शनिवार, 11 जुलाई 2026

सत्ता की ‘राह’ पर कांग्रेस का नया ‘ब्लूप्रिंट’

आलोचना को छोड़ आंदोलन की राह पर कांग्रेस केसी वेणुगोपाल ने फूंका सक्रियता का बिगुल संगठन से सड़क तक लड़ाई तेज करने की तैयारी राज्यों में जवाबदेही और मुद्दों की राजनीति पर जोर देहरादून। आगामी विधानसभा चुनावों और अगले आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने सत्ता में वापसी के लिए अपनी राजनीतिक रणनीति को नए सिरे से धार देना शुरू कर दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान स्पष्ट संकेत दिए कि कांग्रेस अब केवल सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि संगठन, जनसंपर्क और जनआंदोलनों के जरिए मैदान में उतरकर राजनीतिक बढ़त हासिल करने का प्रयास करेगी। वेणुगोपाल के बयान को कांग्रेस के नए एक्शन प्लान का सार्वजनिक संकेत माना जा रहा है। पार्टी का संदेश साफ है कि चुनावी जीत केवल नारों से नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक मजबूत संगठन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जनता के मुद्दों पर लगातार संघर्ष से ही संभव होगी। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस अब वन साइज फिट्स आल की रणनीति छोड़कर राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप अभियान चलाएगी। जहां स्थानीय मुद्दे प्रभावी हैं, वहां क्षेत्रीय नेतृत्व को आगे रखा जाएगा, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं और संविधान की रक्षा जैसे विषयों को प्रमुखता दी जाएगी। वेणुगोपाल ने संगठनात्मक मजबूती को सबसे बड़ी प्राथमिकता बताते हुए संकेत दिया कि निष्क्रिय इकाइयों की समीक्षा होगी और सक्रिय कार्यकर्ताओं को अधिक जिम्मेदारी दी जाएगी। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि जिला और ब्लाक स्तर तक संगठन चुनावी मोड में दिखाई दे। कांग्रेस नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं को भी साफ संदेश दिया है कि चुनावी वर्ष में केवल पद धारण करना पर्याप्त नहीं होगा, जो नेता और पदाधिकारी जनता के बीच सक्रिय रहेंगे, वही संगठन में आगे बढ़ेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संदेश पार्टी के भीतर अनुशासन और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कांग्रेस मानती है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका जमीनी संगठन है। ऐसे में पार्टी अब उसी मोर्चे पर मुकाबले की तैयारी कर रही है। बूथ प्रबंधन, सोशल मीडिया नेटवर्क, जनसंपर्क अभियान और स्थानीय आंदोलनों को एक साथ जोड़कर चुनावी रणनीति तैयार की जा रही है। वेणुगोपाल ने यह भी संकेत दिया कि विपक्षी दलों के साथ राजनीतिक समन्वय और साझा मुद्दों पर सहयोग की संभावनाओं को भी पूरी तरह नकारा नहीं गया है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस अपनी संगठनात्मक ताकत बढ़ाने पर सबसे अधिक ध्यान दे रही है। कांग्रेस नेतृत्व की चिंता केवल चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि चुनाव जीतने की है। इसी कारण अब पार्टी की बैठकों में भाषणों से अधिक संगठनात्मक समीक्षा, बूथ रिपोर्ट, सदस्यता अभियान और जनसंपर्क कार्यक्रमों पर जोर दिया जा रहा है। पार्टी का प्रयास है कि जनता के बीच यह संदेश जाए कि कांग्रेस विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाय सत्ता का मजबूत विकल्प बनने की तैयारी में है। आगामी विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में कांग्रेस ने विशेष रणनीति बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। स्थानीय नेतृत्व को जनता के बीच अधिक सक्रिय रहने, सरकार को मुद्दों पर घेरने और संगठनात्मक समन्वय मजबूत करने के निर्देश दिए जा रहे हैं। उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी पार्टी सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश में जुटी है।

धामी के ‘हैट्रिक’ के दावे के सामने कांग्रेस ‘ढर्रा’

उत्तराखंड कांग्रेस के सामने संगठन से लेकर नेतृत्व तक की अग्निपरीक्षा नेताओं की ऊर्जा आपसी कलह में नहीं, जनता के बीच दिखनी चाहिए अब संगठन में सक्रियता और जवाबदेही से ही तय होगा नेताओं का कद जमीनी पकड़ और बूथ पर परिणाम देने वालों को ही मिल सकती है तवज्जो देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति इस समय दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए संगठन को फिर से खड़ा करने की चुनौती से जूझ रही है। दिल्ली से मिले संदेश ने प्रदेश कांग्रेस के नेताओं के सामने स्पष्ट कर दिया है कि अब बयानबाजी नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर परिणाम देने होंगे। कांग्रेस महासचिव वेणुगोपाल ने संगठन की सक्रियता और जवाबदेही पर जिस तरह जोर दिया, उसका सीधा असर उत्तराखंड कांग्रेस पर पड़ना तय माना जा रहा है। प्रदेश में लंबे समय से नेतृत्व, गुटीय समीकरण और टिकट की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं चलती रही हैं। अब केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि नेताओं की ऊर्जा आंतरिक खींचतान में नहीं, बल्कि जनता के बीच दिखाई दे। प्रदेश कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अलग-अलग शक्ति केंद्रों को एक मंच पर लाकर चुनावी अभियान को गति दे। यदि गुटीय राजनीति जारी रही तो भाजपा को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। इसके मुकाबले कांग्रेस महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और स्थानीय युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेर रही है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल मुद्दे उठाना पर्याप्त नहीं होगा। इन मुद्दों को गांव-गांव और बूथ-बूथ तक पहुंचाने वाला मजबूत संगठन भी चाहिए। उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां सरकारों के खिलाफ असंतोष समय-समय पर उभरता रहा है। लेकिन हर बार विपक्ष उसे चुनावी लाभ में बदल पाए, ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस के सामने यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। यदि पार्टी स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाती है, संगठन को सक्रिय करती है और टिकट वितरण में समय रहते स्पष्टता लाती है, तो मुकाबला रोचक हो सकता है। लेकिन यदि अंदरूनी खींचतान हावी रही तो सत्ता विरोधी भावना भी बिखर सकती है। वेणुगोपाल के संकेतों का एक असर टिकट वितरण पर भी पड़ सकता है। माना जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं, बल्कि जमीनी सक्रियता, जनस्वीकार्यता और संगठनात्मक प्रदर्शन को भी महत्व देगा। इससे कई दावेदारों के लिए चुनौती बढ़ सकती है। 2027 के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या और महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी चुनावी समीकरण बदल सकती है। कांग्रेस यदि इन दोनों वर्गों के लिए स्पष्ट एजेंडा और विश्वसनीय नेतृत्व प्रस्तुत करती है तो उसे राजनीतिक बढ़त मिल सकती है। दूसरी ओर भाजपा भी अपने संगठन और सरकारी योजनाओं के दम पर इन्हीं वर्गों को साधने में जुटी हुई है। वेणुगोपाल का ष्एक्शन प्लानष् उत्तराखंड कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक संदेश से अधिक एक संगठनात्मक चेतावनी भी है। अब यह देखना होगा कि प्रदेश नेतृत्व इसे कितनी गंभीरता से लागू करता है। आने वाले महीनों में कांग्रेस की सक्रियता, जनआंदोलन, सदस्यता अभियान और बूथ प्रबंधन ही तय करेंगे कि पार्टी 2027 में सत्ता की मजबूत दावेदार बनती है या फिर विपक्ष की भूमिका तक सीमित रह जाती है। उत्तराखंड में 2027 की लड़ाई केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होगी, बल्कि संगठन बनाम असंतोष की भी होगी। भाजपा अपनी संगठित चुनावी मशीनरी और सरकार के कामकाज के आधार पर मैदान में उतरेगी, जबकि कांग्रेस को सत्ता विरोधी माहौल को जनसमर्थन में बदलने के लिए जमीन पर असाधारण मेहनत करनी होगी।

खो गई सिलबट्टे की ‘खर्र-खर्र’ और रसोई की ‘रौनक’

आधुनिक गैजेट्स ने बदल दी है पहाड़ के रसोई की अनोखी रंगत मिक्सर व ग्राइंडर के शोर में कहीं खो गई सिलबट्टे की खर्र-खर्र आज भी अधूरी है सिलबट्टे वाले नमक-चटनी की सोंधी खुशबू पहाड़ के गांवों की रसोई में यह केवल पत्थर नहीं एक संस्कृति देहरादून। एक समय था जब पहाड़ के किसी भी गांव में सुबह की शुरुआत केवल पक्षियों की चहचहाहट से नहीं होती थी, बल्कि रसोई से आती सिलबट्टे पर मसाले पीसने की खर्र-खर्र की आवाज से होती थी। वह आवाज़ किसी मशीन की नहीं, बल्कि एक घर के जीवंत होने की पहचान होती थी। सिलबट्टा केवल दो पत्थरों का मेल नहीं था। वह पहाड़ की गृहस्थी का सबसे भरोसेमंद साथी था। उस पर पीसी गई हरी मिर्च, भांग की चटनी, भुना नमक, जाखिया, तिल, धनिया और लहसुन का स्वाद आज भी किसी आधुनिक मिक्सर की तेज धार नहीं दे पाती। आज रसोई में मिक्सर है, ग्राइंडर है, फूड प्रोसेसर है, लेकिन सिलबट्टे पर पीसे मसालों की आत्मा कहीं पीछे छूट गई है। पहाड़ की माताएं घंटों सिलबट्टे पर मसाले पीसती थीं। उनके हाथों की लय ऐसी होती थी कि मसाले केवल पिसते नहीं थे, उनमें अपनापन भी घुल जाता था। जब भांग की चटनी सिल पर तैयार होती थी, उसकी खुशबू पूरे आंगन में फैल जाती थी। बच्चे रोटी लेकर पहले ही बैठ जाते थे। कहा जाता है कि सिलबट्टे पर पीसने से मसालों का तेल और प्राकृतिक सुगंध बनी रहती है। शायद यही कारण है कि पुराने लोग आज भी कहते हैंकृमिक्सर मसाला पीसता है, सिलबट्टा स्वाद बनाता है। आज गांवों में भी कई सिलबट्टे धूल खा रहे हैं। कुछ घरों में तुलसी के चौरे के पास पड़े हैं, तो कहीं गोठ के किनारे। नई पीढ़ी के लिए वह बस एक भारी पत्थर है, लेकिन बुजुर्गों की आंखों में उसे देखकर बीते समय की पूरी कहानी उतर आती है। उस पत्थर पर वर्षों तक परिवार की रोटी का स्वाद तैयार हुआ। त्योहारों की चटनियां बनीं। मेहमानों के स्वागत की तैयारी हुई। बच्चों के लिए पहली बार दलिया पीसा गया। कितनी पीढ़ियों की स्मृतियां उसकी सतह पर आज भी जैसे अंकित हैं। सिलबट्टा उस दौर की पहचान भी है जब पहाड़ आत्मनिर्भर था। मसाले बाजार से तैयार नहीं आते थे। खेत में उगते थे घर में सुखाए जाते थे और सिलबट्टे पर पीसे जाते थे। हर चटनी का स्वाद अलग होता था क्योंकि उसमें घर की मिट्टी, पानी और हाथों का स्पर्श शामिल होता था। यह केवल रसोई का औजार नहीं था, बल्कि पहाड़ की महिलाओं के श्रम, धैर्य और आत्मसम्मान का जीवंत प्रतीक था। बदलती जीवनशैली ने सिलबट्टे को लगभग रसोई से बाहर कर दिया है। शहरों में तो यह सजावट की वस्तु बन चुका है और गांवों में भी इसका उपयोग तेजी से घट रहा है। सवाल यह है कि क्या आने वाली पीढ़ी केवल किताबों में पढ़ेगी कि कभी मसाले पत्थर पर भी पीसे जाते थे? क्या वह कभी समझ पाएंगे कि भांग की चटनी का असली स्वाद मशीन से नहीं, मां के हाथों और सिलबट्टे की धीमी रगड़ से पैदा होता था? पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, मेलों और लोकगीतों में नहीं बसती। वह रसोई में रखे उन साधारण दिखने वाले उपकरणों में भी जीवित है, जिन्होंने पीढ़ियों का जीवन संवारा। सिलबट्टा उनमें सबसे महत्वपूर्ण है। यदि हम अपनी पारंपरिक रसोई, स्थानीय भोजन और लोक संस्कृति को बचाना चाहते हैं, तो सिलबट्टे जैसी विरासत को भी सम्मान देना होगा। क्योंकि जिस दिन पहाड़ के घरों से सिलबट्टे की आखिरी खनक खत्म हो जाएगी, उस दिन केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति का एक अनमोल अध्याय भी हमेशा के लिए मौन हो जाएगा।

‘आस्था-विकास’ की पिच पर ‘जवाबदेही’ की गुगली

कांग्रेस के लिए सवालों का मंच, भाजपा के लिए आस्था का केंद्र उत्तराखंड में चुनावी शंखनाद से पहले मंदिरों पर हुई सियासत तेज यक्ष प्रश्न: आस्था और आरोपों के बीच आमजन किसके साथ देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर मंदिर केवल पूजा-अर्चना का विषय नहीं, बल्कि चुनावी विमर्श का केंद्र बनते दिखाई दे रहे हैं। चारधाम, प्राचीन मंदिरों के प्रबंधन, धार्मिक परंपराओं और मंदिर परिसरों से जुड़े विवादों ने सियासी बहस को नई धार दे दी है। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों ने इस मुद्दे पर अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी है। भाजपा का राजनीतिक संदेश स्पष्ट हैकृमंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं। पार्टी अपने शासनकाल में चारधाम परियोजना, तीर्थ अवसंरचना, श्र(ालु सुविधाओं और धार्मिक पर्यटन को उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत कर रही है। भाजपा का दावा है कि उसकी राजनीति विकास और आस्था को साथ लेकर चलने की है। दूसरी ओर कांग्रेस सरकार से मंदिरों के प्रबंधन, पारदर्शिता, वित्तीय जवाबदेही और स्थानीय हितों से जुड़े सवाल पूछ रही है। पार्टी का कहना है कि धार्मिक संस्थानों से जुड़े मामलों में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होना चाहिए। कांग्रेस यह भी आरोप लगाती रही है कि सरकार धार्मिक मुद्दों का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करती है, जबकि भाजपा इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है। उत्तराखंड जैसे धार्मिक महत्व वाले राज्य में मंदिरों का मुद्दा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आयाम भी रखता है। चारधाम यात्रा से हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी है। मंदिरों से जुड़ी व्यवस्थाएं, यात्रियों की सुविधाएं, स्थानीय व्यापार और पारदर्शी प्रशासनकृये सभी चुनावी चर्चा का हिस्सा बनते जा रहे हैं। भाजपा इस बहस को आस्था और सांस्कृतिक विरासत के नजरिए से प्रस्तुत करती है, जबकि कांग्रेस प्रबंधन, पारदर्शिता और जवाबदेही पर अधिक जोर देती है। यही वैचारिक अंतर राजनीतिक टकराव का मुख्य आधार बन गया है। भाजपा लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसने धार्मिक स्थलों के विकास को प्राथमिकता दी है और यह उसकी वैचारिक प्रतिब(ता का हिस्सा है। वहीं कांग्रेस यह दिखाना चाहती है कि मंदिरों की गरिमा केवल निर्माण कार्यों से नहीं, बल्कि ईमानदार और पारदर्शी व्यवस्था से भी जुड़ी होती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में मंदिरों से जुड़े हर मुद्दे पर दोनों दलों के बीच बयानबाजी और तेज होगी। यह बहस केवल धार्मिक नहीं रहेगी, बल्कि सुशासन, प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक विश्वसनीयता तक पहुंचेगी। देवभूमि उत्तराखंड में मंदिर केवल श्र(ा के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी आधार हैं। इसलिए मंदिरों पर होने वाली राजनीतिक बहस का असर चुनावी माहौल पर भी पड़ सकता है। लेकिन अंततः मतदाता यह भी देखेगा कि किस दल ने आस्था का सम्मान करने के साथ-साथ व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए ठोस काम किया। 2027 की ओर बढ़ती उत्तराखंड की राजनीति में मंदिर फिर एक बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में उभर रहे हैं। भाजपा उन्हें अपनी वैचारिक पहचान और आस्था से जोड़कर प्रस्तुत कर रही है, जबकि कांग्रेस प्रबंधन और जवाबदेही के सवाल उठा रही है। अब असली फैसला जनता के हाथ में होगा। मतदाता यह तय करेगा कि चुनावी बहस में किसका पक्ष अधिक विश्वसनीय हैकृआस्था के साथ विकास का दावा, या आस्था के साथ जवाबदेही की मांग। देवभूमि की राजनीति में यह टकराव आने वाले दिनों में और अधिक तीखा होने के संकेत दे रहा है।

कांग्रेस के ‘दौरों’ पर भाजपा की ‘घेराबंदी’

