गुरुवार, 3 सितंबर 2026

udaydinmaan: ‘शुद्धिकरण’ पर हाईकोर्ट का चाबुक !

udaydinmaan: ‘शुद्धिकरण’ पर हाईकोर्ट का चाबुक !: हल्द्वानी रामलीला मैदान शुद्धिकरण कांड रामलीला मैदान के शुद्धिकरण पर हाईकोर्ट की चौखट पर डा. बैजनाथ, सात सितंबर को होगी सुनवाई डा.बैजनाथ ने ...

‘शुद्धिकरण’ पर हाईकोर्ट का चाबुक !

हल्द्वानी रामलीला मैदान शुद्धिकरण कांड रामलीला मैदान के शुद्धिकरण पर हाईकोर्ट की चौखट पर डा. बैजनाथ, सात सितंबर को होगी सुनवाई डा.बैजनाथ ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद कथित शुद्धिकरण यज्ञ को दी हाईकोर्ट में चुनौती स्वतंत्र जांच से लेकर साक्ष्य सुरक्षित रखने की मांग, पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में सत्ता के नशे में चूर नेताओं की शह, खाकी की संदिग्ध खामोशी और प्रशासनिक लीपापोती का भांडाफोड़ जनहित याचिका ने पूरी व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी, कुर्सी बचाने में जुटे सूबे के आला अफसर देहरादून। हल्द्वानी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में शुद्धिकरण और हवन-यज्ञ के नाम पर परोसे गए नफरती खेल की आंच अब सीधे उत्तराखंड हाईकोर्ट के दरवाजे तक जा पहुंची है। सत्ता के नशे में चूर नेताओं की शह, खाकी की संदिग्ध खामोशी और प्रशासनिक लीपापोती का भांडाफोड़ करते हुए जनहित याचिका ने पूरी व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। सात सितंबर को होने जा रही सुनवाई से पहले शासन-प्रशासन के शीर्ष आकाओं की नींद उड़ चुकी है और पूरे महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। बता दें कि हल्द्वानी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा के बाद कथित तौर पर कराए गए शुद्धिकरण यज्ञ/हवन का विवाद अब उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है। मामले में डा. बैजनाथ ने जनहित याचिका दायर कर पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की है। याचिका पर 7 सितंबर को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई प्रस्तावित है। ई-कोर्ट रिकार्ड के अनुसार मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति जस्टिस सुभाष उपाध्याय की डिवीजन बेंच के समक्ष सूचीबद्ध है। डा. बैजनाथ की ओर से अधिवक्ता रक्षित जोशी पैरवी कर रहे हैं। याचिका में अदालत से मांग की गई है कि खड़गे की सभा के बाद रामलीला मैदान में हुए कथित शुद्धिकरण यज्ञ/हवन की जांच स्थानीय थाने से जुड़े पुलिसकर्मियों के बजाय किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या ऐसी स्वतंत्र टीम से कराई जाए, जिसका स्थानीय पुलिस स्टेशन से संबंध न हो। यानी याचिका ने सीधे उस सवाल को अदालत के सामने ला खड़ा किया है कि आखिर सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रम के बाद शुद्धिकरण कराने की जरूरत क्यों पड़ी और इस पूरी कवायद के पीछे वास्तविक मंशा क्या थी? मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि याचिका में जांच के दौरान यदि कानूनन अपराध के तत्व सामने आते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनों के तहत कार्रवाई की मांग की गई है। डा. बैजनाथ की याचिका में अदालत से घटनाक्रम से जुड़े तमाम साक्ष्यों को तत्काल सुरक्षित रखने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। इसमें सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकार्डिंग, फोटो, इलेक्ट्रानिक संचार, सोशल मीडिया सामग्री, पुलिस रिकार्ड, शिकायतें, रिपोर्ट, अनुमति संबंधी दस्तावेज और अन्य इलेक्ट्रानिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य शामिल हैं। यह मांग मामले को महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे ले जाती है। अब सवाल यह भी है कि घटना के समय क्या रिकार्ड हुआ, किसने क्या किया, प्रशासन और पुलिस को क्या जानकारी थी और बाद में पूरे घटनाक्रम पर क्या कार्रवाई हुई। याचिका में राज्य सरकार के साथ जिलाधिकारी, नैनीताल, एसएसपी नैनीताल, पुलिस महानिदेशक और संबंधित थाना प्रभारी को भी प्रतिवादी बनाया गया है। इससे साफ है कि याचिकाकर्ता केवल घटना की जांच नहीं, बल्कि प्रशासन और पुलिस की भूमिका की भी न्यायिक निगरानी में पड़ताल चाहता है। याचिका का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पक्ष यह है कि राज्य सरकार को उत्तराखंड में छुआछूत के संवैधानिक निषेध को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश देने की मांग की गई है। इसके साथ ही राज्य के दायित्वों के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग भी अदालत से की गई है। यानी हल्द्वानी का यह विवाद अब केवल किसने हवन कराया और क्यों कराया तक सीमित नहीं है। याचिका ने इसे समानता, सामाजिक सम्मान और छुआछूत के खिलाफ संवैधानिक व्यवस्था के सवाल से जोड़ दिया है। रामलीला मैदान में सामाजिक सौहार्द को तार-तार करने वाले इस विवादित घटनाक्रम पर अब तक पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना तमाशा देख रहा था। नेताओं की चौखट पर नतमस्तक पुलिस जिस मामले में एफआईआर तक दर्ज करने से कतरा रही थी, उसी मामले को डा. बैजनाथ की याचिका ने सीधे हाईकोर्ट की चौखट पर खींच लिया है। याचिका ने साफ कर दिया है कि हल्द्वानी में कानून-व्यवस्था का जनाजा ऐसे ही नहीं निकला, बल्कि इसके पीछे नीचे से लेकर ऊपर तक प्रशासनिक नाकामी का पूरा तंत्र शामिल था। याचिका का प्रहार इतना सटीक और मारक है कि इसमें किसी छोटे कर्मचारी को बलि का बकरा बनाने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी गई है। सत्ता और पुलिस प्रशासन के पांच सबसे बड़े आकाओं को एक साथ कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। हाईकोर्ट के ई-कोर्ट रिकार्ड के मुताबिक याचिका दर्ज हो चुकी है। याचिका दाखिल होते ही जिस बुलेट ट्रेन की रफ्तार से इसका रजिस्ट्रेशन हुआ है, उससे साफ है कि अदालत इस प्रशासनिक लापरवाही को बख्शने के मूड में बिल्कुल नहीं है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की डिवीजन बेंच करने जा रही है। सात सितंबर को हाईकोर्ट की बेंच ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए आला अफसरों से हलफनामा मांगा है। इससे कई बड़े अधिकारियों का नपना तय माना जा रहा है। बता दें कि रामलीला मैदान विवाद में अब तक पर्दे के पीछे बैठकर तमाशा देखने वाले अफसरों के पास अब भागने का कोई रास्ता नहीं बचा है। पूरे उत्तराखंड की निगाहें अब 7 सितंबर को होने वाले न्यायिक प्रहार पर टिकी हैं। कि क्या हाईकोर्ट राज्य सरकार और पुलिस के शीर्ष आकाओं को समन भेजकर निजी रूप से तलब करेगा? क्या सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वालों और उन्हें संरक्षण देने वाले अफसरों पर सख्त कार्रवाई का चाबुक चलेगा? हल्द्वानी के रामलीला मैदान से उठा यह बवंडर अब प्रशासनिक दफ्तरों को उखाड़ फेंकने के लिए हाईकोर्ट पहुंच चुका है। 7 सितंबर को यह तय हो जाएगा कि कानून का राज चलेगा या फिर खाकी और खादी की जुगलबंदी यूं ही कानून की धज्जियां उड़ाती रहेगी।

चुनावी गणित में ‘मोदी फैक्टर’

मोदी के जन्मदिन पर भाजपा का मेगा प्लान, सेवा के बहाने चुनावी जमीन मजबूत करने की तैयारी 17 सितंबर से महीनेभर चलेगा जनसंपर्क अभियान, वडनगर-वाराणसी यात्रा से कार्यकर्ताओं में भरेंगे जोश देहरादून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर को भाजपा इस बार सिर्फ उत्सव तक सीमित रखने के बजाय इसे बड़े राजनीतिक और संगठनात्मक अभियान में बदलने की तैयारी में है। पार्टी देशभर में सेवा संकल्प अभियान के जरिए जनसंपर्क बढ़ाने के साथ सरकार की योजनाओं और मोदी सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने की कवायद करेगी। अभियान का सिलसिला सितंबर से अक्टूबर तक चलने की तैयारी है। राजनीतिक रूप से इस अभियान की टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण है। अगले विधानसभा चुनावों की तैयारियां तेज होने के बीच भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने और लाभार्थियों से दोबारा संपर्क साधने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री के जन्मदिन को पार्टी ने सेवा से संगठन और संगठन से चुनाव की रणनीति के लिए बड़े अवसर के रूप में लिया है। भाजपा की योजना 17 सितंबर से व्यापक जनसंपर्क अभियान शुरू करने की है। इस दौरान स्वच्छता अभियान, रक्तदान, स्वास्थ्य शिविर, पौधरोपण, सेवा कार्यक्रम, लाभार्थी संपर्क और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के जरिए कार्यकर्ताओं को जनता के बीच पहुंचाने की तैयारी है। पार्टी की यह कवायद प्रधानमंत्री मोदी के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन से भी जोड़ी जा रही है। यानी भाजपा का संदेश साफ हैकृमोदी का जन्मदिन केवल मोदी के व्यक्तित्व का उत्सव नहीं, बल्कि संगठन की सक्रियता का राष्ट्रीय अभियान बने। इस अभियान का सबसे चर्चित हिस्सा वडनगर से वाराणसी तक प्रस्तावित जनसंपर्क यात्रा है। गुजरात का वडनगर प्रधानमंत्री मोदी की जन्मस्थली है, जबकि वाराणसी उनका लोकसभा क्षेत्र है। योजना के मुताबिक दोनों दिशाओं से टीमें निकलकर जनसंपर्क करेंगी और यात्रा को एक महीने तक चलाने की तैयारी है। राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट हैकृमोदी की राजनीतिक यात्रा को संगठन की जमीनी यात्रा से जोड़ना। यात्रा के जरिए भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आम लोगों तक सरकार की उपलब्धियां पहुंचाने और संगठन की मौजूदगी मजबूत करने का प्रयास करेगी। खास बात यह है कि अगले साल होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा के लिए यह अभियान कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने का भी माध्यम बन सकता है। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय मुद्दों और सरकार के प्रदर्शन के साथ अपने सबसे बड़े राजनीतिक चेहरे यानी प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को जोड़ना है। पार्टी पहले भी विधानसभा चुनावों में मोदी की छवि, केंद्र सरकार की योजनाओं और संगठन की बूथ मशीनरी को एक साथ इस्तेमाल करती रही है। इस बार भी रणनीति कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है। सेवा कार्यक्रमों के जरिए सामाजिक संपर्क, लाभार्थी संपर्क के जरिए योजनाओं का प्रचार और मोदी के नेतृत्व के जरिए व्यापक राजनीतिक संदेशकृइन तीनों को एक साथ जोड़ने की कोशिश होगी। भाजपा के सामने चुनौती यह भी है कि केवल मोदी के नाम पर चुनावी माहौल तैयार करने के बजाय स्थानीय नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों को भी साथ लेकर चला जाए। यही वजह है कि सेवा अभियान में केंद्रीय नेतृत्व के संदेश के साथ प्रदेश और जिला स्तर के संगठन को भी बड़ी भूमिका देने की तैयारी है। भाजपा के लिए यह अभियान सिर्फ जनता से संपर्क का कार्यक्रम नहीं है। इसे संगठन की ताकत परखने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है। कौन सा बूथ कितना सक्रिय है, कितने कार्यकर्ता मैदान में उतरते हैं, लाभार्थियों तक संगठन की पहुंच कितनी है और सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक पार्टी का संदेश कितनी तेजी से पहुंचता हैकृअभियान इन सभी मोर्चों पर संगठन को परखने का अवसर देगा। यही वजह है कि भाजपा का यह मेगा प्लान विपक्ष के लिए भी राजनीतिक संकेत है। कांग्रेस समेत अन्य दलों को अब अपनी चुनावी रणनीति और संगठनात्मक सक्रियता बढ़ानी होगी। भाजपा की राजनीति में सेवा कार्यक्रम नए नहीं हैं। लेकिन चुनाव से पहले ऐसे अभियानों की राजनीतिक अहमियत बढ़ जाती है। प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन को केंद्र में रखकर देशव्यापी कार्यक्रम और जनसंपर्क अभियान पार्टी को एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने का अवसर देगा। पहलाकृमोदी का नेतृत्व अभी भी भाजपा की सबसे बड़ी चुनावी पूंजी है। दूसराकृभाजपा का संगठन चुनाव से काफी पहले मैदान में उतर चुका है और तीसराकृपार्टी सरकार की योजनाओं को सीधे लाभार्थियों और आम मतदाताओं तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है। अब देखना होगा कि सेवा संकल्प का यह मेगा अभियान भाजपा के लिए कितनी राजनीतिक जमीन तैयार करता है। क्योंकि चुनावी राजनीति में केवल भीड़ जुटाना पर्याप्त नहीं होता, असली परीक्षा बूथ पर होती है। भाजपा ने फिलहाल अपना अभियान शुरू करने का संकेत दे दिया है। 17 सितंबर से सेवा के मंच पर शुरू होने वाला यह अभियान आने वाले विधानसभा चुनावों की चुनावी पटकथा का पहला बड़ा अध्याय बन सकता है।

पोस्टर बने गुटबाजी का ‘अखाड़ा’

अपने ही नेताओं के पोस्टर फाड़ रहे कांग्रेस नेता चुनाव से पहले घर की लड़ाई आ गई सड़कों पर भीतर सब कुछ ठीक होने के दावों पर उठे सवाल देहरादून। चुनावी तैयारियों के बीच कांग्रेस जिस एकजुटता का दावा कर रही है, जमीन पर तस्वीर उससे अलग दिखाई देने लगी है। पार्टी के भीतर खींचतान और गुटबाजी अब बंद कमरों से निकलकर सड़कों तक पहुंचती नजर आ रही है। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि कुछ कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अपने ही पार्टी नेताओं के पोस्टर फाड़ दिए। पोस्टर फाड़े जाने की घटना को महज राजनीतिक नाराजगी मानकर नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा। क्योंकि चुनावी मौसम में पोस्टर केवल प्रचार सामग्री नहीं होते, बल्कि पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन और स्वीकार्यता का भी संकेत देते हैं। जब कार्यकर्ता विपक्षी दल के पोस्टर हटाने के बजाय अपने ही नेताओं के पोस्टर फाड़ने लगें तो सवाल संगठन की एकजुटता पर ही उठता है। कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी के आरोपों से जूझती रही है। प्रदेश स्तर पर अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने समर्थक हैं और राजनीतिक कार्यक्रमों में भी कई बार शक्ति प्रदर्शन की तस्वीर सामने आती रही है। अब पोस्टर विवाद ने इस अंदरूनी खींचतान को और खुलकर सामने ला दिया है। पार्टी नेतृत्व भले ही इसे स्थानीय विवाद बताकर किनारा करे, लेकिन चुनाव से पहले ऐसी घटनाएं कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकती हैं। कार्यकर्ताओं का संदेश यदि यह जाता है कि पार्टी अपने ही नेताओं को लेकर एकमत नहीं है, तो उसका सीधा असर चुनावी अभियान पर पड़ सकता है। भाजपा के लिए कांग्रेस की अंदरूनी कलह किसी राजनीतिक अवसर से कम नहीं है। भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर नेतृत्व संकट और गुटबाजी का आरोप लगाती रही है। अब अपने नेताओं के पोस्टर फाड़े जाने की घटना विपक्ष को कांग्रेस पर हमला करने के लिए नया मुद्दा दे सकती है। कांग्रेस के सामने असली चुनौती केवल पोस्टर विवाद को रोकने की नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के भीतर पैदा हो रही नाराजगी को संभालने की है। चुनाव केवल बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं जीते जाते। बूथ पर वही कार्यकर्ता पार्टी का झंडा लेकर खड़ा होता है, जिसे नेतृत्व पर भरोसा हो। राजनीतिक हलकों में इस तरह के विवादों को आगामी विधानसभा चुनाव की टिकट राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। चुनाव नजदीक आते ही दावेदारों की संख्या बढ़ती है और नेताओं के बीच प्रभाव क्षेत्र को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज होती है। ऐसे में पोस्टर, बैनर और कार्यक्रमों में चेहरे को लेकर विवाद कई बार अंदरूनी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाते हैं। यदि यही स्थिति आगे बढ़ी तो कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती होगीकृएक तरफ भाजपा का चुनावी संगठन और दूसरी तरफ अपने ही खेमों को एक मंच पर लाने की चुनौती। पोस्टर फाड़ने की राजनीति देखने में छोटी घटना लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश बड़ा है। चुनाव से पहले किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे जरूरी उसकी एकजुटता की छवि होती है। जनता के सामने यदि पार्टी अपने ही नेताओं को लेकर बंटी दिखाई दे तो विपक्ष को हमला करने का मौका मिलता है और कार्यकर्ताओं का उत्साह भी प्रभावित होता है। कांग्रेस को अब तय करना होगा कि वह इस विवाद को स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी मानकर छोड़ती है या इसके पीछे मौजूद असंतोष की तह तक जाती है। क्योंकि विपक्ष के पोस्टर फाड़ना राजनीतिक संघर्ष है, लेकिन अपने ही नेताओं के पोस्टर फाड़ना संगठन के भीतर चल रहे संघर्ष का संकेत। चुनाव की लड़ाई अभी शुरू भी नहीं हुई और कांग्रेस के भीतर पोस्टर ही आपसी मुकाबले का मैदान बनने लगे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही हैकृकांग्रेस भाजपा से लड़ेगी या पहले अपने घर की लड़ाई खत्म करेगी?

