udaydinmaan
शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026
udaydinmaan: 32 वर्षों बाद भी जीवंत है ‘अन्याय का दर्द’
udaydinmaan: 32 वर्षों बाद भी जीवंत है ‘अन्याय का दर्द’: रामपुर तिराहा कांड की 32वीं बरसी स्मृति, संघर्ष और न्याय की अधूरी आस,उत्तराखंड आंदोलन का वह काला दिन तीन दशक बीतने के बाद भी यह घटना उत्तरा...
जनता के ‘आशीर्वाद’ की तलाश में भाजपा
भाजपा ने बनाई बूथ से घर तक पहुंचने की रणनीति
संगठन को चुनावी मोड में लाने की कवायद तेज की
संगठनात्मक कार्यक्रमों में इसका खाका किया तैयार
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में लाने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी की रणनीति अब केवल सरकार की उपलब्धियां गिनाने तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता, कमजोर सीटों पर पकड़ मजबूत करने और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच संवाद बढ़ाने पर जोर है। हाल के संगठनात्मक कार्यक्रमों में इसका खाका सामने आया है।
भाजपा के सामने 2027 में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य है। इसके लिए पार्टी ने जमीनी संगठन को अपनी रणनीति का मुख्य आधार बनाया है। अगस्त-सितंबर के लिए जारी कार्यक्रमों में बूथ सशक्तीकरण, शक्ति केंद्रों की बैठकें, मतदाता संपर्क और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से संवाद को प्राथमिकता दी गई। पार्टी की कोशिश हर बूथ और हर घर तक संगठन की पहुंच बढ़ाने की है।
भाजपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पिछली विधानसभा में हारी 23 सीटें हैं। इन क्षेत्रों में वरिष्ठ नेताओं और संगठन के पदाधिकारियों के प्रवास, रात्रि विश्राम, बूथ संवाद तथा स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों से संपर्क जैसे कार्यक्रम किए गए। पार्टी इन सीटों पर पिछली हार के कारणों को समझने और संगठनात्मक कमियों को दूर करने की कोशिश कर रही है। वहीं जीती हुई सीटों को सुरक्षित रखना भी रणनीति का अहम हिस्सा है। पार्टी ने मौजूदा विधायकों को अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहने, सरकार के काम जनता तक पहुंचाने और स्थानीय समस्याओं के समाधान पर जोर देने का संदेश दिया है। प्रत्याशी चयन में क्षेत्रीय सक्रियता, संगठन के फीडबैक और सर्वे को आधार बनाए जाने की बात भी सामने आई है।
2027 की चुनावी रणनीति में युवा मतदाताओं को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है। राष्ट्रीय नेतृत्व की बैठकों में पहली बार मतदान करने वाले और 18 से 29 वर्ष के युवाओं तक पहुंच बढ़ाने, महाविद्यालय संपर्क, डिजिटल संवाद और युवा कार्यक्रमों पर चर्चा हुई है। इसके साथ ही भाजपा ने ओबीसी समाज के बीच संपर्क अभियान को भी गति दी है। घर-घर प्रवास, समाजवार संवाद और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों से संपर्क के कार्यक्रम इसके हिस्से हैं।
भाजपा ने प्रदेश कार्यसमिति के स्तर पर विकास, सुशासन, सामाजिक समरसता, जनकल्याण और उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को अपने संभावित चुनावी एजेंडे के प्रमुख बिंदुओं के रूप में रखा है। पार्टी सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को भी चुनावी संवाद का आधार बनाने की तैयारी में है। इस पूरी कवायद का राजनीतिक संदेश साफ हैकृ2027 का चुनाव भाजपा केवल चुनावी मौसम में शुरू होने वाला अभियान नहीं बनाना चाहती। संगठन की गतिविधियों को पहले से ही चुनावी तैयारी में बदलकर पार्टी मतदाताओं तक लगातार पहुंच बनाए रखने की कोशिश कर रही है।
अब असली परीक्षा इस रणनीति के जमीन पर असर की होगी। संगठन बूथ तक कितना सक्रिय होता है, विधायक स्थानीय असंतोष को कितना दूर कर पाते हैं और सरकार की उपलब्धियों के साथ जनता की मौजूदा अपेक्षाओं का संवाद कितना प्रभावी बनता है।कृइन सवालों पर भाजपा की 2027 की चुनावी तैयारी की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।
32 वर्षों बाद भी जीवंत है ‘अन्याय का दर्द’
रामपुर तिराहा कांड की 32वीं बरसी
स्मृति, संघर्ष और न्याय की अधूरी आस,उत्तराखंड आंदोलन का वह काला दिन
तीन दशक बीतने के बाद भी यह घटना उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति में जीवंत
आंदोलनकारियों को रोकने के दौरान हिंसा ने पूरे आंदोलन को झकझोरा था
देहरादून। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे पीड़ादायक अध्याय रामपुर तिराहा कांड को 32 वर्ष पूरे हो चुके हैं। तीन दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी यह घटना उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति में उतनी ही जीवंत है। आंदोलनकारियों पर हुई कार्रवाई, महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार और गोलीकांड ने जिस पीड़ा को जन्म दिया, वह आज भी राज्य की राजनीति और सामाजिक चेतना का हिस्सा है। 32 वर्ष बाद न्याय की दिशा में हुई प्रगति को उम्मीद की शुरुआत माना जा रहा है, लेकिन इसे मंजिल मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
रामपुर तिराहा केवल एक स्थान का नाम नहीं है। यह उस दौर की याद है जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर पहाड़ों से हजारों लोग दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे। दो अक्टूबर 1994 की रात मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर आंदोलनकारियों को रोकने के दौरान हुई हिंसा ने पूरे आंदोलन को झकझोर दिया। इस घटना के बाद उत्तराखंड आंदोलन ने एक निर्णायक मोड़ लिया और राज्य गठन की मांग और अधिक मुखर हुई।
उत्तराखंड का गठन वर्ष 2000 में हो गया, लेकिन रामपुर तिराहा से जुड़े मामलों में न्याय की प्रक्रिया लंबी खिंचती रही। यही वजह है कि हर वर्ष दो अक्टूबर के आसपास शहीदों को याद करते हुए एक सवाल फिर सामने आता हैकृक्या जिन लोगों ने राज्य के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाया, उन्हें पूरा न्याय मिला? समय बीतने के साथ इस घटना के प्रत्यक्षदर्शियों और आंदोलनकारियों की संख्या कम हो रही है। नई पीढ़ी के सामने चुनौती है कि वह इस इतिहास को केवल एक सरकारी कार्यक्रम या श्रद्धांजलि दिवस तक सीमित न होने दे। रामपुर तिराहा की स्मृति को राजनीतिक भाषणों से आगे ले जाकर न्याय, जवाबदेही और इतिहास की सच्चाई से जोड़ना होगा।
रामपुर तिराहा के संदर्भ में न्याय का अर्थ केवल दोषियों को सजा दिलाना नहीं है। न्याय का व्यापक अर्थ यह भी है कि उस रात क्या हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ, किसकी क्या भूमिका थी और पीड़ितों को अब तक क्या मिलाकृइन सवालों का तथ्यात्मक और निष्पक्ष जवाब समाज के सामने आए। न्यायिक प्रक्रिया अपनी गति से चलती है, लेकिन लोकतांत्रिक समाज में संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न उससे भी बड़ा है। किसी भी आंदोलन में शामिल नागरिकों के अधिकारों की रक्षा राज्य की जिम्मेदारी होती है। यदि कहीं इन अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जवाबदेही तय होना लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है।
उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि देने का सबसे सार्थक तरीका केवल पुष्पांजलि नहीं हो सकता। असली श्रद्धांजलि तब होगी जब राज्य उस आंदोलन की मूल भावना को समझेकृपारदर्शी शासन, जवाबदेही, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, गांवों की मजबूती और पहाड़ के लोगों के सम्मान की भावना। राज्य आंदोलन की एक बड़ी चिंता यह थी कि पहाड़ के लोगों की आवाज सत्ता के केंद्र तक पहुंचे। तीन दशक बाद भी पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और गांवों के भविष्य से जुड़े सवाल मौजूद हैं। इसलिए रामपुर तिराहा की स्मृति आज के उत्तराखंड से भी सवाल करती है कि जिस राज्य के लिए बलिदान दिया गया, वह राज्य अपने मूल सवालों का कितना समाधान कर पाया।
32 वर्ष बाद न्याय की प्रक्रिया में आगे बढ़ना निश्चित रूप से उम्मीद पैदा करता है। लेकिन न्याय की शुरुआत को अंतिम पड़ाव मान लेना उस संघर्ष की भावना के साथ न्याय नहीं होगा। अभी पीड़ित परिवारों की पीड़ा, लंबित कानूनी प्रक्रियाएं और इतिहास की पूरी सच्चाई समाज के सामने लाने का दायित्व बाकी है। रामपुर तिराहा को केवल कैलेंडर की एक तारीख न बनाया जाए। यह उत्तराखंड के लोकतांत्रिक इतिहास का वह अध्याय है जो हर पीढ़ी को यह याद दिलाता रहेगा कि अधिकारों की लड़ाई में नागरिकों की आवाज का सम्मान कितना जरूरी है। 32 वर्ष बाद न्याय की उम्मीद जगी है। अब जरूरत इस बात की है कि यह उम्मीद परिणाम तक पहुंचे। क्योंकि रामपुर तिराहा के शहीदों के प्रति हमारा कर्तव्य केवल उन्हें याद करना नहीं, बल्कि उनके संघर्ष से निकले सवालों का जवाब तलाशना भी है।
विपक्ष के सवालों पर भाजपा का पलटवार
भाजपा का तंज हताशा में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा विपक्ष
मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण पर आमने-सामने भाजपा-कांग्रेस
भाजपा ने की त्रुटिहीन सूची के लिए प्रक्रिया में सहयोग की अपील
एसआईआर पर भाजपा ने विपक्ष के आंदोलन को बताया हताशा
देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासत लगातार तेज होती जा रही है। विपक्षी दल जहां एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे रोकने की मांग कर रहे हैं, वहीं भाजपा ने इस विरोध को राजनीतिक मुद्दा बनाकर चुनावी माहौल गरमाने की कोशिश करार दिया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कहा है कि संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए जनता का विश्वास हासिल करने में असफल लोग अब हताशा में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।
भाजपा का तर्क है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण निर्वाचन प्रक्रिया का हिस्सा है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक त्रुटिहीन बनाना है। पार्टी ने कांग्रेस से प्रक्रिया का विरोध करने के बजाय आपत्तियों के निस्तारण में सहयोग करने की अपील भी की है। अगस्त में भट्ट ने कहा था कि राजनीतिक दलों और नागरिकों को मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
एसआईआर को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव ऐसे समय बढ़ रहा है, जब उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि वह एसआईआर को आगामी चुनाव में अपनी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बना रही है और चुनावी हार की आशंका के बीच नए मुद्दे तलाश रही है। कांग्रेस की ओर से इसके विपरीत एसआईआर और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। यानी मतदाता सूची का तकनीकी पुनरीक्षण अब सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। भाजपा इसे चुनावी व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित करने वाली संवैधानिक प्रक्रिया के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्ष पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े सवाल उठा रहा है।
एसआईआर को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर भी विवाद चल रहा है। निर्वाचन आयोग ने 23 सितंबर को कहा था कि एसआईआर से संबंधित निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। दूसरी ओर, विपक्षी दल आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे हैं और प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। भाजपा ने आयोग के फैसलों का बचाव करते हुए विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को प्रभावित करने का आरोप लगाया है। इस बीच भाजपा के कुछ सहयोगी दलों ने भी एसआईआर को लेकर निर्वाचन आयोग से अधिक स्पष्टता और पारदर्शिता की मांग की है, जिससे यह मुद्दा केवल भाजपा बनाम विपक्ष की बहस तक सीमित नहीं रह गया है।
उत्तराखंड में अब एसआईआर को लेकर दो समानांतर राजनीतिक नैरेटिव दिखाई दे रहे हैं। भाजपा इसे मतदाता सूची की शुद्धता और संवैधानिक प्रक्रिया से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष इसे मतदाता अधिकारों और चुनावी पारदर्शिता के सवाल से जोड़ रहा है। दोनों पक्षों के बीच बढ़ता टकराव आने वाले महीनों में चुनावी विमर्श का हिस्सा बन सकता है। 2027 के चुनाव से पहले एसआईआर पर छिड़ी यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची सीधे चुनाव की बुनियाद से जुड़ी है। ऐसे में राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना अहम होगा कि पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रहें, आपत्तियों का नियमानुसार निस्तारण हो और पूरी प्रक्रिया के बारे में मतदाताओं को स्पष्ट जानकारी मिले।
फिलहाल भाजपा ने विपक्ष के आंदोलन को संवैधानिक प्रक्रिया से जनता का विश्वास जीतने में असफल लोगों की हताशा बताया है, जबकि विपक्ष एसआईआर की प्रक्रिया पर अपने सवालों के साथ आंदोलन जारी रखने की तैयारी में है। इस तरह उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में एसआईआर अब महज मतदाता सूची के पुनरीक्षण का प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि 2027 से पहले भाजपा और विपक्ष के बीच एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है।
कांग्रेस का लोकतंत्र बचाओ सप्ताह
जिला स्तर पर निकलेगा वोट बचाओ-देश बचाओ मार्च
मतदान के अधिकार से जुड़े सवाल अब जनता के बीच
कांग्रेस ने आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़ा
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर अपना आंदोलन तेज करने की तैयारी कर ली है। पार्टी ने जिला स्तर पर लोकतंत्र बचाओ सप्ताह आयोजित करने और इसके तहत वोट बचाओ-देश बचाओ मार्च निकालने का निर्णय लिया है। कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची और मतदान के अधिकार से जुड़े सवालों को जनता के बीच ले जाना जरूरी है।
कांग्रेस के इस अभियान को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। पार्टी संगठन को जिला और ब्लाक स्तर तक सक्रिय करने के साथ एसआईआर के मुद्दे पर कार्यकर्ताओं और आम मतदाताओं के बीच संवाद बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का फोकस अब इस मुद्दे को केवल नेताओं की बयानबाजी तक सीमित रखने के बजाय सड़क और जनसंपर्क अभियान तक ले जाने पर है।
कांग्रेस लंबे समय से एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि मतदाता सूची में किसी भी तरह की गड़बड़ी या पात्र मतदाताओं के नाम हटने की आशंका लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर विषय है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ता जिला मुख्यालयों पर मार्च निकालेंगे और जनता के बीच अपनी बात रखेंगे। वहीं भाजपा एसआईआर को निर्वाचन प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए कांग्रेस के विरोध को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश के रूप में देख रही है। भाजपा का कहना है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने की संवैधानिक प्रक्रिया का विरोध करने के बजाय राजनीतिक दलों को इसमें सहयोग करना चाहिए।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन दोनों प्रमुख दलों ने संगठनात्मक स्तर पर तैयारियां तेज कर दी हैं। भाजपा बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। कांग्रेस इसके समानांतर सरकार के खिलाफ जनमुद्दों को लेकर आंदोलन की रणनीति आगे बढ़ा रही है। ऐसे में वोट बचाओ-देश बचाओ मार्च कांग्रेस के लिए केवल एक विरोध कार्यक्रम नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं को चुनावी अभियान के लिए सक्रिय करने का माध्यम भी बन सकता है। जिला स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों के जरिए पार्टी स्थानीय मुद्दों को एसआईआर के सवाल के साथ जोड़कर जनता तक पहुंचाने की कोशिश करेगी।
कांग्रेस की रणनीति में मतदाता अधिकार को केंद्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश दिखाई दे रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र में मतदाता सबसे महत्वपूर्ण है और उसके मताधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित होना जरूरी है। कांग्रेस इसी संदेश के साथ अपने अभियान को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। हालांकि, इस मुद्दे पर कांग्रेस को जनता के बीच यह भी स्पष्ट करना होगा कि एसआईआर में उसकी आपत्तियां क्या हैं और उनके समाधान के लिए वह क्या ठोस विकल्प चाहती है। दूसरी ओर भाजपा संवैधानिक प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग की भूमिका को आधार बनाकर कांग्रेस के आरोपों का जवाब दे रही है।
इस तरह 2027 के चुनाव से पहले उत्तराखंड में मतदाता सूची का मुद्दा अब राजनीतिक संघर्ष का नया मैदान बनता दिख रहा है। कांग्रेस सड़क पर उतरकर वोट बचाओ-देश बचाओ का संदेश देगी, जबकि भाजपा एसआईआर का बचाव करते हुए विपक्ष के अभियान पर सवाल उठा रही है। आने वाले दिनों में यह टकराव जिला मुख्यालयों से लेकर गांव और बूथ स्तर तक पहुंचने की संभावना है।
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026
udaydinmaan: गालीबाज मासूम को फिर ‘मंच’
udaydinmaan: गालीबाज मासूम को फिर ‘मंच’: डीएवी कालेज प्रकरण में एफआईआर के बाद भी यूपीएल फाइनल में प्रस्तुति का फैसला सवालों में उत्तराखंड की सांस्कृतिक प्राथमिकता,स्थानीय कलाकारों क...