उत्तराखंड में अब हर दौरा बनेगा राजनीतिक रणक्षेत्र कांग्रेस के उत्तराखंड दौरों पर भाजपा का पलटवार तेज बड़े नेताओं की आवाजाही पर सत्ता पक्ष कर रहा हमला देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट तेज होते ही राजनीतिक तापमान भी चढ़ने लगा है। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के लगातार उत्तराखंड दौरे अब भाजपा के निशाने पर हैं। मुख्यमंत्री, मंत्रियों और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस के अभियान को लेकर आक्रामक रुख अपनाते हुए सवालों की बौछार शुरू कर दी है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस के शीर्ष नेता उत्तराखंड में राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए लगातार दौरे कर रहे हैं, लेकिन पार्टी पहले अपने भीतर के मतभेद और नेतृत्व के सवालों का समाधान करे। सत्ता पक्ष का दावा है कि राज्य की जनता केवल भाषण सुनने नहीं, बल्कि काम का हिसाब देखने के मूड में है। भाजपा नेताओं का कहना है कि चुनावी मौसम नजदीक आते ही कांग्रेस को उत्तराखंड की याद आना राजनीतिक अवसरवाद को दर्शाता है। उनका तर्क है कि राज्य के विकास, निवेश, सड़क, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के मुद्दों पर कांग्रेस के पास कोई ठोस वैकल्पिक रोडमैप नहीं है। भाजपा के कई नेताओं ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय नेताओं की रैलियां भी तभी प्रभावी होती हैं, जब प्रदेश संगठन मजबूत हो। उनके अनुसार, कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि उसकी अपनी अंदरूनी खींचतान है। राज्य सरकार के मंत्रियों ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि केवल बड़े नेताओं की सभाओं से चुनाव नहीं जीते जाते। जनता यह देखती है कि किस दल के पास स्पष्ट नेतृत्व, नीति और विकास की दृष्टि है। भाजपा का दावा है कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं ने गांवों से लेकर शहरों तक विकास की नई तस्वीर बनाई है। ऐसे में कांग्रेस के आरोपों और दौरों से जनता प्रभावित होने वाली नहीं है। भाजपा नेताओं का मानना है कि कांग्रेस उत्तराखंड में सत्ता विरोधी माहौल बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसे यह भी बताना होगा कि यदि उसे मौका मिला तो वह राज्य के लिए क्या अलग करेगी। सत्ता पक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि कांग्रेस केवल सरकार की आलोचना कर रही है या उसके पास कोई स्पष्ट विकास एजेंडा भी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में कांग्रेस के हर बड़े नेता का उत्तराखंड दौरा भाजपा के जवाबी अभियान का केंद्र बनेगा। एक ओर कांग्रेस जनता के मुद्दोंकृमहंगाई, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय समस्याओंकृको लेकर सरकार को घेरने का प्रयास करेगी, तो दूसरी ओर भाजपा विकास कार्यों, संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व के सवाल पर कांग्रेस को लगातार कठघरे में खड़ा करेगी। उत्तराखंड की राजनीति अब स्पष्ट रूप से चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। कांग्रेस अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के सहारे कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा इस अभियान को बाहरी राजनीतिक प्रदर्शन बताते हुए जनता के बीच अपनी सरकार के कामकाज को मुख्य मुद्दा बनाने में जुटी है।

उत्तराखंड कांग्रेस के ‘सारथी’ बैकफुट पर

2027 की लड़ाई में सबसे बड़ा सवाल बन रही है गैरहाजिरी उत्तराखंड में कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं की सक्रियता बढ़ी पूर्व सीएम हरदा की सीमित मौजूदगी पर हो गई चर्चा तेज देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता लगातार राज्य का दौरा कर रहे हैं, संगठन को सक्रिय करने की कवायद चल रही है और सत्ता परिवर्तन का दावा भी किया जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल राजनीतिक गलियारों में लगातार तैर रहा हैकृकांग्रेस के सबसे अनुभवी चेहरों में गिने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरदा यानी हरीश रावत अपेक्षाकृत कम सक्रिय क्यों दिखाई दे रहे हैं? उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में हरीश रावत लंबे समय तक सबसे प्रभावशाली जननेता रहे हैं। चुनावी रणनीति से लेकर कार्यकर्ताओं को ऊर्जा देने तक उनकी भूमिका अहम मानी जाती रही है। ऐसे में चुनावी माहौल के बीच उनकी सीमित सार्वजनिक सक्रियता को लेकर तरह-तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तराखंड में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। बड़े नेताओं के दौरे, संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों का सिलसिला जारी है। इसके बावजूद कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि यदि हरीश रावत भी पहले की तरह लगातार जनसभाओं, पदयात्राओं और संगठनात्मक अभियानों में सक्रिय दिखाई दें, तो पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल और मजबूत हो सकता है। हालांकि कांग्रेस के भीतर यह भी राय है कि पार्टी अब सामूहिक नेतृत्व के माडल पर आगे बढ़ रही है और चुनाव किसी एक चेहरे के बजाय पूरी टीम के दम पर लड़ना चाहती है। हरीश रावत की सीमित सक्रियता को भाजपा भी राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के नेता आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेस अपने सबसे बड़े जनाधार वाले नेता की भूमिका को लेकर स्पष्ट नहीं है। सत्ता पक्ष इसे कांग्रेस के अंदर नेतृत्व को लेकर असमंजस का संकेत बताता है। वहीं कांग्रेस का कहना है कि पार्टी में सभी वरिष्ठ नेताओं की भूमिका तय है और चुनावी समय आने पर हर नेता अपनी जिम्मेदारी निभाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समय के साथ हरीश रावत की भूमिका में बदलाव आया है। पहले वह आंदोलन, जनसंपर्क और चुनावी अभियान का सबसे प्रमुख चेहरा होते थे, जबकि अब संगठन में नई पीढ़ी के नेताओं को भी आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई दे रही है। इसके बावजूद यह भी सच है कि उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर कुमाऊं और गढ़वाल के अनेक इलाकों में आज भी हरीश रावत की व्यक्तिगत पहचान और जनसंपर्क क्षमता को कांग्रेस की बड़ी राजनीतिक पूंजी माना जाता है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा की मजबूत संगठनात्मक मशीनरी का मुकाबला करना है। ऐसे में अनुभवी नेतृत्व और नए चेहरों के बीच संतुलन बनाना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा। यदि हरीश रावत चुनावी अभियान में अधिक सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो इसका असर कार्यकर्ताओं के उत्साह और चुनावी संदेश दोनों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि पार्टी पूरी तरह नए नेतृत्व और सामूहिक रणनीति पर भरोसा करती है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वरिष्ठ नेताओं का अनुभव और जनाधार चुनावी अभियान से अलग-थलग न पड़ जाए। उत्तराखंड की राजनीति में एक कहावत अक्सर सुनाई देती हैकृकांग्रेस का चुनाव और हरदा की चर्चा, दोनों अलग नहीं हो सकते। यही कारण है कि जैसे-जैसे 2027 का चुनाव करीब आएगा, हरीश रावत की भूमिका, उनकी सक्रियता और चुनावी रणनीति में उनकी भागीदारी पर राजनीतिक चर्चाएं और तेज होना लगभग तय है। फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना निश्चित है कि कांग्रेस यदि सत्ता में वापसी का सपना देख रही है, तो उसे अपने अनुभवी नेतृत्व, संगठनात्मक मजबूती और नई राजनीतिक रणनीतिकृतीनों के बीच संतुलन बनाना होगा। उत्तराखंड की चुनावी बिसात पर यह संतुलन ही जीत और हार के बीच का सबसे महत्वपूर्ण अंतर साबित हो सकता है।

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

कांग्रेस में अनुशासन की चुनावी ‘सर्जरी’

कांग्रेस में 2027 विस चुनाव से पहले संगठन पर कसा केंद्रीय नेतृत्व ने शिकंजा गुटबाजी, टिकट की दौड़ और नेतृत्व के समीकरणों पर है पैनी नजर राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौतीकृगुटबाजी पर लगाम और चुनाव की तैयारी देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में जब भी कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल का दौरा तय होता है, तो यह महज एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होता। यह संकेत होता है कि दिल्ली अब उत्तराखंड की राजनीति को केवल देख नहीं रही, बल्कि उसे अपनी रणनीति के अनुसार आकार देना चाहती है। 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन कांग्रेस के भीतर चुनाव शुरू हो चुका है। यह चुनाव भाजपा के खिलाफ कम और कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, संगठन, टिकट और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई ज्यादा दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि वेणुगोपाल का दौरा कई नेताओं के लिए अवसर भी है और परीक्षा भी। उत्तराखंड कांग्रेस वर्षों से एक ही बीमारी से जूझ रही हैकृचुनाव आते ही कार्यकर्ताओं से ज्यादा दावेदार सक्रिय हो जाते हैं। बूथ कमजोर रहता है और नेताओं के खेमे मजबूत हो जाते हैं। परिणाम यह होता है कि जनता के बीच लड़ाई लड़ने से पहले पार्टी अपने भीतर ही उलझ जाती है। ऐसे में वेणुगोपाल का दौरा इस बात का संकेत माना जा रहा है कि दिल्ली अब यह जोखिम दोहराना नहीं चाहती। राष्ट्रीय नेतृत्व जानता है कि यदि संगठन बिखरा रहा, तो सत्ता विरोधी माहौल भी कांग्रेस के लिए पर्याप्त नहीं होगा। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ नेटवर्क और चुनावी मशीनरी है। कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती उसका संगठनात्मक ढांचा है। भाजपा चुनाव से महीनों पहले बूथ पर पहुंच जाती है, जबकि कांग्रेस अक्सर टिकट घोषित होने के बाद पूरी ताकत से मैदान में उतरती है। यदि कांग्रेस को 2027 में मुकाबला करना है, तो उसे भाषणों से ज्यादा संगठन पर निवेश करना होगा। यही कारण है कि वेणुगोपाल की प्राथमिकता संगठनात्मक अनुशासन और कार्यकर्ता-आधारित राजनीति मानी जा रही है। कांग्रेस में विधानसभा चुनाव से पहले टिकट की दावेदारी हमेशा संगठन पर भारी पड़ती रही है। कई सीटों पर एक ही टिकट के लिए अनेक दावेदार सक्रिय रहते हैं। यदि समय रहते इस प्रतिस्पर्धा का प्रबंधन नहीं हुआ, तो असंतोष चुनावी नुकसान में बदल सकता है। संभव है कि राष्ट्रीय नेतृत्व इस बार प्रदर्शन, जनाधार और संगठनात्मक सक्रियता को अधिक महत्व देने की कोशिश करे। हालांकि अंतिम फैसला भविष्य में ही होगा, लेकिन संगठन को अनुशासित रखने का संदेश अभी से दिया जा सकता है। कांग्रेस के सामने केवल सरकार की आलोचना करना पर्याप्त नहीं होगा। मतदाता अब यह भी जानना चाहता है कि विकल्प क्या है। बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा, भू-कानून, मूल निवास और पहाड़ी अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर ठोस और विश्वसनीय रोडमैप के बिना केवल सत्ता विरोधी राजनीति सीमित असर छोड़ सकती है। यदि वेणुगोपाल के दौरे के बाद कांग्रेस इन मुद्दों पर एक स्पष्ट और संगठित अभियान खड़ा करती है, तो चुनावी मुकाबला अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकता है। उत्तराखंड कांग्रेस में यह धारणा लंबे समय से रही है कि बड़े संगठनात्मक फैसलों पर दिल्ली की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसलिए वेणुगोपाल का दौरा स्वाभाविक रूप से राजनीतिक संदेश लेकर आता है। कार्यकर्ताओं की नजर इस बात पर रहेगी कि संगठनात्मक दिशा, अभियान और समन्वय को लेकर क्या संकेत दिए जाते हैं। वेणुगोपाल का उत्तराखंड दौरा केवल कैलेंडर का एक कार्यक्रम नहीं है। यह कांग्रेस के लिए एक परीक्षा हैकृक्या वह गुटों की राजनीति से ऊपर उठकर संगठन को प्राथमिकता दे पाएगी? यदि जवाब हाँ है, तो 2027 का चुनाव अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि जवाब नहीं है, तो सत्ता विरोधी माहौल भी कांग्रेस के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

पहाड़ की ‘पीड़ा’ चुनावी ‘हथियार’

यूकेडी के उभार की आहट से बदले चुनावी समीकरण भाजपा और कांग्रेस के बीच तीसरे विकल्प की तलाश पहाड़ के मुद्दों पर फिर मुखर हुई उत्तराखंड क्रांति दल देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राजनीतिक गलियारों में एक नई चर्चा जोर पकड़ रही हैकृक्या राज्य में एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति लौट रही है? उत्तराखंड राज्य आंदोलन की विरासत अपने नाम से जोड़ने वाला उत्तराखंड क्रांति दल लगातार जनसंपर्क अभियान, पहाड़ के मूल मुद्दों और स्थानीय अस्मिता को केंद्र में रखकर खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश में जुटा है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि राज्य में यूकेडी के पक्ष में व्यापक चुनावी लहर बन चुकी है, लेकिन कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि पार्टी अपने संगठन को मजबूत करने और जनता के बीच निरंतर सक्रिय रहने में सफल रहती है, तो वह कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकती है। यूकेडी अपने पुराने राजनीतिक एजेंडेकृस्थायी राजधानी, सशक्त भू-कानून, मूल निवास, पलायन, बेरोजगारी, जल-जंगल-जमीन और पर्वतीय विकासकृको फिर से मजबूती से उठा रही है। पार्टी का तर्क है कि राज्य बनने के ढाई दशक बाद भी जिन मुद्दों के लिए उत्तराखंड आंदोलन हुआ था, वे आज भी अधूरे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खाली होते गांव, सीमांत क्षेत्रों से पलायन, कृषि संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दों को लेकर यूकेडी भाजपा और कांग्रेस दोनों पर निशाना साध रही है। पार्टी का कहना है कि राष्ट्रीय दल चुनाव के समय पहाड़ की बात करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी माहौल बनने की स्थिति में सबसे अधिक फायदा अक्सर तीसरे विकल्प को मिलता है। यदि भाजपा और कांग्रेस दोनों के टिकट वितरण से असंतोष बढ़ता है, तो यूकेडी ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकती है। विशेषकर पर्वतीय सीटों पर स्थानीय चेहरों और क्षेत्रीय मुद्दों की पकड़ रखने वाले प्रत्याशी चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना सकते हैं। यदि यूकेडी सीमित सीटों पर भी प्रभावी प्रदर्शन करती है, तो कई निर्वाचन क्षेत्रों में जीत-हार का अंतर प्रभावित हो सकता है। पार्टी युवाओं, बेरोजगारों और उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े परिवारों तक पहुंच बनाने का प्रयास कर रही है। सोशल मीडिया के माध्यम से भी यूकेडी अपनी उपस्थिति बढ़ा रही है। पार्टी का संदेश है कि उत्तराखंड की समस्याओं का समाधान स्थानीय सोच और स्थानीय नेतृत्व से ही संभव है। हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल भावनात्मक मुद्दे चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। संगठन, संसाधन, मजबूत उम्मीदवार और बूथ स्तर की तैयारी किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। भले ही यूकेडी पूरे राज्य में सत्ता की मुख्य दावेदार न दिखाई दे, लेकिन कई सीटों पर उसका प्रभाव निर्णायक हो सकता है। यदि पार्टी 5 से 10 प्रतिशत तक वोट भी अपने पक्ष में खींचने में सफल रहती है, तो भाजपा और कांग्रेस दोनों के पारंपरिक गणित पर असर पड़ सकता है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि चुनाव परिणाम त्रिशंकु स्थिति की ओर बढ़ते हैं, तो क्षेत्रीय दलों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। उत्तराखंड की जनता ने राज्य आंदोलन के समय क्षेत्रीय नेतृत्व पर भरोसा जताया था, लेकिन बाद के वर्षों में यूकेडी संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व संकट और आंतरिक मतभेदों के कारण अपना जनाधार खोती चली गई। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल जनता का विश्वास जीतना नहीं, बल्कि यह साबित करना भी है कि वह आंदोलन की विरासत से आगे बढ़कर आज के उत्तराखंड के लिए एक व्यवहारिक राजनीतिक विकल्प बन सकती है। 2027 का चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता का संघर्ष नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के लिए फिर से जगह बन रही है या नहीं। आने वाले महीनों में यूकेडी की संगठनात्मक सक्रियता, जनसंपर्क अभियान और स्थानीय मुद्दों पर उसकी पकड़ ही तय करेगी कि मौजूदा चर्चा चुनावी परिणामों में बदलती है या नहीं।

रोटना है ‘खुशी’ बांटने की पहाड़ी ‘परंपरा’