रणनीतिक ‘खामोशी’ के पीछे सुलग रही ‘सियासत’

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर मुकदमे दर्ज होने से देश में बड़े राजनीतिक टकराव के हैं आसार कांग्रेस का आरोपकृमुकदमा राजनीतिक प्रतिशोध,भाजपा का जवाबकृकानून के दायरे से कोई ऊपर नहीं सड़क से अदालत तक लड़ाई के संकेत, कांग्रेस के सामने चुनौतीकृकानूनी मोर्चे को राजनीतिक मुद्दा कैसे बनाए देहरादून। कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जुड़े मुकदमे को लेकर प्रदेश कांग्रेस फिलहाल सार्वजनिक तौर पर भले ही संयम बरत रही हो, लेकिन पार्टी के भीतर नाराजगी कम नहीं है। कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का मानना है कि राजनीतिक मुद्दों पर लगातार मुखर रहने वाले राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज मुकदमे को केवल कानूनी प्रक्रिया मानकर चुप बैठना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। यही वजह है कि आने वाले दिनों में यह मामला राजनीतिक टकराव का नया केंद्र बन सकता है। कांग्रेस की चुप्पी को फिलहाल रणनीतिक चुप्पी माना जा रहा है। पार्टी सीधे टकराव में उतरने से पहले कानूनी स्थिति, प्रदेश संगठन की भूमिका और राष्ट्रीय नेतृत्व के अगले कदम को देख रही है। लेकिन कार्यकर्ताओं के बीच इस मामले को लेकर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि राहुल गांधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को राजनीतिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता। पार्टी नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी लगातार केंद्र और भाजपा सरकार के खिलाफ सवाल उठाते रहे हैं और ऐसे में उनके खिलाफ होने वाली हर कार्रवाई को कांग्रेस राजनीतिक रूप से भी देखेगी। दूसरी ओर भाजपा का तर्क है कि कानून अपना काम करता है और राजनीतिक नेता होने का अर्थ यह नहीं कि किसी को कानूनी प्रक्रिया से बाहर रखा जाए। यही वह बिंदु है जहां मामला अदालत से निकलकर राजनीतिक बहस में बदल जाता है। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह अदालत की प्रक्रिया का सम्मान करते हुए अपने राजनीतिक विरोध को किस तरह जनता के बीच रखती है। उत्तराखंड में कांग्रेस पहले से ही आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है। ऐसे में राहुल गांधी से जुड़ा मामला प्रदेश संगठन के लिए भी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने का अवसर बन सकता है। पार्टी यदि इसे लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक प्रतिशोध का मुद्दा बनाती है तो कार्यकर्ताओं को लामबंद करने की कोशिश होगी। कांग्रेस के सामने एक और सवाल हैकृक्या वह इस मुद्दे को प्रदेश के स्थानीय सवालों से जोड़ पाएगी? बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा जैसे मुद्दों के बीच राहुल गांधी का मुकदमा पार्टी के लिए कितना बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा, यह उसकी रणनीति पर निर्भर करेगा। फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी ने ही राजनीतिक अटकलों को जन्म दिया है। पार्टी के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि यदि मुकदमे को राजनीतिक कार्रवाई माना जा रहा है तो फिर संगठन सड़क पर कब उतरेगा? कांग्रेस के लिए यह फैसला आसान नहीं है। बहुत ज्यादा आक्रामकता से मामला केवल कानूनी विवाद के बजाय राजनीतिक टकराव में बदल सकता है और भाजपा को कांग्रेस पर न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप का आरोप लगाने का मौका मिल सकता है। वहीं पूरी तरह चुप रहने से कार्यकर्ताओं में संदेश जा सकता है कि पार्टी अपने शीर्ष नेतृत्व के मुद्दे पर प्रभावी राजनीतिक प्रतिरोध करने में असमर्थ है। भाजपा के लिए भी यह मामला कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि कांग्रेस इसे बड़ा राजनीतिक आंदोलन बनाती है तो भाजपा जवाबी अभियान के जरिए इसे कानून बनाम राजनीति की बहस में बदल सकती है। भाजपा का प्रयास यही रहेगा कि राहुल गांधी के मामले को व्यक्तिगत कानूनी प्रकरण के रूप में रखा जाए, जबकि कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक और राजनीतिक संघर्ष के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकती है। यानी असली लड़ाई अदालत से बाहर राजनीतिक नैरेटिव की होगी। राहुल गांधी का मुकदमा कांग्रेस के लिए केवल एक नेता का कानूनी मामला नहीं, बल्कि नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक रणनीति की परीक्षा भी बन सकता है। पार्टी को तय करना होगा कि इस मुद्दे पर कितना आक्रामक होना है और किस सीमा तक इसे चुनावी एजेंडे में शामिल करना है। अभी कांग्रेस खामोश है, लेकिन यह खामोशी कितने दिन चलेगी, यह बड़ा सवाल है। क्योंकि राजनीति में कई बार चुप्पी भी रणनीति होती है और कई बार कमजोरी का संकेत भी। राहुल गांधी के मुकदमे पर कांग्रेस की अगली चाल यह तय करेगी कि पार्टी इसे अदालत की चारदीवारी में रहने देती है या फिर उत्तराखंड की सियासत में इसे नया राजनीतिक मोर्चा बना देती है। फिलहाल कांग्रेस चुप है, कार्यकर्ता नाराज हैं और भाजपा कांग्रेस की अगली चाल का इंतजार कर रही है। सवाल सिर्फ इतना हैकृयह चुप्पी कब टूटेगी और टूटेगी तो कितने जोर से?

‘20 करोड़‘ का बम

उत्तराखंड में वायरल वीडियो-आडियो ने बढ़ाई सनसनी निष्कासन के बाद आशुतोष नेगी ने लगाए हैं गंभीर आरोप यूकेडी पर राष्ट्रीय दलों से कथित साठगांठ का किया दावा सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो,सियासी हलचल बढ़ी देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव-2027 से पहले उत्तराखंड क्रांति दल यानी यूकेडी के भीतर छिड़ी जंग अब पार्टी की चौखट से निकलकर सोशल मीडिया के मैदान में पहुंच गई है। पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित किए गए आशुतोष नेगी के कथित बयानों और उनसे जुड़े वीडियो-आडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रदेश की क्षेत्रीय राजनीति में सनसनी फैल गई है। सबसे ज्यादा चर्चा उस 20 करोड़ के कथित लेन-देन और राजनीतिक साठगांठ को लेकर है, जिसका आरोप नेगी की ओर से लगाया गया है। यूकेडी ने नेगी को अनुशासनहीनता और सार्वजनिक मंचों पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ कथित भ्रामक एवं तथ्यहीन बयान देने के आरोप में छह वर्ष के लिए निष्कासित किया है। लेकिन निष्कासन के बाद नेगी के तेवर नरम होने के बजाय और तीखे हो गए हैं। सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो और कथित आडियो को लेकर यूकेडी के समर्थकों से लेकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक बहस तेज है। वायरल सामग्री में नेगी से जुड़े बयानों और पार्टी के भीतर चल रहे विवाद को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। हालांकि, वायरल वीडियो या आडयो की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, इसलिए इनमें किए गए दावों को तथ्य के रूप में नहीं बल्कि आरोप और दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन राजनीति में वायरल सामग्री का असर कई बार उसकी सत्यता की जांच से पहले ही दिखाई देने लगता है। यही इस समय यूकेडी के साथ हो रहा है। नेगी ने आरोप लगाया है कि उन्हें राजनीतिक रूप से निबटाने के लिए 20 करोड़ रुपये की कथित सुपारी का खेल हुआ। उन्होंने इसके लिए यूकेडी के कुछ नेताओं पर राष्ट्रीय दलों के साथ कथित साठगांठ का आरोप भी लगाया है। यही आरोप अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। क्योंकि यदि आरोप निराधार हैं तो यूकेडी नेतृत्व के सामने उन्हें स्पष्ट रूप से खारिज करने और स्थिति जनता के सामने रखने की चुनौती है। दूसरी ओर, यदि नेगी अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण सामने लाते हैं तो विवाद का राजनीतिक असर कहीं बड़ा हो सकता है। फिलहाल 20 करोड़ रुपये के कथित लेन-देन की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। यूकेडी उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति और राज्य आंदोलन की विरासत से जुड़ा दल है। ऐसे में उसके नेताओं पर राष्ट्रीय दलों से कथित साठगांठ के आरोप सामान्य राजनीतिक बयान से कहीं ज्यादा गंभीर माने जाएंगे। 2027 के चुनाव में यूकेडी खुद को भाजपा और कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व और राजनीतिक निष्ठा पर सवाल उठना संगठन के लिए बड़ी चुनौती है। नेगी प्रकरण ने एक और सवाल खड़ा किया हैकृकि क्या उक्रांद चुनावी जमीन मजबूत करने से पहले अपने घर की राजनीतिक लड़ाई सुलझा पाएगा? यूकेडी की अनुशासनात्मक कार्रवाई के बावजूद नेगी के तेवर आक्रामक बने हुए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए खुद को अब भी उक्रांद की विचारधारा से जुड़ा बताया है। दूसरी ओर पार्टी का कहना है कि निष्कासन के बाद वह यूकेडी के नाम, झंडे और चुनाव चिह्न का अधिकृत रूप से इस्तेमाल नहीं कर सकते। यानी लड़ाई अब केवल एक नेता के पार्टी से बाहर होने की नहीं रही। यह नेतृत्व बनाम असहमति, संगठन बनाम व्यक्तिगत राजनीतिक दावे और क्षेत्रीय दल की विश्वसनीयता की लड़ाई बनती जा रही है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और आडियो ने इस विवाद को तेजी से जनता तक पहुंचा दिया है। हालांकि वायरल सामग्री की प्रमाणिकता की जांच जरूरी है, लेकिन इससे पैदा हुई राजनीतिक बहस को नजरअंदाज करना यूकेडी के लिए आसान नहीं होगा। 2027 के चुनाव में यदि यूकेडी जनता के बीच तीसरे विकल्प की बात लेकर जाता है तो उसे सबसे पहले यह साबित करना होगा कि उसके फैसले और उम्मीदवार किसी राष्ट्रीय दल की छाया में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के मुद्दों पर स्वतंत्र राजनीतिक लाइन पर खड़े हैं। आशुतोष नेगी के आरोपों ने इसी सवाल को सबसे ज्यादा हवा दी है। 20 करोड़ का दावा सच है या सियासी विस्फोटकृइसका जवाब जांच और प्रमाण देंगे। लेकिन इतना तय है कि वायरल वीडियो-आडियो ने 2027 से पहले यूकेडी के भीतर की आग को सार्वजनिक बहस में जरूर ला दिया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि नेगी अगला खुलासा करते हैं या यूकेडी नेतृत्व इन आरोपों का कोई ठोस जवाब सामने रखता है।

बुधवार, 2 सितंबर 2026

खिसकती जमीन और सत्ता की छटपटाहट

गंगाजल व हवन के बहाने राजनीतिक हिसाब-किताब मुद्दों की सियासत पर भारी पड़ा शुद्धिकरण का दांव देवभूमि में नीयत व विचारधारा का सीधा मुकाबला भाजपा बोली-सत्ता की भूख, कांग्रेस का पलटवार देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े शुद्धिकरण प्रकरण ने उत्तराखंड की सियासत को गरमा दिया है। मंच पर गंगाजल छिड़कने और शुद्धिकरण हवन को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। मामला अब महज एक राजनीतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके बहाने दोनों दल एक-दूसरे की विचारधारा, राजनीति और नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा जहां इसे कांग्रेस की सत्ता की बेचौनी और तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस इसे भाजपा की सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति का उदाहरण बता रही है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस इस मुद्दे को लगातार राजनीतिक रंग देकर जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से हटाना चाहती है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को जनता के बीच अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का अहसास हो चुका है, इसलिए वह ऐसे मुद्दों के सहारे राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेताओं ने इसे कांग्रेस की सत्ता की भूख से जोड़ते हुए कहा कि जनता अब इस तरह की राजनीति को स्वीकार करने वाली नहीं है। भाजपा का कहना है कि उत्तराखंड की जनता ने हमेशा धार्मिक आस्था का सम्मान किया है और किसी भी धार्मिक प्रतीक को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश उचित नहीं है। पार्टी नेताओं के मुताबिक कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि धार्मिक भावनाओं से जुड़े विषयों पर राजनीति करने के बजाय उसे अपने शासन और नीतियों का हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए। भाजपा के निशाने पर कांग्रेस के साथ-साथ राहुल गांधी और पार्टी नेतृत्व भी है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस एक तरफ संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की बात करती है, दूसरी तरफ धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाती है। कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा खुद इस मामले को लगातार राजनीतिक मुद्दा बना रही है और अब कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा को महंगाई, बेरोजगारी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्तराखंड के विकास जैसे मुद्दों पर जवाब देना चाहिए, लेकिन वह धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों के जरिए राजनीतिक ध्रुवीकरण का माहौल तैयार करना चाहती है। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को धार्मिक भावनाओं के नाम पर दूसरे दल को कठघरे में खड़ा करने का अधिकार नहीं है। पार्टी का कहना है कि भाजपा को इस पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी तय करने के बजाय इसे राजनीतिक प्रचार का हथियार बनाने से बचना चाहिए। शुद्धिकरण प्रकरण की राजनीतिक गूंज उत्तराखंड से बाहर भी सुनाई दे रही है। कांग्रेस और भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की बयानबाजी के बाद यह विवाद अब राज्य की राजनीति में एक बड़े प्रतीकात्मक मुद्दे का रूप लेता दिखाई दे रहा है। एक तरफ भाजपा इसे कांग्रेस की कथित सत्ता की हताशा बता रही है, दूसरी ओर कांग्रेस इसे भाजपा की धर्म आधारित राजनीति के रूप में पेश कर रही है। दोनों दलों के लिए यह विवाद आगामी राजनीतिक संघर्ष की जमीन तैयार करने का अवसर भी बन गया है। इस विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या धर्म और आस्था से जुड़े प्रतीकों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाया जाना चाहिए? गंगाजल और शुद्धिकरण जैसे धार्मिक प्रतीकों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब आरोप-प्रत्यारोप के ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां दोनों दल एक-दूसरे की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा इसे कांग्रेस की सत्ता पाने की बेचौनी बता रही है तो कांग्रेस भाजपा पर धार्मिक धु्रवीकरण का आरोप लगा रही है। दरअसल, उत्तराखंड की राजनीति में धर्म और आस्था हमेशा संवेदनशील विषय रहे हैं। ऐसे में दोनों दलों के लिए चुनौती यह है कि राजनीतिक लाभ के लिए उठाए गए कदम कहीं सामाजिक विभाजन को और गहरा न कर दें। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज होने के साथ ही इस विवाद का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है। भाजपा सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में ‘शुद्धिकरण’ विवाद दोनों दलों के लिए एक-दूसरे पर हमला बोलने का नया हथियार बन गया है। आने वाले दिनों में यह विवाद कितना लंबा खिंचता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। लेकिन इतना तय है कि हल्द्वानी का शुद्धिकरण अब केवल एक धार्मिक प्रतीक का विवाद नहीं रहाकृयह उत्तराखंड की सियासत में सत्ता, धर्म और विचारधारा की लड़ाई का नया मोर्चा बन चुका है।

सेवा संकल्प के लिए भाजपा ने उतारी ‘फौज’