गालीबाज मासूम को फिर ‘मंच’
डीएवी कालेज प्रकरण में एफआईआर के बाद भी यूपीएल फाइनल में प्रस्तुति का फैसला
सवालों में उत्तराखंड की सांस्कृतिक प्राथमिकता,स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने की मांग
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में मंच की मर्यादा और स्थानीय कलाकारों के सम्मान को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। अप्रैल में देहरादून के डीएवी पीजी कॉलेज में मंच से कथित अभद्र भाषा के इस्तेमाल को लेकर विवादों में आए हरियाणवी गायक मासूम शर्मा को अब उत्तराखंड प्रीमियर लीग के ग्रैंड फिनाले में दोबारा प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। रायपुर स्थित राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में होने वाले समापन समारोह में मासूम शर्मा की प्रस्तुति प्रस्तावित है।
मामले की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि डीएवी पीजी कालेज के अप्रैल के कार्यक्रम में कथित आपत्तिजनक भाषा के मामले में डालनवाला कोतवाली में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई थी। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी और गायक को बयान दर्ज कराने के लिए नोटिस भी जारी किया था। बाद में शर्मा ने अपने व्यवहार के लिए सार्वजनिक रूप से खेद जताया था। अब सवाल यह है कि जब उसी प्रकरण की गूंज अभी पूरी तरह थमी भी नहीं थी, तो प्रदेश के इतने बड़े सार्वजनिक आयोजन के लिए उन्हीं कलाकार का चयन कैसे हुआ? कांग्रेस समेत विभिन्न संगठनों ने आयोजन समिति और सरकार से इस चयन की प्रक्रिया तथा पूर्व विवाद की समीक्षा को लेकर सवाल किए हैं। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष लालचंद शर्मा ने भी पूछा कि विवाद के बावजूद यूपीएल फाइनल में उन्हें मंच देने का निर्णय क्यों लिया गया और क्या कलाकारों के चयन को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं।
विवाद का दूसरा पहलू उत्तराखंड के स्थानीय कलाकारों से जुड़ा है। गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार की समृद्ध लोकसंगीत परंपरा के साथ प्रदेश में नई पीढ़ी के अनेक गायक, वादक और संगीत समूह लगातार काम कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रदेश के बड़े सार्वजनिक मंचों पर स्थानीय प्रतिभाओं को प्राथमिकता कितनी मिल रही है। मूल निवास और भू-कानून संघर्ष समिति ने भी यही मुद्दा उठाते हुए कहा कि उसका विरोध किसी बाहरी कलाकार से नहीं, बल्कि मंच पर अश्लीलता, गाली-गलौज और आपत्तिजनक भाषा से है। समिति ने सीएयू के साथ बातचीत में भविष्य के आयोजनों में उत्तराखंड के स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने की शर्त रखी।
कार्यक्रम को लेकर विरोध के बीच क्रिकेट एसोसिएशन आफ उत्तराखंड की ओर से बताया गया कि कलाकार को कार्यक्रम का आधा भुगतान पहले ही किया जा चुका है, इसलिए इस समय कार्यक्रम रद्द करना संभव नहीं है। बातचीत के बाद यह सहमति बनी कि मासूम शर्मा मंच से उत्तराखंड की जनता से सार्वजनिक रूप से माफी मांगेंगे और भविष्य में आपत्तिजनक भाषा अथवा फूहड़ प्रस्तुति नहीं करने की बात स्पष्ट करेंगे। उत्तराखंड क्रांति दल ने हालांकि कार्यक्रम रद्द कर स्थानीय कलाकारों को अवसर देने की मांग की है। दल ने कार्यक्रम रद्द नहीं होने की स्थिति में स्टेडियम के बाहर विरोध की चेतावनी भी दी है। पुलिस ने भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की बात कही है।
पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तराखंड के बड़े मंचों पर कलाकारों के चयन का कोई सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंड होना चाहिए? कलाकार किसी भी प्रदेश का हो सकता है और देशभर के कलाकारों का उत्तराखंड में स्वागत भी होना चाहिए, लेकिन स्थानीय प्रतिभाओं को लगातार हाशिये पर रखकर बाहरी कलाकारों को प्राथमिकता देने की शिकायत लंबे समय से सामने आती रही है।
देवभूमि की पहचान केवल पर्यटन और क्रिकेट तक सीमित नहीं है। यहां की पहचान उसकी लोकभाषाओं, लोकधुनों, परंपराओं और उन कलाकारों से भी बनती है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद पहाड़ की संस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाया है। इसलिए सवाल मासूम शर्मा के कार्यक्रम से आगे बढ़कर उत्तराखंड की सांस्कृतिक नीति और आयोजकों की प्राथमिकताओं का भी है। बड़े मंचों पर बाहर से आने वाले कलाकारों का स्वागत हो, लेकिन क्या उसी मंच पर पहाड़ की अपनी आवाज को भी उतनी ही जगह मिलेगीकृयह सवाल अब उत्तराखंड के कलाकारों और सांस्कृतिक जगत के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल,भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
भाजपा बोलीकृनकारात्मक नैरेटिव से कांग्रेस की हताशा उजागर
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा मजबूत करने की आज जरूरत
कांग्रेस के आरोपों को बताया है राजनीतिक रणनीति का हिस्सा
देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सियासी घमासान तेज होता दिखाई दे रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास का माहौल बनाने और नकारात्मक नैरेटिव को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल खड़े करना राजनीतिक असहमति से आगे की बात है और इससे जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस को चुनावी मुद्दों पर जनता के बीच जाना चाहिए, लेकिन इसके बजाय वह चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सवाल खड़े कर रही है। पार्टी के मुताबिक, संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का अधिकार सभी राजनीतिक दलों को है, लेकिन आरोपों के साथ ठोस तथ्य और प्रमाण भी सामने रखे जाने चाहिए।
भाजपा का यह हमला ऐसे समय में आया है, जब मतदाता सूची, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है। कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी पारदर्शिता और मताधिकार से जोड़ रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बता रही है। भाजपा का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की भूमिका चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की है। ऐसे में बिना ठोस आधार के लगातार अविश्वास का वातावरण बनाने से लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे पर असर पड़ सकता है। पार्टी ने कांग्रेस से आरोपों के बजाय तथ्य सामने रखने को कहा है।
हालांकि, कांग्रेस का पक्ष इससे अलग है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची और निर्वाचन व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाना लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी है। पार्टी का तर्क है कि यदि किसी प्रक्रिया में उसे कोई आपत्ति दिखाई देती है तो उसे सार्वजनिक करना संवैधानिक अधिकार है। कांग्रेस इसे संस्थाओं के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता से जुड़ा सवाल बताती रही है। यही विरोधाभास अब उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। भाजपा इसे कांग्रेस की हताशा और नकारात्मक राजनीति के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक निगरानी और चुनावी पारदर्शिता का प्रश्न बता रही है।
विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ आने वाले दिनों में यह टकराव और बढ़ सकता है। खासतौर पर मतदाता सूची और एसआईआर जैसे मुद्दे यदि चुनावी बहस के केंद्र में आते हैं तो दोनों दलों के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तेज होने की संभावना है। ऐसे में असली कसौटी यही होगी कि आरोपों और राजनीतिक दावों के बीच तथ्य कितने स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखे जाते हैं।
युवाओं में राष्ट्रवादी विचारों की मजबूती का संकेत
भाजपा ने युवाओं के रुझान को बताया बदलती राजनीतिक सोच का संकेत
प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर विपक्ष के सामने बढ़ी चुनौती
इसे चुनावी समर्थन का सीधा संकेत मानना राजनीतिक दलों के लिए जल्दबाजी
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में युवाओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसी बीच युवाओं के बीच राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विचारों की स्वीकार्यता को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भाजपा इसे युवाओं में राष्ट्रवादी विचारों की मजबूती का संकेत मान रही है और इसे आगामी विधानसभा चुनाव के लिहाज से महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश के रूप में देख रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि आज का युवा केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की वैश्विक भूमिका, सेना, सीमांत क्षेत्रों और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर भी अपनी राय रखता है। पार्टी के मुताबिक युवाओं में इन विषयों को लेकर बढ़ती रुचि उसके लिए सकारात्मक संकेत है।
उत्तराखंड के संदर्भ में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की बड़ी आबादी का सामाजिक और आर्थिक संबंध सेना तथा पूर्व सैनिक परिवारों से जुड़ा रहा है। सीमांत जिलों की भौगोलिक परिस्थितियां और सैन्य परंपरा भी राष्ट्र और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को यहां विशेष महत्व देती हैं। भाजपा इसी सामाजिक पृष्ठभूमि को अपनी राजनीतिक संवाद रणनीति से जोड़ रही है। हालांकि, युवाओं की राजनीतिक प्राथमिकताएं केवल राष्ट्रवाद तक सीमित नहीं हैं। रोजगार, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, शिक्षा, पलायन, कौशल विकास और स्थानीय स्तर पर अवसर जैसे मुद्दे भी उत्तराखंड के युवा मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए युवाओं के बीच राष्ट्रवादी विचारों की मौजूदगी को चुनावी समर्थन का सीधा संकेत मानना राजनीतिक दलों के लिए जल्दबाजी होगी।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल युवाओं के सवालों को रोजगार और आर्थिक अवसरों से जोड़कर सरकार को घेरते रहे हैं। उनका जोर इस बात पर है कि राष्ट्र निर्माण की चर्चा के साथ युवाओं को रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर भविष्य के अवसर भी चाहिए। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के बीच राजनीतिक विमर्श का स्वरूप महत्वपूर्ण होगा। राष्ट्रवाद बनाम रोजगार जैसी सरल राजनीतिक तस्वीर से आगे युवाओं के सामने कई मुद्दे एक साथ मौजूद हैं। भाजपा राष्ट्रवादी विमर्श को मजबूत करने की कोशिश करेगी, जबकि विपक्ष रोजगार, शिक्षा और सरकार के प्रदर्शन से जुड़े सवालों को प्रमुखता देने की रणनीति अपना सकता है।
उत्तराखंड में युवा मतदाता किस मुद्दे को कितना महत्व देता है, इसका आकलन केवल राजनीतिक दलों के दावों से नहीं, बल्कि चुनावी आंकड़ों और जमीनी रुझानों से ही संभव होगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि युवाओं को लेकर राजनीतिक दलों की रणनीति तेज हो गई है और राष्ट्रवाद भी इस राजनीतिक संवाद का एक प्रमुख हिस्सा बनता जा रहा है।
फिर नीट-यूजी पर सियासी घमासान
विधायक विनोद चमोली ने यशपाल आर्य के आरोपों पर किया पलटवार
भाजपा विधायक बोलेकृव्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले तथ्य सामने रखें
बोले-प्रदेश सरकार ने शिकायत मिलते ही जांच का दायरा भी बढ़ा दिया
देहरादून। उत्तराखंड में नीट-यूजी काउंसलिंग के दौरान प्रमाणपत्रों की सत्यता को लेकर सामने आए मामलों ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के आरोपों पर भाजपा प्रदेश प्रवक्ता एवं वरिष्ठ विधायक विनोद चमोली ने पलटवार करते हुए कांग्रेस पर मुद्दे को राजनीतिक रूप देने का आरोप लगाया।
दरअसल, नीट-यूजी 2026 की राज्य काउंसलिंग में फर्जी अथवा संदिग्ध प्रमाणपत्रों के आधार पर मेडिकल सीट हासिल करने के मामले सामने आने के बाद जांच और कार्रवाई का सिलसिला जारी है। हाल में 12 और अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने पर उनके सीट आवंटन निरस्त किए गए। विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि सत्यापन प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।
इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने सरकार की कार्यप्रणाली और प्रवेश प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के आरोपों के जवाब में चमोली ने कहा कि यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी सामने आती है तो उसकी जांच और कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने से पहले तथ्यों को सामने रखना जरूरी है।
भाजपा का तर्क है कि सरकार ने शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया, बल्कि मामले सामने आते ही जांच के निर्देश दिए और प्रमाणपत्रों के सत्यापन का दायरा बढ़ाया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी सभी आरक्षित श्रेणियों से जुड़े प्रमाणपत्रों की जांच के निर्देश दिए थे। शुरुआती जांच में प्रमाणपत्र निरस्त करने के साथ प्रवेश भी रद्द किए गए हैं। चमोली के पलटवार का राजनीतिक संदेश साफ हैकृकि भाजपा इस पूरे प्रकरण को व्यवस्था में सामने आई गड़बड़ी की जांच और दोषियों पर कार्रवाई के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे सरकार की जवाबदेही से जोड़कर सवाल उठा रही है।
मामले ने इसलिए भी गंभीरता बढ़ा दी है क्योंकि सवाल सिर्फ कुछ अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं है। जांच अब इस बात तक पहुंच रही है कि प्रमाणपत्र जारी करने से लेकर काउंसलिंग में उनके सत्यापन तक कहीं प्रक्रियागत चूक हुई या नहीं। पिछले वर्षों के दाखिलों के रिकॉर्ड की जांच की संभावना भी सामने आई है। ऐसे में नीट-यूजी विवाद अब केवल शिक्षा और चिकित्सा प्रवेश का मुद्दा नहीं रह गया है। विधानसभा चुनाव से पहले यह सरकार की पारदर्शिता बनाम विपक्ष की जवाबदेही की राजनीति का नया अखाड़ा बनता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में कांग्रेस जहां सरकार से पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही मांग सकती है, वहीं भाजपा कार्रवाई को अपनी सरकार की सख्ती के प्रमाण के तौर पर सामने रख सकती है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि फर्जी प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल आखिर किस स्तर पर संभव हुआ और पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी किसकी तय होती है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे अब निगाह जांच के निष्कर्ष और कार्रवाई पर रहेगी।
उत्तराखंड में ‘जेन-जी’ मांग रहा है जवाब
रोजगार से लेकर भर्ती और पलायन तक मुद्दों पर मुखर
2027 से पहले राजनीतिक दलों के लिए बढ़ गई चुनौती
हाल के युवा संवाद कार्यक्रमों में यही तस्वीर सामने आई
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में जेन-जी अब केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय पीढ़ी नहीं, बल्कि चुनावी विमर्श को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण युवा वर्ग बनती दिख रही है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों ने युवाओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ानी शुरू कर दी है। लेकिन जेन-जी का मूड केवल राजनीतिक नारों या नेताओं की अपील तक सीमित दिखाई नहीं देता। रोजगार, पारदर्शी भर्ती, शिक्षा, पलायन, उद्यमिता और डिजिटल अवसर जैसे सवाल उसके राजनीतिक संवाद के केंद्र में हैं। हाल के युवा संवाद कार्यक्रमों में भी यही तस्वीर सामने आई है। मेरे सपनों का उत्तराखंड अभियान के तहत बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और पर्यटन से जुड़े सुझाव दिए। मुख्यमंत्री के साथ हुए संवाद में भी युवाओं ने राज्य के भविष्य को लेकर अपनी प्राथमिकताएं सामने रखीं।
जेन-जी के सामने राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह पीढ़ी केवल भाषण सुनकर संतुष्ट होने वाली नहीं दिखती। वह सवाल पूछती है कि रोजगार कहां है, भर्ती प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, पढ़ाई के बाद अवसर कहां मिलेंगे और पहाड़ में रहने वाले युवाओं के लिए भविष्य की क्या गारंटी है। देशव्यापी युवा सर्वेक्षणों में भी रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य को युवाओं की प्रमुख राजनीतिक प्राथमिकताओं में बताया गया है। इससे उत्तराखंड में भी युवा राजनीति को केवल भावनात्मक मुद्दों तक सीमित रखने के बजाय रोजमर्रा के अवसरों और भविष्य से जोड़ने की जरूरत सामने आती है।
2026 की प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार उत्तराखंड में करीब 17 लाख युवा मतदाता हैं और 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग की हिस्सेदारी भी महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने की रणनीति पर जोर दे रहे हैं। भाजपा की ओर से युवाओं से संवाद और युवा विद्यार्थी मंथन जैसे कार्यक्रम किए गए हैं। मुख्यमंत्री ने तीन लाख से अधिक छात्रों से संवाद का कार्यक्रम भी शुरू किया था। वहीं विपक्ष भी युवाओं के बीच रोजगार, भर्ती और शिक्षा जैसे सवालों को प्रमुखता दे रहा है। उत्तराखंड के संदर्भ में युवा सवाल और भी गहरे हैं। पहाड़ से पलायन रोकना है तो रोजगार कहां पैदा होगा? उच्च शिक्षा के बाद युवा राज्य में क्यों रुकेगा? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को पारदर्शी व्यवस्था कैसे मिलेगी? स्थानीय संसाधनों से उद्यमिता के अवसर कैसे बनेंगे?
