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गुरुवार, 13 अगस्त 2026
udaydinmaan: पहाड़ में संकट मोचन है ‘उचणा’
udaydinmaan: पहाड़ में संकट मोचन है ‘उचणा’: यह परंपरा है पहाड़ के इंसान को मानसिक ढाढस देने वाली लोक-आस्था सदियों पुरानी मान्यता है बीमारी और विपदा में बनती है देव-शरण सहारा आधुनिकता ...
पहाड़ में संकट मोचन है ‘उचणा’
यह परंपरा है पहाड़ के इंसान को मानसिक ढाढस देने वाली लोक-आस्था
सदियों पुरानी मान्यता है बीमारी और विपदा में बनती है देव-शरण सहारा
आधुनिकता के दौर में भी पहाड़ के जीवन में देव-कोप का अटूट विश्वास
पहाड़ में बीमारी का इलाज सिर्फ दवा नहीं, होता है देवता पर भरोसा से भी
देहरादून। उचणा...पहाड़ की बोली का यह छोटा-सा शब्द अपने भीतर एक पूरा लोकविश्वास समेटे हुए है। ऐसा विश्वास, जिसे समझने के लिए पहाड़ के किसी पुराने गांव की चौखट पर बैठना पड़ेगा। किसी बुजुर्ग से पूछना पड़ेगा कि जब घर में अचानक कोई बीमार पड़ जाए, परेशानी खत्म होने का नाम न ले या एक के बाद एक संकट सामने आने लगें तो आखिर गांव के लोग क्या कहते थे? जवाब शायद बहुत सहज होगाकृदेवता नाराज हो गए होंगे और फिर उसी बातचीत में कोई बुजुर्ग मुस्कुराते हुए कह सकता हैकृकि हम तो उचणा से भी ठीक ह्वै जांदा। बस, यही है पहाड़ का उचणा। यह कोई चिकित्सकीय शब्द नहीं। न इसका कोई वैज्ञानिक पैमाना है। यह पहाड़ की लोकमान्यता हैकृपीढ़ियों से चली आ रही वह आस्था, जिसमें बीमारी या बड़ी परेशानी को कभी-कभी देवता की नाराजगी से जोड़कर देखा जाता है और देवता की शरण में जाकर संकट से मुक्ति की कामना की जाती है।
आज किसी को बुखार हो तो डाक्टर है, जांच है, दवा है। बीमारी का कारण जानने के लिए चिकित्सा विज्ञान है। लेकिन पहाड़ के पुराने गांवों में तस्वीर कुछ अलग थी। अस्पताल दूर थे। सड़क नहीं थी। रात में तबीयत बिगड़ जाए तो गांव से बाहर निकलना भी चुनौती था। ऐसे में बीमारी परिवार के लिए केवल स्वास्थ्य की समस्या नहीं, बल्कि पूरा संकट बन जाती थी और जब बीमारी लंबी खिंचती, घर में दूसरी परेशानी आ जाती या तमाम कोशिशों के बाद भी राहत नहीं मिलती तो बुजुर्गों की नजर एक बार देवता की ओर जरूर जाती। कहीं देवता नाराज तो नहीं? यह सवाल उस दौर के पहाड़ी समाज में असामान्य नहीं था। फिर देवस्थान की ओर कदम बढ़ते थे। पहाड़ में देवता घर से बाहर नहीं थे। वह गांव के बीच थे, खेतों के पास थे, जंगल और पानी के स्रोतों से जुड़े थे और लोगों की सामूहिक स्मृति में बसे थे। किसी परिवार पर संकट आया तो देवस्थान में जाना, पूजा-अर्चना करना, मन्नत मांगना या स्थानीय परंपरा के अनुसार देवता से जुड़ी प्रक्रिया अपनाना उसी सामाजिक जीवन का हिस्सा था। मकसद थाकृदेवता की नाराजगी दूर हो और घर पर फिर से सुख-शांति लौटे। इसलिए उचणा रखने के बाद डर खत्म हो जाता था। क्योंकि इसमें एक उम्मीद भी है। अगर देवता नाराज हुए हैं तो उन्हें मनाया भी जा सकता है। अगर संकट देवता की नाराजगी का संकेत है तो देवता की कृपा से रास्ता भी निकल सकता है। शायद इसी भरोसे से पहाड़ का बुजुर्ग कहता थाकृहम तो उचणा से भी ठीक ह्वै जांदा।
इस एक वाक्य को गौर से सुनिए। हम तो उचणा से भी ठीक ह्वै जांदा। इसमें पहाड़ की वह मानसिकता छिपी है, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद को बचाए रखा। यहां ठीक होना सिर्फ बीमारी से बाहर निकलना नहीं है। यह संकट के बाद जीवन के फिर पटरी पर लौटने का भरोसा है। देवता नाराज हो सकते हैं, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। संकट आ सकता है, लेकिन हमेशा नहीं रहेगा। यही विश्वास पहाड़ के लोगों को कठिन समय में मानसिक सहारा देता रहा। आज पहाड़ बदल चुका है। गांवों तक सड़कें पहुंची हैं। अस्पताल हैं। मोबाइल है। इंटरनेट है। नई पीढ़ी बीमारी के कारणों को विज्ञान की नजर से देखती है। लेकिन आस्था अपनी जगह अब भी कायम है। किसी घर में बीमार व्यक्ति का इलाज अस्पताल में चल रहा है और उसी परिवार का कोई सदस्य देवस्थान में जाकर दिया जला रहा हैकृयह दृश्य पहाड़ में आज भी असामान्य नहीं है। यानी पहाड़ ने हमेशा जरूरी नहीं समझा कि उसे दवा या देवता में से किसी एक को चुनना है। वह दोनों को अपने जीवन में जगह देता रहा। दवा शरीर के लिए है। देवता मन के भरोसे के लिए और संकट के समय दोनों की जरूरत महसूस हो सकती है।
कई जगह इस लोकमान्यता का संबंध केवल बीमारी से नहीं, बल्कि परिवार पर आने वाली किसी बड़ी परेशानी या लगातार घट रही अनहोनी जैसी घटनाओं से भी जोड़ा जाता रहा है। घर में बार-बार परेशानी हो रही है। काम बिगड़ रहे हैं। परिवार में संकट खत्म नहीं हो रहा। तब कोई बुजुर्ग कह सकता हैकृकि कुछ तो उचणा है और फिर सवाल बीमारी से हटकर देवता तक पहुंच जाता है। यही वह जगह है जहां उचणा एक शब्द से बढ़कर लोकविश्वास का संकेत बन जाता है। पहाड़ से लोग निकले तो सिर्फ घर नहीं छूटे। बोलियां छूटीं। कहानियां छूटीं। लोकगीत छूटे। देवस्थल से जुड़ी कई परंपराएं छूटीं और ऐसे ही कई शब्द भी पीछे रह गए, जिन्हें अगली पीढ़ी शायद समझ भी न पाए। उचणा उन्हीं शब्दों में से एक है। आज शहर में पली-बढ़ी पहाड़ की नई पीढ़ी से पूछा जाए कि उचणा क्या होता है, तो शायद कई चेहरों पर सवाल दिखाई देगा। लेकिन गांव में किसी बुजुर्ग से पूछिए। वह बिना शब्दकोश खोले बता देगा। फिर शायद कोई अपनी जिंदगी का किस्सा भी सुनाएगाकृ फलां साल घर में बड़ी परेशानी आई थी... सबने कहा देवता उचणा गए हैं... फिर देवस्थान गए... सब ठीक हो गया। वह घटना वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। लेकिन उसके लिए वह जीवन का अनुभव है। यही लोकविश्वास की ताकत है।
उचणा को बचाने का मतलब किसी मान्यता को सही या गलत साबित करना नहीं है। जरूरत इस बात की है कि पहाड़ के ऐसे शब्दों और उनसे जुड़ी लोकस्मृतियों को दर्ज किया जाए। क्योंकि किसी समाज की पहचान केवल उसके पहाड़, नदियों और मंदिरों से नहीं होती। उसकी पहचान उसकी बोली में छिपी स्मृतियों से भी होती है। उचणा ऐसी ही एक स्मृति है। एक ऐसा शब्द जिसमें बीमारी का डर है, देवता की नाराजगी का विश्वास है, संकट से निकलने की उम्मीद है और सबसे बढ़करकृमुश्किल समय में टूटने से इनकार करता पहाड़ का मन है। इसलिए जब अगली बार किसी पुराने पहाड़ी गांव में कोई बुजुर्ग कहेकृ हम तो उचणा से भी ठीक ह्वै जांदा... तो इसे सिर्फ एक वाक्य समझकर आगे मत बढ़ जाइएगा। उस एक वाक्य में पहाड़ की कई पीढ़ियों की आस्था, अनुभव और उम्मीद बोल रही होगी। शायद यही किसी लोकशब्द की सबसे बड़ी ताकत हैकृवह छोटा होता है, लेकिन उसके भीतर पूरा पहाड़ समाया होता है।
बयानों में ‘चर्चा’ और सवालों पर ‘ताला’
सरकार का दावाकृहर सवाल पर बहस को तैयार, विपक्ष की जिद
नीति-निर्माण के बजाय आरोपों और तमाशों का केंद्र बनी संसद
भाग कौन रहा जवाब देने से बचती सरकार या हंगामा करता विपक्ष
नई दिल्ली। संसद चलाने की जिम्मेदारी किसकी है? सरकार की, विपक्ष की या दोनों की? यह सवाल हर मानसून सत्र में लौटकर आता है और हर बार जवाब की जगह आरोपों की नई फाइल खुल जाती है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि मोदी सरकार संसद में हर प्रकार की चर्चा के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि वह संसद में किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं, लेकिन विपक्ष चर्चा ही नहीं होने देना चाहता। भाजपा और मोदी सरकार की ओर से लगातार यही कहा जा रहा है कि विपक्ष संसद चलने दे, सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। बयान सुनने में सीधा है। लेकिन लोकतंत्र में असली सवाल बयान से आगे शुरू होता है। अगर सरकार हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार है तो विपक्ष को चर्चा से भागने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? और अगर विपक्ष चर्चा चाहता है तो फिर संसद को बाधित करना ही उसका रास्ता क्यों बन जाता है?
संसद कोई टीवी स्टूडियो नहीं है, जहां दो लोग एक-दूसरे की आवाज दबाकर घर चले जाएं। संसद वह जगह है जहां जनता के सवालों का रिकॉर्ड बनना चाहिए। वहां सवाल पूछे जाएं, सरकार जवाब दे, विपक्ष जवाब पर सवाल उठाए और देश देखे कि किसके पास तथ्य हैं और किसके पास सिर्फ नारे। लेकिन आज संसद के भीतर भी राजनीति का एक अजीब दृश्य दिखाई देता है। सरकार कहती हैकृहम चर्चा के लिए तैयार हैं। विपक्ष कहता है पहले हमारी मांग मानिए। सरकार कहती हैकृसदन चलने दीजिए। विपक्ष कहता हैकृपहले हमारे मुद्दे पर चर्चा कराइए और इस रस्साकशी के बीच वह नागरिक खड़ा है, जिसके वोट से संसद बनी है। वह पूछता हैकृमेरे सवाल पर चर्चा कब होगी?
अमित शाह का बयान अपने आप में विपक्ष के लिए राजनीतिक चुनौती है। यदि सरकार सचमुच हर विषय पर चर्चा के लिए तैयार है तो विपक्ष के सामने अब दो रास्ते हैंकृसंसद में जाकर सवाल पूछे या फिर सदन के बाहर खड़े होकर सवाल पूछता रहे। लोकतंत्र में माइक बंद होने से सवाल खत्म नहीं होते। लेकिन दूसरी तरफ सरकार के लिए भी यह कहना पर्याप्त नहीं कि वह चर्चा के लिए तैयार है। लोकतंत्र में तैयारी का प्रमाण सार्थक बहस होती है। किसी मुद्दे पर चर्चा कितने घंटे हुई? कितने सांसदों को बोलने का अवसर मिला? सरकार ने विपक्ष के सवालों का क्या जवाब दिया? कौन से सुझाव स्वीकार किए गए? कौन से सवाल अनुत्तरित रह गए? यही असली परीक्षा है। क्योंकि संसद में सिर्फ यह कहना कि हम चर्चा के लिए तैयार हैं उतना ही आसान है, जितना विपक्ष का यह कहना कि सरकार चर्चा से भाग रही है। मुश्किल है दोनों पक्षों का सदन में बैठकर जनता के सामने जवाब देना।
जब सदन नहीं चलता तो नुकसान सिर्फ सांसदों का नहीं होता। उस किसान का सवाल भी रुकता है जो अपनी फसल की कीमत जानना चाहता है। उस छात्र का सवाल भी रुकता है जो परीक्षा व्यवस्था पर जवाब चाहता है। उस युवा का सवाल भी रुकता है जो नौकरी के आंकड़े पूछना चाहता है। उस परिवार का सवाल भी रुकता है जो महंगाई के बीच अपना घरेलू बजट संभाल रहा है और उस नागरिक का सवाल भी रुकता है जो जानना चाहता है कि उसके टैक्स का पैसा कहां खर्च हो रहा है। इसलिए संसद का हर मिनट केवल राजनीतिक समय नहीं है। वह जनता का समय है। जनता ने सांसदों को संसद भेजा है ताकि वह बहस करें। नारे लगाने के लिए नहीं। सरकार को जवाब देने के लिए भेजा है। सिर्फ सरकारी उपलब्धियां गिनाने के लिए नहीं। विपक्ष को सवाल पूछने के लिए भेजा है। सिर्फ हंगामा करने के लिए नहीं।
सरकार के खिलाफ सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है। सरकार का जवाब देना उसका दायित्व है। विपक्ष का विरोध लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है। लेकिन विरोध अगर बहस का रास्ता बंद कर दे तो सवाल उठेगा कि फिर लोकतंत्र में संवाद कहां होगा? और सरकार अगर बहस को सिर्फ औपचारिकता बना दे तो सवाल विपक्ष से आगे बढ़कर सरकार से भी पूछा जाएगा। संसद में असहमति होनी चाहिए। बहस तीखी होनी चाहिए। सरकार से असहज सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन अंत में सदन चलना चाहिए। क्योंकि संसद का मतलब ही हैकृबात करना, जिस देश में संसद में बात नहीं होगी, वहां सवाल सड़क पर आएंगे और जब सवाल सड़क पर आते हैं तो राजनीति ज्यादा शोर करती है, लेकिन लोकतंत्र कम सुनता है।
अमित शाह ने विपक्ष से सदन चलने देने की अपील की है। यह अपील केवल विपक्ष के लिए नहीं, सत्ता पक्ष के लिए भी एक अवसर है। सदन चलाइए। विपक्ष को पर्याप्त समय दीजिए। कठिन सवालों के जवाब दीजिए। आंकड़े रखिए। दस्तावेज रखिए, जहां सरकार सही है, वह बताए कि क्यों सही है। जहां गलती हुई है, वहां यह भी बताए कि उसे कैसे सुधारा जाएगा और विपक्ष भी अपनी जिम्मेदारी निभाए। वह सिर्फ हंगामा न करे। सवालों की सूची लेकर सदन में आए। तथ्य लेकर आए। सरकार को घेरना है तो तर्क से घेरे। जनता को यह देखने दीजिए कि सत्ता के पास जवाब कितने हैं और विपक्ष के पास सवाल कितने मजबूत। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खराब स्थिति वह नहीं है जब सरकार से सवाल पूछे जाते हैं। सबसे खराब स्थिति वह है जब सवाल और जवाब दोनों संसद से बाहर निकल जाते हैं। अमित शाह कह रहे हैंकृसरकार जवाब देने को तैयार है। विपक्ष कह रहा हैकृसरकार जवाब नहीं देना चाहती। अब फैसला किसका? संसद का। लेकिन उससे भी बड़ा फैसला जनता का है। वह सब देख रही हैकृकौन चर्चा चाहता है, कौन चर्चा की शर्तें तय करना चाहता है और कौन चर्चा के नाम पर सिर्फ राजनीति करना चाहता है। संसद को चलना चाहिए। बहस होनी चाहिए। सवाल पूछे जाने चाहिए। जवाब दिए जाने चाहिए और अगर जवाब संतोषजनक न हों तो अगला सवाल और ज्यादा तीखा होना चाहिए।यही लोकतंत्र है। क्योंकि संसद में शोर की जीत नहीं होनी चाहिए।सवाल की जीत होनी चाहिए।
चेहरे बदले, सरकारें बदलीं, सवाल वहीं
उत्तराखंड के तीखे सवाल
प्रदेश में पलायन रोकने के लिए योजनाएं व समितियां भी बनीं
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अभाव में पहाड़ के गांव खाली
बच्चों की पढ़ाई व इलाज के लिए अपने ही घर-आंगन को छोड़ा
सत्ता के दावे और पहाड़ की जमीन के बीच साफ दिखता फासला
देहरादून। उत्तराखंड में सत्ता बदलती रही, चेहरे बदलते रहे, नारे बदलते रहे। कभी विकास का नारा आया, कभी पलायन रोकने का संकल्प, कभी रोजगार की गारंटी, कभी गांवों को फिर से आबाद करने का दावा। लेकिन पहाड़ का आदमी आज भी कुछ पुराने सवाल लेकर खड़ा है। इन सवालों का कोई पार्टी रंग नहीं है। न यह भाजपा के हैं, न कांग्रेस के। यह पहाड़ के सवाल हैं और शायद इसलिए सबसे ज्यादा असहज भी करते हैं। हर सरकार पलायन रोकने की बात करती है। योजनाएं बनती हैं, समितियां बनती हैं, आंकड़े जारी होते हैं। लेकिन पहाड़ का सवाल बहुत सीधा हैकृअगर गांव में रोजगार, इलाज, शिक्षा और बाजार मिल जाए तो कोई अपना घर छोड़कर क्यों जाएगा? पलायन को रोकने के लिए पहाड़ के आदमी को भाषण नहीं, स्थानीय अर्थव्यवस्था चाहिए। खेती से आमदनी चाहिए। बागवानी चाहिए। पर्यटन का लाभ गांव तक पहुंचना चाहिए। छोटे उद्योग चाहिए और सबसे जरूरीकृबच्चों की पढ़ाई और परिवार के इलाज के लिए पहाड़ छोड़ने की मजबूरी खत्म होनी चाहिए।
प्रदेश में सड़क को विकास का सबसे बड़ा प्रतीक मान लिया गया है। सड़क बनना जरूरी है, लेकिन सड़क से आगे भी जिंदगी है। किसी गांव से एंबुलेंस आने में घंटों लगते हैं तो सवाल सड़क का ही नहीं, स्वास्थ्य व्यवस्था का भी है। आज भी पहाड़ में गंभीर मरीज को डोली, कुर्सी या किसी दूसरे अस्थायी साधन से सड़क तक पहुंचाने की तस्वीरें सामने आती हैं। सरकारें मेडिकल कालेजों और अस्पतालों की घोषणाएं करती हैं। लेकिन गांव पूछता हैकृकि डाक्टर कब मिलेगा? विशेषज्ञ कब मिलेगा? दवा कब मिलेगी? और सबसे बड़ा सवालकृक्या बीमारी का इलाज कराने के लिए पहाड़ छोड़ना जरूरी रहेगा?
