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बुधवार, 12 अगस्त 2026
udaydinmaan: विरासत की अनमोल धरोहर ‘फूली’
udaydinmaan: विरासत की अनमोल धरोहर ‘फूली’: बिना किसी आडंबर के स्त्री के सौंदर्य में निखार घोलती है एक छोटी-सी फूली अलमारियों और नए कपड़ों के बीच पीछे छूटी, लेकिन पहचान अब भी कायम आज आभ...
विरासत की अनमोल धरोहर ‘फूली’
बिना किसी आडंबर के स्त्री के सौंदर्य में निखार घोलती है एक छोटी-सी फूली
अलमारियों और नए कपड़ों के बीच पीछे छूटी, लेकिन पहचान अब भी कायम
आज आभूषण भले नए आ गए हों, मगर फूली का स्थान सिर्फ और सिर्फ दिल में
देहरादून। पहाड़ की सुबह में जब धूप धीरे-धीरे घरों की छतों पर उतरती थी, तब पहाड़ी आंगन में काम करती महिलाओं के चेहरे पर सादगी के साथ एक खास चमक भी दिखाई देती थी। माथे पर बिंदी, बालों में सादगी और नाक में चमकती छोटी-सी फूली। फूली बहुत बड़ा गहना नहीं थी। न वह भारी थी, न उसे पहनने के लिए किसी बड़े समारोह की जरूरत होती थी। लेकिन पहाड़ की स्त्री के श्रृंगार में उसकी अपनी जगह थी। कभी यह रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा रही, कभी त्योहारों और मेलों में सजी, तो कभी शादी-ब्याह के अवसर पर दुल्हन के चेहरे की शोभा बनी। आज समय बदल गया है। पहाड़ की पगडंडियों की जगह सड़कें आ गईं। संदूकची की जगह अलमारियों ने ले ली। पारंपरिक पहनावे की जगह आधुनिक फैशन ने ले ली। लेकिन कई पुराने घरों में फूली आज भी सुरक्षित है। वह गहना कम और याद ज्यादा है।
पहाड़ में गहनों को लेकर एक अलग भाव रहा है। गहना केवल सोने-चांदी का टुकड़ा नहीं रहा। वह परिवार की स्मृति भी रहा। मां के पास रखी फूली बेटी के लिए केवल आभूषण नहीं थी। उसमें मां के जीवन की यादें जुड़ी होती थीं। वही फूली किसी दिन बेटी की नाक में सजती तो उसके साथ मायके की स्मृतियां भी चली आतीं। दादी की संदूकची में रखी फूली की कहानी शायद किसी किताब में दर्ज न हो, लेकिन घर की बुजुर्ग महिलाओं को उसकी पूरी कहानी मालूम होती थी। कब बनवाई गई थी? किस सुनार ने बनाई थी? किस अवसर पर पहली बार पहनी गई? किस बेटी की शादी में इसे निकाला गया था? इन सवालों के जवाब परिवार की मौखिक परंपरा में सुरक्षित रहते थे।
पहाड़ी समाज में पारंपरिक आभूषणों ने महिलाओं की सांस्कृतिक पहचान को भी आकार दिया है। फूली उन्हीं आभूषणों की श्रृंखला का हिस्सा रही है। इसकी खासियत उसका सादा सौंदर्य है। जहां बड़े आभूषण अपनी मौजूदगी का एहसास कराते हैं, वहीं फूली चेहरे पर चुपचाप अपनी जगह बनाती है। नाक पर चमकता छोटा-सा सोने का बिंदु जैसे पहाड़ की किसी ऊंची चोटी पर पहली धूप। शायद इसलिए भी फूली को पहाड़ी श्रृंगार में इतना अपनापन मिला। फूली के पीछे पहाड़ के पारंपरिक सुनारों की मेहनत भी छिपी है। पुराने समय में आभूषण बनाना केवल कारोबार नहीं था। सुनार परिवारों की कारीगरी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती थी। स्थानीय डिजाइन, बारीक काम और ग्राहक के परिवार की पसंद को ध्यान में रखते हुए गहने तैयार किए जाते थे।
फूली छोटी जरूर थी, लेकिन उसे बनाने में कारीगर की उंगलियों की बारीकी दिखाई देती थी। सोने की पतली परत को आकार देना, उसकी गोलाई बनाना और उसे इस तरह तैयार करना कि वह चेहरे पर सहज लगेकृयह सब अनुभव की मांग करता था। आज मशीन से बने आधुनिक गहनों के दौर में हाथ की वह कारीगरी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। पहाड़ में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज का उत्सव रहा है। दुल्हन के पारंपरिक श्रृंगार में कपड़ों के साथ आभूषणों की भी अपनी भूमिका रही। नाक के गहने चेहरे की सुंदरता को अलग पहचान देते थे। फूली इस श्रृंगार का हल्का लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा रही।
दुल्हन के चेहरे पर सादगी और पारंपरिक आभूषणों का मेल पहाड़ी संस्कृति की उस सुंदरता को सामने लाता था जिसमें दिखावे से ज्यादा अपनापन था। शादी के बाद भी फूली कई महिलाओं के रोजमर्रा के श्रृंगार का हिस्सा बनी रहती थी। फूली की कहानी केवल गहने की कहानी नहीं है। यह बदलते पहाड़ की कहानी भी है। पहाड़ से पलायन हुआ तो परिवार शहरों में पहुंचे। पहनावा बदला। नई पीढ़ी ने नए फैशन अपनाए। भारी पारंपरिक आभूषणों को संभालना मुश्किल हुआ। कई पुराने गहने बैंक के लॉकर में चले गए। कई संदूकचियों में बंद हो गए और कुछ बाजार में बेच दिए गए। फूली भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही। फिर भी उसकी खासियत यह है कि वह पूरी तरह गायब नहीं हुई। त्योहारों, पारंपरिक समारोहों और विवाहों में आज भी इसकी झलक दिखाई देती है।
नई पीढ़ी की कुछ युवतियां पारंपरिक आभूषणों को आधुनिक पहनावे के साथ जोड़कर उन्हें नया रूप दे रही हैं। यानी फूली खत्म नहीं हो रही, बल्कि अपना नया रास्ता खोज रही है। किसी बुजुर्ग पहाड़ी महिला से अगर उसकी पुरानी फूली के बारे में पूछा जाए तो शायद वह उसके वजन या कीमत से पहले उसकी कहानी बताए। यह मेरी मां की थी। यह एक वाक्य ही उस गहने की पूरी कीमत बता देता है। सोने का बाजार भाव बदल सकता है। गहने का वजन कम या ज्यादा हो सकता है। डिजाइन पुराना पड़ सकता है। लेकिन मां की निशानी का कोई बाजार भाव नहीं होता। यही वजह है कि पुराने आभूषणों को परिवार संभालकर रखते रहे हैं।
आज फूली जैसी पारंपरिक धरोहर को बचाने का मतलब यह नहीं कि नई पीढ़ी को पुराने जमाने में वापस भेज दिया जाए। जरूरत यह है कि परंपरा को आधुनिकता के साथ जोड़ा जाए। फूली के पारंपरिक डिजाइन को आधुनिक और हल्के आभूषणों में ढाला जा सकता है। स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। उत्तराखंड की पारंपरिक ज्वेलरी के डिजाइन का दस्तावेजीकरण किया जा सकता है। क्योंकि जब कोई पारंपरिक गहना बाजार से गायब होता है तो उसके साथ केवल एक डिजाइन नहीं जाताकृएक कारीगरी, एक स्मृति और संस्कृति का एक छोटा हिस्सा भी चला जाता है।
पहाड़ की फूली आकार में छोटी है, लेकिन उसकी कहानी बड़ी है। उसमें पहाड़ की बेटी का श्रृंगार है। मां की संदूकची है। दादी की स्मृति है। सुनार की कारीगरी है। विवाह के गीत हैं। त्योहारों की रौनक है और उस पहाड़ की पहचान है, जहां कम साधनों में भी जीवन को सुंदर बनाने की कला रही है। आज जरूरत है कि फूली को केवल पुराना गहना समझकर संदूक में बंद न कर दिया जाए। उसे कहानी की तरह अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। क्योंकि पहाड़ की फूली नाक पर जितनी छोटी दिखाई देती है, अपनी विरासत में उतनी ही बड़ी है।
राहुल गांधी पर भाजपा का ‘हमला’
छात्रों के मुद्दे पर भाजपा ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को घेरा
भाजपा ने लगाया लोकसभा में चर्चा से भागने का आरोप
छात्रों के सवाल पर दोहरे रवैये को लेकर विपक्ष निशाना
देहरादून। छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर संसद में सियासी टकराव तेज हो गया है। लोकसभा में छात्रों के मुद्दे पर चर्चा और विरोध-प्रदर्शन के बीच भाजपा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन पर चर्चा से बचने का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने सवाल उठाया कि जब विपक्ष छात्रों के मुद्दे को इतना महत्वपूर्ण बता रहा है तो फिर संसद की चर्चा में सरकार के जवाब का सामना करने से उसे परहेज क्यों है? भाजपा ने राहुल गांधी और विपक्ष के रुख को लेकर दोहरे रवैये का आरोप लगाते हुए कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े विषय को राजनीतिक प्रदर्शन का मुद्दा बनाने के बजाय संसद में गंभीर चर्चा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। सत्ता पक्ष की ओर से यह भी सवाल उठाया गया कि विपक्ष एक तरफ छात्रों की समस्याओं को लेकर सरकार से जवाब मांगता है और दूसरी तरफ जब सरकार अपना पक्ष रखने के लिए तैयार होती है तो चर्चा से बचने की कोशिश करता है।
छात्रों से जुड़े मुद्दे पर संसद परिसर में सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों के प्रदर्शन ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। दोनों पक्ष अपने-अपने तरीके से यह संदेश देने में जुटे हैं कि वह छात्रों की समस्याओं को लेकर गंभीर हैं। भाजपा का कहना है कि संसद में चर्चा का रास्ता खुला है और विपक्ष को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि केवल प्रदर्शन और नारेबाजी से छात्रों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। वहीं विपक्ष छात्रों से जुड़े मुद्दों पर सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि छात्रों के मुद्दे पर संसद में सार्थक चर्चा कब होगी और उसका ठोस परिणाम क्या निकलेगा।
भाजपा ने अपने हमले का केंद्र राहुल गांधी को बनाया। पार्टी की ओर से कहा गया कि यदि विपक्ष वास्तव में छात्रों की समस्याओं को लेकर गंभीर है तो उसे सदन में चर्चा में हिस्सा लेना चाहिए। सत्ता पक्ष ने राहुल गांधी के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि संसद में चर्चा से बचना और बाहर छात्रों के मुद्दे पर राजनीति करना दोहरा रवैया है। भाजपा का तर्क है कि संसद सरकार से सवाल पूछने का सबसे प्रभावी मंच है। यहां विपक्ष को सवाल उठाने के साथ-साथ सरकार का जवाब भी सुनना चाहिए और जरूरत पड़ने पर उसके जवाब पर आगे सवाल करना चाहिए। पार्टी नेताओं ने कहा कि लोकतंत्र केवल विरोध करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र में सरकार को जवाब देना और विपक्ष को जवाब सुनना दोनों जरूरी हैं।
छात्रों के मुद्दे पर छिड़ी इस राजनीतिक लड़ाई ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया हैकृक्या छात्रों की समस्याएं वास्तव में राजनीतिक दलों की प्राथमिकता हैं या फिर वे केवल एक-दूसरे को घेरने का माध्यम बन रही हैं? प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, समय पर परीक्षा, परिणाम और भर्ती प्रक्रिया को लेकर युवाओं के बीच लंबे समय से चिंता रही है। ऐसे में संसद में इस विषय पर गंभीर चर्चा की जरूरत है। छात्रों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा यह जानने में दिलचस्पी होगी कि परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी कैसे बनाया जाएगा, शिकायतों का समाधान कैसे होगा और अनियमितता सामने आने पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी।
भाजपा ने विपक्ष के सामने सीधा सवाल रखा है कि यदि छात्रों के मुद्दे पर उसके पास गंभीर प्रश्न और ठोस तथ्य हैं तो उन्हें संसद के भीतर क्यों नहीं रखा जाता? सत्ता पक्ष का कहना है कि सदन में बहस के दौरान सरकार अपना पक्ष रख सकती है और विपक्ष उसके जवाब पर सवाल कर सकता है। इससे जनता के सामने पूरा पक्ष स्पष्ट होगा। भाजपा ने इसी आधार पर राहुल गांधी और विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि छात्रों के मुद्दे को लेकर केवल संसद के बाहर प्रदर्शन करना पर्याप्त नहीं है। हालांकि विपक्ष की ओर से सरकार पर छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक टकराव के बीच यह मुद्दा अब संसद की कार्यवाही से निकलकर व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बनता जा रहा है।
इस राजनीतिक टकराव के बीच सबसे महत्वपूर्ण पक्ष छात्र हैं। जिस युवा ने किसी प्रतियोगी परीक्षा के लिए महीनों या वर्षों तैयारी की है, उसके लिए यह बहस केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है। उसके लिए परीक्षा व्यवस्था उसके भविष्य का सवाल है। वह चाहता है कि परीक्षा निष्पक्ष हो, भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी भी तरह की अनियमितता पर तत्काल कार्रवाई हो। यही कारण है कि सत्ता और विपक्ष दोनों के सामने चुनौती है कि वे छात्रों के मुद्दे को राजनीतिक आरोपों तक सीमित न रखें। भाजपा का हमला राहुल गांधी पर है और विपक्ष सरकार को घेर रहा है। लेकिन छात्रों की निगाहें इस बात पर हैं कि संसद से उनके लिए क्या निकलेगा। सवाल अब यह नहीं कि किसने किसे घेरा। सवाल यह है कि छात्रों की समस्या का समाधान कौन करेगा। संसद में आरोपों का शोर कुछ समय के लिए राजनीतिक सुर्खियां जरूर बना सकता है, लेकिन छात्रों का भविष्य सुर्खियों से नहीं, ठोस फैसलों से बदलेगा। यही इस पूरे विवाद की असली कसौटी है।
अब कांग्रेस करेगी ‘इंटरनल सर्वे’
विधायकों का रिपोर्ट कार्ड भी होगा तैयार
टिकट के दावेदारों की परखी जाएगी पकड़
कांग्रेस ने चुनावी तैयारी को दी नई रफ्तार
देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अब अपनी तैयारियों को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है। संगठन को मजबूत करने और चुनावी रणनीति को धार देने के बाद पार्टी अब प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में संभावित प्रत्याशियों की वास्तविक स्थिति का आकलन करने की तैयारी में है। इसके तहत सभी विधानसभा क्षेत्रों में मौजूदा विधायकों के साथ ही चुनाव लड़ने की दावेदारी कर रहे नेताओं का इंटरनल सर्वे कराया जाएगा। पार्टी का उद्देश्य केवल संभावित प्रत्याशियों की लोकप्रियता नापना नहीं, बल्कि यह पता लगाना भी है कि कौन सा नेता अपने विधानसभा क्षेत्र में संगठन, कार्यकर्ताओं और आम मतदाताओं के बीच कितनी पकड़ रखता है। सर्वे के जरिए दावेदारों की स्वीकार्यता, सक्रियता, क्षेत्र में मौजूदगी और चुनावी क्षमता जैसे पहलुओं को परखा जाएगा।
कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर दावेदारी करने वाले नेताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती योग्य और जीतने की क्षमता रखने वाले उम्मीदवार का चयन करना है। इंटरनल सर्वे को इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक सर्वे में संभावित प्रत्याशियों की व्यक्तिगत छवि के साथ ही क्षेत्र में उनकी सक्रियता, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और जनता के बीच स्वीकार्यता को भी आकलन के दायरे में रखा जाएगा। इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि संबंधित नेता संगठन के लिए कितना सक्रिय रहा है और चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की उसकी क्षमता कैसी है।
इंटरनल सर्वे केवल नए दावेदारों तक सीमित नहीं रहेगा। मौजूदा कांग्रेस विधायकों को भी इस प्रक्रिया से गुजरना होगा। पार्टी यह जानने की कोशिश करेगी कि वर्तमान विधायक के प्रति क्षेत्र की जनता का रुझान कैसा है। स्थानीय स्तर पर उनकी सक्रियता, उपलब्धता और कामकाज को लेकर मतदाताओं की राय क्या है और आगामी चुनाव में उनकी जीत की संभावनाएं कितनी मजबूत हैं। इससे पार्टी नेतृत्व को उन सीटों पर भी समय रहते रणनीति बनाने में मदद मिल सकती है, जहां मौजूदा विधायक को लेकर संगठन या जनता के स्तर पर असंतोष की स्थिति हो।
उत्तराखंड की सभी विधानसभा सीटों का राजनीतिक और सामाजिक समीकरण एक जैसा नहीं है। पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, तो मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण, बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल चुनावी मुद्दे बनते हैं। ऐसे में कांग्रेस का सर्वे केवल नेताओं की लोकप्रियता तक सीमित रहने के बजाय प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के स्थानीय राजनीतिक समीकरण को समझने का माध्यम भी बन सकता है। पार्टी यह जानना चाहेगी कि किस सीट पर कौन सा चेहरा विपक्ष के सामने मजबूत चुनौती पेश कर सकता है और किन सीटों पर संगठन को अभी से अतिरिक्त मेहनत की जरूरत है।
सर्वे की तैयारी से कांग्रेस के भीतर टिकट की दावेदारी को लेकर भी हलचल तेज होने की संभावना है। अब तक क्षेत्र में सक्रियता दिखाकर टिकट की दावेदारी कर रहे नेताओं के सामने अपनी राजनीतिक जमीन साबित करने की चुनौती होगी। सर्वे में यदि किसी नेता की लोकप्रियता और स्वीकार्यता मजबूत सामने आती है तो उसकी दावेदारी को स्वाभाविक रूप से बल मिल सकता है। वहीं केवल संगठन के भीतर मजबूत संपर्क के आधार पर टिकट की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं के लिए यह प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है। पार्टी के इस कदम से यह संदेश भी जा रहा है कि टिकट वितरण केवल सिफारिश या व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर नहीं, बल्कि चुनावी क्षमता और जनता के बीच स्वीकार्यता को ध्यान में रखकर करने की कोशिश होगी।
सत्ता में भाजपा की मौजूदगी के बीच कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार के खिलाफ संभावित असंतोष को अपने पक्ष में वोट में बदलने की है। इसके लिए पार्टी को मजबूत उम्मीदवारों की जरूरत होगी। केवल सरकार विरोधी माहौल के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। हर सीट पर ऐसा चेहरा उतारना होगा जो स्थानीय स्तर पर भाजपा को सीधी चुनौती दे सके। इंटरनल सर्वे इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। कांग्रेस की रणनीति में अब संगठन और प्रत्याशी चयन दोनों को समान महत्व देने की कोशिश दिखाई दे रही है। पार्टी नेतृत्व जानता है कि चुनावी मैदान में केवल प्रदेश स्तर के मुद्दे पर्याप्त नहीं होंगे।
प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय नेतृत्व की ताकत और संगठन की सक्रियता निर्णायक भूमिका निभाएगी। इसीलिए संभावित प्रत्याशियों की स्थिति का पहले से आकलन कर पार्टी चुनाव के अंतिम चरण में किसी तरह के प्रयोग या जल्दबाजी से बचना चाहती है। कांग्रेस का इंटरनल सर्वे पार्टी के भीतर केवल आंकड़े जुटाने की कवायद नहीं होगा। यह आने वाले विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण और चुनावी रणनीति की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। अब देखना यह होगा कि सर्वे के बाद पार्टी कितने मौजूदा विधायकों पर भरोसा कायम रखती है और कितनी सीटों पर नए चेहरों को मौका देने की रणनीति अपनाती है। फिलहाल कांग्रेस के भीतर टिकट के दावेदार सक्रिय हैं और संगठन चुनावी तैयारी में जुट चुका है। चुनावी रण अभी दूर है, लेकिन कांग्रेस ने संकेत दे दिया है कि इस बार टिकट की दौड़ में सिर्फ दावेदारी नहीं चलेगीकृदावेदार की जमीन भी नापी जाएगी।
udaydinmaan: ‘हसुली’ में कैद है पीढ़ियों की ‘विरासत’
udaydinmaan: ‘हसुली’ में कैद है पीढ़ियों की ‘विरासत’: पहाड़ की हसुली गले में सजी धरोहर, पीढ़ियों की कहानी चांदी की चमक से कहीं ज्यादा गहरी है हसुली की पहचान पहाड़ की महिलाओं के गले से उतरकर अब संदू...