यही वह सवाल हैं जिनका जवाब चुनावी घोषणा-पत्रों से आगे जमीन पर चाहिए। 2027 की राजनीति में जेन-जी किस दल के साथ जाएगी, इसका निष्कर्ष अभी निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि उत्तराखंड का युवा अब केवल किसके साथ का सवाल नहीं पूछ रहाकृवह क्यों और क्या मिलेगा का जवाब भी मांग रहा है। यही बदलाव आने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
बुधवार, 30 सितंबर 2026
udaydinmaan: उत्तराखंड में 826 स्कूलों पर ताले
udaydinmaan: उत्तराखंड में 826 स्कूलों पर ताले: 2655 विद्यालय है मात्र एक शिक्षक के भरोसे खाली गांवों से सिकुड़ रहा शिक्षा का आधार माध्यमिक स्तर पर 4745 प्रवक्ता पद खाली 3937 पदों की पदोन्न...
उत्तराखंड में 826 स्कूलों पर ताले
2655 विद्यालय है मात्र एक शिक्षक के भरोसे
खाली गांवों से सिकुड़ रहा शिक्षा का आधार
माध्यमिक स्तर पर 4745 प्रवक्ता पद खाली
3937 पदों की पदोन्नति न्यायिक अड़चन में
देहरादून। उत्तराखंड को बने 25 वर्ष पूरे होने के बाद विकास की उपलब्धियों के बीच सरकारी शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। एक तरफ पहाड़ के गांवों से लगातार घटती छात्र संख्या के कारण सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है, तो दूसरी तरफ जिन विद्यालयों में बच्चे पढ़ रहे हैं, वहां पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। पिछले पांच वर्षों में शून्य छात्र नामांकन के कारण 826 सरकारी प्राथमिक विद्यालय बंद अथवा दूसरे विद्यालयों में विलय किए जा चुके हैं। वहीं नवीनतम यूडीआईएसई 2025-26 के अनुसार राज्य में 2,655 विद्यालय ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक तैनात है। माध्यमिक शिक्षा का संकट इससे अलग और अधिक गंभीर है। राज्य में 4,745 प्रवक्ता पद रिक्त हैं। इनमें से 808 पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी, जबकि 3,937 पद पदोन्नति के माध्यम से भरे जाने हैं और न्यायिक रोक के कारण यह प्रक्रिया प्रभावित है। इसका असर विषयवार पढ़ाई से लेकर विद्यालयों के प्रशासन तक दिखाई दे रहा है।
सरकार की ओर से विधानसभा में रखे गए आंकड़े बताते हैं कि विद्यालय बंद होने की समस्या मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में केंद्रित है। पांच वर्षों में सबसे अधिक 262 प्राथमिक विद्यालय टिहरी गढ़वाल में बंद हुए। इसके बाद पौड़ी गढ़वाल में 120, पिथौरागढ़ में 104 और अल्मोड़ा में 83 विद्यालय बंद हुए। नैनीताल में 49, चमोली में 43, देहरादून में 38, चंपावत में 34, बागेश्वर में 30, उत्तरकाशी में 25, ऊधमसिंह नगर में 21, रुद्रप्रयाग में 15 और हरिद्वार में दो विद्यालय बंद हुए। इन आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सरकारी स्कूलों के बंद होने की कहानी केवल शिक्षा विभाग की प्रशासनिक कवायद नहीं है। इसके पीछे पहाड़ के गांवों में बदलती जनसंख्या का संकट भी जुड़ा हुआ है। जिस गांव में बच्चों की संख्या लगातार घटती जाती है, वहां विद्यालय चलाना विभाग के लिए कठिन होता जाता है। लेकिन दूसरी तरफ विद्यालय का बंद होना उस गांव के सामाजिक जीवन को और कमजोर कर सकता है। यानी सवाल केवल यह नहीं है कि विद्यालय में बच्चे कितने हैं। सवाल यह भी है कि बच्चे गांव में क्यों नहीं हैं और गांव में बच्चों को रोकने के लिए शिक्षा व्यवस्था कितनी सक्षम है।
जिलेवार आंकड़ों में पर्वतीय और मैदानी उत्तराखंड के बीच का अंतर भी साफ दिखाई देता है। टिहरी में 262 विद्यालय बंद हुए, जबकि हरिद्वार में केवल दो। पौड़ी, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जैसे पर्वतीय जिलों में भी बंद विद्यालयों की संख्या काफी अधिक रही। यह अंतर उत्तराखंड के उस पुराने सवाल को सामने लाता है, जिस पर राज्य बनने के बाद से लगातार चर्चा होती रही हैकृक्या पहाड़ में शिक्षा की व्यवस्था केवल विद्यालय खोलकर मजबूत की जा सकती है, या इसके लिए गांवों में आबादी और रोजगार का टिकना भी जरूरी है? यदि गांवों से परिवार बाहर जा रहे हैं, खेती और स्थानीय रोजगार के अवसर घट रहे हैं और नई पीढ़ी शिक्षा व रोजगार के लिए मैदानी क्षेत्रों की ओर जा रही है, तो विद्यालयों में नामांकन स्वाभाविक रूप से प्रभावित होगा। लेकिन विद्यालय बंद होने के बाद बचे हुए परिवारों के बच्चों को दूर स्थित विद्यालय तक पहुंचाने की समस्या भी बढ़ती है।
उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की दूसरी बड़ी चुनौती शिक्षक उपलब्धता है। नवीनतम यूडीआईएसई 2025-26 में राज्य के 2,655 एकल-शिक्षक विद्यालय दर्ज हैं। संसद में प्रस्तुत केंद्र सरकार के आंकड़ों में भी उत्तराखंड के लिए यही संख्या दर्ज है। इससे पहले राज्य में 2,959 एकल-शिक्षक विद्यालय होने की रिपोर्ट सामने आई थी। इस आंकड़े को लेकर नीति आयोग की रिपोर्ट के संदर्भ में भी चिंता जताई गई। बाद के यूडीआईएसई आंकड़े में संख्या 2,655 दर्ज है। इसलिए अलग-अलग रिपोर्टों में संख्या का अंतर रिपोर्टिंग वर्ष और आंकड़ों के स्रोत के कारण हो सकता है। एकल-शिक्षक विद्यालय की वास्तविक चुनौती पहाड़ी क्षेत्रों में और अधिक जटिल हो जाती है। प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक को एक साथ अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को संभालना पड़ता है। पढ़ाई के अलावा प्रशासनिक कार्य, अभिलेख, विभागीय सूचनाएं और अन्य जिम्मेदारियां भी उसी शिक्षक के हिस्से में आती हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक शिक्षक से एक साथ शिक्षण, मूल्यांकन, प्रशासन और विद्यालय प्रबंधन की सभी जिम्मेदारियां निभाने की अपेक्षा किस हद तक व्यावहारिक है। प्राथमिक विद्यालयों में जहां छात्र संख्या और एकल शिक्षक बड़ी समस्या है, वहीं माध्यमिक शिक्षा में शिक्षक पदों की रिक्तियां चिंता बढ़ा रही हैं। राज्य में 4,745 प्रवक्ता पद खाली बताए गए हैं। सरकार के अनुसार 808 पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी, लेकिन 3,937 पद पदोन्नति से भरे जाने की प्रक्रिया न्यायिक रोक के कारण प्रभावित हुई। इसका सीधा असर उन विद्यालयों पर पड़ता है जहां किसी विषय का स्थायी शिक्षक उपलब्ध नहीं है। विज्ञान, गणित, भाषा और अन्य विषयों में शिक्षक की कमी का प्रभाव विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी पर पड़ सकता है। यहां शिक्षा व्यवस्था का एक विरोधाभास भी सामने आता हैकृएक ओर कई विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या इतनी कम है कि विद्यालय बंद करने की नौबत आ रही है, दूसरी ओर मौजूद विद्यालयों में हजारों शिक्षक पद खाली हैं।
शिक्षा व्यवस्था में केवल शिक्षकों की कमी ही नहीं है। विद्यालयों के प्रशासनिक नेतृत्व का संकट भी सामने है। सल्ट विधानसभा क्षेत्र में 59 माध्यमिक विद्यालयों में से 37 में स्थायी प्रधानाचार्य नहीं हैं। इन विद्यालयों में कार्यवाहक व्यवस्था के सहारे काम चलाया जा रहा है। प्रधानाचार्य किसी विद्यालय में केवल प्रशासनिक पद नहीं होता। विद्यालय की शैक्षणिक योजना, शिक्षकों के बीच समन्वय, अनुशासन, अभिभावकों से संवाद और विभागीय कार्यों में प्रधानाचार्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लंबे समय तक स्थायी प्रधानाचार्य नहीं होने से विद्यालय संचालन पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। शिक्षक और छात्र संकट के साथ सरकारी विद्यालयों की आधारभूत सुविधाएं भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। उपलब्ध विभागीय आंकड़ों के अनुसार 2,210 सरकारी विद्यालयों की इमारतों की स्थिति खराब बताई गई है। 2024-25 के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट में पौड़ी गढ़वाल में ऐसे विद्यालयों की संख्या 330 बताई गई थी। उसी रिपोर्ट में 361 विद्यालयों में छात्राओं के लिए शौचालय और 130 विद्यालयों में पेयजल सुविधा नहीं होने की जानकारी दी गई थी।
जर्जर विद्यालय भवनों का संकट नया नहीं है। शिक्षा विभाग ने पहले भी वर्षाकाल में ऐसे भवनों में कक्षाएं संचालित नहीं करने के निर्देश दिए हैं। 2023 की विभागीय रिपोर्ट के आधार पर प्रदेश में 2,785 सरकारी स्कूल भवनों को जर्जर बताया गया था, जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि अलग-अलग वर्षों और मानकों के कारण जर्जर भवनों के आंकड़ों में अंतर मिलता है। विद्यालय में शिक्षक और भवन होने के बाद भी यदि बिजली, पानी, शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं तो शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल बना रहता है। पुराने सरकारी आंकड़ों में उत्तराखंड के बड़ी संख्या में विद्यालयों में बिजली, पुस्तकालय, खेल मैदान, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाओं की कमी दर्ज की गई थी। समय के साथ कई सुविधाओं में सुधार हुआ है, इसलिए पुराने आंकड़ों को वर्तमान स्थिति का सीधा प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। फिर भी पर्वतीय क्षेत्रों में भौगोलिक कठिनाइयां, मौसम, सड़क संपर्क और निर्माण की लागत जैसी समस्याएं शिक्षा के बुनियादी ढांचे को लगातार चुनौती देती हैं।
उत्तराखंड के सरकारी विद्यालयों की मौजूदा तस्वीर को केवल शिक्षा विभाग की विफलता या उपलब्धि के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके पीछे पलायन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं, सड़क संपर्क और गांवों की जनसांख्यिकी भी जुड़ी है। यदि किसी गांव में परिवार ही नहीं बचेंगे तो विद्यालय में विद्यार्थी कहां से आएंगे? और यदि विद्यालय बंद कर दिए जाएंगे तो गांव में बचे परिवार अपने बच्चों को लेकर वहां कितने समय तक टिके रहेंगे? यही वह बिंदु है जहां शिक्षा और पलायन का रिश्ता एक-दूसरे को प्रभावित करता दिखाई देता है। राज्य सरकार शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कई पहल कर रही है। मार्च 2026 में शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने सरकार की ओर से विद्यालयी शिक्षा में आधारभूत ढांचे, आधुनिक संसाधनों, नई शिक्षण पद्धतियों और शिक्षक कौशल पर जोर दिए जाने की बात कही थी। समग्र शिक्षा उत्तराखंड के स्तर पर भी शिक्षक प्रशिक्षण और विद्यालय सुधार से जुड़ी गतिविधियां जारी हैं। 2026 में 50 सरकारी विद्यालयों में आधुनिक शिक्षण माडल लागू करने की पहल भी सामने आई है।
सरकार शिक्षा में फिनलैंड जैसी आधुनिक शिक्षण पद्धतियों से सीख लेने की दिशा में भी विचार कर रही है। लेकिन फिनलैंड की किसी पद्धति को अपनाने से पहले उत्तराखंड की अपनी भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी होगा। फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था में उच्च प्रशिक्षित शिक्षकों, शैक्षणिक स्वायत्तता, सीखने में समान अवसर और विद्यार्थियों की जरूरत के अनुसार सहायता पर जोर दिया जाता है। उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था के सामने अब केवल यह चुनौती नहीं है कि कितने विद्यालय बनाए जाएं। चुनौती यह भी है कि कितने विद्यालय बचाए जाएं, कितने बच्चों को गांव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और कितने परिवारों को गांव छोड़ने से रोका जा सके। 826 विद्यालयों का बंद होना महज 826 भवनों का खाली होना नहीं है। प्रत्येक विद्यालय किसी गांव के सामाजिक और सामुदायिक जीवन का केंद्र भी रहा है। विद्यालय बंद होने का अर्थ कई जगहों पर बच्चों को दूसरे गांव तक भेजना, अभिभावकों के लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी और गांव के सार्वजनिक जीवन में एक और कमी होना है। दूसरी ओर हजारों विद्यालयों का एक शिक्षक के भरोसे चलना बताता है कि जहां विद्यार्थी मौजूद हैं, वहां पर्याप्त मानवीय संसाधन उपलब्ध कराने की चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई है। माध्यमिक स्तर पर 4,745 प्रवक्ता पदों की रिक्ति और 3,937 पदोन्नतियों का न्यायिक अड़चन में फंसना इस संकट को और बड़ा करता है। उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि सरकार बंद हो चुके विद्यालयों की संख्या गिनने से आगे बढ़कर उन कारणों को कैसे संबोधित करेगी, जिनकी वजह से विद्यालय खाली हुए और जो विद्यालय चल रहे हैं, वहां बच्चों को पर्याप्त शिक्षक, सुरक्षित भवन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कब तक मिलेगी। क्योंकि पहाड़ में स्कूल का बचना केवल शिक्षा विभाग की उपलब्धि नहीं होगाकृयह उस गांव में जीवन के बचे रहने का भी संकेत होगा।
छात्रसंघ नतीजों से भाजपा उत्साहित
भाजपा का दावा-एबीवीपी की 85 प्रतिशत जीत को सरकार के प्रति युवाओं के भरोसे से जोड़ा
2027 से पहले सियासी संदेश पढ़ने में जुटी भाजपा,डीएवी की जीत ने बढ़ाया उत्साह
छात्रसंघ चुनावों के जरिए महाविद्यालय परिसरों में सक्रिय कार्यकर्ताओं का दिखा नेटवर्क
देहरादून। उत्तराखंड के महाविद्यालयों में हुए छात्रसंघ चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है। राज्य के सबसे बड़े महाविद्यालय डीएवी पीजी कॉलेज समेत कई संस्थानों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदर्शन से भाजपा उत्साहित है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने एबीवीपी की जीत पर बधाई देते हुए दावा किया कि प्रदेश में करीब 85 प्रतिशत छात्रसंघ सीटों पर मिली जीत इस बात का संकेत है कि युवाओं ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लिए जा रहे निर्णयों पर भरोसा जताया है।
प्रदेश के सबसे बड़े डीएवी पीजी कालेज में अध्यक्ष पद पर एबीवीपी के नवदीप राणा ने जीत दर्ज की। यह लगातार दूसरी बार है जब एबीवीपी ने डीएवी में अध्यक्ष पद अपने नाम किया है। देहरादून के एमकेपी और एसजीआरआर समेत कई महाविद्यालयों में भी एबीवीपी का प्रदर्शन मजबूत रहा। हालांकि कई स्थानों पर निर्दलीय और एनएसयूआई प्रत्याशियों ने भी जीत दर्ज की, जिससे पूरे छात्रसंघ चुनाव को केवल एकतरफा परिणाम के रूप में देखना उचित नहीं होगा। भाजपा ने इन परिणामों को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के बीच अपने राजनीतिक प्रभाव के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया है। महेंद्र भट्ट ने कहा कि एबीवीपी की जीत युवा वर्ग के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, विकास और सरकार की युवा-केंद्रित नीतियों के प्रति समर्थन को दर्शाती है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का तर्क है कि छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी के पक्ष में आया परिणाम केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं है। पार्टी इसे धामी सरकार की नीतियों से जोड़ रही है। भट्ट ने कहा कि युवाओं ने रोजगार, पारदर्शी व्यवस्था और युवा कल्याण से जुड़े सरकार के प्रयासों पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी विजयी एबीवीपी प्रत्याशियों को बधाई देते हुए परिणामों को युवाओं की राष्ट्रवादी विचारधारा और छात्रहित से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा कि युवाओं ने अपने मत के जरिए विपक्ष की कथित नकारात्मक राजनीति को जवाब दिया है। यह मुख्यमंत्री और भाजपा की ओर से किया गया राजनीतिक आकलन है।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अगले वर्ष होने हैं। ऐसे में छात्रसंघ चुनावों के परिणामों को राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से पढ़ रहे हैं। भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छात्र राजनीति में मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क रखने वाली एबीवीपी ने कई महाविद्यालयों में अपना प्रभाव बनाए रखा। भाजपा की रणनीति में युवा मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। छात्रसंघ चुनावों के जरिए महाविद्यालय परिसरों में सक्रिय कार्यकर्ताओं का नेटवर्क भी सामने आता है। विधानसभा चुनाव के दौरान यही नेटवर्क बूथ और स्थानीय स्तर की राजनीतिक गतिविधियों में भूमिका निभा सकता है। हालांकि छात्रसंघ चुनाव के परिणामों को सीधे विधानसभा चुनाव के मतदाताओं की पसंद का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।
इन चुनावों में एनएसयूआई ने कुछ स्थानों पर बेहतर प्रदर्शन किया है। रुड़की के केएलडीएवी कॉलेज में एनएसयूआई ने छह में से चार पद जीते, जबकि मोरी में उसके सभी प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की। नैनीताल के डीएसबी परिसर में अध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे। यानी छात्र राजनीति में मुकाबला पूरी तरह एबीवीपी तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस ने डीएवी चुनाव को लेकर प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल भी उठाए और कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की है। इन आरोपों पर प्रशासन और पुलिस का पक्ष अलग से सामने आना बाकी है।
छात्रसंघ चुनावों के नतीजे ऐसे समय आए हैं जब राजनीतिक दल 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। भाजपा इन परिणामों के जरिए यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रही है कि युवाओं के बीच सरकार की स्वीकार्यता बनी हुई है। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इन परिणामों को छात्र राजनीति तक सीमित रखते हुए सरकार की नीतियों पर अपने सवालों को आगे बढ़ा सकते हैं। यही कारण है कि छात्रसंघ चुनाव अब महज परिसर की राजनीति नहीं रह गए हैं। इनके परिणामों ने विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के मुद्दों, रोजगार, शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।
एबीवीपी की जीत को भाजपा धामी सरकार के प्रति युवा समर्थन के संकेत के तौर पर पेश कर रही है, जबकि चुनावों में एनएसयूआई और निर्दलीय प्रत्याशियों की सफलताएं यह बताती हैं कि छात्र राजनीति का पूरा परिदृश्य बहुआयामी है। अब असली राजनीतिक परीक्षा यह होगी कि छात्र परिसरों में दिखा यह रुझान अगले वर्ष विधानसभा चुनाव के दौरान किस रूप में दिखाई देता है।
एसआईआर पर भाजपा और कांग्रेस में जंग
एसआईआर पर घिरी कांग्रेस को भाजपा ने 60 साल का आईना दिखाया
महेंद्र बोलेकृहार दिखी तो चुनाव व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश
भाजपा ने सीधे कांग्रेस के छह दशक के शासनकाल को निशाने पर लिया
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी जंग और तेज हो गई है। कांग्रेस की ओर से एसआईआर और निर्वाचन प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठाए जाने के बाद भाजपा ने अब सीधे कांग्रेस के छह दशक के शासनकाल को निशाने पर ले लिया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि आज जो पार्टी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रही है, उसे पहले अपने शासनकाल के दौरान चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और व्यवस्था का इतिहास देखना चाहिए।
