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बुधवार, 29 जुलाई 2026
udaydinmaan: पहाड़ की असली ताकत थी ‘साझी संस्कृति’
udaydinmaan: पहाड़ की असली ताकत थी ‘साझी संस्कृति’: पहाड़ की सामूहिक श्रम परंपरा आज भी सिखाती है साथ चलने का मंत्र बिना मजदूरी, बिना अनुबंध और बिना स्वार्थ के रहते थे मिलकर ग्रामीण खेत जोतते, घ...
पहाड़ की असली ताकत थी ‘साझी संस्कृति’
पहाड़ की सामूहिक श्रम परंपरा आज भी सिखाती है साथ चलने का मंत्र
बिना मजदूरी, बिना अनुबंध और बिना स्वार्थ के रहते थे मिलकर ग्रामीण
खेत जोतते, घर बनाते व संकट में एक-दूसरे का हाथ थामते थे सभी लोग
परंपरा भले ही कमजोर हो गई, लेकिन इसकी आत्मा है पहाड़ की पहचान
देहरादून। पहाड़ का जीवन केवल ऊंचे-ऊंचे पर्वतों, नदियों और देवस्थलों तक सीमित नहीं है। इसकी सबसे बड़ी ताकत रही है यहां की सामुदायिक संस्कृति। एक समय था जब गांव में किसी के खेत की बुवाई हो, किसी का घर बन रहा हो, छत पर पत्थर चढ़ाने हों, सिंचाई की गूल साफ करनी हो या किसी परिवार पर संकट आया होकृपूरा गांव बिना बुलावे और बिना किसी पारिश्रमिक के एक साथ जुट जाता था। इसे ही पहाड़ में सामूहिक श्रम की परंपरा कहा जाता था। यह केवल काम करने का तरीका नहीं था, बल्कि सामाजिक जीवन का ऐसा सूत्र था जिसने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी गांवों को आत्मनिर्भर बनाए रखा। सामूहिक श्रम ने पहाड़ के लोगों को यह विश्वास दिया कि किसी एक का संकट पूरे गांव का संकट है और किसी एक की खुशी पूरे गांव की खुशी।
उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में इस परंपरा को स्थानीय बोलियों में अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा है। कहीं इसे परमा कहा गया, कहीं सहकार, तो कहीं पैंचा या अन्य स्थानीय नाम प्रचलित रहे। नाम भले बदलते रहे हों, लेकिन भावना एक ही थीकृआज मैं तुम्हारे खेत में काम करूंगा, कल तुम मेरे खेत में। धान की रोपाई के दिनों में गांव की महिलाएं कतार बनाकर खेतों में उतरती थीं। लोकगीतों की मधुर धुन के बीच रोपाई होती और पूरा वातावरण उत्सव जैसा हो जाता। पुरुष खेत तैयार करते, पानी की व्यवस्था संभालते या अन्य श्रम कार्य करते। इसी तरह गेहूं की कटाई, मंडाई, घास काटना, जंगल से लकड़ी लाना और पशुओं के लिए चारा जुटाना भी सामूहिक प्रयास का हिस्सा था।
पहाड़ में मकान निर्माण भी इसी सहयोग की मिसाल था। आज जहां एक मकान बनाने में ठेकेदार और बड़ी रकम की जरूरत पड़ती है, वहीं पहले पूरा गांव मिलकर पत्थर ढोता, लकड़ी लाता, मिट्टी तैयार करता और छत डालने तक का काम साथ करता था। बदले में केवल आत्मीयता, सम्मान और एक सामूहिक भोजन ही पर्याप्त माना जाता था। सामूहिक श्रम केवल आर्थिक मजबूरी नहीं था। यह सामाजिक सुरक्षा का भी आधार था। किसी परिवार में बीमारी हो, किसी के यहां विवाह हो, किसी के घर शोक का माहौल हो या प्राकृतिक आपदा आ जाएकृगांव के लोग बिना औपचारिक निमंत्रण के मदद के लिए पहुंच जाते थे। यही कारण था कि सीमित संसाधनों के बावजूद पहाड़ का सामाजिक ताना-बाना लंबे समय तक मजबूत बना रहा।
हालांकि बदलते समय के साथ इस परंपरा पर असर पड़ा है। गांवों से लगातार हो रहा पलायन, छोटे होते परिवार, नकद अर्थव्यवस्था का विस्तार और आधुनिक जीवनशैली ने सामूहिक श्रम की संस्कृति को कमजोर किया है। अब जिन कार्यों के लिए पहले पूरा गांव जुटता था, वहां मजदूर बुलाने की परंपरा बढ़ गई है। कई गांवों में खेत खाली पड़े हैं और पुराने लोकगीतों की गूंज भी कम सुनाई देती है। इसके बावजूद यह परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज भी कई दूरस्थ गांवों में सिंचाई की नहरों की सफाई, मंदिरों के रख-रखाव, पैदल मार्गों की मरम्मत, जलस्रोतों के संरक्षण, वनाग्नि रोकने और आपदा के समय राहत कार्यों में सामूहिक श्रम की भावना जीवित दिखाई देती है। महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से और युवा विभिन्न सामाजिक अभियानों में मिलकर इस विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
आज के दौर में जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पलायन जैसी चुनौतियों से जूझ रहे उत्तराखंड में सामूहिक श्रम की परंपरा फिर से प्रासंगिक हो सकती है। यदि ग्राम पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से इस संस्कृति को नई ऊर्जा मिले, तो जल संरक्षण, पारंपरिक खेती, वन संरक्षण और ग्रामीण विकास के कई कार्य कम लागत में अधिक प्रभावी ढंग से किए जा सकते हैं। पहाड़ ने हमेशा सिखाया है कि कठिन रास्तों को अकेले नहीं, बल्कि मिलकर पार किया जाता है। यही कारण है कि सामूहिक श्रम केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता भी है। जब समाज साथ खड़ा होता है, तब विकास केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि लोगों की सहभागिता से आगे बढ़ता है।
‘आधी आबादी’ पर भाजपा का ‘फोकस’
लखपति दीदी सम्मेलन से महिला वोट बैंक पर भाजपा की नजर
भाजपा ने की उत्तराखंड की 70 विधानसभाओं में मोर्चाबंदी तेज
स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं से बढ़ाया राजनीतिक संवाद
संगठन विस्तार संग विस चुनाव की तैयारियों को मिल गई नई धार
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट तेज होने के साथ ही भाजपा ने महिला मतदाताओं तक अपनी पहुंच मजबूत करने की रणनीति पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में भाजपा महिला मोर्चा की ओर से आयोजित किए जा रहे लखपति दीदी सम्मेलन को केवल एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण के साथ राजनीतिक संवाद का बड़ा मंच माना जा रहा है। पार्टी की कोशिश है कि स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण महिलाओं के बीच अपनी पकड़ को और मजबूत किया जाए तथा इसका लाभ विधानसभा स्तर तक संगठन को मिले। उत्तराखंड में महिला मतदाता कई चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर मैदानी जिलों तक महिलाओं की मतदान में सक्रिय भागीदारी लगातार बढ़ी है। ऐसे में भाजपा महिला मोर्चा के सम्मेलन को महिला वोट बैंक के साथ सीधे संवाद और संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार सम्मेलन में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं, उद्यमिता से जुड़े लाभार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय महिला नेतृत्व को जोड़ने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल सरकारी योजनाओं की जानकारी देना नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक महिला कार्यकर्ताओं के नेटवर्क को मजबूत करना भी है। भाजपा लंबे समय से बूथ प्रबंधन को अपनी चुनावी ताकत मानती रही है। अब महिला मोर्चा के माध्यम से प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय महिला नेटवर्क तैयार करने की कवायद तेज हो गई है। पार्टी का मानना है कि यदि स्वयं सहायता समूहों और महिला स्वयंसेवकों के माध्यम से गांव-गांव तक संवाद स्थापित होता है तो चुनावी अभियान को भी मजबूती मिलेगी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लखपति दीदी जैसे कार्यक्रम महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की चर्चा के साथ राजनीतिक सहभागिता का भी अवसर बनते हैं। इससे पार्टी को उन वर्गों तक पहुंचने का मौका मिलता है, जो पारंपरिक राजनीतिक गतिविधियों में अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहते हैं।
उत्तराखंड के चुनावी परिदृश्य में महिलाओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों के निर्णयों पर महिलाओं का प्रभाव बढ़ा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, स्वयं सहायता समूह, गैस, पेयजल, सड़क और स्वरोजगार जैसे मुद्दे महिला मतदाताओं के लिए प्रमुख रहते हैं। ऐसे में सभी राजनीतिक दल इन मुद्दों को अपने अभियान का हिस्सा बना रहे हैं। भाजपा की कोशिश है कि महिला मोर्चा के कार्यक्रमों के माध्यम से सरकार की विभिन्न योजनाओं की जानकारी लाभार्थियों तक पहुंचाई जाए और स्थानीय स्तर पर संवाद का दायरा बढ़ाया जाए। राजनीतिक दृष्टि से यह भी महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस सहित अन्य दल भी महिला मतदाताओं के बीच अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। ऐसे में महिला मतदाताओं को लेकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है। आने वाले महीनों में विभिन्न दलों की महिला इकाइयों के कार्यक्रमों में भी तेजी देखी जा सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड के चुनाव केवल बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं, बल्कि गांवों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय सामाजिक नेटवर्क तक पहुंच से भी प्रभावित होंगे। इसलिए महिला सम्मेलन जैसे कार्यक्रम राजनीतिक दृष्टि से अहम माने जा रहे हैं।
भले ही विधानसभा चुनाव में अभी समय हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति पर काम तेज कर दिया है। भाजपा महिला मोर्चा का लखपति दीदी सम्मेलन इसी व्यापक तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है। संगठन विस्तार, महिला नेतृत्व को सक्रिय करना और लाभार्थी वर्ग से संवाद बढ़ानाकृइन तीनों बिंदुओं पर पार्टी विशेष ध्यान देती दिखाई दे रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि महिला सम्मेलन जैसे कार्यक्रम चुनावी राजनीति में कितना प्रभाव छोड़ते हैं और क्या इनका असर मतदान व्यवहार तक पहुंच पाता है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों पर राजनीतिक गतिविधियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं और महिला मतदाता एक बार फिर सभी दलों की रणनीति के केंद्र में हैं।
‘कांवड़ यात्रा’ आस्था की सबसे बड़ा ‘कारवां’
गंगाजल से भरी कांवड़ केवल जल का पात्र नहीं, बल्कि यह है भारत की सांस्कृतिक एकता
लोकपरंपराओं, सेवा-भाव और देशभर के करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है कांवड़ यात्रा
हरिद्वार से निकलने वाली यह यात्रा बन चुकी है देश को जोड़ने वाली जीवंत सांस्कृतिक धारा
देहरादून। सावन का महीना शुरू होते ही उत्तराखंड की धरती पर एक अलग ही उत्साह दिखाई देने लगता है। हरिद्वार की हर की पैड़ी पर गूंजता हर-हर महादेव का जयघोष, गंगा तट पर उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़, कंधों पर सजी रंग-बिरंगी कांवड़ और हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा का संकल्पकृयह दृश्य केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का भी परिचायक है। कांवड़ यात्रा आज दुनिया की सबसे बड़ी वार्षिक धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। करोड़ों श्रद्धालु उत्तराखंड के हरिद्वार, गंगोत्री, ऋषिकेश और अन्य पवित्र स्थलों से गंगाजल लेकर अपने-अपने शिवालयों में जलाभिषेक करने निकलते हैं। लेकिन इस यात्रा का महत्व केवल भगवान शिव की पूजा तक सीमित नहीं है। यह यात्रा भारत की विविधता, सामाजिक समरसता, सेवा-भाव और लोकजीवन की ऐसी झांकी प्रस्तुत करती है, जिसे देखने दुनिया भर से लोग आते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले विष को भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। विष की ज्वाला शांत करने के लिए देवताओं ने पवित्र नदियों का जल भगवान शिव को अर्पित किया। इसी प्रसंग को कांवड़ यात्रा की मूल प्रेरणा माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, त्रेता युग में भगवान परशुराम ने गंगाजल लाकर शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। कई परंपराओं में यह भी माना जाता है कि रावण ने भी कांवड़ में जल भरकर भगवान शिव की आराधना की थी। समय के साथ यह धार्मिक परंपरा जनआस्था के विराट उत्सव में बदल गई। यदि कांवड़ यात्रा की आत्मा कहीं बसती है तो वह उत्तराखंड है। देवभूमि की गोद में बहने वाली मां गंगा का पवित्र जल ही इस यात्रा का केंद्र है। हरिद्वार की हर की पैड़ी, ऋषिकेश के घाट और गंगोत्री धाम से लाखों श्रद्धालु जल भरकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों की ओर निकल पड़ते हैं। सावन के दिनों में हरिद्वार केवल एक धार्मिक नगर नहीं रहता, बल्कि पूरे भारत का सांस्कृतिक संगम बन जाता है। यहां अलग-अलग भाषाएं सुनाई देती हैं, विभिन्न राज्यों की वेशभूषाएं दिखाई देती हैं और हर कदम पर भारत की विविधता का अनुभव होता है।
कांवड़ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सांस्कृतिक विविधता है। राजस्थान के केसरिया साफे, पंजाब के ढोल, हरियाणा के अखाड़े, उत्तर प्रदेश की भजन मंडलियां, उत्तराखंड के ढोल-दमाऊं, बिहार की लोकधुनें और मध्य प्रदेश के पारंपरिक भजनकृसब एक ही यात्रा का हिस्सा बन जाते हैं। कई स्थानों पर कलाकार लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं। कहीं शिव तांडव की झांकी निकलती है तो कहीं भगवान शिव और माता पार्वती की झलकियां श्रद्धालुओं का स्वागत करती हैं। उत्तराखंड के लोकवाद्य ढोल-दमाऊं, रणसिंघा और पारंपरिक भजन यात्रा को स्थानीय सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं। यह दृश्य सचमुच एक भारत-श्रेष्ठ भारत की भावना को साकार करता है।
कांवड़ यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष सेवा की परंपरा है। यात्रा मार्ग पर हजारों सेवा शिविर लगाए जाते हैं। इनमें श्रद्धालुओं को निःशुल्क भोजन, पानी, दवाइयां, प्राथमिक उपचार, विश्राम, मोबाइल चार्जिंग, दूध, फल और कई स्थानों पर रात्रि विश्राम तक की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है। इन शिविरों को धार्मिक संस्थाएं, सामाजिक संगठन, स्थानीय व्यापारी, स्वयंसेवी समूह और ग्रामीण मिलकर संचालित करते हैं। कई परिवार वर्षों से अपने निजी संसाधनों से सेवा शिविर लगाते आ रहे हैं। उनके लिए यह दान नहीं, बल्कि भगवान शिव की सेवा का माध्यम है। यही सेवा-भाव भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को जीवित रखता है जिसमें अतिथि, साधु और यात्री की सेवा को पुण्य माना गया है।
कांवड़ यात्रा का एक बड़ा आर्थिक पक्ष भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। सावन के दौरान उत्तराखंड के हजारों छोटे व्यापारियों, होटल संचालकों, ढाबों, फल विक्रेताओं, फूल-माला विक्रेताओं, हस्तशिल्प कारोबारियों, परिवहन सेवाओं और स्थानीय दुकानदारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। रंग-बिरंगी कांवड़, भगवा वस्त्र, पूजा सामग्री, धार्मिक झंडे, ढोल, शिव प्रतिमाएं, प्रसाद और स्मृति चिह्नों का कारोबार कई गुना बढ़ जाता है। अस्थायी रोजगार के अवसर भी पैदा होते हैं। स्थानीय युवाओं को परिवहन, लाजिस्टिक्स, खानपान और अन्य सेवाओं में काम मिलता है।
2027 की राह में कांग्रेस की ‘अग्निपरीक्षा’
सत्ता विरोधी माहौल की उम्मीद, लेकिन संगठनात्मक मजबूती
एकजुटता और जमीनी सक्रियता ही तय करेगी कांग्रेस की दिशा
भाजपा के बूथ अभियान के बीच कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति धीरे-धीरे वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है। भाजपा जहां संगठन विस्तार, लाभार्थी संपर्क अभियान और विभिन्न सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस भी सत्ता में वापसी की रणनीति तैयार कर रही है। हालांकि पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा का मुकाबला करने से पहले अपने संगठन को पूरी तरह सक्रिय और एकजुट बनाए रखने की है। किसी भी चुनाव में केवल सरकार के खिलाफ माहौल पर्याप्त नहीं होता। विपक्ष को जनता के सामने विश्वसनीय विकल्प भी प्रस्तुत करना पड़ता है। उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने यही सबसे बड़ी परीक्षा है।
प्रदेश कांग्रेस ने पिछले कुछ समय में जिला और ब्लाक स्तर पर संगठन को सक्रिय करने की कोशिशें तेज की हैं। विभिन्न मुद्दोंकृबेरोजगारी, महंगाई, भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकासकृको लेकर पार्टी लगातार सरकार पर सवाल उठा रही है। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इन मुद्दों को चुनावी लाभ में बदलने के लिए बूथ स्तर तक मजबूत संगठन और लगातार जनसंपर्क आवश्यक होगा। उत्तराखंड जैसे राज्य में स्थानीय कार्यकर्ताओं की सक्रियता चुनाव परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। उत्तराखंड कांग्रेस के सामने समय-समय पर नेतृत्व और समन्वय की चुनौतियां भी चर्चा में रही हैं। चुनाव नजदीक आते ही कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं बढ़ती हैं और टिकट की संभावनाओं को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं। यदि पार्टी नेतृत्व सभी वरिष्ठ नेताओं और युवा कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने में सफल रहता है, तो संगठन को मजबूती मिल सकती है। लेकिन यदि आंतरिक मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आते हैं, तो उसका राजनीतिक नुकसान भी हो सकता है।