मंगलवार, 11 अगस्त 2026
‘हसुली’ में कैद है पीढ़ियों की ‘विरासत’
पहाड़ की हसुली गले में सजी धरोहर, पीढ़ियों की कहानी
चांदी की चमक से कहीं ज्यादा गहरी है हसुली की पहचान
पहाड़ की महिलाओं के गले से उतरकर अब संदूक में सिमटी
देहरादून। पहाड़ की पगडंडियों पर चलते हुए अगर किसी बुजुर्ग महिला और बच्चों के गले पर नजर ठहर जाए तो वहां सिर्फ चांदी की चमक दिखाई नहीं देती। उस चमक में एक पूरा पहाड़ दिखाई देता हैकृमाटी की खुशबू, खेतों की मेहनत, लोकगीतों की मिठास और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की कहानी। गले में सजी वह चांदी की हसुली इसी कहानी का एक हिस्सा है। कभी उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में हसुली बच्चों और महिलाओं के पारंपरिक आभूषणों का अहम हिस्सा हुआ करती थी। विवाह, त्योहार, पारिवारिक समारोह या किसी खास अवसर पर पहाड़ की महिलाएं जब पारंपरिक परिधान पहनती थीं तो गले में सजी हसुली उनकी सुंदरता को अलग पहचान देती थी। लेकिन हसुली को केवल श्रृंगार कहना इसके अर्थ को छोटा कर देना होगा। यह पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा रही है।
हसुली आमतौर पर चांदी से बनाई जाती है और इसका आकार अर्धचंद्राकार या मोटे घुमावदार रूप में दिखाई देता है। अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में इसके आकार, वजन और डिजाइन में अंतर मिलता है। कहीं यह साधारण होती है तो कहीं उस पर महीन नक्काशी दिखाई देती है। कहीं इसमें छोटे-छोटे घुंघरू या सजावटी तत्व जुड़े होते हैं। पहाड़ के सुनारों के लिए भी हसुली बनाना केवल धातु को आकार देना नहीं था। यह पीढ़ियों से चली आ रही एक कारीगरी थी। पुराने समय में जब बाजार दूर थे और तैयार आभूषण आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे, गांव के सुनार ही परिवार की पसंद और सामर्थ्य के हिसाब से आभूषण तैयार करते थे। हसुली भी उसी लोककारीगरी का हिस्सा थी।
पहाड़ के समाज में बेटी की शादी सिर्फ दो व्यक्तियों का संबंध नहीं थी। इसके साथ कई परंपराएं और भावनाएं जुड़ी होती थीं। मायके से विदा होती बेटी को कपड़ों और अन्य सामान के साथ आभूषण भी दिए जाते थे। इनमें हसुली का अपना विशेष स्थान था। कई परिवारों में यह आभूषण मां से बेटी और फिर बेटी से उसकी अगली पीढ़ी तक पहुंचता रहा। इसलिए किसी पुराने संदूक में रखी हसुली केवल चांदी का गहना नहीं होती। वह मां के हाथों की याद होती है। वह नानी की कहानी होती है। वह उस घर की आर्थिक स्थिति और सामाजिक जीवन की भी एक छोटी-सी निशानी होती है। एक हसुली के साथ परिवार की कई पीढ़ियां जुड़ी हो सकती हैं।
हसुली की कहानी उस पहाड़ी महिला से भी जुड़ी है जिसने अपना जीवन खेत, जंगल और घर के बीच गुजारा। सुबह पानी लेने निकलना हो, घास काटने जंगल जाना हो, खेत में काम करना हो या घर के दूसरे कामकृपहाड़ की महिला का जीवन श्रम से भरा रहा है। ऐसे जीवन में गहने केवल सजने का साधन नहीं थे। वह उसकी सामाजिक पहचान का हिस्सा भी थे। त्योहार के दिन जब वही महिला अपनी पारंपरिक पोशाक पहनती, बालों में सजावट करती और गले में हसुली पहनती तो उसका रूप पहाड़ की लोकसंस्कृति का जीवंत चित्र बन जाता। हसुली की चमक में उस महिला का आत्मसम्मान भी दिखाई देता था।
समय बदला तो पहाड़ का पहनावा भी बदलने लगा। गांवों से पलायन हुआ। नई पीढ़ी शहरों में पहुंची। कपड़े बदले, जीवनशैली बदली और आभूषणों की पसंद भी बदल गई। भारी पारंपरिक आभूषणों की जगह हल्के और आधुनिक डिजाइन के गहनों ने ले ली। नतीजा यह हुआ कि कभी रोजमर्रा और त्योहारों में दिखाई देने वाली हसुली अब कई घरों में संदूक के भीतर सुरक्षित रखी मिलती है। बुजुर्ग महिलाओं के गले में इसकी चमक अभी भी दिखाई देती है, लेकिन नई पीढ़ी में यह दृश्य लगातार कम हो रहा है। यह बदलाव सिर्फ फैशन का बदलाव नहीं है। यह उस लोकसंस्कृति के धीरे-धीरे बदलने की कहानी भी है जो कभी पहाड़ के दैनिक जीवन का हिस्सा थी।
आज जब उत्तराखंड अपनी लोकसंस्कृति और पारंपरिक पहचान को पर्यटन से जोड़ने की बात कर रहा है, तब हसुली जैसे आभूषणों को सिर्फ संग्रहालय की वस्तु बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। जरूरत है कि स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन मिले। पारंपरिक डिजाइन को आधुनिक जरूरतों के साथ जोड़ा जाए। युवा पीढ़ी को इन आभूषणों की कहानी बताई जाए और स्थानीय हस्तशिल्प को बाजार मिले। क्योंकि संस्कृति सिर्फ किताबों में नहीं बचती।
वह तब बचती है जब कोई बेटी अपनी मां की हसुली पहनकर आईने में खुद को देखती है और पूछती हैकृमां, यह तुम्हें किसने दी थी? और मां मुस्कुराकर कहती हैकृमेरी मां ने। यहीं से परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है। हसुली की असली कीमत उसके चांदी के वजन में नहीं है। उसकी कीमत उस कहानी में है जो उसके साथ चलती है। यह पहाड़ की उन बेटियों की कहानी है जिन्होंने खेतों में पसीना बहाया, जंगलों से घास ढोई, परिवार संभाला और फिर भी त्योहार के दिन गले में हसुली सजाकर अपने पहाड़ की पहचान को जीवित रखा। आज हसुली भले ही कम दिखाई देती हो, लेकिन जब तक किसी पहाड़ी संदूक में वह सुरक्षित है, तब तक पहाड़ की एक कहानी भी सुरक्षित है। हसुली को बचाना यानी सिर्फ एक आभूषण को बचाना नहींकृपहाड़ की स्मृति को बचाना है।
उफनती नदियां और ‘बेबस’ इंसान
चमोली जिले में तबाही के बीच अपनों की खोज
कागजी दावों पर भारी पड़ रहा प्रकृति का गुस्सा
जलसैलाब में पुल, वाहन बहे, एक कर्मी लापता
सवाल राहत की तस्वीरें आ गई पर जवाब कब
देहरादून। चमोली में पानी आया और अपने साथ सिर्फ पुल और गाड़ियां नहीं ले गया। वह अपने साथ उन परिवारों की नींद भी बहा ले गया, जिनके अपने अचानक लापता हो गए। सड़क बनाने वाले, पुल खड़े करने वाले और सीमा तक पहुंच का रास्ता तैयार करने वाले बीआरओ के कर्मी भी इस जलसैलाब की चपेट में आ गए। पहाड़ में जब पानी अपना रास्ता बदलता है तो आदमी के बनाए रास्ते कितने कमजोर हैं, यह कुछ ही मिनटों में साफ हो जाता है। एक तरफ उफनता पानी था, दूसरी तरफ पहाड़। बीच में इंसान था, उसकी मशीनें थीं, सड़क थी और वह पुल था जिस पर भरोसा करके लोग इस दुर्गम इलाके में आवाजाही करते हैं। फिर पानी आया और पुल नहीं रहा। गाड़ियां नहीं रहीं। कुछ लोग लौटकर नहीं आए। अब प्रशासन खोज रहा है। टीमें लग रही हैं। राहत और बचाव का काम चल रहा है। तस्वीरें आएंगी। हेलीकाप्टर उड़ेंगे। अधिकारियों के बयान आएंगे। बताया जाएगा कि हालात पर नजर रखी जा रही है। लेकिन पहाड़ का सबसे बड़ा सवाल इन बयानों के बीच कहीं खो जाता हैकृआखिर हर बार पहाड़ ही क्यों बताता है कि हमने तैयारी कितनी कम की थी?
चमोली कोई पहली बार बारिश देखने वाला इलाका नहीं है। यहां बादल फटने, अतिवृष्टि, भूस्खलन और अचानक आने वाले जलसैलाब का खतरा नया नहीं है। फिर भी हर बड़ी घटना के बाद हमारी भाषा वही रहती हैकृअचानक, अप्रत्याशित, प्राकृतिक आपदा। प्रकृति निश्चित रूप से अपने रास्ते में किसी की अनुमति नहीं लेती। लेकिन क्या खतरे का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता? यही वह सवाल है जिसे पूछना जरूरी है। एक पुल टूटता है तो प्रशासन के कागज पर वह एक ढांचा होता है। लेकिन गांव के आदमी के लिए पुल बाजार तक पहुंच है। स्कूल जाने का रास्ता है। अस्पताल जाने का रास्ता है। रोजगार तक पहुंच है और पहाड़ में कई बार पुल का मतलब दुनिया से जुड़ा रहना होता है। इसलिए जब जलसैलाब किसी पुल को बहा ले जाता है तो उसके साथ सिर्फ निर्माण सामग्री नहीं जाती। लोगों का भरोसा भी टूटता है और जब उसी घटना में सड़क और सीमा से जुड़े काम में लगे कर्मी लापता हो जाएं, तब यह हादसा और भी गंभीर हो जाता है। उनके घरों में इस समय कोई सरकारी प्रेस नोट नहीं पढ़ा जा रहा होगा। वहां सिर्फ एक सवाल होगाकृकि वह वापस कब आएंगे?
हमारी आपदा पत्रकारिता की एक अजीब आदत है। पहले संख्या आती है। कितने पुल बहे? कितनी गाड़ियां बहीं? कितने लोग लापता? कितनी सड़कें बंद? फिर तस्वीरें आती हैं। फिर दौरा होता है। फिर समीक्षा बैठक होती है। फिर मुआवजे की घोषणा होती है। लेकिन कुछ दिनों बाद जब कैमरे दूसरी खबर की ओर चले जाते हैं, तब उन परिवारों का क्या होता है? जिस घर का आदमी वापस नहीं आया, वहां बारिश खत्म होने के बाद भी इंतजार खत्म नहीं होता। जिस सड़क का पुल बह गया, वहां मौसम साफ होने के बाद भी रास्ता नहीं बन जाता और जिस पहाड़ में एक हादसा हुआ, वहां अगली बारिश तक वही खतरा फिर खड़ा रहता है।
उत्तराखंड में विकास जरूरी है। सड़क चाहिए। पुल चाहिए। सुरंग चाहिए। सीमा तक बेहतर संपर्क चाहिए। गांवों को बाजार और अस्पताल से जोड़ना जरूरी है। लेकिन विकास का अर्थ पहाड़ की प्रकृति को नजरअंदाज करना नहीं हो सकता। जब पहाड़ की ढलान, नदी का प्राकृतिक बहाव, जल निकासी और भूगर्भीय स्थिति को नजरअंदाज करके निर्माण होता है, तब प्रकृति की पहली बड़ी परीक्षा में हमारी इंजीनियरिंग कटघरे में खड़ी हो जाती है। सवाल यह नहीं कि सड़क क्यों बनाई गई। सवाल यह है कि सड़क कैसे बनाई गई? सवाल यह नहीं कि पुल क्यों बनाया गया। सवाल यह है कि क्या पुल उस जलधारा और उस संभावित दबाव को ध्यान में रखकर बनाया गया था? और सबसे बड़ा सवालकृक्या हमने आपदा को केवल राहत और मुआवजे का विषय बना दिया है, जबकि उसे निर्माण और योजना का विषय होना चाहिए था?
बीआरओ कर्मियों की कहानी
सीमा से जुड़े इलाकों में काम करने वाले बीआरओ कर्मी अक्सर उस भारत की तस्वीर हैं जो नक्शे पर दिखाई नहीं देता, जहां सामान्य परिस्थितियों में पहुंचना मुश्किल है, वहां सड़क बनाना आसान काम नहीं। बारिश, बर्फ, भूस्खलन और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच काम करने वाले इन लोगों के लिए पहाड़ रोज की चुनौती है। जलसैलाब में लापता कर्मियों की खबर इसलिए सिर्फ एक दुर्घटना की खबर नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है जो दूसरों के लिए रास्ते बनाते हैं और कभी-कभी उन्हीं रास्तों के बीच खुद रास्ता खो देते हैं। उनके परिवारों के सवालों का जवाब सिर्फ मुआवजे से नहीं दिया जा सकता। उन्हें जवाब चाहिए। खोज चाहिए और यह भरोसा चाहिए कि अगर ऐसी परिस्थितियां दोबारा बनती हैं तो व्यवस्था पहले से तैयार होगी।
आपदा की तस्वीर
हर साल बारिश में उत्तराखंड की तस्वीरें देशभर में पहुंचती हैं। उफनती नदियां। टूटती सड़कें। भूस्खलन। फंसे यात्री। बचाव अभियान। हेलीकाप्टर और पहाड़ की गोद में खड़ा कोई आदमी, जो कैमरे के सामने कहता हैकृसाहब, रास्ता कब खुलेगा? फिर खबर खत्म। लेकिन पहाड़ की जिंदगी खबर खत्म होने के बाद शुरू होती है। चमोली के इस जलसैलाब के बाद भी यही होना चाहिए कि राहत और बचाव सबसे पहली प्राथमिकता बने। लापता लोगों की तलाश पूरी ताकत से हो। प्रभावित परिवारों को तत्काल सहायता मिले। लेकिन इसके बाद एक ईमानदार समीक्षा भी हो। क्यों पुल बहा? क्यों वाहन सुरक्षित नहीं रह सके? कहां चेतावनी व्यवस्था कमजोर थी? क्या निर्माण मानकों का पालन हुआ? क्या नदी और जलधाराओं के पुराने रास्तों का अध्ययन किया गया? क्या संवेदनशील क्षेत्रों में काम कर रहे कर्मचारियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था थी? इन सवालों के जवाब अगर नहीं खोजे गए तो अगली बारिश फिर यही सवाल लेकर आएगी और तब शायद कोई दूसरा पुल होगा। कोई दूसरी गाड़ी होगी। कोई दूसरा परिवार इंतजार कर रहा होगा। पहाड़ को हर साल यह साबित करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि वह कितना खतरनाक हो सकता है। क्योंकि पहाड़ की त्रासदी सिर्फ पानी से नहीं आती। कई बार वह हमारी तैयारी की कमी से भी बड़ी हो जाती है।
करोड़ों का ‘ढोंग’ जिंदगी ‘डोली’ में
उत्तराखंड के पहाड़ के गांवों में बदहाल हैं स्वास्थ्य सेवाएं
उत्तराखंड के पहाड़ में स्ट्रेचर बना है चार लोगों का कंधा
सड़कें कागज पर पहुंच गईं, एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंची
घायल को कंधों पर उठाकर मीलों चलने को ग्रामीण मजबूर
देहरादून। उत्तराखंड में विकास की तस्वीरें बहुत सुंदर हैं। पहाड़ों पर चौड़ी सड़कें हैं, सुरंगें हैं, चारधाम के रास्ते हैं, बड़े-बड़े पुल हैं और विकास के दावों के लंबे-लंबे विज्ञापन हैं। लेकिन इसी उत्तराखंड के किसी गांव में जब कोई व्यक्ति घायल होता है तो विकास की चमक अचानक खत्म हो जाती है। एंबुलेंस सड़क तक आती है। गांव तक नहीं। फिर चार लोग आते हैं। एक डोली आती है। मरीज को उसमें लिटाया जाता है और पहाड़ के चार ग्रामीण उसे कंधों पर उठाकर कई किलोमीटर पैदल चल पड़ते हैं। यह दृश्य किसी पुराने उत्तराखंड की तस्वीर नहीं है। यह उस उत्तराखंड की तस्वीर है जो आज भी मौजूद है। जिस राज्य में चारधाम यात्रा के लिए करोड़ों रुपये के सड़क और परिवहन प्रोजेक्ट बन रहे हैं, उसी राज्य में एक ग्रामीण को अस्पताल पहुंचाने के लिए गांव के लोगों को अपना कंधा देना पड़ रहा है। सवाल यह नहीं कि डोली क्यों बनी। सवाल यह है कि डोली की जरूरत आज भी क्यों है?