भट्ट ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि असली चुनावी मैच फिक्सिंग वह थी, जब जानबूझकर चुनाव आयुक्त के चयन की कोई नीति नहीं बनाई गई। जब सरकारें अपने यस-मैन को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाती रहीं और आयुक्तों को बाद में मंत्री बनाया गया तथा चुनाव लड़ाया गया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और विपक्ष को यह अहसास हो चुका है कि वह सामान्य राजनीतिक मुकाबले में जीत हासिल नहीं कर सकते, इसलिए अब पूरी चुनावी व्यवस्था पर ही संदेह खड़ा करने की रणनीति अपनाई जा रही है। हालांकि यह भाजपा का राजनीतिक आरोप है, कांग्रेस की ओर से इस पर अलग पक्ष रखा जा सकता है।
भाजपा के हमले का सबसे तीखा हिस्सा कांग्रेस की चुनावी रणनीति को लेकर है। भट्ट का कहना है कि एसआईआर को लेकर जिस तरह विपक्ष सवाल उठा रहा है, उससे लगता है कि चुनाव परिणाम आने से पहले ही हार का कारण तलाशने की कोशिश शुरू हो गई है। भाजपा का तर्क है कि यदि मतदाता सूची में किसी पात्र नागरिक का नाम छूटता है या कोई वास्तविक त्रुटि सामने आती है तो राजनीतिक दलों को प्रमाण के साथ निर्वाचन आयोग के समक्ष आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। लेकिन पूरी प्रक्रिया को ही संदिग्ध बताने से मतदाताओं के बीच चुनावी संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है।
कांग्रेस और विपक्ष की ओर से चुनाव प्रक्रिया पर उठाए जा रहे सवालों को भाजपा ने अब राजनीतिक हथियार बना लिया है। भट्ट ने कांग्रेस के आरोपों को उसी की भाषा में जवाब देते हुए मैच फिक्सिंग का पलटवार किया है। उनका निशाना केवल एसआईआर नहीं, बल्कि कांग्रेस के शासनकाल में चुनाव आयोग की नियुक्ति व्यवस्था भी है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को वर्तमान व्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले यह बताना चाहिए कि उसके शासनकाल में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कितनी पारदर्शी थी।
वर्तमान में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए 2023 के कानून में चयन समिति का प्रावधान है। राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं और निर्धारित चयन प्रक्रिया में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ ही चुनाव आयोग, मतदाता सूची और एसआईआर राजनीतिक विमर्श के बड़े मुद्दे बनते जा रहे हैं। कांग्रेस जहां चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों को लेकर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति बता रही है। भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह कांग्रेस के आरोपों का जवाब देने के साथ-साथ अपने पक्ष में एक बड़ा नैरेटिव खड़ा करना चाहती हैकृकि चुनाव आयोग पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करने की कोशिश है। दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि एसआईआर को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखकर ठोस आंकड़ों और प्रमाणों के साथ सामने रखे।
भाजपा का कहना है कि लोकतंत्र में चुनावी जीत-हार का फैसला जनता करती है। इसलिए राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर व्यापक संदेह पैदा करने के बजाय जनता के बीच अपने मुद्दों के साथ जाना चाहिए। यही वजह है कि महेंद्र भट्ट का ताजा बयान उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में केवल कांग्रेस पर हमला नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव से पहले चुनावी नैरेटिव पर पकड़ बनाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। भाजपा कांग्रेस को उसके छह दशक के शासन की याद दिलाकर पूछ रही है कि चुनाव आयोग पर सवाल उठाने से पहले अपने अतीत का हिसाब कौन देगा? वहीं कांग्रेस एसआईआर और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर जवाबदेही मांग रही है। अब यह टकराव जितना बढ़ेगा, उतना ही चुनावी मैदान में मुद्दा किसे वोट से आगे बढ़कर किस चुनावी व्यवस्था पर भरोसा तक पहुंचता जाएगा।
परंपरा पर मंत्री की टिप्पणी से विवाद
शंख पर विवादित बयान पर संत समाज ने मंत्री पर दाग दिए सवाल
जिस शंखनाद से होते हैं मंगल कार्य, भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी है परंपरा
उसी पर टिप्पणी से उठे सवालकृदेवभूमि में आस्था के प्रतीकों का सम्मान कहां
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में अब शंख को लेकर दिया गया एक बयान सियासी बहस से आगे बढ़कर धार्मिक और आध्यात्मिक चर्चा का विषय बन गया है। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की शंख को लेकर की गई कथित विवादित टिप्पणी पर आध्यात्मिक संतों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। सवाल सीधा हैकृकि जिस शंखनाद के साथ सनातन परंपरा में पूजा, आरती और मंगल कार्यों का श्रीगणेश होता है, उसी शंख को लेकर ऐसी टिप्पणी क्यों? भारतीय धार्मिक परंपरा में शंख का स्थान सदियों से विशेष रहा है। मंदिरों में आरती के समय शंखनाद, धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत और शुभ अवसरों पर शंख बजाने की परंपरा आज भी कायम है। धार्मिक आख्यानों में भगवान श्रीकृष्ण के शंख का उल्लेख मिलता है। ऐसे में संत समाज का कहना है कि शंख महज एक वस्तु नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा प्रतीक है।
मंत्री के बयान को लेकर संत समाज के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या सार्वजनिक जीवन में बैठे लोगों को धार्मिक परंपराओं के प्रतीकों पर टिप्पणी करने से पहले उनके महत्व की जानकारी नहीं होनी चाहिए? संतों का कहना है कि विचारों की स्वतंत्रता अपनी जगह है, लेकिन आस्था से जुड़े विषयों पर सार्वजनिक बयान देते समय शब्दों की मर्यादा और संदर्भ दोनों महत्वपूर्ण हैं। खासकर तब, जब बात उत्तराखंड जैसे प्रदेश की हो, जिसकी पहचान ही देवभूमि और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ी है। उत्तराखंड की धार्मिक पहचान चारधाम से लेकर मंदिरों, मठों और संत परंपरा तक फैली हुई है। ऐसे प्रदेश में धार्मिक प्रतीकों को लेकर होने वाली टिप्पणी का असर केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहता।
यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा हैकृकि क्या पर्यटन और विकास की बात करते-करते प्रदेश की उस आध्यात्मिक विरासत को नजरअंदाज किया जा सकता है, जिसके कारण उत्तराखंड की अलग पहचान बनी है? संत समाज की आपत्ति का केंद्र यही है कि शंख को लेकर दिए गए बयान को केवल राजनीतिक बयानबाजी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक धार्मिक प्रतीकों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी का हिस्सा है। अब निगाहें मंत्री सतपाल महाराज की ओर हैं। क्या वह अपने बयान का संदर्भ स्पष्ट करेंगे? क्या वे बताएंगे कि उनकी टिप्पणी का वास्तविक आशय क्या था? और क्या संत समाज द्वारा उठाए जा रहे सवालों पर कोई स्पष्टीकरण सामने आएगा? शंखनाद सनातन परंपरा में शुभता का प्रतीक हैकृलेकिन इस बार शंख की आवाज से ज्यादा तेज वे सवाल सुनाई दे रहे हैं, जिनका जवाब संत समाज मंत्री से मांग रहा है।
मंगलवार, 29 सितंबर 2026
udaydinmaan: तस्वीर पर सियासी गलियारों में चर्चा
udaydinmaan: तस्वीर पर सियासी गलियारों में चर्चा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की मुलाकात, सियासी गलियारों में हलचल महेंद्र भट्ट ने कहा कि प्रधानमंत्री से म...
तस्वीर पर सियासी गलियारों में चर्चा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की मुलाकात, सियासी गलियारों में हलचल
महेंद्र भट्ट ने कहा कि प्रधानमंत्री से मिलना परिवार के लिए विशेष अवसर और ऊर्जा देने वाला अनुभव
चुनावी वर्ष से ठीक पहले हुई इस मुलाकात को उत्तराखंड के सियासी गलियारों में भी अहम माना जा रहा
पार्टी संगठन पहले ही बूथ मजबूती, युवा-महिला संपर्क और सरकारी उपलब्धियों को जनता तक ले जाने की रणनीति में जुटा
नई दिल्ली/देहरादून। उत्तराखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। भट्ट अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्री के साथ प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास पहुंचे। उन्होंने प्रधानमंत्री को अपने पुत्र के आगामी विवाह समारोह का निमंत्रण सौंपा। भाजपा की ओर से मुलाकात को शिष्टाचार एवं पारिवारिक भेंट बताया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने भट्ट के परिवार का स्वागत करते हुए विवाह समारोह के लिए शुभकामनाएं और आशीर्वाद दिया। भट्ट ने मुलाकात को अपने परिवार के लिए विशेष अवसर बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री से मिलना हमेशा ऊर्जा और प्रेरणा देने वाला होता है।
हालांकि मुलाकात का घोषित उद्देश्य पारिवारिक है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में इसका समय इसे चर्चा में ला रहा है। प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा संगठन पहले ही चुनावी तैयारियों को गति दे चुका है। भाजपा की विस्तारित प्रदेश कार्यसमिति में बूथ मजबूती, युवा और महिला मतदाताओं तक पहुंच तथा सरकार की उपलब्धियों को जनता तक ले जाने सहित कई बिंदुओं पर जोर दिया गया था। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का प्रधानमंत्री से मिलना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इस मुलाकात के दौरान उत्तराखंड के संगठन, मंत्रिमंडल, चुनावी रणनीति या किसी राजनीतिक विषय पर चर्चा का कोई उल्लेख नहीं है। इसलिए इसे राजनीतिक बैठक के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय पारिवारिक मुलाकात के तथ्य को ही आधार बनाना उचित होगा।
उत्तराखंड भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक तैयारियों में जुटी है। पार्टी नेतृत्व बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने पर जोर दे रहा है। केंद्रीय नेतृत्व भी प्रदेश संगठन को चुनावी दृष्टि से सक्रिय रहने का संदेश दे चुका है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के रूप में महेंद्र भट्ट की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पार्टी को संगठन और सरकार के बीच समन्वय के साथ चुनावी अभियान को आगे बढ़ाना है। इसके साथ ही राज्यसभा की एक सीट नवंबर में रिक्त होने वाली है, जिसके लिए भाजपा में मंथन चल रहा है। हालांकि भट्ट स्वयं 2030 तक राज्यसभा सदस्य हैं, इसलिए मौजूदा मुलाकात को उस चुनाव से जोड़ने का कोई प्रत्यक्ष आधार सामने नहीं आया है।
परिवार के साथ प्रधानमंत्री से मुलाकात और विवाह का निमंत्रण निजी अवसर से जुड़ा विषय है। लेकिन चुनावी वर्ष में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के बीच मुलाकात होने से राजनीतिक गलियारों में स्वाभाविक रूप से चर्चा होना तय है। फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इतना ही कहा जा सकता है कि मुलाकात का घोषित एजेंडा पारिवारिक था, जबकि उत्तराखंड भाजपा के लिए 2027 की चुनावी तैयारियां समानांतर रूप से जारी हैं। यानी मुलाकात पारिवारिक, लेकिन समय राजनीतिककृइसी वजह से दिल्ली की यह तस्वीर देहरादून के सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है।
एसआईआर पर देशभर में सड़क पर कांग्रेस
पार्टी ने सीईसी के इस्तीफे और विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को तत्काल रोकने की मांग
कांग्रेस का दावा है कि एसआईआर प्रक्रिया के नाम पर मतदाता सूचियों से जायज वोटरों के नाम काटे
तकनीकी प्रक्रिया न मानकर देश के मताधिकार और लोकतांत्रिक प्रणाली की साख से जुड़ा मुद्दा बताया
देहरादून। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशव्यापी राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है। दिल्ली सहित कई राज्यों में कांग्रेस कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे तथा एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की। कांग्रेस का आरोप है कि एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। पार्टी इसे केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण का मामला नहीं, बल्कि मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा बता रही है।
दिल्ली, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, मणिपुर, कर्नाटक और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में प्रदर्शन हुए। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने निर्वाचन कार्यालयों तक मार्च निकाला और ज्ञापन सौंपे। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को निर्वाचन आयोग मुख्यालय की ओर बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस ने पानी की बौछार का इस्तेमाल किया। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि एसआईआर के नाम पर मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव किए जा रहे हैं। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण कानून और निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है। आयोग ने आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया का बचाव किया है।
कांग्रेस की रणनीति केवल प्रदर्शन तक सीमित रहने के संकेत नहीं दे रही है। पार्टी की कार्यसमिति ने एसआईआर, निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के मुद्दे पर आगे की रणनीति पर चर्चा की है। कांग्रेस इस मुद्दे को विपक्षी दलों के साझा मंच तक ले जाने की तैयारी में है। यानी आने वाले दिनों में एसआईआर बनाम विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई और तेज हो सकती है। कांग्रेस इसे चुनावी लोकतंत्र और मताधिकार का प्रश्न बना रही है, जबकि भाजपा और उसके समर्थक एसआईआर को मतदाता सूची को दुरुस्त करने की आवश्यक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। दिल्ली से निकली यह राजनीतिक गर्मी अब राज्यों की राजनीति में भी पहुंच चुकी है।
उत्तराखंड में भी एसआईआर और निर्वाचन आयोग को लेकर कांग्रेस पहले ही विरोध दर्ज करा चुकी है। ऐसे में देशव्यापी अभियान के अगले चरण का असर प्रदेश की राजनीति पर भी पड़ना स्वाभाविक है। खासकर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची और एसआईआर का मुद्दा भाजपा-कांग्रेस के बीच एक और बड़ा राजनीतिक मोर्चा बन सकता है। एक तरफ कांग्रेस इसे मतदाता के अधिकार का सवाल बना रही है, दूसरी तरफ भाजपा इसे मतदाता सूची की शुचिता से जोड़ रही है। चुनावी राजनीति के लिहाज से अब असली लड़ाई सिर्फ मतदाता सूची की नहीं, बल्कि उस पर जनता के भरोसे की है।
उत्तराखंड में सीमांत विकास पर ‘रार’
कांग्रेस के हमलों पर भाजपा का पलटवार, कहा- विकास से बौखलाई विपक्ष
सीमांत क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और आजीविका के अवसरों को तेजी से बढ़ा रही
पलायन रोकने और पर्यटन व रोजगार को बढ़ावा देने के लिए योजनाओं को धरातल पर उतारा जा रहा
देहरादून। उत्तराखंड के सीमांत जिलों में विकास को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। सीमांत क्षेत्रों में कैबिनेट बैठक और विकास योजनाओं को लेकर कांग्रेस की आपत्तियों पर भाजपा ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया है कि कांग्रेस को सीमांत गांवों में सरकार की बढ़ती सक्रियता रास नहीं आ रही है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता हनी पाठक ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार सीमांत क्षेत्रों को सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और आजीविका से जोड़ने पर काम कर रही हैं। भाजपा ने अपने पक्ष में वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम का हवाला देते हुए कहा है कि उत्तराखंड के सीमांत गांवों में बुनियादी ढांचे और आजीविका से जुड़ी योजनाओं को गति दी जा रही है। केंद्र की योजना में सीमावर्ती गांवों के लिए सड़क, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन और रोजगार जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है।
सीमांत क्षेत्र में सरकार की मौजूदगी को लेकर दोनों दलों के बीच राजनीतिक बहस तेज होना 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा इसे सीमांत क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा में लाने और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस सरकार की योजनाओं और उनके जमीन पर प्रभाव को लेकर सवाल उठाती रही है। राज्य सरकार के स्तर पर भी सीमांत क्षेत्र विकास कार्यक्रम के तहत बुनियादी ढांचे, स्वरोजगार, पर्यटन, कौशल विकास और पलायन रोकने जैसी गतिविधियों को शामिल किया गया है। राज्य के नौ सीमावर्ती विकासखंड इसके दायरे में हैं।
भाजपा का कहना है कि सीमांत क्षेत्र केवल नक्शे का आखिरी छोर नहीं बल्कि राज्य की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। पार्टी कांग्रेस से उसके शासनकाल के दौरान सीमांत क्षेत्रों में हुए कार्यों का हिसाब मांग रही है। वहीं इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू यह है कि सीमांत क्षेत्रों में सड़क, रोजगार, स्वास्थ्य और पलायन जैसी समस्याएं अब भी राजनीतिक मुद्दे हैं। हाल में उत्तरकाशी की जिला योजना को लेकर सत्ता पक्ष के विधायक की नाराजगी भी सामने आई थी, जिसमें उन्होंने क्षेत्रीय जरूरतों और जनप्रतिनिधियों के प्रस्तावों की अनदेखी के आरोप लगाए थे।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ भाजपा सरकार अपनी विकास योजनाओं को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखने में जुटी है। कांग्रेस इन दावों की प्रभावशीलता और जमीन पर वास्तविक स्थिति को मुद्दा बना सकती है। ऐसे में सीमांत जिलों का विकास अब महज सरकारी योजनाओं का विषय नहीं रह गया है, बल्कि दोनों दलों के बीच विकास के दावे और राजनीतिक श्रेय की लड़ाई का नया मैदान बनता दिख रहा है। सीमांत क्षेत्रों में रहने वाली जनता के लिए हालांकि राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा अहम सवाल सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और रोजगार का है।
सरकार इन क्षेत्रों में योजनाओं की संख्या गिनाकर अपनी उपलब्धियां बता रही है, जबकि विपक्ष को यह साबित करना होगा कि उसके सवाल केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं हैं। यानी सीमांत की चौकियों से लेकर देहरादून के सियासी गलियारों तक लड़ाई अब एक ही मुद्दे पर हैकृसीमांत का विकास किसका माडल और किसके खाते में जाएगा?