सेवा संकल्प अभियान के सहारे चुनावी मोड में बीजेपी, मंत्रियों,दिग्गजों को कमान जमीनी स्तर पर उतरेगी पूरी टीम, सरकार और संगठन मिलकर साधेंगे लक्ष्य सेवा संकल्प के दम पर जनता के बीच रिपोर्ट कार्ड लेकर जाएगी भाजपा देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच भारतीय जनता पार्टी ने संगठन को अब पूरी तरह चुनावी मोड में लाने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी ने सेवा संकल्प अभियान को जमीन तक पहुंचाने के लिए मंत्रियों से लेकर वरिष्ठ पदाधिकारियों और प्रमुख भाजपा नेताओं तक को जिम्मेदारियां सौंपकर पूरी टीम मैदान में उतारने की तैयारी कर ली है। पार्टी का जोर अभियान को केवल संगठनात्मक कार्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय इसे सरकार के कामकाज और संगठन की सक्रियता से जोड़कर जनता तक पहुंचाने पर है। भाजपा नेतृत्व ने अभियान की सफलता के लिए जिम्मेदारियां तय करते हुए नेताओं को अलग-अलग क्षेत्रों और गतिविधियों की कमान सौंपी है। सरकार के मंत्री जहां अपने विभागीय कामकाज और सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच रखने की भूमिका निभाएंगे, वहीं संगठन के पदाधिकारी बूथ और मंडल स्तर तक अभियान की गतिविधियों को गति देने का काम करेंगे। भाजपा की रणनीति साफ हैकृसरकार की उपलब्धियों का संदेश संगठन के नेटवर्क के जरिए घर-घर तक पहुंचाया जाए। इसके लिए मंत्री, विधायक, सांसद, प्रदेश पदाधिकारी, जिला संगठन और मंडल स्तर के कार्यकर्ताओं को अभियान से जोड़ने की तैयारी है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि चुनावी वर्ष से पहले सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय ही राजनीतिक संदेश को प्रभावी बना सकता है। इसी कारण अभियान में जनप्रतिनिधियों के साथ संगठन के कार्यकर्ताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रखी गई है। सेवा संकल्प अभियान में मंत्रियों को विशेष जिम्मेदारी दिए जाने को भाजपा की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। मंत्रियों से अपेक्षा की जा रही है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जनता के बीच पहुंचकर सरकार की योजनाओं की जानकारी दें और स्थानीय स्तर पर लोगों की समस्याओं को भी सुनें। पार्टी के लिए यह अभियान सरकार और जनता के बीच संवाद बढ़ाने का माध्यम भी है। संगठन की कोशिश है कि सरकार की योजनाओं का लाभ लेने वाले लोगों तक सीधे पहुंच बनाई जाए और उनसे फीडबैक लिया जाए। भाजपा की असली ताकत उसका बूथ स्तर का संगठन माना जाता है। यही वजह है कि सेवा संकल्प अभियान को बूथ तक ले जाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। मंडल और जिला स्तर के पदाधिकारियों को अभियान की निगरानी और समन्वय की जिम्मेदारी दी जा रही है। कार्यकर्ताओं के जरिए केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं, जनकल्याणकारी कार्यक्रमों तथा संगठन की सेवा गतिविधियों को जनता के बीच ले जाने की रणनीति बनाई गई है। राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो सेवा संकल्प अभियान केवल जनसंपर्क कार्यक्रम नहीं है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा अपने संगठन को लगातार सक्रिय रखने और जनता के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सरकार के खिलाफ बनने वाली संभावित नाराजगी को समय रहते समझना और उसे दूर करना है। ऐसे में लगातार जनसंपर्क अभियान संगठन को जनता की नब्ज टटोलने का अवसर भी देगा। विपक्ष जहां सरकार पर महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के मुद्दों को लेकर सवाल उठा रहा है, वहीं भाजपा सेवा और सरकार की उपलब्धियों को अपने राजनीतिक संदेश का आधार बनाने की तैयारी में है। पार्टी नेतृत्व की ओर से संगठन को सक्रिय रखने का संदेश स्पष्ट हैकृचुनाव की घोषणा का इंतजार नहीं करना है, बल्कि उससे पहले ही जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करनी है। मंत्रियों से लेकर प्रदेश पदाधिकारियों और बूथ कार्यकर्ताओं तक जिम्मेदारी बांटने की रणनीति इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। भाजपा की कोशिश है कि चुनाव आने तक संगठन का हर स्तर सक्रिय रहे और पार्टी के पास सरकार के कामकाज के साथ-साथ जमीनी फीडबैक का मजबूत नेटवर्क मौजूद हो। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की लड़ाई के लिए दोनों प्रमुख दलों की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। कांग्रेस जहां सरकार को घेरने के लिए मुद्दे तलाश रही है, वहीं भाजपा लगातार संगठनात्मक गतिविधियों और जनसंपर्क अभियानों के जरिए अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में सेवा संकल्प अभियान भाजपा के लिए सिर्फ सेवा का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सरकार-संगठन-कार्यकर्ता को एक साथ मैदान में उतारने की रणनीति भी है। अब सवाल यही है कि भाजपा की यह फौज जनता तक सरकार का संदेश पहुंचाने में कितनी सफल होती है और क्या यह अभियान 2027 की चुनावी जंग में पार्टी के लिए राजनीतिक बढ़त तैयार कर पाता है?

सूखे राजनीतिक मैदान में ‘संजीवनी’

राहुल गांधी की गिरफ्तारी से मिलेगी कांग्रेस को आक्सीजन उत्तराखंड में भाजपा के सामने आ सकता है सियासी संकट मुद्दा एफआईआर से निकलकर सूबे की सियासत में पहुंचेगा एक बड़ा राजनीतिक चेहरे के साथ मिलेगा भावनात्मक नैरेटिव आरोपी से ज्यादा राजनीतिक प्रतीक बन जाएंगे राहुल गांधी देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 की चुनावी बिसात अभी पूरी तरह बिछी भी नहीं है कि एक ऐसा मुद्दा आकार लेने लगा है, जो आने वाले दिनों में दोनों प्रमुख दलों के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर अगर वह उत्तराखंड पहुंचकर गिरफ्तारी देने का राजनीतिक फैसला लेते हैं, तो यह महज कानूनी कार्रवाई नहीं रहेगी। इसके राजनीतिक मायने कहीं ज्यादा बड़े होंगे। कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम सूखे राजनीतिक मैदान में संजीवनी साबित हो सकता है, जबकि भाजपा के सामने ऐसा मुद्दा खड़ा हो सकता है, जिसे संभालना आसान नहीं होगा। खासकर तब, जब गिरफ्तारी को कांग्रेस राजनीतिक प्रतिशोध के तौर पर जनता के बीच ले जाने की कोशिश करे। राहुल गांधी यदि खुद उत्तराखंड पहुंचकर गिरफ्तारी देने का ऐलान करते हैं, तो कांग्रेस के पास इसे बड़े राजनीतिक अभियान में बदलने का अवसर होगा। प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लामबंद करने से लेकर राष्ट्रीय नेताओं की सक्रियता तक, पूरा घटनाक्रम तेजी से प्रदेश की राजनीति का केंद्र बन सकता है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लंबे समय से सरकार के खिलाफ उठाए जा रहे बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों के साथ उसे एक बड़ा राजनीतिक चेहरा और भावनात्मक नैरेटिव भी मिल जाएगा। यानी कांग्रेस जिस मुद्दे को अभी प्रदेश की सीमा में लड़ रही है, राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी उसे राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा सकती है। भाजपा के सामने मुश्किल यह होगी कि वह इस मामले को कितना कानूनी और कितना राजनीतिक रहने देती है। कार्रवाई होती है तो कांग्रेस इसे राजनीतिक दमन बताएगी और कार्रवाई नहीं होती तो भाजपा पर कानून के सवाल उठ सकते हैं। यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी राजनीतिक पेचीदगी है। भाजपा चाहेगी कि मामला कानून और एफआईआर तक सीमित रहे। कांग्रेस की कोशिश स्वाभाविक रूप से इसे लोकतंत्र, अभिव्यक्ति और राजनीतिक संघर्ष का मुद्दा बनाने की होगी। अगर कांग्रेस अपना नैरेटिव स्थापित करने में सफल होती है तो भाजपा को रक्षात्मक स्थिति में आना पड़ सकता है। राहुल गांधी का उत्तराखंड पहुंचना अपने आप में कांग्रेस संगठन के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर होगा। प्रदेशभर से कार्यकर्ताओं के जुटने, प्रदर्शन और विरोध की राजनीति शुरू हो सकती है। राष्ट्रीय मीडिया की निगाहें भी उत्तराखंड पर टिकेंगी। कांग्रेस इसे डरेंगे नहीं, लड़ेंगे जैसे राजनीतिक संदेश में बदल सकती है। इससे प्रदेश संगठन में नई ऊर्जा आने की संभावना है। विशेषकर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए यह महत्वपूर्ण है। पार्टी को एक ऐसे मुद्दे की जरूरत है, जो संगठन को सड़क पर उतार सके और अलग-अलग गुटों को एक मंच पर ला सके। राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी ऐसा ही मुद्दा बन सकती है। कांग्रेस को यह भी ध्यान रखना होगा कि सिर्फ राजनीतिक नारे से चुनाव नहीं जीते जाते। गिरफ्तारी का मुद्दा तभी राजनीतिक लाभ देगा, जब पार्टी इसे उत्तराखंड के स्थानीय मुद्दों से जोड़ सके। अगर पूरा अभियान केवल राहुल गांधी बनाम भाजपा तक सीमित रह गया, तो भाजपा इसे कांग्रेस की व्यक्तिवादी राजनीति बताकर पलटवार कर सकती है। भाजपा का तर्क होगा कि कानून अपना काम करेगा और किसी नेता को राजनीतिक पहचान के आधार पर विशेष छूट नहीं मिल सकती। यहीं से असली राजनीतिक मुकाबला शुरू होगा। उत्तराखंड में भाजपा लगातार संगठन को मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश में है। ऐसे समय में राहुल गांधी से जुड़ा कोई बड़ा घटनाक्रम कांग्रेस के लिए मुद्दों की कमी से निकलने का रास्ता बन सकता है। भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ राहुल गांधी नहीं होंगे। चुनौती होगी उस राजनीतिक नैरेटिव की, जो उनकी गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस तैयार कर सकती है। अगर कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र और राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया तो भाजपा को हर बयान सोच-समझकर देना होगा। एक गलत राजनीतिक प्रतिक्रिया कांग्रेस को और ताकत दे सकती है। राजनीति में कई बार कानूनी कार्रवाई का असर अदालत से बाहर ज्यादा दिखाई देता है। राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी भी ऐसा ही मोड़ पैदा कर सकती है। कांग्रेस इसे संघर्ष की शुरुआत बताएगी, भाजपा कानून की कार्रवाई। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारने की कोशिश करेगी, भाजपा संगठनात्मक ताकत से मुकाबला करेगी और उत्तराखंड इस टकराव का केंद्र बन सकता है। यही कारण है कि राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी कांग्रेस के लिए संजीवनी और भाजपा के लिए गले की फांस बन सकती है। लेकिन अंतिम फैसला अदालत, कानून और संबंधित जांच प्रक्रिया के दायरे में ही होगा। राजनीतिक दल इस घटनाक्रम को किस तरह जनता के सामने पेश करते हैं, असली लड़ाई वहीं तय होगी। उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में यह मामला अब सिर्फ एफआईआर का नहींकृनैरेटिव की लड़ाई का मामला बनता दिख रहा है।

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

udaydinmaan: हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार

udaydinmaan: हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार: अल्मोड़ा के लोधिया में जर्जर छत के नीचे भविष्य गढ़ने को मजबूर 200 मासूम अल्मोड़ा के स्कूल का जर्जर भवन कभी भी बन सकता है हादसे का सबब 200 से ज्...

udaydinmaan: हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार

udaydinmaan: हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार: अल्मोड़ा के लोधिया में जर्जर छत के नीचे भविष्य गढ़ने को मजबूर 200 मासूम अल्मोड़ा के स्कूल का जर्जर भवन कभी भी बन सकता है हादसे का सबब 200 से ज्...

हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार

अल्मोड़ा के लोधिया में जर्जर छत के नीचे भविष्य गढ़ने को मजबूर 200 मासूम अल्मोड़ा के स्कूल का जर्जर भवन कभी भी बन सकता है हादसे का सबब 200 से ज्यादा छात्र-छात्राएं, बारिश के बीच आज सिर्फ 25 पहुंचे स्कूल वर्षों से स्कूल के मरम्मत की गुहार, विभाग आज दिन तक है इससे बेखबर केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा का क्षेत्र, राज्य मंत्री कुंदन लटवाल का भी गृह क्षेत्रकृफिर भी बच्चों की सुरक्षा पर क्यों खामोशी देहरादून। पहाड़ में बारिश कहर बरपा रही है और इसी बारिश के बीच अल्मोड़ा के लोधिया में सरकारी स्कूल की जर्जर इमारत बच्चों के सिर पर सवाल बनकर खड़ी है। नगर से महज तीन किलोमीटर दूर स्थित राजकीय इंटर कालेज लोधिया का भवन ऐसी हालत में है कि किसी भी समय गंभीर हादसे की आशंका बनी हुई है। विद्यालय में 200 से अधिक बच्चे अध्ययनरत हैं, लेकिन सोमवार को बारिश और भवन की खस्ताहाली के चलते सिर्फ 25 बच्चे ही स्कूल पहुंचे। यह आंकड़ा सिर्फ उपस्थिति रजिस्टर का नंबर नहीं है। यह उस डर की गवाही है, जो अभिभावकों के मन में अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बैठ चुका है। सबसे चुभने वाली बात यह है कि भवन की हालत अचानक खराब नहीं हुई। विद्यालय और अभिभावक लंबे समय से इसे दुरुस्त कराने की मांग कर रहे हैं। शिकायतें हुईं, आवाजें उठीं, लेकिन सरकारी तंत्र की नींद नहीं टूटी। अब लगातार बारिश ने जर्जर भवन को और जोखिम भरा बना दिया है। आखिर जिम्मेदार विभाग को किस चीज का इंतजार है? क्या किसी बच्चे के घायल होने का? क्या भवन का कोई हिस्सा गिरने का? या फिर उस दिन का, जब प्रशासन मौके पर पहुंचकर राहत-बचाव की तस्वीरें जारी करे?हादसा होने के बाद कार्रवाई करना प्रशासनिक सफलता नहीं, व्यवस्था की विफलता होगी। जब भवन की स्थिति को लेकर स्कूल और अभिभावक पहले से चेतावनी दे रहे हैं तो फिर समय रहते मरम्मत क्यों नहीं हुई? बारिश शुरू होने के बाद भी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? स्कूल में 200 से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। लेकिन सोमवार को स्कूल पहुंचने वाले बच्चों की संख्या सिर्फ 25 रह गई। बाकी बच्चे कहां हैं? जवाब किसी सरकारी रिपोर्ट में नहीं, बल्कि अभिभावकों के डर में छिपा है, जिस स्कूल की इमारत देखकर माता-पिता अपने बच्चों को घर पर रोकने को मजबूर हो जाएं, वहां शिक्षा व्यवस्था की सफलता के दावे कितने खोखले हैं, यह समझना मुश्किल नहीं। स्कूल बच्चों के लिए ज्ञान का मंदिर होना चाहिए, लेकिन लोधिया में वही भवन बच्चों और अभिभावकों के लिए चिंता का कारण बन गया है। लोधिया कोई ऐसा दूरदराज का इलाका नहीं है जहां प्रशासन की नजर पहुंचना मुश्किल हो। यह अल्मोड़ा नगर से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर है और राजनीतिक सवाल इससे भी बड़ा है। यह क्षेत्र केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा से जुड़ा हुआ है। हाल में राज्य मंत्री बने कुंदन लटवाल का घर भी इसी क्षेत्र में बताया जाता है। तो फिर सवाल स्वाभाविक हैकृकि जब सत्ता के इतने करीब होने के बावजूद एक सरकारी स्कूल की इमारत वर्षों से बदहाल है, तब पहाड़ के दूरस्थ गांवों के सरकारी स्कूलों की हालत कौन पूछेगा? क्या जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में बच्चों की सुरक्षा शामिल है? अगर शामिल है तो लोधिया कालेज अब तक क्यों नहीं सुधरा? उत्तराखंड में सरकारी भवनों की बदहाली कोई नई कहानी नहीं है। हर बरसात में स्कूल, अस्पताल, पंचायत भवन और दूसरी सरकारी इमारतें अपनी जर्जर हालत का सच सामने लाती हैं। लोधिया कालेज भी उसी व्यवस्था की तस्वीर बन गया है, जहां शिकायत पहले होती है और कार्रवाई हादसे के बाद। यह सवाल सिर्फ शिक्षा विभाग से नहीं है। प्रशासन, शिक्षा महकमा और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधिकृसभी को जवाब देना होगा कि जब भवन को लेकर लगातार मांग उठ रही थी तो अब तक क्या किया गया? क्या भवन का तकनीकी निरीक्षण हुआ? क्या इसे सुरक्षित घोषित किया गया है? अगर सुरक्षित है तो अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से क्यों डर रहे हैं? अगर असुरक्षित है तो स्कूल में कक्षाएं क्यों चल रही हैं? और सबसे बड़ा सवालकृकि अगर बारिश के बीच भवन गिर गया तो जिम्मेदारी किसकी होगी? सरकारें अक्सर बजट, प्रस्ताव, स्वीकृति और टेंडर की लंबी प्रक्रिया का हवाला देती हैं। लेकिन बच्चों की सुरक्षा किसी फाइल की गति की मोहताज नहीं हो सकती। एक जर्जर स्कूल भवन को ठीक कराने के लिए अगर महीनों-वर्षों लगते हैं, तो सवाल भवन की उम्र का नहीं, व्यवस्था की प्राथमिकताओं का है। लोधिया के अभिभावक अपने बच्चों के लिए कोई विशेष सुविधा नहीं मांग रहे। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनके बच्चे जिस स्कूल में पढ़ने जाएं, उसकी छत उनके सिर पर सुरक्षित रहे। बारिश के बीच 200 से ज्यादा बच्चों वाले स्कूल में सिर्फ 25 बच्चों का पहुंचना प्रशासन के लिए खतरे की घंटी होना चाहिए। अब जरूरत निरीक्षण की औपचारिकता की नहीं, तत्काल सुरक्षा व्यवस्था की है। जब तक भवन सुरक्षित नहीं होता, बच्चों के लिए वैकल्पिक कक्षाओं की व्यवस्था हो। भवन की तकनीकी जांच कराई जाए। यदि पुनर्निर्माण आवश्यक है तो प्रक्रिया तत्काल शुरू हो। क्योंकिकृबच्चों की जिंदगी किसी सरकारी फाइल से छोटी नहीं है और लोधिया के अभिभावक अब यह सवाल पूछ रहे हैं।

