवान घाटी तनाव के बाद बंद हुई यह व्यापारिक गतिविधि अब नए दौर में प्रवेश करने जा रही है। पौराणिक मान्यताओं में कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास माना गया है। कैलाश-मानसरोवर यात्रा के लिए जाने वाले श्र(ालुओं की पदचाप सदियों से लिपुलेख दर्रे को पवित्र बनाती रही है। कुमाऊं के व्यास, चौंदास और दारमा घाटियों के भोटिया समुदायों का जीवन भी इसी मार्ग से जुड़ा रहा है। नमक, ऊन, जड़ी-बूटियां और अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान केवल व्यापार नहीं था, बल्कि दो सभ्यताओं के बीच विश्वास और सहअस्तित्व का सेतु था। समय बदला, सीमाएं बदलीं और भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी बदलीं, लेकिन हिमालय के इन रास्तों की ऐतिहासिक भूमिका कभी समाप्त नहीं हुई। आधुनिक भारत में सड़क, संचार और सुरक्षा व्यवस्थाओं के विकास के साथ अब यह मार्ग एक बार फिर आर्थिक संभावनाओं का केंद्र बनने जा रहा है। सीमांत क्षेत्रों के लोगों के लिए यह व्यापार केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि अपनी विरासत से दोबारा जुड़ने का अवसर भी है। वर्षों से बंद पड़े कारोबार के कारण स्थानीय बाजारों, परिवहन सेवाओं और छोटे व्यापारियों पर असर पड़ा था। व्यापार बहाली से इन क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से भी यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक ओर भारत अपनी सीमाओं पर आधुनिक आधारभूत ढांचे को मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सीमांत क्षेत्रों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास भी जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत सीमाएं केवल सैनिक चौकियों से नहीं, बल्कि समृ( और जीवंत सीमांत समाज से भी बनती हैं। हजारों वर्ष पुराने कैलाश मार्ग पर जब फिर से व्यापारिक कारवां आगे बढ़ेंगे तो यह केवल सामानों का आवागमन नहीं होगा, बल्कि इतिहास और आधुनिकता का एक अनूठा संगम भी होगा। हिमालय की वादियों में गूंजती यह नई शुरुआत सीमांत उत्तराखंड के लिए विकास, संस्कृति और विरासत के नए अध्याय का संकेत मानी जा रही है।

मंगलवार, 2 जून 2026

आस्था’ की पिच पर होगा ‘सियासी’ मैच

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-23 यूसीसी, डेमोग्राफी चेंज और सख्त भू-कानून के इर्द-गिर्द घूमेगी सूबे की सियासत ---चारधाम यात्रा, मंदिर कारिडोर और धार्मिक पर्यटन पर बढ़ेगी सियासी बहस ---हिंदुत्व बनाम स्थानीय मुद्दों के बीच चुनावी रणनीति तैयार करने में जुटे दल ---संत समाज, तीर्थ पुरोहित और धार्मिक संगठनों की भूमिका भी रहेगी अहम देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। राज्य की राजनीति में इस बार धर्म और आस्था का मुद्दा प्रमुख चुनावी एजेंडा बन सकता है। चारधाम यात्रा, मंदिरों के विकास, धार्मिक पर्यटन, सनातन संस्कृति और हिंदुत्व की राजनीति को लेकर भाजपा और विपक्ष अपनी-अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। प्रदेश में लंबे समय से धार्मिक आस्था राजनीति का अहम हिस्सा रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में केदारनाथ धाम पुनर्निर्माण, बद्रीनाथ मास्टर प्लान, मानसखंड और मंदिर कारिडोर जैसी परियोजनाओं ने इस मुद्दे को और अधिक प्रभावी बना दिया है। भाजपा इन विकास कार्यों को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखने की तैयारी कर रही है। वहीं कांग्रेस स्थानीय समस्याओं, पलायन, बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दों को केंद्र में रखकर भाजपा को घेरने की रणनीति बना रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड की धार्मिक पहचान और तीर्थाटन आधारित अर्थव्यवस्था को देखते हुए धर्म आधारित राजनीति का असर पहाड़ से लेकर मैदान तक दिखाई दे सकता है। खासकर गढ़वाल क्षेत्र में चारधाम यात्रा और मंदिर विकास कार्य चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। भाजपा जहां खुद को सनातन संस्कृति का संरक्षक बताने में जुटी है, वहीं विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि धार्मिक परियोजनाओं के बावजूद आम लोगों की आर्थिक स्थिति में कितना सुधार हुआ। संत समाज और धार्मिक संगठनों की भूमिका भी चुनाव में अहम मानी जा रही है। चारधाम यात्रा व्यवस्थाओं, तीर्थ पुरोहितों के अधिकार और मंदिर समितियों से जुड़े मुद्दों पर भी राजनीतिक दल अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को भी भाजपा चुनावी विमर्श में शामिल कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड में धार्मिक आस्था लोगों की भावनाओं से सीधे जुड़ी हुई है। ऐसे में चुनावी सभाओं से लेकर सोशल मीडिया अभियान तक धर्म आधारित संदेशों का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि केवल धार्मिक मुद्दों के सहारे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा, क्योंकि जनता रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर भी जवाब चाहती है। बाक्स कांग्रेस की डायवर्जन पालिटिक्स मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के सामने धर्म की इस पिच पर सीधे उतरने का जोखिम है। इसलिए, कांग्रेस की रणनीति इस मुद्दे को सीधे खारिज करने के बजाय इसे डायवर्जन पालिटिक्स करार देने की है। विपक्ष अखबारों और सोशल मीडिया के जरिए अंकिता भंडारी मामले, केदारनाथ में सोने की चोरी के आरोप और भर्ती घोटालों को अभी से हवा दे रहा है ताकि चुनाव को वापस जनता के बुनियादी मुद्दों पर लाया जा सके। सत्तापक्ष चारधाम कारिडोर और केदारनाथ-बद्रीनाथ के पुनरुत्थान को अपनी धार्मिक प्रतिब(ता से जोड़ रहा है, वहीं स्थानीय युवाओं और क्षेत्रीय संगठनों का एक बड़ा वर्ग सोशल मीडिया पर अभियान चला रहा है कि अगर देवभूमि को बचाना है, तो हिमाचल की तर्ज पर सख्त भू-कानून लागू करो। विपक्ष इस जनभावना को भांप चुका है और वह धर्म के मुकाबले जमीन और हक-हकूक का कार्ड खेलने की फिराक में है।

पहाड़ का पारंपरिक ज़ायका है आलू की ‘थिचवाणी’

---पहाड़ की रसोई की शान इसके स्वाद में बसती है लोक संस्कृति की मिठास ---गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों में बेहद लोकप्रिय पारंपरिक व्यंजन ---सादगी, स्वाद और पौष्टिकता का अनूठा संगम है आलु की थिचवाणी ---गांव की रसोई से अब शहरों और पर्यटन स्थलों तक बढ़ गई है इसकी पहचान देहरादून। उत्तराखंड की पारंपरिक खानपान संस्कृति अपने अनोखे स्वाद और सादगी के लिए देशभर में जानी जाती है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में एक खास नाम है आलू की थिचवाणी जो पहाड़ की रसोई की पहचान मानी जाती है। कम मसालों में बनने वाला यह व्यंजन आज भी गांवों में उतना ही लोकप्रिय है, जितना वर्षों पहले हुआ करता था। पहाड़ की जीवनशैली, मौसम और स्थानीय स्वाद का अद्भुत मेल थिचवाणी में देखने को मिलता है। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में बनने वाली थिचवाणी का स्वाद थोड़ा अलग हो सकता है, लेकिन इसकी आत्मा एक जैसी ही रहती है। उबले हुए आलुओं को हाथों से दबाकर या कूटकर तैयार किया जाता है, जिसके बाद उसमें टमाटर, हरी मिर्च, जाखिया, धनिया और पारंपरिक मसालों का तड़का लगाया जाता है। पहाड़ के लोग इसे मंडुवे की रोटी, गेहूं की रोटी या चावल के साथ बड़े चाव से खाते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पुराने समय में जब लोग खेतों और जंगलों में मेहनत करते थे, तब जल्दी बनने वाला पौष्टिक भोजन बेहद जरूरी होता था। ऐसे में थिचवाणी सबसे आसान और स्वादिष्ट विकल्प मानी जाती थी। कम संसाधनों में बनने वाला यह व्यंजन आज भी ग्रामीण जीवन की सादगी को जीवित रखे हुए है। पारंपरिक पहाड़ी भोजन स्वास्थ्य की दृदृष्टि से भी बेहद लाभकारी है। आलू की थिचवाणी में स्थानीय मसालों और कम तेल का प्रयोग इसे हल्का और पौष्टिक बनाता है। यही कारण है कि अब होटल और होमस्टे संचालक भी पर्यटकों को पारंपरिक उत्तराखंडी थाली में थिचवाणी परोसने लगे हैं। उत्तराखंड में तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच पारंपरिक व्यंजनों को बचाए रखने की जरूरत महसूस की जा रही है। कई सामाजिक संगठन और महिला समूह स्थानीय खानपान को बढ़ावा देने के लिए अभियान चला रहे हैं। उनका मानना है कि पहाड़ के पारंपरिक व्यंजन केवल भोजन नहीं बल्कि यहां की संस्कृति, लोकजीवन और पहचान का हिस्सा हैं। आज आलू की थिचवाणी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मीयता और पारंपरिक जीवनशैली का प्रतीक बन चुकी है। गांव की मिट्टी से जुड़ा यह स्वाद लोगों को अपनी जड़ों की याद दिलाता है।