कांग्रेस की राजनीति फिलहाल जनसरोकारों के मुद्दों पर केंद्रित दिखाई दे रही है। इनमें प्रमुख रूप सेकृ बेरोजगारी और रोजगार के अवसर, पलायन और खाली होते गांव, शिक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सड़क, पेयजल और बुनियादी सुविधाएं, आपदा प्रबंधन और पुनर्वास हैं। पार्टी इन मुद्दों के माध्यम से सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। हालांकि चुनावी असर इस बात पर निर्भर करेगा कि यह मुद्दे मतदाताओं तक किस प्रभावी तरीके से पहुंचते हैं। दूसरी ओर भाजपा लगातार बूथ प्रबंधन, लाभार्थी संपर्क और सामाजिक वर्गों के बीच संगठन विस्तार पर जोर दे रही है। महिला, युवा, किसान और अनुसूचित वर्गों तक पहुंच बढ़ाने के लिए अलग-अलग मोर्चे सक्रिय किए जा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने केवल सरकार की आलोचना करने से आगे बढ़कर वैकल्पिक दृष्टि और स्पष्ट विकास एजेंडा प्रस्तुत करने की चुनौती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं और महिला मतदाताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। रोजगार, शिक्षा, स्वरोजगार, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे इन वर्गों के मतदान व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। यदि कांग्रेस इन वर्गों के बीच प्रभावी संवाद स्थापित कर पाती है, तो उसे राजनीतिक लाभ मिल सकता है। वहीं भाजपा भी इन्हीं वर्गों पर विशेष फोकस बनाए हुए है। उत्तराखंड में पलायन आज भी सबसे गंभीर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों में शामिल है। खाली होते गांव, खेती का संकट और सीमांत क्षेत्रों में घटती आबादी लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं। कांग्रेस इन मुद्दों को राजनीतिक बहस का केंद्र बनाने का प्रयास कर रही है। लेकिन मतदाता केवल समस्या नहीं, बल्कि उसके व्यावहारिक समाधान भी सुनना चाहेंगे।
राजनीतिक दृष्टि से अभी चुनाव में समय है और आने वाले महीनों में परिस्थितियां बदल सकती हैं। संगठनात्मक बदलाव, स्थानीय समीकरण, राष्ट्रीय राजनीति, सरकार के फैसले और जनभावनाएं चुनावी तस्वीर को प्रभावित करेंगी। फिलहाल उत्तराखंड कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह अपने संगठन को पूरी तरह सक्रिय कर भाजपा के मुकाबले मजबूत विकल्प के रूप में उभर पाएगी, या फिर आंतरिक चुनौतियां उसकी चुनावी तैयारी को प्रभावित करेंगी।
उत्तराखंड की राजनीति अब तैयारी के दौर में प्रवेश कर चुकी है। भाजपा सत्ता बरकरार रखने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस वापसी का अवसर तलाश रही है। लेकिन चुनावी सफलता केवल नारों या आरोप-प्रत्यारोप से तय नहीं होगी। जनता उस दल पर भरोसा करेगी जो मजबूत संगठन, स्पष्ट नेतृत्व, विश्वसनीय नीतियां और स्थानीय समस्याओं के व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करेगा। 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस अवसर को जनसमर्थन में बदल पाती है या नहीं।
कागजों पर ‘युद्धस्तर’ और जमीन पर ‘आफत’
हर साल मानसून में वही मातम, आखिर कब सीखेगा सिस्टम
बारिश ने फिर खोली तैयारियों की पोल, पहाड़ों पर जिंदगी ठप
आपदा के साथ अब राजनीतिक जवाबदेही भी है बड़ा सवाल
देहरादून। उत्तराखंड में मानसून का मौसम हर साल आता है। पहाड़ों पर बादल हर वर्ष बरसते हैं। नदियां उफान पर आती हैं। भूस्खलन होता है। सड़कें टूटती हैं। गांवों का संपर्क कटता है। लोग घंटों नहीं, कई बार दिनों तक फंसे रहते हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि हर साल सरकारी बयान बदल जाते हैं, लेकिन तस्वीरें नहीं। इस बार भी वही हो रहा है। राज्य के कई जिलों में लगातार हो रही बारिश ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। पहाड़ दरक रहे हैं, सड़कें मलबे में दबी हैं, नदी-नाले खतरे के निशान के करीब बह रहे हैं और प्रशासन युद्धस्तर पर राहत कार्यों का दावा कर रहा है। लेकिन सवाल राहत कार्यों का नहीं, बल्कि उस तैयारी का है, जो हर मानसून से पहले की जानी चाहिए थी।
उत्तराखंड में मानसून कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। मौसम विभाग हर वर्ष पहले से चेतावनी देता है। संवेदनशील स्थानों की सूची भी तैयार रहती है। फिर भी हर बार वही मार्ग बंद होते हैं, वही पुल क्षतिग्रस्त होते हैं और वही गांव अलग-थलग पड़ जाते हैं। आखिर क्यों? राज्य में आपदा प्रबंधन पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। जिला स्तर पर नियंत्रण कक्ष बनाए जाते हैं। मशीनें खरीदी जाती हैं। राहत दलों को प्रशिक्षित किया जाता है। समीक्षा बैठकें होती हैं। लेकिन पहली तेज बारिश के बाद ही पूरा तंत्र दबाव में दिखाई देता है।
प्रश्न यह नहीं कि बारिश कितनी हुई। प्रश्न यह है कि जिन स्थानों को वर्षों से भूस्खलन संभावित क्षेत्र माना जाता है, वहां स्थायी समाधान क्यों नहीं हो पाया? जिन सड़कों पर हर मानसून में मलबा आता है, वहां वैज्ञानिक सुरक्षा उपाय कितने प्रभावी साबित हुए? यदि हर वर्ष एक जैसी समस्या सामने आती है, तो क्या उसे केवल प्राकृतिक आपदा कहकर टाला जा सकता है?
उत्तराखंड पिछले कुछ वर्षों में तेजी से आधारभूत ढांचा विकसित करने वाले राज्यों में शामिल रहा है। सड़कें चौड़ी हुईं, सुरंगें बनीं, चारधाम संपर्क परियोजनाओं ने नई रफ्तार पकड़ी। इन परियोजनाओं का उद्देश्य बेहतर संपर्क और आर्थिक विकास है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय संतुलन और भू-वैज्ञानिक सुरक्षा पर लगातार चर्चा होती रही है। विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि हिमालय युवा पर्वतमाला है। यहां निर्माण कार्यों में अतिरिक्त सावधानी, प्रभावी जल निकासी, ढलानों का वैज्ञानिक उपचार और नियमित निगरानी आवश्यक है। यदि इन पहलुओं की अनदेखी होती है, तो भारी वर्षा के दौरान जोखिम बढ़ सकता है। यह बहस विकास के विरोध की नहीं, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ विकास की है।
बारिश के दौरान सबसे अधिक परेशानी उस व्यक्ति को होती है जिसकी खबर शायद सबसे कम बनती है। दूरस्थ गांव की गर्भवती महिला, जिसे अस्पताल तक पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। वह छात्र, जिसकी परीक्षा सड़क बंद होने से छूट जाती है। वह किसान, जिसकी खेत की मेड़ बारिश में बह जाती है। वह टैक्सी चालक, जिसकी पूरी कमाई पर्यटन पर निर्भर है। वह दुकानदार, जिसका सामान सड़क बंद होने के कारण समय पर नहीं पहुंच पाता। सरकारी आंकड़ों में ये केवल प्रभावित लोग होते हैं, लेकिन पहाड़ की जिंदगी में यही असली संकट है।
उत्तराखंड में वर्ष 2013 की विनाशकारी आपदा के बाद यह उम्मीद बनी थी कि राज्य आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक नई मिसाल बनेगा। कई सुधार भी हुए। एसडीआरएफ की क्षमता बढ़ी, संचार व्यवस्था बेहतर हुई, मौसम चेतावनी प्रणाली मजबूत हुई और राहत अभियानों में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा। फिर भी हर मानसून यह महसूस होता है कि सबसे कठिन चुनौती आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने की नहीं, बल्कि आपदा के प्रभाव को पहले से कम करने की है। यदि किसी सड़क पर लगातार पांच वर्षों से भूस्खलन हो रहा है, तो उसे केवल मशीन भेजकर खोल देना समाधान नहीं कहा जा सकता। यदि किसी गांव का संपर्क हर बरसात में टूटता है, तो वहां स्थायी सुरक्षा व्यवस्था विकसित करना ही वास्तविक तैयारी होगी।
आज बदलते जलवायु पैटर्न के कारण कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे पर्वतीय राज्यों में जोखिम और बढ़ जाता है। ऐसे में पारंपरिक योजनाओं से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीक, भू-वैज्ञानिक अध्ययन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक योजना पर आधारित रणनीति की आवश्यकता है। सिर्फ राहत पैकेज घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता उस मॉडल की है जिसमें विकास, पर्यावरण और आपदा सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक बनें। क्या मानसून पूर्व तैयारियों का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए? क्या संवेदनशील मार्गों का वार्षिक सुरक्षा आडिट सार्वजनिक किया जाना चाहिए? क्या निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की व्यवस्था पर्याप्त है? क्या जिला स्तर पर स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन में अधिक भूमिका दी जानी चाहिए? क्या हर वर्ष दोहराई जाने वाली समस्याओं के लिए समयबद्ध स्थायी कार्ययोजना बनाई गई है? यह सवाल किसी एक सरकार या एक विभाग तक सीमित नहीं हैं। यह उत्तराखंड के भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं।
इस समय प्राथमिकता लोगों की सुरक्षा, राहत और आवश्यक सेवाओं की बहाली है। राहत दल लगातार काम कर रहे हैं और कई स्थानों पर कठिन परिस्थितियों में जान जोखिम में डालकर मार्ग खोलने और लोगों तक सहायता पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका योगदान महत्वपूर्ण है। लेकिन जब बारिश थमेगी, मलबा हट जाएगा और सड़कें फिर खुल जाएंगी, तब असली परीक्षा शुरू होगी। क्या इस बार भी समीक्षा बैठकों के बाद फाइलें बंद हो जाएंगी? या फिर उन कारणों पर गंभीरता से काम होगा जो हर मानसून में उत्तराखंड को एक जैसी त्रासदी के सामने खड़ा कर देते हैं? क्योंकि पहाड़ की जनता अब केवल यह नहीं पूछ रही कि बारिश कितनी हुई। वह यह भी पूछ रही है कि तैयारी कितनी थी और शायद यही सवाल आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति, प्रशासन और विकास माडलकृतीनों की सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाला है।
मंगलवार, 28 जुलाई 2026
‘हरदा’ ने छोड़ा अपना पोस्ट ‘अस्त्र’
हरीश रावत की एक पोस्ट से गरमाई राजनीति
बहुगुणा परिवार पर छिड़ गई नई सियासी जंग
इतिहास, विरासत और नेतृत्व पर बहस हुई तेज
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में सोशल मीडिया अब केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश, शक्ति प्रदर्शन और वैचारिक संघर्ष का सबसे बड़ा मंच बन चुका है। इसी कड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने राज्य की राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है। बहुगुणा परिवार का जिक्र करते हुए लिखी गई इस पोस्ट ने न केवल कांग्रेस के भीतर नई बहस को जन्म दिया है, बल्कि भाजपा को भी विपक्ष पर हमला करने का एक नया अवसर दे दिया है। राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर चुनाव से ठीक पहले ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरों में शामिल हरीश रावत को सार्वजनिक मंच पर ऐसी टिप्पणी करनी पड़ी, जिसकी गूंज पूरे प्रदेश में सुनाई देने लगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक सोशल मीडिया पोस्ट का नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, विरासत और राजनीतिक वर्चस्व की उस खींचतान का संकेत है, जो समय-समय पर सामने आती रही है।
उत्तराखंड बनने के बाद से बहुगुणा परिवार का राज्य की राजनीति में विशेष प्रभाव रहा है। दूसरी ओर हरीश रावत भी कांग्रेस के सबसे बड़े जनाधार वाले नेताओं में गिने जाते हैं। ऐसे में जब दोनों राजनीतिक धाराएं किसी मुद्दे पर आमने-सामने दिखाई देती हैं तो उसका असर केवल पार्टी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति पर पड़ता है। सूत्रों की मानें तो हरीश रावत की पोस्ट को कांग्रेस के भीतर अलग-अलग नजरिये से देखा जा रहा है। एक वर्ग इसे पार्टी के भीतर वैचारिक स्पष्टता की कोशिश बता रहा है, जबकि दूसरा इसे अनावश्यक विवाद मान रहा है। हालांकि किसी नेता ने खुलकर सार्वजनिक प्रतिक्रिया देने से फिलहाल परहेज किया है, लेकिन अंदरखाने चर्चाओं का दौर तेज बताया जा रहा है।
उधर भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की आंतरिक कलह का नया प्रमाण बताते हुए हमला तेज कर दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस आज भी अपने अतीत के विवादों से बाहर नहीं निकल पाई है और पार्टी के वरिष्ठ नेता ही एक-दूसरे की राजनीतिक विरासत पर सवाल खड़े कर रहे हैं। भाजपा इस मुद्दे को 2027 के विधानसभा चुनाव तक जीवित रखने की रणनीति पर काम कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड की राजनीति में व्यक्तित्व आधारित नेतृत्व हमेशा प्रभावी रहा है। ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता की सार्वजनिक टिप्पणी का असर कार्यकर्ताओं के मनोबल और संगठनात्मक एकजुटता पर भी पड़ता है। यदि यह विवाद लंबा खिंचता है तो कांग्रेस को चुनावी तैयारियों के बीच अनावश्यक राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब राज्य में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे गति पकड़ रही हैं। भाजपा लगातार संगठन विस्तार और बूथ प्रबंधन पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटी है। ऐसे समय पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार का सार्वजनिक मतभेद विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर बन सकता है। सोशल मीडिया ने इस विवाद को और हवा दे दी है। समर्थक और विरोधी अपने-अपने तर्कों के साथ पोस्ट साझा कर रहे हैं। पुराने राजनीतिक घटनाक्रम, ऐतिहासिक फैसले और नेताओं के पुराने बयान फिर से चर्चा में आ गए हैं। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा केवल एक पोस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है।
कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह इस विवाद को व्यक्तिगत मतभेद बनने से रोके और संगठनात्मक एकता का संदेश दे। यदि पार्टी समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं करती है तो विरोधी दल इसे कांग्रेस की कमजोरी के प्रतीक के रूप में पेश करने की कोशिश करेंगे। उत्तराखंड की राजनीति में यह पहला अवसर नहीं है जब किसी सोशल मीडिया पोस्ट ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा किया हो। पिछले कुछ वर्षों में कई बार नेताओं की डिजिटल टिप्पणियां अखबारों की सुर्खियां और टीवी की बहस बन चुकी हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आज राजनीतिक लड़ाई केवल जनसभाओं में नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़ी जा रही है।
फिलहाल इतना तय है कि हरीश रावत की इस पोस्ट ने उत्तराखंड की राजनीति में नया विमर्श छेड़ दिया है। आने वाले दिनों में बहुगुणा परिवार की प्रतिक्रिया, कांग्रेस नेतृत्व का रुख और भाजपा की आक्रामक रणनीति इस विवाद की दिशा तय करेगी। 2027 के चुनावी रण से पहले यह सियासी टकराव केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत, नेतृत्व और जनधारणा की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है।
‘न चिट्ठी आयी तेरी, न रैबार...’
अब मोबाइल आया और वह रैबार खो गया
कभी एक संदेश जोड़ देता था पूरे गांव को
व्हाट्सऐप मैसेज से रिश्तों की गर्माहट गुम
देहरादून। गढ़वाली गीत ‘न चिट्ठी आयी तेरी, न रैबार...’ यह एक लोकगीत की पंक्ति भर नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों की सदियों पुरानी पीड़ा, प्रतीक्षा और अपनत्व का जीवंत दस्तावेज है। इस एक पंक्ति में उस मां की बेचौनी छिपी है, जो परदेस गए बेटे की राह तकती थी, उस पत्नी की आंखों का इंतजार है, जिसका पति फौज की सीमा पर तैनात था और उस पूरे गांव की धड़कन है, जो किसी राहगीर के मुंह से अपने लोगों का हाल सुनने के लिए उत्सुक रहता था। पहाड़ में रैबार केवल संदेश नहीं होता था, वह रिश्तों की सांस था। किसी के हाथ में आई चिट्ठी सिर्फ एक परिवार की नहीं होती थी, उसे पढ़ने और सुनने में पूरा गांव शामिल होता था। जब कोई देहरादून, दिल्ली, मुंबई या लखनऊ से लौटता था, तो लोग सबसे पहले पूछते थेकृहमारे लिए क्या संदेश लाए हो?