पहाड़ की रसोई का अनोखा भूला-बिसरा स्वाद रोटना आज भी रिश्तों में घोलता रहता है मिठास न घी से टपकती मिठाई और न बाजार की चमक हर पर्व और शुभ अवसर की पहली पसंद रोटना देहरादून। आधुनिक जीवनशैली और बाजार की चकाचौंध में उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजन धीरे-धीरे लोगों की थाली से गायब होते जा रहे हैं। इन्हीं में एक है रोटनाकृपहाड़ की रसोई में बनने वाला ऐसा पारंपरिक पकवान, जिसकी मिठास केवल स्वाद में नहीं, बल्कि संस्कृति, अपनत्व और लोकजीवन में भी घुली हुई है। एक समय था जब गांव में किसी के घर शुभ कार्य होता, नई फसल कटती, पूजा-अर्चना होती या मेहमान आते, तो रसोई में सबसे पहले रोटना बनाया जाता था। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि खुशी बांटने की परंपरा थी। रोटना गेहूं के आटे से बनाया जाने वाला पारंपरिक मीठा व्यंजन है। इसमें गुड़ या शक्कर, देसी घी और स्थानीय स्वाद के अनुसार सौंफ, इलायची या अन्य घरेलू सामग्री मिलाई जाती है। इसे मोटे आकार में तवे या धीमी आंच पर पकाया जाता है, जिससे इसकी सुगंध पूरे घर में फैल जाती है। पहाड़ की महिलाएं बताती हैं कि रोटना केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि परिवार के साथ बैठकर खाने और बांटने की संस्कृति का हिस्सा था। पहाड़ के गांवों में रोटना जन्मोत्सव, नामकरण, विवाह, इगास, हरेला और अन्य शुभ अवसरों पर बनाया जाता रहा है। खेतों में मेहनत के बाद गर्म रोटना और ताजा घी का स्वाद आज भी बुजुर्गों की यादों में बसा हुआ है। पहले जब बाजार से मिठाइयां आसानी से उपलब्ध नहीं थीं, तब रोटना ही मेहमाननवाजी का सबसे सम्मानजनक व्यंजन माना जाता था। आज गांवों से पलायन, संयुक्त परिवारों का टूटना और फास्ट फूड संस्कृति के बढ़ते प्रभाव ने रोटना जैसे पारंपरिक व्यंजनों को पीछे धकेल दिया है। नई पीढ़ी के कई युवाओं ने इसका नाम तो सुना है, लेकिन स्वाद कभी चखा ही नहीं। बुजुर्गों का कहना है कि पहले बच्चों को रोटना बनाना भी सिखाया जाता था, लेकिन अब यह कला धीरे-धीरे घरों से गायब होती जा रही है। यदि रोटना पारंपरिक तरीके से स्थानीय अनाज, गुड़ और सीमित घी के साथ बनाया जाए, तो यह पैकेज्ड मिठाइयों की तुलना में अधिक पौष्टिक विकल्प हो सकता है। स्थानीय अनाज और गुड़ ऊर्जा के साथ पारंपरिक स्वाद भी देते हैं। पहाड़ में ग्रामीण पर्यटन और होमस्टे संस्कृति तेजी से विकसित हो रही है। ऐसे में रोटना जैसे पारंपरिक व्यंजन पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति से जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं, जिस तरह अन्य राज्यों ने अपने पारंपरिक खाद्य पदार्थों को पर्यटन की पहचान बनाया है, उसी तरह रोटना भी उत्तराखंड की पाक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक बन सकता है। पहाड़ की पहचान केवल हिमालय, मंदिरों और प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं बनती, उसकी असली पहचान गांवों की रसोई में बसती है। रोटना उसी विरासत का स्वाद है, जिसे हमने आधुनिकता की दौड़ में पीछे छोड़ दिया। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को केवल मोबाइल और माल की संस्कृति देंगे, तो वे शायद यह कभी नहीं जान पाएंगे कि पहाड़ की असली मिठास किसी महंगी मिठाई में नहीं, बल्कि मां के हाथों से बने एक साधारण रोटना में बसती थी। पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को बचाना है तो केवल लोकगीत और लोकनृत्य ही नहीं, रसोई की इस अमूल्य परंपरा को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाना होगा। क्योंकि स्वाद भी इतिहास होता है, और रोटना उस इतिहास का मीठा अध्याय है।

‘2037 तक पुष्कर सिंह धामी’

वायरल वीडियो से गरमाई उत्तराखंड की सियासत सोशल मीडिया के एक दावे ने छेड़ दी है नई बहस भाजपा ने 2027 से आगे का भी खींच दिया खाका राजनीतिक खाका या यह केवल डिजिटल नैरेटिव देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक वायरल वीडियो ने नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर प्रसारित हो रहे एक वीडियो में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के वर्ष 2037 तक मुख्यमंत्री बने रहने का दावा किया जा रहा है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन वीडियो ने राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड में अभी 2027 का विधानसभा चुनाव भी नहीं हुआ है, लेकिन सोशल मीडिया पर 2037 की सत्ता का दावा यह संकेत देता है कि चुनावी राजनीति अब केवल जनसभाओं में नहीं, बल्कि डिजिटल नैरेटिव के जरिए भी लड़ी जा रही है। राजनीति में आत्मविश्वास किसी भी दल की ताकत माना जाता है, लेकिन जब भविष्य के चुनावी नतीजों को पहले से तय मानने जैसा संदेश सामने आने लगे, तो विपक्ष इसे लोकतांत्रिक विनम्रता के बजाय राजनीतिक अतिआत्मविश्वास के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। उत्तराखंड का राजनीतिक इतिहास बताता है कि राज्य की जनता ने कई बार सत्ता परिवर्तन का फैसला किया है। ऐसे में 2037 तक सत्ता में बने रहने जैसे दावों पर स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस तेज होना तय है। विपक्षी दलों के लिए ऐसा वायरल वीडियो सरकार पर निशाना साधने का अवसर बन सकता है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल यह सवाल उठा सकते हैं कि क्या सरकार जनता की मौजूदा समस्याओंकृबेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय मुद्दोंकृसे ज्यादा राजनीतिक संदेश गढ़ने में व्यस्त है। उत्तराखंड में चुनावी राजनीति अब सोशल मीडिया के दौर में प्रवेश कर चुकी है। छोटे वीडियो, वायरल क्लिप और आकर्षक राजनीतिक संदेश कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच रहे हैं। ऐसे में किसी भी वायरल सामग्री का प्रभाव उसके तथ्यात्मक होने से पहले ही राजनीतिक चर्चा को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों के लिए डिजिटल संचार जितना अवसर है, उतनी ही चुनौती भी। वायरल सामग्री पर जनता की प्रतिक्रिया और तथ्यात्मक स्थितिकृदोनों पर नजर रखना आवश्यक है। राजनीति में जनता अंतिम निर्णायक होती है, सोशल मीडिया नहीं। मुख्यमंत्री कौन बनेगा और कितने समय तक रहेगा, इसका फैसला न किसी वायरल वीडियो से होता है और न किसी राजनीतिक नारे से। यह निर्णय चुनाव में मतदाता अपने वोट से करता है। फिर भी यह वायरल वीडियो एक संकेत अवश्य देता है कि उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनावी नैरेटिव अब धीरे-धीरे आकार लेने लगा है। आने वाले समय में भाजपा अपनी उपलब्धियों के आधार पर जनादेश मांगेगी, जबकि विपक्ष सरकार के प्रदर्शन को मुद्दा बनाएगा। ऐसे में डिजिटल दावे, राजनीतिक प्रतीक और चुनावी संदेश आने वाले महीनों में और अधिक तीखे होने की संभावना है।

कांग्रेस की ‘वीआईपी परेड’ या संगठन बचाने की कवायद

भाजपा का कांग्रेस पर तंजकृजहां संगठन कमजोर, वहां बढ़ते हैं वीआईपी दौरे दिल्ली के नेताओं की आवाजाही विकास के लिए नहीं, गुटबाजी संभालने के लिए कांग्रेस नेताओं ने दिया भाजपा को जवाबकृयह चुनावी तैयारी है, गुटबाजी नहीं देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के लगातार प्रस्तावित दौरों को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा हमला बोला है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस में इन दिनों चल रही वीआईपी परेड का मकसद जनता के मुद्दों पर संघर्ष नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व विवाद को संभालना है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को उत्तराखंड की जनता की समस्याओं से अधिक अपने संगठन की अंदरूनी चुनौतियों की चिंता है। उनके अनुसार, प्रदेश में राष्ट्रीय नेताओं की लगातार मौजूदगी इस बात का संकेत है कि पार्टी अभी भी संगठनात्मक असंतोष और आपसी खींचतान से पूरी तरह उबर नहीं पाई है। भाजपा का दावा है कि जिस दल का संगठन मजबूत होता है, उसे बार-बार दिल्ली से नेताओं को भेजकर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस अभी चुनाव लड़ने से पहले अपने ही नेताओं को एक मंच पर लाने की चुनौती से जूझ रही है। भाजपा यह भी आरोप लगा रही है कि कांग्रेस के भीतर टिकट की संभावित दावेदारी, क्षेत्रीय गुटों की सक्रियता और नेतृत्व को लेकर अलग-अलग खेमों की खींचतान को शांत करने के लिए केंद्रीय नेताओं के दौरे बढ़ाए जा रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक प्रचार करार दे रही है। पार्टी का कहना है कि राष्ट्रीय नेताओं के दौरे संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, कार्यकर्ताओं से संवाद बढ़ाने और विधानसभा चुनाव की तैयारी का हिस्सा हैं। कांग्रेस का दावा है कि भाजपा संगठनात्मक बैठकों को भी गुटबाजी का रंग देकर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक दलों में समीक्षा बैठकें, रणनीति निर्माण और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद सामान्य प्रक्रिया है और इसे आंतरिक संकट बताना भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी वर्ष नजदीक आते ही लगभग सभी बड़े दल अपने संगठन को सक्रिय करने के लिए वरिष्ठ नेताओं के दौरे बढ़ाते हैं। हालांकि, यदि किसी दल में पहले से मतभेदों की चर्चा हो, तो ऐसे दौरों को राजनीतिक चश्मे से भी देखा जाता है। उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने एक ओर भाजपा की मजबूत चुनावी मशीनरी है, तो दूसरी ओर उसे अपने संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय और एकजुट बनाए रखने की चुनौती भी है। भाजपा इसी पहलू को मुद्दा बनाकर कांग्रेस पर निशाना साध रही है। स्पष्ट है कि उत्तराखंड की राजनीति अब चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। भाजपा विकास, संगठन और सरकार के कामकाज को अपनी ताकत बताने में जुटी है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी मुद्दों को धार देने के साथ संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के दौरे आने वाले दिनों में और बढ़ सकते हैं। इसके साथ ही भाजपा भी इन्हें राजनीतिक हथियार बनाकर यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि कांग्रेस पहले अपने घर को संभाले, फिर सरकार पर सवाल उठाए। फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति में मुद्दों के साथ-साथ नैरेटिव की लड़ाई भी तेज हो चुकी हैकृएक पक्ष इसे संगठन की मजबूती बता रहा है, तो दूसरा इसे गुटबाजी की मरम्मत। अंतिम फैसला, हमेशा की तरह, जनता करेगी।

धामी माडल पर दांव: चेहरा नहीं भविष्य बदलेंगे

भाजपा ने बदला उत्तराखंड की राजनीति का नैरेटिव सबसे लंबे कार्यकाल को बना रही चुनावी हथियार मुख्य विपक्ष से सवालकृचेहरा कौन और एजेंडा क्या देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक समय मुख्यमंत्री बदलना उतना ही सामान्य माना जाता था, जितना मानसून का मौसम बदलना। सत्ता बदलने से पहले मुख्यमंत्री बदल जाते थे और सरकारें अपने ही फैसलों से अस्थिर नजर आती थीं। लेकिन अब भाजपा उसी उत्तराखंड में एक नया राजनीतिक आख्यान गढ़ रही हैकृस्थिर नेतृत्व, मजबूत सरकार और लगातार फैसले। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का लगातार लंबा कार्यकाल अब केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भाजपा का सबसे बड़ा चुनावी ब्रांड बनने की ओर बढ़ रहा है। पार्टी यह संदेश देने में जुटी है कि जिस राज्य को कभी राजनीतिक अस्थिरता की पहचान से देखा जाता था, वही आज स्थिर नेतृत्व का उदाहरण पेश कर रहा है। भाजपा ने धामी पर लगातार भरोसा जताकर यह संकेत दिया है कि उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की पुरानी राजनीति को पीछे छोड़ दिया गया है। अब पार्टी का पूरा चुनावी अभियान एक स्थिर चेहरे और निरंतर नेतृत्व के इर्द-गिर्द बुना जा सकता है। राजनीतिक गलियारों में इसे भाजपा की सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है। संदेश सीधा हैकृजब कप्तान तय है, तो टीम भी उसी के नेतृत्व में मैदान में उतरेगी। भाजपा जहां धामी के नेतृत्व को उपलब्धि बताकर जनता के बीच जा रही है, वहीं कांग्रेस अब भी संगठन, नेतृत्व और चुनावी रणनीति को धार देने में जुटी दिखाई देती है। भाजपा इसी बिंदु को राजनीतिक हथियार बनाकर यह सवाल उछाल सकती है कि जब हमारा चेहरा तय है, तो आपका कौन? यही वह राजनीतिक बढ़त है, जिसे भाजपा 2027 तक बनाए रखना चाहेगी। भाजपा का दावा है कि निवेश, सड़क, कनेक्टिविटी, धार्मिक पर्यटन, समान नागरिक संहिता और प्रशासनिक फैसलों ने उत्तराखंड को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। विपक्ष इन दावों पर सवाल उठाते हुए बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों को सामने रखता रहा है। यानी चुनावी मुकाबला अब केवल विकास के दावों का नहीं, बल्कि किसका नैरेटिव जनता स्वीकार करती हैकृइसका होगा। उत्तराखंड की राजनीति में अब एक नया समीकरण बनता दिख रहा है। भाजपा चुनाव को स्थिर नेतृत्व बनाम अस्थिर विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकती है, जबकि कांग्रेस इसे लंबा कार्यकाल बनाम जनता के मुद्दे की बहस में बदलना चाहेगी। उत्तराखंड की राजनीति में कभी मुख्यमंत्री बदलना सबसे बड़ी खबर होती थी। आज भाजपा उसी इतिहास को पलटकर यह बताना चाहती है कि अब चेहरा नहीं बदलेगा। लेकिन लोकतंत्र में केवल लंबा कार्यकाल ही उपलब्धि का प्रमाण नहीं होता। असली परीक्षा यह है कि क्या उस लंबे कार्यकाल में जनता की उम्मीदें भी उतनी ही तेजी से पूरी हुईं। भाजपा धामी के लंबे नेतृत्व को अपना सबसे बड़ा चुनावी पोस्टर बनाएगी। विपक्ष इसे जनता के अधूरे सवालों से चुनौती देगा। 2027 का चुनाव इस बात का फैसला करेगा कि मतदाता स्थिरता पर मुहर लगाते हैं या जवाबदेही को तरजीह देते हैं।

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

पहाड़ की अनमोल धरोहर है ‘अरसा’

पहाड़ के हर मांगलिक कार्य का पहला गवाह है अरसा अरसे में पहाड़ की मिठास में घुली सदियों की संस्कृति पहाड़ में इसके बिना अधूरे माने जाते हे सभी शुभ कार्य आधुनिक दौर में अपनी पहचान बचाए है पारंपरिक अरसा देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, बुग्यालों, लोकगीतों और हिमालय की चोटियों में ही नहीं बसती, बल्कि उसकी रसोई में भी सांस लेती है। यहां के पारंपरिक व्यंजन केवल भूख मिटाने का माध्यम नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था, रिश्तों और लोकजीवन की जीवित धरोहर हैं। इन्हीं धरोहरों में एक नाम हैकृअरसा। पहाड़ में जब किसी घर में बेटी का विवाह तय होता था, जब किसी नवजात का नामकरण होता, जब देवी-देवताओं का जागर लगता, जब हरेला, इगास, घृत संक्रांति या किसी शुभ पर्व का आगमन होता, तब रसोई में सबसे पहले जिस व्यंजन की तैयारी शुरू होती थी, वह अरसा ही होता था। उसकी खुशबू पूरे गांव को यह संदेश दे देती थी कि इस घर में कोई मंगल अवसर आया है। आज बाजार में सैकड़ों तरह की मिठाइयां उपलब्ध हैं, लेकिन पहाड़ के बुजुर्ग आज भी कहते हैंकृष्मिठाई बहुत हैं पर अरसे जैसा अपनापन किसी में नहीं। इतिहासकारों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में चावल और गुड़ से बने पकवानों की परंपरा बहुत पुरानी रही है। उत्तराखण्ड में कृकृषि आधारित समाज के विकास के साथ धान की खेती बढ़ी और गुड़ का उपयोग भी ग्रामीण जीवन का हिस्सा बना। इन्हीं दो सरल सामग्रियों से तैयार हुआ अरसा धीरे-धीरे धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक परंपराओं का अभिन्न अंग बन गया। गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों क्षेत्रों में इसकी विधि लगभग समान है, हालांकि स्वाद और आकार में स्थानीय विविधताएं मिलती हैं। कहीं इसे थोड़ा मोटा बनाया जाता है, तो कहीं पतला और कुरकुरा। लेकिन हर जगह इसका उद्देश्य एक ही रहाकृशुभ अवसर की मिठास साझा करना। पौड़ी और टिहरी के कुछ गांवों में एक लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक समय गांव में भीषण अकाल पड़ा। खेतों में केवल थोड़ा-सा धान बचा और घरों में थोड़ा गुड़। गांव की सबसे बुजुर्ग महिला ने दोनों को मिलाकर एक नया पकवान बनाया और उसे सबसे पहले ग्राम देवता को अर्पित किया। मान्यता है कि उसके बाद गांव में अच्छी वर्षा हुई और भरपूर फसल आई। तभी से हर शुभ अवसर पर अरसा बनाकर पहले ईष्टदेव को चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। यह कथा ऐतिहासिक प्रमाण नहीं, बल्कि लोकविश्वास का हिस्सा है। लेकिन यह इस बात को अवश्य दर्शाती है कि अरसा केवल भोजन नहीं, बल्कि आस्था और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। पहाड़ के पुराने विवाहों में अरसे का विशेष महत्व होता था। बेटी की विदाई के समय जो पारंपरिक पकवान ससुराल भेजे जाते थे, उनमें अरसा सबसे प्रमुख होता। इसे केवल मिठाई नहीं, बल्कि शुभकामना और समृ(ि का प्रतीक माना जाता था। कई गांवों में आज भी यह परंपरा जीवित है कि विवाह के निमंत्रण के साथ या विवाह के बाद रिश्तेदारों को अरसा और अन्य पारंपरिक पकवान भेंट किए जाते हैं। यह केवल स्वाद नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास बांटने का माध्यम है। उत्तराखण्ड के कई लोकगीतों और मांगल गीतों में पारंपरिक पकवानों का उल्लेख मिलता है। गांवों की महिलाएं जब सामूहिक रूप से अरसा बनाती थीं तो लोकधुनों के बीच पूरा माहौल उत्सव में बदल जाता था। अरसे की तैयारी सामूहिक श्रम, आपसी सहयोग और सामाजिक एकता का प्रतीक हुआ करती थी। आज मशीनों और तैयार मिठाइयों के दौर में वह सामूहिकता कम होती जा रही है, लेकिन बुजुर्गों की स्मृतियों में वह दौर आज भी जीवित है। पहाड़ के ग्रामीण समाज में अरसे को लेकर कई कहावतें प्रचलित रही हैं, जैसेकृअरसा बिना ब्या, जैसे दीप बिना दिया। अर्थात जिस प्रकार दीपक बिना ज्योति के अधूरा है, उसी प्रकार विवाह बिना अरसे के अधूरा माना जाता था। एक और कहावत कही जाती हैकृअरसे की मिठास रिश्तों में बसती है। यह केवल व्यंजन की नहीं, बल्कि पारिवारिक प्रेम और आत्मीयता की भी पहचान है। इन कहावतों का सार यही है कि अरसा सामाजिक जीवन में केवल भोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक रहा है। अरसा बनाना केवल नुस्खा नहीं, बल्कि अनुभव का काम है। चावल कितनी देर भिगोना है, कितना सुखाना है, गुड़ की चाशनी किस तापमान तक पकानी है और मिश्रण को कितनी देर विश्राम देना हैकृइन सभी बातों का संतुलन ही अरसे का असली स्वाद तय करता है। पहले गांवों में यह कला मां से बेटी और दादी से पोती तक पहुंचती थी। लिखित नुस्खों की नहीं, बल्कि अनुभव की परंपरा थी। यही कारण है कि हर गांव के अरसे का स्वाद थोड़ा अलग होता था। आधुनिक पोषण विज्ञान भी मानता है कि यदि अरसा शु( देसी गुड़, स्थानीय चावल और घी से बनाया जाए तो यह कई कृकृत्रिम मिठाइयों की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकता है। गुड़ में आयरन, कैल्शियम और अन्य खनिज तत्व होते हैं, जबकि चावल ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। पहाड़ के कठिन जीवन में यह मिठाई केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि श्रम करने वालों को ऊर्जा देने के लिए भी उपयोगी मानी जाती थी। आज उत्तराखण्ड के गांव तेजी से खाली हो रहे हैं। पलायन के कारण कई घरों की रसोई वर्षों से बंद हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। बाजार की पैक्ड मिठाइयों ने घर में बनने वाले पारंपरिक व्यंजनों की जगह लेनी शुरू कर दी है। नई पीढ़ी अरसे का स्वाद तो जानती है, लेकिन उसे बनाने की विधि बहुत कम लोगों को आती है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में यह परंपरा केवल पुस्तकों और संग्रहालयों तक सीमित होकर रह सकती है। उत्तराखण्ड में महिला स्वयं सहायता समूह, ग्रामीण उद्यमी और स्थानीय स्टार्टअप यदि अरसे को आधुनिक पैकेजिंग, स्वच्छ उत्पादन और ई-कॉमर्स से जोड़ें तो यह बड़ा आर्थिक अवसर बन सकता है। आज लोग पारंपरिक, प्राकृतिक और स्थानीय उत्पादों की ओर लौट रहे हैं। ऐसे समय में अरसा केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि हिमालयी ब्रांड के रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना सकता है। अरसा केवल चावल, गुड़ और घी का मेल नहीं है। यह पहाड़ की मिट्टी की खुशबू, मां के हाथों का स्नेह, दादी की सीख, गांव की चौपाल, मांगल गीतों की गूंज और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृतियों का स्वाद है। जब भी उत्तराखण्ड की किसी रसोई में अरसा तला जाता है, तब केवल एक मिठाई नहीं बनतीकृवहां इतिहास, परंपरा, आत्मीयता और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संकल्प भी फिर से जीवित हो उठता है। यही कारण है कि अरसा आज भी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि देवभूमि की सांस्कृतिक मिठास का सबसे सजीव प्रतीक है।