शक्ति केंद्रों से भाजपा साधेगी ‘हैट्रिक’
भाजपा ने बना दी हैं बूथ स्तर पर माइक्रो मैनेजमेंट की तैयारी
बूथों की स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों की अलग से निगरानी
शक्ति केंद्रों को मजबूत कर ऐतिहासिक जीत दर्ज करने का दावा
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर भाजपा ने संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने की रणनीति पर काम तेज कर दिया है। पार्टी अब शक्ति केंद्रों को चुनाव प्रबंधन का प्रमुख आधार बनाकर स्थानीय मुद्दों, मतदाताओं की प्राथमिकताओं और जमीनी परिस्थितियों की लगातार निगरानी करेगी। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि पार्टी शक्ति केंद्रों को मजबूत कर विधानसभा चुनाव में तीन-तिहाई बहुमत के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ेगी। भाजपा की रणनीति में शक्ति केंद्रों की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि एक शक्ति केंद्र के अंतर्गत आने वाले बूथों पर स्थानीय स्तर की राजनीतिक परिस्थितियों को अलग-अलग समझने और उसके अनुरूप संगठनात्मक गतिविधियां संचालित करने पर जोर रहेगा। पार्टी का प्रयास है कि चुनावी रणनीति केवल प्रदेश या विधानसभा स्तर पर तैयार न हो, बल्कि हर बूथ और शक्ति केंद्र की अलग राजनीतिक तस्वीर संगठन के पास उपलब्ध रहे।
भाजपा के अनुसार शक्ति केंद्रों के माध्यम से क्षेत्र विशेष के मुद्दों की पहचान की जाएगी। सड़क, पेयजल, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, पर्यटन और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर कार्यकर्ताओं से नियमित फीडबैक लेने की योजना है। इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं से लाभान्वित लोगों तक संगठन की पहुंच बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि चुनाव में स्थानीय परिस्थितियां कई बार व्यापक राजनीतिक मुद्दों से अलग प्रभाव डालती हैं। इसलिए शक्ति केंद्र स्तर से मिलने वाली जानकारी को विधानसभा और प्रदेश संगठन तक पहुंचाकर चुनावी प्रबंधन को अधिक सटीक बनाने की कोशिश की जाएगी।
भाजपा की माइक्रो रणनीति में केवल मतदाता संपर्क ही नहीं, बल्कि संगठन के प्रत्येक स्तर की जिम्मेदारी तय करने पर जोर है। शक्ति केंद्र संयोजकों और बूथ कार्यकर्ताओं को अपने-अपने क्षेत्र में मतदाता संपर्क, लाभार्थी संपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों की निगरानी करनी होगी। पार्टी की कोशिश है कि चुनाव के दौरान बूथ प्रबंधन अंतिम समय की कवायद न रहकर पूरे साल चलने वाली प्रक्रिया बने। इसी क्रम में बूथ समितियों को सक्रिय रखने और शक्ति केंद्रों के माध्यम से उनकी नियमित समीक्षा करने की योजना है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि पार्टी का लक्ष्य केवल सत्ता में वापसी नहीं, बल्कि तीन-तिहाई बहुमत के साथ सरकार बनाना है। इसके लिए संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत किया जा रहा है। उनके मुताबिक शक्ति केंद्र भाजपा की चुनावी रणनीति की महत्वपूर्ण कड़ी होंगे और यहीं से स्थानीय मुद्दों तथा मतदाताओं के रुझान की जानकारी संगठन तक पहुंचेगी। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव इसलिए भी अहम है क्योंकि पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इसके लिए सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ संगठन की पकड़ को बूथ स्तर पर मजबूत करना पार्टी की रणनीति का प्रमुख हिस्सा है।
भाजपा के इस माइक्रो मैनेजमेंट के बीच कांग्रेस के सामने भी संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने की चुनौती रहेगी। चुनाव में सत्ता पक्ष की संगठनात्मक मशीनरी के मुकाबले विपक्ष किस तरह अपना जमीनी ढांचा तैयार करता है, यह आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा। उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां विधानसभा क्षेत्रों के भीतर भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों में बड़ा अंतर है, वहां एक जैसी चुनावी रणनीति के बजाय क्षेत्रवार रणनीति पर भाजपा का जोर चुनाव प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव है। संदेश साफ हैकृ2027 की लड़ाई भाजपा प्रदेश कार्यालय से कम और शक्ति केंद्रों से ज्यादा लड़ने की तैयारी कर रही है। अब देखना यह होगा कि बूथ तक पहुंची यह माइक्रो रणनीति चुनावी मैदान में संगठन की ताकत को कितना प्रभावित करती है।
सोमवार, 28 सितंबर 2026
udaydinmaan: तीसरी जीत की ‘राह’ में हर बाधा पर भाजपा की नजर
udaydinmaan: तीसरी जीत की ‘राह’ में हर बाधा पर भाजपा की नजर: प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर कोर कमेटियां बनी 15 प्रमुख विभागों में संयोजक व सह-संयोजक नियुक्त किए उत्तराखंड में बूथ से लेकर केंद्रीय ...
तीसरी जीत की ‘राह’ में हर बाधा पर भाजपा की नजर
प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर कोर कमेटियां बनी
15 प्रमुख विभागों में संयोजक व सह-संयोजक नियुक्त किए
उत्तराखंड में बूथ से लेकर केंद्रीय स्तर तक सक्रिय हुई भाजपा
देहरादून। उत्तराखंड में लगातार तीसरी विधानसभा जीत का लक्ष्य भाजपा के लिए अब महज राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि संगठन के स्तर पर चल रहा विस्तृत चुनावी अभियान बन चुका है। वर्ष 2027 के रण में उतरने से पहले पार्टी ने अपनी तैयारियों को बूथ से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक कई स्तरों पर कसना शुरू कर दिया है। लक्ष्य साफ हैकृसत्ता विरोधी संभावित रुझानों, कमजोर सीटों, संगठनात्मक असंतोष और बदलते सामाजिक समीकरणों को चुनाव से पहले ही साध लिया जाए।
भाजपा ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर कोर कमेटियों का गठन पहले ही कर दिया है। इन कमेटियों के जरिए स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों, संगठन की स्थिति और बूथ स्तर की तैयारियों की समीक्षा की जा रही है। इसके साथ ही पार्टी ने संगठन के 15 प्रमुख विभागों में संयोजक और सह-संयोजक नियुक्त कर चुनाव प्रबंधन को अलग-अलग स्तरों पर सक्रिय किया है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी जीती हुई सीटों को सुरक्षित रखने के साथ पिछली बार हाथ से निकली सीटों पर वापसी की है। सितंबर में हुई संगठनात्मक बैठकों में पार्टी ने 47 जीती सीटों को सुरक्षित रखने और 23 सीटों पर वापसी की रणनीति पर चर्चा की। इसके साथ ही डैमेज कंट्रोल और विपक्ष द्वारा बनाए जा रहे संभावित राजनीतिक माहौल पर भी नजर रखने का संदेश दिया गया। यानी भाजपा की रणनीति केवल अपने मजबूत क्षेत्रों पर निर्भर रहने की नहीं है। पार्टी कमजोर कड़ियों को पहले से चिन्हित कर वहां संगठन, जनसंपर्क और राजनीतिक संदेश को मजबूत करना चाहती है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उत्तराखंड दौरों को भी इसी व्यापक चुनावी तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है। कुमाऊं दौरे के दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों और संगठन पदाधिकारियों से संवाद किया। सरकारी योजनाओं के जमीनी असर, विकास कार्यों और जनता की अपेक्षाओं पर फीडबैक लेने की बात सामने आई। अब चुनाव से करीब एक वर्ष पहले प्रदेश प्रभारी के स्तर पर भी बड़ा बदलाव किया गया है। राम माधव को उत्तराखंड का नया प्रभारी तथा अरविंद मेनन और बांसुरी स्वराज को सह प्रभारी बनाया गया है। पार्टी के अनुसार नई टीम के सामने संगठन और सरकार के बीच समन्वय, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, चुनावी मुद्दों और सामाजिक समीकरणों को साधने की चुनौती होगी।
भाजपा की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बूथ प्रबंधन है। पार्टी चुनाव को केवल बड़े नेताओं की सभाओं और नारों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती। बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता, कार्यकर्ताओं की उपलब्धता और मतदाताओं तक सरकार के कामकाज का संदेश पहुंचाने पर जोर है। अगस्त-सितंबर के लिए पार्टी ने विस्तृत संगठनात्मक कार्यक्रम भी तैयार किया था। इसके साथ ही पहाड़ और मैदान के अलग-अलग राजनीतिक सवालों को एक ही चुनावी रणनीति में पिरोना भाजपा के लिए महत्वपूर्ण होगा। बेरोजगारी, पलायन, भू-कानून, मूल निवास, विकास, सड़क और स्वास्थ्य जैसे स्थानीय मुद्दों के साथ राष्ट्रीय मुद्दों का संतुलन भी चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकता है।
भाजपा के सामने एक दूसरी चुनौती सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दे में बदलने की है। पार्टी ने 2027 के लिए विकास, सुशासन और सामाजिक समरसता को अपने प्रमुख एजेंडे में रखने की बात कही है। लेकिन चुनावी राजनीति में घोषणाएं तभी प्रभावी होती हैं जब उनका स्थानीय स्तर पर अनुभव दिखाई दे। सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा और पलायन जैसे मुद्दों पर जनता की अपेक्षाएं अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती हैं। इसलिए सरकार की उपलब्धियों का प्रचार और जनता की शिकायतों का समाधानकृदोनों साथ चलाना भाजपा के लिए जरूरी होगा।
लगातार सत्ता में रहने के बाद किसी भी दल के सामने संगठनात्मक असंतोष और स्थानीय स्तर पर नाराजगी को नियंत्रित रखने की चुनौती आती है। टिकट की दावेदारी, स्थानीय नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा, कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं और सरकार से जुड़ी शिकायतें चुनाव के समय राजनीतिक समीकरण बदल सकती हैं। इसीलिए भाजपा की मौजूदा कवायद में केवल चुनावी प्रचार नहीं, बल्कि डैमेज कंट्रोल भी महत्वपूर्ण हिस्सा दिखाई दे रहा है। पार्टी जितनी जल्दी असंतोष के कारणों को पहचानकर उन्हें दूर करने में सफल होगी, उतना ही चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारना आसान होगा।
भाजपा की तैयारियों के समानांतर कांग्रेस समेत विपक्षी दल भी सरकार के खिलाफ मुद्दे तलाश रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती केवल अपनी उपलब्धियां गिनाने की नहीं, बल्कि विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की भी होगी। आने वाले महीनों में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, कानून-व्यवस्था, भू-कानून, मूल निवास, पलायन और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में रह सकते हैं। यही वजह है कि भाजपा ने चुनावी तैयारी को अंतिम समय की गतिविधि बनाने के बजाय अभी से संगठन के विभिन्न स्तरों पर सक्रिय कर दिया है। तीसरी जीत की राह में भाजपा के सामने असली चुनौती विपक्ष से अधिक अपने संगठन और सरकार के बीच तालमेल, स्थानीय असंतोष और जनता की बदलती अपेक्षाओं को साधने की होगी। पार्टी ने तैयारी का ढांचा खड़ा कर दिया है और अब उसकी अगली परीक्षा इस बात की होगी कि यह संगठनात्मक मशीनरी जमीन पर जनता के सवालों का कितना प्रभावी जवाब दे पाती है।
भाजपा-कांग्रेस में बढ़ी ‘सियासी’ चौकसी
उत्तराखंड में भविष्य नहीं, वर्तमान की सक्रिय राजनीति बना चुनाव
एक-दूसरे के हर दांव को काउंटर करने में जुटे हैं भाजपा व कांग्रेस
हालिया कोर कमेटी की बैठक में कांग्रेस के राजनीतिक नैरेटिव पर गंभीर
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट अब राजनीतिक दलों के लिए भविष्य की तैयारी नहीं, बल्कि वर्तमान की सक्रिय राजनीति बन चुकी है। वर्ष 2027 के चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों एक-दूसरे की हर राजनीतिक गतिविधि, संगठनात्मक कदम और जनसरोकार से जुड़े अभियान पर नजर रख रहे हैं। कौन सा मुद्दा उठाया जा रहा है, किस क्षेत्र में कौन नेता सक्रिय है, किस वर्ग से संवाद बढ़ाया जा रहा है और किस बयान का जवाब कैसे दिया जाएकृराजनीतिक दलों की निगाह अब इन सभी पहलुओं पर है। भाजपा की हालिया कोर कमेटी की बैठक में कांग्रेस के राजनीतिक नैरेटिव और उसके संभावित प्रभाव पर गंभीर चर्चा इसका संकेत है। पार्टी संगठन ने विपक्ष के हर दांव पर नजर रखने और उसके राजनीतिक संदेश का जवाब देने की रणनीति पर जोर दिया है।
दूसरी ओर कांग्रेस भी चुनावी जमीन तैयार करने में पीछे नहीं रहना चाहती। पार्टी ने राष्ट्रीय नेताओं को उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय करने की तैयारी की है। मैदानी क्षेत्रों में रोजगार, महंगाई और विकास तथा पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन, महिलाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर राजनीतिक अभियान आगे बढ़ाने की योजना सामने आई है।
आगामी चुनाव में सबसे दिलचस्प मुकाबला मुद्दों की राजनीति को लेकर हो सकता है। कांग्रेस सरकार के कामकाज पर सवाल उठाकर बेरोजगारी, भर्ती, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों को धार देने की कोशिश कर रही है। भाजपा की रणनीति इन आरोपों का तत्काल राजनीतिक जवाब देने और सरकार की उपलब्धियों को सामने रखने की है। हाल के दिनों में बिजली समझौते जैसे मुद्दों पर कांग्रेस के आरोपों का मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से जवाब दिया जाना भी इसी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। चुनाव नजदीक आने के साथ आरोप और प्रत्यारोप का यह सिलसिला और तेज होने की संभावना है।
अब दोनों दलों के लिए संगठनात्मक कार्यक्रम भी राजनीतिक संदेश बन गए हैं। भाजपा ने बूथ सशक्तीकरण से लेकर हर घर तक संपर्क का अभियान शुरू किया है। पार्टी का घोषित लक्ष्य संगठन को चुनाव के अंतिम छोर यानी बूथ तक सक्रिय करना है। भाजपा की ओर से 2022 में हारी 23 सीटों पर विशेष ध्यान और वरिष्ठ नेताओं के रात्रि प्रवास की तैयारी को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी का प्रयास है कि जिन क्षेत्रों में पिछली बार नुकसान हुआ, वहां संगठनात्मक कमजोरियों और स्थानीय असंतोष को समय रहते समझा जाए। कांग्रेस के लिए चुनौती इसके उलट है। उसे सरकार विरोधी माहौल को केवल नारों और आरोपों से आगे ले जाकर बूथ स्तर के संगठन और स्थानीय नेतृत्व में बदलना होगा। बड़े नेताओं की सभाओं को वोट में बदलने के लिए विधानसभा क्षेत्रों में मजबूत संगठन उसकी महत्वपूर्ण जरूरत होगी।
2027 की तैयारी में नेताओं के दौरे भी रणनीतिक संकेत दे रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उत्तराखंड दौरे और संगठनात्मक बैठकों के बाद पार्टी ने जमीनी तैयारियों को और गति दी है। कांग्रेस भी राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं के संभावित कार्यक्रमों के माध्यम से चुनावी माहौल बनाने की तैयारी कर रही है। यानी दोनों दल अब केवल प्रदेश स्तर के नेताओं के भरोसे चुनावी जमीन तैयार नहीं कर रहे, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता को भी स्थानीय राजनीतिक संदेश से जोड़ रहे हैं।
इस चुनाव में राजनीतिक चौकसी केवल सार्वजनिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है। दलबदल, टिकट के दावेदार, असंतुष्ट नेता, स्थानीय गुटबाजी और पुराने राजनीतिक संबंध भी दोनों दलों के लिए महत्वपूर्ण हैं। हाल के महीनों में दोनों ओर नेताओं के पाला बदलने से कई विधानसभा क्षेत्रों के समीकरणों में बदलाव की चर्चा हुई है। यही वजह है कि भाजपा कांग्रेस के भीतर की गतिविधियों पर नजर रख रही है और कांग्रेस भाजपा के संगठन तथा सरकार से जुड़े घटनाक्रम को बारीकी से देख रही है। किस नेता की नाराजगी कहां है, कौन सा क्षेत्र असंतोष का केंद्र बन रहा है और किस मुद्दे को जनता के बीच ज्यादा प्रतिक्रिया मिल रही हैकृइन सवालों के जवाब दोनों दल अपनी चुनावी रणनीति में तलाश रहे हैं।
