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बुधवार, 27 मई 2026
उत्तराखंडियत’ से बढ़ी राष्ट्रीय दलों की ‘बेचौनी’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-19
इस बार फिर से क्षेत्रीय अस्मिता को नए सिरे से राजनीतिक ताकत बनाएगी प्रदेश की जनता
---दिल्ली बनाम देहरादून की राजनीति में फंसा पहाड़
---भू-कानून, मूल निवास और पलायन पर होगा वार
---राष्ट्रीय दलों को चुनौती देने को क्षेत्रीय चेहरे तैयार
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक बहस का केंद्र बदलता दिख रहा है। इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता परिवर्तन का नहीं रहेगा, बल्कि उत्तराखंडियत बनाम राष्ट्रीय राजनीति की विचारधारा का भी बनता जा रहा है। राज्य आंदोलन की भावनाओं, पहाड़ी पहचान, मूल निवास, भू-कानून, पलायन और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दे अब फिर राजनीतिक मंचों पर लौटने लगे हैं।
उत्तराखंड बनने के पीछे सबसे बड़ी भावना थी अलग पहाड़ी पहचान और स्थानीय विकास। लेकिन राज्य गठन के 25 साल बाद भी पहाड़ों में खाली होते गांव, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का संकट लोगों के मन में सवाल खड़े कर रहा है। ऐसे में क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा फिर से मजबूत होता दिख रहा है।
भाजपा 2027 में भी राष्ट्रीय नेतृत्व,हिंदुत्व,राष्ट्रवाद और डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी संगठन अभी से चुनावी तैयारी में जुट गया है। प्रत्याशियों के चयन से लेकर बूथ स्तर तक रणनीति बनाई जा रही है। भाजपा का फोकस चारधाम परियोजना, सड़क, रेल और निवेश जैसे बड़े विकास कार्यों को चुनावी नैरेटिव बनाने पर रहेगा। पार्टी राष्ट्रीय नेतृत्व के चेहरे और केंद्र की योजनाओं के सहारे चुनावी बढ़त बनाए रखना चाहती है। राज्य आंदोलन से निकला उत्तराखंड क्रांति दल भी 2027 में सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। पार्टी एक बार फिर मूल मुद्दों भू-कानून, स्थायी निवास, जल-जंगल-जमीन और पहाड़ी पहचान को केंद्र में ला रही है।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भावनात्मक मुद्दों के बावजूद क्षेत्रीय दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मजबूत संगठन और भरोसेमंद नेतृत्व की है। सोशल मीडिया और युवाओं में समर्थन दिखने के बावजूद जमीनी नेटवर्क अभी कमजोर माना जा रहा है। अंकिता भंडारी हत्याकांड, भर्ती घोटाले, पलायन और बेरोजगारी जैसे मुद्दों ने युवाओं के भीतर व्यवस्था के प्रति नाराजगी पैदा की है। पहाड़ के गांवों में यह भावना भी बढ़ रही है कि राष्ट्रीय दल चुनाव के समय तो पहाड़ की बात करते हैं, लेकिन बाद में प्राथमिकता मैदानी राजनीति को मिलती है।यही कारण है कि हमारा उत्तराखंड कैसा हो? का सवाल अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन रहा है। सोशल मीडिया पर भी मूल निवास,सख्त भू-कानून और पहाड़ी अधिकार जैसे मुद्दे तेजी से ट्रेंड कर रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि उत्तराखंड की राजनीति राष्ट्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमेगी या फिर राज्य अपनी क्षेत्रीय अस्मिता को नए सिरे से राजनीतिक ताकत बनाएगा। यदि क्षेत्रीय भावनाएं मजबूत हुईं तो राष्ट्रीय दलों को भी स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा स्पष्ट रुख अपनाना पड़ सकता है। वहीं अगर राष्ट्रवाद और विकास का नैरेटिव हावी रहा तो भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का फायदा मिल सकता है।
वादों की ‘डिलीवरी’ पर जनता का ‘पहरा’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-16
2027 में सड़क, पुल और अस्पतालों पर घिरेगी सियासत, इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा सबसे बड़ा मुद्दा
---पहाड़ में सड़क, अस्पताल और विकास की सुस्त रफ्तार से बढ़ी बेचौनी
---सत्ता पक्ष के लिए साख तो विपक्ष के लिए घेराबंदी का बन सकता है हथियार
---आगामी चुनाव इंफ्रास्ट्रक्चर के मुद्दे पर आमने-सामने होंगे राजनीतिक दल
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे यह साफ होता जा रहा है कि इस बार चुनावी रण में सबसे बड़ा मुद्दा इंफ्रास्ट्रक्चर यानी बुनियादी ढांचे का रहने वाला है। सड़क, पुल, अस्पताल, पेयजल, शहरी ट्रैफिक और ग्रामीण कनेक्टिविटी को लेकर जनता के भीतर बढ़ती बेचौनी अब राजनीतिक सवाल में बदलती दिख रही है।
राज्य बनने के इतने साल बाद भी पहाड़ के कई गांव आज सड़क, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं। सरकारें विकास के बड़े-बड़े दावे करती रही हैं, लेकिन चुनावी मौसम आते ही जनता अब घोषणाओं से ज्यादा जमीन पर दिखने वाले काम का हिसाब मांगने लगी है। देहरादून, हल्द्वानी, ऋषिकेश और हरिद्वार जैसे शहरों में ट्रैफिक जाम अब रोजमर्रा की समस्या बन चुका है। राजधानी में प्रस्तावित रिस्पना-बिंदाल एलिवेटेड कारिडोर को सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्ष इसे पर्यावरण और विस्थापन का मुद्दा बना रहा है। हालिया बजट में इस परियोजना समेत कई सड़क और शहरी विकास योजनाओं पर बड़ा फोकस दिखाई दिया।
दूसरी तरफ पहाड़ के दूरस्थ इलाकों में तस्वीर बिल्कुल अलग है। बारिश के दौरान टूटती सड़कें, भूस्खलन से कटते गांव और महीनों तक बाधित रहने वाली आवाजाही लोगों के भीतर गुस्सा पैदा कर रही है। चारधाम यात्रा मार्गों पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन गांवों की संपर्क सड़कें अब भी बदहाल हैं। यही विरोधाभास चुनावी भाषणों का बड़ा हिस्सा बनने वाला है।
स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर भी इस बार बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। पहाड़ में डाक्टरों की कमी, रेफर सिस्टम और बंद पड़े अस्पतालों को लेकर लोगों में नाराजगी है। हालांकि सरकार मेडिकल कालेज, जिला अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार को अपनी उपलब्धि बता रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड में इंफ्रास्ट्रक्चर केवल विकास का नहीं, बल्कि पलायन और अस्तित्व का सवाल भी बन चुका है। गांवों में सड़क, अस्पताल और रोजगार न होने से लगातार लोग शहरों की ओर जा रहे हैं। ऐसे में विपक्ष खाली होते गांव और कागजी विकास को बड़ा मुद्दा बना सकता है।
राजनीतिक दलों ने भी इसकी आहट समझनी शुरू कर दी है। भाजपा जहां डबल इंजन विकास और बड़े बजट का हवाला दे रही है, वहीं कांग्रेस सरकार से सवाल पूछ रही है कि आखिर करोड़ों के बजट के बावजूद आम आदमी की जिंदगी में कितना बदलाव आया।
‘देवी’ की सुरक्षा पर दल ‘मौन’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-17
अंकिता भंडारी केस से लेकर 33 प्रतिशत आरक्षण तक बनेगा चुनावी मुद्दा
---महिलाओं के लिए सुरक्षा और सम्मान बड़ा सवाल
---नारी शक्ति को साधने में जुट गए हैं राजनीतिक दल
---साइबर अपराध व छेड़छाड़ के मामलों पर बढ़ी चिंता
---महिला भागीदारी और सुरक्षा बड़ा राजनीतिक फैक्टर
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक बिसात धीरे-धीरे सजने लगी है। राज्य में नारी शक्ति को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता भी बढ़ रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों महिला वोट बैंक को साधने की तैयारी में जुट गई हैं। हाल की रिपोर्टों में यह सामने आया है कि 2027 चुनाव में महिला भागीदारी और सुरक्षा बड़ा राजनीतिक फैक्टर बन सकता है।
पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच राज्य आंदोलन से लेकर अर्थव्यवस्था को संभालने तक में महिलाओं की भूमिका अग्रणी रही है। हाल ही में उत्तराखंड विधानसभा के विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम और 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को लेकर हुई तीखी बहस ने यह साफ कर दिया है कि इस बार कोई भी दल आधी आबादी को हल्के में लेने का जोखिम नहीं उठा सकता।
महिला सुरक्षा का सवाल सिर्फ अपराध तक सीमित नहीं है। पहाड़ की महिलाओं के सामने आज भी सुनसान सड़कें, कमजोर परिवहन व्यवस्था, रात में पुलिस गश्त की कमी और साइबर ठगी जैसी नई चुनौतियां मौजूद हैं। पर्वतीय जिलों में कई गांव ऐसे हैं जहां शाम ढलते ही महिलाओं की आवाजाही लगभग बंद हो जाती है। कालेज जाने वाली छात्राओं और नौकरीपेशा महिलाओं के बीच भी सुरक्षा को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है।
उत्तराखंड पुलिस के आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्टों में यह संकेत मिला है कि राज्य में अपहरण और अन्य अपराधों में बढ़ोतरी दर्ज हुई है, जबकि कुछ गंभीर अपराधों में कमी भी बताई गई है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि अपराध कम नहीं हुए, बल्कि कई मामलों में शिकायतें दर्ज ही नहीं हो पातीं। राजनीतिक दल भी अब महिला सुरक्षा को लेकर अपने-अपने एजेंडे तैयार कर रहे हैं। भाजपा महिला हेल्पलाइन, महिला डेस्क और सुरक्षा अभियानों को अपनी उपलब्धि बताने में जुटी है, जबकि कांग्रेस महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और सुरक्षा कानूनों के बेहतर क्रियान्वयन को बड़ा मुद्दा बना रही है।
विपक्षी दल विशेषकर कांग्रेस कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार को लगातार घेर रहे हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड की गूंज आज भी उत्तराखंड के पहाड़ों और मैदानों में शांत नहीं हुई है। विपक्ष का आरोप है कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के ग्राफ में बढ़ोतरी हुई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार केवल नारी वंदन जैसे नारों के पीछे अपनी कमियों को छिपा रही है। विपक्ष का सीधे तौर पर सवाल है कि पर्यटन और होमस्टे नीति के तहत दूरदराज के क्षेत्रों में काम करने वाली बेटियों की सुरक्षा के लिए धरातल पर क्या ठोस कदम उठाए गए हैं? दूसरी ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और सत्तारूढ़ भाजपा इस मुद्दे पर रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। सरकार का दावा है कि उन्होंने महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड में महिला मतदाता अब केवल भावनात्मक नारों से प्रभावित नहीं होगी। रोजगार, सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान जैसे मुद्दों पर ठोस जवाब मांगने वाली महिला वोटर 2027 में चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। खासकर पहाड़ की महिलाएं, जो जल, जंगल और जमीन से लेकर परिवार की पूरी जिम्मेदारी उठाती हैं, अब राजनीतिक भागीदारी और सुरक्षित माहौल दोनों चाहती हैं।
सोशल मीडिया के दौर में महिला सुरक्षा का मुद्दा और संवेदनशील हो गया है। साइबर स्टाकिंग, फर्जी प्रोफाइल और आनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसे मामलों ने युवतियों और छात्राओं की चिंता बढ़ाई है। जैसे-जैसे 2027 का चुनावी दंगल करीब आएगा, अंकिता भंडारी मामले का राजनीतिक असर, महिला आरक्षण बिल को लागू करने की समयसीमा और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा के इंतजाम ही यह तय करेंगे कि देवभूमि की मातृशक्ति किस दल के सिर पर जीत का सेहरा बांधती है। फिलहाल, महिला सुरक्षा का यह मुद्दा केवल एक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी का मुख्य केंद्र बन चुका है।
पहाड़ की ‘खामोशी’ में सुलग रहा ‘असंतोष’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-18
उत्तराखंड में बढ़ता असंतोष, 2027 में बदल सकता है सियासत का चेहरा
---रोजगार की आस में भटकता पहाड़ का युवा, खाली होता पहाड़
---महंगाई की मार और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर फूटेगा गुस्सा
---उत्तराखंड में पहाड़ से मैदान तक सुलग रहे हैं बुनियादी सवाल
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी दूर हो, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी पारा धीरे-धीरे बढ़ने लगा है। इस बार चुनावी मैदान में सबसे बड़ा मुद्दा आमजन का बढ़ता असंतोष बन सकता है। पहाड़ से लेकर मैदान तक जनता के बीच बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और विकास के असमान वितरण को लेकर नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है।
राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी पहाड़ के हजारों गांव आज बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गांवों से लगातार हो रहा पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी विडंबना बन चुका है, जिन खेतों में कभी फसलें लहलहाती थीं, वहां अब झाड़ियां उग रही हैं। स्कूलों में बच्चों की संख्या घट रही है और कई गांवों में ताले लगे मकान राज्य की हकीकत बयां कर रहे हैं।
युवाओं के भीतर सबसे ज्यादा गुस्सा रोजगार और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर दिखाई दे रहा है। पिछले वर्षों में सामने आए भर्ती घोटालों ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं में यह भावना गहराती जा रही है कि मेहनत से ज्यादा सिस्टम की पहुंच मायने रखती है। यही कारण है कि सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक युवाओं का असंतोष लगातार दिखाई दे रहा है।
महंगाई भी आम आदमी की कमर तोड़ रही है। रसोई गैस, बिजली, पेट्रोल और रोजमर्रा की जरूरतों की बढ़ती कीमतों ने मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पहाड़ में आज भी चिंता का विषय बनी हुई है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डाक्टरों और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। गंभीर मरीजों को आज भी इलाज के लिए देहरादून, हल्द्वानी या बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार जनता केवल घोषणाओं और नारों से प्रभावित नहीं होगी। लोग जमीन पर बदलाव देखना चाहते हैं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में रहेंगे। विपक्ष भी सरकार को इन्हीं मुद्दों पर घेरने की तैयारी में जुटा है। हालांकि सत्ताधारी दल विकास कार्यों, सड़क परियोजनाओं, चारधाम यात्रा, पर्यटन और निवेश को अपनी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रख रहा है। लेकिन गांवों और कस्बों में बढ़ती नाराजगी यह संकेत दे रही है कि जनता अब विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच तुलना करने लगी है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का दावा है कि जनता इस बार भाजपा की नीतियों से पूरी तरह ऊब चुकी है और विकल्प की तलाश में है। वहीं, भाजपा संगठन इस बात से बेफिक्र है और उसका मानना है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में किए गए कड़े फैसले और बुनियादी ढांचे का विकास उन्हें सत्ता विरोधी लहर से बचा ले जाएंगे। जनता में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसका मानना है कि सूबे में नौकरशाही आम लोगों और जनप्रतिनिधियों पर हावी है। छोटे-छोटे कामों के लिए जनता को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। भ्रष्टाचार का मुद्दा भले ही सतह पर न दिखे, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती से लोग खफा हैं।
2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह उस आम आदमी की उम्मीदों और नाराजगी का चुनाव भी बन सकता है जो वर्षों से बेहतर उत्तराखंड का सपना देख रहा है। अगर जनता का यह असंतोष आने वाले समय में और गहराया, तो यह चुनावी नतीजों की दिशा बदलने की ताकत भी रखेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल चेहरों या दावों पर नहीं, बल्कि सीधे तौर पर जन-सरोकारों और बुनियादी मुद्दों पर लड़ा जाएगा।
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प्रदेश के युवाओं में है निराशा
उत्तराखंड के पहाड़ों से सेना में जाने की एक समृ( परंपरा रही है। केंद्र सरकार की अग्निवीर योजना को लेकर यहां के युवाओं में जो असमंजस और गुस्सा था, वह अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। इसके अलावा राज्य सेवा परीक्षाओं में पेपर लीक के पुराने जख्म और स्थायी नौकरियों की कमी ने पढ़े-लिखे युवाओं को निराश किया है। मैदान से लेकर पहाड़ तक रोजगार आज भी सबसे बड़ा सुलगता हुआ मुद्दा है।
आमजन के पहचान की लड़ाई