देवभूमि में राहुल की ‘एंट्री’ से कांग्रेस की मिलेगी ‘संजीवनी’

---कांग्रेस नेता राहुल गांधी संगठन में नई ऊर्जा भरने के लिए पहुंचेंगे उत्तराखंड ---बेरोजगारी, पलायन और महंगाई के मुद्दों पर भाजपा को घेरेंगे राहुल गांधी ---2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में बढ़ने लगा है उत्साह ---कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भरने और चुनावी शंखनाद की तैयारी तेज देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक माहौल धीरे-धीरे गर्माने लगा है। ऐसे समय में कांग्रेस नेता राहुल गांध के प्रस्तावित उत्तराखंड दौरे को पार्टी के लिए नई संजीवनी के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से संगठनात्मक चुनौतियों और चुनावी हार से जूझ रही कांग्रेस को राहुल गांधी के दौरे से कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है। प्रदेश कांग्रेस का मानना है कि राहुल गांधी का जनसंपर्क और आम जनता से सीधे संवाद करने का तरीका युवाओं, महिलाओं और बेरोजगार वर्ग को पार्टी के साथ जोड़ने में मदद करेगा। पार्टी नेताओं का कहना है कि राज्य में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और पहाड़ों में खाली होते गांव जैसे मुद्दों पर जनता के बीच असंतोष बढ़ रहा है, जिसे कांग्रेस राजनीतिक रूप से मजबूत मुद्दा बनाना चाहती है। कांग्रेस रणनीतिकारों के अनुसार राहुल गांधी अपने दौरे में विशेष रूप से युवा वर्ग और पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों से संवाद कर सकते हैं। माना जा रहा है कि वह रोजगार, शिक्षा, महिला सुरक्षा और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाएंगे। इससे कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले वैकल्पिक राजनीतिक विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करने का अवसर मिल सकता है। प्रदेश कांग्रेस संगठन भी राहुल गांधी के दौरे को लेकर सक्रिय हो गया है। जिला और ब्लाक स्तर पर बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। पार्टी नेताओं का दावा है कि राहुल गांधी की सभाओं और रोड शो में बड़ी संख्या में लोग जुट सकते हैं, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और संगठन को मजबूती मिलेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ समय में राहुल गांधी ने देशभर में लगातार जनसरोकार के मुद्दों को उठाकर विपक्ष की राजनीति में नई सक्रियता दिखाई है। इसका असर उत्तराखंड में भी देखने को मिल सकता है। खासकर युवा मतदाताओं और सरकारी भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी से नाराज वर्ग को कांग्रेस अपने पक्ष में करने की कोशिश करेगी। कांग्रेस यह भी मान रही है कि राहुल गांधी का दौरा केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि जनता से भावनात्मक जुड़ाव बनाने का माध्यम बनेगा। पहाड़ की समस्याओं को राष्ट्रीय मंच पर उठाने की रणनीति के तहत कांग्रेस इस दौरे को बड़े अभियान के रूप में पेश करने की तैयारी कर रही है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा कांग्रेस को कितनी राजनीतिक मजबूती देता है और क्या पार्टी इसे 2027 के चुनावी माहौल में वास्तविक जनसमर्थन में बदल पाती है। बाक्स भाजपा के लिए शुभ रहा है राहुल का दौराः भट्ट भाजपा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे पर तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस को उनके आने पर पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि उनकी उपस्थिति हमेशा भाजपा के लिए ही लाभकारी साबित होती है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि कांग्रेस पूरी तरह से सेना और सनातन विरोधी पार्टी है, जिसमें उनकी पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी का योगदान सबसे अधिक है। लिहाजा उनके आने से प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को खुशफहमी हो सकती है, लेकिन प्रदेश की प्रबु( जनता को नही। क्योंकि राहुल और कांग्रेस पार्टी का सनातन एवं सेना विरोधी चाल, चरित्र और चेहरा सब देख चुके हैं। उत्तराखंड सैन्य बहुल प्रदेश है, जिसके युवाओं ने देश पर पीढ़ी दर पीढ़ी मर मिटना सीखा है वहां की देशभक्त जनता विपक्ष के ऐसे कायरों और मौकापरस्तों को कभी भी स्वीकार नहीं करने वाली है। उन्होंने तंज कसा कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं को गलतफहमी हो सकती है कि राहुल के आने से राज्य में उनकी स्थिति में कोई सुधार आ सकता है, जबकि प्रदेश की जनता पूरी तरह स्पष्ट है कि सनातन और राष्ट्र विरोधी लोग उन्हे बर्दाश्त नहीं करेंगे। बाक्स जनता प्रदेश में चाहती है बदलाव: शैलजा राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे की तैयारी का जायजा लेने के लिए कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा उत्तराखंड दौरे पर पहुंच गई है। कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में कहा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा महत्वपूर्ण है और वह इस बात की ओर इशारा करता है कि वह उत्तराखंड की जनता के हर सुख दुःख में हमेशा साथ खड़े रहते हैं। कुमारी शैलजा ने कहा कि आज उत्तराखंड सरकार में आपसी तालमेल की बड़ी कमी है। भाजपा नेता विधायक और मंत्री अंतर कला में उलझे हुए हैं यह समय प्रदेश में बदलाव का है और जनता सरकार के कामकाज से खुश नहीं है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए और प्रदेश में बदलाव के लिए कमर कस लेनी चाहिए।

