गुरुवार, 6 अगस्त 2026

udaydinmaan: पहाड़ की ‘घी की कमोली’ नए दौर में गुम

udaydinmaan: पहाड़ की ‘घी की कमोली’ नए दौर में गुम: पहाड़ में यह सिर्फ बर्तन नहीं, घर की शान और समृद्धि की थी कभी पहचान मिट्टी, लकड़ी व धातु के पात्र में पकता शुद्ध घी और महकती पहाड़ी विरासत आधुन...

लोकतंत्र में ‘मालिक’ लाचार

चुनाव से पहले उत्तराखंड में सरकारी चूक का हर्जाना भर रहा है आम मतदाता एआई ने पकड़ी गड़बड़ी, पर सवाल यह कि कंप्यूटर के कीबोर्ड पर उंगलियां किसकी थीं मालिक को किराएदार बना दिया, अब हर मोड़ पर साबित करना पड़ रहा है अपना वजूद सरकारी बाबुओं ने बनाया, फोटो गलत उन्होंने लगाई, फिर चक्कर दफ्तरों के वोटर काट रहे देहरादून। मतदाता... लोकतंत्र का सबसे बड़ा मालिक कहा जाता है। लेकिन हमारे यहां मालिक की हालत अक्सर उस किराएदार जैसी हो जाती है, जिसे हर महीने यह साबित करना पड़ता है कि वह इसी घर में रहता है। उत्तराखंड में इन दिनों यही हो रहा है। हजारों लोगों के घर चुनाव आयोग के नोटिस पहुंच रहे हैं। नाम में गलती, पिता के नाम में गलती, स्पेलिंग में गलती, फोटो किसी और की, पता अधूरा और अब एआई कह रहा हैकृआपत्ति है। लेकिन सवाल यह है कि एआई को यह गलती किसने सिखाई? सोशल मीडिया पर सलीम सैफी ने एक लंबी पोस्ट लिखी है। पोस्ट किसी राजनीतिक दल की प्रेस विज्ञप्ति नहीं है। वह एक सवाल है। सवाल यह कि अगर मतदाता सूची में गलती सरकारी कर्मचारियों ने की थी, तो उसकी सजा मतदाता क्यों भुगत रहा है? सोचिए...जब वोटर कार्ड बन रहा था, तब क्या मतदाता खुद कंप्यूटर के सामने बैठकर अपना नाम टाइप कर रहा था? क्या उसने खुद अपनी फोटो अपलोड की थी? क्या उसने खुद अपने पिता का नाम बदल दिया था? नहीं। यह काम सरकारी मशीनरी ने किया। डेटा एंट्री आपरेटर ने किया। चुनाव विभाग ने किया। लेकिन आज वही विभाग कह रहा है कि आप साबित कीजिए कि आप वही हैं, जो पिछले बीस साल से वोट डालते आ रहे हैं। यह कहानी सिर्फ एक नोटिस की नहीं है। यह उस व्यवस्था की कहानी है, जिसमें गलती ऊपर होती है और जवाब नीचे मांगा जाता है। आज एआई बड़ी चर्चा में है। कहा जा रहा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता लोकतंत्र को और मजबूत करेगी। लेकिन अगर मशीन के सामने गलत डेटा रख दिया जाए, तो मशीन सच नहीं निकालेगी, वह सिर्फ गलती को और तेजी से पहचानकर नोटिस भेज देगी। एआई को फर्क नहीं पड़ता कि मोहन और मोहन सिंह के बीच एक बिंदु किसने छोड़ा। एआई यह नहीं जानता कि किसी बुजुर्ग महिला की फोटो गलती से पड़ोसी के नाम पर कैसे चढ़ गई। एआई यह भी नहीं समझता कि पहाड़ के दूर-दराज गांव में रहने वाला आदमी एक नोटिस मिलने पर तहसील तक आने के लिए पूरा दिन और मजदूरी गंवा देता है। मशीन सिर्फ कहती हैकृमिसमेच, लेकिन लोकतंत्र सिर्फ मशीन से नहीं चलता। लोकतंत्र इंसानों से चलता है और इंसानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती हैकृअपनी गलती स्वीकार करना। उत्तराखंड में सवाल यह नहीं है कि मतदाता सूची शुद्ध होनी चाहिए या नहीं। बिल्कुल होनी चाहिए। सवाल यह है कि शुद्धिकरण का बोझ किसके कंधों पर डाला जा रहा है? अगर विभाग की लापरवाही से किसी का नाम गलत दर्ज हुआ, तो सुधार विभाग के स्तर पर क्यों नहीं हो सकता? अगर लाखों रिकार्ड में गलती है, तो क्या यह सिर्फ मतदाताओं की गलती है? या फिर यह वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही का आईना है? चुनाव आयोग की जिम्मेदारी सिर्फ चुनाव कराना नहीं है। मतदाता का विश्वास बनाए रखना भी है। क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ वोटिंग मशीन से नहीं चलता। लोकतंत्र विश्वास से चलता है और विश्वास तब कमजोर पड़ता है, जब एक आम नागरिक को अपनी पहचान बार-बार साबित करनी पड़े। उत्तराखंड के गांवों में आज भी लोग कहते हैंकृसरकारी दफ्तर जाने का मतलब है पूरा दिन खत्म। अब वही लोग एसआईआर नोटिस लेकर लाइन में खड़े हैं। कोई अपनी रोजी छोड़कर आया है। कोई मजदूरी छोड़कर। कोई बुजुर्ग अपने बेटे के सहारे दफ्तर पहुंचा है। किसलिए? सिर्फ इसलिए कि सरकारी रिकार्ड में कभी किसी ने एक अक्षर गलत लिख दिया था। अगर यह सच है, तो यह सिर्फ तकनीकी गलती नहीं है। यह प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल है और चुनाव से पहले यह सवाल और बड़ा हो जाता है। क्योंकि मतदाता सूची लोकतंत्र की नींव है। नींव कमजोर होगी, तो बहस भी होगी और अविश्वास भी बढ़ेगा। इसलिए जरूरत एआई की तारीफ करने से पहले डेटा की गुणवत्ता सुधारने की है। जरूरत नोटिस भेजने से पहले अपनी फाइलें देखने की है और जरूरत यह स्वीकार करने की है कि हर गलती मतदाता की नहीं होती। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत मतदाता है। अगर वही अपनी पहचान साबित करने में लगा रहेगा, तो फिर लोकतंत्र अपनी पहचान कैसे बचाएगा? यही सवाल है।

पहाड़ की ‘घी की कमोली’ नए दौर में गुम

पहाड़ में यह सिर्फ बर्तन नहीं, घर की शान और समृद्धि की थी कभी पहचान मिट्टी, लकड़ी व धातु के पात्र में पकता शुद्ध घी और महकती पहाड़ी विरासत आधुनिकता की दौड़ में ओझल हुआ पहाड़ के सम्मान व स्वाभिमान का प्रतीक पहाड़ के गांवों में कभी कमोली में रखा घी बनता था रिश्तों व समृद्धि का प्रतीक देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, मेलों और लोकगीतों तक सीमित नहीं है। यहां रसोई में बनने वाली हर चीज अपने भीतर एक इतिहास, एक परंपरा और जीवन-दर्शन समेटे हुए है। इन्हीं परंपराओं में एक नाम है घी की कमोली। आज की नई पीढ़ी के लिए यह शायद एक अपरिचित शब्द हो, लेकिन कभी पहाड़ के गांवों में कमोली केवल घी रखने का बर्तन नहीं, बल्कि समृद्धि, आत्मनिर्भरता और पारिवारिक सम्मान का प्रतीक मानी जाती थी। पहाड़ के पुराने घरों में जब गाय या भैंस का दूध मथा जाता था, तो उससे निकले मक्खन को धीमी आंच पर पकाकर शुद्ध घी बनाया जाता था। यह घी किसी प्लास्टिक के डिब्बे या स्टील के कंटेनर में नहीं, बल्कि विशेष प्रकार के पारंपरिक पात्रकृकमोलीकृमें सुरक्षित रखा जाता था। मिट्टी, लकड़ी या धातु से बनी यह कमोली लंबे समय तक घी को सुरक्षित रखने में सहायक होती थी और घर की रसोई की शान मानी जाती थी। कहावत थीकृजिस घर की कमोली भरी, उस घर की रसोई कभी खाली नहीं। यह केवल कहावत नहीं थी, बल्कि पहाड़ की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का प्रतिबिंब थी। उस समय नकदी कम होती थी, लेकिन घर में अनाज, दाल, घी और मंडुवे का आटा ही असली संपत्ति माने जाते थे। पहाड़ के हरेला, घी संक्रांति, इगास, भिटौली और विवाह जैसे शुभ अवसरों पर कमोली का घी विशेष रूप से निकाला जाता था। इसी घी से पूरी, अरसा, रोट, सिंगल, झंगोरे की खीर और कई पारंपरिक व्यंजन बनते थे। मेहमानों का स्वागत भी इसी घी से बने भोजन से किया जाता था। यह केवल स्वाद नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक था। पहाड़ की एक खूबसूरत परंपरा यह भी रही कि विवाह के समय बेटी को दहेज के दिखावे की बजाय घर का बना शुद्ध घी दिया जाता था। कई परिवार कमोली भरकर घी अपनी बेटी को विदा करते थे। यह संदेश होता था कि बेटी अपने नए घर में भी मायके के स्नेह और संस्कारों की मिठास साथ लेकर जाए। समय बदला, संयुक्त परिवार टूटे, पशुपालन कम हुआ और बाजार का पैकेटबंद घी घरों तक पहुंच गया। इसके साथ ही कमोली भी धीरे-धीरे रसोई से गायब होने लगी। अब अधिकांश परिवार दूध और घी बाजार से खरीदते हैं। नई पीढ़ी के बहुत से बच्चों ने कमोली का नाम तक नहीं सुना। यह बदलाव केवल एक बर्तन का गायब होना नहीं है। यह उस आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कमजोर होने का संकेत भी है, जहां हर घर अपनी जरूरत का दूध, दही, मक्खन और घी स्वयं तैयार करता था। कमोली हमें सिखाती है कि समृद्धि केवल बैंक बैलेंस से नहीं मापी जाती। आत्मनिर्भरता, श्रम, प्रकृति से जुड़ाव और संसाधनों का सम्मान भी किसी समाज की असली पूंजी होते हैं। आज जब आर्गेनिक उत्पादों और पारंपरिक खान-पान की मांग बढ़ रही है, तब पहाड़ की यह विरासत फिर से प्रासंगिक हो गई है। यदि गांवों में पशुपालन को बढ़ावा मिले, स्थानीय दुग्ध उत्पादों को बाजार मिले और पारंपरिक बर्तनों व हस्तशिल्प को संरक्षण दिया जाए, तो कमोली केवल संग्रहालय की वस्तु नहीं रहेगी, बल्कि फिर से पहाड़ की रसोई में अपनी जगह बना सकती है। घी की कमोली केवल एक पात्र नहीं थी, बल्कि पहाड़ के जीवन की खुशबू थी। उसमें रखा घी मेहनत का स्वाद, मां के हाथों का स्नेह और गांव की आत्मनिर्भरता की कहानी सुनाता था। आधुनिकता की दौड़ में यदि हम ऐसी परंपराओं को भूल गए, तो हम केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी खो देंगे। शायद अब समय आ गया है कि पहाड़ अपनी कमोली को फिर से याद करेकृक्योंकि विरासत वही नहीं होती जो किताबों में लिखी हो, विरासत वह भी होती है जो कभी हमारी रसोई में महकती थी।

उत्तराखंड में होगी आर-पार की ‘जंग’

भाजपा को हैट्रिक की अकड़ व कांग्रेस को वजूद की फिक्र सूबे में रणनीति की चौपड़ पर आमने-सामने दो दिग्गज दल टूटेगा इतिहास का तिलस्म या सत्ता की हैट्रिक से गूंजेगा पहाड़ भाजपा की मिशन रिपीट तो कांग्रेस की वापसी की है तैयारी देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी कुछ महीने का समय भले ही शेष हो, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी तापमान तेजी से बढ़ने लगा है। सत्ता पर लगातार तीसरी बार कब्जा जमाने का लक्ष्य लेकर भाजपा मैदान में उतर चुकी है, जबकि पिछले दो विधानसभा चुनावों में हार का सामना करने वाली कांग्रेस इस बार सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। दोनों दलों ने संगठन, रणनीति और जनसंपर्क के स्तर पर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इस बार मुकाबला केवल चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे की परीक्षा का भी होगा। बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई, चारधाम यात्रा, भू-कानून और मूल निवास जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रहने की संभावना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा मिशन रिपीट की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने, लाभार्थी वर्ग से सीधा संवाद बढ़ाने और केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने पर विशेष जोर दे रही है। हाल के महीनों में पार्टी ने संगठनात्मक बैठकों और चुनावी रणनीति को समय से पहले गति दी है। भाजपा की रणनीति का दूसरा बड़ा आधार हिंदुत्व, विकास और मजबूत नेतृत्व की छवि है। पार्टी चारधाम आल वेदर रोड, रेलवे परियोजनाओं, निवेश, पर्यटन और बुनियादी ढांचे को अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के सामने रख रही है। हालांकि पार्टी के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय असंतोष, टिकट की संभावित दावेदारी, महंगाई और रोजगार जैसे मुद्दे विपक्ष को हमला करने का अवसर दे सकते हैं। कांग्रेस ने भी चुनावी मोर्चा संभाल लिया है। पार्टी ने चुनाव अभियान कार्यालय शुरू कर संगठन को सक्रिय करने, कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारने और जनता के बीच लगातार पहुंच बनाने की रणनीति बनाई है। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व की सक्रियता और चुनावी अभियान को तेज करने के संकेत मिले हैं। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश कर रही है। पार्टी बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महंगाई, पलायन, किसानों की समस्याओं और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है। कांग्रेस का मानना है कि यदि संगठन बूथ स्तर तक मजबूत हुआ और गुटबाजी नियंत्रित रही, तो मुकाबला पहले की तुलना में अधिक कड़ा हो सकता है। उत्तराखंड की राजनीति में उत्तराखंड क्रांति दल, निर्दलीय उम्मीदवार और कुछ क्षेत्रीय संगठन भी कई सीटों पर प्रभाव डाल सकते हैं। भले ही मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच माना जा रहा हो, लेकिन कुछ विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय चेहरे चुनावी गणित बदलने की क्षमता रखते हैं। इस चुनाव में मतदाता केवल नारों से प्रभावित होंगे, इसकी संभावना कम दिखाई देती है। प्रदेश के युवाओं की निगाह रोजगार पर है। पहाड़ के गांव आज भी पलायन से जूझ रहे हैं। महिलाएं स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी और महंगाई जैसे मुद्दों पर जवाब चाहती हैं। सीमांत क्षेत्रों में सड़क, संचार और मूलभूत सुविधाएं अब भी बड़ी चुनौती हैं। राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि वे इन मुद्दों पर केवल घोषणाएं करते हैं या ठोस समाधान का भरोसा भी दिला पाते हैं। फिलहाल उम्मीदवारों की सूची सामने नहीं आई है और कई सीटों पर राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। टिकट वितरण, दल-बदल, स्थानीय असंतोष और चुनावी गठबंधन जैसे कारक अंतिम परिणाम को प्रभावित करेंगे। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अब केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बन चुका है। एक ओर भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का सपना देख रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी का अवसर तलाश रही है। आने वाले महीनों में रैलियां, घोषणाएं, आरोप-प्रत्यारोप और जनसंपर्क अभियान तेज होंगे, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा की तरह उत्तराखंड की जनता के हाथ में होगा। चुनावी शोर के बीच मतदाता यह देखेगा कि कौन उसके मुद्दों को समझता है और कौन केवल चुनावी वादों तक सीमित रहता है।

अलर्ट की ‘भाषा’ से परे पहाड़ का ‘खौफ’