आस्था, आरोप और सियासत

बदरीनाथ धाम चढ़ावा विवाद पर निष्पक्ष जांच की मांग आस्था, राजनीति व जवाबदेही की कसौटी पर देवभूमि विपक्ष के तीखे सवाल और सरकार का जांच का भरोसा तीर्थपुरोहित बोले-मंदिर की गरिमा सर्वाेपरि, सच आए सामने देहरादून। बदरीनाथ धाम में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं का मामला अब केवल एक प्रशासनिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है। इसने धार्मिक आस्था, मंदिर प्रबंधन की पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है, जहां विपक्ष सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहा है, वहीं राज्य सरकार का कहना है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कर दी गई है और दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। दूसरी ओर, तीर्थपुरोहितों का जोर इस बात पर है कि मंदिर की गरिमा पर कोई आंच न आए और जांच निष्पक्ष व शीघ्र पूरी हो। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि बदरीनाथ धाम करोड़ों श्र(ालुओं की आस्था का केंद्र है। उनका तर्क है कि यदि चढ़ावे के प्रबंधन में कहीं भी अनियमितता हुई है, तो यह केवल वित्तीय मामला नहीं बल्कि श्र(ालुओं के विश्वास से जुड़ा विषय है। विपक्ष ने मांग की है कि जांच पूरी तरह स्वतंत्र, समयब( और पारदर्शी हो। कई नेताओं ने यह भी कहा है कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए ताकि किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे। विपक्ष का आरोप है कि धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय पारदर्शिता को लेकर सख्त निगरानी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है। राज्य सरकार का कहना है कि जैसे ही मामला सामने आया, संबंधित अधिकारियों को जांच के निर्देश दिए गए। सरकार का दावा है कि किसी भी प्रकार की अनियमितता को छिपाने का प्रयास नहीं किया जाएगा और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई होगी। सत्तापक्ष का तर्क है कि जांच पूरी होने से पहले राजनीतिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। उनका कहना है कि सरकार की प्राथमिकता तथ्यों के आधार पर दोष तय करना है, न कि आरोपों के आधार पर निर्णय लेना। बदरीनाथ धाम से जुड़े कई तीर्थपुरोहितों और स्थानीय धार्मिक प्रतिनिधियों का मानना है कि यह मामला अत्यंत संवेदनशील है। उनका कहना है कि करोड़ों श्र(ालु मंदिर में अटूट विश्वास के साथ चढ़ावा अर्पित करते हैं। इसलिए यदि किसी स्तर पर अनियमितता की आशंका भी पैदा होती है, तो उसका निष्पक्ष परीक्षण आवश्यक है। उनका यह भी कहना है कि जांच ऐसी हो जिससे न केवल दोषी सामने आएं, बल्कि मंदिर प्रशासन की विश्वसनीयता भी और मजबूत हो। तीर्थपुरोहितों का आग्रह है कि इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ-हानि के बजाय धार्मिक संस्था की गरिमा के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। बदरीनाथ धाम भारत के चार धामों में से एक है और इसे सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र तीर्थ माना जाता है। परंपरा के अनुसार, इसका पुनरु(ार आदि शंकराचार्य ने किया था। हर वर्ष लाखों श्र(ालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं और श्र(ापूर्वक दान व चढ़ावा अर्पित करते हैं। मंदिर के संचालन और प्रबंधन की व्यवस्था समय के साथ विकसित हुई। आज मंदिर का प्रशासन निर्धारित कानूनी ढांचे और संबंधित प्रबंधन समिति के माध्यम से संचालित होता है। यही कारण है कि चढ़ावे के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर समाज की अपेक्षाएं भी अत्यधिक हैं। धार्मिक स्थलों पर श्र(ालुओं द्वारा दिया गया चढ़ावा केवल आर्थिक संसाधन नहीं होता। वह विश्वास, आस्था और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतीक होता है। यही कारण है कि जब किसी प्रसि( मंदिर में वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आता है, तो उसकी प्रतिक्रिया सामान्य प्रशासनिक मामलों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक होती है। उत्तराखण्ड में धर्म और राजनीति का संबंध हमेशा संवेदनशील रहा है। चारधाम यात्रा राज्य की अर्थव्यवस्था, पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में बदरीनाथ धाम से जुड़ा कोई भी विवाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है। विपक्ष इसे सरकार की जवाबदेही का प्रश्न बना रहा है, जबकि सरकार जांच पूरी होने तक संयम बरतने की बात कह रही है। आने वाले दिनों में जांच की प्रगति और उसके निष्कर्ष ही तय करेंगे कि यह मामला केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित रहेगा या फिर राज्य की राजनीति में बड़ा मुद्दा बनेगा। इस पूरे विवाद से एक बात स्पष्ट होती है कि धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता, आधुनिक वित्तीय प्रबंधन और नियमित स्वतंत्र आडिट की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। इससे न केवल श्र(ालुओं का विश्वास मजबूत होगा, बल्कि मंदिर प्रशासन पर अनावश्यक विवादों की आशंका भी कम होगी। देवभूमि की पहचान उसके मंदिरों से है, लेकिन उन मंदिरों की सबसे बड़ी शक्ति श्र(ालुओं का विश्वास है। इसलिए इस मामले में निष्पक्ष जांच, समयब( कार्रवाई और पारदर्शी निष्कर्ष ही वह रास्ता है, जो आस्था और व्यवस्थाकृदोनों की गरिमा को सुरक्षित रख सकता है।

दावेदारों की ‘फौज’ टिकट की दौड़ में

उत्तराखंड की सियासत में शुरू हुआ शह और मात का खेल चुनावी शंखनाद से सत्ता बचाने और सत्ता पाने की जंग तेज दावेदारी, अपनों की नाराजगी और बाहरी पर होने लगी रार देहरादून। उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी कई महीने शेष हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी बिसात लगभग बिछ चुकी है। इस बार चुनाव से पहले सबसे अधिक चर्चा टिकट वितरण को लेकर है। भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों दलों में कई सीटों पर दावेदारों की लंबी सूची है, जिन विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी की खबरें हैं, उनकी टिकट को लेकर भी राजनीतिक अटकलें तेज हैं। दूसरी ओर कई नए चेहरे भी सक्रिय होकर जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। कई विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय चेहरा बनाम बाहरी उम्मीदवार की बहस भी तेज होती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि चुनावी तैयारियां सामान्य समय-सीमा से पहले शुरू हो गई हैं। इसके पीछे 2027 की शुरुआत में प्रस्तावित कार्यक्रमों और प्रशासनिक व्यस्तताओं को भी एक कारण माना जा रहा है, हालांकि चुनाव कार्यक्रम का अंतिम निर्णय संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा विकास, समान नागरिक संहिता, निवेश, सड़क, रेल, चारधाम यात्रा और बुनियादी ढांचे के विस्तार को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत कर रही है। संगठन स्तर पर भी पार्टी बूथ प्रबंधन, लाभार्थी संपर्क अभियान और कार्यकर्ता सम्मेलन के जरिए चुनावी मशीनरी को सक्रिय करने में जुटी है। हाल के दिनों में संगठन की बैठकों में टिकट वितरण में प्रदर्शन और संगठनात्मक सक्रियता को महत्व देने के संकेत भी दिए गए हैं। लेकिन भाजपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन, बेरोजगारी, महंगाई, सरकारी भर्तियों को लेकर असंतोष, कुछ विधायकों के खिलाफ स्थानीय नाराजगी और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े विवाद विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दे रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी लहर को नियंत्रित करना होगी। उत्तराखण्ड का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां मतदाता सत्ता बदलने की प्रवृत्ति भी दिखाते रहे हैं, हालांकि भाजपा ने 2022 में इस परंपरा को तोड़ा था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व में कांग्रेस जनता के बीच लगातार सक्रिय दिखाई दे रही है। पाटरग् बेरोजगारी, पेपर लीक, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, कानून व्यवस्था और धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है। हाल के दिनों में बदरीनाथ धाम के चढ़ावा विवाद, भूमि, स्थानीय रोजगार और सरकारी निर्णयों को लेकर कांग्रेस ने सरकार पर लगातार हमले तेज किए हैं। पार्टी का मानना है कि यदि जनाक्रोश को संगठनात्मक शक्ति में बदला गया तो 2027 का चुनाव उसके लिए अवसर बन सकता है। हालांकि कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती उसकी अपनी आंतरिक एकजुटता है। टिकट वितरण, स्थानीय गुटबाजी और नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना पार्टी के लिए चुनाव से पहले सबसे कठिन परीक्षा माना जा रहा है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन की विरासत से निकला उत्तराखण्ड क्रांति दल आज भी अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाश रहा है। स्थानीय मूल निवास, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन, पलायन, पर्वतीय विकास और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे यूकेडी की राजनीतिक पहचान रहे हैं। हालांकि संगठनात्मक कमजोरी और लगातार चुनावी पराजय ने उसके प्रभाव को सीमित किया है। यदि भाजपा और कांग्रेस दोनों के टिकट वितरण में असंतोष बढ़ता है तो उसका सीमित राजनीतिक लाभ क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों को मिल सकता है। उत्तराखण्ड की राजनीति अब चुनावी मोड़ पर पहुंच चुकी है। भाजपा सत्ता की हैट्रिक का सपना देख रही है। कांग्रेस सत्ता में वापसी का अवसर तलाश रही है। क्षेत्रीय दल अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अंतिम फैसला राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की जनता का होगा। आने वाले महीनों में टिकट वितरण, चुनावी घोषणाएं, जनसभाएं और स्थानीय मुद्दे यह तय करेंगे कि 2027 की लड़ाई किस दिशा में बढ़ती है। फिलहाल इतना तय है कि देवभूमि में चुनावी शंखनाद हो चुका है और अब हर राजनीतिक कदम सीधे 2027 की सत्ता की सीढ़ियों की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। बाक्स युवाओं का मूड तय करेगा चुनाव राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव युवाओं की आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घूम सकता है। सरकारी नौकरियां, स्वरोजगार, स्टार्टअप, पर्यटन आधारित रोजगार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और कौशल विकास जैसे मुद्दे पहली बार निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। सोशल मीडिया भी इस चुनाव में पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली होगा। राजनीतिक दल अब केवल रैलियों पर नहीं, बल्कि डिजिटल प्रचार, वीडियो अभियान और स्थानीय कंटेंट पर भी बराबर ध्यान दे रहे हैं।

‘हाथियों’ का रास्ता और ‘इंसानों’ की सड़क

हरियाली पर कुल्हाड़ी शिवालिक एलीफेंट रिजर्व में हजारों पेड़ों की कटाई, पर्यावरणविद चिंतित )षिकेश कारिडोर परियोजना के लिए दांव पर लगा 3995 पेड़ों का जीवन विकास और प्रकृति के बीच नई जंग,विकास के नाम पर एक जंगल की मौत देहरादून। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यह पहचान केवल मंदिरों और तीर्थों से नहीं, बल्कि उसके घने जंगलों, वन्यजीवों और हिमालयी पारिस्थितिकी से भी जुड़ी है। लेकिन अब एक बार फिर विकास और पर्यावरण आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। )षिकेश क्षेत्र में प्रस्तावित चार लेन सड़क/कारिडोर परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की कटाई की संभावना ने पर्यावरणविदों, स्थानीय नागरिकों और वन संरक्षण से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, परियोजना के तहत शिवालिक एलीफेंट रिजर्व क्षेत्र में लगभग 3995 पेड़ों को हटाने का प्रस्ताव है, जिसे लेकर व्यापक बहस छिड़ गई है। सरकार और परियोजना से जुड़े विभागों का तर्क है कि )षिकेश और देहरादून के बीच लगातार बढ़ते यातायात दबाव को देखते हुए सड़क का चौड़ीकरण आवश्यक है। उनका कहना है कि इससे जाम कम होगा, यात्रा सुरक्षित बनेगी और चारधाम यात्रा सहित क्षेत्रीय संपर्क बेहतर होगा। लेकिन पर्यावरणविद पूछ रहे हैं कि क्या विकास का एकमात्र रास्ता जंगलों को काटकर ही निकलेगा? उनका कहना है कि यदि मार्ग हाथियों के पारंपरिक आवागमन वाले क्षेत्र से होकर गुजरता है, तो इसके दूरगामी पारिस्थितिक प्रभाव हो सकते हैं। शिवालिक एलीफेंट रिजर्व केवल एक वन क्षेत्र नहीं, बल्कि हाथियों और अन्य वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण आवागमन मार्ग माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कारिडोर वन्यजीवों की आवाजाही और जैव विविधता के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। यदि बड़े पैमाने पर वृक्ष कटान होता है और आवास खंडित होते हैं, तो मानवदृवन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। यही चिंता पर्यावरण समूह लगातार उठा रहे हैं। इस परियोजना को लेकर न्यायिक स्तर पर भी सवाल उठ चुके हैं। एक याचिका की सुनवाई के दौरान उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने यह पूछा था कि क्या पेड़ों की कटाई कम करने के लिए एलिवेटेड रोड जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने संबंधित पक्षों से वैकल्पिक सुझावों पर भी जवाब मांगा था। यही प्रश्न आज आम नागरिक भी पूछ रहा हैकृयदि तकनीकी विकल्प उपलब्ध हैं, तो क्या पर्यावरणीय नुकसान कम करने वाले मॉडल को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए?यही उत्तराखण्ड वह भूमि है जहां से विश्वप्रसि( चिपको आंदोलन ने जन्म लिया। ग्रामीण महिलाओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने पेड़ों से चिपककर जंगलों को बचाने का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाया। आज उसी राज्य में विकास परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर वृक्ष कटान की खबरें लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि क्या विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की हमारी क्षमता कमजोर पड़ रही है? एक परिपक्व पेड़ केवल लकड़ी नहीं होता। वह पक्षियों का घर, मिट्टी का संरक्षक, भूजल संरक्षण का माध्यम और कार्बन अवशोषण का महत्वपूर्ण स्रोत होता है। हजारों पेड़ों का हटना केवल हरियाली कम होना नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर डाल सकता है। उत्तराखण्ड पहले ही जंगल की आग, भूस्खलन, अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में पर्यावरण विशेषज्ञ विकास परियोजनाओं में अधिक संवेदनशील योजना बनाने की मांग कर रहे हैं। सरकार का पक्ष यह है कि आधुनिक सड़कें राज्य की आर्थिक प्रगति, पर्यटन, आपदा प्रबंधन और आवागमन के लिए आवश्यक हैं। साथ ही, परियोजनाओं के तहत प्रतिपूरक वनीकरण और अन्य पर्यावरणीय शर्तों का पालन किया जाता है। हालांकि, पर्यावरण समूहों का कहना है कि केवल पौधे लगा देना दशकों पुराने प्राकृतिक जंगलों की भरपाई नहीं कर सकता। वह प्रतिपूरक पौधरोपण की गुणवत्ता और उसकी दीर्घकालिक सफलता पर भी सवाल उठाते रहे हैं। उत्तराखण्ड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में यह बहस केवल एक सड़क परियोजना तक सीमित नहीं है। प्रश्न यह है कि आने वाले वर्षों में राज्य किस प्रकार का विकास मॉडल अपनाएगाकृऐसा जो तेज़ तो हो, लेकिन प्रकृति की कीमत पर या ऐसा जो आधुनिक भी हो और पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी भी। )षिकेश कारिडोर का विवाद केवल पेड़ों की संख्या का विवाद नहीं है। यह उस सोच की परीक्षा है, जिसमें विकास और पर्यावरण को विरोधी नहीं बल्कि साझेदार माना जाना चाहिए। देवभूमि की पहचान केवल चौड़ी सड़कों से नहीं बनेगी। उसकी असली ताकत उसके जंगल, नदियां और जैव विविधता हैं। यदि विकास की दौड़ में इन्हीं को सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़े, तो आने वाली पीढ़ियां शायद हमसे यही पूछेंकृक्या हमने सड़कें तो बना लीं, लेकिन जंगल बचा पाए?