रविवार, 31 मई 2026

देवभूमि की रीढ़ हो रही है ‘खोखली’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-22 उत्तराखंड में पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट बनेगा बड़ा मुद्दा ---पहचान की जंग, खंडहर मकान व थमते कदम ---डिग्रियों के बोझ तले दबा है पहाड़ का भविष्य ---बुनियादी सुविधाओं की खाई पाटना बड़ी चुनौती ---चुनावी शोर के बीच बड़ा यक्ष प्रश्न बनेगा पलायन देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात धीरे-धीरे सजने लगी है। भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दल अपने-अपने स्तर पर संगठन मजबूत करने और चुनावी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। लेकिन इस बार चुनावी चर्चा केवल सत्ता परिवर्तन या चेहरों तक सीमित नहीं रहने वाली। पहाड़ के गांवों में अब सबसे बड़ा सवाल पहाड़ का भविष्य बनता जा रहा है। यही कारण है कि आगामी चुनाव में पलायन, खाली होते गांव, युवाओं की बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली, पर्यावरणीय संकट और स्थानीय पहचान जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ सकते हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के पीछे सबसे बड़ी भावना थी कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर होगा। लेकिन राज्य गठन के 25 साल बाद भी हजारों गांव खाली हो चुके हैं। पहाड़ का युवा रोजगार के लिए देहरादून, दिल्ली, चंडीगढ़ और महानगरों की ओर पलायन कर रहा है। गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं ही बची हैं। खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है और पारंपरिक आजीविकाएं संकट में हैं। ऐसे में आमजन के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर पहाड़ का भविष्य क्या होगा? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल विकास के दावों का नहीं, बल्कि पहाड़ बचाने की लड़ाई के रूप में भी देखा जा सकता है। भाजपा सरकार लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क, चारधाम परियोजना, निवेश और पर्यटन को अपनी उपलब्धि बता रही है। हाल ही में पेश बजट में भी ग्रामीण सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और कुंभ 2027 से जुड़ी परियोजनाओं पर विशेष जोर दिया गया है। हालांकि विपक्ष और सामाजिक संगठन यह सवाल उठा रहे हैं कि बड़े विकास मॉडल के बावजूद पहाड़ के मूल मुद्दे क्यों नहीं सुलझ पाए। पर्वतीय क्षेत्रों में अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं, कई स्कूल छात्र संख्या कम होने से बंद होने की कगार पर हैं और युवाओं को स्थायी रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे। यही कारण है कि गांवों से लगातार पलायन जारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में अब मैदानी विकास बनाम पहाड़ी असंतोष की भावना भी उभर रही है। देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में तेजी से शहरीकरण हो रहा है, जबकि दूरस्थ पहाड़ी जिलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी अब भी बरकरार है। इससे क्षेत्रीय असंतुलन का मुद्दा भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। सोशल मीडिया और युवाओं के बीच क्षेत्रीय राजनीति की चर्चा भी बढ़ रही है। कई मंचों पर राष्ट्रीय दलों के प्रति नाराजगी और क्षेत्रीय विकल्प की मांग खुलकर दिखाई दे रही है। कुछ आनलाइन चर्चाओं में युवाओं ने उत्तराखंड क्रांति दल जैसे क्षेत्रीय दलों को मजबूत विकल्प बनाने की बात कही है, हालांकि संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व संकट को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि 2027 के चुनाव में कोई दल पहाड़ के भविष्य को लेकर ठोस रोडमैप प्रस्तुत करता हैकृजैसे स्थानीय रोजगार, पर्वतीय कृषि, ग्रामीण पर्यटन, शिक्षा-स्वास्थ्य सुधार और पर्यावरण संरक्षणकृतो वह जनता के बीच मजबूत पकड़ बना सकता है। खासतौर पर युवा मतदाता अब केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर जवाबदेही मांग रहे हैं। जलवायु परिवर्तन और आपदाएं भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकती हैं। जोशीमठ भू-धंसाव, अतिवृष्टि, जंगलों में आग और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं ने पहाड़ में विकास माडल पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। लोगों के बीच यह चर्चा बढ़ रही है कि बिना पर्यावरणीय संतुलन के विकास का माडल पहाड़ के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है। राजनीतिक तौर पर भाजपा अभी मजबूत संगठन और नेतृत्व के दम पर चुनावी तैयारी में आगे दिखाई दे रही है। पार्टी ने बूथ स्तर तक रणनीति तेज कर दी है। वहीं कांग्रेस जनता के असंतोष को मुद्दा बनाने की कोशिश में जुटी है। दूसरी ओर क्षेत्रीय दल पहाड़ बनाम दिल्ली माडल की भावना को हवा देने का प्रयास कर सकते हैं। स्पष्ट है कि 2027 का चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि उत्तराखंड का पहाड़ आने वाले वर्षों में किस दिशा में जाएगा। यदि गांव खाली होते रहे, युवा पलायन करते रहे और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में पहाड़ का भविष्य केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल बन सकता है।

‘होमस्टे’ से खंडहरों में लौटी ‘जिंदगी’

---पलायन के जख्मों पर मरहम लगा रही पहाड़ की विरासत ---सूबे पारंपरिक घर अब सैलानियों के संग रच रहे नई जिंदगी ---सैलानियों को भा रहा है पहाड़ की संस्कृति का यह अनूठा रंग देहरादून। पत्थरों की दीवारें, लकड़ी की नक्काशीदार चौखट, स्लेट की छत, आंगन में रखी पीतल की गागर, और चूल्हे से उठती लकड़ी की खुशबू। उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी यह घर केवल मकान नहीं होते थे, बल्कि पीढ़ियों की यादों, संस्कारों और रिश्तों की जीवित पहचान होते थे। समय बदला, पलायन बढ़ा और धीरे-धीरे यह घर वीरान होने लगे। कई गांवों में ताले लटक गए, आंगनों में घास उग आई और कभी बच्चों की आवाजों से गूंजने वाले घर खामोश हो गए। लेकिन अब पहाड़ की इन्हीं खामोश दीवारों में फिर से जिंदगी लौटने लगी है। पुराने पारंपरिक घर अब होमस्टे बनकर नई पहचान हासिल कर रहे हैं। यह केवल पर्यटन का कारोबार नहीं, बल्कि पहाड़ की विरासत को बचाने की एक भावनात्मक कोशिश बनती जा रही है। गढ़वाल और कुमाऊं के कई गांवों में लोग अपने पुश्तैनी घरों को आधुनिक सुविधाओं के साथ सजा रहे हैं, लेकिन उनकी आत्मा को वैसा ही रहने दिया गया है। कहीं पुरानी लकड़ी की खिड़कियां आज भी जस की तस हैं, तो कहीं दादी के समय का चूल्हा आज भी पर्यटकों को पहाड़ की असली जिंदगी से रूबरू करा रहा है। पहाड़ छोड़कर शहरों में बस चुके कई युवा अब अपने गांव लौट रहे हैं। जिन घरों में कभी बुजुर्ग अकेले रह गए थे, वहां अब देश-विदेश से आने वाले पर्यटक पहाड़ी संस्कृति को महसूस करने पहुंच रहे हैं। सुबह तांबे के लोटे में पानी, खेतों की पगडंडियां, मंडुवे की रोटी, झंगोरे की खीर और लोकगीतों की मधुर आवाज अब होमस्टे का हिस्सा बन चुकी है। दरअसल, होमस्टे केवल कमाई का जरिया नहीं है। यह उस टूटते रिश्ते को जोड़ने का माध्यम भी बन रहा है, जो वर्षों से पहाड़ और उसके लोगों के बीच कमजोर पड़ता जा रहा था, जिन घरों को लोग खंडहर समझने लगे थे, वह आज गांव की पहचान बन रहे हैं। कई गांवों में महिलाएं इस बदलाव की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी हैं। वह पर्यटकों को स्थानीय भोजन परोस रही हैं, लोककथाएं सुना रही हैं और हस्तशिल्प से जुड़ी चीजें बेचकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। इससे गांवों की अर्थव्यवस्था में भी नई जान आ रही है। हालांकि इस बदलाव के बीच एक चिंता भी है। कुछ जगहों पर आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक वास्तुकला और पहाड़ी संस्कृति को नुकसान पहुंचने लगा है। सीमेंट और चमक-दमक के बीच पुराने घरों की असली आत्मा खोने का डर भी लोगों को सताने लगा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि होमस्टे माडल को स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण के अनुरूप विकसित किया जाए, तभी यह पहाड़ की विरासत को सही मायनों में बचा पाएगा। पहाड़ के इन पुराने घरों में केवल पत्थर और लकड़ी नहीं बसती, बल्कि वहां पुरखों की यादें, त्योहारों की खुशबू, रिश्तों की गर्माहट और उस मिट्टी की आत्मा रहती है, जिसने पीढ़ियों को पाला है। शायद यही कारण है कि जब कोई पर्यटक इन घरों में ठहरता है, तो उसे होटल जैसा एहसास नहीं होता, बल्कि वह खुद को किसी अपने गांव का मेहमान महसूस करता है। आज जब पहाड़ लगातार पलायन और आधुनिकता की मार झेल रहा है, तब यह होमस्टे केवल पर्यटन केंद्र नहीं, बल्कि उम्मीद की नई रोशनी बनकर उभर रहे हैं। ऐसा लगता है मानो वर्षों से बंद पड़े पहाड़ी घर फिर से कह रहे हों...हम अभी जिंदा हैं और हमारी विरासत अभी बाकी है।

