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शनिवार, 27 जून 2026
चुनावी शंखनाद से पहले ‘अग्निपरीक्षा’
भाजपा की विधायकों के रिपोर्ट कार्ड पर टिकी नजरें
रिपोर्ट कार्ड तय करेगा दिग्गजों का सियासी भविष्य
परफार्मेंस के आधार पर खिसकेगी माननीयों की जमीन
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी बिगुल भले ही आधिकारिक तौर पर न बजा हो, लेकिन भाजपा के भीतर विधायकों की अग्निपरीक्षा शुरू हो चुकी है। रिपोर्ट कार्ड की कसौटी पर कौन खरा उतरता है और किसकी राजनीतिक जमीन खिसकती है, यह आने वाले महीनों में साफ हो जाएगा।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा ने चुनावी तैयारियों की घड़ी अभी से तेज कर दी है। पार्टी संगठन ने मिशन-2027 के तहत सभी 70 विधानसभा सीटों पर कोर कमेटियों का गठन कर दिया है और अब विधायकों के प्रदर्शन का आकलन शुरू हो गया है। पार्टी सूत्रों की मानें तो इस बार टिकट वितरण का आधार केवल वरिष्ठता या राजनीतिक प्रभाव नहीं, बल्कि जनता के बीच विधायक की स्वीकार्यता और उनके कार्यों का रिपोर्ट कार्ड होगा।
भाजपा नेतृत्व विधानसभा क्षेत्रों से लगातार फीडबैक जुटा रहा है। इसमें विधायकों की जनता के बीच सक्रियता, विकास कार्यों की गति, संगठन के साथ तालमेल, स्थानीय मुद्दों के समाधान और सरकार की योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने की क्षमता जैसे कई बिंदुओं को शामिल किया गया है। पार्टी यह भी जानना चाहती है कि किन विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी है और किन सीटों पर नए चेहरे उतारने की आवश्यकता पड़ सकती है।
भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल सत्ता में वापसी का चुनाव नहीं, बल्कि मिशन रिपीट की प्रतिष्ठा का सवाल भी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी विकास, समान नागरिक संहिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को जनता के बीच प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश करना चाहती है। दूसरी ओर कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक और विभिन्न जन मुद्दों को हथियार बनाकर भाजपा को घेरने की रणनीति बना रही है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जिन विधायकों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया जाएगा, उनके टिकट पर संकट खड़ा हो सकता है। पार्टी पिछले कुछ चुनावों में सर्वे और रिपोर्ट कार्ड के आधार पर उम्मीदवार बदलने का प्रयोग कर चुकी है और उत्तराखंड में भी इसी फार्मूले को अपनाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।
विधायकों के रिपोर्ट कार्ड की चर्चा के बाद कई जनप्रतिनिधियों की सक्रियता अचानक बढ़ गई है। कहीं जनसभाएं हो रही हैं तो कहीं विकास योजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण कार्यक्रमों की संख्या बढ़ गई है। क्षेत्रीय स्तर पर जनता की शिकायतों के निस्तारण के प्रयास भी तेज हुए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले महीनों में भाजपा के भीतर टिकट को लेकर प्रतिस्पर्धा और तेज होगी।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी भाजपा के इस आंतरिक मूल्यांकन पर नजर बनाए हुए हैं। उनका मानना है कि यदि भाजपा बड़ी संख्या में टिकट बदलती है तो इसका राजनीतिक असर कई सीटों पर देखने को मिल सकता है। वहीं भाजपा इसे संगठन की मजबूती और जीत की रणनीति का हिस्सा बता रही है।
‘करोंजा’ पहाड़ के जंगलों का ‘काला मोती’
इसकी मिठास में बसी है पहाड़ के बचपन की पूरी एक अनोखी दुनिया
गुमनामी के अंधेरे में खो गया पीढ़ियों को मिठास बांटने वाला करोंजा
आधुनिकता की चकाचौंध में पहाड़ की विरासत जंगलों में पड़ी है लावारिस
देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल उसके मंदिरों, लोकगीतों और पर्व-त्योहारों में ही नहीं बसती, बल्कि उन जंगली फलों में भी जीवित है, जिन्होंने यहां की कई पीढ़ियों के बचपन को स्वाद और यादों से भर दिया। इन्हीं अनमोल प्राकृतिक उपहारों में एक नाम है करोंजा का। छोटा-सा, काले रंग का यह मीठा जंगली फल आज भी उत्तराखंड के जंगलों, खेत-खलिहानों और पहाड़ी ढलानों में कहीं-कहीं दिखाई दे जाता है, लेकिन इसकी पहचान अब धीरे-धीरे नई पीढ़ी की स्मृतियों से मिटती जा रही है।
एक समय था जब गर्मियों के दिनों में गांव के बच्चे सुबह से ही करोंजा के पेड़ों की तलाश में निकल पड़ते थे। स्कूल की छुट्टी होते ही बस्ता घर के किसी कोने में फेंका जाता और फिर दोस्तों की टोली जंगलों और पगडंडियों की ओर दौड़ पड़ती थी। किस पेड़ पर करोंजा सबसे ज्यादा लगा है, किसकी डालियां फलों से झुकी हुई हैं और किस रास्ते पर सबसे मीठे करोंजा मिलेंगे, इसकी जानकारी बच्चों को किसी नक्शे से नहीं, बल्कि अपने अनुभव और दोस्तों से मिलती थी।
कई बार बच्चे घंटों जंगलों में भटकते, पेड़ों पर चढ़ते और अपनी कमीज या जेबों को करोंजा से भर लेते थे। घर लौटने तक आधे फल रास्ते में ही खा लिए जाते और बाकी घर पर भाई-बहनों के साथ बांटकर खाए जाते थे। करोंजा का स्वाद केवल उसकी मिठास में नहीं था, बल्कि उस आनंद में था जो उसे खोजने और दोस्तों के साथ बांटने में मिलता था।
आज की पीढ़ी के लिए चाकलेट, चिप्स और बाजार के रंग-बिरंगे स्नैक्स बचपन का हिस्सा हैं, लेकिन पहाड़ के बच्चों के लिए कभी करोंजा, हिसालू, काफल, किनगोड़ और बेडू ही सबसे बड़े स्वाद थे। इन फलों को खरीदने के लिए पैसे नहीं लगते थे। प्रकृति ही इनकी सबसे बड़ी दुकान थी और जंगल उसका खुला खजाना।
गांवों के बुजुर्ग बताते हैं कि करोंजा खाने का आनंद किसी मेले से कम नहीं होता था। बच्चे सुबह से शाम तक जंगलों में घूमते, पेड़ों की छांव में बैठकर फल खाते और फिर शाम को हंसी-खुशी घर लौट आते थे। यही पहाड़ का असली बचपन था, जो प्रकृति के साथ सांस लेता था।
स्थानीय लोगों के अनुसार करोंजा केवल स्वादिष्ट फल ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। इसमें प्राकृतिक मिठास, विटामिन और कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। पहाड़ के लोग इसे शरीर को ऊर्जा देने वाला फल मानते रहे हैं। जंगलों में बिना किसी रासायनिक खाद या कीटनाशक के उगने वाला यह फल पूरी तरह प्राकृतिक और शु( होता है।
पलायन, बदलती जीवनशैली और जंगलों से बढ़ती दूरी ने करोंजा जैसे जंगली फलों को भी प्रभावित किया है। गांव खाली हो रहे हैं, बच्चों का प्रकृति से रिश्ता कमजोर पड़ रहा है और मोबाइल की दुनिया ने जंगलों की उन पगडंडियों को पीछे छोड़ दिया है, जहां कभी करोंजा की तलाश में बच्चों की टोलियां घूमती थीं। आज स्थिति यह है कि शहरों में रहने वाले कई पहाड़ी परिवारों के बच्चे करोंजा का नाम तक नहीं जानते। वह यह भी नहीं जानते कि उनके माता-पिता और दादा-दादी का बचपन किन जंगली फलों की मिठास से भरा हुआ था।
करोंजा सिर्फ एक जंगली फल नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति से गहरे जुड़ाव का प्रतीक है। यह हमें उस दौर की याद दिलाता है जब पहाड़ के लोग प्रकृति के साथ जीते थे और जंगल उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। आज जरूरत इस बात की है कि करोंजा जैसे जंगली फलों का संरक्षण किया जाए, इनके पौधों को बचाया जाए और नई पीढ़ी को इनके बारे में बताया जाए। स्कूलों और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों को अपनी प्राकृतिक धरोहर से जोड़ने की पहल होनी चाहिए।
क्योंकि जिस दिन पहाड़ के जंगलों से करोंजा की मिठास पूरी तरह खत्म हो जाएगी, उस दिन केवल एक फल नहीं खोएगा, बल्कि पहाड़ के बचपन की हंसी, जंगलों की खुशबू और हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों का एक अनमोल अध्याय भी हमेशा के लिए खो जाएगा। करोंजा की मिठास दरअसल पहाड़ की आत्मा की मिठास है, जिसे बचाए रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
देवभूमि में ‘धर्मयुद्ध’ की आहट
कर्णप्रयाग से पांवटा साहिब तक सुलग रही निहंग विवाद की चिंगारी
निहंगों के अल्टीमेटम, बैकफुट पर सरकार, सौहार्द पर मंडराया संकट
उत्तराखंड में निहंग विवाद बन सकता है प्रदेश सरकार के गले की फांस
दो सूत्रीय मांगों पर सरकार को दिया अल्टीमेटम, देवभूमि में बढ़ी सतर्कता,
प्रदेश सरकार के सामने कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द की चुनौती
देहरादून। कर्णप्रयाग से शुरू हुआ निहंगों का विवाद अब रुद्रप्रयाग होते हुए देहरादून के निकट पांवटा साहिब तक पहुंच गया है। निहंगों के एक समूह द्वारा उत्तराखंड सरकार को दो सूत्रीय मांगों को लेकर दिए गए अल्टीमेटम ने सरकार, प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। देवभूमि में धार्मिक आस्था, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती अब पहले से कहीं अधिक गंभीर हो गई है।
सूत्रों के अनुसार निहंगों ने सरकार के समक्ष दो प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें कथित रूप से गिरफ्तार लोगों की रिहाई और उनके धार्मिक अधिकारों और संबंधित विवादों पर सरकार की ओर से स्पष्ट कार्रवाई की मांग शामिल है। निहंगों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। बता दें कि कुछ दिन पहले कर्णप्रयाग और नगरासू क्षेत्र में निहंगों की गतिविधियों को लेकर स्थानीय स्तर पर तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई थी। इसके बाद प्रशासन को अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करना पड़ा और कई दौर की वार्ताओं के जरिए स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। हालांकि प्रशासन ने दावा किया कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है, लेकिन इसके बाद निहंगों का फिर पांवटा साहिब के आसपास सक्रिय होना यह संकेत दे रहा है कि मामला अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है।
देहरादून से सटे पांवटा साहिब क्षेत्र में निहंगों की मौजूदगी और सरकार को दिए गए अल्टीमेटम ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। सुरक्षा एजेंसियां इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि कहीं यह विवाद किसी बड़े आंदोलन का रूप न ले ले। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार सीमावर्ती क्षेत्रों में पुलिस को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं और खुफिया एजेंसियां भी पूरे मामले पर नजर रख रही हैं।
उत्तराखंड सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि प्रदेश में शांति और सामाजिक सद्भाव से किसी को खिलवाड़ नहीं करने दिया जाएगा। सरकार का रुख साफ है कि धार्मिक आस्था का सम्मान किया जाएगा, लेकिन कानून को हाथ में लेने या दबाव की राजनीति की अनुमति किसी को नहीं दी जाएगी।
नगरासू, कर्णप्रयाग और रुद्रप्रयाग क्षेत्र के स्थानीय लोगों में इस घटनाक्रम को लेकर चिंता का माहौल है। लोगों का कहना है कि देवभूमि की पहचान शांति और भाईचारे से है और किसी भी प्रकार के तनावपूर्ण माहौल का असर सामाजिक सद्भाव और पर्यटन पर पड़ सकता है। स्थानीय व्यापारियों और सामाजिक संगठनों ने सरकार से मामले का जल्द और शांतिपूर्ण समाधान निकालने की मांग की है।
विपक्षी दलों ने भी इस मामले को लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि यदि समय रहते स्थिति को प्रभावी ढंग से संभाला गया होता तो मामला एक जिले से दूसरे जिले तक नहीं पहुंचता। हालांकि विपक्ष ने भी प्रदेश में शांति बनाए रखने और किसी भी प्रकार के टकराव से बचने की अपील की है।
निहंगों के अल्टीमेटम के बाद अब सभी की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। क्या सरकार बातचीत के जरिए समाधान निकालेगी या कानून के दायरे में सख्त कदम उठाएगी, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि कर्णप्रयाग से शुरू हुआ यह विवाद अब केवल एक स्थानीय मसला नहीं रह गया है। यह उत्तराखंड सरकार के लिए कानून-व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द और राजनीतिक प्रबंधन की एक बड़ी परीक्षा बन चुका है।
निहंगों द्वारा उत्तराखंड सरकार को दिए गए अल्टीमेटम के बीच पुलिस-प्रशासन और सरकार लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। प्रशासन का कहना है कि संवाद के जरिए मामले को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझा लिया गया है और प्रदेश में कानून व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में है। निहंगों के अल्टीमेटम के बीच राज्य सरकार की सबसे बड़ी चुनौती कानून व्यवस्था बनाए रखने और धार्मिक सौहार्द को कायम रखने की है। प्रशासन और पुलिस का दावा है कि फिलहाल स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए अलर्ट पर हैं।
कानून से ऊपर कोई नहीं: सीएम धामी
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रदेश में शांति, कानून व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव से किसी को भी खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड देवभूमि है और यहां की शांति और भाईचारा सर्वाेपरि है। सरकार सभी धर्मों और आस्थाओं का सम्मान करती है, लेकिन कानून से ऊपर कोई नहीं है। उन्होंने अधिकारियों को संवेदनशीलता और सतर्कता के साथ स्थिति संभालने तथा किसी भी प्रकार की अफवाहों पर तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
शुक्रवार, 26 जून 2026
उत्तराखंड में नीट पर ‘महासंग्राम’
कांग्रेस के हमलों पर भाजपा का जवाबकृछात्रों के भविष्य से खिलवाड़ मंजूर नहीं
नीट पर छात्रों का नहीं, राजनीति का पेपर दे रही कांग्रेस
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र ने किया कांग्रेस पर पलटवार
युवाओं के भविष्य पर सियासत कर रही है कांग्रेस पार्टी
देहरादून। नीट परीक्षा को लेकर कांग्रेस द्वारा केंद्र सरकार और उत्तराखंड सरकार पर लगाए जा रहे आरोपों के बीच प्रदेश की सियासत गर्मा गई है। भाजपा ने कांग्रेस के हमलों का तीखा जवाब देते हुए विपक्ष पर छात्रों के भविष्य को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप लगाया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि कांग्रेस युवाओं के भविष्य की चिंता नहीं, बल्कि उनके नाम पर घटिया राजनीति कर रही है।
महेंद्र भट्ट ने कहा कि उत्तराखंड के युवा जागरूक, समझदार और विवेकशील हैं। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व पर पूरा भरोसा है। इसलिए दिल्ली से भेजे गए राहुल गांधी के संदेशवाहकों के झूठ, भ्रम और प्रपंच में देवभूमि के छात्र आने वाले नहीं हैं। भट्ट ने कहा कि कांग्रेस हर राष्ट्रीय मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है। नीट जैसे संवेदनशील विषय पर भी विपक्ष तथ्यों के बजाय भ्रम फैलाने में लगा है। उनका आरोप था कि कांग्रेस छात्रों की वास्तविक समस्याओं के समाधान में रुचि लेने के बजाय उन्हें सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रही है।
उन्होंने कहा कि परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए केंद्र सरकार लगातार सुधार कर रही है। यदि कहीं कोई अनियमितता सामने आती है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई भी की जाती है। ऐसे में पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा करना केवल राजनीतिक स्वार्थ को दर्शाता है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकार ने युवाओं के लिए रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और सख्त नकल विरोधी कानून जैसे कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में पेपर लीक के मामलों पर धामी सरकार ने जिस कठोरता से कार्रवाई की, उससे युवाओं का विश्वास मजबूत हुआ है। भट्ट ने कहा कि कांग्रेस आज उन्हीं युवाओं के नाम पर राजनीति कर रही है, जिनके हितों की अनदेखी उसने अपने शासनकाल में की थी।
शह और मात का ‘एडवांस गेम’
70 सीटों पर भाजपा ने तैयार की अपनी कोर कमेटियां
भगवा बिसात पर चाल चलने को मजबूर होगा विपक्ष
मिशन-2027 के लिए कोर कमेटियों का चुनावी चक्रव्यूह
70 विधानसभा सीटों पर अलग-अलग टीमों की गई तैनाती
बूथ से लेकर टिकट तक की नब्ज टटोलेगा भाजपा संगठन
देहरादून। भाजपा ने चुनावी घंटी बजने का इंतजार नहीं किया, बल्कि हर विधानसभा में अपनी चुनावी चौकी बिठा दी है। अब सवाल यह है कि विपक्ष अभी रणनीति बनाएगा या भाजपा की बिसात पर चाल चलने को मजबूर होगा? उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अभी दूर दिखाई देती है, लेकिन भाजपा ने चुनावी शतरंज की बिसात अभी से बिछा दी है। प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों के लिए अलग-अलग कोर कमेटियों का गठन कर भाजपा ने साफ संकेत दे दिया है कि इस बार चुनाव केवल प्रचार से नहीं, बल्कि सूक्ष्म संगठनात्मक प्रबंधन के दम पर लड़ा जाएगा।
