udaydinmaan
बुधवार, 20 मई 2026
‘तिरंगे में लिपटा एक युग’
---एक युग का अंत---
---नम आंखों के बीच पंचतत्व में विलीन हुए जनरल बीसी खंडूड़ी
---सेना की दृढ़ता, राजनीति की सादगी व पहाड़ की ईमानदार पहचान
---अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब, खंडूड़ी सिर्फ नेता नहीं था भरोसा
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति और भारतीय सेना का एक अनुशासित, सादगीपूर्ण और ईमानदार चेहरा आज पंचतत्व में विलीन हो गया। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब केवल एक राजनेता को विदाई देने नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व को अंतिम प्रणाम करने पहुंचा था, जिसने जीवनभर अनुशासन, सादगी और जनसेवा को अपनी पहचान बनाए रखा।
तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर जब अंतिम यात्रा के लिए निकला तो माहौल गमगीन हो उठा। हर आंख नम थी, हर चेहरा शांत और हर मन में एक ही भावकृएक ईमानदार दौर अब स्मृति बन गया। सेना के जवानों की सलामी, गूंजते राष्ट्रगान और खंडूड़ी अमर रहें के नारों के बीच जैसे पूरा उत्तराखंड अपने उस जनरल को विदा कर रहा था, जिसने सत्ता में रहकर भी सादगी नहीं छोड़ी। अंतिम यात्रा में बुजुर्गों की आंखों में सम्मान था तो युवाओं के चेहरों पर एक अलग तरह की उदासी। पहाड़ के गांवों से आए कई लोग सिर्फ एक झलक पाने के लिए घंटों खड़े रहे। उनके लिए खंडूड़ी केवल मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि राजनीति में भरोसे और साफ छवि का प्रतीक थे।
उत्तराखंड की राजनीति में अक्सर यह कहा जाता रहा कि खंडूड़ी हैं जरूरी। यह केवल चुनावी नारा नहीं था, बल्कि उस जनविश्वास की अभिव्यक्ति थी जो उन्होंने अपने व्यवहार और निर्णयों से अर्जित किया। राजनीति के शोर और आरोपों के बीच भी उनकी छवि एक सख्त लेकिन ईमानदार प्रशासक की बनी रही। सेना से राजनीति तक का उनका सफर भी असाधारण रहा। फौजी अनुशासन उनके व्यक्तित्व में अंतिम समय तक दिखाई देता रहा। शायद यही कारण था कि उनकी अंतिम यात्रा में केवल राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि आम लोग, पूर्व सैनिक, युवा और कर्मचारी वर्ग भी बड़ी संख्या में मौजूद रहा।
हरिद्वार में गंगा की लहरों की कलकल के बीच जब उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी गई, तो मानो पहाड़ का एक रक्षक हमेशा के लिए सो गया। अंतिम यात्रा देहरादून से शुरू होकर जैसे-जैसे आगे बढ़ी, सड़क के दोनों ओर हजारों की संख्या में लोग हाथ जोड़े, आंखों में आंसू लिए खड़े थे। पवित्र गंगा घाट पर जब सेना के बिगुल ने अंतिम शोक धुन बजाई, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें छलक उठीं। मातमी धुन के बीच सेना के जवानों ने हवा में गोलियां दागकर अपने पूर्व जनरल को अंतिम सलामी दी।
जब चिता की लपटें उठीं तो कई आंखें भर आईं। ऐसा लगा जैसे उत्तराखंड की राजनीति का एक सादा, शांत और विश्वसनीय अध्याय धीरे-धीरे धुएं में बदलकर इतिहास का हिस्सा बन रहा हो। समय आगे बढ़ जाएगा, नई सरकारें आएंगी, नए चेहरे भी उभरेंगे, लेकिन पहाड़ की राजनीति में ईमानदारी, सादगी और अनुशासन की चर्चा जब भी होगी, जनरल खंडूड़ी का नाम उसी सम्मान के साथ लिया जाएगा जैसे आज उनकी अंतिम यात्रा में हर जुबान पर था। गंगा मां की गोद में विलीन हुए इस पहाड़ के गौरव को पूरा देश और उत्तराखंड हमेशा कृतज्ञ भाव से याद रखेगा।
अंतिम सलाम, मेजर जनरल! आपकी कमी हमेशा खलेगी।
‘सपनों’ की नीलामी पर सिस्टम की ‘खामोशी’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-13
भर्ती घोटाले और भ्रष्टाचार की आग में तपेगा 2027 का चुनावी रण
क्रासर
---पेपर लीक, नियुक्तियों पर सवाल और सिस्टम पर अविश्वास
---युवाओं की नाराजगी क्या बदल देगी राजनीति का समीकरण
---उत्तराखंड राज्य की राजनीति के लिए यह चेतावनी का समय
---इतिहास गवाह हैकृजब-जब भरोसा टूटा तब सरकारें ही बदली
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक विकास, पलायन, सड़क और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही, लेकिन अब प्रदेश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता था। उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में सरकारी नौकरी सिर्फ रोजगार नहीं होती, वह परिवार की आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और स्थिर भविष्य का प्रतीक होती है। पहाड़ के गांवों से निकलने वाला युवा सीमित संसाधनों के बावजूद दिन-रात तैयारी करता है। माता-पिता खेत बेचकर और कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। लेकिन जब परीक्षाओं के पेपर बाजार में बिकने लगें, नियुक्तियों पर सवाल उठने लगें और मेहनत की जगह सिस्टम की चर्चा होने लगे, तब सबसे पहले भरोसा मरता है।
यही कारण है कि भर्ती घोटाले उत्तराखंड में केवल कानूनी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गए हैं। यह अब भावनात्मक और राजनीतिक संकट बन चुका है। युवाओं के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि सत्ता और व्यवस्था उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। यही आक्रोश आने वाले विधानसभा चुनावों में निर्णायक रूप ले सकता है।
प्रदेश में पटवारी भर्ती, पुलिस भर्ती, विधानसभा भर्ती और विभिन्न आयोगों की परीक्षाओं को लेकर उठे विवादों ने सरकार और व्यवस्था दोनों की साख को झटका दिया। कई परीक्षाएं रद्द हुईं, गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन युवाओं के मन में बैठा अविश्वास अभी खत्म नहीं हुआ है। गांवों में चौपालों से लेकर शहरों के कोचिंग सेंटरों तक एक ही चर्चा सुनाई देती हैकृक्या मेहनत करने वालों को सच में न्याय मिलेगा?
राजनीतिक दल भी अब इस मुद्दे की गंभीरता को समझने लगे हैं। विपक्ष लगातार सरकार को भर्ती माफिया और सिस्टम में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेर रहा है, जबकि सत्तापक्ष कार्रवाई और सख्त कानूनों का हवाला देकर खुद को जवाबदेह साबित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन चुनावी राजनीति में धारणा अक्सर तथ्यों से ज्यादा असर डालती है और यही चिंता सत्ता पक्ष के भीतर भी दिखाई देने लगी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और परिवार की आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा माध्यम मानी जाती है। ऐसे में भर्ती प्रक्रियाओं पर उठे सवाल सीधे लाखों युवाओं और उनके परिवारों की भावनाओं से जुड़ जाते हैं। यही कारण है कि यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और राजनीतिक रूप ले चुका है।
पहाड़ के दूरस्थ गांवों में रहने वाले युवाओं का दर्द और भी गहरा है। सीमित संसाधनों के बीच वर्षों तक तैयारी करने वाले युवाओं को जब पेपर लीक या भ्रष्टाचार की खबरें सुनाई देती हैं तो उनके भीतर व्यवस्था के प्रति निराशा और गुस्सा दोनों बढ़ता है। कई युवा इसे पलायन और टूटते भरोसे की सबसे बड़ी वजह भी मानने लगे हैं।
2027 का चुनाव केवल सड़कों, बिजली और विकास योजनाओं तक सीमित नहीं रहने वाला। इस बार युवाओं का सवाल सीधा होगाकृनौकरी मिलेगी या सिर्फ आश्वासन? राजनीतिक दलों के भाषणों में राष्ट्रवाद, विकास और योजनाओं के साथ-साथ भर्ती घोटालों और भ्रष्टाचार का मुद्दा भी पूरी ताकत से गूंजेगा।
उत्तराखंड की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब युवाओं का आक्रोश सत्ता के लिए चुनौती बना हो, लेकिन इस बार मामला केवल बेरोजगारी का नहीं, बल्कि भरोसे के टूटने का भी है। और लोकतंत्र में जब भरोसा टूटता है, तब चुनाव केवल सत्ता बदलने का नहीं, व्यवस्था को जवाब देने का माध्यम बन जाता है।
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सिस्टम की साख पर लगा बट्टा
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की नींव में यह सोच थी कि यहाँ के संसाधनों पर यहाँ के युवाओं का हक होगा। लेकिन हालिया वर्षों में यूकेएसएसएससी से लेकर लोक सेवा आयोग तक की परीक्षाओं में जो कुछ देखने को मिला, उसने पूरे सिस्टम की साख पर बट्टा लगा दिया है। जब परीक्षा से ठीक पहली रात को पेपर लाखों रुपयों में बिक जाता है, तो वह केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं बिकता, बल्कि उस गरीब मां-बाप की उम्मीदें नीलाम होती हैं जिन्होंने पेट काटकर अपने बच्चे को पढ़ाया होता है। अखबारों की सुर्खियां गवाह हैं कि जांचें हुईं, गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन युवाओं के मन में यह सवाल आज भी जस का तस हैकृ क्या इस खेल के असली मगरमच्छ कभी पकड़े जाएंगे?
बिकाऊ तंत्र के आगे बेबस युवा
उत्तराखंड के गठन के ढाई दशक बाद भी अगर युवाओं को योग्यता के बजाय सिफारिश और पैसों के दम पर नौकरियां मिलने का डर सताए, तो यह पूरे नीतिगत ढांचे की विफलता है। 2027 का चुनाव यह तय नहीं करेगा कि कौन सी पार्टी जीतेगी, बल्कि यह तय करेगा कि क्या उत्तराखंड का युवा अब भी बिकाऊ तंत्र के आगे बेबस रहेगा या फिर अपने वोट की चोट से एक नया, पारदर्शी और जवाबदेह उत्तराखंड लिखेगा। पहाड़ की जवानी अब चुप रहने के मूड में नहीं है, और यही इस बार के लोकतंत्र के महापर्व का सबसे बड़ा सच है।
राजकीय शोक के बीच ‘जश्न के सुर’
पूर्व सीएम मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी के निधन पर पूरे प्रदेश में तीन दिन का राजकीय शोक
देहरादून के निजी संस्थानों में कार्यक्रमों और उत्सवों की तस्वीरें सवाल खड़े कर रही
यक्ष प्रश्न क्या निजी संस्थानों पर लागू नहीं होते सरकारी संवेदनाओं के कोई भी नियम
देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ जननेता मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी के निधन पर प्रदेश सरकार ने तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। सरकारी भवनों पर झंडे झुके हैं, कई सरकारी कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए हैं और राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर शोक की भावना व्यक्त की जा रही है। लेकिन इसी बीच कुछ निजी शिक्षण संस्थानों में चल रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आयोजनों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
दून स्थित डीआईटी जैसे बड़े संस्थानों में कथित तौर पर सामान्य गतिविधियों और आयोजनों की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब पूरा प्रदेश राजकीय शोक में है तो क्या ऐसे संस्थानों पर संवेदनशीलता और सरकारी निर्देश लागू नहीं होते? क्या निजी संस्थानों के लिए नियम और परंपराएं अलग हैं?
राजकीय शोक केवल औपचारिक सरकारी आदेश नहीं होता, बल्कि वह समाज की सामूहिक संवेदना और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। खासकर जब बात ऐसे व्यक्ति की हो जिसने सेना और राजनीति दोनों में प्रदेश की पहचान बनाई हो। ऐसे समय में बड़े आयोजनों, उत्सवों और मनोरंजन कार्यक्रमों को सीमित करना सामाजिक मर्यादा का हिस्सा माना जाता रहा है। यही कारण है कि अब लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या प्रशासन ने निजी संस्थानों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे? और यदि किए थे तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ? यदि निर्देश जारी नहीं हुए तो यह भी प्रशासनिक गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।
शिक्षा संस्थानों को केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों और संवेदनशीलता का माध्यम भी माना जाता है। ऐसे में यदि राजकीय शोक के दौरान भी सामान्य उत्सव और मंचीय कार्यक्रम जारी रहें, तो यह नई पीढ़ी के सामने किस तरह का संदेश प्रस्तुत करता हैकृयह भी विचार का विषय बन गया है।
अब निगाहें सरकार और प्रशासन पर टिक गई हैं। प्रदेश में कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने मांग उठाई है कि मामले का संज्ञान लिया जाए और स्पष्ट किया जाए कि राजकीय शोक के दौरान निजी संस्थानों की क्या जिम्मेदारी तय होती है। क्योंकि सवाल केवल एक कार्यक्रम का नहीं, बल्कि उस संवेदनशीलता का है जो किसी समाज की पहचान बनती है।
कभी ‘गुस्ताखियों’ का इलाज थी ‘कंडाली थेरेपी’
पहाड़ की डांट, दर्द और देसी अनुशासन था कंडाली की छपाक
कान्वेंट के दौर में गुम हुआ पहाड़ का वह पारंपरिक अनुशासन
कंडाली की छपाक बनाती थी फौलाद, अब बदल गया है समय
सजा नहीं थी बल्कि पहाड़ी जीवन के कठोर संस्कारों का हिस्सा
देहरादून। पहले पहाड़ में बच्चे की गुस्ताखियों की एक ही सजा होती थी कंडाली की छपाक। आज पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं और जो बच्चे शहरों के कान्वेंट स्कूलों में पढ़ रहे हैं वह बच्चे प्राचीन कंडाली थेरेपी से कोसों दूर हैं। आज की पीढ़ी के लिए अनुशासन का मतलब मोबाइल छीन लेना या इंटरनेट बंद कर देना है। लेकिन जो लोग 80 या 90 के दशक में पहाड़ के सरकारी स्कूलों और खेतों में पले-बढ़े हैं वह जानते हैं कि कंडाली की उस छपाक ने उन्हें कितना मजबूत बनाया।
मोबाइल पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल कोठियाल की एक रिपोर्ट देखते समय कंडाली की छपाक शब्द आया। खाना खाते समय बेटी भी साथ में बैठी थी, तो बेटी ने तपाक से पूछ लिया कि पापा यह कंडाली की छपाक क्या है। कुछ देर में खुद सकपका गया। मैं पहाड़ में जन्मा और कई बार कंडाली की छपाक लगी है। बेटी के प्रश्न का जवाब देने के लिए भूमिका बनाई और उसे विस्तार से जानकारी दी। उसी के बाद मन में आया कि आज बच्चे मोबाइल पर हैं कही न कही उन्हें यह आर्टिकल घूम फिर कर मिल ही जाएगा और उन्हें कंडाली की छपाक पर विस्तार से पढ़ने को मिलेगा।
बता दें कि उत्तराखंड के गांवों में बचपन कभी केवल खिलौनों और मोबाइल की स्क्रीन में नहीं बीतता था। वहां खेत, जंगल, ढलानें थीं और उन्हीं के बीच जीवन के अपने देसी नियम भी थे और गलती होने परकृकंडाली की छपाक का नियम था। कंडाली यानी बिच्छू घास। पहाड़ के जंगलों और खेतों के किनारों पर उगने वाला यह पौधा जितना साधारण दिखता है, उसका स्पर्श उतना ही तीखा होता है। शरीर पर लगते ही जलन, चुभन और बेचौनी शुरू हो जाती है। लेकिन पहाड़ की पुरानी पीढ़ियों के लिए कंडाली केवल एक पौधा नहीं, बल्कि अनुशासन का देसी हथियार हुआ करती थी।
गांवों में जब बच्चे जरूरत से ज्यादा शरारत कर दें, खेतों में नुकसान कर दें, स्कूल से भाग जाएं या बड़ों की बात न मानें, तब कई घरों में डांट के साथ कंडाली की छपाक भी मिलती थी। बुजुर्ग आज भी मुस्कुराते हुए याद करते हैं कि मां या दादी खेत से ताजी कंडाली तोड़ लाती थीं और बस एक हल्की छपाक पूरे शरीर में बिजली-सी दौड़ा देती थी। उस दर्द में आंसू भी होते थे और डर भी। बच्चे घंटों खुजलाते रहते, लेकिन अगले कुछ दिनों तक गलती दोहराने की हिम्मत नहीं होती थी। पहाड़ के कठिन जीवन में यही देसी अनुशासन थाकृन कोई काउंसलिंग, न लंबी समझाइश, बस कंडाली की एक छपाक और सबक तैयार।