मानसून में सिर्फ बारिश नहीं, चट्टानों से मौत भी लुढ़क कर नीचे आती है पहाड़ी क्षेत्रों में रेड-आरेंज अलर्ट नहीं समझता पहाड़ी मन, बादल घिरते ही सहम जाती हैं छतें और ढलानें स्कूल गए बच्चे, सड़क पर दौड़ती टैक्सी, रात को बेघर होने की आशंका में बिसूरते बुजुर्ग पहाड़ में आफत बनकर बरसती है बारिश, विकास के दावों के बीच मौत का अनवरत पहरा देहरादून। उत्तराखंड में बारिश का मौसम शुरू होते ही मौसम विभाग का एक नया शब्द हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता हैकृआरेंज अलर्ट, रेड अलर्ट, भारी से बहुत भारी बारिश। लेकिन पहाड़ का आदमी मौसम विभाग की भाषा नहीं समझता। वह सिर्फ इतना जानता है कि जब बादल घिरते हैं तो उसके घर की छत, खेत की मेड़, सड़क का किनारा और पहाड़ की ढलानकृसब एक साथ डराने लगते हैं। यह डर काल्पनिक नहीं है। यह डर उस बच्चे का है जो स्कूल गया है और शाम तक घर नहीं लौटा। यह डर उस मां का है, जिसका बेटा टैक्सी चलाकर परिवार पालता है और हर बारिश में भूस्खलन वाले रास्तों से गुजरता है। यह डर उस बुजुर्ग का है, जिसे रात में यह नहीं पता कि सुबह तक उसका घर उसी जगह रहेगा या मलबे में दब जाएगा। पहाड़ में बारिश सिर्फ आसमान से नहीं गिरती। मौत भी पहाड़ की चट्टानों से लुढ़कती हुई नीचे आती है। बरसात शुरू होते ही सड़कें बंद होने लगती हैं। कहीं पहाड़ दरक जाता है, कहीं पुल बह जाता है, कहीं नदी अपना रास्ता बदल देती है। प्रशासन हर साल कहता है कि तैयारी पूरी है। मशीनें तैनात हैं। आपदा प्रबंधन अलर्ट पर है। लेकिन सवाल यह है कि अगर तैयारी पूरी है, तो हर साल वही तस्वीरें क्यों दोहराई जाती हैं? क्यों हर मानसून में सैकड़ों गांव दुनिया से कट जाते हैं? क्यों मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते? क्यों गर्भवती महिलाओं को डोली में उठाकर कई किलोमीटर चलना पड़ता है? क्यों बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है? पहाड़ का आदमी बारिश से नहीं हारता। वह व्यवस्था की लापरवाही से हारता है। उत्तराखंड की त्रासदी यह है कि यहां सड़क बनती भी है तो अगली बरसात में बह जाती है। पुल बनता है तो पहली बाढ़ में कमजोर पड़ जाता है। पहाड़ काटे जाते हैं, लेकिन यह सोचने की फुर्सत कम दिखाई देती है कि प्रकृति का भी अपना संतुलन होता है। विकास जरूरी है, लेकिन विकास का मतलब यह नहीं कि पहाड़ की छाती को बिना समझे काट दिया जाए। आज पहाड़ का नागरिक एक अजीब मनःस्थिति में जी रहा है। वह घर से निकलते समय यह नहीं सोचता कि कितनी देर में पहुंचेगा। वह यह सोचता है कि पहुंच भी पाएगा या नहीं। आप जरा कल्पना कीजिए। एक बस में बैठे यात्री को यह पता नहीं कि अगले मोड़ पर सड़क होगी या नहीं। एक टैक्सी चालक को नहीं पता कि जिस पहाड़ के नीचे से वह गुजर रहा है, वह अगले पांच मिनट में वहीं रहेगा या टूटकर उसके ऊपर आ जाएगा। यह सिर्फ यात्रा नहीं है, यह हर दिन मौत के साथ समझौता है। और सबसे दुखद बात यह है कि कुछ दिन बाद सब सामान्य हो जाता है। टीवी चैनलों पर दूसरी खबरें आ जाती हैं। सोशल मीडिया पर नई बहस शुरू हो जाती है। पहाड़ में मारे गए लोगों के नाम धीरे-धीरे सरकारी फाइलों में बदल जाते हैं। क्या पहाड़ की जिंदगी इतनी सस्ती है?क्या हर मानसून में कुछ लोगों की मौत को हमने नियति मान लिया है?क्या आपदा केवल राहत राशि बांटने का अवसर है? सवाल केवल प्राकृतिक आपदा का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या हमने पहाड़ के लिए ऐसी विकास नीति बनाई है जो उसकी भौगोलिक संवेदनशीलता को समझती हो? क्या सड़क निर्माण, भवन निर्माण और पर्यटन परियोजनाओं में वैज्ञानिक सलाह को पर्याप्त महत्व दिया जाता है? क्या जोखिम वाले क्षेत्रों में समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की गंभीर योजना है? पहाड़ केवल पर्यटन स्थल नहीं है। वहां लाखों लोग रहते हैं। उनके सपने हैं, उनका संघर्ष है, उनका जीवन है। हर बरसात में उन्हें यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उनका सबसे बड़ा दुश्मन बादल नहीं, बल्कि व्यवस्था की तैयारी की कमी है। बारिश पर किसी का बस नहीं चलता। लेकिन बारिश को आपदा बनने से रोकने की तैयारी इंसान के हाथ में है। जब तक सड़कें मौसम के हिसाब से नहीं बनेंगी, जब तक पहाड़ की प्रकृति को समझकर विकास नहीं होगा, जब तक चेतावनी के साथ सुरक्षित विकल्प भी नहीं होंगे, तब तक उत्तराखंड में मानसून का मतलब रहेगाकृसिर पर मंडराती मौत। और शायद पहाड़ का सबसे बड़ा दर्द यही है कि यहां लोग बारिश की बूंदें नहीं गिनते, बल्कि हर बरसात में यह गिनते हैं कि इस बार मौत किस गांव का पता पूछते हुए आई।

मानसून के साथ ‘डेंगू’

बारिश के बीच डेंगू का बढ़ता खतरा,हाई अलर्ट पर प्रशासन बारिश बनी राहत भी, आफत भी,अस्पतालों में बढ़ी निगरानी उत्तराखंड के नगर निकायों को युद्धस्तर पर अभियान के निर्देश देहरादून। उत्तराखंड में लगातार हो रही मानसूनी बारिश जहां गर्मी से राहत लेकर आई है, वहीं इसके साथ एक नया खतरा भी तेजी से सिर उठाने लगा हैकृडेंगू। बारिश के कारण जगह-जगह जलभराव, नालियों में ठहरा पानी, निर्माण स्थलों पर जमा वर्षा जल और घरों के आसपास रखे खुले बर्तनों में पानी भरने से एडीज मच्छरों के पनपने की आशंका बढ़ गई है। इसी खतरे को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन हाई अलर्ट पर हैं। अस्पतालों में विशेष निगरानी बढ़ा दी गई हैए जबकि नगर निकायों और स्वास्थ्य टीमों को रोकथाम के लिए व्यापक अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। प्रदेश के कई जिलों में स्वास्थ्य विभाग ने डेंगू की रोकथाम को लेकर सर्विलांस तेज कर दिया है। सरकारी अस्पतालों में बुखार से पीड़ित मरीजों की जांच बढ़ाई जा रही है, जबकि निजी अस्पतालों से भी संदिग्ध मामलों की नियमित जानकारी मांगी जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान थोड़ी सी लापरवाही भी संक्रमण को तेजी से फैलने का मौका दे सकती है। डेंगू से लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं जीती जा सकती। इसकी असली लड़ाई घरों, गलियों और मोहल्लों में लड़ी जाती है। प्रशासन ने नगर निगमए नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों को जलभराव वाले स्थानों की पहचान कर तत्काल सफाई, फागिंग और एंटी लार्वा दवा के छिड़काव के निर्देश दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीमें घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करने में जुटी हैं। एडीज मच्छर साफ और ठहरे हुए पानी में पनपता है। इसलिए घरों की छतों, कूलर, गमलों, टायरों, पानी की टंकियों और अन्य पात्रों में जमा पानी नियमित रूप से खाली करना सबसे प्रभावी उपाय है। सरकारी अस्पतालों में डेंगू जांच की व्यवस्था मजबूत की जा रही है। चिकित्सकों को निर्देश दिए गए हैं कि तेज बुखार, शरीर में दर्द, सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द या प्लेटलेट्स कम होने जैसे लक्षणों वाले मरीजों की समय पर जांच सुनिश्चित की जाए। स्वास्थ्य विभाग का जोर इस बात पर है कि संदिग्ध मरीजों की पहचान शुरुआती चरण में हो, ताकि गंभीर स्थिति बनने से पहले इलाज शुरू किया जा सके। उत्तराखंड में मानसून के दौरान अक्सर लोग भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं पर अधिक ध्यान देते हैंए लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि डेंगू जैसी बीमारियां भी उतनी ही गंभीर चुनौती बन सकती हैं। यदि समय रहते रोकथाम नहीं की गई, तो मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि डेंगू की रोकथाम केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है। यदि लोग सप्ताह में एक दिन अपने घर और आसपास जमा पानी की जांच करें, पानी की टंकियों को ढककर रखें, पूरी बाजू के कपड़े पहनें और मच्छररोधी उपाय अपनाएंए तो संक्रमण का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है। हर वर्ष मानसून के साथ डेंगू का खतरा सामने आता है। सवाल यह है कि क्या हमारी तैयारी भी हर साल उतनी ही मजबूत होती है क्या नालों की सफाई समय पर होती है क्या जलभराव वाले स्थानों की स्थायी पहचान कर समाधान निकाला जाता है क्या शहरी विकास योजनाओं में जल निकासी को पर्याप्त महत्व दिया जाता है। यदि इन सवालों के जवाब संतोषजनक नहीं हैं, तो केवल फागिंग और जागरूकता अभियान से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। मानसून प्रकृति का उत्सव है, लेकिन लापरवाही इसे बीमारी का मौसम भी बना सकती है। डेंगू के खिलाफ प्रशासन की सक्रियता जरूरी है पर उससे भी अधिक जरूरी है नागरिकों की भागीदारी। यदि सरकार की तैयारी और जनता की जागरूकता साथ चले तभी इस मानसून में डेंगू के खतरे को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। वरना बारिश की बूंदों के साथ मच्छरों का खतरा भी हर घर की दस्तक बन सकता है।

उत्तराखंड बीजेपी का ‘आपरेशन आल ओके’

आल इज वैल के दावों के बीच विधायकों की नाराजगी दूर करने का बना मास्टर प्लान बैठक में विकास यात्रा के साथ-साथ विधायकों के खिलाफ स्थानीय गुस्से पर मंथन चुनाव अभी दूर है, लेकिन भाजपा को जनता की नाराजगी की आहट सुनाई देने लगी उत्तराखंड में बूथ जीतो अभियान के बहाने सत्ता बचाने की सबसे बड़ी कवायद शुरू देहरादून। चुनाव की तारीख अभी घोषित नहीं हुई है। चुनाव आयोग ने अभी बिगुल नहीं बजाया है। लेकिन भाजपा ने उत्तराखंड में चुनावी रणभेरी बजा दी है। दिल्ली में संगठन की उत्तराखंड कोर ग्रुप की बैठक केवल एक संगठनात्मक बैठक नहीं थी, बल्कि यह उस चिंता का संकेत भी थी जिसे सत्ता पक्ष सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार नहीं करता। तीन घंटे चली बैठक में कई बातें हुई बूथ जीतो अभियान, विकास यात्रा, लखपति दीदी सम्मेलन, सांसदों और विधायकों का क्षेत्रवार प्रवास और सबसे अहम... विधायकों के खिलाफ स्थानीय नाराजगी को कैसे कम किया जाए? यहीं से असली कहानी शुरू होती है। अगर सब कुछ ठीक चल रहा है, अगर सरकार के काम से जनता पूरी तरह संतुष्ट है, अगर विकास हर गांव तक पहुंच चुका है, तो फिर स्थानीय नाराजगी दूर करने के लिए अलग रणनीति बनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? राजनीति में बैठकों की भाषा और जनता की भाषा अलग होती है। प्रेस विज्ञप्ति कहती हैकृ संगठन मजबूत होगा। लेकिन बंद कमरे की चर्चा अक्सर यह होती है कि कौन-सा विधायक जनता के बीच कमजोर पड़ रहा है, किस सीट पर खतरा बढ़ रहा है और किस इलाके में नाराजगी चुनावी नुकसान में बदल सकती है। यही वजह है कि भाजपा ने चुनाव से काफी पहले बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ाने का फैसला किया है। उत्तराखंड में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि सत्ता विरोधी माहौल है। लगातार सरकार में रहने के कारण जनता अब घोषणाओं से आगे बढ़कर जवाब मांग रही है। युवाओं के सवाल हैंकृरोजगार कहां है? पहाड़ पूछ रहा हैकृपलायन कब रुकेगा? किसान पूछ रहा हैकृआय कैसे बढ़ेगी? महिलाएं पूछ रही हैंकृमहंगाई से राहत कब मिलेगी? और कई क्षेत्रों में लोग अपने विधायक से पूछ रहे हैंकृपांच साल में आप हमारे गांव कितनी बार आए? शायद यही कारण है कि बैठक में विधायकों के क्षेत्रीय प्रवास पर विशेष जोर दिया गया। चुनाव से पहले जनता तक पहुंचने की कवायद तेज होगी। गांवों में बैठकें होंगी, चौपाल लगेंगी, विकास यात्रा निकलेगी और लाभार्थियों से संवाद बढ़ाया जाएगा। भारतीय जनता पार्टी अच्छी तरह जानती है कि चुनाव टीवी स्टूडियो में नहीं, बूथ पर जीते जाते हैं। एक-एक बूथ, एक-एक मतदाता और एक-एक कार्यकर्ता... यही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत रही है। इसलिए संगठन पहले बूथ को मजबूत करेगा और फिर चुनावी मैदान में उतरेगा। भाजपा की चुनावी मशीनरी उम्मीदवार घोषित होने का इंतजार नहीं करती। वह उससे बहुत पहले बूथ स्तर पर गणित बैठाना शुरू कर देती है। बैठक में लखपति दीदी सम्मेलन आयोजित करने की योजना भी बनी। सरकार इसे महिला सशक्तिकरण का अभियान बताएगी और इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन राजनीति में समय बहुत कुछ कह देता है। जब चुनाव नजदीक आते हैं तो हर सामाजिक कार्यक्रम का राजनीतिक अर्थ भी निकलने लगता है। महिलाओं का वोट बैंक उत्तराखंड की राजनीति में निर्णायक माना जाता है और भाजपा इस वर्ग के साथ अपने संपर्क को और मजबूत करना चाहती है। भाजपा की यह सक्रियता कांग्रेस के लिए भी एक संदेश है। यदि विपक्ष अभी भी केवल सरकार की आलोचना तक सीमित रहा और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत नहीं कर पाया, तो सत्ता विरोधी माहौल होने के बावजूद चुनावी लाभ उठाना आसान नहीं होगा। चुनाव केवल नाराजगी से नहीं जीते जाते, संगठन और रणनीति से भी जीते जाते हैं। इन बैठकों में विकास यात्रा की बात होती है। लेकिन क्या विकास की यात्रा गांव तक पहुंची? इन बैठकों में नाराजगी दूर करने की बात होती है। लेकिन क्या नाराज़गी का कारण समझने की कोशिश भी होगी? क्या जनता को सिर्फ चुनाव से पहले याद किया जाएगा? या फिर चुनाव के बाद भी गांवों की वही सड़कें, वही अस्पताल, वही स्कूल और वही पलायन चर्चा का विषय बने रहेंगे? उत्तराखंड की राजनीति अब चुनावी मोड़ पर पहुंच चुकी है। भाजपा जीत की हैट्रिक लगाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। संगठन सक्रिय है, रणनीति तैयार है और बूथ स्तर तक पहुंचने की योजना बन चुकी है। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम रणनीति किसी पार्टी के दफ्तर में नहीं बनती। वह बनती है उस मतदाता के मन में, जो हर चुनाव से पहले नेताओं की बातें सुनता है, वादे याद रखता है और मतदान वाले दिन चुपचाप अपनी उंगली से तय करता है कि हैट्रिक होगी या इतिहास बदलेगा।

बुधवार, 5 अगस्त 2026

udaydinmaan: अब विलुप्त हो गई ‘चिरान’ की धुन

udaydinmaan: अब विलुप्त हो गई ‘चिरान’ की धुन: पहाड़ की सदियों पुरानी पारंपरिक कला ने तोड़ा दम मशीनों के शोर में दब गई हाथ के आरे की आवाज कोठार, गौशाला और नक्काशीदार दरवाजे अब कहां देहराद...

अब विलुप्त हो गई ‘चिरान’ की धुन

पहाड़ की सदियों पुरानी पारंपरिक कला ने तोड़ा दम मशीनों के शोर में दब गई हाथ के आरे की आवाज कोठार, गौशाला और नक्काशीदार दरवाजे अब कहां देहरादून। पहाड़ों में सदियों से चली आ रही चिरान की पारंपरिक कला को दर्शाती है। दो लोग, एक ऊपर और एक नीचे, बड़े आरे से लकड़ी के मोटे लट्ठे को चीर रहे हैं। यही वह तकनीक है, जिससे कभी पूरे पहाड़ के घर, दरवाजे, खिड़कियाँ, अनाज के कोठार, गौशालाएँ और मंदिरों की नक्काशीदार लकड़ियाँ तैयार होती थीं। आज जब लकड़ी की हर चीज फैक्ट्री से बनकर आ जाती है, तब शायद नई पीढ़ी को अंदाजा भी नहीं होगा कि कभी पहाड़ में लकड़ी का हर तख्ता इंसानी मेहनत से निकलता था। पहाड़ों में इसे चिरान कहा जाता है। इसमें एक व्यक्ति लकड़ी के ऊपर खड़ा रहता है और दूसरा नीचे। दोनों एक लंबे आरे को ऊपर-नीचे खींचते हैं। कई घंटों की मेहनत के बाद एक मोटा लट्ठा धीरे-धीरे मजबूत पट्टों में बदल जाता है। यह केवल श्रम नहीं था, बल्कि धैर्य, तालमेल और अनुभव का अद्भुत उदाहरण था। एक समय ऐसा था जब बिजली नहीं थी, सड़कें नहीं थीं और मशीनें भी नहीं पहुँच सकती थीं। तब गाँव के चिरानी ही इंजीनियर थे। वह पेड़ की नसों को देखकर बता देते थे कि लकड़ी किस दिशा में चिरेगी, कहाँ गाँठ है और कौन-सा हिस्सा घर की बल्ली बनेगा। किसी घर का निर्माण शुरू होने से पहले सबसे बड़ा काम होता थाकृअच्छी लकड़ी का चयन और उसकी चिरान। पहाड़ का पारंपरिक मकान केवल पत्थर से नहीं बनता था। उसकी पूरी मजबूती लकड़ी पर टिकी होती थी। छत की बल्ली, दरवाजे, खिड़कियाँ, चौखट, अनाज रखने के संदूक, मंदिरों की नक्काशी, खेतों के औजार इन सबकी शुरुआत इसी चिरान से होती थी। गाँवों में चिरानी केवल मजदूर नहीं माना जाता था। वह हुनरमंद कारीगर होता था। उसके बिना किसी का घर नहीं बन सकता था। चिरान के मौसम में लोग कई-कई दिनों तक एक-दूसरे के घरों में श्रमदान करते थे। बदले में मजदूरी के साथ भोजन और सम्मान मिलता था। यह केवल काम नहीं, सामुदायिक सहयोग की परंपरा थी। अब सड़कें हैं, आरा मशीनें हैं, प्लाईवुड है और तैयार फर्नीचर है। नतीजा यह हुआ कि चिरान की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई। आज गाँवों में ऐसे कारीगर उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। नई पीढ़ी इस कठिन काम को सीखना नहीं चाहती क्योंकि मेहनत अधिक और आमदनी कम है। जब कोई पारंपरिक कला खत्म होती है तो केवल रोजगार नहीं जाता, बल्कि उसके साथ एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति भी समाप्त हो जाती है। आज संग्रहालयों में पुराने औजार तो मिल जाएंगे, लेकिन उन्हें चलाने वाले हाथ शायद ही कहीं दिखाई दें। तस्वीर आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक फोटो नहीं, बल्कि इतिहास का दस्तावेज है। यदि सरकार और समाज चाहें तो इस पारंपरिक कौशल को बचाया जा सकता है। इसके लिए पारंपरिक चिरानी कारीगरों का दस्तावेजीकरण किया जाए। ग्रामीण पर्यटन में इस कला का प्रदर्शन कराया जाए। आईटीआई और कौशल विकास कार्यक्रमों में पारंपरिक लकड़ी शिल्प को शामिल किया जाए। स्थानीय देवालयों और पारंपरिक भवनों के संरक्षण में इन कारीगरों को प्राथमिकता दी जाए। लोक संस्कृति मेलों में चिरान की जीवंत प्रदर्शनी आयोजित की जाए। पहाड़ केवल प्राकृतिक सुंदरता का नाम नहीं है। पहाड़ उन मेहनतकश हाथों का नाम है जिन्होंने बिना मशीनों के सभ्यता को खड़ा किया। आज जब विकास की दौड़ में परंपराएँ पीछे छूट रही हैं, तब जरूरत है कि हम चिरान जैसी लोक तकनीकों को केवल याद न करें, बल्कि उन्हें सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित भी करें। क्योंकि जिस दिन आखिरी चिरानी अपना आरा रख देगा, उस दिन केवल एक पेशा नहीं, बल्कि पहाड़ की लोक स्मृति का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।