उत्तराखंड के युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं सिर्फ परीक्षा नहीं हैं। यह कई परिवारों की उम्मीद हैं। लेकिन जब भर्ती प्रक्रिया सवालों में घिरती है, परीक्षा की तारीख बदलती है, परिणाम अटकता है या पेपर लीक की खबर आती है तो एक छात्र का सिर्फ एक साल नहीं जाता। उसका भरोसा जाता है। सत्ता को यह समझना होगा कि सरकारी भर्ती का कैलेंडर भी सरकार की विश्वसनीयता का कैलेंडर है। विपक्ष सवाल उठाएकृजरूर उठाए। लेकिन विपक्ष को भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह भर्ती प्रक्रिया को कैसे पारदर्शी बनाएगा। सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं कि सरकार विफल है। जनता पूछेगीकृकि आप क्या करेंगे?
उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटन बढ़ रहा है। चारधाम यात्रा प्रदेश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। लेकिन एक सवाल फिर भी बचता हैकृकि जो लाखों लोग पहाड़ आते हैं, उनके खर्च का कितना हिस्सा स्थानीय गांवों तक पहुंचता है? क्या स्थानीय युवक गाइड बन रहा है? क्या गांव की महिला अपने उत्पाद बेच पा रही है? क्या स्थानीय किसान होटल और बाजार से जुड़ पा रहा है? अगर तीर्थयात्री आते हैं और पैसा कुछ चुनिंदा बाजारों तक सीमित रह जाता है, तो पर्यटन की संख्या बढ़ने के बावजूद पहाड़ की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी।
बारिश आती है। सड़क टूटती है। पुल बहता है। गांव कट जाता है। फिर राहत पहुंचती है। कुछ दिन खबरें चलती हैं। नेता मौके पर पहुंचते हैं। मुआवजे की घोषणा होती है। फिर कैमरे चले जाते हैं। लेकिन गांव वह वहीं रहता है। उसका टूटा रास्ता वहीं रहता है। उसका बंद स्कूल वहीं रहता है। उसकी मुश्किल वहीं रहती है। इसलिए सवाल सिर्फ राहत का नहीं है। सवाल यह है कि पहाड़ को हर बरसात में आपदा का इंतजार क्यों करना पड़ता है?
उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे से सवाल पूछते हैं। लेकिन अब जनता दोनों से सवाल पूछ रही है। सत्ता सेकृकि आपने पांच साल में क्या बदला? विपक्ष सेकृकि आप सत्ता में आए तो क्या बदलेंगे? सत्ता कहती है विकास हुआ। जनता पूछती हैकृकहां हुआ? विपक्ष कहता है सरकार विफल है। जनता पूछती हैकृकि आपकी वैकल्पिक योजना क्या है? सत्ता उपलब्धियां गिनाती है। विपक्ष आरोप गिनाता है और पहाड़ अपने हिस्से का हिसाब मांगता है।
2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक है। जैसे-जैसे चुनावी माहौल बनेगा, पहाड़ फिर नारों से भर जाएगा। कोई रोजगार की बात करेगा। कोई पलायन की। कोई महिला वोट की। कोई युवा की। कोई धार्मिक पर्यटन की। लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि राजनीतिक दल इन सवालों को घोषणापत्र से निकालकर नीति में बदलने का रोडमैप देते हैं या नहीं। उत्तराखंड को अब सिर्फ यह नहीं चाहिए कि कौन जीतेगा। उत्तराखंड यह जानना चाहता हैकृकि जीतने के बाद पहाड़ के लिए करेगा क्या? क्योंकि पहाड़ ने बहुत भाषण सुन लिए हैं। बहुत शिलान्यास देख लिए हैं। बहुत घोषणाएं सुन ली हैं। अब उसे परिणाम चाहिए। उसे ऐसा गांव चाहिए जहां स्कूल बंद न हो। ऐसा अस्पताल चाहिए जहां डाक्टर मिले। ऐसी सड़क चाहिए जो बरसात में गायब न हो। ऐसी भर्ती व्यवस्था चाहिए, जिसमें युवा अपने भविष्य को लेकर आशंकित न रहे और ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें पहाड़ का बच्चा रोजगार के लिए पहाड़ छोड़ने को मजबूर न हो।
उत्तराखंड के सवाल कठिन नहीं हैं। वह इतने सरल हैं कि उनका जवाब देना मुश्किल हो जाता है। रोटी कहां है? रोजगार कहां है? अस्पताल कहां है? स्कूल कहां है? गांव में आदमी क्यों नहीं है? सत्ता के पास इन सवालों के जवाब होने चाहिए। विपक्ष के पास भी। क्योंकि चुनाव में जनता सिर्फ सरकार नहीं चुनती। वह अपने सवालों का भविष्य चुनती है और इस बार पहाड़ शायद नारे कम सुनेगा। सवाल ज्यादा पूछेगा।
कागजों के फेर में फंसा वोटर, सवालों में अफसर
अपात्रों पर नकेल कसने के नाम पर आम जनता को कागजों के फेर में उलझाया
निर्वाचन नियमावली के पुनरीक्षण में लगे अफसरों के पास प्रक्रिया का जवाब नहीं
उत्तराखंड में पारदर्शिता, जवाबदेही और भरोसे पर उठ रहे हैं कई गंभीर सवाल
देहरादून। चुनाव लोकतंत्र का वह दरवाजा है, जहां से जनता सत्ता तक पहुंचती है। इस दरवाजे की कुंडी अगर पारदर्शी न हो तो सवाल केवल मतदाता सूची का नहीं रहता, सवाल लोकतंत्र के भरोसे का बन जाता है। उत्तराखंड में निर्वाचन नियमावली के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवाल इसी भरोसे से जुड़े हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य होना चाहिएकृहर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल हो और किसी अपात्र व्यक्ति का नाम न रहे। लेकिन जब इसी प्रक्रिया के दौरान आम नागरिकों को नोटिस मिलने लगें, पुराने दस्तावेज मांगे जाने लगें और लोगों को यह समझ न आए कि आखिर उनसे किस आधार पर जानकारी मांगी जा रही है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या पुनरीक्षण की प्रक्रिया वास्तव में उतनी ही पारदर्शी है, जितनी होनी चाहिए?
एक बुजुर्ग दशकों से मतदान कर रहा है। उसका नाम मतदाता सूची में है। वह चुनाव-दर-चुनाव वोट डालता आया है। अचानक उससे ऐसे दस्तावेज मांगे जाते हैं, जिन्हें जुटाना उसके लिए आसान नहीं। उसका सवाल सीधा हैकृकि जब इतने साल से मेरा वोट स्वीकार किया गया, तो अब मेरी नागरिकता या पहचान साबित करने की जिम्मेदारी अचानक मेरे कंधे पर क्यों आ गई? यही सवाल उन तमाम लोगों का है, जो पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर असमंजस में हैं। निर्वाचन सूची का पुनरीक्षण जरूरी है। फर्जी नाम हटने चाहिए। मृत लोगों के नाम हटने चाहिए। स्थान बदल चुके मतदाताओं की जानकारी दुरुस्त होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि वास्तविक मतदाता को अनावश्यक परेशानी न हो। क्योंकि मतदाता सूची सिर्फ सरकारी कागज नहीं है। यही वह सूची है, जिसके आधार पर नागरिक लोकतंत्र में अपनी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
किसी प्रक्रिया को पारदर्शी कहने के लिए यह पर्याप्त नहीं कि उसके तहत नोटिस जारी कर दिए गए। पारदर्शिता का अर्थ हैकृकि किस आधार पर नोटिस दिया गया? किस दस्तावेज की जरूरत क्यों है? दस्तावेज न होने पर क्या विकल्प है? आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है? किस अधिकारी के सामने अपील की जा सकती है? कितने समय में शिकायत का निपटारा होगा? इन सवालों के जवाब आम मतदाता तक स्पष्ट भाषा में पहुंचने चाहिए। अगर मतदाता को यह पता ही नहीं कि उससे दस्तावेज क्यों मांगा जा रहा है, तो प्रक्रिया पारदर्शी होने के बावजूद पारदर्शी दिखाई नहीं देगी और लोकतंत्र में भरोसा केवल नियमों से नहीं बनता। भरोसा प्रक्रिया की निष्पक्षता से बनता है।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य लोगों में डर पैदा करना नहीं होना चाहिए। अगर कोई बुजुर्ग यह सोचकर परेशान हो जाए कि उसके वोट पर सवाल उठ रहा है, कोई परिवार दस्तावेज जुटाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने लगे या किसी नागरिक को यह डर सताने लगे कि कहीं उसका नाम सूची से न हट जाए, तो प्रशासन को यह देखना होगा कि प्रक्रिया जमीन पर कैसी दिखाई दे रही है। कागज पर प्रक्रिया सही हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा जमीन पर होती है। ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। विपक्ष को सवाल उठाने चाहिए। यदि कहीं नियमों का दुरुपयोग हो रहा है तो उसे सामने लाना चाहिए। प्रभावित नागरिकों की आवाज उठानी चाहिए। लेकिन केवल राजनीतिक आरोप पर्याप्त नहीं होंगे। हर शिकायत की तथ्यात्मक जांच होनी चाहिए। वहीं सरकार और निर्वाचन तंत्र की जिम्मेदारी इससे भी बड़ी है। उसे स्पष्ट करना होगा कि पुनरीक्षण में कौन से नियम लागू हैं, नागरिकों से कौन-कौन से दस्तावेज मांगे जा सकते हैं और किन परिस्थितियों में किसी मतदाता के नाम पर आपत्ति दर्ज की जा सकती है। जितनी स्पष्ट जानकारी होगी, उतना कम भ्रम होगा।
सड़क टूट जाए तो बनाई जा सकती है। सरकारी योजना में गलती हो तो सुधारी जा सकती है। लेकिन चुनावी प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा कमजोर हो जाए तो उसकी कीमत बहुत बड़ी होती है। क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने का नाम नहीं है। लोकतंत्र यह भरोसा भी है किकृमेरा वोट सुरक्षित है। मेरा नाम बिना उचित प्रक्रिया के नहीं हटेगा। मेरी आपत्ति सुनी जाएगी। दूसरे नागरिक के साथ भी वही नियम लागू होंगे जो मेरे साथ लागू हुए। यही समानता लोकतंत्र की बुनियाद है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण होना चाहिए। जितनी बार जरूरत हो, उतनी बार होना चाहिए। फर्जी नाम हटने चाहिए। गलतियां सुधरनी चाहिए। नए पात्र मतदाताओं के नाम जुड़ने चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में वास्तविक मतदाता सबसे कम परेशान हो और फर्जीवाड़े की गुंजाइश सबसे कम होकृक्या इसकी पर्याप्त गारंटी है? यही वह सवाल है, जिसका जवाब निर्वाचन तंत्र को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए। क्योंकि अगर एक पात्र नागरिक दस्तावेजों के बोझ में दब जाए और दूसरी तरफ कोई अपात्र नाम व्यवस्था की कमजोरी का फायदा उठा ले, तो पुनरीक्षण अपने उद्देश्य से भटक जाएगा।
चुनाव आयोग और प्रशासन के सामने चुनौती सिर्फ सूची को साफ करने की नहीं है। चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि सफाई के नाम पर किसी वास्तविक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित न हो। उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में दस्तावेज जुटाना, कार्यालय तक पहुंचना और बार-बार सत्यापन कराना हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं है, वहां प्रक्रिया को और अधिक संवेदनशील बनाने की जरूरत है। नियम एक जैसे हों, लेकिन व्यवस्था मानवीय हो। नोटिस हो तो उसका कारण साफ लिखा हो। दस्तावेज मांगा जाए तो विकल्प भी बताया जाए। आपत्ति हो तो सुनवाई का अवसर मिले और सबसे जरूरी है कि हर कदम का रिकार्ड सार्वजनिक और जांच योग्य हो। क्योंकि चुनाव केवल राजनीतिक दलों की परीक्षा नहीं है। यह चुनावी व्यवस्था की भी परीक्षा है। आज सवाल यह नहीं कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण क्यों हो रहा है। सवाल यह है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, कितनी जवाबदेह है और आम नागरिक को उस पर कितना भरोसा है। इस भरोसे को बनाए रखना सरकार, निर्वाचन तंत्र और राजनीतिक दलकृतीनों की साझा जिम्मेदारी है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा दस्तावेज कोई पहचान पत्र नहीं होता। सबसे बड़ा दस्तावेज जनता का भरोसा होता है और इस भरोसे पर कोई भी ऐसा सवाल नहीं उठना चाहिए, जिसका जवाब देने में व्यवस्था खुद असहज हो जाए।
दिल्ली में ‘दरबार’ दून में ‘इंतजार’
‘हाईकमान’ के सहारे 2027 जीतेगी उत्तराखंड कांग्रेस, आगामी बैठक में चर्चा होगी
उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति देहरादून में नहीं, दिल्ली की बैठक में क्यों तय हो रही
दिल्ली दरबार में जुटेंगे दिग्गज, 2027 की जमीन पर रणनीति को लेकर बढ़ी हलचल
देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति इन दिनों देहरादून की सड़कों से ज्यादा दिल्ली के बैठक कक्षों में दिखाई दे रही है। प्रदेश की सियासत में अगले विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही कांग्रेस के भीतर बैठकों का दौर बढ़ गया है। दिल्ली में होने वाली बैठकों को लेकर पार्टी के नेताओं की सक्रियता ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि उत्तराखंड कांग्रेस की चुनावी रणनीति आखिर तय कहां हो रही हैकृदेहरादून में या दिल्ली में? कांग्रेस के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव महज सत्ता वापसी की लड़ाई नहीं है। यह संगठन के भीतर नेतृत्व, गुटबाजी और चुनावी रणनीति की भी परीक्षा है। ऐसे में दिल्ली में होने वाली बैठकों को प्रदेश कांग्रेस के भीतर चल रही राजनीतिक कवायद से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के खिलाफ मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार करने की है। लेकिन उससे पहले कांग्रेस को अपने घर के भीतर की जमीन मजबूत करनी होगी।
कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व के साथ बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही हैं। टिकट को लेकर दावेदारी शुरू होनी है। विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करना है। संभावित प्रत्याशियों का आकलन होना है और सबसे बड़ी बातकृकांग्रेस को यह तय करना है कि चुनाव किस चेहरे और किस मुद्दे के आसपास लड़ा जाएगा। दिल्ली में बैठकर होने वाली चर्चा का असर स्वाभाविक रूप से उत्तराखंड संगठन पर पड़ेगा। लेकिन यहीं कांग्रेस के सामने एक पुराना सवाल भी खड़ा हैकृ कि क्या दिल्ली से तय रणनीति पहाड़ की जमीन पर भी उतनी ही प्रभावी होगी?
कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ मुद्दों की कमी नहीं है। बेरोजगारी है। पलायन है। भर्ती परीक्षाओं को लेकर युवाओं की नाराजगी है। स्वास्थ्य सुविधाओं की चुनौती है। आपदा और सड़क जैसी समस्याएं हैं। महंगाई और स्थानीय रोजगार का सवाल है। लेकिन मुद्दे तभी चुनावी ताकत बनते हैं जब पार्टी उन्हें एक आवाज में जनता तक पहुंचाए। यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा है। पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। कई नेता अपने-अपने तरीके से सक्रिय हैं। समर्थकों की अपनी-अपनी राजनीतिक पसंद है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा कि 2027 के लिए कांग्रेस एकजुट चेहरा कैसे पेश करेगी?
उत्तराखंड कांग्रेस में नेतृत्व का सवाल हमेशा से संवेदनशील रहा है। कौन चुनाव का नेतृत्व करेगा? किस नेता को संगठन की बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी? किसे टिकट मिलेगा? किस नेता की भूमिका प्रदेश स्तर पर होगी? और किसकी भूमिका विधानसभा क्षेत्र तक सीमित रहेगी? इन सवालों के जवाब भले ही अभी सार्वजनिक न हों, लेकिन कांग्रेस के भीतर इन पर चर्चा तेज होना तय है। क्योंकि चुनावी राजनीति में टिकट की घोषणा से पहले ही टिकट की राजनीति शुरू हो जाती है और उत्तराखंड में यह राजनीति जितनी देहरादून में होती है, उतनी ही दिल्ली में भी।
कांग्रेस नेतृत्व अगर दिल्ली की बैठक से स्पष्ट रणनीति के साथ निकलता है तो इसका संदेश प्रदेश संगठन में जाएगा। विधानसभा स्तर पर सक्रियता बढ़ सकती है। दावेदारों को संकेत मिल सकते हैं। संगठनात्मक फेरबदल की तस्वीर साफ हो सकती है और पार्टी सरकार के खिलाफ मुद्दों को लेकर ज्यादा आक्रामक हो सकती है। लेकिन केवल दिल्ली की बैठक से चुनाव नहीं जीता जाता। चुनाव जीतने के लिए पहाड़ के गांव तक जाना पड़ेगा। चौक-चौराहों पर जनता के सवाल सुनने होंगे। युवा के हाथ में रोजगार का सवाल पकड़ना होगा। महिला के सामने महंगाई और सुरक्षा के सवाल पर जवाब रखना होगा। पलायन से खाली होते गांवों के बीच जाकर पूछना होगा कि कांग्रेस सत्ता में आई तो बदलेगा क्या?
भाजपा के पास सरकार है, संगठन है और सत्ता की मशीनरी का अनुभव है। कांग्रेस के सामने चुनौती इसलिए बड़ी है क्योंकि उसे विपक्ष में रहते हुए सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के साथ अपना संगठन भी मजबूत करना है। सबसे बड़ी गलती कांग्रेस यह करेगी कि वह चुनाव को केवल भाजपा हटाओ के नारे तक सीमित कर दे। जनता पूछेगीकृकि भाजपा को हटाकर आप करेंगे क्या? कांग्रेस को इस सवाल का जवाब अभी से तैयार करना होगा। सिर्फ सरकार की कमियां गिनाना आसान है। विकल्प देना मुश्किल। इसलिए दिल्ली में होने वाली बैठक को सिर्फ एक सामान्य संगठनात्मक बैठक मानना शायद सही नहीं होगा। यह बैठक कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक दिशा तय करने का मौका है। अगर केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश के नेताओं को साथ बैठाकर स्पष्ट रणनीति बनाई, गुटों के बीच संवाद बढ़ाया, संगठन को सक्रिय किया और चुनावी मुद्दों पर सहमति बनाई तो कांग्रेस के लिए यह बैठक अहम मोड़ साबित हो सकती है। लेकिन अगर बैठक के बाद भी वही पुराने आरोप-प्रत्यारोप, टिकट की खींचतान और नेतृत्व को लेकर अस्पष्टता जारी रही तो दिल्ली की बैठक भी कांग्रेस की लंबी राजनीतिक बैठकों की सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगी।
उत्तराखंड की राजनीति अब 2027 की ओर बढ़ रही है। दिल्ली में बैठकर रणनीति बन सकती है। लेकिन उसका फैसला देहरादून में नहीं, पहाड़ की जनता के बीच होगा। वहां सवाल बहुत सीधे हैंकृ कौन लड़ेगा? किस मुद्दे पर लड़ेगा? किस चेहरे के साथ लड़ेगा? और सबसे बड़ा सवालकृ कि अगर जनता ने मौका दिया तो कांग्रेस बदलेगी क्या? दिल्ली की बैठक का असली जवाब इन्हीं सवालों में छिपा है।
सरकारी ‘सर्कस’ में सयारा का ‘सरेंडर’
---डेढ़ लाख के बजट ने तोड़ दिया उत्तराखंड की बेटी का इंटरनेशनल सपना
---रोमानिया में होने वाली अंतरराष्ट्रीय ताइक्वांडो स्पर्धा के लिए हुआ था चयन
---युवा संवाद में छात्रा सयारा के आंसुओं ने सरकारी वादों की पोल खोल दी
---तिरंगा लहराने का सपना देखने वाली बेटी को अफसरों ने मोहताज बनाया
देहरादून। उत्तराखंड में खेल प्रतिभाओं और सरकारी व्यवस्था को लेकर एक छात्रा की मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने कही गई बात ने सियासी बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री से युवा संवाद कार्यक्रम के दौरान देहरादून की छात्रा सयारा ने भावुक होकर बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर खेलने के बाद उसका चयन रोमानिया में होने वाली अंतरराष्ट्रीय ताइक्वांडो प्रतियोगिता के लिए हुआ था, लेकिन करीब डेढ़ लाख रुपये की व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण वह प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकी। छात्रा ने मुख्यमंत्री के सामने कहा कि उससे करीब 1.50 लाख रुपये मांगे गए थे और वह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में नहीं खेल पाई। छात्रा के भावुक होने पर मुख्यमंत्री ने उसे शांत कराया और अधिकारियों से मामले की जानकारी जुटाने के निर्देश दिए। इस पूरे घटनाक्रम ने सवाल खड़ा किया है कि यदि किसी सरकारी या खेल व्यवस्था में एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के बाद केवल आर्थिक संसाधनों के अभाव में रुक जाती है, तो खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने की सरकारी नीतियां आखिर किस हद तक जमीन पर पहुंच रही हैं?