पिछले कुछ समय से उत्तराखंड में सख्त भू-कानून और मूल निवास की मांग को लेकर जनता सड़कों पर उतरी है। पहाड़ों में बाहरी लोगों द्वारा धड़ाधड़ जमीनें खरीदने और स्थानीय लोगों के अधिकारों के सीमित होने की आशंका ने एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा किया है। जनता में यह धारणा बलवती हो रही है कि सरकारें उनकी जल, जंगल और जमीन की रक्षा करने में ढुलमुल रवैया अपना रही हैं।
‘धधक’ रहे जंगल, घुट रही हैं ‘सांसें’
गढ़वाल और कुमाऊं के कई क्षेत्रों के जंगलों में लगी भीषण आग
पहाड़ की जलधाराओं,वन्यजीवों और पर्यावरण पर मंडराया संकट
जंगलों में आग से मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा और बढ़ने की संभावना
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ इन दिनों एक भयानक त्रासदी से गुजर रहे हैं। कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक पहाड़ियों की ढलानें हरी-भरी वनस्पतियों के बजाय दावानल की नारंगी लपटों से धधक रही हैं। रात के अंधेरे में दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो पूरे पहाड़ ने आग की चादर ओढ़ ली हो। दिन के समय आसमान में सूरज की रोशनी धुंध और काले धुएं के पीछे छिप गई है। यह आग सिर्फ पेड़ों को राख नहीं कर रही, बल्कि उत्तराखंड की पारिस्थितिकी, वन्यजीवों और इंसानी जिंदगियों को भी अपनी चपेट में ले रही है।
यह मौसम पहाड़ में कई दुर्लभ पक्षियों और वन्यजीवों के प्रजनन का होता है। काफल, बुरांश और बांज के जंगलों में लगी इस आग ने काफल-पाको जैसे अनगिनत पक्षियों के घोंसले और उनके अंडों को जलाकर खाक कर दिया है। आग से बचने के लिए काकड़, गुलदार और जंगली सूअर आबादी वाले क्षेत्रों की तरफ भाग रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा और बढ़ गया है।
उत्तराखंड के जंगलों में गर्मियां आते ही आग जैसे नियति बन गई है। सूखी चीड़ की पत्तियां छोटी सी चिंगारी को भी भयावह आग में बदल देती हैं। कई बार यह आग गांवों तक पहुंच जाती है। लोगों के पशुओं के लिए चारा, जंगलों की जड़ी-बूटियां और पेयजल स्रोत तक इसकी चपेट में आ जाते हैं। पहाड़ के लोग कहते हैं कि जंगल जलते हैं तो केवल पेड़ नहीं मरते, गांव की जिंदगी भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि जंगलों की आग अब मौसम और पर्यावरण को भी बदल रही है, जिन पहाड़ियों पर कभी ठंडी हवाएं बहती थीं, वहां अब धुएं की गंध महसूस होती है। छोटी-छोटी गाड़-गदेरे और प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगे हैं।
‘बेडू पाका बारामासा...’ है हर उत्तराखंडी का ‘ग्लोबल पासपोर्ट’
---जब तक पहाड़ों में पर काफल पकेंगे, तब तक गूंजेगी बेडू पाका की धुन
---पहाड़ों की शांत वादियों से निकलकर सात समंदर पार तक गूंज रहा है संगीत
---हर उत्तराखंडी को अपनी जड़ों की ओर खींच लाती है यह मिट्टी की सोंधी खुशबू
---मौसम के चक्र और लोकजीवन को समेटे इस गीत का जादू आज भी बरकरार
देहरादून। मौसम बदलेंगे, पीढ़ियां बदलेंगी, लेकिन जब तक पहाड़ पर काफल पकेंगे और बेडू के पेड़ रहेंगे, तब तक बेडू पाका बारामासा, ओ नरेन काफल पाका चैता...की अमर धुन उत्तराखंड की वादियों में गूंजती रहेगी और हर उत्तराखंडी को अपनी जड़ों की याद दिलाती रहेगी। यह सिर्फ एक लोकगीत नहीं है, बल्कि दुनिया भर के किसी भी कोने में बैठे उत्तराखंडी के लिए अपनी मिट्टी से जुड़ने का ग्लोबल पासपोर्ट है।
बता दें कि उत्तराखंड की पहाड़ियों में जब हवा बांज और बुरांश के जंगलों से होकर गुजरती है, तो ऐसा लगता है जैसे दूर कहीं कोई धीमे स्वर में गा रहा हो कृबेडू पाको बारामासा, ओ नारैणा। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा की आवाज है, जिसने पीढ़ियों से लोगों की भावनाओं, यादों और संस्कृति को अपने सुरों में बांध रखा है। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों अंचलों में लोकप्रिय बेडू पाको बारामासा उत्तराखंड का सबसे प्रसि( लोकगीत माना जाता है। इस गीत में पहाड़ की प्रृिति, प्रेम और लोकजीवन का ऐसा सुंदर मेल है, जो सुनने वाले को सीधे गांव की पगडंडियों, खेतों और पहाड़ी आंगनों तक ले जाता है।
बेडू यानी जंगली अंजीर और काफल पहाड़ का प्रिय फल। गीत में बेडू के बारहों महीने पकने और काफल के चौत महीने में पकने का जिक्र केवल फलों का वर्णन नहीं, बल्कि पहाड़ के मौसम और जीवनचक्र का प्रतीक है। लोकगीत के बोल बताते हैं कि पहाड़ का आदमी प्रकृति से कितना गहरे जुड़ा हुआ था। यह गीत वर्षों तक गांवों की चौपालों, शादी-ब्याह, मेलों और लोकनृत्यों का अभिन्न हिस्सा बना रहा। ढोल-दमाऊं की थाप पर जब महिलाएं और पुरुष इस गीत पर थिरकते थे, तब पूरा गांव मानो एक परिवार बन जाता था। आज भी उत्तराखंड के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत अक्सर इसी गीत से होती है।
समय बदला, गांव खाली होने लगे, पहाड़ के युवा रोजगार और शिक्षा के लिए शहरों की ओर चले गए, लेकिन बेडू पाको का जादू कभी कम नहीं हुआ। बल्कि आधुनिक दौर में यह गीत उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान बन गया। देश-विदेश में बसे उत्तराखंडी जब इस गीत को सुनते हैं, तो उनके भीतर गांव, खेत, बचपन और पहाड़ की स्मृतियां जीवित हो उठती हैं।
संगीत विशेषज्ञ मानते हैं कि बेडू पाको की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी है। इसमें न कोई बनावट है और न ही कृत्रिमता। गीत सीधे दिल से निकलता है और दिल तक पहुंचता है। यही कारण है कि दशकों बाद भी इसकी लोकप्रियता बरकरार है। आज के डिजिटल दौर में भी यह गीत सोशल मीडिया, यूट्यूब और सांस्कृतिक आयोजनों में नई पीढ़ी के बीच उतना ही लोकप्रिय है। कई युवा कलाकार इसे नए संगीत के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं, लेकिन इसकी मूल आत्मा अब भी वैसी ही है पहाड़ की मिट्टी की खुशबू से भरी हुई।
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कालजयी गीत के गीतकार
इस कालजयी गीत को तराशने का श्रेय बृजेंद्र लाल शाह को जाता है, जिन्होंने 1950 के दशक में इसे लिखा और संगीतब( किया था। लेकिन इसे जन-जन तक पहुंचाने वाले शख्स थे मोहन उप्रेती। मोहन उप्रेती ने इस गीत की धुन को पहली बार अल्मोड़ा के लोधिया नामक स्थान पर सुना था। इसके बाद उन्होंने इसे नया रूप दिया। कहा जाता है कि जब यह गीत पूरी तरह तैयार हुआ, तो इसे सबसे पहले प्रसि( संत नीमकरोली बाबा के सामने कैंची धाम में गाया गया था। बाबा ने इसे सुनकर आशीर्वाद दिया था कि यह गीत युगों-युगों तक अमर रहेगा।
जिनेवा तक किया सफर तय
बेडू पाका बारामासा ने बहुत जल्दी ही पहाड़ों की कंदराओं को पार कर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज की। 1950 के दशक में नई दिल्ली के तीन मूर्ति भवन में एक कार्यक्रम के दौरान जब मोहन उप्रेती और उनकी टीम ने इसे गाया, तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने इस गीत की जमकर तारीफ की। इसके बाद इस धुन को सेना के कुमाऊं रेजीमेंट के बैंड में शामिल किया गया। आज भी जब सेना का बैंड इस धुन को बजाता है, तो जवानों का जोश दोगुना हो जाता है। जिनेवा के एक अंतरराष्ट्रीय संगीत समारोह में भी इस गीत ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था।
पहाड़ की ‘खोली’ अब है ‘खामोश’
कभी यही थी जिंदगी की सबसे गर्म पनाह,पलायन के ग्रहण से आज खोलिया सिसक रही
पत्थर, लकड़ी और मिट्टी से बनी पहाड़ की खोली केवल एक कमरा नहीं गांव की थी आत्मा
रिश्तों की गर्माहट और संघर्ष भरे जीवन की सबसे सजीव कहानी यही से होती थी शुरू
देहरादून। उत्तराखंड के पारंपरिक घरों में खोली का मतलब सिर्फ एक दरवाजा नहीं होता। यह पत्थरों को तराशकर, देवदार और टून की लकड़ी पर की गई बारीक नक्काशी से सजा एक ऐसा भव्य प्रवेश द्वार होता है, जो घर के वैभव और संस्कृति को दर्शाता है। इस घर की खोली पर भी देवी-देवताओं, शेर, हाथी और लताओं की इतनी सुंदर नक्काशी थी कि जो भी वहां से गुजरता, एक पल को ठहर जाता।
पहाड़ की खोली केवल रहने की जगह नहीं थी, बल्कि संघर्ष और सादगी की सबसे बड़ी पहचान थी। खेतों के किनारे बनी छोटी-छोटी खोलियों में किसान दिनभर खेती करते, पशुओं की देखभाल करते और रात को वहीं चूल्हे पर मंडुवे की रोटी और गहत की दाल बनती थी।पहले पहाड़ की हर ढलान पर कोई न कोई खोली दिख जाती थी। कहीं घास काटने वाली महिलाओं का विश्राम स्थल, कहीं चरवाहों का ठिकाना और कहीं खेतों की रखवाली करती बुजुर्ग आंखों की आखिरी उम्मीद। लेकिन अब समय बदल गया है।
पलायन ने पहाड़ की खोलियों की रौनक भी छीन ली है। जो खोली कभी धुएं और लोगों की आवाजों से जीवित रहती थी, वहां अब मकड़ियों के जाले हैं। कई खोलियां बारिश और बर्फबारी में टूट चुकी हैं। कुछ पत्थरों के ढेर में बदल गईं तो कुछ जंगल में गुम हो गईं।आधुनिकता के इस दौर में सीमेंट के बड़े घर बन गए, लेकिन उनमें वह अपनापन नहीं रहा जो एक छोटी सी खोली में हुआ करता था। खोली में जगह भले कम होती थी, मगर रिश्तों में दूरी नहीं होती थी। वहां मोबाइल नेटवर्क नहीं था, लेकिन दिलों का संपर्क हमेशा मजबूत रहता था।
गांव के बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि खोली केवल दीवारों का ढांचा नहीं थी, बल्कि पहाड़ के आत्मनिर्भर जीवन की पहचान थी। वहीं से खेती चलती थी, वहीं लोकगीत जन्म लेते थे और वहीं पहाड़ का असली जीवन बसता था। आज जब पहाड़ के गांव वीरान हो रहे हैं, तब टूटती हुई खोलियां मानो यह सवाल पूछ रही हैं कि क्या विकास की दौड़ में हमने अपनी जड़ों को बहुत पीछे छोड़ दिया है।
आज पहाड़ की हवाएं जब उस बंद पड़े घर के झरोखों से गुजरती हैं, तो ऐसा लगता है मानो वह खोली सिसक रही हो। वह आज भी इंतजार कर रही है कि कभी कोई त्योहार आएगा, कोई प्रवासी बेटा वापस लौटेगा। उत्तराखंड के पहाड़ों में आज ऐसी हजारों खोलियां वीरान पड़ी हैं। यह सिर्फ खाली मकान नहीं हैं, बल्कि पहाड़ की लोक-कला और समृ( इतिहास के वह मूक गवाह हैं, जो पलायन के इस दौर में अपनी पहचान बचाने की गुहार लगा रहे हैं। शायद आने वाले समय में पहाड़ की खोली केवल कहानियों, लोकगीतों और पुरानी तस्वीरों में ही बचकर रह जाए।
पहाड़ की ‘सांसें’ अब हो गई हैं ‘बंजर’
पहाड़ में बंजर खेतों की छाती पर उगती कंटीली झाड़ियां और सिसक रही हमारी विरासत
जिन खेतों में कभी लहलहाता था धान और मंडुवा, वहां आज उगी हैं कँटीली झाड़ियाँ
पहाड़ की खेती को निगल गई है वन्यजीवों की मार, गांवों को खा गया पलायन का दंश
देहरादून। पहाड़ के सीढ़ीनुमा खेतों में हरियाली किसी चित्रकार की बनाई तस्वीर जैसी लगती थी। लेकिन आज वही खेत बंजर पड़े हैं। कहीं झाड़ियां उग आई हैं तो कहीं पत्थर और सूखी मिट्टी ने खेती की आखिरी उम्मीद भी निगल ली है। कभी धान, मंडुवा और झंगोरे से लहलहाने वाले उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों के खेत पलायन, बंदर-सुअर आतंक और बदलती जिंदगी ने वीरान बना दिए है।
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में बंजर होते खेत केवल खेती का संकट नहीं, बल्कि टूटते पहाड़ की सबसे दर्दनाक कहानी बन चुके हैं। गांवों से युवाओं का पलायन लगातार बढ़ रहा है, जो हाथ कभी हल चलाते थे, वह अब शहरों में नौकरी और मजदूरी की तलाश में भटक रहे हैं। पीछे बच गए हैं बूढ़े मां-बाप, बंद घर और खाली खेत। पहाड़ की खेती पहले ही मौसम की मार झेल रही थी, ऊपर से बंदरों और जंगली सूअरों ने किसानों की कमर तोड़ दी। कई गांवों में लोगों ने खेती करना इसलिए छोड़ दिया क्योंकि रातभर की मेहनत सुबह उजड़े खेतों में बदल जाती है। खेतों की मेड़ों पर अब बच्चों की आवाजें नहीं, बल्कि सन्नाटा पसरा रहता है।
सबसे बड़ा दर्द यह है कि जिन खेतों ने पीढ़ियों का पेट भरा, आज वही खेत अपने लोगों का इंतजार कर रहे हैं। गांव की बुजुर्ग महिलाएं आज भी आस लगाए बैठी हैं कि शायद इस बार उनका बेटा शहर से लौटकर खेतों में हल चलाएगा। लेकिन हर साल यह उम्मीद भी सूखी मिट्टी की तरह दरकती जा रही है। पहाड़ में खेती केवल रोजगार नहीं थी, वह संस्कृति थी, रिश्तों की डोर थी, सामूहिकता का उत्सव थी। पड़्याल और रोपाई जैसी परंपराएं गांवों को एक परिवार की तरह जोड़ती थीं। आज खेत बंजर हुए तो उनके साथ लोकगीत, मेलजोल और गांव की आत्मा भी सूखने लगी है।
आज पहाड़ के सीढ़ीदार खेत एक अजीब सी खामोशी ओढ़े हुए हैं। यह खामोशी हरी-भरी फसलों की नहीं, बल्कि खेतों के बंजर होने और उनके सीने पर उग आई कटीली झाड़ियों की है। पहाड़ में खेतों के बंजर होने के पीछे एक ऐसा दुष्चक्र है, जिसने किसानों की कमर तोड़कर रख दी है। ग्रामीणों के मुताबिक खेती छोड़ने की सबसे बड़ी वजह केवल रोजगार की तलाश नहीं, बल्कि जंगली जानवरों का आतंक भी है। पहाड़ के बंजर होते खेत सिर्फ मिट्टी का टुकड़ा नहीं हैं आत्मा के सूखते जाने के जीवंत दस्तावेज हैं।
हिमालय की ‘गोद’ और नदियों का ‘मायका’
हवाओं में केदार की गूंज, रगों में गंगा का पानी, यह है गढ़वाल की अनकही कहानी
मखमली बुग्यालों सी कोमल और चट्टानों सी मजबूत संस्कृति
गौरवशाली अतीत की विरासत और पहाड़ का छलकता पानी
गढ़वाल में कुदरत के आंगन में धड़कता एक पवित्र अहसास
देहरादून। उत्तराखंड का गढ़वाल क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता, गहरी धार्मिक आस्था, समृ( संस्कृति और गौरवशाली इतिहास का एक अनूठा संगम है। सात जिलों चमोली, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, टिहरी, देहरादून और हरिद्वार में फैला यह क्षेत्र अपनी कई अनूठी विशेषताओं के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। हिमालय की ऊंची चोटियों, पवित्र नदियों और शांत गांवों से घिरा गढ़वाल केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि पहाड़ी जीवन और संस्कृति की आत्मा माना जाता है।
गढ़वाल को हिंदू धर्म में सबसे पवित्र क्षेत्रों में से एक माना गया है। इसे देवभूमि का मुख्य केंद्र कहा जा सकता है। यहां भारत के प्रसि( चार धामकृबद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्रीकृपूरी तरह से गढ़वाल क्षेत्र में ही स्थित हैं। पवित्र नदी गंगा का उद्गम गंगोत्री से और यमुना का यमुनोत्री से होता है। इसके अलावा, अलकनंदा नदी के पांच पवित्र संगम विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग जिन्हें पंच प्रयाग कहा जाता है, यहीं स्थित हैं। देवप्रयाग में ही अलकनंदा और भागीरथी मिलकर गंगा बनती हैं। सिखों का सुप्रसि( तीर्थ स्थल हेमकुंड साहिब भी चमोली गढ़वाल में एक खूबसूरत बर्फानी झील के किनारे स्थित है।
गढ़वाल की भौगोलिक बनावट में आसमान छूती चोटियां और मखमली घास के मैदान बुग्याल शामिल हैं। भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी नंदा देवी 7816 मीटर, कामेट, त्रिशूल, चौखंबा और नीलकंठ जैसी भव्य चोटियां इसी क्षेत्र का गौरव हैं। चमोली जिले में स्थित यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, जो मानसून के समय सैकड़ों प्रजातियों के प्राकृतिक फूलों से महक उठता है। ऊंचे पहाड़ों पर पेड़ों की कतार खत्म होने के बाद मिलने वाले घास के मैदानों को बुग्याल कहते हैं। ओली जो स्कीइंग के लिए प्रसि( चोपता, और वेदिनी बुग्याल इसके शानदार उदाहरण हैं।
गढ़वाल की संस्कृति यहां के सीधे-सादे और कठिन जीवन जीने वाले लोगों की जीवंतता को दर्शाती है। यहां के पारंपरिक नृत्य जैसे थड़िया, चौंफला और झुमेलो बहुत प्रसि( हैं। वहीं, वीरता और ऐतिहासिक गाथाओं पर आधारित पवांड़े और जागर देवताओं का आह्वान करने वाला संगीत यहां की आत्मा हैं। रम्माण उत्सव को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर में शामिल किया गया है। गढ़वाल की लोकसंस्कृति बेहद समृ( और भावनात्मक है। यहां के लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक वाद्ययंत्र लोगों की पहचान हैं। बेडू पाको बारामासा जैसे लोकगीत पूरी दुनिया में प्रसि( हैं। पांडव नृत्य, चौफला और झुमैलो यहां की पारंपरिक लोककलाएं हैं। गढ़वाली भाषा और बोली क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा मानी जाती है।
यहाँ मुख्य रूप से गढ़वाली भाषा बोली जाती है, जिसकी अपनी कई उप-बोलियां जैसे श्रीनगरी, राठी, सलाणी हैं। महिलाएं पारंपरिक रूप से घाघरा-आंगड़ी और पिछौड़ा पहनती हैं। गले में गलोबंद, छाती पर हंसुली और नाक में पहनी जाने वाली बड़ी नथ टिहरी की नथ गढ़वाली संस्कृति की पहचान है। पहाड़ की कड़कड़ाती ठंड और मेहनत वाले जीवन के अनुकूल यहां का खाना बेहद पौष्टिक और जैविक होता है। कोदे की रोटी, झंगोरे की खीर, चौंसू, फानू और थिचवाणी,बिच्छू घास से बनाया जाने वाला यह साग आयरन और औषधीय गुणों से भरपूर होता है।