अपमान पर पर्दा, सवाल उठाने पर केस

कांग्रेस द्वारा इसे महज उत्तराखंड का मामला न मानकर राष्ट्रीय स्तर पर उठा रही खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण और सामाजिक बराबरी के मुद्दे पर विवाद को राष्ट्रीय पहचान देने और कांग्रेस के आगामी रणनीतिक का है बड़ा प्लान देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाले नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर दर्ज एफआईआर ने उत्तराखंड की सियासत को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। कांग्रेस ने अब इस पूरे विवाद को महज उत्तराखंड का स्थानीय मामला मानने से इनकार करते हुए इसे दलित सम्मान, सामाजिक बराबरी और संविधान की लड़ाई से जोड़ दिया है। राहुल गांधी के खिलाफ हल्द्वानी में एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होने के बाद कांग्रेस का आक्रोश और बढ़ गया है। पार्टी का आरोप है कि खड़गे के कार्यक्रम के बाद हुए कथित शुद्धिकरण पर कार्रवाई करने के बजाय राहुल गांधी की आवाज को एफआईआर के जरिए दबाने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए आंदोलन को देशव्यापी स्वर देने का फैसला किया है। कांग्रेस की रणनीति अब साफ दिखाई दे रही है। पार्टी इस विवाद को केवल मंच शुद्धिकरण तक सीमित नहीं रखना चाहती। उसका निशाना अब सीधे भाजपा की राजनीतिक और वैचारिक राजनीति पर है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कथित शुद्धिकरण में शामिल लोगों के खिलाफ एफआईआर की मांग की थी। कांग्रेस का कहना है कि जब इस मांग के बाद राहुल गांधी पर ही मुकदमा दर्ज कर दिया गया, तो इससे सवाल और बड़ा हो गया है कि क्या विपक्ष के नेता को सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने का भी अधिकार नहीं है? कांग्रेस नेताओं ने इसी सवाल को लेकर विरोध-प्रदर्शन का सिलसिला शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में प्रदर्शन हुआ तो झारखंड के धनबाद तक इसका असर दिखाई दिया। कई राज्यों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एफआईआर और कथित शुद्धिकरण के खिलाफ आवाज उठाई। राजनीतिक तौर पर देखें तो कांग्रेस को एक ऐसा मुद्दा मिल गया है, जिसके जरिए वह भाजपा को सीधे सामाजिक न्याय और संविधान के सवाल पर घेरना चाहती है। खड़गे स्वयं दलित समुदाय से आने वाले राष्ट्रीय नेता हैं। ऐसे में कांग्रेस का तर्क है कि उनके कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण की घटना को सामान्य राजनीतिक विवाद मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। पार्टी इसे सामाजिक भेदभाव के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है। राहुल गांधी ने भी इसे इसी बड़े विमर्श से जोड़ा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर समेत कई नेताओं ने घटना की आलोचना की है। अब पार्टी की कोशिश इस सवाल को गांव, शहर और प्रदेश स्तर तक ले जाने की है। अगर संविधान समानता की गारंटी देता है तो जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के सम्मान को लेकर अलग व्यवहार क्यों? इस विवाद का सबसे सीधा असर उत्तराखंड की राजनीति पर पड़ना तय है। कांग्रेस पहले ही हल्द्वानी की घटना को लेकर आक्रामक है और देहरादून में सचिवालय घेराव का ऐलान कर चुकी है। कांग्रेस के लिए यह आंदोलन केवल भाजपा विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने राजनीतिक नैरेटिव को धार देने का अवसर भी बन गया है। भाजपा जहां कांग्रेस पर मामले को जातिगत राजनीति के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस इसे भाजपा की कथित सामाजिक सोच का आईना बता रही है। यानी आने वाले दिनों में यह विवाद कानूनी लड़ाई से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई बन सकता है। कांग्रेस का हमला अब दो सवालों पर केंद्रित हैकृपहला, खड़गे के कार्यक्रम के बाद हुए कथित शुद्धिकरण पर क्या कार्रवाई हुई? दूसरा, राहुल गांधी के बयान पर एफआईआर क्यों? भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह इस विवाद को केवल राहुल गांधी के बयान तक सीमित रखकर कांग्रेस के राजनीतिक हमले को रोक पाएगी या नहीं। क्योंकि कांग्रेस अब इसे राहुल बनाम भाजपा का विवाद नहीं रहने देना चाहती। वह इसे सामाजिक सम्मान बनाम भेदभाव के सवाल में बदलने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस ने साफ संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे पर पीछे हटने वाली नहीं है। पार्टी ने देशभर में प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं और एफआईआर को ही आंदोलन का राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी है। कांग्रेस का कहना है कि उसके नेताओं पर कार्रवाई हो सकती है तो कथित शुद्धिकरण के लिए जिम्मेदार लोगों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। यानी हल्द्वानी का विवाद अब उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर निकल चुका है। एक तरफ भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीतिक अवसरवादिता बता रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस इसे संविधान और सामाजिक सम्मान की लड़ाई बना रही है। आने वाले दिनों में असली मुकाबला अदालत या थाने से ज्यादा जनता की अदालत में नैरेटिव तय करने का होगा और यही इस पूरे विवाद को 2027 की उत्तराखंड विधानसभा चुनावी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण बना देता है।

एफआईआर बन गई नया ‘रणक्षेत्र’

भाजपा बोलीकृसियासत के लिए समाज को मत बांटो, कानून से ऊपर कौन राहुल की एफआईआर पर कांग्रेस के हंगामे को बताया राजनीतिक नौटंकी देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद सामने आए कथित शुद्धिकरण विवाद ने उत्तराखंड की सियासत को सड़क से लेकर राजधानी तक गर्म कर दिया है। कांग्रेस ने जहां इसे सामाजिक अपमान, दलित सम्मान और संविधान की लड़ाई का नाम देकर भाजपा को घेरना शुरू किया है, वहीं भाजपा ने पलटवार करते हुए कांग्रेस के इस अभियान को राजनीतिक मुद्दे को जातीय रंग देने की कोशिश करार दिया है। भाजपा का हमला सीधा हैकृकांग्रेस के पास जनता के बीच जाने के लिए मुद्दे नहीं बचे तो अब विवादों को चुनावी हथियार बनाया जा रहा है। भाजपा नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड की शांत सामाजिक व्यवस्था को राजनीतिक फायदे के लिए जाति के चश्मे से देखना प्रदेश के हित में नहीं है। पार्टी ने कांग्रेस से सवाल किया है कि क्या हर राजनीतिक विवाद को जातिगत संघर्ष में बदल देना ही उसकी राजनीति का नया एजेंडा है? कांग्रेस जिस घटना को दलित सम्मान से जोड़कर राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुटी है, भाजपा ने उसी नैरेटिव को पलटने की कोशिश शुरू कर दी है। भाजपा का कहना है कि किसी व्यक्ति या संगठन की ओर से कानून का उल्लंघन हुआ है तो जांच होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई भी। लेकिन इसके नाम पर पूरे राजनीतिक दल या समाज को कटघरे में खड़ा करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। पार्टी का तर्क है कि कानून अपना रास्ता तय करेगा, राजनीतिक मंच अदालत नहीं बन सकता। यही वह लाइन है जिसके जरिए भाजपा कांग्रेस के आंदोलन की धार कुंद करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज एफआईआर ने विवाद को और बड़ा राजनीतिक आयाम दे दिया है। कांग्रेस इसे बदले की राजनीति बता रही है और कार्रवाई की मांग कर रही है। भाजपा का जवाब है कि लोकतंत्र में राजनीतिक कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, कानून सबके लिए समान होना चाहिए। भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि कांग्रेस राहुल गांधी की एफआईआर को लेकर देशभर में आंदोलन की तैयारी कर रही है। ऐसे में भाजपा इस लड़ाई को कानून बनाम राजनीतिक दबाव के फ्रेम में रखने की कोशिश कर रही है। भाजपा का संदेश हैकृएफआईआर को लेकर सड़क पर दबाव बनाने से कानून की प्रक्रिया नहीं बदलेगी। भाजपा ने कांग्रेस के आंदोलन के पीछे राजनीतिक मंशा भी तलाशनी शुरू कर दी है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस सामाजिक न्याय के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करना चाहती है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को यदि वास्तव में सामाजिक सद्भाव की चिंता है तो उसे ऐसे मुद्दों को हवा देने के बजाय प्रदेश में भाईचारे की राजनीति करनी चाहिए। भाजपा के हमले का सार यही हैकृसम्मान के सवाल पर राजनीति नहीं, कानून के आधार पर फैसला होना चाहिए। इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक संदर्भ 2027 का विधानसभा चुनाव है। उत्तराखंड में चुनावी तैयारी शुरू होते ही भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक नैरेटिव मजबूत करने में जुटे हैं। कांग्रेस के लिए यह विवाद भाजपा को सामाजिक न्याय के मोर्चे पर घेरने का अवसर है। भाजपा के लिए चुनौती है कि कांग्रेस इसे दलित बनाम भाजपा के सवाल में तब्दील न कर पाए। इसीलिए भाजपा अब रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक हो गई है। पार्टी कांग्रेस से पूछ रही है कि अगर हर विवाद को जाति से जोड़कर आंदोलन किया जाएगा तो क्या इससे समाज में दूरी नहीं बढ़ेगी? भाजपा की कोशिश इस पूरे विवाद को विकास बनाम विवाद की बहस में बदलने की है। पार्टी का कहना है कि जनता रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और पर्यटन जैसे मुद्दों पर जवाब चाहती है, जबकि कांग्रेस राजनीतिक विवादों को हवा देकर चुनावी जमीन तैयार कर रही है। यानी भाजपा का निशाना केवल कांग्रेस नहीं, बल्कि उसका चुनावी नैरेटिव है। कांग्रेस जहां पूछ रही है कि कथित शुद्धिकरण करने वालों पर कार्रवाई कब होगी, वहीं भाजपा पलटकर पूछ रही है कि क्या राहुल गांधी कानून से ऊपर हैं? यही सवाल अब आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है। फिलहाल दोनों दल पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। कांग्रेस सड़क पर उतरने की तैयारी में है तो भाजपा भी जवाबी राजनीतिक अभियान की जमीन तैयार कर रही है। एक घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैंकृसामाजिक सम्मान का, राजनीतिक मर्यादा का, कानून का और सबसे बढ़कर 2027 के चुनावी नैरेटिव का। हल्द्वानी का विवाद अब केवल शुद्धिकरण तक सीमित नहीं है। कांग्रेस इसे भाजपा की वैचारिक राजनीति का प्रतीक बता रही है, जबकि भाजपा इसे कांग्रेस की विवाद पैदा करो और राजनीतिक लाभ लो रणनीति के रूप में पेश कर रही है। उत्तराखंड की सियासत में अब असली मुकाबला सिर्फ बयानबाजी का नहीं, बल्कि इस बात का है कि जनता किस नैरेटिव को स्वीकार करती है। एक तरफ कांग्रेस का सवालकृखड़गे के कथित अपमान पर कार्रवाई कब? दूसरी तरफ भाजपा का पलटवारकृराजनीति के लिए समाज को कब तक बांटोगे? और इसी सवाल-जवाब के बीच 2027 का चुनावी रण धीरे-धीरे आकार लेता दिख रहा है।

पवित्र मैदान पर ‘गंदी सियासत’

रामलीला मैदान विवाद में बीजेपी ने बदला पैंतरा, कांग्रेस को घेरा खड़गे विवाद पर बीजेपी की दो टूककृपरंपरा से खिलवाड़ मंजूर नहीं रामलीला मैदान का धार्मिक महत्व जानते हुए भी हो रही है सियासत भाजपा का सवालकृधार्मिक आस्था के स्थल को राजनीतिक अखाड़ा देहरादून। हल्द्वानी का रामलीला मैदान इन दिनों राजनीतिक विवाद का केंद्र बना हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण को लेकर कांग्रेस जहां भाजपा और हिंदू संगठनों पर हमलावर है, वहीं भाजपा ने अब इस विवाद को एक अलग कोण से उठाना शुरू कर दिया है। भाजपा का कहना है कि जिस रामलीला मैदान का स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में महत्व रहा है, वहां हुई घटना को केवल जातिगत चश्मे से देखना उत्तराखंड की सनातन परंपरा और स्थानीय आस्था के साथ अन्याय है। भाजपा का तर्क है कि विवाद में शामिल प्रत्येक पक्ष की भूमिका और उसके बयान की जांच होनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए पूरे घटनाक्रम को दलित बनाम सवर्ण या दलित बनाम सनातन की बहस में बदलना समाज को बांटने की कोशिश है। हल्द्वानी का रामलीला मैदान लंबे समय से धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों का प्रमुख स्थल रहा है। रामलीला जैसे धार्मिक आयोजनों के कारण इस मैदान की पहचान स्थानीय जनजीवन में केवल एक सार्वजनिक मैदान के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े स्थान के तौर पर भी बनी है। यही वजह है कि भाजपा इस पहलू को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला रही है। भाजपा नेताओं का सवाल है कि यदि किसी धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल पर कोई विवाद पैदा होता है तो उसकी संवेदनशीलता को समझना जरूरी है। उसे तत्काल जातीय संघर्ष की भाषा में बदल देना क्या उचित है? भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस इस विवाद को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर रही है। पार्टी नेताओं के अनुसार कांग्रेस के पास भाजपा को घेरने के लिए सामाजिक न्याय और दलित सम्मान का मुद्दा है, लेकिन इस बहस में सनातन परंपराओं और स्थानीय धार्मिक भावनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। भाजपा का कहना है कि दलित सम्मान और सनातन सम्मान को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना ही असली राजनीतिक साजिश है। पार्टी के मुताबिक उत्तराखंड की सामाजिक संरचना को इस तरह की विभाजनकारी राजनीति से बचाना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है। कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है कि खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण क्यों किया गया और इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। भाजपा इस सवाल पर सीधे बचाव करने के बजाय अब बहस का फोकस बदलने की कोशिश कर रही है। उसका कहना है कि किसी भी घटना पर कानून अपना काम करे, लेकिन धार्मिक स्थल और धार्मिक परंपराओं को लेकर संवेदनशीलता भी जरूरी है। यहीं से भाजपा का राजनीतिक पलटवार शुरू होता है। भाजपा नेताओं का सवाल है कि क्या किसी धार्मिक परंपरा को लेकर उठे विवाद को सीधे जातिवाद का नाम देकर खत्म कर देना उचित होगा? कांग्रेस के लिए भाजपा का यह नैरेटिव चुनौतीपूर्ण है। कांग्रेस इस पूरे प्रकरण को दलित सम्मान और सामाजिक बराबरी का सवाल बनाना चाहती है। भाजपा इसे सनातन परंपरा, धार्मिक आस्था और सामाजिक सद्भाव से जोड़ रही है। इस तरह दोनों दल एक ही घटना से दो बिल्कुल अलग राजनीतिक संदेश निकाल रहे हैं। कांग्रेस का संदेशकृसामाजिक बराबरी से समझौता नहीं। भाजपा का संदेशकृधार्मिक आस्था को राजनीतिक हथियार मत बनाइए। यानी विवाद अब केवल हल्द्वानी तक सीमित नहीं रह गया है। यह उत्तराखंड में उस बड़े राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन रहा है जिसमें सामाजिक न्याय बनाम सांस्कृतिक अस्मिता के अलग-अलग नैरेटिव सामने आ रहे हैं। भाजपा कांग्रेस से यह भी पूछ रही है कि क्या हर राजनीतिक विवाद में जाति को केंद्र में रखना जरूरी है? पार्टी का कहना है कि उत्तराखंड का समाज लंबे समय से विभिन्न जातियों, समुदायों और परंपराओं के सह-अस्तित्व का उदाहरण रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों को ऐसे मुद्दों पर और अधिक जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। हालांकि कांग्रेस का तर्क है कि कथित शुद्धिकरण जैसी घटना को सामान्य धार्मिक परंपरा बताकर टाला नहीं जा सकता। उसका कहना है कि सामाजिक बराबरी और सम्मान के सवाल को दबाया नहीं जा सकता। यही टकराव अब पूरे विवाद को और तीखा बना रहा है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक तैयारियां तेज होने के साथ इस विवाद का चुनावी महत्व भी बढ़ गया है। भाजपा जहां अपने हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नैरेटिव को मजबूती देने की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस सामाजिक न्याय, संविधान और बराबरी को अपने अभियान का प्रमुख आधार बना सकती है। हल्द्वानी का रामलीला मैदान इसलिए अब केवल विवाद का स्थल नहीं, बल्कि दो राजनीतिक विचारधाराओं की टकराहट का प्रतीक बनता जा रहा है। भाजपा का सवाल है कि सनातन परंपरा और दलित सम्मान को आमने-सामने खड़ा करके आखिर किसका राजनीतिक फायदा होगा? कांग्रेस का सवाल है कि धार्मिक आस्था के नाम पर सामाजिक भेदभाव को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? यही दो सवाल आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत का तापमान तय करेंगे। रामलीला मैदान की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान अपनी जगह है और सामाजिक समानता का संवैधानिक सिद्धांत अपनी जगह। राजनीतिक दलों के सामने चुनौती यही है कि आस्था और अधिकार की इस बहस को समाज को बांटने का हथियार बनने से कैसे रोका जाए।

सोमवार, 31 अगस्त 2026

udaydinmaan: मुद्दा मंच का और ‘निशाना’ 2027

udaydinmaan: मुद्दा मंच का और ‘निशाना’ 2027: हल्द्वानी के मंच से उठी सियासी चिंगारी दिल्ली तक पहुंची कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र और संविधान का बताया है अपमान भाजपा का कांग्रेस पर धार्मिक...