रिपोर्टों के मुताबिक, रोमानिया की प्रतियोगिता में जाने के लिए यात्रा सहित कुल खर्च करीब 3.70 लाख रुपये बताया गया था। इसमें लगभग 1.70 लाख रुपये की सहायता काउंसिल की ओर से होने की बात थी, जबकि करीब 1.50 लाख रुपये छात्रा को स्वयं जुटाने थे। आर्थिक व्यवस्था नहीं होने के कारण वह प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकी। यानी इस मामले में डेढ़ लाख एक रकम भर नहीं है। यह उस सवाल का प्रतीक बन गया है कि प्रतिभा और आर्थिक क्षमता के बीच सरकार कितनी मजबूत पुल बना पाती है। छात्रा की बात सामने आने के बाद विपक्ष ने इसे सरकार की खेल व्यवस्था पर हमला करने के लिए मुद्दा बना लिया। कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के सामने ही एक बेटी ने व्यवस्था में भ्रष्टाचार की शिकायत रखी। लेकिन इसी मामले में एक महत्वपूर्ण सावधानी भी सामने आई है। बाद की रिपोर्टों में छात्रा की बात को रिश्वत के रूप में प्रचारित किए जाने पर सवाल उठे हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, मामला प्रतियोगिता में जाने के लिए आवश्यक वित्तीय व्यवस्था का था और छात्रा ने बाद में स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री के सामने वह अपनी पूरी बात नहीं रख पाई थी। इसलिए फिलहाल इसे सीधे रिश्वतखोरी साबित मानना उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि डेढ़ लाख रुपये की आवश्यकता क्यों पड़ी, किस संस्था की क्या जिम्मेदारी थी और खिलाड़ी को उपलब्ध सरकारी अथवा खेल सहायता समय पर क्यों नहीं मिल सकी।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को छात्रा के स्कूल और उसके ताइक्वांडो प्रशिक्षण से जुड़ी जानकारी जुटाने के निर्देश दिए हैं। अब गेंद सरकार के पाले में है। यदि जांच में यह सामने आता है कि खिलाड़ी को नियमानुसार मिलने वाली सहायता नहीं मिली, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि रकम वास्तव में प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए खिलाड़ी की अपनी हिस्सेदारी थी, तो फिर यह भी देखना होगा कि आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाओं के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है कि चयन के बाद पैसे के अभाव में उनका अंतरराष्ट्रीय अवसर न छूटे। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश की राजनीति में युवा, रोजगार और प्रतिभाओं का पलायन पहले से बड़े मुद्दे हैं। सरकार खेलों में सुविधाओं और प्रतिभाओं को अवसर देने की बात करती रही है। दूसरी ओर विपक्ष को ऐसे मामलों के जरिए यह सवाल उठाने का मौका मिल रहा है कि घोषणाओं और जमीन पर मौजूद व्यवस्था के बीच कितना अंतर है।इस पूरे विवाद में सबसे जरूरी बात राजनीति से आगे की है।
एक बच्ची राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती है। फिर अंतरराष्ट्रीय मंच का दरवाजा उसके सामने खुलता है। लेकिन दरवाजे के बाहर खड़ा सवाल सिर्फ 1.50 लाख रुपये का रह जाता है। अगर प्रतिभा के सामने सबसे बड़ी बाधा पैसा बन जाए, तो फिर सवाल केवल खिलाड़ी का नहीं रहताकृपूरे खेल तंत्र की क्षमता का हो जाता है। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री के सामने उठी इस आवाज का जवाब सिर्फ जांच के आदेश तक सीमित रहता है या उत्तराखंड की खेल व्यवस्था में ऐसा रास्ता बनता है, जिसमें किसी खिलाड़ी का अंतरराष्ट्रीय सपना आर्थिक मजबूरी के कारण अधूरा न रह जाए।
बुधवार, 12 अगस्त 2026
udaydinmaan: विरासत की अनमोल धरोहर ‘फूली’
udaydinmaan: विरासत की अनमोल धरोहर ‘फूली’: बिना किसी आडंबर के स्त्री के सौंदर्य में निखार घोलती है एक छोटी-सी फूली अलमारियों और नए कपड़ों के बीच पीछे छूटी, लेकिन पहचान अब भी कायम आज आभ...
विरासत की अनमोल धरोहर ‘फूली’
बिना किसी आडंबर के स्त्री के सौंदर्य में निखार घोलती है एक छोटी-सी फूली
अलमारियों और नए कपड़ों के बीच पीछे छूटी, लेकिन पहचान अब भी कायम
आज आभूषण भले नए आ गए हों, मगर फूली का स्थान सिर्फ और सिर्फ दिल में
देहरादून। पहाड़ की सुबह में जब धूप धीरे-धीरे घरों की छतों पर उतरती थी, तब पहाड़ी आंगन में काम करती महिलाओं के चेहरे पर सादगी के साथ एक खास चमक भी दिखाई देती थी। माथे पर बिंदी, बालों में सादगी और नाक में चमकती छोटी-सी फूली। फूली बहुत बड़ा गहना नहीं थी। न वह भारी थी, न उसे पहनने के लिए किसी बड़े समारोह की जरूरत होती थी। लेकिन पहाड़ की स्त्री के श्रृंगार में उसकी अपनी जगह थी। कभी यह रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा रही, कभी त्योहारों और मेलों में सजी, तो कभी शादी-ब्याह के अवसर पर दुल्हन के चेहरे की शोभा बनी। आज समय बदल गया है। पहाड़ की पगडंडियों की जगह सड़कें आ गईं। संदूकची की जगह अलमारियों ने ले ली। पारंपरिक पहनावे की जगह आधुनिक फैशन ने ले ली। लेकिन कई पुराने घरों में फूली आज भी सुरक्षित है। वह गहना कम और याद ज्यादा है।
पहाड़ में गहनों को लेकर एक अलग भाव रहा है। गहना केवल सोने-चांदी का टुकड़ा नहीं रहा। वह परिवार की स्मृति भी रहा। मां के पास रखी फूली बेटी के लिए केवल आभूषण नहीं थी। उसमें मां के जीवन की यादें जुड़ी होती थीं। वही फूली किसी दिन बेटी की नाक में सजती तो उसके साथ मायके की स्मृतियां भी चली आतीं। दादी की संदूकची में रखी फूली की कहानी शायद किसी किताब में दर्ज न हो, लेकिन घर की बुजुर्ग महिलाओं को उसकी पूरी कहानी मालूम होती थी। कब बनवाई गई थी? किस सुनार ने बनाई थी? किस अवसर पर पहली बार पहनी गई? किस बेटी की शादी में इसे निकाला गया था? इन सवालों के जवाब परिवार की मौखिक परंपरा में सुरक्षित रहते थे।
पहाड़ी समाज में पारंपरिक आभूषणों ने महिलाओं की सांस्कृतिक पहचान को भी आकार दिया है। फूली उन्हीं आभूषणों की श्रृंखला का हिस्सा रही है। इसकी खासियत उसका सादा सौंदर्य है। जहां बड़े आभूषण अपनी मौजूदगी का एहसास कराते हैं, वहीं फूली चेहरे पर चुपचाप अपनी जगह बनाती है। नाक पर चमकता छोटा-सा सोने का बिंदु जैसे पहाड़ की किसी ऊंची चोटी पर पहली धूप। शायद इसलिए भी फूली को पहाड़ी श्रृंगार में इतना अपनापन मिला। फूली के पीछे पहाड़ के पारंपरिक सुनारों की मेहनत भी छिपी है। पुराने समय में आभूषण बनाना केवल कारोबार नहीं था। सुनार परिवारों की कारीगरी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती थी। स्थानीय डिजाइन, बारीक काम और ग्राहक के परिवार की पसंद को ध्यान में रखते हुए गहने तैयार किए जाते थे।
फूली छोटी जरूर थी, लेकिन उसे बनाने में कारीगर की उंगलियों की बारीकी दिखाई देती थी। सोने की पतली परत को आकार देना, उसकी गोलाई बनाना और उसे इस तरह तैयार करना कि वह चेहरे पर सहज लगेकृयह सब अनुभव की मांग करता था। आज मशीन से बने आधुनिक गहनों के दौर में हाथ की वह कारीगरी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। पहाड़ में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज का उत्सव रहा है। दुल्हन के पारंपरिक श्रृंगार में कपड़ों के साथ आभूषणों की भी अपनी भूमिका रही। नाक के गहने चेहरे की सुंदरता को अलग पहचान देते थे। फूली इस श्रृंगार का हल्का लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा रही।
दुल्हन के चेहरे पर सादगी और पारंपरिक आभूषणों का मेल पहाड़ी संस्कृति की उस सुंदरता को सामने लाता था जिसमें दिखावे से ज्यादा अपनापन था। शादी के बाद भी फूली कई महिलाओं के रोजमर्रा के श्रृंगार का हिस्सा बनी रहती थी। फूली की कहानी केवल गहने की कहानी नहीं है। यह बदलते पहाड़ की कहानी भी है। पहाड़ से पलायन हुआ तो परिवार शहरों में पहुंचे। पहनावा बदला। नई पीढ़ी ने नए फैशन अपनाए। भारी पारंपरिक आभूषणों को संभालना मुश्किल हुआ। कई पुराने गहने बैंक के लॉकर में चले गए। कई संदूकचियों में बंद हो गए और कुछ बाजार में बेच दिए गए। फूली भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही। फिर भी उसकी खासियत यह है कि वह पूरी तरह गायब नहीं हुई। त्योहारों, पारंपरिक समारोहों और विवाहों में आज भी इसकी झलक दिखाई देती है।
नई पीढ़ी की कुछ युवतियां पारंपरिक आभूषणों को आधुनिक पहनावे के साथ जोड़कर उन्हें नया रूप दे रही हैं। यानी फूली खत्म नहीं हो रही, बल्कि अपना नया रास्ता खोज रही है। किसी बुजुर्ग पहाड़ी महिला से अगर उसकी पुरानी फूली के बारे में पूछा जाए तो शायद वह उसके वजन या कीमत से पहले उसकी कहानी बताए। यह मेरी मां की थी। यह एक वाक्य ही उस गहने की पूरी कीमत बता देता है। सोने का बाजार भाव बदल सकता है। गहने का वजन कम या ज्यादा हो सकता है। डिजाइन पुराना पड़ सकता है। लेकिन मां की निशानी का कोई बाजार भाव नहीं होता। यही वजह है कि पुराने आभूषणों को परिवार संभालकर रखते रहे हैं।
आज फूली जैसी पारंपरिक धरोहर को बचाने का मतलब यह नहीं कि नई पीढ़ी को पुराने जमाने में वापस भेज दिया जाए। जरूरत यह है कि परंपरा को आधुनिकता के साथ जोड़ा जाए। फूली के पारंपरिक डिजाइन को आधुनिक और हल्के आभूषणों में ढाला जा सकता है। स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। उत्तराखंड की पारंपरिक ज्वेलरी के डिजाइन का दस्तावेजीकरण किया जा सकता है। क्योंकि जब कोई पारंपरिक गहना बाजार से गायब होता है तो उसके साथ केवल एक डिजाइन नहीं जाताकृएक कारीगरी, एक स्मृति और संस्कृति का एक छोटा हिस्सा भी चला जाता है।
पहाड़ की फूली आकार में छोटी है, लेकिन उसकी कहानी बड़ी है। उसमें पहाड़ की बेटी का श्रृंगार है। मां की संदूकची है। दादी की स्मृति है। सुनार की कारीगरी है। विवाह के गीत हैं। त्योहारों की रौनक है और उस पहाड़ की पहचान है, जहां कम साधनों में भी जीवन को सुंदर बनाने की कला रही है। आज जरूरत है कि फूली को केवल पुराना गहना समझकर संदूक में बंद न कर दिया जाए। उसे कहानी की तरह अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। क्योंकि पहाड़ की फूली नाक पर जितनी छोटी दिखाई देती है, अपनी विरासत में उतनी ही बड़ी है।
राहुल गांधी पर भाजपा का ‘हमला’
छात्रों के मुद्दे पर भाजपा ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को घेरा
भाजपा ने लगाया लोकसभा में चर्चा से भागने का आरोप
छात्रों के सवाल पर दोहरे रवैये को लेकर विपक्ष निशाना
देहरादून। छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर संसद में सियासी टकराव तेज हो गया है। लोकसभा में छात्रों के मुद्दे पर चर्चा और विरोध-प्रदर्शन के बीच भाजपा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन पर चर्चा से बचने का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने सवाल उठाया कि जब विपक्ष छात्रों के मुद्दे को इतना महत्वपूर्ण बता रहा है तो फिर संसद की चर्चा में सरकार के जवाब का सामना करने से उसे परहेज क्यों है? भाजपा ने राहुल गांधी और विपक्ष के रुख को लेकर दोहरे रवैये का आरोप लगाते हुए कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े विषय को राजनीतिक प्रदर्शन का मुद्दा बनाने के बजाय संसद में गंभीर चर्चा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। सत्ता पक्ष की ओर से यह भी सवाल उठाया गया कि विपक्ष एक तरफ छात्रों की समस्याओं को लेकर सरकार से जवाब मांगता है और दूसरी तरफ जब सरकार अपना पक्ष रखने के लिए तैयार होती है तो चर्चा से बचने की कोशिश करता है।
छात्रों से जुड़े मुद्दे पर संसद परिसर में सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों के प्रदर्शन ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। दोनों पक्ष अपने-अपने तरीके से यह संदेश देने में जुटे हैं कि वह छात्रों की समस्याओं को लेकर गंभीर हैं। भाजपा का कहना है कि संसद में चर्चा का रास्ता खुला है और विपक्ष को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि केवल प्रदर्शन और नारेबाजी से छात्रों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। वहीं विपक्ष छात्रों से जुड़े मुद्दों पर सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि छात्रों के मुद्दे पर संसद में सार्थक चर्चा कब होगी और उसका ठोस परिणाम क्या निकलेगा।
भाजपा ने अपने हमले का केंद्र राहुल गांधी को बनाया। पार्टी की ओर से कहा गया कि यदि विपक्ष वास्तव में छात्रों की समस्याओं को लेकर गंभीर है तो उसे सदन में चर्चा में हिस्सा लेना चाहिए। सत्ता पक्ष ने राहुल गांधी के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि संसद में चर्चा से बचना और बाहर छात्रों के मुद्दे पर राजनीति करना दोहरा रवैया है। भाजपा का तर्क है कि संसद सरकार से सवाल पूछने का सबसे प्रभावी मंच है। यहां विपक्ष को सवाल उठाने के साथ-साथ सरकार का जवाब भी सुनना चाहिए और जरूरत पड़ने पर उसके जवाब पर आगे सवाल करना चाहिए। पार्टी नेताओं ने कहा कि लोकतंत्र केवल विरोध करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र में सरकार को जवाब देना और विपक्ष को जवाब सुनना दोनों जरूरी हैं।
छात्रों के मुद्दे पर छिड़ी इस राजनीतिक लड़ाई ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया हैकृक्या छात्रों की समस्याएं वास्तव में राजनीतिक दलों की प्राथमिकता हैं या फिर वे केवल एक-दूसरे को घेरने का माध्यम बन रही हैं? प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, समय पर परीक्षा, परिणाम और भर्ती प्रक्रिया को लेकर युवाओं के बीच लंबे समय से चिंता रही है। ऐसे में संसद में इस विषय पर गंभीर चर्चा की जरूरत है। छात्रों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा यह जानने में दिलचस्पी होगी कि परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी कैसे बनाया जाएगा, शिकायतों का समाधान कैसे होगा और अनियमितता सामने आने पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी।
भाजपा ने विपक्ष के सामने सीधा सवाल रखा है कि यदि छात्रों के मुद्दे पर उसके पास गंभीर प्रश्न और ठोस तथ्य हैं तो उन्हें संसद के भीतर क्यों नहीं रखा जाता? सत्ता पक्ष का कहना है कि सदन में बहस के दौरान सरकार अपना पक्ष रख सकती है और विपक्ष उसके जवाब पर सवाल कर सकता है। इससे जनता के सामने पूरा पक्ष स्पष्ट होगा। भाजपा ने इसी आधार पर राहुल गांधी और विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि छात्रों के मुद्दे को लेकर केवल संसद के बाहर प्रदर्शन करना पर्याप्त नहीं है। हालांकि विपक्ष की ओर से सरकार पर छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक टकराव के बीच यह मुद्दा अब संसद की कार्यवाही से निकलकर व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बनता जा रहा है।
इस राजनीतिक टकराव के बीच सबसे महत्वपूर्ण पक्ष छात्र हैं। जिस युवा ने किसी प्रतियोगी परीक्षा के लिए महीनों या वर्षों तैयारी की है, उसके लिए यह बहस केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है। उसके लिए परीक्षा व्यवस्था उसके भविष्य का सवाल है। वह चाहता है कि परीक्षा निष्पक्ष हो, भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी भी तरह की अनियमितता पर तत्काल कार्रवाई हो। यही कारण है कि सत्ता और विपक्ष दोनों के सामने चुनौती है कि वे छात्रों के मुद्दे को राजनीतिक आरोपों तक सीमित न रखें। भाजपा का हमला राहुल गांधी पर है और विपक्ष सरकार को घेर रहा है। लेकिन छात्रों की निगाहें इस बात पर हैं कि संसद से उनके लिए क्या निकलेगा। सवाल अब यह नहीं कि किसने किसे घेरा। सवाल यह है कि छात्रों की समस्या का समाधान कौन करेगा। संसद में आरोपों का शोर कुछ समय के लिए राजनीतिक सुर्खियां जरूर बना सकता है, लेकिन छात्रों का भविष्य सुर्खियों से नहीं, ठोस फैसलों से बदलेगा। यही इस पूरे विवाद की असली कसौटी है।