उस समय न मोबाइल था, न इंटरनेट और न ही हर गांव तक डाक की नियमित सुविधा। लेकिन रिश्ते इतने मजबूत थे कि कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था। कोई किसी की बेटी का संदेश लाता, कोई फौज में तैनात जवान का हाल सुनाता, तो कोई शहर में नौकरी कर रहे बेटे की कुशलक्षेम बताता। वह रैबार केवल शब्द नहीं होता था, उसमें घर की खुशबू, गांव की मिट्टी और अपनों की धड़कन समाई होती थी। आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। हर हाथ में स्मार्टफोन है। एक बटन दबाते ही वीडियो काल हो जाती है। दुनिया सिमटकर हथेली में आ गई है, लेकिन विडंबना यह है कि रिश्तों के बीच की दूरी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। पहले एक चिट्ठी आने पर पूरा गांव खुश हो जाता था, आज दिनभर सैकड़ों संदेश आते हैं, लेकिन उनमें वह अपनापन नहीं मिलता जो किसी रैबार में हुआ करता था।
पहाड़ की संस्कृति में रैबार केवल संचार का माध्यम नहीं था, बल्कि सामाजिक एकता की मजबूत कड़ी था। गांव का हर व्यक्ति दूसरे के सुख-दुख का सहभागी होता था। यदि किसी घर में शहर से चिट्ठी आती, तो पढ़ा-लिखा युवक उसे सबके सामने पढ़कर सुनाता। अगर किसी परिवार में खुशी की खबर होती, तो वह पूरे गांव की खुशी बन जाती और यदि कोई दुखद समाचार आता, तो पूरा गांव उस परिवार के साथ खड़ा दिखाई देता। यही पहाड़ की असली ताकत थीकृसाझेदारी, संवेदना और सामूहिक जीवन। लेकिन विकास और पलायन ने इस व्यवस्था को गहराई से बदल दिया। रोजगार की तलाश में लाखों युवा पहाड़ छोड़कर महानगरों की ओर चले गए। जिन गांवों में कभी रैबार पहुंचाने वाले कदमों की आहट सुनाई देती थी, वहां आज ताले लटके हैं। सूने आंगन, बंद घर और वीरान खेत मानो पूछ रहे होंकृअब किसके लिए आएगा रैबार?
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि नई पीढ़ी रैबार शब्द का अर्थ तो जानती है, लेकिन उसकी आत्मा से परिचित नहीं है। उनके लिए संदेश का मतलब मोबाइल नोटिफिकेशन है, जबकि पुरानी पीढ़ी जानती है कि कभी एक रैबार के लिए महीनों तक इंतजार किया जाता था। उस इंतजार में बेचौनी थी, लेकिन विश्वास भी था कि कोई न कोई अपने गांव लौटेगा और अपनों का हाल जरूर सुनाएगा। आज भी उत्तराखंड के लोकगीतों में रैबार जीवित है। लोकगायक जब मंच पर रैबार का जिक्र करते हैं, तो बुजुर्गों की आंखें नम हो जाती हैं। क्योंकि उन्हें याद आ जाता है वह दौर, जब रिश्ते नेटवर्क से नहीं, भरोसे से चलते थे, जब संदेश मोबाइल टावर नहीं, इंसान लेकर चलता था और जब पहाड़ की असली पहचान उसकी सामुदायिक संस्कृति थी।
तकनीक का विरोध नहीं किया जा सकता और न ही करना चाहिए। समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में यदि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत खो दें, तो विकास अधूरा रह जाता है। उत्तराखंड को केवल सड़कें, सुरंगें और इंटरनेट ही नहीं चाहिए, बल्कि वह सामाजिक ताना-बाना भी चाहिए जिसने सदियों तक कठिन पहाड़ी जीवन को आसान बनाया। आज जरूरत इस बात की है कि रैबार को केवल लोकगीतों तक सीमित न रहने दिया जाए। स्कूलों में स्थानीय संस्कृति पढ़ाई जाए, गांवों के सांस्कृतिक मेलों में रैबार की परंपरा को जीवित रखा जाए और नई पीढ़ी को बताया जाए कि पहाड़ की असली पहचान उसकी बोली, उसके लोकगीत और उसके रिश्तों की गर्माहट है।
शायद अब कोई राहगीर हाथ में चिट्ठी लेकर गांव न पहुंचे, शायद डाकिए की घंटी पहले जैसी उत्सुकता न जगाए, लेकिन यदि हम एक-दूसरे का हाल पूछना नहीं छोड़ेंगे, गांव से अपना रिश्ता नहीं तोड़ेंगे और अपने बुजुर्गों की आवाज सुनते रहेंगे, तो रैबार कभी खत्म नहीं होगा। क्योंकि रैबार कागज पर लिखे कुछ शब्द नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा है। जिस दिन यह आत्मा खो गई, उस दिन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान का एक अमूल्य अध्याय भी इतिहास बन जाएगा।
‘फुल सिस्टम क्रैश’
जब दूनघाटी में बच्चे स्कूल पहुंचे तब जागा प्रशासन
बारिश में राजधानी बेहाल, डीएम का अवकाश आदेश देर से आया
भीगते रहे छात्र-छात्राएं व मासूम नौनिहाल, जाम में फंसे अभिभावक
सड़कें बनीं दरिया, स्कूल पहुंचे बच्चों को फिर लौटना पड़ा अपने घर
सवालकृजब आसमान रात से बरस रहा था तो फैसला सुबह देर से क्यों
देहरादून। राजधानी में मूसलाधार बारिश ने केवल सड़कों को ही नहीं डुबोया, बल्कि प्रशासन की आपदा प्रबंधन व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए। सुबह से तेज बारिश के बीच हजारों बच्चे रोज की तरह स्कूल के लिए निकल पड़े। कई स्कूलों में प्रार्थना सभा भी हो गई, कक्षाएं शुरू हो गईं और तभी जिला प्रशासन की ओर से स्कूलों में अवकाश का आदेश जारी हुआ। नतीजा यह हुआ कि जिन बच्चों को सुरक्षित घरों में होना चाहिए था, वह बारिश, जलभराव और ट्रैफिक जाम के बीच फंस गए।
राजधानी की कई प्रमुख सड़कें कुछ ही घंटों में नदी का रूप ले चुकी थीं। नालों का पानी सड़कों पर बह रहा था। वाहन रेंग रहे थे और जगह-जगह लंबा जाम लगा था। सबसे अधिक परेशानी उन अभिभावकों को हुई, जिन्होंने अपने बच्चों को स्कूल छोड़ दिया था। अवकाश की सूचना मिलते ही उन्हें दोबारा स्कूलों की ओर दौड़ लगानी पड़ी। कई परिवार घंटों तक जाम में फंसे रहे, जबकि छोटे-छोटे बच्चे भीगते हुए स्कूल से घर लौटे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मौसम विभाग लगातार भारी बारिश की चेतावनी जारी कर रहा था और रात से ही राजधानी में तेज बारिश हो रही थी, तब अवकाश का निर्णय समय रहते क्यों नहीं लिया गया? यदि सुबह स्कूल खुलने से पहले आदेश जारी हो जाता, तो हजारों बच्चों और अभिभावकों को इस परेशानी से बचाया जा सकता था। यह पहला अवसर नहीं है जब देहरादून में बारिश के दौरान प्रशासनिक निर्णयों के समय को लेकर सवाल उठे हों। हर मानसून में राजधानी की वही तस्वीर सामने आती हैकृजलभराव, बंद नालियां, घंटों लंबा ट्रैफिक जाम और फिर आपात बैठकें। फर्क सिर्फ इतना है कि हर साल दावे नए होते हैं और समस्याएं पुरानी।
अभिभावकों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भारी नाराजगी देखी गई। उनका कहना था कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा फैसला सबसे पहले होना चाहिए। यदि प्रशासन मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रख रहा था, तो स्कूल खुलने से पहले ही स्पष्ट आदेश जारी किया जाना चाहिए था। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने सवाल उठाए कि आखिर निर्णय लेने में इतनी देरी क्यों हुई।
राजधानी की सड़कों की हालत ने भी नगर निकायों और संबंधित विभागों की तैयारियों की पोल खोल दी। जहां-जहां कुछ देर की बारिश में सड़कें तालाब बन गईं, वहां वर्षों से चल रहे ड्रेनेज सुधार और जल निकासी के दावों पर सवाल खड़े हो गए। लोगों का कहना है कि हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई और जलभराव रोकने की योजनाओं की बात होती है, लेकिन पहली तेज बारिश ही पूरी व्यवस्था की वास्तविकता सामने ला देती है।
अभिभावकों का कहना है कि मौसम आधारित निर्णयों के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध प्रोटोकाल होना चाहिए। यदि भारी बारिश की संभावना हो, तो स्कूलों में अवकाश या समय परिवर्तन का निर्णय सुबह बच्चों के घरों से निकलने से पहले लिया जाना चाहिए। इससे भ्रम की स्थिति भी नहीं बनेगी और अनावश्यक जोखिम भी टाला जा सकेगा। राजधानी में आज जो हुआ, उसने एक बार फिर यह याद दिलाया कि आपदा केवल प्राकृतिक नहीं होती, कई बार निर्णय लेने में हुई देरी भी संकट को बढ़ा देती है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बारिश कितनी हुई, बल्कि यह भी है कि प्रशासन ने समय पर फैसला क्यों नहीं लिया?
देहरादून की सड़कों पर बहता पानी कुछ घंटों में उतर जाएगा, ट्रैफिक भी सामान्य हो जाएगा, लेकिन उन अभिभावकों के मन में उठे सवाल आसानी से नहीं मिटेंगे, जिन्होंने अपने बच्चों को सुरक्षित स्कूल भेजा था और कुछ ही देर बाद उन्हें बाढ़ जैसे हालात में वापस लाना पड़ा। मानसून हर साल आएगा, लेकिन क्या हर साल फैसले भी इतने ही देर से आएंगेकृयही सबसे बड़ा सवाल है।
राष्ट्रवाद की ‘नई पिच’ पर भाजपा
भाजपा का स्वतंत्रता दिवस से पहले गांव-गांव पहुंचेगा अभियान
देशभक्ति के संदेश के साथ भाजपा की संगठन विस्तार की रणनीति
भाजपा बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की है तैयारी में
देहरादून। स्वतंत्रता दिवस से पहले भाजपा उत्तराखंड में एक बार फिर हर घर तिरंगा अभियान को व्यापक जनअभियान का स्वरूप देने जा रही है। पार्टी का दावा है कि इस अभियान का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक में राष्ट्रभक्ति की भावना को मजबूत करना और आजादी के अमृतकाल के संकल्पों को जन-जन तक पहुंचाना है। वहीं, राजनीतिक जानकार इसे केवल राष्ट्रीय अभियान नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने की भाजपा की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, राज्य के सभी जिलों, मंडलों और बूथों पर कार्यकर्ताओं को अभियान की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। घर-घर तिरंगा पहुंचाने के साथ-साथ तिरंगे के सम्मान, स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों और भारत की उपलब्धियों पर जनसंपर्क कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी वार्डों तक प्रभात फेरियां, तिरंगा यात्राएं और युवा सम्मेलन आयोजित करने की भी तैयारी है। भाजपा नेताओं का कहना है कि तिरंगा किसी दल का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की पहचान है। इसलिए अभियान को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि प्रत्येक नागरिक को अपने घर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए प्रेरित करना ही इसका मूल उद्देश्य है।
हालांकि विपक्ष इस अभियान को अलग नजरिये से देख रहा है। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रवाद को चुनावी राजनीति से जोड़ने का प्रयास करती रही है। उनका कहना है कि देशभक्ति किसी अभियान की मोहताज नहीं होती, बल्कि सरकार को महंगाई, बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों पर भी समान गंभीरता से काम करना चाहिए। उत्तराखंड जैसे सैन्य परंपरा वाले राज्य में हर घर तिरंगा अभियान का विशेष महत्व माना जा रहा है। राज्य के हजारों परिवारों का सेना से सीधा जुड़ाव रहा है और सीमाओं की रक्षा में उत्तराखंड के सैनिकों का योगदान देशभर में सम्मान के साथ याद किया जाता है। ऐसे में भाजपा इस अभियान के माध्यम से पूर्व सैनिकों, युवाओं और छात्रों को भी जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा लंबे समय से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय गौरव के मुद्दों को अपनी राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा बनाती रही है। अयोध्या में राम मंदिर, अनुच्छेद 370, समान नागरिक संहिता और राष्ट्रीय पर्वों से जुड़े अभियानों के बाद अब हर घर तिरंगा भी उसी व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। उत्तराखंड में जहां अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं, वहां इस तरह के जनसंपर्क अभियान संगठन को कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय बनाए रखने में भी मदद करेंगे।
भाजपा के लिए यह अभियान केवल ध्वजारोहण तक सीमित नहीं है। इसके जरिए पार्टी बूथ स्तर पर अपनी सक्रियता बढ़ाने, नए स्वयंसेवकों को जोड़ने और राष्ट्रीय मुद्दों के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंच बनाने का प्रयास करेगी। दूसरी ओर विपक्ष की चुनौती यह होगी कि वह इस अभियान का विरोध किए बिना अपनी राजनीतिक बात जनता तक कैसे पहुंचाए। स्पष्ट है कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर शुरू होने वाला हर घर तिरंगा अभियान इस बार केवल राष्ट्रीय उत्सव नहीं रहेगा, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति में भी इसकी गूंज सुनाई देगी। जहां भाजपा इसे राष्ट्रभक्ति का महाअभियान बता रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा मान रहा है। अंतिम फैसला हमेशा की तरह जनता को ही करना है कि वह इसे राष्ट्रीय भावना का उत्सव मानती है या चुनावी माहौल में राजनीतिक संदेश का विस्तार।
सोमवार, 27 जुलाई 2026
उत्तराखंड में पेपर लीक पर ‘क्लेश’
दिल्ली में धर्मेंद्र प्रधान गए, अब क्या उत्तराखंड में धन सिंह रावत की बारी
तकनीकी विवि कांड के बाद सड़क पर विपक्ष, मंत्री की कुर्सी पर खतरा
पेपर लीक से गरमाई राजनीति, उत्तराखंड में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग
देहरादून। देशभर में पेपर लीक के खिलाफ उठी युवा आवाज अब उत्तराखंड की राजनीति के केंद्र में पहुंच गई है। केंद्र में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब उत्तराखंड के उच्च शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री डा. धन सिंह रावत के इस्तीफे की मांग भी तेज हो गई है। हाल में वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय की परीक्षा के कथित पेपर लीक मामले में गिरफ्तारी और उसके बाद विपक्ष के विरोध प्रदर्शन ने राज्य की राजनीति को नया मुद्दा दे दिया है। कांग्रेस ने मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने की मांग की है।
यह मुद्दा केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रह गया है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग भर्ती घोटाला, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप और अब विश्वविद्यालय स्तर पर पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं के बीच यह धारणा मजबूत की है कि मेहनत के बावजूद परीक्षा प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर उभरे परीक्षा सुधार आंदोलन की गूंज अब उत्तराखंड में भी सुनाई दे रही है।दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्र असंतोष अब राज्यों की राजनीति को भी प्रभावित कर रहा है। हाल के घटनाक्रमों में परीक्षा सुधार, जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग ने सरकारों पर दबाव बढ़ाया है। इसी व्यापक माहौल में उत्तराखंड में भी शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा सुरक्षा पर सवाल तेज हुए हैं।
देहरादून में विपक्ष ने पेपर लीक प्रकरण को लेकर मार्च निकाला और तकनीकी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई। विपक्ष का तर्क है कि जब परीक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक सामने आई है, तब राजनीतिक जवाबदेही तय होनी चाहिए। दूसरी ओर सरकार का पक्ष यह हो सकता है कि मामले में जांच चल रही है, गिरफ्तारियां हुई हैं और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, इसलिए जांच पूरी होने से पहले निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। यह विवाद केवल एक मंत्री तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं और युवाओं से जुड़े मुद्दे चुनावी विमर्श का केंद्र बनते जा रहे हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में देरी और पेपर लीक जैसे विषय विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दे रहे हैं।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि आज का युवा केवल सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं है। सीधे जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई की मांग कर रही है। यही दबाव राष्ट्रीय राजनीति में दिखाई दिया और अब उसका असर राज्यों में भी महसूस किया जा रहा है। उत्तराखंड में भी छात्र संगठनों और विपक्ष ने इसी भावना को राजनीतिक मुद्दे में बदलने की कोशिश शुरू कर दी है।
राज्य सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। पहली, दोषियों के खिलाफ त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई कर यह संदेश देना कि परीक्षा प्रणाली से समझौता नहीं होगा। दूसरी, युवाओं का भरोसा फिर से जीतना। केवल गिरफ्तारी या जांच की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही पर ठोस सुधार दिखाई देने होंगे।
फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति में यह बहस तेज है कि क्या नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए या जांच पूरी होने तक इंतजार किया जाना चाहिए। इतना तय है कि पेपर लीक अब केवल कानून-व्यवस्था या शिक्षा विभाग का मुद्दा नहीं रहा। यह युवाओं के विश्वास, रोजगार और आने वाले चुनावों का बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन चुका है। युवाओं का असंतोष लगातार बढ़ता है और परीक्षा सुधार की मांग राज्य की सड़कों से चुनावी मंचों तक पहुंचती है, तो उत्तराखंड की 2027 की राजनीति में यह मुद्दा रोजगार के साथ सबसे प्रभावी चुनावी एजेंडा बन सकता है।
सदियों से ‘जैविक’ है पहाड़ की खेती
अब दुनिया सीख रही है पहाड़ का माडल
रसायनों से दूर रही पहाड़ के गांवों में कृषि
मंडुवा-झंगोरा, राजमा और गहत सुपरफूड
देहरादून। जब पूरी दुनिया रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों से जूझ रही है और आर्गेनिक खाद्य पदार्थों की मांग लगातार बढ़ रही है, तब उत्तराखंड के पहाड़ों की ओर दुनिया की नजरें फिर से उठने लगी हैं। कारण साफ हैकृयहां की खेती किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा से जैविक रही है, जिस खेती को आज आधुनिक दुनिया आर्गेनिक फार्मिंग कहकर करोड़ों रुपये के कारोबार में बदल रही है, वह पहाड़ के किसानों की जीवनशैली का हिस्सा रही है।
पहाड़ के गांवों में वर्षों तक खेतों में न तो रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग हुआ और न ही कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल। गोबर की खाद, पत्तियों से बनी जैविक खाद, पशुपालन और मिश्रित खेती ने यहां की कृषि को स्वाभाविक रूप से जैविक बनाए रखा। यही कारण है कि पहाड़ का मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, चौलाई, राजमा और लाल चावल आज देश ही नहीं, विदेशों में भी सुपरफूड के रूप में पहचान बना रहे हैं। विडंबना यह है कि जिस किसान ने सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर खेती की, वही आज सबसे अधिक आर्थिक संकट से जूझ रहा है। गांव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर पड़ रहे हैं और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जैविक खेती की पहचान तो बनी, लेकिन उसका आर्थिक लाभ किसान तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया।
पहाड़ की कृषि केवल अन्न उत्पादन नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का भी माडल है। यहां की सीढ़ीनुमा खेती मिट्टी के कटाव को रोकती है। जंगल, जलस्रोत और खेती एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। यही कारण है कि उत्तराखंड की पारंपरिक कृषि जलवायु परिवर्तन के दौर में भी टिकाऊ खेती का उदाहरण मानी जाती है। आज दुनिया मिलेट्स श्री अन्न को भविष्य का भोजन बता रही है। संयुक्त राष्ट्र ने भी मोटे अनाजों के महत्व को स्वीकार किया है। लेकिन उत्तराखंड का किसान सदियों से मंडुवा और झंगोरा खाता और उगाता आया है, जो भोजन कभी गरीबी की पहचान समझा जाता था, वही अब बड़े शहरों के सुपरमार्केट और पांच सितारा होटलों में ऊंचे दामों पर बिक रहा है।
उत्तराखंड की जैविक खेती को वैज्ञानिक तकनीक, बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ा जाए तो यह राज्य की अर्थव्यवस्था की नई रीढ़ बन सकती है। स्थानीय उत्पादों को भौगोलिक पहचान, ई-कामर्स और निर्यात बाजार से जोड़कर किसानों की आय में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। छोटे जोत, जंगली जानवरों का बढ़ता आतंक, सिंचाई की कमी, परिवहन की दिक्कत और विपणन व्यवस्था की कमजोरी किसानों का मनोबल तोड़ रही है। कई गांवों में खेत इसलिए खाली हैं क्योंकि खेती लाभ का सौदा नहीं रह गई है।
राज्य सरकार समय-समय पर जैविक खेती को बढ़ावा देने की योजनाएं चलाती रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल उत्पादन बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। असली जरूरत किसान को बाजार, उचित मूल्य और ब्रांड पहचान दिलाने की है। यदि पहाड़ के उत्पाद सीधे उपभोक्ता तक पहुंचें तो किसान की आय कई गुना बढ़ सकती है। उत्तराखंड में पर्यटन और कृषि का मेल भी नई संभावनाएं पैदा कर सकता है। एग्री-टूरिज्म, होमस्टे के साथ स्थानीय भोजन, जैविक उत्पादों की बिक्री और पारंपरिक खेती का अनुभव पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है। इससे गांवों में रोजगार भी बढ़ेगा और पलायन पर भी कुछ हद तक रोक लग सकती है।
आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पहाड़ में जैविक खेती होती है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम उस किसान को पहचान और सम्मान दे पा रहे हैं, जिसने बिना किसी प्रमाणपत्र के सदियों से धरती, पानी और पर्यावरण की रक्षा करते हुए प्राकृतिक खेती को जीवित रखा है। उत्तराखंड की पहचान केवल देवभूमि या पर्यटन तक सीमित नहीं है। इसकी असली ताकत इसकी पारंपरिक जैविक कृषि है। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और बाजार मिलकर इस विरासत को आधुनिक अर्थव्यवस्था से जोड़ दें, तो उत्तराखंड न केवल देश का अग्रणी जैविक राज्य बन सकता है, बल्कि पलायन जैसी गंभीर समस्या का स्थायी समाधान भी खोज सकता है। पहाड़ की खेती को दया नहीं, सही दाम, मजबूत बाजार और वैश्विक पहचान की जरूरत है। यही उत्तराखंड के ग्रामीण भविष्य की सबसे मजबूत नींव साबित हो सकती है।
अब ‘ई-20’ जनता पार्टी
देश में जन्म ले रहा है युवाओं का नया राजनीतिक आंदोलन
डेढ़ लाख फालोअर्स के दावे ने बढ़ा दी है सियासी हलचल
बेरोजगारी और पेपर लीक के मुद्दे के बाद अब नई गोलबंदी
देहरादून। देश की राजनीति में पिछले कुछ महीनों से युवाओं के गुस्से ने जिस तरह नए-नए रूप धारण किए हैं, उसने पारंपरिक राजनीतिक दलों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। पहले सोशल मीडिया पर काकरोच आंदोलन ने सत्ता और विपक्ष दोनों का ध्यान अपनी ओर खींचा। अब उसी सिलसिले में ई-20 जनता पार्टी नाम से चल रहा एक नया डिजिटल अभियान तेजी से चर्चा के केंद्र में है। बेहद कम समय में करीब डेढ़ लाख फालोअर्स जुटाने के दावे और बड़े आंदोलन की तैयारियों की चर्चाओं ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है।
हालांकि इस मंच का वास्तविक संगठनात्मक ढांचा, सदस्य संख्या और राजनीतिक भविष्य अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना तय है कि सोशल मीडिया की ताकत ने इसे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया है। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताएं, पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर चलाया जा रहा यह अभियान आने वाले दिनों में सियासी समीकरण बदलने की क्षमता रखता है या नहीं, इस पर सभी दलों की नजर टिकी हुई है। देश में पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं के रद्द होने, पेपर लीक के आरोपों और नौकरियों में देरी जैसे मुद्दों ने लाखों युवाओं को प्रभावित किया है। कई राज्यों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए और सोशल मीडिया के जरिए अपनी आवाज राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाई।
कहते है कि जब पारंपरिक राजनीतिक दल किसी वर्ग की अपेक्षाओं को समय पर संबोधित नहीं कर पाते, तब ऐसे डिजिटल अभियान तेजी से लोकप्रिय होने लगते हैं। ई-20 जनता पार्टी की बढ़ती चर्चा को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। पहले आंदोलनों को गांव-गांव और शहर-शहर तक पहुंचने में महीनों लग जाते थे। अब एक वायरल वीडियो, एक प्रभावी नारा और कुछ घंटों की डिजिटल सक्रियता लाखों लोगों तक संदेश पहुंचा देती है। ई-20 जनता पार्टी के नाम से चल रहे अभियान ने भी यही रणनीति अपनाई है। छोटे-छोटे वीडियो, युवाओं की समस्याओं पर केंद्रित पोस्ट, लाइव चर्चा और लगातार डिजिटल संवाद के जरिए समर्थकों का दायरा बढ़ाने की कोशिश हो रही है। यही कारण है कि कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोग इस मंच से जुड़ने का दावा किया जा रहा है।
काकरोच आंदोलन ने यह साबित किया कि प्रतीकात्मक विरोध भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन सकता है। एक अलग प्रतीक, आक्रामक नारे और सोशल मीडिया की तेज रणनीति ने उसे चर्चा के केंद्र में ला दिया। अब ई-20 जनता पार्टी उसी डिजिटल ऊर्जा को एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में बदलने का प्रयास करती दिखाई दे रही है। यदि यह अभियान केवल सोशल मीडिया तक सीमित न रहकर राज्यों में संगठन खड़ा करता है, तो इसकी राजनीतिक प्रासंगिकता बढ़ सकती है। अकेले उत्तराखंड लंबे समय से भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा है। राज्य के हजारों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता का मुद्दा लगातार उठता रहा है।
सत्ता पक्ष के लिए युवाओं की नाराजगी को कम करना उतना ही जरूरी है, जितना विपक्ष के लिए उस असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलना। यदि युवाओं का बड़ा वर्ग किसी स्वतंत्र मंच के साथ खड़ा होता है, तो पारंपरिक दलों के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है। यही कारण है कि छात्र आंदोलनों और सोशल मीडिया अभियानों पर अब राष्ट्रीय दल भी लगातार नजर बनाए हुए हैं। फिलहाल इस सवाल का कोई स्पष्ट उत्तर उपलब्ध नहीं है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि यह पहल एक औपचारिक राजनीतिक दल का रूप ले रही है, किसी संगठन का अभियान है या केवल एक डिजिटल जन-अभियान है। चुनाव लड़ने, संगठन विस्तार या नेतृत्व संरचना को लेकर भी अभी स्पष्ट और आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
फिर भी, भारतीय राजनीति में कई ऐसे उदाहरण रहे हैं जहां सामाजिक या जन आंदोलनों ने बाद में राजनीतिक स्वरूप ग्रहण किया। इसलिए इस पहल के भविष्य को लेकर अटकलें स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारतीय राजनीति अब केवल रैलियों और जनसभाओं तक सीमित नहीं रही। इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म जनमत निर्माण के महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। युवा वर्ग की भागीदारी बढ़ने के साथ डिजिटल अभियानों का प्रभाव भी बढ़ा है। ऐसे माहौल में कोई भी अभियान यदि युवाओं की वास्तविक समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाता है, तो वह कम समय में बड़ी पहचान बना सकता है। हालांकि, डिजिटल लोकप्रियता और स्थायी जनाधार एक ही बात नहीं हैं। किसी भी मंच की वास्तविक ताकत का आकलन उसके जमीनी संगठन, नेतृत्व और दीर्घकालिक सक्रियता से ही होगा।
काकरोच आंदोलन के बाद ई-20 जनता पार्टी की चर्चा इस बात का संकेत है कि देश का युवा वर्ग अपनी बात कहने के लिए नए मंच तलाश रहा है। यह मंच भविष्य में कितना प्रभावी होगा, इसका आकलन अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तय है कि रोजगार, शिक्षा और पारदर्शिता जैसे मुद्दे अब केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ चुके हैं। जो भी दल इन सवालों का विश्वसनीय समाधान प्रस्तुत करेगा, वही आने वाले वर्षों में युवाओं का अधिक भरोसा जीतने की स्थिति में होगा।
‘बवाल’ बढ़ा तो बदल गए ‘सुर’
चौतरफा घिरे बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने मांगी माफी, इस्तीफे की मांग पर अड़े थे युवा
सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक घमासान के बाद बैकफुट पर संगठन, कप्तानी पर संकट
भाजपा प्रदेश अध्यक्षकृश्यदि मेरी बात से किसी की भावना आहत हुई है तो मुझे खेद: महेंद्र
देहरादून। उत्तराखंड भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को आखिरकार अपने विवादित बयान पर सफाई देते हुए युवाओं से माफी मांगनी पड़ी। पिछले कुछ दिनों युवाओं को लेकर दिए बयान को लेकर प्रदेश की राजनीति में जबरदस्त हलचल मची हुई थी। सोशल मीडिया पर लगातार विरोध, छात्र-युवा संगठनों की नाराजगी और विपक्ष के हमलों के बीच मामला इतना बढ़ गया कि कई स्थानों पर उनके इस्तीफे की मांग भी उठने लगी। राजनीतिक दबाव बढ़ने के बाद महेंद्र भट्ट ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यदि उनके बयान से किसी भी युवा या किसी वर्ग की भावनाएं आहत हुई हैं तो उन्हें इसका खेद है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं था और उनके बयान को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया।
हालांकि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की इस सफाई के बाद भी राजनीतिक बहस थमी नहीं है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह माफी स्वेच्छा से नहीं, बल्कि जनता और युवाओं के बढ़ते दबाव का परिणाम है। विपक्ष का कहना है कि यदि विरोध नहीं होता तो भाजपा नेतृत्व इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहता। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका युवाओं की रही। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बड़ी संख्या में युवाओं ने बयान का विरोध किया। कई छात्र संगठनों ने इसे युवाओं के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताते हुए प्रदेश अध्यक्ष से इस्तीफे की मांग की। देखते ही देखते यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और युवाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों से भी जुड़ने लगा।
भाजपा ने विवाद को लंबा खिंचने देने के बजाय नुकसान की आशंका को देखते हुए तत्काल सफाई देने की रणनीति अपनाई। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और पार्टी किसी भी ऐसे विवाद को चुनावी मुद्दा बनने से रोकना चाहती है, जिससे युवा मतदाता प्रभावित हों। भाजपा के लिए युवा मतदाता बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। राज्य में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और रोजगार के अवसर पहले से ही चर्चा के विषय हैं। ऐसे माहौल में किसी भी विवादित बयान का राजनीतिक असर अपेक्षा से अधिक हो सकता है। यही कारण है कि संगठन ने विवाद बढ़ने के बाद तुरंत डैमेज कंट्रोल की कोशिश की।
वहीं, विपक्ष इस मुद्दे को यहीं समाप्त करने के पक्ष में नहीं दिख रहा। कांग्रेस ने कहा है कि केवल माफी मांग लेने से मामला खत्म नहीं हो जाता। विपक्ष का दावा है कि जनता ने भाजपा नेतृत्व को अपना रुख बदलने के लिए मजबूर किया है और आने वाले समय में युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार को लगातार घेरा जाएगा। घटनाक्रम उत्तराखंड की बदलती राजनीति का संकेत भी है। अब सोशल मीडिया पर उठने वाली जनभावनाएं सीधे राजनीतिक फैसलों और नेताओं की प्रतिक्रियाओं को प्रभावित कर रही हैं। पहले जिन बयानों पर लंबे समय तक सफाई नहीं आती थी, अब उन पर कुछ ही दिनों में प्रतिक्रिया देनी पड़ रही है।
विवादों की ‘आंधी’ में डगमगा रही ‘कुर्सी’
उत्तराखंड भाजपा में नए प्रदेश अध्यक्ष की चर्चाएं तेज
सोशल मीडिया पर दावेदारों की लंबी सूची, संगठन चुप
बदलाव होगा या महेंद्र भट्ट पर ही जताया जाएगा भरोसा
देहरादून। उत्तराखंड भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर इन दिनों राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कई नेताओं के नाम चर्चा में हैं, तो दूसरी ओर पार्टी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक गलियारों में भी संगठन में संभावित बदलाव को लेकर कयासों का दौर जारी है। हालांकि, पार्टी की ओर से अब तक प्रदेश अध्यक्ष बदलने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। राजनीतिक चर्चाओं को उस समय और बल मिला, जब हाल के दिनों में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट अपने एक विवादित बयान को लेकर विपक्ष और युवाओं के निशाने पर आए। बढ़ते विवाद के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से सफाई दी और युवाओं से खेद भी व्यक्त किया। इसके बाद सोशल मीडिया पर यह चर्चा और तेज हो गई कि क्या पार्टी संगठन आगामी राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए नेतृत्व में बदलाव कर सकता है।
उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन भाजपा ने चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। संगठन विस्तार, बूथ प्रबंधन और नए सामाजिक समीकरणों पर लगातार काम हो रहा है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का पद बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही कारण है कि जैसे ही संगठन में बदलाव की संभावनाओं की चर्चा शुरू हुई, कई नेताओं के नाम सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। हालांकि, भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि पार्टी में संगठनात्मक नियुक्तियां तय प्रक्रिया के तहत होती हैं और सोशल मीडिया की चर्चाओं के आधार पर कोई निर्णय नहीं लिया जाता। पार्टी नेतृत्व फिलहाल सार्वजनिक रूप से यही संदेश दे रहा है कि संगठन पूरी तरह एकजुट है और सभी नेता आगामी चुनावी तैयारियों में जुटे हैं।
