रविवार, 21 जून 2026

भीमलः उत्तराखंड के पहाड़ों का ‘कल्पवृक्ष’

भीमल के पेड़ में दवा भी, सहारा भी और आजीविका भी पहाड़ की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रहा भीमल का पेड़ औषधीय गुणों से लेकर मजबूत रेशे तक हर रूप में अनमोल देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में प्रकृति ने ऐसी अनेक धरोहरें दी हैं, जिन्होंने सदियों से ग्रामीण जीवन को आत्मनिर्भर बनाया। इन्हीं में से एक है भीमल का पेड़। पहाड़ के बुजुर्ग इसे केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि जीवन का साथी मानते हैं। इसकी छाल से निकलने वाला मजबूत रेशा हो, पत्तियों से मिलने वाला पौष्टिक चारा, लकड़ी का घरेलू उपयोग या फिर इसके औषधीय गुणकृभीमल का हर हिस्सा किसी न किसी रूप में मानव और पशुओं के लिए उपयोगी रहा है। एक समय था जब पहाड़ के लगभग हर गांव के आसपास भीमल के पेड़ सहज ही दिखाई देते थे। गांव की महिलाएं इसकी छाल से रेशा निकालकर मजबूत रस्सियां बनाती थीं। इन रस्सियों का उपयोग खेतों में, पशुपालन में, घास और लकड़ी बांधने, पुल बनाने और घरेलू कार्यों में वर्षों तक किया जाता था। आज भले ही नायलॉन और प्लास्टिक ने उनकी जगह ले ली हो, लेकिन भीमल की रस्सी की मजबूती और टिकाऊपन का मुकाबला आज भी मुश्किल माना जाता है। पहाड़ की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक पशुपालन पर आधारित रही है। भीमल की मुलायम और पौष्टिक पत्तियां गाय, बैल, बकरी और भैंस के लिए उत्कृष्ट चारे के रूप में जानी जाती हैं। विशेषकर सर्दियों में, जब हरा चारा कम उपलब्ध होता है, तब भीमल की पत्तियां पशुओं के पोषण का बड़ा आधार बनती हैं। यही कारण है कि ग्रामीण परिवार आज भी अपने खेतों की मेड़ों और घरों के आसपास भीमल लगाना पसंद करते हैं। आयुर्वेद और लोक चिकित्सा में भीमल का विशेष महत्व है। ग्रामीण परंपराओं में इसकी छाल और पत्तियों का उपयोग घाव भरने, सूजन कम करने तथा त्वचा संबंधी समस्याओं में किया जाता रहा है। माना जाता है कि इसकी छाल में ऐसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि किसी भी औषधीय उपयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक मानी जाती है। भीमल केवल इंसान के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी वरदान है। इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़कर रखती हैं, जिससे पहाड़ी ढलानों पर कटाव कम होता है। वर्षा के पानी को भूमि में समाहित करने में भी यह वृक्ष मददगार माना जाता है। यही कारण है कि जल संरक्षण और भूस्खलन रोकने के प्रयासों में भी भीमल जैसे स्थानीय वृक्षों को महत्वपूर्ण माना जाता है। पहले गांवों में महिलाएं भीमल के रेशे से रस्सी, डोरी, जाल और कई हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करती थीं। इन उत्पादों की स्थानीय बाजारों में अच्छी मांग रहती थी। यदि आधुनिक डिजाइन और विपणन से जोड़ा जाए, तो भीमल आधारित हस्तशिल्प आज भी ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार का सशक्त माध्यम बन सकता है। बदलती जीवनशैली, पलायन और प्लास्टिक उत्पादों के बढ़ते उपयोग के कारण भीमल के पेड़ों की संख्या और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान में लगातार कमी आ रही है। नई पीढ़ी भीमल की उपयोगिता से धीरे-धीरे अनजान होती जा रही है। वन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो पहाड़ अपनी एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर खो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भीमल के पौधों का बड़े पैमाने पर रोपण किया जाए और इसके रेशे व अन्य उत्पादों का वैज्ञानिक ढंग से मूल्य संवर्धन किया जाए, तो यह पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती दे सकता है। जैविक और प्राकृतिक उत्पादों की बढ़ती मांग के दौर में भीमल से बने उत्पाद देश-विदेश के बाजारों में अपनी अलग पहचान बना सकते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग कहते हैंकृजिस गांव में भीमल है, वहां पशुधन भी स्वस्थ रहता है और प्रकृति भी खुशहाल रहती है। आधुनिकता की दौड़ में यदि इस वृक्ष और इससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान को सहेजा जाए, तो भीमल आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृ( लोक संस्कृति, आत्मनिर्भरता और प्रकृति से जुड़ाव का जीवंत प्रतीक बना रहेगा।

धामी का ‘जीरो टालरेंस’ एक्शन या चुनावी साल का ‘मास्टरस्ट्रोक’

भूमि प्रकरण में धामी सरकार की कार्रवाई के बाद भ्रष्टाचार पर सियासत चुनावी साल में प्रशासनिक सख्ती बन गई राजनीतिक विमर्श का केंद्र धामी सरकार का अफसरशाही को कड़ा संदेश, विपक्ष उठा रहा सवाल देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले हरिद्वार नगर निगम के भूमि प्रकरण में धामी सरकार की सख्त कार्रवाई ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। जांच में जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आने के बाद सरकार ने कार्रवाई की, उसे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जीरो टालरेंस नीति का बड़ा उदाहरण बताया जा रहा है। वहीं विपक्ष इसे स्वागत योग्य कदम तो मान रहा है, लेकिन यह सवाल भी उठा रहा है कि क्या यह सख्ती हर मामले में समान रूप से लागू होगी या फिर चुनावी साल में सरकार अपनी छवि चमकाने की कोशिश कर रही है। यह प्रकरण अब केवल हरिद्वार नगर निगम तक सीमित नहीं रह गया है। यह पूरे प्रदेश की नौकरशाही, राजनीतिक व्यवस्था और चुनावी माहौल का बड़ा विषय बन गया है। सत्ता, विपक्ष और आम जनताकृतीनों की नजर इस बात पर है कि सरकार इस कार्रवाई को आखिर किस मुकाम तक ले जाती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार सार्वजनिक मंचों से कहते रहे हैं कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करेगी। सरकार का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में नकल माफिया के खिलाफ कठोर कानून, भर्ती घोटालों में कार्रवाई, अवैध कब्जों पर अभियान और अब हरिद्वार नगर निगम प्रकरण में त्वरित निर्णय इस बात के प्रमाण हैं कि शासन की प्राथमिकता पारदर्शिता और जवाबदेही है। सरकार के अनुसार यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके पद या प्रभाव की परवाह किए बिना कार्रवाई होगी। भाजपा का मानना है कि इससे जनता में यह भरोसा मजबूत होगा कि कानून सबके लिए समान है और प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही तय की जा रही है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि पहले भ्रष्टाचार के मामलों में वर्षों तक फाइलें दबाकर रखी जाती थीं, जबकि वर्तमान सरकार ने कार्रवाई की गति तेज की है। पार्टी इसे निर्णायक नेतृत्व की पहचान के रूप में भी पेश कर रही है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल इस कार्रवाई का खुलकर विरोध नहीं कर रहे, लेकिन सरकार की मंशा पर सवाल जरूर उठा रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में जीरो टालरेंस की नीति पर चल रही है तो प्रदेश में सामने आए हर भ्रष्टाचार के मामले में समान स्तर की कार्रवाई होनी चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि कई मामलों में कार्रवाई की गति धीमी रही, जबकि कुछ मामलों में तत्काल सख्ती दिखाई गई। आम आदमी पार्टी का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का स्वागत है, लेकिन इसे केवल चुनावी संदेश तक सीमित नहीं रहना चाहिए। दोषियों को न्यायालय में सजा दिलाना ही वास्तविक सफलता होगी। यूकेडी का कहना है कि यदि सरकार ईमानदारी से पूरे प्रशासनिक ढांचे की जवाबदेही तय करती है तो जनता उसका समर्थन करेगी, लेकिन कार्रवाई केवल चुनिंदा मामलों तक सीमित रही तो जनता इसे राजनीतिक प्रबंधन के रूप में देखेगी। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि हरिद्वार नगर निगम प्रकरण ने पूरे सरकारी तंत्र को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि अब फाइलों में लिए गए निर्णयों की जवाबदेही तय हो सकती है। लंबे समय से यह धारणा रही है कि कुछ अधिकारी नियमों की अलग-अलग व्याख्या कर विवादास्पद फैसले लेते हैं। इस कार्रवाई ने संकेत दिया है कि सरकारी पद अब केवल अधिकार नहीं बल्कि उत्तरदायित्व भी है। यदि आने वाले समय में अन्य विभागों में भी इसी तरह निष्पक्ष कार्रवाई होती है तो इससे प्रशासनिक अनुशासन मजबूत हो सकता है। जनता की राय इस मुद्दे पर दो हिस्सों में बंटी दिखाई देती है। एक वर्ग का मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जितनी भी सख्ती हो, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लोगों का कहना है कि यदि अधिकारी और कर्मचारी जवाबदेह होंगे तो सरकारी व्यवस्था में सुधार आएगा और जनता का विश्वास बढ़ेगा। दूसरा वर्ग यह मानता है कि केवल निलंबन या विभागीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। यदि जांच समयब( पूरी नहीं हुई, दोषियों को कानूनी सजा नहीं मिली और सरकारी नुकसान की भरपाई नहीं हुई, तो ऐसी कार्रवाई का असर सीमित रह जाएगा। जनता अब परिणाम देखना चाहती है, केवल घोषणाएं नहीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव 2027 में भ्रष्टाचार, सुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही बड़े चुनावी मुद्दे बन सकते हैं। भाजपा इस कार्रवाई को अपनी ईमानदार और निर्णायक सरकार की पहचान के रूप में प्रचारित करेगी। दूसरी ओर विपक्ष यह साबित करने की कोशिश करेगा कि सरकार की सख्ती केवल चुनावी वर्ष तक सीमित है। युवा मतदाता, मध्यम वर्ग और सरकारी सेवाओं से जुड़े लोग इस मुद्दे को गंभीरता से देख रहे हैं। यही वर्ग चुनावी परिणामों को भी काफी हद तक प्रभावित करता है। हरिद्वार नगर निगम भूमि प्रकरण में धामी सरकार की कार्रवाई ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को सरकार अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत के रूप में पेश करना चाहती है। लेकिन चुनावी राजनीति में केवल कार्रवाई की शुरुआत नहीं, उसका तार्किक और निष्पक्ष निष्कर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। यदि सरकार आने वाले समय में बिना किसी भेदभाव के सभी मामलों में समान कठोरता दिखाती है, तो जीरो टालरेंस की नीति एक मजबूत राजनीतिक पूंजी बन सकती है। लेकिन यदि कार्रवाई चुनिंदा मामलों तक सीमित रह गई, तो विपक्ष इसे चुनावी प्रबंधन करार देने में देर नहीं लगाएगा।