उत्तराखंड से गूंजेगा भगवा संदेश

उत्तराखंड में प्रचंड बहुमत के लिए भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष ने फूंका चुनावी बिगुल ---उत्तराखंड की माटी से हुंकार, देश और दुनिया तक भगवा संदेश पहुंचाने का किया आह्वान ---2027 की चुनावी बिसात फतह करने के लिए भाजपा कार्यकर्ता झोंके अपनी पूरी ताकत ---बोले-भाजपा सिर्फ सत्ता चलाने वाली नहीं, राष्ट्रहित की विचारधारा वाली सरकार देहरादून। उत्तराखंड के तीन दिवसीय दौरे पर पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने देवभूमि उत्तराखंड से पूरे देश और दुनिया तक भगवा संदेश पहुंचाने का आह्वान करते हुए आगामी विधानसभा चुनाव 2027 में पार्टी को प्रचंड बहुमत से जिताने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाजपा की सरकार केवल सत्ता चलाने वाली सरकार नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने वाली सरकार है, जिसे मजबूत बनाए रखना राष्ट्रहित में आवश्यक है। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और राष्ट्रवाद की चेतना का केंद्र है। उन्होंने कहा कि गंगा, हिमालय, चारधाम और )षि-मुनियों की तपोभूमि से निकला संदेश पूरे देश को दिशा देता है। ऐसे में भाजपा कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने का आह्वान करते हुए कहा कि 2027 का चुनाव केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि विचारधारा की लड़ाई भी होगा। उन्होंने कहा कि भाजपा ने देश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का वातावरण तैयार किया है और उत्तराखंड इस अभियान का महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। अपने संबोधन में राष्ट्रीय अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले वर्षों में देश ने वैश्विक स्तर पर नई पहचान बनाई है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने विकास और संस्कृति को साथ लेकर चलने का कार्य किया है। चाहे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हो, काशी का पुनर्विकास हो या केदारखंड और मानसखंड को जोड़ने की योजनाएंकृइन सभी ने भारत की सांस्कृतिक आत्मा को नई ऊर्जा दी है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में भाजपा सरकार ने सड़क, स्वास्थ्य, पर्यटन, रेल और हवाई कनेक्टिविटी के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किए हैं। चारधाम यात्रा को सुविधाजनक बनाने, सीमांत क्षेत्रों के विकास और पर्यटन को रोजगार से जोड़ने की दिशा में सरकार लगातार काम कर रही है। उन्होंने दावा किया कि डबल इंजन सरकार ने राज्य को विकास की नई गति दी है। हालांकि राष्ट्रीय अध्यक्ष का पूरा भाषण केवल विकास तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने बार-बार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सनातन मूल्यों का उल्लेख करते हुए कार्यकर्ताओं से कहा कि भाजपा का संघर्ष केवल चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का अभियान है। उन्होंने कहा कि विपक्ष भाजपा की विचारधारा को समझ नहीं पा रहा, जबकि देश की जनता अब राष्ट्रहित और सांस्कृतिक अस्मिता के मुद्दों पर खुलकर भाजपा के साथ खड़ी है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को संदेश देते हुए कहा कि आने वाला चुनाव संगठन की ताकत और जनता के विश्वास का चुनाव होगा। प्रत्येक कार्यकर्ता को घर-घर जाकर केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाना होगा। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं को पार्टी से जोड़ने पर जोर दिया।

दूनघाटी में ‘हाईप्रोफाइल’ मंथन

उत्तराखंड में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने बताया विधानसभा चुनाव के लिए ‘एक्शन प्लान’ ---सांसदों-विधायकों को विधानसभा स्तर पर मोर्चा संभालने के निर्देश ---वोट बैंक से आगे विचार परिवार के दायरे को बढ़ाने पर होगा फोकस ---विपक्षी खेमे की घेराबंदी के लिए भाजपा ने झोंकी सांगठनिक ताकत देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अब जमीनी स्तर पर संगठनात्मक तैयारी तेज कर दी है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने उत्तराखंड दौरे के दौरान सांसदों, विधायकों और संगठन पदाधिकारियों के साथ हुई महत्वपूर्ण बैठकों में स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि आगामी चुनाव केवल राजनीतिक अभियान नहीं, बल्कि पार्टी विचार परिवार के विस्तार का मिशन होगा। उन्होंने सभी जनप्रतिनिधियों को विधानसभा स्तर पर ठोस कार्ययोजना बनाकर सक्रिय भूमिका निभाने के निर्देश दिए हैं। सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष ने संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय पर विशेष जोर देते हुए कहा कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ स्तर तक फैला संगठन और वैचारिक कार्यकर्ता हैं। ऐसे में हर विधायक, सांसद और पदाधिकारी को केवल चुनावी नेता नहीं, बल्कि संगठन विस्तारक की भूमिका में काम करना होगा। बैठक में विशेष रूप से उन विधानसभा सीटों पर गहन चर्चा की गई, जहां भाजपा पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कमजोर रही या हार का सामना करना पड़ा। पार्टी नेतृत्व ने इन सीटों का अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण तैयार करने के निर्देश दिए हैं। माना जा रहा है कि भाजपा अब हर सीट पर स्थानीय समीकरण, जातीय संतुलन, युवा मतदाता, महिला वोट बैंक और क्षेत्रीय मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अलग रणनीति तैयार करेगी। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि पार्टी को केवल जीतने वाली सीटों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि कमजोर क्षेत्रों में भी संगठन की जड़ें मजबूत करनी होंगी। उन्होंने कार्यकर्ताओं को हर बूथ, मजबूत बूथ के मंत्र के साथ गांव-गांव तक पहुंचने का आह्वान किया। बैठक में यह भी तय किया गया कि जिन सीटों पर भाजपा पिछली बार कमजोर रही, वहां लोकसभा और राज्यसभा सांसदों की विशेष जिम्मेदारी तय की जाएगी। सांसदों को इन क्षेत्रों में नियमित प्रवास, जनसंपर्क और संगठनात्मक बैठकों के माध्यम से पार्टी को मजबूत करने का दायित्व सौंपा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि सांसदों की सक्रिय मौजूदगी से कार्यकर्ताओं में ऊर्जा बढ़ेगी और जनता के बीच सरकार की योजनाओं का प्रभावी संदेश पहुंचेगा। सूत्र बताते हैं कि पार्टी अब प्रवास राजनीति को चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बना रही है। इसके तहत सांसद और वरिष्ठ नेता लगातार गांवों, कस्बों और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में रात्रि प्रवास करेंगे। इससे स्थानीय मुद्दों की जानकारी लेने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद भी स्थापित किया जाएगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने स्पष्ट किया कि भाजपा केवल चुनावी गणित के आधार पर राजनीति नहीं करती, बल्कि वैचारिक आधार पर समाज को जोड़ने का कार्य करती है। उन्होंने कहा कि पार्टी का लक्ष्य केवल सीटें जीतना नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग तक राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक विचारधारा को पहुंचाना है। बैठक में सोशल मीडिया और युवा मतदाताओं पर भी विशेष फोकस किया गया। पार्टी ने युवाओं के बीच डिजिटल माध्यमों से पहुंच बढ़ाने, पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं को जोड़ने और केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं को प्रभावी ढंग से प्रचारित करने की रणनीति पर चर्चा की।

आस्था’ पर जाम का ‘ब्रेक’