बुधवार, 8 जुलाई 2026

जनभावनाओं से दूर भाग रही सरकार

गणेश गोदियाल का सीएम धामी पर तीखा हमला कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बोले-जनता सब देख रही सत्ता के अहंकार का जवाब विस चुनाव में मिलेगा देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज हो गया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटका रही है और सत्ता का अहंकार अब खुलकर दिखाई देने लगा है। अपने संबोधन में गोदियाल ने कहा कि मुख्यमंत्री अपनी राजनीतिक पहचान और जनभावनाओं से भी दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश की जनता सब कुछ समझ रही है और आने वाले समय में इसका जवाब लोकतांत्रिक तरीके से देगी। कांग्रेस नेता ने राज्य में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और विकास कार्यों की गति जैसे मुद्दों को उठाते हुए सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि सरकार प्रचार पर अधिक और जनसमस्याओं के समाधान पर कम ध्यान दे रही है। उधर, भाजपा की ओर से इन आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बताया जा सकता है। भाजपा लगातार यह दावा करती रही है कि राज्य में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, निवेश और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में तेजी से काम हो रहा है तथा विपक्ष तथ्यों के बजाय आरोपों की राजनीति कर रहा है। विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच कांग्रेस लगातार सरकार को जनहित के मुद्दों पर घेरने की रणनीति अपना रही है। वहीं भाजपा अपनी विकास योजनाओं और संगठनात्मक मजबूती के दम पर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। ऐसे में दोनों दलों के बीच राजनीतिक बयानबाजी आने वाले महीनों में और तेज होने की संभावना है।

बदरीनाथ में चढ़ावे से चोरी पर ‘महासियासत’

विधायक ने खोला मोर्चा, बोलेकृ जांच हुई तो सामने आएगा ऐतिहासिक घोटाला बदरीनाथ विधायक ने धरना देकर की बीकेटीसी अध्यक्ष से इस्तीफे की मांग राम मंदिर से बड़ी चोरी का हो सकता है खुलासा,कृविधायक का दावा सीएम ने गठित की हाईलेवल जांच समिति, बीकेटीसी ने पीए को किया निलंबित देहरादून। बदरीनाथ धाम में श्र(ालुओं के चढ़ावे से कथित चोरी का मामला अब केवल प्रशासनिक जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र के विधायक ने मामले को लेकर धरना देकर विरोध दर्ज कराया और बदरी-केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष से नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की मांग करते हुए पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई। धरने के दौरान विधायक ने दावा किया कि यह मामला सामान्य चोरी का नहीं है, बल्कि जांच आगे बढ़ने पर राम मंदिर से भी बड़ी चोरी का खुलासा हो सकता है। उनके इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उच्चस्तरीय जांच के निर्देश दिए हैं। सरकार ने गढ़वाल मंडल आयुक्त की अध्यक्षता में हाईलेवल जांच समिति गठित कर पूरे प्रकरण की तह तक जाने को कहा है। सरकार का कहना है कि दोषी चाहे कोई भी हो, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और श्र(ालुओं की आस्था से किसी भी प्रकार का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जांच शुरू होते ही बदरी-केदार मंदिर समिति ने भी प्रारंभिक कार्रवाई करते हुए अध्यक्ष के निजी सहायक प्रमोद नौटियाल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। समिति का कहना है कि जांच पूरी होने तक आवश्यक प्रशासनिक कदम उठाए जा रहे हैं और किसी भी दोषी को संरक्षण नहीं दिया जाएगा। चढ़ावे की कथित चोरी का मामला अब विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का बड़ा राजनीतिक हथियार बनता दिखाई दे रहा है। विपक्ष का आरोप है कि देवभूमि के सबसे बड़े मंदिरों में श्र(ालुओं की आस्था और दान की सुरक्षा पर सवाल उठना बेहद गंभीर विषय है। ऐसे मामलों में केवल निलंबन पर्याप्त नहीं, बल्कि जवाबदेही तय होनी चाहिए। चारधाम यात्रा के दौरान करोड़ों श्र(ालु बदरीनाथ धाम पहुंचते हैं। ऐसे में चढ़ावे में कथित अनियमितता का मामला सरकार और मंदिर समिति दोनों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। यदि जांच में बड़े स्तर की वित्तीय गड़बड़ी सामने आती है तो इसका असर केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी महसूस किया जा सकता है। अब पूरे प्रदेश की निगाहें हाईलेवल जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं। यह जांच तय करेगी कि मामला केवल कुछ कर्मचारियों की लापरवाही तक सीमित है या फिर इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क अथवा संगठित अनियमितता है। फिलहाल, बदरीनाथ धाम में कथित चढ़ावा चोरी का मामला आस्था, प्रशासन और राजनीतिकृतीनों के केंद्र में आ चुका है।

‘चौलाई’ है पहाड़ का ‘लाल सोना’

हमने खेतों से चौलाई को निकाला और दुनिया ने सिर आंखों पर बैठा दिया पहाड़ में गांवों के खेतों से गायब होती लाल-बैंगनी चौलाई की है यह कहानी दुनिया कर रही सुपरफूड की तलाश, सदियों से उगता है पहाड़ के खेतों में देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में जब बरसात के बाद खेत लाल और बैंगनी रंग की लंबी-लंबी बालियों से भर जाते हैं, तो किसान समझ जाते हैं कि मर्छू, यानी चौलाई की फसल तैयार है। कभी पहाड़ के लगभग हर गांव में इसकी खेती होती थी, लेकिन आधुनिक खेती, पलायन और बदलती खान-पान की आदतों ने इस पारंपरिक फसल को धीरे-धीरे खेतों से दूर कर दिया है। विडंबना यह है कि जिसे पहाड़ का किसान कभी सामान्य अनाज मानता था, आज वही चौलाई दुनिया भर में सुपरफूड के रूप में पहचानी जा रही है। चौलाई प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम और फाइबर से भरपूर होती है। ग्लूटेन-फ्री होने के कारण इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे संतुलित आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। उत्तराखंड में मर्छू के दानों से लड्डू, चिक्की, खीर और आटा बनाया जाता है। इसकी हरी पत्तियों की स्वादिष्ट सब्जी भी तैयार की जाती है। त्योहारों और व्रत-उपवास के दिनों में भी चौलाई का विशेष महत्व रहा है। चौलाई की खेती कम पानी और सीमित संसाधनों में भी अच्छी होती है। पहाड़ी क्षेत्रों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी यह अच्छी पैदावार देती है। यदि इसकी वैज्ञानिक खेती, प्रसंस्करण और ब्रांडिंग की जाए तो यह किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। एक समय था जब हर गांव में चौलाई की लाल बालियां खेतों की शोभा बढ़ाती थीं। आज पलायन और खेती से बढ़ती दूरी के कारण इसकी खेती लगातार घट रही है। नई पीढ़ी इसके स्वाद और महत्व से भी अनजान होती जा रही है। मिलेट्स और पारंपरिक अनाजों को बढ़ावा देने की राष्ट्रीय पहल के बीच उत्तराखंड की चौलाई को भी नई पहचान मिल सकती है। यदि सरकार, कृषि विभाग और स्वयं सहायता समूह मिलकर इसके मूल्य संवर्धन पर काम करें तो ष्उत्तराखंड चौलाईष् देश-विदेश के बाजारों में एक मजबूत ब्रांड बन सकती है। मर्छू या चौलाई केवल एक फसल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की कृषि परंपरा, पोषण सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है, जिस फसल को कभी सामान्य समझकर भुलाया जा रहा था, वही आज आधुनिक जीवनशैली में स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में फिर से सम्मान पा रही है। अब जरूरत इस बात की है कि पहाड़ के खेतों में एक बार फिर चौलाई की लाल बालियां लहराएं और किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिले।

‘नायक’ आंदोलन से सत्ता तक बना ‘मोहरा’

यूकेडी के साथ हुआ उत्तराखंड आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक छल आंदोलन यूकेडी ने खड़ा किया, सत्ता की फसल भाजपा-कांग्रेस ने काटी आंदोलन की मशाल से सत्ता के अंधियारे तक एक क्षेत्रीय दल की त्रासदी देहरादून। राजनीति में एक कहावत हैकृबैल जितना सीधा होगा, हल उसी के कंधों पर रखा जाएगा। उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास पढ़ते समय यह कहावत बार-बार याद आती है। सवाल केवल यह नहीं कि उत्तराखंड किसने बनाया, बल्कि यह भी है कि जिस दल ने राज्य आंदोलन की आग जलाए रखी, वह सत्ता के दरवाजे तक पहुंचने से पहले ही हाशिए पर कैसे चला गया? यह कहानी केवल चुनावी हार की नहीं है। यह कहानी राजनीतिक दूरदर्शिता और रणनीतिक भूलों की है। यह कहानी उस क्षेत्रीय दल की है, जिसने उत्तराखंड की अस्मिता को जनांदोलन बनाया, लेकिन राजनीतिक शतरंज की बिसात पर अपने ही मोहरे गंवा बैठा। बता दें कि वर्ष 1994 का उत्तराखंड आंदोलन अपने उफान पर था। गांव-गांव, कस्बे-कस्बे और शहरों की सड़कों पर एक ही मांग थीकृअलग उत्तराखंड राज्य। उस दौर में उत्तराखंड क्रांति दल केवल एक राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि आंदोलन की धड़कन था। जनता की पहली उम्मीद, युवाओं का पहला मंच और राज्य निर्माण का सबसे मुखर राजनीतिक चेहरा। उस समय हालात ऐसे थे कि उत्तराखंड में यूकेडी की स्वीकार्यता किसी समानांतर राजनीतिक सत्ता से कम नहीं थी। दूसरी ओर, भाजपा और कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय दल आंदोलन की दिशा को लेकर असमंजस में दिख रहे थे। स्थानीय स्तर पर उनके कई नेता खुलकर नेतृत्व करने से बच रहे थे। यानी जनभावनाओं का पूरा केंद्र यूकेडी थी और यहीं से शुरू हुआ खेल और यूकेडी समझ ही नहीं पाई। जब आंदोलन अपने चरम पर था, तभी उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति का गठन हुआ। इसे आंदोलन को व्यापक बनाने का प्रयास बताया गया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में वर्षों से यह चर्चा रही है कि यहीं से यूकेडी की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान कमजोर पड़ने लगी। यूकेडी के झंडे की जगह संघर्ष समिति का बैनर दिखाई देने लगा। पार्टी का अलग संगठनात्मक चेहरा धुंधला पड़ गया। आंदोलन का नेतृत्व सामूहिक मंच के हवाले हो गया। यही वह मोड़ था, जहां आंदोलन की कमान तो यूकेडी के पास रही, लेकिन उसकी राजनीतिक ब्रांडिंग धीरे-धीरे उसके हाथ से फिसलती चली गई। राजनीति में भावनाएं जरूरी होती हैं, लेकिन केवल भावनाओं से सत्ता नहीं मिलती। सत्ता के लिए रणनीति चाहिए। 1996 का लोकसभा चुनाव आया। )षिकेश स्थित आईडीपीएल में हुई बैठक में संयुक्त संघर्ष समिति ने नारा दिया राज्य नहीं तो चुनाव नहीं। नारा सुनने में क्रांतिकारी था। मकसद केंद्र सरकार पर दबाव बनाना था। यूकेडी ने इसे आंदोलन की नैतिक लड़ाई मानकर पूरी ताकत चुनाव बहिष्कार में झोंक दी। लेकिन यहीं राजनीति ने अपना असली रंग दिखाया और यूकेडी सड़कों पर रही और भाजपा और कांग्रेस बैलेट पर पहुंच गईं। एक तरफ यूकेडी चुनाव का विरोध करती रही। दूसरी तरफ भाजपा और कांग्रेस बिना किसी हिचकिचाहट के चुनाव मैदान में उतर गईं। मतदान प्रतिशत कम रहा। आंदोलन का असर भी साफ दिखा। लेकिन लोकतंत्र में इतिहास नारे नहीं, मतपेटियां लिखती हैं। कम मतदान के बावजूद राष्ट्रीय दल चुनाव जीत गए। यानी जिस आंदोलन को खड़ा करने में यूकेडी ने अपनी पूरी राजनीतिक पूंजी लगा दी, उसी आंदोलन की जनभावनाओं का चुनावी लाभ भाजपा और कांग्रेस अपने खाते में दर्ज कराने में सफल रहीं। यूकेडी के हिस्से आया संघर्ष और राष्ट्रीय दलों के हिस्से आई सत्ता। यहीं से उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास जन्म लेता है, जिस दल ने अलग राज्य का सपना गांव-गांव पहुंचाया, वह सत्ता की दौड़ से बाहर होता चला गया और जिन राष्ट्रीय दलों पर कभी आंदोलन से दूरी बनाने के आरोप लगे, वही आगे चलकर उत्तराखंड की सत्ता के सबसे बड़े दावेदार बन गए। आंदोलन का नैतिक श्रेय यूकेडी के पास रहा, लेकिन राजनीतिक लाभ भाजपा और कांग्रेस के खाते में दर्ज होता गया। क्या यह राजनीतिक मासूमियत थी या रणनीतिक आत्मघात? आज भी यह सवाल राजनीतिक गलियारों में गूंजता है। क्या यूकेडी ने आंदोलन को राजनीति से अलग मानने की भूल की? क्या उसे यह समझने में देर हो गई कि जनांदोलन और चुनावी राजनीति दो अलग-अलग यु( क्षेत्र होते हैं? क्या उसने विरोधियों की राजनीतिक चाल को बहुत देर से पहचाना? या फिर क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई लड़ते-लड़ते उसने सत्ता की राजनीति को महत्व ही नहीं दिया? इन सवालों के जवाब अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इतना तय है कि इतिहास इस मोड़ को यूकेडी की सबसे बड़ी रणनीतिक चूक के रूप में याद करता है। उत्तराखंड बनने के 25 वर्ष बाद भी यह अध्याय केवल इतिहास नहीं है। यह हर उस क्षेत्रीय दल के लिए चेतावनी है, जो जनभावनाओं का नेतृत्व तो करता है, लेकिन उन्हें चुनावी ताकत में बदलने की रणनीति नहीं बना पाता। राजनीति में संघर्ष जरूरी है, लेकिन संघर्ष को सत्ता तक पहुंचाने की कला उससे भी ज्यादा जरूरी होती है। उत्तराखंड आंदोलन ने राज्य दिया, लेकिन राजनीति ने यह भी सिखा दिया कि जो केवल मशाल उठाता है, जरूरी नहीं कि मंजिल तक पहुंचने का श्रेय भी उसी को मिले और शायद इसी कारण उत्तराखंड की राजनीति में आज भी यह प्रश्न अनुत्तरित है। क्या यूकेडी को जनता ने हराया था, या वह राजनीतिक शतरंज की ऐसी चाल में फंस गई, जहां जीत किसी और की पहले से तय थी?