भाजपा के लिए ‘खतरे की घंटी’

गृह जनपद में ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का विरोध सत्ता के प्रति बढ़ती नाराजगी को विपक्ष ने बनाया चुनावी मुद्दा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के विरोध से बढ़ी धामी सरकार की चिंता देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले उत्तराखंड की राजनीति में ऐसे संकेत दिखाई देने लगे हैं, जो भाजपा के लिए चिंता का कारण बन सकते हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को उनके गृह जनपद चमोली के पोखरी क्षेत्र में विरोध का सामना करना पड़ा। कार्यक्रम के दौरान महेंद्र भट्ट मुर्दाबाद के नारे लगने की घटना ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। विपक्ष इसे धामी सरकार के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश का संकेत बता रहा है, जबकि भाजपा इसे विपक्ष द्वारा प्रायोजित विरोध करार दे रही है। भाजपा ने 2022 के चुनाव में विकास, समान नागरिक संहिता, सख्त कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई जैसे मुद्दों के सहारे दोबारा सत्ता हासिल की थी। लेकिन कार्यकाल के अंतिम चरण में रोजगार, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्थानीय समस्याएं और विकास कार्यों की रफ्तार जैसे मुद्दे फिर से चर्चा में हैं। ऐसे माहौल में यदि पार्टी के शीर्ष प्रदेश नेतृत्व को अपने ही क्षेत्र में विरोध का सामना करना पड़े तो उसका राजनीतिक संदेश दूर तक जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी लहर हमेशा बड़े आंदोलनों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी स्थानीय घटनाओं से आकार लेना शुरू करती है। जनता जब अपने प्रतिनिधियों के सामने खुलकर नाराजगी जताने लगे तो यह संकेत संगठन के लिए भी गंभीर माना जाता है। विपक्ष ने इस घटनाक्रम को हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस का कहना है कि यह विरोध प्रदेशभर में बढ़ रहे जन असंतोष की शुरुआत है। पार्टी का आरोप है कि सरकार ने युवाओं, किसानों, कर्मचारियों और आम जनता से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई। आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल भी इसे जनता के मोहभंग का संकेत बताते हुए सरकार पर लगातार हमलावर हैं। हालांकि भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को स्थानीय मुद्दों से जुड़ी सामान्य लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया बता रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जनता की हर बात सुनी जाएगी और सरकार विकास कार्यों के आधार पर दोबारा जनता के बीच जाएगी। भाजपा संगठन भी बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर फीडबैक लेने और असंतोष को दूर करने की रणनीति पर काम कर रहा है। चुनावी राजनीति में प्रतीकात्मक घटनाओं का महत्व कम नहीं होता। अपने ही गृह जनपद में प्रदेश अध्यक्ष का विरोध विपक्ष को यह कहने का अवसर देता है कि सरकार के खिलाफ असंतोष अब भाजपा के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों तक पहुंचने लगा है। वहीं भाजपा के लिए यह संदेश है कि केवल सरकार की उपलब्धियां गिनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जनता की नाराजगी को समय रहते दूर करना भी जरूरी होगा। उत्तराखंड की राजनीति में अभी चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि आने वाले महीनों में रोजगार, महंगाई, पेपर लीक, स्थानीय विकास और जनसरोकारों के मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में रहेंगे। यदि भाजपा समय रहते संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाकर जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में सफल नहीं होती, तो विपक्ष इन मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।

युवाओं का ‘गुस्सा’ बनाम सरकार की ‘साख’

बेरोजगारों के मुद्दे पर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी में भाजपा के लिए चुनाव से पहले युवाओं के भरोसे की ‘जंग’ कांग्रेस ने खोला मोर्चा, आप और यूकेडी भी हुई आक्रामक देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्य में एक बार फिर पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं का मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस ने इसे सरकार की सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलता बताते हुए प्रदेशभर में आंदोलन की रणनीति तैयार कर ली है। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल भी बेरोजगार युवाओं के साथ खड़े होकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में रोजगार और भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है। उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने लाखों युवाओं के भविष्य पर सवाल खड़े किए। स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा, सचिवालय सुरक्षा, वन दरोगा सहित कई परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोपों ने प्रदेश की राजनीति को झकझोर दिया था। हजारों अभ्यर्थियों ने सड़कों पर उतरकर आंदोलन किया और सरकार को कई परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं। इसी मुद्दे को कांग्रेस अब चुनावी हथियार बना रही है। प्रदेश कांग्रेस का कहना है कि सरकार युवाओं को रोजगार देने में असफल रही और जो भर्तियां निकाली गईं, उनमें भी भ्रष्टाचार और पेपर लीक ने युवाओं का विश्वास तोड़ दिया। कांग्रेस प्रदेशभर में युवा न्याय अभियान चलाने की तैयारी कर रही है, जिसमें बेरोजगार युवाओं के साथ संवाद और जनसभाएं आयोजित की जाएंगी। आम आदमी पार्टी भी इस मुद्दे पर लगातार सरकार को घेर रही है। पार्टी का आरोप है कि भाजपा सरकार ने युवाओं को रोजगार के नाम पर केवल आश्वासन दिए। आप का कहना है कि यदि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और जवाबदेह होती तो पेपर लीक जैसे मामले सामने नहीं आते। पार्टी युवाओं के बीच रोजगार गारंटी और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था को प्रमुख चुनावी वादा बनाने की तैयारी में है। उत्तराखंड क्रांति दल ने भी इस मुद्दे को राज्य के युवाओं के सम्मान से जोड़ दिया है। यूकेडी का कहना है कि प्रदेश बनने का उद्देश्य स्थानीय युवाओं को रोजगार देना था, लेकिन आज वही युवा भर्ती घोटालों और बेरोजगारी से सबसे अधिक प्रभावित हैं। पार्टी इसे राज्य की अस्मिता और युवाओं के भविष्य का सवाल बताकर गांव-गांव तक ले जाने की रणनीति बना रही है। भाजपा सरकार का कहना है कि पेपर लीक मामलों में पहली बार सख्त कार्रवाई की गई। आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, परीक्षाएं निरस्त की गईं और दोषियों के खिलाफ कठोर कानून लागू किया गया। सरकार यह भी दावा कर रही है कि नई भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाई गई है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तकनीकी निगरानी मजबूत की गई है। भाजपा चुनावी मंचों पर यह संदेश देने की तैयारी में है कि पिछली घटनाओं पर कार्रवाई करके सरकार ने युवाओं का भरोसा बहाल करने का प्रयास किया है। उत्तराखंड में लगभग 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या चुनावी समीकरणों में निर्णायक मानी जाती है। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाएं और सरकारी नौकरियां हमेशा से इस वर्ग के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्ष इस मुद्दे को लगातार जीवित रखता है तो यह चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकता है। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस, आप और यूकेडी तीनों अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के बावजूद पेपर लीक और बेरोजगारी के मुद्दे पर लगभग एक ही सुर में सरकार को घेर रहे हैं। हालांकि तीनों दलों की चुनावी रणनीति अलग है, लेकिन लक्ष्य एक ही हैकृयुवा मतदाताओं का विश्वास जीतना।

शनिवार, 20 जून 2026

फिर ‘भाजपा’ या अब ‘कांग्रेस’

उत्तराखंड में ‘हैट्रिक’ पर भाजपा की नजर और वापसी के लिए बेताब दिख रही है प्रदेश में कांग्रेस भाजपा तीसरी बार सत्ता बचाने की चुनौती में, कांग्रेस सत्ता परिवर्तन की परंपरा लौटाने की कोशिश में संगठन, बूथ, बागी, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दे तय करेंगे सूबे में अगली सरकार देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी कुछ महीने दूर हों, लेकिन प्रदेश में चुनावी रण लगभग सज चुका है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने संगठनात्मक बैठकों, कार्यकर्ता सम्मेलनों, जनसंपर्क अभियानों और केंद्रीय नेताओं के लगातार दौरों के जरिए यह संकेत दे दिया है कि अब हर राजनीतिक कदम चुनावी चश्मे से देखा जाएगा। भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का इतिहास रचना चाहती है, जबकि कांग्रेस 2022 में टूटी सत्ता परिवर्तन की परंपरा को फिर से स्थापित करने की कोशिश में है। उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि राज्य गठन के बाद लंबे समय तक सत्ता भाजपा और कांग्रेस के बीच बदलती रही। वर्ष 2022 में पहली बार भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इस परंपरा को तोड़ा। अब 2027 का चुनाव इस सवाल का जवाब देगा कि क्या यह बदलाव स्थायी है या मतदाता फिर सत्ता परिवर्तन की ओर लौटेंगे। भाजपा इस चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उतरने का स्पष्ट संकेत दे चुकी है। पार्टी का पूरा फोकस संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, पिछले चुनाव में हारे बूथों की समीक्षा, लाभार्थी वर्ग को फिर से जोड़ने और केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं को चुनावी मुद्दा बनाने पर है। राष्ट्रीय नेतृत्व भी लगातार उत्तराखंड पर विशेष ध्यान दे रहा है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती एंटी-इनकंबेंसी को नियंत्रित करना है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण स्थानीय स्तर पर विधायकों के खिलाफ नाराजगी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे चुनाव में असर डाल सकते हैं। दूसरी ओर कांग्रेस ने भी चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। राहुल गांधी, प्रदेश प्रभारी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के लगातार उत्तराखंड दौरे इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। पार्टी संगठन को सक्रिय करने, पुराने नेताओं को साथ लाने, नए चेहरों को अवसर देने और युवाओं के बीच पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस की रणनीति सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, पर्वतीय क्षेत्रों में खाली होते गांव और स्थानीय विकास के मुद्दों को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाना है। राजनीतिक दल भले ही बड़े-बड़े दावे कर रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और भी है। उत्तराखंड का मतदाता अब केवल बड़े नेताओं की रैलियों से प्रभावित नहीं होता। गांवों में सड़क, पेयजल, अस्पताल, स्कूल, मोबाइल नेटवर्क, वन्यजीवों का आतंक, खेती की बदहाली और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। पहाड़ से लगातार पलायन आज भी सबसे बड़ा सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न है। हजारों गांव आंशिक या पूरी तरह खाली हो चुके हैं। चुनाव के समय यह मुद्दा हर दल उठाता है, लेकिन समाधान अभी भी अधूरा माना जाता है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह चुनाव इस बात की भी परीक्षा होगा कि जनता विकास के दावों को प्राथमिकता देती है या स्थानीय असंतोष को। भाजपा के सामने उपलब्धियों को जनसमर्थन में बदलने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस के सामने असंतोष को वोट में बदलने की। अंतिम फैसला हमेशा की तरह उत्तराखंड की जनता के हाथ में होगा, जो राज्य गठन के बाद कई बार यह साबित कर चुकी है कि वह किसी भी राजनीतिक दल को स्थायी जनादेश देने के बजाय उसके कामकाज का कठोर मूल्यांकन करती है। बाक्स बागी बन सकते हैं गेम चेंजर उत्तराखंड के लगभग हर चुनाव में टिकट वितरण के बाद बगावत देखने को मिलती रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ऐसे कई नेता हैं जो वर्षों से टिकट की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि टिकट वितरण में असंतोष बढ़ता है तो निर्दलीय उम्मीदवार कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय बना सकते हैं। प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर हजार या उससे भी कम वोटों का रहा है। ऐसे में बागी उम्मीदवार चुनावी समीकरण बिगाड़ सकते हैं। अभी तक की सरकारें 2002-कांग्रेस सरकार 2007-भाजपा सरकार 2012-कांग्रेस सरकार 2017-भाजपा सरकार 2022-भाजपा सरकार