मैदानी शहर में एंबुलेंस की आवाज सुनाई देती है तो लगता है कि व्यवस्था मरीज तक पहुंच रही है। पहाड़ में कई जगह एंबुलेंस की आवाज गांव तक पहुंचती ही नहीं। क्योंकि सड़क नीचे खत्म हो जाती है। इसके बाद रास्ता पगडंडी का होता है। कहीं सीढ़ियां हैं, कहीं पत्थर हैं, कहीं जंगल का रास्ता है और कहीं इतना संकरा रास्ता कि चार आदमी भी मुश्किल से चल सकें। मरीज को स्ट्रेचर पर ले जाना संभव नहीं होता तो डोली ही सहारा बनती है। परिवार के लोग जानते हैं कि अस्पताल दूर है। समय कम है और रास्ता लंबा। फिर किसी की मां, किसी के पिता, किसी की पत्नी या किसी बच्चे को चार-पांच लोग अपने कंधों पर उठाते हैं। यह सिर्फ मजबूरी नहीं। यह स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ा एक आईना है।
उत्तराखंड की स्वास्थ्य समस्या केवल अस्पतालों की संख्या की समस्या नहीं है। यह दूरी की समस्या भी है। अस्पताल है तो कितनी दूर? सड़क है तो मरीज के घर तक है या नहीं? सड़क है तो बारिश में चलती है या नहीं? एंबुलेंस है तो गांव तक पहुंचती है या नहीं? और अगर एंबुलेंस नहीं पहुंचती तो मरीज को सड़क तक कौन पहुंचाएगा? इन सवालों का जवाब किसी सरकारी भवन की दीवार पर नहीं लिखा है। इसका जवाब पहाड़ का ग्रामीण अपने कंधे पर लिखता है। वही कंधा जिस पर कभी घास की गठरी होती थी, अब उसी पर मरीज की जिंदगी रखी होती है। सरकारी रिपोर्ट में लिखा जाएगाकृस्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। कहीं लिखा होगाकृदूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत की गई हैं। किसी बैठक में कहा जाएगाकृग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर कनेक्टिविटी सरकार की प्राथमिकता है। लेकिन जिस दिन किसी गांव का आदमी घायल होता है, उसे इन वाक्यों की जरूरत नहीं होती। उसे डाक्टर चाहिए। उसे एंबुलेंस चाहिए। उसे सड़क चाहिए और सबसे बढ़कर उसे समय चाहिए। क्योंकि पहाड़ में अस्पताल तक पहुंचने में लगने वाला अतिरिक्त एक घंटा केवल एक घंटा नहीं होता।वह मरीज की जिंदगी और मौत के बीच का अंतर हो सकता है।
यह सवाल विकास विरोधी नहीं है। बल्कि यह विकास की गुणवत्ता का सवाल है। अगर किसी गांव तक सड़क नहीं पहुंच सकती तो कम से कम ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं है जिससे आपातकाल में मरीज को सुरक्षित और तेजी से सड़क तक पहुंचाया जा सके? अगर सड़क भूस्खलन से बंद हो जाती है तो वैकल्पिक मार्ग क्या है? क्या हर संवेदनशील गांव के लिए स्थानीय आपदा-चिकित्सा योजना है? क्या प्रशिक्षित ग्रामीण स्वयंसेवक हैं? क्या प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था है? क्या हर दूरस्थ गांव के लिए आपातकालीन संपर्क और परिवहन व्यवस्था वास्तव में काम करती है? या फिर हमारी पूरी व्यवस्था इस उम्मीद पर चल रही है कि हादसा होने से पहले कोई हादसा न हो?
उत्तराखंड के गांवों में डोली उठाने वाले लोग किसी योजना का हिस्सा नहीं होते। वह पड़ोसी होते हैं। रिश्तेदार होते हैं। दोस्त होते हैं। कभी-कभी अनजान ग्रामीण भी मदद के लिए कंधा दे देते हैं। उनके पास कोई सरकारी एंबुलेंस नहीं होती। कोई सायरन नहीं होता। कोई मेडिकल टीम नहीं होती। सिर्फ एक आदमी होता है जिसे बचाना है और चार-पांच लोग होते हैं जो उसे बचाने के लिए अपना कंधा दे रहे होते हैं।
यही उत्तराखंड की सबसे मार्मिक तस्वीर है। जिस पहाड़ ने देश को सैनिक दिए, श्रमिक दिए, पर्यटन दिया, नदियां दीं, पानी दियाकृवही पहाड़ आज भी अपने बीमार और घायल लोगों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए अपने लोगों के कंधों पर निर्भर है। चुनाव आते हैं तो पहाड़ के लिए बड़े-बड़े वादे होते हैं। पलायन रोकेंगे। सड़क देंगे। स्वास्थ्य सुधारेंगे। गांवों को आधुनिक बनाएंगे। लेकिन किसी नेता से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिएकृ क्या आपके विकास माडल में वह गांव शामिल है जहां आज भी मरीज को डोली में अस्पताल ले जाना पड़ता है? क्या विकास की सफलता किलोमीटर सड़क से मापी जाएगी या इस बात से कि आपातकाल में एंबुलेंस कितने मिनट में मरीज तक पहुंचती है? क्या स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता अस्पतालों की इमारतों से तय होगी या इस बात से कि किसी पहाड़ी मां को अपने बेटे को डोली में लादकर कितनी दूर नहीं चलना पड़ा? यही असली कसौटी है।
हर बार जब ऐसी तस्वीर सामने आती है तो सोशल मीडिया पर लोग दुख जताते हैं। उत्तराखंड की असली तस्वीर। यह कैसी स्वास्थ्य व्यवस्था? सरकार कब जागेगी? फिर कुछ दिन बाद दूसरी खबर आ जाती है। लेकिन डोली वहीं रहती है। पगडंडी वहीं रहती है। दूर अस्पताल वहीं रहता है और अगला मरीज भी शायद उसी रास्ते से जाएगा। इसलिए सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, पूरे समाज और व्यवस्था से है। क्यों हम उस तस्वीर को सामान्य मान बैठे हैं जिसमें चार इंसान पांचवें इंसान को कंधे पर उठाकर अस्पताल ले जा रहे हैं? डोली पहाड़ की परंपरा हो सकती है। लेकिन आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था का विकल्प नहीं। जिस दिन पहाड़ के किसी गांव में घायल को डोली की जरूरत नहीं पड़ेगी, उस दिन शायद हम कह सकेंगे कि विकास सचमुच गांव तक पहुंचा है। उस दिन सड़क सिर्फ कागज पर नहीं होगी। अस्पताल सिर्फ भवन नहीं होगा और एंबुलेंस सिर्फ सरकारी वाहन नहीं होगी। वह सचमुच मरीज तक पहुंचेगी।
तब पहाड़ का कंधा फिर घास की गठरी उठाएगा, लकड़ी उठाएगा, बच्चे को स्कूल पहुंचाएगा। लेकिन किसी मरीज की जिंदगी को अस्पताल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उसे अपने कंधे पर नहीं उठानी पड़ेगी। यही वह दिन होना चाहिए जिसे उत्तराखंड विकास का असली प्रमाण माने।
पहाड़ की सियासत में मुद्दों की ‘बौछार’
पहाड़ों पर आफत की बारिश के बीच बढ़ा सियासी तापमान
भाजपा का राहत पर दांव और कांग्रेस का अव्यवस्था पर वार
कांग्रेस के तीखे सवालों पर भाजपा का राहत-बचाव पर ढाल
2027 की दस्तक में बारिश के बीच जमीन पर उतरीं पार्टियां
देहरादून। उत्तराखंड में मानसून की बारिश भले ही पहाड़ों को भिगो रही हो, लेकिन प्रदेश का राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। कहीं सड़क और पुल बहने का मुद्दा है तो कहीं आपदा राहत और पुनर्वास को लेकर सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी ओर विधानसभा चुनाव 2027 की दस्तक के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों ने संगठन को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है। ऐसे में इस बार की बरसात सिर्फ नदियों और नालों का जलस्तर नहीं बढ़ा रही, बल्कि सियासत की हलचल भी तेज कर रही है। मानसून के दौरान उत्तराखंड में हर साल सड़कें टूटती हैं, पुल क्षतिग्रस्त होते हैं और गांवों का संपर्क जिला मुख्यालयों से कटता है। इस बार भी कई इलाकों में बारिश और भूस्खलन ने सरकार की तैयारियों की परीक्षा शुरू कर दी है। यही घटनाएं अब विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का राजनीतिक हथियार बन रही हैं। कांग्रेस सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर हमलावर है तो भाजपा विकास कार्यों और आपदा के दौरान किए जा रहे राहत एवं बचाव अभियानों को अपनी उपलब्धि के रूप में सामने रख रही है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में मानसून हमेशा सरकार के लिए बड़ी चुनौती लेकर आता है। सड़क बंद होने से लेकर गांवों तक राशन और जरूरी दवाइयां पहुंचाने तक प्रशासन की क्षमता की परीक्षा होती है। चारधाम यात्रा के बीच बारिश ने चुनौती को और बढ़ा दिया है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आपदा के दौरान राहत और बचाव कार्य तेजी से हों तथा प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य स्थिति जल्द बहाल की जाए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार लगातार अधिकारियों से तैयारियों और राहत कार्यों की जानकारी ले रही है। सरकार का दावा है कि संवेदनशील क्षेत्रों में मशीनरी और बचाव दलों को अलर्ट रखा गया है। लेकिन विपक्ष का सवाल है कि हर साल मानसून आने से पहले तैयारियों के दावे किए जाते हैं, फिर बारिश शुरू होते ही वही सड़कें और वही पुल क्यों टूटते हैं? यही सवाल आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बन सकता है।
2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में लाना शुरू कर दिया है। पार्टी का फोकस बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने का है, जहां पिछली बार पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। भाजपा नेतृत्व के सामने सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी की चुनौती है। ऐसे में संगठनात्मक गतिविधियों को तेज करने के साथ ही विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर मौजूद नाराजगी को कम करना भी पार्टी की प्राथमिकताओं में शामिल है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की तैयारी में है। समान नागरिक संहिता, महिला सशक्तीकरण, रोजगार, निवेश और विकास परियोजनाओं के साथ सरकार चारधाम और सीमांत क्षेत्रों में किए जा रहे कामों को भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाना चाहती है।
दूसरी तरफ कांग्रेस मानसून को सरकार के खिलाफ मुद्दे खड़े करने के अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी सड़क, स्वास्थ्य सेवाओं, बेरोजगारी, महंगाई और पलायन जैसे पुराने मुद्दों के साथ आपदा प्रबंधन को भी प्रमुखता से उठा रही है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार पर हमला करना नहीं, बल्कि इन मुद्दों को जनता के बीच एक मजबूत राजनीतिक विकल्प में बदलना है। संगठन में नई ऊर्जा भरने के प्रयास इसी दिशा में देखे जा रहे हैं। पार्टी नेताओं का लगातार जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय होना इस बात का संकेत है कि चुनावी तैयारी अब केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहने वाली।
उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ का दर्द कभी पुराना नहीं होता। सड़क टूटी तो सवाल विकास का, अस्पताल दूर हुआ तो सवाल स्वास्थ्य व्यवस्था का, युवा बाहर गया तो सवाल रोजगार का और गांव खाली हुआ तो सवाल पलायन का। मानसून इन सभी सवालों को अचानक सामने ला देता है। बरसात में बंद सड़क किसी सरकारी आंकड़े का हिस्सा नहीं होती। वह उस गांव के लिए जीवन की लाइन होती है। पुल टूटना किसी फाइल में दर्ज नुकसान भर नहीं होता, बल्कि कई परिवारों के लिए बाजार, स्कूल और अस्पताल से संपर्क टूट जाना होता है। यही वजह है कि मानसून के दौरान सामने आने वाली छोटी-छोटी घटनाएं भी चुनावी साल में बड़ा राजनीतिक संदेश बन सकती हैं।
विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनावी घड़ी चल चुकी है। आने वाले महीनों में विकास बनाम व्यवस्था, सरकार की उपलब्धियां बनाम स्थानीय नाराजगी और राष्ट्रीय मुद्दे बनाम उत्तराखंड के स्थानीय सवालों के बीच मुकाबला तेज होगा। भाजपा अपने मजबूत संगठन और सरकार की उपलब्धियों के सहारे मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश करेगी। क्षेत्रीय दल और अन्य राजनीतिक ताकतें भी अपनी जगह तलाशेंगी। ऐसे में इस मानसून की बारिश केवल पहाड़ की सड़कों और नदियों की परीक्षा नहीं ले रही। यह सरकार की तैयारी, प्रशासन की कार्यक्षमता और विपक्ष की राजनीतिक सक्रियताकृतीनों की परीक्षा है। आने वाले दिनों में बारिश थमेगी, सड़कें खुलेंगी और मौसम साफ होगा। लेकिन 2027 की राजनीति में इस बरसात के दौरान उठे सवाल शायद इतनी जल्दी नहीं थमेंगे।
सोमवार, 10 अगस्त 2026
udaydinmaan: बदलते दौर में खो गई ‘बुलाक’ की चमक
udaydinmaan: बदलते दौर में खो गई ‘बुलाक’ की चमक: सदियों की कहानी कहती एक छोटी-सी बुलाक की वह चमक पहाड़ के गांवों में कभी सुहाग और समृद्धि की पहचान थी बुलाक आज के फैशन के बीच लोक-संस्कृति की ...
कांग्रेस का बड़ा प्लान, यशपाल आर्य को कमान!
यशपाल आर्य को सीएम फेस बनाकर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी
सत्ता की लड़ाई में कांग्रेस का नया कार्ड, हाईकमान की मुहर का इंतजार
कांग्रेस की तराई से पहाड़ तक सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अब तेज होती जा रही है। भाजपा जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस अब ऐसा चेहरा तलाश रही है जो भाजपा के चुनावी नैरेटिव को सीधे चुनौती दे सके। पार्टी के भीतर से निकल रही चर्चाओं और सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर चुनाव मैदान में उतरने की रणनीति पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगर यह रणनीति अंतिम रूप लेती है तो उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा। कांग्रेस पहली बार चुनाव से पहले मुख्यमंत्री चेहरे को स्पष्ट कर भाजपा के सामने सीधी राजनीतिक लड़ाई खड़ी कर सकती है। हालांकि पार्टी की ओर से अभी तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है और अंतिम फैसला कांग्रेस हाईकमान को करना है।
कांग्रेस की रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने एक ऐसा चेहरा खड़ा करना है, जिसके पास लंबा राजनीतिक अनुभव हो और जो प्रदेश के अलग-अलग सामाजिक समीकरणों में स्वीकार्यता रखता हो। यशपाल आर्य उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। वह कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे हैं। इसके अलावा उनकी राजनीतिक पकड़ कुमाऊं के साथ-साथ तराई क्षेत्र में भी मानी जाती है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर पेश करने से चुनाव का विमर्श केवल धामी बनाम कौन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन और सरकार के प्रदर्शन जैसे मुद्दे भी केंद्र में आ सकते हैं।
आर्य को आगे करने की चर्चा के पीछे सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्तराखंड में दलित मतदाता चुनावी गणित में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस अगर आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर आगे करती है तो पार्टी इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व के बड़े संदेश के रूप में पेश कर सकती है। कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि भाजपा पिछले दो विधानसभा चुनावों से लगातार मजबूत स्थिति में है। ऐसे में केवल सरकार विरोधी माहौल के भरोसे सत्ता में वापसी मुश्किल हो सकती है। पार्टी को ऐसा नैरेटिव तैयार करना होगा जो मतदाताओं को यह भरोसा दिला सके कि उसके पास सरकार चलाने का स्पष्ट नेतृत्व और रोडमैप दोनों मौजूद हैं। यहीं पर आर्य का नाम कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
आर्य को मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करना कांग्रेस के लिए जितना बड़ा राजनीतिक दांव होगा, उतनी ही बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर पैदा हो सकती है। उत्तराखंड कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार माने जाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, विधायक और संगठन के कई प्रभावशाली चेहरे लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं। ऐसे में किसी एक चेहरे को चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने के बाद बाकी नेताओं को साथ लेकर चलना कांग्रेस नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी। कांग्रेस अगर आर्य के नाम पर आगे बढ़ती है तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पार्टी का चुनावी अभियान किसी एक नेता की महत्वाकांक्षा के बजाय सामूहिक नेतृत्व के संदेश के साथ आगे बढ़े।