प्राचीन काल में यह क्षेत्र 52 छोटे-छोटे किलों में बंटा हुआ था। पंवार वंश के राजा अजय पाल ने 15वीं शताब्दी में इन सभी गढ़ों को जीतकर एक किया, जिसके बाद इस पूरे क्षेत्र का नाम गढ़वाल पड़ा। गढ़वाल के लोग अपनी वीरता के लिए जाने जाते हैं। भारतीय सेना की प्रतिष्ठित गढ़वाल राइफल्स का मुख्यालय पौड़ी जिले के लैंसडाउन में है। प्रथम विश्व यु( के नायक गब्बर सिंह नेगी और दरवान सिंह नेगी यहीं के थे, जिन्हें विक्टोरिया क्रास मिला था।
गढ़वाल की एक बड़ी चुनौती पलायन भी है। रोजगार और शिक्षा की कमी के कारण कई गांव खाली हो रहे हैं। फिर भी अपनी संस्कृति, त्योहारों और प्रकृति से जुड़ाव के कारण लोग अपनी जड़ों से भावनात्मक रिश्ता बनाए हुए हैं। यहा बहती हुई गंगा की कलकल, केदारनाथ का डमरू, नंदा देवी की भव्यता और कड़कड़ाती ठंड में मड़ुए की रोटी के गरमा-गर्म स्वाद का अहसास है।
-पहाडी थाली का ‘देसी सुपरफूड’
पहाड़ में स्वाद और सेहत का खजाना है कंडाली का साग
---चुभन में छिपा स्वाद और पहाड़ की शान है साग
---जंगल से रसोई तक, कंडाली की अनोखी कहानी
---पर्यटकों को भाता है ‘कंडाली के साग’ का स्वाद
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में कंडाली का नाम सुनते ही कई लोगों को बचपन की चुभन याद आ जाती है। जंगलों और खेतों के किनारे उगने वाली यह पौधा छूते ही शरीर में जलन पैदा कर देता है, लेकिन यही कंडाली जब पहाड़ी रसोई में पकती है तो स्वाद और सेहत का अनमोल खजाना बन जाती है। पहाड़ की पारंपरिक थाली में कंडाली का साग केवल भोजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति और पहाड़ी जीवनशैली की पहचान माना जाता है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में एक बड़ी प्रसि( कहावत हैकृजो कंडाली से डरा, उसने पहाड़ का स्वाद नहीं चखा। कुमाऊं और गढ़वाल में कंडाली हर पहाड़ी रास्ते, खेत की मेड़ और गधेरों के पास बहुतायत में उगती है। इसकी पत्तियों और डंठल पर छोटे-छोटे सुई जैसे कांटे होते हैं, जिनमें फार्मिक एसिड होता है। अगर यह शरीर से छू जाए तो तेज झनझनाहट और खुजली होती है। लेकिन पहाड़ी महिलाओं के पास इस कांटेदार चुनौती को एक बेहतरीन पकवान में बदलने का हुनर पीढ़ियों से चला आ रहा है।
गढ़वाल और कुमाऊं के गांवों में आज भी कंडाली का साग बड़े चाव से बनाया जाता है। पुराने समय में जब बाजार और आधुनिक सब्जियां गांवों तक नहीं पहुंचती थीं, तब लोग जंगलों और खेतों से मिलने वाली प्राकृतिक वनस्पतियों पर निर्भर रहते थे। कंडाली का साग उन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में से एक है, जिसने पीढ़ियों तक पहाड़ के लोगों को पोषण दिया। कंडाली को तोड़ना भी किसी कला से कम नहीं माना जाता। इसे तोड़ते समय हाथों में जलन और चुभन होती है, इसलिए लोग विशेष सावधानी बरतते हैं। गांव की महिलाएं और बुजुर्ग इसे दस्ताने या लकड़ी की मदद से इकट्ठा करते हैं। इसके बाद इसे अच्छी तरह उबालकर और मसालों के साथ पकाकर स्वादिष्ट साग तैयार किया जाता है। सबसे आखिरी और मुख्य कदम है तड़का। सरसों के तेल में जखिया और सूखी लाल मिर्च का छौंक लगाया जाता है। जखिया का कड़कड़ाना कंडाली के साग को उसका असली पहाड़ी मिजाज देता है। कई जगह इसे मंडुवे की रोटी या भात के साथ परोसा जाता है।
आयुर्वेद में भी कंडाली को बेहद गुणकारी माना गया है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह शरीर को गर्माहट देने के साथ-साथ कई बीमारियों में लाभ पहुंचाती है। पहाड़ के बुजुर्ग आज भी इसे प्राकृतिक औषधि के रूप में देखते हैं। बदलते दौर में अब शहरों के लोग और पर्यटक भी कंडाली के साग की ओर आकर्षित हो रहे हैं। कई होटल और होमस्टे इसे पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन के रूप में अपने मेन्यू में शामिल कर रहे हैं।
आज जब दुनिया आर्गेनिक और सुपरफूड के पीछे भाग रही है। उत्तराखंड के गांवों में सदियों से मौजूद यह कंडाली अब बड़े शहरों के फाइव-स्टार होटलों के मेन्यू में नेटल सूप और सिप के नाम से जगह बना रही है। लेकिन जो स्वाद पहाड़ की ठंडी हवाओं के बीच लोहे की कड़ाही से सीधे थाली में आए कंडाली के साग में है उसकी तुलना दुनिया के किसी शेफ के व्यंजन से नहीं की जा सकती।
पहले ‘गांव’ और अब स्कूल हुए ‘खाली’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-15
खाली होते गांवों के स्कूल, निजी शिक्षा का बढ़ा बोझ, 2027 के विधानसभा के रण में होगी सत्ता की परीक्षा
---सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच फंसी शिक्षा व्यवस्था बनी जनता की सबसे बड़ी नाराजगी
---स्मार्ट क्लास के दावों के पीछे शिक्षक विहीन स्कूलों की कड़वी सच्चाई अब बनी बहस का केंद्र
---प्रदेश में बदहाल सरकारी व्यवस्थाएं आगामी चुनाव में सत्ता की परीक्षा लेने को है तैयार
देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। राज्य में पारंपरिक तौर पर पलायन, रोजगार और जल-जंगल-जमीन जैसे बुनियादी मुद्दे हावी रहे हैं, लेकिन बदलते समय के साथ इस बार शिक्षा और स्कूल सुधार एक ऐसा केंद्रीय मुद्दा बनता दिख रहा है जो किसी भी दल का खेल बना या बिगाड़ सकता है।
सरकारी आंकड़ों में शिक्षा व्यवस्था भले पटरी पर दिखाई जाती हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हजारों अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए गांव छोड़कर कस्बों और शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। राज्य के पर्वतीय इलाकों में लगातार बंद हो रहे प्राथमिक विद्यालय अब केवल शिक्षा का संकट नहीं, बल्कि पहाड़ के अस्तित्व का सवाल बनते जा रहे हैं। गांवों में स्कूल बंद होने का सीधा असर बसावट पर पड़ रहा है, जिस गांव में कभी बच्चों की आवाज गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। यही कारण है कि शिक्षा अब केवल बच्चों का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है।
सरकारें वर्षों से स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और नई शिक्षा नीति के दावे करती रही हैं, लेकिन पहाड़ के दूरस्थ गांवों में आज भी बच्चे टूटी छतों, जर्जर कमरों और बिना विज्ञान-गणित शिक्षकों के पढ़ने को मजबूर हैं। कई इंटर कालेजों में महीनों तक विषय विशेषज्ञ नहीं पहुंचते। अभिभावकों का भरोसा सरकारी स्कूलों से लगातार टूट रहा है और यही कारण है कि गांव का गरीब परिवार भी बच्चों को पढ़ाने के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहा है।
प्रदेश के पर्वतीय जिलों में लगातार घटती छात्र संख्या सरकार के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। सैकड़ों स्कूल या तो बंद हो चुके हैं या दूसरे स्कूलों में समायोजित कर दिए गए हैं। गांवों में लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब स्कूल ही नहीं बचेंगे तो गांव कैसे बचेंगे? चुनाव से पहले विपक्ष अब इसी मुद्दे को हथियार बनाने की तैयारी में है। बेरोजगार बीएड और डीएलएड प्रशिक्षित युवाओं में भी नाराजगी बढ़ रही है। वर्षों से भर्ती प्रक्रिया लटकी रहने और अतिथि शिक्षकों के भरोसे शिक्षा व्यवस्था चलने पर युवाओं में असंतोष है।
वहीं शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड में शिक्षा केवल पढ़ाई का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह पलायन, रोजगार और गांवों के अस्तित्व से सीधे जुड़ा प्रश्न बन चुका है, जिस गांव में अच्छा स्कूल नहीं होगा, वहां परिवार रुकना नहीं चाहेगा। राज्य में साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से काफी बेहतर होने के बावजूद, बुनियादी शिक्षा का ढांचा और नीतियों में हो रहे बदलाव इस बार चुनावी रण में मुख्य मुद्दा बनने की ओर अग्रसर हैं। उत्तराखंड का सबसे बड़ा दर्द है पलायन। लोग पहाड़ों से मैदानी इलाकों की तरफ सिर्फ रोजगार के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की अच्छी पढ़ाई के लिए भी भाग रहे हैं। पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ के कई गांवों में सिर्फ इसलिए ताले लटक गए क्योंकि वहां बच्चों के लिए अच्छे स्कूल या कालेज नहीं थे।
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टूटी छतें और जर्जर स्कूल के कमरें
बीते कुछ वर्षों में सरकार ने स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा, अंग्रेजी माध्यम और नई शिक्षा नीति को लेकर बड़े-बड़े दावे किए हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर इंटरनेट और शिक्षकों की कमी ने इन योजनाओं की रफ्तार रोक दी है। पहाड़ के कई विद्यालय आज भी टूटी छतों, जर्जर कमरों और सीमित संसाधनों के सहारे चल रहे हैं। वहीं दूसरी ओर निजी स्कूलों की बढ़ती फीस ने मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी है। अभिभावकों में यह भावना तेजी से बढ़ रही है कि सरकारी स्कूलों में भविष्य सुरक्षित नहीं है। यही नाराजगी आने वाले चुनावों में राजनीतिक रंग ले सकती है।
हाईवे ‘चमक’ रहे और गांव हैं ‘बदहाल’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-14
-सड़क पर सियासत की रफ्तार 2027 में गड्ढों से लेकर हाईवे तक हो सकता हैं चुनावी संग्राम
---चारधाम की रहें हुई सुगम, गांवों में हिचकोले खा रही है जिंदगीं
---सड़कों की गुणवत्ता, लैंडस्लाइड व ग्रामीण कनेक्टिविटी का दर्द
---अधूरी सड़कों और घटिया निर्माण को लेकर लोगों में है असंतोष
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 के लिए जैसे-जैसे राजनीतिक दल अपनी जमीन मजबूत कर रहे हैं, वैसे-वैसे यह साफ होता जा रहा है कि इस बार सड़क सूबे का सबसे ज्वलंत चुनावी मुद्दा बनने जा रही है। एक तरफ जहां सत्ताधारी भाजपा सरकार अपनी डबल इंजन रफ्तार और चारधाम कनेक्टिविटी के दम पर दोबारा सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने की रणनीति बना रही है, वहीं कांग्रेस ने सड़कों की गुणवत्ता, लैंडस्लाइड और ग्रामीण कनेक्टिविटी को लेकर सरकार को घेरने का पूरा मन बना लिया है।
राज्य के पर्वतीय इलाकों में हालात यह हैं कि कई गांव आज भी बरसात में मुख्य सड़कों से कट जाते हैं। जगह-जगह भूस्खलन और दरकती सड़कों ने यात्रियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में विपक्ष सरकार पर हाईवे की चमक और गांवों की बदहाली का आरोप लगाकर जनता के बीच मुद्दा बनाने की तैयारी कर रहा है। वहीं सरकार दावा कर रही है कि उत्तराखंड में अब तक का सबसे बड़ा रोड इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क तैयार किया जा रहा है, जिसमें देहरादून-हरिद्वार कारिडोर, )षिकेश बाईपास और चारधाम परियोजनाएं शामिल हैं।
2027 से पहले सड़कों पर राजनीति इसलिए भी तेज होती दिख रही है क्योंकि पहाड़ में विकास का सबसे सीधा पैमाना आज भी सड़क पहुंची या नहीं माना जाता है। गांवों में सड़क बनने का मतलब अस्पताल, स्कूल, बाजार और रोजगार से जुड़ाव है। लेकिन कई इलाकों में अधूरी सड़कों और घटिया निर्माण को लेकर लोगों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर भी खराब सड़कों और सरकारी लापरवाही को लेकर लोगों की नाराजगी खुलकर सामने आ रही है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा इस चुनाव में बुनियादी ढांचे, विशेषकर सड़कों के कायाकल्प को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। सरकार के रणनीतिकारों का मानना है कि )षिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के साथ-साथ )षिकेश-बद्रीनाथ-केदारनाथ आल वेदर रोड ने राज्य में पर्यटन और तीर्थयात्रा की तस्वीर बदली है।
चीन सीमा से सटे पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी जैसे सीमांत जिलों तक सड़कों के सुदृढ़ीकरण को राष्ट्रवाद और सुरक्षा से जोड़कर पेश किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि सुगम सड़कों के कारण चारधाम यात्रा में रिकार्ड श्र(ालु पहुंच रहे हैं, जिससे स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिला है। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस नैरेटिव को काटने के लिए जमीनी मुद्दों को उठाना शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार केवल मुख्य राजमार्गों की चमक दिखा रही है, जबकि राज्य के अंदरूनी हिस्सों की स्थिति जस की तस है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2027 में भाजपा विकास और बड़े रोड प्रोजेक्ट्स को चुनावी चेहरा बनाएगी, जबकि कांग्रेस और क्षेत्रीय दल गांवों की जमीनी समस्याओं, पलायन और खराब सड़क व्यवस्था को मुद्दा बनाकर सरकार को घेरेंगे। खासकर पर्वतीय सीटों पर सड़क, स्वास्थ्य और पलायन एक-दूसरे से जुड़े बड़े चुनावी प्रश्न बन सकते हैं।
‘काकरोच’ की ‘डिजिटल फौज’
इंस्टाग्राम पर रेंगते हुए आई काकरोच पार्टी, करोड़ों फालोअर्स, इंटरनेट पर मचा तहलका
देश के सीजेआई की एक टिप्पणी और सोशल मीडिया पर खड़ी हो गई काकरोच सेना
इंस्टाग्राम पर इसके फालोअर्स ने बीजेपी और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों को भी पीछे छोड़ा
देश में काकरोच पार्टी का सोशल मीडिया तूफान, व्यंग्य में छिपा युवाओं का असली गुस्सा
मीम, रील और ट्रोल संस्कृति के दौर में काकरोच पार्टी है क्या सोशल मीडिया पर है एक मजाक
क्या राजनीति से मोहभंग, भ्रष्टाचार और अवसरवादी नेताओं पर है देश के युवओं का इंटरनेट व्यंग्य
देहरादून। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, तो आपने एक अजीबोगरीब नाम बार-बार ट्रेंड होते देखा होगाकृकाकरोच पार्टी। पहली नजर में यह किसी हालीवुड की एनिमेटेड फिल्म या मीम जैसा लग सकता है, लेकिन डिजिटल गलियारों में इस वक्त यह शब्द एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन चुका है। इंटरनेट की दुनिया में यह काकरोच तेजी से रेंग रहा है और हर टाइमलाइन पर कब्जा कर चुका है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब पर लोग मजेदार मीम, कटाक्ष भरे वीडियो और राजनीतिक तंज के जरिए इस शब्द को वायरल कर रहे हैं। पहली नजर में यह केवल इंटरनेट का मजाक लग सकता है, लेकिन इसके पीछे जनता की गहरी नाराजगी और राजनीतिक व्यवस्था से उपजा अविश्वास साफ दिखाई देता है।
दरअसल सोशल मीडिया सर्च से पता चला है कि देश के सीएजेआई की एक टिप्पणी के बाद इंटरनेट पर यह बवाल मचा। बवाल भी इतना कि इसने इंटरनेट के सभी रिकार्ड ध्वस्त कर दिए और देश की प्रमुख पार्टियों भाजपा और कांग्रेस को ही इंटरनेट पर पछाड़ दिया। आज आप जब सोशल मीडिया देख रहे होंगे तो आपके मोबाइल पर भी काकरोच पार्टी रेंग रही होगी। बता दें कि काकरोच पार्टी शब्द का इस्तेमाल लोग उन नेताओं और राजनीतिक प्रवृत्तियों के लिए कर रहे हैं, जो हर परिस्थिति में खुद को बचा लेते हैं। जैसे काकरोच को सबसे जिद्दी और हर हाल में जिंदा रहने वाला जीव माना जाता है, वैसे ही सोशल मीडिया यूजर्स भ्रष्टाचार, दल-बदल और अवसरवाद की राजनीति को इस प्रतीक से जोड़ रहे हैं। युवाओं के बीच यह ट्रेंड तेजी से इसलिए भी फैल रहा है क्योंकि अब राजनीति पर सीधी बहस की जगह व्यंग्य और मीम ने ले ली है। आज का युवा लंबा भाषण नहीं सुनता, बल्कि 30 सेकेंड की रील में पूरा राजनीतिक संदेश समझ लेता है। काकरोच पार्टी उसी डिजिटल राजनीति की उपज है, जहां हास्य के जरिए सत्ता और व्यवस्था पर चोट की जाती है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रेंड केवल मनोरंजन नहीं है। यह उस पीढ़ी की निराशा को दर्शाता है जो बार-बार भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और नेताओं के बदलते बयान देखकर राजनीति से दूरी महसूस कर रही है। सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि पार्टियां बदल जाती हैं, चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन व्यवस्था की आदतें नहीं बदलतीं। दिलचस्प बात यह भी है कि इस ट्रेंड में किसी एक दल को निशाना नहीं बनाया जा रहा, बल्कि पूरी राजनीतिक संस्क1ति पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यही कारण है कि काकरोच पार्टी एक मीम से बढ़कर व्यवस्था विरोधी जनभावना का प्रतीक बनती जा रही है।
हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सोशल मीडिया की यह व्यंग्य संस्कृति लोकतंत्र के लिए दोधारी तलवार है। एक ओर यह जनता को खुलकर बोलने का मंच देती है, वहीं दूसरी ओर गंभीर मुद्दों को केवल मजाक तक सीमित कर देने का खतरा भी पैदा करती है। फिर भी इतना तय है कि आज की राजनीति में सोशल मीडिया केवल प्रचार का माध्यम नहीं रह गया है। अब जनता भी मीम और ट्रेंड के जरिए नेताओं को आईना दिखा रही है। काकरोच पार्टी का वायरल होना इस बात का संकेत है कि जनता अब नाराजगी को भाषणों में नहीं, बल्कि व्यंग्य में व्यक्त कर रही है।
हालांकि यह देखने में एक मजाकिया मीम या तीखा तंज लगता है, लेकिन भाषा के जानकारों ने इस पर चिंता भी जताई है। राजनीति में जब आप अपने विरोधियों को इंसान न मानकर कीड़े-मकोड़े या काकरोच कहना शुरू कर देते हैं, तो इसे समाजशास्त्र में डीह्यूमनाइजेशन कहा जाता है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी वर्ग या पार्टी को कीड़े-मकोड़ों की उपमा दी जाती है, तो समाज में नफरत का स्तर बहुत तेजी से बढ़ता है।
फिलहाल सोशल मीडिया पर छाई काकरोच पाटी कोई असली राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि यह इस दौर के डिजिटल फ्रस्ट्रेशन और क्रिएटिविटी का एक काकटेल है। देखना दिलचस्प होगा कि यह महज कुछ दिनों का इंटरनेट ट्रेंड बनकर दम तोड़ देता है, या आने वाले समय में मुख्यधारा की राजनीति के नेता भी एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए इस काकरोच शब्द का इस्तेमाल अपने भाषणों में करने लगेंगे।
पहाड़ हर गांव में ‘वीरता’ की नई कहानी
शौर्य की धरती ‘गढ़वाल’ में आज भी है सेना में जाने की परंपरा
देश की सीमाओं से गांव तक गूंजता है गढ़वाल का सैनिक गौरव
देवभूमि की गौरवशाली परंपरा ने देश को दिए हजारों वीर जवान
देहरादून। हिमालय की गोद में बसा गढ़वाल केवल प्राकृतिक सुंदरता और देवस्थलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अदम्य वीरता और सैनिक परंपरा के लिए भी पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां की मिट्टी में साहस, अनुशासन और देशभक्ति रची-बसी है। गढ़वाल के गांवों में आज भी सेना को केवल नौकरी नहीं, बल्कि सम्मान, गौरव और राष्ट्रसेवा का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है।
पीढ़ियों से यहां के युवाओं ने भारतीय सेना में भर्ती होकर सीमाओं की रक्षा की है। यही कारण है कि गढ़वाल को वीरों की भूमि कहा जाता है। यहां का लगभग हर गांव किसी न किसी सैनिक, शहीद या पूर्व सैनिक की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है।
गढ़वाल की सैनिक परंपरा का इतिहास सदियों पुराना है। प्राचीन काल में गढ़वाल के राजाओं की सेनाएं अपने साहस और यु( कौशल के लिए प्रसि( थीं। कठिन पहाड़ी परिस्थितियों में लड़ने की क्षमता ने यहां के यो(ाओं को विशेष पहचान दी।
ब्रिटिश शासनकाल में जब अंग्रेजों ने गढ़वाल के युवाओं की बहादुरी देखी तब उन्होंने गढ़वाल राइफल्स की स्थापना की। वर्ष 1887 में स्थापित हुई। आज भारतीय सेना की सबसे सम्मानित रेजीमेंटों में गिनी जाती है। गढ़वाल राइफल्स ने देश के लगभग हर बड़े यु( में अपनी वीरता का परिचय दिया है। प्रथम विश्व यु( से लेकर कारगिल यु( तक इस रेजीमेंट के जवानों ने असाधारण साहस दिखाया। 1962 के भारत-चीन यु( 1965 और 1971 के भारत-पाक यु(ों में गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए। कारगिल यु( में भी गढ़वाल के वीर जवानों ने दुर्गम चोटियों पर लड़ते हुए देश की रक्षा की।
गढ़वाल के सैनिकों की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस नहीं खोते। ऊंचे पहाड़ों और कठिन जीवन ने उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाया है। गढ़वाल के कई गांव ऐसे हैं जहां लगभग हर घर से कोई न कोई सेना में रहा है। यहां बच्चों का बचपन से ही सपना होता है फौजी बनना। गांवों में सेना से लौटे पूर्व सैनिक युवाओं के प्रेरणास्रोत होते हैं। आज भी जब कोई जवान छुट्टी में गांव लौटता है तो उसका सम्मान किसी नायक की तरह किया जाता है। सेना की वर्दी यहां सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि गर्व और सम्मान का प्रतीक मानी जाती है।
गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों में सीमित रोजगार के बीच सेना लंबे समय तक युवाओं के लिए सबसे सम्मानजनक और स्थिर विकल्प रही है। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि यहां सेना में जाना राष्ट्रभक्ति और परंपरा से जुड़ा भावनात्मक विषय है। गढ़वाल ने देश को कई वीर सैनिक और शहीद दिए हैं। कई वीरों ने अपने बलिदान से भारतीय सैन्य इतिहास में अमिट छाप छोड़ी। कारगिल यु( में भी गढ़वाल के कई जवानों ने सर्वाेच्च बलिदान दिया। उनके नाम गांवों के स्मारकों और लोगों के दिलों में आज भी जीवित हैं।
गढ़वाल की सैनिक परंपरा केवल पुरुषों तक सीमित नहीं रही। यहां की महिलाओं ने भी त्याग और साहस की मिसाल पेश की है। सैनिकों की पत्नियां और माताएं कठिन परिस्थितियों में परिवार संभालते हुए अपने बेटों और पतियों को देशसेवा के लिए प्रेरित करती रही हैं। कई बार महीनों तक दुर्गम गांवों में अकेले रहकर उन्होंने परिवार और खेती दोनों की जिम्मेदारी निभाई। गढ़वाल की सैनिक परंपरा के पीछे महिलाओं का यह मौन त्याग भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
समय के साथ परिस्थितियां बदली हैं। अब युवाओं के सामने रोजगार के कई नए विकल्प हैं। सेना भर्ती प्रक्रिया में बदलाव और अग्निवीर योजना जैसे विषयों पर पहाड़ में चर्चा और चिंता भी देखने को मिलती है। इसके बावजूद गढ़वाल में सेना के प्रति सम्मान और आकर्षण आज भी बना हुआ है। यहां के युवाओं में देशसेवा की भावना अब भी उतनी ही मजबूत दिखाई देती है।
गढ़वाल की वीर सैनिक परंपरा केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि आज भी जीवित संस्कृति है। यहां की लोकगाथाओं, गीतों और कहानियों में सैनिकों का गौरव गूंजता है। जब देश की सीमाओं पर कोई गढ़वाली जवान खड़ा होता है, तब उसके साथ केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ का साहस खड़ा होता है। यही कारण है कि गढ़वाल की धरती को वीरता, बलिदान और राष्ट्रभक्ति की अमर भूमि कहा जाता है।
‘राष्ट्रीय चेहरों’ की पहाड़ में ‘एंट्री’
भाजपा और कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के दौरे से होने वाला है चुनावी रण का आगाज
---भाजपा अध्यक्ष नितिन व कांग्रेस नेता राहुल के दौरों से बढ़ी तपिश
---देवभूमि में गरमाई सियासत, बड़े नेताओं के दौरों से बढ़ी हलचल
---दिल्ली से दून तक सियासी हलचल तेज,स्थानीय मुद्दों पर फोकस
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के प्रस्तावित उत्तराखंड दौरों ने साफ संकेत दे दिए हैं कि 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात अब तेजी से बिछने लगी है। दोनों राष्ट्रीय दल अब पहाड़ की राजनीति को केवल संगठनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि भविष्य की सत्ता की लड़ाई के रूप में देखने लगे हैं। देहरादून से लेकर कुमाऊं और गढ़वाल तक राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इन दौरों का उद्देश्य सिर्फ कार्यकर्ताओं में जोश भरना नहीं, बल्कि जनता के मूड को समझना और चुनावी नैरेटिव तय करना भी है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पार्टी उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा डबल इंजन विकास, समान नागरिक संहिता, चारधाम परियोजना और निवेश को बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में पेश कर रही है। पार्टी सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष का फोकस बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और गुटबाजी को नियंत्रित करने पर रहेगा। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि उत्तराखंड में संगठन पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा 2027 में राष्ट्रीय नेतृत्व और हिंदुत्व के मुद्दों के साथ-साथ विकास परियोजनाओं को भी प्रमुख हथियार बनाएगी।
दूसरी ओर कांग्रेस नेता राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस इस बार बेरोजगारी, भर्ती घोटाले, पलायन, महंगाई और पहाड़ की बदहाल स्वास्थ्य-शिक्षा व्यवस्था को लेकर भाजपा सरकार को घेरने की तैयारी में है। राहुल गांधी पहले भी अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान रोजगार, सामाजिक न्याय और संविधान बचाने जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना चुके हैं। उत्तराखंड में उनका फोकस युवाओं, महिलाओं और पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं पर रहने की संभावना है। कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि भाजपा सरकार इवेंट और प्रचार में ज्यादा व्यस्त है, जबकि गांवों में पलायन और बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दोनों बड़े नेताओं के दौरे यह दिखाते हैं कि उत्तराखंड अब राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण चुनावी राज्य बन चुका है। राज्य छोटा जरूर है, लेकिन यहां की राजनीतिक दिशा राष्ट्रीय संदेश देने का काम करती है। पिछले कुछ वर्षों में अंकिता भंडारी हत्याकांड, भर्ती परीक्षाओं में धांधली, सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति जैसे मुद्दों ने सरकार के सामने चुनौती खड़ी की है। वहीं भाजपा अब भी मजबूत संगठन और केंद्र सरकार की योजनाओं के दम पर बढ़त बनाए हुए है।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाला चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं,बल्कि नैरेटिव की लड़ाई होगा। भाजपा राष्ट्रवाद, विकास और मजबूत नेतृत्व की बात करेगी, जबकि कांग्रेस जनता के स्थानीय मुद्दों और असंतोष को चुनावी हथियार बनाएगी। दोनों नेताओं के दौरे इस बात का संकेत हैं कि आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति और अधिक आक्रामक होने वाली है। पहाड़ में अब चुनावी माहौल धीरे-धीरे गर्माने लगा है।
उत्तराखंड सरकार लगातार अपनी पुलिस को मित्र पुलिस कहकर प्रचारित करती रही है, लेकिन धरातल पर हेम भट्ट जैसी घटनाएं इस दावों की पोल खोलती हैं। जनता और सरकार के बीच सेतु का काम करने वाले पत्रकारों का इस तरह उत्पीड़न यह साफ दर्शाता है कि तंत्र अब अपनी कमियों को छिपाने के लिए तानाशाही पर उतारू है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए, क्योंकि सरकार की इस चुप्पी को पत्रकारों के दमन को मूक सहमति माना जा रहा है।
बुधवार, 20 मई 2026
‘तिरंगे में लिपटा एक युग’
---एक युग का अंत---
---नम आंखों के बीच पंचतत्व में विलीन हुए जनरल बीसी खंडूड़ी
---सेना की दृढ़ता, राजनीति की सादगी व पहाड़ की ईमानदार पहचान
---अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब, खंडूड़ी सिर्फ नेता नहीं था भरोसा
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति और भारतीय सेना का एक अनुशासित, सादगीपूर्ण और ईमानदार चेहरा आज पंचतत्व में विलीन हो गया। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब केवल एक राजनेता को विदाई देने नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व को अंतिम प्रणाम करने पहुंचा था, जिसने जीवनभर अनुशासन, सादगी और जनसेवा को अपनी पहचान बनाए रखा।
तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर जब अंतिम यात्रा के लिए निकला तो माहौल गमगीन हो उठा। हर आंख नम थी, हर चेहरा शांत और हर मन में एक ही भावकृएक ईमानदार दौर अब स्मृति बन गया। सेना के जवानों की सलामी, गूंजते राष्ट्रगान और खंडूड़ी अमर रहें के नारों के बीच जैसे पूरा उत्तराखंड अपने उस जनरल को विदा कर रहा था, जिसने सत्ता में रहकर भी सादगी नहीं छोड़ी। अंतिम यात्रा में बुजुर्गों की आंखों में सम्मान था तो युवाओं के चेहरों पर एक अलग तरह की उदासी। पहाड़ के गांवों से आए कई लोग सिर्फ एक झलक पाने के लिए घंटों खड़े रहे। उनके लिए खंडूड़ी केवल मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि राजनीति में भरोसे और साफ छवि का प्रतीक थे।
उत्तराखंड की राजनीति में अक्सर यह कहा जाता रहा कि खंडूड़ी हैं जरूरी। यह केवल चुनावी नारा नहीं था, बल्कि उस जनविश्वास की अभिव्यक्ति थी जो उन्होंने अपने व्यवहार और निर्णयों से अर्जित किया। राजनीति के शोर और आरोपों के बीच भी उनकी छवि एक सख्त लेकिन ईमानदार प्रशासक की बनी रही। सेना से राजनीति तक का उनका सफर भी असाधारण रहा। फौजी अनुशासन उनके व्यक्तित्व में अंतिम समय तक दिखाई देता रहा। शायद यही कारण था कि उनकी अंतिम यात्रा में केवल राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि आम लोग, पूर्व सैनिक, युवा और कर्मचारी वर्ग भी बड़ी संख्या में मौजूद रहा।
हरिद्वार में गंगा की लहरों की कलकल के बीच जब उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी गई, तो मानो पहाड़ का एक रक्षक हमेशा के लिए सो गया। अंतिम यात्रा देहरादून से शुरू होकर जैसे-जैसे आगे बढ़ी, सड़क के दोनों ओर हजारों की संख्या में लोग हाथ जोड़े, आंखों में आंसू लिए खड़े थे। पवित्र गंगा घाट पर जब सेना के बिगुल ने अंतिम शोक धुन बजाई, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें छलक उठीं। मातमी धुन के बीच सेना के जवानों ने हवा में गोलियां दागकर अपने पूर्व जनरल को अंतिम सलामी दी।
जब चिता की लपटें उठीं तो कई आंखें भर आईं। ऐसा लगा जैसे उत्तराखंड की राजनीति का एक सादा, शांत और विश्वसनीय अध्याय धीरे-धीरे धुएं में बदलकर इतिहास का हिस्सा बन रहा हो। समय आगे बढ़ जाएगा, नई सरकारें आएंगी, नए चेहरे भी उभरेंगे, लेकिन पहाड़ की राजनीति में ईमानदारी, सादगी और अनुशासन की चर्चा जब भी होगी, जनरल खंडूड़ी का नाम उसी सम्मान के साथ लिया जाएगा जैसे आज उनकी अंतिम यात्रा में हर जुबान पर था। गंगा मां की गोद में विलीन हुए इस पहाड़ के गौरव को पूरा देश और उत्तराखंड हमेशा कृतज्ञ भाव से याद रखेगा।
अंतिम सलाम, मेजर जनरल! आपकी कमी हमेशा खलेगी।
‘सपनों’ की नीलामी पर सिस्टम की ‘खामोशी’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-13
भर्ती घोटाले और भ्रष्टाचार की आग में तपेगा 2027 का चुनावी रण
क्रासर
---पेपर लीक, नियुक्तियों पर सवाल और सिस्टम पर अविश्वास
---युवाओं की नाराजगी क्या बदल देगी राजनीति का समीकरण
---उत्तराखंड राज्य की राजनीति के लिए यह चेतावनी का समय
---इतिहास गवाह हैकृजब-जब भरोसा टूटा तब सरकारें ही बदली
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक विकास, पलायन, सड़क और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही, लेकिन अब प्रदेश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता था। उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में सरकारी नौकरी सिर्फ रोजगार नहीं होती, वह परिवार की आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और स्थिर भविष्य का प्रतीक होती है। पहाड़ के गांवों से निकलने वाला युवा सीमित संसाधनों के बावजूद दिन-रात तैयारी करता है। माता-पिता खेत बेचकर और कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। लेकिन जब परीक्षाओं के पेपर बाजार में बिकने लगें, नियुक्तियों पर सवाल उठने लगें और मेहनत की जगह सिस्टम की चर्चा होने लगे, तब सबसे पहले भरोसा मरता है।
यही कारण है कि भर्ती घोटाले उत्तराखंड में केवल कानूनी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गए हैं। यह अब भावनात्मक और राजनीतिक संकट बन चुका है। युवाओं के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि सत्ता और व्यवस्था उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। यही आक्रोश आने वाले विधानसभा चुनावों में निर्णायक रूप ले सकता है।
प्रदेश में पटवारी भर्ती, पुलिस भर्ती, विधानसभा भर्ती और विभिन्न आयोगों की परीक्षाओं को लेकर उठे विवादों ने सरकार और व्यवस्था दोनों की साख को झटका दिया। कई परीक्षाएं रद्द हुईं, गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन युवाओं के मन में बैठा अविश्वास अभी खत्म नहीं हुआ है। गांवों में चौपालों से लेकर शहरों के कोचिंग सेंटरों तक एक ही चर्चा सुनाई देती हैकृक्या मेहनत करने वालों को सच में न्याय मिलेगा?