थम गए घराट के ‘पाट’ अब बची हैं सिर्फ ‘यादें’

घराट’ कृपानी की शक्ति से चलने वाली पारंपरिक आटा चक्की थी पहाड़ की विरासत --गधेरों के किनारे घराट कभी थे गांव की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक जीवन का केंद्र --पलायन, आधुनिक चक्कियों और बदलती जीवनशैली ने धरोहर को इतिहास के पन्नों तक समेटा --कभी पहाड़ में गांवों के घराट के आसपास हर समय रहती थी लोगों की खूब चहल-पहल देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में बहती छोटी-छोटी नदियों और गधेरों के किनारे कभी एक ऐसी विरासत जीवंत हुआ करती थी, जिसकी घर्र-घर्र की आवाज पूरे गांव के जीवन की लय बन जाती थी। यह विरासत थी ‘घराट’ कृपानी की शक्ति से चलने वाली पारंपरिक आटा चक्की। आज भले ही घराटों के पाट थम चुके हों, लेकिन पहाड़ की स्मृतियों में उनकी आवाज आज भी उतनी ही जीवित है। एक समय था जब गांव का हर परिवार अपने खेतों में उगे गेहूं, मंडुवा, झंगोरा, मक्का और जौं की बोरियां पीठ पर लादकर कई किलोमीटर पैदल चलकर घराट तक पहुंचता था। वहां आटा पिसवाने की कोई जल्दबाजी नहीं होती थी। क्योंकि घराट केवल अनाज पीसने की जगह नहीं था, बल्कि वह गांव का सबसे बड़ा सामाजिक केंद्र था। घराट के आसपास हर समय लोगों की चहल-पहल रहती थी। कोई अपनी बारी का इंतजार करता, कोई खेती-किसानी की चर्चा करता, तो कोई दूर शहर या फौज में नौकरी कर रहे बेटे का हाल सुनाता। महिलाएं लोकगीत गातीं, बच्चे गधेरे के किनारे खेलते और बुजुर्ग पुराने किस्सों से नई पीढ़ी को गांव का इतिहास सुनाते। कई बार घराट ही वह जगह बन जाता, जहां रिश्ते तय होते, गांव की समस्याओं पर चर्चा होती और सामूहिक फैसले लिए जाते। आज की भाषा में कहें तो घराट गांव की चौपाल, पंचायत और संवाद केंद्रकृतीनों का संगम था। घराट पहाड़ के लोगों की प्रकृति के साथ तालमेल की अद्भुत मिसाल था। इसमें न बिजली की जरूरत पड़ती थी और न ही डीजल की। गधेरे का बहता पानी लकड़ी के पंखों को घुमाता और वही शक्ति पत्थर के भारी पाट को चलाती थी। धीरे-धीरे पिसा हुआ आटा स्वाद, पौष्टिकता और खुशबू में अलग पहचान रखता था। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण और हरित ऊर्जा की बात कर रही है, तब यह याद करना जरूरी है कि उत्तराखंड के गांव सदियों पहले ही जल ऊर्जा का ऐसा उपयोग कर रहे थे, जो पूरी तरह प्रकृति के अनुकूल था। रूद्रप्रयाग जिले के दानकोट निवासी देवी प्रसाद गौड बताते हैं कि घराट में पिसे मंडुवे की रोटी, झंगोरे का आटा या गेहूं का स्वाद कुछ अलग ही होता था। आटा गर्म नहीं होता था, इसलिए उसमें अनाज की प्राकृतिक खुशबू और पोषण बना रहता था। यही कारण था कि घराट का आटा केवल भोजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का भी आधार माना जाता था। समय बदला, गांवों से पलायन बढ़ा और बिजली से चलने वाली चक्कियां गांव-गांव तक पहुंच गईं। इसके साथ ही घराटों की रौनक भी खत्म होने लगी। जिन रास्तों पर कभी अनाज की बोरियां लेकर लोग चलते थे, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं। कई घराट ढह चुके हैं, कुछ मलबे में बदल गए हैं और कुछ केवल नाम भर रह गए हैं। पहाड़ के खाली होते गांवों के साथ घराट भी वीरान हो गए। पानी अब भी बहता है, लेकिन उसे घुमाने वाले पाट और वहां जुटने वाला समाज बिखर चुका है। इतिहासकार डा. भगवती प्रसाद पुरोहित मानते हैं कि घराट केवल तकनीकी संरचना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान हैं। यह उस दौर की याद दिलाते हैं, जब गांव आत्मनिर्भर थे और स्थानीय संसाधनों के सहारे अपना जीवन चलाते थे। यदि इन घराटों का संरक्षण किया जाए, तो इन्हें ग्रामीण पर्यटन, पारंपरिक खाद्य उत्पादों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जा सकता है। कई देशों में ऐसी पारंपरिक जलचक्कियां आज भी पर्यटन का बड़ा आकर्षण हैं। उत्तराखंड भी इस दिशा में पहल कर अपनी विरासत को नई पहचान दे सकता है। आज भी बरसात के दिनों में जब किसी पुराने घराट के पास से बहता पानी तेज होता है, तो लगता है मानो पत्थरों के बीच कहीं वह पुरानी घर्र-घर्र की आवाज अब भी छिपी हुई है। वह आवाज केवल चक्की के घूमने की नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर पहाड़, सामूहिक जीवन, आपसी प्रेम और प्रकृति के साथ संतुलन की थी। आज जरूरत केवल घराटों को बचाने की नहीं, बल्कि उस संस्कृति को बचाने की है जिसने पहाड़ को सदियों तक जीवंत बनाए रखा। क्योंकि जब घराट बंद हुए, तब केवल चक्कियां नहीं रुकींकृपहाड़ की एक पूरी जीवनशैली धीरे-धीरे खामोश हो गई। हालांकि प्रदेश में आज कुछ संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही है, लेकिन वह भी सिर्फ सरकार बजट की आस में इससे जुडे़ है। बजट खत्म तो उनकी जिम्मेदारी भी खत्म।

कांग्रेस के ‘कमांडर’ की चुनावी फौज ‘लापता’

विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा फुल एक्टिव और कांग्रेस अभी भी है अधूरी गोदियाल सक्रिय, लेकिन कुर्सियां खाली, कांग्रेस के लिए मिशन 2027 की चुनौती कांग्रेस पाटी में अकेले कमांडर के सिर चुनाव का भार अभी तक न टीम, न रणनीति देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में भले अभी कुछ समय बाकी हो, लेकिन सियासत पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुकी है। भाजपा ने संगठन से लेकर सरकार तक पूरे चुनावी तंत्र को सक्रिय कर दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार जिलों का दौरा कर रहे हैं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय नेता तक संगठन की नब्ज टटोल रहे हैं और बूथ स्तर तक चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। दूसरी ओर प्रदेश की मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आ रही है। पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में गणेश गोदियाल को कमान तो सौंप दी, लेकिन चुनाव की दहलीज पर खड़ी कांग्रेस के पास अभी तक पूरी प्रदेश कार्यकारिणी ही नहीं है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद गणेश गोदियाल लगातार सक्रिय हैं। दिल्ली से लेकर देहरादून तक बैठकों का दौर जारी है। कार्यकर्ताओं से संवाद भी हो रहा है और सरकार पर हमले भी तेज हैं। लेकिन प्रदेश संगठन का ढांचा अभी भी अधूरा है। प्रदेश उपाध्यक्ष कौन होंगे, महामंत्री कौन होंगे, जिलों की जिम्मेदारी किसे मिलेगी, चुनावी अभियान कौन संभालेगा, मीडिया प्रबंधन कौन करेगा और बूथ स्तर पर संगठन को कौन सक्रिय करेगाकृइन सभी सवालों के जवाब अभी मिलने बाकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी वर्ष में संगठन जितना जल्दी खड़ा होता है, उतना ही मजबूत संदेश कार्यकर्ताओं तक जाता है। कांग्रेस में फिलहाल यही संदेश सबसे कमजोर दिखाई दे रहा है। भाजपा ने 2027 के चुनाव को लेकर महीनों पहले तैयारी शुरू कर दी है। प्रत्येक जिले में संगठनात्मक बैठकें, शक्ति केंद्रों की समीक्षा, बूथ समितियों का गठन, पन्ना प्रमुखों की सक्रियता और लाभार्थी संपर्क अभियान लगातार चल रहे हैं। इसके विपरीत कांग्रेस के भीतर अभी भी संगठन विस्तार का इंतजार है। राजनीतिक गलियारों में चुटकी ली जा रही है कि भाजपा चुनाव लड़ रही है और कांग्रेस अभी टीम बना रही है। उत्तराखंड विधानसभा की 70 सीटों पर जीत के लिए केवल मुद्दे काफी नहीं होते। चुनाव जीतने के लिए बूथ एजेंट, सेक्टर प्रभारी, जिला प्रभारी, सोशल मीडिया टीम, मीडिया सेल, युवा और महिला संगठन, प्रशिक्षण टीम और संसाधनों का मजबूत नेटवर्क चाहिए। यही नेटवर्क चुनाव के दिन वोट को बूथ तक पहुंचाता है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यदि प्रदेश संगठन का गठन जल्द नहीं हुआ तो चुनावी तैयारियों में देरी का सीधा असर जमीनी स्तर पर दिखाई दे सकता है। उत्तराखंड की राजनीति में संगठन हमेशा निर्णायक रहा है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 47 सीटें’जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस 19 सीटों पर सिमट गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की संगठनात्मक मजबूती उसकी बड़ी ताकत रही, जबकि कांग्रेस कई स्थानों पर स्थानीय स्तर पर कमजोर दिखाई दी। अब यदि कांग्रेस सत्ता में वापसी का सपना देख रही है तो उसे केवल सरकार के खिलाफ माहौल बनाने से ज्यादा, अपने संगठन को धार देनी होगी। कांग्रेस लगातार बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठा रही है। लेकिन राजनीति का पुराना नियम है कि मुद्दे टीवी स्टूडियो में नहीं, बूथ पर जीत दिलाते हैं। जब तक हर विधानसभा, हर ब्लाक और हर बूथ पर पार्टी का मजबूत ढांचा नहीं होगा, तब तक सरकार विरोधी मुद्दों का पूरा राजनीतिक लाभ मिलना आसान नहीं होगा। कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रदेश कार्यकारिणी का ऐलान कब होगा? क्योंकि संगठन बनने के बाद ही चुनावी जिम्मेदारियां तय होंगी और टिकट के दावेदार भी अपनी रणनीति स्पष्ट कर पाएंगे। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक तंज खूब सुनाई दे रहा है कि भाजपा के पास पूरी बारात तैयार है, कांग्रेस अभी घोड़ी सजाने में लगी है। इसके साथ ही प्रदेश अध्यक्ष मैदान में हैं, लेकिन चुनावी टीम की जर्सी अभी सिल रही है। 2027 का विधानसभा चुनाव केवल चेहरे का नहीं, बल्कि संगठन की ताकत का चुनाव होगा। भाजपा ने अपनी चुनावी मशीनरी को काफी हद तक सक्रिय कर दिया है, जबकि कांग्रेस की असली परीक्षा अभी अपने घर को व्यवस्थित करने की है।