बदरीनाथ हाईवे पर जाम की वीडियो सोशल मीडिया पर हो रही है वायरल ---बदरीनाथ हाईवे पर जोशीमठ के पास घंटों रेंगते दिख रहे वीडिया में वाहन ---सरकार का दावा-कृरिकार्ड भीड़ के बाद भी व्यवस्था संभाल रहे अफसर ---जोशीमठ, पांडुकेश्वर और गोविंदघाट क्षेत्र में है यात्रियों का ज्यादा दबाव देहरादून। उत्तराखंड के जोशीमठ के पास बद्रीनाथ यात्रा मार्ग से आ रही तस्वीरें और वीडियो इस समय सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इन वीडियो में वाहनों की कई किलोमीटर लंबी कतारें और घंटों से जाम में फंसे श्र(ालु नजर आ रहे हैं। चारधाम यात्रा में उमड़ रही रिकार्ड भीड़ अब बदरीनाथ यात्रा मार्ग पर भारी दबाव के रूप में दिखाई देने लगी है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि जोशीमठ के पास राष्ट्रीय राजमार्ग पर विगत दिवस लंबा ट्रैफिक जाम लगने से हजारों श्र(ालु घंटों तक रास्ते में फंसे रहे। कई स्थानों पर वाहन रेंगते नजर आए, जबकि कुछ जगह यात्रियों को सड़क किनारे उतरकर इंतजार करना पड़ा। वायरल हो रहे एक वीडियो में बदरीनाथ हाईवे पर वाहनों की कई किलोमीटर लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं। वीडियो में बताया जा रहा है कि जोशीमठ, पांडुकेश्वर और गोविंदघाट क्षेत्र में अत्यधिक दबाव के चलते बार-बार यातायात प्रभावित हो रहा है। पहाड़ी मार्ग संकरा होने और कई स्थानों पर सड़क निर्माण कार्य चलने से भी समस्या बढ़ रही है। उधर, राज्य सरकार ने कहा है कि इस बार चारधाम यात्रा में रिकार्ड संख्या में श्र(ालु पहुंच रहे हैं, जिसके कारण कुछ स्थानों पर दबाव बढ़ा है। सरकार के अनुसार ट्रैफिक व्यवस्था संभालने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल और प्रशासनिक टीमें तैनात की गई हैं। अधिकारियों को लगातार मानिटरिंग के निर्देश दिए गए हैं। सरकार की ओर से श्र(ालुओं से अपील की गई है कि वह यात्रा पर निकलने से पहले मौसम और ट्रैफिक अपडेट जरूर देखें और प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने यात्रा व्यवस्थाओं को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार चारधाम यात्रा को लेकर केवल प्रचार में व्यस्त रही, जबकि जमीन पर व्यवस्थाएं चरमराई हुई हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि यदि पहले से भीड़ का अनुमान था तो पार्किंग, ट्रैफिक नियंत्रण और वैकल्पिक व्यवस्थाओं को मजबूत क्यों नहीं किया गया। कांग्रेस ने यात्रियों की परेशानी को प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम बताया। वही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कहना है कि इस वर्ष चारधाम यात्रा में रिकार्ड संख्या में श्र(ालु पहुंच रहे हैं, जो बाबा बदरीविशाल के प्रति लोगों की गहरी आस्था को दर्शाता है। पार्टी नेताओं के अनुसार सरकार और प्रशासन लगातार स्थिति की मानिटरिंग कर रहे हैं। अतिरिक्त पुलिस बल और ट्रैफिक टीमें तैनात की गई हैं तथा यात्रियों की सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता है। भाजपा का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में अत्यधिक भीड़ के दौरान कुछ समय के लिए दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। बाक्स सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लोग 5 से 8 घंटे तक एक ही जगह पर फंसे होने का दावा कर रहे हैं। कई वीडियो में लोग प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए दिख रहे हैं कि क्षमता से अधिक वाहनों को आगे क्यों जाने दिया जा रहा है। बता दें कि जोशीमठ के पास आल वेदर रोड के निर्माण कार्य और पिछले दिनों हुए कुछ भूस्खलन के चलते भी सड़कें संकरी हुई हैं, जिससे श्बॉटलनेकश् जैसी स्थिति बन गई है। भाजपा का बयान भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि

‘पहाड़ों में जीवंत होता है द्वापर युग’

देवभूमि में आस्था और इतिहास का साक्षात संगम है पांडव नृत्य, इस दौरान ---उत्तराखंड के गांवों में सदियों से जीवित है पांडव नृत्य की परंपरा ---लोक संस्कृति, आस्था और महाभारत कथाओं का अद्भुत संगम ---नई पीढ़ी तक लोक विरासत पहुंचाने की चुनौती बनी बड़ी चिंता देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ केवल प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक स्थलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृ( लोक संस्कृति और परंपराओं के लिए भी देशभर में अलग पहचान रखते हैं। इन्हीं लोक परंपराओं में एक महत्वपूर्ण और प्राचीन परंपरा है पांडव नृत्य। गढ़वाल के कई गांवों में आज भी यह लोकनृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और लोकजीवन का जीवंत हिस्सा माना जाता है। पांडव नृत्य का संबंध महाभारत काल की कथाओं से माना जाता है। लोक मान्यता है कि पांडव अपने वनवास और अज्ञातवास के दौरान हिमालयी क्षेत्रों में भी पहुंचे थे। इसी विश्वास के चलते उत्तराखंड के गांवों में पांडवों को देवतुल्य सम्मान दिया जाता है और उनके जीवन प्रसंगों को लोकनृत्य एवं गीतों के माध्यम से मंचित किया जाता है। यह नृत्य मुख्य रूप से गढ़वाल क्षेत्र के रुद्रप्रयाग, चमोली जिलों के गांवों में अधिक प्रचलित है। सर्दियों के मौसम, धार्मिक आयोजनों और विशेष मेलों के दौरान गांवों में रातभर पांडव नृत्य आयोजित किया जाता है। ढोल, दमाऊं, रणसिंघा और थाली की पारंपरिक धुनों के बीच कलाकार महाभारत के विभिन्न प्रसंगों को अभिनय और नृत्य के जरिए जीवंत कर देते हैं। पांडव नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आध्यात्मिकता मानी जाती है। गांवों में इसे केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देव अनुष्ठान के रूप में देखा जाता है। कई स्थानों पर कलाकारों में देव अवतरण की मान्यता भी जुड़ी होती है। स्थानीय लोग मानते हैं कि प्रस्तुति के दौरान पांडवों की आत्मिक शक्ति कलाकारों में प्रवेश करती है और पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। इस लोकनृत्य में भीम, अर्जुन, द्रौपदी, श्रीकृष्ण और दुर्याेधन जैसे पात्रों की विशेष भूमिका होती है। कलाकार पारंपरिक वेशभूषा पहनकर घंटों तक नृत्य करते हैं। संवादों से अधिक यहां भाव-भंगिमा, लोकगीत और वाद्ययंत्रों की धुन कहानी को आगे बढ़ाती है। कई बार पूरा गांव रातभर जागकर इस आयोजन का हिस्सा बनता है। लोक संस्कृति के जानकारों का मानना है कि पांडव नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना का प्रतीक है। गांवों में यह आयोजन लोगों को एक मंच पर जोड़ता है। बुजुर्गों से लेकर बच्चे तक इसमें भाग लेते हैं और इसी माध्यम से नई पीढ़ी अपनी लोक विरासत से जुड़ती है। हालांकि आधुनिकता और पलायन के दौर में यह परंपरा चुनौतियों का सामना भी कर रही है। गांव खाली हो रहे हैं और लोक कलाकारों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। युवा पीढ़ी का रुझान आधुनिक मनोरंजन की ओर बढ़ने से पारंपरिक लोक कलाओं पर संकट गहराने लगा है। कई सांस्कृतिक संगठनों और लोक कलाकारों का कहना है कि यदि समय रहते संरक्षण नहीं मिला तो आने वाले वर्षों में यह विरासत कमजोर पड़ सकती है। इसके बावजूद पहाड़ के कई गांव आज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बचाए हुए हैं। जब रात के सन्नाटे में ढोल-दमाऊं की थाप गूंजती है और पांडव नृत्य शुरू होता है, तब ऐसा लगता है मानो महाभारत का इतिहास फिर से जीवंत हो उठा हो। यही कारण है कि पांडव नृत्य केवल एक लोक परंपरा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।