राजनीतिक दल भी अब इस मुद्दे की गंभीरता को समझने लगे हैं। विपक्ष लगातार सरकार को भर्ती माफिया और सिस्टम में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेर रहा है, जबकि सत्तापक्ष कार्रवाई और सख्त कानूनों का हवाला देकर खुद को जवाबदेह साबित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन चुनावी राजनीति में धारणा अक्सर तथ्यों से ज्यादा असर डालती है और यही चिंता सत्ता पक्ष के भीतर भी दिखाई देने लगी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और परिवार की आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा माध्यम मानी जाती है। ऐसे में भर्ती प्रक्रियाओं पर उठे सवाल सीधे लाखों युवाओं और उनके परिवारों की भावनाओं से जुड़ जाते हैं। यही कारण है कि यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और राजनीतिक रूप ले चुका है।
पहाड़ के दूरस्थ गांवों में रहने वाले युवाओं का दर्द और भी गहरा है। सीमित संसाधनों के बीच वर्षों तक तैयारी करने वाले युवाओं को जब पेपर लीक या भ्रष्टाचार की खबरें सुनाई देती हैं तो उनके भीतर व्यवस्था के प्रति निराशा और गुस्सा दोनों बढ़ता है। कई युवा इसे पलायन और टूटते भरोसे की सबसे बड़ी वजह भी मानने लगे हैं।
2027 का चुनाव केवल सड़कों, बिजली और विकास योजनाओं तक सीमित नहीं रहने वाला। इस बार युवाओं का सवाल सीधा होगाकृनौकरी मिलेगी या सिर्फ आश्वासन? राजनीतिक दलों के भाषणों में राष्ट्रवाद, विकास और योजनाओं के साथ-साथ भर्ती घोटालों और भ्रष्टाचार का मुद्दा भी पूरी ताकत से गूंजेगा।
उत्तराखंड की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब युवाओं का आक्रोश सत्ता के लिए चुनौती बना हो, लेकिन इस बार मामला केवल बेरोजगारी का नहीं, बल्कि भरोसे के टूटने का भी है। और लोकतंत्र में जब भरोसा टूटता है, तब चुनाव केवल सत्ता बदलने का नहीं, व्यवस्था को जवाब देने का माध्यम बन जाता है।
बाक्स
सिस्टम की साख पर लगा बट्टा
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की नींव में यह सोच थी कि यहाँ के संसाधनों पर यहाँ के युवाओं का हक होगा। लेकिन हालिया वर्षों में यूकेएसएसएससी से लेकर लोक सेवा आयोग तक की परीक्षाओं में जो कुछ देखने को मिला, उसने पूरे सिस्टम की साख पर बट्टा लगा दिया है। जब परीक्षा से ठीक पहली रात को पेपर लाखों रुपयों में बिक जाता है, तो वह केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं बिकता, बल्कि उस गरीब मां-बाप की उम्मीदें नीलाम होती हैं जिन्होंने पेट काटकर अपने बच्चे को पढ़ाया होता है। अखबारों की सुर्खियां गवाह हैं कि जांचें हुईं, गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन युवाओं के मन में यह सवाल आज भी जस का तस हैकृ क्या इस खेल के असली मगरमच्छ कभी पकड़े जाएंगे?
बिकाऊ तंत्र के आगे बेबस युवा
उत्तराखंड के गठन के ढाई दशक बाद भी अगर युवाओं को योग्यता के बजाय सिफारिश और पैसों के दम पर नौकरियां मिलने का डर सताए, तो यह पूरे नीतिगत ढांचे की विफलता है। 2027 का चुनाव यह तय नहीं करेगा कि कौन सी पार्टी जीतेगी, बल्कि यह तय करेगा कि क्या उत्तराखंड का युवा अब भी बिकाऊ तंत्र के आगे बेबस रहेगा या फिर अपने वोट की चोट से एक नया, पारदर्शी और जवाबदेह उत्तराखंड लिखेगा। पहाड़ की जवानी अब चुप रहने के मूड में नहीं है, और यही इस बार के लोकतंत्र के महापर्व का सबसे बड़ा सच है।
राजकीय शोक के बीच ‘जश्न के सुर’
पूर्व सीएम मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी के निधन पर पूरे प्रदेश में तीन दिन का राजकीय शोक
देहरादून के निजी संस्थानों में कार्यक्रमों और उत्सवों की तस्वीरें सवाल खड़े कर रही
यक्ष प्रश्न क्या निजी संस्थानों पर लागू नहीं होते सरकारी संवेदनाओं के कोई भी नियम
देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ जननेता मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी के निधन पर प्रदेश सरकार ने तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। सरकारी भवनों पर झंडे झुके हैं, कई सरकारी कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए हैं और राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर शोक की भावना व्यक्त की जा रही है। लेकिन इसी बीच कुछ निजी शिक्षण संस्थानों में चल रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आयोजनों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
दून स्थित डीआईटी जैसे बड़े संस्थानों में कथित तौर पर सामान्य गतिविधियों और आयोजनों की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब पूरा प्रदेश राजकीय शोक में है तो क्या ऐसे संस्थानों पर संवेदनशीलता और सरकारी निर्देश लागू नहीं होते? क्या निजी संस्थानों के लिए नियम और परंपराएं अलग हैं?
राजकीय शोक केवल औपचारिक सरकारी आदेश नहीं होता, बल्कि वह समाज की सामूहिक संवेदना और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। खासकर जब बात ऐसे व्यक्ति की हो जिसने सेना और राजनीति दोनों में प्रदेश की पहचान बनाई हो। ऐसे समय में बड़े आयोजनों, उत्सवों और मनोरंजन कार्यक्रमों को सीमित करना सामाजिक मर्यादा का हिस्सा माना जाता रहा है। यही कारण है कि अब लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या प्रशासन ने निजी संस्थानों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे? और यदि किए थे तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ? यदि निर्देश जारी नहीं हुए तो यह भी प्रशासनिक गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।
शिक्षा संस्थानों को केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों और संवेदनशीलता का माध्यम भी माना जाता है। ऐसे में यदि राजकीय शोक के दौरान भी सामान्य उत्सव और मंचीय कार्यक्रम जारी रहें, तो यह नई पीढ़ी के सामने किस तरह का संदेश प्रस्तुत करता हैकृयह भी विचार का विषय बन गया है।
अब निगाहें सरकार और प्रशासन पर टिक गई हैं। प्रदेश में कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने मांग उठाई है कि मामले का संज्ञान लिया जाए और स्पष्ट किया जाए कि राजकीय शोक के दौरान निजी संस्थानों की क्या जिम्मेदारी तय होती है। क्योंकि सवाल केवल एक कार्यक्रम का नहीं, बल्कि उस संवेदनशीलता का है जो किसी समाज की पहचान बनती है।
कभी ‘गुस्ताखियों’ का इलाज थी ‘कंडाली थेरेपी’
पहाड़ की डांट, दर्द और देसी अनुशासन था कंडाली की छपाक
कान्वेंट के दौर में गुम हुआ पहाड़ का वह पारंपरिक अनुशासन
कंडाली की छपाक बनाती थी फौलाद, अब बदल गया है समय
सजा नहीं थी बल्कि पहाड़ी जीवन के कठोर संस्कारों का हिस्सा
देहरादून। पहले पहाड़ में बच्चे की गुस्ताखियों की एक ही सजा होती थी कंडाली की छपाक। आज पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं और जो बच्चे शहरों के कान्वेंट स्कूलों में पढ़ रहे हैं वह बच्चे प्राचीन कंडाली थेरेपी से कोसों दूर हैं। आज की पीढ़ी के लिए अनुशासन का मतलब मोबाइल छीन लेना या इंटरनेट बंद कर देना है। लेकिन जो लोग 80 या 90 के दशक में पहाड़ के सरकारी स्कूलों और खेतों में पले-बढ़े हैं वह जानते हैं कि कंडाली की उस छपाक ने उन्हें कितना मजबूत बनाया।
मोबाइल पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल कोठियाल की एक रिपोर्ट देखते समय कंडाली की छपाक शब्द आया। खाना खाते समय बेटी भी साथ में बैठी थी, तो बेटी ने तपाक से पूछ लिया कि पापा यह कंडाली की छपाक क्या है। कुछ देर में खुद सकपका गया। मैं पहाड़ में जन्मा और कई बार कंडाली की छपाक लगी है। बेटी के प्रश्न का जवाब देने के लिए भूमिका बनाई और उसे विस्तार से जानकारी दी। उसी के बाद मन में आया कि आज बच्चे मोबाइल पर हैं कही न कही उन्हें यह आर्टिकल घूम फिर कर मिल ही जाएगा और उन्हें कंडाली की छपाक पर विस्तार से पढ़ने को मिलेगा।
बता दें कि उत्तराखंड के गांवों में बचपन कभी केवल खिलौनों और मोबाइल की स्क्रीन में नहीं बीतता था। वहां खेत, जंगल, ढलानें थीं और उन्हीं के बीच जीवन के अपने देसी नियम भी थे और गलती होने परकृकंडाली की छपाक का नियम था। कंडाली यानी बिच्छू घास। पहाड़ के जंगलों और खेतों के किनारों पर उगने वाला यह पौधा जितना साधारण दिखता है, उसका स्पर्श उतना ही तीखा होता है। शरीर पर लगते ही जलन, चुभन और बेचौनी शुरू हो जाती है। लेकिन पहाड़ की पुरानी पीढ़ियों के लिए कंडाली केवल एक पौधा नहीं, बल्कि अनुशासन का देसी हथियार हुआ करती थी।
गांवों में जब बच्चे जरूरत से ज्यादा शरारत कर दें, खेतों में नुकसान कर दें, स्कूल से भाग जाएं या बड़ों की बात न मानें, तब कई घरों में डांट के साथ कंडाली की छपाक भी मिलती थी। बुजुर्ग आज भी मुस्कुराते हुए याद करते हैं कि मां या दादी खेत से ताजी कंडाली तोड़ लाती थीं और बस एक हल्की छपाक पूरे शरीर में बिजली-सी दौड़ा देती थी। उस दर्द में आंसू भी होते थे और डर भी। बच्चे घंटों खुजलाते रहते, लेकिन अगले कुछ दिनों तक गलती दोहराने की हिम्मत नहीं होती थी। पहाड़ के कठिन जीवन में यही देसी अनुशासन थाकृन कोई काउंसलिंग, न लंबी समझाइश, बस कंडाली की एक छपाक और सबक तैयार।
हालांकि आज के नजरिए से देखें तो यह तरीका कठोर लग सकता है, लेकिन उस दौर के सामाजिक और पारिवारिक जीवन में इसे सामान्य माना जाता था। पहाड़ का जीवन संघर्षों से भरा था। खेत, पशु, पानी और जंगल के बीच जीने वाले परिवारों में बच्चों को जल्दी जिम्मेदार बनाना जरूरी समझा जाता था। शायद इसी वजह से अनुशासन के तरीके भी उतने ही सख्त थे।
आज गांव बदल रहे हैं। कच्चे आंगन पक्के हो गए हैं, जंगलों की राहें सूनी पड़ रही हैं और बच्चों के खेल मोबाइल में सिमटते जा रहे हैं। नई पीढ़ी शायद कंडाली की छपाक का मतलब भी ठीक से न समझ पाए। लेकिन पहाड़ के बुजुर्गों की यादों में यह शब्द आज भी एक पूरा बचपन जिंदा कर देता है,कृजहां दर्द भी अपना था और अनुशासन भी देसी।
बाक्स
सजा, दवा और स्वाद
विज्ञान और पहाड़ की परंपराएं भी अजीब हैं, जिस कंडाली से बच्चे खौफ खाते हैं, वही कंडाली पहाड़ की सबसे पौष्टिक डिश भी है। सर्दियों में बनने वाला कंडाली का साग या भुज्जी न सिर्फ आयरन और विटामिन से भरपूर होता है, बल्कि यह शरीर को गर्म रखने और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने की अचूक दवा भी है। कंडाली का साग आज भी उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों में खास स्थान रखता है। यानी जो पौधा बचपन में सजा देता था, वही बड़े होने पर थाली में स्वाद बनकर लौट आता था।
मंगलवार, 19 मई 2026
उत्तराखंड में ‘चुनावी बिसात’ पर ‘हेल्थकेयर’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-12
विधानसभा चुनाव 2027 में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली भी बनेगा बड़ा राजनीतिक मुद्दा
क्रासर
---उत्तराखंड के पहाड़ों की हकीकत, डाक्टरों की कमी और बंद पड़े अस्पताल
---ईलाज के लिए पहाड़ से मैदान की दौड़ और खर्च बढ़ने से परेशान है आमजन
---बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था पर 2027 में जनता लिख सकती है नया प्रिस्क्रिप्शन
देहरादून। मैदान की चकाचौंध से दूर, राज्य के सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी एक गर्भवती महिला को डोली में बिठाकर अस्पताल ले जाने की तस्वीरें या रेफरल सेंटर बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र महज प्रशासनिक खामी नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन चुके हैं। उत्तराखंड में सड़क, पानी और रोजगार की तरह अब स्वास्थ्य भी पहाड़ के लोगों की सबसे बड़ी चिंता बनता जा रहा है। राज्य के दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी गर्भवती महिलाओं को कई किलोमीटर डोली या निजी वाहनों से अस्पताल पहुंचाना पड़ता है, जबकि गंभीर मरीजों के लिए देहरादून, हल्द्वानी या )षिकेश ही अंतिम उम्मीद बनकर रह गए हैं।
राज्य के अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र वर्षों से डाक्टरों और विशेषज्ञों की कमी से जूझ रहे हैं। कई अस्पतालों में भवन तो खड़े हैं, लेकिन भीतर न डाक्टर हैं, न मशीनें और न ही पर्याप्त स्टाफ। पहाड़ के अनेक इलाकों में स्वास्थ्य केंद्र केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं, जहां मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद सीधे शहर भेज दिया जाता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं की यह कमजोरी केवल इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पलायन पर भी पड़ रहा है, जिन गांवों में स्कूल और अस्पताल कमजोर हैं, वहां से परिवार स्थायी रूप से मैदानों की ओर बसने लगे हैं। पहाड़ का बुजुर्ग और गरीब वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित है, जो आर्थिक अभाव में बड़े शहरों का इलाज नहीं करा पाता।
राजनीतिक दलों ने वर्षों से स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के दावे किए, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी सवालों के घेरे में है। एम्स )षिकेश, मेडिकल कालेजों और हेलीकाप्टर स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बड़ी योजनाओं का प्रचार जरूर हुआ, लेकिन दूरस्थ गांवों तक उनका प्रभाव सीमित नजर आता है। चुनाव नजदीक आते ही अब स्वास्थ्य के नाम पर नई घोषणाओं और वादों की तैयारी शुरू हो चुकी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में स्वास्थ्य माडल मैदानी राज्यों जैसा नहीं हो सकता। यहां मोबाइल हेल्थ यूनिट, टेलीमेडिसिन, पर्वतीय भत्ते के साथ डाक्टरों की स्थायी तैनाती और गांव आधारित स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करना जरूरी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कोरोना काल के बाद से उत्तराखंड के ग्रामीण मतदाताओं में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है। अब लोग केवल सड़क और बिजली पर संतुष्ट नहीं हैं। पलायन कर चुके प्रवासियों का एक बड़ा वर्ग, जो चुनावों में अपने पैतृक गांवों का रुख करता है, वह भी इस मुद्दे को हवा दे रहा है। उनका तर्क है कि अगर पहाड़ों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और अच्छे स्कूल हों, तो लोग अपनी जन्मभूमि छोड़ने को मजबूर नहीं होंगे।
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भाजपा और कांग्रेस के अपने-अपने दावे
चुनावी बिगुल बजने से पहले ही भाजपा और कांग्रेस सहित तमाम क्षेत्रीय दलों ने स्वास्थ्य के मोर्चे पर मोर्चाबंदी शुरू कर दी है। सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार राज्य में आयुष्मान उत्तराखंड योजना की सफलता, दूरदराज के क्षेत्रों में एयर एम्बुलेंस सेवा की शुरुआत और अल्मोड़ा व श्रीनगर जैसे पहाड़ी जिलों में मेडिकल कालेजों की स्थापना को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। सरकार का दावा है कि टेलीमेडिसिन के जरिए उन्होंने डाक्टरों की कमी को पाटने का प्रयास किया है। अगर सब ठीक रहा तो विपक्षी दल इस चुनावी समर में मशीन है पर आपरेटर नहीं, अस्पताल है पर डाक्टर नहीं के नारे के साथ जनता के बीच जा सकते हैं। विपक्ष का आरोप है कि पहाड़ों के जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक में सर्जन, महिला रोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ के पद खाली पड़े हैं। आपातकाल में मरीजों को सीधे देहरादून, )षिकेश या सुशीला तिवारी अस्पताल हल्द्वानी रेफर कर दिया जाता है, जिससे तीमारदारों की जेब और जान दोनों पर बन आती है।