प्रदेश संगठन का यह कदम सामान्य राजनीतिक गतिविधि नहीं माना जा रहा। इसके पीछे बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना, स्थानीय असंतोष की पहचान करना, संभावित प्रत्याशियों की ताकत और कमजोरी का आकलन करना तथा सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना प्रमुख उद्देश्य माना जा रहा है।
भाजपा की नई रणनीति के तहत प्रत्येक विधानसभा सीट पर गठित कोर कमेटी सीधे प्रदेश नेतृत्व को फीडबैक देगी। इसमें क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियां, जातीय एवं सामाजिक समीकरण, स्थानीय मुद्दे, विकास कार्यों की स्थिति, विपक्ष की सक्रियता और कार्यकर्ताओं की नाराजगी जैसे विषय शामिल रहेंगे। इसका अर्थ साफ है कि पार्टी अब चुनावी निर्णय केवल देहरादून में बैठकर नहीं बल्कि प्रत्येक विधानसभा से मिलने वाले वास्तविक फीडबैक के आधार पर करेगी।
सबसे अधिक फोकस उन सीटों पर किया जा रहा है जहां 2022 के चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इन सीटों पर सांसद, वरिष्ठ नेता और संगठन पदाधिकारियों को विशेष जिम्मेदारी दी गई है ताकि कमजोर बूथों की पहचान कर उन्हें मजबूत किया जा सके। साथ ही उन क्षेत्रों में लगातार जनसंपर्क अभियान चलाने की भी योजना है जहां पार्टी का वोट प्रतिशत कम रहा था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस बार टिकट वितरण से पहले ही संभावित दावेदारों के प्रदर्शन की निगरानी शुरू कर चुकी है। कोर कमेटियां यह भी देखेंगी कि कौन नेता जनता के बीच सक्रिय है, किसकी स्वीकार्यता अधिक है और किसके खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी है। ऐसे में टिकट की दौड़ अब केवल नेताओं की राजनीतिक पहुंच से नहीं बल्कि उनके जमीनी प्रदर्शन से भी तय होती दिखाई दे सकती है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी माहौल को नियंत्रित करना होगी। लगातार दो कार्यकाल सरकार चलाने के बाद स्वाभाविक रूप से जनता की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में कोर कमेटियां केवल चुनावी मशीनरी नहीं बल्कि सरकार और जनता के बीच संवाद का माध्यम भी बनेंगी।
दूसरी ओर कांग्रेस अभी संगठनात्मक पुनर्गठन और नेतृत्व की मजबूती में जुटी दिखाई दे रही है। प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का प्रयास कर रही है, लेकिन भाजपा जिस गति से विधानसभा स्तर तक संगठनात्मक ढांचा मजबूत कर रही है, उससे राजनीतिक मुकाबला और रोचक होने की संभावना है।
राजनीतिक दृदृष्टि से देखा जाए तो भाजपा का यह कदम केवल संगठन विस्तार नहीं बल्कि चुनावी माइक्रो मैनेजमेंट का माडल है। बूथ से लेकर विधानसभा और विधानसभा से लेकर प्रदेश नेतृत्व तक एक मजबूत फीडबैक सिस्टम तैयार कर पार्टी चुनावी जोखिम को पहले ही कम करना चाहती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा की यह संगठनात्मक तैयारी 2027 में चुनावी बढ़त दिलाती है या कांग्रेस और अन्य दल स्थानीय मुद्दों के सहारे इस रणनीति को चुनौती देने में सफल होते हैं। लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड का चुनावी रण अब समय से पहले ही गर्म होना शुरू हो चुका है।
बैरिकेड फेल, संवाद पास
दो घंटे तक दून पुलिस को छकाते रहे निहंग
रेसकोर्स गुरुद्वारे में खत्म हुआ हाईवोल्टेज ड्रामा
बैरियर तोड़कर किया देहरादून जिले में प्रवेश
गुरुद्वारे में वार्ता के बाद पांवटा साहिब लौटे जत्थे
देहरादून। सवाल केवल यह नहीं कि निहंग शहर में कैसे पहुंचे, सवाल यह भी है कि यदि उनका इरादा टकराव का होता तो क्या पुलिस उन्हें समय रहते रोक पाती? राहत की बात यह रही कि संवाद ने वह काम कर दिया, जो सायरन और बैरिकेड नहीं कर सके। बता दें कि देहरादून उस समय हाई अलर्ट पर आ गया, जब निहंग सिखों का एक जत्था पुलिस की निगरानी को धता बताते हुए शहर की सीमा में प्रवेश कर गया। पुलिस और प्रशासन की कई टीमें करीब दो घंटे तक उनकी तलाश में शहरभर में दौड़ती रहीं। आखिरकार यह जत्था रेसकोर्स स्थित गुरुद्वारे में मिला, जहां प्रशासन और सिख समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के साथ लंबी वार्ता के बाद मामला शांत हुआ और निहंग पांवटा साहिब लौटने पर सहमत हो गए।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है, जब नगरासू क्षेत्र में पहले से ही तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है। ऐसे में देहरादून में निहंगों के प्रवेश ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी थी। किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए पुलिस ने शहर के प्रमुख मार्गों, धार्मिक स्थलों और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त बल तैनात कर दिया।
सूत्रों के अनुसार पुलिस को पहले से सूचना थी कि निहंगों का जत्था देहरादून की ओर बढ़ रहा है। उन्हें सीमा पर रोकने की तैयारी भी की गई थी, लेकिन जत्था वैकल्पिक मार्गों का उपयोग करते हुए शहर में प्रवेश करने में सफल रहा। इसके बाद पुलिस को लगातार उनकी लोकेशन बदलने की सूचनाएं मिलती रहीं, जिससे पूरा पुलिस तंत्र सक्रिय हो गया। करीब दो घंटे तक पुलिस और खुफिया एजेंसियां उनकी तलाश में जुटी रहीं। इस दौरान शहर में कई स्थानों पर चेकिंग अभियान भी चलाया गया।
आखिरकार सूचना मिली कि निहंग रेसकोर्स स्थित गुरुद्वारे में मौजूद हैं। इसके बाद वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और सिख समाज के प्रमुख लोग मौके पर पहुंचे। गुरुद्वारे के भीतर वार्ता का दौर शुरू हुआ। सूत्र बताते हैं कि प्रशासन ने कानून-व्यवस्था की स्थिति और संभावित तनाव को देखते हुए निहंगों से शांति बनाए रखने की अपील की। सिख समाज के प्रतिनिधियों ने भी संयम बरतने और प्रशासन का सहयोग करने की सलाह दी।
करीब एक घंटे चली बातचीत के बाद निहंग पांवटा साहिब लौटने पर सहमत हो गए। इसके बाद पुलिस की निगरानी में उनका जत्था देहरादून से रवाना हुआ। प्रशासन ने राहत की सांस ली क्योंकि पूरे घटनाक्रम के दौरान कहीं भी हिंसा या टकराव की स्थिति नहीं बनी।
बता दें कि पिछले कुछ दिनों से नगरासू क्षेत्र की घटनाओं के चलते प्रदेश में संवेदनशील माहौल बना हुआ है। इसी वजह से प्रशासन किसी भी नए घटनाक्रम को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि धार्मिक और सामाजिक मामलों में छोटी सी चूक भी बड़े तनाव का कारण बन सकती है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को अत्यंत संयम के साथ संभाला गया।
हालांकि मामला शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त हो गया, लेकिन इस घटनाक्रम ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। यदि पुलिस को पहले से जत्थे के आने की सूचना थी, तो वह शहर में प्रवेश कैसे कर गए? करीब दो घंटे तक पुलिस उनकी सही लोकेशन क्यों नहीं तलाश पाई? क्या खुफिया तंत्र और फील्ड पुलिस के बीच समन्वय में कमी रही? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी चर्चा का विषय बन सकते हैं।
बाक्स
राजनीतिक मुद्दा बना
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले कानून-व्यवस्था से जुड़ा हर घटनाक्रम सरकार और विपक्ष दोनों के लिए राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। विपक्ष इसे सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी के रूप में उठाने का प्रयास कर सकता है, जबकि सरकार शांतिपूर्ण समाधान और प्रशासनिक संयम को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है।
पहाड़ पर मानसून का पहला ‘प्रहार’
चमोली जिले के नारायणबगड़ में मलबे का तांडव, हाईवे पर लगी वाहनों की लंबी कतारें
अतिवृष्टि ने मचाई तबाही, दुकानों और इंटर कालेज में घुसा मलबा, बदरीनाथ हाईवे बाधित, लोग दहशत में
बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर मलबा आने से यातायात बाधित, प्रशासन, एनएच और आपदा प्रबंधन की टीमें राहत कार्य में जुटीं
देहरादून/चमोली। मानसून की पहली तेज बारिश ने पहाड़ की नाजुक भौगोलिक स्थिति की एक बार फिर पोल खोल दी। चमोली जिले के नारायणबगड़ क्षेत्र में हुई अतिवृष्टि ने कुछ ही घंटों में जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। पहाड़ों से भारी मात्रा में मलबा और बोल्डर बहकर बाजार, दुकानों और राजकीय इंटर कालेज परिसर में जा घुसे। बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी मलबा आने से यातायात बाधित हो गया, जिससे दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।
रातभर हुई मूसलाधार बारिश के बाद सुबह लोगों ने जब घरों और दुकानों के दरवाजे खोले तो सामने तबाही का मंजर था। कई दुकानों में घुटनों तक मलबा भर चुका था। व्यापारियों का सामान कीचड़ और पत्थरों के नीचे दब गया। राजकीय इंटर कालेज के परिसर और कमरों में भी मलबा घुसने से शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हुई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बारिश इतनी तेज थी कि कुछ ही मिनटों में पहाड़ों से उफनता पानी और मलबा नीचे बाजार की ओर बह निकला। देखते ही देखते सड़कें नालों में बदल गईं और पानी अपने साथ पत्थर, पेड़ और मिट्टी लेकर बाजार में घुस गया।
स्थानीय लोगों ने किसी तरह दुकानों और घरों से बाहर निकलकर सुरक्षित स्थानों पर शरण ली। कई परिवारों ने पूरी रात भय के साये में गुजारी। अतिवृष्टि का सबसे बड़ा असर बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर दिखाई दिया। कई स्थानों पर मलबा और बोल्डर आने से यातायात पूरी तरह बाधित हो गया। प्रशासन ने सुरक्षा की दृदृष्टि से वाहनों को रोक दिया और सड़क खोलने के लिए मशीनें लगाई गईं। चारधाम यात्रा पर निकले श्र(ालुओं को भी घंटों इंतजार करना पड़ा। हालांकि राहत एवं बचाव दल ने सड़क से मलबा हटाने का काम यु(स्तर पर शुरू कर दिया।
नारायणबगड़ के राजकीय इंटर कालेज परिसर में मलबा भर जाने से विद्यालय को भारी नुकसान पहुंचा है। परिसर, खेल मैदान और कुछ कक्षाओं में मिट्टी और पत्थर जमा हो गए। स्कूल प्रशासन ने पहले सफाई कार्य पूरा होने तक पठन-पाठन प्रभावित रहने की आशंका जताई है। घटना की सूचना मिलते ही जिला प्रशासन, पुलिस, लोक निर्माण विभाग, एनएच और आपदा प्रबंधन की टीमें मौके पर पहुंच गईं। जेसीबी मशीनों की मदद से सड़कें खोलने और बाजार से मलबा हटाने का कार्य शुरू किया गया।
प्रशासन ने लोगों से नदी-नालों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों से दूर रहने की अपील की है। मौसम विभाग द्वारा आगामी दिनों में भी भारी बारिश की संभावना जताए जाने के बाद प्रशासन ने सतर्कता बढ़ा दी है।
उत्तराखंड में मानसून आते ही पहाड़ों का दर्द फिर सामने आ जाता है। कहीं सड़कें टूटती हैं, कहीं पुल बह जाते हैं और कहीं बाजार मलबे में दब जाते हैं। नारायणबगड़ की घटना केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि पहाड़ों में आपदा प्रबंधन और पूर्व तैयारी की वास्तविक परीक्षा भी है। सवाल यह है कि क्या हर मानसून के बाद केवल मलबा हटाना ही समाधान है, या अब स्थायी उपायों पर गंभीरता से काम करने का समय आ गया है?
हिसूल: महंगी चाकलेट पर भारी पहाड़ का ‘खजाना’
गर्मियों की छुट्टियों में फिर याद आया हिसूल वाला बचपन
पहाड़ की मिट्टी में उगा वह स्वाद, जो अब यादों में सिमटा
गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों की जेब का खजाना था हिसूल
आज जंगलों में सिमटती जा रही है यह प्राकृतिक सौगात
देहरादून। एक समय था जब गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही गांव के बच्चे सुबह-सुबह टोकरियां और छोटे डिब्बे लेकर जंगलों की ओर निकल पड़ते थे। न किसी माल की जरूरत होती थी, न किसी महंगे चाकलेट की। जंगलों में लगे हिसूल के पौधे ही बच्चों के लिए सबसे बड़ा खजाना हुआ करते थे। लाल, बैंगनी और काले रंग के छोटे-छोटे फलों से लदे पौधे बच्चों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर देते थे। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल बर्फ से ढके शिखर, नदियां और देवस्थल ही नहीं हैं, बल्कि यहां के जंगलों में उगने वाले जंगली फल और वनस्पतियां भी हैं, जिन्होंने पीढ़ियों के बचपन और जीवन को मिठास से भर दिया। इन्हीं में से एक है हिसूल जो गर्मियों के मौसम में जंगलों और पहाड़ी ढलानों पर उगने वाला एक पौष्टिक और स्वादिष्ट जंगली फल है।
हिसूल केवल स्वाद का खजाना नहीं है, बल्कि यह पोषण से भी भरपूर है। स्थानीय लोग मानते हैं कि इसमें विटामिन, एंटीआक्सीडेंट और शरीर को ऊर्जा देने वाले तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि जंगल में काम करने वाले लोग थकान मिटाने और शरीर को तरोताजा रखने के लिए हिसूल खाते थे। गर्मियों की चिलचिलाती धूप में जब पहाड़ के प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगते हैं, तब हिसूल जैसे जंगली फल प्रकृति की ओर से ऊर्जा का स्रोत बन जाते हैं। यही कारण है कि इसे पहाड़ के पारंपरिक खान-पान और जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता रहा है।
समय बदला, गांव खाली होने लगे और जंगलों तक जाने वाले रास्ते भी सुनसान पड़ गए। नई पीढ़ी मोबाइल और बाजार की पैकिंग वाली चीजों में उलझ गई। आज कई बच्चे हिसूल का नाम तक नहीं जानते। आज जंगलों में बढ़ती आग, जलवायु परिवर्तन और पारंपरिक वनस्पतियों के संरक्षण के प्रति घटती रुचि के कारण हिसूल जैसे कई जंगली फल धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रहे हैं। गांव के बुजुर्ग आज भी उस दौर को याद करते हैं, जब बच्चों के कपड़े हिसूल के रस से रंग जाते थे और घर लौटने पर मां की डांट भी पड़ती थी। लेकिन उस डांट में भी अपनापन था, क्योंकि वह प्रकृति से जुड़ा बचपन था।
हिसूल केवल एक जंगली फल नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, स्मृतियों और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि असली समृ(ि जंगलों की उस जैव विविधता में छिपी है, जिसे हम धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। जिस पहाड़ में कभी बच्चे हिसूल तोड़ते हुए बड़े होते थे, वहां अब जंगलों की जगह कंक्रीट और बचपन की जगह मोबाइल ने ले ली है। अगर हिसूल और ऐसी वन संपदाओं को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि पहाड़ के जंगलों में कभी मिठास भी उगती थी।
राजनीति से ऊपर प्रदेश का अमन-चौन
निहंग विवाद पर सियासी घमासान के बीच भाजपा ने दिया कड़ा संदेश
निहंग विवाद पर भाजपा ने दिया सख्त संदेश
चुनाव और राजनीति से ऊपर सूबे का भाईचारा
माहौल बिगाड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई की मांग
देहरादून। उत्तराखंड में निहंग विवाद को लेकर सियासी बयानबाजी के बीच भाजपा ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ संदेश दिया है कि देवभूमि की शांति, सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द के साथ किसी भी कीमत पर खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा। पार्टी ने कहा कि भाजपा के लिए चुनावी राजनीति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रदेश का आपसी भाईचारा, अमन-चौन और सामाजिक सद्भाव है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड की पहचान सदियों से धार्मिक सहिष्णुता, सांस्कृतिक विविधता और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की रही है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति या संगठन यदि प्रदेश का माहौल खराब करने की कोशिश करेगा तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। भाजपा ने कहा कि कुछ लोग संवेदनशील घटनाओं को राजनीतिक रंग देकर समाज में भ्रम और तनाव पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं। पार्टी का मानना है कि ऐसे मामलों में सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए और कानून को अपना काम करने देना चाहिए।
पार्टी ने दोहराया कि भाजपा की प्राथमिकता कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना और प्रदेश में शांति का वातावरण कायम रखना है। किसी भी समुदाय विशेष के खिलाफ माहौल बनाने या सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि चारधाम यात्रा, पर्यटन और धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में उत्तराखंड की पहचान पूरे देश और दुनिया में है। यदि प्रदेश में तनाव या अस्थिरता का माहौल बनता है तो इसका असर केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्यटन, निवेश और राज्य की छवि पर भी पड़ेगा। इसी कारण सरकार और संगठन दोनों की जिम्मेदारी है कि किसी भी संवेदनशील घटना को समय रहते नियंत्रित किया जाए और शांति व्यवस्था बनाए रखी जाए।
भाजपा ने विपक्ष पर अप्रत्यक्ष हमला बोलते हुए कहा कि कुछ राजनीतिक दल हर संवेदनशील मुद्दे में राजनीतिक लाभ तलाशने की कोशिश करते हैं। ऐसे समय में जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका समाज को जोड़ने की होनी चाहिए, न कि लोगों को बांटने की। पार्टी का कहना है कि उत्तराखंड की जनता समझदार है और वह सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाली राजनीति को स्वीकार नहीं करेगी। भाजपा ने स्पष्ट किया कि कानून सभी के लिए समान है। यदि किसी ने कानून हाथ में लिया है या शांति व्यवस्था भंग करने का प्रयास किया है तो उसके खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई होनी चाहिए। पार्टी ने प्रशासन द्वारा संयम और सतर्कता के साथ स्थिति संभालने की भी सराहना की।