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

पहाड़ की ‘कौणी’ बदलेगी ‘तकदीर’

पहाड़ की थाली का भूला-बिसरा स्वाद फिर बना सेहत का सितारा कभी हर गांव के खेतों में लहलहाती थी कौणी, अब बना सुपरफूड किसानों के लिए बन सकती है आय का जरिया,बाजार में बढ़ी मांग देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी कौणी केवल एक अनाज नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। बरसात के मौसम में खेतों में लहलहाती कौणी की बालियां और सर्दियों में इसकी खीर, भात व रोटी हर घर की रसोई की पहचान हुआ करती थीं। समय के साथ आधुनिक खेती, पलायन और बदलती खानपान की आदतों ने इस पारंपरिक फसल को हाशिए पर पहुंचा दिया। लेकिन अब स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने कौणी को फिर से चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। आज के दौर में यदि कौणी की खेती को प्रोत्साहन दिया जाए और इसे संगठित बाजार से जोड़ा जाए तो यह उत्तराखंड के पर्वतीय किसानों के लिए आर्थिक मजबूती का बड़ा आधार बन सकती है। कौणी पहाड़ की जलवायु के अनुकूल पारंपरिक मोटा अनाज है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह कम पानी, कम उर्वरक और सीमित संसाधनों में भी अच्छी पैदावार देती है। यही कारण है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में वर्षों तक यह किसानों की पसंदीदा फसल रही। जलवायु परिवर्तन और घटते जलस्रोतों के दौर में कृकृषि विशेषज्ञ अब कौणी जैसी फसलों को भविष्य की टिकाऊ खेती का आधार मान रहे हैं। कौणी में प्रोटीन, फाइबर, आयरन, कैल्शियम और कई आवश्यक खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे स्वास्थ्यवर्धक आहार माना जाता है। चिकित्सकों के अनुसार यह मधुमेह, मोटापा और पाचन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए भी लाभकारी हो सकती है। पहाड़ों में आज भी कई परिवार कौणी की खीर, भात, दलिया और रोटी को पारंपरिक भोजन के रूप में तैयार करते हैं। पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन, खेती में घटती रुचि और जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक ने कौणी की खेती पर भी असर डाला, जिन गांवों में कभी बड़े पैमाने पर इसकी खेती होती थी, वहां अब यह सीमित क्षेत्रों तक सिमट गई है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युवाओं को आधुनिक तकनीक, बाजार और उचित मूल्य उपलब्ध कराया जाए तो कौणी की खेती फिर से गांवों में रोजगार का माध्यम बन सकती है। देश-विदेश में मोटे अनाजों की बढ़ती मांग का लाभ उत्तराखंड को भी मिल सकता है। आर्गेनिक उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता के बीच कौणी अब हेल्थ फूड के रूप में अपनी पहचान बना रही है। बड़े शहरों के सुपरमार्केट, आनलाइन प्लेटफार्म और जैविक उत्पादों की दुकानों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार कौणी की ब्रांडिंग, प्रोसेसिंग और विपणन पर विशेष ध्यान दे तो यह किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पलायन रोकने में भी सहायक साबित हो सकती है। कौणी केवल एक फसल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। पहाड़ की पारंपरिक कृकृषि व्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण स्थान रहा है। बदलते समय में जब दुनिया रसायन मुक्त और पौष्टिक भोजन की ओर लौट रही है, तब कौणी जैसी पारंपरिक फसलें उत्तराखंड की नई पहचान बन सकती हैं। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि कौणी को पर्यटन, होमस्टे और स्थानीय व्यंजनों से जोड़ा जाए तो यह राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बता दें कि जिस कौणी को कभी पहाड़ की मजबूरी समझकर लोग छोड़ने लगे थे, वही आज स्वास्थ्य और पोषण का प्रतीक बनकर नई पहचान हासिल कर रही है। यदि नीति, बाजार और किसानों का साथ मिला तो यह पारंपरिक फसल केवल खेतों में ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था और पहचान में भी फिर से मजबूती के साथ लौट सकती है।

70 सीटों का ‘मैजिक’ नंबर 36

चुनाव से पहले गठबंधन और सीटों के तालमेल की सुगबुगाहट बहुमत के आंकड़े के लिए सियासी दल तैयार कर रहे प्लान-बी 70 सीटों वाले उत्तराखंड में एकला चलो या चुनावी साझेदारी छोटे दलों और निर्दलीयों की भूमिका पर होने लगा मंथन तेज देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अभी कुछ महीने दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। भाजपा और कांग्रेस जहां अपने-अपने बूथ संगठन को मजबूत करने में जुटी हैं, वहीं पर्दे के पीछे संभावित गठबंधनों और सीटों के तालमेल को लेकर चर्चाओं का दौर भी तेज हो गया है। हालांकि अभी तक किसी बड़े दल ने औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं की है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि चुनाव नजदीक आते-आते कई सीटों पर रणनीतिक समझौते देखने को मिल सकते हैं। उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों में बहुमत का आंकड़ा 36 है। ऐसे में हर सीट का महत्व बढ़ जाता है और यही वजह है कि दल अब जीतने की क्षमता वाले उम्मीदवारों के साथ-साथ संभावित चुनावी साझेदारों के विकल्प भी तलाश रहे हैं। प्रदेश में भले ही मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच हो, लेकिन कई सीटों पर क्षेत्रीय दल, निर्दलीय और स्थानीय प्रभाव वाले नेता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसी कारण प्रमुख दल ऐसे क्षेत्रों का आकलन कर रहे हैं, जहां सीधे मुकाबले के बजाय तालमेल अधिक लाभकारी साबित हो सकता है। चर्चा है कि कुछ क्षेत्रीय दल अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में सम्मानजनक सीटों की मांग रख सकते हैं, जबकि बड़े दल भी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए सीमित स्तर पर समझौते का विकल्प खुला रखना चाहते हैं। कांग्रेस संगठन विस्तार के साथ-साथ विपक्षी मतों के एकीकरण की रणनीति पर भी काम कर रही है। पार्टी के भीतर यह आकलन किया जा रहा है कि किन सीटों पर स्थानीय सामाजिक समीकरणों के आधार पर सहयोगी दलों या प्रभावशाली नेताओं के साथ तालमेल लाभदायक हो सकता है। हालांकि प्रदेश नेतृत्व की ओर से अभी गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है। दूसरी ओर भाजपा का फोकस फिलहाल संगठन और बूथ प्रबंधन पर दिखाई दे रहा है। पार्टी नेतृत्व कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव तक पहुंच बढ़ाने और सत्ता विरोधी माहौल को सीमित करने की रणनीति पर काम कर रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा की प्राथमिकता फिलहाल अपने दम पर चुनाव लड़ने की होगी, लेकिन स्थानीय स्तर पर समीकरणों पर नजर बनाए रखी जाएगी। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि टिकट वितरण और गठबंधन की रणनीति एक-दूसरे से जुड़ी होगी। यदि किसी सीट पर संभावित सहयोगी दल को स्थान दिया जाता है तो वहां टिकट के दावेदारों की नाराजगी भी सामने आ सकती है। इसलिए दल पहले आंतरिक सर्वे, जीत की संभावना और स्थानीय समीकरणों का आकलन कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार प्रमुख दल कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों के लिए अलग-अलग रणनीति तैयार कर रहे हैं, जिन सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है, वहां गठबंधन की चर्चा अधिक है, जबकि सीधी टक्कर वाली सीटों पर दल अपने मजबूत प्रत्याशी उतारने के पक्ष में हैं।

बूथ स्तर पर ‘किलाबंदी’ में जुटी भाजपा

चुनाव से पहले राजनीतिक खालीपन खत्म करेगी भाजपा, प्रकोष्ठों के जरिए तैयार की जमीनी फौज कार्यकर्ताओं के दम पर बूथ मजबूत करेगी भाजपा, 10 हजार की फौज को मैदान में उतरने का टास्क 2027 विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को सूक्ष्म स्तर पर उतारने की रणनीति, हर वर्ग तक पहुंच बनाने पर जोर देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी तैयारियों को अब संगठन के सबसे निचले स्तर तक पहुंचाने का फैसला कर लिया है। प्रदेश भाजपा ने अपने विभिन्न संगठनात्मक प्रकोष्ठों के माध्यम से 10 हजार से अधिक कार्यकर्ताओं की चुनावी फौज मैदान में उतारने की रणनीति तैयार की है। उद्देश्य साफ हैकृसरकार की योजनाओं का लाभ और संदेश सीधे मतदाता तक पहुंचे, बूथ स्तर पर संगठन सक्रिय रहे और चुनावी मुकाबले से पहले कोई भी राजनीतिक खालीपन न बचे। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने प्रकोष्ठों की महत्वपूर्ण बैठक में स्पष्ट संदेश दिया कि अब चुनाव केवल बड़े जनसभाओं या सोशल मीडिया से नहीं जीते जाएंगे, बल्कि बूथ, बस्ती और परिवार स्तर पर सतत संपर्क ही जीत की असली कुंजी होगा। उन्होंने सभी प्रकोष्ठों को मंडल और बूथ स्तर तक अपनी मजबूत इकाइयों का गठन शीघ्र पूरा करने के निर्देश दिए। भाजपा की नई रणनीति पारंपरिक चुनाव प्रचार से आगे बढ़कर माइक्रो मैनेजमेंट पर आधारित दिखाई दे रही है। पार्टी चाहती है कि किसान, युवा, महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, व्यापारी, पूर्व सैनिक, चिकित्सा, शिक्षा, विधि, आईटी और अन्य सामाजिक वर्गों से जुड़े प्रकोष्ठ सीधे अपने-अपने समाज के बीच सक्रिय रहें। भाजपा इस माडल के जरिए हर वर्ग तक अलग-अलग संदेश पहुंचाने की तैयारी कर रही है। इससे पार्टी को स्थानीय मुद्दों की जानकारी भी मिलेगी और संगठन की पकड़ भी मजबूत होगी। बैठक में कार्यकर्ताओं से कहा गया कि वह सरकार की विकास योजनाओं, जनकल्याणकारी कार्यक्रमों और पिछले वर्षों में हुए कार्यों को गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचाएं। यानी भाजपा का चुनावी नैरेटिव एक बार फिर विकास और डिलीवरी पर केंद्रित रहने वाला है। पार्टी का आकलन है कि यदि योजनाओं के लाभार्थियों से सीधे संवाद मजबूत हुआ तो सत्ता विरोधी माहौल को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। भाजपा की यह सक्रियता ऐसे समय सामने आई है जब कांग्रेस प्रदेशभर में संगठन विस्तार और परिवर्तन के संदेश के साथ कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुटी है। ऐसे में भाजपा का प्रकोष्ठ अभियान केवल संगठनात्मक कवायद नहीं, बल्कि विपक्ष की राजनीतिक सक्रियता का जवाब भी माना जा रहा है। दोनों दल अब जनसभाओं से ज्यादा कैडर आधारित चुनाव की तैयारी कर रहे हैं, जो पार्टी बूथ स्तर पर मजबूत होगी, वही चुनावी बढ़त हासिल कर सकती है। भाजपा की कोशिश है कि प्रत्येक बूथ पर ऐसा कार्यकर्ता मौजूद हो, जो स्थानीय मतदाताओं से लगातार संपर्क बनाए रखे। यही वजह है कि प्रकोष्ठों को केवल औपचारिक संगठन नहीं, बल्कि चुनावी अभियान का सक्रिय हिस्सा बनाया जा रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार आने वाले महीनों में प्रकोष्ठों के प्रशिक्षण शिविर, लाभार्थी सम्मेलन, सामाजिक संवाद कार्यक्रम और घर-घर संपर्क अभियान भी तेज किए जाएंगे। भाजपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू संगठन और सरकार के बीच समन्वय भी है। सरकार की योजनाओं का राजनीतिक लाभ तभी मिलेगा, जब संगठन उन्हें प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाए। यही कारण है कि इस बार संगठनात्मक ढांचे को पहले से अधिक सक्रिय बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

चुनाव से पहले बदला राजनीतिक नैरेटिव

धामी सरकार विकास के बजाय कर रही विभाजन की राजनीति, कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा दसौनी का हमला कांग्रेस का आरोप, रोजगार और पलायन जैसे मूल मुद्दों को छोड़ ध्रुवीकरण में जुटी प्रदेश सरकार जनहित के वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान भटका रही प्रदेश की धामी सरकार कांग्रेस देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की सरगर्मियों के बीच प्रदेश में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक हमले तेज होते जा रहे हैं। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार पर विकास के बजाय विभाजन की राजनीतिष् करने का आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने रोजगार, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और पलायन जैसे मूल मुद्दों पर अपेक्षित परिणाम देने के बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण को प्राथमिकता दी है। प्रदेश कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि धामी सरकार ने विकास के नए मानक स्थापित करने के बजाय समाज को विभाजित करने की राजनीति के नए रिकार्ड बनाए हैं। उनका आरोप था कि सरकार जनहित के वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने का प्रयास कर रही है। दसौनी ने कहा कि प्रदेश की जनता आज रोजगार, महंगाई, पलायन, किसानों की समस्याओं, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं पर जवाब चाहती है। उनका कहना था कि इन विषयों पर ठोस चर्चा करने के बजाय सरकार लगातार ऐसे मुद्दों को आगे बढ़ा रही है, जिनसे राजनीतिक बहस तो होती है लेकिन आम लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान नहीं निकलता। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपनी उपलब्धियों का ठोस लेखा-जोखा देने के बजाय भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दों के सहारे जनमत को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, भाजपा विकास की उपलब्धियों के बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण को चुनावी रणनीति का हिस्सा बना रही है। दसौनी ने दावा किया कि प्रदेश में बेरोजगार युवाओं, महिलाओं, व्यापारियों और किसानों के बीच कई सवाल हैं, लेकिन सरकार उन पर खुलकर चर्चा करने से बच रही है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार अपने काम को लेकर आश्वस्त है तो उसे रोजगार सृजन, निवेश, स्वास्थ्य, शिक्षा और पलायन रोकने के प्रयासों पर सार्वजनिक बहस के लिए तैयार होना चाहिए। कांग्रेस प्रवक्ता ने भाजपा के विकास संबंधी दावों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार बड़ी घोषणाएं तो करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर उनके परिणाम अपेक्षित नहीं दिखाई देते। उनका आरोप था कि प्रदेश के दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा संस्थान और रोजगार के अवसर बड़ी चुनौती बने हुए हैं। दसौनी ने कहा कि सरकार को यह बताना चाहिए कि युवाओं के लिए स्थायी रोजगार, गांवों से पलायन रोकने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए हैं। कांग्रेस ने कहा कि विपक्ष का दायित्व सरकार से जवाब मांगना है और जनता से जुड़े मुद्दे उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। दसौनी ने कहा कि सरकार आलोचना को राजनीतिक विरोध मानने के बजाय उसे सुधार के अवसर के रूप में देखे। उत्तराखंड की राजनीति अब स्पष्ट रूप से चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। कांग्रेस विकास बनाम विभाजन की बहस को प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा अपने विकास कार्यों और संगठनात्मक मजबूती के आधार पर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनावी विमर्श का केंद्र रोजगार, पलायन, महंगाई और विकास जैसे मुद्दे बनते हैं या फिर राजनीतिक और वैचारिक बहसें अधिक प्रभावी रहती हैं। इतना तय है कि 2027 का चुनाव केवल नारों का नहीं, बल्कि जनता के बीच विश्वसनीयता और मुद्दों की लड़ाई भी होगा।

सोमवार, 6 जुलाई 2026

बदरीनाथ के ‘खजाने’ पर घमासान

पारदर्शी शासन के दावों की भी निकली हवा विपक्ष ने उठाए चढ़ावे के प्रबंधन पर सवाल साख बचाने की चुनौती में घिरी धामी सरकार प्रदेश सरकार की चुप्पी से गरमा गई सियासत देहरादून। भगवान बदरीविशाल के चरणों में चढ़ने वाला चढ़ावा अब राजनीतिक गलियारों में बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। बदरीनाथ धाम के चढ़ावे के प्रबंधन और उसके उपयोग को लेकर उठे सवालों ने धामी सरकार को विपक्ष के निशाने पर ला खड़ा किया है। विपक्ष जहां पूरे मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहा है, वहीं सरकार इसे अनावश्यक विवाद बताकर बचाव की मुद्रा में दिखाई दे रही है। लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मामला केवल मंदिर प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार की विश्वसनीयता और उसके पारदर्शी शासन के दावे की भी परीक्षा बन गया है। उत्तराखंड की राजनीति में धार्मिक आस्था हमेशा से संवेदनशील विषय रही है। चारधाम यात्रा राज्य की आर्थिकी और सांस्कृतिक पहचान दोनों का आधार है। ऐसे में बदरीनाथ धाम के चढ़ावे को लेकर उठे सवाल सीधे करोड़ों श्र(ालुओं की भावनाओं से जुड़ गए हैं। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आरोपों का खंडन नहीं, बल्कि भरोसा कायम रखने की है। यदि चढ़ावे के प्रबंधन में सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो सरकार को विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करने में संकोच क्यों होना चाहिए? यही वह सवाल है, जो विपक्ष को हमलावर होने का अवसर दे रहा है। प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से विपक्ष किसी ऐसे मुद्दे की तलाश में था, जो भाजपा सरकार को रक्षात्मक स्थिति में ला सके। अंकिता भंडारी प्रकरण, भर्ती घोटाले और भू-कानून जैसे मुद्दों के बाद अब बदरीनाथ चढ़ावा विवाद विपक्ष के हाथ में एक नया राजनीतिक हथियार बनता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे केवल वित्तीय पारदर्शिता का मामला नहीं, बल्कि आस्था और जवाबदेही का प्रश्न बना रहे हैं। उनका तर्क है कि जब सरकार हर क्षेत्र में पारदर्शिता की बात करती है, तो फिर मंदिरों से जुड़े आर्थिक मामलों में पूरी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? भाजपा की राजनीति का एक बड़ा आधार धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दे रहे हैं। पार्टी स्वयं को सनातन परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं की संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ऐसे में यदि आस्था के किसी मुद्दे पर सरकार सवालों के घेरे में आती है, तो उसका राजनीतिक असर सामान्य विवादों से कहीं अधिक होता है। यदि सरकार समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं करती है तो विपक्ष इस मुद्दे को गांव-गांव तक ले जाने की कोशिश करेगा। 2027 के विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने-अपने मुद्दों की जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। ऐसे में यह विवाद आने वाले समय में और बड़ा रूप ले सकता है।बदरीनाथ चढ़ावा विवाद ने एक बार फिर चारधाम देवस्थानम बोर्ड प्रकरण की यादें ताजा कर दी हैं। उस समय भी सरकार को तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा था और अंततः उसे पीछे हटना पड़ा था। उस प्रकरण ने यह संदेश दिया था कि देवभूमि में धार्मिक मामलों पर सरकार को बेहद सतर्क रहना पड़ता है और संवादहीनता राजनीतिक संकट में बदल सकती है। आज की स्थिति भी कुछ वैसी ही प्रतीत हो रही है। सरकार जितना इस मुद्दे पर चुप रहने की कोशिश करेगी, उतने ही नए सवाल खड़े होंगे। असल प्रश्न यह नहीं है कि चढ़ावे में कोई अनियमितता हुई है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या आस्था से जुड़े धन के प्रबंधन में पूर्ण पारदर्शिता है? क्या श्र(ालुओं को यह जानने का अधिकार नहीं है कि उनके द्वारा चढ़ाई गई धनराशि का उपयोग किन कार्यों में हो रहा है? और क्या सरकार इस पूरे मामले पर स्वतंत्र आडिट या श्वेत पत्र जारी करने को तैयार है? इन सवालों के जवाब जितनी देर से आएंगे, विवाद उतना ही गहराता जाएगा। धामी सरकार के लिए यह विवाद केवल एक प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है। जनता अब केवल घोषणाओं और दावों से संतुष्ट नहीं होती। वह पारदर्शिता और जवाबदेही चाहती है। खासकर तब, जब मामला आस्था से जुड़ा हो। देवभूमि की राजनीति में जनता बहुत बारीकी से देखती है कि सरकार धार्मिक मामलों में कितना संवेदनशील और पारदर्शी व्यवहार करती है। इसलिए बदरीनाथ चढ़ावा विवाद का असर केवल एक समाचार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह आने वाले दिनों में सरकार की राजनीतिक परीक्षा का एक महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। जब करोड़ों श्र(ालुओं की आस्था का धन दांव पर हो, तब सरकार की चुप्पी संदेह को जन्म देती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक हैकृक्या सरकार पारदर्शिता से स्थिति स्पष्ट करेगी या फिर यह विवाद 2027 की राजनीति का नया मुद्दा बन जाएगा?