मंच शुद्धिकरण पर ‘महासंग्राम’

खरगे मामले में अल्मोड़ा में सड़कों पर उतरी कांग्रेस, एफआईआर की मांग पर अड़ी मंच शुद्धिकरण पर कांग्रेस का वार, एफआईआर के लिए कोतवाली पहुंचा काफिला अल्मोड़ा में गरजे कांग्रेसी,लोकतंत्र में यह कैसी राजनीति? दोषियों पर मुकदमा करो देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यक्रम स्थल के कथित शुद्धिकरण का मामला अब अल्मोड़ा में भी सियासी चिंगारी भड़काने लगा है। सोमवार को कांग्रेस कार्यकर्ता बड़ी संख्या में कोतवाली पहुंचे और घटना के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर पुलिस पर दबाव बनाया। कांग्रेसियों ने साफ कहा कि राजनीतिक विरोध की आड़ में सामाजिक और धार्मिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश किसी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। कोतवाली पहुंचे कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष के बीच वैचारिक संघर्ष स्वाभाविक है, लेकिन किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम स्थल का कथित तौर पर गंगाजल से शुद्धिकरण करना विरोध की राजनीति को एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। कांग्रेस ने सवाल उठाया कि क्या अब राजनीतिक असहमति का जवाब धार्मिक प्रतीकों के जरिए दिया जाएगा? कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पुलिस को ज्ञापन सौंपते हुए मांग की कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर वीडियो और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संबंधित लोगों की पहचान की जाए और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाए। नेताओं ने कहा कि कानून सबके लिए बराबर है और राजनीतिक प्रभाव के कारण किसी को कार्रवाई से बचने नहीं दिया जाना चाहिए। कांग्रेस नेताओं ने पुलिस-प्रशासन को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा कि यदि घटना सामने आने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं होती है तो इससे कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े होंगे। उनका कहना था कि कानून की किताब में आरोपी का राजनीतिक झंडा नहीं देखा जाता, अपराध देखा जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में लगातार ऐसी राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें असली मुद्दों से ध्यान हटाकर धार्मिक और भावनात्मक विषयों को आगे किया जा रहा है। कांग्रेस ने चेतावनी दी कि यदि पुलिस ने मामले में तत्काल कार्रवाई नहीं की तो पार्टी कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे। हल्द्वानी का मंच शुद्धिकरण प्रकरण अब केवल एक शहर तक सीमित नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक मर्यादा, सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर प्रदेशभर में मुद्दा बनाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। अल्मोड़ा में कोतवाली पहुंचकर एफआईआर की मांग इसी राजनीतिक रणनीति का अगला कदम माना जा रहा है। विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड की सियासत पहले ही गरम है। ऐसे में मंच शुद्धिकरण का विवाद भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ती तल्खी को और हवा दे सकता है।

मुद्दा मंच का और ‘निशाना’ 2027

हल्द्वानी के मंच से उठी सियासी चिंगारी दिल्ली तक पहुंची कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र और संविधान का बताया है अपमान भाजपा का कांग्रेस पर धार्मिक भावनाओं के दोहन का आरोप देहरादून। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यक्रम स्थल के कथित शुद्धीकरण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब प्रदेश की सियासत से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बन गया है। गंगाजल छिड़कने और हवन के जरिए मंच के शुद्धीकरण की घटना पर कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के खिलाफ बताया है, वहीं भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीति पर पलटवार के तौर पर पेश कर रही है। मामला बढ़ने के बाद कांग्रेस ने सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग की है। राहुल गांधी ने शुद्धीकरण की घटना को लेकर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग करते हुए इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जोड़ दिया। कांग्रेस का आरोप है कि राजनीतिक विरोध के नाम पर विपक्ष के राष्ट्रीय अध्यक्ष के मंच का शुद्धीकरण करना सामाजिक विभाजन और राजनीतिक असहिष्णुता की मानसिकता को दर्शाता है। हल्द्वानी की घटना ने उत्तराखंड के राजनीतिक तापमान को अचानक बढ़ा दिया है। विधानसभा चुनाव से पहले जहां भाजपा और कांग्रेस संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं यह विवाद दोनों दलों को एक-दूसरे पर वैचारिक हमला करने का नया अवसर दे रहा है। कांग्रेस इस पूरे मामले को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम से जुड़ा विवाद नहीं मान रही। पार्टी इसे सामाजिक समरसता, संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं से जोड़कर बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है। दूसरी ओर भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस स्वयं धार्मिक प्रतीकों और आस्थाओं को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती रही है और अब विरोध होने पर लोकतंत्र की दुहाई दे रही है। यही वजह है कि हल्द्वानी का स्थानीय विवाद अब भाजपा बनाम कांग्रेस की व्यापक वैचारिक लड़ाई का चेहरा बनता दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी के सीधे हमले ने उत्तराखंड कांग्रेस को भी आक्रामक तेवर अपनाने का मौका दिया है। प्रदेश कांग्रेस नेताओं ने भाजपा से सवाल किया है कि क्या राजनीतिक मतभेद के कारण किसी दूसरे दल के राष्ट्रीय नेता के कार्यक्रम स्थल को अपवित्र माना जा सकता है? कांग्रेस का कहना है कि लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध की अनुमति है, लेकिन विरोध की सीमा संवैधानिक और सामाजिक मर्यादाओं से बाहर नहीं जानी चाहिए। कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही हैकृमुद्दे को केवल हल्द्वानी तक सीमित न रखकर इसे राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र बनाम कथित धार्मिक राजनीति के विमर्श में बदलना। भाजपा कांग्रेस के आरोपों को स्वीकार करने के बजाय पलटवार की रणनीति पर चल रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को धार्मिक भावनाओं और हिंदू आस्था से जुड़े मुद्दों पर राजनीति करने से पहले अपने राजनीतिक व्यवहार पर नजर डालनी चाहिए। भाजपा का प्रयास इस विवाद को कांग्रेस की कथित तुष्टिकरण की राजनीति और सनातन से जुड़े उसके बयानों से जोड़ने का है। पार्टी का संदेश है कि कांग्रेस यदि धार्मिक भावनाओं से जुड़े प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल करेगी तो भाजपा भी उसी राजनीतिक मैदान में जवाब देने से पीछे नहीं हटेगी। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव को अभी समय है, लेकिन दोनों प्रमुख दलों की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। ऐसे में हल्द्वानी का शुद्धीकरण विवाद महज एक घटना नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी विमर्श की झलक भी माना जा रहा है। पहाड़ की राजनीति में बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा और महंगाई जैसे मुद्दे लगातार मौजूद हैं। मगर राजनीतिक दलों के लिए भावनात्मक और धार्मिक मुद्दे चुनावी ध्रुवीकरण का आसान माध्यम भी बनते रहे हैं। हल्द्वानी की घटना ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा किया है कि 2027 का चुनाव विकास के सवालों पर लड़ा जाएगा या फिर धार्मिक-सामाजिक पहचान के मुद्दे चुनावी एजेंडे पर हावी होंगे। इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या किसी राजनीतिक मंच का धार्मिक तरीके से शुद्धीकरण महज आस्था का विषय है या इसके पीछे राजनीतिक संदेश भी छिपा है। भाजपा इसे आस्था और राजनीतिक प्रतिक्रिया के नजरिए से देख रही है, जबकि कांग्रेस इसे विपक्ष के प्रति असम्मान और सामाजिक विभाजन की राजनीति बता रही है। दोनों दलों की व्याख्या अलग है, लेकिन राजनीतिक असर एककृविवाद लगातार बड़ा होता जा रहा है। हल्द्वानी से उठी यह चिंगारी अब दिल्ली तक पहुंच चुकी है। राहुल गांधी के मैदान में उतरने के बाद भाजपा के लिए इसे स्थानीय विवाद तक सीमित रखना मुश्किल होगा। कांग्रेस इसे संविधान और लोकतंत्र का सवाल बनाएगी तो भाजपा इसे सनातन, आस्था और तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ अपने अभियान से जोड़ेगी। यानी चुनावी रणभेरी बजने से पहले ही उत्तराखंड में एक नया राजनीतिक अखाड़ा तैयार हैकृमुद्दा मंच का है, लेकिन निशाना 2027 है।

राहुल गांधी पर हल्द्वानी में मुकदमा

हल्द्वानी मंच शुद्धिकरण मामले में शिकायत, दलितों के अपमान का लगा आरोप श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास की तहरीर पर पुलिस ने राहुल गांधी पर केस दर्ज देहरादून। हल्द्वानी मंच शुद्धीकरण मामले ने अब नया राजनीतिक और कानूनी मोड़ ले लिया है। श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास की ओर से कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ पुलिस को तहरीर दी गई है। शिकायतकर्ताओं ने जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए जांच और कानूनी कार्रवाई की मांग की है, जिसके बाद हल्द्वानी कोतवाली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम स्थल के शुद्धीकरण का मामले पर राजनीति तेज है। अब इस मामले में एक और नया मोड़ सामने आया है। श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास के दो कार्यकर्ता विनोद कुमार आर्य और अमित कुमार ने कांग्रेस सांसद एवं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ पुलिस को तहरीर सौंपी है, जिसके आधार पर कोतवाली पुलिस ने कांग्रेस नेता के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि राहुल गांधी की ओर से अनुसूचित जाति के खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया। पुलिस से मामले की जांच कर कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि सार्वजनिक मंच से की गई कथित टिप्पणी से अनुसूचित जाति के लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। उन्होंने पुलिस से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करने और आरोप सही पाए जाने पर संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई करने की मांग की है। गौरतलब है कि हल्द्वानी के रामलीला मैदान में हुए शुद्धिकरण कार्यक्रम को लेकर पहले से ही राजनीतिक बयानबाजी तेज है। मंजूनाथ टीसी, एसएसपी, नैनीताल ने कहा कि दलित समाज से आने वाले अमित नाम के व्यक्ति ने एक शिकायत दी थी, जिस के आधार पर मुकदमे दर्ज किया गया है। तहरीर में कहा था कि राहुल गांधी के बयान व प्रेस कांफ्रेंस से उन्हें और उनके समाज को चोट पहुंची है। इस बारे में दलित समाज के लोगों से कोई भी जानकारी नहीं ली गई और यह समाज के लिए सही नहीं है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर आगे की कार्रवाई तेज कर दी है। कांग्रेस इस मामले को लेकर विरोध दर्ज करा रही है, जबकि दूसरी ओर शुद्धिकरण कराने वाले पक्ष की ओर से लगातार अपनी बात रखी जा रही है। अब राहुल गांधी के खिलाफ दी गई इस तहरीर के बाद मामला और गरमा गया है। हालांकि पुलिस ने तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज किया है। इसके साथ ही मामले की विवेचना पुलिस क्षेत्राधिकारी अमित कुमार सैनी को सौंपी गई है। शिकायतकर्ता अमित कुमार मंच शुद्धिकरण मामले में उनकी संस्था द्वारा रामलीला मचान में गंदगी फैली हुई थी, जिसको लेकर उस स्थान पर सफाई अभियान चला कर शुद्धिकरण किया गया था। इस मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं, जिसको लेकर समाज के व्यक्तियों के साथ राहुल गांधी के खिलाफ तहरीर सौंपी है। गौर हो कि 8 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस की एक रैली आयोजित हुई थी, जिसके बाद कथित तौर पर हिंदूवादी संगठन की ओर से मैदान में शुद्धिकरण यज्ञ का मामला सामने आने के बाद राजनीति तेज हो गई।

उत्तराखंड की राजनीति का ‘गोल्डन रूल’

उत्तराखंड की सियासत में नहीं चलता जाति-धर्म का गणित पहाड़ की जनता ने विकास, ईमानदारी,जनहित को तरजीह दी पहचान की राजनीति से ज्यादा मुद्दों की राजनीति रही है हावी देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामाजिक बुनावट रही है। पहाड़ से मैदान तक समाज अनेक जातियों, समुदायों और वर्गों में बंटा होने के बावजूद चुनावी राजनीति में उत्तराखंड की जनता ने लंबे समय तक जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर स्थायी खांचे स्वीकार नहीं किए। यहां मतदाता की अपनी राजनीतिक समझ रही है और वह समय-समय पर सरकारों और नेताओं को उनके कामकाज के आधार पर परखता रहा है। उत्तराखंड का गठन ही लंबे जनआंदोलन की उस भावना से हुआ था, जिसमें क्षेत्रीय अस्मिता, रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पहाड़ के विकास को केंद्रीय मुद्दा बनाया गया। आंदोलन के दौर में जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोग एक साझा मांग के साथ सड़कों पर उतरे। यही सामाजिक चेतना आज भी प्रदेश की राजनीति की बुनियाद में दिखाई देती है। उत्तराखंड की राजनीति को केवल पहाड़ और मैदान के बीच विभाजन के नजरिए से भी पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे मैदानी जिलों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं तो सीमांत और पर्वतीय जिलों के अपने सवाल। इसके बावजूद चुनावों में मतदाता कई बार स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवार की छवि को पार्टी के पारंपरिक समीकरणों पर भारी कर देता है। यही कारण है कि उत्तराखंड में किसी एक जाति या समुदाय को स्थायी वोट बैंक मान लेना राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं रहा है। उत्तराखंड धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण प्रदेश है। चारधाम, प्रमुख शक्तिपीठ और अनेक स्थानीय देव परंपराएं यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। लेकिन धार्मिक आस्था और चुनावी राजनीति को एक ही तराजू में रखना हमेशा सही नहीं रहा। प्रदेश का मतदाता धार्मिक हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने रोजमर्रा के सवालों को भूल जाता है। सड़क टूटने पर सड़क चाहिए, अस्पताल में डाक्टर चाहिए, स्कूल में शिक्षक चाहिए और युवाओं को रोजगार चाहिए। पहाड़ में पलायन रोकना है तो स्थानीय स्तर पर आर्थिक अवसर चाहिए। आस्था अपनी जगह है और शासन का सवाल अपनी जगह। उत्तराखंड में जातीय पहचानें मौजूद हैं और राजनीतिक दल चुनावों में सामाजिक समीकरणों का आकलन भी करते हैं। मगर यहां जाति को चुनाव जीतने की गारंटी मान लेना जोखिम भरा रहा है। एक ही जाति या समुदाय के मतदाता अलग-अलग राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। इसका कारण उत्तराखंड की सामाजिक संरचना और राजनीतिक चेतना दोनों में देखा जा सकता है। छोटे राज्य में स्थानीय रिश्ते, उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, क्षेत्रीय जुड़ाव और उसके कामकाज का असर कई बार व्यापक जातीय समीकरणों पर भारी पड़ता है। आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह जनता को किस मुद्दे पर अपने साथ जोड़ते हैं। क्या चुनाव बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और आपदा प्रबंधन पर होगा या फिर जाति, धर्म और पहचान के भावनात्मक मुद्दे चुनावी विमर्श पर हावी होंगे? उत्तराखंड का मतदाता राजनीतिक दलों को यह संदेश देता रहा है कि उसे केवल भावनाओं से नहीं, परिणामों से मतलब है। सत्ता में बैठी सरकार से वह सवाल करता है और विपक्ष से भी विकल्प की स्पष्टता मांगता है। उत्तराखंड की सामाजिक एकता को सबसे बड़ी चुनौती तब मिलती है जब राजनीतिक लाभ के लिए समाज को छोटे-छोटे खांचों में बांटने का प्रयास होता है। जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर राजनीतिक धु्रवीकरण अल्पकाल में चुनावी लाभ दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है। उत्तराखंड की जनता ने राज्य आंदोलन से लेकर आज तक कई राजनीतिक बदलाव देखे हैं। सरकारें बदलीं, चेहरे बदले और चुनावी मुद्दे बदले, लेकिन जनता की मूल आकांक्षाएं बहुत हद तक वही हैंकृसम्मान के साथ रोजगार, बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य, सुरक्षित सड़कें, मजबूत गांव और पलायन से मुक्ति। इसलिए 2027 की चुनावी लड़ाई में भी राजनीतिक दलों के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि किस जाति या समुदाय को कैसे साधा जाए। बड़ा सवाल यह होगा कि क्या उत्तराखंड की जनता को विकास और जनहित का भरोसेमंद एजेंडा दिया जा सकता है? उत्तराखंड की असली पहचान किसी जाति, धर्म या वर्ग की राजनीति नहीं, बल्कि साझा पहाड़ी चेतना है। यहां मतदाता को बांटने की कोशिश भले हो सकती है, लेकिन उसे स्थायी खांचे में कैद करना आसान नहीं। सियासत चाहे जितने समीकरण बनाए, आखिर में फैसला उत्तराखंड की जनता अपने मुद्दों और अपनी समझ से ही करेगी।