शुक्रवार, 29 मई 2026

बीजेपी का ‘आल इज वेल’ गेम प्लान

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे से पहले भाजपा नेताओं की जुगलबंदी दिखी मुख्यमंत्री आवास से निकली तस्वीरों ने बदल गई है उत्तराखंड में सियासी हवा लंबे समय बाद त्रिवेंद्र रावत पहुंचे सीएम हाउस, अनिल बलूनी संग बनी रणनीति उत्तराखंड भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले चली एकजुटता की बड़ी चाल देहरादून। सियासत में तस्वीरें सिर्फ यादों के लिए नहीं, बल्कि बड़े संदेशों के लिए खींची जाती हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के तीन दिवसीय उत्तराखंड प्रवास से ठीक पहले मुख्यमंत्री आवास से निकली तस्वीरों ने उत्तराखंड की राजनीति में एक नई इबारत लिख दी है। लंबे समय से सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बनी दूरियों पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक डिनर डिप्लोमेसी के जरिए पूर्णविराम लगा दिया है। सूत्र बताते हैं कि सीएम आवास का माहौल सामान्य से अलग था। काफी लंबे अर्से बाद पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री आवास पहुंचे जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खुद गर्मजोशी से उनकी अगवानी की। इसके साथ ही गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी ने भी सीएम से वार्ता कर कई विषयों पर चर्चा की। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने परंपरा और शिष्टाचार का निर्वहन करते हुए पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत का शाल ओढ़ाकर गर्मजोशी से स्वागत किया। मुख्यमंत्री ने उन्हें पौधा भी भेंट किया जो संगठन के भीतर नई ऊर्जा और विकास के अंकुर फूटने का प्रतीक माना जा रहा है। इस दौरान दोनों नेताओं के चेहरे की मुस्कान ने विपक्षी खेमे में चल रही अंदरूनी कलह की चर्चाओं पर विराम लगाने का काम किया है। डिनर के साथ ही मुख्यमंत्री आवास पर एक उच्च स्तरीय संगठनात्मक बैठक भी हुई। इस बैठक की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के अलावा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और प्रदेश संगठन महामंत्री अजेय कुमार भी मौजूद रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत का सीएम आवास पर इस तरह सक्रिय दिखना भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह अपने हर बड़े चेहरे को एक साथ मंच पर लाना चाहती है। जब पार्टी के दो दिग्गज और निर्णायक चेहरे वर्तमान और पूर्व सीएम एक साथ डिनर टेबल पर बैठकर राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे की रणनीति तैयार कर रहे हों तो यह सीधे तौर पर कार्यकर्ताओं के लिए अनुशासन और एकजुटता की लक्ष्मण रेखा है। सूत्रों के अनुसार डिनर के साथ चली लंबी गुफ्तगू में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के आगामी तीन दिवसीय दौरे के एक-एक बिंदु पर बारीकी से चर्चा की गई। संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल कैसे रहे, इस पर वरिष्ठ नेताओं ने अपने अनुभव साझा किए। पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत और धामी की साथ-साथ डिनर करती तस्वीर ने विपक्ष के उन दावों को हवा में उड़ा दिया है, जिनमें भाजपा के भीतर गुटबाजी की बात कही जा रही थी। आज से शुरू हो रहे राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रवास के दौरान होने वाली अहम बैठकों का एजेंडा भी इस डिनर टेबल पर फाइनल किया गया। इसके साथ ही गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी ने कुछ दिन पूर्व भाजपा से नाराज चल रहे अरविंद पांडे के आवास पर जाकर उनसे मुलाकात की और उसके बाद देहरादून में सीएम धामी से मुलाकात कर कई विषयों पर चर्चा की। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि नितिन नबीन के दौरे से ठीक पहले भाजपा ने अपने अंतर्विरोधों पर मरहम लगा लिया है। त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे दिग्गज नेता का सीएम आवास पहुंचना और मुख्यमंत्री का उन्हें ससम्मान शाल ओढ़ाकर स्वागत करना यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर अब सब कुछ दुरुस्त है। नितिन नबीन के दौरे से पहले भाजपा ने अपने आंतरिक मोर्चों को पूरी तरह सुरक्षित कर लिया है। मुख्यमंत्री धामी की डिनर डिप्लोमेसी ने न केवल वरिष्ठों का सम्मान सुनिश्चित किया है, बल्कि संगठन के उन कील-कांटों को भी निकाल फेंका है जो भविष्य की राह में बाधा बन सकते थे। अब भाजपा पूरी ताकत और एकजुटता के साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वागत करने और 2027 की बिसात बिछाने के लिए तैयार खड़ी है।

भाजपा बनाएगी ‘मिशन रिपीट’ का ब्लूप्रिंट

---धामी सरकार के कामकाज की होगी समीक्षा ---बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने पर फोकस ---कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की रणनीति ---पहाड़ के मुद्दों पर केंद्रीय नेतृत्व की रहेगी नजर ---सत्ता विरोधी माहौल को साधने की भी है तैयारी देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने समय से पहले चुनावी मोर्चाबंदी शुरू कर दी है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का उत्तराखंड दौरा इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी इस दौरे के जरिए जहां संगठन को सक्रिय करने में जुटी है, वहीं सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बैठाने की कवायद भी तेज हो गई है। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व पर केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे के रूप में भी देखा जा रहा है। भाजपा पहले ही संकेत दे चुकी है कि 2027 का चुनाव धामी के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा। ऐसे में यह दौरा पार्टी के भीतर किसी भी संभावित असंतोष को शांत करने और कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने की कोशिश माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा इस बार केवल चुनावी घोषणाओं के भरोसे नहीं रहना चाहती, बल्कि बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क तैयार करने में जुट गई है। पार्टी ग्रामीण क्षेत्रों, सीमांत इलाकों और शहरी सीटों पर अलग-अलग रणनीति तैयार कर रही है। संगठनात्मक बैठकों में कार्यकर्ताओं को अभी से चुनावी मोड में लाने पर जोर दिया जा रहा है। दूसरी ओर भाजपा की सक्रियता विपक्षी कांग्रेस के लिए भी चुनौती बनती दिख रही है। कांग्रेस जहां अभी संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व संतुलन की जद्दोजहद में उलझी है, वहीं भाजपा लगातार केंद्रीय नेतृत्व के जरिए कार्यकर्ताओं में संदेश देने की कोशिश कर रही है कि पार्टी पूरी तरह चुनावी तैयारी में उतर चुकी है। हालांकि भाजपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं में धांधली, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे लगातार सरकार को घेर रहे हैं। पहाड़ों में भू-कानून और मूल निवास जैसे मुद्दों पर भी जनता की नाराजगी खुलकर सामने आई है। ऐसे में राष्ट्रीय अध्यक्ष का यह दौरा केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि जनता के मूड को समझने और चुनाव से पहले कमजोर कड़ियों को दुरुस्त करने का प्रयास भी माना जा रहा है। भाजपा अब उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही है। इसी कारण पार्टी ने चुनावी तैयारियों को अभी से गति दे दी है। आने वाले महीनों में केंद्रीय नेताओं के और दौरों की संभावना भी जताई जा रही है। साफ है कि उत्तराखंड में 2027 का चुनावी रण धीरे-धीरे गर्माने लगा है।

टिहरी की नथ: पहाड़ की ‘ध्याण’ के श्रृंगार का ‘गौरव’