भाजपा की रणनीति फिलहाल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व और सरकार की उपलब्धियों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ने की है। पार्टी संगठन बूथ स्तर तक अपनी तैयारियां तेज कर चुका है। ऐसे में कांग्रेस अगर आर्य को सामने रखती है तो मुकाबला सीधे दो राजनीतिक चेहरों के बीच दिखाई देने लगेगा। धामी की सबसे बड़ी ताकत उनकी युवा छवि और भाजपा संगठन का मजबूत नेटवर्क है। वहीं आर्य के पक्ष में लंबा प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव तथा विभिन्न सामाजिक समूहों में उनकी पहचान को रखा जा सकता है। यानी कांग्रेस की रणनीति सफल हुई तो 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं, बल्कि धामी बनाम आर्य की राजनीतिक लड़ाई के रूप में भी पेश हो सकता है।
यशपाल आर्य को आगे करने का एक और राजनीतिक संदेश क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा है। उत्तराखंड की राजनीति में कुमाऊं और गढ़वाल के बीच नेतृत्व के संतुलन का सवाल हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। आर्य के चेहरे के साथ कांग्रेस तराई और कुमाऊं के मतदाताओं को साधने की कोशिश कर सकती है। साथ ही पहाड़ में पार्टी के पुराने जनाधार को वापस खड़ा करने के लिए अलग रणनीति अपनाई जा सकती है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन की परंपरा को वह अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। पार्टी का संदेश हो सकता है कि भाजपा को लगातार दो कार्यकाल देने के बाद अब मतदाता बदलाव की ओर देख रहे हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस हाईकमान वास्तव में यशपाल आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में घोषित करेगा? सूत्रों की चर्चा को अगर राजनीतिक संकेत मानें तो कांग्रेस नेतृत्व उत्तराखंड के चुनाव को इस बार अधिक स्पष्ट नेतृत्व के साथ लड़ने की तैयारी में है। लेकिन पार्टी के भीतर की खींचतान और टिकट वितरण से लेकर नेतृत्व के सवाल तक कई ऐसे मोर्चे हैं, जिन पर अंतिम फैसला आसान नहीं होगा। कांग्रेस यदि आर्य को आगे करती है तो यह केवल एक नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाना नहीं होगा। यह उत्तराखंड की जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक गणित को नए सिरे से व्यवस्थित करने की कोशिश होगी।
आखिरकार चुनाव केवल चेहरों से नहीं जीते जाते। बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, आपदा, महंगाई, भ्रष्टाचार, चारधाम यात्रा और पहाड़ की बुनियादी जरूरतें भी मतदाता के सामने होंगी। भाजपा अपने विकास माडल और धामी सरकार के कामकाज को लेकर मैदान में उतरेगी। कांग्रेस को जवाब में केवल चेहरे की राजनीति नहीं, बल्कि एक स्पष्ट वैकल्पिक एजेंडा भी देना होगा। अगर कांग्रेस आर्य को सामने रखती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि चेहरा आकर्षण बने, बोझ नहीं। फिलहाल यशपाल आर्य का नाम कांग्रेस की संभावित रणनीति में तेजी से उभर रहा है। लेकिन राजनीति में सूत्रों की चर्चा और आधिकारिक फैसला दो अलग चीजें हैं। इसलिए असली तस्वीर कांग्रेस हाईकमान के निर्णय के बाद ही साफ होगी। फिर भी इतना तय है कि अगर कांग्रेस ने आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर मैदान में उतारने का फैसला कर लिया, तो उत्तराखंड का 2027 चुनाव अब तक के सबसे दिलचस्प राजनीतिक मुकाबलों में शामिल हो सकता है।
भाजपा ने तैयार की चुनावी ‘फौज’
भाजपा प्रदेश कार्यसमिति में दिग्गजों को जिम्मेदारी
अनुभवी नेताओं के साथ नए चेहरों को मिली जगह
बूथ से विधानसभा तक चुनावी नेटवर्क करेंगे मजबूत
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक जमीन अभी से तैयार होने लगी है। सत्ता में हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में लाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। पार्टी ने प्रदेश कार्यसमिति का गठन कर नेताओं की एक ऐसी टीम तैयार की है, जिसमें संगठन के अनुभवी चेहरों से लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाले नेताओं को जिम्मेदारियां दी गई हैं। प्रदेश कार्यसमिति की घोषणा को महज संगठनात्मक फेरबदल के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव की बड़ी रणनीति दिखाई दे रही है। भाजपा का लक्ष्य साफ हैकृसंगठन को मजबूत करो, बूथ को मजबूत करो और चुनाव से पहले हर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की पूरी मशीनरी को सक्रिय कर दो।
भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति में कई वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को जगह मिली है। पार्टी के लिए इन नेताओं का अनुभव चुनावी परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं संगठन में नई ऊर्जा लाने के लिए नए चेहरों को भी जिम्मेदारी देकर भाजपा ने यह संकेत दिया है कि आगामी चुनाव केवल सरकार के भरोसे नहीं, बल्कि संगठन की ताकत के दम पर लड़ा जाएगा। पार्टी की राजनीति में संगठन को हमेशा सबसे महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है। यही वजह है कि भाजपा चुनाव से काफी पहले अपनी टीम को मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है। प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य आने वाले समय में केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहेंगे। उन्हें विधानसभा क्षेत्रों में संगठन की स्थिति, बूथ स्तर की तैयारियों, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर भी नजर रखनी होगी।
भाजपा की इस पूरी कवायद में उन विधानसभा सीटों पर विशेष फोकस माना जा रहा है, जहां पार्टी को पिछले चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी पहले ही कमजोर सीटों की पहचान कर चुकी है और वरिष्ठ नेताओं को विधानसभा स्तर पर संगठनात्मक प्रवास की जिम्मेदारी देने की रणनीति पर काम कर रही है। अब प्रदेश कार्यसमिति की नई टीम इस अभियान को और गति दे सकती है। भाजपा की रणनीति है कि चुनाव की घोषणा का इंतजार करने के बजाय अभी से कमजोर बूथों और कमजोर विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय किया जाए। यानी इस बार भाजपा का चुनावी मंत्र केवल चुनाव के समय प्रचार नहीं, बल्कि चुनाव से पहले संगठन तैयार करने का है।
भाजपा के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाना भी महत्वपूर्ण होगा। सरकार की उपलब्धियों को लेकर पार्टी पहले से ही जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है। प्रदेश कार्यसमिति के जरिए पार्टी सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को बूथ स्तर तक पहुंचाने की कोशिश करेगी। इसके लिए कार्यकर्ताओं को यह बताया जाएगा कि सरकार ने क्या काम किया, उसका लाभ किन वर्गों को मिला और आने वाले समय में पार्टी का एजेंडा क्या होगा। भाजपा की कोशिश होगी कि सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बने और उसका फायदा चुनाव में मिले। प्रदेश कार्यसमिति का गठन पार्टी के भीतर टिकट की राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन संभावित प्रत्याशियों की सक्रियता पहले ही बढ़ चुकी है।
भाजपा नेतृत्व लगातार यह संकेत देता रहा है कि टिकट केवल व्यक्तिगत संपर्क या सिफारिश से नहीं, बल्कि संगठन में प्रदर्शन, जनता के बीच पकड़ और चुनाव जीतने की क्षमता के आधार पर तय होगा। ऐसे में नई कार्यसमिति में शामिल नेताओं की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। उन्हें संगठन के साथ-साथ स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की रिपोर्ट भी ऊपर तक पहुंचानी होगी। यानी प्रदेश कार्यसमिति सिर्फ पदों की सूची नहीं, बल्कि आने वाले चुनाव के लिए राजनीतिक फीडबैक सिस्टम भी बन सकती है। भाजपा की इस तैयारी ने कांग्रेस पर भी दबाव बढ़ा दिया है। कांग्रेस जहां अपने संगठन को नए सिरे से मजबूत करने और चुनावी चेहरे को लेकर मंथन कर रही है, वहीं भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर अपना ढांचा सामने रख दिया है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ा फायदा उसका मजबूत बूथ नेटवर्क है। पार्टी इस नेटवर्क को और सक्रिय करके चुनावी मुकाबले में शुरुआती बढ़त लेने की कोशिश कर रही है। हालांकि कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ स्थानीय नाराजगी, बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने का अवसर रहेगा। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती केवल संगठन खड़ा करने की नहीं, बल्कि जनता के बीच अपने पक्ष में माहौल बनाए रखने की भी होगी। उत्तराखंड की राजनीति में अक्सर चुनावी मुकाबला मुख्यमंत्री चेहरे और सरकार के प्रदर्शन के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। लेकिन 2027 में भाजपा इसे संगठनात्मक ताकत की लड़ाई बनाने की कोशिश कर रही है। प्रदेश कार्यसमिति में दिग्गजों को जिम्मेदारी देकर पार्टी ने संकेत दिया है कि चुनावी मैदान में एक साथ कई मोर्चे खोले जाएंगे। कोई नेता बूथ संभालेगा, कोई विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं को सक्रिय करेगा, कोई सरकार की उपलब्धियों को जनता तक ले जाएगा और कोई कमजोर सीटों पर पार्टी की संभावनाओं का आकलन करेगा। अर्थात भाजपा ने चुनाव से पहले ही अपनी फौज की तैनाती शुरू कर दी है।
संगठन की घोषणा करना आसान है, लेकिन उसे चुनावी मशीन में बदलना चुनौती है। कार्यसमिति के नेताओं के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह कागज पर मिली जिम्मेदारी को जमीन पर कितनी मजबूती से निभा पाते हैं। भाजपा अगर बूथ स्तर तक अपने संगठन को सक्रिय करने में सफल रहती है तो कांग्रेस के लिए मुकाबला और कठिन हो सकता है। लेकिन अगर स्थानीय असंतोष, टिकट की खींचतान या नेताओं के बीच गुटबाजी संगठन पर भारी पड़ती है तो यही बड़ा ढांचा पार्टी के लिए चुनौती भी बन सकता है। फिलहाल भाजपा ने साफ कर दिया है कि 2027 का चुनाव उसके लिए अभी से शुरू हो चुका है। प्रदेश कार्यसमिति का गठन इसी चुनावी तैयारी की पहली बड़ी तस्वीर है। अब देखना होगा कि भाजपा की यह राजनीतिक फौज विधानसभा चुनाव तक कितनी सक्रिय रहती है और बूथ से लेकर सत्ता के गलियारों तक उसकी रणनीति कितनी कारगर साबित होती है।
बदलते दौर में खो गई ‘बुलाक’ की चमक
सदियों की कहानी कहती एक छोटी-सी बुलाक की वह चमक
पहाड़ के गांवों में कभी सुहाग और समृद्धि की पहचान थी बुलाक
आज के फैशन के बीच लोक-संस्कृति की विरासत बचाने की चुनौती
देहरादून। पहाड़ की पगडंडियों पर चलती कोई महिला जब अपने पारंपरिक परिधान में नजर आती है तो उसके माथे की बिंदी, गले का गलोबंद, कानों के कर्णफूल और नाक की बुलाककृसब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं, जिसमें पहाड़ की लोकसंस्कृति सांस लेती दिखाई देती है। पहाड़ की स्त्री के श्रृंगार में बुलाक केवल सोने का एक आभूषण नहीं रही, बल्कि यह उसकी पहचान, परिवार की परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रही है। आज जब पहाड़ के गांव बदल रहे हैं, पहनावा बदल रहा है और नई पीढ़ी का फैशन भी बदल रहा है, तब बुलाक की चमक कुछ कम जरूर हुई है, लेकिन उसकी कहानी अब भी उतनी ही पुरानी और खूबसूरत है।
बुलाक को देखकर पहली नजर में शायद कोई इसे नाक का साधारण आभूषण समझे, लेकिन पहाड़ के पारंपरिक श्रृंगार में इसका अपना विशेष स्थान रहा है। खासकर पहाड़ी महिलाओं के पारंपरिक आभूषणों में बुलाक का उल्लेख आते ही पुरानी पीढ़ी के सामने गांव की महिलाएं, त्योहारों के अवसर पर सजे आंगन और पारंपरिक परिधानों में सजी पहाड़ की बेटियों की तस्वीर उभर आती है। सोने या अन्य धातु से बनी बुलाक अपने आकार और डिजाइन में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग दिखाई दे सकती है। कहीं इसमें महीन नक्काशी होती है तो कहीं यह साधारण लेकिन बेहद आकर्षक डिजाइन में दिखाई देती है। यही विविधता पहाड़ के आभूषणों की खूबसूरती है।
पहाड़ के पारंपरिक समाज में शादी-ब्याह केवल दो व्यक्तियों का रिश्ता नहीं, बल्कि पूरे गांव और परिवार का उत्सव होता था। ऐसे अवसरों पर महिलाओं का पारंपरिक श्रृंगार विशेष महत्व रखता था। दुल्हन के परिधान के साथ बुलाक भी उसके श्रृंगार का हिस्सा बनती थी। बुजुर्ग महिलाएं अपनी बहुओं और बेटियों को पुराने गहनों के बारे में बतातीं और कई परिवारों में पीढ़ियों से संभालकर रखे गए आभूषण विशेष अवसरों पर निकाले जाते थे। इस तरह एक बुलाक सिर्फ आभूषण नहीं रहती थी। उसमें मां की याद होती थी, दादी की कहानी होती थी और परिवार की कई पीढ़ियों का स्पर्श जुड़ा होता था। पहाड़ में पारंपरिक आभूषणों की एक खास खूबी यह रही कि वे स्थानीय कारीगरों की कला से जुड़े थे। सुनार केवल गहना बनाने वाला कारीगर नहीं होता था, बल्कि वह स्थानीय संस्कृति और परिवारों की पसंद को भी समझता था। बुलाक के डिजाइन में स्थानीय शिल्प की झलक दिखाई देती थी। महीन काम, छोटे आकार और पारंपरिक आकृतियां इसे सामान्य बाजार में मिलने वाले आभूषणों से अलग बनाती थीं।
लेकिन वक्त बदला। गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा। पारंपरिक परिधान रोजमर्रा की जिंदगी से दूर होने लगे। इसके साथ ही कई पुराने आभूषण भी संदूकों और संदूकों के भीतर रखी स्मृतियों तक सीमित होते गए। आज की पीढ़ी पारंपरिक गहनों को नए अंदाज में पहनना चाहती है। यही कारण है कि बुलाक भी अब केवल पारंपरिक पोशाक तक सीमित नहीं है। कुछ युवा इसे आधुनिक परिधानों के साथ भी पहनने लगी हैं। सोशल मीडिया ने भी पारंपरिक आभूषणों को नई पहचान देने में भूमिका निभाई है। पहाड़ की संस्कृति और पारंपरिक पहनावे को लेकर बढ़ती रुचि ने बुलाक जैसे आभूषणों को फिर चर्चा में ला दिया है। लेकिन यहां सवाल केवल फैशन का नहीं है। अगर बुलाक केवल फैशन बनकर रह गई और उसके पीछे की कहानी भूल गई तो एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है।
कई घरों में पुराने आभूषणों की अपनी कहानी होती है। मां की शादी में पहनी गई बुलाक बेटी की शादी तक पहुंचती है। कभी दादी की बुलाक पोती के श्रृंगार का हिस्सा बन जाती है। इन गहनों की कीमत केवल सोने के भाव से नहीं लगाई जा सकती। क्योंकि उनकी असली कीमत उस कहानी में है जो उनके साथ जुड़ी है। एक छोटी-सी बुलाक कभी किसी मां की विदाई की गवाह रही होगी। कभी किसी बेटी के विवाह में चमकी होगी। कभी किसी त्योहार पर गांव की महिलाओं के सामूहिक उत्सव का हिस्सा बनी होगी। इसलिए पहाड़ के पुराने संदूक में रखी बुलाक वास्तव में बीते समय की एक छोटी-सी डायरी है।
पलायन और बदलती जीवनशैली ने पहाड़ के पारंपरिक पहनावे और आभूषणों को प्रभावित किया है। गांव खाली हो रहे हैं तो पारंपरिक शिल्प से जुड़े कई कारीगरों के सामने भी बाजार की चुनौती है। जरूरत इस बात की है कि बुलाक जैसे आभूषणों को केवल संग्रहालय की वस्तु न बनने दिया जाए। इन्हें आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़ा जाए, स्थानीय कारीगरों को बाजार मिले और नई पीढ़ी को इनके सांस्कृतिक महत्व के बारे में बताया जाए। स्कूलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और स्थानीय मेलों में पहाड़ के पारंपरिक आभूषणों की प्रदर्शनी और इनके पीछे की कहानियां नई पीढ़ी तक पहुंचाई जा सकती हैं।
पहाड़ की संस्कृति को समझने के लिए हमेशा बड़े-बड़े स्मारकों की जरूरत नहीं होती। कभी किसी बुजुर्ग महिला के संदूक में रखा छोटा-सा गहना भी पूरी संस्कृति की कहानी कह देता है। बुलाक भी ऐसा ही एक गहना है। उसकी चमक में पहाड़ की स्त्री का श्रृंगार है, उसके डिजाइन में स्थानीय कारीगर की मेहनत है, उसकी स्मृति में परिवार की पीढ़ियां हैं और उसके अस्तित्व में पहाड़ की लोकसंस्कृति की वह डोर है जो अतीत को वर्तमान से जोड़ती है। बुलाक छोटी है, लेकिन इसकी कहानी बहुत बड़ी है और शायद यही वजह है कि जब पहाड़ की कोई बेटी अपनी नाक में बुलाक सजाती है, तो वह सिर्फ गहना नहीं पहनतीकृवह अपने साथ पहाड़ की एक पूरी विरासत लेकर चलती है।
रविवार, 9 अगस्त 2026
udaydinmaan: पहाड़ में बचपन की आखिरी आवाज ‘धगुली’
udaydinmaan: पहाड़ में बचपन की आखिरी आवाज ‘धगुली’: स्मार्टफोन के शोर में खो गई धगुली की छनकाहट, सूने पड़े आंगन और स्क्रीन पर सिमटा पहाड़ का बचपन न महंगे खिलौने, न बाजार की जरूरत, खेत-खलिहान और ...