‘पोस्टर क्रांति’ की सियासी दुकानों पर ताला

प्रदेश के 17 राजनीतिक दलों पर गिरी गाज, सक्रिय सूची से बाहर जनादेश के अभाव में वक्त के साथ राजनीतिक स्मृति से हुए ओझल जनमुद्दों से जन्मी सियासी उम्मीदें ने चंद चुनावों के बाद ही तोड़ा दम राजनीति में कागजी पार्टियों का अंत और हो गया नए खेल की शुरु देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक खबर आई है। खबर छोटी लग सकती है, लेकिन उसके भीतर लोकतंत्र का एक बड़ा सवाल छिपा हुआ है। भारत निर्वाचन आयोग ने उत्तराखंड के 17 पंजीकृत राजनीतिक दलों को अपनी सक्रिय सूची से हटा दिया है। अब यह दल आगामी चुनाव नहीं लड़ सकेंगे, जब तक वह निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी कर दोबारा मान्यता या पंजीकरण हासिल न कर लें। पहली नजर में लगेगा कि इससे क्या फर्क पड़ता है? चुनाव तो भाजपा और कांग्रेस ही लड़ती हैं। लेकिन जरा ठहरिए। सवाल केवल 17 दलों का नहीं है, सवाल यह है कि हमारे लोकतंत्र में राजनीतिक दल बनाना कितना आसान और उसे जीवित रखना कितना कठिन है। उत्तराखंड में पिछले दो दशकों में दर्जनों राजनीतिक दल बने। किसी ने पर्वतीय अस्मिता के नाम पर पार्टी बनाई, किसी ने पलायन के मुद्दे पर, किसी ने रोजगार के लिए और किसी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ। चुनाव आए, पोस्टर लगे, प्रेस कान्फ्रेंस हुई, सोशल मीडिया पर क्रांति भी हुई। लेकिन चुनाव खत्म होते ही अधिकांश दल भी मानो राजनीतिक स्मृति से गायब हो गए। निर्वाचन आयोग का यह कदम बताता है कि केवल पार्टी का नाम रख लेने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सक्रिय संगठन, नियमित राजनीतिक गतिविधियां, कानूनी अनुपालन और जनता के बीच निरंतर उपस्थिति भी जरूरी होती है। लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी है। क्या यह केवल 17 दलों की विफलता है? या फिर यह उस राजनीतिक व्यवस्था की भी विफलता है जिसमें छोटे दलों के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है? आज चुनाव लड़ना विचारों से ज्यादा संसाधनों का खेल बनता जा रहा है। बड़े दलों के पास करोड़ों का प्रचार, डिजिटल अभियान, विशाल संगठन और संसाधन हैं। दूसरी ओर, छोटे दल चुनाव आयोग के नियमों, वित्तीय रिपोर्टिंग, संगठनात्मक ढांचे और आर्थिक चुनौतियों के बीच दम तोड़ देते हैं। ऐसे में लोकतंत्र का मैदान बराबरी का नहीं रह जाता। उत्तराखंड जैसे राज्य में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह वही प्रदेश है जिसकी नींव जनआंदोलनों पर पड़ी थी। अलग राज्य की मांग किसी एक बड़ी पार्टी ने नहीं, बल्कि छोटे संगठनों, सामाजिक आंदोलनों और हजारों आम लोगों ने मिलकर उठाई थी। अगर छोटे राजनीतिक विकल्प धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे, तो क्या भविष्य में नए विचारों को राजनीति में जगह मिल पाएगी? हालांकि, इसका मतलब यह भी नहीं कि केवल नाम के लिए राजनीतिक दल बने रहें। यदि कोई पार्टी वर्षों तक चुनाव नहीं लड़ती, अपना लेखा-जोखा जमा नहीं करती, संगठन नहीं चलाती और केवल कागजों पर मौजूद रहती है, तो निर्वाचन आयोग की कार्रवाई लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा मानी जाएगी। चुनाव आयोग का दायित्व केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था को पारदर्शी और नियमबद्ध बनाए रखना भी है। अब सवाल उत्तराखंड की राजनीति का है। 2027 का विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे करीब आ रहा है। भाजपा सत्ता बचाने की तैयारी में है। कांग्रेस वापसी का सपना देख रही है। क्षेत्रीय दल अपनी प्रासंगिकता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे समय में 17 दलों का बाहर होना चुनावी गणित को भले बहुत बड़ा झटका न दे, लेकिन यह संकेत जरूर देता है कि आने वाले समय में चुनावी मुकाबला और अधिक सीमित हो सकता है। लोकतंत्र की खूबसूरती विकल्पों में होती है। विकल्प खत्म होने लगें, तो चुनाव तो होते हैं, लेकिन राजनीतिक विविधता कमजोर पड़ जाती है। इसलिए यह खबर केवल इतनी नहीं है कि 17 दल सूची से हट गए। असली खबर यह है कि उत्तराखंड की राजनीति में विचारों की जमीन कितनी बची है? क्या नए राजनीतिक प्रयोगों के लिए जगह है? क्या छोटे दल संगठन और जवाबदेही के साथ खुद को खड़ा कर पाएंगे? या फिर राजनीति कुछ बड़े दलों के बीच ही सिमटती चली जाएगी? लोकतंत्र में चुनाव जीतना ही सब कुछ नहीं होता। लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात से भी तय होता है कि कितनी आवाजें मैदान में हैं, कितने विचार जनता तक पहुंच रहे हैं और कितने राजनीतिक दल केवल चुनाव नहीं, समाज के सवालों को भी जिंदा रखे हुए हैं। सवाल 17 दलों के हटने का नहीं है। सवाल यह है कि उत्तराखंड की राजनीति में अगला नया विकल्प कौन बनेगाकृया फिर विकल्प बचेंगे भी या नहीं?

‘बंद कमरे’ और पहाड़ के ‘खाली गाँव’

उत्तराखंड भाजपा की दिल्ली में होने वाली बैठक पर सवाल दिल्ली में खिंचे कैमरे और बंद दरवाजों में 2027 की बिसात समीक्षा बूथों की होगी या पलायन से खाली होते पहाड़ों की भाजपा के माइक्रो-मैनेजमेंट के आगे पस्त पहाड़ के जनमुद्दे रणनीति की मेज पर चुनाव और जनता की मेज पर सवाल देहरादून। दिल्ली में बैठक और कमरों के बंद दरवाजे। बाहर कैमरे खड़े हैं। अंदर नेता बैठे हैं। एजेंडा लिखा होगाकृसंगठन, चुनाव, रणनीति, बूथ, विस्तार, 2027। लेकिन उत्तराखंड का आम आदमी शायद यह पूछना चाहता हैकृक्या इन बैठकों में उसकी भी कोई सीट होती है? दिल्ली में उत्तराखंड भाजपा की बैठक सिर्फ एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं है। यह उस चुनावी तैयारी का हिस्सा है, जिसकी आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीति में चुनाव कभी दूर नहीं होते। चुनाव खत्म होते ही अगला चुनाव शुरू हो जाता है। बैठक में निश्चित रूप से समीक्षा होगी। किस जिले में संगठन मजबूत है, कहाँ कमजोर है। किस विधायक के खिलाफ नाराजगी है, कहाँ सरकार की योजनाएँ असर कर रही हैं, किस मुद्दे को आगे रखना है और किस मुद्दे को पीछे छोड़ देना है। लेकिन क्या कोई यह भी पूछेगा कि उत्तराखंड से लगातार हो रहे पलायन का क्या हुआ?क्या बैठक में यह चर्चा होगी कि जिन गाँवों में बूथ तो हैं, लेकिन मतदाता नहीं बचे, वहाँ लोकतंत्र किसके भरोसे खड़ा है? यह वही उत्तराखंड है जहाँ चुनाव के समय हर सड़क विकास का प्रतीक बन जाती है और बरसात आते ही वही सड़क गड्ढों की पहचान बन जाती है, जहाँ हर साल रोजगार के वादे होते हैं और हर साल प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी नई चिंताओं के साथ तैयारी करते हैं। दिल्ली की बैठकों में आंकड़े रखे जाते हैं। कितने सदस्य बने, कितने बूथ जीते, कितनी योजनाएँ शुरू हुईं। लेकिन जनता के पास भी अपने आंकड़े हैंकृकितने युवा नौकरी की तलाश में राज्य छोड़ गए, कितने स्कूल बंद हुए, कितने गाँव खाली हुए और कितने अस्पताल डाक्टरों का इंतजार करते रहे। भाजपा के लिए यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में लगातार सत्ता में रहने के बाद एंटी-इन्कम्बेंसी एक स्वाभाविक चुनौती बनती है। पार्टी चाहेगी कि संगठन सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुँचाए और असंतोष को कम करे। दूसरी तरफ विपक्ष भी इन्हीं बैठकों पर नजर रखे हुए है। कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि भाजपा चुनावी गणित में व्यस्त है, जबकि जनता महँगाई, बेरोज़गारी और स्थानीय समस्याओं से जूझ रही है। लेकिन लोकतंत्र में सवाल केवल विपक्ष से नहीं, सत्ता से ज्यादा पूछे जाते हैं। क्योंकि निर्णय लेने की शक्ति सत्ता के पास होती है। दिल्ली की बैठक में यदि केवल चुनाव जीतने की रणनीति बनेगी, तो वह राजनीतिक बैठक होगी। लेकिन यदि वहाँ यह भी तय होगा कि पहाड़ के खाली होते गाँव कैसे बसेंगे, युवाओं को स्थानीय रोजगार कैसे मिलेगा, पर्यटन का लाभ गाँव तक कैसे पहुँचेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ कैसे मजबूत होंगीकृतब वह केवल राजनीतिक बैठक नहीं, उत्तराखंड के भविष्य की बैठक होगी। उत्तराखंड की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में चेहरों से ज्यादा संगठन पर जोर दिया गया है। नेतृत्व परिवर्तन भी हुए, रणनीतियाँ भी बदलीं, लेकिन जनता का मूल्यांकन अंततः रोजमर्रा के जीवन से होता है। चुनावी नारे कुछ दिन चलते हैं, बिजली-पानी, सड़क, अस्पताल और रोजगार हर दिन चलते हैं। दिल्ली की यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संकेत मिलेगा कि भाजपा 2027 के चुनाव में किस नैरेटिव के साथ उतरना चाहती है। क्या चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित होगा या स्थानीय सवालों को अधिक महत्व मिलेगा? क्या संगठन में बदलाव होंगे? क्या कुछ नेताओं की जिम्मेदारियाँ बदलेंगी? इन सभी सवालों के जवाब आने वाले महीनों में स्पष्ट होंगे। राजनीतिक दलों की बैठकें लोकतंत्र का हिस्सा हैं। रणनीति बनाना उनका अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा बैठक खत्म होने के बाद शुरू होती है। जब नेता दिल्ली से लौटेंगे, तब जनता पूछेगीकृकि बैठक में मेरे गाँव की बात हुई थी क्या? मेरे बेटे की नौकरी पर चर्चा हुई थी क्या? मेरे स्कूल, मेरे अस्पताल और मेरी सड़क का भी कोई एजेंडा था क्या? अगर इन सवालों का जवाब हाँ है, तो बैठक सफल मानी जाएगी और अगर जवाब केवल चुनावी समीकरणों तक सीमित रहा, तो यह बैठक भी राजनीतिक कैलेंडर की एक और तारीख बनकर रह जाएगी। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी बैठक अंततः दिल्ली के बंद कमरों में नहीं, बल्कि जनता के खुले दरबार में होती है।

‘ग्राउंड वर्सेज लीगल फाइट’

कांग्रेस कानूनी तैयारी में और भाजपा बूथों पर किलेबंदी में व्यस्त कांग्रेस पाटी की नजर बैलट से पहले वोटर लिस्ट के कागजात पर वकीलों की फौज तैयार, चुनावी जंग अब अदालत व आयोग तक देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की उलटी गिनती अभी शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारी तेज कर दी है। भाजपा बूथ मजबूत करने में लगी है, तो कांग्रेस अब एसआईआर को लेकर कानूनी मोर्चा खोलने की तैयारी कर रही है। खबर है कि कांग्रेस ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए वकीलों की एक टीम तैयार की है। पहली नजर में यह केवल संगठनात्मक तैयारी लग सकती है। लेकिन इसके पीछे लोकतंत्र का एक बड़ा सवाल छिपा हैकृक्या चुनाव अब केवल जनता के बीच लड़े जाएंगे, या अदालतों और निर्वाचन आयोग के दफ्तरों में भी? मतदाता सूची किसी भी चुनाव की रीढ़ होती है। अगर सूची पर विवाद खड़ा हो जाए, तो चुनाव परिणाम आने से पहले ही अविश्वास का माहौल बन सकता है। कांग्रेस का कहना है कि वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि कोई पात्र मतदाता सूची से बाहर न हो और किसी प्रकार की अनियमितता न होने पाए। इसलिए उसने कानूनी विशेषज्ञों को मैदान में उतारने का फैसला किया है। भाजपा का पक्ष अलग होगा। वह कहेगी कि निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और उसकी प्रक्रिया पर बेवजह संदेह पैदा करना उचित नहीं। सत्ता पक्ष यह भी तर्क दे सकता है कि यदि किसी को आपत्ति है तो उसके लिए आयोग ने कानूनी प्रक्रिया पहले से तय कर रखी है। लेकिन राजनीति में सवाल वहीं खत्म नहीं होते जहाँ बयान खत्म होते हैं। उत्तराखंड का चुनाव हमेशा पहाड़ और मैदान, पलायन और रोजगार, सड़क और स्वास्थ्य, सैनिक और किसान जैसे मुद्दों के बीच लड़ा जाता रहा है। इस बार यदि मतदाता सूची भी बड़ा मुद्दा बनती है, तो चुनाव का स्वरूप बदल सकता है। कांग्रेस की रणनीति यह संकेत देती है कि वह चुनाव के दिन से पहले ही चुनावी प्रक्रिया पर पूरी निगरानी रखना चाहती है। हर विधानसभा क्षेत्र में यदि कानूनी टीम सक्रिय रहती है, तो बूथ स्तर पर उठने वाले विवादों को तुरंत आयोग के सामने रखा जा सकेगा। यह एक राजनीतिक रणनीति भी है और एहतियाती कदम भी। लेकिन एक सवाल कांग्रेस से भी पूछा जाना चाहिए। यदि मतदाता सूची इतनी महत्वपूर्ण है, तो क्या पार्टी ने पिछले वर्षों में भी बूथ स्तर पर उतनी ही गंभीरता से काम किया? क्या केवल चुनाव नजदीक आने पर कानूनी तैयारी पर्याप्त होगी, या जनता के बीच संगठन की मजबूती भी उतनी ही जरूरी है? दूसरी ओर, भाजपा के लिए भी यह समय आत्मविश्वास के साथ-साथ पारदर्शिता दिखाने का है। यदि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो हर आपत्ति का जवाब तथ्यों और नियमों के आधार पर दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में विश्वास केवल जीत से नहीं, बल्कि प्रक्रिया की निष्पक्षता से बनता है। दरअसल, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत मतदाता है। और मतदाता की सबसे बड़ी पहचान उसका नाम मतदाता सूची में होना है। यदि कोई पात्र नागरिक सूची से बाहर रह जाए, तो उसका मतदान का अधिकार प्रभावित होता है। इसलिए मतदाता सूची का शुद्ध और अद्यतन होना किसी एक दल का नहीं, पूरे लोकतंत्र का विषय है। 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीति तय करनी शुरू कर दी है। भाजपा संगठन और सरकार के कामकाज के सहारे चुनावी मैदान तैयार कर रही है। कांग्रेस चुनावी प्रक्रिया पर निगरानी और कानूनी तैयारी के जरिए अपनी सक्रियता दिखा रही है। आने वाले महीनों में यह मुकाबला केवल रैलियों और सभाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दस्तावेज़ों, नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं तक भी पहुंचेगा। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है, लेकिन यह उत्सव तभी सार्थक है जब हर पात्र मतदाता बिना किसी बाधा के अपने मताधिकार का उपयोग कर सके। यदि कांग्रेस की कानूनी टीम चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने में योगदान देती है, तो यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक कदम हो सकता है और यदि यह केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का माध्यम बनती है, तो जनता इसे भी चुनावी रणनीति का हिस्सा मानेगी। आखिरकार, चुनाव केवल वोटों से नहीं जीते जातेकृविश्वास से भी जीते जाते हैं और विश्वास की शुरुआत मतदाता सूची से होती है।

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

udaydinmaan: पहाड़ की संस्कृति पर ‘डिजिटल’ प्रहार

udaydinmaan: पहाड़ की संस्कृति पर ‘डिजिटल’ प्रहार: अस्तित्व के संकट से जूझती देवभूमि की सांस्कृतिक धरोहर झुमेलो पहाड़ में दुख-सुख व सांस्कृतिक चेतना का था कभी जीवंत माध्यम मोबाइल रील्स व आधुन...