परंपरा, सौंदर्य और पहाड़ी संस्कृति की पहचान बनी सदियों पुरानी विरासत क्रासर ---सोने की कारीगरी में झलकती पहाड़ की समृ( संस्कृति ---समय बदला लेकिन नथ का सम्मान आज भी है कायम ---नई पीढ़ी फैशन के साथ अपनी परंपरा को भी दे रही जगह देहरादून। ‘तेरी टिहरी की नथुली सुआ, सैंण-सैंण मा लश्कारी...’ पहाड़ में जब-जब इस गढ़वाली गीत की धुन कानों में पड़ती है तो पहाड़ की ध्याण के चेहरे पर पहाड़ की शान टिहरी की नथ आखों के सामने इसका दृश्य दिखता है। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र की संस्कृति जितनी समृ( और रंगीन है, उतनी ही खास उसकी पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण भी हैं। इन्हीं में सबसे खास पहचान रखती है टिहरी की नथ जिसे गढ़वाल की शान कहा जाता है। पहाड़ की महिलाओं के सौंदर्य, सम्मान और पारंपरिक गौरव का प्रतीक मानी जाने वाली यह नथ आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। गढ़वाली विवाह की कल्पना टिहरी की नथ के बिना अधूरी मानी जाती है। बड़े आकार की यह सोने की नथ केवल आभूषण नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी रही है। पुराने समय में परिवार की आर्थिक स्थिति और सामाजिक सम्मान का अंदाजा भी महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली नथ से लगाया जाता था। कहा जाता है कि टिहरी रियासत के दौर में इस नथ को विशेष पहचान मिली। राजघरानों और समृ( परिवारों की महिलाएं बड़े आकार की नथ पहनती थीं, जिसके बाद धीरे-धीरे यह परंपरा गांव-गांव तक पहुंच गई। समय के साथ टिहरी की नथ गढ़वाल की सांस्कृतिक पहचान बन गई। इस नथ की खासियत इसका बड़ा गोल आकार और उसमें जड़े जाने वाले मोती व लाल-हरे नग होते हैं। पारंपरिक रूप से इसे सोने से तैयार किया जाता है और कई बार इसका वजन भी काफी अधिक होता है। शादी के दौरान दुल्हन जब पारंपरिक गढ़वाली वेशभूषा के साथ टिहरी की नथ पहनती है तो उसका रूप अलग ही दिखाई देता है। गढ़वाल में नथ केवल श्रृंगार का हिस्सा नहीं, बल्कि भावनाओं और परंपराओं से भी जुड़ी हुई है। कई परिवारों में यह पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत के रूप में सौंपी जाती है। दादी-नानी की नथ आज भी परिवारों में संभालकर रखी जाती है और विशेष अवसरों पर नई पीढ़ी उसे गर्व के साथ पहनती है। पहाड़ के लोकगीतों और लोकनृत्यों में भी टिहरी की नथ का जिक्र अक्सर सुनाई देता है। गढ़वाली गीतों में दुल्हन की सुंदरता और उसकी नथ की चमक को खास तौर पर दर्शाया जाता रहा है। समय के साथ फैशन और जीवनशैली में काफी बदलाव आया है, लेकिन टिहरी की नथ का आकर्षण आज भी कम नहीं हुआ। अब युवा पीढ़ी पारंपरिक डिजाइनों के साथ हल्के और आधुनिक स्टाइल की नथ भी पसंद कर रही है। कई फैशन डिजाइनर और ज्वेलरी कलाकार भी गढ़वाली नथ को नए अंदाज में पेश कर रहे हैं। सोशल मीडिया और उत्तराखंडी सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने भी इस पारंपरिक आभूषण को नई पहचान दी है। पहाड़ी विवाहों में अब भी दुल्हन की सबसे खास पहचान उसकी बड़ी और खूबसूरत नथ ही मानी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड की पारंपरिक कला और आभूषणों को संरक्षित करना बेहद जरूरी है। टिहरी की नथ केवल एक गहना नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक आत्मा का हिस्सा है। बदलते दौर में नई पीढ़ी यदि अपनी इस विरासत को अपनाए रखेगी, तो पहाड़ की पहचान और भी मजबूत होगी। टिहरी की नथ आज भी यह एहसास कराती है कि आधुनिकता की दौड़ में भी पहाड़ अपनी परंपराओं और संस्कृति को गर्व के साथ जीवित रखे हुए है।

‘नैरेटिव’ नया और ‘डीएनए’ वही पुराना

गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन, मैदानी बनाम पहाड़ी राजनीति और जातीय गणित तय करेंगे चुनावी दिशा क्रासर ---प्रदेश के गढ़वाल और कुमाऊं में बनेगी अलग-अलग चुनाव की रणनीति ---पहाड़ बनाम मैदान का मुद्दा फिर पकड़ सकता है जोर, रणनीति में जुटे दल ---पलायन, भू-कानून, मूल निवास व सीमांत जिलों में विकास पर होगा फोकस देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में इस बार केवल विकास और बेरोजगारी ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय समीकरण भी सत्ता की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाने जा रहे हैं। राज्य गठन के बाद से ही उत्तराखंड की राजनीति गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन, पहाड़ और मैदान के राजनीतिक प्रभाव और जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। आगामी चुनाव में भी यही समीकरण राजनीतिक दलों की रणनीति का केंद्र बनने लगे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल अब क्षेत्रवार रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। गढ़वाल मंडल की सीटों पर जहां राष्ट्रवाद, सड़क और चारधाम परियोजनाओं को मुद्दा बनाया जा सकता है, वहीं कुमाऊं में बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय पहचान के सवाल अधिक प्रभावी रहने की संभावना है। उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से गढ़वाल और कुमाऊं का संतुलन बेहद अहम माना जाता रहा है। मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन में प्रमुख पदों पर क्षेत्रीय संतुलन साधना हर दल की मजबूरी रही है। भाजपा हो या कांग्रेस दोनों दल जानते हैं कि किसी एक क्षेत्र की उपेक्षा राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती है। वर्तमान में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कुमाऊं क्षेत्र से आते हैं और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष गढ़वाल से प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं कांग्रेस भी क्षेत्रीय असंतोष को भुनाने की कोशिश में जुटी हुई है। उत्तराखंड में हर चुनाव के दौरान पहाड़ और मैदान के बीच विकास असंतुलन का मुद्दा उठता रहा है। पहाड़ी जिलों में पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, बंद स्कूल और खराब सड़कें आज भी बड़ा मुद्दा हैं। दूसरी ओर देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में शहरीकरण, ट्रैफिक, कानून व्यवस्था और रोजगार प्रमुख चुनावी मुद्दे बनते जा रहे हैं। राजनीतिक दल अब इन दोनों क्षेत्रों के लिए अलग-अलग चुनावी नैरेटिव तैयार करने में जुटे हैं। पहाड़ में मूल निवास, भू-कानून और स्थानीय रोजगार जैसे मुद्दे हवा पकड़ सकते हैं, जबकि मैदान में विकास परियोजनाओं और निवेश को प्रमुखता दी जा सकती है। राज्य की राजनीति में ठाकुर, ब्राह्मण, दलित और ओबीसी वोट बैंक का प्रभाव भी लगातार बढ़ा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही जातीय संतुलन साधने के लिए टिकट वितरण से लेकर संगठन विस्तार तक सावधानी बरत रहे हैं। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर की सीटों पर मुस्लिम और प्रवासी वोटरों की भूमिका भी कई सीटों पर परिणाम प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार युवा मतदाता और पहली बार वोट डालने वाली पीढ़ी भी चुनावी समीकरण बदल सकती है। सोशल मीडिया और स्थानीय मुद्दों के प्रभाव से पारंपरिक वोट बैंक में भी बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। चीन और नेपाल सीमा से लगे पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जैसे जिलों में राष्ट्रीय सुरक्षा, सड़क और संचार सुविधाएं प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। भाजपा यहां राष्ट्रवाद और सीमांत विकास को प्रमुख चुनावी एजेंडा बना सकती है। वहीं कांग्रेस स्थानीय समस्याओं और पलायन को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। हालांकि उत्तराखंड की राजनीति मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन इस बार क्षेत्रीय संगठन और सामाजिक मंच भी चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। भू-कानून और मूल निवास की मांग को लेकर सक्रिय समूह पहाड़ में जनभावनाओं को दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। यदि यह मुद्दे चुनाव तक मजबूत बने रहते हैं तो मुख्य दलों की रणनीति भी प्रभावित हो सकती है। उत्तराखंड में 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं और सामाजिक संतुलन की परीक्षा भी होगा। पहाड़ की नाराजगी, मैदान की अपेक्षाएं और गढ़वाल-कुमाऊं का समीकरण किस दल के पक्ष में जाएगा, यही आने वाले चुनाव की सबसे बड़ी कहानी बनने जा रही है।

काफिले की ‘रफ्तार’ पर सियासी ‘रार’