भाजपा का ‘ब्रह्मास्त्र’ बनेगा कार्यकर्ता
सत्ता विरोधी माहौल की आशंकाओं के बीच बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने की कवायद तेज
गांव-गांव में सक्रिय किए जा रहे भाजपा के जमीन से जुड़े पुराने सभी कार्यकर्ता
संगठन के दरवाजे पर इंतजार करने वाले कार्यकर्ता बनेंगे चुनावी वैतरणी पार कराने वाले
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट ने भाजपा के भीतर संगठनात्मक समीकरण बदलने शुरू कर दिए हैं। सत्ता के गलियारों में प्रभावशाली नेताओं, मंत्रियों और पदाधिकारियों के बीच खड़ा वह साधारण कार्यकर्ता, जो पिछले कुछ वर्षों में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा था, अचानक भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण चेहरा बन गया है। पार्टी नेतृत्व अब गांव-गांव और घर-घर तक पहुंच रखने वाले कार्यकर्ताओं को चुनावी रणनीति का केंद्र बना रहा है।
भाजपा अच्छी तरह समझती है कि चुनावी जीत केवल सरकारी योजनाओं, बड़े नेताओं की सभाओं और सोशल मीडिया अभियानों से सुनिश्चित नहीं होती। बूथ पर बैठा कार्यकर्ता ही वह कड़ी है जो मतदाता और पार्टी के बीच सीधा संवाद स्थापित करता है। यही कारण है कि संगठन अब बूथ समितियों को सक्रिय करने, पन्ना प्रमुखों को मजबूत करने और पुराने कार्यकर्ताओं को फिर से मैदान में उतारने की कवायद में जुट गया है।
दरअसल, सत्ता के दस वर्षों के दौरान पार्टी के भीतर एक धारणा बनी कि कुछ चुनिंदा नेताओं और पदाधिकारियों तक ही संगठन सीमित हो गया है। कई पुराने कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक और निजी तौर पर यह शिकायत भी की कि उन्हें न तो संगठन में पर्याप्त महत्व मिला और न ही सरकार में उनकी सुनवाई हुई। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, पार्टी को एहसास हो रहा है कि चुनावी जंग एयरकंडीशंड कमरों में नहीं, बल्कि गांव की चौपालों, कस्बों की गलियों और बूथों पर लड़ी जाती है।
भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने हाल के दिनों में लगातार संगठनात्मक बैठकों का सिलसिला तेज किया है। मंत्रियों, विधायकों और जिलाध्यक्षों को स्पष्ट संदेश दिया जा रहा है कि बूथ स्तर तक संवाद बढ़ाया जाए। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि विपक्ष के आरोपों, स्थानीय नाराजगियों और सरकार विरोधी माहौल को निष्प्रभावी करने का काम केवल वही कार्यकर्ता कर सकता है जो रोज जनता के बीच रहता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका कैडर आधारित ढांचा रहा है। 2017 और 2022 के चुनावों में भी बूथ प्रबंधन ने पार्टी को बड़ी सफलता दिलाई थी। लेकिन इस बार चुनौती अलग है। एक ओर सत्ता विरोधी भावनाओं को नियंत्रित करना है तो दूसरी ओर संगठन के भीतर नाराज कार्यकर्ताओं को भी साथ लेकर चलना है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व छोटे कार्यकर्ता को फिर से केंद्र में लाने की कोशिश कर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि जिन कार्यकर्ताओं को कभी नेताओं के कार्यक्रमों में भीड़ जुटाने तक सीमित समझा जाता था, आज वही कार्यकर्ता चुनावी गणित के सबसे अहम सूत्रधार बन गए हैं। गांवों में होने वाली बैठकों से लेकर सोशल मीडिया के स्थानीय नेटवर्क तक, हर जगह कार्यकर्ता की भूमिका बढ़ी है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी भाजपा की इस रणनीति पर नजर बनाए हुए हैं। विपक्ष का दावा है कि चुनाव आते ही भाजपा को कार्यकर्ताओं की याद आ जाती है, जबकि सत्ता के दौरान उनकी उपेक्षा की जाती है। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि संगठन की असली ताकत हमेशा कार्यकर्ता ही रहा है और रहेगा।
फिलहाल इतना तय है कि 2027 की चुनावी रणभेरी बजने से पहले भाजपा में सबसे अधिक पूछ-परख किसी मंत्री, विधायक या पदाधिकारी की नहीं, बल्कि उस कार्यकर्ता की हो रही है जो हर चुनाव में पार्टी का झंडा लेकर सबसे आगे खड़ा दिखाई देता है। सत्ता की राजनीति में भले चेहरे बदलते रहें, लेकिन चुनाव आते ही भाजपा को फिर याद आ जाता है कि उसकी असली ताकत बूथ का कार्यकर्ता ही है। आज की स्थिति में कहा जाए तो भाजपा में छोटा कार्यकर्ता ही सबसे बड़ा भगवान बन गया है।
जनता ‘बेफिक्र’ और नेता हुए तैयार
समय से पहले चुनावी मोड में आ गए दल
भाजपा बूथों को मजबूत करने में जुट गई
कांग्रेस संगठन खड़ा करने की कवायद में
क्षेत्रीय दल तलाश रहे अपने लिए नई जमीन
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय भले शेष हो, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी बिगुल समय से पहले बजता दिखाई देने लगा है। सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक सभी राजनीतिक दल मिशन मोड में आ गए हैं। गांवों, कस्बों और शहरों में संगठनात्मक गतिविधियां तेज हो गई हैं। राजनीतिक दलों को पता है कि पहाड़ की राजनीति में चुनावी फसल एक दिन में नहीं उगती, उसके लिए वर्षों पहले बीज बोने पड़ते हैं।
सत्तारूढ़ भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतिहास रचने का सपना देख रही है। इसके लिए पार्टी ने बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों से लेकर सांसदों, विधायकों और मंत्रियों के क्षेत्रीय दौरों की संख्या बढ़ गई है। सरकार की योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। भाजपा की कोशिश है कि सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दे में बदला जाए और सत्ता विरोधी लहर की संभावनाओं को शुरुआत में ही नियंत्रित कर लिया जाए।
वहीं कांग्रेस भी लंबे समय बाद सत्ता में वापसी का अवसर तलाश रही है। पार्टी नेतृत्व संगठन को मजबूत करने और गुटबाजी को नियंत्रित करने की चुनौती से जूझ रहा है। प्रदेश कांग्रेस की बैठकों में लगातार इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय किया जाए और भाजपा सरकार के खिलाफ जनमुद्दों को धार दी जाए। बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य सेवाएं और भर्ती घोटाले कांग्रेस के प्रमुख राजनीतिक हथियार बनते दिखाई दे रहे हैं।
क्षेत्रीय दल भी चुनावी समीकरणों में अपनी भूमिका तलाश रहे हैं। उत्तराखंड क्रांति दल अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश में जुटा है। राज्य आंदोलन की भावना और क्षेत्रीय अस्मिता को फिर से राजनीतिक मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम हो रहा है। इसके अलावा नई राजनीतिक ताकतें और छोटे दल भी चुनावी समीकरणों में जगह बनाने के लिए सक्रियता बढ़ा रहे हैं।
2027 का चुनाव केवल सरकार और विपक्ष के बीच मुकाबला नहीं होगा, बल्कि यह संगठन क्षमता और जनसंपर्क का भी बड़ा इम्तिहान होगा। पिछले दो चुनावों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला, लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ अलग हैं। दस वर्षों की सत्ता के बाद जनता की अपेक्षाएं बढ़ी हैं। वहीं विपक्ष को भी महसूस हो रहा है कि यदि अभी से तैयारी नहीं की गई तो चुनाव के समय बहुत देर हो जाएगी।
दिलचस्प यह है कि अभी तक किसी भी दल ने आधिकारिक रूप से चुनावी अभियान की घोषणा नहीं की है, लेकिन नेताओं की सक्रियता, लगातार हो रही बैठकों, सदस्यता अभियानों और क्षेत्रीय दौरों ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि सभी दल चुनावी मोड में प्रवेश कर चुके हैं। जनता के बीच पहुंचने की होड़ शुरू हो चुकी है और राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से मतदाताओं का भरोसा जीतने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीति के जानकार कहते हैं कि उत्तराखंड में चुनाव केवल रैलियों और नारों से नहीं जीते जाते। यहां गांव की चौपाल, स्थानीय मुद्दे और व्यक्तिगत संपर्क बड़ी भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि सभी दल अभी से अपने संगठन को धार देने और जनता के बीच पैठ मजबूत करने में जुट गए हैं। फिलहाल तस्वीर साफ है। चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन राजनीतिक दलों की घड़ियां 2027 पर सेट हो चुकी हैं। प्रदेश की राजनीति अब विकास, आरोप-प्रत्यारोप और जनसंपर्क अभियानों के बीच नए चुनावी अध्याय की ओर बढ़ रही है। मिशन 2027 की शुरुआत हो चुकी है और अब हर राजनीतिक कदम का लक्ष्य केवल एक हैकृसत्ता की कुर्सी तक पहुंचना।
‘मुद्दे’ गायब और बयानों में ‘उबाल’
नेताओं को एक-दूसरे की कमियां गिनाने से ही फुर्सत नहीं मिल रही
चुनावी मौसम आने वाला है, इसलिए मुद्दे नहीं, बयान उगलने लगे नेता
भाजपा-कांग्रेस और यूकेडी पर हमलावर, कांग्रेस के निशाने पर प्रधानमंत्री तक
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में काफी समय शेष है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी गमरग् अभी से महसूस की जाने लगी है। विकास, रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर बहस होने के बजाय राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तीखी बयानबाजी का दौर शुरू हो चुका है। भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के नेताओं की भाषा में बढ़ती तल्खी इस बात का संकेत है कि चुनावी रणभूमि की तैयारी शुरू हो गई है।
हाल के दिनों में भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने कांग्रेस और उत्तराखंड क्रांति दल पर हमलों की धार तेज कर दी है। भाजपा नेताओं का दावा है कि विपक्ष के पास जनता के सामने रखने के लिए कोई ठोस एजेंडा नहीं है और इसलिए वह केवल सरकार की आलोचना तक सीमित है। दूसरी ओर कांग्रेस भाजपा सरकार और केंद्र सरकार पर लगातार हमले बोल रही है। कई मौकों पर कांग्रेस नेताओं के बयान सीधे प्रधानमंत्री तक को निशाने पर लेते दिखाई दिए हैं। जवाब में भाजपा इसे प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर हमला बताकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है।
आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा चाहती है कि चुनावी विमर्श राष्ट्रीय नेतृत्व, राष्ट्रवाद और केंद्र सरकार की योजनाओं के इर्द-गिर्द घूमे। वहीं कांग्रेस कोशिश कर रही है कि चुनाव को स्थानीय मुद्दों और सरकार विरोधी भावनाओं पर केंद्रित किया जाए। यूकेडी क्षेत्रीय अस्मिता और राज्य आंदोलन की मूल भावना को पुनर्जीवित करने की कोशिश में है।
दिलचस्प बात यह है कि चुनावी माहौल गर्म करने में सोशल मीडिया की भूमिका भी तेजी से बढ़ी है। नेताओं के भाषणों के छोटे-छोटे वीडियो क्लिप, बयान और प्रतिक्रियाएं कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच रही हैं। राजनीतिक दल जानते हैं कि आज की राजनीति में बयान केवल सभा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सोशल मीडिया के जरिए दूर-दराज के गांवों तक पहुंच जाता है। यही कारण है कि हर बयान अब एक सुनियोजित राजनीतिक संदेश बनता जा रहा है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या जनता भी इसी प्रकार की राजनीति चाहती है? प्रदेश के सामने आज भी बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और आपदा प्रबंधन जैसी गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। पहाड़ के खाली होते गांव, युवाओं के रोजगार का संकट और बढ़ती शहरी अव्यवस्थाएं ऐसे मुद्दे हैं जिन पर ठोस बहस की अपेक्षा की जाती है। इसके बावजूद राजनीतिक दलों की प्राथमिकता फिलहाल एक-दूसरे पर हमले करने में अधिक दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव नजदीक आते ही बयानबाजी का स्तर और अधिक तीखा हो सकता है। पिछले चुनावों का इतिहास भी यही बताता है कि जैसे-जैसे मतदान का समय करीब आता है, व्यक्तिगत आरोप, राजनीतिक कटाक्ष और जुबानी हमले बढ़ने लगते हैं। इस बार भी उसके संकेत समय से पहले दिखाई देने लगे हैं।
भाजपा के लिए चुनौती दस वर्षों की सत्ता के बाद जनता के विश्वास को बनाए रखने की है। कांग्रेस के सामने खुद को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करने की चुनौती है। वहीं यूकेडी और अन्य छोटे दल अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में सभी दलों को लगता है कि आक्रामक राजनीति उन्हें चर्चा में बनाए रख सकती है।
हालांकि लोकतंत्र में स्वस्थ आलोचना और राजनीतिक बहस जरूरी मानी जाती है, लेकिन जब बहस मुद्दों से हटकर केवल आरोपों और व्यक्तिगत हमलों तक सीमित हो जाए तो जनता के वास्तविक सरोकार पीछे छूटने लगते हैं। उत्तराखंड की राजनीति इस समय ठीक उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तलवारें म्यान से बाहर निकाल दी हैं। अब देखना यह होगा कि आने वाले महीनों में चुनावी चर्चा विकास और जनहित के मुद्दों पर केंद्रित होती है या फिर आरोप-प्रत्यारोप की यह राजनीति ही पूरे चुनावी विमर्श पर हावी रहती है।
पहाड़ में छिपा अनमोल खजाना ‘खेणु’
जमीन के नीचे उगता है स्वाद और सेहत का संगम
स्वाद, परंपरा और औषधीय गुणों का अनोखा स्रोत
गांवों में इसका स्वाद और महत्व आज भी बरकरार
देहरादून। पहाड़ के बच्चों की जेब में कभी टाफियां नहीं होती थीं, लेकिन जंगलों की मिट्टी में छिपा खेणु उनकी मुस्कान का सबसे मीठा कारण हुआ करता था। उत्तराखंड के पहाड़ केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि जैव विविधता और पारंपरिक खाद्य संपदा के लिए भी जाने जाते हैं। इन्हीं प्राकृतिक धरोहरों में एक नाम है खेणु का, जो आज भी पहाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की पसंदीदा वन उपजों में गिना जाता है। आधुनिक जीवनशैली और बाजारवाद के दौर में भले ही इसकी चर्चा कम होती हो, लेकिन गांवों में इसका स्वाद और महत्व आज भी बरकरार है।
खेणु को कई लोग तिमला का छोटा भाई भी कहते हैं। दोनों पौधे एक ही परिवार से जुड़े माने जाते हैं और दोनों में कई समान गुण पाए जाते हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि तिमला के मीठे फल पेड़ों की शाखाओं पर दिखाई देते हैं, जबकि खेणु का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इसके फल जमीन के नीचे विकसित होते हैं। यही विशेषता इसे अन्य फलों से अलग पहचान देती है।
बरसात के मौसम में जब पहाड़ की मिट्टी नमी से भर जाती है, तब खेणु के पौधों के आसपास जमीन के भीतर छोटे-छोटे फल तैयार होने लगते हैं। ग्रामीण बच्चे और महिलाएं इन्हें खोजने के लिए जंगलों, खेतों की मेड़ों और झाड़ियों के आसपास निकल पड़ते हैं। मिट्टी को हल्का सा हटाने पर मिलने वाला यह फल स्वाद में मीठा और बेहद सुगंधित होता है। इसकी प्राकृतिक मिठास लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
खेणु केवल स्वाद का खजाना नहीं, बल्कि लोकजीवन का भी हिस्सा है। पुराने समय में जब बाजारों से मिलने वाले फल और मिठाइयां गांवों तक आसानी से नहीं पहुंचती थीं, तब बच्चे और युवा जंगलों से मिलने वाले खेणु, तिमला, काफल, हिसालू और बेडू जैसे फलों का आनंद लेते थे। यही कारण है कि खेणु से जुड़ी अनेक स्मृतियां आज भी पहाड़ के बुजुर्गों की यादों में जीवित हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि खेणु में कई औषधीय गुण भी पाए जाते हैं। पारंपरिक ज्ञान के अनुसार इसका सेवन पाचन तंत्र के लिए लाभकारी माना जाता है। इसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं और गर्मी के मौसम में यह ताजगी का एहसास कराता है। हालांकि इसके औषधीय गुणों पर वैज्ञानिक शोध सीमित हैं, लेकिन लोक अनुभवों में इसे स्वास्थ्यवर्धक फल माना जाता रहा है।
दुर्भाग्य से बदलती जीवनशैली, जंगलों में घटती जैव विविधता और नई पीढ़ी की कम होती रुचि के कारण खेणु जैसे पारंपरिक फल धीरे-धीरे लोगों की स्मृतियों तक सीमित होते जा रहे हैं। आज के बच्चों को विदेशी फलों के नाम तो याद हैं, लेकिन अपने पहाड़ की इस अनमोल देन के बारे में जानकारी कम होती जा रही है। यदि स्थानीय वनस्पतियों और पारंपरिक खाद्य संसाधनों का संरक्षण किया जाए तो न केवल जैव विविधता सुरक्षित रहेगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नया आधार मिल सकता है। खेणु जैसे फल पहाड़ की पहचान हैं और इन्हें संरक्षित करना सांस्कृतिक विरासत को बचाने जैसा है।
पहाड़ की मिट्टी में छिपा यह छोटा सा फल केवल स्वाद नहीं, बल्कि प्रकृति और लोकजीवन के गहरे रिश्ते की कहानी भी कहता है। तिमला की तरह गुणकारी और स्वादिष्ट खेणु आज भी उन लोगों के लिए किसी खजाने से कम नहीं, जो पहाड़ की प्रकृति को करीब से जानते और समझते हैं।
बुधवार, 24 जून 2026
बयानबाजी का ‘ट्रेलर’ रिलीज