मिशन 2027 से पहले कांग्रेस में बड़ा ‘एक्शन’

भीतरघातियों को बाहर का रास्ता, गुटबाजी आई सामने विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने दे दिया सख्त संदेश कांग्रेस ने आक्रामक तेवर के बीच की अपनों पर कार्रवाई अनुशासन के सहारे कांग्रेस संगठन को साधने की कवायद देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही प्रदेश कांग्रेस ने अपने संगठन को लेकर सख्त रुख अपनाना शुरू कर दिया है। एक ओर पार्टी भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर उसने अपने ही कार्यकर्ताओं और नेताओं पर अनुशासन का डंडा चलाना शुरू कर दिया है। हाल के दिनों में पार्टी विरोधी गतिविधियों, सार्वजनिक बयानबाजी और संगठन के खिलाफ काम करने के आरोप में कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को बाहर का रास्ता दिखाया गया है। राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस की इस कार्रवाई को विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को एकजुट रखने और अनुशासन स्थापित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, यह कदम पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और गुटबाजी को भी उजागर कर रहा है। प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व इस बार किसी भी कीमत पर अनुशासनहीनता को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिख रहा है। पार्टी नेताओं का मानना है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण से लेकर स्थानीय स्तर की गुटबाजी ने कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया था। कई सीटों पर पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ बगावत और अंदरूनी विरोध ने चुनावी गणित बिगाड़ दिया था। इसी अनुभव को देखते हुए प्रदेश नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिया है कि चुनाव से पहले संगठन विरोधी गतिविधियों में शामिल किसी भी नेता या कार्यकर्ता पर कार्रवाई की जा सकती है। कांग्रेस इन दिनों महंगाई, बेरोजगारी, भू-कानून, पलायन, चारधाम यात्रा व्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। लेकिन पार्टी नेतृत्व यह भी समझ रहा है कि यदि अंदरूनी कलह पर नियंत्रण नहीं हुआ तो भाजपा के खिलाफ आक्रामकता का राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाएगा। यही कारण है कि कांग्रेस ने एक साथ दो मोर्चों पर लड़ाई शुरू की हैकृबाहर भाजपा के खिलाफ और भीतर असंतुष्ट एवं अनुशासनहीन नेताओं के खिलाफ। उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी की समस्या से जूझती रही है। पूर्व मुख्यमंत्री, वरिष्ठ नेताओं और क्षेत्रीय क्षत्रपों के अलग-अलग शक्ति केंद्रों ने कई बार संगठनात्मक फैसलों को प्रभावित किया है। ऐसे में पार्टी से कुछ कार्यकर्ताओं को बाहर करने भर से क्या गुटबाजी खत्म हो जाएगी, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की राय बंटी हुई है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई का संदेश तो जाएगा, लेकिन यदि असंतोष के कारणों का समाधान नहीं हुआ तो चुनाव नजदीक आते-आते बगावत के नए स्वर भी सामने आ सकते हैं। कांग्रेस की हालिया सक्रियता को टिकट की संभावित लड़ाई से भी जोड़कर देखा जा रहा है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन कई विधानसभा क्षेत्रों में दावेदार सक्रिय हो चुके हैं। ऐसे में संगठन विरोधी गतिविधियों पर सख्ती को आगामी टिकट वितरण की तैयारी के रूप में भी देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता कि 2027 से पहले किसी भी स्तर पर ऐसा माहौल बने, जिससे यह संदेश जाए कि कांग्रेस अभी भी अपने अंदरूनी संघर्षों से बाहर नहीं निकल पाई है। कांग्रेस की ताजा कार्रवाई का राजनीतिक संदेश स्पष्ट हैकृजो पार्टी लाइन से हटेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। लेकिन इसके साथ ही पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि अनुशासन और असंतोष के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी भाजपा नहीं, बल्कि कई बार उसकी अपनी अंदरूनी खींचतान रही है। ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले अपने ही कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई पार्टी को अनुशासित संगठन का चेहरा दे सकती है, लेकिन यदि यह असंतोष को और बढ़ाती है तो इसका उल्टा असर भी पड़ सकता है। वही दूसरी ओर भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता में लौटने के लिए हर मोर्चे पर संघर्ष का संदेश देना चाहती है। ऐसे में पार्टी का यह सख्त रुख आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस की यह अनुशासनात्मक मुहिम संगठन को मजबूत करती है या फिर चुनाव से पहले नए असंतोष और नए समीकरणों को जन्म देती है।

पहाड़ के आंगन से खो गई ‘जंदूरू’ की मधुर तान

गेहूं, मडुवे संग जहां पिसती थीं जीवन की कठिनाइयां पहाड़ के पुराने घरों की रौनक था यह पारंपरिक यंत्र मशीनी युग ने छीनी पहाड़ के पारंपरिक हुनर की साख अतीत के पन्नों में दफन आत्मनिर्भरता की अनूठी पहचान आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं छूट गया है आज जंदूरू देहरादून। पहाड़ के पुराने घरों में सुबह की शुरुआत अक्सर एक मधुर, लयब( आवाज से होती थी। यह आवाज किसी रेडियो या मंदिर की घंटियों की नहीं, बल्कि जंदूरू की होती थी। घर के एक कोने में रखा पत्थर का वह छोटा-सा संसार, जिसमें गेहूं, मडुवा, झंगोरा और जौं पिसते थे और साथ ही पिसती थीं घर की चिंताएं, थकान और जीवन की कठिनाइयां। जंदूरू केवल आटा पीसने की चक्की नहीं था, बल्कि पहाड़ के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा था। यह घर की आत्मनिर्भरता, महिलाओं की मेहनत और परिवार की एकजुटता का प्रतीक था। पहाड़ के अधिकांश लोगों की स्मृतियों में एक दृश्य आज भी जिंदा हैकृभोर की पहली किरण, चूल्हे की धीमी आंच और मां का जंदूरू चलाते हुए कोई लोकगीत गुनगुनाना। मां दोनों हाथों से चक्की घुमाती जाती और साथ ही दिनभर के काम की योजना भी बनाती जाती। जंदूरू की घर्र-घर्र की आवाज घर में एक अलग ही संगीत घोल देती थी। बच्चे अभी बिस्तर में होते, लेकिन उन्हें पता चल जाता था कि अब सुबह हो चुकी है। मां के माथे पर पसीना होता, लेकिन चेहरे पर संतोष। क्योंकि जंदूरू से निकलने वाला आटा केवल भोजन नहीं, बल्कि परिवार की मेहनत और प्रेम का स्वाद लेकर आता था। आज गांवों में बिजली से चलने वाली आटा चक्कियां आ गई हैं। काम आसान हुआ है, समय बचा है, लेकिन जंदूरू का वह स्वाद कहीं पीछे छूट गया। मडुवे की रोटी, झंगोरे का आटा और गेहूं की सोंधी खुशबू, जो हाथ से पिसे आटे में आती थी, वह मशीनों के तेज शोर में कहीं खो गई है। बुजुर्ग आज भी कहते हैं जंदूरू का आटा सिर्फ पेट नहीं भरता था, वह शरीर को ताकत और मन को संतोष भी देता था। जंदूरू पहाड़ की महिलाओं की मेहनत का जीवंत प्रतीक भी है। उन्होंने इसे केवल एक घरेलू उपकरण की तरह नहीं, बल्कि जीवनसाथी की तरह अपनाया। खेतों में काम, पशुओं की देखभाल, पानी और लकड़ी ढोने के बीच जंदूरू चलाना भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। शायद यही कारण है कि जंदूरू की आवाज में पहाड़ की महिलाओं के संघर्ष, त्याग और आत्मनिर्भरता की कहानी छिपी है। आज कई गांवों के पुराने घरों में जंदूरू अब भी मौजूद हैं। किसी कोने में धूल से ढके हुए, किसी छज्जे के नीचे रखे हुए। वे अब आटा नहीं पीसते, लेकिन बीते समय की गवाही जरूर देते हैं। जब गांवों में पलायन बढ़ा, घर खाली हुए और नई पीढ़ी शहरों की ओर चली गई, तो जंदूरू भी धीरे-धीरे खामोश हो गए। उनकी खामोशी मानो यह कहती है कि पहाड़ केवल अपनी आबादी नहीं खो रहा, बल्कि अपनी परंपराएं, अपने स्वाद और अपनी सांस्कृतिक धरोहर भी खो रहा है। जंदूरू किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवंत संस्कृति का हिस्सा है। नई पीढ़ी को इसके महत्व से परिचित कराना जरूरी है। क्योंकि जो समाज अपनी छोटी-छोटी परंपराओं को भूल जाता है, वह धीरे-धीरे अपनी पहचान भी खोने लगता है। जब भी किसी पुराने पहाड़ी घर के कोने में रखा जंदूरू दिखाई देता है, तो ऐसा लगता है जैसे वह आज भी किसी मां के हाथों के स्पर्श और किसी लोकगीत की प्रतीक्षा कर रहा हो।

गोदियाल का धामी पर ‘तंज’

दिल्ली का फैसला या जनता का जनादेश, धामी पर गोदियाल के बयान से सुलगी सियासत सलेक्टेड सीएम बनाम जनादेश का चेहरा, उत्तराखंड में शुरू हुई नई राजनीतिक जंग गोदियाल ने धामी की राजनीतिक वैधता पर उठाए सवाल, भाजपा ने बताया जनादेश का अपमान देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी गर्मी अभी दूर है, लेकिन सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। इसकी वजह बना कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदिया का वह बयान, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सलेक्टेड सीएम बताया। गोदियाल का सीधा तंज था कि धामी जनता की पहली पसंद बनकर नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व की पसंद बनकर मुख्यमंत्री बने हैं। यानी उत्तराखंड की सत्ता की चाबी देहरादून से ज्यादा दिल्ली के हाथ में है। कांग्रेस ने इस बयान के जरिए भाजपा के सबसे मजबूत चेहरे पर सीधे राजनीतिक वार किया है। कांग्रेस इस नैरेटिव को गढ़ना चाहती है कि मुख्यमंत्री धामी का राजनीतिक कद जनता से ज्यादा पार्टी नेतृत्व के भरोसे खड़ा हुआ है। पार्टी का कहना है कि राज्य के बड़े फैसलों से लेकर नेतृत्व परिवर्तन तक, भाजपा में अंतिम मुहर दिल्ली की लगती है। इसलिए सलेक्टेड सीएम का तंज केवल व्यक्ति पर नहीं, बल्कि भाजपा की कार्यशैली पर हमला है। भाजपा ने इस बयान को लपक लिया। पार्टी नेताओं ने कहा कि धामी के नेतृत्व में भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई और मुख्यमंत्री ने जनता के बीच जाकर अपना जनसमर्थन भी साबित किया। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस मुद्दों की लड़ाई हार चुकी है, इसलिए अब व्यक्तिगत और राजनीतिक विशेषणों के सहारे माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। पार्टी यह भी मानती है कि मुख्यमंत्री धामी उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी हैं। इसलिए कांग्रेस का हमला सीधे भाजपा के चुनावी चेहरे पर हमला है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो यह विवाद सिर्फ एक बयान का नहीं है। यह 2027 की लड़ाई का शुरुआती ट्रेलर है। कांग्रेस दिल्ली बनाम उत्तराखंड और सलेक्टेड बनाम जनता का नेता का नैरेटिव खड़ा करना चाहती है। वहीं भाजपा विकास, स्थिर नेतृत्व और जनादेश की कहानी को आगे बढ़ाने में जुटी है। उत्तराखंड की राजनीति अब मुद्दों के साथ-साथ शब्दों की लड़ाई में भी उतर चुकी है। सलेक्टेड सीएम एक वाक्य जरूर है, लेकिन इसके पीछे बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा हैकृकांग्रेस मुख्यमंत्री धामी की राजनीतिक स्वीकार्यता को चुनौती देना चाहती है और भाजपा इसे जनादेश पर हमले के रूप में पेश कर रही है। चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन इतना साफ है कि अब सियासत केवल सड़क, बिजली और पानी पर नहीं चलेगी। लड़ाई इस बात पर भी होगी कि उत्तराखंड का नेतृत्व आखिर तय कौन करता हैकृजनता या पार्टी का शीर्ष नेतृत्व?

शनिवार, 4 जुलाई 2026

विपक्ष ही नहीं ‘अपनों’ से भी घिरी ‘सरकार’

अपने ही सवालों के घेरे में सरकार, नाराज विधायकों ने बढ़ाई भाजपा की चिंता अधिकारियों की रफ्तार बेलगाम, माननीयों की ही नहीं सुन रही ब्यूरोक्रेसी जनता की उम्मीदें व फाइलों में दबे विकास, जमीनी हकीकत से बेबस होते विधायक चुनावी जीत का भारी बोझ, दूसरी पारी में विपक्ष से ज्यादा खुद की परछाईं से चुनौती देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर उठ रहे असंतोष के स्वर हैं। सरकार के कामकाज को लेकर भाजपा के कई विधायक जिस तरह सार्वजनिक मंचों से अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं, उसने यह संकेत दे दिया है कि सब कुछ उतना सहज नहीं है, जितना सत्ता के गलियारों से दिखाने की कोशिश की जा रही है। सत्ता में दूसरी बार वापसी के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही अपेक्षाओं का बोझ है। विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में जनता के बीच हैं, जहां उन्हें विकास कार्यों, सड़कों, पेयजल, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों पर जवाब देना पड़ रहा है। लेकिन जब जनप्रतिनिधि स्वयं यह कहने लगें कि उनकी सुनवाई नहीं हो रही, अधिकारी उनकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे और योजनाएं फाइलों में अटक रही हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर बढ़ती दूरी का संकेत है। उत्तराखंड की राजनीति में यह पहला अवसर नहीं है, जब सत्ता पक्ष के विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ स्वर बुलंद किए हों। राज्य गठन के बाद लगभग हर सरकार को नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल के संकट का सामना करना पड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार यह असंतोष ऐसे समय सामने आ रहा है, जब विधानसभा चुनाव-2027 की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। भाजपा की राजनीतिक ताकत हमेशा उसके मजबूत संगठन और अनुशासित कार्यशैली को माना जाता रहा है। लेकिन यदि विधायक लगातार सार्वजनिक रूप से असंतोष जताते रहे, तो विपक्ष को सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने का मजबूत आधार मिल जाएगा। कांग्रेस पहले ही यह कह रही है कि जब सत्ता पक्ष के विधायक ही संतुष्ट नहीं हैं, तो आम जनता की परेशानियों का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। वास्तविक चिंता इस बात की है कि क्या सरकार और संगठन के बीच संवाद की कमी बढ़ रही है? क्या नौकरशाही जनप्रतिनिधियों पर हावी होती जा रही है? और क्या चुनाव से पहले विधायकों की अपेक्षाओं और सरकार की प्राथमिकताओं के बीच दूरी बढ़ती जा रही है? राजनीति में असंतोष तब तक सामान्य माना जाता है, जब तक वह बंद कमरों तक सीमित रहे। लेकिन जब नाराजगी सार्वजनिक मंचों से व्यक्त होने लगे, तो वह एक राजनीतिक संदेश बन जाती है। उत्तराखंड में आज यही संदेश सुनाई दे रहा है। भाजपा के लिए यह समय आत्ममंथन का है। विपक्ष की आलोचना से अधिक चिंता उन आवाजों की होनी चाहिए, जो पार्टी के भीतर से उठ रही हैं। क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष के हमले चुनाव नहीं हराते, लेकिन अपने ही लोगों की नाराजगी सत्ता की राह को कठिन जरूर बना देती है।