हालांकि आज के नजरिए से देखें तो यह तरीका कठोर लग सकता है, लेकिन उस दौर के सामाजिक और पारिवारिक जीवन में इसे सामान्य माना जाता था। पहाड़ का जीवन संघर्षों से भरा था। खेत, पशु, पानी और जंगल के बीच जीने वाले परिवारों में बच्चों को जल्दी जिम्मेदार बनाना जरूरी समझा जाता था। शायद इसी वजह से अनुशासन के तरीके भी उतने ही सख्त थे।
आज गांव बदल रहे हैं। कच्चे आंगन पक्के हो गए हैं, जंगलों की राहें सूनी पड़ रही हैं और बच्चों के खेल मोबाइल में सिमटते जा रहे हैं। नई पीढ़ी शायद कंडाली की छपाक का मतलब भी ठीक से न समझ पाए। लेकिन पहाड़ के बुजुर्गों की यादों में यह शब्द आज भी एक पूरा बचपन जिंदा कर देता है,कृजहां दर्द भी अपना था और अनुशासन भी देसी।
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सजा, दवा और स्वाद
विज्ञान और पहाड़ की परंपराएं भी अजीब हैं, जिस कंडाली से बच्चे खौफ खाते हैं, वही कंडाली पहाड़ की सबसे पौष्टिक डिश भी है। सर्दियों में बनने वाला कंडाली का साग या भुज्जी न सिर्फ आयरन और विटामिन से भरपूर होता है, बल्कि यह शरीर को गर्म रखने और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने की अचूक दवा भी है। कंडाली का साग आज भी उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों में खास स्थान रखता है। यानी जो पौधा बचपन में सजा देता था, वही बड़े होने पर थाली में स्वाद बनकर लौट आता था।
मंगलवार, 19 मई 2026
उत्तराखंड में ‘चुनावी बिसात’ पर ‘हेल्थकेयर’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-12
विधानसभा चुनाव 2027 में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली भी बनेगा बड़ा राजनीतिक मुद्दा
क्रासर
---उत्तराखंड के पहाड़ों की हकीकत, डाक्टरों की कमी और बंद पड़े अस्पताल
---ईलाज के लिए पहाड़ से मैदान की दौड़ और खर्च बढ़ने से परेशान है आमजन
---बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था पर 2027 में जनता लिख सकती है नया प्रिस्क्रिप्शन
देहरादून। मैदान की चकाचौंध से दूर, राज्य के सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी एक गर्भवती महिला को डोली में बिठाकर अस्पताल ले जाने की तस्वीरें या रेफरल सेंटर बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र महज प्रशासनिक खामी नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन चुके हैं। उत्तराखंड में सड़क, पानी और रोजगार की तरह अब स्वास्थ्य भी पहाड़ के लोगों की सबसे बड़ी चिंता बनता जा रहा है। राज्य के दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी गर्भवती महिलाओं को कई किलोमीटर डोली या निजी वाहनों से अस्पताल पहुंचाना पड़ता है, जबकि गंभीर मरीजों के लिए देहरादून, हल्द्वानी या )षिकेश ही अंतिम उम्मीद बनकर रह गए हैं।
राज्य के अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र वर्षों से डाक्टरों और विशेषज्ञों की कमी से जूझ रहे हैं। कई अस्पतालों में भवन तो खड़े हैं, लेकिन भीतर न डाक्टर हैं, न मशीनें और न ही पर्याप्त स्टाफ। पहाड़ के अनेक इलाकों में स्वास्थ्य केंद्र केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं, जहां मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद सीधे शहर भेज दिया जाता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं की यह कमजोरी केवल इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पलायन पर भी पड़ रहा है, जिन गांवों में स्कूल और अस्पताल कमजोर हैं, वहां से परिवार स्थायी रूप से मैदानों की ओर बसने लगे हैं। पहाड़ का बुजुर्ग और गरीब वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित है, जो आर्थिक अभाव में बड़े शहरों का इलाज नहीं करा पाता।
राजनीतिक दलों ने वर्षों से स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के दावे किए, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी सवालों के घेरे में है। एम्स )षिकेश, मेडिकल कालेजों और हेलीकाप्टर स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बड़ी योजनाओं का प्रचार जरूर हुआ, लेकिन दूरस्थ गांवों तक उनका प्रभाव सीमित नजर आता है। चुनाव नजदीक आते ही अब स्वास्थ्य के नाम पर नई घोषणाओं और वादों की तैयारी शुरू हो चुकी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में स्वास्थ्य माडल मैदानी राज्यों जैसा नहीं हो सकता। यहां मोबाइल हेल्थ यूनिट, टेलीमेडिसिन, पर्वतीय भत्ते के साथ डाक्टरों की स्थायी तैनाती और गांव आधारित स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करना जरूरी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कोरोना काल के बाद से उत्तराखंड के ग्रामीण मतदाताओं में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है। अब लोग केवल सड़क और बिजली पर संतुष्ट नहीं हैं। पलायन कर चुके प्रवासियों का एक बड़ा वर्ग, जो चुनावों में अपने पैतृक गांवों का रुख करता है, वह भी इस मुद्दे को हवा दे रहा है। उनका तर्क है कि अगर पहाड़ों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और अच्छे स्कूल हों, तो लोग अपनी जन्मभूमि छोड़ने को मजबूर नहीं होंगे।
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भाजपा और कांग्रेस के अपने-अपने दावे
चुनावी बिगुल बजने से पहले ही भाजपा और कांग्रेस सहित तमाम क्षेत्रीय दलों ने स्वास्थ्य के मोर्चे पर मोर्चाबंदी शुरू कर दी है। सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार राज्य में आयुष्मान उत्तराखंड योजना की सफलता, दूरदराज के क्षेत्रों में एयर एम्बुलेंस सेवा की शुरुआत और अल्मोड़ा व श्रीनगर जैसे पहाड़ी जिलों में मेडिकल कालेजों की स्थापना को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। सरकार का दावा है कि टेलीमेडिसिन के जरिए उन्होंने डाक्टरों की कमी को पाटने का प्रयास किया है। अगर सब ठीक रहा तो विपक्षी दल इस चुनावी समर में मशीन है पर आपरेटर नहीं, अस्पताल है पर डाक्टर नहीं के नारे के साथ जनता के बीच जा सकते हैं। विपक्ष का आरोप है कि पहाड़ों के जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक में सर्जन, महिला रोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ के पद खाली पड़े हैं। आपातकाल में मरीजों को सीधे देहरादून, )षिकेश या सुशीला तिवारी अस्पताल हल्द्वानी रेफर कर दिया जाता है, जिससे तीमारदारों की जेब और जान दोनों पर बन आती है।
‘घुघुती’ पहाड़ के अकेलेपन की ‘होम्योपैथी’
---पहाड़ के गांवों, लोकगीतों और स्मृतियों में बसी थी कभी घुघुती
---चौत की उदासी और काफल पाको का अमर विरह और घुघुती
---घुघुती एक पक्षी नहीं, पहाड़ की संस्कृति और प्रकृति का प्रतीक
---मोबाइल टावर व कंक्रीट के बीच वजूद की लड़ रही है लड़ाई
देहरादून। पहाड़ की मुंडेरों, बांज के जंगलों और खेतों की मेड़ों पर दिखने वाली यह घुघुती आज भी उत्तराखंड के ग्रामीण जनजीवन की धड़कन बनी हुई है। उत्तराखंड के लोक-जीवन, गीतों और संस्कृति में रचा-बसा घुघुती पक्षी केवल एक जीव नहीं, बल्कि पहाड़ के सीधेपन और एकांत का सबसे बड़ा प्रतीक है।
स्थानीय लोग घुघुती को शुभ और अपनत्व का प्रतीक मानते हैं। लोक मान्यताओं में इसकी आवाज को घर-आंगन की रौनक से जोड़कर देखा जाता रहा है। उत्तराखंड के प्रसि( लोकगीत घुघुती ना बासा में भी इस पक्षी को बेटी, ममता और घर लौटने की भावना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले गांवों में घुघुती की आवाज हर मौसम में सुनाई देती थी, लेकिन अब इसकी संख्या कम होती महसूस हो रही है। जंगलों में बदलाव, बढ़ता शहरीकरण, कंक्रीट के मकान और गांवों से पलायन ने इसके प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित किया है।
घुघुती केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि पहाड़ की स्मृतियों में बसने वाली वह आवाज है, जो लोगों को अपने गांव, बचपन और प्रकृति से जोड़ती है। आधुनिकता के इस दौर में जरूरत केवल विकास की नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक विरासत को बचाने की भी है, जिसने सदियों से पहाड़ की पहचान बनाई है।
अक्सर लोग घुघुती को एक अलग श्रेणी का पक्षी मानते हैं, लेकिन पक्षी वैज्ञानिकों के अनुसार यह पूरी तरह कबूतर वंश का हिस्सा है। आम कबूतरों की तुलना में घुघुती थोड़ी छोटी, पतली और अधिक सुडौल होती है। इसकी गर्दन पर काले और सफेद मोतियों जैसी चित्तियां होती हैं, जो इसे एक खूबसूरत कंठहार जैसा लुक देती हैं। सामान्य कबूतरों की तरह यह झुंड में हुड़दंग नहीं मचाती। घुघुती बेहद शर्मीली, भोली और शांत स्वभाव की होती है। यह अक्सर अकेले या अपने साथी के साथ ही दाना चुगते हुए दिखाई देती है।
उत्तराखंड के सैकड़ों गांव आज पलायन के कारण खाली हो चुके हैं। इन भूतहा गांवों में जहां इंसानों के कदम पड़ने बंद हो गए हैं, वहां आज भी बुजुर्गों के अकेलेपन को पाटने का काम यह घुघुती ही कर रही है। दोपहर में जब यह घुघुती आकर मुंडेर पर बैठती है और अपनी भाषा में गाती है, तो लगता है कोई अपना हालचाल पूछ रहा है। यह हमारे दुखों की गवाह है। आज के कंक्रीट के बढ़ते जंगलों और मोबाइल टावरों के रेडिएशन के दौर में जहां शहरों से गौरैया और कबूतर गायब हो रहे हैं, वहीं पहाड़ की घुघुती अभी भी प्रकृति का संतुलन बनाए हुए है।
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काफल पाको, मैल न चाखो
पहाड़ की लोककथाओं में घुघुती को एक बेटी का रूप माना गया है। चौत-बैशाख के महीने में जब जंगलों में काफल के लाल फल पकते हैं, तो घुघुती की आवाज बदलकर काफल पाको, मैल न चाखो पक गए, पर मैंने नहीं चखे जैसी सुनाई देती है। यह एक मां-बेटी की उस बेबसी की कहानी है, जिसमें एक निर्दाेष बेटी मां के गुस्से का शिकार होकर पक्षी बन गई थी। तब से यह पक्षी पहाड़ की बेटियों के मायके के प्रति प्रेम और विरह का संदेशवाहक बन गया है।
अलविदा ‘जनरल साहब’
पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी का 91 वर्ष की आयु में दून में निधन
लंबे समय से थे बीमार, देहरादून स्थित मैक्स अस्पताल में ली खंडूड़ी ने अंतिम सांस
सैन्य जीवन से लेकर राजनीति तक बेदाग छवि, अनुशासन के लिए जाने गए जनरल
सैन्य अनुशासन से चलाई सरकार, भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया था जीरो टालरेंस
मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी
जन्म-1 अक्टूबर 1934 देहरादून
मृत्यु-19 मई 2026 देहरादून
पैतृक गांव- मरगदना गांव पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का एक स्वर्णिम अध्याय आज शांत हो गया। खंडूड़ी है जरूरी के नारे से जन-जन के हृदय में बसने वाले, पूर्व मुख्यमंत्री और सेना के जांबाज मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी अब हमारे बीच नहीं रहे। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे खंडूड़ी ने आज सुबह देहरादून के मैक्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित देश और राज्य के तमाम दिग्गज नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे एक युग का अंत बताया है।
पौड़ी गढ़वाल की मिट्टी से निकला वह सख्त सैन्य अधिकारी, जिसने राजनीति में भी अनुशासन को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया, आज पहाड़ की स्मृतियों में अमर हो गया। सेना की वर्दी से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक, खंडूड़ी का व्यक्तित्व हमेशा बेदाग छवि और कठोर प्रशासनिक फैसलों के लिए जाना गया। लोग उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि ईमानदार पहाड़ी जनरल के रूप में याद करते रहे। पौड़ी गढ़वाल के मरगदना गांव में जन्में जनरल खंडूड़ी का जन्म 1 अक्टूबर 1934 में हुआ था। शिक्षा देहरादून और अन्य स्थानों पर हुई और आज उन्होंने अंतिम सांस ली।
बता दें कि जनरल खंडूड़ी ने 1954 से 1991 तक सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद जब उन्होंने राजनीति की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर कदम रखा तो उनके पास केवल एक ही अस्त्र था अडिग अनुशासन। चाहे केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सड़क परिवहन मंत्री के रूप में स्वर्णिम चतुर्भुज योजना को रफ्तार देनी हो या उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में भ्रष्टाचार पर लगाम लगानी हो, उन्होंने कभी सि(ांतों से समझौता नहीं किया।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जब राजनीति में भ्रष्टाचार, गुटबाजी और सत्ता संघर्ष की चर्चाएं तेज थीं, तब खंडूड़ी एक ऐसे चेहरे के रूप में उभरे जिन्होंने शासन में पारदर्शिता और सादगी की बात की। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने सड़क, सेना और सीमांत क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दी। पहाड़ के दूरस्थ गांवों तक सड़क पहुंचाने का उनका सपना आज भी कई लोगों की जुबान पर है।
उनकी राजनीतिक शैली भले ही कठोर मानी जाती रही हो, लेकिन पहाड़ का आम आदमी उन्हें भरोसे के प्रतीक के रूप में देखता था। गांवों की चौपालों में अक्सर यह कहा जाता थाकृखंडूड़ी जैसा नेता अब कहां। शायद यही वजह रही कि सत्ता से दूर होने के बाद भी उनके प्रति सम्मान कभी कम नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने प्रदेश को लोकायुक्त बिल जैसा सख्त कानून देने का साहस दिखाया। वह अक्सर कहते थे कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आनी चाहिए। उनकी कार्यशैली में सेना जैसी स्पष्टता थीकृफाइलें रुकती नहीं थीं और भ्रष्टाचार करने वालों के लिए उनके दरबार में कोई जगह नहीं थी। उनकी सादगी का आलम यह था कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी वह प्रोटोकाल की तामझाम से दूर रहना पसंद करते थे।
उनके निधन के साथ उत्तराखंड की राजनीति का वह दौर भी मानो विदा हो गया, जिसमें सि(ांत और सादगी अब भी जिंदा दिखाई देती थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत कई नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक जताया और उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।
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राष्ट्र प्रथम, फिर प्रदेश और अंत में स्वयं