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने पूछा- यूकेडी मैदान में उतरेगी या किसी बड़े दल की गोद में बैठेगी
भाजपा को यूकेडी का डर या चुनावी बेचौनी, महेंद्र भट्ट की पोस्ट ने बढ़ाई सियासी हलचल
विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की सोशल मीडिया पोस्ट पर उठे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी का दौर भी शुरू हो गया है। इस बीच भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। अपनी पोस्ट में उन्होंने सीधे उत्तराखंड क्रांति दल पर निशाना साधते हुए लिखा कि अब देखना यह है कि यूकेडी कितनी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ती है या फिर किसी बड़े दल की गोद में बैठ जाती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यूकेडी का इतिहास सत्ता के साथ जाने का रहा है।
यही पोस्ट अब राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। सवाल यह उठ रहा है कि जिस यूकेडी का विधानसभा में वर्तमान में कोई प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं है, उस पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष को सार्वजनिक टिप्पणी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब कोई बड़ा दल किसी छोटे दल पर लगातार टिप्पणी करने लगे तो इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि वह उसके संभावित चुनावी प्रभाव को लेकर सतर्क है।
यूकेडी भले ही पिछले दो दशकों में चुनावी तौर पर कमजोर हुई हो, लेकिन उत्तराखंड राज्य आंदोलन की विरासत आज भी उसके साथ जुड़ी हुई है। पहाड़ के कई क्षेत्रों में पार्टी का भावनात्मक आधार अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में यदि विधानसभा चुनाव में यूकेडी अधिक सीटों पर उतरती है तो वह कई सीटों पर वोटों का समीकरण प्रभावित कर सकती है। महेंद्र भट्ट की पोस्ट को विपक्ष और राजनीतिक जानकार भाजपा की चुनावी रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि यूकेडी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत नहीं रही, जबकि दूसरी ओर इस तरह की टिप्पणी यह भी संकेत देती है कि भाजपा किसी भी संभावित वोट कटवा समीकरण को हल्के में लेने के मूड में नहीं है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उत्तराखंड की राजनीति में यूकेडी का वोट प्रतिशत भले सीमित रहा हो, लेकिन त्रिकोणीय मुकाबलों में उसका प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक बन सकता है। यही कारण है कि चुनाव से पहले क्षेत्रीय दलों की गतिविधियों पर राष्ट्रीय दलों की पैनी नजर रहती है। हालांकि भाजपा की ओर से इसे सामान्य राजनीतिक टिप्पणी बताया जा सकता है, लेकिन समय और संदर्भ को देखते हुए यह पोस्ट कई सवाल छोड़ गई है। यदि यूकेडी वास्तव में भाजपा के लिए अप्रासंगिक है तो फिर उसके भविष्य को लेकर प्रदेश अध्यक्ष को सार्वजनिक टिप्पणी करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
अब निगाहें यूकेडी की रणनीति पर होंगी। क्या पार्टी पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतरेगी या फिर किसी गठबंधन का रास्ता चुनेगी? इसका जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा। लेकिन इतना तय है कि महेंद्र भट्ट की इस एक पोस्ट ने विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड की राजनीति में नई बहस जरूर छेड़ दी है।
उत्तराखंड में ‘बिसात’ पर सजे ‘मोहरे’
भाजपा की हैट्रिक की जिद और कांग्रेस कर रहा वापसी की जंग
देहरादून से सीमांत क्षेत्रों तक सूबे में छिड़ गया सत्ता का महाभारत
क्षेत्रीय दल और बागी भी बदल सकते हैं कई विस सीटों का गणित
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति इस समय शतरंज की बिसात जैसी दिखाई दे रही है। मोहरे सज चुके हैं, रणनीतियां बन रही हैं और राजनीतिक हमले भी तेज होने लगे हैं। चुनाव की तारीख भले घोषित न हुई हो, लेकिन सत्ता की लड़ाई का बिगुल बज चुका है। आने वाले महीनों में दल-बदल, नए गठबंधन, टिकट की खींचतान और बड़े राजनीतिक दांव उत्तराखंड की सियासत को और अधिक गर्माने वाले हैं।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव का राजनीतिक दलों ने चुनावी शंखनाद लगभग कर दिया है। राजधानी देहरादून से लेकर सीमांत जिलों तक राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतर चुकी है, जबकि कांग्रेस पिछले एक दशक से सत्ता से बाहर रहने के बाद वापसी का रास्ता तलाश रही है। दूसरी ओर उत्तराखंड क्रांति दल, बसपा, आम आदमी पार्टी और निर्दलीय चेहरे भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं।
प्रदेश की राजनीति में इस समय सबसे बड़ी लड़ाई केवल सरकार बनाने की नहीं, बल्कि जनमत को अपने पक्ष में मोड़ने की है। भाजपा विकास, बुनियादी ढांचे, निवेश, समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच जा रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने की रणनीति पर काम कर रही है।
वहीं कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली, शिक्षा व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और स्थानीय मुद्दों को चुनावी हथियार बना रही है। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश में जुटे हैं और कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी लहर (एंटी इनकंबेंसी) को नियंत्रित करना है। लगातार दो कार्यकाल सरकार चलाने के बाद जनता की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। कई विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी की चर्चाएं हैं। पार्टी इसलिए संगठन और सरकार दोनों के प्रदर्शन को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है।
भाजपा यह भी जानती है कि उत्तराखंड की राजनीति में हर चुनाव में मतदाता सत्ता बदलने का इतिहास रखते आए हैं। हालांकि 2022 में भाजपा ने इस परंपरा को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी। अब पार्टी तीसरी बार सत्ता में लौटने का नया इतिहास लिखना चाहती है। कांग्रेस को उम्मीद है कि महंगाई, बेरोजगारी, युवाओं की नाराजगी और स्थानीय समस्याएं उसके लिए राजनीतिक अवसर बन सकती हैं। लेकिन कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं है। संगठनात्मक मजबूती, गुटबाजी पर नियंत्रण और मजबूत स्थानीय नेतृत्व उसके लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी। यदि कांग्रेस इन चुनौतियों से पार पा लेती है तो मुकाबला सीधा और कांटे का हो सकता है।
उत्तराखंड में चुनाव भले भाजपा और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला होता हो, लेकिन कई सीटों पर क्षेत्रीय दल और निर्दलीय उम्मीदवार जीत-हार का अंतर तय करते रहे हैं। उत्तराखंड क्रांति दल राज्य आंदोलन की विरासत को फिर से राजनीतिक ताकत में बदलने की कोशिश कर रहा है। यदि पार्टी सीमित सीटों पर भी प्रभावी प्रदर्शन करती है तो कई सीटों का समीकरण बदल सकता है।
2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 70 में से 47 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं। बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद विधानसभा में भाजपा के पास 47 और कांग्रेस के पास 20 सदस्य हैं। विधानसभा में बहुमत के लिए 36 सीटों की आवश्यकता होती है। इस बार सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार, व्हाट्सऐप नेटवर्क, बूथ प्रबंधन और माइक्रो कैडर पर विशेष जोर रहेगा। दोनों दल युवा मतदाताओं और पहली बार मतदान करने वालों तक पहुंचने के लिए अलग-अलग अभियान तैयार कर रहे हैं। उम्मीदवारों के चयन में जीतने की क्षमता और स्थानीय स्वीकार्यता पहले से अधिक महत्वपूर्ण होगी।
तिमला: जड़ें मिट्टी में और यादें सीने में
एक ऐसा वृक्ष जो पशुपालन, खेती, पर्यावरण और स्वास्थ्य का आधार रहा
गुम होती यादों के बीच आज भी अपनी माटी की महक देता तिमले का पेड़
पहाड़ में सुख-दुख बांटने के लिए सदियों से संभाला ग्रामीण जीवन का आंगन
आधुनिकता की चकाचौंध में धीरे-धीरे गांवों से हो रहा तिमले का पेड़ गायब
देहरादून। उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, नदियों और देवस्थलों से नहीं है, बल्कि उन पारंपरिक वृक्षों से भी है, जिन्होंने सदियों से पहाड़ के जीवन को सहारा दिया है। इन्हीं में से एक है तिमला। खेतों की मेड़ों, गांव के समीप, आंगन के आसपास और पगडंडियों के किनारे सहज रूप से उगने वाला यह वृक्ष पहाड़ के ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। एक समय ऐसा था जब शायद ही कोई गांव ऐसा होता, जहां तिमला का पेड़ न दिखाई देता हो। आज भी बुजुर्ग जब तिमला का नाम लेते हैं तो उनके चेहरे पर बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं।
तिमला केवल फल देने वाला पेड़ नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की आत्मनिर्भर जीवनशैली का प्रतीक है। पशुओं के लिए चारा, बच्चों के लिए प्राकृतिक मिठास, किसानों के लिए खेतों की सुरक्षा और ग्रामीणों के लिए घरेलू औषधिकृएक ही पेड़ इतने रूपों में लोगों के काम आता है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। ऐसे में तिमला का महत्व और बढ़ जाता है। इसकी कोमल पत्तियां गाय, बैल, भैंस और बकरियों के लिए पौष्टिक चारे के रूप में इस्तेमाल होती हैं। ग्रामीण बताते हैं कि तिमला का चारा खाने से पशु स्वस्थ रहते हैं और दूध देने वाले पशुओं की सेहत पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पहाड़ में जहां वर्ष के कई महीनों तक हरा चारा सीमित होता है, वहां तिमला किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना जाता।
गर्मियों के मौसम में जब तिमला पर छोटे-छोटे फल पकते हैं तो पूरा पेड़ मानो मिठास से भर उठता है। बाहर से साधारण दिखने वाला यह फल स्वाद में बेहद मीठा होता है। गांवों में बच्चे स्कूल जाते समय और लौटते वक्त पेड़ पर चढ़कर इसके फल खाते थे। उस समय न चॉकलेट का आकर्षण था और न पैकेट वाले स्नैक्स का, तिमला ही पहाड़ के बचपन की सबसे मीठी याद हुआ करता था। यह फल केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि पोषण से भी भरपूर माना जाता है। इसमें प्राकृतिक शर्करा, फाइबर और कई सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं।
लोक चिकित्सा में तिमला का विशेष स्थान रहा है। ग्रामीण वैद्य और बुजुर्ग इसके फल, छाल और दूधिया रस का उपयोग विभिन्न पारंपरिक उपचारों में करते रहे हैं। माना जाता है कि इसका फल पाचन तंत्र को मजबूत करने में सहायक होता है। इसकी छाल और दूधिया रस का सीमित उपयोग त्वचा संबंधी समस्याओं और अन्य पारंपरिक उपचारों में भी किया जाता रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि औषधीय उपयोग चिकित्सकीय सलाह के बाद ही किया जाना चाहिए।
तिमला खेतों की मेड़ों पर इसलिए लगाया जाता था क्योंकि इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़ती हैं। इससे वर्षा के दौरान मिट्टी का कटाव कम होता है और खेत सुरक्षित रहते हैं। इसके पेड़ तेज धूप में किसानों और राहगीरों को छाया भी देते हैं। यह वृक्ष पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पक्षियों के लिए यह सुरक्षित आश्रय है और इसके फल कई जीव-जंतुओं का भोजन भी बनते हैं। इस तरह तिमला जैव विविधता की रक्षा में भी अपनी भूमिका निभाता है।
पलायन, घटती खेती, सीमेंट-कंक्रीट का बढ़ता विस्तार और पारंपरिक वृक्षों की अनदेखी ने तिमला की संख्या पर भी असर डाला है। पहले हर गांव में आसानी से दिखाई देने वाला यह वृक्ष अब कई स्थानों पर दुर्लभ होता जा रहा है। नई पीढ़ी इसके नाम से भी अनजान होती जा रही है। विडंबना यह है कि जिस दौर में पूरी दुनिया आर्गेनिक और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों की ओर लौट रही है, उसी समय पहाड़ अपनी प्राकृतिक धरोहरों को खोता जा रहा है।
यदि तिमला के फलों का वैज्ञानिक तरीके से संग्रहण और प्रसंस्करण किया जाए तो इससे जैम, जेली, स्क्वैश, सूखे फल और हर्बल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे स्वयं सहायता समूहों, महिला मंगल दलों और ग्रामीण युवाओं को स्वरोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं। वन विभाग और कृषि विभाग यदि तिमला के पौधों का बड़े स्तर पर रोपण अभियान चलाएं तो यह पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती दे सकता है। पहाड़ में तिमला केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि लोकजीवन का हिस्सा है। इसकी छांव में चौपालें लगीं, बच्चों का बचपन बीता और पशुपालकों का जीवन आसान हुआ। यह पेड़ पहाड़ की उस संस्कृति का प्रतीक है, जिसमें प्रकृति और इंसान का रिश्ता केवल उपयोग का नहीं, बल्कि आत्मीयता का था।
मंगलवार, 23 जून 2026
राजधानी में ‘हाथ’ का दम
2027 के रण के लिए कांग्रेस का महा-शक्ति प्रदर्शन, बदल दी है अपनी चुनावी नैरेटिव
बैक-टू-बैक कांग्रेस के धरना-प्रदर्शनों से बैकफुट पर आयी प्रदेश की भाजपा सरकार
कांग्रेस ने की बूथ स्तर पर किलेबंदी तेज, मंडल और सेक्टर प्रभारियों को सौंपी कमान
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। इसी कड़ी में कांग्रेस ने राजधानी में बड़ा शक्ति प्रदर्शन कर यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी चुनावी मुकाबले के लिए पूरी तरह सक्रिय है। हाल के महीनों में कांग्रेस ने संगठनात्मक बैठकों, जनसभाओं, धरना-प्रदर्शनों और कार्यकर्ता सम्मेलनों के जरिए अपनी राजनीतिक मौजूदगी को मजबूत करने का प्रयास किया है।
देहरादून में कांग्रेस के कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और नेताओं की मौजूदगी देखने को मिली। पार्टी ने महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और जनहित के मुद्दों को लेकर राज्य सरकार को घेरने की रणनीति अपनाई। फरवरी 2026 में कांग्रेस ने लोकभवन कूच का आयोजन किया, जिसमें हजारों कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई, जिससे कार्यक्रम को व्यापक राजनीतिक चर्चा मिली।
कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना जरूरी है। इसी उद्देश्य से पार्टी ने प्रदेशभर में संगठन विस्तार अभियान चलाया है। कांग्रेस नेताओं के उत्तराखंड दौरे और अल्मोड़ा जनसभा को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया। पार्टी नेतृत्व ने देहरादून में पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर चुनावी तैयारियों की समीक्षा की तथा संगठन को एकजुट करने पर जोर दिया।
विश्लेषकों का मानना है कि देहरादून में कांग्रेस का यह शक्ति प्रदर्शन केवल विरोध प्रदर्शन नहीं बल्कि भाजपा को सीधी चुनावी चुनौती देने का प्रयास है। कांग्रेस राज्य सरकार के खिलाफ जनभावनाओं को राजनीतिक समर्थन में बदलना चाहती है, जबकि भाजपा अपने संगठन और सरकार की उपलब्धियों के आधार पर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है।
देहरादून में हुए शक्ति प्रदर्शन से कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी राज्य में विपक्ष की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि सत्ता में वापसी के लिए आक्रामक रणनीति पर काम कर रही है। आगामी विधानसभा चुनाव तक ऐसे कार्यक्रमों की संख्या बढ़ने की संभावना है, जिससे उत्तराखंड की राजनीति और अधिक गर्माने के संकेत मिल रहे हैं।
बता दें कि देहरादून में कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन आगामी विधानसभा चुनावों की राजनीतिक बिसात का शुरुआती संकेत माना जा रहा है। पार्टी संगठनात्मक मजबूती, जनसरोकारों के मुद्दों और बड़े जनसमूह के प्रदर्शन के जरिए यह दिखाने में जुटी है कि उत्तराखंड की चुनावी लड़ाई में वह भाजपा को कड़ी चुनौती देने की तैयारी कर चुकी है।
एजुकेशन हब में ‘मौत के जाल’
राजधानी देहरादून में हादसों को न्योता दे रहे हैं कई कोचिंग सेंटर और तंग गलियों में बने हास्टल
बेसमेंट में क्लासरूम और संकरी गलियों में हास्टल और फायर सेफ्टी के नाम पर सिर्फ खानापूरी
एजुकेशन हब के पीछे छिपा मौत का जाल,बिना पुलिस वेरिफिकेशन और एनओसी के चल रहा खेल
दून में मोटी फीस और महंगे किराए की वसूली, लेकिन सुरक्षा के नाम पर है जीरो मैनेजमेंट
देहरादून। राजस्थान के कोटा से लेकर दिल्ली के मुखर्जी नगर तक, कोचिंग सेंटरों में सुरक्षा को लेकर सवाल बार-बार उठते रहे हैं। लेकिन उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी स्थिति बहुत अलग नहीं दिखती। शहर में हजारों छात्र-छात्राएं प्रतियोगी परीक्षाओं, मेडिकल, इंजीनियरिंग, डिफेंस और अन्य कोर्सों की तैयारी के लिए आते हैं। इनके लिए कोचिंग संस्थानों के साथ-साथ पीजी, हास्टल और किराए के कमरों का एक विशाल नेटवर्क खड़ा हो चुका है। सवाल यह है कि क्या इन इमारतों में पढ़ने और रहने वाले छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित है, या फिर ये कोचिंग सेंटर किसी संभावित हादसे का इंतजार कर रहे लाक्षागृह बन चुके हैं?