‘घुघुती’ पहाड़ के अकेलेपन की ‘होम्योपैथी’
---पहाड़ के गांवों, लोकगीतों और स्मृतियों में बसी थी कभी घुघुती
---चौत की उदासी और काफल पाको का अमर विरह और घुघुती
---घुघुती एक पक्षी नहीं, पहाड़ की संस्कृति और प्रकृति का प्रतीक
---मोबाइल टावर व कंक्रीट के बीच वजूद की लड़ रही है लड़ाई
देहरादून। पहाड़ की मुंडेरों, बांज के जंगलों और खेतों की मेड़ों पर दिखने वाली यह घुघुती आज भी उत्तराखंड के ग्रामीण जनजीवन की धड़कन बनी हुई है। उत्तराखंड के लोक-जीवन, गीतों और संस्कृति में रचा-बसा घुघुती पक्षी केवल एक जीव नहीं, बल्कि पहाड़ के सीधेपन और एकांत का सबसे बड़ा प्रतीक है।
स्थानीय लोग घुघुती को शुभ और अपनत्व का प्रतीक मानते हैं। लोक मान्यताओं में इसकी आवाज को घर-आंगन की रौनक से जोड़कर देखा जाता रहा है। उत्तराखंड के प्रसि( लोकगीत घुघुती ना बासा में भी इस पक्षी को बेटी, ममता और घर लौटने की भावना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले गांवों में घुघुती की आवाज हर मौसम में सुनाई देती थी, लेकिन अब इसकी संख्या कम होती महसूस हो रही है। जंगलों में बदलाव, बढ़ता शहरीकरण, कंक्रीट के मकान और गांवों से पलायन ने इसके प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित किया है।
घुघुती केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि पहाड़ की स्मृतियों में बसने वाली वह आवाज है, जो लोगों को अपने गांव, बचपन और प्रकृति से जोड़ती है। आधुनिकता के इस दौर में जरूरत केवल विकास की नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक विरासत को बचाने की भी है, जिसने सदियों से पहाड़ की पहचान बनाई है।
अक्सर लोग घुघुती को एक अलग श्रेणी का पक्षी मानते हैं, लेकिन पक्षी वैज्ञानिकों के अनुसार यह पूरी तरह कबूतर वंश का हिस्सा है। आम कबूतरों की तुलना में घुघुती थोड़ी छोटी, पतली और अधिक सुडौल होती है। इसकी गर्दन पर काले और सफेद मोतियों जैसी चित्तियां होती हैं, जो इसे एक खूबसूरत कंठहार जैसा लुक देती हैं। सामान्य कबूतरों की तरह यह झुंड में हुड़दंग नहीं मचाती। घुघुती बेहद शर्मीली, भोली और शांत स्वभाव की होती है। यह अक्सर अकेले या अपने साथी के साथ ही दाना चुगते हुए दिखाई देती है।
उत्तराखंड के सैकड़ों गांव आज पलायन के कारण खाली हो चुके हैं। इन भूतहा गांवों में जहां इंसानों के कदम पड़ने बंद हो गए हैं, वहां आज भी बुजुर्गों के अकेलेपन को पाटने का काम यह घुघुती ही कर रही है। दोपहर में जब यह घुघुती आकर मुंडेर पर बैठती है और अपनी भाषा में गाती है, तो लगता है कोई अपना हालचाल पूछ रहा है। यह हमारे दुखों की गवाह है। आज के कंक्रीट के बढ़ते जंगलों और मोबाइल टावरों के रेडिएशन के दौर में जहां शहरों से गौरैया और कबूतर गायब हो रहे हैं, वहीं पहाड़ की घुघुती अभी भी प्रकृति का संतुलन बनाए हुए है।
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काफल पाको, मैल न चाखो
पहाड़ की लोककथाओं में घुघुती को एक बेटी का रूप माना गया है। चौत-बैशाख के महीने में जब जंगलों में काफल के लाल फल पकते हैं, तो घुघुती की आवाज बदलकर काफल पाको, मैल न चाखो पक गए, पर मैंने नहीं चखे जैसी सुनाई देती है। यह एक मां-बेटी की उस बेबसी की कहानी है, जिसमें एक निर्दाेष बेटी मां के गुस्से का शिकार होकर पक्षी बन गई थी। तब से यह पक्षी पहाड़ की बेटियों के मायके के प्रति प्रेम और विरह का संदेशवाहक बन गया है।
अलविदा ‘जनरल साहब’
पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी का 91 वर्ष की आयु में दून में निधन
लंबे समय से थे बीमार, देहरादून स्थित मैक्स अस्पताल में ली खंडूड़ी ने अंतिम सांस
सैन्य जीवन से लेकर राजनीति तक बेदाग छवि, अनुशासन के लिए जाने गए जनरल
सैन्य अनुशासन से चलाई सरकार, भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया था जीरो टालरेंस
मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी
जन्म-1 अक्टूबर 1934 देहरादून
मृत्यु-19 मई 2026 देहरादून
पैतृक गांव- मरगदना गांव पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का एक स्वर्णिम अध्याय आज शांत हो गया। खंडूड़ी है जरूरी के नारे से जन-जन के हृदय में बसने वाले, पूर्व मुख्यमंत्री और सेना के जांबाज मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी अब हमारे बीच नहीं रहे। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे खंडूड़ी ने आज सुबह देहरादून के मैक्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित देश और राज्य के तमाम दिग्गज नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे एक युग का अंत बताया है।
पौड़ी गढ़वाल की मिट्टी से निकला वह सख्त सैन्य अधिकारी, जिसने राजनीति में भी अनुशासन को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया, आज पहाड़ की स्मृतियों में अमर हो गया। सेना की वर्दी से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक, खंडूड़ी का व्यक्तित्व हमेशा बेदाग छवि और कठोर प्रशासनिक फैसलों के लिए जाना गया। लोग उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि ईमानदार पहाड़ी जनरल के रूप में याद करते रहे। पौड़ी गढ़वाल के मरगदना गांव में जन्में जनरल खंडूड़ी का जन्म 1 अक्टूबर 1934 में हुआ था। शिक्षा देहरादून और अन्य स्थानों पर हुई और आज उन्होंने अंतिम सांस ली।
बता दें कि जनरल खंडूड़ी ने 1954 से 1991 तक सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद जब उन्होंने राजनीति की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर कदम रखा तो उनके पास केवल एक ही अस्त्र था अडिग अनुशासन। चाहे केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सड़क परिवहन मंत्री के रूप में स्वर्णिम चतुर्भुज योजना को रफ्तार देनी हो या उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में भ्रष्टाचार पर लगाम लगानी हो, उन्होंने कभी सि(ांतों से समझौता नहीं किया।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जब राजनीति में भ्रष्टाचार, गुटबाजी और सत्ता संघर्ष की चर्चाएं तेज थीं, तब खंडूड़ी एक ऐसे चेहरे के रूप में उभरे जिन्होंने शासन में पारदर्शिता और सादगी की बात की। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने सड़क, सेना और सीमांत क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दी। पहाड़ के दूरस्थ गांवों तक सड़क पहुंचाने का उनका सपना आज भी कई लोगों की जुबान पर है।
उनकी राजनीतिक शैली भले ही कठोर मानी जाती रही हो, लेकिन पहाड़ का आम आदमी उन्हें भरोसे के प्रतीक के रूप में देखता था। गांवों की चौपालों में अक्सर यह कहा जाता थाकृखंडूड़ी जैसा नेता अब कहां। शायद यही वजह रही कि सत्ता से दूर होने के बाद भी उनके प्रति सम्मान कभी कम नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने प्रदेश को लोकायुक्त बिल जैसा सख्त कानून देने का साहस दिखाया। वह अक्सर कहते थे कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आनी चाहिए। उनकी कार्यशैली में सेना जैसी स्पष्टता थीकृफाइलें रुकती नहीं थीं और भ्रष्टाचार करने वालों के लिए उनके दरबार में कोई जगह नहीं थी। उनकी सादगी का आलम यह था कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी वह प्रोटोकाल की तामझाम से दूर रहना पसंद करते थे।
उनके निधन के साथ उत्तराखंड की राजनीति का वह दौर भी मानो विदा हो गया, जिसमें सि(ांत और सादगी अब भी जिंदा दिखाई देती थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत कई नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक जताया और उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।
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राष्ट्र प्रथम, फिर प्रदेश और अंत में स्वयं
उनके दौर में लाल बत्ती का मोह त्यागने और नौकरशाही पर नकेल कसने की कई कहानियां आज भी सचिवालय की गलियों में सुनी जाती हैं। उनके लिए राष्ट्र प्रथम, फिर प्रदेश और अंत में स्वयं का मंत्र सिर्फ कहने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए था। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ईमानदारी की विरासत और साफ-सुथरी राजनीति का उनका विजन आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा एक मशाल का काम करेगा।
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जनरल खंडूड़ी एक नजर
1954 में कमीशन प्राप्त किया और 1971 के यु( में महत्वपूर्ण भूमिका
आर्मी में रहते हुए अति विशिष्ट सेवा पदक से उन्हें किया गया सम्मानित
1991 में पहली बार सांसद बने और वाजपेयी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे
2007-2009 और 2011-2012 के बीच दो बार प्रदेश की कमान संभाली
भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस और सशक्त लोकायुक्त कानून के प्रणेता
रविवार, 17 मई 2026
‘पहाड़’ के आशियानों से रूठी ‘घन्दूणी’
पत्थर के घर उजड़े, तिबारियां टूटीं तो घन्दूणी ने भी छोड़ दिया आंगन
पहाड़ के गांवों से घन्दूणी के गायब होने के साथ मिट गई बचपन की यादें
देवभूमि के उजड़ते गांवों और रिश्तों की सबसे भावुक दास्तान है घन्दूणी
घन्दूणी का मौन दे रहा पलायन का दंश झेल रहे पहाड़ के गांवों की गवाही
देहरादून। पहाड़ के पारंपरिक पत्थरों वाले मकानों की खोली, लकड़ी की नक्काशीदार खिड़कियां और आंगन में सूखता मडुआ... इन सबके बीच जो एक आवाज पहाड़ के सुबह की पहचान हुआ करती थी, वह थीकृचीं-चीं, चूँ-चूँ। उत्तराखंड की लोकभाषा में जिसे बड़े लाड से घन्दूणी कहा जाता है, यानी हमारी अपनी गौरैया। पहाड़ के गांवों में कभी सुबह की शुरुआत घन्दूणी यानी गौरैया की चहचहाहट से होती थी। पत्थर की छतों और लकड़ी की तिबारियों वाले घरों में फुदकती यह छोटी चिड़िया गांव की रौनक मानी जाती थी। लेकिन अब बदलते पहाड़, तेजी से बढ़ते पलायन और आधुनिक निर्माण शैली के बीच घन्दूणी की आवाज भी धीरे-धीरे खामोश पड़ने लगी है।
पहाड़ के लोकगीतों में गौरैया यानी घन्दूणी को मैत की डाकिया कहा गया है। यह चिड़िया इस बात की गवाह है कि पहाड़ का सौंदर्य सिर्फ बर्फबारी और पहाड़ों की ऊंचाई में नहीं, बल्कि इन आंगनों की जीवंतता में है। आज उत्तराखंड के हजारों गांव आज पलायन की मार झेल रहे हैं। रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग शहरों की ओर जा रहे हैं, जिन आंगनों में कभी बच्चों की किलकारियां और महिलाओं की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है। इसी बदलते माहौल का असर घन्दूणी यानी गौरैया पर भी दिखाई दे रहा है।
मेरे ननिहाल दानकोट गांव के चेतराम बताते हैं कि पहले सुबह होते ही दर्जनों गौरैया आंगन में आती थीं। महिलाएं चावल और झंगोरे के दाने डालती थीं और बच्चे घंटों उन्हें देखते रहते थे। लेकिन अब गांवों में पुराने घर टूट रहे हैं और उनकी जगह सीमेंट के आधुनिक मकान ले रहे हैं। इन मकानों में ना तो लकड़ी के छज्जे बचे हैं और ना ही छोटी दरारें, जहां गौरैया अपने घोंसले बनाया करती थी।
बुडोली रूद्रप्रयाग के मोहन सिंह कहते हैं कि पहले घन्दूणी की आवाज से लगता था गांव जिंदा है। अब कई दिनों तक उसकी चहचहाहट सुनाई नहीं देती। उनके अनुसार गांवों से पहले लोग गए और अब धीरे-धीरे पक्षी भी गायब होने लगे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि गौरैया मानव बस्तियों के साथ रहने वाली चिड़िया है। पुराने पहाड़ी घर, गौशालाएं, खुले आंगन और स्थानीय खेती उसके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते थे। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में जैसे-जैसे गांवों की पारंपरिक संरचना खत्म हो रही है, वैसे-वैसे गौरैया का प्राकृतिक संसार भी सिमटता जा रहा है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि गौरैया का कम होना केवल एक पक्षी का गायब होना नहीं, बल्कि पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना में आए बदलाव का संकेत है। पहाड़ के गांवों से जब इंसानों की रौनक खत्म हुई, तो घन्दूणी की चहचहाहट भी धीरे-धीरे यादों में बदलने लगी है। यदि गांवों में पारंपरिक आंगन, पेड़-पौधे और स्थानीय वातावरण को बचाने की दिशा में प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले समय में गौरैया सिर्फ किताबों और यादों तक सीमित होकर रह जाएगी।
उत्तराखंड के कई गांवों में घर बंद पड़े हैं और आंगन सूने हो चुके हैं। ऐसे में घन्दूणी का गांवों से दूर होना लोगों को भावनात्मक रूप से भी प्रभावित कर रहा है। आज भी कई बुजुर्ग हर सुबह आंगन में कुछ दाने डाल देते हैं। शायद इस उम्मीद में कि कभी फिर घन्दूणी लौटेगी और उसके साथ लौट आएगा पहाड़ का पुराना जीवन, पुरानी गर्माहट और वह खोई हुई रौनक।
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कंक्रीट के जंगल से उजड़ा आशियाना
उत्तराखंड के देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार में तो कंक्रीट के मकानों और मोबाइल टावरों के रेडिएशन ने गौरैया को पहले ही गायब कर दिया था, लेकिन अब पहाड़ के ग्रामीण इलाकों में भी घन्दूणी का वजूद खतरे में है। कहते है कि जब किसी गांव से पलायन होता है और घरों पर ताले लटक जाते हैं, तो वहां खेती बंद हो जाती है। घन्दूणी को इंसानों के बीच रहने और उनके आंगनों से दाना चुगने की आदत होती है। इंसानों के जाते ही यह चिड़ियां भी भूखी मर जाती हैं या वहां से पलायन कर जाती हैं। पहाड़ के पुराने तिबारी वाले मकानों की छतों और कड़ियों के बीच गौरैया आसानी से घोंसला बना लेती थी। अब वहां भी सीमेंट के पक्के लेंटर वाले मकान बन रहे हैं, जिनमें इस नन्हीं चिड़िया के लिए कोई कोना नहीं बचा हुआ है।
पहाड़ में ‘खामोश’ क्रांति की ‘आहट’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-11
विधानसभा चुनाव 2027 में महिला वोट बैंक लिखेगी सत्ता की नई पटकथा
क्रासर
---काफल के पेड़ों से लेकर बांज के जंगलों तक गूंज रही बदलाव की आहट
---पहाड़ का पानी और जवानी ही लिखेगी उत्तराखंड का नया सियासी भविष्य
---देवभूमि की महिलाएं ही विधानसभा चुनाव में बनेगी अनाउंसड किंगमेकर
देहरादून। पहाड़ की वादियों में इन दिनों बर्फ भले ही पिघल रही हो, लेकिन सियासत का पारा चढ़ चुका है। उत्तराखंड की राजनीति में सालों से एक घिसा-पिटा जुमला दोहराया जाता थाकृपहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी यहां के काम नहीं आती। लेकिन इस विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड ने इस जुमले को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया है। नया नैरेटिव कुमाऊं के काफल के पेड़ों से लेकर गढ़वाल के बांज के जंगलों तक गूंज रहा है और एक खामोश क्रांति की आहट सुनाई दे रही है। इस बार देवभूमि की महिलाएं अब सिर्फ साइलेंट वोटर नहीं बल्कि अनाउंसड किंगमेकर की भूमिका निभाएंगी।