मोदी माडल में ‘सत्ता’ से ज्यादा ‘सेवा’ का दावा

भाजपा के लिए सत्ता शक्ति नहीं, सेवा का है माध्यम प्रदेश में जनसेवा के संदेश के साथ 2027 की तैयारी संगठन का दावाकृसमाज और राष्ट्र सेवा का है साधन देहरादून। भाजपा नेताओं की ओर से बार-बार दोहराया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के लिए सत्ता कभी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम नहीं रही, बल्कि जनसेवा का अवसर है। यह दावा ऐसे समय में सामने आ रहा है जब उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं और भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ संगठन को सक्रिय कर रही है। भाजपा की राजनीति में सेवा को केंद्रीय विचार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि सत्ता का अर्थ केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं और सुविधाओं का लाभ पहुंचाना है। यही वजह है कि भाजपा अपने राजनीतिक अभियान में विकास के साथ गरीब कल्याण, जनकल्याण और राष्ट्र निर्माण को प्रमुखता दे रही है। भाजपा नेताओं के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने राजनीति में सत्ता की परिभाषा को बदलने का प्रयास किया है। उनके लिए सरकार का मतलब केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि लोगों की समस्याओं का समाधान और जरूरतमंद तक सरकारी सहायता पहुंचाना है। भाजपा इस सोच को जनधन, आवास, शौचालय, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन और डिजिटल सेवाओं जैसी योजनाओं से जोड़कर पेश करती है। पार्टी का तर्क है कि शासन की सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि उसका लाभ समाज के उस व्यक्ति तक पहुंचे जो लंबे समय तक व्यवस्था से दूर रहा। हालांकि उत्तराखंड में भाजपा के सामने इस दावे को जमीन पर साबित करने की बड़ी चुनौती है। पहाड़ी जिलों में आज भी पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा, सड़क, आपदा और स्थानीय अर्थव्यवस्था जैसे सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार अपनी जगह है, लेकिन पहाड़ का मतदाता यह भी जानना चाहता है कि उसके गांव में रोजगार कब पहुंचेगा, अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक कब उपलब्ध होंगे, सड़कें कब सुरक्षित होंगी और आपदा के समय सरकारी तंत्र कितनी तेजी से उसके साथ खड़ा होगा। यानी भाजपा के लिए सेवा का दावा अब केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि 2027 में जनता की कसौटी भी बनने वाला है। भाजपा संगठन लगातार बूथ स्तर तक अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है। पार्टी की रणनीति में कार्यकर्ताओं को सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं को संगठन के माध्यम से सरकार तक पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है। भाजपा नेताओं का मानना है कि पार्टी की असली ताकत उसका कैडर और कार्यकर्ता है। इसलिए सत्ता में रहते हुए भी संगठन को जनता से निरंतर संपर्क बनाए रखने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। भाजपा के सेवा वाले नैरेटिव ने विपक्ष के सामने भी चुनौती खड़ी की है। कांग्रेस लगातार सरकार की नीतियों और उपलब्धियों पर सवाल उठाती रही है। ऐसे में आगामी चुनाव में मुकाबला केवल भाजपा की उपलब्धियों बनाम विपक्ष के आरोपों का नहीं होगा, बल्कि दोनों पक्षों को यह साबित करना होगा कि वह उत्तराखंड की जनता के जीवन में वास्तविक बदलाव कैसे ला सकते हैं। भाजपा जहां मोदी सरकार की उपलब्धियों और धामी सरकार के कामकाज को जनसेवा के माडल के रूप में पेश करेगी, वहीं विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, भर्ती और आपदा जैसे मुद्दों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश करेगा। राजनीति में सत्ता को सेवा का माध्यम बताना भारतीय लोकतंत्र में नया विचार नहीं है। लगभग हर राजनीतिक दल जनता की सेवा को अपना लक्ष्य बताता है। असली सवाल यह है कि सत्ता में आने के बाद उस विचार का कितना हिस्सा जमीन पर दिखाई देता है। उत्तराखंड में 2027 का चुनाव इसी दावे की परीक्षा बन सकता है। भाजपा यदि लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का लक्ष्य लेकर चल रही है तो उसे जनता के सामने यह भी साबित करना होगा कि उसके लिए सत्ता वास्तव में सेवा का माध्यम है। क्योंकि चुनावी भाषण में सत्ता सेवा हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में उसकी अंतिम परीक्षा जनता के अनुभव से होती है।

रविवार, 30 अगस्त 2026

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बैकफुट पर बीजेपी, कांग्रेस ने ‘दलित कार्ड’ खेला

कांग्रेस ने स्थानीय विवाद को बनाया राष्ट्रीय मुद्दा, एकजुट होकर खोला मोर्चा खरगे के अपमान को कांग्रेस ने बनाया सामाजिक बराबरी की लड़ाई का मुद्दा दिग्गजों से लेकर राहुल तक मैदान में, सम्मान बनाम मानसिकता की सियासत देहरादून। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित शुद्धिकरण के मामले ने उत्तराखंड कांग्रेस को एकजुट होकर राजनीतिक मोर्चा खोलने का मौका दे दिया है, जिस विवाद को शुरुआत में स्थानीय स्तर की घटना माना जा रहा था, कांग्रेस ने उसे अब दलित सम्मान, सामाजिक बराबरी और वैचारिक लड़ाई का मुद्दा बना दिया है। खरगे की आठ अगस्त को हल्द्वानी में सभा हुई थी। इसके बाद 10 अगस्त को रामलीला मैदान में हवन और गंगाजल छिड़कने का कार्यक्रम हुआ। इसके बाद विवाद ने राजनीतिक रंग पकड़ लिया। भाजपा ने आयोजन से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया है, जबकि कांग्रेस लगातार इस मामले में कार्रवाई की मांग कर रही है। कांग्रेस के लिए यह विवाद इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि पार्टी इसे केवल खरगे के अपमान के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक बराबरी के सवाल के रूप में पेश कर रही है। राज्यसभा में खरगे ने भी इस घटना पर आपत्ति जताई थी। बाद में संसद में मामला उठा और भाजपा की ओर से जांच तथा कार्रवाई का आश्वासन दिया गया। अब कांग्रेस के प्रदेश स्तर के दिग्गज नेताओं ने भी मोर्चा संभाल लिया है। प्रीतम सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से मिलकर निष्पक्ष जांच की मांग कर चुका है। यानी पार्टी इस मामले को सड़क से राजभवन और राजभवन से राष्ट्रीय राजनीति तक ले जाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। 29 अगस्त को राहुल गांधी के इस मुद्दे पर खुलकर सामने आने के बाद विवाद की राजनीतिक धार और तेज हो गई। राहुल ने कथित शुद्धिकरण को छुआछूत से जोड़ते हुए भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधा तथा कार्रवाई और एफआइआर की मांग की। इससे उत्तराखंड कांग्रेस के लिए साफ राजनीतिक संदेश गया हैकृमुद्दा छोड़ना नहीं है, बल्कि इसे राष्ट्रीय बहस में बनाए रखना है। कांग्रेस को इसमें एक साथ कई राजनीतिक संदेश दिखाई दे रहे हैं। पहला, दलित सम्मान का सवाल। दूसरा, सामाजिक न्याय का मुद्दा। तीसरा, भाजपा की वैचारिक राजनीति पर हमला और चौथा, आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का अवसर। हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौती भी कम नहीं है। भाजपा लगातार कह रही है कि शुद्धिकरण कार्यक्रम से उसका कोई संबंध नहीं था। ऐसे में कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी से आगे ले जाने के लिए उसे ठोस तथ्य और जांच के निष्कर्ष सामने रखने होंगे। यही कारण है कि कांग्रेस अब मामले की निष्पक्ष जांच की मांग पर जोर दे रही है। पार्टी का तर्क है कि यदि घटना गलत है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और यदि भाजपा का इससे कोई संबंध नहीं है तो वह भी निष्पक्ष जांच के माध्यम से स्पष्ट हो जाएगा। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज होने के बीच कांग्रेस इस विवाद को राजनीतिक रूप से हल्के में लेने के मूड में नहीं है। प्रदेश में दलित मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में कांग्रेस की कोशिश साफ दिखाई दे रही है कि शुद्धिकरण विवाद को सामाजिक सम्मान के बड़े सवाल से जोड़कर भाजपा के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जाए। दूसरी ओर भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह इस मामले को लगातार बढ़ते राजनीतिक विवाद में बदलने से कैसे रोके। पार्टी के सामने एक तरफ धार्मिक भावनाओं से जुड़ा पक्ष है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सामाजिक भेदभाव के आरोप। यही वजह है कि हल्द्वानी का रामलीला मैदान अब केवल एक मैदान नहीं रह गया है। यह उत्तराखंड की आने वाली चुनावी राजनीति में वैचारिक टकराव का नया प्रतीक बनता दिखाई दे रहा है। प्रीतम सिंह से लेकर प्रदेश कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं और अब राहुल गांधी तक इस मुद्दे पर सक्रियता बताती है कि कांग्रेस इसे महज एक दिन की बयानबाजी नहीं बनाना चाहती। पार्टी इसे लगातार राजनीतिक विमर्श में रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। खास बात यह है कि कांग्रेस के भीतर लंबे समय से संगठन, नेतृत्व और चुनावी रणनीति को लेकर अलग-अलग आवाजें उठती रही हैं। ऐसे में यह मुद्दा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को एक साझा राजनीतिक मंच भी दे रहा है। यानी हल्द्वानी में शुद्धिकरण का विवाद अब कांग्रेस के लिए केवल सम्मान का सवाल नहीं, बल्कि 2027 की सियासत का एक संभावित राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में कांग्रेस का रुख और आक्रामक हुआ तो यह मुद्दा उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में विकास बनाम वैचारिक संघर्ष की नई बहस खड़ी कर सकता है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस इस मुद्दे को कितनी दूर तक ले जाती है और भाजपा इसका जवाब किस राजनीतिक रणनीति से देती है।

यूकेडी के सियासी तेवर ‘तल्ख’

उत्तराखंडियत के मुद्दे पर भाजपा व कांग्रेस को घेरने की तैयारी संगठन विस्तार से लेकर बूथ तक सक्रियता बढ़ाने पर दिया जोर देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ उत्तराखंड क्रांति दल ने भी अपने सियासी तेवर तल्ख करने शुरू कर दिए हैं। राज्य आंदोलन की राजनीतिक विरासत का दावा करने वाला दल अब भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटी प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। पार्टी का फोकस एक बार फिर उत्तराखंडियत, मूल निवास, भू-कानून, रोजगार, पलायन और पहाड़ के अधिकारों जैसे मुद्दों पर है। यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि राज्य गठन के आंदोलन से निकली उसकी राजनीतिक ताकत को चुनावी वोट में कैसे बदला जाए। पिछले चुनावों में संगठनात्मक कमजोरी और सीमित जनाधार के कारण दल उम्मीद के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाया। लेकिन 2027 को लेकर पार्टी अब पहले से ज्यादा सक्रिय नजर आ रही है। यूकेडी का मानना है कि उत्तराखंड बनने के बाद भी पहाड़ के मूल सवाल जस के तस हैं। रोजगार की तलाश में युवाओं का पलायन, जमीनों की खरीद-फरोख्त, गांवों का खाली होना और पहाड़ में बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर दल भाजपा और कांग्रेस दोनों को कठघरे में खड़ा करने की तैयारी में है। पार्टी की रणनीति साफ हैकृउत्तराखंड के सवाल पर किसी राष्ट्रीय दल को राजनीतिक स्पेस नहीं दिया जाए। मूल निवास और सशक्त भू-कानून यूकेडी के प्रमुख मुद्दों में हैं। पार्टी इन सवालों को केवल विधानसभा के भीतर उठाने के बजाय गांव-गांव तक ले जाने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही बेरोजगार युवाओं, पूर्व सैनिकों, महिलाओं और राज्य आंदोलनकारियों से जुड़े मुद्दों को भी राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाने पर जोर है। उत्तराखंड की राजनीति में यूकेडी के लिए सबसे बड़ी चुनौती भाजपा और कांग्रेस के बीच बने मजबूत द्विध्रुवीय मुकाबले को तोड़ना है। क्षेत्रीय दल होने के बावजूद यूकेडी अभी तक ऐसा व्यापक जनाधार नहीं बना सका है जो उसे सत्ता के निर्णायक विकल्प के रूप में स्थापित कर सके। यही वजह है कि पार्टी अब केवल मुद्दों की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने और संभावित प्रत्याशियों को समय रहते सक्रिय करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। यूकेडी की कोशिश है कि चुनाव आने तक पार्टी का चेहरा केवल राज्य आंदोलन की पार्टी तक सीमित न रहे, बल्कि जनता के सामने सत्ता का वैकल्पिक माडल भी पेश करे। यूकेडी भाजपा और कांग्रेस दोनों पर पहाड़ के साथ न्याय न करने का आरोप लगाता रहा है। ऐसे में चुनावी मैदान में पार्टी का सबसे बड़ा हथियार यही नैरेटिव हो सकता है कि राष्ट्रीय दलों की सरकारों ने राज्य गठन की मूल अवधारणाओं को कमजोर किया। भू-कानून और मूल निवास के सवाल पर युवाओं में बढ़ती चर्चा को देखते हुए यूकेडी इन्हें चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी की कोशिश होगी कि इन मुद्दों को भावनात्मक नारों से आगे ले जाकर रोजगार, जमीन और स्थानीय अधिकारों से जोड़ा जाए। हालांकि यूकेडी के लिए केवल आक्रामक बयानबाजी पर्याप्त नहीं होगी। उसे यह भी साबित करना होगा कि वह चुनावी संगठन, प्रत्याशी चयन, संसाधन और बूथ प्रबंधन के मोर्चे पर भाजपा-कांग्रेस का मुकाबला करने की स्थिति में है। पार्टी के सामने बिखरे हुए क्षेत्रीय मतों को एकजुट करने और छोटे क्षेत्रीय समूहों को साथ लाने की चुनौती भी है। यदि यूकेडी इस दिशा में सफल होता है तो 2027 के चुनाव में वह कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है। आने वाला विधानसभा चुनाव यूकेडी के लिए केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व और प्रासंगिकता की भी परीक्षा है। पार्टी जितनी आक्रामकता से भाजपा-कांग्रेस को घेरने की कोशिश करेगी, उतना ही जनता उसके सामने यह सवाल रखेगी कि राज्य के लिए उसके पास सिर्फ मुद्दे हैं या सरकार चलाने का ठोस रोडमैप भी। फिलहाल यूकेडी ने संकेत दे दिया है कि 2027 के रण में वह दर्शक बनकर नहीं बैठने वाला। उत्तराखंडियत की जमीन पर अपना झंडा फिर बुलंद करने के लिए यूकेडी ने कमर कस ली है। अब असली परीक्षा यह है कि आक्रामक तेवर वोट में कितने बदलते हैं।

राष्ट्रीय फलक पर गूंजा ‘शुद्धिकरण’ विवाद

मुद्दाविहीन कांग्रेस कर रही तुष्टिकरण की राजनीति,कांग्रेस बोली-भाजपा असली मुद्दों से ध्यान भटका रही भाजपा का हमलाकृजनता के सवालों से बचने के लिए कांग्रेस धार्मिक और जातीय मुद्दों का सहारा संसद से लेकर प्रदेश के गलियारों तक गरमाई राजनीति, 2027 की लड़ाई के साफ हुए शुरुआती संकेत देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज होने के साथ ही भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव भी लगातार धार पकड़ रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर मुद्दाविहीन राजनीति और तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए हमला तेज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस के पास जनता के सामने रखने के लिए कोई ठोस एजेंडा नहीं है, इसलिए वह धार्मिक, जातीय और भावनात्मक मुद्दों को हवा देकर राजनीतिक जमीन तलाश रही है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस को प्रदेश में बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा और पर्यटन जैसे सवालों पर अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए। इसके बजाय पार्टी ऐसे मुद्दों को तूल दे रही है, जिनसे समाज में राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा हो सकता है। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद सामने आए कथित शुद्धिकरण विवाद को लेकर कांग्रेस की आक्रामकता को भी भाजपा इसी रणनीति का हिस्सा बता रही है। भाजपा का कहना है कि स्थानीय घटना को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है। भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक हमला यही है कि कांग्रेस के पास प्रदेश की जनता को देने के लिए कोई स्पष्ट विजन नहीं है। पार्टी नेताओं के अनुसार चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस जाति, धर्म और कथित सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों को आगे कर रही है, जबकि प्रदेश के विकास से जुड़े सवालों पर उसका एजेंडा स्पष्ट नहीं है। भाजपा इसे तुष्टिकरण की राजनीति करार दे रही है। पार्टी का कहना है कि उत्तराखंड की जनता विकास, रोजगार और बेहतर सुविधाएं चाहती है, लेकिन कांग्रेस का राजनीतिक विमर्श लगातार ऐसे मुद्दों की ओर जा रहा है जो भावनाओं को भड़काने का काम करते हैं। भाजपा की रणनीति भी साफ दिखाई दे रही है। वह कांग्रेस को विकास के सवाल पर घेरने के साथ-साथ उसके राजनीतिक मुद्दों को वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है। कांग्रेस भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार कर रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सामाजिक सम्मान, संविधान, बेरोजगारी, महंगाई और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को तुष्टिकरण कहना भाजपा की राजनीतिक रणनीति है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार अपने कार्यकाल की उपलब्धियों के बजाय विपक्ष पर आरोप लगाने में ज्यादा ऊर्जा खर्च कर रही है। पार्टी का दावा है कि प्रदेश में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और आपदा जैसे सवाल आज भी जनता के सामने हैं और वह इन्हीं मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में जाएगी। यानी दोनों दलों ने अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई के साथ-साथ नैरेटिव की लड़ाई भी बनने जा रहा है। भाजपा जहां कांग्रेस को तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस भाजपा को बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और जनसमस्याओं पर जवाबदेह बनाने की तैयारी में है। इस राजनीतिक जंग में दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे जनता के सामने अपना एजेंडा कितनी मजबूती से रख पाते हैं। कांग्रेस के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है कि उसे भाजपा के मजबूत संगठन और सत्ता विरोधी भावनाओं के बीच अपनी चुनावी जमीन तैयार करनी है। वहीं भाजपा के सामने सत्ता में वापसी की हैट्रिक का लक्ष्य है, जिसके लिए उसे सरकार के कामकाज को लेकर जनता के सवालों का जवाब भी देना होगा। आने वाले महीनों में हल्द्वानी का शुद्धिकरण विवाद, धार्मिक पहचान, सामाजिक सम्मान और तुष्टिकरण जैसे मुद्दे उत्तराखंड की राजनीति में और उछल सकते हैं। चुनावी माहौल बनने के साथ राजनीतिक दल ऐसे मुद्दों को अपने-अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। लेकिन जनता के सामने सवाल इससे बड़ा है। क्या चुनाव की राजनीति बेरोजगार युवा को रोजगार देगी? क्या पहाड़ से पलायन रोकने का रोडमैप सामने आएगा? क्या आपदा प्रभावित गांवों को सुरक्षित बनाने की ठोस योजना बनेगी? क्या स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाल व्यवस्थाओं पर कोई दल स्पष्ट जवाब देगा? यही वह सवाल हैं जिनसे कोई भी राजनीतिक दल लंबे समय तक बच नहीं सकता। भाजपा कांग्रेस को मुद्दाविहीन बताकर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगा रही है। कांग्रेस पलटकर भाजपा पर असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगा रही है। दोनों दलों की सियासी तलवारें खिंच चुकी हैं। लेकिन 2027 के चुनाव में अंतिम फैसला नेताओं के बयानों से नहीं, मतदाता के सवालों से होगा। उत्तराखंड का मतदाता यह देखेगा कि कौन दल भावनाओं की राजनीति से आगे बढ़कर रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, जमीन और आपदा जैसे सवालों पर ठोस जवाब देता है। क्योंकि चुनाव में मुद्दा वही नहीं होता जो राजनीतिक दल तय करेंकृमुद्दा वह भी होता है जिसे जनता अपने जीवन में रोज झेलती है।