उनके दौर में लाल बत्ती का मोह त्यागने और नौकरशाही पर नकेल कसने की कई कहानियां आज भी सचिवालय की गलियों में सुनी जाती हैं। उनके लिए राष्ट्र प्रथम, फिर प्रदेश और अंत में स्वयं का मंत्र सिर्फ कहने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए था। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ईमानदारी की विरासत और साफ-सुथरी राजनीति का उनका विजन आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा एक मशाल का काम करेगा।
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जनरल खंडूड़ी एक नजर
1954 में कमीशन प्राप्त किया और 1971 के यु( में महत्वपूर्ण भूमिका
आर्मी में रहते हुए अति विशिष्ट सेवा पदक से उन्हें किया गया सम्मानित
1991 में पहली बार सांसद बने और वाजपेयी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे
2007-2009 और 2011-2012 के बीच दो बार प्रदेश की कमान संभाली
भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस और सशक्त लोकायुक्त कानून के प्रणेता
रविवार, 17 मई 2026
‘पहाड़’ के आशियानों से रूठी ‘घन्दूणी’
पत्थर के घर उजड़े, तिबारियां टूटीं तो घन्दूणी ने भी छोड़ दिया आंगन
पहाड़ के गांवों से घन्दूणी के गायब होने के साथ मिट गई बचपन की यादें
देवभूमि के उजड़ते गांवों और रिश्तों की सबसे भावुक दास्तान है घन्दूणी
घन्दूणी का मौन दे रहा पलायन का दंश झेल रहे पहाड़ के गांवों की गवाही
देहरादून। पहाड़ के पारंपरिक पत्थरों वाले मकानों की खोली, लकड़ी की नक्काशीदार खिड़कियां और आंगन में सूखता मडुआ... इन सबके बीच जो एक आवाज पहाड़ के सुबह की पहचान हुआ करती थी, वह थीकृचीं-चीं, चूँ-चूँ। उत्तराखंड की लोकभाषा में जिसे बड़े लाड से घन्दूणी कहा जाता है, यानी हमारी अपनी गौरैया। पहाड़ के गांवों में कभी सुबह की शुरुआत घन्दूणी यानी गौरैया की चहचहाहट से होती थी। पत्थर की छतों और लकड़ी की तिबारियों वाले घरों में फुदकती यह छोटी चिड़िया गांव की रौनक मानी जाती थी। लेकिन अब बदलते पहाड़, तेजी से बढ़ते पलायन और आधुनिक निर्माण शैली के बीच घन्दूणी की आवाज भी धीरे-धीरे खामोश पड़ने लगी है।
पहाड़ के लोकगीतों में गौरैया यानी घन्दूणी को मैत की डाकिया कहा गया है। यह चिड़िया इस बात की गवाह है कि पहाड़ का सौंदर्य सिर्फ बर्फबारी और पहाड़ों की ऊंचाई में नहीं, बल्कि इन आंगनों की जीवंतता में है। आज उत्तराखंड के हजारों गांव आज पलायन की मार झेल रहे हैं। रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग शहरों की ओर जा रहे हैं, जिन आंगनों में कभी बच्चों की किलकारियां और महिलाओं की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है। इसी बदलते माहौल का असर घन्दूणी यानी गौरैया पर भी दिखाई दे रहा है।
मेरे ननिहाल दानकोट गांव के चेतराम बताते हैं कि पहले सुबह होते ही दर्जनों गौरैया आंगन में आती थीं। महिलाएं चावल और झंगोरे के दाने डालती थीं और बच्चे घंटों उन्हें देखते रहते थे। लेकिन अब गांवों में पुराने घर टूट रहे हैं और उनकी जगह सीमेंट के आधुनिक मकान ले रहे हैं। इन मकानों में ना तो लकड़ी के छज्जे बचे हैं और ना ही छोटी दरारें, जहां गौरैया अपने घोंसले बनाया करती थी।
बुडोली रूद्रप्रयाग के मोहन सिंह कहते हैं कि पहले घन्दूणी की आवाज से लगता था गांव जिंदा है। अब कई दिनों तक उसकी चहचहाहट सुनाई नहीं देती। उनके अनुसार गांवों से पहले लोग गए और अब धीरे-धीरे पक्षी भी गायब होने लगे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि गौरैया मानव बस्तियों के साथ रहने वाली चिड़िया है। पुराने पहाड़ी घर, गौशालाएं, खुले आंगन और स्थानीय खेती उसके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते थे। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में जैसे-जैसे गांवों की पारंपरिक संरचना खत्म हो रही है, वैसे-वैसे गौरैया का प्राकृतिक संसार भी सिमटता जा रहा है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि गौरैया का कम होना केवल एक पक्षी का गायब होना नहीं, बल्कि पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना में आए बदलाव का संकेत है। पहाड़ के गांवों से जब इंसानों की रौनक खत्म हुई, तो घन्दूणी की चहचहाहट भी धीरे-धीरे यादों में बदलने लगी है। यदि गांवों में पारंपरिक आंगन, पेड़-पौधे और स्थानीय वातावरण को बचाने की दिशा में प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले समय में गौरैया सिर्फ किताबों और यादों तक सीमित होकर रह जाएगी।
उत्तराखंड के कई गांवों में घर बंद पड़े हैं और आंगन सूने हो चुके हैं। ऐसे में घन्दूणी का गांवों से दूर होना लोगों को भावनात्मक रूप से भी प्रभावित कर रहा है। आज भी कई बुजुर्ग हर सुबह आंगन में कुछ दाने डाल देते हैं। शायद इस उम्मीद में कि कभी फिर घन्दूणी लौटेगी और उसके साथ लौट आएगा पहाड़ का पुराना जीवन, पुरानी गर्माहट और वह खोई हुई रौनक।
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कंक्रीट के जंगल से उजड़ा आशियाना
उत्तराखंड के देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार में तो कंक्रीट के मकानों और मोबाइल टावरों के रेडिएशन ने गौरैया को पहले ही गायब कर दिया था, लेकिन अब पहाड़ के ग्रामीण इलाकों में भी घन्दूणी का वजूद खतरे में है। कहते है कि जब किसी गांव से पलायन होता है और घरों पर ताले लटक जाते हैं, तो वहां खेती बंद हो जाती है। घन्दूणी को इंसानों के बीच रहने और उनके आंगनों से दाना चुगने की आदत होती है। इंसानों के जाते ही यह चिड़ियां भी भूखी मर जाती हैं या वहां से पलायन कर जाती हैं। पहाड़ के पुराने तिबारी वाले मकानों की छतों और कड़ियों के बीच गौरैया आसानी से घोंसला बना लेती थी। अब वहां भी सीमेंट के पक्के लेंटर वाले मकान बन रहे हैं, जिनमें इस नन्हीं चिड़िया के लिए कोई कोना नहीं बचा हुआ है।
पहाड़ में ‘खामोश’ क्रांति की ‘आहट’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-11
विधानसभा चुनाव 2027 में महिला वोट बैंक लिखेगी सत्ता की नई पटकथा
क्रासर
---काफल के पेड़ों से लेकर बांज के जंगलों तक गूंज रही बदलाव की आहट
---पहाड़ का पानी और जवानी ही लिखेगी उत्तराखंड का नया सियासी भविष्य
---देवभूमि की महिलाएं ही विधानसभा चुनाव में बनेगी अनाउंसड किंगमेकर
देहरादून। पहाड़ की वादियों में इन दिनों बर्फ भले ही पिघल रही हो, लेकिन सियासत का पारा चढ़ चुका है। उत्तराखंड की राजनीति में सालों से एक घिसा-पिटा जुमला दोहराया जाता थाकृपहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी यहां के काम नहीं आती। लेकिन इस विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड ने इस जुमले को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया है। नया नैरेटिव कुमाऊं के काफल के पेड़ों से लेकर गढ़वाल के बांज के जंगलों तक गूंज रहा है और एक खामोश क्रांति की आहट सुनाई दे रही है। इस बार देवभूमि की महिलाएं अब सिर्फ साइलेंट वोटर नहीं बल्कि अनाउंसड किंगमेकर की भूमिका निभाएंगी।
मुझे याद है जब पृथक राज्य आंदोलन चल रहा था उस समय हाथ में दरांती, कंडी और भीमल से बनी रस्सी के साथ आंदोलन में अपनी अग्रणी भूमिका निभा रही थी। उसी मातृशक्ति के संघर्ष का परिणाम उत्तराखंड राज्य बना, लेकिन राज्य बनने के बाद वह हाशिये पर चली गई। महिलाओं के उस संघर्ष को सभी ने भुला दिया। उत्तराखंड के गांवों में पुरुषों के पलायन के बाद खेती, पशुपालन, पानी, जंगल और परिवार की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य के हजारों गांव आंशिक या पूर्ण पलायन की मार झेल रहे हैं। ऐसे में गांव बचाने की सबसे बड़ी लड़ाई महिलाएं ही लड़ रही हैं। महंगाई, गैस सिलेंडर, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और शराब के खिलाफ आंदोलनों ने महिलाओं के भीतर राजनीतिक चेतना को और तेज किया है।
आज अखबार के पन्नों पर भले ही दावों की चमक हो, लेकिन पहाड़ के गांवों की पगडंडियों पर सन्नाटा और संघर्ष आज भी बरकरार है। गढ़वाल और कुमाऊं के पहाड़ी जिलों में तो महिलाओं की आंखों में उम्मीद के साथ-साथ एक तीखा सवाल भी तैरता दिखता है। पुरुष रोजगार की तलाश में मैदानों का रुख कर चुके हैं। पीछे छूटे गांवों में भूतिया मकानों के बीच अकेली महिलाएं ही खेती, मवेशी, बच्चों की पढ़ाई और बुजुर्गों की दवा का बोझ उठा रही हैं। लेकिन पहाड़ की नीति-नियंताओं ने इन वीरांगनाओं को आज दिन तक दुत्कारा ही है। सरकार लाख दावे कर रही हो, लेकिन यह सच्चाई है कि पहाड़ की वीरांगनाएं आज भी संर्घष कर रही हैं।
दरअसल पहाड़ की महिलाओं का गुस्सा और संघर्ष विधानसभा चुनाव की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहेगा, बल्कि यह महिला विश्वास की लड़ाई भी होगा, जो दल महिलाओं के मुद्दों को सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रखेगा, उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। दिलचस्प बात यह भी है कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार के दौर में महिला मतदाता पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक और मुखर हुई हैं। गांवों की चौपाल से लेकर मोबाइल स्क्रीन तक अब महिलाएं राजनीतिक बहस का हिस्सा बन रही हैं।
हाल ही में संपन्न हुए पंचायत चुनावों के आंकड़ों ने राजनीतिक विश्लेषकों को अपने केलकुलेटर दोबारा उठाने पर मजबूर किया था। बता दें कि राज्य की लगभग 32 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां महिला वोटरों की संख्या या तो पुरुषों से अधिक है, या उनका वोटिंग टर्नआउट पुरुषों को पछाड़ देता है। यही वजह है कि इस बार दिल्ली से लेकर देहरादून तक के रणनीतिकार महिलाओं के आगे नतमस्तक दिख रहे हैं। 2027 की चुनावी बिसात पर महिला अस्मिता और अधिकार सबसे बड़ा मोहरा बनेगा और भाजपा-कांग्रेसकृखुद को महिलाओं का सबसे बड़ा रक्षक साबित करने की होड़ में दिख रहा हैं।
भाजपा जहां महिला वोट बैंक को साधने के लिए उज्ज्वला योजना, लखपति दीदी, स्वयं सहायता समूह और महिला सशक्तिकरण योजनाओं को बड़ा हथियार बनाएगी। सरकार का दावा है कि राज्य में लाखों महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा गया है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी बढ़ी है। वहीं कांग्रेस भी खुद को महिलाओं का सबसे बड़ा हितैषी बना रही है।
शनिवार, 16 मई 2026
डिग्रियां ‘हाथ’ में और ‘नौकरियां हवा’ में
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-10
विधानसभा चुनाव 2027 के महासमर में बेरोजगारी बन सकता है गेमचेंजर
क्रासर
---पलायन और खाली होते गांवों के बीच रोजगार का मुद्दा रहेगा मुखर
---पेपर लीक और भर्ती घोटालों की टीस युवाओं के दिलों में है जिंदा
---इस बार चुनावी मंचों पर विकास से ज्यादा रोजगार पर होगी बहस
---प्रदेश में सरकारी भर्तियों की धीमी रफ्तार से युवाओं में है नाराजगी
देहरादून। पहाड़ के गांवों से लेकर शहरों तक युवा रोजगार और भविष्य को लेकर बेचौन हैं। सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या, भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक जैसी घटनाओं और निजी क्षेत्र में अवसरों की कमी ने युवाओं के भीतर गहरी नाराजगी है। विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राज्य में सियासी पारा चढ़ने लगा है। 70 विधानसभा सीटों वाले इस पर्वतीय राज्य में सत्ता की चाबी इस बार किस करवट बैठेगी, इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों ने गुणा-भाग भी शुरू कर दिया है। लेकिन इन सबके बीच धरातल पर एक ऐसा मुद्दा है, जो इस बार पारंपरिक पहाड़ बनाम मैदान या जातिगत समीकरणों पर भारी पड़ता दिख रहा हैकृवह मुद्दा है बेरोजगारी का।
उत्तराखंड के सियासी गलियारों से लेकर चाय की दुकानों और युवाओं के चौपालों तक इस बात की गूंज साफ सुनाई दे रही है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में रोजगार के वादों और दावों पर ही लड़ा जाएगा। राज्य गठन के ढाई दशक बाद भी पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी का यहां के काम न आना एक स्थायी दर्द बन चुका है। रोजगार की तलाश में मैदानी इलाकों और दूसरे राज्यों का रुख करते युवा आज भी उत्तराखंड की सबसे बड़ी कड़वी हकीकत हैं। हालांकि सरकार की ओर से स्वरोजगार और होमस्टे जैसी योजनाओं के जरिए युवाओं को रोकने की कोशिशें की गईं, लेकिन धरातल पर उनकी रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं दिख रही है।
पहाड़ी जिलों से लगातार हो रहा पलायन इस बात का गवाह है कि गांवों में युवाओं के पास आजीविका के साधन बेहद सीमित हैं। बीते वर्षों में राज्य ने सरकारी भर्तियों में कई उतार-चढ़ाव और विवाद देखे हैं। यूकेएसएसएससी और लोक सेवा आयोग की कुछ परीक्षाओं में हुए घोटालों और पेपर लीक के मामलों ने प्रदेश के युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया है। हालांकि सरकार ने सख्त नकल विरोधी कानून लागू कर डैमेज कंट्रोल की बड़ी कोशिश की, लेकिन युवाओं के मन में परीक्षाओं के लटकने, समय पर रिजल्ट न आने और नियुक्तियों में देरी को लेकर जो टीस पैदा हुई थी, वह आगामी चुनाव में ईवीएम तक पहुंच सकती है।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल इस मुद्दे को भुनाने में अभी से लग गया हैं। कांग्रेस ने हाल ही में सांगठनिक स्तर पर बदलाव कर युवाओं और बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार रोजगार के आंकड़े केवल कागजों पर दिखा रही है, जबकि हकीकत में लाखों पंजीकृत बेरोजगार कतार में खड़े हैं। विपक्ष इस बार के चुनाव में रोजगार गारंटी, समयब( भर्ती कैलेंडर और खाली पड़े सरकारी पदों को भरने जैसे मुद्दों को अपने घोषणापत्र का मुख्य हिस्सा बना सकता है।
दूसरी ओर सत्तारूढ़ भाजपा इस मोर्चे पर रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रणनीति अपना रही है। सरकार का तर्क है कि पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए देश का सबसे कड़ा नकल विरोधी कानून उत्तराखंड में ही लागू है। इसके अलावा ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के जरिए प्रदेश में आए निवेश, इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और पर्यटन के क्षेत्र में पैदा हो रहे नए अवसरों को सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर सकती है। भाजपा का दावा है कि सरकारी नौकरियों के अलावा निजी क्षेत्र और स्वरोजगार के माध्यम से लाखों युवाओं को आत्मनिर्भर बनाया गया है।
उत्तराखंड में युवा मतदाताओं की संख्या कुल मतदाता वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। यह वह वर्ग है जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है और पारंपरिक राजनीति से इतर सिर्फ नतीजे चाहता है। डिजिटल जनगणना और सीमांकन की आहट के बीच, युवा वर्ग राजनीतिक दलों से ठोस रोडमैप भी मांगेगा और जो भी दल युवाओं को सुरक्षित भविष्य और रोजगार का सबसे विश्वसनीय भरोसा देगा 2027 में सत्ता का रास्ता उसी के लिए साफ होगा। अब देखना यह होगा कि जवानी के दम पर उत्तराखंड की सत्ता हासिल करने का यह ख्वाब किस दल का पूरा होता है और कौन बेरोजगारी के इस चक्रव्यूह में उलझकर रह जाता है।