अब कांग्रेस करेगी ‘इंटरनल सर्वे’
विधायकों का रिपोर्ट कार्ड भी होगा तैयार
टिकट के दावेदारों की परखी जाएगी पकड़
कांग्रेस ने चुनावी तैयारी को दी नई रफ्तार
देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अब अपनी तैयारियों को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है। संगठन को मजबूत करने और चुनावी रणनीति को धार देने के बाद पार्टी अब प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में संभावित प्रत्याशियों की वास्तविक स्थिति का आकलन करने की तैयारी में है। इसके तहत सभी विधानसभा क्षेत्रों में मौजूदा विधायकों के साथ ही चुनाव लड़ने की दावेदारी कर रहे नेताओं का इंटरनल सर्वे कराया जाएगा। पार्टी का उद्देश्य केवल संभावित प्रत्याशियों की लोकप्रियता नापना नहीं, बल्कि यह पता लगाना भी है कि कौन सा नेता अपने विधानसभा क्षेत्र में संगठन, कार्यकर्ताओं और आम मतदाताओं के बीच कितनी पकड़ रखता है। सर्वे के जरिए दावेदारों की स्वीकार्यता, सक्रियता, क्षेत्र में मौजूदगी और चुनावी क्षमता जैसे पहलुओं को परखा जाएगा।
कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर दावेदारी करने वाले नेताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती योग्य और जीतने की क्षमता रखने वाले उम्मीदवार का चयन करना है। इंटरनल सर्वे को इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक सर्वे में संभावित प्रत्याशियों की व्यक्तिगत छवि के साथ ही क्षेत्र में उनकी सक्रियता, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और जनता के बीच स्वीकार्यता को भी आकलन के दायरे में रखा जाएगा। इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि संबंधित नेता संगठन के लिए कितना सक्रिय रहा है और चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की उसकी क्षमता कैसी है।
इंटरनल सर्वे केवल नए दावेदारों तक सीमित नहीं रहेगा। मौजूदा कांग्रेस विधायकों को भी इस प्रक्रिया से गुजरना होगा। पार्टी यह जानने की कोशिश करेगी कि वर्तमान विधायक के प्रति क्षेत्र की जनता का रुझान कैसा है। स्थानीय स्तर पर उनकी सक्रियता, उपलब्धता और कामकाज को लेकर मतदाताओं की राय क्या है और आगामी चुनाव में उनकी जीत की संभावनाएं कितनी मजबूत हैं। इससे पार्टी नेतृत्व को उन सीटों पर भी समय रहते रणनीति बनाने में मदद मिल सकती है, जहां मौजूदा विधायक को लेकर संगठन या जनता के स्तर पर असंतोष की स्थिति हो।
उत्तराखंड की सभी विधानसभा सीटों का राजनीतिक और सामाजिक समीकरण एक जैसा नहीं है। पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, तो मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण, बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल चुनावी मुद्दे बनते हैं। ऐसे में कांग्रेस का सर्वे केवल नेताओं की लोकप्रियता तक सीमित रहने के बजाय प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के स्थानीय राजनीतिक समीकरण को समझने का माध्यम भी बन सकता है। पार्टी यह जानना चाहेगी कि किस सीट पर कौन सा चेहरा विपक्ष के सामने मजबूत चुनौती पेश कर सकता है और किन सीटों पर संगठन को अभी से अतिरिक्त मेहनत की जरूरत है।
सर्वे की तैयारी से कांग्रेस के भीतर टिकट की दावेदारी को लेकर भी हलचल तेज होने की संभावना है। अब तक क्षेत्र में सक्रियता दिखाकर टिकट की दावेदारी कर रहे नेताओं के सामने अपनी राजनीतिक जमीन साबित करने की चुनौती होगी। सर्वे में यदि किसी नेता की लोकप्रियता और स्वीकार्यता मजबूत सामने आती है तो उसकी दावेदारी को स्वाभाविक रूप से बल मिल सकता है। वहीं केवल संगठन के भीतर मजबूत संपर्क के आधार पर टिकट की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं के लिए यह प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है। पार्टी के इस कदम से यह संदेश भी जा रहा है कि टिकट वितरण केवल सिफारिश या व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर नहीं, बल्कि चुनावी क्षमता और जनता के बीच स्वीकार्यता को ध्यान में रखकर करने की कोशिश होगी।
सत्ता में भाजपा की मौजूदगी के बीच कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार के खिलाफ संभावित असंतोष को अपने पक्ष में वोट में बदलने की है। इसके लिए पार्टी को मजबूत उम्मीदवारों की जरूरत होगी। केवल सरकार विरोधी माहौल के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। हर सीट पर ऐसा चेहरा उतारना होगा जो स्थानीय स्तर पर भाजपा को सीधी चुनौती दे सके। इंटरनल सर्वे इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। कांग्रेस की रणनीति में अब संगठन और प्रत्याशी चयन दोनों को समान महत्व देने की कोशिश दिखाई दे रही है। पार्टी नेतृत्व जानता है कि चुनावी मैदान में केवल प्रदेश स्तर के मुद्दे पर्याप्त नहीं होंगे।
प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय नेतृत्व की ताकत और संगठन की सक्रियता निर्णायक भूमिका निभाएगी। इसीलिए संभावित प्रत्याशियों की स्थिति का पहले से आकलन कर पार्टी चुनाव के अंतिम चरण में किसी तरह के प्रयोग या जल्दबाजी से बचना चाहती है। कांग्रेस का इंटरनल सर्वे पार्टी के भीतर केवल आंकड़े जुटाने की कवायद नहीं होगा। यह आने वाले विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण और चुनावी रणनीति की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। अब देखना यह होगा कि सर्वे के बाद पार्टी कितने मौजूदा विधायकों पर भरोसा कायम रखती है और कितनी सीटों पर नए चेहरों को मौका देने की रणनीति अपनाती है। फिलहाल कांग्रेस के भीतर टिकट के दावेदार सक्रिय हैं और संगठन चुनावी तैयारी में जुट चुका है। चुनावी रण अभी दूर है, लेकिन कांग्रेस ने संकेत दे दिया है कि इस बार टिकट की दौड़ में सिर्फ दावेदारी नहीं चलेगीकृदावेदार की जमीन भी नापी जाएगी।
udaydinmaan: ‘हसुली’ में कैद है पीढ़ियों की ‘विरासत’
udaydinmaan: ‘हसुली’ में कैद है पीढ़ियों की ‘विरासत’: पहाड़ की हसुली गले में सजी धरोहर, पीढ़ियों की कहानी चांदी की चमक से कहीं ज्यादा गहरी है हसुली की पहचान पहाड़ की महिलाओं के गले से उतरकर अब संदू...
मंगलवार, 11 अगस्त 2026
‘हसुली’ में कैद है पीढ़ियों की ‘विरासत’
पहाड़ की हसुली गले में सजी धरोहर, पीढ़ियों की कहानी
चांदी की चमक से कहीं ज्यादा गहरी है हसुली की पहचान
पहाड़ की महिलाओं के गले से उतरकर अब संदूक में सिमटी
देहरादून। पहाड़ की पगडंडियों पर चलते हुए अगर किसी बुजुर्ग महिला और बच्चों के गले पर नजर ठहर जाए तो वहां सिर्फ चांदी की चमक दिखाई नहीं देती। उस चमक में एक पूरा पहाड़ दिखाई देता हैकृमाटी की खुशबू, खेतों की मेहनत, लोकगीतों की मिठास और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की कहानी। गले में सजी वह चांदी की हसुली इसी कहानी का एक हिस्सा है। कभी उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में हसुली बच्चों और महिलाओं के पारंपरिक आभूषणों का अहम हिस्सा हुआ करती थी। विवाह, त्योहार, पारिवारिक समारोह या किसी खास अवसर पर पहाड़ की महिलाएं जब पारंपरिक परिधान पहनती थीं तो गले में सजी हसुली उनकी सुंदरता को अलग पहचान देती थी। लेकिन हसुली को केवल श्रृंगार कहना इसके अर्थ को छोटा कर देना होगा। यह पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा रही है।
हसुली आमतौर पर चांदी से बनाई जाती है और इसका आकार अर्धचंद्राकार या मोटे घुमावदार रूप में दिखाई देता है। अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में इसके आकार, वजन और डिजाइन में अंतर मिलता है। कहीं यह साधारण होती है तो कहीं उस पर महीन नक्काशी दिखाई देती है। कहीं इसमें छोटे-छोटे घुंघरू या सजावटी तत्व जुड़े होते हैं। पहाड़ के सुनारों के लिए भी हसुली बनाना केवल धातु को आकार देना नहीं था। यह पीढ़ियों से चली आ रही एक कारीगरी थी। पुराने समय में जब बाजार दूर थे और तैयार आभूषण आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे, गांव के सुनार ही परिवार की पसंद और सामर्थ्य के हिसाब से आभूषण तैयार करते थे। हसुली भी उसी लोककारीगरी का हिस्सा थी।
पहाड़ के समाज में बेटी की शादी सिर्फ दो व्यक्तियों का संबंध नहीं थी। इसके साथ कई परंपराएं और भावनाएं जुड़ी होती थीं। मायके से विदा होती बेटी को कपड़ों और अन्य सामान के साथ आभूषण भी दिए जाते थे। इनमें हसुली का अपना विशेष स्थान था। कई परिवारों में यह आभूषण मां से बेटी और फिर बेटी से उसकी अगली पीढ़ी तक पहुंचता रहा। इसलिए किसी पुराने संदूक में रखी हसुली केवल चांदी का गहना नहीं होती। वह मां के हाथों की याद होती है। वह नानी की कहानी होती है। वह उस घर की आर्थिक स्थिति और सामाजिक जीवन की भी एक छोटी-सी निशानी होती है। एक हसुली के साथ परिवार की कई पीढ़ियां जुड़ी हो सकती हैं।
हसुली की कहानी उस पहाड़ी महिला से भी जुड़ी है जिसने अपना जीवन खेत, जंगल और घर के बीच गुजारा। सुबह पानी लेने निकलना हो, घास काटने जंगल जाना हो, खेत में काम करना हो या घर के दूसरे कामकृपहाड़ की महिला का जीवन श्रम से भरा रहा है। ऐसे जीवन में गहने केवल सजने का साधन नहीं थे। वह उसकी सामाजिक पहचान का हिस्सा भी थे। त्योहार के दिन जब वही महिला अपनी पारंपरिक पोशाक पहनती, बालों में सजावट करती और गले में हसुली पहनती तो उसका रूप पहाड़ की लोकसंस्कृति का जीवंत चित्र बन जाता। हसुली की चमक में उस महिला का आत्मसम्मान भी दिखाई देता था।
समय बदला तो पहाड़ का पहनावा भी बदलने लगा। गांवों से पलायन हुआ। नई पीढ़ी शहरों में पहुंची। कपड़े बदले, जीवनशैली बदली और आभूषणों की पसंद भी बदल गई। भारी पारंपरिक आभूषणों की जगह हल्के और आधुनिक डिजाइन के गहनों ने ले ली। नतीजा यह हुआ कि कभी रोजमर्रा और त्योहारों में दिखाई देने वाली हसुली अब कई घरों में संदूक के भीतर सुरक्षित रखी मिलती है। बुजुर्ग महिलाओं के गले में इसकी चमक अभी भी दिखाई देती है, लेकिन नई पीढ़ी में यह दृश्य लगातार कम हो रहा है। यह बदलाव सिर्फ फैशन का बदलाव नहीं है। यह उस लोकसंस्कृति के धीरे-धीरे बदलने की कहानी भी है जो कभी पहाड़ के दैनिक जीवन का हिस्सा थी।
आज जब उत्तराखंड अपनी लोकसंस्कृति और पारंपरिक पहचान को पर्यटन से जोड़ने की बात कर रहा है, तब हसुली जैसे आभूषणों को सिर्फ संग्रहालय की वस्तु बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। जरूरत है कि स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन मिले। पारंपरिक डिजाइन को आधुनिक जरूरतों के साथ जोड़ा जाए। युवा पीढ़ी को इन आभूषणों की कहानी बताई जाए और स्थानीय हस्तशिल्प को बाजार मिले। क्योंकि संस्कृति सिर्फ किताबों में नहीं बचती।
वह तब बचती है जब कोई बेटी अपनी मां की हसुली पहनकर आईने में खुद को देखती है और पूछती हैकृमां, यह तुम्हें किसने दी थी? और मां मुस्कुराकर कहती हैकृमेरी मां ने। यहीं से परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है। हसुली की असली कीमत उसके चांदी के वजन में नहीं है। उसकी कीमत उस कहानी में है जो उसके साथ चलती है। यह पहाड़ की उन बेटियों की कहानी है जिन्होंने खेतों में पसीना बहाया, जंगलों से घास ढोई, परिवार संभाला और फिर भी त्योहार के दिन गले में हसुली सजाकर अपने पहाड़ की पहचान को जीवित रखा। आज हसुली भले ही कम दिखाई देती हो, लेकिन जब तक किसी पहाड़ी संदूक में वह सुरक्षित है, तब तक पहाड़ की एक कहानी भी सुरक्षित है। हसुली को बचाना यानी सिर्फ एक आभूषण को बचाना नहींकृपहाड़ की स्मृति को बचाना है।
उफनती नदियां और ‘बेबस’ इंसान
चमोली जिले में तबाही के बीच अपनों की खोज
कागजी दावों पर भारी पड़ रहा प्रकृति का गुस्सा
जलसैलाब में पुल, वाहन बहे, एक कर्मी लापता
सवाल राहत की तस्वीरें आ गई पर जवाब कब
देहरादून। चमोली में पानी आया और अपने साथ सिर्फ पुल और गाड़ियां नहीं ले गया। वह अपने साथ उन परिवारों की नींद भी बहा ले गया, जिनके अपने अचानक लापता हो गए। सड़क बनाने वाले, पुल खड़े करने वाले और सीमा तक पहुंच का रास्ता तैयार करने वाले बीआरओ के कर्मी भी इस जलसैलाब की चपेट में आ गए। पहाड़ में जब पानी अपना रास्ता बदलता है तो आदमी के बनाए रास्ते कितने कमजोर हैं, यह कुछ ही मिनटों में साफ हो जाता है। एक तरफ उफनता पानी था, दूसरी तरफ पहाड़। बीच में इंसान था, उसकी मशीनें थीं, सड़क थी और वह पुल था जिस पर भरोसा करके लोग इस दुर्गम इलाके में आवाजाही करते हैं। फिर पानी आया और पुल नहीं रहा। गाड़ियां नहीं रहीं। कुछ लोग लौटकर नहीं आए। अब प्रशासन खोज रहा है। टीमें लग रही हैं। राहत और बचाव का काम चल रहा है। तस्वीरें आएंगी। हेलीकाप्टर उड़ेंगे। अधिकारियों के बयान आएंगे। बताया जाएगा कि हालात पर नजर रखी जा रही है। लेकिन पहाड़ का सबसे बड़ा सवाल इन बयानों के बीच कहीं खो जाता हैकृआखिर हर बार पहाड़ ही क्यों बताता है कि हमने तैयारी कितनी कम की थी?
चमोली कोई पहली बार बारिश देखने वाला इलाका नहीं है। यहां बादल फटने, अतिवृष्टि, भूस्खलन और अचानक आने वाले जलसैलाब का खतरा नया नहीं है। फिर भी हर बड़ी घटना के बाद हमारी भाषा वही रहती हैकृअचानक, अप्रत्याशित, प्राकृतिक आपदा। प्रकृति निश्चित रूप से अपने रास्ते में किसी की अनुमति नहीं लेती। लेकिन क्या खतरे का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता? यही वह सवाल है जिसे पूछना जरूरी है। एक पुल टूटता है तो प्रशासन के कागज पर वह एक ढांचा होता है। लेकिन गांव के आदमी के लिए पुल बाजार तक पहुंच है। स्कूल जाने का रास्ता है। अस्पताल जाने का रास्ता है। रोजगार तक पहुंच है और पहाड़ में कई बार पुल का मतलब दुनिया से जुड़ा रहना होता है। इसलिए जब जलसैलाब किसी पुल को बहा ले जाता है तो उसके साथ सिर्फ निर्माण सामग्री नहीं जाती। लोगों का भरोसा भी टूटता है और जब उसी घटना में सड़क और सीमा से जुड़े काम में लगे कर्मी लापता हो जाएं, तब यह हादसा और भी गंभीर हो जाता है। उनके घरों में इस समय कोई सरकारी प्रेस नोट नहीं पढ़ा जा रहा होगा। वहां सिर्फ एक सवाल होगाकृकि वह वापस कब आएंगे?
हमारी आपदा पत्रकारिता की एक अजीब आदत है। पहले संख्या आती है। कितने पुल बहे? कितनी गाड़ियां बहीं? कितने लोग लापता? कितनी सड़कें बंद? फिर तस्वीरें आती हैं। फिर दौरा होता है। फिर समीक्षा बैठक होती है। फिर मुआवजे की घोषणा होती है। लेकिन कुछ दिनों बाद जब कैमरे दूसरी खबर की ओर चले जाते हैं, तब उन परिवारों का क्या होता है? जिस घर का आदमी वापस नहीं आया, वहां बारिश खत्म होने के बाद भी इंतजार खत्म नहीं होता। जिस सड़क का पुल बह गया, वहां मौसम साफ होने के बाद भी रास्ता नहीं बन जाता और जिस पहाड़ में एक हादसा हुआ, वहां अगली बारिश तक वही खतरा फिर खड़ा रहता है।
उत्तराखंड में विकास जरूरी है। सड़क चाहिए। पुल चाहिए। सुरंग चाहिए। सीमा तक बेहतर संपर्क चाहिए। गांवों को बाजार और अस्पताल से जोड़ना जरूरी है। लेकिन विकास का अर्थ पहाड़ की प्रकृति को नजरअंदाज करना नहीं हो सकता। जब पहाड़ की ढलान, नदी का प्राकृतिक बहाव, जल निकासी और भूगर्भीय स्थिति को नजरअंदाज करके निर्माण होता है, तब प्रकृति की पहली बड़ी परीक्षा में हमारी इंजीनियरिंग कटघरे में खड़ी हो जाती है। सवाल यह नहीं कि सड़क क्यों बनाई गई। सवाल यह है कि सड़क कैसे बनाई गई? सवाल यह नहीं कि पुल क्यों बनाया गया। सवाल यह है कि क्या पुल उस जलधारा और उस संभावित दबाव को ध्यान में रखकर बनाया गया था? और सबसे बड़ा सवालकृक्या हमने आपदा को केवल राहत और मुआवजे का विषय बना दिया है, जबकि उसे निर्माण और योजना का विषय होना चाहिए था?