उत्तराखंड में ‘वार्मअप मैच’ शुरू

उत्तराखंड में सियासी पारा उफान पर, चुनाव अभी दूर लेकिन रणभूमि सजने लगी हैट्रिक के लिए बेचौन, कांग्रेस सत्ता वापसी और यूकेडी तीसरे मोर्चे की तलाश में बयान, आरोप और मुद्दों के बीच उत्तराखंड में आम जनता के सवाल चले गए पीछे देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अभी सामने नहीं हैं, लेकिन सियासत ने पहले ही चुनावी रंग पकड़ लिया है। देहरादून से हल्द्वानी और हरिद्वार से पहाड़ तक राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ रही है। कहीं संगठन मजबूत करने की कवायद है तो कहीं टिकट के दावेदार शक्ति प्रदर्शन में जुटे हैं। कहीं भाजपा कांग्रेस पर तुष्टिकरण का आरोप लगा रही है तो कांग्रेस सामाजिक सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों का सवाल उठा रही है। उधर उत्तराखंड क्रांति दल राष्ट्रीय दलों के बीच तीसरी ताकत बनने की कोशिश में फिर आक्रामक तेवर दिखा रहा है। यानी 2027 का चुनाव अभी आया नहीं, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति ने मानो वार्मअप मैच शुरू कर दिया है। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक लक्ष्य लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का है। पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और चुनावी तैयारियों को समय से पहले धार देने में जुटी है। भाजपा के लिए सबसे बड़ा हथियार सत्ता में रहते हुए किए गए काम और मजबूत संगठन है। लेकिन सत्ता की तीसरी पारी की राह केवल उपलब्धियों के सहारे आसान नहीं होगी। बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, आपदा, सड़क और स्थानीय रोजगार जैसे सवाल विपक्ष को सरकार को घेरने का मौका दे रहे हैं। इसलिए भाजपा की रणनीति दोहरी दिखाई दे रही हैकृएक तरफ विकास और सरकार के काम का नैरेटिव, दूसरी तरफ कांग्रेस पर वैचारिक और राजनीतिक हमला। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए अपनी जमीन तैयार कर रही है। प्रदेश में पार्टी के वरिष्ठ नेता सक्रिय हैं और राष्ट्रीय नेताओं की आवाजाही भी बढ़ रही है। कांग्रेस सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और जनसमस्याओं पर घेरने की तैयारी में है। लेकिन हाल के दिनों में हल्द्वानी के शुद्धिकरण विवाद ने पार्टी को एक अलग राजनीतिक मोर्चा भी दे दिया है। खड़गे की रैली के बाद रामलीला मैदान में हुए कथित शुद्धिकरण को कांग्रेस ने सामाजिक भेदभाव और सम्मान से जोड़ दिया है, जबकि भाजपा ने आयोजन से दूरी बनाई है। यह विवाद अब स्थानीय घटना से आगे बढ़कर भाजपा-कांग्रेस की वैचारिक लड़ाई का नया प्रतीक बन चुका है। यही वह जगह है जहां कांग्रेस को सावधान भी रहना होगा। यदि पार्टी लगातार भावनात्मक और पहचान आधारित मुद्दों पर ही केंद्रित दिखाई देती है तो भाजपा को उसे मुद्दाविहीन और तुष्टिकरण की राजनीति के आरोप में घेरने का मौका मिलेगा। लेकिन भाजपा के लिए भी तस्वीर उतनी आसान नहीं है। सिर्फ कांग्रेस पर आरोप लगाने से जनता के सवाल खत्म नहीं होंगे। पहाड़ का युवा रोजगार पूछेगा। गांव का खाली होता घर पलायन पूछेगा। आपदा प्रभावित परिवार पुनर्वास पूछेंगे। मरीज अस्पताल पूछेगा और अभिभावक शिक्षा की गुणवत्ता। राजनीति का तापमान चाहे जितना बढ़े, जनता के घर का तापमान रसोई गैस, महंगाई और रोजगार से ही तय होगा। यही भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच सरकार के काम का ठोस हिसाब जनता तक पहुंचाए। इस बीच उत्तराखंड क्रांति दल ने भी राष्ट्रीय दलों के बीच अपना स्पेस तलाशना शुरू कर दिया है। यूकेडी की सक्रियता भाजपा और कांग्रेस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि राज्य में मूल निवास, भू-कानून, रोजगार और उत्तराखंडियत जैसे सवाल लगातार चर्चा में हैं। हालिया राजनीतिक विश्लेषणों में भी यूकेडी को भाजपा-कांग्रेस के बीच संभावित तीसरे कोण के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मुद्दों को वोट में बदलने की है। आंदोलन की विरासत और चुनावी संगठनकृदोनों अलग चीजें हैं। यदि पार्टी संगठन को बूथ तक ले जाने और प्रभावी प्रत्याशी खड़े करने में सफल होती है तो कुछ सीटों पर मुकाबले का गणित जरूर बदल सकता है। चुनाव से पहले सबसे ज्यादा हलचल टिकट को लेकर है। संभावित प्रत्याशी अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा रहे हैं। जनसंपर्क, शक्ति प्रदर्शन और संगठन में पकड़ बनाने की कोशिश शुरू हो चुकी है। यहां तक कि कुछ सीटों पर अभी से संभावित चेहरों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इसका सीधा असर पार्टियों की अंदरूनी राजनीति पर पड़ रहा है। चुनाव से पहले टिकट की राजनीति अक्सर पार्टी के भीतर सबसे बड़ा चुनाव बन जाती है। उत्तराखंड की मौजूदा राजनीति को देखें तो एक तरफ वास्तविक मुद्दे हैं और दूसरी तरफ राजनीतिक नैरेटिव। एक तरफ बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, आपदा, भू-कानून और मूल निवास जैसे सवाल हैं। दूसरी तरफ शुद्धिकरण, तुष्टिकरण, सनातन, सामाजिक सम्मान और वैचारिक संघर्ष जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ रहे हैं। आने वाले महीनों में यही तय करेगा कि चुनावी बहस किस दिशा में जाती है। क्या उत्तराखंड का चुनाव रोजगार और पलायन पर लड़ा जाएगा या पहचान और भावनाओं पर? फिलहाल दोनों धाराएं समानांतर चल रही हैं। उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि चुनाव आते ही पहाड़ के सवाल फिर राजनीतिक मंचों पर लौट आते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही उनकी धार कमजोर पड़ जाती है। इस बार जनता शायद सिर्फ भाषण सुनने के मूड में नहीं है। सोशल मीडिया और नई पीढ़ी ने राजनीतिक सवाल पूछने का तरीका बदल दिया है। युवा अब यह भी पूछ रहा है कि घोषणा कितनी हुई और जमीन पर क्या बदला। इसलिए 2027 की लड़ाई केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होगी। यह भरोसे बनाम नाराजगी, काम बनाम वादे और पुराने राजनीतिक नैरेटिव बनाम नए उत्तराखंड के सवालों की लड़ाई भी होगी। फिलहाल देहरादून के सत्ता गलियारों से लेकर पहाड़ के गांवों तक एक ही सवाल तैर रहा हैकृ लेकिन उससे बड़ा सवाल हैकृ कि कौन जनता के सवालों को सबसे पहले अपना चुनावी मुद्दा बनाएगा? क्योंकि उत्तराखंड में सियासी पारा भले अभी से उबल रहा हो, असली गर्मी तब महसूस होगी जब जनता अपना फैसला सुनाने के करीब पहुंचेगी।

शनिवार, 29 अगस्त 2026

udaydinmaan: खड़गे के मंच पर ‘शुद्धिकरण’ से सुलगा सियासी संग्राम

udaydinmaan: खड़गे के मंच पर ‘शुद्धिकरण’ से सुलगा सियासी संग्राम: राहुल का वारकृदलित अध्यक्ष नहीं, संविधान और लोकतंत्र का हुआ अपमान गंगाजल छिड़कने और हवन को लेकर भाजपा-संघ पर राहुल का तीखा हमला दिल्ली में मच...

खड़गे के मंच पर ‘शुद्धिकरण’ से सुलगा सियासी संग्राम

राहुल का वारकृदलित अध्यक्ष नहीं, संविधान और लोकतंत्र का हुआ अपमान गंगाजल छिड़कने और हवन को लेकर भाजपा-संघ पर राहुल का तीखा हमला दिल्ली में मचा गया सियासी घमासान राहुल गांधी ने बीजेपी और संघ को घेरा चुनावी महासमर में मामले को कांग्रेस बनाएगी राष्ट्रीय मुद्दा, बैकफुट पर बीजेपी संतोष बेंजवाल देहरादून। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के मंच पर गंगाजल छिड़कने और शुद्धिकरण हवन के दुस्साहस ने देश की राजधानी दिल्ली में प्रचंड राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर तीखा हमला बोला है। राहुल ने साफ शब्दों में कहा कि यह सिर्फ एक जनसभा के मंच का अपमान नहीं, बल्कि देश के संविधान, लोकतंत्र और दलित समाज के मुंह पर करारा तमाचा है। नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में राहुल गांधी के तेवर बेहद आक्रामक नजर आए। उन्होंने इस कृत्य को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 ;अस्पृश्यता का अंतद्ध की सरेआम धज्जियां उड़ाने वाला करार दिया। राहुल गांधी ने तीखे बाण चलाते हुए कहा कि यह घटना बीजेपी और संघ की सदियों पुरानी संकीर्ण और जातिवादी मानसिकता का नग्न प्रदर्शन है। देश के कानून में छुआछूत एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध है। जब देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के दलित राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ सरेआम ऐसा घिनौना कृत्य किया जा सकता है, तो जरा सोचिए कि देश के दूर-दराज के गांवों में रहने वाले आम दलितों और मासूम बच्चों के साथ ये लोग कैसा सुलूक करते होंगे? राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खामोशी पर हमला बोलते हुए मांग की कि दोषियों और इस षड्यंत्र के पीछे मौजूद चेहरों पर अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज कर उन्हें सलाखों के पीछे भेजा जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस पर तत्काल कड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, तो कांग्रेस इसे राष्ट्रीय स्तर पर जनांदोलन का रूप देगी। बता दें कि उत्तराखंड के हल्द्वानी के रामलीला मैदान में मल्लिकार्जुन खड़गे की एक जनसभा आयोजित हुई थी। रैली समाप्त होने के दो दिन बाद, एक स्थानीय संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा मंच पर शुद्धिकरण हवन करने और गंगाजल छिड़कने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस घटना के सामने आते ही सियासी हलकों में हड़कंप मच गया और संसद से लेकर सड़कों तक आक्रोश की लहर दौड़ गई। राहुल गांधी के सीधे वार के बाद भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने बचाव में मोर्चा संभाला। बीजेपी प्रवक्ताओं और प्रदेश नेताओं ने आरोपों को खारिज करते हुए इसे कांग्रेस की राजनीतिक हताशा का परिणाम बताया। बीजेपी का तर्क है कि इस तरह के किसी भी निजी या स्थानीय संगठन के धार्मिक अनुष्ठान से पार्टी का कोई सीधा संबंध नहीं है। कांग्रेस जनमुद्दों से भटक चुकी है और समाज में सामाजिक वैमनस्य फैलाकर राजनीतिक रोटियां सेकने की नाकाम कोशिश कर रही है। उत्तराखंड में आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुए इस घटनाक्रम ने पूरे प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को गरमा दिया है। राहुल गांधी के आक्रामक तेवरों से साफ संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस इस शुद्धिकरण कांड को दलित स्वाभिमान और सामाजिक न्याय की ढाल बनाकर सत्तापक्ष को चौतरफा घेरने के मूड में है।

मंच शुद्धीकरण पर ‘महाभारत’

राहुल का प्रधानमंत्री पर सीधा हमला, पूछा कहां है एफआईआर राहुल गांधी बोलेदृ मंच शुद्धीकरण नहीं, यह संविधान का अपमान उत्तराखंड की सीमाएं लांघ राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचा विवाद प्रदेश में विस चुनाव से पहले सम्मान बनाम सत्ता की नई सियासी जंग देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में मंच शुद्धीकरण का विवाद अब प्रदेश की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक पहुंचता दिख रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश देने की मांग कर भाजपा पर सीधा हमला बोला है। राहुल के बयान के बाद कांग्रेस ने इसे महज राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और संवैधानिक बराबरी का सवाल बताते हुए भाजपा को घेरना शुरू कर दिया है। मंच पर मौजूदगी के बाद कथित शुद्धीकरण की घटना ने उत्तराखंड की राजनीति में पहले ही सवाल खड़े कर दिए थे। अब राहुल गांधी के हस्तक्षेप ने इस विवाद को नई राजनीतिक धार दे दी है। कांग्रेस का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति की जाति या सामाजिक पहचान के आधार पर उसके जाने के बाद किसी सार्वजनिक मंच का शुद्धीकरण किया जाता है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना पर सवाल है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से मांग की कि मामले में एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए जाएं। कांग्रेस इसे भाजपा के लिए असहज करने वाला सवाल बता रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि एक तरफ भाजपा सामाजिक समरसता और सबका साथ, सबका विकास की बात करती है, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड में शुद्धीकरण जैसी घटना सामने आना गंभीर विरोधाभास है। कांग्रेस अब पूछ रही है कि अगर घटना गलत है तो कार्रवाई क्यों नहीं और अगर सही है तो जिम्मेदारी किसकी है? यही सवाल आने वाले दिनों में भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है। मंच शुद्धीकरण का मामला पहले ही प्रदेश की सियासत में बड़ा विवाद बन चुका है। कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर लगातार सरकार और भाजपा पर हमलावर है। मामला राजभवन तक पहुंचने के बाद विवाद की गंभीरता और बढ़ गई है। अब राहुल गांधी के बयान ने इसे राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श से भी जोड़ दिया है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि उत्तराखंड जैसे सामाजिक रूप से संवेदनशील राज्य में ऐसी घटनाएं समाज को बांटने वाली मानसिकता को मजबूती देती हैं। पार्टी इस मुद्दे को आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सामाजिक न्याय, सम्मान और बराबरी के सवाल से जोड़ने की कोशिश कर रही है। विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी में जुटी भाजपा के सामने यह विवाद ऐसे समय आया है, जब पार्टी लगातार संगठन को चुनावी मोड में ला रही है। भाजपा जहां विकास, सरकार की उपलब्धियों और संगठन की मजबूती को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है, वहीं कांग्रेस ऐसे विवादों के जरिए सरकार को सामाजिक मुद्दों पर घेरने की रणनीति अपना रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि शुद्धीकरण की राजनीति आखिर उत्तराखंड को किस दिशा में ले जा रही है? राजनीतिक मंच पर विरोध होना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान को आधार बनाकर उसके बाद मंच को शुद्ध करने की धारणा अगर स्थापित होती है, तो यह केवल राजनीतिक कटाक्ष नहीं रह जाती। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे छोटे दिखने वाले राजनीतिक विवाद भी बड़े चुनावी मुद्दों में बदल रहे हैं। मंच शुद्धीकरण भी अब उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस के लिए यह भाजपा को घेरने का बड़ा हथियार बन सकता है, जबकि भाजपा के सामने चुनौती है कि वह इस विवाद को लंबा खिंचने से कैसे रोकती है। राहुल गांधी के सीधे प्रधानमंत्री से एफआईआर के निर्देश देने की मांग करने के बाद गेंद अब भाजपा के पाले में है। सवाल सिर्फ एक मंच के शुद्धीकरण का नहीं है। सवाल यह है कि उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनाव विकास के मुद्दों पर लड़ा जाएगा या सामाजिक सम्मान और पहचान के सवाल भी इसकी धुरी बनेंगे?