हल्द्वानी के रामलीला मैदान से जुड़ा शुद्धिकरण विवाद भी इस बात का उदाहरण है कि कोई स्थानीय घटना किस तरह व्यापक राजनीतिक मुद्दे में बदल सकती है। कांग्रेस ने इसे सामाजिक न्याय और दलित सम्मान से जोड़कर उठाया, जबकि भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों और उसकी राजनीतिक व्याख्या पर सवाल उठाए। विवाद ने दोनों दलों को अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव को धार देने का अवसर दिया। आगे भी ऐसे स्थानीय मुद्दे चुनावी राजनीति में तेजी से बड़े विमर्श का रूप ले सकते हैं।2027 की चुनावी लड़ाई अभी दूर है, लेकिन उसकी राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है। भाजपा सत्ता में होने के कारण अपने कामकाज और संगठन की ताकत को चुनावी आधार बनाने की कोशिश करेगी। कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल और जनता के स्थानीय असंतोष को राजनीतिक विकल्प में बदलने की कोशिश करेगी।
इस पूरी प्रक्रिया में एक बात स्पष्ट हैकृअब भाजपा कांग्रेस के हर कदम को पढ़ रही है और कांग्रेस भाजपा की हर चाल का जवाब तलाश रही है। आने वाले महीनों में यह निगरानी और चौकसी और बढ़ेगी। क्योंकि चुनाव के मैदान में केवल यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि कौन क्या कह रहा है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि किस मुद्दे पर कौन पहले पहुंचता है, किसकी बात जमीन तक पहुंचती है और कौन अपने संगठन को मतदाता तक प्रभावी ढंग से ले जा पाता है।
कांग्रेस के ‘सवाल’ पर भाजपा का ‘पलटवार’
एसआईआर की निष्पक्षता पर कांग्रेस के सवाल
भाजपा बोलीकृझूठ का सहारा ले रही कांग्रेस पार्टी
चुनाव से पहले हो रही भ्रम फैलाने की राजनीतिक
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। कांग्रेस जहां एसआईआर की प्रक्रिया और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लेकर गंभीर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए इसे चुनाव से पहले भ्रम फैलाने की राजनीतिक कोशिश बताया है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस और राहुल गांधी के आरोपों को पूरी तरह मनगढ़ंत और झूठ बताते हुए कहा कि विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े कर राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। उनके मुताबिक, कांग्रेस को एसआईआर को लेकर भ्रम फैलाने के बजाय पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में सुनिश्चित कराने के लिए जमीन पर काम करना चाहिए। भट्ट का हमला ऐसे समय हुआ है जब उत्तराखंड में एसआईआर को लेकर राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची का मुद्दा अब भाजपा और कांग्रेस के बीच व्यापक राजनीतिक बहस का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। भाजपा का तर्क है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक वैधानिक प्रक्रिया है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना है। कांग्रेस इसके तौर-तरीकों और संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठा रही है।
उत्तराखंड में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में फार्म-7 आवेदन सामने आने के बाद भी राजनीतिक बहस तेज हुई है। निर्वाचन कार्यालय के अनुसार, करीब 1.73 लाख फार्म-7 आवेदनों में 95 हजार से अधिक को जांच के दौरान अपात्र श्रेणी में रखा गया। निर्वाचन कार्यालय ने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि संबंधित मतदाता का नाम स्वतः हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। पात्र व्यक्ति निर्धारित प्रक्रिया के तहत फार्म-6 के माध्यम से मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का दावा कर सकता है।
महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी पहले चुनाव परिणामों को ईवीएम से जोड़ती रही और अब एसआईआर को लेकर सवाल उठाकर भविष्य के चुनाव परिणामों के लिए राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है। उन्होंने कांग्रेस से सवाल किया कि यदि किसी पात्र मतदाता को एसआईआर के दौरान परेशानी आ रही है तो पार्टी उसकी मदद के लिए कितने स्तर पर अभियान चला रही है।
भाजपा का यह हमला सीधे तौर पर कांग्रेस की चुनावी रणनीति को निशाने पर लेने वाला है। पार्टी का संदेश साफ है कि एसआईआर को लेकर उठ रहे सवालों को वह केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहने देना चाहती, बल्कि इसे कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में पेश कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस का कहना है कि एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का स्पष्ट और पारदर्शी जवाब मिलना चाहिए। कांग्रेस ने निर्वाचन कार्यालय के घेराव और प्रदर्शन के जरिए इस मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी राहुल गांधी और विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग तथा एसआईआर को लेकर सवाल उठाए हैं। इसके जवाब में भाजपा नेताओं ने आरोपों को निराधार बताया है। निर्वाचन आयोग की ओर से भी एसआईआर से जुड़े निर्णयों को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया गया है। उत्तराखंड में अब एसआईआर केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच यह राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बन चुकी है। भाजपा इसे मतदाता सूची को व्यवस्थित करने की संवैधानिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि कांग्रेस प्रक्रिया की पारदर्शिता और संभावित प्रभावों पर सवाल उठा रही है।
यही वजह है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर दोनों दलों के बीच बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं। भाजपा जहां कांग्रेस पर भ्रम फैलाने का आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस निर्वाचन आयोग से जुड़े अपने सवालों को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है। 2027 के चुनावी रण में बेरोजगारी, पलायन, भू-कानून और विकास के साथ अब मतदाता सूची और एसआईआर भी बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता दिख रहा है। सवाल केवल यह नहीं कि सूची में किसका नाम है, बल्कि यह भी है कि चुनाव से पहले इस पूरी प्रक्रिया को लेकर जनता के बीच किस दल का राजनीतिक नैरेटिव ज्यादा प्रभाव डालता है।
रविवार, 27 सितंबर 2026
udaydinmaan: बदरीनाथ में डीजे कान्सर्ट पर घमासान
udaydinmaan: बदरीनाथ में डीजे कान्सर्ट पर घमासान: डीएम ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग आफिसर को भेजा नोटिस बिना अनुमति कैसे हुआ बदरीनाथ धाम में डीजे कान्सर्ट का आयोजन ऊंची आवाज में साउंड सिस्...
बदरीनाथ में डीजे कान्सर्ट पर घमासान
डीएम ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग आफिसर को भेजा नोटिस
बिना अनुमति कैसे हुआ बदरीनाथ धाम में डीजे कान्सर्ट का आयोजन
ऊंची आवाज में साउंड सिस्टम लगाने का भी डीएम ने मांगा जवाब
देहरादून। बदरीनाथ धाम में आयोजित देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव के दौरान डीजे और तेज ध्वनि में संगीत कार्यक्रम को लेकर विवाद अब प्रशासनिक स्तर तक पहुंच गया है। कार्यक्रम के वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद धार्मिक संगठनों और संतों की आपत्ति के बीच चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग आफिसर को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। डीएम ने पूछा है कि बदरीनाथ धाम क्षेत्र में इस तरह के आयोजन के लिए सक्षम स्तर से अनुमति ली गई थी या नहीं और कार्यक्रम में उच्च ध्वनि वाले साउंड सिस्टम का इस्तेमाल क्यों किया गया।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि कार्यक्रम के सांस्कृतिक हिस्से के आयोजन और भुगतान में जिला प्रशासन तथा राज्य सरकार की भूमिका नहीं थी। डीएम के अनुसार 19 और 20 सितंबर को भारतीय सेना की ओर से बामणी और माणा क्षेत्र में वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। जिला प्रशासन की भूमिका केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए स्टाल लगाने तक सीमित थी। बदरीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में 19 और 20 सितंबर को देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026 आयोजित किया गया था। यह आयोजन भारतीय सेना की आपरेशन सद्भावना पहल के तहत किया गया था। इसका घोषित उद्देश्य सीमांत क्षेत्रों की लोक संस्कृति, परंपराओं, स्थानीय उत्पादों और पर्यटन को बढ़ावा देना था। कार्यक्रम में उत्तराखंड की लोक गायिका प्रियंका मेहर की प्रस्तुति भी हुई। कार्यक्रम के दौरान तेज संगीत और नृत्य के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद विवाद खड़ा हुआ।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी बदरीनाथ पहुंचे थे। उन्होंने मंदिर में पूजा-अर्चना की और कार्यक्रम में शामिल हुए। यही वजह है कि आयोजन की जिम्मेदारी और अनुमति को लेकर उठे सवालों ने राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा तेज कर दी है। चमोली प्रशासन की ओर से गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग आफिसर को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि बदरीनाथ धार्मिक आस्था का केंद्र है और वहां इस तरह के सामूहिक आयोजन तथा उच्च ध्वनि वाले साउंड सिस्टम का इस्तेमाल धाम की गरिमा के अनुरूप नहीं है। डीएम ने कार्यक्रम के औचित्य और अनुमति से संबंधित जानकारी मांगी है। साथ ही भविष्य में इस प्रकार की पुनरावृत्ति न होने देने को कहा गया है।
डीएम ने यह भी पूछा है कि कार्यक्रम के लिए सक्षम स्तर से अनुमति ली गई थी या नहीं तथा तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल का कारण क्या था। प्रशासन ने आगे ऐसे आयोजनों के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था पर भी जोर दिया है। कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने आपत्ति जताई है। महापंचायत का कहना है कि उसका विरोध सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन से नहीं, बल्कि बदरीनाथ जैसे धार्मिक स्थल पर उसके स्वरूप और तेज ध्वनि वाले मनोरंजन कार्यक्रम से है। ज्योतिर्मठ से जुड़े संतों की ओर से भी आयोजन को लेकर आपत्ति जताई गई है और धार्मिक परंपराओं तथा धाम की मर्यादा के अनुरूप कार्यक्रम कराने की मांग की गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी ने भी बदरीनाथ में ऐसे संगीत कार्यक्रम पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार से धार्मिक स्थलों की मर्यादा बनाए रखने की मांग की।
विवाद अब सिर्फ डीजे या संगीत कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। प्रशासन के नोटिस के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि बदरीनाथ जैसे धार्मिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में इतने बड़े आयोजन की अनुमति की प्रक्रिया क्या थी और कार्यक्रम के स्वरूप को अंतिम मंजूरी किस स्तर से मिली? एक ओर प्रशासन का कहना है कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों का निर्धारण सेना की ओर से किया गया था, वहीं उपलब्ध रिपोर्टों में इस आयोजन को सेना, जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग के सहयोग से आयोजित बताया गया है। यही अंतर अब जांच और स्पष्टीकरण का विषय बन गया है। प्रशासन ने फिलहाल सेना से जवाब मांगा है। सेना की ओर से आधिकारिक जवाब आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आयोजन की अनुमति किस स्तर से ली गई थी और कार्यक्रम में तेज ध्वनि वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल का निर्णय किस आधार पर लिया गया। बदरीनाथ में संस्कृति के नाम पर आयोजन को लेकर उठा विवाद अब धार्मिक मर्यादा बनाम मनोरंजन के सवाल से आगे बढ़कर प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा बन गया है।
मां की तस्वीर पर सियासत
ईडी कार्यालय जाते समय हरीश रावत के मां की तस्वीर साथ रखने पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का हमला
वर्ष 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा से जुड़े मामले में पूछताछ के लिए पहुंचे
रावत ने कहा था कि वह अपनी मां, मां जगदंबा और धरती मां का स्मरण करते हुए ईडी कार्यालय पहुंचे
देहरादून। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के प्रवर्तन निदेशालय कार्यालय में पूछताछ के लिए पहुंचने के दौरान अपनी दिवंगत मां की तस्वीर साथ रखने को लेकर उत्तराखंड की सियासत गरमा गई है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने रावत पर निशाना साधते हुए इसे राजनीति के लिए भावनाओं के इस्तेमाल का मामला बताया है। उन्होंने कहा कि निजी भावनाओं और पारिवारिक स्मृतियों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं है। रावत शनिवार को वर्ष 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा से जुड़े मामले में पूछताछ के लिए ईडी कार्यालय पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने अपनी मां की तस्वीर गले में रखी थी। रावत ने कहा था कि वह अपनी मां, मां जगदंबा और धरती मां का स्मरण करते हुए ईडी कार्यालय पहुंचे हैं और मां का आशीर्वाद लेकर जांच एजेंसी के सामने उपस्थित हुए हैं।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने इसी को आधार बनाते हुए हरीश रावत पर राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने कहा कि राजनीति में व्यक्तिगत भावनाओं को इस तरह सामने लाना दुर्भाग्यपूर्ण है। भट्ट के बयान ने पहले से ही ईडी की कार्रवाई को लेकर चल रहे कांग्रेस-भाजपा विवाद को नया राजनीतिक रंग दे दिया है। भाजपा का कहना है कि ईडी की पूछताछ एक जांच प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे राजनीतिक भावनाओं से जोड़ना उचित नहीं है। वहीं कांग्रेस और रावत लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि चुनाव से पहले केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई को राजनीतिक दबाव के तौर पर देखा जाना चाहिए। इन आरोपों पर जांच एजेंसी का अंतिम निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।
ईडी कार्यालय पहुंचने से पहले रावत ने कहा था कि वह अपनी मां की तस्वीर लेकर आए हैं। उन्होंने इसे किसी राजनीतिक प्रदर्शन के बजाय मां का आशीर्वाद लेने की अपनी भावना से जोड़ा। रावत ने यह भी कहा कि उन्होंने किसी को नहीं बुलाया और केवल अपनी मां को साथ लेकर आए हैं। ईडी की पूछताछ वर्ष 2016 की वीपीडीओ भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े धनशोधन मामले के सिलसिले में है। इस मामले में रावत के तत्कालीन ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े परिसरों पर भी ईडी ने तलाशी ली थी। ईडी की कार्रवाई के बाद रावत ने जांच एजेंसी के सामने अपना पक्ष रखने की बात कही थी।