पहाड़ में बचपन की आखिरी आवाज ‘धगुली’
स्मार्टफोन के शोर में खो गई धगुली की छनकाहट, सूने पड़े आंगन और स्क्रीन पर सिमटा पहाड़ का बचपन
न महंगे खिलौने, न बाजार की जरूरत, खेत-खलिहान और धगुली से सजता था बच्चों का संसार
खाली होते गांव और मोबाइल स्क्रीन का अकेलापन, अब इतिहास बन गई सामूहिक खेलों की वह टोली
देहरादून। पहाड़ के गांव में बचपन कभी बहुत महंगा नहीं था। खेलने के लिए बाजार से खिलौने खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती थी। खेत की मेड़, घर का आंगन, जंगल की पगडंडी और पत्थरों के बीच बहता पानी ही बच्चों का खेल का मैदान हुआ करता था। खिलौने भी आसपास की चीजों से बन जाते थे। इन्हीं खिलौनों में एक थी धगुली। धगुली हाथ में आती तो बच्चे की चाल में जैसे कोई उत्सव उतर आता। उसे घुमाने पर निकलती आवाज दूर तक सुनाई देती। वह आवाज सिर्फ धातु की नहीं थी, वह पहाड़ के उस बचपन की आवाज थी जिसमें खेल था, शरारत थी और सामूहिकता थी। आज गांवों में धगुली की आवाज कम सुनाई देती है। उसकी जगह मोबाइल फोन की आवाज ने ले ली है। कभी आंगन में बच्चों की टोली होती थी, अब कई आंगन खाली हैं। कभी एक बच्चा धगुली लेकर निकलता तो चार और उसके पीछे हो लेते थे। अब बच्चे स्क्रीन पर अकेले खेलते हैं।
धगुली शायद बहुत मामूली चीज थी, लेकिन पहाड़ के बचपन के लिए उसका महत्व मामूली नहीं था। वह खिलौना बच्चों को किसी दुकान से नहीं मिलता था। घर के बड़े-बुजुर्ग उसे बनाते थे या आसपास से उपलब्ध चीजों से बच्चे खुद अपना खेल तैयार करते थे। यही तो पहाड़ के बचपन की खासियत थीकृकम साधनों में ज्यादा खुशी। आज जब बाजार बच्चों के लिए हजारों तरह के खिलौने बेचता है, तब उस दौर का बच्चा बिना किसी महंगे खिलौने के भी खुश था। धगुली के साथ खेलते हुए बच्चों की टोली गांव की गलियों से गुजरती थी। किसी के घर के आंगन में थोड़ी देर खेलना, फिर दूसरे घर की ओर भाग जाना। रास्ते में किसी दोस्त का इंतजार करना। कभी खेत की मेड़ पर बैठ जाना और कभी जंगल की ओर निकल जाना।
बचपन का अपना भूगोल था। उस भूगोल में कोई मोबाइल नेटवर्क नहीं था, लेकिन संवाद खूब था। कोई आनलाइन गेम नहीं था, लेकिन खेलों की कमी नहीं थी। कोई वर्चुअल दोस्त नहीं था, क्योंकि दोस्त सामने होते थे और धगुली की आवाज उन दोस्तों को एक-दूसरे से जोड़ती थी। पहाड़ में बच्चों के खेल कभी केवल खेल नहीं होते थे। उनमें जीवन की छोटी-छोटी सीख छिपी होती थी। बच्चे मिलकर खेलते थे तो उनमें बांटने की आदत आती थी। हारते थे तो अगली बार जीतने की कोशिश करते थे। किसी दोस्त के पास खिलौना नहीं होता तो दूसरा अपना खिलौना उसके साथ साझा कर लेता था। यानी खिलौना छोटा था, लेकिन उससे बनने वाला सामाजिक संसार बड़ा था।
आज बच्चे के पास खिलौनों की कमी नहीं है, लेकिन साथ खेलने वाले बच्चों की कमी जरूर हो गई है। यह सिर्फ तकनीक का असर नहीं है। इसके पीछे पहाड़ के गांवों का बदलता जीवन भी है। पलायन ने पहाड़ के कई गांवों से बच्चों की टोली छीन ली। जिन घरों में कभी बच्चों की आवाज गूंजती थी, वहां अब बुजुर्गों की खामोशी है। स्कूलों में छात्र संख्या घटती गई। कई गांवों के रास्तों पर अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं रही। ऐसे में धगुली भी धीरे-धीरे स्मृति का हिस्सा बन गई।
आज अगर किसी पहाड़ी गांव में धगुली की चर्चा छेड़ दी जाए तो बुजुर्गों के चेहरे पर एक अलग चमक दिखाई देती है। व अपने बचपन में लौट जाते हैं। उन्हें याद आता है कि कैसे त्योहारों के दिनों में बच्चे नए उत्साह के साथ खेलते थे। कैसे गांव के एक छोर से दूसरे छोर तक बच्चों की टोली निकलती थी। कैसे घर की महिलाएं अपने काम के बीच बच्चों की आवाज सुनकर मुस्कुरा देती थीं। किसी दादी के पास धगुली से जुड़ी कहानी है तो किसी नाना के पास उसके साथ खेले गए खेल की याद। वह दौर अब तस्वीरों में नहीं, स्मृतियों में बचा है और स्मृतियां भी तब तक बचती हैं जब तक कोई उन्हें सुनाने वाला हो।
आज पहाड़ का बच्चा भी उसी डिजिटल दुनिया का हिस्सा है, जिसमें शहर का बच्चा है। उसके हाथ में स्मार्टफोन है, स्क्रीन है और आनलाइन मनोरंजन है। इसमें बुराई नहीं कि समय बदल रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बदलते समय के साथ हम अपनी छोटी-छोटी लोक स्मृतियों को भी खोते जा रहे हैं? धगुली कोई ऐतिहासिक धरोहर नहीं होगी। शायद उसका कोई संग्रहालय भी न बने। लेकिन किसी संस्कृति की पहचान केवल बड़ी चीजों से नहीं होती। वह उन छोटी चीजों में भी छिपी होती है जिन्हें लोग सामान्य समझकर भूल जाते हैं। एक खिलौना भी संस्कृति का हिस्सा हो सकता है। एक खेल भी इतिहास हो सकता है। एक आवाज भी किसी पीढ़ी की पहचान बन सकती है। धगुली ऐसी ही एक पहचान है।
जरूरी नहीं कि आज के बच्चों को वही पुराने खिलौने दिए जाएं और उनसे कहा जाए कि वे उसी तरह खेलें जैसे उनके दादा-दादी खेलते थे। समय को पीछे नहीं लौटाया जा सकता। लेकिन उस समय की कहानियां जरूर आगे ले जाई जा सकती हैं। स्कूलों में स्थानीय खेलों और खिलौनों पर गतिविधियां हों। गांवों में बुजुर्ग बच्चों को पुराने खेल सिखाएं। स्थानीय मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में पहाड़ के पारंपरिक खिलौनों को जगह मिले। बच्चों को बताया जाए कि उनके गांव में मोबाइल फोन आने से पहले बचपन कैसा था। क्योंकि धगुली को बचाना वास्तव में एक खिलौने को बचाना नहीं है। यह उस बचपन की स्मृति को बचाना है जिसमें खुशियां बाजार से नहीं, अपने आसपास से पैदा होती थीं।
पहाड़ बदल रहा है। घर बदल रहे हैं। रास्ते बदल रहे हैं। बच्चों के खेल बदल रहे हैं। लेकिन पहाड़ की स्मृतियों को पूरी तरह बदल जाने देना जरूरी नहीं। कभी किसी पुराने संदूक में पड़ी धगुली को निकालिए। उसे बच्चे के हाथ में दीजिए। शायद वह बच्चा पहले उसे अजीब नजरों से देखे। फिर उसे घुमाए और जब उससे वह पुरानी आवाज निकलेगी, तो संभव है कि पास बैठा कोई बुजुर्ग अचानक मुस्कुरा उठे। उस मुस्कान में उसका पूरा बचपन छिपा होगा। धगुली की वह आवाज शायद लौटकर फिर गांव की गलियों में न गूंजे, लेकिन उसकी कहानी अगली पीढ़ी तक जरूर पहुंच सकती है। क्योंकि पहाड़ सिर्फ पहाड़ नहीं होता। वह उन आवाजों का भी घर है, जो समय बीतने के बाद सुनाई देना बंद हो जाती हैंकृलेकिन खत्म नहीं होतीं।
आस्था की ‘तेज रफ्तार’
आस्था और रफ्तार आमने-सामने,पुलिस के सामने व्यवस्था की अग्निपरीक्षा
सड़कों पर उमड़ता जनसैलाब, तेज दौड़ते वाहन और समय की है बड़ी चुनौती
पारंपरिक यात्रा से अलग इस दौर में ट्रैफिक और सुरक्षा बनाने का कड़ा मोर्चा
देहरादून। सावन आते ही हरिद्वार की सड़कों का रंग बदल जाता है। गंगा घाटों पर आस्था उमड़ती है और कांवड़ियों के जत्थे शहर से गुजरते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं। लेकिन डाक कांवड़ के दौर में यह भीड़ सिर्फ बड़ी नहीं होती, उसकी रफ्तार भी चुनौती बन जाती है। तेज दौड़ते वाहन, सड़कों पर उमड़ता जनसैलाब और हर तरफ गूंजते जयकारे के बीच पुलिस के सामने एक साथ कई मोर्चे खुल जाते हैं। यही वह समय है जब पुलिस की असली अग्नि परीक्षा शुरू होती है। डाक कांवड़ का स्वरूप पारंपरिक कांवड़ यात्रा से अलग है। यहां समय की अहमियत बढ़ जाती है। कांवड़िए तेजी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं और सड़क पर वाहनों की आवाजाही भी प्रभावित होती है। ऐसे में यातायात व्यवस्था, श्रद्धालुओं की सुरक्षा, स्थानीय लोगों की आवाजाही और आपातकालीन सेवाओं को सुचारु रखना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। एक छोटी-सी चूक बड़ी समस्या का कारण बन सकती है।
डाक कांवड़ के दौरान पुलिस को सबसे ज्यादा मशक्कत यातायात व्यवस्था को लेकर करनी पड़ती है। एक ओर कांवड़ियों के लिए निर्धारित मार्गों पर भारी भीड़ रहती है, दूसरी ओर स्थानीय और बाहरी वाहनों की आवाजाही भी बनी रहती है। कई स्थानों पर सड़क का एक हिस्सा पूरी तरह कांवड़ियों के लिए सुरक्षित करना पड़ता है। रूट डायवर्जन लागू किए जाते हैं। भारी वाहनों को रोकना पड़ता है। शहर के भीतर यातायात का दबाव बढ़ जाता है। पुलिस के सामने सवाल सिर्फ रास्ता खाली कराने का नहीं होता। सवाल यह होता है कि किसी भी परिस्थिति में श्रद्धालुओं की सुरक्षा से समझौता न हो और आम नागरिक को भी परेशानी कम से कम हो।
हरिद्वार से लेकर रुड़की और आगे उत्तर प्रदेश की सीमा तक पुलिस की तैनाती बढ़ जाती है। प्रमुख चौराहों, हाईवे, घाटों और संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त बल लगाया जाता है। पुलिसकर्मी घंटों सड़क पर खड़े रहते हैं। तेज धूप हो या बारिश, उनकी ड्यूटी लगातार चलती रहती है। कई जवानों के लिए यह केवल कुछ घंटों की ड्यूटी नहीं होती। उन्हें लगातार कई शिफ्ट में भीड़ के बीच काम करना पड़ता है। भीड़ का मनोविज्ञान समझना पड़ता है। कहां बैरिकेडिंग करनी है? कहां रास्ता खोलना है? कहां भीड़ को रोकना है? कहां एंबुलेंस को रास्ता देना है? हर निर्णय तत्काल लेना पड़ता है।
बड़े धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन सबसे संवेदनशील कामों में से एक है। डाक कांवड़ में यह चुनौती और बढ़ जाती है, क्योंकि श्रद्धालुओं की संख्या के साथ उनकी गति भी तेज होती है। पुलिस के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि किसी अफवाह को फैलने से रोका जाए। सोशल मीडिया के दौर में छोटी-सी गलत सूचना भी कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। ऐसे में पुलिस को केवल सड़क पर नहीं, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी निगरानी रखनी पड़ती है। सीसीटीवी, ड्रोन, कंट्रोल रूम और वायरलेस नेटवर्क के जरिए स्थिति पर नजर रखी जाती है। संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त निगरानी की जरूरत पड़ती है।
कांवड़ यात्रा आस्था का पर्व है। पुलिस की भूमिका यहां सिर्फ कानून लागू करने की नहीं, बल्कि आस्था और व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की भी होती है। कांवड़िए देश के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं। उनके लिए हरिद्वार की यात्रा धार्मिक भावनाओं से जुड़ी होती है। ऐसे में पुलिस को भीड़ से संवाद करते हुए व्यवस्था बनाए रखनी होती है। जहां जरूरी हो, सख्ती करनी पड़ती है। लेकिन सख्ती का मतलब संवेदनशीलता खत्म करना नहीं है। यही पुलिस के लिए सबसे कठिन संतुलन है। कांवड़ यात्रा के दौरान पुलिस की चुनौती केवल कांवड़ियों तक सीमित नहीं रहती। स्थानीय नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित होती है। रूट डायवर्जन के कारण लोगों को लंबा रास्ता तय करना पड़ सकता है। बाजारों और मुख्य सड़कों पर यातायात का दबाव बढ़ जाता है। स्कूल, अस्पताल और कार्यालय जाने वालों को भी कई बार वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ते हैं। ऐसे में पुलिस को स्थानीय नागरिकों की सुविधा का भी ध्यान रखना पड़ता है। विशेष रूप से अस्पताल जाने वाली एंबुलेंस और आपातकालीन वाहनों के लिए रास्ता खुला रखना बेहद जरूरी होता है।
डाक कांवड़ कुछ दिनों बाद अपने गंतव्य तक पहुंच जाएगी। सड़कें सामान्य हो जाएंगी। बैरिकेड हट जाएंगे। यातायात फिर अपनी पुरानी गति पकड़ लेगा। लेकिन इस पूरे आयोजन के दौरान पुलिस के सामने खड़ी चुनौती छोटी नहीं है। यह केवल भीड़ संभालने की ड्यूटी नहीं। यह धैर्य, अनुशासन, संवेदनशीलता और त्वरित निर्णय क्षमता की परीक्षा है। एक तरफ लाखों लोगों की आस्था है, दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी। एक तरफ तेज रफ्तार डाक कांवड़ है, दूसरी तरफ सड़क पर चलती जिंदगी। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना ही पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। डाक कांवड़ में आस्था की रफ्तार तेज है, लेकिन व्यवस्था की जिम्मेदारी उससे भी बड़ी और इस पूरे सैलाब के बीच अगर यात्रा सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ती है, तो उसके पीछे सिर्फ व्यवस्था नहीं, बल्कि सड़क पर घंटों खड़ी वह खाकी भी होती है, जिसकी अग्नि परीक्षा हर सावन में होती है।
भाजपा की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
धामी ने कसा बूथ का पेच, सुस्त विपक्ष के लिए खतरे की घंटी
भाजपा की बैठक में मुख्यमंत्री धामी ने किया चुनावी शंखनाद
मिशन 2027 के लिए संगठन को मैदान में उतरने का दिया संदेश
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती भले अभी शुरू न हुई हो, लेकिन सियासी मैदान में तैयारियां तेज हो गई हैं। भाजपा की अहम बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की हुंकार ने साफ कर दिया कि पार्टी अब चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने से लेकर संगठन को बूथ स्तर पर सक्रिय करने तक की रणनीति पर जोर के बीच धामी का संदेश साफ थाकृअब रुकना नहीं है, चुनावी मैदान में उतरना है। धामी की इस हुंकार को सिर्फ कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाला भाषण मानना राजनीतिक भूल होगी। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव का पूरा खाका दिखाई देता है। भाजपा सत्ता में है और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य उसके सामने है। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए जमीन तलाश रही है। ऐसे में भाजपा की यह बैठक विपक्ष के लिए भी संदेश है कि सत्तारूढ़ दल चुनावी लड़ाई को लेकर गंभीर है और संगठन को अभी से सक्रिय करने की तैयारी में जुट गया है।
मुख्यमंत्री धामी की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में भाजपा के लिए उत्तराखंड में एक महत्वपूर्ण चुनावी चेहरा बनकर उभरी है। 2022 में पार्टी के सत्ता में लौटने के बाद धामी के नेतृत्व में सरकार ने कई ऐसे फैसलों को राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाया, जिन्हें भाजपा अब जनता के बीच लेकर जाने की तैयारी में है। अब चुनौती यह है कि सरकारी फैसले फाइलों से निकलकर मतदाता तक पहुंचें। यही वजह है कि भाजपा की रणनीति में संगठन को सबसे आगे रखा जा रहा है। धामी का संदेश कार्यकर्ताओं के लिए जितना स्पष्ट था, उतना ही विपक्ष के लिए भीकृभाजपा चुनाव का इंतजार नहीं करेगी, बल्कि चुनाव से पहले ही चुनावी जमीन तैयार करेगी। कांग्रेस लंबे समय से सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे उठा रही है। विपक्ष की कोशिश है कि इन मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जाए।
भाजपा अब विपक्ष के इसी नैरेटिव का जवाब अपने विकास और जनकल्याणकारी फैसलों के जरिए देने की तैयारी में है। लेकिन भाजपा के सामने चुनौती भी कम नहीं है। सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद स्थानीय स्तर पर नाराजगी पैदा होना स्वाभाविक राजनीतिक जोखिम है। कई सीटों पर विधायकों के कामकाज को लेकर कार्यकर्ताओं और जनता की राय पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगी। यानी धामी की हुंकार के बाद अब संगठन को केवल विपक्ष से नहीं, अपने भीतर की चुनौतियों से भी मुकाबला करना होगा।
भाजपा का चुनावी गणित हमेशा बूथ से शुरू होता है। बड़े नेताओं की रैलियां माहौल बना सकती हैं, लेकिन वोट बूथ पर पड़ता है। इसीलिए पार्टी कमजोर बूथों की पहचान, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और मतदाताओं से लगातार संपर्क पर जोर दे रही है। भाजपा का लक्ष्य साफ हैकृचुनाव की घोषणा से पहले संगठन इतना मजबूत हो जाए कि आखिरी समय में उसे हड़बड़ी में व्यवस्था खड़ी न करनी पड़े। यह रणनीति कांग्रेस के लिए चुनौती है। कांग्रेस अगर चुनाव से कुछ महीने पहले संगठन को सक्रिय करने की कोशिश करती है और भाजपा पहले से बूथ पर पहुंच चुकी होती है, तो चुनावी मुकाबले का अंतर यहीं से बन सकता है।
भाजपा की चुनावी रणनीति चाहे जितनी मजबूत हो, अंतिम फैसला जनता को करना है। उत्तराखंड के गांवों में आज भी रोजगार और पलायन बड़ा सवाल है। पहाड़ में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति, शिक्षा, सड़क और पेयजल जैसे मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा बने रहेंगे। युवा रोजगार चाहता है। महिला सुरक्षित और सुविधाजनक जीवन चाहती है। किसान अपनी उपज की कीमत चाहता है। गांव बुनियादी सुविधाएं चाहता है और पहाड़ चाहता है कि विकास केवल घोषणाओं में नहीं, जमीन पर भी दिखाई दे। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती केवल यह बताने की नहीं होगी कि उसने क्या किया। चुनौती यह साबित करने की भी होगी कि सरकार के काम का असर आम आदमी की जिंदगी पर कितना पड़ा।
2027 का चुनाव सिर्फ भाजपा की परीक्षा नहीं होगा। यह मुख्यमंत्री धामी के राजनीतिक नेतृत्व की भी बड़ी परीक्षा होगी। अगर भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटती है तो धामी की राजनीतिक स्थिति और मजबूत होगी। लेकिन अगर पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो स्वाभाविक रूप से नेतृत्व और रणनीति पर सवाल उठेंगे। इसलिए बैठक में धामी की हुंकार के पीछे राजनीतिक दांव भी बड़ा है। यह केवल कार्यकर्ताओं से जोश मांगने का वक्त नहीं है। यह अपने नेतृत्व, संगठन और सरकार के रिपोर्ट कार्ड को जनता की अदालत में ले जाने की तैयारी है।
धामी की हुंकार को कांग्रेस शायद इसी वजह से हल्के में नहीं लेना चाहेगी। विपक्ष के सामने अब सवाल है कि वह भाजपा के मजबूत संगठन का मुकाबला किस रणनीति से करेगा? क्या कांग्रेस बूथ स्तर पर भाजपा की बराबरी कर पाएगी? क्या वह स्थानीय असंतोष को वोट में बदल पाएगी? क्या वह सरकार के खिलाफ मुद्दों को एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदल सकेगी? या फिर भाजपा सरकार की योजनाओं और संगठन की ताकत के सामने विपक्ष का हमला बिखर जाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे।
भाजपा की बैठक से एक बात साफ हैकृउत्तराखंड की राजनीति अब धीरे-धीरे चुनावी रंग में रंगने लगी है। मुख्यमंत्री ने कार्यकर्ताओं को संदेश दे दिया है। संगठन ने तैयारी शुरू कर दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि यह हुंकार कितनी जल्दी गांव, शहर, बूथ और मतदाता तक पहुंचती है। क्योंकि चुनाव भाषणों से शुरू जरूर होते हैं, लेकिन जीत मतदाता के दरवाजे पर तय होती है। धामी ने हुंकार भर दी है। अब भाजपा के सामने चुनौती है कि इस हुंकार को हर बूथ की आवाज बनाया जाए और विपक्ष के सामने चुनौती है कि वह इस आवाज का जवाब कैसे देता है। उत्तराखंड का 2027 चुनाव अभी दूर दिखाई दे सकता है, लेकिन उसकी सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।
‘ठंडी हवा’ के बीच चढ़ा ‘सियासी पारा’
कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे की कुमाऊं रैली ने कांग्रेस में फूंकी नई जान
अब सवालकृजोश वोट में बदलेगा या फिर रह जाएगा मंच तक ही
कुमाऊं से कांग्रेस का चुनावी संदेश कार्यकर्ताओं में दिखा उत्साह
प्रदेश भाजपा के सामने विपक्ष की सक्रियता बढ़ाने की होगी चुनौती
देहरादून। कुमाऊं की जमीन पर कांग्रेस की राजनीति को एक बार फिर आवाज मिली है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली ने पार्टी के उन कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने की कोशिश की है, जो लंबे समय से सत्ता पक्ष के सामने खुद को कमजोर महसूस कर रहे थे। मंच पर भाषण थे, नारे थे, भीड़ थी और चुनावी दावे भी। लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या यह रैली कांग्रेस के भीतर पैदा हुई राजनीतिक सुस्ती को सचमुच तोड़ पाएगी? या फिर कुछ घंटों की राजनीतिक गर्मी के बाद पहाड़ की ठंडी हवा सब कुछ पहले जैसा कर देगी? यही सवाल कांग्रेस के सामने है। कुमाऊं उत्तराखंड की राजनीति में सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। यहां की विधानसभा सीटें प्रदेश की सत्ता का रास्ता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का कुमाऊं पहुंचना अपने आप में राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस यह बताना चाहती है कि वह 2027 की लड़ाई के लिए तैयार हो रही है। लेकिन चुनाव की तैयारी मंच से ज्यादा जमीन पर दिखाई देती है।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी जरूरत इस समय केवल भाषण नहीं, भरोसा है। कार्यकर्ता पूछता हैकृपार्टी की रणनीति क्या है?कौन नेतृत्व करेगा? उम्मीदवारों का चयन कैसे होगा? बूथ पर संगठन कितना मजबूत है? और सबसे बड़ा सवालकृक्या कांग्रेस इस बार भाजपा को सीधी चुनौती देने की स्थिति में है? खड़गे की रैली ने कम से कम इतना जरूर किया कि पार्टी के भीतर यह संदेश गया कि केंद्रीय नेतृत्व उत्तराखंड को नजरअंदाज नहीं कर रहा। कार्यकर्ता के लिए बड़े नेता का मैदान में उतरना सिर्फ राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होता। वह इसे अपने संघर्ष की स्वीकृति के रूप में भी देखता है। यही वजह है कि रैली के बाद कांग्रेस के भीतर उत्साह दिखाई देना स्वाभाविक है। लेकिन उत्साह और चुनावी संगठन के बीच काफी लंबी दूरी होती है।
कुमाऊं की जनता के सामने मुद्दे किसी रैली के साथ पैदा नहीं हुए हैं। रोजगार का सवाल पुराना है। पलायन का दर्द पुराना है। स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी पुरानी है। युवाओं की प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर चिंता पुरानी है। सड़क, पानी और शिक्षा के सवाल भी पुराने हैं। राजनीतिक दल आते हैं, भाषण करते हैं, वादे करते हैं और चले जाते हैं। जनता फिर वही सवाल लेकर खड़ी रह जाती है। इसलिए खड़गे की रैली का राजनीतिक असर इस बात से तय नहीं होगा कि मंच पर कितने नारे लगे। असर इस बात से तय होगा कि कांग्रेस इन सवालों को कितनी मजबूती से गांव तक लेकर जाती है।
कांग्रेस के सामने एक आसान रास्ता हैकृभाजपा सरकार की आलोचना करना। सत्ता में रहने वाली पार्टी से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी। लेकिन सिर्फ सवाल पूछने से विपक्ष मजबूत नहीं होता। जनता को यह भी बताना पड़ता है कि अगर सत्ता मिली तो क्या बदलेगा? पलायन रोकने की ठोस नीति क्या होगी? युवा को रोजगार कैसे मिलेगा? पहाड़ के अस्पतालों में डाक्टर कैसे पहुंचेंगे? सरकारी स्कूल कैसे मजबूत होंगे? स्थानीय अर्थव्यवस्था को कैसे खड़ा किया जाएगा? महिलाओं की आय और सुरक्षा के लिए क्या किया जाएगा? कांग्रेस अगर इन सवालों के स्पष्ट जवाब जनता के सामने रखती है तो खड़गे की रैली एक बड़े राजनीतिक अभियान की शुरुआत बन सकती है। वरना यह भी दूसरी राजनीतिक रैलियों की तरह भीड़ और भाषणों की खबर बनकर रह जाएगी।
कांग्रेस जानती है कि भाजपा को उत्तराखंड में चुनौती देना केवल विधानसभा स्तर पर उम्मीदवार उतारने से संभव नहीं होगा। भाजपा का संगठन बूथ तक फैला हुआ है। उसके पास कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है। सरकार के पास योजनाओं और उपलब्धियों का अपना नैरेटिव है। ऐसे में कांग्रेस को मुकाबले के लिए केवल बड़े नेताओं की रैलियां नहीं, बल्कि हर बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ता चाहिए। खड़गे की रैली अगर इस संगठनात्मक कमजोरी को दूर करने की शुरुआत करती है तो इसका राजनीतिक महत्व बढ़ जाएगा। वरना राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी से कुछ घंटों का उत्साह तो पैदा किया जा सकता है, लेकिन चुनाव नहीं जीता जा सकता। उत्तराखंड कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती कई बार विपक्ष से ज्यादा उसके भीतर दिखाई देती रही है। नेताओं के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। समर्थकों के अपने-अपने समूह हैं। टिकट को लेकर दावेदारियां हैं और हर नेता की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह स्थानीय नेताओं को एक मंच पर कितना ला पाता है। कांग्रेस अगर 2027 को सत्ता में वापसी का चुनाव बनाना चाहती है तो उसे पहले अपने भीतर एकता का चुनाव जीतना होगा। क्योंकि जनता उस पार्टी पर भरोसा करने में हिचक सकती है जो खुद अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट दिखाई न दे।
खड़गे की कुमाऊं रैली ने कांग्रेस को निश्चित रूप से ऊर्जा दी है। कार्यकर्ताओं को यह संदेश मिला है कि लड़ाई अभी बाकी है। लेकिन राजनीति में भीड़ शुरुआत होती है, परिणाम नहीं। अब कांग्रेस को इस उत्साह को बूथ समितियों में बदलना होगा। रैली के नारों को घर-घर के संपर्क में बदलना होगा। मंच पर उठे सवालों को गांव की चौपाल तक ले जाना होगा और सबसे जरूरीकृजनता के सवालों को सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं, अपनी राजनीतिक प्राथमिकता बनाना होगा। क्योंकि पहाड़ का मतदाता भाषण सुनता जरूर है, लेकिन अंततः अपने अनुभव से फैसला करता है। उसे याद रहता है कि चुनाव से पहले कौन उसके गांव आया था और चुनाव के बाद कौन गायब हो गया।
खड़गे की कुमाऊं रैली ने कांग्रेस में नई जान जरूर डाली है। लेकिन राजनीति में नई जान और नई जीत के बीच एक पूरा रास्ता होता है। उस रास्ते पर संगठन चाहिए। स्थानीय नेतृत्व चाहिए। स्पष्ट मुद्दे चाहिए। विश्वसनीय चेहरा चाहिए और सबसे बढ़कर जनता के बीच लगातार मौजूद रहने की क्षमता चाहिए। कांग्रेस के लिए खड़गे की रैली इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने पार्टी को फिर से मैदान में उतरने का आत्मविश्वास दिया है। अब देखना यह है कि कांग्रेस इस ऊर्जा को कितने दिन बचाकर रखती है। क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में रैली की भीड़ अगले दिन घर चली जाती है। चुनाव की असली भीड़ तब बनती है, जब कार्यकर्ता महीनों तक जनता के दरवाजे पर खड़ा रहता है। खड़गे ने कुमाऊं से आवाज दी है। अब कांग्रेस को तय करना है कि यह आवाज सिर्फ हल्द्वानी के मैदान तक रहेगी या पहाड़ के गांव-गांव तक पहुंचेगी। क्योंकि 2027 की लड़ाई भाषणों से नहीं, जनता के भरोसे से जीती जाएगी।
शनिवार, 8 अगस्त 2026
udaydinmaan: ऋषभ पंत की ‘गूगली’
udaydinmaan: ऋषभ पंत की ‘गूगली’: आधी रात को मदद की मांग, मैदान से दूर घर लौटने की छटपटाहट सवाल सिर्फ एक क्रिकेटर का नहीं, पहाड़ लौटने वालों की राह का स्टार क्रिकेटर पंत की आध...