भाजपा के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, सरकार की उपलब्धियों को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना और दूसरी, युवाओं के बीच पार्टी की सकारात्मक छवि को मजबूत बनाए रखना। भर्ती परीक्षाओं, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे पहले ही राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। ऐसे में संगठन का नेतृत्व किसके हाथ में होगा, यह केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है। विपक्ष भी इन चर्चाओं पर पैनी नजर बनाए हुए है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है और नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं संगठन के अंदरूनी असंतोष का संकेत हैं। वहीं भाजपा इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे विपक्ष की राजनीतिक व्याख्या बता रही है।
सोशल मीडिया ने इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बना दिया है। अलग-अलग दावेदारों के समर्थन में पोस्ट, वीडियो और संदेश लगातार साझा किए जा रहे हैं। कई पोस्ट में संभावित नामों का दावा किया जा रहा है, लेकिन इनमें से किसी भी दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। सोशल मीडिया का माहौल और संगठन का वास्तविक निर्णय हमेशा एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं होता। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की कार्यशैली को देखते हुए यह भी माना जा रहा है कि यदि संगठन में कोई बदलाव होता है तो उसका फैसला अचानक और औपचारिक घोषणा के साथ सामने आएगा। वहीं यदि पार्टी मौजूदा नेतृत्व पर ही भरोसा कायम रखती है, तो सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं पर स्वतः विराम लग सकता है।
उत्तराखंड भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चल रही चर्चाओं ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले संगठन का हर कदम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाएगा। फिलहाल बदलाव की चर्चाएं अटकलों के स्तर पर हैं और पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है। ऐसे में आने वाले दिनों में भाजपा का संगठनात्मक फैसला ही यह तय करेगा कि सोशल मीडिया की अटकलें सही साबित होती हैं या फिर मौजूदा नेतृत्व पर ही भरोसा कायम रखा जाता है।
शनिवार, 25 जुलाई 2026
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धर्मेंद्र प्रधान ने पीएम मोदी को भेजी इस्तीफे की चिट्ठी
जंतर-मंतर पर काकरोच संग्राम के बाद बड़ा फैसला
धर्मेंद्र ने चिट्ठी भेजकर अपना पद छोड़ने की इच्छा जताई
पीएमओ से अभी तक नहीं हो पाई है इसकी काई भी पुष्टि
नई दिल्ली। राजधानी के जंतर-मंतर पर पिछले कई दिनों से चल रहे अनोखे प्रदर्शन के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। शिक्षा नीति और पेपर लीक विवादों के बीच, जंतर-मंतर पर शुरू हुए काकरोच संग्राम ने ऐसा तूल पकड़ा कि आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफे की पेशकश करनी पड़ी। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक भावुक चिट्ठी भेजकर अपना पद छोड़ने की इच्छा जताई है।
दरअसल, नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने इस बार विरोध का एक बेहद अजीब तरीका निकाला। छात्रों ने आरोप लगाया था कि देश की परीक्षा प्रणाली में दीमक और काकरोच की तरह भ्रष्टाचार घर कर चुका है। इसके विरोध स्वरूप जंतर-मंतर पर हजारों की संख्या में प्रतीकात्मक काकरोच के पोस्टर, कट-आउट और डिब्बों में बंद काकरोच लाकर अनोखा प्रदर्शन किया गया। काकरोच हटाओ, परीक्षा बचाओ के नारों से पूरा जंतर-मंतर गूंज उठा। इस अजीबोगरीब प्रदर्शन ने न केवल मीडिया का ध्यान खींचा, बल्कि सोशल मीडिया पर भी यह संग्राम ट्रेंड करने लगा, जिससे सरकार पर भारी नैतिक दबाव बन गया।
प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी गई चिट्ठी में धर्मेंद्र प्रधान ने लिखा है कि वह छात्रों के आक्रोश और जंतर-मंतर पर बने हालात से बेहद आहत हैं। परीक्षाओं में पारदर्शिता बनाए रखना मेरी सर्वाेच्च प्राथमिकता थी। लेकिन जिस तरह से छात्रों का विश्वास डगमगाया है और जिस तरह के विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं, उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मैं अपने पद से त्यागपत्र दे रहा हूँ। धर्मेंद्र प्रधान के इस अप्रत्याशित कदम के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
विपक्षी दलों ने इसे छात्र शक्ति की जीत करार देते हुए कहा कि केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से बात नहीं बनेगी, बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र को ध्वस्त कर नए सिरे से बनाना होगा। सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने फिलहाल इस चिट्ठी पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। खबर लिखे जाने तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि प्रधानमंत्री ने इस्तीफा स्वीकार किया है या नहीं। फिलहाल, जंतर-मंतर पर छात्रों का जमावड़ा बना हुआ है और सबकी नजरें अब पीएमओ के अगले कदम पर टिकी हैं।
भाइयों-बहनों से अब ‘फ्रेंड्स’
जेन-जी को साधने के लिए पीएम मोदी ने बदला अंदाज
पीएम मोदी की देश के युवाओं को साधने की नई कोशिश
24 घंटे में पीएम का दूसरा वीडियो, युवाओं को कहा थैंक यू
देहरादून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे के भीतर लगातार दूसरा वीडियो संदेश जारी कर एक बार फिर देश के युवाओं, खासकर जेन जी से सीधे संवाद करने की कोशिश की। पहले वीडियो में पेपर लीक और परीक्षा सुधारों पर बात करने के बाद अब उन्होंने दूसरे वीडियो में युवाओं द्वारा दिए गए सुझावों और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पिछले वीडियो पर मिले सकारात्मक सुझावों और समर्थन ने उनके साथ युवाओं के रिश्ते को और मजबूत किया है। यह पहली बार है जब प्रधानमंत्री ने इतने कम समय के अंतराल में एक ही मुद्दे पर लगातार दो वीडियो जारी किए हैं। यह केवल धन्यवाद संदेश नहीं, बल्कि उस युवा वर्ग तक पहुंचने की कोशिश है, जो पिछले कुछ दिनों से पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था को लेकर सबसे अधिक मुखर दिखाई दे रहा है।
अपने वीडियो में प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके पहले वीडियो पर युवाओं ने जिस तरह सकारात्मक सुझाव दिए, उससे उन्हें खुशी हुई। उन्होंने भरोसा जताया कि यह संवाद आगे भी जारी रहेगा और युवाओं का स्नेह तथा विश्वास बना रहेगा। इस बार सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री की भाषा और अंदाज की रही। वर्षों तक मेरे प्यारे देशवासियों, भाइयों और बहनों और मित्रों से शुरुआत करने वाले प्रधानमंत्री ने अब सीधे थैंक यू फ्रेंड्स कहकर युवाओं को संबोधित किया। इसे सोशल मीडिया की भाषा और जेन जी से जुड़ने की एक नई शैली के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री का पहला वीडियो ऐसे समय आया था जब देशभर में पेपर लीक के मुद्दे पर छात्र आंदोलन तेज है। सरकार पहले ही परीक्षा प्रणाली में सुधार, कड़े कानून और फास्ट-ट्रैक अदालतों जैसी घोषणाएं कर चुकी है। दूसरे वीडियो में प्रधानमंत्री ने इन घोषणाओं को दोहराने के बजाय सीधे युवाओं की प्रतिक्रिया को महत्व दिया।
सरकार अब केवल प्रशासनिक फैसलों पर नहीं, बल्कि भावनात्मक संवाद के जरिए भी युवाओं का भरोसा जीतने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री के पहले वीडियो को सोशल मीडिया पर करोड़ों लोगों ने देखा और उसके बाद उनके सोशल मीडिया खातों पर बड़ी संख्या में नए फालोअर्स भी जुड़े। इसके बाद सरकार के भीतर भी डिजिटल माध्यमों पर युवाओं से संवाद बढ़ाने की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि विपक्ष का कहना है कि केवल वीडियो संदेशों से छात्रों की नाराजगी दूर नहीं होगी और सरकार को जवाबदेही तय करनी होगी। दूसरी ओर, सरकार का दावा है कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार और युवाओं के साथ सीधा संवाद ही विश्वास बहाल करने का रास्ता है।
24 घंटे में दो वीडियो यह संकेत देते हैं कि केंद्र सरकार युवाओं के मुद्दों को लेकर संवाद की गति बढ़ाना चाहती है। अब देखना यह होगा कि यह डिजिटल संवाद केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहता है या परीक्षा प्रणाली में दिखने वाले बदलावों के साथ युवाओं का भरोसा भी वापस ला पाता है। फिलहाल इतना तय है कि जेन जी केवल दर्शक नहीं, बल्कि एजेंडा तय करने वाली ताकत बनकर उभर रही है और प्रधानमंत्री का लगातार दूसरा वीडियो इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य का संकेत माना जा रहा है।
पहाड़ के हर घर था अपना ‘बीज बैंक’
बाजार के दौर में भी नहीं बदला पहाड़ की खेती का वह मूलमंत्र
बाजार के हाइब्रिड दौर में भी जिंदा है पारंपरिक बीजों की विरासत
खेतों से लेकर संस्कृति तक बचाए हुए हैं पहाड़ के गांवों की पहचान
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में खेती केवल अन्न उगाने का माध्यम नहीं रही, बल्कि यह संस्क्ृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता की जीवनरेखा रही है। यहां हर गांव में कभी बीजों का अपना खजाना हुआ करता था। एक किसान के पास यदि मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, राजमा, चौलाई, रामदाना, जख्या, तिल, उड़द और स्थानीय धान की किस्में सुरक्षित थीं, तो उसे समृद्ध माना जाता था। आज जब बाजार हाइब्रिड बीजों और रासायनिक खेती की ओर बढ़ चुका है, तब भी पहाड़ के कुछ गांव ऐसे हैं, जहां पारंपरिक बीजों की यह विरासत अब भी सांस ले रही है। यह केवल खेती की कहानी नहीं, बल्कि उस विश्वास की कहानी है कि बीज बचेंगे, तभी पहाड़ बचेगा।
पहाड़ की महिलाएं फसल कटने के बाद सबसे पहले अगले साल के लिए सबसे स्वस्थ और अच्छे दानों को अलग रखती थीं। इन बीजों को राख, नीम की पत्तियों, भांग की पत्तियों या मिट्टी के बर्तनों में सुरक्षित रखा जाता था। न कोई कंपनी, न कोई पैकेट और न ही हर साल बीज खरीदने की मजबूरी। गांवों में बीजों का लेन-देन भी रिश्तों की तरह होता था। यदि किसी किसान का बीज खराब हो जाए तो पड़ोसी बिना किसी कीमत के उसे बीज दे देता था। इसे केवल मदद नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी माना जाता था।
पहाड़ के पारंपरिक बीज केवल फसल नहीं, बल्कि स्थानीय जलवायु के अनुरूप विकसित हुई पीढ़ियों की बुद्धिमत्ता हैं। मंडुवादृ कम पानी में भी अच्छी पैदावार, कैल्शियम और आयरन से भरपूर,झंगोरा सूखे क्षेत्रों का भरोसेमंद अनाज,गहतदृ दाल ही नहीं, पारंपरिक चिकित्सा का भी हिस्सा,भट्टदृ पहाड़ी व्यंजनों की शान और प्रोटीन का बड़ा स्रोत,चौलाई और रामदानादृ पोषण से भरपूर और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाली फसलें,जख्या उत्तराखंड के स्वाद की पहचान। इन बीजों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पहाड़ की कठोर जलवायु में भी टिके रहते हैं और कम संसाधनों में खेती संभव बनाते हैं।
पिछले दो दशकों में कृषि बाजार तेजी से बदला। अधिक उत्पादन के वादे के साथ हाइब्रिड बीज गांवों तक पहुंचे। धीरे-धीरे किसानों ने पारंपरिक किस्मों की जगह बाजार से खरीदे जाने वाले बीजों को अपनाना शुरू किया। इसके कई दुष्परिणाम सामने आएकृहै। इसमें हर साल नया बीज खरीदने की मजबूरी, रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरत, स्थानीय किस्मों का तेजी से लुप्त होना, खेती की लागत में लगातार वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के प्रति फसलों की संवेदनशीलता प्रमुख है। आज कई गांव ऐसे हैं जहां कभी उगने वाली स्थानीय धान या गेहूं की किस्मों के नाम तक नई पीढ़ी नहीं जानती।
विशेषज्ञ मानते हैं कि पारंपरिक बीज जलवायु परिवर्तन के दौर में सबसे अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं। अनियमित बारिश, सूखा और तापमान में बदलाव जैसी परिस्थितियों में स्थानीय बीज अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल रहते हैं। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक अब फिर से स्थानीय बीजों के संरक्षण और उनके वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण पर जोर दे रहे हैं। पहाड़ की ग्रामीण महिलाओं ने इस विरासत को बचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। स्वयं सहायता समूह, महिला मंगल दल और कई स्थानीय संगठन गांव-गांव में बीज संरक्षण अभियान चला रहे हैं।
कुछ स्थानों पर सामुदायिक बीज बैंक बनाए गए हैं, जहां किसान पारंपरिक बीज जमा भी करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर वापस भी लेते हैं। इससे बीजों की विविधता बनी रहती है। पहाड़ में जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ पारंपरिक बीजों की मांग भी बढ़ रही है। महानगरों में मंडुवा, झंगोरा, गहत और भट्ट जैसे उत्पाद अब ष्सुपर फूडष् के रूप में बिक रहे हैं। विडंबना यह है कि जिन अनाजों को कभी गरीब का भोजन कहा जाता था, वही आज स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन ने पारंपरिक खेती को सबसे बड़ा झटका दिया है। खेत खाली हुए तो बीज भी गायब होने लगे। जिन परिवारों ने पीढ़ियों तक बीजों को संभाला, उनके गांव छोड़ने के साथ वह ज्ञान भी धीरे-धीरे समाप्त होता गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। गांव स्तर पर बीज मेलों, स्थानीय बीज बैंक, स्कूलों में कृषि शिक्षा और किसानों को पारंपरिक बीजों के संरक्षण के लिए प्रोत्साहन जैसी पहल जरूरी हैं। यदि आज इन बीजों को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी उत्तराखंड के खेतों में सैकड़ों स्थानीय किस्में उगती थीं। पहाड़ का भविष्य केवल सड़कों, सुरंगों और बड़े निवेश से तय नहीं होगा। वह इस बात से भी तय होगा कि क्या हम अपनी मिट्टी के मूल बीज बचा पाए। पारंपरिक बीज केवल कृषि की धरोहर नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, लोक संस्कृति और आत्मनिर्भरता का आधार हैं। पहाड़ के लिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अगली फसल कौन-सी होगी, बल्कि यह है कि अगली पीढ़ी के पास अपने खेतों के मूल बीज बचेंगे भी या नहीं।
‘अपने’ ही करने लगे ‘अपनों’ का विरोध
पेपर लीक पर एबीवीपी ने फूंका पुतला
दिल्ली के आंदोलन की गूंज अब पहाड़ों में
अपनी ही सरकार के खिलाफ उतरा संगठन
देहरादून। देशभर में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब केवल दिल्ली के जंतर-मंतर या संसद मार्ग तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा। इसकी गूंज अब उत्तराखंड के पहाड़ों तक सुनाई देने लगी है। मसूरी में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का पुतला फूंके जाने की घटना ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या युवाओं का यह असंतोष अब राजनीतिक सीमाओं को भी पार करने लगा है। यदि मसूरी में यह प्रदर्शन वास्तव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया है, तो यह इसलिए चर्चा का विषय बना क्योंकि भारतीय विद्यार्थी परिषद को व्यापक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा छात्र संगठन माना जाता है और उसकी वैचारिक निकटता भाजपा से मानी जाती है। हालांकि, इस घटना को लेकर संबंधित संगठन का आधिकारिक पक्ष और स्थानीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं।
पिछले कुछ सप्ताहों में देशभर के लाखों छात्र और युवा पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में देरी और पारदर्शिता की मांग को लेकर सड़क पर उतरे हैं। जंतर-मंतर से लेकर सोशल मीडिया तक यह आंदोलन लगातार चर्चा में रहा। युवाओं ने इसे केवल एक परीक्षा का सवाल नहीं, बल्कि अपने भविष्य और व्यवस्था पर भरोसे का मुद्दा बताया। अब मसूरी की घटना को उसी व्यापक छात्र असंतोष की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। यह संकेत देता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी चिंताएं केवल विपक्षी राजनीति का विषय नहीं रहीं, बल्कि छात्र समुदाय के भीतर व्यापक चर्चा का हिस्सा बन चुकी हैं।