पिछले एक दशक में देहरादून उत्तर भारत के प्रमुख कोचिंग केंद्रों में शामिल हुआ है। शहर के नेहरू कालोनी, बल्लूपुर, प्रेमनगर, घंटाघर, राजपुर रोड और क्लेमेंटटाउन क्षेत्रों में सैकड़ों छोटे-बड़े कोचिंग संस्थान संचालित हो रहे हैं। इनके साथ हास्टल और पीजी की भी भरमार है। हजारों छात्र दूसरे जिलों और राज्यों से यहां आते हैं। लेकिन बढ़ती संख्या के मुकाबले सुरक्षा मानकों की निगरानी और अनुपालन पर सवाल लगातार उठते रहे हैं।
सूरत कोचिंग सेंटर अग्निकांड के बाद 2019 में देहरादून और राज्य के अन्य शहरों में बड़े पैमाने पर फायर सेफ्टी जांच अभियान चलाया गया था। उस दौरान देहरादून में 55 कोचिंग सेंटरों, होटलों और व्यावसायिक भवनों को अग्नि सुरक्षा इंतजामों की कमी के कारण नोटिस जारी किए गए थे। जांच में फायर एक्सटिंग्विशर, फायर अलार्म और आपातकालीन निकासी व्यवस्था जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी सामने आई थी। इसी अवधि में राज्य स्तर पर कई कोचिंग संस्थानों को फायर एनओसी और सुरक्षा मानकों का पालन न करने पर चेतावनी दी गई थी।
शहर में बड़ी संख्या में ऐसे कोचिंग सेंटर संचालित हैं जो व्यावसायिक या आवासीय इमारतों के ऊपरी तल पर चल रहे हैं। कई जगहों पर प्रवेश और निकास के लिए केवल एक संकरा रास्ता है। बिजली के तारों का जाल, सीमित वेंटिलेशन और भीड़भाड़ वाली कक्षाएं किसी भी आपात स्थिति में खतरा बढ़ा सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आग लगने की स्थिति में सबसे बड़ा जोखिम निकासी का होता है। यदि एक ही सीढ़ी या दरवाजा हो और सैकड़ों छात्र मौजूद हों, तो भगदड़ की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी देहरादून के कई कोचिंग संस्थानों का निरीक्षण करने के बाद सरकार को पत्र लिखकर संचालन के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने की मांग की थी। आयोग ने पाया था कि कई संस्थानों में मानक संचालन प्रक्रिया और छात्रों की सुरक्षा से जुड़े बुनियादी प्रावधानों का अभाव है। आयोग ने फीस, बुनियादी सुविधाओं और छात्र सुरक्षा पर नियमन की जरूरत बताई थी।
केंद्र सरकार की कोचिंग सेंटर नियमन संबंधी गाइडलाइन स्पष्ट कहती है कि कोचिंग भवनों को फायर सेफ्टी और बिल्डिंग सेफ्टी मानकों का पालन करना होगा और संबंधित अधिकारियों से सुरक्षा प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा। पर्याप्त जगह, वेंटिलेशन, प्राथमिक उपचार और आपातकालीन सहायता व्यवस्था भी अनिवार्य है। लेकिन सवाल यह है कि देहरादून में चल रहे सभी कोचिंग सेंटर और उनसे जुड़े हास्टल क्या वास्तव में इन मानकों पर खरे उतरते हैं?
देहरादून में बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान हैं जो कोचिंग के साथ हास्टल सुविधा भी उपलब्ध कराते हैं। इनमें सैकड़ों छात्र एक ही परिसर में रहते हैं। ऐसे में केवल क्लासरूम ही नहीं, बल्कि हास्टल, मेस, रसोई, बिजली व्यवस्था और आपातकालीन निकास मार्गों की भी नियमित जांच आवश्यक है। देहरादून को शिक्षा नगरी कहा जाता है। लेकिन यदि किसी भवन में फायर एनओसी नहीं है, निकासी का पर्याप्त इंतजाम नहीं है, या क्षमता से अधिक छात्रों को बैठाया जा रहा है, तो वह भवन पढ़ाई का केंद्र कम और संभावित दुर्घटना का केंद्र अधिक बन सकता है।
कोटा, सूरत और दिल्ली जैसे हादसों ने देश को चेताया है। अब सवाल यह है कि क्या देहरादून प्रशासन, नगर निकाय, फायर विभाग और शिक्षा विभाग मिलकर व्यापक सुरक्षा आडिट करेंगे, या फिर किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही व्यवस्थाएं जागेंगी? क्योंकि जब हजारों छात्र अपने सपनों के साथ इन इमारतों में प्रवेश करते हैं, तो उन्हें सिर्फ शिक्षा ही नहीं, सुरक्षा का भरोसा भी मिलना चाहिए।
‘अतीत’ बने पहाड़ के ‘कोठार’
सिर्फ अनाज का भंडार नहीं, स्मृतियों का अनमोल संसार था कोठार का एक कोना
सीमेंट के जंगलों में खो गई काष्ठशिल्प की विरासत,आधुनिक जीवनशैली ने छीनी पहचान
पुरखों की थाती में नई पीढ़ी के लिए सिर्फ कौतूहल बनकर रह गए हैं आज कोठार
देहरादून। पहाड़ के पुराने घरों में एक कमरा ऐसा होता था, जो सिर्फ कमरा नहीं होता था। वह घर की समृ(ि का प्रतीक होता था, परिवार की सुरक्षा का भरोसा होता था और बच्चों के लिए सबसे प्रिय ठिकाना भी। इसे पहाड़ में कोठार कहा जाता था। आज सीमेंट के मकानों और आधुनिक जीवनशैली के बीच कोठार धीरे-धीरे इतिहास बनते जा रहे हैं। लेकिन जिन लोगों ने अपना बचपन गांवों में बिताया है, उनके लिए कोठार केवल अनाज रखने की जगह नहीं, बल्कि यादों का एक जीवित संसार है।
जब गांवों में बाजार दूर थे और हर परिवार अपनी जरूरत का अधिकांश अनाज खुद पैदा करता था, तब कोठार घर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता था। गेहूं, धान, मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट और राजमा जैसे अनाज पूरे साल के लिए यहीं सुरक्षित रखे जाते थे। मिट्टी, पत्थर और लकड़ी से बने इन कोठारों में अनाज को नमी, चूहों और कीड़ों से बचाने के लिए विशेष इंतजाम किए जाते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति का अंदाजा भी अक्सर कोठार में भरे अनाज से लगाया जाता था। बुजुर्ग कहा करते थे जिसका कोठार भरा हो, उसका मन भी भरा रहता है। दिन में जहां अनाज की बोरियां और लकड़ी के बक्से रखे रहते थे, वहीं रात होते ही यही कोठार बच्चों का शयनकक्ष बन जाता था।
सर्दियों की ठंडी रातों में जब बाहर बर्फीली हवाएं चलती थीं, तब कोठार के भीतर एक अलग ही गर्माहट महसूस होती थी। अनाज की बोरियों के बीच बिछे बिस्तरों पर बच्चे, भाई-बहन और कई बार मेहमान भी साथ सोते थे। दादी की कहानियां, मां की लोरियां और लालटेन की मंम रोशनी में बीतती रातें आज भी कई लोगों की स्मृतियों में जिंदा हैं। कोठार की अपनी एक महक होती थी। ताजे धान, सूखे गेहूं, मंडुवे और लकड़ी की मिश्रित खुशबू। आज भी जब गांव लौटे लोग किसी पुराने कोठार का दरवाजा खोलते हैं तो वह खुशबू उन्हें सीधे बचपन में पहुंचा देती है। याद आता है कि कैसे अनाज की बोरियों पर चढ़कर खेला करते थे, कैसे छिपन-छिपाई का सबसे सुरक्षित अड्डा वही हुआ करता था। कई बच्चों के लिए कोठार किसी रहस्यमयी दुनिया से कम नहीं था।
कोठार सिर्फ अनाज का भंडार नहीं था, वह पहाड़ की आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। वह बताता था कि परिवार ने साल भर मेहनत की है और आने वाले मौसमों के लिए तैयारी भी कर ली है। आज बाजारों और ऑनलाइन डिलीवरी के दौर में शायद यह एहसास कम हो गया है कि एक समय भोजन की सुरक्षा घर के कोठार से तय होती थी। पलायन ने सबसे ज्यादा असर गांवों के कोठारों पर भी डाला है, जिन कमरों में कभी अनाज से भरी बोरियां रखी रहती थीं, वहां आज सन्नाटा पसरा है।
कई घरों के कोठार बंद पड़े हैं। कुछ टूट चुके हैं और कुछ आधुनिक निर्माण की भेंट चढ़ गए हैं। उनके साथ ही एक जीवनशैली, एक संस्कृति और यादों का एक पूरा संसार भी धीरे-धीरे गायब हो रहा है। जब गांव के बुजुर्ग अपने पुराने दिनों को याद करते हैं तो उनकी आंखों में चमक आ जाती है। वह खेती की बात करते हैं, फसलों की बात करते हैं और फिर अनायास ही कोठार का जिक्र आ जाता है।
शायद इसलिए कि कोठार में केवल अनाज नहीं रखा जाता था।वहां परिवार की मेहनत रखी जाती थी।वहां आने वाले कल की उम्मीद रखी जाती थी।वहां बच्चों का बचपन रखा जाता था।और सबसे बढ़कर, वहां पहाड़ की आत्मा बसती थी। आज भले ही कोठार खाली हों, लेकिन उनकी यादें अब भी हजारों पहाड़ी दिलों में भरी हुई हैं।
बूथ पर ‘पहरा’ विधायकों में ‘डर’
भाजपा का नया माइक्रो मैनेजमेंट और टिकट कटने का डर
प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ी नेताओं की धड़कनें
भाजपा की नई चक्रव्यूह रचना, डेंजर जोन में सिटिंग विधायक
देहरादून। चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन सत्ता और संगठन के गलियारों में हलचल तेज हो चुकी है। भाजपा का नया माइक्रो मैनेजमेंट माडल न केवल संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, बल्कि जनप्रतिनिधियों और दावेदारों के बीच एक नई चिंता भी पैदा कर रहा हैकृकहीं टिकट न कट जाए। पार्टी की रणनीति अब केवल चुनावी सभाओं और बड़े नेताओं की रैलियों तक सीमित नहीं है। भाजपा का फोकस अब हर बूथ, हर कार्यकर्ता और हर विधानसभा क्षेत्र के प्रदर्शन पर है। यही वजह है कि सांसदों, विधायकों और संगठन पदाधिकारियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है।
एक समय था जब चुनाव के करीब आते ही टिकट वितरण पर चर्चा शुरू होती थी, लेकिन अब भाजपा वर्षों पहले ही उम्मीदवारों के प्रदर्शन का आकलन शुरू कर देती है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, संगठन विभिन्न माध्यमों से जनप्रतिनिधियों की सक्रियता, जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता, क्षेत्र में विकास कार्यों की स्थिति और कार्यकर्ताओं के साथ उनके संबंधों का फीडबैक जुटाता है। यही माइक्रो मैनेजमेंट भाजपा की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। पार्टी चुनाव को केवल उम्मीदवार के भरोसे नहीं छोड़ती, बल्कि बूथ स्तर तक एक विस्तृत तंत्र तैयार करती है।
भाजपा ने पिछले कई चुनावों में यह संदेश दिया है कि जीतने की क्षमता और जनता के बीच स्वीकार्यता सबसे महत्वपूर्ण है। कई राज्यों में पार्टी ने बड़े चेहरों तक के टिकट काटने से परहेज नहीं किया। यही कारण है कि वर्तमान जनप्रतिनिधियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखना बन गई है। विधायक और अन्य दावेदार लगातार क्षेत्र में सक्रियता बढ़ा रहे हैं। जनसंपर्क अभियान, सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी और संगठनात्मक बैठकों में उपस्थिति पहले से अधिक दिखाई दे रही है।
भाजपा के भीतर अब रिपोर्ट कार्ड संस्कृति मजबूत होती दिख रही है। संगठन यह जानना चाहता है कि जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र में कितने सक्रिय रहे, जनता की समस्याओं को कितना उठाया और संगठन के कार्यक्रमों में उनकी भूमिका क्या रही। कई बार स्थानीय स्तर पर मिलने वाली नकारात्मक रिपोर्ट भी टिकट वितरण को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि नेताओं की कोशिश है कि संगठन और जनता दोनों के बीच सकारात्मक संदेश जाए।
जहां वर्तमान विधायक टिकट बचाने की जद्दोजहद में हैं, वहीं नए दावेदार भी अवसर तलाश रहे हैं। भाजपा की कार्यप्रणाली को देखते हुए पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत है कि यदि किसी सीट पर मौजूदा जनप्रतिनिधि के खिलाफ माहौल है तो संगठन नए चेहरे पर दांव लगाने से पीछे नहीं हटेगा। इस संभावना ने कई क्षेत्रों में अंदरूनी राजनीतिक गतिविधियों को तेज कर दिया है। संगठन पहले, व्यक्ति बाद में भाजपा की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा है कि पार्टी व्यक्ति से अधिक संगठन को महत्व देने का दावा करती है। माइक्रो मैनेजमेंट का वर्तमान माडल भी इसी सोच पर आधारित दिखाई देता है। बूथ समितियों की मजबूती, लाभार्थी संपर्क अभियान, सोशल मीडिया नेटवर्क और क्षेत्रीय फीडबैक सिस्टम के जरिए संगठन चुनावी तैयारियों को अंतिम समय तक सीमित नहीं रखना चाहता है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, नेताओं पर दबाव और बढ़ेगा। क्षेत्र में उपस्थिति, जनता से संवाद और संगठनात्मक कार्यक्रमों में भागीदारी का महत्व पहले से अधिक हो जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का यह माडल चुनावी दृष्टि से प्रभावी हो सकता है, लेकिन इसके साथ ही पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धा और टिकट को लेकर असुरक्षा की भावना भी बढ़ा सकता है। भाजपा का नया माइक्रो मैनेजमेंट केवल चुनाव जीतने की रणनीति नहीं, बल्कि संगठन को हर स्तर पर सक्रिय रखने का प्रयास है। लेकिन इस रणनीति का दूसरा पहलू भी है। जैसे-जैसे फीडबैक, सर्वे और रिपोर्ट कार्ड की संस्कृति मजबूत होगी, वैसे-वैसे नेताओं में टिकट कटने का डर भी बढ़ेगा। यानी चुनाव से पहले भाजपा के भीतर सबसे बड़ा संदेश साफ हैकृसिर्फ पद पर बने रहना काफी नहीं, लगातार प्रदर्शन करना भी जरूरी है।
‘अंधे सिस्टम’ का फुटपाथ पर ‘धंधा’
देहरादून में फुटपाथ पर दुकान, सड़क पर दौड़ रहे यमराज
फुटपाथ बिके, यात्री सड़कों पर पैदल चलने को हैं मजबूर
नगर निगम के दावे खोखले, पुलिस की चौकसी पर सवाल
प्रदेश सरकार की स्मार्ट सिटी पर आमजन उठा रहे सवाल
सवाल यह नहीं कब्जा है, सवाल यह है कि हटाता कौन नहीं
देहरादून। राजधानी देहरादून में यदि किसी को यह जानना हो कि प्रशासनिक व्यवस्था कितनी सक्रिय है, तो उसे किसी सरकारी रिपोर्ट की जरूरत नहीं। बस शहर के किसी भी प्रमुख फुटपाथ पर पांच मिनट खड़े हो जाइए। तस्वीर खुद बता देगी कि फुटपाथ अब पैदल यात्रियों के नहीं, बल्कि कब्जेदारों के हो चुके हैं। आम आदमी सड़क पर है और व्यवस्था फाइलों में। नगर निगम हर महीने अतिक्रमण हटाने के अभियान की तस्वीरें जारी करता है। पुलिस ट्रैफिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बताती है। सरकार स्मार्ट सिटी और सुशासन के दावे करती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राजधानी के अधिकांश फुटपाथों पर खुलेआम दुकानें सजी हैं और पैदल चलने वाला व्यक्ति अपनी जान हथेली पर रखकर सड़क पर चलने को मजबूर है।
देहरादून के घंटाघर से पल्टन बाजार, लालपुल से प्रिंस चौक, सहारनपुर रोड से राजपुर रोड और आईएसबीटी से बल्लूपुर सहित शहर की सभी सड़कों और फुटपाथों पर रोज दुकानें सजती हैं। यह कोई रातों-रात होने वाला कब्जा नहीं है। यह रोज होता है, सबकी आंखों के सामने होता है और फिर भी चलता रहता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल नगर निगम से है। आखिर जिन फुटपाथों की जिम्मेदारी उसके पास है, वे वर्षों से कब्जे में कैसे हैं? पुलिस से भी सवाल है कि जब ट्रैफिक पुलिस हर चौराहे पर मौजूद रहती है, तो सड़क पर उतरने को मजबूर पैदल यात्री उसे क्यों दिखाई नहीं देते? और सरकार से भी सवाल है कि क्या स्मार्ट सिटी का मतलब केवल सुंदर टाइलें बिछाना है, या उन पर आम नागरिक का अधिकार भी सुनिश्चित करना है?
राजधानी में अतिक्रमण हटाने के अभियान अब लोगों के बीच मजाक का विषय बनने लगे हैं। सुबह जेसीबी चलती है, दोपहर तक फोटो और प्रेस विज्ञप्ति जारी होती है और कुछ दिन बाद वहीं फिर वही दुकानें लग जाती हैं। यदि यही कार्रवाई है, तो फिर यह मानने में क्या संकोच कि समस्या कब्जेदारों से ज्यादा व्यवस्था की इच्छाशक्ति की है?