udaydinmaan: पहाड़ की बेटी के गले का ‘गलोबंद’
udaydinmaan: पहाड़ की बेटी के गले का ‘गलोबंद’: यह गहना नहीं, मां की संदूकची से निकली हुई है एक पूरी पीढ़ी गले का गलोबंद सिर्फ गहना नहीं, पहाड़ के पीढ़ियों की कहानी मायके की सोंधी महक, पीढ़िय...
पहाड़ की बेटी के गले का ‘गलोबंद’
यह गहना नहीं, मां की संदूकची से निकली हुई है एक पूरी पीढ़ी
गले का गलोबंद सिर्फ गहना नहीं, पहाड़ के पीढ़ियों की कहानी
मायके की सोंधी महक, पीढ़ियों का दुलार और धुंधलाती यादें
देहरादून। पहाड़ की महिलाओं के गले में सजा गलोबंद कभी परिवार की पहचान हुआ करता था। सोने-चांदी के छोटे-छोटे टुकड़ों में बुनी यह परंपरा आज फैशन की दुनिया में भले लौट रही हो, लेकिन इसके पीछे छिपी पहाड़ की स्मृतियां धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं। पहाड़ की सुबह जितनी सादगी भरी होती है, वहां की स्त्री का श्रृंगार उतना ही अर्थपूर्ण। माथे की बिंदी, नाक की नथ, कानों के झुमके और गले में सजा गलोबंद यह सिर्फ आभूषण नहीं थे। इनमें पहाड़ की अर्थव्यवस्था, परिवार की हैसियत, कारीगर की मेहनत और महिलाओं की पीढ़ियों पुरानी स्मृतियां दर्ज होती थीं। गलोबंद को देखिए तो पहली नजर में यह गले में पहना जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण लगता है। लेकिन पहाड़ के गांवों में इसकी कहानी इससे कहीं बड़ी रही है।
कभी बेटी की शादी में मायके से आने वाले गहनों में गलोबंद का खास स्थान होता था। मां का गलोबंद बेटी तक पहुंचता था और उसके साथ सिर्फ सोना या चांदी नहीं जाती थीकृजाती थी एक पूरी पीढ़ी की कहानी। दादी ने पहना, मां ने संभाला और बेटी ने विरासत में पाया। यही तो पहाड़ के गहनों की खासियत थी। आज जब बाजार में आभूषण डिजाइन बदल रहे हैं और पारंपरिक गहने आधुनिक फैशन के साथ दोबारा दिखाई देने लगे हैं, तब गलोबंद भी नई पीढ़ी के बीच अपनी जगह बना रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या गलोबंद सिर्फ फैशन बनकर रह जाएगा या इसके पीछे की संस्कृति भी बच पाएगी?
परंपरागत गलोबंद के निर्माण में कारीगरी का अपना महत्व रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसके डिजाइन, आकार और इस्तेमाल की शैली में अंतर देखने को मिलता है। इसमें धातु के छोटे-छोटे हिस्सों को जोड़कर या कपड़े/धागे के आधार पर सजाकर गले का आभूषण तैयार किया जाता था। इसकी खूबसूरती केवल चमक में नहीं थी। उसकी असली खूबसूरती उस हाथ में थी, जिसने उसे बनाया था। पहाड़ में आभूषण बनाने वाले कारीगरों की अपनी दुनिया थी। पीढ़ियों से चली आ रही यह कला उनके हुनर और धैर्य की परीक्षा लेती थी। एक-एक डिजाइन के पीछे घंटों की मेहनत होती थी।
आज मशीन से बने आभूषण बाजार में जल्दी उपलब्ध हो जाते हैं। कीमत भी कई बार कम होती है। ऐसे में हाथ से तैयार पारंपरिक गहनों के सामने बाजार की चुनौती बढ़ी है। लेकिन गलोबंद की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बल्कि नई पीढ़ी ने इसे नए अंदाज में अपनाना शुरू किया है। पहाड़ की पारंपरिक पोशाक के साथ पहना जाने वाला गलोबंद अब सिर्फ गांव की शादी तक सीमित नहीं है। आधुनिक डिजाइनरों ने इसे नए कपड़ों और नए फैशन के साथ जोड़ना शुरू किया है। कई युवतियां इसे साड़ी, सूट और पारंपरिक परिधानों के साथ पहनना पसंद करती हैं। यानी जिस आभूषण को कभी पहाड़ की बहू-बेटियों की पहचान माना जाता था, वह अब शहरों के फैशन में भी जगह बना रहा है। लेकिन इस बदलाव के साथ एक खतरा भी है।कहीं ऐसा न हो कि गलोबंद बच जाए और उसकी कहानी खो जाए। किस धातु का इस्तेमाल होता था? किस अवसर पर पहना जाता था? इसे कौन बनाता था? शादी में इसका क्या महत्व था? मायके और ससुराल के बीच इसका क्या रिश्ता था? इन सवालों के जवाब भी उसी विरासत का हिस्सा हैं।
पहाड़ के समाज में आभूषण केवल सजने के लिए नहीं होते थे। कई बार वह परिवार की आर्थिक सुरक्षा भी होते थे। मुश्किल समय में गहने बेचकर परिवार ने अपनी जरूरतें पूरी कीं। लेकिन भावनात्मक मूल्य का कोई बाजार नहीं होता। एक मां के लिए अपनी शादी का गलोबंद सिर्फ एक आभूषण नहीं था। उसमें उसके मायके की यादें थीं। बेटी की शादी में जब वही गहना उसे दिया जाता था तो वह एक तरह से परिवार की स्मृति को आगे बढ़ाना होता था। यही कारण है कि पहाड़ के पुराने संदूकों में रखे गहनों को खोलते समय सिर्फ धातु की चमक नहीं दिखाई देती थी। उनमें पुरानी तस्वीरें, पुरानी शादियां और पुरानी पीढ़ियां दिखाई देती थीं।
उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन ने केवल खेत और गांव नहीं बदले। उसने पहनावे और आभूषणों की दुनिया को भी प्रभावित किया जो परिवार गांव से शहर आ गए, उनकी अगली पीढ़ी का जीवन अलग हो गया। पारंपरिक पहनावा रोजमर्रा की जिंदगी से बाहर होता गया। उसके साथ पारंपरिक गहनों का इस्तेमाल भी कम हुआ। आज कई घरों में दादी-नानी के पुराने गहने संदूकों में सुरक्षित हैं, लेकिन उन्हें पहनने वाली पीढ़ी कम होती जा रही है। इसलिए गलोबंद की कहानी केवल एक आभूषण की कहानी नहीं है। यह उस पहाड़ की कहानी है, जो अपनी पुरानी चीजों को बचाने की कोशिश कर रहा है।
गलोबंद को बचाने का मतलब यह नहीं कि नई पीढ़ी को पुराने तरीके से ही जीने के लिए कहा जाए। परंपरा तभी जीवित रहती है जब वह समय के साथ बदलती है। जरूरत है कि स्थानीय कारीगरों को बाजार मिले, पारंपरिक डिजाइन का दस्तावेजीकरण हो और स्कूल-कालेजों तथा सांस्कृतिक आयोजनों में उत्तराखंड के पारंपरिक आभूषणों के बारे में नई पीढ़ी को बताया जाए। क्योंकि जब किसी समाज की चीजें सिर्फ संग्रहालय में रह जाती हैं, तो संस्कृति का एक हिस्सा जीवित होकर भी रोजमर्रा की जिंदगी से गायब हो जाता है। गलोबंद आज फिर फैशन में लौट रहा है। यह अच्छी खबर है। लेकिन उससे भी बड़ी खबर तब होगी जब इसके साथ उसकी कहानी भी लौटे।
धातु की चमक से कहीं ज्यादा इसमें उन हाथों की गर्माहट है, जिन्होंने इसे बनाया। उन माताओं की ममता है, जिन्होंने इसे बेटी को दिया। उन बेटियों की यादें हैं, जिन्होंने इसे संभालकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाया। इसलिए अगली बार जब किसी पहाड़ी महिला के गले में गलोबंद दिखाई दे, तो उसे सिर्फ एक आभूषण मत समझिएगा। उसमें एक गांव है, एक परिवार है, एक मां है, एक बेटी है और पहाड़ की कई पीढ़ियों की कहानी है।
ऋषभ पंत की ‘गूगली’
आधी रात को मदद की मांग, मैदान से दूर घर लौटने की छटपटाहट
सवाल सिर्फ एक क्रिकेटर का नहीं, पहाड़ लौटने वालों की राह का
स्टार क्रिकेटर पंत की आधी रात की पोस्ट ने खड़े किए कई सवाल
देहरादून। रात के 12 बजकर 46 मिनट। जब ज्यादातर लोग अपने फोन को एक तरफ रखकर दिन खत्म कर चुके होते हैं, सोशल मीडिया पर भारतीय क्रिकेटर ऋषभ पंत की एक पोस्ट सामने आती है। पोस्ट में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मदद की मांग की जाती है। यह सिर्फ एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं थी। इसे पढ़ने वालों के लिए यह एक अलग तरह की कहानी थी। एक तरफ श्रीलंका का दौरा है। मैदान है। क्रिकेट है। टीम है। वार्मअप मैच हैं। दूसरी तरफ अपने घर लौटने की इच्छा है और उस इच्छा के बीच खड़ी कोई ऐसी परेशानी, जिसके समाधान के लिए राज्य के मुख्यमंत्री तक बात पहुंचानी पड़ रही है। अगर पंत सचमुच दिल्ली से दोबारा उत्तराखंड शिफ्ट होना चाहते हैं, तो सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी दिक्कत है, जिसने उत्तराखंड के इस स्टार क्रिकेटर को आधी रात सोशल मीडिया के जरिए मुख्यमंत्री से मदद मांगने को मजबूर किया? और यही वह सवाल है, जिस पर क्रिकेट की चमक से बाहर निकलकर बात करने की जरूरत है।
ऋषभ पंत का नाम उत्तराखंड से सिर्फ इसलिए नहीं जुड़ा है कि वह देश के बड़े क्रिकेटरों में शामिल हैं। वह उस पहाड़ से आते हैं, जहां से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाना आसान नहीं होता। पहाड़ में अक्सर एक कहानी सुनाई जाती हैकृबेटा बाहर जाता है, पढ़ता है, नौकरी करता है, बड़ा आदमी बनता है और फिर एक दिन गांव लौटना चाहता है। लेकिन लौटने की राह में कई बार वही पुरानी मुश्किलें खड़ी मिलती हैं। सड़क,व्यवस्था,
कागज,जमीन व स्थानीय प्रशासन और सबसे बड़ा सवालकृक्या पहाड़ में वापस आने वाले व्यक्ति के लिए व्यवस्था उतनी ही सहज है, जितनी बाहर जाने वाले के लिए? पंत की पोस्ट को इसी बड़े सवाल के संदर्भ में देखना चाहिए। क्योंकि यह मामला सिर्फ एक सेलिब्रिटी का नहीं है।
मान लीजिए किसी आम पहाड़ी परिवार का बेटा वर्षों दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ या किसी दूसरे शहर में रहने के बाद अपने राज्य में लौटना चाहता है। उसे अगर किसी जमीन, घर, दस्तावेज, प्रशासनिक प्रक्रिया या स्थानीय समस्या के समाधान के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें तो उसके पास किसे टैग करने का विकल्प है? क्या वह आधी रात मुख्यमंत्री को टैग करके लिख सकता हैकृमुख्यमंत्री जी, मदद करिए? शायद नहीं। ऋषभ पंत कर सकते हैं क्योंकि उनके पास लाखों लोगों तक पहुंचने वाला सोशल मीडिया है। उनका एक पोस्ट खबर बन जाता है। मुख्यमंत्री तक बात पहुंच जाती है। प्रशासन भी शायद तुरंत सक्रिय हो जाए। लेकिन यहां असली सवाल यही हैकृजिस काम के लिए एक क्रिकेटर को मुख्यमंत्री को सोशल मीडिया पर पुकारना पड़ रहा है, उसी काम के लिए एक सामान्य नागरिक क्या करता होगा?
यह सवाल पंत पर नहीं, व्यवस्था पर है और शायद इसीलिए इस पोस्ट को सिर्फ वायरल पोस्ट मानकर आगे बढ़ जाना ठीक नहीं होगा। उत्तराखंड सरकार लगातार प्रवासियों को वापस पहाड़ लाने, निवेश बढ़ाने और रिवर्स माइग्रेशन को प्रोत्साहित करने की बात करती रही है। सरकार चाहती है कि पहाड़ से बाहर गया व्यक्ति वापस आए। अपने गांव में बसे। जमीन का इस्तेमाल करे। रोजगार पैदा करे। लेकिन रिवर्स माइग्रेशन सिर्फ भाषणों से नहीं होता। लोगों को लौटने के लिए भरोसा चाहिए। उन्हें जमीन चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा साफ व्यवस्था चाहिए। उन्हें सड़क चाहिए, इंटरनेट चाहिए, स्कूल चाहिए, अस्पताल चाहिए, रोजगार चाहिए और ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी काम के लिए किसी बड़े आदमी की पहचान जरूरी न हो।
ऋषभ पंत अगर उत्तराखंड लौटना चाहते हैं तो यह राज्य के लिए खुशी की बात होनी चाहिए। लेकिन उनकी घर वापसी अगर किसी प्रशासनिक अड़चन में फंसती है, तो यह भी सोचने का मौका है कि उन हजारों-लाखों लोगों का क्या होता होगा जो उत्तराखंड लौटना चाहते हैं, लेकिन उनके पास पंत जैसी आवाज नहीं है। पहाड़ का पलायन केवल गांव खाली होने की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की भी कहानी है जो लौटना चाहते हैं। कई लोग कहते हैं कि पहाड़ छोड़ना आसान है, लौटना मुश्किल। क्यों? क्योंकि बाहर शहर में आपकी पहचान आपकी नौकरी, आपका कारोबार और आपकी मेहनत से बनती है। पहाड़ लौटकर वही व्यक्ति कई बार जमीन, दस्तावेज, स्थानीय व्यवस्था और सरकारी प्रक्रियाओं के बीच उलझ जाता है और फिर वह सोचता हैकृक्या वापस आना गलती थी?