सूनी चौखटों को ‘अपनों’ का इंतजार
पहाड़ का दर्द
पहाड़ के गांवों के बंद दरवाजों में कैद हैं अधूरी हंसी और सपने
पलायन ने पहाड़ से सिर्फ लोग नहीं, उसकी आत्मा भी छीन ली
रोजगार व बेहतर जिंदगी की तलाश में गांव हो गए हैं आज बूढ़े
खेत बंजर,पगडंडियां सुनसान व बुजुर्ग ताक रही अपनों की राह
देहरादून। पहाड़ की सुबह आज भी उतनी ही खूबसूरत होती है। सूरज की पहली किरण जब सीढ़ीनुमा खेतों पर पड़ती है तो लगता है जैसे प्रकृति ने सोने की चादर बिछा दी हो। हवा में आज भी बुरांश की खुशबू है और पगडंडियों में घास उगी है और आज भी वैसी ही हैं, लेकिन अब उनमें जीवन की आवाज नहीं बची।
कभी जिन गांवों में हर शाम चूल्हों का धुआं उठता था, जहां तिबारियों में बैठकर बुजुर्ग लोकगीत गाते थे, जहां बच्चे खेतों में दौड़ते थे, आज वहां सन्नाटा पसरा है। घरों के दरवाजों पर जंग लगे ताले लटक रहे हैं। कई मकानों की छतें टूट चुकी हैं। दीवारों पर उग आई काई मानो वक्त के बीतने का हिसाब दे रही हो। पलायन ने पहाड़ को धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर दिया है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर भविष्य की तलाश में गांवों के युवा शहरों की तरफ चले गए। पीछे रह गए बूढ़े मां-बाप, सूने आंगन और इंतजार करती आंखें।
उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी इन गांवों में जीवन धड़कता था। सुबह महिलाएं घास और लकड़ी लेने जंगल जाती थीं, पुरुष खेतों में हल चलाते थे, बच्चे स्कूल की पगडंडियों पर दौड़ते थे। शाम होते ही चौपाल सजती थी और तिबारियों में लोकगीत गूंजते थे। अब वही गांव वीरान खड़े हैं। खेतों में झाड़ियां उग आई हैं और पगडंडियों पर अब केवल जंगली जानवरों के निशान दिखते हैं।
रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में पहाड़ का युवा शहरों की ओर चला गया। देहरादून, दिल्ली, हल्द्वानी और चंडीगढ़ जैसे शहरों ने गांवों की रौनक अपने भीतर समेट ली। पीछे रह गए सिर्फ बूढ़े मां-बाप, जिनकी आंखें हर त्योहार पर दरवाजे की ओर टिक जाती हैं। वह आज भी उम्मीद करते हैं कि शायद इस बार बेटा लौट आएगा। शायद इस बार घर में फिर चूल्हा जलेगा। शायद सूनी पड़ी तिबारी में फिर हंसी सुनाई देगी।
पहाड़ के कई गांव अब भूतिया गांव कहलाने लगे हैं। वहां घर तो हैं, लेकिन उनमें जिंदगी नहीं है। टूटी छतों से बरसात टपकती है, दीवारों का पलस्तर झड़ चुका है और बंद कमरों में मकड़ियों ने अपने जाले बुन लिए हैं। ऐसा लगता है मानो घर भी अपने लोगों के लौटने की राह देखते-देखते थक गए हों। विडंबना यह है कि जिस पहाड़ ने देश को सैनिक, शिक्षक, वैज्ञानिक और अधिकारी दिए, वही पहाड़ आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। गांव खाली हो रहे हैं संस्कृति सिमट रही है और लोक परंपराएं धीरे-धीरे यादों में बदलती जा रही हैं।
‘सत्ता’ के आगे झुकी ‘उम्र’
मरोड़ा ग्राम पंचायत की युवा प्रधान और बुजुर्ग के पैर छूने वाली तस्वीर पर छिड़ी बहस
---सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है तस्वीर
---युवा महिला प्रधान पर उठे सवाल, समर्थक आए सामने
---लोकतंत्र, संस्कार व सत्ता के बदलते स्वरूप पर बहस
---मरोड़ा कांड से लिा उत्तराखंड का पालिटिकल सिस्टम
देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में मातृशक्ति और युवा नेतृत्व को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार सामाजिक मर्यादाओं और व्यवस्था के अंतर्विरोधों को उजागर कर देती है। हाल ही में पौड़ी गढ़वाल जिले की मरोड़ा ग्राम पंचायत से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया से लेकर पहाड़ के राजनीतिक गलियारों तक एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
बता दें कि उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की मरोड़ा ग्राम पंचायत इन दिनों अचानक चर्चा के केंद्र में आ गई है। वजह बनी एक वायरल तस्वीर, जिसमें ग्राम पंचायत की युवा महिला प्रधान वीरा रावत कुर्सी पर बैठी नजर आ रही हैं, जबकि उनके सामने दादा की उम्र का एक बुजुर्ग व्यक्ति झुककर उनके पैर छूता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि मरोड़ा ग्राम पंचायत की युवा और पढ़ी-लिखी प्रधान वीरा रावत के पास गाँव के ही एक बुजुर्ग व्यक्ति किसी सरकारी काम या दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराने पहुंचे थे। प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आई जानकारी के अनुसार इस दौरान एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जहां बुजुर्ग व्यक्ति ने युवा महिला प्रधान के पैर छुए। इस घटना की तस्वीर और जानकारी जैसे ही सामने आई, यह पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई।
पहाड़ में जहां गाँव की बेटियों को पूजने और बड़ों से आशीर्वाद लेने की अटूट परंपरा है, वहां एक दादा की उम्र के बुजुर्ग द्वारा युवा प्रधान के पैर छूने की घटना ने लोगों को दो पक्षों में बांट दिया है। हालांकि इस मामले में कुछ लोग महिला प्रधान वीरा रावत के समर्थन में भी सामने आए हैं। उनका कहना है कि तस्वीर को एकतरफा तरीके से देखा जा रहा है। संभव है कि बुजुर्ग व्यक्ति ने स्वेच्छा से प्रधान पद का सम्मान करने के लिए ऐसा किया हो। समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में चुने गए जनप्रतिनिधि का सम्मान करना गलत नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन सवाल केवल सम्मान का नहीं, बल्कि उस सामाजिक संदेश का भी है जो ऐसी तस्वीरें समाज में छोड़ती हैं। पंचायत व्यवस्था को गांवों की सबसे संवेदनशील लोकतांत्रिक इकाई माना जाता है, जहां प्रधान को जनसेवक की भूमिका में देखा जाता है। ऐसे में जब सत्ता और पद को लेकर दिखावे की तस्वीरें सामने आती हैं, तो लोगों के मन में असहजता पैदा होना स्वाभाविक माना जा रहा है।
यह विवाद महिला नेतृत्व को लेकर भी नई चर्चा खड़ी कर रहा है। कुछ लोग इसे महिला प्रधान को अनावश्यक रूप से निशाना बनाने की कोशिश बता रहे हैं। उनका कहना है कि यदि यही तस्वीर किसी पुरुष प्रधान की होती, तो शायद इतना बड़ा विवाद खड़ा नहीं होता। वहीं दूसरी ओर कई लोग इसे विनम्रता और सामाजिक संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर क्षेत्र के बु(िजीवियों, ग्रामीणों और सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिल रहे हैं। एक पक्ष का मानना है कि यह सम्मान वीरा रावत नामक एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि ग्राम प्रधान के संवैधानिक पद को दिया गया है। जब कोई व्यक्ति किसी प्रशासनिक या संवैधानिक पद पर बैठता है, तो वह व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। कई बार ग्रामीण अपनी अत्यधिक कृकृतज्ञता, काम हो जाने की खुशी या प्रशासनिक औपचारिकता के तहत पद के प्रति अपना सम्मान इस तरह प्रकट करते हैं। लोकतंत्र में पद की एक अपनी गरिमा होती है जो उम्र और जेंडर से ऊपर होती है।
दूसरा पक्ष इस घटना को उत्तराखंड की समृ( सांस्कृतिक परंपराओं के खिलाफ देख रहा है। उत्तराखंड के पहाड़ों में कुमाऊंनी और गढ़वाली संस्कृति के तहत बेटियां और बहुएं हमेशा पूजनीय रही हैं। गाँव के बुजुर्ग हमेशा युवाओं को आशीष देते हैं। आलोचकों का कहना है कि भले ही कोई व्यक्ति कितने ही बड़े पद पर क्यों न बैठ जाए, लेकिन सामाजिक जीवन में उसे अपनी उम्र, मर्यादा और पहाड़ के पारंपरिक संस्कारों का ध्यान रखना चाहिए। यदि बुजुर्ग भावुकतावश पैर छूने भी लगे, तो युवा प्रधान को शालीनता से उन्हें रोकना चाहिए था।
पहाड़ में युवा महिला नेतृत्व का उभरना निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है और वीरा रावत जैसी युवा प्रधानों से क्षेत्र को विकास की बड़ी उम्मीदें हैं। लेकिन इस तरह के मामलों से यह भी सीख मिलती है कि ग्रामीण भारत में सफल नेतृत्व वही माना जाता है, जो प्रशासनिक शक्ति के साथ-साथ लोक-परंपराओं और बुजुर्गों के सम्मान के बीच एक सही संतुलन बनाकर चले। यह मामला इस बात पर आत्ममंथन करने का अवसर देता है कि हम अपनी व्यवस्थाओं को मजबूत करते समय अपनी उन बुनियादी जड़ों और संस्कारों को न भूलें, जो हमारे पहाड़ की असली पहचान हैं।
‘महंगाई डायन खाए जात है’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-9
रसोई से लेकर पेट्रोल पंप तक महंगा, 2027 के विधानसभा चुनाव का बनेगा मुद्दा
---महंगाई की मार से भी तपेगा 2027 का चुनावी रण
---पहाड़ में जेब खाली, चुनाव में भारी पड़ेगी महंगाई
---चुनाव से पहले गैस, राशन और पेट्रोल सब महंगा
देहरादून। ‘महंगाई डायन खाए जात है’ 2010 की फिल्म पीपली लाइव का गाना है, जो महंगाई की मार और आम आदमी की व्यथा को दर्शाता है। आज के दौर में जहां पहले ही महंगाई से लोग परेशान थे। वही पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने का फर्क सभी चीजों पर पडे़गा और यह असर लंबे समय तक रहने वाला है। क्योंकि आमजन की कमाई तो बढ़ी नहीं, लेकिन महंगाई ने अपने पांव इत कदर फैला दिए है कि आमजन के लिए यह परेशानी वाला समय है। यह कहे कि ‘महंगाई डायन खाए जात है’ तो इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। पहाड़ से लेकर मैदान तक जनता जिन मुद्दों से सबसे ज्यादा परेशान है, उनमें महंगाई सबसे ऊपर है। गैस सिलेंडर, खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, पेट्रोल-डीजल और बच्चों की पढ़ाई तक हर चीज की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। ऐसे में आने वाले चुनाव में महंगाई बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।
प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में स्थिति और अधिक गंभीर है। पहाड़ों में पहले ही रोजगार और पलायन की समस्या है, ऊपर से रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ने से लोगों का जीवन मुश्किल होता जा रहा है। गांवों में रहने वाले बुजुर्ग और सीमित आय वाले परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कई जगहों पर लोग कह रहे हैं कि आमदनी नहीं बढ़ी, लेकिन खर्च दोगुना हो गया। शहरी क्षेत्रों में भी महंगाई ने मध्यम वर्ग को परेशान कर रखा है। देहरादून, हल्द्वानी और हरिद्वार जैसे शहरों में किराया, बिजली बिल, स्कूल फीस और राशन का खर्च लगातार बढ़ रहा है। गृहिणियों का कहना है कि पहले जो सामान एक महीने चलता था, अब वही आधे महीने में खत्म हो रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाएगा। कांग्रेस समेत अन्य दल पहले ही महंगाई को लेकर सरकार पर हमला बोल रहे हैं। वहीं सत्ताधारी दल विकास योजनाओं और केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को जनता के सामने रखकर जवाब देने की तैयारी में है।
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रसोई से लेकर खेती तक मार
बीते एक साल में दालों, खाद्य तेल और रसोई गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने मध्यम और गरीब वर्ग की कमर तोड़ दी है। पहाड़ी क्षेत्रों में परिवहन लागत बढ़ने के कारण मैदानी इलाकों की तुलना में सामान 10-15 प्रतिशत महंगा मिल रहा है। प्रदेश के पहाड़ी जिलों में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हैं। सीमित रोजगार, खेती में घटती आय और पलायन के बीच महंगाई ने ग्रामीण परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
चारधाम यात्रा पर दिख रहा असर
वर्तमान में चल रही चारधाम यात्रा के दौरान बढ़ती भीड़ ने स्थानीय मांग को बढ़ा दिया है, जिससे स्थानीय निवासियों के लिए फल, दूध और सब्जियों की कमी और कीमतों में तेजी देखी जा रही है। वैसे भी चारधाम यात्रा का टाइम पीरियड इतना कम होता है कि हर कोई इस समय में अपनी कमाई कम समय में बढ़ाना चाहता है। वही महंगाई की मार से सभी परेशान हैं।
आम आदमी की जेब पर सीधा असर
देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल ईंधन का मुद्दा नहीं रह गई हैं, बल्कि यह आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा सबसे बड़ा आर्थिक सवाल बन चुकी हैं। पेट्रोल-डीजल महंगे होते ही परिवहन खर्च बढ़ता है, जिसका असर सब्जियों, राशन, दूध और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई देता है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में इसका असर और अधिक गंभीर है, क्योंकि यहां परिवहन पूरी तरह सड़क मार्ग पर निर्भर है। महंगे ईंधन के कारण गांव से शहर तक सामान पहुंचाने की लागत बढ़ रही है, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता को उठाना पड़ता है। सरकारें अक्सर अंतरराष्ट्रीय बाजार और टैक्स को वजह बताती हैं, लेकिन जनता को राहत देने के लिए स्थायी नीति की जरूरत महसूस हो रही है। पेट्रोल-डीजल आज केवल वाहन चलाने का साधन नहीं, बल्कि महंगाई की धुरी बन चुका है।
शुक्रवार, 15 मई 2026
कैमरों के सामने ‘बचत’ और पीछे ‘शाही ठाठ’
नई राजनीति
देशभर में पीएम की अपील के बाद मची सादगी की होड़
माननीय व अफसरों का आमजन जैसा दिखने का नया दौर
सोशल मीडिया में समाज में अचानक उपज गई नई लहर
जनता पूछ रहीकृक्या यह असली बचत है या ‘फोटो सेशन’
वैश्विक आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और अनिश्चितताओं के दौर में प्रधानमंत्री मोदी की सादगी और बचत संबंधी अपील के बाद देश की राजनीति में एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है। जैसे ही टीवी पर प्रधानमंत्री ने वैश्विक संकट और मितव्ययिता का आह्वान किया तो सोशल मीडिया पर आर्थिक आपातकाल जैसे हालात हो गए है। माननीय से लेकर छोटे-बडे़ नेता और अधिकारियों को अपनी सादगी और मितव्ययिता का डिजिटल पर प्रदर्शन कर देश में एक अनोखा ट्रेड शुरू हो गया है।
अचानक कई माननीयों को सादगी पसंद आने लगी है, जो नेता कल तक बड़े काफिलों और आलीशान व्यवस्थाओं के बीच दिखाई देते थे, वह अब कैमरों के सामने आम आदमी की तरह नजर आने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरों की बाढ़ आ गई है। ऐसा लगने लगा है मानो देश में अचानक सादगी की प्रतियोगिता शुरू हो गई हो। हालांकि जनता भी अब राजनीति की इस पटकथा को समझने लगी है। लोग पूछ रहे हैं कि यदि सादगी सच में अपनानी है, तो क्या केवल कैमरों के सामने क्यों! क्या सरकारी फिजूलखर्ची, बड़े-बड़े काफिले, वीआईपी संस्कृति पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाएगी?