मुझे याद है जब पृथक राज्य आंदोलन चल रहा था उस समय हाथ में दरांती, कंडी और भीमल से बनी रस्सी के साथ आंदोलन में अपनी अग्रणी भूमिका निभा रही थी। उसी मातृशक्ति के संघर्ष का परिणाम उत्तराखंड राज्य बना, लेकिन राज्य बनने के बाद वह हाशिये पर चली गई। महिलाओं के उस संघर्ष को सभी ने भुला दिया। उत्तराखंड के गांवों में पुरुषों के पलायन के बाद खेती, पशुपालन, पानी, जंगल और परिवार की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य के हजारों गांव आंशिक या पूर्ण पलायन की मार झेल रहे हैं। ऐसे में गांव बचाने की सबसे बड़ी लड़ाई महिलाएं ही लड़ रही हैं। महंगाई, गैस सिलेंडर, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और शराब के खिलाफ आंदोलनों ने महिलाओं के भीतर राजनीतिक चेतना को और तेज किया है।
आज अखबार के पन्नों पर भले ही दावों की चमक हो, लेकिन पहाड़ के गांवों की पगडंडियों पर सन्नाटा और संघर्ष आज भी बरकरार है। गढ़वाल और कुमाऊं के पहाड़ी जिलों में तो महिलाओं की आंखों में उम्मीद के साथ-साथ एक तीखा सवाल भी तैरता दिखता है। पुरुष रोजगार की तलाश में मैदानों का रुख कर चुके हैं। पीछे छूटे गांवों में भूतिया मकानों के बीच अकेली महिलाएं ही खेती, मवेशी, बच्चों की पढ़ाई और बुजुर्गों की दवा का बोझ उठा रही हैं। लेकिन पहाड़ की नीति-नियंताओं ने इन वीरांगनाओं को आज दिन तक दुत्कारा ही है। सरकार लाख दावे कर रही हो, लेकिन यह सच्चाई है कि पहाड़ की वीरांगनाएं आज भी संर्घष कर रही हैं।
दरअसल पहाड़ की महिलाओं का गुस्सा और संघर्ष विधानसभा चुनाव की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहेगा, बल्कि यह महिला विश्वास की लड़ाई भी होगा, जो दल महिलाओं के मुद्दों को सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रखेगा, उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। दिलचस्प बात यह भी है कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार के दौर में महिला मतदाता पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक और मुखर हुई हैं। गांवों की चौपाल से लेकर मोबाइल स्क्रीन तक अब महिलाएं राजनीतिक बहस का हिस्सा बन रही हैं।
हाल ही में संपन्न हुए पंचायत चुनावों के आंकड़ों ने राजनीतिक विश्लेषकों को अपने केलकुलेटर दोबारा उठाने पर मजबूर किया था। बता दें कि राज्य की लगभग 32 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां महिला वोटरों की संख्या या तो पुरुषों से अधिक है, या उनका वोटिंग टर्नआउट पुरुषों को पछाड़ देता है। यही वजह है कि इस बार दिल्ली से लेकर देहरादून तक के रणनीतिकार महिलाओं के आगे नतमस्तक दिख रहे हैं। 2027 की चुनावी बिसात पर महिला अस्मिता और अधिकार सबसे बड़ा मोहरा बनेगा और भाजपा-कांग्रेसकृखुद को महिलाओं का सबसे बड़ा रक्षक साबित करने की होड़ में दिख रहा हैं।
भाजपा जहां महिला वोट बैंक को साधने के लिए उज्ज्वला योजना, लखपति दीदी, स्वयं सहायता समूह और महिला सशक्तिकरण योजनाओं को बड़ा हथियार बनाएगी। सरकार का दावा है कि राज्य में लाखों महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा गया है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी बढ़ी है। वहीं कांग्रेस भी खुद को महिलाओं का सबसे बड़ा हितैषी बना रही है।
शनिवार, 16 मई 2026
डिग्रियां ‘हाथ’ में और ‘नौकरियां हवा’ में
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-10
विधानसभा चुनाव 2027 के महासमर में बेरोजगारी बन सकता है गेमचेंजर
क्रासर
---पलायन और खाली होते गांवों के बीच रोजगार का मुद्दा रहेगा मुखर
---पेपर लीक और भर्ती घोटालों की टीस युवाओं के दिलों में है जिंदा
---इस बार चुनावी मंचों पर विकास से ज्यादा रोजगार पर होगी बहस
---प्रदेश में सरकारी भर्तियों की धीमी रफ्तार से युवाओं में है नाराजगी
देहरादून। पहाड़ के गांवों से लेकर शहरों तक युवा रोजगार और भविष्य को लेकर बेचौन हैं। सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या, भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक जैसी घटनाओं और निजी क्षेत्र में अवसरों की कमी ने युवाओं के भीतर गहरी नाराजगी है। विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राज्य में सियासी पारा चढ़ने लगा है। 70 विधानसभा सीटों वाले इस पर्वतीय राज्य में सत्ता की चाबी इस बार किस करवट बैठेगी, इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों ने गुणा-भाग भी शुरू कर दिया है। लेकिन इन सबके बीच धरातल पर एक ऐसा मुद्दा है, जो इस बार पारंपरिक पहाड़ बनाम मैदान या जातिगत समीकरणों पर भारी पड़ता दिख रहा हैकृवह मुद्दा है बेरोजगारी का।
उत्तराखंड के सियासी गलियारों से लेकर चाय की दुकानों और युवाओं के चौपालों तक इस बात की गूंज साफ सुनाई दे रही है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में रोजगार के वादों और दावों पर ही लड़ा जाएगा। राज्य गठन के ढाई दशक बाद भी पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी का यहां के काम न आना एक स्थायी दर्द बन चुका है। रोजगार की तलाश में मैदानी इलाकों और दूसरे राज्यों का रुख करते युवा आज भी उत्तराखंड की सबसे बड़ी कड़वी हकीकत हैं। हालांकि सरकार की ओर से स्वरोजगार और होमस्टे जैसी योजनाओं के जरिए युवाओं को रोकने की कोशिशें की गईं, लेकिन धरातल पर उनकी रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं दिख रही है।
पहाड़ी जिलों से लगातार हो रहा पलायन इस बात का गवाह है कि गांवों में युवाओं के पास आजीविका के साधन बेहद सीमित हैं। बीते वर्षों में राज्य ने सरकारी भर्तियों में कई उतार-चढ़ाव और विवाद देखे हैं। यूकेएसएसएससी और लोक सेवा आयोग की कुछ परीक्षाओं में हुए घोटालों और पेपर लीक के मामलों ने प्रदेश के युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया है। हालांकि सरकार ने सख्त नकल विरोधी कानून लागू कर डैमेज कंट्रोल की बड़ी कोशिश की, लेकिन युवाओं के मन में परीक्षाओं के लटकने, समय पर रिजल्ट न आने और नियुक्तियों में देरी को लेकर जो टीस पैदा हुई थी, वह आगामी चुनाव में ईवीएम तक पहुंच सकती है।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल इस मुद्दे को भुनाने में अभी से लग गया हैं। कांग्रेस ने हाल ही में सांगठनिक स्तर पर बदलाव कर युवाओं और बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार रोजगार के आंकड़े केवल कागजों पर दिखा रही है, जबकि हकीकत में लाखों पंजीकृत बेरोजगार कतार में खड़े हैं। विपक्ष इस बार के चुनाव में रोजगार गारंटी, समयब( भर्ती कैलेंडर और खाली पड़े सरकारी पदों को भरने जैसे मुद्दों को अपने घोषणापत्र का मुख्य हिस्सा बना सकता है।
दूसरी ओर सत्तारूढ़ भाजपा इस मोर्चे पर रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रणनीति अपना रही है। सरकार का तर्क है कि पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए देश का सबसे कड़ा नकल विरोधी कानून उत्तराखंड में ही लागू है। इसके अलावा ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के जरिए प्रदेश में आए निवेश, इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और पर्यटन के क्षेत्र में पैदा हो रहे नए अवसरों को सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर सकती है। भाजपा का दावा है कि सरकारी नौकरियों के अलावा निजी क्षेत्र और स्वरोजगार के माध्यम से लाखों युवाओं को आत्मनिर्भर बनाया गया है।
उत्तराखंड में युवा मतदाताओं की संख्या कुल मतदाता वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। यह वह वर्ग है जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है और पारंपरिक राजनीति से इतर सिर्फ नतीजे चाहता है। डिजिटल जनगणना और सीमांकन की आहट के बीच, युवा वर्ग राजनीतिक दलों से ठोस रोडमैप भी मांगेगा और जो भी दल युवाओं को सुरक्षित भविष्य और रोजगार का सबसे विश्वसनीय भरोसा देगा 2027 में सत्ता का रास्ता उसी के लिए साफ होगा। अब देखना यह होगा कि जवानी के दम पर उत्तराखंड की सत्ता हासिल करने का यह ख्वाब किस दल का पूरा होता है और कौन बेरोजगारी के इस चक्रव्यूह में उलझकर रह जाता है।
सूनी चौखटों को ‘अपनों’ का इंतजार
पहाड़ का दर्द
पहाड़ के गांवों के बंद दरवाजों में कैद हैं अधूरी हंसी और सपने
पलायन ने पहाड़ से सिर्फ लोग नहीं, उसकी आत्मा भी छीन ली
रोजगार व बेहतर जिंदगी की तलाश में गांव हो गए हैं आज बूढ़े
खेत बंजर,पगडंडियां सुनसान व बुजुर्ग ताक रही अपनों की राह
देहरादून। पहाड़ की सुबह आज भी उतनी ही खूबसूरत होती है। सूरज की पहली किरण जब सीढ़ीनुमा खेतों पर पड़ती है तो लगता है जैसे प्रकृति ने सोने की चादर बिछा दी हो। हवा में आज भी बुरांश की खुशबू है और पगडंडियों में घास उगी है और आज भी वैसी ही हैं, लेकिन अब उनमें जीवन की आवाज नहीं बची।
कभी जिन गांवों में हर शाम चूल्हों का धुआं उठता था, जहां तिबारियों में बैठकर बुजुर्ग लोकगीत गाते थे, जहां बच्चे खेतों में दौड़ते थे, आज वहां सन्नाटा पसरा है। घरों के दरवाजों पर जंग लगे ताले लटक रहे हैं। कई मकानों की छतें टूट चुकी हैं। दीवारों पर उग आई काई मानो वक्त के बीतने का हिसाब दे रही हो। पलायन ने पहाड़ को धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर दिया है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर भविष्य की तलाश में गांवों के युवा शहरों की तरफ चले गए। पीछे रह गए बूढ़े मां-बाप, सूने आंगन और इंतजार करती आंखें।
उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी इन गांवों में जीवन धड़कता था। सुबह महिलाएं घास और लकड़ी लेने जंगल जाती थीं, पुरुष खेतों में हल चलाते थे, बच्चे स्कूल की पगडंडियों पर दौड़ते थे। शाम होते ही चौपाल सजती थी और तिबारियों में लोकगीत गूंजते थे। अब वही गांव वीरान खड़े हैं। खेतों में झाड़ियां उग आई हैं और पगडंडियों पर अब केवल जंगली जानवरों के निशान दिखते हैं।
रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में पहाड़ का युवा शहरों की ओर चला गया। देहरादून, दिल्ली, हल्द्वानी और चंडीगढ़ जैसे शहरों ने गांवों की रौनक अपने भीतर समेट ली। पीछे रह गए सिर्फ बूढ़े मां-बाप, जिनकी आंखें हर त्योहार पर दरवाजे की ओर टिक जाती हैं। वह आज भी उम्मीद करते हैं कि शायद इस बार बेटा लौट आएगा। शायद इस बार घर में फिर चूल्हा जलेगा। शायद सूनी पड़ी तिबारी में फिर हंसी सुनाई देगी।
पहाड़ के कई गांव अब भूतिया गांव कहलाने लगे हैं। वहां घर तो हैं, लेकिन उनमें जिंदगी नहीं है। टूटी छतों से बरसात टपकती है, दीवारों का पलस्तर झड़ चुका है और बंद कमरों में मकड़ियों ने अपने जाले बुन लिए हैं। ऐसा लगता है मानो घर भी अपने लोगों के लौटने की राह देखते-देखते थक गए हों। विडंबना यह है कि जिस पहाड़ ने देश को सैनिक, शिक्षक, वैज्ञानिक और अधिकारी दिए, वही पहाड़ आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। गांव खाली हो रहे हैं संस्कृति सिमट रही है और लोक परंपराएं धीरे-धीरे यादों में बदलती जा रही हैं।
‘सत्ता’ के आगे झुकी ‘उम्र’
मरोड़ा ग्राम पंचायत की युवा प्रधान और बुजुर्ग के पैर छूने वाली तस्वीर पर छिड़ी बहस
---सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है तस्वीर
---युवा महिला प्रधान पर उठे सवाल, समर्थक आए सामने
---लोकतंत्र, संस्कार व सत्ता के बदलते स्वरूप पर बहस
---मरोड़ा कांड से लिा उत्तराखंड का पालिटिकल सिस्टम
देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में मातृशक्ति और युवा नेतृत्व को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार सामाजिक मर्यादाओं और व्यवस्था के अंतर्विरोधों को उजागर कर देती है। हाल ही में पौड़ी गढ़वाल जिले की मरोड़ा ग्राम पंचायत से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया से लेकर पहाड़ के राजनीतिक गलियारों तक एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
बता दें कि उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की मरोड़ा ग्राम पंचायत इन दिनों अचानक चर्चा के केंद्र में आ गई है। वजह बनी एक वायरल तस्वीर, जिसमें ग्राम पंचायत की युवा महिला प्रधान वीरा रावत कुर्सी पर बैठी नजर आ रही हैं, जबकि उनके सामने दादा की उम्र का एक बुजुर्ग व्यक्ति झुककर उनके पैर छूता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि मरोड़ा ग्राम पंचायत की युवा और पढ़ी-लिखी प्रधान वीरा रावत के पास गाँव के ही एक बुजुर्ग व्यक्ति किसी सरकारी काम या दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराने पहुंचे थे। प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आई जानकारी के अनुसार इस दौरान एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जहां बुजुर्ग व्यक्ति ने युवा महिला प्रधान के पैर छुए। इस घटना की तस्वीर और जानकारी जैसे ही सामने आई, यह पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई।
पहाड़ में जहां गाँव की बेटियों को पूजने और बड़ों से आशीर्वाद लेने की अटूट परंपरा है, वहां एक दादा की उम्र के बुजुर्ग द्वारा युवा प्रधान के पैर छूने की घटना ने लोगों को दो पक्षों में बांट दिया है। हालांकि इस मामले में कुछ लोग महिला प्रधान वीरा रावत के समर्थन में भी सामने आए हैं। उनका कहना है कि तस्वीर को एकतरफा तरीके से देखा जा रहा है। संभव है कि बुजुर्ग व्यक्ति ने स्वेच्छा से प्रधान पद का सम्मान करने के लिए ऐसा किया हो। समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में चुने गए जनप्रतिनिधि का सम्मान करना गलत नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन सवाल केवल सम्मान का नहीं, बल्कि उस सामाजिक संदेश का भी है जो ऐसी तस्वीरें समाज में छोड़ती हैं। पंचायत व्यवस्था को गांवों की सबसे संवेदनशील लोकतांत्रिक इकाई माना जाता है, जहां प्रधान को जनसेवक की भूमिका में देखा जाता है। ऐसे में जब सत्ता और पद को लेकर दिखावे की तस्वीरें सामने आती हैं, तो लोगों के मन में असहजता पैदा होना स्वाभाविक माना जा रहा है।
यह विवाद महिला नेतृत्व को लेकर भी नई चर्चा खड़ी कर रहा है। कुछ लोग इसे महिला प्रधान को अनावश्यक रूप से निशाना बनाने की कोशिश बता रहे हैं। उनका कहना है कि यदि यही तस्वीर किसी पुरुष प्रधान की होती, तो शायद इतना बड़ा विवाद खड़ा नहीं होता। वहीं दूसरी ओर कई लोग इसे विनम्रता और सामाजिक संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर क्षेत्र के बु(िजीवियों, ग्रामीणों और सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिल रहे हैं। एक पक्ष का मानना है कि यह सम्मान वीरा रावत नामक एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि ग्राम प्रधान के संवैधानिक पद को दिया गया है। जब कोई व्यक्ति किसी प्रशासनिक या संवैधानिक पद पर बैठता है, तो वह व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। कई बार ग्रामीण अपनी अत्यधिक कृकृतज्ञता, काम हो जाने की खुशी या प्रशासनिक औपचारिकता के तहत पद के प्रति अपना सम्मान इस तरह प्रकट करते हैं। लोकतंत्र में पद की एक अपनी गरिमा होती है जो उम्र और जेंडर से ऊपर होती है।