ऋषभ पंत की पोस्ट को इसी नजरिए से पढ़ना चाहिए। यहां किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह जानना भी जरूरी है कि उनकी वास्तविक परेशानी क्या है। क्या मामला संपत्ति से जुड़ा है? दस्तावेज से? प्रशासनिक अनुमति से? किसी अन्य प्रक्रिया से? जब तक पंत या मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आती, तब तक सोशल मीडिया की अटकलों को तथ्य मान लेना पत्रकारिता नहीं होगी। लेकिन एक बात जरूर पूछी जानी चाहिए। अगर पंत का घर उत्तराखंड है तो उन्हें अपने घर लौटने के लिए मदद क्यों मांगनी पड़ी? और अगर मुख्यमंत्री उनकी मदद करते हैं, तो क्या उसी प्रक्रिया को इतना सरल बनाया जा सकता है कि अगली बार किसी दूसरे प्रवासी को मुख्यमंत्री को टैग न करना पड़े? क्योंकि उत्तराखंड को सिर्फ ऋषभ पंत की वापसी की खबर नहीं चाहिए। उत्तराखंड को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें हर ऋषभ पंत अपने घर लौट सके।
रात के 12 बजकर 46 मिनट पर लिखा गया एक सोशल मीडिया पोस्ट सुबह की खबर बन गया। लेकिन असली खबर शायद वह पोस्ट नहीं है। असली खबर वह सवाल है, जो पोस्ट के पीछे खड़ा हैकृअपने पहाड़ लौटने की इच्छा रखने वाले आदमी के रास्ते में आखिर कौन खड़ा है? और अगर रास्ते में व्यवस्था खड़ी है, तो उसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है? मुख्यमंत्री की, सरकार की, प्रशासन की और शायद उन सभी की, जो वर्षों से कहते आए हैंकृ पहाड़ वापस आओ। अब सवाल यह है कि जब कोई वापस आना चाहता है, तो क्या पहाड़ और उसकी व्यवस्था उसके लिए दरवाजा खोलती है? या फिर दरवाजे तक पहुंचने के लिए भी किसी ऋषभ पंत का होना जरूरी है?
सैन्यभूमि के युवाओं को ‘सहारा’
उत्तराखंड में अग्निवीरों के लिए पुनर्राेजगार सेल गठित, सेवा के बाद मिलेगा रोजगार
देश के पहले अग्निवीर पुनर्राेजगार सेल से हर सैनिक को रोजगार से जोड़ने की तैयारी
सेवा के बाद भविष्य सुरक्षित करने पर जोर, रोजगार के लिए बन रहा है मजबूत तंत्र
देहरादून। उत्तराखंड को सैनिकों की भूमि के रूप में पहचान दिलाने वाले राज्य में अग्निवीरों के भविष्य को लेकर सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य में स्थापित अग्निवीर पुनर्राेजगार सेल का उद्देश्य सेना में सेवा पूरी करने वाले अग्निवीरों को उनके कौशल और योग्यता के अनुरूप रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है। सरकार की इस पहल का फोकस सिर्फ अग्निवीरों को रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि सेना में मिले अनुशासन, प्रशिक्षण और तकनीकी दक्षता को नागरिक क्षेत्र में उपयोगी रोजगार से जोड़ना भी है। उत्तराखंड जैसे सैन्य बहुल राज्य के लिए यह पहल खास महत्व रखती है। राज्य के हजारों परिवारों की पीढ़ियां सेना से जुड़ी रही हैं। ऐसे में अग्निवीर योजना के तहत सेवा में जाने वाले युवाओं के लिए सेवा अवधि के बाद रोजगार और भविष्य की सुरक्षा बड़ा विषय रहा है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने पुनर्राेजगार की व्यवस्था को संस्थागत रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
अग्निवीरों को सेना में सीमित अवधि की सेवा के दौरान सैन्य प्रशिक्षण के साथ अनुशासन, नेतृत्व, तकनीकी दक्षता और टीमवर्क का अनुभव मिलता है। सरकार का प्रयास है कि सेवा समाप्त होने के बाद इन कौशलों को रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाए। इसके लिए पुनर्राेजगार सेल विभिन्न विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों, निजी क्षेत्र और अन्य रोजगार प्रदाताओं के साथ समन्वय की भूमिका निभा सकता है। अग्निवीरों की योग्यता और कौशल के आधार पर उन्हें उपयुक्त अवसरों की जानकारी उपलब्ध कराने, रोजगार मेलों से जोड़ने और आवश्यक मार्गदर्शन देने पर जोर रहेगा। उत्तराखंड में सेना सिर्फ रोजगार का माध्यम नहीं रही है। यहां सेना के प्रति भावनात्मक जुड़ाव भी गहरा है। पर्वतीय क्षेत्रों के अनेक परिवारों में आज भी सेना की वर्दी गौरव का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में अग्निवीरों के भविष्य को लेकर राज्य सरकार की पहल का सामाजिक महत्व भी है। सरकार का संदेश है कि जो युवा देश की सुरक्षा के लिए अपनी सेवाएं देंगे, उनके भविष्य को लेकर राज्य भी अपनी जिम्मेदारी निभाएगा। यही वजह है कि पुनर्राेजगार सेल को केवल सरकारी योजना के रूप में नहीं, बल्कि पूर्व सैनिकों और अग्निवीरों के लिए रोजगार का पुल बनाने की पहल के तौर पर देखा जा रहा है।
सरकारी क्षेत्र में रोजगार की सीमित संभावनाओं को देखते हुए निजी क्षेत्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। अग्निवीरों के सैन्य प्रशिक्षण और कौशल का इस्तेमाल सुरक्षा सेवाओं, आपदा प्रबंधन, लाजिस्टिक्स, तकनीकी कार्यों, प्रशासनिक जिम्मेदारियों और अन्य क्षेत्रों में किया जा सकता है। राज्य सरकार की कोशिश होगी कि निजी कंपनियां भी प्रशिक्षित अग्निवीरों को रोजगार के लिए प्राथमिकता दें और उनके कौशल का उपयोग करें। अगर यह माडल प्रभावी ढंग से लागू होता है तो उत्तराखंड देश के अन्य राज्यों के सामने एक उदाहरण भी प्रस्तुत कर सकता है। उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौतियों में पलायन शामिल है। रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में युवा मैदानी शहरों और दूसरे राज्यों की ओर जाते हैं। सेना में सेवा के बाद यदि युवाओं को राज्य में ही रोजगार के बेहतर अवसर मिलते हैं तो इसका सीधा असर पलायन पर भी पड़ सकता है। खासकर पहाड़ी जिलों के युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर तैयार करना जरूरी है। अग्निवीरों के पास अनुशासन और प्रशिक्षण के साथ कार्य करने का अनुभव होगा। ऐसे युवाओं को राज्य के रोजगार तंत्र से जोड़ना स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।
हालांकि किसी भी सरकारी पहल की सफलता इस बात से तय होगी कि वह जमीन पर कितना प्रभाव डालती है। सिर्फ सेल बन जाना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी यह होगा कि अग्निवीरों को वास्तविक रोजगार के अवसर मिलें। निजी क्षेत्र के साथ ठोस समझौते हों। रोजगार की जानकारी समय पर मिले और युवाओं को आवेदन से लेकर चयन तक उचित मार्गदर्शन उपलब्ध हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अग्निवीरों की योग्यता के अनुरूप सम्मानजनक और स्थायी रोजगार के अवसर तैयार किए जाएं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में शुरू की गई यह पहल उत्तराखंड की सैन्य पृष्ठभूमि और युवाओं की आकांक्षाओं से सीधे जुड़ी है। सरकार के सामने अब चुनौती इस पहल को एक प्रभावी रोजगार मॉडल में बदलने की है। अगर हर सेवा पूर्ण करने वाले अग्निवीर को उसकी योग्यता के अनुसार रोजगार का अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस व्यवस्था बनती है तो यह राज्य के युवाओं के लिए बड़ा भरोसा बन सकती है।
क्योंकि सैनिक बनना सिर्फ वर्दी पहनना नहीं है। इसके पीछे एक परिवार की उम्मीद होती है। एक गांव का सपना होता है और देश की सेवा का संकल्प होता है। ऐसे में सेवा पूरी होने के बाद उस युवा से यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि अब आप नौकरी तलाशिए। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जो उससे कहेकृ देश की सेवा आपने की है, अब आपके कौशल को रोजगार से जोड़ना हमारी जिम्मेदारी है। यही अग्निवीर पुनर्राेजगार सेल की सबसे बड़ी कसौटी होगी।
‘कुमाऊं की सियासी नब्ज’
कांग्रेस की चुनावी रणनीति में कुमाऊं पर खास फोकस
विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का है शक्ति प्रदर्शन
संगठन और कार्यकर्ताओं में जोश,भाजपा को देंगे संदेश
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस अब कुमाऊं की धरती से चुनावी अभियान को धार देने की तैयारी में है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के हल्द्वानी दौरे को इसी रणनीति की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। हल्द्वानी को कांग्रेस ने इसके लिए चुना है तो इसके पीछे केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कुमाऊं की राजनीतिक नब्ज को साधने की कोशिश भी मानी जा रही है। कुमाऊं में कांग्रेस की पारंपरिक पकड़, स्थानीय मुद्दों और संगठन की मौजूदा स्थिति को देखते हुए पार्टी हाईकमान यहां से कार्यकर्ताओं को बड़ा राजनीतिक संदेश देना चाहता है। कांग्रेस की कोशिश है कि हल्द्वानी से ऐसा माहौल तैयार किया जाए, जिसकी राजनीतिक गूंज अल्मोड़ा से लेकर पिथौरागढ़, नैनीताल, बागेश्वर, चंपावत और ऊधम सिंह नगर तक सुनाई दे।
कुमाऊं की राजनीति में हल्द्वानी का अपना अलग महत्व है। इसे कुमाऊं का प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक केंद्र माना जाता है। मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच संपर्क का बड़ा केंद्र होने के कारण हल्द्वानी का राजनीतिक संदेश पूरे कुमाऊं में तेजी से पहुंचता है। कांग्रेस इसी राजनीतिक और भौगोलिक महत्व का लाभ उठाना चाहती है। पार्टी की रणनीति में हल्द्वानी सिर्फ कार्यक्रम स्थल नहीं, बल्कि कुमाऊं में चुनावी अभियान के लान्चिंग पैड की भूमिका निभा सकता है। लंबे समय से कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की रही है। सत्ता में वापसी के लिए पार्टी को केवल बड़े नेताओं के भाषणों पर निर्भर रहने के बजाय जमीनी संगठन को सक्रिय करना होगा। मल्लिकार्जुन खरगे का दौरा इसी लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कार्यकर्ताओं के साथ संवाद, संगठन को चुनाव के लिए तैयार करने का संदेश और भाजपा सरकार के खिलाफ मुद्दों को जनता के बीच ले जाने की रणनीति पर पार्टी नेतृत्व जोर दे सकता है। कांग्रेस चाहती है कि कार्यकर्ता चुनावी मोड में अभी से उतरें और विधानसभा स्तर पर मतदाताओं के साथ संपर्क अभियान तेज करें। कुमाऊं की राजनीति में स्थानीय मुद्दों का प्रभाव हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई, युवाओं के रोजगार और पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। इसके अलावा जमीन और स्थानीय पहचान से जुड़े मुद्दे भी चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं। कांग्रेस का प्रयास रहेगा कि राष्ट्रीय राजनीति के बजाय उत्तराखंड के स्थानीय सवालों को चुनाव का केंद्र बनाया जाए।
हल्द्वानी से राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यक्रम कांग्रेस की ओर से भाजपा को सीधा राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की रणनीति पर काम कर रही है। संगठन को बूथ स्तर पर मजबूत करने और हारी हुई सीटों पर विशेष फोकस की उसकी तैयारी सामने आ चुकी है। ऐसे में कांग्रेस भी यह दिखाना चाहती है कि वह चुनाव से पहले संगठन को सक्रिय कर रही है और मुकाबले के लिए तैयार है। खरगे की मौजूदगी से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के साथ कांग्रेस नेतृत्व यह संदेश देने की कोशिश करेगा कि उत्तराखंड का चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ राज्य इकाई का चुनाव नहीं, बल्कि केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकता भी है।
उत्तराखंड की राजनीति में कुमाऊं क्षेत्र कांग्रेस के लिए लंबे समय तक महत्वपूर्ण आधार रहा है। हालांकि पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा ने यहां मजबूत प्रदर्शन किया। अब कांग्रेस के सामने चुनौती पुराने राजनीतिक आधार को दोबारा सक्रिय करने की है। इसके लिए पार्टी को सिर्फ बड़े नेताओं की सभाओं से आगे बढ़ना होगा। स्थानीय नेतृत्व, पूर्व प्रत्याशी, विधायक, जिला और ब्लॉक संगठन तथा बूथ कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल मजबूत करना होगा। हल्द्वानी का कार्यक्रम इसी बड़े अभियान की शुरुआत बन सकता है।
उत्तराखंड में चुनावी राजनीति अक्सर गढ़वाल और कुमाऊं के क्षेत्रीय संतुलन के इर्द-गिर्द भी देखी जाती है। ऐसे में हल्द्वानी से कांग्रेस का बड़ा कार्यक्रम यह संकेत दे सकता है कि पार्टी कुमाऊं में अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए अलग रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस के सामने लक्ष्य स्पष्ट हैकृकुमाऊं की अधिक से अधिक विधानसभा सीटों पर मुकाबले को मजबूत करना। इसके लिए पार्टी को स्थानीय असंतोष को राजनीतिक मुद्दे में बदलना होगा और संगठन को चुनावी मशीनरी में तब्दील करना होगा। मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी यात्रा का महत्व सिर्फ उनके भाषण तक सीमित नहीं रहेगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कार्यक्रम के बाद कांग्रेस संगठन कितनी तेजी से सक्रिय होता है। क्या बूथ स्तर पर नई जिम्मेदारियां तय होंगी? क्या स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद कम होंगे?क्या युवाओं और महिला मतदाताओं के लिए अलग अभियान तैयार होगा?क्या कांग्रेस भाजपा सरकार के खिलाफ स्थानीय मुद्दों को लगातार जनता के बीच ले जाएगी? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि हल्द्वानी का यह कार्यक्रम महज एक राजनीतिक सभा था या 2027 के चुनावी अभियान का वास्तविक आगाज। फिलहाल कांग्रेस का संदेश साफ दिखाई दे रहा हैकृ
कुमाऊं की जमीन पर लौटना है, संगठन को जगाना है और भाजपा के सामने सीधी चुनौती पेश करनी है। हल्द्वानी से उठने वाली यह राजनीतिक आवाज आने वाले महीनों में कुमाऊं की चुनावी हवा किस दिशा में मोड़ती है, इस पर अब सबकी नजर रहेगी।
‘घर लौटने’ की राह में खड़ी ‘दीवार’
सरकार के दावों की हकीकत
ऋषभ पंत की आधी रात की गुहार और उत्तराखंड के दावों का कड़वा सच
उत्तराखंड राज्य के बड़े आयकरदाता को लगानी पड़ी गुहार तो आमजन कहा
सवालकृजब एक स्टार क्रिकेटर को घर लौटने में दिक्कत तो आम पहाड़ी कहां
देहरादून। रात के 12 बजकर 46 मिनट। देश के सबसे चर्चित क्रिकेटरों में शामिल ऋषभ पंत श्रीलंका दौरे पर हैं। टीम इंडिया के साथ क्रिकेट के मैदान पर मौजूद हैं। लेकिन इसी बीच उनका एक सोशल मीडिया पोस्ट उत्तराखंड की व्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल खड़ा कर देता है। पंत ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मदद की अपील की। यह सिर्फ एक क्रिकेटर की व्यक्तिगत परेशानी की कहानी नहीं है। यह उस उत्तराखंड की कहानी भी है, जो लगातार प्रवासियों से कहता हैकृलौट आइए, अपने पहाड़ आइए, अपने गांव आइए। लेकिन जब कोई लौटना चाहता है तो उसके रास्ते में कौन-कौन सी दीवारें खड़ी हो जाती हैं?और इस सवाल को और गंभीर बना देता है ऋषभ पंत का कद।
ऋषभ पंत कोई सामान्य नाम नहीं हैं। वह उत्तराखंड से निकलकर भारतीय क्रिकेट के बड़े सितारे बने। उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व किया, दुनिया के बड़े क्रिकेट मैदानों पर अपनी पहचान बनाई और उत्तराखंड के नाम को भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के नक्शे पर पहुंचाया। आयकर के लिहाज से भी पंत को उत्तराखंड के प्रमुख करदाताओं में गिना जाता रहा है। ऐसे में अगर राज्य का इतना बड़ा नाम अपने ही राज्य में लौटने से जुड़ी किसी परेशानी के लिए मुख्यमंत्री से सार्वजनिक रूप से मदद मांग रहा है, तो सवाल सिर्फ पंत का नहीं रह जाता। सवाल व्यवस्था का हो जाता है। सोचिए सरकार कहती है कि उत्तराखंड में रिवर्स माइग्रेशन होगा। सरकार कहती है कि पहाड़ खाली नहीं होने दिए जाएंगे। सरकार कहती है कि प्रवासी उत्तराखंडियों को वापस लाया जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ अगर देश का एक बड़ा क्रिकेट स्टार अपने राज्य में दोबारा बसने की कोशिश में किसी अड़चन का सामना कर रहा है और उसे मुख्यमंत्री को सोशल मीडिया पर पुकारना पड़ रहा है, तो हमें एक मिनट रुककर पूछना चाहिएकृकि क्या उत्तराखंड में वापस आना सचमुच इतना आसान है? ऋषभ पंत के पास अपनी बात सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचाने की ताकत है। उनके पोस्ट को कुछ ही मिनटों में हजारों लोग देख सकते हैं। मीडिया उसे खबर बना देता है, सरकार संज्ञान ले सकती है और प्रशासन सक्रिय हो सकता है। लेकिन उस पहाड़ी नौजवान का क्या, जो दिल्ली, मुंबई या देहरादून से अपने गांव लौटना चाहता है? उसके पास कितने फालोअर हैं? वह मुख्यमंत्री को टैग करके कितनी आसानी से अपनी समस्या बता सकता है? शायद यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
उत्तराखंड का पलायन सिर्फ रोजगार की कहानी नहीं है। यह व्यवस्था की कहानी भी है। लोग पहाड़ छोड़कर शहरों में गए, किसी ने नौकरी की, किसी ने कारोबार किया,