हरीश रावत और भाजपा के बीच यह जुबानी जंग ऐसे समय तेज हुई है, जब उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोर पकड़ रही हैं। ईडी की कार्रवाई और उसके बाद रावत के बयान को कांग्रेस राजनीतिक कार्रवाई बता रही है, जबकि भाजपा जांच प्रक्रिया का बचाव कर रही है। अब मां की तस्वीर को लेकर महेंद्र भट्ट के बयान ने इस विवाद को भावनात्मक और राजनीतिक बहस में बदल दिया है। एक तरफ भाजपा रावत के कदम को राजनीतिक प्रतीकवाद बता रही है, तो दूसरी ओर रावत इसे अपनी मां और मातृशक्ति के प्रति श्रद्धा के रूप में पेश कर रहे हैं। ईडी की पूछताछ का कानूनी पक्ष जांच पूरी होने के बाद स्पष्ट होगा, लेकिन इतना तय है कि मां की तस्वीर को लेकर शुरू हुई राजनीतिक बहस ने उत्तराखंड में चुनावी तापमान और बढ़ा दिया है।
ईडी से चुनावी रण तक
हरीश रावत की पेशी के बाद भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
आरोप-प्रत्यारोप ने 2027 के चुनावी माहौल को दी नई धार
सूबे में कार्रवाई चुनावी राजनीति का अहम मुद्दा बनने जा रही
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव का एक नया मोर्चा खुल गया है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की प्रवर्तन निदेशालय के समक्ष पेशी के बाद जिस तरह दोनों दल आमने-सामने आए हैं, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई भी प्रदेश की चुनावी राजनीति का अहम मुद्दा बनने जा रही है। 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े धनशोधन मामले में ईडी ने हरीश रावत को पूछताछ के लिए बुलाया। 26 सितंबर को रावत ईडी कार्यालय पहुंचे। इस दौरान वह अपनी दिवंगत मां की तस्वीर साथ लेकर पहुंचे और कहा कि वह अपनी मां, मां जगदंबा और धरती मां का स्मरण करते हुए कार्यालय आए हैं।
पेशी के बाद रावत ने केंद्र और भाजपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि चुनाव नजदीक आते ही जांच एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं। इससे पहले भी वह ईडी की कार्रवाई को उत्तराखंड की चुनावी राजनीति से जोड़ चुके हैं। कांग्रेस ने भी कार्रवाई को राजनीतिक दबाव के रूप में पेश किया है। हालांकि जांच एजेंसी की कार्रवाई के पीछे राजनीतिक मंशा होने का अंतिम निष्कर्ष अभी स्थापित नहीं हुआ है। रावत के आरोपों के बाद भाजपा ने भी मोर्चा खोल दिया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने रावत के ईडी कार्यालय जाते समय मां की तस्वीर साथ रखने पर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक सहानुभूति हासिल करने की कोशिश बताया। भाजपा का कहना है कि जांच एक कानूनी प्रक्रिया है और इसे राजनीतिक भावनाओं के साथ जोड़ना उचित नहीं। यहीं से विवाद केवल ईडी की पूछताछ तक सीमित नहीं रहा। मां की तस्वीर, जांच एजेंसी की कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपकृइन तीनों ने मिलकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बयानबाजी को और तीखा कर दिया है।
ईडी की कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब कांग्रेस 2027 के लिए सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने की तैयारी में है। पार्टी बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, पलायन, भू-कानून और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। लेकिन रावत से जुड़े प्रकरण ने कांग्रेस के चुनावी विमर्श में एक नया आयाम जोड़ दिया है। इससे पहले रावत ने अपने पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े ईडी प्रकरण के बाद कांग्रेस के संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश भी की थी। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर भी चर्चा को जन्म दिया था। अब रावत की ईडी पेशी के बाद कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह जांच से जुड़े सवालों और भाजपा के राजनीतिक हमलों का जवाब देते हुए अपने चुनावी मुद्दों को किस तरह आगे बढ़ाती है।
दूसरी ओर भाजपा इस प्रकरण को कांग्रेस और रावत के खिलाफ राजनीतिक सवालों के रूप में उठा रही है। भाजपा की ओर से यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि जांच एजेंसियों की कार्रवाई को राजनीति से जोड़ने के बजाय संबंधित मामले में सामने आने वाले तथ्यों पर बात होनी चाहिए। हालांकि, चुनावी राजनीति में जांच एजेंसियों की कार्रवाई का राजनीतिक असर होने से इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस इसे विपक्ष पर दबाव की कार्रवाई के रूप में देख रही है, जबकि भाजपा इसे जांच की सामान्य प्रक्रिया बता रही है। दोनों पक्षों के इन दावों के बीच अंतिम तस्वीर जांच के निष्कर्ष और उपलब्ध दस्तावेजों से ही स्पष्ट होगी।
उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत अब भी कांग्रेस के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल हैं। ऐसे में उनके खिलाफ या उनसे जुड़े किसी भी जांच प्रकरण का राजनीतिक असर स्वाभाविक रूप से व्यापक होता है। भाजपा के लिए रावत पर हमला कांग्रेस के पुराने शासन और उससे जुड़े सवालों को उठाने का अवसर है, जबकि कांग्रेस के लिए रावत की पेशी केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाने का आधार बन रही है। इस तरह ईडी कार्यालय से शुरू हुआ विवाद अब सीधे चुनावी मैदान की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बहस जांच के तथ्यों तक सीमित रहती है या भाजपा-कांग्रेस की चुनावी रणनीति का स्थायी हिस्सा बनती है। फिलहाल इतना जरूर है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी मुकाबले में एक नया अध्याय जुड़ गया हैकृईडी की कार्रवाई बनाम राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप।
शनिवार, 26 सितंबर 2026
udaydinmaan: एक सीट, 24 दावेदार
udaydinmaan: एक सीट, 24 दावेदार: राज्यसभा के एक टिकट ने भाजपा के भीतर बढ़ाई दावेदारों की बेचौनी कोर कमेटी में नहीं बनी सहमति,अब सीएम धामी-भट्ट-शर्मा तय करेंगे नाम उत्तराखंड म...
एक सीट, 24 दावेदार
राज्यसभा के एक टिकट ने भाजपा के भीतर बढ़ाई दावेदारों की बेचौनी
कोर कमेटी में नहीं बनी सहमति,अब सीएम धामी-भट्ट-शर्मा तय करेंगे नाम
उत्तराखंड में भाजपा के भीतर राज्यसभा की एक सीट ने सियासी हलचल तेज
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भाजपा के भीतर राज्यसभा की एक सीट ने सियासी हलचल तेज कर दी है। एक सीट और दावेदार करीब दो दर्जन। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि राज्यसभा की कुर्सी को लेकर पार्टी के भीतर कितनी जोरदार दावेदारी है। शुक्रवार को हुई भाजपा की प्रदेश कोर कमेटी की बैठक में करीब 24 नामों पर मंथन हुआ, लेकिन किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन सकी। आखिरकार अब संभावित दावेदारों में से तीन या पांच नामों का पैनल तैयार करने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और प्रदेश महामंत्री संगठन फणींद्रनाथ शर्मा को सौंपी गई है।
राज्यसभा सांसद नरेश बंसल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद यह सीट खाली होगी। इसके लिए भाजपा के भीतर दावेदारों की लंबी फेहरिस्त सामने आना महज टिकट की सामान्य दावेदारी नहीं माना जा रहा। 2027 के विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ी भाजपा के लिए राज्यसभा का यह चयन संगठन, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय संतुलनकृतीनों को साधने की चुनौती भी है। भाजपा ने आधिकारिक रूप से दावेदारों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं। पार्टी की ओर से इतना जरूर बताया गया है कि सामने आए करीब 24 नामों में महिला, अनुसूचित जाति-जनजाति और युवा वर्ग समेत विभिन्न सामाजिक समूहों से जुड़े चेहरे शामिल हैं। यानी अंतिम चयन केवल व्यक्तिगत दावेदारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व का गणित भी महत्वपूर्ण होगा।
इसके साथ ही गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन का सवाल भी चर्चा में है। मीडिया रिपोर्टों में कुमाऊं को प्रतिनिधित्व देने और वैश्य समाज के चेहरे को मौका देने जैसे अलग-अलग समीकरणों की चर्चा है। पूर्व मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल का नाम भी चर्चाओं में आया है, हालांकि पार्टी ने किसी नाम को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की है। राज्यसभा का टिकट ऐसे समय में सामने आया है जब भाजपा उत्तराखंड में 2027 की चुनावी तैयारी को तेज कर रही है। ऐसे में राज्यसभा का एक टिकट केवल उच्च सदन की सदस्यता नहीं, बल्कि संगठन के भीतर राजनीतिक महत्व और भविष्य की भूमिका से भी जुड़ा माना जा रहा है।
यही वजह है कि पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर संगठन के वरिष्ठ नेताओं और अलग-अलग सामाजिक समूहों के चेहरों तक के नामों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। मीडिया रिपोर्टों में रमेश पोखरियाल निशंक, तीरथ सिंह रावत, नरेश बंसल, अनिल गोयल, मदन कौशिक, ज्योति प्रसाद गैरोला, बलराज पासी और केदार जोशी समेत कई नामों की चर्चा हुई है। हालांकि इनमें से किसी नाम को भाजपा ने प्रत्याशी के रूप में घोषित नहीं किया है। कोर कमेटी के सामने करीब 24 नाम आने के बाद अब सबसे कठिन काम नाम छांटने का है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और प्रदेश महामंत्री संगठन फणींद्रनाथ शर्मा तीन या पांच नामों का पैनल तैयार करेंगे। इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व अंतिम नाम पर निर्णय करेगा। यानी प्रदेश भाजपा के भीतर चल रही दावेदारी का पहला दौर खत्म हो चुका है, लेकिन असली राजनीतिक परीक्षा अब शुरू होगी। दो दर्जन से अधिक दावेदारों में से कुछ नाम पैनल तक पहुंचेंगे और अंततः एक चेहरे पर केंद्रीय नेतृत्व की मुहर लगेगी।
इस पूरी कवायद का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि भाजपा के सामने अगले वर्ष विधानसभा चुनाव है। राज्यसभा के लिए चुना जाने वाला चेहरा संगठन के भीतर पार्टी की प्राथमिकताओं का संकेत भी माना जाएगा। महिला, युवा, एससी-एसटी, क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाते हुए पार्टी किस तरह का संदेश देती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल तस्वीर यही हैकृकि सीट एक है, दावेदार करीब 24। नामों की कतार लंबी है और अंतिम फैसला दिल्ली में होना है। लेकिन उससे पहले उत्तराखंड भाजपा के भीतर चल रही दावेदारी ने यह जरूर साफ कर दिया है कि राज्यसभा की यह सीट पार्टी के नेताओं के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो चुकी है।
गंगा किनारे से हरदा की ‘हुंकार’
गंगा पूजन के बाद भावुक हुए पूर्व मुख्यमंत्री, बोलेकृहरिद्वार से चुनाव लड़ने की है इच्छा
अंतिम फैसला परिस्थितियों पर, अंतिम यात्रा भी हरिद्वार के प्रतिनिधि के तौर पर निकले
अंतिम निर्णय उस समय की परिस्थितियों, समय, स्वास्थ्य और उम्र को देखते हुए लिया जाएगा
देहरादून। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हरिद्वार से आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताने के अगले ही दिन हरकी पैड़ी पहुंचकर मां गंगा का विधि-विधान से पूजन किया। गंगा पूजन के बाद पत्रकारों से बातचीत में रावत ने अपनी राजनीतिक इच्छा के साथ ही हरिद्वार से अपने पुराने रिश्ते को भावुक अंदाज में सामने रखा। उन्होंने कहा कि उनके मन में हरिद्वार से चुनाव लड़ने की इच्छा जरूर है, लेकिन अंतिम निर्णय उस समय की परिस्थितियों, समय, स्वास्थ्य और उम्र को देखते हुए लिया जाएगा। रावत ने इससे भी आगे बढ़कर कहा कि उनकी इच्छा है कि जीवन के अंतिम समय में उनकी अंतिम यात्रा हरिद्वार के प्रतिनिधि के तौर पर निकले। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियां तेज हो रही हैं और कांग्रेस के भीतर संभावित उम्मीदवारों तथा चुनावी नेतृत्व को लेकर मंथन का दौर चल रहा है।
हरीश रावत ने एक दिन पहले ही इंटरनेट मीडिया पोस्ट के माध्यम से हरिद्वार से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी। उन्होंने 2009 से 2014 के बीच हरिद्वार से लोकसभा प्रतिनिधित्व के दौर को अपने राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम काल बताया और कहा कि उस दौरान मतदाताओं के साथ उनके व्यक्तिगत रिश्ते बने। उन्होंने हरिद्वार को विधानसभा में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने और क्षेत्र के लिए अपनी योजनाओं पर काम करने की इच्छा भी व्यक्त की। यानी शुक्रवार को हरकी पैड़ी पहुंचना महज धार्मिक यात्रा भर नहीं रहा। इसके साथ रावत ने अपनी राजनीतिक मंशा को भी सार्वजनिक रूप से दोहराया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव लड़ने का अंतिम फैसला परिस्थितियों के अनुसार ही होगा।
हरिद्वार हरीश रावत के राजनीतिक सफर का महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। वर्ष 2009 से 2014 तक वह हरिद्वार के सांसद रहे। अब विधानसभा चुनाव से पहले उसी क्षेत्र से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताना उनके लिए राजनीतिक रूप से एक नए अध्याय की संभावना खोलता है। रावत के बयान का दूसरा पहलू कांग्रेस के लिए है। यदि वह वास्तव में हरिद्वार की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय लेते हैं तो पार्टी को संबंधित सीट के संभावित दावेदारों और स्थानीय संगठन के समीकरणों के साथ तालमेल बैठाना होगा। फिलहाल रावत ने अपनी ओर से अंतिम उम्मीदवारी घोषित नहीं की है, इसलिए इसे दावेदारी की सार्वजनिक इच्छा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
रावत की राजनीति में हरिद्वार का भावनात्मक पक्ष पहले से मौजूद रहा है। लेकिन इस बार उनका बयान ऐसे समय आया है जब चुनावी राजनीति धीरे-धीरे टिकट और सीटों के समीकरण की ओर बढ़ रही है। ऐसे में उनके हरिद्वार पहुंचने और गंगा पूजन के बाद दिए गए बयान ने उनकी राजनीतिक सक्रियता को लेकर चर्चा को जरूर तेज किया है। हाल के दिनों में रावत ने 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी के निर्णय को सर्वाेपरि बताते हुए कांग्रेस की चुनावी भूमिका पर भी बात की है। इससे संकेत मिलता है कि वह चुनावी राजनीति से अपने जुड़ाव को सार्वजनिक रूप से बनाए हुए हैं। रावत यदि हरिद्वार से चुनाव लड़ने का निर्णय लेते हैं तो कांग्रेस के सामने दो स्तरों पर समीकरण साधने की चुनौती होगी। पहला, संबंधित विधानसभा सीट का स्थानीय संगठन और संभावित दावेदार। दूसरा, रावत के लंबे राजनीतिक अनुभव और उनके समर्थक आधार को चुनावी रणनीति में किस तरह जोड़ा जाए।
हालांकि अभी कांग्रेस ने हरिद्वार की किसी सीट से रावत की उम्मीदवारी घोषित नहीं की है। इसलिए फिलहाल यह मामला हरीश रावत की इच्छा बनाम कांग्रेस के अंतिम निर्णय के बीच है। हरीश रावत ने हरिद्वार के साथ अपने पुराने राजनीतिक रिश्ते को याद करते हुए जिस तरह अपनी बात रखी है, उसमें व्यक्तिगत भावना और राजनीतिक संकेत दोनों दिखाई देते हैं। एक तरफ वह हरिद्वार को अपने राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय बता रहे हैं, दूसरी तरफ चुनाव लड़ने के अंतिम निर्णय को पार्टी और परिस्थितियों पर छोड़ रहे हैं। लेकिन उनकी यह सार्वजनिक इच्छा अब कांग्रेस की चुनावी चर्चा का हिस्सा बन चुकी है।गंगा के किनारे खड़े होकर हरीश रावत ने सिर्फ अपनी पुरानी यादें नहीं दोहराईं, बल्कि 2027 की राजनीति के लिए हरिद्वार का दरवाजा भी अपने लिए खुला रखा है। अब देखना यह होगा कि यह इच्छा चुनावी मैदान तक पहुंचती है या कांग्रेस का अंतिम निर्णय कोई दूसरा रास्ता तय करता है।
रविवार को ‘कैद’
आरबीआई की मंजूरी से कर्मचारियों की छुट्टी खत्म
27 सितंबर को बैंक खोलने के फैसले पर कानूनी पेच
सेवा शर्तों व साप्ताहिक अवकाश को लेकर उठे सवाल