प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद देशभर में नेताओं-अधिकारियों की जीवनशैली में अचानक बदलाव दिखाई देने लगा है। हर कोई पैदल आफिस जाने और अपना काफिला कम करने की फोटो मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पोस्ट करवा रहा है। भाई पीएम की अपील है और उस पर अमल न हो यह तो हो ही नहीं सकता है। क्योंकि यह तो स्टेसस का सवाल जो है।
अकेले उत्तराखंड की बात करें तो यहां तो प्रिंट मीडिया में सायं को जब खबरों का पोस्टमार्टम होता है उस समय माननीय और अधिकारियों की सिफारिशें कि फला-फला... और संपादक जी से लेकर यूनिट हैड तक की सिफारिश आ रही है। यही नहीं सोशल मीडिया के सभी प्लेफार्मों पर तस्वीरों के साथ कई वीडियों माननीय और अफसरों की तैर रही है। आमजन यह देखकर हैरान है कि आखिर एकदम से ऐसा कैसे हो गया। जबकि आमजन तो सदियों से सादगी से जी रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति में जनसंपर्क और प्रतीकात्मक संदेशों की हमेशा बड़ी भूमिका रही है। स्वच्छता अभियान में झाड़ू लगाना हो या सैनिकों के बीच त्योहार मनानाकृइन संदेशों ने आम जनता पर प्रभाव डाला। अब उसी शैली को दूसरे जनप्रतिनिधि भी अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। अधिकारियों के लिए तो यह मजबूरी बन जाती है। आमजन की इस पर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग नेताओं अधिकारियों के इस बदले व्यवहार को सकारात्मक मान रहे हैं, जबकि कई लोगों का कहना है कि दिखावा है और कुछ नहीं।
गुरुवार, 14 मई 2026
अब ‘जुमले’ नहीं ‘जवाब’ मांगेंगे ‘युवा’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-8
उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव 2027 में रोजगार बन सकता है सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा
क्रासर
---डिग्री और डिजिटल दुनिया के बीच खड़ा युवा चुनाव में कर सकता है कुछ अलग
---विधानसभा चुनाव सियासत समझ पाएगी उत्तराखंड के जागरूक युवाओं की नब्ज
---पहाड़ की जवानी अब अपनी शर्तों पर लिखेगी चुनाव में कामयाबी की ई इबारत
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों की राजनीतिक हलचल तेज होने लगी है। राजनीतिक दल भले ही विकास, सड़क, पर्यटन और धार्मिक आयोजनों को अपनी उपलब्धि बता रहे हों, लेकिन पहाड़ के गांवों और शहरों के युवाओं के मन में सबसे बड़ा सवाल आज भी वही हैकृ रोजगार कहां है? आज युवा की सोच आज के दौर में न केवल बदली है, बल्कि यह अधिक स्पष्ट, व्यावहारिक और तकनीकी रूप से जागरूक हो गई है। युवा परंपराओं का सम्मान तो करता है, लेकिन वह अब केवल हौसले के भरोसे नहीं, बल्कि संसाधनों और अवसरों के साथ आगे बढ़ना चाहता है। आगामी विधानसभा चुनाव में युवाओं की सोच राजनैतिक दलों के लिए परेशानी बन सकती है।
बता दें कि राज्य गठन के 25 साल बाद भी उत्तराखंड का युवा नौकरी के लिए दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर है। ऐसे में माना जा रहा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में रोजगार की कमी सबसे बड़ा और निर्णायक मुद्दा बन सकती है। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में लगातार पलायन बढ़ रहा है। गांवों में खेत सूने हैं, स्कूलों में बच्चों की संख्या घट रही है और युवा रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर जा रहे हैं। कई गांव भूतिया गांव बन चुके हैं, जहां अब केवल बुजुर्ग रह गए हैं।
राज्य सरकारें समय-समय पर स्वरोजगार और स्टार्टअप योजनाओं की बात करती रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का प्रभाव सीमित दिखाई देता है। युवाओं का आरोप है कि सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया बेहद धीमी है और कई बार पेपर लीक जैसी घटनाएं विश्वास को तोड़ देती हैं।
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था लंबे समय से पर्यटन, सेना भर्ती और सरकारी नौकरियों पर निर्भर रही है। लेकिन बदलते दौर में युवाओं की संख्या और अपेक्षाएं दोनों बढ़ी हैं। पहाड़ में उद्योगों की कमी, सीमित निजी निवेश और तकनीकी शिक्षा के बाद अवसरों का अभाव बड़ी चुनौती बना हुआ है। देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर जैसे जिलों में कुछ रोजगार अवसर जरूर बने, लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में हालात अभी भी चिंताजनक हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से विकास और पलायन साथ-साथ चर्चा में रहे हैं। सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क और धार्मिक पर्यटन को विकास का माडल बता रही है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन परियोजनाओं से पहाड़ के युवाओं को स्थायी रोजगार मिलेगा? विश्लेषकों का मानना है कि यदि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन नहीं हुआ, तो पलायन और तेज हो सकता है। आगामी चुनाव में युवाओं और क्षेत्रीय मुद्दों को केंद्र में रखने की तैयारी कर रहा है। यूकेडी ने सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का संकेत दिया है और संगठन में युवाओं को जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। सोशल मीडिया और आनलाइन चर्चाओं में भी रोजगार, पलायन और पहाड़ के खाली होते गांवों को लेकर चिंता साफ दिखाई देती है।
उत्तराखंड में बेरोजगारी दर अक्सर राष्ट्रीय औसत के इर्द-गिर्द या उससे ऊपर बनी रहती है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्टों के अनुसार शिक्षित युवाओं में रोजगार की कमी एक बड़ी चिंता है। रिपोर्ट के अनुसार विधानसभा चुनाव में 2027 में लगभग 15-20 लाख युवा मतदाता निर्णायक भूमिका निभाएंगे। यह वर्ग पार्टियों के पारंपरिक वोट बैंक से हटकर डिलीवरी और जवाबदेही के आधार पर मतदान करने की प्रवृत्ति दिखाएंगे। युवाओं की सोच का परिणाम हम नेपाल चुनाव में देख चुके हैं। हालांकि प्रदेश के राजनैतिक दल भी इस पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं, लेकिन परिणाम क्या होंगे यह तो बाद में ही पता चल पाएगा।
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सरकारी नौकरी असली रोजगार
पहाड़ में सरकारी नौकरी को ही असली रोजगार माना जाता है। पुलिस, शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग में खाली पड़े हजारों पदों को भरना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना और होमस्टे जैसी योजनाओं ने कुछ उम्मीदें जगाई हैं, लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी के कारण यह योजनाएं हर जिले में सफल नहीं हो पाई हैं। पिछले कुछ वर्षों में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और अन्य भर्ती परीक्षाओं में हुए घोटालों ने युवाओं के मनोबल को चोट पहुँचाई है। पेपर लीक और भ्रष्टाचार के मामलों ने सत्ता पक्ष के लिए बचाव की स्थिति पैदा की है, वहीं विपक्ष इसे युवा विरोधी सरकार के रूप में भुनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि सरकार ने देश का सबसे सख्त नकल विरोधी कानून लागू किया है, लेकिन युवाओं के बीच यह सवाल अब भी बरकरार है कि क्या नई भर्तियां समय पर और पारदर्शी तरीके से पूरी होंगी?
दावों की ‘चकाचौंध’ में खो गया ‘विकास’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-7
उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव 2027 में विकास बनेगा सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा
क्रासर
---उत्तराखंड राज्य के विकास का एक बड़ा और कड़वा सच
---स्किल के दावों के बीच खाली हाथ खड़े हैं पहाड़ के युवा
---सुविधाओं की कसौटी पर सरकार को परखेंगे पहाड़ के वोटर
देहरादून। राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के करीब हैं, लेकिन आज भी पहाड़ के लोग सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उत्तराखंड के विकास का एक कड़वा सच यह है कि विकास का सारा केंद्र देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर तक सिमट कर रह गया है। आज भी दूरस्थ जिलों में रेफरल सेंटर बने अस्पताल और शिक्षकों की कमी से जूझते स्कूल विकास के दावों पर सवाल खड़े करते हैं। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही एक बार फिर विकास को लेकर बहस शुरू हो गई है और आगामी चुनाव में यह सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभर सकता है।
राजनीतिक दल अपने-अपने विकास के दावे कर रहे हैं, लेकिन जनता अब आंकड़ों से ज्यादा जमीनी हकीकत देखना चाहती है। गांव खाली हो रहे हैं, युवाओं का पलायन जारी है और पहाड़ की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर उत्तराखंड का विकास किस दिशा में जा रहा है?
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में पलायन आज भी सबसे गंभीर समस्या बना हुआ है। हजारों गांव आंशिक या पूर्ण रूप से खाली हो चुके हैं। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण युवा शहरों की ओर जा रहे हैं। गांवों में केवल बुजुर्ग और महिलाएं बची हैं। चुनावी सभाओं में राजनीतिक दल रोजगार सृजन और स्थानीय उद्योगों की बात तो करते हैं, लेकिन जमीन पर हालात अब भी चिंताजनक हैं। पहाड़ के लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर राज्य बनने के बाद भी रोजगार के लिए युवाओं को दिल्ली, चंडीगढ़ और देहरादून क्यों जाना पड़ रहा है? सरकारें सड़क निर्माण और कनेक्टिविटी को अपनी उपलब्धि बताती रही हैं, लेकिन कई दूरस्थ गांव आज भी बेहतर सड़क सुविधा से वंचित हैं। बरसात में सड़कें टूट जाती हैं और कई गांवों का संपर्क कट जाता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चुनावी बहस के केंद्र में है। पहाड़ी जिलों में डाक्टरों और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र केवल नाम के सहारे चल रहे हैं। गंभीर मरीजों को घंटों सफर कर बड़े शहरों तक पहुंचना पड़ता है।
सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या और शिक्षकों की कमी भी बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। कई स्कूल बंद होने की कगार पर हैं। उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थानों की कमी के कारण युवाओं को राज्य से बाहर जाना पड़ता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और भर्ती घोटालों ने युवाओं में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ाई है। बेरोजगार युवा अब चुनाव में जवाब मांगने की तैयारी में हैं। सरकारें चारधाम यात्रा, धार्मिक कारिडोर और पर्यटन परियोजनाओं को विकास का चेहरा बता रही हैं। केदारनाथ, बदरीनाथ और अन्य धार्मिक स्थलों पर बड़े स्तर पर निर्माण कार्य हुए हैं। लेकिन विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या विकास केवल पर्यटन केंद्रों तक सीमित रह गया है? स्थानीय लोग चाहते हैं कि पर्यटन से गांवों को भी सीधा लाभ मिले, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले और पारंपरिक संस्कृति को भी संरक्षण मिले। विकास की बहस के साथ भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा भी तेजी से उभर रहा है। पहाड़ में जमीनों की खरीद और बाहरी निवेश को लेकर लोगों में चिंता है। कई सामाजिक संगठन मजबूत भू-कानून की मांग कर रहे हैं। राजनीतिक दल इस मुद्दे को विकास और जनसंख्या संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि चुनाव के करीब आते-आते यह मुद्दा और अधिक गर्माएगा। राज्य में विकास को लेकर सबसे बड़ा आरोप क्षेत्रीय असंतुलन का है। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और हल्द्वानी जैसे क्षेत्रों में तेजी से विकास हुआ, जबकि कई पहाड़ी जिले अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विपक्ष सरकार पर मैदान केंद्रित विकास का आरोप लगा रहा है, जबकि सत्ता पक्ष का दावा है कि दूरस्थ क्षेत्रों तक योजनाएं पहुंचाई जा रही हैं।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2027 के चुनाव में केवल हिंदुत्व या राष्ट्रीय मुद्दे नहीं, बल्कि स्थानीय विकास, रोजगार, पलायन, भू-कानून और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे निर्णायक भूमिका निभाएंगे। पहाड़ की खामोश होती बस्तियां, खाली होते खेत और नौकरी की तलाश में भटकता युवा आने वाले चुनाव की दिशा तय कर सकते हैं।
‘अधूरे वादों’ पर सियासत 25 साल से ‘मौन’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-6
पहाड़ के उजड़ते गांवों की पीड़ा पर सजेगी विधानसभा 2027 की चुनावी बिसात
क्रासर
---पर्वतीय जिलों से लगातार बढ़ रहा पलायन राजनीतिक दलों के लिए बड़ी चुनौती
---सरकारी नौकरियों की कमी और भर्ती विवादों से युवाओं में बढ़ी है नाराजगी
---सीमांत गांवों से पलायन को लेकर सुरक्षा और विकास दोनों पर उठ रहे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। राज्य की राजनीति में पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी हमेशा से केंद्र में रहे हैं। पहाड़ों के खाली होते गांव, युवाओं की बेरोजगारी और बेहतर अवसरों की तलाश में मैदानों व दूसरे राज्यों की ओर बढ़ता पलायन अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। राजनीति में अभी तक वादों और सियासत का खेल चलता रहा है, लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव में सियासत के ‘अधूरे वादों’ जो अभी तक मौन साधा है उस पर प्रश्न उठने लाजमी हैं और हो सकता है कि यह सत्ता के खेल में भारी पड़ सकता है।
उत्तराखंड राज्य गठन के समय लोगों ने उम्मीद की थी कि अलग राज्य बनने से पहाड़ों में रोजगार बढ़ेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं सुधरेंगी और गांव आबाद रहेंगे। लेकिन 25 साल बाद भी तस्वीर काफी हद तक उलट दिखाई देती है। राज्य के पर्वतीय जिलोंकृपौड़ी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ सहित अन्य जिलों में पलायन सबसे अधिक हुआ है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि पलायन सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सामरिक चुनौती भी बन गया है। भारत-चीन सीमा से लगे कई गांव लगभग खाली हो चुके हैं। 2024 में सामने आई एक रिपोर्ट में 11 सीमांत गांव पूरी तरह खाली पाए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमांत क्षेत्रों का खाली होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी चिंता का विषय है।
उत्तराखंड का युवा आज सरकारी नौकरी, सेना भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं पर सबसे ज्यादा निर्भर है। लेकिन भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती घोटाले और सीमित अवसरों ने युवाओं में गहरा असंतोष पैदा किया है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक युवाओं का गुस्सा कई बार देखने को मिला है। विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य में उद्योगों की कमी, पर्वतीय क्षेत्रों में निवेश न होना और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का कमजोर होना बेरोजगारी का बड़ा कारण है। पर्यटन और सेना भर्ती पर अत्यधिक निर्भरता भी राज्य की अर्थव्यवस्था को सीमित करती है।