राहुल की ‘जेन-जेड’ से दोस्ती

डिजिटल पीढ़ी, सीधे सवालों के साथ कांग्रेस नेता राहुल गाधी ने बना दी है नई युवा रणनीति रोजगार, पेपर लीक, शिक्षा व सोशल मीडिया के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचने की कोशिश में कांग्रेस भाजपा भी युवा मतदाताओं पर पकड़ मजबूत रखने में जुटी, पड़ोसी देशों के युवा आंदोलनों की चर्चा तेज देहरादून। देश की राजनीति में एक नया शब्द तेजी से चर्चा में है जेन-जेड। यह वह पीढ़ी है, जिसने सोशल मीडिया के दौर में आंखें खोलीं, इंटरनेट को किताबों से ज्यादा देखा, मोबाइल को हथियार बनाया और अपने सवालों के जवाब सीधे सत्ता से मांगने की आदत विकसित की। यही कारण है कि अब राजनीतिक दलों की नजर भी इसी पीढ़ी पर टिक गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हाल के महीनों में अपने राजनीतिक अभियान का केंद्र इस नई पीढ़ी को बनाया है। छात्रों से लगातार संवाद, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था के सवालों को उठाकर कांग्रेस युवाओं के बीच अपनी नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राहुल गांधी अब केवल पारंपरिक कांग्रेस वोट बैंक पर निर्भर रहने के बजाय पहली बार मतदान करने वाले और 18 से 30 वर्ष के मतदाताओं को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा आधार बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार हर चुनाव में लाखों नए मतदाता जुड़ते हैं। इनमें अधिकांश जेन-जेड वर्ग के होते हैं। यह पीढ़ी जाति, धर्म और परंपरागत राजनीतिक नारों से आगे बढ़कर रोजगार, करियर, स्टार्टअप, शिक्षा, डिजिटल अवसर, पारदर्शिता और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देती है। यही वजह है कि आज लगभग हर राजनीतिक दल सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सक्रिय दिखाई देता है। इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब, एक्स, फेसबुक और पाडकास्ट अब राजनीतिक हथियार बन चुके हैं। राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में लगातार छात्रों और युवाओं के मुद्दों को उठाया है। उन्होंने पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार सवाल खड़े किए हैं। उनकी सभाओं में अब युवाओं की भागीदारी पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है। कांग्रेस का पूरा डिजिटल अभियान भी युवाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी यह संदेश देना चाहते हैं कि यदि युवाओं के भविष्य का सवाल है तो कांग्रेस उनकी आवाज बनेगी। यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि भाजपा में खलबली मच गई है। हालांकि इतना जरूर है कि भाजपा भी युवाओं को अपने साथ बनाए रखने के लिए लगातार सक्रिय है। भाजपा पिछले दस वर्षों में स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, पीएम मुद्रा योजना, नई शिक्षा नीति, डिजिटल गवर्नेंस और विभिन्न युवा कार्यक्रमों के जरिए युवा वर्ग तक पहुंच बनाने का प्रयास करती रही है। इसके साथ ही भाजपा का सोशल मीडिया नेटवर्क देश का सबसे मजबूत राजनीतिक डिजिटल नेटवर्क माना जाता है। यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों अब युवाओं के बीच नैरेटिव की लड़ाई लड़ रहे हैं। हाल के वर्षों में दक्षिण एशिया के कई देशों में युवाओं ने बड़े जनआंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण नीति के खिलाफ छात्र आंदोलन ने व्यापक राजनीतिक संकट पैदा किया। वही श्रीलंका में आर्थिक संकट के दौरान हजारों युवाओं ने सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए। इसके साथ ही नेपाल में भी समय-समय पर छात्र और युवा विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। इन घटनाओं के बाद भारत में भी राजनीतिक विश्लेषक यह चर्चा कर रहे हैं कि क्या युवाओं का असंतोष भविष्य में चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनावी प्रक्रिया, संघीय ढांचा और राजनीतिक परिस्थितियां इन देशों से काफी अलग हैं। इसलिए किसी एक देश की राजनीतिक घटनाओं को भारत पर सीधे लागू करना उचित नहीं माना जाता। बता दें कि आज का युवा अखबार पढ़ने से पहले मोबाइल खोलता है। राजनीतिक दल भी इसे अच्छी तरह समझ चुके हैं। यही कारण है कि अब चुनावी भाषणों से ज्यादा महत्व छोटे वीडियो, लाइव बातचीत, पाडकास्ट, डिजिटल कैंपेन और वायरल कंटेंट का हो गया है। राहुल गांधी भी अब पारंपरिक रैलियों के साथ डिजिटल संवाद पर विशेष जोर दे रहे हैं, जबकि भाजपा पहले से ही इस क्षेत्र में मजबूत मानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव में केवल जातीय समीकरण या पारंपरिक वोट बैंक ही निर्णायक नहीं होंगे। पहली बार वोट डालने वाले युवा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र, बेरोजगार डिग्रीधारी, स्टार्टअप से जुड़े युवा और डिजिटल दुनिया में सक्रिय मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। इसी कारण कांग्रेस रोजगार, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को मुख्य मुद्दा बना रही है, जबकि भाजपा विकास, बुनियादी ढांचे, डिजिटल परिवर्तन, कल्याणकारी योजनाओं और राष्ट्रीय नेतृत्व के मुद्दों पर अपना भरोसा कायम रखना चाहती है। राहुल गांधी का जेन-ज़ेड की ओर बढ़ता कदम इस बात का संकेत है कि कांग्रेस भविष्य की राजनीति को युवा आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द खड़ा करना चाहती है। दूसरी ओर भाजपा भी अपने युवा समर्थन आधार को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए समान रूप से सक्रिय है। आने वाले वर्षों में यह मुकाबला केवल दो दलों का नहीं, बल्कि युवा मतदाताओं के विश्वास, उम्मीदों और आकांक्षाओं को अपने पक्ष में करने की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का होगा, जिस दल को नई पीढ़ी का अधिक भरोसा मिलेगा, वही भविष्य की भारतीय राजनीति की दिशा तय करने में मजबूत स्थिति में होगा।

गुरुवार, 18 जून 2026

70 सीटें, चार कोने और एक गद्दी

उत्तराखंड की सियासत में तीसरे-चौथे मोर्चे का खौफ, बदलेगी राष्ट्रीय दलों की रणनीति राष्ट्रीय दलों के वोट बैंक में सेंध लगाने को तैयार क्षेत्रीय और बाहरी सूरमा उत्तराखंड की 70 सीटों पर आप व यूकेडी की एंट्री से उड़े दिग्गजों के तोते देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। अब तक मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा माना जा रहा था, लेकिन आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल की सक्रियता ने चुनावी रण को त्रिकोणीय ही नहीं बल्कि कई सीटों पर चतुष्कोणीय बनाने के संकेत दे दिए हैं। आप ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है, जबकि यूकेडी पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि वह उत्तराखंडियत, भू-कानून, मूल निवास और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों पर पूरे दमखम के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी। भले ही आप और यूकेडी सरकार बनाने की स्थिति में न दिखें, लेकिन दोनों दल भाजपा और कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि दोनों राष्ट्रीय दलों ने अपनी चुनावी रणनीति को नए सिरे से तैयार करना शुरू कर दिया है। भाजपा को चिंता इस बात की है कि शहरी क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य को मुद्दा बनाकर मध्यम वर्ग और युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश करेगी। दूसरी ओर कांग्रेस को डर है कि सत्ता विरोधी मतों का बिखराव सीधे भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है। यूकेडी की सक्रियता भी दोनों दलों के लिए चुनौती है। उत्तराखंड आंदोलन की विरासत रखने वाला यह दल पर्वतीय क्षेत्रों में भू-कानून, मूल निवास, पलायन और स्थानीय रोजगार जैसे भावनात्मक मुद्दों को फिर से चुनावी विमर्श के केंद्र में लाने की तैयारी में है। दिल्ली और पंजाब के बाद उत्तराखंड में संगठन को नए सिरे से खड़ा करने में जुटी आम आदमी पार्टी ने नई प्रदेश इकाई के गठन के साथ बड़ा संदेश दिया है कि वह केवल औपचारिक उपस्थिति नहीं बल्कि हर विधानसभा क्षेत्र में मजबूत लड़ाई लड़ेगी। पार्टी का दावा है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और रोजगार को चुनाव का मुख्य एजेंडा बनाएगी और सभी 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी। यूकेडी लंबे समय से कह रही है कि राष्ट्रीय दल उत्तराखंड के मूल मुद्दों को भूल चुके हैं। पार्टी का फोकस सशक्त भू-कानून, मूल निवास 1950 आधारित नीति की मांग, पलायन रोकने की ठोस योजना, पर्वतीय जिलों में रोजगार, राज्य आंदोलन की मूल भावना पर रहेगा। यदि यूकेडी कुछ क्षेत्रों में प्रभावी प्रदर्शन करती है तो वह कई सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों का गणित बिगाड़ सकती है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार देहरादून, हरिद्वार, )षिकेश, रुड़की, काशीपुर, हल्द्वानी, रुद्रपुर और कोटद्वार जैसे शहरी क्षेत्रों में आप अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास करेगी, जबकि यूकेडी का प्रभाव टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है। दोनों बड़े दल अब केवल एक-दूसरे पर हमला करने तक सीमित नहीं रह सकते। उन्हें छोटे दलों के प्रभाव को भी ध्यान में रखकर उम्मीदवार चयन, संगठन विस्तार और स्थानीय मुद्दों पर अधिक फोकस करना होगा। भाजपा बूथ स्तर पर संगठन मजबूत कर रही है, जबकि कांग्रेस भी जिलों और ब्लाकों में संगठनात्मक बैठकों के जरिए चुनावी तैयारी तेज कर चुकी है। उत्तराखंड की राजनीति में अब केवल भाजपा बनाम कांग्रेस का सीधा मुकाबला नहीं दिख रहा। आम आदमी पार्टी की 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा और यूकेडी की आक्रामक तैयारी ने चुनावी समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। सरकार कौन बनाएगा, इसका उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि तीसरे और चौथे मोर्चे की सक्रियता भाजपा और कांग्रेस दोनों की चुनावी रणनीति को प्रभावित करेगी। यदि आप और यूकेडी अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावी वोट हासिल करते हैं, तो 2027 का चुनाव उत्तराखंड के इतिहास के सबसे दिलचस्प और बहुकोणीय चुनावों में से एक साबित हो सकता है।