पहाड़ की संस्कृति पर ‘डिजिटल’ प्रहार

अस्तित्व के संकट से जूझती देवभूमि की सांस्कृतिक धरोहर झुमेलो पहाड़ में दुख-सुख व सांस्कृतिक चेतना का था कभी जीवंत माध्यम मोबाइल रील्स व आधुनिकता के बीच गुम हो रही हैं लोक परंपराएं सिर्फ एक नृत्य नहीं पहाड़ की सामूहिक आत्मा का उत्सव था झुमेलो देहरादून। उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय की बर्फीली चोटियों, देवस्थलों और प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं है। इस प्रदेश की असली ताकत उसकी लोक संस्कृति, लोकगीतों और पारंपरिक लोककलाओं में बसती है। इन्हीं अमूल्य धरोहरों में एक है झुमेलोकृएक ऐसा लोकनृत्य जो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पहाड़ के सामाजिक जीवन, सामूहिकता और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। आज जब आधुनिकता और डिजिटल संस्कृति गांवों तक पहुंच चुकी है, तब झुमेलो जैसी लोककलाएं अपने अस्तित्व की चुनौती से जूझ रही हैं। सवाल यह है कि क्या आने वाली पीढ़ियां केवल मोबाइल स्क्रीन पर रील्स देखेंगी, या फिर ढोल-दमाऊ की थाप पर झूमते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ेंगी? झुमेलो उत्तराखंड, विशेष रूप से गढ़वाल क्षेत्र का लोकप्रिय पारंपरिक लोकनृत्य और लोकगायन है। इसका नाम ही झूमने से निकला माना जाता है। इसमें महिलाएं और पुरुष समूह बनाकर गोलाकार या अर्धवृत्त में खड़े होकर तालबद्ध कदमों और मधुर गीतों के साथ नृत्य करते हैं। इस नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहजता है। इसमें मंच, चमकदार रोशनी या आधुनिक साज-सज्जा की जरूरत नहीं होती। गांव का चौक, खेत की मेड़, मंदिर का आंगन या किसी मेले का खुला मैदान ही इसका सबसे बड़ा मंच बन जाता है। झुमेलो की आत्मा उसके लोकवाद्य हैं। ढोल, दमाऊ, रणसिंघा, हुड़का और बांसुरी की मधुर ध्वनि पूरे वातावरण को जीवंत बना देती है। जैसे ही ढोल की पहली थाप पड़ती है, लोग स्वतः ही नृत्य की लय में बंध जाते हैं। झुमेलो के गीतों में प्रेम, प्रकृति, ऋतु परिवर्तन, देवी-देवताओं की महिमा, खेती-बाड़ी, सामाजिक रिश्ते और पहाड़ के संघर्ष की झलक मिलती है। यह केवल संगीत नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक स्मृतियों का मौखिक इतिहास भी है। पहाड़ का जीवन हमेशा सामूहिक रहा है। खेती हो, शादी-ब्याह हो, मेले-त्योहार हों या किसी देवता का उत्सवकृहर अवसर पर पूरा गांव एक परिवार की तरह शामिल होता है। झुमेलो इसी सामूहिक जीवन का सांस्कृतिक विस्तार है। यह नृत्य किसी एक कलाकार का प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि पूरे समाज की सहभागिता का प्रतीक होता है। यहां दर्शक और कलाकार के बीच कोई दीवार नहीं होती। हर व्यक्ति इस उत्सव का हिस्सा बन जाता है। झुमेलो केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इसके गीतों में सामाजिक संदेश भी छिपे होते हैं। कहीं बेटी के सम्मान की बात होती है, कहीं प्रकृति संरक्षण का संदेश, तो कहीं मेहनत और ईमानदारी का महत्व। पहाड़ की लोककलाएं हमेशा समाज को जोड़ने का माध्यम रही हैं। उन्होंने बिना किसी औपचारिक शिक्षा के लोगों को संस्कृति, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारियों का पाठ पढ़ाया। समय के साथ गांवों से पलायन बढ़ा। रोजगार और शिक्षा के लिए युवा शहरों की ओर चले गए। गांव खाली होने लगे और उनके साथ लोककलाओं की जीवंत परंपरा भी कमजोर पड़ने लगी। आज कई गांव ऐसे हैं जहां पहले हर त्योहार पर झुमेलो की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन अब वहां सन्नाटा पसरा रहता है। विवाह समारोहों में लोकवाद्यों की जगह डीजे ने ले ली है। पारंपरिक गीतों की जगह फिल्मी संगीत बजने लगा है। यह बदलाव केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के क्षरण का संकेत भी है। सकारात्मक बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड के कई युवा कलाकार, सांस्कृतिक संस्थाएं और सोशल मीडिया मंच झुमेलो सहित अन्य लोककलाओं को नई पहचान दिलाने का प्रयास कर रहे हैं। यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों के वीडियो लाखों लोग देख रहे हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सांस्कृतिक महोत्सवों में भी झुमेलो को मंच मिल रहा है। यदि इस प्रयास को सरकारी संरक्षण और समाज का सहयोग मिले, तो यह परंपरा नई पीढ़ी के बीच और मजबूत हो सकती है। उत्तराखंड में धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन के साथ-साथ सांस्कृतिक पर्यटन की भी अपार संभावनाएं हैं। यदि स्थानीय मेलों, होम-स्टे, पर्यटन उत्सवों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में झुमेलो को नियमित स्थान मिले, तो यह न केवल संस्कृति को जीवित रखेगा बल्कि स्थानीय कलाकारों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगा। लोककला केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक ताकत भी बन सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि झुमेलो जैसी लोककलाओं को बचाने के लिए केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। परिवार, विद्यालय, ग्राम सभाएं, सांस्कृतिक संस्थाएं और स्थानीय समुदाय सभी को मिलकर प्रयास करना होगा। स्कूलों में लोकनृत्य और लोकसंगीत को सह-पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। ग्राम स्तर पर सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं का आयोजन हो। वरिष्ठ लोक कलाकारों का सम्मान और उनके अनुभव का दस्तावेजीकरण किया जाए। डिजिटल माध्यमों पर लोककला का संग्रह और प्रचार-प्रसार बढ़ाया जाए। युवा कलाकारों को आर्थिक और संस्थागत सहयोग दिया जाए। झुमेलो केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा की धड़कन है। यह उस समाज की कहानी कहता है जिसने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी गीत, संगीत और सामूहिकता को कभी नहीं छोड़ा। आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास की दौड़ में हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को न भूलें। क्योंकि जिस समाज की लोककलाएं जीवित रहती हैं, उसकी पहचान भी जीवित रहती है। ढोल-दमाऊ की हर थाप और झुमेलो का हर कदम हमें यही याद दिलाता है कि आधुनिकता का स्वागत करें, लेकिन अपनी संस्कृति की कीमत पर नहीं। यही उत्तराखंड की असली पहचान है, और यही उसकी सबसे बड़ी विरासत।

मतदाता सूची पुनरीक्षण पर ‘संग्राम’

2027 चुनाव से पहले सड़कों पर उतरी कांग्रेस उत्तराखंड की सियासत में कांग्रेस का हल्लाबोल मतदाता सूची के बहाने चुनावी रण का आगाज देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल गर्माने लगा है। इस बार मुद्दा बना है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण। कांग्रेस ने इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते हुए राज्यभर में विरोध प्रदर्शन तेज कर दिए हैं। पार्टी नेताओं का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम हटने की आशंका है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसी मुद्दे को लेकर प्रदेश कांग्रेस ने जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन किए, चुनाव आयोग को ज्ञापन सौंपे और सरकार के साथ-साथ चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए। कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची में किसी भी प्रकार की त्रुटि लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर कर सकती है और इसलिए प्रत्येक पात्र मतदाता का नाम सुरक्षित रहना चाहिए। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। उनका आरोप है कि यदि प्रक्रिया में लापरवाही हुई तो हजारों मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। पार्टी ने मांग की है कि प्रत्येक आपत्ति और दावे का निष्पक्ष तरीके से निस्तारण किया जाए तथा पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक निगरानी में हो। प्रदेश कांग्रेस का कहना है कि वह केवल राजनीतिक विरोध नहीं कर रही, बल्कि मतदाताओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठा रही है। पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक सक्रिय रहने और मतदाता सूची का सत्यापन कराने के निर्देश भी दिए हैं। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है। भाजपा का कहना है कि मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण चुनाव आयोग की नियमित और संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस बिना ठोस प्रमाण के जनता में भ्रम फैलाने का प्रयास कर रही है। भाजपा का दावा है कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम छूटता है, तो उसके लिए चुनाव आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा और आपत्ति दर्ज कराने की व्यवस्था पहले से मौजूद है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर का मुद्दा केवल मतदाता सूची तक सीमित नहीं है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सभी दल अपने-अपने समर्थक वर्ग को सक्रिय करने में जुटे हैं। कांग्रेस इसे लोकतंत्र और मताधिकार का मुद्दा बना रही है, जबकि भाजपा इसे प्रशासनिक प्रक्रिया बताकर विपक्ष के आरोपों को खारिज कर रही है। राज्य में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों के बीच अब मतदाता सूची का सवाल भी चुनावी बहस का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच चुनाव आयोग की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। आयोग के सामने चुनौती है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध ढंग से पूरी हो, ताकि किसी भी प्रकार की आशंका या विवाद की गुंजाइश न रहे। यदि किसी मतदाता का नाम छूटता है, तो उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत समय पर सुधार का अवसर मिल सके। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड में चुनावी बिगुल अभी औपचारिक रूप से नहीं बजा है, लेकिन एसआईआर को लेकर शुरू हुआ विवाद यह संकेत जरूर दे रहा है कि आने वाले महीनों में राजनीतिक दल जनता से जुड़े हर मुद्दे को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाएंगे। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाकर अपनी सक्रियता का संदेश देने की कोशिश की है, जबकि भाजपा चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर भरोसा जताते हुए विपक्ष के आरोपों को निराधार बता रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि एसआईआर का यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है या आने वाले विधानसभा चुनावों में यह वास्तव में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनता है।

‘वायरल वीडियो’ पर सियासत, कांग्रेस का हमला

भाजपा विधायक महेश जीना की कथित अभद्र भाषा का वीडियो वायरल होने के बाद प्रदेश की राजनीति में उबाल कांग्रेस पार्टी के नताओं ने अमर्यादित भाषा को बताया लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान, कार्रवाई की मांग कांग्रेस के आरोपों के बीच सत्ता पक्ष उतरा अपने विधायक के बचाव में,दोनों दलों के बीच बढ़ा जुबानी जंग का दौर देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर नेताओं की भाषा चर्चा के केंद्र में है। भाजपा विधायक महेश जीना के कथित अभद्र भाषा वाले वायरल वीडियो को लेकर प्रदेश की सियासत गरमा गई है। कांग्रेस ने इसे जनप्रतिनिधि की गरिमा के खिलाफ बताते हुए भाजपा पर तीखा हमला बोला है, जबकि सत्ता पक्ष अपने विधायक के बचाव में उतर आया है। इस घटनाक्रम ने दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर शुरू कर दिया है। प्रदेश कांग्रेस ने कहा कि जनता के प्रतिनिधियों से शालीन और मर्यादित आचरण की अपेक्षा की जाती है। यदि कोई जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंच या बातचीत में अमर्यादित भाषा का प्रयोग करता है, तो वह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। कांग्रेस नेताओं ने भाजपा से विधायक के बयान पर स्पष्ट रुख अपनाने और आवश्यक कार्रवाई करने की मांग की है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा लगातार संस्कार और अनुशासन की बात करती है, लेकिन जब उसके नेताओं की भाषा विवादों में आती है तो पार्टी बचाव की मुद्रा में दिखाई देती है। विपक्ष का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा केवल व्यक्तिगत व्यवहार का विषय नहीं होती, बल्कि वह राजनीतिक संस्कृति का भी परिचय देती है। दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक अवसरवाद करार दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि वीडियो को संदर्भ से काटकर पेश किया जा रहा है और विपक्ष जानबूझकर अनावश्यक विवाद खड़ा कर रहा है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस के नेताओं का अपना रिकार्ड भी ऐसे विवादों से अछूता नहीं रहा है और नैतिकता का पाठ पढ़ाने से पहले उसे अपने गिरेबान में भी झांकना चाहिए। सत्ता पक्ष का तर्क है कि चुनावी माहौल बनते ही सोशल मीडिया पर वीडियो और बयानों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है। इसलिए किसी भी वीडियो पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले पूरे संदर्भ को देखना आवश्यक है। वायरल वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है। एक पक्ष इसे जनप्रतिनिधि की भाषा पर सवाल बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक रूप से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाने का आरोप लगा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोशल मीडिया के दौर में किसी भी नेता का एक बयान या वीडियो कुछ ही मिनटों में राज्यव्यापी बहस का विषय बन जाता है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। ऐसे समय में राजनीतिक दल एक-दूसरे को घेरने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहे हैं। अब तक विकास, बेरोजगारी, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर राजनीति होती रही है, लेकिन अब नेताओं की भाषा और आचरण भी चुनावी बहस का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी राजनीति में मुद्दों की लड़ाई जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतनी ही नेताओं की सार्वजनिक छवि भी। ऐसे विवाद मतदाताओं के बीच राजनीतिक दलों की छवि को प्रभावित कर सकते हैं। लोकतंत्र में तीखी आलोचना और राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन राजनीतिक संवाद की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक माना जाता है। जनता अपने प्रतिनिधियों से केवल विकास कार्यों की ही नहीं, बल्कि संयमित और जिम्मेदार व्यवहार की भी अपेक्षा करती है। महेश जीना के कथित वीडियो को लेकर शुरू हुआ यह विवाद फिलहाल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित है, लेकिन इसने एक बार फिर यह बहस जरूर छेड़ दी है कि क्या चुनावी राजनीति में भाषा का स्तर लगातार गिर रहा है? आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि यह विवाद केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहता है या फिर राजनीतिक दल इसे चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बनाकर आगे बढ़ाते हैं। इतना तय है कि उत्तराखंड की राजनीति में इस मुद्दे ने नई गर्माहट पैदा कर दी है और दोनों प्रमुख दल इसे अपने-अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप भुनाने की कोशिश में जुट गए हैं।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

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udaydinmaan: कागजों में ‘सेवक’ और मंचों पर ‘महाराज’: स्वागत भाषणों में समय स्वाहा, पहाड़ के दर्द सुनने की नेताओं को फुर्सत ही नहीं सुर्खियों की राजनीति छोड़िए, मेघालय माडल अपनाकर नीयत साफ कीजिए स...

कागजों में ‘सेवक’ और मंचों पर ‘महाराज’