किसी ने बच्चों को पढ़ाया, किसी ने मकान बनाया और अब कई लोग वापस लौटना चाहते हैं। लेकिन लौटने के साथ जमीन के कागज सामने आते हैं। राजस्व विभाग सामने आता है। स्थानीय अनुमति सामने आती है। सड़क और बिजली की समस्या सामने आती है। स्कूल और अस्पताल का सवाल सामने आता है और सबसे ऊपर आती है सरकारी प्रक्रिया। अगर किसी बड़े क्रिकेटर को भी इन प्रक्रियाओं में मदद की जरूरत पड़ रही है, तो आम आदमी की मुश्किल का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां ऋषभ पंत को लेकर सहानुभूति जताना ही पर्याप्त नहीं है। उनकी परेशानी को एक केस स्टडी की तरह देखना चाहिए। क्योंकि अगर उत्तराखंड सच में चाहता है कि उसके बाहर गए लोग वापस आएं, तो उसे सिर्फ यह कहने से काम नहीं चलेगा किकृ पना पहाड़ आपको बुला रहा है। पहाड़ बुला रहा है तो रास्ता भी आसान करना होगा।
यह सवाल थोड़ा असहज है, लेकिन पूछा जाना चाहिए कि जिस राज्य का नागरिक बाहर रहकर कमाता है, निवेश करता है, टैक्स देता है और फिर अपने घर लौटना चाहता हैकृक्या राज्य की मशीनरी उसके लिए इतनी सरल नहीं हो सकती कि उसे मुख्यमंत्री के दरवाजे तक अपनी बात लेकर न जाना पड़े? ऋषभ पंत की लोकप्रियता के कारण यह मामला सामने आ गया। लेकिन उत्तराखंड में ऐसे कितने लोग हैं जिनकी परेशानियां कभी सोशल मीडिया तक पहुंचती ही नहीं? कितने पूर्व प्रवासी अपने गांव लौटकर जमीन और प्रशासनिक उलझनों में फंस जाते हैं? कितने लोग वापस आने का विचार इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां काम करवाना मुश्किल है? इन सवालों का जवाब किसी वायरल पोस्ट से नहीं मिलेगा। इसके लिए सरकार को अपनी व्यवस्था देखनी होगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए यह सिर्फ एक व्यक्ति की मदद करने का मामला नहीं होना चाहिए। यह अवसर है। अगर ऋषभ पंत उत्तराखंड में वापस आना चाहते हैं तो सरकार उनकी समस्या का समाधान करे। लेकिन उसके साथ-साथ ऐसी व्यवस्था भी बनाए जिसमें अगला व्यक्ति मुख्यमंत्री को टैग करने के बजाय एक सरल पोर्टल, एक हेल्पडेस्क या एकल खिड़की के जरिए अपना काम करा सके। क्योंकि रिवर्स माइग्रेशन पोस्टर से नहीं, सिस्टम से आएगा। उत्तराखंड को ऐसे पहाड़ की जरूरत है जहां किसी ऋषभ पंत को भी अपने घर लौटने के लिए आधी रात को गुहार न लगानी पड़े और अगर पंत जैसे बड़े नाम को आवाज उठानी पड़ रही है, तो उन हजारों सामान्य उत्तराखंडियों के बारे में सोचना जरूरी है जिनकी आवाज मुख्यमंत्री तक कभी पहुंचती ही नहीं। रात के 12 बजकर 46 मिनट पर ऋषभ पंत की पोस्ट वायरल हुई। अब देखना यह है कि सरकार इसे सिर्फ एक क्रिकेटर की समस्या समझती है या उत्तराखंड में घर वापसी की पूरी व्यवस्था पर उठे सवाल के रूप में देखती है।
क्योंकि असली सवाल यह नहीं है किकृऋषभ पंत को मदद मिलेगी या नहीं? असली सवाल यह हैकृ जब उत्तराखंड का सबसे बड़ा नाम भी अपने घर लौटने के लिए गुहार लगाए, तो उस आम पहाड़ी की क्या स्थिति होगी जिसके पास न करोड़ों की कमाई है, न सोशल मीडिया की ताकत और न मुख्यमंत्री तक सीधे पहुंच? यही सवाल ऋषभ पंत की आधी रात की पोस्ट को एक क्रिकेट खबर से कहीं बड़ी खबर बना देता है।
एसआईआर में 75 साल के बुजुर्ग से दस्तावेज मांगने पर उठ रहे हजारों सवाल
75 साल की उम्र, 50 साल का वोट व एक हाईस्कूल मार्कशीट की जलालत
सरकारें चुनने वाला बुजुर्ग अब खुद की पहचान साबित करने को है मोहताज
लोकतंत्र के सामने नागरिक को अपनी पहचान साबित करने को किया मजबूर
देहरादून। एक आदमी 75 साल का हो चुका है। उसके बाल सफेद हैं। चेहरे पर उम्र की लकीरें हैं। जिंदगी का बड़ा हिस्सा उसने इसी देश में गुजारा है। उसने सरकारें बदलते देखीं। प्रधानमंत्रियों को आते-जाते देखा। मुख्यमंत्रियों के चेहरे बदले। चुनाव के नारों को बदलते देखा। गांवों को कस्बों में बदलते देखा और कस्बों को शहर बनते देखा और इन तमाम बदलावों के बीच एक चीज नहीं बदलीकृउसका वोट। करीब पांच दशक तक वह चुनाव आया तो मतदान केंद्र तक गया। कतार में खड़ा हुआ। पहचान बताई। वोट डाला और घर लौट आया। लेकिन आज, 75 साल की उम्र में व्यवस्था उसके सामने एक नया सवाल लेकर खड़ी हैकृ हाईस्कूल की मार्कशीट दिखाइए। यह सिर्फ एक कागज मांगने की कहानी नहीं है। यह उस रिश्ते की कहानी है जो नागरिक और लोकतंत्र के बीच बनता है और सवाल यह है कि क्या पांच दशक तक वोट देने वाला नागरिक आज एक मार्कशीट से छोटा हो गया है।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना है। फर्जी नाम हटें, मृत मतदाताओं के नाम हटें, गलत प्रविष्टियां सुधरें और वास्तविक मतदाता सूची में रहेंकृइस उद्देश्य पर सवाल नहीं होना चाहिए। सवाल उस तरीके पर है, जिसमें प्रक्रिया आम आदमी के लिए भय और परेशानी का कारण बनने लगे। एक 75 वर्षीय व्यक्ति से हाईस्कूल की मार्कशीट मांगना शायद कागज पर एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लगे। लेकिन उस व्यक्ति की जिंदगी में जाकर देखिए। उसने हाईस्कूल किस साल पास किया होगा। उस समय स्कूलों में रिकार्ड आज की तरह डिजिटल नहीं थे। कितने स्कूलों की पुरानी इमारतें आज भी मौजूद हैं। कितने स्कूलों के पुराने रजिस्टर सुरक्षित हैं। कितने लोगों के पास 50-60 साल पुराने प्रमाणपत्र आज भी सुरक्षित होंगे और अगर वह कागज खो गया तो क्या नागरिकता, मतदाता पहचान और लोकतांत्रिक अधिकार का पूरा भार अब एक पुराने कागज पर टिका दिया जाएगा।
व्यवस्था कह सकती हैकृदस्तावेज तो चाहिए, ठीक है। लेकिन फिर अगला सवाल भी पूछा जाना चाहिएकृकि दस्तावेज जुटाने की जिम्मेदारी किसकी है। 75 साल का बुजुर्ग सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाए, स्कूल की पुरानी फाइल खोजे, तहसील जाए, ब्लाक जाए, जन्म प्रमाणपत्र तलाशे, पुराने रिकार्ड निकलवाए और अगर रिकार्ड किसी दफ्तर में उपलब्ध ही नहीं है तो फिर क्या। क्या उसे यह साबित करना होगा कि वह पिछले 50 वर्षों से वोट क्यों देता आया। क्या वह अपनी जिंदगी की गवाही लेकर सरकारी दफ्तर में खड़ा होगा। यह वही देश है जहां गांव का एक बुजुर्ग पूरे इलाके को पहचानता है और पूरा गांव उसे पहचानता है। लेकिन कागज की दुनिया कहती हैकृ गांव तुम्हें जानता हो तो जानता रहे, पहले दस्तावेज दिखाओ। यहीं से लोकतंत्र और कागजी व्यवस्था के बीच की खाई दिखाई देती है।
लोकतंत्र में नागरिक राज्य का मालिक माना जाता है। वह वोट देता है, वह टैक्स देता है, वह कानून मानता है, वह सरकार चुनता है। लेकिन धीरे-धीरे एक ऐसी प्रशासनिक भाषा विकसित होती जा रही है, जिसमें नागरिक से पहले पूछा जाता हैकृआप साबित कीजिए कि आप वही हैं जो आप कहते हैं। यह सवाल सुनने में सामान्य है, लेकिन इसके पीछे छिपा डर बहुत बड़ा है। क्योंकि गरीब के पास दस्तावेज कम हो सकते हैं। बुजुर्ग के कागज खो सकते हैं। गांव में रहने वाले व्यक्ति के रिकार्ड पुराने हो सकते हैं। महिलाओं के नाम विवाह के बाद बदल सकते हैं। परिवारों के पते बदल सकते हैं। गांवों के नाम बदल सकते हैं और कई लोगों के जीवन में दस्तावेज हमेशा उनकी जिंदगी से पीछे चलते रहे हैं। तो क्या अब दस्तावेजों की कमी को नागरिक की कमी मान लिया जाएगा।
मतदाता सूची में गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए। यह लोकतंत्र की पहली शर्तों में से एक है। लेकिन मतदाता सूची को साफ करने की प्रक्रिया में अगर वास्तविक मतदाता ही डरने लगे तो प्रशासन को एक बार रुककर सोचना चाहिए। क्योंकि चुनाव आयोग के सामने सिर्फ कागज नहीं हैं। कागज के पीछे इंसान हैं। एक बुजुर्ग है। एक विधवा है। एक प्रवासी मजदूर है। एक पहाड़ी गांव का परिवार है। एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अपना अधिकांश जीवन गांव में बिताया और अब उसके बच्चे शहरों में रहते हैं। इन लोगों से दस्तावेज मांगना गलत नहीं है। लेकिन उन्हें दस्तावेज जुटाने की सहायता दिए बिना सिर्फ नोटिस थमा देना सवाल जरूर खड़ा करता है।
कल्पना कीजिए, एक बुजुर्ग के घर बीएलओ आता है। हाथ में नोटिस है। कहता हैकृदस्तावेज जमा करने होंगे। बुजुर्ग कागजों की पुरानी पेटी खोलता है। एक-एक कागज निकालता है। कुछ पढ़ने लायक हैं। कुछ फट चुके हैं। कुछ पर स्याही धुंधली हो चुकी है। कुछ मिलते ही नहीं। फिर घर में सवाल शुरू होता हैकृअब क्या होगा,नाम कट तो नहीं जाएगा ,वोट दे पाएंगे या नहीं, बच्चों को बुलाना पड़ेगा, दफ्तर कौन जाएगा। एक सरकारी प्रक्रिया धीरे-धीरे परिवार की चिंता बन जाती है। यही वह बिंदु है जहां प्रशासन को समझना होगा कि कानून और प्रक्रिया की भाषा एक जैसी नहीं होती।कानून कागज मांग सकता है। लेकिन प्रशासन को इंसान भी दिखाई देना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है। यदि कोई व्यक्ति दशकों से मतदाता सूची में दर्ज है, लगातार चुनावों में मतदान करता रहा है, उसके पास दूसरे सरकारी दस्तावेज हैं, स्थानीय स्तर पर उसकी पहचान है, तो इन तमाम तथ्यों का महत्व क्या है। क्या हर पीढ़ी को अपने अस्तित्व का नया प्रमाण देना होगा। क्या 75 साल की उम्र में भी नागरिक कहेगा मैं हूं और सरकार जवाब देगीकृपहले साबित करो। फिर लोकतंत्र किसके लिए है। क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव के दिन वोट डालना है। या लोकतंत्र का मतलब यह भी है कि राज्य अपने नागरिक पर भरोसा करे।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। यहां हजारों गांवों की सामाजिक स्मृति कागजों से नहीं चलती। गांव में किसी व्यक्ति की पहचान उसके घर, परिवार, खेत, रिश्तों और पीढ़ियों से होती है। एक बुजुर्ग के बारे में गांव का बच्चा तक जानता है कि वह कौन है। लेकिन सरकारी फार्म पर उसका अस्तित्व कुछ कालम में बंट जाता हैकृनाम,पिता का नाम,जन्मतिथि,पता,दस्तावेज संख्या और फिर एक बाक्सकृ में प्रमाण संलग्न करें। जिस आदमी की जिंदगी 75 साल की है, उसकी पहचान एक बाक्स में समा जाती है और अगर उस बाक्स में कागज नहीं है तो क्या उसकी पूरी जिंदगी अधूरी मान ली जाएगी।
हारी सीटों पर भाजपा की ‘किलेबंदी’
कोर कमेटी को विधानसभावार संगठनात्मक प्रवास की जिम्मेदारी
कमजोर बूथों से लेकर नाराज कार्यकर्ताओं तक की होगी पड़ताल
विस चुनाव 2027 से पहले हार वाली सीटों पर भाजपा का फोकस
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने अपनी चुनावी तैयारियों को और धार देना शुरू कर दिया है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ पार्टी अब उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष नजर रख रही है, जहां पिछले चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इन सीटों को जीत में बदलने के लिए पार्टी संगठन ने जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ाने की रणनीति बनाई है। इसी कड़ी में भाजपा कोर कमेटी के सदस्यों को विधानसभावार संगठनात्मक प्रवास की जिम्मेदारी दिए जाने की तैयारी है। संबंधित वरिष्ठ नेता अपने-अपने निर्धारित विधानसभा क्षेत्रों में जाकर संगठन की वास्तविक स्थिति का आकलन करेंगे। बूथ स्तर की सक्रियता, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय, स्थानीय मुद्दों और चुनावी माहौल की जानकारी जुटाने के साथ ही पिछले चुनाव में हार के कारणों की भी पड़ताल की जाएगी। भाजपा के लिए यह कवायद इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं है। पार्टी सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस समेत विपक्षी दल भी संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं।
चुनाव में किसी सीट पर हार सिर्फ उम्मीदवार की हार नहीं होती। उसके पीछे संगठन की कमजोरी, स्थानीय नाराजगी, बूथ प्रबंधन, टिकट को लेकर असंतोष और चुनावी रणनीति की कमी जैसे कई कारण हो सकते हैं। भाजपा अब इन्हीं पहलुओं की समीक्षा करना चाहती है। कोर कमेटी के सदस्य जब विधानसभा क्षेत्रों में प्रवास करेंगे तो वहां पार्टी पदाधिकारियों, मंडल और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से संवाद किया जाएगा। स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से यह समझने की कोशिश होगी कि आखिर पिछले चुनाव में पार्टी कहां कमजोर रही। क्या प्रत्याशी को लेकर नाराजगी थी?क्या स्थानीय संगठन सक्रिय नहीं था?क्या बूथ प्रबंधन में कमी रह गई? क्या पार्टी के पक्ष में माहौल होने के बावजूद वोटों का सही प्रबंधन नहीं हो पाया? या फिर स्थानीय स्तर पर कोई ऐसा मुद्दा था, जिसने चुनावी समीकरण बदल दिया? इन सभी सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश होगी।
भाजपा की चुनावी राजनीति में बूथ प्रबंधन को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में हारी हुई विधानसभा सीटों पर पार्टी की रणनीति का केंद्र बूथ ही रहने वाला है। कहां पार्टी के बूथ कमजोर हैं, किन बूथों पर कार्यकर्ता सक्रिय नहीं हैं, किन क्षेत्रों में मतदाताओं के साथ संपर्क कमजोर है और किन इलाकों में विपक्ष को बढ़त मिली थीकृइन बिंदुओं पर फोकस किया जाएगा। पार्टी की कोशिश होगी कि चुनाव से काफी पहले बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत कर दिया जाए, ताकि चुनाव के समय अचानक सक्रिय होने के बजाय कार्यकर्ता लगातार मतदाताओं के संपर्क में रहें। किसी भी चुनाव में संगठन की सबसे बड़ी ताकत कार्यकर्ता होता है। लेकिन चुनाव हारने के बाद कई बार कार्यकर्ताओं में निराशा और स्थानीय नेतृत्व को लेकर नाराजगी भी सामने आती है। भाजपा की संगठनात्मक प्रवास योजना में ऐसे कार्यकर्ताओं से संवाद को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पार्टी यह जानना चाहेगी कि स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की क्या शिकायतें हैं। विधायक, पूर्व प्रत्याशी और संगठन के बीच तालमेल कैसा है। स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद तो नहीं हैं और कार्यकर्ताओं को चुनावी अभियान में किस तरह अधिक प्रभावी भूमिका दी जा सकती है। क्योंकि चुनाव सिर्फ बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं जीता जाता। चुनाव बूथ पर खड़ा कार्यकर्ता जिताता है। उत्तराखंड की राजनीति में स्थानीय मुद्दों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। सड़क, रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि, पेयजल और क्षेत्रीय विकास जैसे मुद्दे विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करते हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का प्रवास इसलिए भी अहम होगा कि पार्टी को प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की अलग राजनीतिक तस्वीर मिल सके। एक सीट पर जो मुद्दा महत्वपूर्ण है, जरूरी नहीं कि दूसरी सीट पर भी वही मुद्दा चुनावी प्रभाव रखता हो। इसलिए विधानसभा स्तर पर अलग रणनीति बनाने की दिशा में भी पार्टी आगे बढ़ सकती है।
संगठनात्मक प्रवास का उद्देश्य केवल रिपोर्ट तैयार करना नहीं माना जा रहा। पार्टी की कोशिश समस्याओं की पहचान के साथ उनके समाधान की दिशा में भी काम करने की होगी जहां संगठन कमजोर है, वहां नए सिरे से जिम्मेदारी तय की जा सकती है, जहां कार्यकर्ताओं में नाराजगी है, वहां संवाद बढ़ाया जा सकता है, जहां बूथ कमजोर हैं, वहां बूथ समितियों को सक्रिय किया जा सकता है और जहां स्थानीय स्तर पर नेतृत्व को लेकर असंतोष है, वहां वरिष्ठ नेताओं के माध्यम से स्थिति संभालने की कोशिश होगी। उत्तराखंड में भाजपा लगातार दो विधानसभा चुनावों में सरकार बनाने में सफल रही है। अब पार्टी के सामने 2027 में सत्ता की हैट्रिक लगाने की चुनौती है। लेकिन तीसरी बार सत्ता में लौटने के लिए पार्टी को केवल अपनी मजबूत सीटों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। उसे उन सीटों पर भी प्रदर्शन सुधारना होगा, जहां पिछले चुनाव में उसे झटका लगा था। यही वजह है कि हारी हुई विधानसभा सीटें अब भाजपा की चुनावी रणनीति के केंद्र में आती दिख रही हैं। पार्टी की कोशिश साफ हैकृजहां पिछली बार कमी रह गई, वहां इस बार कोई गुंजाइश न छोड़ी जाए।
भाजपा की यह कवायद विपक्ष के लिए भी एक राजनीतिक संकेत है। जब सत्तारूढ़ दल चुनाव से महीनों पहले हारी हुई सीटों पर संगठनात्मक प्रवास शुरू कर रहा है, तो इसका अर्थ है कि पार्टी चुनाव को लेकर पूरी तरह सक्रिय मोड में आ चुकी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के लिए भी यह चुनौती होगी कि वह इन विधानसभा क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करें और भाजपा की रणनीति का मुकाबला करने के लिए बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करें। 2027 का चुनाव अभी सामने नहीं आया है, लेकिन उसकी तैयारी जमीन पर शुरू हो चुकी है। भाजपा का संदेश साफ हैकृकि पिछली हार को भूलना नहीं है, उससे सीखना है। हारी हुई सीटों पर संगठन को भेजना है। कमजोर बूथों को मजबूत करना है। नाराज कार्यकर्ताओं को साथ लाना है। स्थानीय मुद्दों को समझना है और फिर उस पूरी तैयारी को चुनावी जीत में बदलना है। अब देखना होगा कि भाजपा की यह संगठनात्मक कवायद 2027 में कितनी सीटों का राजनीतिक गणित बदल पाती है।
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