कांग्रेस नेताओं के ‘जमीनी टेस्ट’ की तैयारी

कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा का कांग्रेस नेताओं को दिया अल्टीमेटम उत्तराखंड में सैलजा का साफ संदेशकृजो जनता के बीच पसीना बहाएगा, वही टिकट पाएगा उत्तराखंड कांग्रेस में परफार्मेंस रिपोर्ट कार्ड तय करेगा टिकट, सिटिंग विधायकों की भी बढ़ी धड़कनें कांग्रेस प्रदेश प्रभारी ने दिया जीत का मंत्र, संगठन में अनुशासन व जवाबदेही पर जोर देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों में जुटी कांग्रेस ने अब संगठन को चुनावी मोड में लाना शुरू कर दिया है। प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा के उत्तराखंड दौरे ने साफ संकेत दे दिया है कि इस बार पार्टी केवल दावेदारी के आधार पर टिकट नहीं बांटेगी, बल्कि जमीनी सक्रियता, संगठन के प्रति समर्पण और जनता के बीच लगातार काम करने वाले नेताओं को ही प्राथमिकता मिलेगी। प्रदेश प्रभारी ने प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में जिला अध्यक्षों, महानगर अध्यक्षों, फ्रंटल संगठनों, प्रकोष्ठों और विधानसभा स्तर के पदाधिकारियों के साथ मैराथन बैठकें कीं। इस दौरान उन्होंने संगठन की मजबूती, बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और चुनावी रणनीति पर विस्तार से चर्चा की। बैठक का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि जो नेता आज से जनता के बीच दिखाई देगा, टिकट की दौड़ में वही आगे रहेगा। प्रदेश प्रभारी ने साफ शब्दों में कहा कि केवल दिल्ली या देहरादून में बैठकर टिकट की पैरवी करने से कुछ नहीं होगा। चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले नेताओं को अभी से अपने विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय होना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि टिकट का आधार केवल वरिष्ठता नहीं बल्कि विजयी होने की क्षमता और जनता के बीच स्वीकार्यता होगी। प्रदेश प्रभारी ने संगठन की कमजोर कड़ियों पर भी खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को केवल सरकार की आलोचना करने वाली पार्टी नहीं बल्कि जनता के बीच संघर्ष करने वाले संगठन के रूप में पहचान बनानी होगी। बैठक के दौरान प्रदेश प्रभारी ने नेताओं को स्पष्ट संदेश दिया कि व्यक्तिगत मतभेद पार्टी के भीतर रह सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से संगठन को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां स्वीकार नहीं की जाएंगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसका कार्यकर्ता है और यदि सभी नेता एकजुट होकर काम करेंगे तो 2027 में सत्ता परिवर्तन संभव है। प्रदेश प्रभारी ने कार्यकर्ताओं से कहा कि वह केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रहें बल्कि जनता से जुड़े मुद्दों को गांव-गांव तक पहुंचाएं। प्रदेश प्रभारी ने स्पष्ट किया कि विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी का पूरा फोकस संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर रहेगा। प्रदेश प्रभारी का यह दौरा केवल संगठनात्मक बैठक भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे कांग्रेस के चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि 2027 का चुनाव केवल नेताओं के भरोसे नहीं बल्कि मजबूत संगठन और सक्रिय कार्यकर्ताओं के दम पर लड़ा जाएगा। भाजपा जहां सत्ता बचाने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस अब संगठनात्मक अनुशासन, बूथ प्रबंधन और जमीनी सक्रियता के जरिए सत्ता में वापसी का रास्ता तलाश रही है। प्रदेश प्रभारी के दौरे से कांग्रेस ने दो स्पष्ट संदेश दिए हैंकृपहला, टिकट उसी को मिलेगा जो जनता के बीच रहेगा और जीतने की क्षमता साबित करेगा। दूसरा, संगठन सर्वाेपरि है और अनुशासन से कोई समझौता नहीं होगा। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कांग्रेस अब दावेदारों की भी परीक्षा ले रही है और संगठन की भी।

उत्तराखंड में ‘मार्च’ की जंग ‘नवंबर’ में

उत्तराखंड में प्री-मैच्योर इलेक्शन की सुगबुगाहट से राजनीतिक दलों की थमी सांसें सूबे में समय से पहले बजेगा चुनावी बिगुल,जनगणना, अर्द्धकुंभ और सियासी गणित ने बढ़ाई हलचल राजनीतिक दलों की गतिविधियां, संगठनात्मक बैठकों की बढ़ती रफ्तार ने इस संभावना को हवा दे दी देहरादून। समय से पहले विधानसभा चुनाव की चर्चा ने उत्तराखंड की राजनीति को गर्मा दिया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपनी चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक ही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में हैकृक्या विधानसभा चुनाव तय समय से पहले हो सकते हैं? अभी विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2027 तक है, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां, संगठनात्मक बैठकों की बढ़ती रफ्तार और चुनावी तैयारियों ने इस संभावना को हवा दे दी है कि प्रदेश में नवंबर-दिसंबर 2026 में ही चुनाव कराए जा सकते हैं। हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा होता है तो यह उत्तराखंड के चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी रणनीतिक कवायद होगी। इसकी वजह केवल राजनीति नहीं, बल्कि प्रशासनिक मजबूरियां भी बताई जा रही हैं। केंद्र सरकार ने वर्ष 2027 में देशव्यापी जनगणना का कार्यक्रम तय किया है। दूसरी ओर उत्तराखंड सहित उत्तर प्रदेश, पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनाव भी इसी अवधि में प्रस्तावित हैं। चुनाव और जनगणना दोनों में बड़ी संख्या में शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी तथा सरकारी कर्मचारी लगाए जाते हैं। यदि दोनों प्रक्रियाएं एक साथ होती हैं तो सरकारी मशीनरी पर भारी दबाव पड़ सकता है। इसी कारण समय से पहले चुनाव कराने की चर्चा राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चल रही है। आंकड़ों बताते है कि पिछले दो चुनावों में भाजपा का वर्चस्व रहा है, जबकि कांग्रेस लगातार अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। भाजपा ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर संगठन को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। बूथ समितियों की समीक्षा, शक्ति केंद्रों की बैठकों और वरिष्ठ नेताओं के लगातार दौरों ने संकेत दिए हैं कि पार्टी किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहती है। हाल के दिनों में राष्ट्रीय नेतृत्व के उत्तराखंड दौरे, कार्यकर्ताओं के साथ बैठकों और बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने के निर्देशों ने चुनावी चर्चाओं को और तेज किया है। मुख्य विपक्ष कांग्रेस भी संगठन को धार देने में जुट गई है। प्रदेश प्रभारी के लगातार दौरे, जिलाध्यक्षों की बैठकों, फ्रंटल संगठनों की समीक्षा और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की रणनीति इस बात का संकेत है कि पार्टी भी संभावित समयपूर्व चुनाव की संभावना को नजरअंदाज नहीं कर रही। हरिद्वार में प्रस्तावित धार्मिक आयोजनों तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं को देखते हुए भी चुनावी कैलेंडर को लेकर चर्चाएं हो रही हैं। यदि चुनाव, धार्मिक आयोजन और जनगणना एक साथ आते हैं तो प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। यही वजह है कि समयपूर्व चुनाव की संभावना पर राजनीतिक बहस जारी है। यदि चुनाव समय से पहले होते हैं तो सभी दलों को उम्मीदवार चयन, टिकट वितरण, चुनावी घोषणापत्र और संसाधनों की तैयारी अपेक्षा से कई महीने पहले पूरी करनी होगी। छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए यह और बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। बता दें कि उत्तराखंड में लगभग 85 लाख मतदाता हैं। इनमें युवाओं और महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत लगभग 65 प्रतिशत रहा था। इस बार युवाओं, पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं और महिलाओं की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।