बीआरओ कर्मियों की कहानी
सीमा से जुड़े इलाकों में काम करने वाले बीआरओ कर्मी अक्सर उस भारत की तस्वीर हैं जो नक्शे पर दिखाई नहीं देता, जहां सामान्य परिस्थितियों में पहुंचना मुश्किल है, वहां सड़क बनाना आसान काम नहीं। बारिश, बर्फ, भूस्खलन और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच काम करने वाले इन लोगों के लिए पहाड़ रोज की चुनौती है। जलसैलाब में लापता कर्मियों की खबर इसलिए सिर्फ एक दुर्घटना की खबर नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है जो दूसरों के लिए रास्ते बनाते हैं और कभी-कभी उन्हीं रास्तों के बीच खुद रास्ता खो देते हैं। उनके परिवारों के सवालों का जवाब सिर्फ मुआवजे से नहीं दिया जा सकता। उन्हें जवाब चाहिए। खोज चाहिए और यह भरोसा चाहिए कि अगर ऐसी परिस्थितियां दोबारा बनती हैं तो व्यवस्था पहले से तैयार होगी।
आपदा की तस्वीर
हर साल बारिश में उत्तराखंड की तस्वीरें देशभर में पहुंचती हैं। उफनती नदियां। टूटती सड़कें। भूस्खलन। फंसे यात्री। बचाव अभियान। हेलीकाप्टर और पहाड़ की गोद में खड़ा कोई आदमी, जो कैमरे के सामने कहता हैकृसाहब, रास्ता कब खुलेगा? फिर खबर खत्म। लेकिन पहाड़ की जिंदगी खबर खत्म होने के बाद शुरू होती है। चमोली के इस जलसैलाब के बाद भी यही होना चाहिए कि राहत और बचाव सबसे पहली प्राथमिकता बने। लापता लोगों की तलाश पूरी ताकत से हो। प्रभावित परिवारों को तत्काल सहायता मिले। लेकिन इसके बाद एक ईमानदार समीक्षा भी हो। क्यों पुल बहा? क्यों वाहन सुरक्षित नहीं रह सके? कहां चेतावनी व्यवस्था कमजोर थी? क्या निर्माण मानकों का पालन हुआ? क्या नदी और जलधाराओं के पुराने रास्तों का अध्ययन किया गया? क्या संवेदनशील क्षेत्रों में काम कर रहे कर्मचारियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था थी? इन सवालों के जवाब अगर नहीं खोजे गए तो अगली बारिश फिर यही सवाल लेकर आएगी और तब शायद कोई दूसरा पुल होगा। कोई दूसरी गाड़ी होगी। कोई दूसरा परिवार इंतजार कर रहा होगा। पहाड़ को हर साल यह साबित करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि वह कितना खतरनाक हो सकता है। क्योंकि पहाड़ की त्रासदी सिर्फ पानी से नहीं आती। कई बार वह हमारी तैयारी की कमी से भी बड़ी हो जाती है।
करोड़ों का ‘ढोंग’ जिंदगी ‘डोली’ में
उत्तराखंड के पहाड़ के गांवों में बदहाल हैं स्वास्थ्य सेवाएं
उत्तराखंड के पहाड़ में स्ट्रेचर बना है चार लोगों का कंधा
सड़कें कागज पर पहुंच गईं, एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंची
घायल को कंधों पर उठाकर मीलों चलने को ग्रामीण मजबूर
देहरादून। उत्तराखंड में विकास की तस्वीरें बहुत सुंदर हैं। पहाड़ों पर चौड़ी सड़कें हैं, सुरंगें हैं, चारधाम के रास्ते हैं, बड़े-बड़े पुल हैं और विकास के दावों के लंबे-लंबे विज्ञापन हैं। लेकिन इसी उत्तराखंड के किसी गांव में जब कोई व्यक्ति घायल होता है तो विकास की चमक अचानक खत्म हो जाती है। एंबुलेंस सड़क तक आती है। गांव तक नहीं। फिर चार लोग आते हैं। एक डोली आती है। मरीज को उसमें लिटाया जाता है और पहाड़ के चार ग्रामीण उसे कंधों पर उठाकर कई किलोमीटर पैदल चल पड़ते हैं। यह दृश्य किसी पुराने उत्तराखंड की तस्वीर नहीं है। यह उस उत्तराखंड की तस्वीर है जो आज भी मौजूद है। जिस राज्य में चारधाम यात्रा के लिए करोड़ों रुपये के सड़क और परिवहन प्रोजेक्ट बन रहे हैं, उसी राज्य में एक ग्रामीण को अस्पताल पहुंचाने के लिए गांव के लोगों को अपना कंधा देना पड़ रहा है। सवाल यह नहीं कि डोली क्यों बनी। सवाल यह है कि डोली की जरूरत आज भी क्यों है?
मैदानी शहर में एंबुलेंस की आवाज सुनाई देती है तो लगता है कि व्यवस्था मरीज तक पहुंच रही है। पहाड़ में कई जगह एंबुलेंस की आवाज गांव तक पहुंचती ही नहीं। क्योंकि सड़क नीचे खत्म हो जाती है। इसके बाद रास्ता पगडंडी का होता है। कहीं सीढ़ियां हैं, कहीं पत्थर हैं, कहीं जंगल का रास्ता है और कहीं इतना संकरा रास्ता कि चार आदमी भी मुश्किल से चल सकें। मरीज को स्ट्रेचर पर ले जाना संभव नहीं होता तो डोली ही सहारा बनती है। परिवार के लोग जानते हैं कि अस्पताल दूर है। समय कम है और रास्ता लंबा। फिर किसी की मां, किसी के पिता, किसी की पत्नी या किसी बच्चे को चार-पांच लोग अपने कंधों पर उठाते हैं। यह सिर्फ मजबूरी नहीं। यह स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ा एक आईना है।
उत्तराखंड की स्वास्थ्य समस्या केवल अस्पतालों की संख्या की समस्या नहीं है। यह दूरी की समस्या भी है। अस्पताल है तो कितनी दूर? सड़क है तो मरीज के घर तक है या नहीं? सड़क है तो बारिश में चलती है या नहीं? एंबुलेंस है तो गांव तक पहुंचती है या नहीं? और अगर एंबुलेंस नहीं पहुंचती तो मरीज को सड़क तक कौन पहुंचाएगा? इन सवालों का जवाब किसी सरकारी भवन की दीवार पर नहीं लिखा है। इसका जवाब पहाड़ का ग्रामीण अपने कंधे पर लिखता है। वही कंधा जिस पर कभी घास की गठरी होती थी, अब उसी पर मरीज की जिंदगी रखी होती है। सरकारी रिपोर्ट में लिखा जाएगाकृस्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। कहीं लिखा होगाकृदूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत की गई हैं। किसी बैठक में कहा जाएगाकृग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर कनेक्टिविटी सरकार की प्राथमिकता है। लेकिन जिस दिन किसी गांव का आदमी घायल होता है, उसे इन वाक्यों की जरूरत नहीं होती। उसे डाक्टर चाहिए। उसे एंबुलेंस चाहिए। उसे सड़क चाहिए और सबसे बढ़कर उसे समय चाहिए। क्योंकि पहाड़ में अस्पताल तक पहुंचने में लगने वाला अतिरिक्त एक घंटा केवल एक घंटा नहीं होता।वह मरीज की जिंदगी और मौत के बीच का अंतर हो सकता है।
यह सवाल विकास विरोधी नहीं है। बल्कि यह विकास की गुणवत्ता का सवाल है। अगर किसी गांव तक सड़क नहीं पहुंच सकती तो कम से कम ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं है जिससे आपातकाल में मरीज को सुरक्षित और तेजी से सड़क तक पहुंचाया जा सके? अगर सड़क भूस्खलन से बंद हो जाती है तो वैकल्पिक मार्ग क्या है? क्या हर संवेदनशील गांव के लिए स्थानीय आपदा-चिकित्सा योजना है? क्या प्रशिक्षित ग्रामीण स्वयंसेवक हैं? क्या प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था है? क्या हर दूरस्थ गांव के लिए आपातकालीन संपर्क और परिवहन व्यवस्था वास्तव में काम करती है? या फिर हमारी पूरी व्यवस्था इस उम्मीद पर चल रही है कि हादसा होने से पहले कोई हादसा न हो?
उत्तराखंड के गांवों में डोली उठाने वाले लोग किसी योजना का हिस्सा नहीं होते। वह पड़ोसी होते हैं। रिश्तेदार होते हैं। दोस्त होते हैं। कभी-कभी अनजान ग्रामीण भी मदद के लिए कंधा दे देते हैं। उनके पास कोई सरकारी एंबुलेंस नहीं होती। कोई सायरन नहीं होता। कोई मेडिकल टीम नहीं होती। सिर्फ एक आदमी होता है जिसे बचाना है और चार-पांच लोग होते हैं जो उसे बचाने के लिए अपना कंधा दे रहे होते हैं।
यही उत्तराखंड की सबसे मार्मिक तस्वीर है। जिस पहाड़ ने देश को सैनिक दिए, श्रमिक दिए, पर्यटन दिया, नदियां दीं, पानी दियाकृवही पहाड़ आज भी अपने बीमार और घायल लोगों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए अपने लोगों के कंधों पर निर्भर है। चुनाव आते हैं तो पहाड़ के लिए बड़े-बड़े वादे होते हैं। पलायन रोकेंगे। सड़क देंगे। स्वास्थ्य सुधारेंगे। गांवों को आधुनिक बनाएंगे। लेकिन किसी नेता से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिएकृ क्या आपके विकास माडल में वह गांव शामिल है जहां आज भी मरीज को डोली में अस्पताल ले जाना पड़ता है? क्या विकास की सफलता किलोमीटर सड़क से मापी जाएगी या इस बात से कि आपातकाल में एंबुलेंस कितने मिनट में मरीज तक पहुंचती है? क्या स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता अस्पतालों की इमारतों से तय होगी या इस बात से कि किसी पहाड़ी मां को अपने बेटे को डोली में लादकर कितनी दूर नहीं चलना पड़ा? यही असली कसौटी है।
हर बार जब ऐसी तस्वीर सामने आती है तो सोशल मीडिया पर लोग दुख जताते हैं। उत्तराखंड की असली तस्वीर। यह कैसी स्वास्थ्य व्यवस्था? सरकार कब जागेगी? फिर कुछ दिन बाद दूसरी खबर आ जाती है। लेकिन डोली वहीं रहती है। पगडंडी वहीं रहती है। दूर अस्पताल वहीं रहता है और अगला मरीज भी शायद उसी रास्ते से जाएगा। इसलिए सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, पूरे समाज और व्यवस्था से है। क्यों हम उस तस्वीर को सामान्य मान बैठे हैं जिसमें चार इंसान पांचवें इंसान को कंधे पर उठाकर अस्पताल ले जा रहे हैं? डोली पहाड़ की परंपरा हो सकती है। लेकिन आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था का विकल्प नहीं। जिस दिन पहाड़ के किसी गांव में घायल को डोली की जरूरत नहीं पड़ेगी, उस दिन शायद हम कह सकेंगे कि विकास सचमुच गांव तक पहुंचा है। उस दिन सड़क सिर्फ कागज पर नहीं होगी। अस्पताल सिर्फ भवन नहीं होगा और एंबुलेंस सिर्फ सरकारी वाहन नहीं होगी। वह सचमुच मरीज तक पहुंचेगी।
तब पहाड़ का कंधा फिर घास की गठरी उठाएगा, लकड़ी उठाएगा, बच्चे को स्कूल पहुंचाएगा। लेकिन किसी मरीज की जिंदगी को अस्पताल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उसे अपने कंधे पर नहीं उठानी पड़ेगी। यही वह दिन होना चाहिए जिसे उत्तराखंड विकास का असली प्रमाण माने।
पहाड़ की सियासत में मुद्दों की ‘बौछार’
पहाड़ों पर आफत की बारिश के बीच बढ़ा सियासी तापमान
भाजपा का राहत पर दांव और कांग्रेस का अव्यवस्था पर वार
कांग्रेस के तीखे सवालों पर भाजपा का राहत-बचाव पर ढाल
2027 की दस्तक में बारिश के बीच जमीन पर उतरीं पार्टियां
देहरादून। उत्तराखंड में मानसून की बारिश भले ही पहाड़ों को भिगो रही हो, लेकिन प्रदेश का राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। कहीं सड़क और पुल बहने का मुद्दा है तो कहीं आपदा राहत और पुनर्वास को लेकर सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी ओर विधानसभा चुनाव 2027 की दस्तक के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों ने संगठन को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है। ऐसे में इस बार की बरसात सिर्फ नदियों और नालों का जलस्तर नहीं बढ़ा रही, बल्कि सियासत की हलचल भी तेज कर रही है। मानसून के दौरान उत्तराखंड में हर साल सड़कें टूटती हैं, पुल क्षतिग्रस्त होते हैं और गांवों का संपर्क जिला मुख्यालयों से कटता है। इस बार भी कई इलाकों में बारिश और भूस्खलन ने सरकार की तैयारियों की परीक्षा शुरू कर दी है। यही घटनाएं अब विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का राजनीतिक हथियार बन रही हैं। कांग्रेस सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर हमलावर है तो भाजपा विकास कार्यों और आपदा के दौरान किए जा रहे राहत एवं बचाव अभियानों को अपनी उपलब्धि के रूप में सामने रख रही है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में मानसून हमेशा सरकार के लिए बड़ी चुनौती लेकर आता है। सड़क बंद होने से लेकर गांवों तक राशन और जरूरी दवाइयां पहुंचाने तक प्रशासन की क्षमता की परीक्षा होती है। चारधाम यात्रा के बीच बारिश ने चुनौती को और बढ़ा दिया है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आपदा के दौरान राहत और बचाव कार्य तेजी से हों तथा प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य स्थिति जल्द बहाल की जाए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार लगातार अधिकारियों से तैयारियों और राहत कार्यों की जानकारी ले रही है। सरकार का दावा है कि संवेदनशील क्षेत्रों में मशीनरी और बचाव दलों को अलर्ट रखा गया है। लेकिन विपक्ष का सवाल है कि हर साल मानसून आने से पहले तैयारियों के दावे किए जाते हैं, फिर बारिश शुरू होते ही वही सड़कें और वही पुल क्यों टूटते हैं? यही सवाल आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बन सकता है।
2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में लाना शुरू कर दिया है। पार्टी का फोकस बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने का है, जहां पिछली बार पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। भाजपा नेतृत्व के सामने सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी की चुनौती है। ऐसे में संगठनात्मक गतिविधियों को तेज करने के साथ ही विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर मौजूद नाराजगी को कम करना भी पार्टी की प्राथमिकताओं में शामिल है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की तैयारी में है। समान नागरिक संहिता, महिला सशक्तीकरण, रोजगार, निवेश और विकास परियोजनाओं के साथ सरकार चारधाम और सीमांत क्षेत्रों में किए जा रहे कामों को भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाना चाहती है।
दूसरी तरफ कांग्रेस मानसून को सरकार के खिलाफ मुद्दे खड़े करने के अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी सड़क, स्वास्थ्य सेवाओं, बेरोजगारी, महंगाई और पलायन जैसे पुराने मुद्दों के साथ आपदा प्रबंधन को भी प्रमुखता से उठा रही है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार पर हमला करना नहीं, बल्कि इन मुद्दों को जनता के बीच एक मजबूत राजनीतिक विकल्प में बदलना है। संगठन में नई ऊर्जा भरने के प्रयास इसी दिशा में देखे जा रहे हैं। पार्टी नेताओं का लगातार जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय होना इस बात का संकेत है कि चुनावी तैयारी अब केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहने वाली।
उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ का दर्द कभी पुराना नहीं होता। सड़क टूटी तो सवाल विकास का, अस्पताल दूर हुआ तो सवाल स्वास्थ्य व्यवस्था का, युवा बाहर गया तो सवाल रोजगार का और गांव खाली हुआ तो सवाल पलायन का। मानसून इन सभी सवालों को अचानक सामने ला देता है। बरसात में बंद सड़क किसी सरकारी आंकड़े का हिस्सा नहीं होती। वह उस गांव के लिए जीवन की लाइन होती है। पुल टूटना किसी फाइल में दर्ज नुकसान भर नहीं होता, बल्कि कई परिवारों के लिए बाजार, स्कूल और अस्पताल से संपर्क टूट जाना होता है। यही वजह है कि मानसून के दौरान सामने आने वाली छोटी-छोटी घटनाएं भी चुनावी साल में बड़ा राजनीतिक संदेश बन सकती हैं।
विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनावी घड़ी चल चुकी है। आने वाले महीनों में विकास बनाम व्यवस्था, सरकार की उपलब्धियां बनाम स्थानीय नाराजगी और राष्ट्रीय मुद्दे बनाम उत्तराखंड के स्थानीय सवालों के बीच मुकाबला तेज होगा। भाजपा अपने मजबूत संगठन और सरकार की उपलब्धियों के सहारे मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश करेगी। क्षेत्रीय दल और अन्य राजनीतिक ताकतें भी अपनी जगह तलाशेंगी। ऐसे में इस मानसून की बारिश केवल पहाड़ की सड़कों और नदियों की परीक्षा नहीं ले रही। यह सरकार की तैयारी, प्रशासन की कार्यक्षमता और विपक्ष की राजनीतिक सक्रियताकृतीनों की परीक्षा है। आने वाले दिनों में बारिश थमेगी, सड़कें खुलेंगी और मौसम साफ होगा। लेकिन 2027 की राजनीति में इस बरसात के दौरान उठे सवाल शायद इतनी जल्दी नहीं थमेंगे।
सोमवार, 10 अगस्त 2026
udaydinmaan: बदलते दौर में खो गई ‘बुलाक’ की चमक
udaydinmaan: बदलते दौर में खो गई ‘बुलाक’ की चमक: सदियों की कहानी कहती एक छोटी-सी बुलाक की वह चमक पहाड़ के गांवों में कभी सुहाग और समृद्धि की पहचान थी बुलाक आज के फैशन के बीच लोक-संस्कृति की ...
कांग्रेस का बड़ा प्लान, यशपाल आर्य को कमान!