स्वागत भाषणों में समय स्वाहा, पहाड़ के दर्द सुनने की नेताओं को फुर्सत ही नहीं सुर्खियों की राजनीति छोड़िए, मेघालय माडल अपनाकर नीयत साफ कीजिए सरकार उत्तराखंड में नेताओं के स्वागत में फिजूलखर्च, समस्याओं पर आज भी पसरा है सन्नाटा माला नहीं, जनता का होगासम्मान, मेघालय सरकार का फैसला बन गया है मिसाल देहरादून। पहले एक खबर बनी। फिर एक आदेश आया और अब उस आदेश ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या लोकतंत्र में जनता सबसे ऊपर है या फिर मंच पर बैठे वीआईपी? मेघालय सरकार ने वीआईपी संस्कृति पर ऐसा फैसला लिया है, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। अब वहां किसी भी सरकारी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक या अन्य जनप्रतिनिधियों का औपचारिक अभिनंदन, शॉल ओढ़ाने, माला पहनाने और स्मृति चिन्ह देने जैसी परंपरा नहीं होगी। इसके बजाय कार्यक्रमों में आम नागरिकोंकृकिसान, शिक्षक, महिला समूह, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता या किसी स्थानीय उपलब्धि हासिल करने वाले व्यक्तिकृको सम्मानित किया जाएगा और उन्हें अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा। मेघालय सरकार का तर्क साफ है कि सरकारी कार्यक्रम जनता के टैक्स के पैसे से होते हैं। इसलिए उनका केंद्र भी जनता ही होनी चाहिए, न कि मंच पर बैठे नेता। सरकारी आयोजन विकास कार्यों की समीक्षा, योजनाओं की जानकारी और लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए होने चाहिए, न कि नेताओं के स्वागत-सत्कार के लिए। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि सरकारी संस्कृति बदलने की कोशिश माना जा रहा है। अब प्रश्न उठता है कि क्या उत्तराखंड भी ले सकता है ऐसा फैसला? देवभूमि उत्तराखंड में शायद ही कोई सरकारी कार्यक्रम ऐसा होता हो, जहां मंच पर नेताओं के स्वागत में फूल-मालाओं की कतार न लगी हो। कई बार कार्यक्रम का बड़ा हिस्सा स्वागत भाषण, शाल ओढ़ाने और स्मृति चिन्ह देने में ही निकल जाता है। जनता घंटों इंतजार करती रहती है कि आखिर उनकी समस्या पर कब बात होगी। अगर मेघालय की तरह उत्तराखंड में भी ऐसा आदेश लागू हो जाए तो तस्वीर काफी बदल सकती है। क्या बदल सकता है? सरकारी कार्यक्रमों में समय की बचत होगी, मंच पर नेताओं के बजाय जनता की उपलब्धियों को सम्मान मिलेगा और गांव की महिला, सैनिक परिवार, किसान, शिक्षक और युवा मंच के केंद्र में होंगे। अधिकारियों का फोकस स्वागत व्यवस्था से हटकर योजनाओं के क्रियान्वयन पर होगा। जनता और सरकार के बीच संवाद बढ़ेगा। उत्तराखंड के सरकारी कार्यक्रमों में अक्सर देखने को मिलता हैकृकि मंच पर लंबी कुर्सियों की कतार,स्वागत के लिए कई-कई संस्थाओं की लाइन,दर्जनों मालाएं और शाल,नेताओं के लंबे भाषण और अंत में जनता के सवाल पूछने का समय ही खत्म। कई बार तो किसी योजना के शुभारंभ से ज्यादा चर्चा स्वागत समारोह की होती है। ऐसे में मेघालय का माडल उत्तराखंड के लिए भी एक नई सोच पेश करता है। सरकारी कार्यक्रमों का खर्च जनता के टैक्स से चलता है। यदि उसी पैसे से नेताओं का स्वागत, स्मृति चिन्ह, फूल-मालाएं और औपचारिक आयोजन किए जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह खर्च वास्तव में आवश्यक है? अगर यही राशि किसी विद्यालय, अस्पताल, पुस्तकालय, आंगनबाड़ी, महिला समूह या छात्रवृत्ति पर खर्च हो, तो उसका सीधा लाभ समाज को मिलेगा। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 करीब हैं। ऐसे समय में यदि राज्य सरकार भी मेघालय जैसी पहल करती है, तो यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा कि सरकार वास्तव में वीआईपी संस्कृति खत्म करना चाहती है। यह कदम विपक्ष और सत्ताकृदोनों के लिए एक परीक्षा भी होगा। क्योंकि मंच पर सम्मान पाने की परंपरा किसी एक दल तक सीमित नहीं रही है। उत्तराखंड के लोग वर्षों से पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पेयजल जैसे मुद्दों पर जवाब चाहते हैं। ऐसे में यदि सरकारी कार्यक्रमों का केंद्र जनता बन जाए, तो लोकतंत्र की भावना और मजबूत होगी। आखिर लोकतंत्र में सबसे बड़ा वीआईपी कौन होना चाहिएकृमंत्री या मतदाता? मेघालय सरकार का फैसला केवल माला हटाने का आदेश नहीं है, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं को बदलने का प्रयास है। यदि उत्तराखंड भी इस माडल को अपनाता है, तो सरकारी कार्यक्रमों की संस्कृति में बड़ा बदलाव आ सकता है। नेताओं के स्वागत की जगह यदि किसी सीमांत गांव की महिला, किसी सरकारी स्कूल के मेधावी छात्र, किसी सैनिक की शहादत देने वाले परिवार, किसी नवाचारी किसान या आपदा में उत्कृष्ट कार्य करने वाले स्वयंसेवक का सम्मान हो, तो लोकतंत्र की असली तस्वीर सामने आएगी। सवाल अब यही हैकृक्या उत्तराखंड भी वीआईपी संस्कृति से आगे बढ़कर जनता ही सबसे बड़ा सम्मान का संदेश देने का साहस दिखाएगा, या फिर सरकारी मंचों पर फूल-मालाओं और औपचारिक अभिनंदन की परंपरा पहले की तरह जारी रहेगी?

कैमरे चालू, ट्रक मुस्तैद और तमाशा

अतिक्रमण हटाओ अभियान सहूलियत या सिर्फ कैमरों वाला छलावा अवैध कब्जे से ज्यादा प्रशासनिक नूराकुश्ती से लाचार हुआ देहरादून जब तक अफसर मेहरबान रहेंगे, तब तक कैसे खाली होंगे फुटपाथ राजधानी दून में फुटपाथ पर कब्जे की वापसी हर बार होती है तेज से देहरादून। देहरादून में फिर अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है। फुटपाथ खाली कराए जा रहे हैं। दुकानों के बाहर रखा सामान ट्रकों में भरा जा रहा है। नगर निगम के अधिकारी कैमरों के सामने खड़े होकर बता रहे हैं कि शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाया जा रहा है। कुछ दिन तक सड़कें चौड़ी दिखाई देंगी। लोग कहेंगे, वाह, अब ट्रैफिक सुधर जाएगा। लेकिन जरा ठहरिए...एक महीना बाद उसी सड़क से गुजरिए। वही फुटपाथ फिर सामान से भर जाएंगे। वही ठेले, वही बोर्ड, वही टीन शेड, वही पार्किंग और वही कब्जा। फिर अगले साल यही अभियान चलेगा। फिर वही तस्वीरें, वही प्रेस विज्ञप्ति और वही दावाकृअतिक्रमण हटा दिया गया। सवाल यह नहीं है कि अतिक्रमण हटाया गया या नहीं। सवाल यह है कि अतिक्रमण हटता क्यों नहीं, सिर्फ हटाया क्यों जाता है? यानी बीमारी का इलाज नहीं, केवल बुखार नापने की रस्म निभाई जा रही है। अब प्रश्न उठता है कि क्या फुटपाथ पर बैठा छोटा दुकानदार?क्या फल बेचने वाला गरीब? क्या ठेले वाला? या फिर वह पूरा तंत्र जो सालों तक अवैध कब्जे को बढ़ने देता है और फिर अचानक बुलडोजर लेकर पहुंच जाता है? अगर किसी दुकान ने दो-दो, तीन-तीन फुट तक सरकारी जमीन घेर ली, तो यह एक दिन में नहीं हुआ होगा। यह महीनों और वर्षों में हुआ होगा। तब नगर निगम कहां था? तब नोटिस क्यों नहीं दिए गए?तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?और अगर कार्रवाई हुई थी तो फिर कब्जा दोबारा कैसे हो गया? यानी शहर में अतिक्रमण से बड़ा सवाल प्रशासनिक अतिक्रमण का है। जहां जिम्मेदारी पर लापरवाही ने कब्जा कर लिया है। अब देहरादून में अतिक्रमण हटाओ अभियान भी एक सरकारी मौसम बन चुका है।जैसे बरसात आती है। जैसे सर्दियां आती हैं। वैसे ही बुलडोजर भी आता है। मीडिया कवरेज होती है। कुछ तस्वीरें वायरल होती हैं। कुछ अधिकारी सम्मानित हो जाते हैं। फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। अगर अभियान के बाद दोबारा कब्जा हो जाता है, तो इसका मतलब साफ है कि कार्रवाई अधूरी थी। यही सबसे बड़ा सवाल है। जब फुटपाथ पर ठेला लगता है, तो बुलडोजर तुरंत पहुंच जाता है। लेकिन जब किसी बड़े होटल का पार्किंग क्षेत्र सड़क तक फैल जाता है...जब किसी बड़े शोरूम की सीढ़ियां सरकारी जमीन पर बन जाती हैं..जब किसी प्रभावशाली व्यक्ति की बाउंड्री वाल आगे बढ़ जाती है...तब कार्रवाई की गति धीमी क्यों पड़ जाती है? कानून की आंख पर पट्टी इसलिए बांधी गई थी कि वह सबको बराबर देखे। लेकिन कई बार लगता है कि उस पट्टी के नीचे से पहचान भी झांक रही है। यह यक्ष प्रश्न है कि फुटपाथ दुकानों के विस्तार के लिए नहीं बने।फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए बने हैं।लेकिन देहरादून में कई जगह पैदल चलना ही सबसे मुश्किल काम है।क्योंकि फुटपाथ पर दुकान है। ठेला है। बाइक खड़ी है। कार पार्क है और जहां कुछ नहीं है, वहां निर्माण सामग्री रखी है। यानी पैदल चलने वाला नागरिक सड़क पर उतरता है। फिर सड़क पर ट्रैफिक बढ़ता है। फिर दुर्घटना होती है। फिर प्रशासन ट्रैफिक प्लान बनाता है। लेकिन फुटपाथ वापस पैदल यात्रियों को नहीं मिलते। कोई भी अवैध निर्माण बिना किसी की नजर के वर्षों तक खड़ा नहीं रह सकता। हर नया शेड...हर नया बोर्ड...हर नई दीवार...किसी न किसी की आंखों के सामने बनी होगी। अगर अधिकारी नहीं देख पाए, तो यह अक्षमता है। अगर देखकर भी नहीं बोले, तो यह सवाल जवाबदेही का है और अगर सब जानते थे, फिर भी चुप रहे, तो यह केवल अतिक्रमण नहीं, व्यवस्था की साझेदारी है। बुलडोजर समाधान नहीं है। समाधान हैकृ दोबारा कब्जा करने वालों पर भारी आर्थिक दंड, संबंधित क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, हर अतिक्रमण क्षेत्र की डिजिटल मैपिंग हो, साप्ताहिक निरीक्षण अनिवार्य हो, प्रभावशाली और सामान्य नागरिक के लिए समान कानून लागू हो, रेहड़ी-फड़ी वालों के लिए नियोजित वेंडिंग ज़ोन विकसित किए जाएं, ताकि रोजगार भी बचे और सड़कें भी। जब तक कब्जा करने वाले से ज्यादा डर कार्रवाई करने वाले को रहेगा, तब तक अतिक्रमण लौटता रहेगा। बता दें कि देहरादून केवल राजधानी नहीं है, यह उत्तराखंड का चेहरा है। लेकिन शहर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां अतिक्रमण हटाने का अभियान, अतिक्रमण रोकने की नीति से ज्यादा मजबूत दिखाई देता है। बुलडोजर की आवाज कुछ घंटों तक सुनाई देती है। लेकिन उसके बाद फिर धीरे-धीरे दुकानें बाहर आने लगती हैं। सामान फुटपाथ पर सजने लगता है। लोहे के स्टैंड वापस आ जाते हैं। तिरपाल फिर तन जाती है और शहर समझ जाता है कि अभियान खत्म हो गया है। शायद देहरादून को बुलडोजर से ज्यादा ईमानदार निगरानी की जरूरत है। क्योंकि सवाल अतिक्रमण का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जो हर साल वही गलती दोहराती है और फिर उसी गलती पर कार्रवाई करके अपनी पीठ थपथपाती है और तब लगता है कि देहरादून में सड़कों पर सबसे स्थायी चीज अतिक्रमण नहीं, बल्कि अस्थायी कार्रवाई है। यही इस शहर की सबसे बड़ी विडंबना है।

यूकेडी का 70 सीटों पर दांव

भाजपा और कांग्रेस के सियासी गणित में पड़ सकती है नई दरार यूकेडी की घोषणा से विस चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबले के संकेत पहाड़ की राजनीति में फिर उठी क्षेत्रीय अस्मिता की दमदार आवाज देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन अब उत्तराखंड क्रांति दल ने आगामी विधानसभा चुनाव में सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर सियासी समीकरणों को नई दिशा देने की कोशिश की है। यह घोषणा ऐसे समय आई है जब भाजपा सत्ता बचाने और कांग्रेस सत्ता में वापसी की रणनीति बनाने में जुटी है। ऐसे में यूकेडी का मैदान में पूरी ताकत के साथ उतरना दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए नई चुनौती बन सकता है। हालांकि सवाल यह भी है कि क्या यूकेडी सिर्फ चुनावी उपस्थिति दर्ज कराएगी या वास्तव में भाजपा और कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना देगी? उत्तराखंड राज्य आंदोलन की अगुआ रही यूकेडी वर्षों से अपने खोए जनाधार को वापस पाने की कोशिश कर रही है। अलग राज्य बनने के बाद जिस दल ने राज्य निर्माण का सपना दिखाया, वही धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिये पर पहुंच गया। अब पार्टी एक बार फिर मूल निवास, भू-कानून, रोजगार, पलायन, जल-जंगल-जमीन और पहाड़ की पहचान जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यूकेडी इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में सफल रहती है, तो वह उन मतदाताओं को आकर्षित कर सकती है जो भाजपा और कांग्रेस दोनों से निराश हैं। उत्तराखंड में कई विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां जीत-हार का अंतर दो से पांच हजार वोटों के भीतर रहा है। यदि यूकेडी इन सीटों पर कुछ हजार वोट भी हासिल कर लेती है, तो कई सीटों का परिणाम बदल सकता है। विशेषकर पर्वतीय जिलोंकृपौड़ी, टिहरी, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और रुद्रप्रयागकृमें क्षेत्रीय मुद्दों का असर अधिक माना जाता है। यहां यूकेडी की सक्रियता भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। भाजपा फिलहाल सरकार में है और स्वाभाविक रूप से सत्ता विरोधी माहौल का सामना भी कर रही है। यदि यूकेडी भू-कानून, मूल निवास, स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन और पहाड़ की उपेक्षा जैसे मुद्दों पर जनसमर्थन जुटाती है, तो उसका असर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक पर भी पड़ सकता है। हालांकि भाजपा संगठनात्मक रूप से मजबूत है और उसके पास बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क है, लेकिन छोटे अंतर वाली सीटों पर यूकेडी का प्रभाव निर्णायक हो सकता है। कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर का लाभ उठाने की उम्मीद कर रही है। लेकिन यदि भाजपा विरोधी वोट यूकेडी की ओर खिसकते हैं, तो कांग्रेस की संभावित बढ़त कमजोर पड़ सकती है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह मतदाताओं को यह भरोसा दिलाए कि भाजपा को हराने की वास्तविक लड़ाई उसी के हाथ में है। यदि विपक्षी वोट बंटे, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। उत्तराखंड के शुरुआती चुनावों में यूकेडी का प्रभाव साफ दिखाई देता था। कई बार उसने सत्ता गठन के समीकरणों को प्रभावित किया। बाद के वर्षों में संगठन कमजोर हुआ, नेतृत्व बिखरा और जनाधार सिमटता गया। अब यदि पार्टी सभी 70 सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारने, संगठन खड़ा करने और प्रभावी चुनाव अभियान चलाने में सफल होती है, तो वह भले सत्ता तक न पहुंचे, लेकिन कई सीटों पर किंगमेकर की भूमिका निभा सकती है। घोषणा करना और उसे जमीन पर उतारना, दोनों अलग बातें हैं। यूकेडी के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैंकृकि हर सीट पर मजबूत उम्मीदवार खोजना, चुनावी संसाधनों का प्रबंधन, बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करना, युवा मतदाताओं के बीच प्रभाव बनाना, गुटबाजी से बचना और क्षेत्रीय मुद्दों को चुनावी एजेंडा बनाना। यदि पार्टी इन चुनौतियों से पार नहीं पाती, तो 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा केवल प्रतीकात्मक बनकर रह सकती है। उत्तराखंड की राजनीति अब केवल भाजपा बनाम कांग्रेस तक सीमित नहीं दिखाई दे रही। यूकेडी के इस फैसले ने चुनावी बहस में तीसरे विकल्प की संभावना को फिर जीवित कर दिया है। यदि क्षेत्रीय अस्मिता, भू-कानून और स्थानीय अधिकारों का मुद्दा चुनाव के केंद्र में आता है, तो यूकेडी राजनीतिक चर्चा का बड़ा केंद्र बन सकती है। वहीं यदि चुनाव राष्ट्रीय नेतृत्व, संगठन और संसाधनों के दम पर लड़ा गया, तो भाजपा और कांग्रेस की सीधी टक्कर ही प्रमुख रहेगी। यूकेडी का 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान केवल एक चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दल अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। अब नजर इस बात पर होगी कि क्या यूकेडी अपनी इस घोषणा को मजबूत संगठन, प्रभावी उम्मीदवारों और जनसमर्थन में बदल पाती है या फिर यह भी चुनावी मौसम की एक और राजनीतिक घोषणा बनकर रह जाएगी। 2027 के विधानसभा चुनाव की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यूकेडी की इस घोषणा ने राजनीतिक दलों की रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। भाजपा को अपने वोट बैंक की रक्षा करनी होगी, कांग्रेस को विपक्षी मतों के बिखराव से बचना होगा और यूकेडी को यह साबित करना होगा कि वह केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति का भविष्य भी बन सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो इस बार चुनावी मुकाबला सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राज्य की क्षेत्रीय राजनीति के पुनर्जागरण का भी हो सकता है।