घड़ी नहीं ‘गंज्याली’ की थाप से जागता था पहाड़

ओखली में गंज्याली की हर चोट नहीं कूटती थी केवल धान या मंडुवा पहाड़ की आत्मनिर्भरता, महिलाओं का श्रम व लोकगीतों की थी मिठास सदियों पुरानी पहाड़ की लोक संस्कृति की सुनाई देती थी वह धड़कन रील और रील्स की दुनिया में कहीं गुम हो गई बुजुर्गों की प्यारी विरासत देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों की सुबह कभी अलार्म की आवाज से नहीं, बल्कि ओखली में पड़ती गंज्याली की लयब( थाप से होती थी। यह आवाज इतनी परिचित थी कि गांव के लोग बिना घड़ी देखे समझ जाते थे कि दिन निकलने वाला है। पहाड़ की रसोई में चूल्हे की पहली आंच जलने से पहले ओखली में गंज्याली चलती थी और पूरे आंगन में उसकी ठक-ठक...ठक-ठक की गूंज फैल जाती थी। यह केवल एक घरेलू काम नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा था। गंज्याली लकड़ी से बना एक मजबूत और भारी उपकरण है, जिसका उपयोग ओखली में धान, मंडुवा, झंगोरा, गेहूं, गहत और अन्य अनाज कूटने के लिए किया जाता था। पहाड़ के लगभग हर घर के आंगन में पत्थर या मजबूत लकड़ी की ओखली बनी होती थी और उसके साथ गंज्याली हमेशा खड़ी रहती थी। यह रसोई का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा थी, जितना चूल्हा, सिलबट्टा या तांबे का भड्डू। पहाड़ में खेती आसान नहीं थी। सीढ़ीदार खेतों में महीनों की मेहनत के बाद जब धान या मंडुवा की फसल घर आती थी, तब उसका अंतिम रूप गंज्याली ही देती थी। धान को ओखली में डालकर गंज्याली से कूटा जाता, जिससे उसका छिलका अलग होता और शु( चावल तैयार होता। मंडुवा और झंगोरा भी इसी प्रक्रिया से साफ किए जाते थे। यह पूरी प्रक्रिया धैर्य, ताकत और अनुभव मांगती थी। गंज्याली का सबसे गहरा रिश्ता पहाड़ की महिलाओं से था। सुबह घर के काम शुरू होने से पहले वह ओखली के पास पहुंच जाती थीं। कई बार दो महिलाएं आमने-सामने खड़ी होकर बारी-बारी से गंज्याली चलाती थीं। दोनों की थाप में इतना तालमेल होता था कि एक पल की चूक भी नहीं होती। इस दौरान वह गढ़वाली और कुमाऊंनी लोकगीत गातीं, सुख-दुख साझा करतीं और गांव-समाज की बातें भी करतीं। इस तरह ओखली केवल अनाज कूटने की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का केंद्र भी बन जाती थी। बुजुर्ग बताते हैं कि गंज्याली से कूटा गया चावल मशीन से निकले चावल की तुलना में अधिक स्वादिष्ट होता था। उसमें अनाज का प्राकृतिक स्वाद और पौष्टिकता बनी रहती थी। यही कारण था कि पहाड़ के लोगों का भोजन सादा होने के बावजूद बेहद पौष्टिक माना जाता था। आज भी कई बुजुर्ग मानते हैं कि मशीनों ने सुविधा तो दी, लेकिन स्वाद और परंपरा दोनों कहीं पीछे छूट गए। पहाड़ में किसी घर की समृ(ि का अंदाजा उसके आंगन से लगाया जाता था, जिस घर में मजबूत ओखली और अच्छी गंज्याली होती, उसे आत्मनिर्भर परिवार माना जाता था। उस समय बाजार पर निर्भरता बहुत कम थी। घर का अनाज घर में ही तैयार होता था और परिवार अपनी जरूरतें स्वयं पूरी करता था। समय के साथ बिजली से चलने वाली राइस मिलें, आटा चक्कियां और आधुनिक मशीनें गांव-गांव तक पहुंच गईं। अब कुछ ही मिनटों में वही काम हो जाता है, जिसके लिए पहले घंटों मेहनत करनी पड़ती थी। सुविधा बढ़ी, लेकिन गंज्याली की आवाज गांवों से धीरे-धीरे गायब हो गई। आज अधिकांश घरों में ओखली और गंज्याली या तो किसी कोने में रखी हैं या फिर पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। लोक संस्कृति के जानकार मानते हैं कि गंज्याली केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर है। इसे लोक संग्रहालयों, विद्यालयों, सांस्कृतिक मेलों और ग्रामीण पर्यटन से जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है। यदि गांवों में पारंपरिक अनाजों और जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा, तो गंज्याली जैसी विरासत भी फिर से सम्मान पा सकती है। आज जब पहाड़ के गांवों से पलायन बढ़ रहा है और पारंपरिक जीवनशैली तेजी से बदल रही है, तब गंज्याली की खामोशी बहुत कुछ कहती है। कभी जिसकी थाप से सुबह जागती थी, आज वह किसी पुराने घर के आंगन में चुपचाप खड़ी है। ऐसा लगता है मानो वह आने वाली पीढ़ियों से पूछ रही होकृक्या मेरी ठक-ठक अब हमेशा के लिए थम जाएगी? गंज्याली की आवाज भले ही धीमी पड़ गई हो, लेकिन उसकी हर चोट में आज भी पहाड़ की मिट्टी की खुशबू, मेहनतकश हाथों का पसीना, लोकगीतों की मिठास और आत्मनिर्भर उत्तराखंड की पूरी कहानी जीवित है। यही गंज्याली की सबसे बड़ी पहचान है और यही उसकी सबसे अमूल्य विरासत।

बुधवार, 17 जून 2026

अतिथि देवो भवः की संस्कृति पर चोट

पर्यटकों और श्र(ालुओं की गुंडागर्दी से आहत हो गई है देवभूमि चारधाम यात्रा और पर्यटन सीजन में बढ़ रहे दुर्व्यवहार के मामले स्थानीय के साथ मारपीट, अभद्रता और दबंगई की घटनाएं बढ़ी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो बढ़ा रहे सभी की चिंता सरकार और प्रशासन पर समय रहते सख्ती नहीं करने के आरोप देहरादून। सदियों से अपनी सरलता, सहनशीलता और अतिथि देवो भवः की परंपरा के लिए पहचाने जाने वाले पहाड़ के लोग आज भीतर ही भीतर रो रहे हैं, जिन पहाड़ों ने देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों और श्र(ालुओं का खुले दिल से स्वागत किया, वहीं अब कई जगहों पर स्थानीय लोग खुद को असुरक्षित और अपमानित महसूस कर रहे हैं। चारधाम यात्रा और पर्यटन सीजन के दौरान लगातार सामने आ रही घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि देवभूमि का धैर्य अब जवाब देने लगा है। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में आए दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां बाहरी राज्यों से आए कुछ पर्यटक और श्र(ालु स्थानीय लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करते दिखाई दे रहे हैं। कहीं सड़क पर विवाद के दौरान मारपीट हो रही है तो कहीं होटल, ढाबों और टैक्सी चालकों के साथ बदसलूकी की घटनाएं सामने आ रही हैं। कई मामलों में महिलाओं और बुजुर्गों तक के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लगे हैं। उत्तराखंड की संस्कृति हमेशा से मेहमानों के सम्मान की रही है। पहाड़ के लोग अपने सीमित संसाधनों के बावजूद यात्रियों की मदद के लिए आगे आते रहे हैं। आपदा हो या यात्रा का कठिन रास्ता, स्थानीय लोग हमेशा सहारा बनते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन के बढ़ते दबाव के साथ व्यवहार में भी बदलाव देखने को मिला है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बड़ी संख्या में आने वाले कुछ पर्यटक पहाड़ को पर्यटन स्थल नहीं बल्कि मौज-मस्ती का मैदान समझने लगे हैं। शराब पीकर हुड़दंग, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी, धार्मिक स्थलों की मर्यादा का उल्लंघन और स्थानीय लोगों के साथ अभद्रता जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं। चारधाम यात्रा को आस्था का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। हर साल लाखों श्र(ालु बाबा केदार, बदरीविशाल, हेमकुंड, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में यात्रा मार्गों पर कई बार श्र(ालुओं और स्थानीय लोगों के बीच विवाद की खबरें सामने आई हैं। स्थानीय व्यापारियों, टैक्सी चालकों और होटल संचालकों का कहना है कि कुछ लोग यात्रा पर श्र(ा से कम और दबंगई के प्रदर्शन के लिए अधिक आते दिखाई देते हैं। मामूली बातों पर गाली-गलौज और मारपीट तक की नौबत आ जाती है। पहले ऐसी घटनाएं स्थानीय स्तर तक सीमित रह जाती थीं, लेकिन अब मोबाइल कैमरों और सोशल मीडिया ने पूरी तस्वीर सामने ला दी है। आए दिन ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनमें पर्यटकों और स्थानीय लोगों के बीच झगड़े, सड़क पर हंगामा और कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ती दिखाई देती हैं। इन वीडियो के बाद प्रदेशभर में यह बहस तेज हो गई है कि आखिर देवभूमि की गरिमा को बचाने के लिए क्या किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार पर्यटन और यात्रा के आंकड़ों को लेकर तो उत्साहित दिखाई देती है, लेकिन उससे जुड़ी चुनौतियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। पर्यटन बढ़ने के साथ कानून व्यवस्था, ट्रैफिक नियंत्रण और स्थानीय लोगों की सुरक्षा के लिए ठोस व्यवस्था की जरूरत है। कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त नियम नहीं बनाए गए तो स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ सकता है। उनका मानना है कि उत्तराखंड केवल पर्यटन उद्योग नहीं बल्कि लाखों लोगों का घर भी है और उनकी गरिमा तथा सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। हजारों परिवारों की आजीविका पर्यटन और यात्रा सीजन पर निर्भर है। यही कारण है कि कई बार अपमान और दुर्व्यवहार झेलने के बावजूद स्थानीय लोग खुलकर विरोध नहीं कर पाते। उन्हें डर रहता है कि कहीं उनकी रोजी-रोटी प्रभावित न हो जाए। लेकिन अब हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि पहाड़ की खामोशी के पीछे गहरा आक्रोश दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में पर्यटन और तीर्थाटन का स्वागत होना चाहिए, लेकिन इसके साथ अनुशासन और जवाबदेही भी जरूरी है। जो लोग देवभूमि में आते हैं, उन्हें यहां की संस्कृति, परंपराओं और स्थानीय समाज का सम्मान करना होगा। उत्तराखंड केवल पहाड़, नदियां और मंदिर नहीं है। यह उन लोगों की भूमि है जिन्होंने सदियों से इन पहाड़ों को जिंदा रखा है। यदि स्थानीय लोगों का सम्मान और सुरक्षा खतरे में पड़ती है तो इसका असर केवल समाज पर नहीं बल्कि पर्यटन और तीर्थाटन की पूरी व्यवस्था पर पड़ेगा। आज पहाड़ मानो सरकार, प्रशासन और समाज से एक ही सवाल पूछ रहा है।कृ

नीट की ‘दौड़’ में टूट रहे ‘सपने’