लंबे समय तक छात्र राजनीति को वैचारिक खांचों में देखा जाता रहा, लेकिन ळमर्द की नई पीढ़ी रोजगार, पारदर्शिता, मेरिट और जवाबदेही जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देती दिखाई दे रही है। यही वजह है कि विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े छात्र भी परीक्षा प्रणाली और भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह आंदोलन किसी एक संगठन या दल का नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का आंदोलन बनता जा रहा है, जो सोशल मीडिया के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ी हुई है।
उत्तराखंड में भाजपा लगातार युवा मतदाताओं को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती रही है। लेकिन यदि पार्टी के वैचारिक दायरे से जुड़े छात्र संगठनों के कार्यकर्ता भी परीक्षा व्यवस्था को लेकर सार्वजनिक विरोध दर्ज कराते हैं, तो यह सरकार के लिए एक राजनीतिक संकेत हो सकता है कि युवाओं के बीच भरोसा बनाए रखना अब पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण होगा। हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी एक स्थानीय प्रदर्शन के आधार पर भाजपा के भीतर व्यापक असहमति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यह देखना होगा कि आने वाले दिनों में पार्टी, सरकार और छात्र संगठन इस मुद्दे पर क्या आधिकारिक रुख अपनाते हैं।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पेपर लीक और पलायन पहले से ही युवाओं के प्रमुख मुद्दे हैं। यदि आंदोलन इसी तरह गति पकड़ता है, तो यह चुनावी विमर्श को भी प्रभावित कर सकता है। विरोध सिर्फ एक प्रतीकात्मक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस बेचौनी का संकेत माना जा सकता है जो देशभर के युवाओं में दिखाई दे रही है। दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी आवाज अब उत्तराखंड के पहाड़ों तक पहुंचती दिख रही है।
यदि सरकार समय रहते परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, समयबद्ध भर्तियां और जवाबदेही सुनिश्चित करने में सफल होती है, तो यह असंतोष शांत हो सकता है। लेकिन यदि युवाओं का भरोसा लगातार कमजोर पड़ता गया, तो जेन जी आंदोलन आने वाले समय में केवल छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श भी बन सकता है।
वायरल काप के ड्रामे का नया ‘चैप्टर’
परचून की दुकान में मिलते हैं पेपर कहने वाला पुलिसकर्मी खुद जांच के घेरे में
जंतर-मंतर पर इस्तीफे का ऐलान करने वाले कांस्टेबल की खुल गई अब पोल
कांस्टेबल पहले बना आंदोलन का चेहरा, फिर कुछ ही घंटे में बन गया आरोपी
देहरादून। पेपर लीक के खिलाफ चल रहे देशव्यापी आंदोलन के बीच जंतर-मंतर पर उत्तराखंड पुलिस के जिस कांस्टेबल ने मंच से अपना बैज उतारकर नौकरी छोड़ने की घोषणा की थी और यह दावा किया था कि उत्तराखंड में परचून की दुकान पर भी पेपर मिल जाते हैं, अब वही पुलिसकर्मी खुद कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ गया है। इस घटनाक्रम ने छात्र आंदोलन, राजनीतिक बहस और कानून-व्यवस्था को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। यह वही पुलिसकर्मी था जिसने जंतर-मंतर के आंदोलन में छात्रों के समर्थन में भावनात्मक भाषण दिया था। उसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और कई लोगों ने इसे व्यवस्था के खिलाफ एक साहसिक कदम बताया। लेकिन अब उसके खिलाफ दर्ज मामले के बाद पूरा घटनाक्रम नए सवाल खड़े कर रहा है।
जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन में कांस्टेबल ने सार्वजनिक रूप से अपना पुलिस बैज उतारते हुए इस्तीफे की घोषणा की थी। उसने आरोप लगाया था कि भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक ने युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया है और उत्तराखंड में स्थिति इतनी खराब है कि परचून की दुकान में भी पेपर मिल जाते हैं। उसका यह बयान कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। छात्र संगठनों और आंदोलनकारियों ने इसे व्यवस्था के भीतर से उठी आवाज बताया। अब, उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू होने के बाद बहस का केंद्र बदल गया है।
प्रशासन का कहना है कि पुलिसकर्मी के खिलाफ सेवा नियमों और अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा रही है। दूसरी ओर, आंदोलन से जुड़े लोग इसे आवाज उठाने वालों पर कार्रवाई के रूप में देख रहे हैं। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी भी आरोप का अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगा। केवल मामला दर्ज होना किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं है। देशभर में चल रहा आंदोलन अब केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं रह गया है। यह आंदोलन पारदर्शिता, जवाबदेही और युवाओं के भविष्य से जुड़े व्यापक सवाल उठा रहा है।
जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ एक वर्दीधारी पुलिसकर्मी का खड़ा होना आंदोलन के लिए एक प्रतीकात्मक क्षण था। वहीं, उसके खिलाफ कार्रवाई ने आंदोलन को एक नया राजनीतिक और कानूनी आयाम दे दिया है। उत्तराखंड पहले ही भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक के मामलों को लेकर राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है। विपक्ष लगातार सरकार पर सवाल उठा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाया जा रहा है। इस बीच, छात्र संगठनों के विरोध प्रदर्शन और हाल में मसूरी में केंद्रीय शिक्षा मंत्री के खिलाफ हुए प्रदर्शन ने भी यह संकेत दिया है कि युवाओं का असंतोष अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया हैकृकि क्या व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाला हर व्यक्ति कानून के दायरे में आएगा, या फिर यदि उसके बयान तथ्यों से परे पाए जाते हैं तो उनके लिए भी जवाबदेही तय होगी? इन दोनों सवालों का जवाब तथ्यों, जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही तय होगा। जंतर-मंतर से उठी एक आवाज ने पूरे देश का ध्यान खींचा था। अब उसी आवाज का कानूनी परीक्षण शुरू हो गया है। यह घटनाक्रम केवल एक पुलिसकर्मी की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर का आईना है जिसमें जेन जी के आंदोलन, पेपर लीक, राजनीतिक जवाबदेही और कानूनकृचारों एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। आने वाले दिनों में जांच के निष्कर्ष और सरकारी कार्रवाई तय करेगी कि यह मामला केवल एक अनुशासनात्मक कार्रवाई बनकर रह जाता है या फिर छात्र आंदोलन की दिशा और राजनीतिकृदोनों पर स्थायी असर छोड़ता है।
शुक्रवार, 24 जुलाई 2026
udaydinmaan: यूकेडी का इतिहास ‘हिट’ वजूद ‘फ्लाप’
udaydinmaan: यूकेडी का इतिहास ‘हिट’ वजूद ‘फ्लाप’: यूकेडी के स्थापना दिवस पर विशेष यह है संघर्ष की विरासत और सियासी हाशिए की अनोखी कहानी 47 साल पहले जिस आंदोलन ने उत्तराखंड राज्य का सपना जगाय...
udaydinmaan: लाठियों के खिलाफ ‘खाकी’ की बगावत
udaydinmaan: लाठियों के खिलाफ ‘खाकी’ की बगावत: जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के बीच उत्तराखंड पुलिसकर्मी का ऐतिहासिक फैसला मंच पर बैज रखकर जवान बोला- मैं युवाओं के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता पुलि...
लाठियों के खिलाफ ‘खाकी’ की बगावत
जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के बीच उत्तराखंड पुलिसकर्मी का ऐतिहासिक फैसला
मंच पर बैज रखकर जवान बोला- मैं युवाओं के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता
पुलिस कर्मी बोला-छात्रों पर लाठी नहीं चला सकता, भावुक संबोधन से गूंजा पंडाल
जंतर-मंतर आंदोलन के मंच से उत्तराखंड पुलिस के जवान ने किया इस्तीफा देने का ऐलान
देहरादून। दिल्ली के जंतर-मंतर में पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के बीच एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने पूरे आंदोलन को भावनात्मक मोड़ दे दिया। उत्तराखंड पुलिस के एक जवान ने मंच पर पहुंचकर अपनी वर्दी का बैज उतार दिया और सार्वजनिक रूप से अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी। जवान ने कहा कि वह उन छात्रों के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता, जो अपने भविष्य और न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। सोशल मीडिया में चल रहे इस वीडियो और उसमें कही बातों की पुष्टि नहीं करते हैं। जैसे ही पुलिसकर्मी ने मंच से अपना बैज उतारा, पूरा पंडाल तालियों और नारों से गूंज उठा। बड़ी संख्या में मौजूद छात्रों ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। कई छात्र भावुक हो गए, जबकि मंच पर मौजूद आंदोलन के नेताओं ने इसे युवाओं के संघर्ष के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक बताया।
मंच से बोलते हुए पुलिस जवान ने कहा कि उसने वर्दी पहनते समय संविधान की रक्षा करने और जनता की सेवा करने की शपथ ली थी। लेकिन जब देश के युवा अपने अधिकारों की मांग कर रहे हों और उनके साथ बल प्रयोग हो, तो उसका अंतर्मन उसे चुप रहने की अनुमति नहीं देता। उन्होंने कहा कि छात्रों पर हुए लाठीचार्ज की तस्वीरों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उनका कहना था कि पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वाले युवाओं की आवाज को दबाना उचित नहीं माना जा सकता।
पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहा। देश के विभिन्न राज्यों से युवा, सामाजिक संगठन और कई जनप्रतिनिधि भी इसमें अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। हाल के दिनों में दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज की घटनाओं ने इस आंदोलन को और अधिक चर्चा में ला दिया है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
उत्तराखंड पुलिस के जवान द्वारा मंच से पुलिस कर्मी के इस्तीफा देने की घोषणा को आंदोलन में मौजूद युवाओं ने विशेष महत्व दिया। छात्रों का कहना था कि यह केवल एक व्यक्ति का निर्णय नहीं, बल्कि उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है जिसे देश का युवा महसूस कर रहा है। जवान ने अपने संबोधन में उत्तराखंड के युवाओं का भी उल्लेख करते हुए कहा कि रोजगार और पारदर्शी भर्ती हर युवा का अधिकार है। उन्होंने अपील की कि सरकार युवाओं की आवाज को विरोध नहीं, बल्कि सुझाव के रूप में सुने।
हालांकि उत्तराखंड पुलिस के जवान के इस सार्वजनिक इस्तीफे ने पूरे मामले को नया राजनीतिक और सामाजिक आयाम दे दिया है। यदि इस्तीफा औपचारिक रूप से संबंधित विभाग को सौंपा गया है, तो विभागीय स्तर पर इसकी प्रक्रिया और जांच भी चर्चा का विषय बन सकती है। जंतर-मंतर के मंच पर बैज उतारकर दिया गया यह इस्तीफा अब केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं रह गया है। आंदोलन में शामिल युवाओं के लिए यह व्यवस्था के भीतर से उठी एक ऐसी आवाज बन गया है, जिसने उनके संघर्ष को नया नैतिक बल देने का काम किया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस आंदोलन और उससे जुड़ी भावनाओं को किस तरह संबोधित करती है। फिलहाल इतना तय है कि जंतर-मंतर के मंच से उतरा वह बैज देशभर में युवाओं के आंदोलन की सबसे चर्चित तस्वीरों में शामिल हो चुका है।
यूकेडी का इतिहास ‘हिट’ वजूद ‘फ्लाप’
यूकेडी के स्थापना दिवस पर विशेष
यह है संघर्ष की विरासत और सियासी हाशिए की अनोखी कहानी
47 साल पहले जिस आंदोलन ने उत्तराखंड राज्य का सपना जगाया
वही उत्तराखंड क्रांति दल आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास लिखते समय यदि किसी एक दल को नजरअंदाज कर दिया जाए तो वह इतिहास अधूरा रहेगा। यह दल है उत्तराखंड क्रांति दल। 24-25 जुलाई 1979 को नैनीताल में स्थापित यूकेडी केवल एक राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि पहाड़ की अस्मिता, पहचान और अलग राज्य की आकांक्षा का राजनीतिक मंच था। आज, स्थापना के लगभग पांच दशक बाद, वही दल अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के संघर्ष में है। विडंबना यह है कि जिस राज्य के निर्माण का श्रेय उसके आंदोलन को जाता है, उसी राज्य की सत्ता की राजनीति में वह हाशिए पर पहुंच चुका है।
सत्तर के दशक के अंत में उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं का गंभीर अभाव था। पहाड़ के लोग लगातार पलायन कर रहे थे और प्रशासनिक उपेक्षा का भाव गहराता जा रहा था। इन्हीं परिस्थितियों में 24-25 जुलाई 1979 को उत्तराखंड क्रांति दल का गठन हुआ। यूकेडी ने पहली बार राजनीतिक रूप से यह स्थापित किया कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान अलग राज्य के बिना संभव नहीं है। उस समय राष्ट्रीय दल इस मांग को गंभीरता से नहीं लेते थे, लेकिन यूकेडी ने गांव-गांव जाकर अलग उत्तराखंड राज्य की चेतना जगाई। यही चेतना आगे चलकर 1994 के जनआंदोलन में बदल गई।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास केवल खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा की घटनाओं का इतिहास नहीं है, बल्कि उन वर्षों की राजनीतिक तैयारी का भी इतिहास है, जिसे यूकेडी ने लगातार आगे बढ़ाया। जब राष्ट्रीय दल अलग राज्य की मांग पर स्पष्ट नहीं थे, तब यूकेडी ने विधानसभा से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे को जीवित रखा। आंदोलन के दौरान हजारों कार्यकर्ता जेल गए, लाठियां खाईं और कई ने अपने प्राणों की आहुति दी। इसलिए उत्तराखंड बनने के बाद यह उम्मीद थी कि राज्य की पहली पसंद यूकेडी होगी। लेकिन राजनीति ने अलग दिशा पकड़ ली।
9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया। यह वह क्षण था जिसके लिए यूकेडी दो दशक से अधिक समय तक संघर्ष करता रहा। लेकिन राज्य बनने के बाद जनता ने सत्ता की कमान राष्ट्रीय दलोंकृभाजपा और कांग्रेसकृके हाथों में सौंप दी। यूकेडी कभी सरकार में सहयोगी बना, कभी विपक्ष में रहा, लेकिन वह कभी राज्य की मुख्य राजनीतिक शक्ति नहीं बन पाया। इसके पीछे कई कारण रहे, इसमें लगातार गुटबाजी और नेतृत्व संघर्ष, संगठन का गांव स्तर पर कमजोर होना, नए नेतृत्व को समय पर आगे न बढ़ा पाना, आंदोलन की राजनीति से शासन की राजनीति में प्रभावी बदलाव न कर पान, भाजपा और कांग्रेस द्वारा क्षेत्रीय मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल कर लेना। यही कारण रहा कि धीरे-धीरे यूकेडी का जनाधार सिकुड़ता गया।
यूकेडी की सबसे बड़ी ताकत उसकी वैचारिक पहचान थीकृपहाड़ पहले। जल, जंगल, जमीन, स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन रोकना, मूल निवास, भू-कानून, मजबूत पंचायत व्यवस्था और पर्यावरण आधारित विकासकृये सभी मुद्दे यूकेडी दशकों पहले उठा चुका था। विडंबना यह रही कि समय के साथ यही मुद्दे भाजपा और कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा बन गए, जबकि यूकेडी इन्हें राजनीतिक लाभ में बदलने में पीछे रह गया। आज भी राज्य में जब भू-कानून, मूल निवास, स्थायी राजधानी, पलायन, चारधाम, वनाधिकार और स्थानीय संसाधनों की बात होती है तो यूकेडी के पुराने दस्तावेज और आंदोलन याद किए जाते हैं। लेकिन चुनाव आते-आते चर्चा भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द सिमट जाती है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का दावा कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश में है। आम आदमी पार्टी, बसपा और अन्य दल भी अपनी जमीन तलाश रहे हैं। ऐसे में यूकेडी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वह सरकार बनाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह फिर से जनता के बीच अपनी प्रासंगिकता स्थापित कर पाएगा? पिछले कुछ वर्षों में पार्टी लगातार अनुशासन, नेतृत्व परिवर्तन और संगठनात्मक विवादों से जूझती रही है। कई वरिष्ठ नेता अलग हुए, कई नए चेहरे आए, लेकिन व्यापक जनाधार वापस नहीं लौट पाया। हालांकि पार्टी आज भी राज्य के उन मुद्दों पर मुखर दिखाई देती है जिन्हें क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़ा जाता है।
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क्षेत्रीय राजनीति की वापसी