हरक की ‘विरासत’ पर भाजपा की ‘सियासत’

उत्तराखंड की बदलती राजनीति के बीच अनुकृति के बयान के सियासी मायने भाजपा की प्रवक्ता बनीं अनुकृति ने हरक सिंह रावत के योगदान को याद किया सवाल यह कि पुराने रिश्तों की विरासत से नई राजनीतिक पारी कितनी मजबूत होगी ससुर का सम्मान या पार्टी के भीतर खुद की जगह बनाने की कवायद देहरादून। राजनीति में रिश्ते कभी सिर्फ रिश्ते नहीं होते। खासकर तब, जब रिश्ता उत्तराखंड की उस राजनीति से जुड़ा हो जिसने पिछले दो दशक में कई बार सत्ता का रुख बदला हो। भाजपा प्रवक्ता अनुकृति गुसाईं रावत ने जब अपने ससुर और पूर्व मंत्री डा. हरक सिंह रावत का नाम लेकर कहा कि उत्तराखंड में भाजपा को मजबूती देने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है, तो यह महज पारिवारिक सम्मान का बयान नहीं माना जा रहा। इस बयान में उत्तराखंड की बदलती सियासत की एक तस्वीर भी दिखाई देती है। हरक सिंह रावत का राजनीतिक सफर उत्तराखंड की राजनीति के उन अध्यायों में शामिल है, जहां दल बदलना, सत्ता समीकरण और व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते। भाजपा से कांग्रेस और कांग्रेस से भाजपा तक की उनकी यात्राओं ने प्रदेश की राजनीति में कई बार हलचल पैदा की। अब उसी राजनीतिक विरासत का एक हिस्सा भाजपा के भीतर अनुकृति गुसाईं रावत के रूप में दिखाई दे रहा है। अनुकृति का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक स्तर पर लगातार अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। ऐसे समय में पार्टी की नई प्रवक्ता का अपने ससुर के भाजपा में योगदान को सार्वजनिक रूप से रेखांकित करना क्या केवल अतीत को याद करना है या भविष्य की राजनीति का संकेत भी? उत्तराखंड की राजनीति में हरक सिंह रावत का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। अलग-अलग राजनीतिक दलों में उनकी सक्रियता और सरकारों में उनकी भूमिका ने उन्हें प्रदेश की राजनीति का प्रभावशाली चेहरा बनाया। यही कारण है कि जब परिवार की अगली पीढ़ी भाजपा में सक्रिय भूमिका निभाती है और पुराने राजनीतिक योगदान को याद करती है, तो उसके राजनीतिक अर्थ भी निकाले जाते हैं। अनुकृति का बयान इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि राजनीति में किसी नेता की विरासत केवल परिवार के नाम से आगे नहीं बढ़ती। उसे संगठन स्वीकार करता है, कार्यकर्ता स्वीकार करते हैं और सबसे बड़ी बातकृमतदाता स्वीकार करते हैं। भाजपा में प्रवक्ता की भूमिका मिलने के बाद अनुकृति के सामने भी यही चुनौती है कि वह पारिवारिक पहचान से आगे निकलकर अपनी अलग राजनीतिक पहचान कितनी तेजी से बनाती हैं। भाजपा की राजनीति में संगठन सबसे ऊपर होने का दावा लगातार किया जाता रहा है। ऐसे में किसी पुराने और प्रभावशाली नेता की राजनीतिक विरासत से जुड़े चेहरे को संगठन में जिम्मेदारी मिलना अपने आप में दिलचस्प है। क्या भाजपा उत्तराखंड में पुराने राजनीतिक प्रभाव वाले परिवारों को भी अपनी रणनीति में जगह दे रही है? क्या पार्टी 2027 के लिए हर वर्ग और हर राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है? या फिर यह सिर्फ संगठन में एक सामान्य जिम्मेदारी है, जिसे परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जा रहा है? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में भाजपा की गतिविधियों से मिलेंगे। उत्तराखंड की राजनीति में परिवारवाद पर खूब बहस होती रही है। कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों दलों में ऐसे नेताओं की कमी नहीं रही जिनके राजनीतिक परिवारों ने अगली पीढ़ी को राजनीति का रास्ता दिखाया। लेकिन पहाड़ की राजनीति में मतदाता केवल नाम देखकर हमेशा फैसला नहीं करता। यहां सड़क चाहिए, रोजगार चाहिए, स्वास्थ्य सुविधा चाहिए, पलायन का जवाब चाहिए। गांव खाली हो रहे हैं तो सवाल परिवार की राजनीतिक विरासत से आगे जाकर पूछा जाता है। अनुकृति गुसाईं के सामने भी यही कसौटी होगी। ससुर का राजनीतिक योगदान अपनी जगह है। लेकिन नई पीढ़ी की राजनीति को पुराने खाते की जमा पूंजी पर हमेशा नहीं चलाया जा सकता। उसे अपना खाता खोलना पड़ता है। विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां जैसे-जैसे तेज होंगी, उत्तराखंड भाजपा में कई नए चेहरे दिखाई देंगे। कुछ संगठन से आएंगे, कुछ आंदोलन की राजनीति से, कुछ सामाजिक क्षेत्र से और कुछ राजनीतिक परिवारों की विरासत लेकर। अनुकृति गुसाईं का राजनीतिक सफर भी इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है। उनका बयान एक तरह से अतीत को स्वीकार करता हैकृकि परिवार का राजनीतिक इतिहास भाजपा से जुड़ा रहा है और हरक सिंह रावत का पार्टी को मजबूत करने में योगदान रहा है। लेकिन भविष्य का सवाल अलग है। क्या अनुकृति अपने ससुर की राजनीतिक पहचान की उत्तराधिकारी बनेंगी या अपनी अलग राजनीतिक पहचान गढ़ेंगी? उत्तराखंड की राजनीति में यह सवाल छोटा नहीं है। क्योंकि पहाड़ में राजनीतिक विरासत दरवाजा खोल सकती है, लेकिन अंदर जगह बनाना अभी भी अपने काम से ही पड़ता है और 2027 का चुनाव यही तय करेगा कि राजनीतिक परिवार की पहचान कितनी दूर तक जाती है और नई राजनीति की अपनी पहचान कहां से शुरू होती है।

उत्तराखंड में कांग्रेस का ‘मिशन कमबैक’

दिग्गजों के दौरों से कार्यकर्ताओं में जान फूंकने की रणनीति भाजपा के सियासी किले में सेंध लगाने की चल रही तैयारी जमीनी पकड़ मजबूत करने व सरकार को घेरने की कवायद आने वाले महीनों में राष्ट्रीय नेताओं के कार्यक्रमों की तैयारी संगठन से लेकर बूथ तक सक्रियता बढ़ाने की रणनीति तय देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी कुछ दूर हों, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी मैदान को गर्म करना शुरू कर दिया है। भाजपा के बाद अब कांग्रेस भी अपनी चुनावी तैयारियों को धार देने में जुट गई है। पार्टी आने वाले महीनों में प्रदेश में राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े नेताओं के दौरे कराने की तैयारी में है। इन दौरों के जरिये कांग्रेस जहां कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने की कोशिश करेगी, वहीं सरकार के खिलाफ माहौल बनाने और चुनावी मुद्दों को जनता के बीच ले जाने की रणनीति पर भी काम होगा। कांग्रेस के लिए 2027 की लड़ाई सिर्फ सत्ता में वापसी की कोशिश नहीं, बल्कि प्रदेश में अपने राजनीतिक आधार को दोबारा मजबूत करने की चुनौती भी है। ऐसे में पार्टी की नजर अब विधानसभा क्षेत्रों से लेकर बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने पर है। राष्ट्रीय नेताओं के प्रस्तावित दौरे इसी व्यापक चुनावी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। कांग्रेस की रणनीति में राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी को खास महत्व दिया जा रहा है। पार्टी के बड़े नेता उत्तराखंड पहुंचकर कार्यकर्ताओं के साथ संवाद करेंगे और विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेंगे। इन दौरों के दौरान बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की तैयारी है। कांग्रेस की कोशिश है कि चुनावी माहौल बनने से पहले ही इन मुद्दों को जनता के बीच लगातार जिंदा रखा जाए। पार्टी का मानना है कि चुनाव के समय अचानक सक्रिय होने के बजाय अभी से संगठन को मैदान में उतारने से कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच सीधा संपर्क मजबूत किया जा सकता है। कांग्रेस की चुनावी रणनीति का सबसे अहम हिस्सा विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करना है। पार्टी स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां सौंपकर बूथ स्तर तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रही है। दरअसल, उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों पर मुकाबला एक जैसा नहीं है। पहाड़ और मैदान की राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग हैं। कुमाऊं और गढ़वाल की सियासी परिस्थितियां भी अलग-अलग हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी रणनीति तैयार करने की है, जो पूरे प्रदेश पर समान रूप से लागू होने के बजाय स्थानीय मुद्दों के मुताबिक आगे बढ़े। कांग्रेस के सामने केवल भाजपा सरकार को घेरने की चुनौती नहीं है। मतदाता के सामने अपना विकल्प और स्पष्ट रोडमैप रखना भी पार्टी के लिए जरूरी होगा। पिछले चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी नेतृत्व जानता है कि केवल सत्ता विरोधी माहौल के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता। यही वजह है कि संगठनात्मक सक्रियता के साथ कांग्रेस अपने मुद्दों और संभावित चुनावी एजेंडे को भी आकार देने में जुटी है। युवा मतदाताओं पर विशेष फोकस रहने की संभावना है। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और पलायन जैसे सवालों को कांग्रेस चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाना चाहती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के उत्तराखंड दौरे पार्टी के लिए दोहरे राजनीतिक लाभ का माध्यम बन सकते हैं। एक ओर इससे प्रदेश संगठन को ऊर्जा मिलेगी, दूसरी ओर राष्ट्रीय नेतृत्व के मंच से प्रदेश सरकार के खिलाफ हमले को व्यापक राजनीतिक स्वर दिया जा सकेगा। हालांकि कांग्रेस के लिए यह भी चुनौती होगी कि राष्ट्रीय नेताओं की सभाओं और कार्यक्रमों को केवल भीड़ जुटाने तक सीमित न रखा जाए। इन कार्यक्रमों का सीधा लाभ बूथ संगठन और स्थानीय चुनावी अभियान को मिले, इसके लिए पार्टी को स्पष्ट फॉलोअप रणनीति बनानी होगी। भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर 2027 को लेकर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। ऐसे में कांग्रेस अब उस अंतर को पाटने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय नेताओं के दौरे इसी प्रतिस्पर्धा का हिस्सा हैं। लेकिन असली मुकाबला मंचों पर नहीं, मैदान में होगा। कौन सा दल गांव तक पहुंचता है? किसके कार्यकर्ता चुनाव से महीनों पहले मतदाता के दरवाजे पर दिखाई देते हैं? कौन स्थानीय नाराजगी को राजनीतिक मुद्दे में बदल पाता है? और कौन युवा मतदाता को अपने साथ जोड़ पाता है? 2027 की चुनावी पिच पर इन सवालों के जवाब ही जीत-हार की दिशा तय करेंगे। कांग्रेस ने दिग्गजों के दौरे की तैयारी शुरू कर दी है। अब देखना यह होगा कि इन दौरों से पैदा होने वाली सियासी गर्मी कितनी जल्दी संगठन की जमीन तक पहुंचती है।

‘वादों’ के मंच पर जनता का ‘हिसाब’

चुनावी आहट के बीच सियासी सरगर्मियों का दौर शुरू इस बार नारों से ज्यादा कसौटी पर होंगे जमीनी मुद्दे जनता पूछेगी सवाल, नेताओं को देना होगा हिसाब 2027 की चुनावी आहट के साथ बदल रहा माहौल वादों से ज्यादा काम का लेखा-जोखा मांगेंगे मतदाता देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ सियासत का तापमान बढ़ने लगा है। राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने, यात्राएं निकालने और बड़े नेताओं के दौरे कराने में जुट गए हैं। मंच सजने लगे हैं, नारों की तैयारी होने लगी है और दावेदार भी अपनी-अपनी जमीन तलाशने लगे हैं। लेकिन इस बार चुनावी मैदान में सिर्फ नेता नहीं होंगे। जनता भी सवालों की अपनी सूची लेकर खड़ी होगी। पांच साल पहले किए गए वादों से लेकर आज की जमीनी हकीकत तक, मतदाता नेताओं से हिसाब मांग सकता है। सवाल यह नहीं होगा कि मंच से किसने कितना बड़ा दावा किया। सवाल यह होगा कि गांव में सड़क पहुंची या नहीं, अस्पताल में डाक्टर आया या नहीं, स्कूल में शिक्षक है या नहीं और जिस युवा से रोजगार का वादा किया गया था, उसके लिए वास्तव में क्या बदला? उत्तराखंड की राजनीति में पलायन सबसे पुराना और सबसे कठिन सवाल है। वर्षों से सरकारें पलायन रोकने, गांवों को आबाद करने और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने की बातें करती रही हैं। योजनाएं भी बनीं, घोषणाएं भी हुईं। लेकिन चुनावी चौपाल में शायद सवाल फिर वही होगाकृगांव क्यों खाली हो रहे हैं? जिस परिवार का बेटा रोजगार के लिए देहरादून, दिल्ली या चंडीगढ़ चला गया, वह घोषणाओं से ज्यादा अपने गांव की स्थिति देखेगा। बंद पड़े घर, खाली स्कूल और खेती से दूर होती नई पीढ़ी किसी भी चुनावी भाषण से ज्यादा बड़ा सवाल खड़ा करती है। उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में युवा मतदाता निर्णायक भूमिका में है। प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं, बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों को लेकर युवाओं के सवाल इस बार भी चुनावी विमर्श के केंद्र में रह सकते हैं। युवा पूछ सकता हैकृभर्ती कब निकली, परीक्षा कब हुई, परिणाम कब आया और नियुक्ति कब मिली? यह सवाल किसी एक दल तक सीमित नहीं रहेगा। सत्ता पक्ष से जवाब मांगा जाएगा तो विपक्ष से भी पूछा जाएगा कि उसके पास समाधान क्या है। पहाड़ों में स्वास्थ्य सुविधाएं हमेशा चुनावी मुद्दा रही हैं। कई स्थानों पर अस्पतालों की इमारतें हैं, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सक और जरूरी सुविधाएं पर्याप्त नहीं। गंभीर मरीज को आज भी बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। चुनाव के समय सवाल सीधा होगाकृक्या पहाड़ के व्यक्ति को इलाज के लिए पहाड़ छोड़ना ही पड़ेगा? इसी तरह शिक्षा की स्थिति, शिक्षकों की उपलब्धता और सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता भी जनता के सवालों में शामिल होगी। उत्तराखंड में विकास का सबसे दिखाई देने वाला चेहरा सड़क है। लेकिन बारिश के मौसम में सड़क टूटती है, पहाड़ दरकता है और कई बार यातायात ठप हो जाता है। चारधाम और पर्यटन परियोजनाओं से लेकर गांव की संपर्क सड़क तक, गुणवत्ता और टिकाऊपन पर सवाल उठते रहे हैं। इस बार जनता सिर्फ यह नहीं पूछेगी कि सड़क बनी या नहीं। सवाल होगाकृसड़क कितने साल चली और किस कीमत पर बनी? उत्तराखंड में आपदा अब चुनावी मुद्दे से अलग नहीं रह सकती। हर बरसात में भूस्खलन, सड़क बंद होने, नदी-नालों के उफान और बस्तियों पर खतरे की खबरें सामने आती हैं। ऐसे में जनता यह भी पूछेगी कि आपदा आने के बाद राहत कितनी मिली, लेकिन उससे बड़ा सवाल होगाकृआपदा आने से पहले तैयारी कितनी थी? प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील प्रदेश में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल भी राजनीतिक दलों के सामने होगा। उत्तराखंड के सामाजिक और आर्थिक ढांचे में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। पानी, स्वास्थ्य, महंगाई, परिवार की आय, रोजगार और पलायन का सीधा असर उन पर पड़ता है। इसलिए महिला मतदाता से केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं होगी। उसे यह जानना होगा कि उसके जीवन में पिछले पांच वर्षों में क्या बदला। चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दल बड़े-बड़े मंच तैयार करेंगे। घोषणाएं होंगी, यात्राएं निकलेंगी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलेगा। लेकिन इस बार चुनावी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद मंच नहीं, जनता की चौपाल होगी। क्योंकि मतदाता अब केवल यह सुनना नहीं चाहता कि प्रदेश कितना आगे बढ़ा। वह यह भी देखना चाहता है कि उसके गांव, उसके मोहल्ले और उसके परिवार की जिंदगी कितनी बदली। 2027 की चुनावी जंग में भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अपनी-अपनी उपलब्धियां और दावे होंगे। छोटे दल भी अपने सवाल लेकर मैदान में उतरेंगे। लेकिन अंतिम फैसला उस मतदाता के हाथ में होगा जो पांच साल के अनुभव को अपने मतदान के दिन याद रखेगा। इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कौन जीतेगा। बड़ा सवाल यह होगा कि जनता के सवालों का जवाब कौन बेहतर तरीके से दे पाएगा। क्योंकि चुनावी मौसम में नेता दरवाजे पर आएंगे। इस बार दरवाजा जनता खोलेगीकृऔर सवाल भी वही पूछेगी।