उत्तराखंड के कई गांव अब घोस्ट विलेज कहलाने लगे हैं। गांवों में सिर्फ बंद मकान और सूने आंगन बच गए हैं। खेत बंजर हो रहे हैं और पारंपरिक खेती खत्म होती जा रही है। हालांकि कुछ गांवों ने उम्मीद भी जगाई है। बागेश्वर जिले के खाती और वाछम जैसे गांवों ने पर्यटन, होमस्टे और जड़ी-बूटी आधारित रोजगार के जरिए पलायन को काफी हद तक रोका है। यहां स्थानीय युवाओं ने गांव छोड़ने के बजाय गांव में ही रोजगार के अवसर बनाए। हालांकि सरकार यह भी दावा कर रही है कि हाल के वर्षों में रिवर्स माइग्रेशन यानी गांवों में वापसी का ट्रेंड बढ़ा है। लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि गांव लौटने वालों की संख्या अभी भी बाहर जाने वालों से काफी कम है।
प्रदेश में होने वाले आगामी चुनाव केवल सड़क और बिजली पर नहीं, बल्कि पहाड़ की स्थिरता पर टिके होंगे। यदि सरकारें पहाड़ों में लघु उद्योगों और आईटी क्लस्टर्स को बढ़ावा देने में विफल रहती हैं, तो पलायन का यह आंकड़ा आने वाले समय में उत्तराखंड की जनसांख्यिकी को पूरी तरह बदल सकता है। इससे आने वाले समय में विधानसभा सहित सभी अन्य चुनावों पर भी फर्क पडे़गा और राजनीति पर भी।
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पलायन की स्थिति है चिंताजनक
उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार राज्य में पलायन की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। 2011 से 2022 के बीच राज्य के लगभग 1792 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, जिन्हें अब घोस्ट विलेज कहा जाता है। 2011 में यह संख्या 1034 थी। अल्मोड़ा, पौड़ी गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल से सबसे अधिक पलायन दर्ज किया गया है। पौड़ी जिले में अकेले 1.5 लाख से अधिक लोगों ने अपने घर छोड़े हैं। लगभग 50 प्रतिशत पलायन का मुख्य कारण आजीविका के अवसरों का अभाव है। इसके बाद स्वास्थ्य और शिक्षा का स्थान आता है। पलायन करने वालों में 26 से 35 वर्ष की आयु के युवाओं की संख्या सबसे अधिक है, जो राज्य की उत्पादक शक्ति को कमजोर कर रही है।
मुद्दों में ‘पहाड़’ और रणनीति में ‘मैदान’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-5
उत्तराखंड की सियासत में फिर आमने-सामने होंगे पहाड़ और मैदान
क्रासर
---चुनावी घोषणाओं में पहाड़, लेकिन रणनीति का केंद्र मैदान
---पहाड़ में पलायन, स्वास्थ्य और रोजगार सबसे बड़े सवाल
---मैदान में उद्योग, किसान और कानून व्यवस्था बड़ी चुनौती
देहरादून। 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने उत्तराखंड राज्य की मूल अवधारणा एक पहाड़ी राज्य की थी, लेकिन चुनावी गणित और आर्थिक विकास की धुरी अक्सर मैदानी जिलों की ओर झुकती नजर आती है। यहां भूगोल, संस्कृति, संसाधनों और असमान विकास की एक अलग कहानी है। आगामी विधानसभा चुनाव में एक बार फिर प्रदेश की राजनीति दो बड़े हिस्सोंकृमैदान और पहाड़कृके मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती दिखेगी। मैदान और पर्वतीय क्षेत्रों की जरूरतें अलग हैं, समस्याएं अलग हैं और राजनीतिक प्राथमिकताएं भी अलग हैं।
प्रदेश में 2027 में विधानसभा के चुनाव होने हैं और इस चुनाव में फिर से पहाड़ बनान मैदान का मुद्दा भी राजनैतिक दलों के घोषणा पत्र में होगा। दलों के घोषणा पत्र में बात और मुद्दे पहाड़ के होंगे और राजनीति की बात आएगी तो वह होगी मैदान की। यह सब राज्य बनने से लेकर अभी तक चलता आया है और आगे भी ऐसा ही होगा। उत्तराखंड का मैदानी क्षेत्र आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत माना जाता है। ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार जैसे जिलों में उद्योग, कृषि, व्यापार और बेहतर सड़क नेटवर्क ने विकास की तस्वीर बनाई है। यहां रोजगार, निवेश, बिजली, सिंचाई, कानून व्यवस्था और औद्योगिक नीतियां मुख्य चुनावी मुद्दे बनते हैं।
वहीं दूसरी ओर पहाड़ी जिलों में पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, बंद होते स्कूल, खराब सड़कें, वन्यजीवों का आतंक, खेती का संकट और रोजगार का अभाव सबसे बड़े सवाल हैं। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन दशकों से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। हजारों गांव खाली हो चुके हैं और कई गांव भूतिया गांव कहलाने लगे हैं। चुनावी सभाओं में हर दल पलायन रोकने की बात करता है, लेकिन जमीनी हालात बहुत नहीं बदले। युवाओं का कहना है कि अगर गांव में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं हों तो वह शहरों की ओर क्यों जाएं? यही कारण है कि इस चुनाव में स्वरोजगार, पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था और स्थानीय उत्पादों को बाजार दिलाने जैसे मुद्दे निर्णायक बन सकते हैं।
दूसरी ओर मैदानी क्षेत्र में उद्योगों की बड़ी भूमिका है। यहां बेरोजगारी के साथ-साथ स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देने का मुद्दा तेजी से उठ रहा है। सिडकुल क्षेत्रों में बाहरी राज्यों के श्रमिकों की अधिक संख्या को लेकर स्थानीय युवाओं में नाराजगी भी देखी जाती है। इसके अलावा किसान गन्ना मूल्य भुगतान, सिंचाई व्यवस्था और कृषि लागत को लेकर सरकारों से जवाब मांग रहे हैं। मैदान का मतदाता सड़क, बिजली और व्यापारिक सुविधाओं के आधार पर सरकार का मूल्यांकन करता है।
पर्वतीय क्षेत्रों में भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा तेजी से राजनीतिक रंग ले चुका है। लोगों का एक बड़ा वर्ग हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर सख्त भू-कानून की मांग कर रहा है। उनका तर्क है कि बाहरी निवेश के नाम पर जमीनों की खरीद बढ़ने से स्थानीय पहचान और संसाधनों पर खतरा पैदा हो रहा है। यह मुद्दा पहाड़ में भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, जबकि तराई क्षेत्र में इसे अलग नजरिए से देखा जाता है। यहां व्यापार और निवेश के लिहाज से लोग कठोर नियमों को लेकर मिश्रित राय रखते हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां सड़क और अस्पताल पहुंचना चुनौती बना हुआ है। गर्भवती महिलाओं को डोली में अस्पताल ले जाने की खबरें सरकारों के विकास दावों पर सवाल खड़े करती हैं। दूसरी ओर मैदान में बेहतर सुविधाओं के बावजूद ट्रैफिक, शहरी अव्यवस्था और बढ़ती आबादी चिंता का विषय है। शिक्षा के क्षेत्र में पहाड़ के सरकारी स्कूल लगातार खाली हो रहे हैं, जबकि निजी स्कूलों का दबदबा बढ़ रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं में डाक्टरों की कमी भी बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।
उत्तराखंड का आगामी विधानसभा चुनाव केवल राजनीतिक दलों की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह विकास माडल की भी परीक्षा होगा। सवाल यह है कि क्या प्रदेश का विकास केवल मैदान तक सीमित रहेगा या पहाड़ भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो पाएंगे? चुनावी मंचों पर वादे बहुत होंगे, लेकिन जनता अब नारे नहीं, जमीन पर बदलाव देखना चाहती है।
शहर ‘चमक’ रहे और पहाड़ हो रहे हैं ‘खाली’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे भाग-4
राज्य गठन के 25 साल बाद भी अधूरा है सपना, विकास में पिछड़ा पहाड़
क्रासर
---विकास की असंतुलित राह बन सकती है इस विस चुनाव में चुनौती
---पलायन, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से आमजन नाराज
---सीमांत जिलों में खाली होते गांव, सरकारों के दावों पर उठा रहे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड राज्य स्थापना के ढाई दशक बाद भी पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी का नारा आज भी एक कड़वी हकीकत के रूप में सामने है। आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के बीच विकास में असमानता फिर से एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर उभर सकता है। राज्य के मैदानी जिलों की चमक-धमक और पर्वतीय क्षेत्रों की बुनियादी सुविधाओं के बीच बढ़ती खाई ने नीति-नियंताओं पर सवाल खड़े कर रही हैं।
आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड का विकास मुख्य रूप से तीन मैदानी जिलोंकृदेहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगरकृतक सिमट कर रह गया है। राज्य की जीडीपी में इन तीन जिलों का योगदान 70 प्रतिशत से अधिक है। राजधानी देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्योगों का तेजी से विस्तार हुआ है। वहीं दूसरी ओर पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी और बागेश्वर जैसे पर्वतीय जिलों में आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ रहा है। गांवों से लगातार हो रहा पलायन इस असमान विकास की सबसे बड़ी तस्वीर पेश करता है।
पहाड़ के लोगों का आरोप है कि सरकारें चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे तो करती हैं, लेकिन योजनाओं का अधिकांश लाभ मैदानी क्षेत्रों तक सीमित रह जाता है। रोजगार के अवसर, बेहतर अस्पताल, उच्च शिक्षा संस्थान और उद्योग आज भी पहाड़ों में सपना बने हुए हैं। यही वजह है कि हजारों गांव खाली हो चुके हैं और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
राज्य के सिडकुल क्षेत्रों का विस्तार केवल मैदानों तक सीमित रहा। पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे उद्योगों या फलोद्यान को बढ़ावा देने के लिए वैसी ठोस नीतियां नहीं दिखीं, जो युवाओं को घर पर रोक सकें। पर्यटन के क्षेत्र में भी )षिकेश और नैनीताल जैसे चुनिंदा केंद्रों पर ही दबाव बढ़ रहा है, जबकि दूरस्थ क्षेत्रों के पर्यटन स्थल बुनियादी सुविधाओं के अभाव में गुमनाम हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार मतदाता केवल सड़क के वादे पर वोट नहीं देगा। अब मांग समान विकास की है। इस बढ़ती असमानता ने ही सख्त भू-कानून की मांग को जन्म दिया है, ताकि पहाड़ की संपदा सुरक्षित रह सके। इसके साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों में डिजिटल कनेक्टिविटी और प्रशासनिक सेवाओं की सुगमता एक बड़ा मुद्दा है। मैदानों में खेती के लिए संसाधन हैं, लेकिन पहाड़ों में बंदरों और सुअरों के आतंक के कारण लोग खेती छोड़ रहे हैं, जिससे आर्थिक असमानता और गहरी हो रही है।
राज्य गठन के 25 साल बाद भी पहाड़ और मैदान के बीच विकास की खाई कम होने के बजाय और गहरी होती दिखाई दे रही है। यही कारण है कि आगामी विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 के चुनाव में संतुलित विकास एक बड़ा चुनावी नारा बन सकता है। विपक्ष जहां सरकार को पहाड़ों की अनदेखी का आरोप लगाकर घेरने की तैयारी में है, वहीं सत्ताधारी दल विकास कार्यों की लंबी सूची गिनाकर जनता को साधने की कोशिश करेगा।
‘तीसरी ताकत’ 2027 का असली ‘सस्पेंस’
विस चुनाव 2027 के प्रमुख मुद्दे भाग-3
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पहाड़ की सियासत में तीसरे मोर्चे की आहट
क्रासर
---पहाड़ पर तीसरे की दस्तक, वोटकटवा या बनेगा सत्ता का सारथी
---इस विस चुनाव चलेगी बदलाव की बयार या फिर वही पुरानी राह
---बागी नेता तीसरे मोर्चे से मिले तो कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प
देहरादून। उत्तराखंड की शांत वादियों में 2027 के विधानसभा चुनावों की राजनीतिक तपिश अभी से महसूस होने लगी है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस बार मुकाबला केवल हाथ और कमल के बीच नहीं है, बल्कि परदे के पीछे से सक्रिय तीसरी ताकत और निर्दलीय दिग्गजों ने बड़े दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। उत्तराखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकले कई क्षेत्रीय दल वर्षों से यह दावा करते रहे हैं कि राष्ट्रीय दल पहाड़ के मूल मुद्दों को समझने में असफल रहे हैं। भू-कानून, मूल निवास, पलायन, बेरोजगारी, गैरसैंण, जल-जंगल-जमीन और पहाड़ी अस्मिता जैसे मुद्दों को लेकर समय-समय पर नई राजनीतिक ताकतें सामने आती रही हैं।
अब 2027 से पहल राजनैतिक दल जनता के बीच यह संदेश देने में जुटे हैं कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उत्तराखंड की उम्मीदों को पूरा नहीं किया। यही कारण है कि क्षेत्रीय विकल्प की जमीन बनाने की कोशिश हो रही है। उत्तराखंड में कई सीटें ऐसी हैं, जहां जीत-हार का अंतर बेहद कम रहता है। ऐसे में तीसरा मोर्चा भले सरकार न बना पाए, लेकिन वह हजारों वोट काटकर समीकरण बदल सकता है। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की नजर छोटे दलों और बागी नेताओं की गतिविधियों पर टिकी हुई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर तीसरा मोर्चा कुछ खास क्षेत्रों जैसे कुमाऊं के पर्वतीय इलाके, गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्र या तराई की कुछ सीटों पर प्रभावी हुआ, तो सीधा असर मुख्य दलों की जीत-हार पर पड़ सकता है। उत्तराखंड में तीसरे मोर्चे की सबसे बड़ी चुनौती संगठन और संसाधनों की कमी रही है। चुनाव के समय मुद्दे तो जनता को आकर्षित करते हैं, लेकिन बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क न होने के कारण क्षेत्रीय दल अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं।
इसके अलावा चुनाव आते-आते कई नेता बड़े दलों में शामिल हो जाते हैं, जिससे तीसरे विकल्प की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। यही कारण है कि अब तक प्रदेश में कोई भी क्षेत्रीय शक्ति स्थायी राजनीतिक विकल्प नहीं बन पाई। इस बार परिस्थितियां कुछ अलग भी नजर आ रही हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, पलायन और स्थानीय अधिकारों के मुद्दे युवाओं के बीच चर्चा में हैं। यदि कोई तीसरा मोर्चा इन मुद्दों को मजबूती से उठाता है और साफ नेतृत्व प्रस्तुत करता है, तो उसे युवाओं और नाराज मतदाताओं का समर्थन मिल सकता है।
हालांकि राजनीति के जानकार मानते हैं कि सिर्फ भावनात्मक मुद्दों से चुनाव नहीं जीते जाते। जनता अब स्थिर नेतृत्व और मजबूत संगठन भी चाहती है। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में टिकट वितरण के बाद असंतोष की संभावना रहती है। ऐसे में बागी नेता यदि तीसरे मोर्चे के साथ आते हैं तो कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। पिछले चुनावों में भी बागियों ने कई जगह मुख्य दलों का गणित बिगाड़ा था।
उत्तराखंड में अभी तक तीसरा मोर्चा सत्ता तक नहीं पहुंच पाया है, लेकिन उसने कई बार चुनावी परिणामों को प्रभावित जरूर किया है। 2027 में भी यह फैक्टर महत्वपूर्ण रहने वाला है। यदि क्षेत्रीय दल साझा रणनीति, मजबूत चेहरा और जमीनी संगठन तैयार कर लेते हैं, तो मुकाबला रोचक हो सकता है। लेकिन यदि वह केवल मुद्दों तक सीमित रहे और एकजुटता नहीं दिखा पाए, तो फिर उन पर वोट कटवा होने का आरोप और मजबूत हो जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में तीसरे मोर्चे की हलचल ने भाजपा और कांग्रेस दोनों की चिंता बढ़ा दी है। 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक विकल्प की तलाश का भी चुनाव बनता नजर आएगा।
बाक्स
चेहरों की भीड़