यशपाल आर्य को सीएम फेस बनाकर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी
सत्ता की लड़ाई में कांग्रेस का नया कार्ड, हाईकमान की मुहर का इंतजार
कांग्रेस की तराई से पहाड़ तक सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अब तेज होती जा रही है। भाजपा जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस अब ऐसा चेहरा तलाश रही है जो भाजपा के चुनावी नैरेटिव को सीधे चुनौती दे सके। पार्टी के भीतर से निकल रही चर्चाओं और सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर चुनाव मैदान में उतरने की रणनीति पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगर यह रणनीति अंतिम रूप लेती है तो उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा। कांग्रेस पहली बार चुनाव से पहले मुख्यमंत्री चेहरे को स्पष्ट कर भाजपा के सामने सीधी राजनीतिक लड़ाई खड़ी कर सकती है। हालांकि पार्टी की ओर से अभी तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है और अंतिम फैसला कांग्रेस हाईकमान को करना है।
कांग्रेस की रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने एक ऐसा चेहरा खड़ा करना है, जिसके पास लंबा राजनीतिक अनुभव हो और जो प्रदेश के अलग-अलग सामाजिक समीकरणों में स्वीकार्यता रखता हो। यशपाल आर्य उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। वह कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे हैं। इसके अलावा उनकी राजनीतिक पकड़ कुमाऊं के साथ-साथ तराई क्षेत्र में भी मानी जाती है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर पेश करने से चुनाव का विमर्श केवल धामी बनाम कौन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन और सरकार के प्रदर्शन जैसे मुद्दे भी केंद्र में आ सकते हैं।
आर्य को आगे करने की चर्चा के पीछे सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्तराखंड में दलित मतदाता चुनावी गणित में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस अगर आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर आगे करती है तो पार्टी इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व के बड़े संदेश के रूप में पेश कर सकती है। कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि भाजपा पिछले दो विधानसभा चुनावों से लगातार मजबूत स्थिति में है। ऐसे में केवल सरकार विरोधी माहौल के भरोसे सत्ता में वापसी मुश्किल हो सकती है। पार्टी को ऐसा नैरेटिव तैयार करना होगा जो मतदाताओं को यह भरोसा दिला सके कि उसके पास सरकार चलाने का स्पष्ट नेतृत्व और रोडमैप दोनों मौजूद हैं। यहीं पर आर्य का नाम कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
आर्य को मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करना कांग्रेस के लिए जितना बड़ा राजनीतिक दांव होगा, उतनी ही बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर पैदा हो सकती है। उत्तराखंड कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार माने जाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, विधायक और संगठन के कई प्रभावशाली चेहरे लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं। ऐसे में किसी एक चेहरे को चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने के बाद बाकी नेताओं को साथ लेकर चलना कांग्रेस नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी। कांग्रेस अगर आर्य के नाम पर आगे बढ़ती है तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पार्टी का चुनावी अभियान किसी एक नेता की महत्वाकांक्षा के बजाय सामूहिक नेतृत्व के संदेश के साथ आगे बढ़े।
भाजपा की रणनीति फिलहाल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व और सरकार की उपलब्धियों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ने की है। पार्टी संगठन बूथ स्तर तक अपनी तैयारियां तेज कर चुका है। ऐसे में कांग्रेस अगर आर्य को सामने रखती है तो मुकाबला सीधे दो राजनीतिक चेहरों के बीच दिखाई देने लगेगा। धामी की सबसे बड़ी ताकत उनकी युवा छवि और भाजपा संगठन का मजबूत नेटवर्क है। वहीं आर्य के पक्ष में लंबा प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव तथा विभिन्न सामाजिक समूहों में उनकी पहचान को रखा जा सकता है। यानी कांग्रेस की रणनीति सफल हुई तो 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं, बल्कि धामी बनाम आर्य की राजनीतिक लड़ाई के रूप में भी पेश हो सकता है।
यशपाल आर्य को आगे करने का एक और राजनीतिक संदेश क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा है। उत्तराखंड की राजनीति में कुमाऊं और गढ़वाल के बीच नेतृत्व के संतुलन का सवाल हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। आर्य के चेहरे के साथ कांग्रेस तराई और कुमाऊं के मतदाताओं को साधने की कोशिश कर सकती है। साथ ही पहाड़ में पार्टी के पुराने जनाधार को वापस खड़ा करने के लिए अलग रणनीति अपनाई जा सकती है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन की परंपरा को वह अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। पार्टी का संदेश हो सकता है कि भाजपा को लगातार दो कार्यकाल देने के बाद अब मतदाता बदलाव की ओर देख रहे हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस हाईकमान वास्तव में यशपाल आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में घोषित करेगा? सूत्रों की चर्चा को अगर राजनीतिक संकेत मानें तो कांग्रेस नेतृत्व उत्तराखंड के चुनाव को इस बार अधिक स्पष्ट नेतृत्व के साथ लड़ने की तैयारी में है। लेकिन पार्टी के भीतर की खींचतान और टिकट वितरण से लेकर नेतृत्व के सवाल तक कई ऐसे मोर्चे हैं, जिन पर अंतिम फैसला आसान नहीं होगा। कांग्रेस यदि आर्य को आगे करती है तो यह केवल एक नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाना नहीं होगा। यह उत्तराखंड की जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक गणित को नए सिरे से व्यवस्थित करने की कोशिश होगी।
आखिरकार चुनाव केवल चेहरों से नहीं जीते जाते। बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, आपदा, महंगाई, भ्रष्टाचार, चारधाम यात्रा और पहाड़ की बुनियादी जरूरतें भी मतदाता के सामने होंगी। भाजपा अपने विकास माडल और धामी सरकार के कामकाज को लेकर मैदान में उतरेगी। कांग्रेस को जवाब में केवल चेहरे की राजनीति नहीं, बल्कि एक स्पष्ट वैकल्पिक एजेंडा भी देना होगा। अगर कांग्रेस आर्य को सामने रखती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि चेहरा आकर्षण बने, बोझ नहीं। फिलहाल यशपाल आर्य का नाम कांग्रेस की संभावित रणनीति में तेजी से उभर रहा है। लेकिन राजनीति में सूत्रों की चर्चा और आधिकारिक फैसला दो अलग चीजें हैं। इसलिए असली तस्वीर कांग्रेस हाईकमान के निर्णय के बाद ही साफ होगी। फिर भी इतना तय है कि अगर कांग्रेस ने आर्य को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर मैदान में उतारने का फैसला कर लिया, तो उत्तराखंड का 2027 चुनाव अब तक के सबसे दिलचस्प राजनीतिक मुकाबलों में शामिल हो सकता है।
भाजपा ने तैयार की चुनावी ‘फौज’
भाजपा प्रदेश कार्यसमिति में दिग्गजों को जिम्मेदारी
अनुभवी नेताओं के साथ नए चेहरों को मिली जगह
बूथ से विधानसभा तक चुनावी नेटवर्क करेंगे मजबूत
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक जमीन अभी से तैयार होने लगी है। सत्ता में हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में लाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। पार्टी ने प्रदेश कार्यसमिति का गठन कर नेताओं की एक ऐसी टीम तैयार की है, जिसमें संगठन के अनुभवी चेहरों से लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाले नेताओं को जिम्मेदारियां दी गई हैं। प्रदेश कार्यसमिति की घोषणा को महज संगठनात्मक फेरबदल के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव की बड़ी रणनीति दिखाई दे रही है। भाजपा का लक्ष्य साफ हैकृसंगठन को मजबूत करो, बूथ को मजबूत करो और चुनाव से पहले हर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की पूरी मशीनरी को सक्रिय कर दो।
भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति में कई वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को जगह मिली है। पार्टी के लिए इन नेताओं का अनुभव चुनावी परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं संगठन में नई ऊर्जा लाने के लिए नए चेहरों को भी जिम्मेदारी देकर भाजपा ने यह संकेत दिया है कि आगामी चुनाव केवल सरकार के भरोसे नहीं, बल्कि संगठन की ताकत के दम पर लड़ा जाएगा। पार्टी की राजनीति में संगठन को हमेशा सबसे महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है। यही वजह है कि भाजपा चुनाव से काफी पहले अपनी टीम को मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है। प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य आने वाले समय में केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहेंगे। उन्हें विधानसभा क्षेत्रों में संगठन की स्थिति, बूथ स्तर की तैयारियों, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर भी नजर रखनी होगी।
भाजपा की इस पूरी कवायद में उन विधानसभा सीटों पर विशेष फोकस माना जा रहा है, जहां पार्टी को पिछले चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी पहले ही कमजोर सीटों की पहचान कर चुकी है और वरिष्ठ नेताओं को विधानसभा स्तर पर संगठनात्मक प्रवास की जिम्मेदारी देने की रणनीति पर काम कर रही है। अब प्रदेश कार्यसमिति की नई टीम इस अभियान को और गति दे सकती है। भाजपा की रणनीति है कि चुनाव की घोषणा का इंतजार करने के बजाय अभी से कमजोर बूथों और कमजोर विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय किया जाए। यानी इस बार भाजपा का चुनावी मंत्र केवल चुनाव के समय प्रचार नहीं, बल्कि चुनाव से पहले संगठन तैयार करने का है।
भाजपा के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाना भी महत्वपूर्ण होगा। सरकार की उपलब्धियों को लेकर पार्टी पहले से ही जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है। प्रदेश कार्यसमिति के जरिए पार्टी सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को बूथ स्तर तक पहुंचाने की कोशिश करेगी। इसके लिए कार्यकर्ताओं को यह बताया जाएगा कि सरकार ने क्या काम किया, उसका लाभ किन वर्गों को मिला और आने वाले समय में पार्टी का एजेंडा क्या होगा। भाजपा की कोशिश होगी कि सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बने और उसका फायदा चुनाव में मिले। प्रदेश कार्यसमिति का गठन पार्टी के भीतर टिकट की राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन संभावित प्रत्याशियों की सक्रियता पहले ही बढ़ चुकी है।
भाजपा नेतृत्व लगातार यह संकेत देता रहा है कि टिकट केवल व्यक्तिगत संपर्क या सिफारिश से नहीं, बल्कि संगठन में प्रदर्शन, जनता के बीच पकड़ और चुनाव जीतने की क्षमता के आधार पर तय होगा। ऐसे में नई कार्यसमिति में शामिल नेताओं की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। उन्हें संगठन के साथ-साथ स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की रिपोर्ट भी ऊपर तक पहुंचानी होगी। यानी प्रदेश कार्यसमिति सिर्फ पदों की सूची नहीं, बल्कि आने वाले चुनाव के लिए राजनीतिक फीडबैक सिस्टम भी बन सकती है। भाजपा की इस तैयारी ने कांग्रेस पर भी दबाव बढ़ा दिया है। कांग्रेस जहां अपने संगठन को नए सिरे से मजबूत करने और चुनावी चेहरे को लेकर मंथन कर रही है, वहीं भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर अपना ढांचा सामने रख दिया है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ा फायदा उसका मजबूत बूथ नेटवर्क है। पार्टी इस नेटवर्क को और सक्रिय करके चुनावी मुकाबले में शुरुआती बढ़त लेने की कोशिश कर रही है। हालांकि कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ स्थानीय नाराजगी, बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने का अवसर रहेगा। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती केवल संगठन खड़ा करने की नहीं, बल्कि जनता के बीच अपने पक्ष में माहौल बनाए रखने की भी होगी। उत्तराखंड की राजनीति में अक्सर चुनावी मुकाबला मुख्यमंत्री चेहरे और सरकार के प्रदर्शन के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। लेकिन 2027 में भाजपा इसे संगठनात्मक ताकत की लड़ाई बनाने की कोशिश कर रही है। प्रदेश कार्यसमिति में दिग्गजों को जिम्मेदारी देकर पार्टी ने संकेत दिया है कि चुनावी मैदान में एक साथ कई मोर्चे खोले जाएंगे। कोई नेता बूथ संभालेगा, कोई विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं को सक्रिय करेगा, कोई सरकार की उपलब्धियों को जनता तक ले जाएगा और कोई कमजोर सीटों पर पार्टी की संभावनाओं का आकलन करेगा। अर्थात भाजपा ने चुनाव से पहले ही अपनी फौज की तैनाती शुरू कर दी है।
संगठन की घोषणा करना आसान है, लेकिन उसे चुनावी मशीन में बदलना चुनौती है। कार्यसमिति के नेताओं के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह कागज पर मिली जिम्मेदारी को जमीन पर कितनी मजबूती से निभा पाते हैं। भाजपा अगर बूथ स्तर तक अपने संगठन को सक्रिय करने में सफल रहती है तो कांग्रेस के लिए मुकाबला और कठिन हो सकता है। लेकिन अगर स्थानीय असंतोष, टिकट की खींचतान या नेताओं के बीच गुटबाजी संगठन पर भारी पड़ती है तो यही बड़ा ढांचा पार्टी के लिए चुनौती भी बन सकता है। फिलहाल भाजपा ने साफ कर दिया है कि 2027 का चुनाव उसके लिए अभी से शुरू हो चुका है। प्रदेश कार्यसमिति का गठन इसी चुनावी तैयारी की पहली बड़ी तस्वीर है। अब देखना होगा कि भाजपा की यह राजनीतिक फौज विधानसभा चुनाव तक कितनी सक्रिय रहती है और बूथ से लेकर सत्ता के गलियारों तक उसकी रणनीति कितनी कारगर साबित होती है।
बदलते दौर में खो गई ‘बुलाक’ की चमक
सदियों की कहानी कहती एक छोटी-सी बुलाक की वह चमक
पहाड़ के गांवों में कभी सुहाग और समृद्धि की पहचान थी बुलाक
आज के फैशन के बीच लोक-संस्कृति की विरासत बचाने की चुनौती
देहरादून। पहाड़ की पगडंडियों पर चलती कोई महिला जब अपने पारंपरिक परिधान में नजर आती है तो उसके माथे की बिंदी, गले का गलोबंद, कानों के कर्णफूल और नाक की बुलाककृसब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं, जिसमें पहाड़ की लोकसंस्कृति सांस लेती दिखाई देती है। पहाड़ की स्त्री के श्रृंगार में बुलाक केवल सोने का एक आभूषण नहीं रही, बल्कि यह उसकी पहचान, परिवार की परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रही है। आज जब पहाड़ के गांव बदल रहे हैं, पहनावा बदल रहा है और नई पीढ़ी का फैशन भी बदल रहा है, तब बुलाक की चमक कुछ कम जरूर हुई है, लेकिन उसकी कहानी अब भी उतनी ही पुरानी और खूबसूरत है।
बुलाक को देखकर पहली नजर में शायद कोई इसे नाक का साधारण आभूषण समझे, लेकिन पहाड़ के पारंपरिक श्रृंगार में इसका अपना विशेष स्थान रहा है। खासकर पहाड़ी महिलाओं के पारंपरिक आभूषणों में बुलाक का उल्लेख आते ही पुरानी पीढ़ी के सामने गांव की महिलाएं, त्योहारों के अवसर पर सजे आंगन और पारंपरिक परिधानों में सजी पहाड़ की बेटियों की तस्वीर उभर आती है। सोने या अन्य धातु से बनी बुलाक अपने आकार और डिजाइन में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग दिखाई दे सकती है। कहीं इसमें महीन नक्काशी होती है तो कहीं यह साधारण लेकिन बेहद आकर्षक डिजाइन में दिखाई देती है। यही विविधता पहाड़ के आभूषणों की खूबसूरती है।
पहाड़ के पारंपरिक समाज में शादी-ब्याह केवल दो व्यक्तियों का रिश्ता नहीं, बल्कि पूरे गांव और परिवार का उत्सव होता था। ऐसे अवसरों पर महिलाओं का पारंपरिक श्रृंगार विशेष महत्व रखता था। दुल्हन के परिधान के साथ बुलाक भी उसके श्रृंगार का हिस्सा बनती थी। बुजुर्ग महिलाएं अपनी बहुओं और बेटियों को पुराने गहनों के बारे में बतातीं और कई परिवारों में पीढ़ियों से संभालकर रखे गए आभूषण विशेष अवसरों पर निकाले जाते थे। इस तरह एक बुलाक सिर्फ आभूषण नहीं रहती थी। उसमें मां की याद होती थी, दादी की कहानी होती थी और परिवार की कई पीढ़ियों का स्पर्श जुड़ा होता था। पहाड़ में पारंपरिक आभूषणों की एक खास खूबी यह रही कि वे स्थानीय कारीगरों की कला से जुड़े थे। सुनार केवल गहना बनाने वाला कारीगर नहीं होता था, बल्कि वह स्थानीय संस्कृति और परिवारों की पसंद को भी समझता था। बुलाक के डिजाइन में स्थानीय शिल्प की झलक दिखाई देती थी। महीन काम, छोटे आकार और पारंपरिक आकृतियां इसे सामान्य बाजार में मिलने वाले आभूषणों से अलग बनाती थीं।
लेकिन वक्त बदला। गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा। पारंपरिक परिधान रोजमर्रा की जिंदगी से दूर होने लगे। इसके साथ ही कई पुराने आभूषण भी संदूकों और संदूकों के भीतर रखी स्मृतियों तक सीमित होते गए। आज की पीढ़ी पारंपरिक गहनों को नए अंदाज में पहनना चाहती है। यही कारण है कि बुलाक भी अब केवल पारंपरिक पोशाक तक सीमित नहीं है। कुछ युवा इसे आधुनिक परिधानों के साथ भी पहनने लगी हैं। सोशल मीडिया ने भी पारंपरिक आभूषणों को नई पहचान देने में भूमिका निभाई है। पहाड़ की संस्कृति और पारंपरिक पहनावे को लेकर बढ़ती रुचि ने बुलाक जैसे आभूषणों को फिर चर्चा में ला दिया है। लेकिन यहां सवाल केवल फैशन का नहीं है। अगर बुलाक केवल फैशन बनकर रह गई और उसके पीछे की कहानी भूल गई तो एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है।
कई घरों में पुराने आभूषणों की अपनी कहानी होती है। मां की शादी में पहनी गई बुलाक बेटी की शादी तक पहुंचती है। कभी दादी की बुलाक पोती के श्रृंगार का हिस्सा बन जाती है। इन गहनों की कीमत केवल सोने के भाव से नहीं लगाई जा सकती। क्योंकि उनकी असली कीमत उस कहानी में है जो उनके साथ जुड़ी है। एक छोटी-सी बुलाक कभी किसी मां की विदाई की गवाह रही होगी। कभी किसी बेटी के विवाह में चमकी होगी। कभी किसी त्योहार पर गांव की महिलाओं के सामूहिक उत्सव का हिस्सा बनी होगी। इसलिए पहाड़ के पुराने संदूक में रखी बुलाक वास्तव में बीते समय की एक छोटी-सी डायरी है।
पलायन और बदलती जीवनशैली ने पहाड़ के पारंपरिक पहनावे और आभूषणों को प्रभावित किया है। गांव खाली हो रहे हैं तो पारंपरिक शिल्प से जुड़े कई कारीगरों के सामने भी बाजार की चुनौती है। जरूरत इस बात की है कि बुलाक जैसे आभूषणों को केवल संग्रहालय की वस्तु न बनने दिया जाए। इन्हें आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़ा जाए, स्थानीय कारीगरों को बाजार मिले और नई पीढ़ी को इनके सांस्कृतिक महत्व के बारे में बताया जाए। स्कूलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और स्थानीय मेलों में पहाड़ के पारंपरिक आभूषणों की प्रदर्शनी और इनके पीछे की कहानियां नई पीढ़ी तक पहुंचाई जा सकती हैं।
पहाड़ की संस्कृति को समझने के लिए हमेशा बड़े-बड़े स्मारकों की जरूरत नहीं होती। कभी किसी बुजुर्ग महिला के संदूक में रखा छोटा-सा गहना भी पूरी संस्कृति की कहानी कह देता है। बुलाक भी ऐसा ही एक गहना है। उसकी चमक में पहाड़ की स्त्री का श्रृंगार है, उसके डिजाइन में स्थानीय कारीगर की मेहनत है, उसकी स्मृति में परिवार की पीढ़ियां हैं और उसके अस्तित्व में पहाड़ की लोकसंस्कृति की वह डोर है जो अतीत को वर्तमान से जोड़ती है। बुलाक छोटी है, लेकिन इसकी कहानी बहुत बड़ी है और शायद यही वजह है कि जब पहाड़ की कोई बेटी अपनी नाक में बुलाक सजाती है, तो वह सिर्फ गहना नहीं पहनतीकृवह अपने साथ पहाड़ की एक पूरी विरासत लेकर चलती है।
रविवार, 9 अगस्त 2026
udaydinmaan: पहाड़ में बचपन की आखिरी आवाज ‘धगुली’
udaydinmaan: पहाड़ में बचपन की आखिरी आवाज ‘धगुली’: स्मार्टफोन के शोर में खो गई धगुली की छनकाहट, सूने पड़े आंगन और स्क्रीन पर सिमटा पहाड़ का बचपन न महंगे खिलौने, न बाजार की जरूरत, खेत-खलिहान और ...