कुदरत को ‘माल’ समझने वालों आंखें खोलो

दुनिया को बचाने का रास्ता गुजरता है हिमालय की देव संस्कृति से होकर गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल की देव संस्कृति है सदियों से यहां की आस्था हजारों वर्षों से यहां पर्यावरण संरक्षण व सामाजिक संतुलन का जीवंत दर्शन देहरादून। हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं का नाम नहीं है। यह उन सभ्यताओं का घर है, जिन्होंने प्रकृति को संसाधन नहीं, बल्कि देवत्व का स्वरूप माना। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल के पर्वतीय समाज की पहचान केवल उनकी लोकभाषाओं, लोकगीतों और रीति-रिवाजों से नहीं होती, बल्कि उस देव संस्कृति से होती है, जिसने हजारों वर्षों से मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने, जल संकट और जैव विविधता के क्षरण जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब हिमालयी समाज की यह परंपरा आधुनिक पर्यावरणीय सोच के लिए भी महत्वपूर्ण संदर्भ बनकर उभरती है। यहां जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, नदी केवल पानी का साधन नहीं और पर्वत केवल खनिज संपदा का भंडार नहीं माने गए। इन्हें जीवनदाता और पूजनीय माना गया। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल के अधिकांश गांवों में आज भी ग्राम देवता या स्थानीय देवी-देवताओं की परंपरा जीवित है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी अलग देव परंपरा, अपने मेले, अपने अनुष्ठान और अपने लोकाचार हैं। इन देवस्थलों के आसपास के जंगलों, जलस्रोतों और चरागाहों को लंबे समय तक सामुदायिक संरक्षण मिलता रहा। अनेक स्थानों पर इन क्षेत्रों से पेड़ काटना, जलस्रोतों को प्रदूषित करना या वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाना धार्मिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से अनुचित माना जाता था। इस प्रकार आस्था ने संरक्षण की ऐसी व्यवस्था विकसित की, जिसे आज की भाषा में ष्सामुदायिक पर्यावरण प्रबंधनष् कहा जा सकता है। हिमालयी देव संस्कृति की जड़ें स्थानीय लोकविश्वासों और व्यापक सनातन परंपरा, दोनों से जुड़ी दिखाई देती हैं। पर्वतों को शिव का निवास, नदियों को मातृस्वरूप, वृक्षों को जीवनदायी और धरती को माता मानने की परंपरा ने प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत किया। हिमालयी क्षेत्रों में होने वाले अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाशकृइन पंचमहाभूतों का विशेष महत्व है। यह दृष्टिकोण केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं, बल्कि दैनिक जीवन, कृषि, पशुपालन और सामुदायिक व्यवहार में भी दिखाई देता है। स्थानीय देव परंपराएं केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने गांवों के सामाजिक जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई क्षेत्रों में विवादों के समाधान, सामुदायिक निर्णय, मेलों के आयोजन, जलस्रोतों की देखरेख और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जुड़े नियमों में देवस्थानों और स्थानीय परंपराओं का प्रभाव देखा जाता रहा है। इससे सामाजिक अनुशासन और सामुदायिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत होती थी। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल के लोकपर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के अवसर भी हैं। हरेला, फूलदेई, इगास,घी संक्रांति, बग्वाल, नंदा देवी महोत्सव, जागर जैसी परंपराएं ऋतुओं, खेती, जंगलों, जल और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ी हैं। इन पर्वों के माध्यम से नई पीढ़ी तक यह संदेश पहुंचता है कि प्रकृति का सम्मान केवल पूजा से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण से भी होता है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, सड़क निर्माण, अनियोजित पर्यटन, जलवायु परिवर्तन और पलायन ने हिमालयी समाज की पारंपरिक जीवनशैली को प्रभावित किया है। कई गांव खाली हो रहे हैं। अनेक पारंपरिक मेले और अनुष्ठान सीमित होते जा रहे हैं। युवा पीढ़ी का अपनी लोकभाषाओं, लोककथाओं और देव परंपराओं से जुड़ाव भी पहले जैसा नहीं रहा। इसके साथ ही जंगलों, जलस्रोतों और पारंपरिक सामुदायिक संसाधनों पर भी दबाव बढ़ा है। ऐसे समय में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या विकास और परंपरा के बीच संतुलन बनाया जा सकता है? आज पर्यावरण विशेषज्ञ सस्टेनेबल डेवलपमेंट और नेचर-बेस्ड साल्यूशंस की बात करते हैं। लेकिन हिमालयी समाज सदियों से अपने जीवन में इन सिद्धांतों का पालन करता आया है। प्राकृतिक संसाधनों का सीमित उपयोग, सामुदायिक वन संरक्षण, जलस्रोतों की देखभाल, जैव विविधता का सम्मान और प्रकृति के प्रति आध्यात्मिक दृष्टिकोणकृये सभी ऐसे तत्व हैं, जिनसे आधुनिक पर्यावरण नीति भी सीख ले सकती है। देव संस्कृति केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि हिमालय की सांस्कृतिक पहचान का आधार है। यदि यह परंपरा कमजोर होती है, तो उसके साथ लोकभाषाएं, लोककथाएं, लोकसंगीत, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली भी प्रभावित होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सांस्कृतिक संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हिमालय की इस विरासत को जीवित रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नई पीढ़ी पर है। यदि युवा अपनी लोकसंस्कृति, देव परंपराओं और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को समझेंगे, तो यह विरासत भविष्य तक सुरक्षित रह सकेगी। इसके लिए विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों की साझी भूमिका महत्वपूर्ण है। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल की देव संस्कृति हमें यह सिखाती है कि प्रकृति पर अधिकार नहीं, उसके साथ संतुलित सह-अस्तित्व ही सभ्यता की वास्तविक पहचान है। यह परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी एक प्रासंगिक संदेश है। जब दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब हिमालय की यह लोकपरंपरा याद दिलाती है कि विकास का सबसे टिकाऊ माडल वही है, जिसमें जंगल केवल संसाधन नहीं, देवता हों, नदियां केवल जलधारा नहीं, जीवन हों और पर्वत केवल चट्टानें नहीं, हमारी सांस्कृतिक चेतना के प्रहरी हों।

सेवा के मंच पर वोटों की ‘फील्डिंग’

जनसेवा और सामाजिक प्रभाव को राजनीतिक ताकत में बदलने का प्लान भाजपा के एनजीओ समन्वय एवं विकास सम्मेलन ने खड़े किए कई सवाल चुनाव से पहले सामाजिक संगठनों के जरिए तैयार हो रहा है चुनावी नेटवर्क देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 की दस्तक अब साफ सुनाई देने लगी है। राजनीतिक दल केवल सभाओं, रैलियों और सदस्यता अभियानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज के उन वर्गों तक पहुंच बनाने की कवायद तेज हो गई है, जिनका सीधा प्रभाव जनमत पर पड़ता है। इसी कड़ी में भाजपा के एनजीओ प्रकोष्ठ द्वारा देहरादून में आयोजित एनजीओ समन्वय एवं विकास सम्मेलन ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। सम्मेलन का संदेश थाकृबदलाव की शुरुआत आपके एक कदम से। मंच से सामाजिक संस्थाओं को संगठित करने, विकास की धारा से जोड़ने और समाज सेवा को नई दिशा देने की बात कही गई। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इससे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह वास्तव में समाज सेवा का मंच था, या फिर चुनावी रणनीति का वह हिस्सा, जहां सामाजिक संस्थाओं के प्रभाव को राजनीतिक ताकत में बदलने की कोशिश की जा रही है? यही वह सवाल है, जो इस सम्मेलन को सामान्य कार्यक्रम से आगे ले जाकर राजनीतिक विश्लेषण का विषय बना देता है। उत्तराखंड में अब तक भाजपा, कांग्रेस और अन्य दल किसान, महिला, युवा, शिक्षक, व्यापार और पेशेवर वर्गों के अलग-अलग प्रकोष्ठ बनाकर संगठन विस्तार करते रहे हैं। लेकिन एनजीओ क्षेत्र को इस स्तर पर संगठित करने की पहल पहली बार इतनी स्पष्ट दिखाई दी। राज्यभर से सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों को एक मंच पर बुलाना महज औपचारिक आयोजन नहीं माना जा रहा। चुनावी राजनीति में सामाजिक पूंजी को सबसे प्रभावी पूंजी माना जाता है। जिन संस्थाओं का गांव-गांव, वार्ड-वार्ड और समुदायों में वर्षों का संपर्क है, उनकी बात लोगों तक अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय ढंग से पहुंचती है। यहीं से राजनीतिक विश्लेषण शुरू होता है। गैर-सरकारी संगठन केवल समाज सेवा नहीं करते। वह गांवों में महिला स्वयं सहायता समूहों के साथ काम करते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, नशा मुक्ति, बाल अधिकार, जल संरक्षण, स्वरोजगार और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक उनकी भूमिका रहती है। कई संस्थाएं हजारों स्वयंसेवकों के नेटवर्क के साथ काम करती हैं। यानी उनके पास वह सामाजिक पहुंच है, जिसे राजनीतिक दल वर्षों की मेहनत के बाद तैयार करते हैं। ऐसे में यदि कोई राजनीतिक दल इस पूरे वर्ग से संगठित संवाद शुरू करता है, तो उसके दूरगामी राजनीतिक अर्थ निकाले जाना स्वाभाविक है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक चुनाव केवल पार्टी कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं लड़े जाते। आज चुनावी रणनीति में ऐसे प्रभावशाली वर्गों की भूमिका बढ़ गई है जो प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं होते, लेकिन समाज में उनकी स्वीकार्यता होती है। यदि किसी क्षेत्र में वर्षों से काम कर रही सामाजिक संस्था किसी नीति या सरकार के पक्ष में सकारात्मक वातावरण बनाती है, तो उसका असर मतदाताओं पर पड़ सकता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और स्वयंसेवी संगठनों के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश करते हैं। हालांकि, इस सम्मेलन के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि ऐसा ही उद्देश्य था, लेकिन यह सवाल राजनीतिक बहस का हिस्सा अवश्य बन गया है। उत्तराखंड में केंद्र और राज्य सरकार की अनेक योजनाएं स्वयंसेवी संस्थाओं की भागीदारी से भी संचालित होती हैं। महिला सशक्तिकरण, पोषण, कौशल विकास, जल संरक्षण, जैविक खेती, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में एनजीओ सक्रिय रहते हैं। यदि यही संस्थाएं किसी राजनीतिक दल के साथ सार्वजनिक मंच साझा करती हैं, तो विपक्ष यह प्रश्न उठा सकता है कि कहीं सरकारी योजनाओं और राजनीतिक संदेशों की सीमाएं धुंधली तो नहीं हो रही हैं। दूसरी ओर, भाजपा का तर्क यह हो सकता है कि सामाजिक संस्थाओं से संवाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है और इससे समाज सेवा के कार्यों को गति मिलती है। राजनीति में चुनाव केवल जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों से नहीं जीते जाते। अब सामाजिक प्रभाव रखने वाले समूह भी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। महिला समूह...युवा क्लब...धार्मिक संगठन...सांस्कृतिक मंच...स्वयंसेवी संस्थाएं... इन सभी की स्थानीय स्तर पर अपनी पहचान होती है। यदि किसी दल का इनसे संवाद मजबूत होता है, तो वह चुनावी अभियान को अप्रत्यक्ष रूप से भी लाभ पहुंचा सकता है। यही वजह है कि भाजपा का यह सम्मेलन सामान्य संगठनात्मक गतिविधि से कहीं अधिक राजनीतिक महत्व रखता दिखाई देता है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस सम्मेलन को आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं। वह यह सवाल उठा सकते हैंकृक्या समाज सेवा करने वाली संस्थाओं को राजनीतिक मंचों से जोड़ना उचित है? क्या इससे एनजीओ की निष्पक्षता प्रभावित होगी? क्या भविष्य में सरकारी सहायता प्राप्त संस्थाओं पर किसी प्रकार का राजनीतिक दबाव बनेगा?क्या सामाजिक संस्थाएं राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन जाएंगी? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में राजनीतिक बहस का विषय बन सकते हैं। भाजपा इस पूरे मामले को अलग नजरिये से देख सकती है। पार्टी का पक्ष यह हो सकता है कि लोकतंत्र में किसी भी सामाजिक संस्था को किसी भी राजनीतिक दल से संवाद करने का अधिकार है। यदि कोई संस्था समाज के विकास, पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण या जनकल्याण के मुद्दों पर सरकार और राजनीतिक दलों से समन्वय करती है, तो इसमें कोई असामान्य बात नहीं है। पार्टी यह भी कह सकती है कि सम्मेलन का उद्देश्य सामाजिक संस्थाओं के अनुभवों को जोड़ना और विकास कार्यों में उनकी भागीदारी बढ़ाना था, न कि उन्हें राजनीतिक रूप से संबद्ध करना। भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं की पहचान उनकी निष्पक्षता और जनसेवा से बनती है। यदि किसी संस्था पर किसी दल विशेष के निकट होने की धारणा बनती है, तो उसके कामकाज पर भी सवाल उठ सकते हैं। इसीलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि सामाजिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों के बीच संवाद हो सकता है, लेकिन उसकी प्रवृति पारदर्शी और स्पष्ट होनी चाहिए। लोकतंत्र में नागरिक समाज की स्वतंत्र भूमिका को बनाए रखना उतना ही आवश्यक है, जितना राजनीतिक दलों का सामाजिक संवाद। भाजपा पहले से बूथ स्तर तक मजबूत संगठन होने का दावा करती है। अब यदि वह समाज के विभिन्न वर्गों के साथ भी अपने रिश्ते मजबूत करती है, तो उसका चुनावी आधार और व्यापक हो सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सामने चुनौती होगी कि वह भी सामाजिक संगठनों और नागरिक समाज के बीच अपनी उपस्थिति मजबूत करें। यानी आने वाले महीनों में केवल राजनीतिक रैलियां ही नहीं, बल्कि सामाजिक मंच भी चुनावी गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। अब प्रश्न उठता है कि क्या यह सम्मेलन केवल सामाजिक समन्वय का प्रयास था? या फिर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक प्रभाव रखने वाले संगठनों के माध्यम से राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की रणनीति? इसका स्पष्ट उत्तर अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति अब बूथ, मंडल और जिलों से आगे बढ़कर समाज के प्रभावशाली नेटवर्क तक पहुंच चुकी है।

यूकेडी की हुंकार अब ‘नया उत्तराखंड’

उत्तराखंड चुनाव में नया उत्तराखंड के संकल्प के साथ पहचान तलाशने मैदान में उतरेगा यूकेडी नया उत्तराखंड का एजेंडा या खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की यह है आखिरी लड़ाई राज्य आंदोलन की विरासत, क्षेत्रीय अस्मिता और जनसरोकारों के सहारे चुनावी रणभूमि में उतरेगा यूकेडी देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल अपनी पहचान और प्रासंगिकता स्थापित करने की कोशिश में जुट गया है। पार्टी ने नया उत्तराखंड का संकल्प लेकर चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान किया है। यह सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि उन मुद्दों को फिर से केंद्र में लाने का प्रयास है जिनके आधार पर अलग उत्तराखंड राज्य का आंदोलन खड़ा हुआ था। यूकेडी का दावा है कि राज्य बनने के 26 वर्षों बाद भी उत्तराखंड अपने मूल उद्देश्यों से भटक गया है। पलायन, बेरोजगारी, संसाधनों का असमान उपयोग, भूमि संरक्षण, स्थानीय युवाओं के अधिकार और पहाड़ों का विकास जैसे मुद्दे आज भी अधूरे हैं। पार्टी इन्हीं सवालों को लेकर जनता के बीच जाने की रणनीति बना रही है। यूकेडी के अनुसार नया उत्तराखंड केवल नई सरकार बनाने का अभियान नहीं, बल्कि शासन की सोच बदलने का संकल्प है। पार्टी का मानना है कि पिछले दो दशकों में प्रदेश की राजनीति राष्ट्रीय दलों के बीच सत्ता परिवर्तन तक सीमित हो गई, जबकि राज्य आंदोलन के मूल उद्देश्य पीछे छूट गए। यूकेडी अपने एजेंडे में पांच बड़े बिंदुओं को केंद्र में रख रही हैकृमजबूत भू-कानून, मूल निवास आधारित अधिकार, स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन रोकने की ठोस नीति, प्राकृतिक संसाधनों पर उत्तराखंड का अधिकार। इसके साथ ही प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों से सबसे अधिक चर्चा भू-कानून को लेकर रही है। यूकेडी लगातार मांग करती रही है कि हिमालयी राज्य की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को देखते हुए उत्तराखंड में भी हिमाचल प्रदेश जैसी सख्त भूमि संरक्षण नीति लागू की जाए। पार्टी का कहना है कि यदि जमीन पर नियंत्रण कमजोर होता गया तो आने वाले वर्षों में स्थानीय लोग अपनी ही भूमि पर हाशिये पर पहुंच जाएंगे। यूकेडी लंबे समय से मूल निवास आधारित नीति लागू करने की मांग करती रही है। पार्टी का तर्क है कि सरकारी नौकरियों और विभिन्न योजनाओं में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उनका कहना है कि उत्तराखंड के संसाधनों पर पहला अधिकार उत्तराखंड के लोगों का होना चाहिए। यही मुद्दा राज्य आंदोलन के दौरान भी प्रमुख मांगों में शामिल था। उत्तराखंड के हजारों गांव आज भी खाली होने की समस्या से जूझ रहे हैं। यूकेडी का कहना है कि सरकारों ने पलायन आयोग तो बना दिया, लेकिन गांवों में रोजगार और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। पार्टी का दावा है कि नया उत्तराखंड तभी बनेगा जब गांव आबाद होंगे और युवाओं को अपने घरों के पास रोजगार मिलेगा। यूकेडी सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग और ठेका व्यवस्था की लगातार आलोचना करती रही है। पार्टी का कहना है कि स्थायी रोजगार के अवसर घट रहे हैं जबकि अस्थायी नियुक्तियों का दायरा बढ़ रहा है। युवा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए पार्टी स्थानीय उद्योग, कृषि आधारित रोजगार, पर्यटन और स्वरोजगार को प्राथमिकता देने की बात कर रही है। जल, जंगल और जमीन हमेशा से यूकेडी की राजनीति का मूल आधार रहे हैं। पार्टी का आरोप है कि बड़े विकास परियोजनाओं का लाभ स्थानीय लोगों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पाया। यूकेडी चाहती है कि जलविद्युत परियोजनाओं, खनन, वन संपदा और पर्यटन से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा स्थानीय क्षेत्रों के विकास पर खर्च हो। बता दें कि उत्तराखंड आंदोलन में यूकेडी की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। राज्य बनने के बाद पार्टी धीरे-धीरे संगठनात्मक कमजोरियों, गुटबाजी और सीमित जनाधार के कारण पीछे चली गई। अब पार्टी फिर से राज्य आंदोलन की भावनाओं को जनता के बीच ले जाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है। यूकेडी का आरोप है कि पिछले 26 वर्षों में सत्ता बदलती रही लेकिन व्यवस्था नहीं बदली। पार्टी भाजपा और कांग्रेस दोनों पर राज्य आंदोलन की भावनाओं के साथ न्याय न करने का आरोप लगा रही है। यूकेडी का कहना है कि दोनों राष्ट्रीय दलों ने उत्तराखंड को राष्ट्रीय राजनीति के नजरिये से देखा, जबकि राज्य की स्थानीय जरूरतें अलग हैं। 2027 के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की संख्या काफी अधिक होगी। यूकेडी का पूरा प्रयास है कि वह रोजगार, शिक्षा, स्टार्टअप, कृषि, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्थानीय अवसरों के मुद्दे उठाकर युवाओं को अपने साथ जोड़े। यदि पार्टी युवाओं के बीच प्रभाव बना पाती है तो उसका चुनावी प्रदर्शन पहले की तुलना में बेहतर हो सकता है। हालांकि नया उत्तराखंड का विजन जितना आकर्षक दिखाई देता है, उसे जमीन पर उतारना उतना ही कठिन है। यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां हैंकृपूरे प्रदेश में मजबूत संगठन खड़ा करना, 70 सीटों पर प्रभावी उम्मीदवार उतारना, सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े दलों से मुकाबला करना, गुटबाजी से बचना, युवाओं और नए मतदाताओं का विश्वास जीतना, अपने एजेंडे को केवल चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करना। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यूकेडी अपने पारंपरिक प्रभाव वाले पर्वतीय क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन करती है, तो कई सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। भले ही पार्टी सत्ता तक न पहुंचे, लेकिन कम अंतर वाली सीटों पर वोटों का बंटवारा चुनावी परिणामों को बदल सकता है। यूकेडी का नया उत्तराखंड संकल्प प्रदेश की राजनीति में क्षेत्रीय विमर्श को फिर से केंद्र में लाने की कोशिश है। यह एजेंडा राज्य आंदोलन की उन अधूरी आकांक्षाओंकृस्थानीय अधिकार, रोजगार, पलायन रोकना, भू-कानून और संसाधनों पर स्थानीय भागीदारीकृको दोबारा राजनीतिक बहस का विषय बनाता है। लेकिन चुनावी राजनीति में केवल मुद्दे पर्याप्त नहीं होते। संगठन, नेतृत्व, संसाधन, विश्वसनीयता और जनसंपर्क भी उतने ही निर्णायक होते हैं। 2027 का चुनाव इसलिए यूकेडी के लिए केवल सीटें जीतने की लड़ाई नहीं, बल्कि यह साबित करने की परीक्षा भी होगा कि क्या वह आज के उत्तराखंड में एक प्रभावी क्षेत्रीय विकल्प बन सकती है, या फिर नया उत्तराखंड का संकल्प भी चुनावी घोषणापत्र के पन्नों तक सीमित रह जाएगा।

रविवार, 2 अगस्त 2026

udaydinmaan: पहाड़ की ‘खामोश’ क्रांति पर सिस्टम की ‘चोट’

udaydinmaan: पहाड़ की ‘खामोश’ क्रांति पर सिस्टम की ‘चोट’: महिला मंगल दल गांव की पहरेदार महिला मंगल दल का वादों का सहारा बिना पद संभाली जल-जंगल और जमीन पर लड़ा युद्ध गांव की सरकार आज भी है समाज की संस...