उत्तराखंड की राजनीति में एक बड़ा प्रश्न लगातार पूछा जा रहा हैकृक्या राज्य फिर किसी मजबूत क्षेत्रीय विकल्प की तलाश करेगा? इसके पीछे कुछ कारण भी हैंकृकि लगातार बढ़ता पलायन,पर्वतीय जिलों में घटती आबादी, रोजगार का संकट, स्थानीय संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण को लेकर बहस, भू-कानून और मूल निवास की मांग, पहाड़ और मैदान के विकास में असंतुलन। यदि यह मुद्दे चुनाव का केंद्रीय एजेंडा बनते हैं तो यूकेडी के पास राजनीतिक अवसर मौजूद हो सकता है। लेकिन केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं होगी। यूकेडी को मजबूत संगठन, युवा नेतृत्व, स्पष्ट चुनावी रोडमैप और आधुनिक राजनीतिक अभियान की आवश्यकता होगी। सोशल मीडिया से लेकर बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाए बिना वापसी आसान नहीं होगी।
इतिहास का सम्मान, भविष्य की चुनौती
यूकेडी की सबसे बड़ी पूंजी उसका इतिहास है, लेकिन चुनाव इतिहास नहीं, वर्तमान संगठन और भविष्य की विश्वसनीयता से जीते जाते हैं। आज की युवा पीढ़ी उत्तराखंड आंदोलन को किताबों और स्मृति दिवसों के माध्यम से जानती है। उसके लिए रोजगार, स्टार्टअप, डिजिटल अवसर, बेहतर शिक्षा और आधुनिक बुनियादी ढांचा अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि यूकेडी अपने मूल विचारकृस्थानीय हित सर्वाेपरिकृको नई पीढ़ी की आकांक्षाओं से जोड़ पाता है, तो उसके लिए राजनीतिक संभावनाएं बन सकती हैं। लेकिन यदि वह केवल आंदोलन की विरासत पर निर्भर रहा तो उसका दायरा स्मृति समारोहों तक सीमित होने का खतरा रहेगा।
भविष्य गढ़ने की चुनौती
24-25 जुलाई केवल एक राजनीतिक दल का स्थापना दिवस नहीं, बल्कि उस विचार का स्मरण है जिसने उत्तराखंड राज्य की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज जब राज्य अपने गठन के ढाई दशक पूरे करने की ओर बढ़ रहा है, तब यह सवाल पहले से अधिक प्रासंगिक हैकृक्या उत्तराखंड की राजनीति में फिर किसी मजबूत क्षेत्रीय आवाज की जरूरत है, या राष्ट्रीय दल ही राज्य की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते रहेंगे? इस प्रश्न का उत्तर 2027 का चुनाव देगा, लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड की राजनीतिक यात्रा में उत्तराखंड क्रांति दल का इतिहास हमेशा सम्मान के साथ दर्ज रहेगा। अब चुनौती इतिहास लिखने की नहीं, बल्कि भविष्य गढ़ने की है।
‘गोठ’ वीरान और पहाड़ की ‘धड़कन’ खामोश
जब गोठ आबाद थे, तब पहाड़ भी आबाद और पशुओं का वह ठिकाना भी
पहाड़ की अर्थव्यवस्था, संस्कृति व आत्मनिर्भर जीवन का था विश्वविद्यालय
आज गोठों के उजड़ने के साथ सूखती जा रही है पहाड़ की जीवन-धारा भी
दूध की बाल्टियों से झाड़ियों के जंगल,उजड़ते गोठों में कैद पहाड़ की कसक
देहरादून। पहाड़ की पहचान केवल बर्फ से ढकी चोटियों, देवदार के जंगलों और कल-कल बहती नदियों से नहीं थी। उसकी असली पहचान उन गोठों से भी थी, जो गांवों से कुछ दूर ऊंची ढलानों, बुग्यालों और जंगलों के किनारे बने होते थे। मिट्टी, पत्थर और लकड़ी से बने यह छोटे-छोटे आश्रय केवल गाय, बैल, भैंस और बकरियों के रहने की जगह नहीं थे, बल्कि पूरे पहाड़ी जीवन की धड़कन थे। आज जब पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर पड़ रहे हैं और पशुपालन सिमटता जा रहा है, तब सबसे पहले वीरान हुए हैं गोठ। जिन गोठों में कभी घंटियों की मधुर आवाज गूंजती थी, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं। जिन चौखटों पर सुबह-सुबह दूध की बाल्टियां रखी जाती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है। गोठ का उजड़ना केवल एक भवन का उजड़ना नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता का मौन हो जाना है।
राज्य के गढ़वाल और कुमाऊं में गोठ सदियों से ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। गांवों के अधिकांश परिवार खेती और पशुपालन पर निर्भर थे। खेतों की उर्वरता पशुओं के गोबर से आती थी, घर का भोजन दूध, दही, घी और छाछ से समृद्ध होता था और खेती का सबसे बड़ा सहारा बैल हुआ करते थे। इसी व्यवस्था का केंद्र था गोठ। बरसात के मौसम में हरी घास का भंडारण, सर्दियों के लिए चारे की व्यवस्था, पशुओं की देखभाल, बछड़ों का पालन और दूध निकालने से लेकर खाद तैयार करने तक का पूरा चक्र गोठ के इर्द-गिर्द चलता था। पहाड़ की अर्थव्यवस्था बैंक खातों से नहीं, गोठों की समृद्धि से मापी जाती थी। किसी परिवार के पास कितनी गायें हैं, कितने बैल हैं और गोठ कितना बड़ा हैकृयही उसकी आर्थिक स्थिति का पैमाना माना जाता था।
शाम ढलते ही गांव के बुजुर्ग गोठ पहुंच जाते थे। युवा पशुओं को चारा डालते और बच्चे वहीं खेलते-कूदते बड़े होते। यहीं लोकगीत गाए जाते, लोककथाएं सुनाई जातीं और जीवन के अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचते। बुजुर्ग बताते थे कि कौन-सी गाय किस नस्ल की है, किस बैल की चाल सबसे तेज है, किस मौसम में कौन-सी घास काटनी चाहिए और जंगल से कितना लेना है, कितना छोड़ना है। यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाया जाता था। यह पीढ़ियों से गोठ की चौखट पर हस्तांतरित होता था। यदि पहाड़ की रीढ़ महिलाएं थीं, तो उनका सबसे बड़ा कार्यस्थल गोठ था। सुबह अंधेरा रहते ही घास काटने जंगल जाना, सिर पर भारी गठरी लेकर लौटना, पशुओं को चारा देना, दूध निकालना, गोबर साफ करना और खाद तैयार करनाकृयह सब रोजमर्रा की दिनचर्या थी। गोठ महिलाओं के श्रम, धैर्य और त्याग का जीवंत प्रतीक था।
आज मशीनों और डेयरी उत्पादों के दौर में शायद उस मेहनत की कल्पना करना भी कठिन है। आज दुनिया आर्गेनिक फार्मिंग की बात करती है, लेकिन पहाड़ इसे सदियों पहले जी चुका था। गोठ में रहने वाले पशुओं का गोबर खेतों की उर्वरता बढ़ाता था। खेतों से अनाज आता था। अनाज का भूसा फिर पशुओं के चारे में जाता था। जंगल से घास आती थी, लेकिन जंगल को नुकसान पहुंचाए बिना। यह प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन का ऐसा माडल था, जिसे आज टिकाऊ विकास कहा जाता है।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद विकास की उम्मीदें जगीं, लेकिन पलायन थम नहीं सका। रोजगार की तलाश में युवा शहरों की ओर निकल गए। खेती छूटती गई। बैल ट्रैक्टर से हार गए। गायों की जगह बाजार का दूध आने लगा। धीरे-धीरे गोठों के दरवाजे बंद होने लगे। आज हजारों गांव ऐसे हैं, जहां कभी दर्जनों गोठ हुआ करते थे, लेकिन अब उनमें केवल टूटी दीवारें बची हैं। कई जगहों पर वह जंगली जानवरों का ठिकाना बन चुके हैं। जब गोठ खत्म हुए तो केवल पशुपालन नहीं घटा। खत्म हो गयाकृ खेतों का प्राकृतिक खाद चक्र, पारंपरिक बीजों की खेती, स्थानीय दुग्ध अर्थव्यवस्था, सामूहिक श्रम की संस्कृति, लोकगीतों और लोककथाओं का जीवंत मंच और बच्चों का प्रकृति से रिश्ता। यानी गोठ के साथ पूरा ग्रामीण जीवन बदल गया।
आज यदि उत्तराखंड को पलायन रोकना है तो केवल सड़क और भवन बनाना पर्याप्त नहीं होगा। पारंपरिक पशुपालन को आधुनिक तकनीक, डेयरी उद्योग, जैविक खेती और ग्रामीण पर्यटन से जोड़ना होगा। आज होमस्टे की तरह गोठ अनुभव पर्यटन विकसित किया जा सकता है, जहां पर्यटक पहाड़ी जीवन, पशुपालन, जैविक खेती और स्थानीय भोजन का अनुभव करें। पुराने गोठों का संरक्षण कर उन्हें ग्रामीण संस्कृति के संग्रहालय, प्रशिक्षण केंद्र या सामुदायिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
पहाड़ का दर्द केवल खाली होते गांव नहीं हैं। दर्द यह भी है कि अब शाम ढलते ही कहीं दूर से गायों की घंटियां नहीं सुनाई देतीं, बच्चे गोठ की आग के पास बैठकर दादी की कहानियां नहीं सुनते, बुजुर्ग अब पशुओं के नाम लेकर उन्हें पुकारते नहीं,गोठ की टूटी दीवारें आज भी खड़ी हैं, मानो अपने लोगों की राह देख रही हों। वह पूछती हैंकृक्या विकास का अर्थ अपनी जड़ों को पीछे छोड़ देना है? क्योंकि सच तो यह है कि जब तक गोठ जीवित थे, तब तक पहाड़ केवल बसता नहीं था, बल्कि सांस लेता था और यदि पहाड़ को अपनी आत्मा बचानी है, तो उसे गोठों की स्मृतियों को केवल इतिहास नहीं, भविष्य की विकास नीति का हिस्सा भी बनाना होगा।
‘दावे’ बेमिसाल पर कटघरे में ‘कंट्रोल’
यूटीयू पेपर लीक से लेकर बदरी-केदार मंदिरों के चढ़ावे तक
सरकार के दावों पर उठते सवालों को विपक्ष बना रहा हथियार
विकास की पटकथा पर भारी पड़ रहे हैं तीन सुलगते सवाल
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी शंखनाद अभी औपचारिक रूप से नहीं हुआ है, लेकिन मुद्दों की लड़ाई शुरू हो चुकी है। सत्ता पक्ष विकास, निवेश, चारधाम आल वेदर रोड, समान नागरिक संहिता, धार्मिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे की उपलब्धियों के साथ जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल ऐसे मुद्दों की तलाश में हैं, जो सरकार की विश्वसनीयता पर सीधे सवाल खड़े करें। ऐसे में तीन मुद्दे लगातार राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैंकृयूटीयू पेपर लीक का मामला, बदरी-केदार मंदिरों के चढ़ावे को लेकर उठे विवाद और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल। इन तीनों मुद्दों की प्रकृति अलग है, लेकिन विपक्ष इन्हें एक ही राजनीतिक संदेश में पिरोने की कोशिश कर रहा हैकृसरकार बड़े दावे करती है, लेकिन व्यवस्था पर नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है।
उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाला युवा पहले ही सीमित अवसरों से जूझ रहा है। ऐसे में जब परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठते हैं, तो उसका असर केवल अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हजारों परिवारों तक पहुंचता है। यूटीयू पेपर लीक का मामला इसी कारण राजनीतिक महत्व हासिल कर चुका है। विपक्ष का आरोप है कि यदि परीक्षा प्रणाली सुरक्षित नहीं है तो युवाओं का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा? सरकार का पक्ष है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बनाते हुए लगातार पूछ रहा हैकृजब दावे इतने बड़े थे तो लीक हुआ कैसे? यही सवाल अब गांवों तक पहुंच चुका है।
उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे धामों में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाया गया चढ़ावा केवल आर्थिक विषय नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक भी है। चढ़ावे से जुड़े विवादों और अनियमितताओं के आरोपों ने विपक्ष को सरकार को घेरने का नया अवसर दिया है। सरकार ने जांच, कार्रवाई और जवाबदेही की बात कही है। लेकिन विपक्ष इसे यह कहकर जनता के बीच ले जा रहा है कि जब भगवान का चढ़ावा सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा? यह राजनीतिक नारा भले हो, लेकिन चुनावी सभाओं में इसकी गूंज सुनाई देने लगी है।
भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक प्रोपेगेंडा बताते हुए विकास कार्यों को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रही है। पार्टी का दावा है कि पिछले वर्षों में सड़क, स्वास्थ्य, रेल, चारधाम परियोजनाओं, निवेश और धार्मिक पर्यटन में अभूतपूर्व काम हुआ है। भाजपा का मानना है कि जनता चुनाव में आरोप नहीं, विकास देखेगी। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विकास और जवाबदेही दोनों अलग-अलग विषय नहीं हैं। जनता अब यह भी देखना चाहती है कि यदि कोई गड़बड़ी होती है तो सरकार कितनी तेजी और पारदर्शिता से कार्रवाई करती है।
कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर सरकार के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जाए। पेपर लीक, बेरोजगारी, पलायन, मंदिरों के चढ़ावे, महंगाई और प्रशासनिक फैसलों को जोड़कर कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि राज्य में जवाबदेही कमजोर हुई है। हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौती भी कम नहीं है। उसे केवल सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह परीक्षा प्रणाली, धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन और प्रशासनिक पारदर्शिता में क्या बदलाव करेगी।
उत्तराखंड के चुनाव में हमेशा सैनिक, किसान, महिला मतदाता और क्षेत्रीय संतुलन की चर्चा होती रही है। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे लाखों युवा और उनके परिवार चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं। पेपर लीक का मामला केवल परीक्षा का नहीं, बल्कि विश्वास का संकट बन चुका है। यदि युवा यह महसूस करता है कि उसकी मेहनत सुरक्षित नहीं है, तो उसका असर सीधे मतदान पर पड़ सकता है। 2027 का चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं होगा। यह सरकार की प्रशासनिक विश्वसनीयता की भी परीक्षा होगी। क्या सरकार विवादित मामलों में समयबद्ध जांच पूरी कर पाएगी? क्या दोषियों को सजा मिलेगी? क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रुकेगी? यही वह सवाल हैं, जिनका उत्तर जनता चुनाव से पहले जानना चाहेगी।
उत्तराखंड की राजनीति में कभी सड़क मुद्दा बनी, कभी पलायन, कभी गैरसैंण, कभी भू-कानून। अब ऐसा लगता है कि युवाओं का भविष्य और व्यवस्था की विश्वसनीयता भी उसी सूची में शामिल हो चुके हैं। यदि विपक्ष इन मुद्दों को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने में सफल रहता है और सरकार समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं दिखा पाती, तो 2027 के चुनाव में विकास के साथ-साथ पेपर लीक, चढ़ावा और जवाबदेही भी बड़े चुनावी मुद्दे बन सकते हैं। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार केवल अपने काम से नहीं, बल्कि संकट के समय अपनी जवाबदेही से भी आंकी जाती है।
आधी रात पीएम का ‘मास्टरस्ट्रोक’
पेपर लीक को बताया युवाओं के सपनों पर हमला, कैबिनेट के बड़े फैसले का ऐलान
भारी दबाव के बीच पीएम का छात्रों के नाम आधी रात जारी किया विशेष वीडियो संदेश
प्रधानमंत्री मोदी बोले-युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को नहीं बख्शा जाएगा
नई दिल्ली। देशभर में पेपर लीक को लेकर जारी छात्र आंदोलनों, बढ़ते राजनीतिक दबाव और परीक्षा प्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधी रात छात्रों के नाम एक विशेष वीडियो संदेश जारी कर बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक संकेत दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि पेपर लीक केवल एक अपराध नहीं, बल्कि देश के युवाओं के सपनों पर हमला है, इसलिए केंद्र सरकार की कैबिनेट इस मुद्दे पर सख्त और व्यापक फैसला लेने जा रही है। प्रधानमंत्री का यह संदेश ऐसे समय आया है, जब देश के कई हिस्सों में छात्र संगठनों और युवाओं के विरोध प्रदर्शन जारी हैं। विपक्ष लगातार सरकार पर परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित रखने में विफल रहने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार का दावा है कि पेपर लीक माफिया के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है।
वीडियो संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा कि लाखों युवा वर्षों तक कठिन परिश्रम करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। ऐसे में यदि कुछ संगठित गिरोह प्रश्नपत्र लीक कर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि सरकार इस विषय को केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास और देश के भविष्य से जुड़ा विषय मानती है। इसी कारण कैबिनेट स्तर पर व्यापक चर्चा कर कठोर निर्णय लिए जाएंगे। प्रधानमंत्री के बयान के बाद अब राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि केंद्र सरकार परीक्षा सुरक्षा से जुड़े कानूनों, तकनीकी निगरानी, परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही और पेपर लीक मामलों में त्वरित कार्रवाई जैसे मुद्दों पर नए कदम उठा सकती है।
हालांकि सरकार ने अभी प्रस्तावित फैसलों का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन प्रधानमंत्री के बयान ने संकेत दे दिया है कि इस मुद्दे को शीर्ष स्तर पर गंभीरता से लिया जा रहा है। प्रधानमंत्री के आश्वासन के बावजूद कई राज्यों में छात्र संगठनों के प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ऐसा तंत्र चाहिए जिससे भविष्य में किसी भी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक न हो। युवाओं का कहना है कि वर्षों की तैयारी, आर्थिक कठिनाइयों और मानसिक दबाव के बाद यदि परीक्षा रद्द हो जाती है, तो उसकी भरपाई केवल दोबारा परीक्षा कराने से नहीं होती।