राजधानी के लालपुल में सिटी बस की चपेट में आए लोगों की घटना ने पूरे शहर को झकझोर दिया। दुर्घटना के कारणों की जांच अपने स्थान पर है, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जब फुटपाथ कब्जे में होंगे तो पैदल यात्री सड़क पर ही चलेंगे। और जब सड़क पर पैदल यात्री होंगे, तो हादसों का खतरा भी बढ़ेगा। यह केवल ट्रैफिक का मुद्दा नहीं, बल्कि शहरी नियोजन और प्रशासनिक जवाबदेही का भी सवाल है। शहर में वर्षों से एक सवाल गूंज रहा हैकृयदि रोज लगने वाले कब्जे अवैध हैं तो वह रोज लगते कैसे हैं? यदि वैध हैं तो फुटपाथों पर पैदल यात्रियों का अधिकार कहां गया? और यदि अवैध हैं, तो फिर कार्रवाई स्थायी क्यों नहीं होती? यही वह सवाल हैं जिनका जवाब न नगर निगम देता है, न पुलिस और न ही सरकार।
सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर सड़कें चौड़ी कर रही है, फुटपाथ बना रही है और शहर को आधुनिक बनाने के दावे कर रही है। लेकिन सबसे बुनियादी अधिकारकृसुरक्षित पैदल चलने का अधिकारकृआज भी नागरिकों को नहीं मिल पाया है। विडंबना यह है कि राजधानी में वाहन के लिए सड़क है, दुकान के लिए फुटपाथ है, लेकिन पैदल चलने वाले के लिए कोई जगह नहीं बची। आमजन का सवाल है कि क्या नगर निगम केवल चालान और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित रहेगा? क्या पुलिस की जिम्मेदारी केवल वाहनों का चालान काटने तक है? क्या सरकार स्मार्ट सिटी की रैंकिंग से आगे बढ़कर नागरिकों की सुरक्षा पर भी ध्यान देगी? क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही फुटपाथ पैदल यात्रियों को वापस मिलेंगे? अब इन प्रश्नों का उत्तर मांगे तो मांगे किससे।
यह सर्व विदित है कि फुटपाथ पर कब्जा केवल अतिक्रमण नहीं, बल्कि आम नागरिक के अधिकार पर कब्जा है। जब व्यवस्था अपनी आंखों के सामने सार्वजनिक स्थानों पर अवैध कब्जे होते देख भी मौन रहती है, तो सवाल केवल प्रशासनिक विफलता का नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं का भी बन जाता है। राजधानी के लोग अब यह नहीं पूछ रहे कि फुटपाथ पर कब्जा किसने किया। वह यह पूछ रहे हैं कि फुटपाथ आखिर खाली कौन नहीं कराना चाहता?
नगरासू में लौटी शांति
दो दिन तक चले हाई वोल्टेज घटनाक्रम के बाद प्रशासन ने हालात सामान्य बताए
निहंग श्र(ालुओं से वार्ता सफल रही, गुरुद्वारे में लंगर और अरदास फिर शुरू
जिला प्रशासन ने कहा- कानून-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में, भ्रामक खबरों और अफवाहों पर ध्यान न दे जनता
देहरादून। रुद्रप्रयाग के नगरासू गुरुद्वारा प्रकरण में तनाव के बाद सोमवार को स्थिति सामान्य होती दिखाई दी। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि नगरासू में कानून-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में है और चारधाम यात्रा पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। प्रशासन ने लोगों से सोशल मीडिया पर प्रसारित अफवाहों से दूर रहने की अपील की है।
नगरासू गुरुद्वारा उस समय सुर्खियों में आया जब चमोली के कर्णप्रयाग में हुई झड़प के बाद कुछ निहंग श्र(ालु अपनी मांगों को लेकर गुरुद्वारे में डटे रहे। प्रारंभिक खबरों में गुरुद्वारे के प्रबंधक को बंधक बनाए जाने और कब्जे जैसी बातें सामने आईं, लेकिन जिला प्रशासन ने इन दावों का खंडन करते हुए कहा कि किसी को बंधक नहीं बनाया गया था और पूरी स्थिति बातचीत के माध्यम से संभाली जा रही थी।
रविवार देर रात तक जिला प्रशासन, पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों ने लगातार निहंगों से वार्ता की। प्रशासन के अनुसार बातचीत सकारात्मक रही और किसी प्रकार की बल प्रयोग की नौबत नहीं आई। सोमवार को गुरुद्वारे में सामान्य रूप से अरदास और लंगर सेवा भी संचालित होती रही, जिससे श्र(ालुओं और स्थानीय लोगों ने राहत की सांस ली।
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ चमोली जिले के कर्णप्रयाग में पार्किंग विवाद के बाद हुई हिंसक झड़प को माना जा रहा है। उस मामले में चार निहंग श्र(ालुओं की गिरफ्तारी के बाद विरोध का स्वर नगरासू तक पहुंच गया। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि गिरफ्तारी कानून के अनुसार की गई है और मामले की जांच जारी है।
प्रदेश सरकार ने भी पूरे मामले पर नजर बनाए रखी है। गृह विभाग ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि चारधाम यात्रा की सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता रहे और किसी भी अफवाह को फैलने से रोका जाए। प्रशासन का कहना है कि यात्रा मार्ग पूरी तरह सुरक्षित है और श्र(ालु बिना किसी भय के अपनी यात्रा जारी रख सकते हैं।
हालांकि राजनीतिक स्तर पर इस घटनाक्रम ने सरकार को विपक्ष के निशाने पर ला दिया है। विपक्ष का कहना है कि यदि प्रारंभिक स्तर पर संवाद स्थापित किया जाता तो मामला इतना नहीं बढ़ता। दूसरी ओर सरकार का दावा है कि संवेदनशील परिस्थिति को बिना किसी बड़े टकराव के नियंत्रित करना प्रशासन की बड़ी सफलता है।
नगरासू प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि चारधाम और हेमकुंड साहिब यात्रा के दौरान सुरक्षा प्रबंधन, भीड़ नियंत्रण और विभिन्न राज्यों से आने वाले श्र(ालुओं के बीच बेहतर समन्वय कैसे सुनिश्चित किया जाए। धार्मिक यात्राओं के दौरान छोटी घटनाएं भी यदि समय पर नहीं संभाली जाएं तो वे बड़े विवाद का रूप ले सकती हैं।
फिलहाल नगरासू में शांति लौट आई है, लेकिन प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब विश्वास बहाल करने की है। निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्रवाई और अफवाहों पर प्रभावी नियंत्रण ही इस पूरे प्रकरण का स्थायी समाधान साबित हो सकता है।
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अधिकारियों ने की शांति की अपील
शैलेश बगोली गृह सचिव ने कहा कि यह मामला दो पक्षों के आपसी विवाद से जुड़ा है। इसे सांप्रदायिक रंग देकर माहौल खराब करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आईजी गढ़वाल को निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए गए हैं।विशाल मिश्रा जिलाधिकारी, रुद्रप्रयाग ने बताया कि गुरुद्वारे में अरदास और लंगर सेवाएं सामान्य रूप से जारी हैं। किसी प्रकार के स्थाई कब्जे या हिंसा की खबरें भ्रामक हैं। सोशल मीडिया की अफवाहों पर ध्यान न दें। राजीव स्वरूप आईजी, गढ़वाल रेंज ने कहा कि मामले की विस्तृत जांच की जा रही है। सोशल मीडिया पर अफवाह और भ्रामक पोस्ट फैलाने वालों को चिन्हित करने के लिए विशेष जांच के निर्देश दिए गए हैं।
यह था पूरा घटनाक्रम
बता दें कि घटनाक्रम की शुरुआत शनिवार 20 जून को हुई। चमोली जिले के कर्णप्रयाग बाजार में बीते 16 जून को वाहन खड़ा करने को लेकर कुछ सिख तीर्थयात्रियों निहंगों का स्थानीय लोगों से विवाद हो गया था, जिसमें तलवारबाजी में चार स्थानीय लोग घायल हुए थे। इस मामले में पुलिस ने पंजाब के मोहाली निवासी चार निहंगों को गिरफ्तार किया था। शनिवार को हेमकुंड साहिब यात्रा से लौट रहे सात से आठ निहंगों का एक अन्य दल नगरासू गुरुद्वारे पहुंचा। यहां लंगर और ठहरने के दौरान गुरुद्वारा प्रबंधन समिति और इन निहंगों के बीच बहस हो गई। इसके बाद, गिरफ्तार साथियों की तत्काल रिहाई की मांग को लेकर ये निहंग शस्त्रों तलवार, भाला और कृपाण के साथ गुरुद्वारे की तीसरी मंजिल पर चढ़ गए और मोर्चाबंदी कर दी।
यह था आरोप
नगरासू गुरुद्वारे के मुख्य ग्रंथी बाबा बेहंत सिंह ने आरोप लगाया कि शरण और भोजन दिए जाने के बावजूद उक्त दल ने सेवादारों के साथ अभद्रता की, सीसीटीवी कैमरे तोड़े और पुलिस व स्थानीय लोगों पर पथराव की कोशिश की। निहंगों ने गुरुद्वारे के सेवादार नवतेज सिंह समेत दो लोगों को अपने कब्जे में ले लिया था, जिनमें से एक को शनिवार रात और दूसरे को रविवार शाम छोड़ दिया गया। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी विशाल मिश्रा और पुलिस अधीक्षक नीहारिका तोमर भारी पुलिस बल, एटीएस और आईटीबीपी के जवानों के साथ मौके पर डटे रहे। एसपी नीहारिका तोमर ने स्वयं लगभग एक घंटे तक फोन पर निहंगों से वार्ता कर उन्हें कानून हाथ में न लेने के लिए समझाया। चमोली के कर्णप्रयाग और गैरसैंण क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 27 जून तक निषेधाज्ञा धारा 144/संशोधित नागरिक संहिता प्रावधान लागू कर दी गई है।
अल्मोड़ा से विरोध की ‘गूंज’
अल्मोड़ा में मुख्यमंत्री धामी को काले झंडे, गो बैक के नारों से गरमाई सूबे की सियासत
युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान किया विरोध प्रदर्शन, कई हिरासत में
कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक अधिकार बताया, भाजपा ने कहाकृविकास विरोधी राजनीति
देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अल्मोड़ा दौरे के दौरान उस समय राजनीतिक माहौल गरमा गया, जब युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने उन्हें काले झंडे दिखाते हुए गो बैक के नारे लगाए। मुख्यमंत्री के कार्यक्रम स्थल की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने बैरिकेडिंग पर ही रोक दिया। इस दौरान पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी नोकझोंक हुई और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर बाद में छोड़ दिया गया।
मुख्यमंत्री धामी अल्मोड़ा में विभिन्न विकास योजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास के साथ-साथ जनसभा को संबोधित करने पहुंचे थे। कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रही, लेकिन युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए बेरोजगारी, पेपर लीक, बढ़ती महंगाई और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध दर्ज कराया। युवा कांग्रेस नेताओं का कहना था कि प्रदेश का युवा रोजगार, पारदर्शी भर्ती और बेहतर शिक्षा व्यवस्था की मांग कर रहा है, लेकिन सरकार इन मुद्दों पर गंभीर नहीं दिख रही। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि बार-बार भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और युवाओं के भविष्य से जुड़े मामलों पर सरकार जवाबदेही से बच रही है। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री के समक्ष लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का प्रयास किया गया।
दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक नौटंकी करार दिया। भाजपा नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री धामी प्रदेश में रिकॉर्ड विकास कार्यों को गति दे रहे हैं और कांग्रेस जनता के बीच अपनी घटती राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए केवल विरोध की राजनीति कर रही है। भाजपा का दावा है कि प्रदेश में निवेश, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में लगातार काम हो रहा है, जिससे कांग्रेस असहज है।
पुलिस प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम के दौरान स्थिति को नियंत्रण में रखा। अधिकारियों के अनुसार प्रदर्शन की सूचना पहले से थी, इसलिए सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए गए थे। किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए प्रदर्शनकारियों को कार्यक्रम स्थल से पहले ही रोक दिया गया। प्रशासन ने कहा कि कानून-व्यवस्था पूरी तरह सामान्य रही और मुख्यमंत्री के सभी निर्धारित कार्यक्रम शांतिपूर्वक संपन्न हुए।
अल्मोड़ा की घटना ऐसे समय हुई है जब उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। विपक्ष लगातार बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महंगाई और युवाओं के मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। वहीं भाजपा विकास कार्यों और मजबूत नेतृत्व को चुनावी मुद्दा बनाने में जुटी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री के हर दौरे पर विपक्ष इस तरह के प्रतीकात्मक विरोध के जरिए सरकार को घेरने का प्रयास करेगा। दूसरी ओर भाजपा ऐसे प्रदर्शनों को विकास विरोधी बताकर जनता के बीच अपना पक्ष मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
अल्मोड़ा के स्थानीय लोगों का कहना है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन विरोध शांतिपूर्ण होना चाहिए। आम लोगों की अपेक्षा है कि राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे जमीनी मुद्दों पर ठोस समाधान प्रस्तुत करें।
चुनावी बिसात के बीच नया ‘सियासी ट्रेंड’
बीजेपी नेताओं की घेराबंदी से गरमाई सियासत
उत्तराखंड में विपक्ष ने बदली चुनाव की रणनीति
चुनाव अभी दूर, लेकिन राजनीतिक टकराव तेज
सीएम से लेकर प्रदेश अध्यक्ष व मंत्रियों का विरोध
जनाक्रोश की अभिव्यक्ति या विपक्ष की है रणनीति
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। प्रदेश के राजनीतिक माहौल में पिछले कुछ सप्ताह के दौरान एक नया ट्रेंड तेजी से उभरकर सामने आया है। मुख्यमंत्री, मंत्रियों और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के सार्वजनिक कार्यक्रमों में विरोध, घेराव, काले झंडे और गो बैक के नारे अब लगातार देखने को मिल रहे हैं।
अल्मोड़ा में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को युवा कांग्रेस द्वारा काले झंडे दिखाए जाने का मामला हो या अन्य जिलों में भाजपा नेताओं के कार्यक्रमों के दौरान विरोध प्रदर्शनकृइन घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि विपक्ष अब केवल प्रेस बयान और धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहना चाहता। उसकी रणनीति सीधे उन मंचों तक पहुंचने की है, जहां सत्ता जनता के बीच मौजूद है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह केवल अलग-अलग घटनाएं हैं या फिर इसके पीछे कोई संगठित चुनावी रणनीति काम कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस और उससे जुड़े संगठन अब भाजपा के प्रत्येक बड़े कार्यक्रम को राजनीतिक अवसर के रूप में देख रहे हैं। उद्देश्य केवल विरोध दर्ज कराना नहीं, बल्कि सरकार को लगातार रक्षात्मक स्थिति में रखना भी है। इस रणनीति के तहत मुख्यमंत्री, मंत्रियों और भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों के दौरों की पहले से जानकारी जुटाई जाती है। इसके बाद स्थानीय कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर विरोध प्रदर्शन, काले झंडे, ज्ञापन और नारेबाजी के माध्यम से राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की जाती है। इन प्रदर्शनों के वीडियो और तस्वीरें कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर प्रसारित कर दी जाती हैं, जिससे राजनीतिक चर्चा का दायरा और बढ़ जाता है।
विपक्ष बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था, किसानों की समस्याओं और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहा है। इन मुद्दों को प्रत्येक विरोध प्रदर्शन का आधार बनाया जा रहा है ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सरकार जनभावनाओं से दूर होती जा रही है। हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि विरोध के पीछे केवल मुद्दे ही नहीं, बल्कि चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने और संगठन को ऊर्जा देने की रणनीति भी काम कर रही है।
भाजपा इन विरोध प्रदर्शनों को विपक्ष की राजनीतिक हताशा करार दे रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जब सरकार विकास कार्यों, निवेश, चारधाम यात्रा, समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ रही है, तब विपक्ष के पास केवल विरोध की राजनीति बची है। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा के सामने भी चुनौती कम नहीं है। चुनावी वर्ष नजदीक आने के साथ हर सार्वजनिक कार्यक्रम में सुरक्षा, राजनीतिक संदेश और जनसंपर्ककृतीनों का संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा। किसी भी छोटी घटना का राजनीतिक असर बड़ा हो सकता है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में यह चुनावी संघर्ष का शुरुआती चरण है। विपक्ष सड़क पर संघर्ष का माहौल बनाकर सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करना चाहता है, जबकि भाजपा विकास और स्थिर नेतृत्व के मुद्दे पर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। यानी दोनों दलों ने अपनी-अपनी चुनावी रणनीति तय कर ली है। एक ओर सड़क पर संघर्ष का संदेश है, तो दूसरी ओर विकास और उपलब्धियों का दावा।
लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों ने एक और सवाल खड़ा किया है कि क्या राजनीतिक विरोध लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रह पाएगा? विशेषज्ञों का मानना है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन यदि विरोध टकराव या हिंसा में बदलता है तो इसका नुकसान राजनीतिक दलों से ज्यादा लोकतांत्रिक व्यवस्था को होगा। प्रशासन के सामने भी चुनौती है कि वह राजनीतिक विरोध और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखे। चुनावी माहौल में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