पहाड़ में बचपन की आखिरी आवाज ‘धगुली’
स्मार्टफोन के शोर में खो गई धगुली की छनकाहट, सूने पड़े आंगन और स्क्रीन पर सिमटा पहाड़ का बचपन
न महंगे खिलौने, न बाजार की जरूरत, खेत-खलिहान और धगुली से सजता था बच्चों का संसार
खाली होते गांव और मोबाइल स्क्रीन का अकेलापन, अब इतिहास बन गई सामूहिक खेलों की वह टोली
देहरादून। पहाड़ के गांव में बचपन कभी बहुत महंगा नहीं था। खेलने के लिए बाजार से खिलौने खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती थी। खेत की मेड़, घर का आंगन, जंगल की पगडंडी और पत्थरों के बीच बहता पानी ही बच्चों का खेल का मैदान हुआ करता था। खिलौने भी आसपास की चीजों से बन जाते थे। इन्हीं खिलौनों में एक थी धगुली। धगुली हाथ में आती तो बच्चे की चाल में जैसे कोई उत्सव उतर आता। उसे घुमाने पर निकलती आवाज दूर तक सुनाई देती। वह आवाज सिर्फ धातु की नहीं थी, वह पहाड़ के उस बचपन की आवाज थी जिसमें खेल था, शरारत थी और सामूहिकता थी। आज गांवों में धगुली की आवाज कम सुनाई देती है। उसकी जगह मोबाइल फोन की आवाज ने ले ली है। कभी आंगन में बच्चों की टोली होती थी, अब कई आंगन खाली हैं। कभी एक बच्चा धगुली लेकर निकलता तो चार और उसके पीछे हो लेते थे। अब बच्चे स्क्रीन पर अकेले खेलते हैं।
धगुली शायद बहुत मामूली चीज थी, लेकिन पहाड़ के बचपन के लिए उसका महत्व मामूली नहीं था। वह खिलौना बच्चों को किसी दुकान से नहीं मिलता था। घर के बड़े-बुजुर्ग उसे बनाते थे या आसपास से उपलब्ध चीजों से बच्चे खुद अपना खेल तैयार करते थे। यही तो पहाड़ के बचपन की खासियत थीकृकम साधनों में ज्यादा खुशी। आज जब बाजार बच्चों के लिए हजारों तरह के खिलौने बेचता है, तब उस दौर का बच्चा बिना किसी महंगे खिलौने के भी खुश था। धगुली के साथ खेलते हुए बच्चों की टोली गांव की गलियों से गुजरती थी। किसी के घर के आंगन में थोड़ी देर खेलना, फिर दूसरे घर की ओर भाग जाना। रास्ते में किसी दोस्त का इंतजार करना। कभी खेत की मेड़ पर बैठ जाना और कभी जंगल की ओर निकल जाना।
बचपन का अपना भूगोल था। उस भूगोल में कोई मोबाइल नेटवर्क नहीं था, लेकिन संवाद खूब था। कोई आनलाइन गेम नहीं था, लेकिन खेलों की कमी नहीं थी। कोई वर्चुअल दोस्त नहीं था, क्योंकि दोस्त सामने होते थे और धगुली की आवाज उन दोस्तों को एक-दूसरे से जोड़ती थी। पहाड़ में बच्चों के खेल कभी केवल खेल नहीं होते थे। उनमें जीवन की छोटी-छोटी सीख छिपी होती थी। बच्चे मिलकर खेलते थे तो उनमें बांटने की आदत आती थी। हारते थे तो अगली बार जीतने की कोशिश करते थे। किसी दोस्त के पास खिलौना नहीं होता तो दूसरा अपना खिलौना उसके साथ साझा कर लेता था। यानी खिलौना छोटा था, लेकिन उससे बनने वाला सामाजिक संसार बड़ा था।
आज बच्चे के पास खिलौनों की कमी नहीं है, लेकिन साथ खेलने वाले बच्चों की कमी जरूर हो गई है। यह सिर्फ तकनीक का असर नहीं है। इसके पीछे पहाड़ के गांवों का बदलता जीवन भी है। पलायन ने पहाड़ के कई गांवों से बच्चों की टोली छीन ली। जिन घरों में कभी बच्चों की आवाज गूंजती थी, वहां अब बुजुर्गों की खामोशी है। स्कूलों में छात्र संख्या घटती गई। कई गांवों के रास्तों पर अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं रही। ऐसे में धगुली भी धीरे-धीरे स्मृति का हिस्सा बन गई।
आज अगर किसी पहाड़ी गांव में धगुली की चर्चा छेड़ दी जाए तो बुजुर्गों के चेहरे पर एक अलग चमक दिखाई देती है। व अपने बचपन में लौट जाते हैं। उन्हें याद आता है कि कैसे त्योहारों के दिनों में बच्चे नए उत्साह के साथ खेलते थे। कैसे गांव के एक छोर से दूसरे छोर तक बच्चों की टोली निकलती थी। कैसे घर की महिलाएं अपने काम के बीच बच्चों की आवाज सुनकर मुस्कुरा देती थीं। किसी दादी के पास धगुली से जुड़ी कहानी है तो किसी नाना के पास उसके साथ खेले गए खेल की याद। वह दौर अब तस्वीरों में नहीं, स्मृतियों में बचा है और स्मृतियां भी तब तक बचती हैं जब तक कोई उन्हें सुनाने वाला हो।
आज पहाड़ का बच्चा भी उसी डिजिटल दुनिया का हिस्सा है, जिसमें शहर का बच्चा है। उसके हाथ में स्मार्टफोन है, स्क्रीन है और आनलाइन मनोरंजन है। इसमें बुराई नहीं कि समय बदल रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बदलते समय के साथ हम अपनी छोटी-छोटी लोक स्मृतियों को भी खोते जा रहे हैं? धगुली कोई ऐतिहासिक धरोहर नहीं होगी। शायद उसका कोई संग्रहालय भी न बने। लेकिन किसी संस्कृति की पहचान केवल बड़ी चीजों से नहीं होती। वह उन छोटी चीजों में भी छिपी होती है जिन्हें लोग सामान्य समझकर भूल जाते हैं। एक खिलौना भी संस्कृति का हिस्सा हो सकता है। एक खेल भी इतिहास हो सकता है। एक आवाज भी किसी पीढ़ी की पहचान बन सकती है। धगुली ऐसी ही एक पहचान है।
जरूरी नहीं कि आज के बच्चों को वही पुराने खिलौने दिए जाएं और उनसे कहा जाए कि वे उसी तरह खेलें जैसे उनके दादा-दादी खेलते थे। समय को पीछे नहीं लौटाया जा सकता। लेकिन उस समय की कहानियां जरूर आगे ले जाई जा सकती हैं। स्कूलों में स्थानीय खेलों और खिलौनों पर गतिविधियां हों। गांवों में बुजुर्ग बच्चों को पुराने खेल सिखाएं। स्थानीय मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में पहाड़ के पारंपरिक खिलौनों को जगह मिले। बच्चों को बताया जाए कि उनके गांव में मोबाइल फोन आने से पहले बचपन कैसा था। क्योंकि धगुली को बचाना वास्तव में एक खिलौने को बचाना नहीं है। यह उस बचपन की स्मृति को बचाना है जिसमें खुशियां बाजार से नहीं, अपने आसपास से पैदा होती थीं।
पहाड़ बदल रहा है। घर बदल रहे हैं। रास्ते बदल रहे हैं। बच्चों के खेल बदल रहे हैं। लेकिन पहाड़ की स्मृतियों को पूरी तरह बदल जाने देना जरूरी नहीं। कभी किसी पुराने संदूक में पड़ी धगुली को निकालिए। उसे बच्चे के हाथ में दीजिए। शायद वह बच्चा पहले उसे अजीब नजरों से देखे। फिर उसे घुमाए और जब उससे वह पुरानी आवाज निकलेगी, तो संभव है कि पास बैठा कोई बुजुर्ग अचानक मुस्कुरा उठे। उस मुस्कान में उसका पूरा बचपन छिपा होगा। धगुली की वह आवाज शायद लौटकर फिर गांव की गलियों में न गूंजे, लेकिन उसकी कहानी अगली पीढ़ी तक जरूर पहुंच सकती है। क्योंकि पहाड़ सिर्फ पहाड़ नहीं होता। वह उन आवाजों का भी घर है, जो समय बीतने के बाद सुनाई देना बंद हो जाती हैंकृलेकिन खत्म नहीं होतीं।
आस्था की ‘तेज रफ्तार’
आस्था और रफ्तार आमने-सामने,पुलिस के सामने व्यवस्था की अग्निपरीक्षा
सड़कों पर उमड़ता जनसैलाब, तेज दौड़ते वाहन और समय की है बड़ी चुनौती
पारंपरिक यात्रा से अलग इस दौर में ट्रैफिक और सुरक्षा बनाने का कड़ा मोर्चा
देहरादून। सावन आते ही हरिद्वार की सड़कों का रंग बदल जाता है। गंगा घाटों पर आस्था उमड़ती है और कांवड़ियों के जत्थे शहर से गुजरते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं। लेकिन डाक कांवड़ के दौर में यह भीड़ सिर्फ बड़ी नहीं होती, उसकी रफ्तार भी चुनौती बन जाती है। तेज दौड़ते वाहन, सड़कों पर उमड़ता जनसैलाब और हर तरफ गूंजते जयकारे के बीच पुलिस के सामने एक साथ कई मोर्चे खुल जाते हैं। यही वह समय है जब पुलिस की असली अग्नि परीक्षा शुरू होती है। डाक कांवड़ का स्वरूप पारंपरिक कांवड़ यात्रा से अलग है। यहां समय की अहमियत बढ़ जाती है। कांवड़िए तेजी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं और सड़क पर वाहनों की आवाजाही भी प्रभावित होती है। ऐसे में यातायात व्यवस्था, श्रद्धालुओं की सुरक्षा, स्थानीय लोगों की आवाजाही और आपातकालीन सेवाओं को सुचारु रखना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। एक छोटी-सी चूक बड़ी समस्या का कारण बन सकती है।
डाक कांवड़ के दौरान पुलिस को सबसे ज्यादा मशक्कत यातायात व्यवस्था को लेकर करनी पड़ती है। एक ओर कांवड़ियों के लिए निर्धारित मार्गों पर भारी भीड़ रहती है, दूसरी ओर स्थानीय और बाहरी वाहनों की आवाजाही भी बनी रहती है। कई स्थानों पर सड़क का एक हिस्सा पूरी तरह कांवड़ियों के लिए सुरक्षित करना पड़ता है। रूट डायवर्जन लागू किए जाते हैं। भारी वाहनों को रोकना पड़ता है। शहर के भीतर यातायात का दबाव बढ़ जाता है। पुलिस के सामने सवाल सिर्फ रास्ता खाली कराने का नहीं होता। सवाल यह होता है कि किसी भी परिस्थिति में श्रद्धालुओं की सुरक्षा से समझौता न हो और आम नागरिक को भी परेशानी कम से कम हो।
हरिद्वार से लेकर रुड़की और आगे उत्तर प्रदेश की सीमा तक पुलिस की तैनाती बढ़ जाती है। प्रमुख चौराहों, हाईवे, घाटों और संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त बल लगाया जाता है। पुलिसकर्मी घंटों सड़क पर खड़े रहते हैं। तेज धूप हो या बारिश, उनकी ड्यूटी लगातार चलती रहती है। कई जवानों के लिए यह केवल कुछ घंटों की ड्यूटी नहीं होती। उन्हें लगातार कई शिफ्ट में भीड़ के बीच काम करना पड़ता है। भीड़ का मनोविज्ञान समझना पड़ता है। कहां बैरिकेडिंग करनी है? कहां रास्ता खोलना है? कहां भीड़ को रोकना है? कहां एंबुलेंस को रास्ता देना है? हर निर्णय तत्काल लेना पड़ता है।
बड़े धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन सबसे संवेदनशील कामों में से एक है। डाक कांवड़ में यह चुनौती और बढ़ जाती है, क्योंकि श्रद्धालुओं की संख्या के साथ उनकी गति भी तेज होती है। पुलिस के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि किसी अफवाह को फैलने से रोका जाए। सोशल मीडिया के दौर में छोटी-सी गलत सूचना भी कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। ऐसे में पुलिस को केवल सड़क पर नहीं, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी निगरानी रखनी पड़ती है। सीसीटीवी, ड्रोन, कंट्रोल रूम और वायरलेस नेटवर्क के जरिए स्थिति पर नजर रखी जाती है। संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त निगरानी की जरूरत पड़ती है।
कांवड़ यात्रा आस्था का पर्व है। पुलिस की भूमिका यहां सिर्फ कानून लागू करने की नहीं, बल्कि आस्था और व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की भी होती है। कांवड़िए देश के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं। उनके लिए हरिद्वार की यात्रा धार्मिक भावनाओं से जुड़ी होती है। ऐसे में पुलिस को भीड़ से संवाद करते हुए व्यवस्था बनाए रखनी होती है। जहां जरूरी हो, सख्ती करनी पड़ती है। लेकिन सख्ती का मतलब संवेदनशीलता खत्म करना नहीं है। यही पुलिस के लिए सबसे कठिन संतुलन है। कांवड़ यात्रा के दौरान पुलिस की चुनौती केवल कांवड़ियों तक सीमित नहीं रहती। स्थानीय नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित होती है। रूट डायवर्जन के कारण लोगों को लंबा रास्ता तय करना पड़ सकता है। बाजारों और मुख्य सड़कों पर यातायात का दबाव बढ़ जाता है। स्कूल, अस्पताल और कार्यालय जाने वालों को भी कई बार वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ते हैं। ऐसे में पुलिस को स्थानीय नागरिकों की सुविधा का भी ध्यान रखना पड़ता है। विशेष रूप से अस्पताल जाने वाली एंबुलेंस और आपातकालीन वाहनों के लिए रास्ता खुला रखना बेहद जरूरी होता है।
डाक कांवड़ कुछ दिनों बाद अपने गंतव्य तक पहुंच जाएगी। सड़कें सामान्य हो जाएंगी। बैरिकेड हट जाएंगे। यातायात फिर अपनी पुरानी गति पकड़ लेगा। लेकिन इस पूरे आयोजन के दौरान पुलिस के सामने खड़ी चुनौती छोटी नहीं है। यह केवल भीड़ संभालने की ड्यूटी नहीं। यह धैर्य, अनुशासन, संवेदनशीलता और त्वरित निर्णय क्षमता की परीक्षा है। एक तरफ लाखों लोगों की आस्था है, दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी। एक तरफ तेज रफ्तार डाक कांवड़ है, दूसरी तरफ सड़क पर चलती जिंदगी। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना ही पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। डाक कांवड़ में आस्था की रफ्तार तेज है, लेकिन व्यवस्था की जिम्मेदारी उससे भी बड़ी और इस पूरे सैलाब के बीच अगर यात्रा सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ती है, तो उसके पीछे सिर्फ व्यवस्था नहीं, बल्कि सड़क पर घंटों खड़ी वह खाकी भी होती है, जिसकी अग्नि परीक्षा हर सावन में होती है।
भाजपा की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
धामी ने कसा बूथ का पेच, सुस्त विपक्ष के लिए खतरे की घंटी
भाजपा की बैठक में मुख्यमंत्री धामी ने किया चुनावी शंखनाद
मिशन 2027 के लिए संगठन को मैदान में उतरने का दिया संदेश
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती भले अभी शुरू न हुई हो, लेकिन सियासी मैदान में तैयारियां तेज हो गई हैं। भाजपा की अहम बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की हुंकार ने साफ कर दिया कि पार्टी अब चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने से लेकर संगठन को बूथ स्तर पर सक्रिय करने तक की रणनीति पर जोर के बीच धामी का संदेश साफ थाकृअब रुकना नहीं है, चुनावी मैदान में उतरना है। धामी की इस हुंकार को सिर्फ कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाला भाषण मानना राजनीतिक भूल होगी। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव का पूरा खाका दिखाई देता है। भाजपा सत्ता में है और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य उसके सामने है। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए जमीन तलाश रही है। ऐसे में भाजपा की यह बैठक विपक्ष के लिए भी संदेश है कि सत्तारूढ़ दल चुनावी लड़ाई को लेकर गंभीर है और संगठन को अभी से सक्रिय करने की तैयारी में जुट गया है।
मुख्यमंत्री धामी की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में भाजपा के लिए उत्तराखंड में एक महत्वपूर्ण चुनावी चेहरा बनकर उभरी है। 2022 में पार्टी के सत्ता में लौटने के बाद धामी के नेतृत्व में सरकार ने कई ऐसे फैसलों को राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाया, जिन्हें भाजपा अब जनता के बीच लेकर जाने की तैयारी में है। अब चुनौती यह है कि सरकारी फैसले फाइलों से निकलकर मतदाता तक पहुंचें। यही वजह है कि भाजपा की रणनीति में संगठन को सबसे आगे रखा जा रहा है। धामी का संदेश कार्यकर्ताओं के लिए जितना स्पष्ट था, उतना ही विपक्ष के लिए भीकृभाजपा चुनाव का इंतजार नहीं करेगी, बल्कि चुनाव से पहले ही चुनावी जमीन तैयार करेगी। कांग्रेस लंबे समय से सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे उठा रही है। विपक्ष की कोशिश है कि इन मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जाए।
भाजपा अब विपक्ष के इसी नैरेटिव का जवाब अपने विकास और जनकल्याणकारी फैसलों के जरिए देने की तैयारी में है। लेकिन भाजपा के सामने चुनौती भी कम नहीं है। सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद स्थानीय स्तर पर नाराजगी पैदा होना स्वाभाविक राजनीतिक जोखिम है। कई सीटों पर विधायकों के कामकाज को लेकर कार्यकर्ताओं और जनता की राय पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगी। यानी धामी की हुंकार के बाद अब संगठन को केवल विपक्ष से नहीं, अपने भीतर की चुनौतियों से भी मुकाबला करना होगा।
भाजपा का चुनावी गणित हमेशा बूथ से शुरू होता है। बड़े नेताओं की रैलियां माहौल बना सकती हैं, लेकिन वोट बूथ पर पड़ता है। इसीलिए पार्टी कमजोर बूथों की पहचान, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और मतदाताओं से लगातार संपर्क पर जोर दे रही है। भाजपा का लक्ष्य साफ हैकृचुनाव की घोषणा से पहले संगठन इतना मजबूत हो जाए कि आखिरी समय में उसे हड़बड़ी में व्यवस्था खड़ी न करनी पड़े। यह रणनीति कांग्रेस के लिए चुनौती है। कांग्रेस अगर चुनाव से कुछ महीने पहले संगठन को सक्रिय करने की कोशिश करती है और भाजपा पहले से बूथ पर पहुंच चुकी होती है, तो चुनावी मुकाबले का अंतर यहीं से बन सकता है।