प्रधानमंत्री के वीडियो संदेश पर विपक्ष ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई का स्वागत है, लेकिन जनता अब घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस परिणाम देखना चाहती है। विपक्षी दलों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में गंभीर है तो बड़े नेटवर्क का खुलासा, समयबद्ध जांच, दोषियों की शीघ्र सजा और पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। प्रधानमंत्री का आधी रात का वीडियो संदेश केवल प्रशासनिक घोषणा नहीं, बल्कि युवाओं तक सीधे पहुंचने की राजनीतिक कोशिश भी है। हाल के दिनों में रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक को लेकर युवाओं की नाराजगी खुलकर सामने आई है। ऐसे में प्रधानमंत्री का सीधे छात्रों को संबोधित करना इस संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे को चुनावी बहस नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है।
पेपर लीक के खिलाफ कठोर कानून, तेज जांच और सख्त कार्रवाई की बातें पहले भी कई बार कही गई हैं। इस बार अंतर यह है कि युवाओं का धैर्य पहले से कम और अपेक्षाएं पहले से अधिक हैं। प्रधानमंत्री ने भरोसा दिया है। अब निगाहें कैबिनेट के फैसले पर हैं। क्योंकि देश के करोड़ों अभ्यर्थियों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सरकार ने क्या कहा, बल्कि यह है कि सरकार क्या करेगी।
राजनीति का ‘माइक’ ऑन, छात्रों की ‘आवाज’ म्यूट
पेपर लीक पर देशभर में उबाल बरकरार, सरकार ने की सख्त कार्रवाई की बात
विपक्ष सरकार को घेर रहा, सवाल अब भी वही हैकृयुवाओं का भरोसा लौटेगा
सिस्टम का प्रश्नपत्र, युवाओं के सवाल, राजनीति के शोर में दबी वह आवाज
नई दिल्ली। देश के अलग-अलग शहरों में एक जैसा दृश्य दिखाई दे रहा है। कहीं छात्र हाथों में तख्तियां लिए खड़े हैं, कहीं सड़कों पर मार्च निकाल रहे हैं, कहीं धरना दे रहे हैं। वह किसी एक राज्य के छात्र नहीं हैं। उनकी भाषा अलग हो सकती है, लेकिन उनका प्रश्न एक हैकृक्या मेहनत का कोई मूल्य बचा है? पेपर लीक का मामला अब किसी एक भर्ती परीक्षा का विवाद नहीं रह गया है। यह उस पीढ़ी की बेचौनी बन चुका है, जिसने बचपन से यही सुना कि पढ़-लिख लो, जिंदगी बदल जाएगी। अब वही पीढ़ी पूछ रही है कि अगर प्रश्नपत्र पहले ही बिक जाएगा, तो पढ़ाई किसके लिए करें? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक के खिलाफ और सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है। सरकार कह रही है कि माफिया के खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ बताते हुए सरकार पर लगातार हमलावर हैं। लेकिन इस पूरे राजनीतिक शोर के बीच सबसे कम सुनी जा रही आवाज उसी युवा की है, जिसके लिए यह पूरा विवाद खड़ा हुआ है।
पेपर लीक की हर घटना के बाद एक तयशुदा क्रम दिखाई देता है। सरकार जांच की घोषणा करती है। विपक्ष प्रेस कान्फ्रेंस करता है। सोशल मीडिया पर हैशटैग चलने लगते हैं। कुछ गिरफ्तारियां होती हैं। फिर कुछ दिन बाद एक नया मामला सामने आ जाता है। इस बार फर्क सिर्फ इतना है कि युवाओं का धैर्य पहले जैसा नहीं रहा। व केवल बयान नहीं सुनना चाहते। उन्हें परिणाम चाहिए। उनके लिए यह कोई टीवी डिबेट नहीं है। यह उनकी उम्र का सबसे महत्वपूर्ण समय है। एक भर्ती परीक्षा रद्द होने का मतलब सिर्फ नई तारीख नहीं होता। इसका मतलब हैकृएक और साल की तैयारी, एक और साल का खर्च, परिवार पर बढ़ता आर्थिक बोझ और मानसिक तनाव।
सरकार से सवाल है कि यदि पेपर लीक पर पहले भी कानून बने, एजेंसियां सक्रिय हुईं और गिरफ्तारियां हुईं, तो फिर बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों सामने आती हैं? लेकिन विपक्ष से भी सवाल कम महत्वपूर्ण नहीं है। जब वह सत्ता में था, तब क्या परीक्षा प्रणाली पूरी तरह निष्पक्ष थी? क्या आज का आक्रोश केवल सरकार बदलने का मुद्दा है या व्यवस्था बदलने का? युवा शायद इस राजनीतिक हिसाब-किताब में दिलचस्पी नहीं रखता। उसे इससे फर्क नहीं पड़ता कि प्रेस कान्फ्रेंस कौन कर रहा है। उसे फर्क इससे पड़ता है कि अगली परीक्षा समय पर होगी या नहीं।
यह समझना होगा कि आज का प्रदर्शन केवल पेपर लीक के खिलाफ नहीं है। यह रोजगार, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग भी है। देश का बड़ा युवा वर्ग वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है। कई अभ्यर्थी उम्र सीमा के अंतिम पड़ाव पर हैं। कई परिवार अपनी बचत कोचिंग और रहने-खाने पर खर्च कर चुके हैं। जब ऐसी स्थिति में परीक्षा रद्द होती है या पेपर लीक की खबर आती है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं रहती। यह सामाजिक और आर्थिक संकट भी बन जाती है। लोकतंत्र में जनता सरकार से असहमत हो सकती है, लेकिन सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब जनता व्यवस्था पर ही विश्वास खोने लगे। आज कई युवाओं की सबसे बड़ी चिंता यही है। उन्हें लगने लगा है कि मेहनत और मेरिट से ज्यादा ताकत संगठित गिरोहों की हो गई है। यदि यह भावना गहरी होती गई, तो नुकसान केवल एक सरकार का नहीं होगा। नुकसान उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का होगा, जो समान अवसर देने का दावा करती है।
यह भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए कि विरोध का अधिकार लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन हिंसा उसका विकल्प नहीं हो सकती। यदि किसी आंदोलन की आड़ में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है, पुलिस पर हमला होता है या अराजकता फैलाने की कोशिश होती है, तो कानून को निष्पक्ष तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन इसी के साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार न हो। लोकतंत्र में डंडा और संवादकृदोनों का अपना स्थान है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले कौन आता है।
आने वाले चुनावों में बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दे युवाओं के मतदान व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। कभी जाति चुनाव का केंद्र होती थी, कभी धर्म। अब रोजगार और परीक्षा प्रणाली भी उसी सूची में शामिल होते दिखाई दे रहे हैं। सरकार के लिए यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता का भी प्रश्न है। विपक्ष के लिए भी यह अवसर तभी है, जब वह केवल आरोप लगाने के बजाय ठोस वैकल्पिक व्यवस्था का खाका पेश करे।
इस समय देश की सड़कों पर जो भीड़ दिखाई दे रही है, उसे केवल प्रदर्शनकारी भीड़ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उस भीड़ में कोई किसान का बेटा है, कोई रिक्शा चालक की बेटी, कोई पहाड़ के गांव से आया छात्र, कोई छोटे कस्बे का अभ्यर्थी। वह सरकार बदलने नहीं निकले हैं। वह अपना भविष्य बचाने निकले हैं और लोकतंत्र में जब युवा अपने भविष्य की सुरक्षा मांगने के लिए सड़कों पर उतर आए, तब सबसे पहले राजनीतिक दलों को अपनी आवाज धीमी कर देनी चाहिए और युवाओं की आवाज सुननी चाहिए। क्योंकि चुनाव पांच साल में एक बार आते हैं, लेकिन युवाओं की उम्र दोबारा नहीं आती।
गुरुवार, 23 जुलाई 2026
युवाओं के गुस्से से हिला ‘सिस्टम‘
पीएम मोदी ने फेंका फास्ट ट्रैक का पासा, पर क्या रुक पाएगी धांधली?
फास्ट ट्रैक कोर्ट का ऐलान, लेकिन विपक्ष को अब भी दिखता है झोल
पीएम मोदी के पेपर लीक पर बड़े ऐलान के बाद सीएजेपी का पहला रिएक्शन
बोले-दोषियों को सजा मिले, लेकिन युवाओं का भरोसा भी लौटाना है जरूरी
नई दिल्ली। देशभर में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में धांधली और युवाओं के बढ़ते आक्रोश के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि पेपर लीक के दोषियों को जल्द सजा दिलाने के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे। प्रधानमंत्री के इस बयान को सरकार की ओर से युवाओं के गुस्से को शांत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि, प्रधानमंत्री के इस ऐलान के कुछ ही समय बाद कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से पहली राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आ गई। संगठन ने कहा कि केवल फास्ट ट्रैक कोर्ट बना देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। असली चुनौती परीक्षा प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार, जवाबदेही की कमी और दोषियों तक कार्रवाई पहुंचाने की है। पार्टी के नेताओं ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में पेपर लीक की घटनाएं सामने आईं। लाखों युवाओं का भविष्य प्रभावित हुआ, लेकिन अधिकांश मामलों में कार्रवाई लंबी खिंचती रही। ऐसे में यदि फास्ट ट्रैक कोर्ट वास्तव में समयब( सुनवाई कर दोषियों को सजा दिलाते हैं तो इसका स्वागत किया जाएगा।
संगठन का कहना है कि युवा अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि परिणाम चाहते हैं। यदि परीक्षा माफिया और उनके राजनीतिक संरक्षण पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तो नई व्यवस्था भी केवल कागजों तक सीमित रह सकती है। अपने बयान में कहा कि पेपर लीक का सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि इससे युवाओं का पूरे भर्ती तंत्र पर भरोसा कमजोर होता है। संगठन के अनुसार लाखों अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करते हैं, आर्थिक और मानसिक दबाव झेलते हैं, लेकिन एक पेपर लीक पूरे परिश्रम पर पानी फेर देता है। ऐसे में दोषियों को शीघ्र सजा के साथ-साथ प्रभावित अभ्यर्थियों को समयबद्ध न्याय भी मिलना चाहिए।
सीजेपी ने सरकार से मांग की कि फास्ट ट्रैक कोर्ट के साथ-साथ परीक्षा प्रणाली में भी व्यापक सुधार किए जाएं। संगठन ने सुझाव दिया किकृपरीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय हो। डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था मजबूत बनाई जाए। पेपर तैयार करने से लेकर वितरण तक हर चरण की निगरानी हो। परीक्षा माफिया और उनके नेटवर्क की राष्ट्रीय स्तर पर जांच हो। भर्ती परीक्षाओं का निश्चित कैलेंडर बनाया जाए ताकि युवाओं का समय बर्बाद न हो।
प्रधानमंत्री का यह ऐलान ऐसे समय आया है जब देशभर में पेपर लीक का मुद्दा लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में है। विपक्ष लगातार सरकार पर युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार अब सख्त कानूनी कार्रवाई का संदेश देने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर सीजेपी इस मुद्दे को केवल कानून-व्यवस्था नहीं बल्कि युवा अधिकार और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था के सवाल के रूप में पेश कर रही है। संगठन का मानना है कि यदि सरकार इस बार ठोस कार्रवाई करती है तो युवाओं का विश्वास दोबारा बनाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री के ऐलान और सीजेपी की प्रतिक्रिया के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पेपर लीक का मुद्दा अभी राजनीतिक विमर्श से बाहर नहीं होने वाला। संसद से लेकर सड़कों तक इस पर बहस जारी रहने की संभावना है। सरकार अब फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाना चाहती है, जबकि विपक्ष और छात्र संगठन इस बात पर नजर रखेंगे कि घोषणा जमीन पर कितनी तेजी से लागू होती है और क्या वास्तव में दोषियों को समयबद्ध सजा मिलती है।
पेपर लीक अब केवल कानून और व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है। यह देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य, सरकार की विश्वसनीयता और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। फास्ट ट्रैक कोर्ट का ऐलान एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जांच एजेंसियां कितनी निष्पक्षता और तेजी से काम करती हैं, अभियोजन कितना प्रभावी होता है और अदालतों में मामलों का निस्तारण वास्तव में समयबद्ध हो पाता है या नहीं। युवाओं की नजर अब घोषणा पर नहीं, बल्कि उसके परिणाम पर टिकी है।
‘अब हल्या, हल और बैल भी गुम’
रोपाई के मंगल गीतों से गूंजने वाले खेत अब हो गए है बंजर
गांवों में पीछे छूट कई लोक-समृ(ि और पुरखों की विरासत
पलायन और बंजर खेतों ने छीन ली पहाड़ की कृषि संस्कृति
इतिहास के पन्नों में खो रही पहाड़ के गांवों की आत्मनिर्भरता
देहरादून। कभी पहाड़ के गांवों की सुबह बैलों के गले में बंधे खांखरे की मधुर आवाज से होती थी। खेतों में हल चलता था, महिलाएं रोपाई के गीत गाती थीं और गोठ में बंधी गाय-भैंस गांव की समृ(ि का प्रतीक मानी जाती थीं। गांव का वह परिवार सबसे संपन्न माना जाता था, जिसके पास मजबूत बैलों की जोड़ी होती थी। बैल सिर्फ खेती का साधन नहीं, बल्कि गांव की प्रतिष्ठा, आत्मनिर्भरता और मेहनतकश जीवन का प्रतीक थे। आज वही पहाड़ एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां कई गांवों में बैलों की आखिरी जोड़ी भी गांव छोड़ने को मजबूर है।
पिछले ढाई-तीन दशकों में पहाड़ का ग्रामीण जीवन तेजी से बदला है। शिक्षा, रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में युवाओं का पलायन हुआ। गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं रह गईं। खेती श्रम मांगती है, पशुपालन चौबीस घंटे की जिम्मेदारी है। जब खेत जोतने वाले हाथ ही कम पड़ गए तो बैलों की जरूरत भी खत्म होती चली गई। पहले बैल बिके, फिर गाय-भैंसें कम हुईं और अब अधिकांश गांवों के गोठ खाली पड़े हैं।
पहाड़ में खेती छोड़ने का सबसे बड़ा प्रमाण अब खेतों में दिखने लगा है। जिन खेतों में कभी धान, मंडुवा, झंगोरा, गेहूं और राजमा की फसलें लहलहाती थीं, वहां आज झाड़ियां, चीड़ के पौधे और जंगली वनस्पति उग आई है। वर्षों से बिना जोते खेत धीरे-धीरे जंगल में बदल रहे हैं। इसके साथ ही जंगली जानवरों का आतंक भी बढ़ा है। बंदर, जंगली सूअर, साही और अन्य वन्यजीव बची-खुची खेती को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे में खेती करने की इच्छा रखने वाले किसान भी हतोत्साहित हो रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले परिवार अपनी जरूरत का अधिकांश अनाज खुद पैदा करता था। खेती जीवन का आधार थी। अब सरकारी राशन योजनाओं, बाजार तक आसान पहुंच और रोजगार के नए विकल्पों ने ग्रामीण जीवन की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने गरीब परिवारों को राहत जरूर दी, लेकिन कई क्षेत्रों में खेती पर निर्भरता भी कम होती चली गई। अब मेहनत से खेती करने की बजाय बाजार से अनाज खरीदना आसान विकल्प माना जाने लगा है।
पहाड़ के गांवों से बैलों का गायब होना केवल कृषि संकट नहीं है। इसके साथ ही पहाड़ की सदियों पुरानी संस्कृति भी कमजोर हो रही है। हरेला, रोपाई, सामूहिक श्रम, गोठ संस्कृति, जैविक खेती और पारंपरिक बीजों की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। नई पीढ़ी बैलों से जुड़ी उस जीवनशैली को देख ही नहीं पा रही, जो कभी उत्तराखंड की पहचान थी।
आने वाले समय में पहाड़ के अधिकांश गांवों में बैलों की जोड़ी केवल तस्वीरों और लोकगीतों में ही दिखाई देगी। आज भी कुछ गांवों में कोई बुजुर्ग अपनी बैलों की जोड़ी के साथ खेत जोतता दिखाई देता है। वह केवल अपनी जमीन नहीं जोत रहा होता, बल्कि एक पूरी परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश कर रहा होता है। लेकिन सवाल यह है कि उसके बाद क्या होगा? क्या अगली पीढ़ी फिर कभी हल और बैलों के साथ खेत में उतरेगी, या पहाड़ की खेती इतिहास बनकर रह जाएगी?
पहाड़ के गांवों में घटती बैलों की संख्या केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन का संकेत है जिसमें पलायन, बदलती अर्थव्यवस्था, घटती खेती और बंजर होते खेत मिलकर पहाड़ की आत्मा को धीरे-धीरे खोखला कर रहे हैं।
बाक्स
पहाड़ की बदलती तस्वीर
25-30 वर्ष पहले अधिकांश गांवों में बैलों की कई जोड़ियां होती थीं। आज अनेक गांवों में एक भी बैल नहीं बचा। खाली पड़े खेतों में झाड़ियां और जंगल तेजी से फैल रहे हैं। जंगली जानवर खेती छोड़ने की बड़ी वजह बन रहे हैं। गोठ खाली हैं, पशुपालन लगातार घट रहा है। खेती के साथ लोक संस्कृति और सामुदायिक जीवन भी कमजोर पड़ रहा है। जिस दिन पहाड़ के गांवों से आखिरी बैलों की जोड़ी भी खत्म हो जाएगी, उस दिन केवल एक कृषि परंपरा नहीं टूटेगी, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।
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