राज्य की 70 विधानसभा सीटों पर नजर डालें तो हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे मैदानी जिलों में बहुजन समाज पार्टी और आप का बढ़ता प्रभाव कांग्रेस के कोर वोट बैंक में सेंध लगा रहा है। वहीं, पहाड़ की सीटों पर उत्तराखंड क्रांति दल मूल निवास और सशक्त भू-कानून के भावनात्मक मुद्दों को लेकर भाजपा के राष्ट्रवाद को चुनौती देने की तैयारी में है। पिछली बार के आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तराखंड में कई सीटें ऐसी थीं जहाँ जीत का अंतर 1000 से 2000 वोटों के बीच रहा। 2027 में वोटकटवा की भूमिका निभाने वाले प्रत्याशी निर्णायक साबित होंगे।
‘माटी’ और ‘मानुष’ पर सियासत
क्रासर
---आगामी विधानसभा चुनाव के रण में होगी पहाड़ का पानी और जवानी अब जमीन पर सियासत
---उत्तराखंड की जमीन और संसाधनों पर पहला हक किसका सवाल 25 सालों से है सियासत में तैर रहा
---सूबे की सियासत को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहे हैं अपणी जमीन-अपणो अधिकार जैसे कई अभियान
देहरादून। उत्तराखंड की शांत वादियों में इस समय राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है। सूबे की राजनीति में एक बार फिर भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा चुनावी केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही पहाड़ में जमीन, पहचान और अधिकार को लेकर बहस तेज हो गई है। राज्य गठन के 25 साल बाद भी यह सवाल जनता के बीच जिंदा है कि आखिर उत्तराखंड की जमीन और संसाधनों पर पहला हक किसका होना चाहिए।
बता दें कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदने के मामलों में तेजी आई है। देहरादून, मसूरी, नैनीताल, )षिकेश और चारधाम मार्ग से जुड़े इलाकों में होटल, रिजार्ट और फार्म हाउस संस्कृति बढ़ने से स्थानीय लोगों के बीच अपनी जमीन और संस्कृति के खत्म होने का डर गहरा रहा है। पहाड़ के निवासियों का मानना है कि 2018 के संशोधनों के बाद बाहरी राज्यों के लोगों ने अंधाधुंध जमीनें खरीदी हैं। जनता की मांग है कि हिमाचल की तर्ज पर उत्तराखंड में भी कृषि भूमि की खरीद पर पूर्ण प्रतिबंध लगे। सरकार ने हाल ही में संशोधनों के जरिए सख्ती दिखाई है, लेकिन आंदोलनकारी शपथ पत्र जैसे प्रावधानों से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि जब तक जमीन नहीं बचेगी, तब तक पहाड़ नहीं बचेगा।
वही प्रदेश में स्थायी निवास बनाम मूल निवास की बहस ने युवाओं को सड़कों पर ला दिया है। आंदोलनकारियों का तर्क है कि 1950 को कट-आफ वर्ष माना जाए, ताकि राज्य के सीमित संसाधनों और नौकरियों पर पहला हक उन लोगों का हो जिनके पूर्वजों ने इस राज्य के लिए संघर्ष किया। यह भावनात्मक मुद्दा सीधे तौर पर राज्य के 70 विधानसभा क्षेत्रों में से पहाड़ी सीटों के नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। राज्य में 2026 के बाद होने वाला संभावित परिसीमन एक और बड़ी चिंता है। जनसंख्या आधारित परिसीमन से पहाड़ों की सीटें घटने और मैदानों की बढ़ने का डर है। ऐसे में भू-कानून और मूल निवास के मुद्दे पहाड़ी अस्मिता को बचाने के आखिरी हथियार के रूप में देखे जा रहे हैं।
राजनीतिक दल भी अब इन मुद्दों की संवेदनशीलता को समझ रहे हैं। सत्ता पक्ष जहां भू-कानून में संशोधन और सख्ती की बात कर रहा है, वहीं विपक्ष सरकार पर केवल आश्वासन देने का आरोप लगा रहा है। क्षेत्रीय दल और छात्र संगठन इसे चुनाव का सबसे बड़ा जनभावनात्मक मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि 2027 का चुनाव केवल सड़क, पानी और बिजली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पहाड़ किसका? जैसे सवाल भी वोट की दिशा तय कर सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे को सबसे ज्यादा समर्थन युवा और महिलाएं दे रही हैं। गांव खाली होने, खेती खत्म होने और संस्कृति के कमजोर पड़ने की चिंता अब पारिवारिक चर्चा का हिस्सा बन चुकी है। सोशल मीडिया पर भी अपणी जमीन-अपणो अधिकार जैसे अभियान तेजी से चल रहे हैं।
उत्तराखंड के चुनाव अब तक दिल्ली के चेहरे और केंद्र की योजनाओं पर लड़े जाते रहे हैं। लेकिन 2027 में पहली बार लोकल का शोर सबसे तेज होगा। सोशल मीडिया से लेकर गांव की चौपालों तक, युवा वोटर पूछेगा कि अगर हमारी जमीन और पहचान ही नहीं रही, तो सड़कों और पुलों का हम क्या करेंगे? आने वाले विधानसभा चुनावों में यह साफ होगा कि राजनीतिक दल इन भावनाओं को केवल नारों तक सीमित रखते हैं या वास्तव में कोई ठोस नीति सामने लाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की सियासत में भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा आने वाले दिनों में और ज्यादा गरमाने वाला है।
रोजगार-भू-कानून बनेगे ‘गेमचेंजर’
क्रासर
---पलायन, पहचान, विकास, महिला शक्ति और संगठनकृपर तय होगी सत्ता की राह
---रोजगार और पलायन, पहाड़ में खाली होते गांवों की बढ़ती चिंता पर होगा फोकस
---उत्तराखंड की अस्मिता, युवाओं के सब्र और नेतृत्व की साख का भी होगा टेस्ट
देहरादून। प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की रणभेदी बजने में अभी समय है, लेकिन इस बार का चुनाव उत्तराखंड की राजनीति अब हर पांच साल में बदलाव के मिथक से आगे निकल चुका है। 2027 का रण केवल विकास के दावों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह राज्य की अस्मिता, युवाओं के सब्र और नेतृत्व की साख का टेस्ट भी होगा। इसके साथ ही इस बार का चुनाव पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर आमजन से जुड़े ठोस सवालों पर केंद्रित होता दिख रहा है। पहाड़ की चुनौतियों, सीमित संसाधनों और बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच मतदाता अब सीधे जवाब चाहता है। राजनीतिक दल भी अपनी रणनीतियों को कुछ मुद्दों के इर्द-गिर्द गढ़ रहे हैं, जो सत्ता का रास्ता तय करेंगे।
आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनैतिक दल अपनी तैयारियों में लगे हैं और हर उस रणनीति को तैयार कर रहे हैं जो सत्ता के लिए सही हो। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो इस बार के विधानसभा चुनाव में राज्य के मूद्दों के ज्यादा हावी रहने के संकेत मिल रहे हैं। वैसे भी विपक्ष और प्रदेश के सबसे पुराने क्षेत्रिय दल यूकेडी के यूथ ब्रिगेड की रणनीति राष्ट्रीय दलों पर भारी पड़ सकती है। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो आगामी विधानसभा चुनाव में इन मुद्दों पर ज्यादा बात होने की संभावना है। इसमें राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन सबसे गंभीर चुनौती बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों और सामाजिक अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि कई गांव आंशिक या पूरी तरह खाली हो चुके हैं। युवाओं के सामने रोजगार के सीमित अवसर, भर्तियों में देरी और निजी क्षेत्र का अभाव उन्हें मैदानों और अन्य राज्यों की ओर धकेल रहा है। कृषि और पारंपरिक व्यवसाय भी अब पहले जैसे सहारा नहीं दे पा रहे।
इसके साथ ही राज्य में सख्त भू-कानून की मांग अब जनआंदोलन का रूप ले चुकी है। स्थानीय लोग बाहरी निवेश और जमीन खरीद पर नियंत्रण की मांग कर रहे हैं। यह मुद्दा सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि पहाड़ की पहचान, संस्कृति और संसाधनों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही मूल निवास का सवाल भी इसी के साथ मजबूती से उभर रहा है। खासतौर पर पर्वतीय सीटों पर यह मुद्दा निर्णायक असर डाल सकता है। क्षेत्रीय दल और सामाजिक संगठन इसे चुनावी केंद्र में ला रहे हैं।
वही दूसरी ओर सत्तारूढ़ पक्ष अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाएगा। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन से जुड़े प्रोजेक्ट्स को प्रमुखता दी जा रही है। चारधाम यात्रा, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और निवेश को सरकार अपनी ताकत के रूप में पेश करेगी। हालांकि, विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है।
2027 का चुनाव यह तय करेगा कि उत्तराखंड अपनी मूल पहचान को बचाने के साथ-साथ आधुनिक विकास की दौड़ में कहां खड़ा है। यह चुनाव केवल नारों का नहीं, बल्कि पहाड़ के स्वाभिमान का होगा। यह सब राजनैतिक दलों को पता है और वह इसके लिए अपनी रणनीति तय करने में लगे हैं,ताकी जनता के बीच जाकर अपने आप को ही हीरो साबित कर सके और चुनाव में वोट अपने पक्ष में डलवा सके, लेकिन राज्य की जनता का असली मूड क्या होगा यह तो आने वाले समय में पता चलेगा।
बाक्स
रोजगार और पलायन, पहाड़ की जवानी का सवाल
भू-कानून और पहचान, सूबे में अस्मिता की लड़ाई
विकास और एंटी-इंकम्बेंसी,10 साल बनाम विकल्प
संगठन व नेतृत्व, चेहरे की चमक बनाम कैडर ताकत
इसके साथ ही महंगाई और अन्य मुद्दे भी होंगे भारी
पड़्याल: पहाड़ की मिट्टी में बसी अपनत्व की मिसाल
एक-दूसरे के खेतों में बिना मजदूरी के मिलकर करते थे सभी लोग काम
रोपाई व कटाई में गूंजते थे लोकगीत, मजबूत होता था सामाजिक रिश्ता
पलायन व बदलती जीवनशैली में खत्म हो गई है पहाड़ की पुरानी परंपरा
देहरादून। पहाड़ में जेठ की तपती दोपहरी हो या सावन की रिमझिम फुहार यहाँ के सीढ़ीदार खेत अकेले आदमी के बस की बात नहीं होते। जब पहाड़ की ऊबड़-खाबड़ ढलानों पर खेती की बात आती है तो यहा कि एक सदियों पुरानी प्रथा पड़्याल जो सामूहिक श्रम, लोक संस्कृति, समानता, पारंपरिक व्यंजन, सामाजिक मजबूती की मिशाल थी। आज के दौर में यह अब एक दिवास्वप्न बन गई है।
कुछ दिनों पहले पहाड़ की यात्रा पर था। खेतों में पानी और तपती दोपहर में खेतों में रौपाई करती कुछ महिलाएं दिखी। लंबे समय बाद पहाड़ जाना हुआ तो मैं भी उन खेतों में चला गया। खेतों में कार्य करती महिलाओं से सवाल-जवाब में पड्याल पर चर्चा की। तो उन्होंने पड़्याल का सरल अर्थ सामूहिक श्रमदान बताया और कहा कि आज यह सब कहां है। पहले जब गांव के किसी एक व्यक्ति के खेत में बुवाई, निराई या कटाई का बड़ा काम होता था, तो पूरा गांव अपनी कुदाल और दराती लेकर उसके खेत में उतर आता है। बदले में कोई पैसा नहीं लिया जाता, बल्कि एक अटूट विश्वास होता है कि आज हम तुम्हारे खेत में हैं, कल तुम हमारे साथ होगे।
महिलाओं ने बताया कि पड़्याल केवल श्रमदान नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज की आत्मा थी। जब किसी परिवार के खेतों में रोपाई, गुड़ाई या कटाई का समय आता, तो गांव के लोग बिना किसी मजदूरी के मदद के लिए पहुंच जाते। बदले में वह परिवार भी दूसरे के खेतों में उसी तरह काम करता। इस परंपरा में न कोई हिसाब था और न कोई सौदा, केवल अपनापन और सहयोग था। रोपाई के दिनों में खेतों से आती महिलाओं की सामूहिक लोकगीतों की आवाजें पूरे गांव को जीवंत कर देती थीं। खेत काम का स्थान कम और मेल-मिलाप का केंद्र ज्यादा लगते थे। कोई पानी पिलाता, कोई बैलों को संभालता और कोई गीत गाते हुए थकान मिटाता। पहाड़ का कठिन जीवन इसी सामूहिक सहयोग से आसान बनता था।
बरसात के दिनों में रोपाई के समय खेतों में महिलाओं के लोकगीत गूंजते थे। पुरुष बैलों और हल के साथ खेत तैयार करते, जबकि महिलाएं कतार में धान रोपती थीं। खेतों में काम के साथ हंसी-मजाक और लोकसंस्कृति भी जीवित रहती थी। उत्तराखंड के पहाड़ों में प्रचलित पड़्याल प्रथा इसी एकजुटता का प्रतीक थी। लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ गई है।
आज के दौर में गांवों से पलायन बढ़ गया है और खेती बंजर होने लगी और आपसी मेलजोल की जगह भागदौड़ वाली जिंदगी ने ले ली। अब खेतों में जहां महिलाएं कार्य करती दिखती हैं वहां सामूहिक गीतों की आवाज कम और सन्नाटा ज्यादा सुनाई देता है। क्योंकि सभी महिलाओं ने अपने-अपने कानों पर मोबाइल की लीड लगाकर चुनके से गीतों का अपने आप आनंद लेती दिखती है। यही कारण है कि आज जब समाज में अकेलापन बढ़ रहा है।
महिलाएं बताती है कि जब पड़्याल जैसी परंपराएं थी उस समय लोगों में आपसी मेल-मिलाप, हसी-ठिठोली और पहाड़ का जीवन जीवंत था, लेकिन आज सब बदल गया है। पहले पहाड़ केवल प्राकृतिक सुंदरता का नाम नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन और आपसी सहयोग की संस्कृति का भी प्रतीक थे और पड्याल परंपरा केवल खेतों में काम करने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि इंसानियत और सामाजिक एकता की मिसाल थी, लेकिन आज वह सब कहा।
बुधवार, 13 मई 2026
‘काफल’ है प्रकृति का ‘अनमोल’ उपहार
उत्तराखंड के पहाड़ों की लाल मिठास और लोकजीवन की धड़कन है काफल
देवभूमि की संस्कृति, लोकगीतों और स्वाद में काफल का एक अलग ही स्थान
उत्तराखंड में 1200 से 2200 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिलता है काफल
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में मिलने वाला काफल प्रकृति का अनमोल उपहार है। यह फल केवल स्वाद नहीं देता, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, लोककथाओं और जीवन शैली को भी जीवित रखता है। काफल की लालिमा में पहाड़ की मिट्टी की महक और लोगों की भावनाएं बसती हैं। मसूरी, नैनीताल और अल्मोड़ा जैसे पर्यटक स्थलों के रास्तों पर काफल बेचते स्थानीय लोग पहाड़ों की जीवंत तस्वीर पेश करते हैं।
उत्तराखंड के पहाड़ केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, बर्फीली चोटियों और देवस्थलों के लिए ही प्रसि( नहीं हैं, बल्कि यहां की वन संपदा और लोक संस्कृति भी पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखती है। इन्हीं पहाड़ी धरोहरों में एक नाम है काफल। लाल-भूरे रंग का यह छोटा सा जंगली फल पहाड़ के लोगों के लिए केवल एक फल नहीं, बल्कि बचपन की याद, लोकगीतों की आत्मा और पहाड़ी जीवन की मिठास है। गर्मियों के मौसम में जब जंगलों में काफल पकता है, तो पहाड़ की वादियां इसकी खुशबू और रंग से जीवंत हो उठती हैं।
काफल हिमालयी क्षेत्रों विशेषकर उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल के पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है। उत्तराखंड में यह लगभग 1200 से 2200 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक मिलता है। इसका पेड़ मध्यम आकार का होता है और फल छोटे-छोटे लाल दानों की तरह दिखाई देते हैं। काफल का स्वाद मीठा और हल्का खट्टापन लिए होता है। यही स्वाद इसे बेहद खास बनाता है। इसे खाने के बाद जो ताजगी महसूस होती है, वह पहाड़ की ठंडी हवा जैसी लगती है।
काफल उत्तराखंड की लोक चेतना का हिस्सा है। एक लोककथा काफल पाको, मैं नी चाखो आज भी हर पहाड़ी की आँखों में आंसू ला देती है। यह कहानी एक माँ और बेटी के निस्वार्थ प्रेम और एक गलतफहमी के कारण हुए दुखद अंत की याद दिलाती है, जिससे काफल का भावनात्मक महत्व और बढ़ जाता है। काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान है। यह मध्यम आकार के पेड़ों पर गुच्छों में उगता है। काफल का स्वाद खट्टा-मीठा और बेहद रसीला होता है। इसे खाने का असली मजा तब है जब इसे सिलबट्टे पर पिसे हुए पहाड़ी नमक के साथ मिलाकर खाया जाए। नमक, मिर्च और सरसों के तेल का मिश्रण जब काफल की मिठास से मिलता है, तो वह स्वाद जुबान पर लंबे समय तक बना रहता है।