देहरादून में मेधावी छात्रा की आत्महत्या ने खड़े किए कई सवाल छात्रा ने सुसाइड नोट में नीट में अच्छी रैंक आने का किया जिक्र सफलता के बाद भी तनाव में जी रहे हजारों मेधावी छात्र-छात्राएं परीक्षाओं के दबाव और मानसिक स्वास्थ्य पर फिर छिड़ी बहस विशेषज्ञ बोले, रैंक व अंकों से ज्यादा जरूरी है मानसिक संतुलन देहरादून। डाक्टर बनने का सपना लेकर लाखों छात्र हर वर्ष राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा ‘नीट’ में बैठते हैं। इस परीक्षा को देश की सबसे कठिन और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में गिना जाता है। एक-एक अंक और एक-एक रैंक भविष्य का रास्ता तय करती है। लेकिन इस प्रतियोगिता की चमक के पीछे एक ऐसी दुनिया भी है जहां तनाव, चिंता, अवसाद और असुरक्षा का अंधेरा लगातार गहराता जा रहा है। देहरादून के पटेलनगर क्षेत्र में एक मेधावी छात्रा द्वारा आत्महत्या की घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। पुलिस को मिले सुसाइड नोट में छात्रा ने नीट में अच्छी रैंक प्राप्त होने का उल्लेख किया है। यह तथ्य अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आमतौर पर माना जाता है कि अच्छी रैंक और सफलता मिलने के बाद छात्रों की परेशानियां समाप्त हो जाती हैं, लेकिन यह घटना बताती है कि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। यह मामला केवल एक छात्रा की दुखद मौत का नहीं, बल्कि उस मानसिक दबाव का प्रतीक बन गया है, जिससे देशभर के लाखों छात्र गुजर रहे हैं। मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की होड़ ने बच्चों की जिंदगी को किताबों, टेस्ट सीरीज और रैंकिंग तक सीमित कर दिया है। बचपन और युवावस्था का बड़ा हिस्सा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में गुजर जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार छात्र परीक्षा पास करने के बाद भी मानसिक दबाव से मुक्त नहीं हो पाते। अच्छी रैंक आने के बावजूद पसंदीदा कालेज मिलने की चिंता, भविष्य को लेकर अनिश्चितता, परिवार और समाज की अपेक्षाएं तथा लगातार बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव उन्हें भीतर ही भीतर परेशान करता रहता है। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि कई छात्र अपनी भावनाओं को परिवार और मित्रों के साथ साझा नहीं कर पाते। बाहर से वह सामान्य और सफल दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर गहरी चिंता और अकेलेपन से जूझ रहे होते हैं। ऐसे मामलों में समय रहते संवाद और सहयोग नहीं मिलने पर स्थिति गंभीर हो सकती है। पिछले एक दशक में देशभर में कोचिंग संस्कृति तेजी से बढ़ी है। लाखों छात्र घर-परिवार से दूर रहकर वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। सुबह से रात तक पढ़ाई, टेस्ट, रैंकिंग और प्रतिस्पर्धा का माहौल मानसिक दबाव को बढ़ाता है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों का मूल्यांकन केवल अंकों और रैंक के आधार पर किया जाना भी समस्या का बड़ा कारण है। जब सफलता को केवल एक परीक्षा से जोड़ दिया जाता है, तो छात्र असफलता या अनिश्चितता को स्वीकार नहीं कर पाते। समाज में डाक्टर और इंजीनियर बनने को आज भी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। कई बार अभिभावक अनजाने में बच्चों पर अत्यधिक अपेक्षाओं का बोझ डाल देते हैं। बच्चे परिवार की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए अपनी भावनाओं को दबा लेते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अभिभावकों को बच्चों के अंकों और रैंक से अधिक उनकी मानसिक स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चा तनाव, चिंता या उदासी के संकेत दे रहा हो तो उसे गंभीरता से लेना आवश्यक है। देहरादून, हल्द्वानी और अन्य शहरों में बड़ी संख्या में छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। शिक्षा के बढ़ते केंद्रों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों, कालेजों और कोचिंग संस्थानों में नियमित काउंसलिंग व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए ताकि छात्र अपनी समस्याओं को खुलकर साझा कर सकें। पटेलनगर की यह घटना केवल एक परिवार का दर्द नहीं है। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल है जिसमें बच्चों की सफलता को उनकी रैंक से मापा जाता है, लेकिन उनके मानसिक संघर्षों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह समय शिक्षा व्यवस्था, अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के लिए आत्ममंथन का है। यदि हम केवल परिणामों पर ध्यान देंगे और बच्चों की भावनाओं को नहीं समझेंगे, तो ऐसी दुखद घटनाएं चिंता का विषय बनी रहेंगी। आज जरूरत इस बात की है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों को यह भरोसा दिया जाए कि उनकी पहचान केवल एक परीक्षा, एक रैंक या एक परिणाम से नहीं है। उनका जीवन, उनका आत्मविश्वास और उनका मानसिक स्वास्थ्य किसी भी परीक्षा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

सरकारी ‘नाकामी’ ने छीनी एक ‘उम्मीद’

नीट विवाद की भेंट चढ़ी देहरादून की एक होनहार जिंदगी नीट विवाद में घिरा सिस्टम, सवालों के घेरे में सरकार देहरादून की छात्रा की मौत ने खड़े किए कई सवाल सुसाइड नोट में अच्छी तैयारी और रैंक की उम्मीद सरकार की नाकामी और कीमत चुका रहे ‘बच्चे’ देहरादून। देहरादून में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की मौत ने केंद्र सरकार और परीक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बताया जा रहा है कि छात्रा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि उसने नीट परीक्षा की अच्छी तैयारी की थी और उसे अच्छी रैंक आने की पूरी उम्मीद थी। लेकिन जिस परीक्षा व्यवस्था पर उसने भरोसा किया, वही व्यवस्था विवादों और अनिश्चितताओं में उलझ गई। यह घटना केवल एक छात्रा की मौत नहीं है, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था पर सवाल है जो करोड़ों युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी संभालने का दावा करती है। जब छात्र सालों तक दिन-रात मेहनत करते हैं, परिवार अपनी जमा पूंजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करता है और फिर परीक्षा की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं, तो सबसे बड़ा धोखा उन युवाओं के साथ होता है जिन्होंने ईमानदारी से मेहनत की होती है। देश में पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं से लेकर प्रवेश परीक्षाओं तक पेपर लीक की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। हर बार सरकार जांच, कार्रवाई और सुधार के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदलती। नीट जैसे देश के सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षा में भी विवाद सामने आना इस बात का प्रमाण है कि सरकार परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने में पूरी तरह सफल नहीं रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि परीक्षा प्रणाली में सेंध लगती है तो उसकी सजा छात्रों को क्यों भुगतनी पड़ती है? आखिर उन अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही कब तय होगी जिनकी जिम्मेदारी परीक्षा को निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराना है? देहरादून की छात्रा के सुसाइड नोट की पंक्तियांकृमैंने अच्छी तैयारी की थी, मुझे अच्छी रैंक आने की उम्मीद थीकृसरकारी दावों की पोल खोलती नजर आती हैं। यह केवल एक छात्रा की पीड़ा नहीं, बल्कि लाखों युवाओं की आवाज है जो आज यह महसूस कर रहे हैं कि उनकी मेहनत व्यवस्था की खामियों के सामने बेबस है। सरकार लगातार युवाओं को देश का भविष्य बताती है, लेकिन जब वही युवा परीक्षा विवादों, बेरोजगारी और अनिश्चितता से जूझ रहे हों तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर युवाओं की चिंता प्राथमिकता में क्यों नहीं है? बता दें कि नीट देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में से एक है, जिसमें हर साल लाखों विद्यार्थी डाक्टर बनने का सपना लेकर शामिल होते हैं। वर्ष 2026 में भी 22 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी थी, लेकिन पेपर लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और दोबारा परीक्षा कराने का फैसला लिया गया। इस निर्णय ने छात्रों को मानसिक रूप से झकझोर दिया। महीनों की मेहनत, आर्थिक खर्च और भावनात्मक दबाव के बाद छात्रों को फिर उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है। एक मेडिकल छात्र बनने का सपना केवल छात्र का नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें उससे जुड़ी होती हैं। कई परिवार अपनी आर्थिक सीमाओं को पार कर बच्चों को कोचिंग और पढ़ाई के बेहतर अवसर उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं या परीक्षा रद्द होती है, तो सबसे बड़ा आघात उन छात्रों को पहुंचता है जिन्होंने ईमानदारी से तैयारी की होती है। देहरादून की छात्रा के सुसाइड नोट में लिखे शब्दकृमैंने अच्छी तैयारी की थी, मुझे अच्छी रैंक की उम्मीद थी आज पूरे देश के छात्रों की पीड़ा को सामने ला रहे हैं। यह सवाल उठ रहा है कि आखिर छात्रों की मेहनत का मूल्य कौन चुकाएगा? किसी भी लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों का भरोसा बनाए रखना होती है। लेकिन जब करोड़ों छात्रों के भविष्य से जुड़ी परीक्षाओं पर बार-बार सवाल उठें, जब मेहनती छात्र निराशा में डूबने लगें और जब एक छात्रा अपने नोट में अपनी मेहनत और उम्मीदों का जिक्र करके दुनिया से विदा हो जाए, तब यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह जाती, बल्कि शासन और व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन जाती है। आज देश जानना चाहता है कि परीक्षा प्रणाली की खामियों की जिम्मेदारी कौन लेगा? कितने और युवाओं के सपने टूटेंगे? और आखिर कब सरकार ऐसी व्यवस्था दे पाएगी जिस पर छात्रों को पूरा भरोसा हो सके? बाक्स जवाबदेही पर उठ रहे सवाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पेपर लीक हुआ तो जिम्मेदार कौन है? यदि परीक्षा की गोपनीयता नहीं बचाई जा सकती तो इसकी कीमत छात्रों को क्यों चुकानी पड़ रही है? अभिभावकों का कहना है कि हर बार जांच, कमेटी और कार्रवाई की बात होती है, लेकिन व्यवस्था में स्थायी सुधार दिखाई नहीं देता। पेपर लीक की घटनाएं अब अपवाद नहीं बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही हैं। सरकार और एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती केंद्र सरकार और परीक्षा एजेंसियों ने परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाने तथा दोबारा परीक्षा के लिए अतिरिक्त इंतजाम करने की घोषणा की है। परीक्षा अवधि बढ़ाने, प्रश्न पुस्तिका में बदलाव और सुरक्षा उपायों को मजबूत करने जैसे कदम उठाए गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन उपायों से छात्रों का टूटा हुआ भरोसा वापस आ पाएगा?