---जौलीग्रांट एयरपोर्ट से पार्टी मुख्यालय तक वाहनों की लंबी कतार से कई जगह जाम जैसे हालात ---विपक्ष ने पीएम मोदी की ऊर्जा बचत अपील का हवाला देकर भाजपा को घेरा ---भाजपा बोली कार्यकर्ताओं का उत्साह लोकतंत्र की ताकत, विपक्ष कर रहा अनावश्यक राजनीति ---सोशल मीडिया पर भी रोड शो और वाहनों के काफिले को लेकर छिड़ी बहस देहरादून। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के उत्तराखंड दौरे के दौरान जौलीग्रांट एयरपोर्ट से देहरादून स्थित पार्टी मुख्यालय तक निकले वाहनों के लंबे काफिले ने राजनीतिक बहस छेड़ दी है। एक ओर भाजपा इसे कार्यकर्ताओं के उत्साह और संगठन की ताकत बता रही है, वहीं विपक्ष ने इसे फिजूल शक्ति प्रदर्शन बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऊर्जा बचत और पर्यावरण संरक्षण की अपील से जोड़कर सवाल उठाए हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्वागत के लिए एयरपोर्ट से लेकर शहर तक बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता वाहनों के साथ पहुंचे। कई किलोमीटर तक चले काफिले के कारण रास्ते में ट्रैफिक की रफ्तार धीमी पड़ गई। आम लोगों को जगह-जगह जाम और असुविधा का सामना करना पड़ा। दफ्तर जाने वाले लोग, स्कूली वाहन और रोजमर्रा के काम से निकलने वाले नागरिक लंबे समय तक यातायात में फंसे रहे। प्रदेश कांग्रेस नेताओं ने इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा की दिखावटी राजनीति करार दिया। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार ऊर्जा बचत, ईंधन बचाने और कार्बन उत्सर्जन कम करने की अपील करते हैं, लेकिन उनकी ही पार्टी के नेता सैकड़ों गाड़ियों के काफिले निकालकर विपरीत संदेश दे रहे हैं। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि जिस राज्य में आम आदमी महंगे पेट्रोल-डीजल से परेशान है, वहां राजनीतिक रोड शो के नाम पर ईंधन की बर्बादी जनता को खटक रही है। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि सत्ता का प्रभाव दिखाने के लिए आम जनता की सुविधा को नजरअंदाज किया गया। भाजपा नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताया है। पार्टी पदाधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का उत्तराखंड आगमन कार्यकर्ताओं के लिए उत्साह का विषय था और बड़ी संख्या में लोगों का स्वागत के लिए पहुंचना स्वाभाविक है। भाजपा नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के कार्यक्रम और स्वागत यात्राएं नई बात नहीं हैं। पार्टी ने यह भी कहा कि यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन ने आवश्यक इंतजाम किए थे और विपक्ष केवल राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है। काफिले को लेकर आम नागरिकों में भी मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे बड़े नेताओं के स्वागत की परंपरा बताया, जबकि कई लोगों ने सोशल मीडिया पर ट्रैफिक अव्यवस्था और ईंधन की बर्बादी को लेकर नाराजगी जाहिर की। देहरादून निवासी एक व्यापारी ने कहा कि अगर ऊर्जा बचाने और प्रदूषण कम करने की बात होती है तो नेताओं को भी उदाहरण पेश करना चाहिए। वहीं एक भाजपा समर्थक ने कहा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वागत करना कार्यकर्ताओं का उत्साह है, इसे गलत तरीके से नहीं देखना चाहिए। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि विधानसभा चुनाव 2027 से पहले ऐसे आयोजन शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनेंगे। भाजपा जहां बड़े जनसमर्थन को अपनी ताकत के रूप में पेश करेगी, वहीं विपक्ष इन्हें जनता की समस्याओं और वीआईपी संस्कृति से जोड़कर घेरने की कोशिश करेगा। फिलहाल देहरादून का यह रोड शो केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि इसने ऊर्जा बचत बनाम राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की बहस को भी तेज कर दिया है।

‘डबल इंजन’ बनाम ‘पहाड़ का दर्द’

2027 के विधानसभा चुनाव में विकास माडल पर आमने-सामने हो सकते है सत्ता और विपक्ष क्रासर ---भाजपा विकास कार्यों को बनाएगी चुनावी हथियार, विपक्ष उठाएगा जमीनी सवाल ---सड़क, पर्यटन और निवेश के दावों के बीच पलायन-बेरोजगारी पर घिरेगी सरकार ---पहाड़ के गांव, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जनता के बीच बढ़ेगी बहस देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे राज्य की राजनीति में विकास माडल सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। भाजपा जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में अपने डबल इंजन विकास माडल को जनता के सामने रखेगी, वहीं कांग्रेस और क्षेत्रीय दल इसी माडल की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करने की तैयारी में हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के 27 साल बाद भी पहाड़ पलायन, बेरोजगारी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में आगामी चुनाव में जनता यह सवाल पूछ सकती है कि आखिर उत्तराखंड का वास्तविक विकास माडल क्या है और उसका लाभ आम लोगों तक कितना पहुंचा? भाजपा सरकार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सड़कों, एक्सप्रेस-वे, आल वेदर रोड, रेल परियोजनाओं, पर्यटन कारिडोर, धार्मिक पुनर्निर्माण और निवेश सम्मेलनों को अपने विकास मॉडल की पहचान के रूप में पेश कर रही है। हाल ही में पेश किए गए 1.11 लाख करोड़ रुपये के बजट में भी सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर, युवा, महिला और ग्रामीण विकास पर फोकस दिखाया है। भाजपा का दावा है कि डबल इंजन सरकार के कारण उत्तराखंड में सड़क, स्वास्थ्य, पर्यटन और निवेश के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम हुए हैं। केदारनाथ पुनर्निर्माण, चारधाम यात्रा प्रबंधन, होम-स्टे नीति, नए मेडिकल कालेज और सीमांत क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क को पार्टी अपनी उपलब्धियों के रूप में गिना रही है। पार्टी संगठन पहले ही मिशन-2027 के लिए सक्रिय दिखाई दे रहा है और मुख्यमंत्री धामी को चुनाव का चेहरा बनाए जाने के संकेत भी साफ दिख रहे हैं। हालांकि विपक्ष इसी विकास माडल पर सबसे ज्यादा हमला बोलने की तैयारी में है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार का विकास केवल कागजों और विज्ञापनों तक सीमित है। पहाड़ों से लगातार पलायन, गांवों में खाली घर, अस्पतालों में डाक्टरों की कमी, सरकारी स्कूलों की बदहाली और युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी विपक्ष के प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। कांग्रेस यह भी सवाल उठा रही है कि यदि विकास हुआ है तो पहाड़ों के दूरस्थ गांव आज भी सड़क, इंटरनेट और स्वास्थ्य सेवाओं से क्यों जूझ रहे हैं? राज्य में बढ़ती आपदाएं, जंगल की आग, पेयजल संकट और अनियोजित शहरीकरण को भी विपक्ष विकास माडल की विफलता के तौर पर पेश करने की रणनीति बना रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव विकास के दावे बनाम विकास की हकीकत पर केंद्रित हो सकता है। भाजपा जहां बड़े प्रोजेक्ट, धार्मिक पर्यटन और निवेश को अपनी ताकत बताएगी, वहीं विपक्ष गांव, किसान, रोजगार और पलायन जैसे स्थानीय मुद्दों को जनता के बीच ले जाएगा। क्षेत्रीय दल भी इस बहस को पहाड़ बनाम मैदान के नजरिये से देखने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया और युवाओं के बीच यह चर्चा तेजी से बढ़ रही है कि राज्य का विकास माडल स्थानीय संसाधनों, रोजगार और पहाड़ी अस्मिता को कितना मजबूत कर पाया है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में अब केवल सड़क और भवन निर्माण को विकास नहीं माना जाएगा। जनता रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन रोकने और गांवों को जीवित रखने वाले माडल की तलाश में है। ऐसे में 2027 का चुनाव इस बात का फैसला भी करेगा कि उत्तराखंड भविष्य में धार्मिक पर्यटन आधारित विकास माडल पर आगे बढ़ेगा या स्थानीय जरूरतों और पहाड़ी अर्थव्यवस्था पर आधारित नए माडल की मांग तेज होगी।