‘नारी’ अस्मिता पर सियासी ‘तमाशा’

सहानुभूति का मुखौटा पहन राजनीतिक मोहरे बिछाने का आरोप गंभीर मामलों पर एकजुटता के बजाय आर-पार के मूड में दल महिला सुरक्षा पर भाजपा ने किया कांग्रेस पार्टी पर तीखा हमला भाजपा बोली-संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति करना कांग्रेस की आदत देहरादून। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। भाजपा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि महिलाओं की सुरक्षा जैसे अत्यंत संवेदनशील और गंभीर विषय पर राजनीति करना कांग्रेस की पुरानी आदत रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस हर आपराधिक घटना को राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश करती है, जबकि ऐसे मामलों में सभी दलों को मिलकर पीड़ितों के साथ खड़ा होना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के दिनों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के कई मामलों को लेकर राजनीतिक दल आमने-सामने हैं। कांग्रेस लगातार सरकार की कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा के मुद्दे पर आलोचना कर रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि कांग्रेस का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ हासिल करना है। भाजपा के प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने संयुक्त रूप से कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस चुनिंदा घटनाओं को उठाकर राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश करती है और कई बार तथ्यों की पूरी जांच से पहले ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर देती है। भाजपा नेताओं का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर बहस होनी चाहिए, लेकिन इसे राजनीतिक हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। भाजपा का तर्क है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने महिला सुरक्षा के लिए कानूनों को सख्त करने, फास्ट ट्रैक कोर्ट, महिला हेल्पलाइन, वन-स्टाप सेंटर और पुलिस तंत्र को मजबूत करने जैसे कई कदम उठाए हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे उसका राजनीतिक संबंध किसी भी दल से क्यों न हो। भाजपा के आरोपों पर कांग्रेस ने भी पलटवार किया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा राजनीति का नहीं, बल्कि जनसुरक्षा और शासन की जवाबदेही का विषय है। उनका कहना है कि यदि अपराध बढ़ रहे हैं या कानून-व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं तो विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार से जवाब मांगे। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा आलोचना से बचने के लिए हर सवाल को राजनीतिक साजिश बताने की कोशिश करती है। कांग्रेस का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा पर सरकार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। पार्टी नेताओं ने यह भी कहा कि पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग करना राजनीति नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल महिला सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि आगामी चुनावी रणनीति का भी हिस्सा बन चुका है। उत्तराखंड सहित कई राज्यों में अगले विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी है और कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा, बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख चुनावी एजेंडा बनते जा रहे हैं। ऐसे में दोनों दल इन मुद्दों पर अपनी राजनीतिक धार तेज करने में जुटे हैं। भाजपा महिला सुरक्षा के सवाल पर अपनी सरकारी योजनाओं और कानूनी सुधारों को सामने रख रही है, जबकि कांग्रेस सरकार की जवाबदेही, पुलिस व्यवस्था और अपराध नियंत्रण के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रही है। दोनों दलों की रणनीति स्पष्ट हैकृमहिला मतदाताओं के बीच अपनी विश्वसनीयता मजबूत करना। महिलाओं की सुरक्षा भारतीय राजनीति का ऐसा मुद्दा है जिस पर जनता की भावनाएं गहराई से जुड़ी होती हैं। इसलिए किसी भी घटना के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेजी से सामने आती हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ते आरोप-प्रत्यारोप के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इस राजनीतिक संघर्ष से महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में मजबूत होगी? महिलाओं की सुरक्षा पर राजनीतिक बहस लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन यह बहस तब सार्थक होगी जब उसका केंद्र चुनावी लाभ नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार होगा। यदि राजनीतिक दल इस मुद्दे को केवल आरोप-प्रत्यारोप का माध्यम बनाएंगे तो सबसे बड़ा नुकसान उस विश्वास का होगा, जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता देश की महिलाओं को है। जनता अब केवल बयान नहीं, बल्कि ठोस परिणाम देखना चाहती है।

नैरेटिव का ‘जहर’ और वोट की ‘जंग’

हैट्रिक की जिद बनाम बदलाव की जंग भाजपा का नैरेटिव सेट करने पर जोर कांग्रेस को दिख रही वापसी की राह राजनीतिक मोहरों से बिगड़ेगा समीकरण देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने चुनावी शतरंज बिछानी शुरू कर दी है। पिछले चुनावों में जहां मुकाबला विकास बनाम वादों तक सीमित था, वहीं इस बार लड़ाई केवल सीटों की नहीं, बल्कि जनता के मन में नैरेटिव स्थापित करने की है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि 2027 का चुनाव उत्तराखंड की राजनीति का सबसे अलग और सबसे आक्रामक चुनाव साबित हो सकता है। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतिहास रचने की तैयारी में है, जबकि कांग्रेस इसे सत्ता परिवर्तन का सबसे बड़ा अवसर मान रही है। दूसरी ओर क्षेत्रीय दल और नए राजनीतिक समूह भी युवाओं और स्थानीय मुद्दों के सहारे अपनी जगह बनाने की कोशिश में हैं। भाजपा का पूरा चुनावी अभियान अब तक के विकास कार्यों, सड़क, रेल, चारधाम आल वेदर रोड, रोपवे, निवेश, पर्यटन, समान नागरिक संहिता और डबल इंजन सरकार की अवधारणा के इर्द-गिर्द रहने की संभावना है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि उत्तराखंड को राजनीतिक स्थिरता और तेज विकास केवल भाजपा ही दे सकती है। हालांकि भाजपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी, बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं पर उठे सवाल, महंगाई और ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याएं विपक्ष को लगातार मुद्दे दे रही हैं। ऐसे में पार्टी संगठन और सरकार दोनों को एंटी-इनकंबेंसी की धार को कुंद करना होगा। कांग्रेस बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और किसानों के मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का प्रयास है कि सत्ता विरोधी भावना को संगठित जनसमर्थन में बदला जाए। लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा उसके अपने संगठन की मजबूती होगी। यदि गुटबाजी और नेतृत्व के सवाल हावी रहे, तो जनता के मुद्दे भी चुनावी लाभ में नहीं बदल पाएंगे। चुनाव से पहले संगठनात्मक एकजुटता कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक आवश्यकता होगी। उत्तराखंड में बड़ी संख्या में युवा मतदाता पहली बार मतदान करेंगे। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, स्टार्टअप, स्वरोजगार, डिजिटल अवसर और शिक्षा उनके प्रमुख मुद्दे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मामलों ने युवाओं के बीच व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए। अब सभी दल युवाओं को अपने पक्ष में करने के लिए अलग-अलग रणनीति बना रहे हैं। सोशल मीडिया इस बार चुनाव प्रचार का सबसे प्रभावी हथियार बन सकता है। महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वरोजगार, स्वयं सहायता समूह, गैस, पानी और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों महिलाओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने की तैयारी में हैं। उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। पलायन, खाली होते गांव, सड़क, स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा जैसे मुद्दे पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार चर्चा का विषय हैं, जबकि मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण, रोजगार, उद्योग और बुनियादी सुविधाएं प्रमुख चुनावी मुद्दे हैं। जो दल इन दोनों क्षेत्रों की अपेक्षाओं में संतुलन स्थापित करेगा, उसे चुनावी लाभ मिल सकता है। 2027 का चुनाव केवल जनसभाओं का नहीं होगा। फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप पर नैरेटिव बनाने की प्रतिस्पर्धा पहले ही शुरू हो चुकी है। वीडियो, फैक्ट-चेक, आरोप-प्रत्यारोप और त्वरित राजनीतिक प्रतिक्रियाएं चुनाव प्रचार की दिशा तय करेंगी। डिजिटल अभियान अब किसी भी दल की चुनावी रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बन चुका है। क्षेत्रीय दल, निर्दलीय उम्मीदवार और नए राजनीतिक मंच भले सत्ता की सीधी दौड़ में न दिखें, लेकिन कई सीटों पर वे परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले का लाभ किसे मिलेगा, यह स्थानीय समीकरण तय करेंगे। 2027 का चुनाव केवल सरकार बदलने या बचाने का चुनाव नहीं होगा। यह तय करेगा कि उत्तराखंड का राजनीतिक विमर्श विकास, रोजगार, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहता है या फिर पहचान, भावनात्मक मुद्दों और चुनावी नैरेटिव के इर्द-गिर्द घूमता है। उत्तराखंड की चुनावी बिसात बिछ चुकी है। भाजपा अपने शासन और विकास माडल पर भरोसा जता रही है, जबकि कांग्रेस जनसरोकारों और सत्ता विरोधी माहौल को राजनीतिक ऊर्जा में बदलने की कोशिश कर रही है। लेकिन अंतिम फैसला जनता करेगीकृऔर वह केवल नारों से नहीं, बल्कि यह देखकर कि किस दल के पास आने वाले पांच वर्षों के लिए सबसे विश्वसनीय दृष्टि, मजबूत संगठन और व्यवहारिक रोडमैप है।

पहाड़ की ‘खामोश’ क्रांति पर सिस्टम की ‘चोट’

महिला मंगल दल गांव की पहरेदार महिला मंगल दल का वादों का सहारा बिना पद संभाली जल-जंगल और जमीन पर लड़ा युद्ध गांव की सरकार आज भी है समाज की संस्कारशाला देहरादून। पहाड़ों में यदि किसी संस्था ने बिना किसी बड़े प्रचार, राजनीतिक मंच या सरकारी पद के समाज को सबसे अधिक जोड़ा है, तो वह है महिला मंगल दल। गांव की चौपाल से लेकर जंगलों की रक्षा, जल स्रोतों के संरक्षण, सामाजिक जागरूकता, नशामुक्ति अभियान, स्वच्छता, लोक संस्कृति और आपदा के समय राहत कार्य तककृमहिला मंगल दल दशकों से पहाड़ की सामाजिक धड़कन बने हुए हैं। आज जब पलायन, जल संकट, जंगलों में आग, बदलते सामाजिक ताने-बाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब महिला मंगल दलों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन महिलाओं ने गांवों को जीवंत बनाए रखा, वह स्वयं अक्सर सरकारी योजनाओं और नीति-निर्माण के केंद्र से दूर दिखाई देती हैं। पहाड़ के इतिहास में महिलाओं ने केवल परिवार नहीं संभाला, बल्कि जंगल, जल और जमीन की रक्षा के लिए भी संघर्ष किया। चिपको आंदोलन ने दुनिया को यह संदेश दिया कि पहाड़ की महिलाएं पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी प्रहरी हैं। उसी सामाजिक चेतना की निरंतरता आज भी महिला मंगल दलों में दिखाई देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह दल केवल औपचारिक संगठन नहीं हैं, बल्कि सामुदायिक नेतृत्व का जीवंत उदाहरण हैं। गांव में कोई धार्मिक आयोजन हो, स्कूल का कार्यक्रम, स्वच्छता अभियान, जल स्रोत की सफाई, पौधारोपण या किसी जरूरतमंद परिवार की सहायताकृसबसे पहले महिला मंगल दल ही सक्रिय दिखाई देता है। पहाड़ की महिलाएं खेती, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, स्वयं सहायता समूह, स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक हस्तशिल्प से जुड़ी हुई हैं। महिला मंगल दल इन गतिविधियों को संगठित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि सरकार इन दलों को स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग, विपणन, प्रशिक्षण और डिजिटल प्लेटफार्म से जोड़ दे, तो पहाड़ की अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है। मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, लाल चावल, जड़ी-बूटियां और स्थानीय हस्तशिल्प जैसे उत्पाद राष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सकते हैं। आज पहाड़ के हजारों गांव पलायन की मार झेल रहे हैं। पुरुष रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं, जबकि गांवों की जिम्मेदारी महिलाओं पर बढ़ती जा रही है। ऐसे में महिला मंगल दल केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि गांवों को जीवित रखने वाली ताकत बन चुके हैं। कई गांवों में यह संगठन खाली पड़े खेतों को सामूहिक खेती से जोड़ने, वर्षा जल संरक्षण, जैविक खेती और सामुदायिक श्रमदान जैसे कार्यों में भी योगदान दे रहे हैं। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही महिला मतदाताओं की भूमिका पर सभी राजनीतिक दलों की नजर रहती है। महिला मंगल दल सीधे तौर पर गैर-राजनीतिक संगठन माने जाते हैं, लेकिन उनके माध्यम से गांवों की वास्तविक समस्याएं सामने आती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, राशन, गैस, वन अधिकार और आजीविका जैसे मुद्दों पर सबसे स्पष्ट आवाज इन्हीं समूहों से निकलती है। यही कारण है कि चुनावी मौसम में जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दल महिला समूहों से संवाद बढ़ाने का प्रयास करते हैं। हालांकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि महिला मंगल दलों को केवल चुनावी मंच का हिस्सा न बनाया जाए, बल्कि उनके सुझावों को ग्राम विकास योजनाओं और स्थानीय नीति निर्माण में भी महत्व मिले। एक चिंता यह भी है कि आधुनिक जीवनशैली, पलायन और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के कारण नई पीढ़ी की महिलाओं का महिला मंगल दलों से जुड़ाव पहले जैसा नहीं रहा। यदि समय रहते इन संगठनों को डिजिटल प्रशिक्षण, नेतृत्व विकास और स्वरोजगार से नहीं जोड़ा गया, तो उनकी सामाजिक ऊर्जा कमजोर पड़ सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि महिला मंगल दलों को पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, पर्यटन, जैविक खेती, वन प्रबंधन और आपदा प्रबंधन से व्यवस्थित रूप से जोड़ा जाए, तो वह ग्रामीण विकास के सबसे प्रभावी मॉडल बन सकते हैं। उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, चारधाम और प्राकृतिक सौंदर्य नहीं है। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसके गांव और उन गांवों की महिलाएं हैं। महिला मंगल दलों ने वर्षों से बिना किसी बड़े संसाधन के सामाजिक एकता, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास की मशाल जलाए रखी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें उन्हें केवल सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित न रखें, बल्कि ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण, जल संरक्षण, जैविक कृषि, स्थानीय अर्थव्यवस्था और आपदा प्रबंधन की नीतियों में साझेदार बनाएं। यदि उत्तराखंड के गांवों को आत्मनिर्भर बनाना है, तो महिला मंगल दलों को केवल सम्मान नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में भी सशक्त स्थान देना होगा। क्योंकि पहाड़ की असली रीढ़ सड़कें नहीं, बल्कि यह महिलाएं हैं जो हर कठिन परिस्थिति में गांव को जीवित रखे हुए हैं।

शनिवार, 1 अगस्त 2026

udaydinmaan: कंडाली की ‘छपाक’ और बचपन का ‘शोर’

udaydinmaan: कंडाली की ‘छपाक’ और बचपन का ‘शोर’: पहाड़ की पगडंडियों, गदेरों और बेफिक्र दिनों की वह ख़ूबसूरत दास्तान दो मिनट का रोना और फिर पहाड़ की पगडंडियों पर वही खेल शुरू नंगे पांव दौड़ना, ...