देहरादून। देशभर में प्रस्तावित राष्ट्रव्यापी बैंक हड़ताल से ठीक पहले 27 सितंबर, रविवार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को खोलने के केंद्र सरकार के फैसले ने नया कानूनी सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि रविवार को बैंक खोला जा सकता है या नहीं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय रिजर्व बैंक की मंजूरी के आधार पर बैंक प्रबंधन अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को रविवार को अनिवार्य रूप से ड्यूटी करने के लिए बाध्य कर सकता है? अधिवक्ता डा. बैजनाथ के अनुसार दोनों सवालों का जवाब एक जैसा नहीं है और विवाद का असली केंद्र कर्मचारियों की सेवा शर्तें तथा साप्ताहिक अवकाश का अधिकार है।
वित्त मंत्रालय की आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक आरबीआई ने 27 सितंबर को बैंक शाखाओं, कार्यालयों, एटीएम-लिंक शाखाओं और करेंसी चेस्ट को संचालित रखने की मंजूरी दी है। सरकार ने इसका कारण 28 से 30 सितंबर की प्रस्तावित बैंक हड़ताल के बीच बैंकिंग सेवाओं की निरंतरता बनाए रखना बताया है। यानी लगातार कई दिनों तक बैंक बंद रहने से ग्राहकों को होने वाली परेशानी को देखते हुए रविवार को बैंकिंग व्यवस्था चालू रखने का फैसला किया गया है। लेकिन यहीं से कर्मचारियों के अधिकारों का सवाल सामने आता है।
डा.बैजनाथ के मुताबिक नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 25 में रविवार को सार्वजनिक अवकाश माना गया है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि रविवार को बैंकिंग कारोबार करना ही गैरकानूनी है। आरबीआई के बैंकिंग संबंधी निर्देशों में भी रविवार को बैंकिंग संचालन की व्यवस्था का उल्लेख है। इसलिए केवल रविवार होने के आधार पर 27 सितंबर को बैंक खोलने के फैसले को चुनौती देना कमजोर कानूनी आधार हो सकता है। असल सवाल कर्मचारी से अनिवार्य काम कराने का है। आरबीआई की ओर से बैंक शाखाओं को संचालित रखने की मंजूरी को कर्मचारियों को व्यक्तिगत रूप से रविवार को ड्यूटी करने का स्वतः आदेश नहीं माना जा सकता। बैंक कर्मचारियों की सेवा शर्तें बाइपार्टाइट सेटलमेंट, ज्वाइंट नोट, सेवा नियमों और अन्य लागू औद्योगिक समझौतों से भी निर्धारित होती हैं। ऐसे में बैंक प्रबंधन द्वारा रविवार की अनिवार्य ड्यूटी का आदेश जारी किए जाने पर उसके कानूनी आधार की जांच जरूरी होगी।
मामला साप्ताहिक अवकाश के अधिकार से भी जुड़ता है। आक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड, 2020 में साप्ताहिक विश्राम और कार्य दिवसों से संबंधित प्रावधान हैं। रविवार को कर्मचारी से काम लिया जाता है तो यह देखना होगा कि उसे वैधानिक वैकल्पिक या प्रतिपूरक अवकाश दिया गया है या नहीं, उसके काम के घंटे निर्धारित सीमा में हैं या नहीं और ओवरटाइम संबंधी प्रावधानों का पालन हुआ है या नहीं। डा. बैजनाथ के मुताबिक आरबीआई के अपने निर्देशों में भी बैंकिंग समय अथवा कार्य दिवसों में बदलाव करते समय लागू स्थानीय कानूनों और कर्मचारियों से संबंधित औद्योगिक पुरस्कारों एवं समझौतों का पालन करने की आवश्यकता को मान्यता दी गई है। ऐसे में आरबीआई की प्रशासनिक मंजूरी को कर्मचारियों के पहले से लागू सेवा अधिकारों से ऊपर मान लेना अपने आप में सवाल खड़ा कर सकता है।
हड़ताल से ठीक पहले रविवार को काम कराने का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा संबंध बैंक यूनियनों के प्रस्तावित औद्योगिक आंदोलन से है। सरकार इसे बैंकिंग सेवाओं की निरंतरता बनाए रखने का कदम बता रही है, जबकि कर्मचारियों की दृष्टि से वास्तविक सवाल यह होगा कि रविवार की ड्यूटी किस वैधानिक और सेवा नियम के तहत अनिवार्य की गई है। इसलिए विवाद का केंद्र अब बैंक रविवार को खुलेगा या नहीं से ज्यादा रविवार को कर्मचारी से किस अधिकार के तहत काम कराया जाएगा बन गया है। यदि किसी बैंक का आदेश लागू बाइपार्टाइट सेटलमेंट, ज्वाइंट नोट, सेवा नियमों अथवा साप्ताहिक विश्राम संबंधी वैधानिक प्रावधानों से टकराता है और उसके अनुरूप प्रतिपूरक अवकाश की व्यवस्था नहीं है, तो उसकी वैधानिकता को चुनौती देने का गंभीर आधार बन सकता है। अंतिम स्थिति संबंधित बैंक के वास्तविक आदेश और उस पर लागू सेवा शर्तों की जांच के बाद ही तय होगी।
शुक्रवार, 25 सितंबर 2026
udaydinmaan: निर्वाचन आयोग में ‘दरार’
udaydinmaan: निर्वाचन आयोग में ‘दरार’: वोट चोरी के आरोपों के बीच निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट ने बढ़ाया सियासी तापमान गंभीर आरोपों और विपक्ष के हमलों के बीच विवाद का एक औ...
निर्वाचन आयोग में ‘दरार’
वोट चोरी के आरोपों के बीच निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट ने बढ़ाया सियासी तापमान
गंभीर आरोपों और विपक्ष के हमलों के बीच विवाद का एक और महत्वपूर्ण पक्ष भी आया सामने
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने खोला मोर्चा,अब सवाल संस्था की विश्वसनीयता का
देहरादून। चुनावी राजनीति में वोट चोरी के आरोपों के बीच निर्वाचन आयोग को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, फार्म-6 में बदलाव तथा मतदाता सूची से जुड़े तकनीकी तंत्र जैसे महत्वपूर्ण विषयों से था। रिपोर्ट सामने आते ही विपक्ष ने इसे निर्वाचन आयोग के भीतर गंभीर मतभेद का संकेत बताते हुए केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर हमला तेज कर दिया है। विपक्षी दलों की ओर से अब मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संसदीय प्रक्रिया शुरू करने की बात भी सामने आई है। लेकिन इस पूरे विवाद में एक दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
निर्वाचन आयोग ने रिपोर्ट के बाद स्पष्ट किया कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय और सुझाव आना निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। आयोग के मुताबिक पिछले एक वर्ष में लिए गए निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए और केवल कुछ आंतरिक टिप्पणियों को सामने रखकर पूरी प्रक्रिया की तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। यानी अब राजनीतिक सवाल सीधे निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर आ खड़ा हुआ हैकृकि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार आपत्ति दर्ज की, तो उन आपत्तियों पर क्या हुआ? क्या उन्हें स्वीकार किया गया? क्या उन्हें खारिज किया गया?अगर खारिज किया गया तो उसके कारण क्या थे?और सबसे बड़ा सवालकृक्या इन आपत्तियों से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किए जा सकते हैं?यही सवाल इस पूरे विवाद को गंभीर बनाता है।
मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि आपत्तियां किसी सामान्य प्रशासनिक फैसले को लेकर नहीं थीं। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने तथा मतदाता डेटा की तकनीकी व्यवस्था जैसे चुनावी प्रक्रिया के मूल हिस्से शामिल थे। वहीं, आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक वैधानिक प्रक्रिया है और मतदाता सूची को अद्यतन करना उसका संवैधानिक दायित्व है। एसआईआर को लेकर विपक्ष लंबे समय से सवाल उठा रहा है, जबकि आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है। यहीं से वोट चोरी की राजनीतिक बहस और निर्वाचन आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता एक-दूसरे से जुड़ जाती है।
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलावों का इस्तेमाल चुनावी लाभ के लिए किया जा सकता है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता और सत्यापन चुनाव प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा है। इन दोनों दावों के बीच असली कसौटी दस्तावेज और पारदर्शिता है। लोकतंत्र में चुनाव आयोग पर सवाल उठना अपने आप में लोकतंत्र का संकट नहीं है। बल्कि किसी भी संवैधानिक संस्था से सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। संकट तब पैदा होता है जब सवालों के जवाब अस्पष्ट रह जाएं और संस्था के भीतर की असहमति पर भी जनता को पर्याप्त जानकारी न मिले। 14 आपत्तियों की खबर ने इसी पारदर्शिता की मांग को और बड़ा कर दिया है।
राजनीतिक रूप से देखें तो विपक्ष को इसमें सरकार और चुनाव आयोग पर हमला करने का नया आधार मिला है। दूसरी ओर सत्तापक्ष और आयोग के पास यह कहने का आधार है कि आंतरिक विमर्श को संस्थागत मतभेद या निर्णयों की वैधता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। आयोग ने खुद कहा है कि अलग-अलग राय निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए। लेकिन जनता के लिए सवाल इससे आगे का है।
चुनाव कौन जीतता है, यह बाद का सवाल है। चुनाव कैसे हुआ और हर मतदाता को अपने वोट के अधिकार का समान अवसर मिला या नहींकृयह उससे पहले का सवाल है। यही कारण है कि वोट चोरी जैसे राजनीतिक नारों से ऊपर उठकर मतदाता सूची, एसआईआर और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की स्वतंत्र और तथ्याधारित पड़ताल जरूरी है। चुनाव आयोग देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का निर्णायक प्रहरी है। उसकी विश्वसनीयता किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्षकृदोनों की चुनावी वैधता अंततः उसी व्यवस्था से आती है। इसलिए 14 आपत्तियों की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यही हैकृकि अब बहस आरोप बनाम आरोप की नहीं, दस्तावेज बनाम दस्तावेज की होनी चाहिए। यदि आपत्तियां गलत थीं तो उनके खारिज किए जाने का पूरा आधार सामने आए। यदि आपत्तियों में दम था तो सुधार की प्रक्रिया सार्वजनिक हो और यदि आयोग के सभी निर्णय वास्तव में सर्वसम्मति से हुए, तो उन फैसलों की प्रक्रिया और संबंधित रिकार्ड जनता के सामने रखने में संकोच नहीं होना चाहिए। क्योंकि चुनाव में हारने वाला दल पांच साल इंतजार कर सकता है, लेकिन मतदाता का खोया हुआ भरोसा लोकतंत्र के लिए कहीं ज्यादा महंगा पड़ता है। वोट चोरी का आरोप सच है या राजनीतिक नाराकृइसका फैसला राजनीतिक मंच नहीं, पारदर्शी तथ्य और संवैधानिक प्रक्रिया ही कर सकती है।
गुरुवार, 24 सितंबर 2026
udaydinmaan: उत्तराखंड में चुनावी उल्टी गिनती शुरू
udaydinmaan: उत्तराखंड में चुनावी उल्टी गिनती शुरू: मिशन-2027 के लिए बूथ तक पहुंच गई है भाजपा कांग्रेस ने भी तेज की सरकार को घेरने की कवायद देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की उल्ट...
उत्तराखंड में चुनावी उल्टी गिनती शुरू
मिशन-2027 के लिए बूथ तक पहुंच गई है भाजपा
कांग्रेस ने भी तेज की सरकार को घेरने की कवायद
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। चुनाव आयोग की घोषणा अभी बाकी है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनावी मौसम दस्तक दे चुका है। सत्ता की हैट्रिक के लक्ष्य के साथ भाजपा संगठन को बूथ से लेकर घर तक सक्रिय करने में जुटी है, तो कांग्रेस सरकार के कामकाज, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था और जनसरोकारों के मुद्दों को लेकर मैदान तैयार कर रही है। विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल मार्च 2027 में पूरा होना है। सामान्य चुनावी कार्यक्रम के हिसाब से इससे पहले मतदान होना है। फिलहाल समय से पहले चुनाव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में आने वाले महीने दोनों प्रमुख दलों के लिए संगठन, मुद्दों और उम्मीदवारों की जमीन तैयार करने के लिहाज से निर्णायक होंगे।
भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। पार्टी ने बूथ सशक्तीकरण, शक्ति केंद्रों की बैठक और घर-घर संपर्क जैसे कार्यक्रमों को गति दी है। सितंबर में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उत्तराखंड दौरे के दौरान भी संगठन और आगामी चुनाव की रणनीति पर मंथन हुआ। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने का नहीं, बल्कि सत्ता में लगातार दो कार्यकाल के बाद स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाली नाराजगी और अपेक्षाओं को साधने का भी होगा। पार्टी विकास, सांस्कृतिक पहचान और सरकार के फैसलों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस भी अब चुनावी तैयारी को गति दे रही है। प्रदेश संगठन को मजबूत करने, मोर्चों और विभागों को सक्रिय करने तथा राज्यभर में जनसंपर्क बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महिला सुरक्षा और सरकार के कामकाज को प्रमुख मुद्दों के रूप में उठा रहा है।
राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के प्रस्तावित दौरों से भी कांग्रेस चुनावी माहौल को गर्म करने की तैयारी में है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि सरकार विरोधी मुद्दों को केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित न रखते हुए उन्हें बूथ स्तर के संगठन और स्थानीय नेतृत्व के साथ किस तरह जोड़ा जाए। 2027 का चुनाव केवल सत्ता और विपक्ष की पारंपरिक लड़ाई तक सीमित रहने के संकेत नहीं दे रहा। उत्तराखंड में भू-कानून, मूल निवास, पलायन, रोजगार, भर्ती परीक्षाएं, महिला सुरक्षा, चारधाम और पर्यटन, ग्रामीण सड़कें, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा राज्य की सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दे पहले ही राजनीतिक विमर्श में जगह बना चुके हैं। हल्द्वानी रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच हुआ विवाद भी राजनीतिक टकराव का हिस्सा बन चुका है। इस मुद्दे को लेकर दोनों दलों की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आई हैं।
भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई के बावजूद क्षेत्रीय और छोटे दलों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड क्रांति दल समेत अन्य राजनीतिक संगठन अपने-अपने मुद्दों के साथ चुनावी जमीन तलाश रहे हैं। कई सीटों पर तीसरे विकल्प की मौजूदगी मुकाबले का गणित प्रभावित कर सकती है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, टिकटों को लेकर दलों के भीतर दावेदारियों का दबाव बढ़ेगा। मौजूदा विधायकों का प्रदर्शन, स्थानीय संगठन की स्थिति, जातीय-सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय असंतोष और जीत-हार का पिछला रिकार्ड टिकट वितरण में महत्वपूर्ण कारक बन सकते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ और मैदान का संतुलन हमेशा अहम रहा है। कुमाऊं और गढ़वाल के साथ मैदानी जिलों की राजनीतिक प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं। ऐसे में कोई भी दल केवल राज्यव्यापी नारे के सहारे चुनावी गणित नहीं साध सकता।
चुनावी शंखनाद चाहे दल कर रहे हों, अंतिम फैसला मतदाता को करना है। आने वाले महीनों में राजनीतिक दल अपने-अपने दावे जनता के सामने रखेंगे। भाजपा अपने कार्यकाल और नीतियों का हिसाब देगी, कांग्रेस सरकार की कमियां गिनाएगी और क्षेत्रीय दल अपने मुद्दों को केंद्र में लाने की कोशिश करेंगे। अब उत्तराखंड की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू हो चुका हैकृदावों से ज्यादा उनके प्रमाण, नारों से ज्यादा जमीन पर काम और आरोपों से ज्यादा जनता के सवालों का जवाब। 2027 का चुनाव अभी दूर दिखाई देता है, लेकिन उसकी राजनीतिक घड़ी चल पड़ी है। अब हर बूथ पर सवाल होगा, हर सीट पर गणित होगा और हर दल को अपने दावों का हिसाब जनता के सामने रखना होगा।
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