दूसरा पक्ष इस घटना को उत्तराखंड की समृ( सांस्कृतिक परंपराओं के खिलाफ देख रहा है। उत्तराखंड के पहाड़ों में कुमाऊंनी और गढ़वाली संस्कृति के तहत बेटियां और बहुएं हमेशा पूजनीय रही हैं। गाँव के बुजुर्ग हमेशा युवाओं को आशीष देते हैं। आलोचकों का कहना है कि भले ही कोई व्यक्ति कितने ही बड़े पद पर क्यों न बैठ जाए, लेकिन सामाजिक जीवन में उसे अपनी उम्र, मर्यादा और पहाड़ के पारंपरिक संस्कारों का ध्यान रखना चाहिए। यदि बुजुर्ग भावुकतावश पैर छूने भी लगे, तो युवा प्रधान को शालीनता से उन्हें रोकना चाहिए था।
पहाड़ में युवा महिला नेतृत्व का उभरना निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है और वीरा रावत जैसी युवा प्रधानों से क्षेत्र को विकास की बड़ी उम्मीदें हैं। लेकिन इस तरह के मामलों से यह भी सीख मिलती है कि ग्रामीण भारत में सफल नेतृत्व वही माना जाता है, जो प्रशासनिक शक्ति के साथ-साथ लोक-परंपराओं और बुजुर्गों के सम्मान के बीच एक सही संतुलन बनाकर चले। यह मामला इस बात पर आत्ममंथन करने का अवसर देता है कि हम अपनी व्यवस्थाओं को मजबूत करते समय अपनी उन बुनियादी जड़ों और संस्कारों को न भूलें, जो हमारे पहाड़ की असली पहचान हैं।
‘महंगाई डायन खाए जात है’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-9
रसोई से लेकर पेट्रोल पंप तक महंगा, 2027 के विधानसभा चुनाव का बनेगा मुद्दा
---महंगाई की मार से भी तपेगा 2027 का चुनावी रण
---पहाड़ में जेब खाली, चुनाव में भारी पड़ेगी महंगाई
---चुनाव से पहले गैस, राशन और पेट्रोल सब महंगा
देहरादून। ‘महंगाई डायन खाए जात है’ 2010 की फिल्म पीपली लाइव का गाना है, जो महंगाई की मार और आम आदमी की व्यथा को दर्शाता है। आज के दौर में जहां पहले ही महंगाई से लोग परेशान थे। वही पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने का फर्क सभी चीजों पर पडे़गा और यह असर लंबे समय तक रहने वाला है। क्योंकि आमजन की कमाई तो बढ़ी नहीं, लेकिन महंगाई ने अपने पांव इत कदर फैला दिए है कि आमजन के लिए यह परेशानी वाला समय है। यह कहे कि ‘महंगाई डायन खाए जात है’ तो इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। पहाड़ से लेकर मैदान तक जनता जिन मुद्दों से सबसे ज्यादा परेशान है, उनमें महंगाई सबसे ऊपर है। गैस सिलेंडर, खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, पेट्रोल-डीजल और बच्चों की पढ़ाई तक हर चीज की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। ऐसे में आने वाले चुनाव में महंगाई बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।
प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में स्थिति और अधिक गंभीर है। पहाड़ों में पहले ही रोजगार और पलायन की समस्या है, ऊपर से रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ने से लोगों का जीवन मुश्किल होता जा रहा है। गांवों में रहने वाले बुजुर्ग और सीमित आय वाले परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कई जगहों पर लोग कह रहे हैं कि आमदनी नहीं बढ़ी, लेकिन खर्च दोगुना हो गया। शहरी क्षेत्रों में भी महंगाई ने मध्यम वर्ग को परेशान कर रखा है। देहरादून, हल्द्वानी और हरिद्वार जैसे शहरों में किराया, बिजली बिल, स्कूल फीस और राशन का खर्च लगातार बढ़ रहा है। गृहिणियों का कहना है कि पहले जो सामान एक महीने चलता था, अब वही आधे महीने में खत्म हो रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाएगा। कांग्रेस समेत अन्य दल पहले ही महंगाई को लेकर सरकार पर हमला बोल रहे हैं। वहीं सत्ताधारी दल विकास योजनाओं और केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को जनता के सामने रखकर जवाब देने की तैयारी में है।
बाक्स
रसोई से लेकर खेती तक मार
बीते एक साल में दालों, खाद्य तेल और रसोई गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने मध्यम और गरीब वर्ग की कमर तोड़ दी है। पहाड़ी क्षेत्रों में परिवहन लागत बढ़ने के कारण मैदानी इलाकों की तुलना में सामान 10-15 प्रतिशत महंगा मिल रहा है। प्रदेश के पहाड़ी जिलों में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हैं। सीमित रोजगार, खेती में घटती आय और पलायन के बीच महंगाई ने ग्रामीण परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
चारधाम यात्रा पर दिख रहा असर
वर्तमान में चल रही चारधाम यात्रा के दौरान बढ़ती भीड़ ने स्थानीय मांग को बढ़ा दिया है, जिससे स्थानीय निवासियों के लिए फल, दूध और सब्जियों की कमी और कीमतों में तेजी देखी जा रही है। वैसे भी चारधाम यात्रा का टाइम पीरियड इतना कम होता है कि हर कोई इस समय में अपनी कमाई कम समय में बढ़ाना चाहता है। वही महंगाई की मार से सभी परेशान हैं।
आम आदमी की जेब पर सीधा असर
देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल ईंधन का मुद्दा नहीं रह गई हैं, बल्कि यह आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा सबसे बड़ा आर्थिक सवाल बन चुकी हैं। पेट्रोल-डीजल महंगे होते ही परिवहन खर्च बढ़ता है, जिसका असर सब्जियों, राशन, दूध और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई देता है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में इसका असर और अधिक गंभीर है, क्योंकि यहां परिवहन पूरी तरह सड़क मार्ग पर निर्भर है। महंगे ईंधन के कारण गांव से शहर तक सामान पहुंचाने की लागत बढ़ रही है, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता को उठाना पड़ता है। सरकारें अक्सर अंतरराष्ट्रीय बाजार और टैक्स को वजह बताती हैं, लेकिन जनता को राहत देने के लिए स्थायी नीति की जरूरत महसूस हो रही है। पेट्रोल-डीजल आज केवल वाहन चलाने का साधन नहीं, बल्कि महंगाई की धुरी बन चुका है।
शुक्रवार, 15 मई 2026
कैमरों के सामने ‘बचत’ और पीछे ‘शाही ठाठ’
नई राजनीति
देशभर में पीएम की अपील के बाद मची सादगी की होड़
माननीय व अफसरों का आमजन जैसा दिखने का नया दौर
सोशल मीडिया में समाज में अचानक उपज गई नई लहर
जनता पूछ रहीकृक्या यह असली बचत है या ‘फोटो सेशन’
वैश्विक आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और अनिश्चितताओं के दौर में प्रधानमंत्री मोदी की सादगी और बचत संबंधी अपील के बाद देश की राजनीति में एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है। जैसे ही टीवी पर प्रधानमंत्री ने वैश्विक संकट और मितव्ययिता का आह्वान किया तो सोशल मीडिया पर आर्थिक आपातकाल जैसे हालात हो गए है। माननीय से लेकर छोटे-बडे़ नेता और अधिकारियों को अपनी सादगी और मितव्ययिता का डिजिटल पर प्रदर्शन कर देश में एक अनोखा ट्रेड शुरू हो गया है।
अचानक कई माननीयों को सादगी पसंद आने लगी है, जो नेता कल तक बड़े काफिलों और आलीशान व्यवस्थाओं के बीच दिखाई देते थे, वह अब कैमरों के सामने आम आदमी की तरह नजर आने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरों की बाढ़ आ गई है। ऐसा लगने लगा है मानो देश में अचानक सादगी की प्रतियोगिता शुरू हो गई हो। हालांकि जनता भी अब राजनीति की इस पटकथा को समझने लगी है। लोग पूछ रहे हैं कि यदि सादगी सच में अपनानी है, तो क्या केवल कैमरों के सामने क्यों! क्या सरकारी फिजूलखर्ची, बड़े-बड़े काफिले, वीआईपी संस्कृति पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाएगी?
प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद देशभर में नेताओं-अधिकारियों की जीवनशैली में अचानक बदलाव दिखाई देने लगा है। हर कोई पैदल आफिस जाने और अपना काफिला कम करने की फोटो मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पोस्ट करवा रहा है। भाई पीएम की अपील है और उस पर अमल न हो यह तो हो ही नहीं सकता है। क्योंकि यह तो स्टेसस का सवाल जो है।
अकेले उत्तराखंड की बात करें तो यहां तो प्रिंट मीडिया में सायं को जब खबरों का पोस्टमार्टम होता है उस समय माननीय और अधिकारियों की सिफारिशें कि फला-फला... और संपादक जी से लेकर यूनिट हैड तक की सिफारिश आ रही है। यही नहीं सोशल मीडिया के सभी प्लेफार्मों पर तस्वीरों के साथ कई वीडियों माननीय और अफसरों की तैर रही है। आमजन यह देखकर हैरान है कि आखिर एकदम से ऐसा कैसे हो गया। जबकि आमजन तो सदियों से सादगी से जी रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति में जनसंपर्क और प्रतीकात्मक संदेशों की हमेशा बड़ी भूमिका रही है। स्वच्छता अभियान में झाड़ू लगाना हो या सैनिकों के बीच त्योहार मनानाकृइन संदेशों ने आम जनता पर प्रभाव डाला। अब उसी शैली को दूसरे जनप्रतिनिधि भी अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। अधिकारियों के लिए तो यह मजबूरी बन जाती है। आमजन की इस पर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग नेताओं अधिकारियों के इस बदले व्यवहार को सकारात्मक मान रहे हैं, जबकि कई लोगों का कहना है कि दिखावा है और कुछ नहीं।
गुरुवार, 14 मई 2026
अब ‘जुमले’ नहीं ‘जवाब’ मांगेंगे ‘युवा’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-8
उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव 2027 में रोजगार बन सकता है सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा
क्रासर
---डिग्री और डिजिटल दुनिया के बीच खड़ा युवा चुनाव में कर सकता है कुछ अलग
---विधानसभा चुनाव सियासत समझ पाएगी उत्तराखंड के जागरूक युवाओं की नब्ज
---पहाड़ की जवानी अब अपनी शर्तों पर लिखेगी चुनाव में कामयाबी की ई इबारत
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों की राजनीतिक हलचल तेज होने लगी है। राजनीतिक दल भले ही विकास, सड़क, पर्यटन और धार्मिक आयोजनों को अपनी उपलब्धि बता रहे हों, लेकिन पहाड़ के गांवों और शहरों के युवाओं के मन में सबसे बड़ा सवाल आज भी वही हैकृ रोजगार कहां है? आज युवा की सोच आज के दौर में न केवल बदली है, बल्कि यह अधिक स्पष्ट, व्यावहारिक और तकनीकी रूप से जागरूक हो गई है। युवा परंपराओं का सम्मान तो करता है, लेकिन वह अब केवल हौसले के भरोसे नहीं, बल्कि संसाधनों और अवसरों के साथ आगे बढ़ना चाहता है। आगामी विधानसभा चुनाव में युवाओं की सोच राजनैतिक दलों के लिए परेशानी बन सकती है।
बता दें कि राज्य गठन के 25 साल बाद भी उत्तराखंड का युवा नौकरी के लिए दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर है। ऐसे में माना जा रहा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में रोजगार की कमी सबसे बड़ा और निर्णायक मुद्दा बन सकती है। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में लगातार पलायन बढ़ रहा है। गांवों में खेत सूने हैं, स्कूलों में बच्चों की संख्या घट रही है और युवा रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर जा रहे हैं। कई गांव भूतिया गांव बन चुके हैं, जहां अब केवल बुजुर्ग रह गए हैं।
राज्य सरकारें समय-समय पर स्वरोजगार और स्टार्टअप योजनाओं की बात करती रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का प्रभाव सीमित दिखाई देता है। युवाओं का आरोप है कि सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया बेहद धीमी है और कई बार पेपर लीक जैसी घटनाएं विश्वास को तोड़ देती हैं।
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था लंबे समय से पर्यटन, सेना भर्ती और सरकारी नौकरियों पर निर्भर रही है। लेकिन बदलते दौर में युवाओं की संख्या और अपेक्षाएं दोनों बढ़ी हैं। पहाड़ में उद्योगों की कमी, सीमित निजी निवेश और तकनीकी शिक्षा के बाद अवसरों का अभाव बड़ी चुनौती बना हुआ है। देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर जैसे जिलों में कुछ रोजगार अवसर जरूर बने, लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में हालात अभी भी चिंताजनक हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से विकास और पलायन साथ-साथ चर्चा में रहे हैं। सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क और धार्मिक पर्यटन को विकास का माडल बता रही है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन परियोजनाओं से पहाड़ के युवाओं को स्थायी रोजगार मिलेगा? विश्लेषकों का मानना है कि यदि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन नहीं हुआ, तो पलायन और तेज हो सकता है। आगामी चुनाव में युवाओं और क्षेत्रीय मुद्दों को केंद्र में रखने की तैयारी कर रहा है। यूकेडी ने सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का संकेत दिया है और संगठन में युवाओं को जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। सोशल मीडिया और आनलाइन चर्चाओं में भी रोजगार, पलायन और पहाड़ के खाली होते गांवों को लेकर चिंता साफ दिखाई देती है।
उत्तराखंड में बेरोजगारी दर अक्सर राष्ट्रीय औसत के इर्द-गिर्द या उससे ऊपर बनी रहती है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्टों के अनुसार शिक्षित युवाओं में रोजगार की कमी एक बड़ी चिंता है। रिपोर्ट के अनुसार विधानसभा चुनाव में 2027 में लगभग 15-20 लाख युवा मतदाता निर्णायक भूमिका निभाएंगे। यह वर्ग पार्टियों के पारंपरिक वोट बैंक से हटकर डिलीवरी और जवाबदेही के आधार पर मतदान करने की प्रवृत्ति दिखाएंगे। युवाओं की सोच का परिणाम हम नेपाल चुनाव में देख चुके हैं। हालांकि प्रदेश के राजनैतिक दल भी इस पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं, लेकिन परिणाम क्या होंगे यह तो बाद में ही पता चल पाएगा।
बाक्स
सरकारी नौकरी असली रोजगार
पहाड़ में सरकारी नौकरी को ही असली रोजगार माना जाता है। पुलिस, शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग में खाली पड़े हजारों पदों को भरना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना और होमस्टे जैसी योजनाओं ने कुछ उम्मीदें जगाई हैं, लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी के कारण यह योजनाएं हर जिले में सफल नहीं हो पाई हैं। पिछले कुछ वर्षों में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और अन्य भर्ती परीक्षाओं में हुए घोटालों ने युवाओं के मनोबल को चोट पहुँचाई है। पेपर लीक और भ्रष्टाचार के मामलों ने सत्ता पक्ष के लिए बचाव की स्थिति पैदा की है, वहीं विपक्ष इसे युवा विरोधी सरकार के रूप में भुनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि सरकार ने देश का सबसे सख्त नकल विरोधी कानून लागू किया है, लेकिन युवाओं के बीच यह सवाल अब भी बरकरार है कि क्या नई भर्तियां समय पर और पारदर्शी तरीके से पूरी होंगी?
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