इतिहास रचने की हैट्रिक बनाम एंटी-इन्कंबेंसी

भाजपा और कांग्रेस में शह-मात का खेल अभी से हुआ शुरू तीसरे विकल्प की तलाश में छटपटाती देवभूमि की राजनीति दिल्ली दूर, गांवों व बूथों से तय होगा उत्तराखंड का महासमर देहरादून। प्रदेश की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है। सत्ता की राह दिल्ली से नहीं, बल्कि गांवों, बूथों और कार्यकर्ताओं के मन से होकर गुजरती है। 2027 की चुनावी शतरंज में मोहरे सजने शुरू हो गए हैं, लेकिन बाजी कौन जीतेगा, इसका फैसला आने वाले महीनों में कार्यकर्ताओं के मूड और जनता के मन से तय होगा। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव-2027 अभी समय है, लेकिन प्रदेश की राजनीति पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुकी है। सत्तारूढ़ भाजपा तीसरी बार लगातार सत्ता में लौटने का इतिहास रचने की तैयारी में है, तो कांग्रेस एक बार फिर सत्ता विरोधी माहौल को भुनाने की रणनीति बना रही है। वहीं, क्षेत्रीय दल और नए राजनीतिक विकल्प भी अपने लिए जमीन तलाश रहे हैं। इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रदेश का राजनीतिक समीकरण किस करवट बैठेगा और कार्यकर्ताओं का मूड क्या कह रहा है? प्रदेश में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत संगठन और बूथ स्तर तक फैला नेटवर्क है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार विकास, समान नागरिक संहिता, निवेश और बुनियादी ढांचे के मुद्दों को चुनावी नैरेटिव बनाने की तैयारी में है। लेकिन पार्टी के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कई विधायकों की सार्वजनिक नाराजगी, नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव को लेकर असंतोष और टिकट कटने की आशंकाओं ने संगठन के भीतर बेचौनी पैदा कर दी है। भाजपा के कार्यकर्ताओं का एक वर्ग यह मानता है कि सरकार की योजनाएं जनता तक पहुंची हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाया है। पार्टी के अंदर यह चर्चा भी तेज है कि 2027 में बड़े पैमाने पर टिकट परिवर्तन हो सकता है। ऐसे में कई मौजूदा विधायक और दावेदार अपने-अपने क्षेत्रों में राजनीतिक ताकत दिखाने में जुट गए हैं। कांग्रेस के लिए 2027 सत्ता में वापसी का बड़ा अवसर माना जा रहा है। पार्टी सत्ता विरोधी रुझान, बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती उसकी आंतरिक गुटबाजी और नेतृत्व का सवाल है। पार्टी के कार्यकर्ता यह मानते हैं कि यदि समय रहते संगठनात्मक एकजुटता नहीं दिखाई गई तो भाजपा के खिलाफ माहौल बनने के बावजूद चुनावी लाभ उठाना मुश्किल होगा। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में उत्साह जरूर है, लेकिन वह स्पष्ट रणनीति और मजबूत नेतृत्व का इंतजार भी कर रहे हैं। पार्टी की चुनावी संभावनाएं काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेंगी कि वह अपने भीतर के मतभेदों को कितना नियंत्रित कर पाती है। उत्तराखंड क्रांति दल एक बार फिर क्षेत्रीय अस्मिता, मूल निवास, भू-कानून और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि संगठनात्मक कमजोरी और सीमित जनाधार उसके सामने बड़ी चुनौती हैं। फिर भी यदि राज्य में त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बनती है, तो कुछ सीटों पर क्षेत्रीय दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। राजनीतिक दलों की रणनीति का केंद्र इस बार युवा मतदाता हैं। रोजगार, स्वरोजगार, शिक्षा और तकनीकी अवसरों के मुद्दे युवाओं के बीच सबसे अधिक चर्चा में हैं। महिला मतदाताओं के बीच सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों का असर देखने को मिल सकता है, जबकि पहाड़ से पलायन कर चुके मतदाताओं को भी चुनावी विमर्श में शामिल करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। जमीनी स्तर पर भाजपा कार्यकर्ताओं में सरकार की उपलब्धियों को लेकर आत्मविश्वास है, लेकिन स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक समन्वय को लेकर कुछ असंतोष भी दिखाई देता है। दूसरी ओर कांग्रेस कार्यकर्ता भाजपा विरोधी माहौल की उम्मीद में हैं, लेकिन वह यह भी मानते हैं कि केवल सरकार विरोधी भावनाओं के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 2027 का चुनाव केवल नेताओं का नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की ऊर्जा और संगठनात्मक प्रबंधन का चुनाव होगा। जिस दल का कार्यकर्ता सबसे अधिक सक्रिय और संतुष्ट होगा, वही चुनावी बढ़त हासिल कर सकता है।

‘बेडू’ में है पहाड़ की मिठास और लोकजीवन की पहचान

जंगलों में पकता है स्वाद, लोकगीतों में बसती इसकी महक आज भी प्रकृति की गोद में मुस्कुराती बेडू की वह मिठास बदलते दौर में भी फीकी नहीं पड़ी पहाड़ की यह पहचान देहरादून। बेडू पाको बारामासा, ओ नरैणा...पहाड़ का यह अमर लोकगीत केवल एक गीत नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, प्रकृति और लोकजीवन का जीवंत दस्तावेज है। इस गीत में जिस बेडू का जिक्र है, वह आज भी पहाड़ के जंगलों, खेतों की मेड़ों और गांवों के आसपास प्राकृतिक रूप से उगता हुआ दिखाई देता है। बदलते समय और आधुनिक खानपान के बीच भी बेडू की मिठास पहाड़ की स्मृतियों में आज भी उतनी ही ताजा है। बेडू जंगली अंजीर की एक प्रजाति है, जो पहाड़ के मध्य हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगती है। इसका पेड़ अधिक ऊंचा नहीं होता, लेकिन इसकी शाखाएं घनी होती हैं और गर्मियों से बरसात के बीच इसमें फल लगते हैं। पकने पर इसका रंग गहरा बैंगनी या लालिमा लिए होता है और स्वाद मीठा तथा हल्का दानेदार होता है। पहाड़ के बच्चों के लिए बेडू केवल एक फल नहीं, बल्कि गर्मियों की छुट्टियों की यादों का हिस्सा है। स्कूल से लौटते समय जंगलों से बेडू तोड़ना और दोस्तों के साथ बैठकर खाना पहाड़ी बचपन की अनमोल स्मृतियों में शामिल रहा है। पहाड़ के प्रसि( लोकगीत बेडू पाको बारामासा ने इस फल को वैश्विक पहचान दिलाई। इस गीत में बेडू केवल एक फल नहीं, बल्कि पहाड़ की समृ( प्रकृति और लोक संस्कृति का प्रतीक बनकर उभरता है। पहाड़ी समाज में बेडू को आत्मीयता, सरलता और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का प्रतीक माना जाता रहा है। कई गांवों में आज भी बुजुर्ग बताते हैं कि कठिन दौर में जंगलों के ये फल लोगों के लिए अतिरिक्त पोषण का स्रोत बने। बेडू में प्राकृतिक शर्करा, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और कई प्रकार के एंटीआक्सीडेंट पाए जाते हैं। स्थानीय लोग इसे पाचन के लिए लाभकारी मानते हैं। आयुर्वेद में भी अंजीर वर्ग के फलों को स्वास्थ्यवर्धक माना गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ के ऐसे पारंपरिक फल आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी कई समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकते हैं। आज जब लोग जैविक और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों की ओर लौट रहे हैं, तब बेडू जैसे फल नई संभावनाओं के साथ सामने आ रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग अब बेडू से उतना परिचित नहीं है, जितनी पिछली पीढ़ियां थीं। जंगलों से दूरी, बदलती जीवनशैली और बाजार आधारित खानपान ने पारंपरिक फलों को धीरे-धीरे हाशिए पर पहुंचा दिया है। कई गांवों में अब भी बेडू के पेड़ खड़े हैं, लेकिन उन्हें पहचानने और उनके महत्व को समझने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इन पारंपरिक फलों का वैज्ञानिक संरक्षण और व्यावसायिक मूल्यांकन किया जाए तो यह स्थानीय आजीविका का भी महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं। पहाड़ के जंगलों में स्वतः उगने वाला यह फल केवल स्वाद नहीं देता, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश भी देता है। जब भी कहीं दूर से बेडू पाको बारामासा... की धुन सुनाई देती है, तो उसके साथ पहाड़ की पगडंडियां, जंगलों की खुशबू और बचपन की यादें भी लौट आती हैं। बेडू पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत का मीठा स्वाद है, जिसे सहेजना आने वाली पीढ़ियों के लिए उतना ही जरूरी है, जितना अपने पहाड़ और अपनी लोक परंपराओं को बचाए रखना।

‘तूफान’ से पहले ‘शांति’

जनता तो बाद में फैसला करेगी, भीतरघात और बागी बिगाड़ेंगे दलों का खेल जब-जब रूठे ‘अपने’ तब-तब बड़े-बड़े सूरमाओं के ढह गए सियासी किले राजनीतिक दल बदलने और निर्दलीय ताल ठोकने की स्क्रिप्ट अभी से तैयार देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव-2027 से पहले राजनीति का पारा अभी से चढ़ने लगा है। फिलहाल राजनैतिक तपिश तो है मगर वह शांत है और आने वाले दिनों में यह तूफान का रूप ले लेग। भाजपा हो या कांग्रेस, लगभग सभी दलों के भीतर टिकट की दावेदारी, क्षेत्रीय समीकरण और गुटीय खींचतान ने राजनीतिक गतिविधियों को तेज कर दिया है मगर शांति से। नेताओं की सक्रियता बढ़ गई है और कार्यकर्ता भी अपने-अपने दावेदारों के पक्ष में लामबंद होने लगे हैं। इस बार का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता की वापसी की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि दलों के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक संतुलन की भी बड़ी परीक्षा साबित होगा। प्रदेश में फिलहाल तो शांति छाया है, लेकिन आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में तूफान आने वाला है। सत्तारूढ़ भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर मैदान में उतर रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी विकास और सुशासन के एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। लेकिन पार्टी के भीतर कई सीटों पर टिकट को लेकर दावेदारों की संख्या बढ़ रही है। कई मौजूदा विधायक अपने क्षेत्रों में विरोध और नाराजगी का सामना कर रहे हैं, जबकि नए चेहरे भी संगठन में अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुट गए हैं। कुछ विधायकों की सरकार के कामकाज और नौकरशाही को लेकर सार्वजनिक नाराजगी ने भी पार्टी के भीतर बेचौनी बढ़ाई है। संगठन की चिंता यह है कि यदि असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया तो इसका असर बूथ स्तर तक दिखाई दे सकता है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस चुनाव को बड़े अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी को उम्मीद है कि सत्ता विरोधी रुझान और स्थानीय मुद्दों के सहारे वह मजबूत वापसी कर सकती है। लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती उसकी पुरानी बीमारीकृगुटबाजीकृबनी हुई है। प्रदेश नेतृत्व, पूर्व नेताओं के समर्थक और क्षेत्रीय क्षत्रप अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने में जुटे हैं। कई सीटों पर एक ही टिकट के लिए कई दावेदार सक्रिय हैं, जिससे संगठनात्मक एकजुटता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पार्टी के कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि टिकट वितरण में देरी हुई या स्थानीय समीकरणों की अनदेखी हुई, तो चुनाव से पहले असंतोष खुलकर सामने आ सकता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस बार टिकट वितरण केवल जीतने की क्षमता पर नहीं, बल्कि जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन, संगठन में सक्रियता और केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे पर भी निर्भर करेगा। किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी ताकत उसका कार्यकर्ता होता है। यदि टिकट वितरण में असंतोष बढ़ता है तो इसका सीधा असर चुनावी प्रबंधन पर पड़ सकता है। भाजपा में कई कार्यकर्ता संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय की अपेक्षा कर रहे हैं, जबकि कांग्रेस के कार्यकर्ता स्पष्ट नेतृत्व और समय पर निर्णय चाहते हैं। दोनों दलों के सामने चुनौती यह है कि वे अपने कार्यकर्ताओं को संतुष्ट रखते हुए चुनावी एकजुटता बनाए रखें। उत्तराखंड की राजनीति में बगावत और निर्दलीय उम्मीदवारों का इतिहास रहा है। कई चुनावों में टिकट न मिलने से नाराज नेताओं ने दलों के समीकरण बिगाड़े हैं। ऐसे में 2027 से पहले असंतोष, टिकट विवाद और गुटबाजी किसी भी दल के लिए बड़ा राजनीतिक जोखिम बन सकते हैं। फिलहाल, उत्तराखंड की चुनावी बिसात बिछ चुकी है। नेता अपनी-अपनी चाल चल रहे हैं, कार्यकर्ता माहौल भांप रहे हैं और दल भीतर की खामोशियों को संभालने में जुटे हैं। क्योंकि चुनाव केवल जनता के बीच नहीं जीते जाते, कई बार उनकी दिशा पार्टी के भीतर उठने वाली नाराज आवाजें भी तय कर देती हैं।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

‘वोट’ से पहले जनता ‘प्रोटेस्ट’ मोड में

सड़क, पानी और पलायन पर विधायकों को भागने की जगह नहीं ग्राउंड पर गुस्सा आन पीक भाजपा के लिए खतरे की घंटी, अपनों की ही परफारमेंस पर उठने लग गए हैं सवाल प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की घोषणा से पहले विधायकों की बढ़ी चुनौती देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय शेष हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी तापमान अभी से बढ़ने लगा है। सत्तारूढ़ भाजपा के कई विधायकों को अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में जनता के विरोध, सवालों और घेराव का सामना करना पड़ रहा है। कहीं सड़क, पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली पर लोग नाराज हैं, तो कहीं बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय समस्याओं को लेकर जनता खुलकर अपनी नाराजगी जता रही है। ऐसे में भाजपा के लिए लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की राह आसान नहीं दिख रही है। पिछले कुछ महीनों में कई विधानसभा क्षेत्रों में विधायकों के कार्यक्रमों के दौरान जनता ने तीखे सवाल पूछे हैं। कई स्थानों पर ग्रामीणों ने विकास कार्यों में देरी, पेयजल संकट, खराब सड़कों और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर विरोध जताया। पंचायत स्तर से लेकर जिला मुख्यालयों तक जनता का असंतोष सामने आने लगा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2022 में भाजपा को मिले प्रचंड जनादेश के बाद लोगों की अपेक्षाएं काफी बढ़ गई थीं। अब जब चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो जनता अपने जनप्रतिनिधियों से पांच साल का हिसाब मांग रही है। उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि राज्य गठन के बाद सत्ता परिवर्तन का क्रम लगातार चलता रहा है। हालांकि 2022 में भाजपा ने इस मिथक को तोड़ते हुए दोबारा सरकार बनाई, लेकिन तीसरी बार सत्ता में वापसी के लिए उसे एंटी-इंकम्बेंसी की चुनौती से जूझना पड़ रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सत्ता विरोधी लहर अभी व्यापक नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर विधायकों के प्रति असंतोष बढ़ रहा है। कई सीटों पर भाजपा संगठन ने भी फीडबैक लेना शुरू कर दिया है और कमजोर सीटों पर विशेष रणनीति बनाई जा रही है। कांग्रेस इस बढ़ती नाराजगी को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और स्थानीय विकास कार्यों को लेकर सरकार को लगातार घेर रही है। कांग्रेस का दावा है कि जनता अब बदलाव चाहती है और विधायकों के घेराव इसी जनभावना का संकेत हैं। वहीं, उत्तराखंड क्रांति दल भी मूल निवास, भू-कानून और स्थायी राजधानी जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। विधायकों के खिलाफ बढ़ता असंतोष भाजपा नेतृत्व के लिए चिंता का विषय बन गया है। पार्टी संगठन ने बूथ स्तर तक समीक्षा शुरू कर दी है। सूत्रों की मानें तो कई सीटों पर विधायकों की कार्यशैली और जनसंपर्क को लेकर रिपोर्ट तैयार की जा रही है। पार्टी उन सीटों पर विशेष ध्यान दे रही है जहां जनता की नाराजगी अधिक दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि चुनाव से पहले भाजपा कुछ सीटों पर नए चेहरों को मौका देने की रणनीति पर विचार कर सकती है, ताकि स्थानीय असंतोष को कम किया जा सके। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का कहना है कि विकास के बड़े दावे किए गए, लेकिन कई बुनियादी समस्याएं अभी भी जस की तस हैं। युवाओं में रोजगार को लेकर चिंता है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी बड़े मुद्दे बने हुए हैं। हालांकि, दूसरी ओर भाजपा सरकार अपनी उपलब्धियोंकृसड़क, धार्मिक पर्यटन, समान नागरिक संहिता, निवेश और बुनियादी ढांचे के विकासकृको लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। पार्टी का मानना है कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व और संगठन की मजबूती के दम पर वह तीसरी बार सत्ता में लौट सकती है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विधायकों का बढ़ता घेराव केवल स्थानीय नाराजगी नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव की शुरुआती चेतावनी भी है। यदि भाजपा समय रहते जनता की शिकायतों का समाधान नहीं करती, तो कई सीटों पर उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की सियासत में 2027 का चुनाव केवल विकास बनाम आरोप-प्रत्यारोप की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह जनता की अपेक्षाओं, स्थानीय मुद्दों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की भी परीक्षा बनेगा। जनता अब केवल वादे नहीं, बल्कि पांच वर्षों का रिपोर्ट कार्ड मांग रही है, और यही रिपोर्ट कार्ड आने वाले चुनाव में कई राजनीतिक समीकरण बदल सकता है।