भाजपा का कहना है कि लोकतंत्र में विरोध का स्वागत है, लेकिन अराजकता स्वीकार नहीं की जाएगी। पार्टी नेताओं का दावा है कि जनता विकास कार्यों और सरकार के प्रदर्शन के आधार पर निर्णय करेगी। सरकार का यह भी कहना है कि विपक्ष जनता के वास्तविक मुद्दों के बजाय राजनीतिक सुर्खियां बटोरने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार जनता के सवालों से बच रही है। विपक्ष के अनुसार यदि युवाओं, कर्मचारियों, किसानों और आम लोगों की समस्याओं का समाधान समय पर किया जाता, तो सड़क पर उतरने की नौबत नहीं आती। कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक अधिकार और जनभावनाओं की अभिव्यक्ति बता रही है।
उत्तराखंड की राजनीति में अब चुनावी शतरंज की बिसात सज चुकी है। भाजपा अपनी उपलब्धियों के सहारे जनादेश दोहराने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष जनाक्रोश को राजनीतिक पूंजी में बदलने की कोशिश कर रहा है। भाजपा नेताओं की लगातार घेराबंदी की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि आने वाले महीनों में प्रदेश की राजनीति और अधिक आक्रामक होगी। हालांकि यह निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी कि ये सभी विरोध एक केंद्रीकृत रणनीति का हिस्सा हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि विपक्ष सार्वजनिक कार्यक्रमों को सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने के मंच के रूप में अधिक सक्रियता से इस्तेमाल कर रहा है। विधानसभा चुनाव नजदीक आते-आते यह सियासी टकराव और तेज होने की पूरी संभावना है।
‘भडूडू’ था पहाड़ की रसोई का राजा
इसमें पकती थी दाल और बसती थी पहाड़ की संस्कृति
कांसे का भडूडू केवल नहीं था दाल पकाने का एक बर्तन
पारिवारिक संस्कृति और लोक विरासत का जीवंत प्रतीक
गैस और प्रेशर कुकर के दौर में यह अनमोल धरोहर लुप्त
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल हिमालय, देवस्थल, नदियां और जंगल ही नहीं हैं, बल्कि यहां की पारंपरिक रसोई भी उतनी ही समृ( रही है। पहाड़ की रसोई में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों का अपना अलग महत्व था। सिलबट्टा, ओखली, गंज्याली, तकली और तांबे-पीतल के बर्तनों की तरह ही भडूडू भी हर घर की शान हुआ करता था। आज की पीढ़ी शायद इस नाम से परिचित भी न हो, लेकिन कुछ दशक पहले तक पहाड़ के लगभग हर घर में कांसे का बना भडूडू जरूर होता था। यह विशेष रूप से दाल पकाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। माना जाता था कि भडूडू में बनी गहत, भट्ट, मसूर, उड़द या राजमा की दाल का स्वाद किसी अन्य बर्तन में नहीं आ सकता।
भडूडू केवल भोजन बनाने का साधन नहीं था, बल्कि वह पहाड़ की रसोई का ऐसा साथी था, जिसने पीढ़ियों तक हजारों परिवारों के भोजन को स्वाद और पौष्टिकता से भर दिया। भडूडू कांसे का मोटा और मजबूत बर्तन होता था। इसका निचला हिस्सा गोल और गहरा होता था, जिससे आग की गर्मी पूरे बर्तन में समान रूप से फैलती थी। ऊपर का मुंह अपेक्षाकृत छोटा होता था, जिससे भाप लंबे समय तक भीतर बनी रहती थी और दाल धीरे-धीरे गलती थी। लकड़ी के चूल्हे पर भडूडू को रखा जाता था। नीचे चीड़, बांज, बुरांश या अन्य सूखी लकड़ियां जलती रहती थीं और ऊपर दाल घंटों तक धीमी आंच पर पकती रहती थी।
सुबह-सुबह महिलाएं गहत, भट्ट या मसूर की दाल को धोकर भडूडू में डालती थीं। उसमें पानी, हल्दी और थोड़ा नमक मिलाकर चूल्हे पर चढ़ा दिया जाता था। इसके बाद दाल को जल्दी पकाने की कोई जल्दबाजी नहीं होती थी। दाल धीरे-धीरे उबलती रहती थी। बीच-बीच में उसे लकड़ी के कलछुल से चलाया जाता था। जब दाल पूरी तरह गल जाती, तब उसमें जाखिया, जीरा, लहसुन, सूखी लाल मिर्च और देसी घी का तड़का लगाया जाता था। घर के बुजुर्ग कहते थे कि दाल जितनी धीरे पकेगी, स्वाद उतना ही गहरा होगा।
पहाड़ के लोग मानते थे कि भडूडू में बनी दाल का स्वाद अलग ही होता था। इसके पीछे कांसे का बर्तन गर्मी को संतुलित रखता था। लकड़ी की धीमी आंच दाल को समान रूप से पकाती थी। दाल जल्दी नहीं गलती थी, बल्कि धीरे-धीरे अपना प्राकृतिक स्वाद छोड़ती थी। धुएं की हल्की खुशबू भोजन में अलग सुगंध भर देती थी। यही कारण था कि आज भी बुजुर्ग कहते हैं कि गैस और प्रेशर कुकर में बनी दाल पेट भर सकती है, लेकिन भडूडू वाली दाल मन भर देती थी।
आयुर्वेद में कांसे के बर्तनों का विशेष महत्व बताया गया है। ग्रामीण समाज का मानना था कि कांसे के बर्तन में पका भोजन अधिक सुपाच्य होता है। पहाड़ के लोग इसे किसी वैज्ञानिक सि(ांत के रूप में नहीं, बल्कि अपने अनुभव के आधार पर मानते थे। गहत, भट्ट और उड़द जैसी पौष्टिक दालें जब भडूडू में पकती थीं तो वह लंबे समय तक गर्म भी रहती थीं और उनका स्वाद भी बना रहता था।
पहाड़ के पुराने घरों में रसोई केवल खाना बनाने की जगह नहीं होती थी। जब भडूडू चूल्हे पर चढ़ा होता था, तब पूरा परिवार उसके आसपास बैठता था। बच्चे गृहकार्य करते थे। बुजुर्ग लोककथाएं सुनाते थे। महिलाएं ऊन कातती थीं। पुरुष खेत-खलिहान की बातें करते थे। यानी भडूडू के साथ केवल दाल नहीं पकती थी, बल्कि परिवार भी साथ बैठता था। पहाड़ में बेटी की विदाई के समय उसे तांबे और कांसे के बर्तनों के साथ भडूडू भी दिया जाता था। इसे गृहस्थी की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। कई परिवार आज भी अपने पूर्वजों का भडूडू संभालकर रखते हैं। यह केवल बर्तन नहीं, बल्कि परिवार की विरासत माना जाता है।
समय बदला, लकड़ी के चूल्हों की जगह गैस ने ले ली। प्रेशर कुकर ने घंटों पकने वाली दाल को कुछ मिनटों में तैयार कर दिया। स्टील और नॉन-स्टिक बर्तनों का चलन बढ़ गया। धीरे-धीरे भडूडू रसोई से गायब होने लगा। आज गांवों में भी बहुत कम घर ऐसे हैं, जहां नियमित रूप से भडूडू का इस्तेमाल होता हो। लोक संस्कृति के जानकार मानते हैं कि यदि पारंपरिक रसोई से जुड़े बर्तनों को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों और तस्वीरों में ही इन्हें देख पाएंगी। ग्रामीण पर्यटन, होम-स्टे और पारंपरिक पहाड़ी भोजन के माध्यम से भडूडू को फिर से पहचान दिलाई जा सकती है। यदि पर्यटकों को भडूडू में बनी गहत या भट्ट की दाल परोसी जाए तो यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई दे सकता है।
पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, मेलों और लोकगीतों में नहीं बसती, बल्कि उसकी रसोई में भी जीवित रहती है। भडूडू उसी संस्कृति का एक ऐसा अध्याय है, जो धीरे-धीरे बंद होता जा रहा है। यदि हम अपनी अगली पीढ़ी को पहाड़ की असली पहचान से जोड़ना चाहते हैं, तो हमें केवल व्यंजन ही नहीं, बल्कि उन्हें बनाने वाले पारंपरिक बर्तनों और उनसे जुड़ी जीवनशैली को भी सहेजना होगा। क्योंकि भडूडू में पकने वाली दाल केवल भोजन नहीं थी, वह पहाड़ की आत्मा का स्वाद थी।
रविवार, 21 जून 2026
भीमलः उत्तराखंड के पहाड़ों का ‘कल्पवृक्ष’
भीमल के पेड़ में दवा भी, सहारा भी और आजीविका भी
पहाड़ की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रहा भीमल का पेड़
औषधीय गुणों से लेकर मजबूत रेशे तक हर रूप में अनमोल
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में प्रकृति ने ऐसी अनेक धरोहरें दी हैं, जिन्होंने सदियों से ग्रामीण जीवन को आत्मनिर्भर बनाया। इन्हीं में से एक है भीमल का पेड़। पहाड़ के बुजुर्ग इसे केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि जीवन का साथी मानते हैं। इसकी छाल से निकलने वाला मजबूत रेशा हो, पत्तियों से मिलने वाला पौष्टिक चारा, लकड़ी का घरेलू उपयोग या फिर इसके औषधीय गुणकृभीमल का हर हिस्सा किसी न किसी रूप में मानव और पशुओं के लिए उपयोगी रहा है।
एक समय था जब पहाड़ के लगभग हर गांव के आसपास भीमल के पेड़ सहज ही दिखाई देते थे। गांव की महिलाएं इसकी छाल से रेशा निकालकर मजबूत रस्सियां बनाती थीं। इन रस्सियों का उपयोग खेतों में, पशुपालन में, घास और लकड़ी बांधने, पुल बनाने और घरेलू कार्यों में वर्षों तक किया जाता था। आज भले ही नायलॉन और प्लास्टिक ने उनकी जगह ले ली हो, लेकिन भीमल की रस्सी की मजबूती और टिकाऊपन का मुकाबला आज भी मुश्किल माना जाता है।
पहाड़ की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक पशुपालन पर आधारित रही है। भीमल की मुलायम और पौष्टिक पत्तियां गाय, बैल, बकरी और भैंस के लिए उत्कृष्ट चारे के रूप में जानी जाती हैं। विशेषकर सर्दियों में, जब हरा चारा कम उपलब्ध होता है, तब भीमल की पत्तियां पशुओं के पोषण का बड़ा आधार बनती हैं। यही कारण है कि ग्रामीण परिवार आज भी अपने खेतों की मेड़ों और घरों के आसपास भीमल लगाना पसंद करते हैं।
आयुर्वेद और लोक चिकित्सा में भीमल का विशेष महत्व है। ग्रामीण परंपराओं में इसकी छाल और पत्तियों का उपयोग घाव भरने, सूजन कम करने तथा त्वचा संबंधी समस्याओं में किया जाता रहा है। माना जाता है कि इसकी छाल में ऐसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि किसी भी औषधीय उपयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक मानी जाती है।
भीमल केवल इंसान के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी वरदान है। इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़कर रखती हैं, जिससे पहाड़ी ढलानों पर कटाव कम होता है। वर्षा के पानी को भूमि में समाहित करने में भी यह वृक्ष मददगार माना जाता है। यही कारण है कि जल संरक्षण और भूस्खलन रोकने के प्रयासों में भी भीमल जैसे स्थानीय वृक्षों को महत्वपूर्ण माना जाता है।
पहले गांवों में महिलाएं भीमल के रेशे से रस्सी, डोरी, जाल और कई हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करती थीं। इन उत्पादों की स्थानीय बाजारों में अच्छी मांग रहती थी। यदि आधुनिक डिजाइन और विपणन से जोड़ा जाए, तो भीमल आधारित हस्तशिल्प आज भी ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार का सशक्त माध्यम बन सकता है।
बदलती जीवनशैली, पलायन और प्लास्टिक उत्पादों के बढ़ते उपयोग के कारण भीमल के पेड़ों की संख्या और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान में लगातार कमी आ रही है। नई पीढ़ी भीमल की उपयोगिता से धीरे-धीरे अनजान होती जा रही है। वन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो पहाड़ अपनी एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर खो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भीमल के पौधों का बड़े पैमाने पर रोपण किया जाए और इसके रेशे व अन्य उत्पादों का वैज्ञानिक ढंग से मूल्य संवर्धन किया जाए, तो यह पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती दे सकता है। जैविक और प्राकृतिक उत्पादों की बढ़ती मांग के दौर में भीमल से बने उत्पाद देश-विदेश के बाजारों में अपनी अलग पहचान बना सकते हैं।
पहाड़ के बुजुर्ग कहते हैंकृजिस गांव में भीमल है, वहां पशुधन भी स्वस्थ रहता है और प्रकृति भी खुशहाल रहती है। आधुनिकता की दौड़ में यदि इस वृक्ष और इससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान को सहेजा जाए, तो भीमल आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृ( लोक संस्कृति, आत्मनिर्भरता और प्रकृति से जुड़ाव का जीवंत प्रतीक बना रहेगा।
धामी का ‘जीरो टालरेंस’ एक्शन या चुनावी साल का ‘मास्टरस्ट्रोक’
भूमि प्रकरण में धामी सरकार की कार्रवाई के बाद भ्रष्टाचार पर सियासत
चुनावी साल में प्रशासनिक सख्ती बन गई राजनीतिक विमर्श का केंद्र
धामी सरकार का अफसरशाही को कड़ा संदेश, विपक्ष उठा रहा सवाल
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले हरिद्वार नगर निगम के भूमि प्रकरण में धामी सरकार की सख्त कार्रवाई ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। जांच में जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आने के बाद सरकार ने कार्रवाई की, उसे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जीरो टालरेंस नीति का बड़ा उदाहरण बताया जा रहा है। वहीं विपक्ष इसे स्वागत योग्य कदम तो मान रहा है, लेकिन यह सवाल भी उठा रहा है कि क्या यह सख्ती हर मामले में समान रूप से लागू होगी या फिर चुनावी साल में सरकार अपनी छवि चमकाने की कोशिश कर रही है। यह प्रकरण अब केवल हरिद्वार नगर निगम तक सीमित नहीं रह गया है। यह पूरे प्रदेश की नौकरशाही, राजनीतिक व्यवस्था और चुनावी माहौल का बड़ा विषय बन गया है। सत्ता, विपक्ष और आम जनताकृतीनों की नजर इस बात पर है कि सरकार इस कार्रवाई को आखिर किस मुकाम तक ले जाती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार सार्वजनिक मंचों से कहते रहे हैं कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करेगी। सरकार का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में नकल माफिया के खिलाफ कठोर कानून, भर्ती घोटालों में कार्रवाई, अवैध कब्जों पर अभियान और अब हरिद्वार नगर निगम प्रकरण में त्वरित निर्णय इस बात के प्रमाण हैं कि शासन की प्राथमिकता पारदर्शिता और जवाबदेही है। सरकार के अनुसार यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके पद या प्रभाव की परवाह किए बिना कार्रवाई होगी।
भाजपा का मानना है कि इससे जनता में यह भरोसा मजबूत होगा कि कानून सबके लिए समान है और प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही तय की जा रही है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि पहले भ्रष्टाचार के मामलों में वर्षों तक फाइलें दबाकर रखी जाती थीं, जबकि वर्तमान सरकार ने कार्रवाई की गति तेज की है। पार्टी इसे निर्णायक नेतृत्व की पहचान के रूप में भी पेश कर रही है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल इस कार्रवाई का खुलकर विरोध नहीं कर रहे, लेकिन सरकार की मंशा पर सवाल जरूर उठा रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में जीरो टालरेंस की नीति पर चल रही है तो प्रदेश में सामने आए हर भ्रष्टाचार के मामले में समान स्तर की कार्रवाई होनी चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि कई मामलों में कार्रवाई की गति धीमी रही, जबकि कुछ मामलों में तत्काल सख्ती दिखाई गई। आम आदमी पार्टी का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का स्वागत है, लेकिन इसे केवल चुनावी संदेश तक सीमित नहीं रहना चाहिए। दोषियों को न्यायालय में सजा दिलाना ही वास्तविक सफलता होगी। यूकेडी का कहना है कि यदि सरकार ईमानदारी से पूरे प्रशासनिक ढांचे की जवाबदेही तय करती है तो जनता उसका समर्थन करेगी, लेकिन कार्रवाई केवल चुनिंदा मामलों तक सीमित रही तो जनता इसे राजनीतिक प्रबंधन के रूप में देखेगी।
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि हरिद्वार नगर निगम प्रकरण ने पूरे सरकारी तंत्र को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि अब फाइलों में लिए गए निर्णयों की जवाबदेही तय हो सकती है। लंबे समय से यह धारणा रही है कि कुछ अधिकारी नियमों की अलग-अलग व्याख्या कर विवादास्पद फैसले लेते हैं। इस कार्रवाई ने संकेत दिया है कि सरकारी पद अब केवल अधिकार नहीं बल्कि उत्तरदायित्व भी है। यदि आने वाले समय में अन्य विभागों में भी इसी तरह निष्पक्ष कार्रवाई होती है तो इससे प्रशासनिक अनुशासन मजबूत हो सकता है।
जनता की राय इस मुद्दे पर दो हिस्सों में बंटी दिखाई देती है। एक वर्ग का मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जितनी भी सख्ती हो, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लोगों का कहना है कि यदि अधिकारी और कर्मचारी जवाबदेह होंगे तो सरकारी व्यवस्था में सुधार आएगा और जनता का विश्वास बढ़ेगा। दूसरा वर्ग यह मानता है कि केवल निलंबन या विभागीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। यदि जांच समयब( पूरी नहीं हुई, दोषियों को कानूनी सजा नहीं मिली और सरकारी नुकसान की भरपाई नहीं हुई, तो ऐसी कार्रवाई का असर सीमित रह जाएगा। जनता अब परिणाम देखना चाहती है, केवल घोषणाएं नहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव 2027 में भ्रष्टाचार, सुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही बड़े चुनावी मुद्दे बन सकते हैं। भाजपा इस कार्रवाई को अपनी ईमानदार और निर्णायक सरकार की पहचान के रूप में प्रचारित करेगी। दूसरी ओर विपक्ष यह साबित करने की कोशिश करेगा कि सरकार की सख्ती केवल चुनावी वर्ष तक सीमित है। युवा मतदाता, मध्यम वर्ग और सरकारी सेवाओं से जुड़े लोग इस मुद्दे को गंभीरता से देख रहे हैं। यही वर्ग चुनावी परिणामों को भी काफी हद तक प्रभावित करता है।
हरिद्वार नगर निगम भूमि प्रकरण में धामी सरकार की कार्रवाई ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को सरकार अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत के रूप में पेश करना चाहती है। लेकिन चुनावी राजनीति में केवल कार्रवाई की शुरुआत नहीं, उसका तार्किक और निष्पक्ष निष्कर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। यदि सरकार आने वाले समय में बिना किसी भेदभाव के सभी मामलों में समान कठोरता दिखाती है, तो जीरो टालरेंस की नीति एक मजबूत राजनीतिक पूंजी बन सकती है। लेकिन यदि कार्रवाई चुनिंदा मामलों तक सीमित रह गई, तो विपक्ष इसे चुनावी प्रबंधन करार देने में देर नहीं लगाएगा।
भाजपा के लिए ‘खतरे की घंटी’
गृह जनपद में ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का विरोध
सत्ता के प्रति बढ़ती नाराजगी को विपक्ष ने बनाया चुनावी मुद्दा
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के विरोध से बढ़ी धामी सरकार की चिंता
देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले उत्तराखंड की राजनीति में ऐसे संकेत दिखाई देने लगे हैं, जो भाजपा के लिए चिंता का कारण बन सकते हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को उनके गृह जनपद चमोली के पोखरी क्षेत्र में विरोध का सामना करना पड़ा। कार्यक्रम के दौरान महेंद्र भट्ट मुर्दाबाद के नारे लगने की घटना ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। विपक्ष इसे धामी सरकार के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश का संकेत बता रहा है, जबकि भाजपा इसे विपक्ष द्वारा प्रायोजित विरोध करार दे रही है।
भाजपा ने 2022 के चुनाव में विकास, समान नागरिक संहिता, सख्त कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई जैसे मुद्दों के सहारे दोबारा सत्ता हासिल की थी। लेकिन कार्यकाल के अंतिम चरण में रोजगार, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्थानीय समस्याएं और विकास कार्यों की रफ्तार जैसे मुद्दे फिर से चर्चा में हैं। ऐसे माहौल में यदि पार्टी के शीर्ष प्रदेश नेतृत्व को अपने ही क्षेत्र में विरोध का सामना करना पड़े तो उसका राजनीतिक संदेश दूर तक जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी लहर हमेशा बड़े आंदोलनों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी स्थानीय घटनाओं से आकार लेना शुरू करती है। जनता जब अपने प्रतिनिधियों के सामने खुलकर नाराजगी जताने लगे तो यह संकेत संगठन के लिए भी गंभीर माना जाता है।
विपक्ष ने इस घटनाक्रम को हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस का कहना है कि यह विरोध प्रदेशभर में बढ़ रहे जन असंतोष की शुरुआत है। पार्टी का आरोप है कि सरकार ने युवाओं, किसानों, कर्मचारियों और आम जनता से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई। आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल भी इसे जनता के मोहभंग का संकेत बताते हुए सरकार पर लगातार हमलावर हैं।
हालांकि भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को स्थानीय मुद्दों से जुड़ी सामान्य लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया बता रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जनता की हर बात सुनी जाएगी और सरकार विकास कार्यों के आधार पर दोबारा जनता के बीच जाएगी। भाजपा संगठन भी बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर फीडबैक लेने और असंतोष को दूर करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
चुनावी राजनीति में प्रतीकात्मक घटनाओं का महत्व कम नहीं होता। अपने ही गृह जनपद में प्रदेश अध्यक्ष का विरोध विपक्ष को यह कहने का अवसर देता है कि सरकार के खिलाफ असंतोष अब भाजपा के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों तक पहुंचने लगा है। वहीं भाजपा के लिए यह संदेश है कि केवल सरकार की उपलब्धियां गिनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जनता की नाराजगी को समय रहते दूर करना भी जरूरी होगा।
उत्तराखंड की राजनीति में अभी चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि आने वाले महीनों में रोजगार, महंगाई, पेपर लीक, स्थानीय विकास और जनसरोकारों के मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में रहेंगे। यदि भाजपा समय रहते संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाकर जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में सफल नहीं होती, तो विपक्ष इन मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।
युवाओं का ‘गुस्सा’ बनाम सरकार की ‘साख’
बेरोजगारों के मुद्दे पर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी में
भाजपा के लिए चुनाव से पहले युवाओं के भरोसे की ‘जंग’
कांग्रेस ने खोला मोर्चा, आप और यूकेडी भी हुई आक्रामक
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्य में एक बार फिर पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं का मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस ने इसे सरकार की सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलता बताते हुए प्रदेशभर में आंदोलन की रणनीति तैयार कर ली है। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल भी बेरोजगार युवाओं के साथ खड़े होकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में रोजगार और भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।
उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने लाखों युवाओं के भविष्य पर सवाल खड़े किए। स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा, सचिवालय सुरक्षा, वन दरोगा सहित कई परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोपों ने प्रदेश की राजनीति को झकझोर दिया था। हजारों अभ्यर्थियों ने सड़कों पर उतरकर आंदोलन किया और सरकार को कई परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं।
इसी मुद्दे को कांग्रेस अब चुनावी हथियार बना रही है। प्रदेश कांग्रेस का कहना है कि सरकार युवाओं को रोजगार देने में असफल रही और जो भर्तियां निकाली गईं, उनमें भी भ्रष्टाचार और पेपर लीक ने युवाओं का विश्वास तोड़ दिया। कांग्रेस प्रदेशभर में युवा न्याय अभियान चलाने की तैयारी कर रही है, जिसमें बेरोजगार युवाओं के साथ संवाद और जनसभाएं आयोजित की जाएंगी।
आम आदमी पार्टी भी इस मुद्दे पर लगातार सरकार को घेर रही है। पार्टी का आरोप है कि भाजपा सरकार ने युवाओं को रोजगार के नाम पर केवल आश्वासन दिए। आप का कहना है कि यदि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और जवाबदेह होती तो पेपर लीक जैसे मामले सामने नहीं आते। पार्टी युवाओं के बीच रोजगार गारंटी और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था को प्रमुख चुनावी वादा बनाने की तैयारी में है।
उत्तराखंड क्रांति दल ने भी इस मुद्दे को राज्य के युवाओं के सम्मान से जोड़ दिया है। यूकेडी का कहना है कि प्रदेश बनने का उद्देश्य स्थानीय युवाओं को रोजगार देना था, लेकिन आज वही युवा भर्ती घोटालों और बेरोजगारी से सबसे अधिक प्रभावित हैं। पार्टी इसे राज्य की अस्मिता और युवाओं के भविष्य का सवाल बताकर गांव-गांव तक ले जाने की रणनीति बना रही है।
भाजपा सरकार का कहना है कि पेपर लीक मामलों में पहली बार सख्त कार्रवाई की गई। आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, परीक्षाएं निरस्त की गईं और दोषियों के खिलाफ कठोर कानून लागू किया गया। सरकार यह भी दावा कर रही है कि नई भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाई गई है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तकनीकी निगरानी मजबूत की गई है। भाजपा चुनावी मंचों पर यह संदेश देने की तैयारी में है कि पिछली घटनाओं पर कार्रवाई करके सरकार ने युवाओं का भरोसा बहाल करने का प्रयास किया है।
उत्तराखंड में लगभग 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या चुनावी समीकरणों में निर्णायक मानी जाती है। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाएं और सरकारी नौकरियां हमेशा से इस वर्ग के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्ष इस मुद्दे को लगातार जीवित रखता है तो यह चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस, आप और यूकेडी तीनों अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के बावजूद पेपर लीक और बेरोजगारी के मुद्दे पर लगभग एक ही सुर में सरकार को घेर रहे हैं। हालांकि तीनों दलों की चुनावी रणनीति अलग है, लेकिन लक्ष्य एक ही हैकृयुवा मतदाताओं का विश्वास जीतना।
शनिवार, 20 जून 2026
फिर ‘भाजपा’ या अब ‘कांग्रेस’
उत्तराखंड में ‘हैट्रिक’ पर भाजपा की नजर और वापसी के लिए बेताब दिख रही है प्रदेश में कांग्रेस
भाजपा तीसरी बार सत्ता बचाने की चुनौती में, कांग्रेस सत्ता परिवर्तन की परंपरा लौटाने की कोशिश में
संगठन, बूथ, बागी, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दे तय करेंगे सूबे में अगली सरकार
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी कुछ महीने दूर हों, लेकिन प्रदेश में चुनावी रण लगभग सज चुका है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने संगठनात्मक बैठकों, कार्यकर्ता सम्मेलनों, जनसंपर्क अभियानों और केंद्रीय नेताओं के लगातार दौरों के जरिए यह संकेत दे दिया है कि अब हर राजनीतिक कदम चुनावी चश्मे से देखा जाएगा। भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का इतिहास रचना चाहती है, जबकि कांग्रेस 2022 में टूटी सत्ता परिवर्तन की परंपरा को फिर से स्थापित करने की कोशिश में है।
उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि राज्य गठन के बाद लंबे समय तक सत्ता भाजपा और कांग्रेस के बीच बदलती रही। वर्ष 2022 में पहली बार भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इस परंपरा को तोड़ा। अब 2027 का चुनाव इस सवाल का जवाब देगा कि क्या यह बदलाव स्थायी है या मतदाता फिर सत्ता परिवर्तन की ओर लौटेंगे। भाजपा इस चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उतरने का स्पष्ट संकेत दे चुकी है। पार्टी का पूरा फोकस संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, पिछले चुनाव में हारे बूथों की समीक्षा, लाभार्थी वर्ग को फिर से जोड़ने और केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं को चुनावी मुद्दा बनाने पर है। राष्ट्रीय नेतृत्व भी लगातार उत्तराखंड पर विशेष ध्यान दे रहा है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती एंटी-इनकंबेंसी को नियंत्रित करना है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण स्थानीय स्तर पर विधायकों के खिलाफ नाराजगी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे चुनाव में असर डाल सकते हैं। दूसरी ओर कांग्रेस ने भी चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। राहुल गांधी, प्रदेश प्रभारी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के लगातार उत्तराखंड दौरे इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। पार्टी संगठन को सक्रिय करने, पुराने नेताओं को साथ लाने, नए चेहरों को अवसर देने और युवाओं के बीच पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस की रणनीति सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, पर्वतीय क्षेत्रों में खाली होते गांव और स्थानीय विकास के मुद्दों को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाना है।
राजनीतिक दल भले ही बड़े-बड़े दावे कर रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और भी है। उत्तराखंड का मतदाता अब केवल बड़े नेताओं की रैलियों से प्रभावित नहीं होता। गांवों में सड़क, पेयजल, अस्पताल, स्कूल, मोबाइल नेटवर्क, वन्यजीवों का आतंक, खेती की बदहाली और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। पहाड़ से लगातार पलायन आज भी सबसे बड़ा सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न है। हजारों गांव आंशिक या पूरी तरह खाली हो चुके हैं। चुनाव के समय यह मुद्दा हर दल उठाता है, लेकिन समाधान अभी भी अधूरा माना जाता है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह चुनाव इस बात की भी परीक्षा होगा कि जनता विकास के दावों को प्राथमिकता देती है या स्थानीय असंतोष को। भाजपा के सामने उपलब्धियों को जनसमर्थन में बदलने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस के सामने असंतोष को वोट में बदलने की। अंतिम फैसला हमेशा की तरह उत्तराखंड की जनता के हाथ में होगा, जो राज्य गठन के बाद कई बार यह साबित कर चुकी है कि वह किसी भी राजनीतिक दल को स्थायी जनादेश देने के बजाय उसके कामकाज का कठोर मूल्यांकन करती है।
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बागी बन सकते हैं गेम चेंजर
उत्तराखंड के लगभग हर चुनाव में टिकट वितरण के बाद बगावत देखने को मिलती रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ऐसे कई नेता हैं जो वर्षों से टिकट की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि टिकट वितरण में असंतोष बढ़ता है तो निर्दलीय उम्मीदवार कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय बना सकते हैं। प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर हजार या उससे भी कम वोटों का रहा है। ऐसे में बागी उम्मीदवार चुनावी समीकरण बिगाड़ सकते हैं।
अभी तक की सरकारें
2002-कांग्रेस सरकार
2007-भाजपा सरकार
2012-कांग्रेस सरकार
2017-भाजपा सरकार
2022-भाजपा सरकार
थम गए घराट के ‘पाट’ अब बची हैं सिर्फ ‘यादें’
घराट’ कृपानी की शक्ति से चलने वाली पारंपरिक आटा चक्की थी पहाड़ की विरासत
--गधेरों के किनारे घराट कभी थे गांव की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक जीवन का केंद्र
--पलायन, आधुनिक चक्कियों और बदलती जीवनशैली ने धरोहर को इतिहास के पन्नों तक समेटा
--कभी पहाड़ में गांवों के घराट के आसपास हर समय रहती थी लोगों की खूब चहल-पहल
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में बहती छोटी-छोटी नदियों और गधेरों के किनारे कभी एक ऐसी विरासत जीवंत हुआ करती थी, जिसकी घर्र-घर्र की आवाज पूरे गांव के जीवन की लय बन जाती थी। यह विरासत थी ‘घराट’ कृपानी की शक्ति से चलने वाली पारंपरिक आटा चक्की। आज भले ही घराटों के पाट थम चुके हों, लेकिन पहाड़ की स्मृतियों में उनकी आवाज आज भी उतनी ही जीवित है। एक समय था जब गांव का हर परिवार अपने खेतों में उगे गेहूं, मंडुवा, झंगोरा, मक्का और जौं की बोरियां पीठ पर लादकर कई किलोमीटर पैदल चलकर घराट तक पहुंचता था। वहां आटा पिसवाने की कोई जल्दबाजी नहीं होती थी। क्योंकि घराट केवल अनाज पीसने की जगह नहीं था, बल्कि वह गांव का सबसे बड़ा सामाजिक केंद्र था।
घराट के आसपास हर समय लोगों की चहल-पहल रहती थी। कोई अपनी बारी का इंतजार करता, कोई खेती-किसानी की चर्चा करता, तो कोई दूर शहर या फौज में नौकरी कर रहे बेटे का हाल सुनाता। महिलाएं लोकगीत गातीं, बच्चे गधेरे के किनारे खेलते और बुजुर्ग पुराने किस्सों से नई पीढ़ी को गांव का इतिहास सुनाते। कई बार घराट ही वह जगह बन जाता, जहां रिश्ते तय होते, गांव की समस्याओं पर चर्चा होती और सामूहिक फैसले लिए जाते। आज की भाषा में कहें तो घराट गांव की चौपाल, पंचायत और संवाद केंद्रकृतीनों का संगम था।
घराट पहाड़ के लोगों की प्रकृति के साथ तालमेल की अद्भुत मिसाल था। इसमें न बिजली की जरूरत पड़ती थी और न ही डीजल की। गधेरे का बहता पानी लकड़ी के पंखों को घुमाता और वही शक्ति पत्थर के भारी पाट को चलाती थी। धीरे-धीरे पिसा हुआ आटा स्वाद, पौष्टिकता और खुशबू में अलग पहचान रखता था। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण और हरित ऊर्जा की बात कर रही है, तब यह याद करना जरूरी है कि उत्तराखंड के गांव सदियों पहले ही जल ऊर्जा का ऐसा उपयोग कर रहे थे, जो पूरी तरह प्रकृति के अनुकूल था।
रूद्रप्रयाग जिले के दानकोट निवासी देवी प्रसाद गौड बताते हैं कि घराट में पिसे मंडुवे की रोटी, झंगोरे का आटा या गेहूं का स्वाद कुछ अलग ही होता था। आटा गर्म नहीं होता था, इसलिए उसमें अनाज की प्राकृतिक खुशबू और पोषण बना रहता था। यही कारण था कि घराट का आटा केवल भोजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का भी आधार माना जाता था। समय बदला, गांवों से पलायन बढ़ा और बिजली से चलने वाली चक्कियां गांव-गांव तक पहुंच गईं। इसके साथ ही घराटों की रौनक भी खत्म होने लगी। जिन रास्तों पर कभी अनाज की बोरियां लेकर लोग चलते थे, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं। कई घराट ढह चुके हैं, कुछ मलबे में बदल गए हैं और कुछ केवल नाम भर रह गए हैं। पहाड़ के खाली होते गांवों के साथ घराट भी वीरान हो गए। पानी अब भी बहता है, लेकिन उसे घुमाने वाले पाट और वहां जुटने वाला समाज बिखर चुका है।
इतिहासकार डा. भगवती प्रसाद पुरोहित मानते हैं कि घराट केवल तकनीकी संरचना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान हैं। यह उस दौर की याद दिलाते हैं, जब गांव आत्मनिर्भर थे और स्थानीय संसाधनों के सहारे अपना जीवन चलाते थे। यदि इन घराटों का संरक्षण किया जाए, तो इन्हें ग्रामीण पर्यटन, पारंपरिक खाद्य उत्पादों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जा सकता है। कई देशों में ऐसी पारंपरिक जलचक्कियां आज भी पर्यटन का बड़ा आकर्षण हैं। उत्तराखंड भी इस दिशा में पहल कर अपनी विरासत को नई पहचान दे सकता है।
आज भी बरसात के दिनों में जब किसी पुराने घराट के पास से बहता पानी तेज होता है, तो लगता है मानो पत्थरों के बीच कहीं वह पुरानी घर्र-घर्र की आवाज अब भी छिपी हुई है। वह आवाज केवल चक्की के घूमने की नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर पहाड़, सामूहिक जीवन, आपसी प्रेम और प्रकृति के साथ संतुलन की थी। आज जरूरत केवल घराटों को बचाने की नहीं, बल्कि उस संस्कृति को बचाने की है जिसने पहाड़ को सदियों तक जीवंत बनाए रखा। क्योंकि जब घराट बंद हुए, तब केवल चक्कियां नहीं रुकींकृपहाड़ की एक पूरी जीवनशैली धीरे-धीरे खामोश हो गई। हालांकि प्रदेश में आज कुछ संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही है, लेकिन वह भी सिर्फ सरकार बजट की आस में इससे जुडे़ है। बजट खत्म तो उनकी जिम्मेदारी भी खत्म।
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