भाजपा की चुनावी रणनीति चाहे जितनी मजबूत हो, अंतिम फैसला जनता को करना है। उत्तराखंड के गांवों में आज भी रोजगार और पलायन बड़ा सवाल है। पहाड़ में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति, शिक्षा, सड़क और पेयजल जैसे मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा बने रहेंगे। युवा रोजगार चाहता है। महिला सुरक्षित और सुविधाजनक जीवन चाहती है। किसान अपनी उपज की कीमत चाहता है। गांव बुनियादी सुविधाएं चाहता है और पहाड़ चाहता है कि विकास केवल घोषणाओं में नहीं, जमीन पर भी दिखाई दे। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती केवल यह बताने की नहीं होगी कि उसने क्या किया। चुनौती यह साबित करने की भी होगी कि सरकार के काम का असर आम आदमी की जिंदगी पर कितना पड़ा।
2027 का चुनाव सिर्फ भाजपा की परीक्षा नहीं होगा। यह मुख्यमंत्री धामी के राजनीतिक नेतृत्व की भी बड़ी परीक्षा होगी। अगर भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटती है तो धामी की राजनीतिक स्थिति और मजबूत होगी। लेकिन अगर पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो स्वाभाविक रूप से नेतृत्व और रणनीति पर सवाल उठेंगे। इसलिए बैठक में धामी की हुंकार के पीछे राजनीतिक दांव भी बड़ा है। यह केवल कार्यकर्ताओं से जोश मांगने का वक्त नहीं है। यह अपने नेतृत्व, संगठन और सरकार के रिपोर्ट कार्ड को जनता की अदालत में ले जाने की तैयारी है।
धामी की हुंकार को कांग्रेस शायद इसी वजह से हल्के में नहीं लेना चाहेगी। विपक्ष के सामने अब सवाल है कि वह भाजपा के मजबूत संगठन का मुकाबला किस रणनीति से करेगा? क्या कांग्रेस बूथ स्तर पर भाजपा की बराबरी कर पाएगी? क्या वह स्थानीय असंतोष को वोट में बदल पाएगी? क्या वह सरकार के खिलाफ मुद्दों को एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदल सकेगी? या फिर भाजपा सरकार की योजनाओं और संगठन की ताकत के सामने विपक्ष का हमला बिखर जाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे।
भाजपा की बैठक से एक बात साफ हैकृउत्तराखंड की राजनीति अब धीरे-धीरे चुनावी रंग में रंगने लगी है। मुख्यमंत्री ने कार्यकर्ताओं को संदेश दे दिया है। संगठन ने तैयारी शुरू कर दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि यह हुंकार कितनी जल्दी गांव, शहर, बूथ और मतदाता तक पहुंचती है। क्योंकि चुनाव भाषणों से शुरू जरूर होते हैं, लेकिन जीत मतदाता के दरवाजे पर तय होती है। धामी ने हुंकार भर दी है। अब भाजपा के सामने चुनौती है कि इस हुंकार को हर बूथ की आवाज बनाया जाए और विपक्ष के सामने चुनौती है कि वह इस आवाज का जवाब कैसे देता है। उत्तराखंड का 2027 चुनाव अभी दूर दिखाई दे सकता है, लेकिन उसकी सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।
‘ठंडी हवा’ के बीच चढ़ा ‘सियासी पारा’
कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे की कुमाऊं रैली ने कांग्रेस में फूंकी नई जान
अब सवालकृजोश वोट में बदलेगा या फिर रह जाएगा मंच तक ही
कुमाऊं से कांग्रेस का चुनावी संदेश कार्यकर्ताओं में दिखा उत्साह
प्रदेश भाजपा के सामने विपक्ष की सक्रियता बढ़ाने की होगी चुनौती
देहरादून। कुमाऊं की जमीन पर कांग्रेस की राजनीति को एक बार फिर आवाज मिली है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली ने पार्टी के उन कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने की कोशिश की है, जो लंबे समय से सत्ता पक्ष के सामने खुद को कमजोर महसूस कर रहे थे। मंच पर भाषण थे, नारे थे, भीड़ थी और चुनावी दावे भी। लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या यह रैली कांग्रेस के भीतर पैदा हुई राजनीतिक सुस्ती को सचमुच तोड़ पाएगी? या फिर कुछ घंटों की राजनीतिक गर्मी के बाद पहाड़ की ठंडी हवा सब कुछ पहले जैसा कर देगी? यही सवाल कांग्रेस के सामने है। कुमाऊं उत्तराखंड की राजनीति में सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। यहां की विधानसभा सीटें प्रदेश की सत्ता का रास्ता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का कुमाऊं पहुंचना अपने आप में राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस यह बताना चाहती है कि वह 2027 की लड़ाई के लिए तैयार हो रही है। लेकिन चुनाव की तैयारी मंच से ज्यादा जमीन पर दिखाई देती है।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी जरूरत इस समय केवल भाषण नहीं, भरोसा है। कार्यकर्ता पूछता हैकृपार्टी की रणनीति क्या है?कौन नेतृत्व करेगा? उम्मीदवारों का चयन कैसे होगा? बूथ पर संगठन कितना मजबूत है? और सबसे बड़ा सवालकृक्या कांग्रेस इस बार भाजपा को सीधी चुनौती देने की स्थिति में है? खड़गे की रैली ने कम से कम इतना जरूर किया कि पार्टी के भीतर यह संदेश गया कि केंद्रीय नेतृत्व उत्तराखंड को नजरअंदाज नहीं कर रहा। कार्यकर्ता के लिए बड़े नेता का मैदान में उतरना सिर्फ राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होता। वह इसे अपने संघर्ष की स्वीकृति के रूप में भी देखता है। यही वजह है कि रैली के बाद कांग्रेस के भीतर उत्साह दिखाई देना स्वाभाविक है। लेकिन उत्साह और चुनावी संगठन के बीच काफी लंबी दूरी होती है।
कुमाऊं की जनता के सामने मुद्दे किसी रैली के साथ पैदा नहीं हुए हैं। रोजगार का सवाल पुराना है। पलायन का दर्द पुराना है। स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी पुरानी है। युवाओं की प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर चिंता पुरानी है। सड़क, पानी और शिक्षा के सवाल भी पुराने हैं। राजनीतिक दल आते हैं, भाषण करते हैं, वादे करते हैं और चले जाते हैं। जनता फिर वही सवाल लेकर खड़ी रह जाती है। इसलिए खड़गे की रैली का राजनीतिक असर इस बात से तय नहीं होगा कि मंच पर कितने नारे लगे। असर इस बात से तय होगा कि कांग्रेस इन सवालों को कितनी मजबूती से गांव तक लेकर जाती है।
कांग्रेस के सामने एक आसान रास्ता हैकृभाजपा सरकार की आलोचना करना। सत्ता में रहने वाली पार्टी से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी। लेकिन सिर्फ सवाल पूछने से विपक्ष मजबूत नहीं होता। जनता को यह भी बताना पड़ता है कि अगर सत्ता मिली तो क्या बदलेगा? पलायन रोकने की ठोस नीति क्या होगी? युवा को रोजगार कैसे मिलेगा? पहाड़ के अस्पतालों में डाक्टर कैसे पहुंचेंगे? सरकारी स्कूल कैसे मजबूत होंगे? स्थानीय अर्थव्यवस्था को कैसे खड़ा किया जाएगा? महिलाओं की आय और सुरक्षा के लिए क्या किया जाएगा? कांग्रेस अगर इन सवालों के स्पष्ट जवाब जनता के सामने रखती है तो खड़गे की रैली एक बड़े राजनीतिक अभियान की शुरुआत बन सकती है। वरना यह भी दूसरी राजनीतिक रैलियों की तरह भीड़ और भाषणों की खबर बनकर रह जाएगी।
कांग्रेस जानती है कि भाजपा को उत्तराखंड में चुनौती देना केवल विधानसभा स्तर पर उम्मीदवार उतारने से संभव नहीं होगा। भाजपा का संगठन बूथ तक फैला हुआ है। उसके पास कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है। सरकार के पास योजनाओं और उपलब्धियों का अपना नैरेटिव है। ऐसे में कांग्रेस को मुकाबले के लिए केवल बड़े नेताओं की रैलियां नहीं, बल्कि हर बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ता चाहिए। खड़गे की रैली अगर इस संगठनात्मक कमजोरी को दूर करने की शुरुआत करती है तो इसका राजनीतिक महत्व बढ़ जाएगा। वरना राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी से कुछ घंटों का उत्साह तो पैदा किया जा सकता है, लेकिन चुनाव नहीं जीता जा सकता। उत्तराखंड कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती कई बार विपक्ष से ज्यादा उसके भीतर दिखाई देती रही है। नेताओं के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। समर्थकों के अपने-अपने समूह हैं। टिकट को लेकर दावेदारियां हैं और हर नेता की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह स्थानीय नेताओं को एक मंच पर कितना ला पाता है। कांग्रेस अगर 2027 को सत्ता में वापसी का चुनाव बनाना चाहती है तो उसे पहले अपने भीतर एकता का चुनाव जीतना होगा। क्योंकि जनता उस पार्टी पर भरोसा करने में हिचक सकती है जो खुद अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट दिखाई न दे।
खड़गे की कुमाऊं रैली ने कांग्रेस को निश्चित रूप से ऊर्जा दी है। कार्यकर्ताओं को यह संदेश मिला है कि लड़ाई अभी बाकी है। लेकिन राजनीति में भीड़ शुरुआत होती है, परिणाम नहीं। अब कांग्रेस को इस उत्साह को बूथ समितियों में बदलना होगा। रैली के नारों को घर-घर के संपर्क में बदलना होगा। मंच पर उठे सवालों को गांव की चौपाल तक ले जाना होगा और सबसे जरूरीकृजनता के सवालों को सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं, अपनी राजनीतिक प्राथमिकता बनाना होगा। क्योंकि पहाड़ का मतदाता भाषण सुनता जरूर है, लेकिन अंततः अपने अनुभव से फैसला करता है। उसे याद रहता है कि चुनाव से पहले कौन उसके गांव आया था और चुनाव के बाद कौन गायब हो गया।
खड़गे की कुमाऊं रैली ने कांग्रेस में नई जान जरूर डाली है। लेकिन राजनीति में नई जान और नई जीत के बीच एक पूरा रास्ता होता है। उस रास्ते पर संगठन चाहिए। स्थानीय नेतृत्व चाहिए। स्पष्ट मुद्दे चाहिए। विश्वसनीय चेहरा चाहिए और सबसे बढ़कर जनता के बीच लगातार मौजूद रहने की क्षमता चाहिए। कांग्रेस के लिए खड़गे की रैली इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने पार्टी को फिर से मैदान में उतरने का आत्मविश्वास दिया है। अब देखना यह है कि कांग्रेस इस ऊर्जा को कितने दिन बचाकर रखती है। क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में रैली की भीड़ अगले दिन घर चली जाती है। चुनाव की असली भीड़ तब बनती है, जब कार्यकर्ता महीनों तक जनता के दरवाजे पर खड़ा रहता है। खड़गे ने कुमाऊं से आवाज दी है। अब कांग्रेस को तय करना है कि यह आवाज सिर्फ हल्द्वानी के मैदान तक रहेगी या पहाड़ के गांव-गांव तक पहुंचेगी। क्योंकि 2027 की लड़ाई भाषणों से नहीं, जनता के भरोसे से जीती जाएगी।
शनिवार, 8 अगस्त 2026
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पहाड़ की बेटी के गले का ‘गलोबंद’
यह गहना नहीं, मां की संदूकची से निकली हुई है एक पूरी पीढ़ी
गले का गलोबंद सिर्फ गहना नहीं, पहाड़ के पीढ़ियों की कहानी
मायके की सोंधी महक, पीढ़ियों का दुलार और धुंधलाती यादें
देहरादून। पहाड़ की महिलाओं के गले में सजा गलोबंद कभी परिवार की पहचान हुआ करता था। सोने-चांदी के छोटे-छोटे टुकड़ों में बुनी यह परंपरा आज फैशन की दुनिया में भले लौट रही हो, लेकिन इसके पीछे छिपी पहाड़ की स्मृतियां धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं। पहाड़ की सुबह जितनी सादगी भरी होती है, वहां की स्त्री का श्रृंगार उतना ही अर्थपूर्ण। माथे की बिंदी, नाक की नथ, कानों के झुमके और गले में सजा गलोबंद यह सिर्फ आभूषण नहीं थे। इनमें पहाड़ की अर्थव्यवस्था, परिवार की हैसियत, कारीगर की मेहनत और महिलाओं की पीढ़ियों पुरानी स्मृतियां दर्ज होती थीं। गलोबंद को देखिए तो पहली नजर में यह गले में पहना जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण लगता है। लेकिन पहाड़ के गांवों में इसकी कहानी इससे कहीं बड़ी रही है।
कभी बेटी की शादी में मायके से आने वाले गहनों में गलोबंद का खास स्थान होता था। मां का गलोबंद बेटी तक पहुंचता था और उसके साथ सिर्फ सोना या चांदी नहीं जाती थीकृजाती थी एक पूरी पीढ़ी की कहानी। दादी ने पहना, मां ने संभाला और बेटी ने विरासत में पाया। यही तो पहाड़ के गहनों की खासियत थी। आज जब बाजार में आभूषण डिजाइन बदल रहे हैं और पारंपरिक गहने आधुनिक फैशन के साथ दोबारा दिखाई देने लगे हैं, तब गलोबंद भी नई पीढ़ी के बीच अपनी जगह बना रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या गलोबंद सिर्फ फैशन बनकर रह जाएगा या इसके पीछे की संस्कृति भी बच पाएगी?
परंपरागत गलोबंद के निर्माण में कारीगरी का अपना महत्व रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसके डिजाइन, आकार और इस्तेमाल की शैली में अंतर देखने को मिलता है। इसमें धातु के छोटे-छोटे हिस्सों को जोड़कर या कपड़े/धागे के आधार पर सजाकर गले का आभूषण तैयार किया जाता था। इसकी खूबसूरती केवल चमक में नहीं थी। उसकी असली खूबसूरती उस हाथ में थी, जिसने उसे बनाया था। पहाड़ में आभूषण बनाने वाले कारीगरों की अपनी दुनिया थी। पीढ़ियों से चली आ रही यह कला उनके हुनर और धैर्य की परीक्षा लेती थी। एक-एक डिजाइन के पीछे घंटों की मेहनत होती थी।
आज मशीन से बने आभूषण बाजार में जल्दी उपलब्ध हो जाते हैं। कीमत भी कई बार कम होती है। ऐसे में हाथ से तैयार पारंपरिक गहनों के सामने बाजार की चुनौती बढ़ी है। लेकिन गलोबंद की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बल्कि नई पीढ़ी ने इसे नए अंदाज में अपनाना शुरू किया है। पहाड़ की पारंपरिक पोशाक के साथ पहना जाने वाला गलोबंद अब सिर्फ गांव की शादी तक सीमित नहीं है। आधुनिक डिजाइनरों ने इसे नए कपड़ों और नए फैशन के साथ जोड़ना शुरू किया है। कई युवतियां इसे साड़ी, सूट और पारंपरिक परिधानों के साथ पहनना पसंद करती हैं। यानी जिस आभूषण को कभी पहाड़ की बहू-बेटियों की पहचान माना जाता था, वह अब शहरों के फैशन में भी जगह बना रहा है। लेकिन इस बदलाव के साथ एक खतरा भी है।कहीं ऐसा न हो कि गलोबंद बच जाए और उसकी कहानी खो जाए। किस धातु का इस्तेमाल होता था? किस अवसर पर पहना जाता था? इसे कौन बनाता था? शादी में इसका क्या महत्व था? मायके और ससुराल के बीच इसका क्या रिश्ता था? इन सवालों के जवाब भी उसी विरासत का हिस्सा हैं।
पहाड़ के समाज में आभूषण केवल सजने के लिए नहीं होते थे। कई बार वह परिवार की आर्थिक सुरक्षा भी होते थे। मुश्किल समय में गहने बेचकर परिवार ने अपनी जरूरतें पूरी कीं। लेकिन भावनात्मक मूल्य का कोई बाजार नहीं होता। एक मां के लिए अपनी शादी का गलोबंद सिर्फ एक आभूषण नहीं था। उसमें उसके मायके की यादें थीं। बेटी की शादी में जब वही गहना उसे दिया जाता था तो वह एक तरह से परिवार की स्मृति को आगे बढ़ाना होता था। यही कारण है कि पहाड़ के पुराने संदूकों में रखे गहनों को खोलते समय सिर्फ धातु की चमक नहीं दिखाई देती थी। उनमें पुरानी तस्वीरें, पुरानी शादियां और पुरानी पीढ़ियां दिखाई देती थीं।
उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन ने केवल खेत और गांव नहीं बदले। उसने पहनावे और आभूषणों की दुनिया को भी प्रभावित किया जो परिवार गांव से शहर आ गए, उनकी अगली पीढ़ी का जीवन अलग हो गया। पारंपरिक पहनावा रोजमर्रा की जिंदगी से बाहर होता गया। उसके साथ पारंपरिक गहनों का इस्तेमाल भी कम हुआ। आज कई घरों में दादी-नानी के पुराने गहने संदूकों में सुरक्षित हैं, लेकिन उन्हें पहनने वाली पीढ़ी कम होती जा रही है। इसलिए गलोबंद की कहानी केवल एक आभूषण की कहानी नहीं है। यह उस पहाड़ की कहानी है, जो अपनी पुरानी चीजों को बचाने की कोशिश कर रहा है।
गलोबंद को बचाने का मतलब यह नहीं कि नई पीढ़ी को पुराने तरीके से ही जीने के लिए कहा जाए। परंपरा तभी जीवित रहती है जब वह समय के साथ बदलती है। जरूरत है कि स्थानीय कारीगरों को बाजार मिले, पारंपरिक डिजाइन का दस्तावेजीकरण हो और स्कूल-कालेजों तथा सांस्कृतिक आयोजनों में उत्तराखंड के पारंपरिक आभूषणों के बारे में नई पीढ़ी को बताया जाए। क्योंकि जब किसी समाज की चीजें सिर्फ संग्रहालय में रह जाती हैं, तो संस्कृति का एक हिस्सा जीवित होकर भी रोजमर्रा की जिंदगी से गायब हो जाता है। गलोबंद आज फिर फैशन में लौट रहा है। यह अच्छी खबर है। लेकिन उससे भी बड़ी खबर तब होगी जब इसके साथ उसकी कहानी भी लौटे।
धातु की चमक से कहीं ज्यादा इसमें उन हाथों की गर्माहट है, जिन्होंने इसे बनाया। उन माताओं की ममता है, जिन्होंने इसे बेटी को दिया। उन बेटियों की यादें हैं, जिन्होंने इसे संभालकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाया। इसलिए अगली बार जब किसी पहाड़ी महिला के गले में गलोबंद दिखाई दे, तो उसे सिर्फ एक आभूषण मत समझिएगा। उसमें एक गांव है, एक परिवार है, एक मां है, एक बेटी है और पहाड़ की कई पीढ़ियों की कहानी है।
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