गर्मियों के दो महीनों में काफल ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आय का एक बड़ा जरिया बनता है। स्थानीय लोग सुबह-सुबह जंगलों से काफल तोड़ते हैं और फिर उन्हें टोकरियों में भरकर मुख्य सड़कों और बाजारों तक लाते हैं। यह पूरी तरह से प्राकृतिक है, इसलिए इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। काफल को तोड़ना कोई आसान काम नहीं है। इसके पेड़ ऊंचे और अक्सर ढलान वाले जंगलों में होते हैं। ग्रामीण महिलाएं और युवा अपनी जान जोखिम में डालकर इन पेड़ों पर चढ़ते हैं। काफल की शेल्फ-लाइफ बहुत कम होती है, इसलिए इसे तोड़ते ही तुरंत बाजार पहुँचाना पड़ता है।
काफल के पेड़ हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। यह मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और स्थानीय पक्षियों व वन्यजीवों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत हैं। विशेषकर काफल पाको पक्षी की आवाज जंगलों में काफल पकने की सूचना देती है। आज जलवायु परिवर्तन और जंगलों में लगने वाली आग के कारण काफल के पेड़ों पर संकट मंडरा रहा है। बेमौसम बारिश या अत्यधिक गर्मी से इसकी पैदावार प्रभावित हो रही है। इस लाल सोने को बचाने के लिए जंगली प्रजातियों का संरक्षण अनिवार्य है।
बाजार में काफल की लालिमा और आयुर्वेद
पहाड़ों में अप्रैल से जून के बीच काफल पकता है। गांवों के बच्चे सुबह-सुबह जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं। हाथों में छोटी टोकरी या कपड़ा लेकर वह पेड़ों पर चढ़ते हैं और काफल तोड़ते हैं। कई जगह महिलाएं और बच्चे इसे बाजारों में बेचते भी हैं। सड़क किनारे छोटी दुकानों में नमक और मसाले के साथ बिकता काफल यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। गर्मियों में उत्तराखंड के स्थानीय बाजार काफल की लालिमा से भर जाते हैं। आयुर्वेद में काफल को बेहद लाभकारी बताया गया है। इसमें एंटी-आक्सीडेंट्स की भरपूर मात्रा होती है। यह पेट की समस्याओं और कब्ज में रामबाण है। काफल के पेड़ की छाल का उपयोग चर्म रोग और जुकाम की दवा बनाने में होता है। यह फल तनाव कम करने और याददाश्त बढ़ाने में भी सहायक माना जाता है।
लोकजीवन की मिठास है काफल
शहरीकरण और पलायन के दौर में नई पीढ़ी धीरे-धीरे पहाड़ की पारंपरिक चीजों से दूर होती जा रही है। मोबाइल और इंटरनेट के समय में जंगल जाकर काफल तोड़ने की संस्कृति कम होती दिखाई दे रही है। फिर भी जब कोई पहाड़ लौटता है और सड़क किनारे काफल बेचती बुजुर्ग महिला दिखाई देती है, तो बचपन की यादें ताजा हो उठती हैं। काफल केवल फल नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा है। इसमें गांव की खुशबू, जंगल की ठंडक और लोकजीवन की मिठास छिपी है। आज जरूरत है कि काफल जैसे पारंपरिक फलों और वन संपदा को संरक्षित किया जाए। स्कूलों और गांवों में इसके पौधे लगाए जाएं। स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराया जाए और लोगों को इसके महत्व के बारे में जागरूक किया जाए।
मंगलवार, 12 मई 2026
‘तिबारी’ पहाड़ में घरों की ‘आत्मा’
तिबारी बरामदा नहीं, पहाड़ की सामाजिक चौपाल
लकड़ी की नक्काशी में बसती थी पहाड़ की कला
पलायन और आधुनिकता ने छीनी तिबारी की रौनक
देहरादून। उत्तराखंड के पारंपरिक पहाड़ी घर केवल पत्थर, लकड़ी और मिट्टी से बने मकान नहीं होते थे, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, जीवनशैली और सामाजिक रिश्तों की जीवित तस्वीर होते थे। इन्हीं पारंपरिक घरों की सबसे खास पहचान होती थी तिबारी। आज आधुनिकता की दौड़ में तिबारी धीरे-धीरे पहाड़ के घरों से गायब होती जा रही है, लेकिन एक समय ऐसा था जब हर पहाड़ी घर की रौनक और आत्मा तिबारी ही होती थी।
तिबारी पहाड़ी घर का खुला बरामदा या लकड़ी से बना सामने का हिस्सा होता था। इसे घर की ऊपरी मंजिल में बनाया जाता था, जहां से दूर-दूर तक पहाड़, खेत और गांव दिखाई देते थे। लकड़ी की खूबसूरत नक्काशीदार खिड़कियां और मजबूत खंभे इसकी पहचान होते थे। तिबारी केवल बैठने की जगह नहीं थी, बल्कि यह पहाड़ के सामाजिक जीवन का केंद्र हुआ करती थी। यहां परिवार के लोग बैठकर बातें करते, मेहमानों का स्वागत होता, बच्चे खेलते और बुजुर्ग गांव की खबरों पर चर्चा करते थे।
पुराने समय में जब गांवों में टीवी, मोबाइल और इंटरनेट नहीं थे, तब तिबारी ही लोगों के मेलजोल का सबसे बड़ा स्थान होती थी। शाम होते ही गांव के लोग तिबारी में बैठकर लोकगीत गाते, ढोल-दमाऊ की थाप पर सांस्कृतिक चर्चाएं होतीं और गांव के सुख-दुख साझा किए जाते। तिबारी ने पहाड़ की सामूहिक संस्कृति को जीवित रखने में बड़ी भूमिका निभाई। यहां रिश्ते बनते थे, परंपराएं आगे बढ़ती थीं और नई पीढ़ी बुजुर्गों से लोककथाएं और जीवन के अनुभव सुनती थी।
तिबारी केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृदृष्टि से भी बेहद उपयोगी होती थी। पहाड़ की जलवायु को ध्यान में रखकर इसका निर्माण किया जाता था। गर्मियों में यहां ठंडी हवा मिलती थी, जबकि सर्दियों में धूप का आनंद लिया जाता था। लकड़ी और पत्थर से बने यह घर पर्यावरण के अनुकूल होते थे। तिबारी में बड़ी खिड़कियां और खुलापन होने के कारण घर में प्राकृतिक रोशनी और हवा आसानी से आती थी। यह पहाड़ की पारंपरिक वास्तुकला की अनूठी पहचान थी।
समय बदला, सीमेंट के मकान बनने लगे और पहाड़ की पारंपरिक वास्तुकला धीरे-धीरे पीछे छूटने लगी। आज नए घरों में तिबारी की जगह बालकनी और आधुनिक डिजाइन ने ले ली है। पलायन ने भी इस परंपरा को गहरा आघात पहुंचाया। गांव खाली होने लगे और कई पुराने घर खंडहर बन गए, जिन तिबारियों में कभी लोकगीत गूंजते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा दिखाई देता है। तिबारी केवल एक निर्माण शैली नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत है। यह पहाड़ के सामूहिक जीवन, अपनापन और प्रकृति से जुड़े रहने की सोच का प्रतीक रही है। आज जरूरत इस बात की है कि नई पीढ़ी को तिबारी और पारंपरिक पहाड़ी वास्तुकला के महत्व से परिचित कराया जाए। यदि आधुनिक निर्माण में पारंपरिक शैली को जोड़ा जाए, तो यह विरासत फिर से जीवित हो सकती है।
पहाड़ के घरों की तिबारी केवल लकड़ी का बरामदा नहीं थी, बल्कि वह रिश्तों की गर्माहट, संस्कृति की पहचान और प्रकृति से जुड़े जीवन का प्रतीक थी। बदलते समय के साथ भले ही तिबारियां कम होती जा रही हों, लेकिन पहाड़ की यादों और लोकसंस्कृति में उनका स्थान आज भी अमिट है।
बाक्स
---तिबारी के नक्काशीदार खंभों में आज भी बुजुर्गों की यादें और पहाड़ की संस्कृति की महक
---गांव के बुजुर्ग अक्सर दोपहर की धूप सेंकने या गांव की गपशप के लिए बैठते थे तिबारी में
---घर की ध्याण विदा होते समय अक्सर अपनी तिबारी की लकड़ी को छूकर आशीर्वाद लेती थीं।
सोमवार, 11 मई 2026
सूनी बूढ़ी आंखों को ‘लाल’ का इंतजार
शहरों की नींव में दफन हो रहे हैं पहाड़ के गांवों के पुश्तैनी आंगन
रोजगार की तलाश में शहर गए बेटे, गांव में अकेले रह गए मां-बाप
बुजुर्ग आंखें आज भी हर बस और हर कदम में तलाशती हैं अपनों को
आज के दौर में वीडियो काल को बना दिया है डिजिटल आत्मीयता
देहरादून। पहाड़ की ऊंची चोटियों पर जब कोहरा उतरता है, तो पहाड़ के किसी दूरस्थ गांव की एक धुंधली सी खिड़की में एक बूढ़ा चेहरा टकटकी लगाए नीचे सड़क की ओर देखता मिलता है। वह सड़क जो सालों पहले उनके बेटे को साहब बनाने के लिए शहर ले गई थी। आज सड़क तो चकाचक डामर वाली हो गई है, लेकिन उस पर चलने वाले कदम अब गांव की ओर कम और शहर की ओर ज्यादा बढ़ते हैं।
उत्तराखंड के हजारों गांवों की यही कहानी है। पलायन ने सिर्फ गांव खाली नहीं किए, उसने मां-बाप के जीवन से सहारा भी छीन लिया। जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, आज वही हाथ बुढ़ापे में सहारे को तरस रहे हैं। कई बुजुर्ग ऐसे हैं, जिनके बच्चे साल में सिर्फ एक-दो बार गांव आते हैं। पहाड़ में पलायन ने केवल गांव खाली नहीं किए, उसने बुढ़ापे का लाठी भी छीन ली है। आज उत्तराखंड के हजारों बुजुर्ग पहरेदार बनकर रह गए हैं। वह अपनी पुश्तैनी जमीन और खंडहर होते मकानों की रखवाली कर रहे हैं इस उम्मीद में कि शायद किसी मोड़ पर उनका लाल वापस आएगा।
यह पहाड़ की आज की हकीकत है दो बूढ़े चेहरे एक-दूसरे को निहारते हुए रात काट लेते हैं। आज पहाड़ के गांवों में रिश्तों की डोर व्हाट्सएप वीडियो काल पर टिक गई है। रविवार के दिन जब नेटवर्क साथ देता है, तो शहर में बैठा बेटा चंद मिनटों के लिए अपने बच्चों को दादा-दादी का चेहरा दिखाता है। आज के दौर में बीमार मां या पिता को अस्पताल ले जाने के लिए अब बेटा नहीं, बल्कि गांव का कोई पड़ोसी या टैक्सी वाला सहारा बनता है।
आज गांवों तक सड़क पहुँची तो उम्मीद जागी थी कि दूरियां घटेंगी। लेकिन विडंबना देखिए इन्हीं सड़कों पर सवार होकर पहाड़ की जवानी मैदानों की ओर ऐसी उतरी कि फिर मुड़कर वापस नहीं आई। पीछे छूट गए वह बूढ़े मां-बाप जिन्होंने तिनका-तिनका जोड़कर अपने बच्चों को इस काबिल बनाया कि वह शहर जा सकें। आज उन्हीं बच्चों के पास अपने उन माता-पिता के लिए वक्त नहीं है, जिन्होंने अपनी पूरी उम्र पहाड़ की पथरीली खेती और अभावों में काट दी।
रविवार, 10 मई 2026
‘रोते’ पहाड़ की सूनी ‘पगडंडियां’
खाली आंगन, सूने खेत और लौटते कदमों का इंतजार करता पहाड़
पहाड़ के गांवों से शहरों की ओर बहता जीवन, पीछे छूट गया घर-आंगन
देहरादून। पहाड़ की सुबह आज भी उतनी ही खूबसूरत है। सूरज की पहली किरण जब सीढ़ीनुमा खेतों पर पड़ती है, तो लगता है मानो प्रकृति ने सोने की चादर बिछा दी हो। लेकिन आज इस चमक के पीछे एक गहरा सन्नाटा छिपा हैकृवीरान पगडंडियों का सन्नाटा, बंजर खेतों का सन्नाटा और खाली होते गांवों का सन्नाटा। समय का पहिया ऐसा घूमा कि जो रास्ते कभी घर की ओर ले जाते थे, आज वही पलायन की गवाही दे रहे हैं।
गांव के ऊपर वाले खेतों में अब हल की गूँज सुनाई नहीं देती। वह सीढ़ीदार खेत, जिन्हें पुरखों ने अपने पसीने से सींचकर सोना उगाने लायक बनाया था, आज बंजर पड़े हैं। वहां अब मंडुवा और झंगोरा नहीं, बल्कि जंगली घास उग आई है। पहाड़ के बंजर खेत सिर्फ खेती का संकट नहीं हैं, वह टूटते रिश्तों की कहानी भी हैं। जब गांव से युवा गए, तो खेत भी अकेले पड़ गए। पहले जिन खेतों में त्योहारों के गीत गूंजते थे, वहां अब बंदरों और जंगली सूअरों का आतंक है। मेहनत से बोई फसल रातों-रात उजड़ जाती है। धीरे-धीरे लोगों ने खेती छोड़ दी। शाम ढलते ही गांव का सन्नाटा और भारी हो जाता है। बंद घरों पर लगे ताले हवा में हिलते हैं। आंगन सूने हैं, चूल्हों का धुआं गायब है। गांव की बूढ़ी आंखें हर मोड़ पर किसी अपने के लौटने की राह देखती हैं।
पहाड़ के गांवों की वीरान पगडंडियां सिर्फ रास्ते नहीं हैं, बल्कि उन अधूरे सपनों की गवाह हैं जो रोजगार, शिक्षा और बेहतर जिंदगी की तलाश में शहरों की ओर निकल गए। बरसों पहले जिन खेतों में गेहूं और मंडुवा लहलहाता था, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं। बंदरों और जंगली सूअरों ने खेती की बची उम्मीद भी तोड़ दी।
उत्तराखंड के पहाड़ों में आज सबसे बड़ा दर्द सिर्फ पलायन नहीं, बल्कि धीरे-धीरे खत्म होती गांव की आत्मा है। वीरान पगडंडियां और बंजर खेत एक खामोश सवाल बनकर आज खड़े हैं। आज भी हर साल गर्मियों में जब शहरों से कुछ लोग अपने गांव लौटते हैं, तो पगडंडियां फिर थोड़ी देर के लिए मुस्कुराती हैं। बच्चों के कदम पड़ते हैं, घरों के आंगन खुलते हैं और बूढ़ी आंखों में चमक लौट आती है। गांव जैसे फिर से जी उठता हैकृकुछ दिनों के लिए ही सही।
सूबे में चढ़ने लगा ‘सियासी’ पारा
फ्लैग--चुनावी साल में दल-बदल की राजनीति से अटकलों का बाजार गर्माया
चुनाव की घोषणा से पहले दलों की राजनैतिक तैयारी
भाजपा और कांग्रेस में चलने लगा दल-बदल का खेल
अब दिनभर लगने लगी दलों के मुख्यालयों में भारी भीड़
देहरादून। चुनावी साल में दल-बदल आम बात है और यह राजनीति सभी दलों में देखने को मिलती है। प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के इस ‘खेल’ से जहां सियासी पारा चढ़ने लगा है। चुनाव की घोषणा से पहले दलों की राजनैतिक तैयारी का मतलब ‘हम ही हम हैं बाकी सब कम है’ का संदेश होता है।
प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। सत्तारूढ़ भाजपा की तैयारी जहां सभी सीटों पर जीत दर्ज करने की है वही कांग्रेस भी पीछे कहा रहने वाली है। यही कारण है कि दोनों दलों में तोड़फोड़ अभी से शुरू हो चुकी है, जबकि अभी चुनाव की तारीख तक घोषित नहीं हुई है। चुनावी साल है और इस समय किसी भी कमी का मतलब खतरा होता है। शायद यही कारण है कि दोनों दल सक्रिय हो गए है।
राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो चुनाव की घोषणा से पूर्व सभी राजनैतिक दल जनता में यह संदेश देना चाहते है कि उनका दल सबसे अच्छा है। इसी कारण दल-बदल की राजनीति पर दलों का चुनाव से पूर्व जोर रहता है। सूत्रों की माने तो भाजपा और कांग्रेस में तो दल-बदल की राजनीति को एक मिशन के रूप में लिया जाता है। दलों में इसके लिए स्पेशल विंग तैयार की जाती है, जिसका काम सिर्फ दूसरे दल के लोगों को अपने दल में शामिल करवाना होता है।
अकेले भाजपा की बात करें तो भाजपा संगठन और सरकार की उपलब्धियों को लेकर अपनी तैयारी कर रही है। वही दूसरी ओर कांग्रेस सरकार की नाकामी को मुद्दा बनाकर आमजन के बीच जाकर तोड़फोड़ में लगी है। आजकल कोई ऐसा दिन नहीं है जब एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का क्रम जारी न हो। इसके साथ ही राजनैतिक दलों के मुख्यालयों में पार्टी ज्वांइन करने वालों की लंबी लाइनें न लगी हों। हालांकि मतदाता सब समझता है कि चार साल तक जिसे दुत्कारा जा रहा था आजकल एकदम से वह पूज्यनीय कैसे बन गया। चुनावी साल है और इस समय कुछ भी हो सकता है।
कई लोगों ने ली भाजपा की सदस्यता
भाजपा मुख्यालय में ज्वाइनिंग कार्यक्रम में पाटीं के वरिष्ठ नेता एवं बीस सूत्रीय क्रियान्वहन समिति के उपाध्यक्ष ज्योति गैरोला एवं प्रदेश महामंत्री कुंदन परिहार ने कई लोगों को भाजपा की सदस्यता दिलाई।
भाजपा का दामन थामने वालों में पूर्व लेबर डिप्टी कमिश्नर सुरेश आर्य ने कहा कि पूरी सर्विस के दौरान मुझे लोगों की सेवा का अवसर मिला है। सेवानिवृत्ति के बाद भी में सेवा के कामों को आगे बढ़ाना चाहता था, जिसके लिए मुझे सर्वश्रेष्ठ पार्टी भाजपा महसूस हुईई। पीएम मोदी जैसा नेतृत्व और राज्य में धामी जैसे कर्मशील मुख्यमंत्री, हम सबके यहां आने की महत्वपूर्ण वजह है। भाजपा की सदस्यता लेने वालों में नरेश भारद्वाज आकाश पवार, राहुल पाल, रोशन, अंशुल तिवारी, अंकित तिवारी, पीयूष चौहान, सुनील चौहान, बृजेश कुमार, हिमांशु चंद्र, दीपक कुमार, गोपाल राम, कैलाश चंद्र, चयनिका आर्य, प्रियंका आर्य, भावना आर्य, कैलाश कुमार, सुंदर सिंह, गणेश मेहरा, वीरेंद्र कुमार, जीवन सिंह रावत, सरिता आर्या, मीनू आर्य, ज्योति तिवारी, गीता तिवारी, विक्रम सिंह, कुलदीप सिंह, मेजर सिंह, प्रीतम सिंह, कश्मीर सिंह, संजीव चौहान, कुलविंदर सिंह आदि थे।
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