कंडाली की ‘छपाक’ और बचपन का ‘शोर’

पहाड़ की पगडंडियों, गदेरों और बेफिक्र दिनों की वह ख़ूबसूरत दास्तान दो मिनट का रोना और फिर पहाड़ की पगडंडियों पर वही खेल शुरू नंगे पांव दौड़ना, गदेरों में छलांगें व बिछुआ घास की वह मीठी चुभन हर पहाड़ी के दिल में आज भी जिंदा है बचपन का वह खट्टा-मीठा दर्द देहरादून। अरे... कंडाली लग गई! यह आवाज कभी पहाड़ के हर गांव में सुनाई देती थी। अगले ही पल बच्चों का शोर, हंसी और भागमभाग शुरू हो जाती थी। कोई हाथ सहला रहा होता, कोई पत्ते रगड़ रहा होता, तो कोई साथी को चिढ़ाते हुए कहता अब समझ आया, खेत में दौड़ने का नतीजा! पहाड़ में बचपन का मतलब सिर्फ स्कूल जाना नहीं था। बचपन का मतलब थाकृनंगे पांव पगडंडियों पर दौड़ना, जंगलों में गाय-बकरियां चराना, गदेरों में मछलियां पकड़ना, पेड़ों पर चढ़ना और इन्हीं सबके बीच कभी न कभी कंडाली की छपाक खाना। यह छपाक सिर्फ शरीर पर नहीं लगती थी, बल्कि पहाड़ के हर बच्चे की यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती थी। कंडाली का पौधा दिखने में जितना साधारण, उसका स्पर्श उतना ही तेज। इसके महीन कांटे त्वचा में चुभते और कुछ ही सेकंड में हाथ-पैर जलने लगते। ऐसा लगता मानो किसी ने सैकड़ों सूइयां एक साथ चुभो दी हों। लेकिन पहाड़ के बच्चों के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। दो मिनट रोने के बाद फिर वही खेल शुरू। आज की तरह उस समय हर घर में दवा नहीं होती थी। दादी कहती थींकृबांज का पत्ता रगड़ दो, कोई कहता बिच्छू बूटी का असर अपने आप उतर जाएगा, तो कोई मिट्टी या ठंडा पानी लगाने की सलाह देता। कुछ देर बाद जलन कम हो जाती और बच्चे फिर जंगल की ओर निकल पड़ते। कई गांवों में कंडाली सिर्फ गलती से नहीं लगती थी। दोस्तों की शरारत में भी इसका खूब इस्तेमाल होता था। किसी की पीठ पर हल्की सी कंडाली छुआ दी और फिर पूरा गांव हंसी से गूंज उठता। उस समय गुस्सा भी आता था और दोस्ती भी उतनी ही मजबूत रहती थी। समय बदला। विज्ञान ने बताया कि यही कंडाली पोषक तत्वों का खजाना है। इससे स्वादिष्ट साग बनता है, आयुर्वेदिक दवाइयां तैयार होती हैं और आज यह जैविक खेती व पहाड़ी व्यंजनों की पहचान बन चुकी है जो पौधा कभी बच्चों को रुलाता था, वही आज शहरों के बड़े-बड़े होटलों के मेन्यू में जगह बना चुका है। मोबाइल, इंटरनेट और कोचिंग के दौर में पहाड़ का बचपन भी बदल गया है। अब बच्चे जंगलों में कम जाते हैं। पगडंडियों की जगह सड़कें हैं, गदेरों की जगह मोबाइल गेम्स और पेड़ों पर चढ़ने की जगह सोशल मीडिया ने ले ली है। इसलिए नई पीढ़ी शायद कभी उस एहसास को नहीं समझ पाएगी, जब कंडाली की छपाक लगते ही पूरा दोस्ताना ठहाकों में बदल जाता था। पहाड़ छोड़ चुके लाखों लोग जब अपने गांव लौटते हैं और कहीं खेत की मेड़ पर कंडाली का पौधा देखते हैं, तो अनायास मुस्कुरा देते हैं। उन्हें याद आता हैकृवह बचपन...वह पगडंडी...वह खेत...वह बारिश... और कंडाली की वह तेज जलन, जो आज सबसे मीठी याद बन चुकी है। कभी जिस बिच्छू घास से बचकर भागते थे, आज उसी की तस्वीर देखकर बचपन लौट आता है। शायद इसलिए पहाड़ के लोग कहते हैंकृकंडाली की छपाक भूल सकते हो, लेकिन उससे जुड़ी यादें कभी नहीं।

खाकी में ‘बगावत’ या जवानों का ‘दर्द’

निलंबित शेर सिंह के पीछे खड़ा हुआ एक और सिपाही छात्र आंदोलन से उठी चिंगारी अब बनने लगी है शोला उत्तराखंड पुलिस के अंदरूनी असंतोष आ गया है सामने देहरादून। उत्तराखंड पुलिस में अनुशासन और असंतोष को लेकर चल रही बहस ने नया मोड़ ले लिया। छात्र आंदोलन के दौरान दिए गए बयान के बाद निलंबित किए गए कांस्टेबल शेर सिंह के समर्थन में अब एक और पुलिसकर्मी के सामने आ गया है। शेर सिंह प्रकरण पहले ही राज्य की राजनीति और सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ था। अब दूसरे पुलिसकर्मी के सामने आने से यह मामला एक व्यक्तिगत विवाद से आगे बढ़कर संस्थागत चर्चा का विषय बन गया है। पुलिस बल एक अनुशासित सेवा है। सेवा नियमों के अनुसार कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे सार्वजनिक मंचों पर ऐसे बयान न दें, जिनसे विभाग की निष्पक्षता या अनुशासन पर प्रश्न उठें। दूसरी ओर, यह मामला इस बहस को भी जन्म देता है कि सरकारी सेवाओं में कार्यरत कर्मचारियों की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए और किन परिस्थितियों में विभागीय कार्रवाई उचित मानी जाती है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब राज्य में विभिन्न राजनीतिक और छात्र संगठनों के आंदोलन चर्चा में हैं। विपक्ष इस मामले को कर्मचारियों के असंतोष और सरकार के रवैये से जोड़ सकता है, जबकि सत्तापक्ष का जोर इस बात पर रहेगा कि वर्दीधारी बलों में अनुशासन सर्वाेच्च है और सेवा नियमों का पालन अनिवार्य है। पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है। एक वर्ग इसे पुलिस कर्मियों के भीतर बढ़ती बेचौनी का संकेत बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे व्यक्तिगत घटनाओं को अनावश्यक रूप से व्यापक रूप देने की कोशिश मान रहा है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित पुलिसकर्मी के मामले में विभाग क्या कार्रवाई करता है। यदि विभागीय जांच शुरू होती है, तो यह स्पष्ट होगा कि पुलिस मुख्यालय इस प्रकरण को किस दृष्टिकोण से देख रहा है।

‘वोटर लिस्ट’ पर उत्तराखंड में ‘संग्राम’

हजारों नागरिकों के वोट पर मंडराया संकट या सिर्फ यह है जुबानी जंग मतदाता सूची की खामियों को मुद्दा बनाकर कांग्रेस का हल्ला बोल उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के रण से पहले बढ़ी राजनीतिक तपिश देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया अब राजनीतिक विवाद का नया केंद्र बन गई है। कांग्रेस ने इस पूरी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और खामियों का आरोप लगाते हुए राज्यभर में मोर्चा खोल दिया है। पार्टी का दावा है कि यदि समय रहते कमियां दूर नहीं की गईं तो हजारों वास्तविक मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। वहीं सत्तारूढ़ भाजपा इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कह रही है कि चुनाव आयोग पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता और निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित कर रहा है। चुनावी वर्ष से पहले मतदाता सूची का पुनरीक्षण हमेशा महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन इस बार यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। यह राजनीतिक संघर्ष का नया अखाड़ा बनती दिखाई दे रही है। प्रदेश कांग्रेस का आरोप है कि एसआईआर के दौरान कई स्थानों पर मतदाताओं के नाम बिना पर्याप्त सूचना के हटाए जा रहे हैं, नए मतदाताओं के पंजीकरण में अनावश्यक देरी हो रही है और बूथ स्तर पर पर्याप्त सत्यापन नहीं किया जा रहा। पार्टी नेताओं का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग रोजगार के कारण अस्थायी रूप से बाहर रहते हैं। ऐसे परिवारों के नाम हटने का खतरा बढ़ गया है। कांग्रेस का कहना है कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से बाहर हो गया तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकतकृमताधिकारकृकमजोर होगी। इसी मुद्दे को लेकर पार्टी जिला मुख्यालयों से लेकर राज्य स्तर तक ज्ञापन, धरना और विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को चुनाव से पहले भ्रम फैलाने की रणनीति बताया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण पूरी तरह चुनाव आयोग की संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें राजनीतिक दलों के बूथ एजेंटों को भी आपत्तियां और सुझाव देने का अवसर मिलता है। भाजपा का तर्क है कि यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है तो उसके लिए निर्धारित अपील और दावा-आपत्ति की व्यवस्था पहले से मौजूद है। ऐसे में कांग्रेस का विरोध केवल राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश है। इस पूरे विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग है। आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना है ताकि मृत, स्थानांतरित या दोहरे नामों को हटाया जा सके और नए पात्र मतदाताओं को जोड़ा जा सके। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल सूची की शुद्धता ही नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है। यही कारण है कि आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सभी दलों की निगाहें टिकी हुई हैं। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में एसआईआर की प्रक्रिया मैदानी राज्यों से कहीं अधिक जटिल है। बड़ी संख्या में लोग रोजगार, शिक्षा और व्यवसाय के लिए दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई या अन्य शहरों में रहते हैं, जबकि उनका स्थायी निवास गांवों में है। कई गांवों में पलायन के कारण परिवार वर्ष के अधिकांश समय बाहर रहते हैं। यदि ऐसे मामलों में पर्याप्त सत्यापन के बिना नाम हटाए जाते हैं तो विवाद स्वाभाविक रूप से बढ़ सकता है। यही मुद्दा कांग्रेस जोर-शोर से उठा रही है। इस बार पहली बार मतदान करने वाले युवाओं का पंजीकरण भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। कांग्रेस का आरोप है कि कई कालेजों और दूरदराज क्षेत्रों में जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं है। वहीं भाजपा दावा कर रही है कि युवा मतदाताओं को जोड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर का विवाद केवल मतदाता सूची तक सीमित नहीं है। इसके पीछे आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति भी जुड़ी हुई है। कांग्रेस इसे लोकतंत्र और मताधिकार की रक्षा का मुद्दा बनाकर जनता के बीच ले जाना चाहती है, जबकि भाजपा चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर भरोसा जताते हुए विपक्ष के आरोपों को चुनावी राजनीति का हिस्सा बता रही है। यदि यह मुद्दा लगातार गर्माता है तो आने वाले महीनों में यह बेरोजगारी, महंगाई और पलायन जैसे मुद्दों के साथ चुनावी विमर्श का प्रमुख हिस्सा बन सकता है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि चुनाव आयोग कांग्रेस द्वारा उठाए गए मुद्दों पर क्या प्रतिक्रिया देता है और पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान प्राप्त दावों एवं आपत्तियों का किस प्रकार निस्तारण करता है। यदि प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और तथ्यपरक रही तो विवाद स्वतः शांत हो सकता है। लेकिन यदि किसी भी स्तर पर बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम छूटने या हटने की शिकायतें सामने आती हैं, तो यह मामला राजनीतिक से आगे बढ़कर संवैधानिक बहस का विषय भी बन सकता है। मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद है। इसलिए उस पर उठने वाला हर सवाल स्वाभाविक रूप से गंभीर होता है। विपक्ष का अधिकार है कि वह संभावित खामियों की ओर ध्यान दिलाए, वहीं चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जांच कर प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखे। फिलहाल उत्तराखंड में एसआईआर केवल एक प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति का नया रणक्षेत्र बन चुका है।

जनगणना में भी पहाड़ ‘अदृश्य’

अपनी गणना, अपना गांव, संसद में महेंद्र भट्ट ने उठाई पर्वतीय जनगणना की मांग बड़ा सवाल,कृक्या मैदानी पैमानों में सिमट कर रह गई है पहाड़ की आबादी पलायन वखाली होते गांवों की सच्चाई, आंकड़ों में लौटेंगे खाली होते गांव देहरादून। उत्तराखंड को अक्सर देवभूमि कहा जाता है। चुनाव आते हैं तो वीरभूमि भी कहा जाता है। पर्यटन की बात होती है तो स्वर्ग कहा जाता है। लेकिन जब सरकारी फाइलों में गिनती होती है, तब यही उत्तराखंड अक्सर सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाता है। संसद में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने उत्तराखंड के लिए विशेष पर्वतीय जनगणना माडल की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि अपनी गणना, अपना गांव की तर्ज पर ऐसी जनगणना होनी चाहिए, जो पहाड़ की वास्तविक आबादी, पलायन और गांवों की सच्चाई को दर्ज करे। सवाल यह नहीं है कि यह मांग किसने उठाई। सवाल यह है कि क्या भारत की मौजूदा जनगणना व्यवस्था वास्तव में पहाड़ को देख भी रही है? उत्तराखंड में हजारों गांव ऐसे हैं जहां मकान खड़े हैं, लेकिन लोग नहीं। दरवाजों पर ताले हैं, खेतों में झाड़ियां हैं और स्कूलों में बच्चों की संख्या हर साल घट रही है। लेकिन जब जनगणना होती है तो वह पूछती हैकृआप अभी कहां रहते हैं? वह यह नहीं पूछती कि आपका गांव कौन-सा है? वह यह नहीं पूछती कि आप हर त्योहार पर किस गांव लौटते हैं? वह यह भी नहीं पूछती कि यदि गांव में रोजगार मिल जाए तो क्या आप वापस लौटेंगे?यही वह खाली जगह है, जिसकी ओर संसद में इशारा किया गया। उत्तराखंड का पलायन कोई नई खबर नहीं है। इस पर आयोग बने, रिपोर्टें आईं, समितियां बनीं और घोषणाएं हुईं। लेकिन गांव आज भी खाली हैं। सरकारें कहती हैं कि सड़क बना दी। लोग पूछते हैंकृरोजगार कहां है? सरकार कहती है इंटरनेट पहुंच गया। लोग पूछते हैंकृयुवा वापस क्यों नहीं लौटे? सरकार कहती है पर्यटन बढ़ा। लोग पूछते हैंकृस्थायी आजीविका कितनों को मिली? यही वजह है कि आज जनगणना केवल जनसंख्या गिनने का विषय नहीं रह गया है। यह विकास माडल की परीक्षा बन गया है। यह बात भी स्वीकार करनी होगी कि यह मांग ऐसे समय आई है जब उत्तराखंड विधानसभा चुनाव दूर नहीं हैं। भाजपा जानती है कि पलायन, सीमांत गांव, खाली होते घर और पहाड़ की उपेक्षा ऐसे मुद्दे हैं जिन पर हर सरकार से सवाल पूछे जाते रहे हैं। इसलिए यदि भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष संसद में यह कहता है कि उत्तराखंड के लिए अलग पर्वतीय जनगणना माडल होना चाहिए, तो यह केवल प्रशासनिक सुझाव नहीं है। यह एक राजनीतिक संदेश भी है कि पार्टी पहाड़ की पहचान और उसकी विशेष परिस्थितियों को राष्ट्रीय बहस में लाना चाहती है। लेकिन राजनीति का दूसरा पक्ष भी है। महेंद्र भट्ट जिस दल के प्रदेश अध्यक्ष हैं, उसी दल की सरकार राज्य में भी है और केंद्र में भी। इसलिए विपक्ष पूछेगा यदि आज की जनगणना व्यवस्था पहाड़ के साथ न्याय नहीं कर रही थी तो पिछले वर्षों में इसे बदलने की पहल क्यों नहीं हुई? यदि पलायन सबसे बड़ी चुनौती है तो खाली गांवों को आबाद करने की नीतियों का परिणाम क्या निकला? यदि सीमांत गांव रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तो वहां स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की स्थिति अब भी कमजोर क्यों है? लोकतंत्र में यही स्वाभाविक है। जो सवाल विपक्ष से पूछे जाते हैं, वही सवाल सत्ता से भी पूछे जाएंगे। यह बात शायद कम लोग जानते हैं कि जनगणना केवल लोगों की गिनती नहीं करती। उसी के आधार पर योजनाएं बनती हैं, संसाधनों का वितरण होता है, स्कूल, अस्पताल, सड़कें और कई सरकारी सुविधाओं की प्राथमिकताएं तय होती हैं। यदि किसी गांव की आबादी कागज पर कम दिखाई देती है तो वहां विकास योजनाएं भी सीमित हो सकती हैं। यदि बाहर रहने वाले लोग पूरी तरह शहरों की आबादी में दर्ज हो जाते हैं, तो पहाड़ की वास्तविक सामाजिक संरचना सरकारी नजर से ओझल हो सकती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय से पर्वतीय राज्यों के लिए अलग दृष्टिकोण की बात करते रहे हैं। यदि इस अवधारणा पर गंभीरता से काम होता है और प्रत्येक नागरिक का अपने मूल गांव से संबंध भी दर्ज किया जाता है, तो सरकार के पास पहली बार यह स्पष्ट तस्वीर होगी किकृकितने लोग अस्थायी रूप से बाहर हैं। कितने गांव पूरी तरह खाली होने की कगार पर हैं। किन क्षेत्रों में रोजगार देकर आबादी लौटाई जा सकती है। किन सीमांत गांवों को विशेष सहायता की आवश्यकता है। लेकिन इसके लिए केवल नारा नहीं, मजबूत कानूनी ढांचा, स्पष्ट प्रक्रिया और विश्वसनीय डेटा संग्रह की व्यवस्था भी चाहिए। संसद में मुद्दा उठ जाना अच्छी बात है। बहस भी हो जाएगी। समाचार भी बन जाएगा। लेकिन पहाड़ के लोग शायद एक और सवाल पूछेंगे। क्या अगली जनगणना के बाद हमारे गांवों में लोग भी लौटेंगे? क्योंकि उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि गांवों की गिनती कम हो रही है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि गांवों में जिंदगी कम होती जा रही है। यदि जनगणना उस जिंदगी को वापस लाने की दिशा में पहला कदम बनती है, तो यह केवल आंकड़ों का सुधार नहीं होगा, बल्कि पहाड़ के भविष्य का दस्तावेज होगा और यदि यह केवल संसद की बहस बनकर रह गई, तो अगली जनगणना में शायद कुछ और गांव नक्शे पर तो मिलेंगे, लेकिन उनमें रहने वाले लोग नहीं। यही उत्तराखंड की सबसे बड़ी विडंबना है।