गांवों से लेकर सोशल मीडिया तक ‘सियासी जंग’

चुनाव में अभी समय, लेकिन मैदान में उतर चुके हैं दोनों दलों के कार्यकर्ता भाजपा सरकार की उपलब्धियों के सहारे, कांग्रेस जनमुद्दों के सहारे बना रही रणनीति बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और विकास के मुद्दों पर तेज होगी 2027 की जंग देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी डेढ़ वर्ष से अधिक का समय शेष है, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी रण की तैयारियां अभी से शुरू कर दी हैं। सत्ता में बैठी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस दोनों ही गांव की चौपालों, कस्बों की बैठकों, सोशल मीडिया अभियानों और संगठनात्मक गतिविधियों के जरिए अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गई हैं। प्रदेश की राजनीति में अब हर कार्यक्रम, हर दौरा और हर बयान को चुनावी नजरिए से देखा जाने लगा है। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतिहास रचने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस दस साल के सत्ता वनवास को समाप्त करने के लिए पूरी ताकत झोंकने की रणनीति पर काम कर रही है। यही वजह है कि दोनों दलों के नेता गांव-गांव पहुंच रहे हैं और संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने में लगे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में विकास कार्यों, निवेश, सड़क, रेल, हवाई कनेक्टिविटी, समान नागरिक संहिता और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दों को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है। प्रदेश संगठन भी बूथ सशक्तिकरण अभियान पर जोर दे रहा है। पार्टी का लक्ष्य है कि प्रत्येक बूथ पर कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाए। भाजपा नेताओं का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता का लाभ 2027 में भी मिल सकता है, यदि संगठन को जमीनी स्तर पर और मजबूत किया जाए। इसी रणनीति के तहत केंद्रीय नेताओं, प्रदेश प्रभारी और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों के लगातार उत्तराखंड दौरे हो रहे हैं। जिलों और मंडलों में बैठकों का सिलसिला तेज हो गया है। पार्टी विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान दे रही है, जहां पिछले चुनावों में जीत का अंतर कम रहा था। दूसरी ओर कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं और स्थानीय युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि प्रदेश में एंटी-इंकम्बेंसी का लाभ उसे मिल सकता है। इसी कारण पार्टी नेताओं को जनता के बीच जाने और जनसंवाद बढ़ाने के निर्देश दिए जा रहे हैं। प्रदेश प्रभारी से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक लगातार जिलों का दौरा कर संगठन को सक्रिय करने में जुटे हैं। कांग्रेस की चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर की गुटबाजी को नियंत्रित रखना भी है। पार्टी नेतृत्व जानता है कि यदि संगठन एकजुट रहा तो मुकाबला अधिक प्रभावी हो सकता है। उत्तराखंड के चुनावों में हमेशा गांव और ग्रामीण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों का फोकस गांवों की चौपालों पर है। नेता अब शहरों से निकलकर दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों की पगडंडियां नाप रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बैठकों, जनसंपर्क अभियानों और स्थानीय मुद्दों को उठाने का सिलसिला तेज हो गया है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और पलायन जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में दिखाई देने लगे हैं। विधानसभा चुनाव 2027 में सोशल मीडिया की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहने वाली है। भाजपा और कांग्रेस दोनों डिजिटल प्लेटफार्म पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने में लगी हैं। व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल और इंस्टाग्राम के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति बनाई जा रही है। राजनीतिक दल अब केवल रैलियों और सभाओं पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि मोबाइल स्क्रीन तक अपनी पहुंच सुनिश्चित करना चाहते हैं। दोनों दलों के सामने एक बड़ी चुनौती अपने नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ रखने की भी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ऐसे नेता हैं जो टिकट और संगठनात्मक जिम्मेदारियों को लेकर असंतुष्ट रहे हैं। चुनाव नजदीक आते ही डैमेज कंट्रोल की राजनीति भी तेज हो गई है। वरिष्ठ नेता लगातार संवाद स्थापित कर संगठन को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 का चुनाव विकास बनाम जनमुद्दों की लड़ाई के रूप में सामने आ सकता है। भाजपा जहां अपनी उपलब्धियों और केंद्र-राज्य सरकार की योजनाओं को मुद्दा बनाएगी, वहीं कांग्रेस जनता से जुड़े सवालों को लेकर चुनावी मैदान में उतरेगी। हालांकि चुनाव में अभी समय है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी बिगुल बज चुका है। गांव की चौपाल से लेकर सोशल मीडिया तक दोनों दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। आने वाले महीनों में राजनीतिक गतिविधियां और तेज होंगी और प्रदेश की जनता के बीच वादों, दावों और आरोप-प्रत्यारोपों का दौर भी बढ़ेगा।

ओखल: पहाड़ के गांवों का धड़कता दिल अब ‘खामोश’

कभी हर आंगन की शान होती थी पत्थर की ओखल मसालों की खुशबू के साथ जुड़ी हैं पीढ़ियों की यादें आधुनिक मशीनों ने छीनी परंपरागत रसोई की पहचान ओखल में कूटा मसाला आज भी देता है असली स्वाद देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल लोकगीतों, मेलों और मंदिरों में ही नहीं बसती, बल्कि वह उन छोटी-छोटी चीजों में भी सांस लेती है जो सदियों से लोगों के जीवन का हिस्सा रही हैं। ऐसी ही एक विरासत है पत्थरों की बनी ओखल जो कभी पहाड़ के हर गांव, हर आंगन और हर रसोई की पहचान हुआ करती थी। आज भले ही उसकी जगह मिक्सर और ग्राइंडर ने ले ली हो, लेकिन ओखल की खट-खट की आवाज आज भी पहाड़ के बुजुर्गों के कानों में गूंजती है। एक समय था जब सुबह की पहली किरण के साथ गांव के घरों से ओखल में मसाले कूटने की आवाज सुनाई देती थी। यह केवल रसोई का काम नहीं होता था, बल्कि पूरे परिवार के जीवन की लय का हिस्सा होता था। पत्थर की ओखल में लहसुन, अदरक, भांग, जीरा, जख्या और लाल मिर्च कूटते हुए महिलाएं लोकगीत गाती थीं। उस खट-खट की आवाज में पहाड़ की जिंदगी की सरलता और आत्मीयता बसती थी। पहाड़ के लोग कहते हैं कि ओखल में कूटा मसाला केवल मसाला नहीं होता था, उसमें मेहनत, धैर्य और अपनापन भी घुला होता था। पत्थर पर कूटने से मसालों का स्वाद और सुगंध वैसी निकलती थी, जैसी मशीनों में पिसने से नहीं आती। भांग की चटनी हो, सिलबट्टे पर पिसा नमक हो या ओखल में कूटी गई हरी मिर्च, इन सबका स्वाद आज भी लोगों की यादों में ताजा है। पहाड़ के गांवों में ओखल केवल रसोई का उपकरण नहीं थी। यह घर की समृ(ि और परंपरा का प्रतीक भी मानी जाती थी। कई घरों में बड़ी-बड़ी पत्थर की ओखलें वर्षों तक एक ही स्थान पर रहती थीं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उनका उपयोग होता रहता था। बुजुर्ग बताते हैं कि शादी-ब्याह, त्योहार और विशेष अवसरों पर बड़ी मात्रा में मसाले और अनाज कूटने के लिए ओखल का उपयोग किया जाता था। गांव की महिलाएं एक-दूसरे के घर जाकर सामूहिक रूप से काम करती थीं। काम के साथ हंसी-मजाक और लोकगीतों का ऐसा संगम होता था जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं खो गया है। समय बदला, तकनीक आई और पहाड़ की रसोई भी बदल गई। बिजली से चलने वाले मिक्सर और ग्राइंडर ने काम को आसान बना दिया। कुछ ही मिनटों में मसाले तैयार होने लगे। सुविधा बढ़ी, लेकिन कहीं न कहीं स्वाद और आत्मीयता का एक हिस्सा पीछे छूट गया। आज कई गांवों में पत्थर की ओखल आंगन के किसी कोने में उपेक्षित पड़ी दिखाई देती है। कुछ घरों में वह अब फूलों के गमले का आधार बन गई है तो कहीं केवल पुरानी यादों की निशानी भर रह गई है। ओखल केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि पहाड़ की लोक संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। इसमें पहाड़ की महिलाओं का श्रम, पारिवारिक जीवन की आत्मीयता और पारंपरिक खान-पान की पूरी कहानी छिपी है। जब भी कोई बुजुर्ग ओखल को देखता है तो उसे अपने बचपन का गांव, मां के हाथों का स्वाद और परिवार के साथ बिताए वह दिन याद आ जाते हैं जब जीवन में सुविधाएं कम थीं, लेकिन अपनापन बहुत अधिक था। आज जब दुनिया अपनी जड़ों की ओर लौटने की बात कर रही है, तब पत्थर की ओखल जैसी पारंपरिक धरोहरों को भी सहेजने की जरूरत है। यह केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि पहाड़ की स्मृतियों, स्वाद और संस्कृति का हिस्सा है। शायद आने वाली पीढ़ियां कभी यह न जान सकें कि सुबह-सुबह ओखल की खट-खट की आवाज कैसी लगती थी। लेकिन पहाड़ के बुजुर्गों के लिए वह आवाज आज भी किसी लोकगीत की तरह दिल में गूंजती है। पत्थरों की वह ओखल आज भी गांव के किसी पुराने आंगन में चुपचाप खड़ी है। वह बोलती नहीं, लेकिन उसकी खामोशी कहती है कि उसने पीढ़ियों को पाला है, रिश्तों को जोड़ा है और पहाड़ की रसोई को स्वाद दिया है। समय बदल गया, लोग बदल गए, लेकिन ओखल में बसी यादें आज भी पहाड़ के दिल में जिंदा हैं।

विकास की ‘बिजली’ चमकेगी और दर्द देगा ‘विस्थापन’

उत्तराखंड-हिमाचल बार्डर पर किशाऊ बांध महापरियोजना की सुगबुगाहट बरसों की कागजी दौड़ व बैठकों के दौर के बाद आखिरकार जमीन पर उतरेगी महापरियोजना उत्तराखंड-हिमाचल ही नहीं पूरे उत्तर भारत की बिजली, पानी और सिंचाई का संकट होगा कम हजारों को रोजगार, क्षेत्र के विकास की जगी उम्मीद, पर्यावरण की चिंता व विस्थापन का दर्द देहरादून। यमुना नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना को उत्तराखंड की सबसे महत्वाकांक्षी जलविद्युत और बहुउद्देशीय परियोजनाओं में गिना जाता है। वर्षों से फाइलों और बैठकों में उलझी यह परियोजना अब धरातल पर उतरने की दिशा में आगे बढ़ रही है। नई दिल्ली में छह राज्यों के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में इस परियोजना को हरी झंडी मिलने के साथ छह राज्यों के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर हुए। केद्र सरकार का दावा है कि किशाऊ बांध न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे उत्तर भारत की ऊर्जा, सिंचाई और पेयजल जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। वहीं स्थानीय स्तर पर इसे विकास और चुनौतियों के दोहरे पहलू के रूप में देखा जा रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर यमुना नदी पर बनने वाली यह परियोजना लंबे समय से चर्चा में रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परियोजना तय समय पर पूरी होती है तो यह प्रदेश के आर्थिक और सामाजिक विकास की तस्वीर बदल सकती है। उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश कहा जाता है। राज्य की नदियां बिजली उत्पादन की अपार संभावनाएं रखती हैं। किशाऊ बांध परियोजना से बड़ी मात्रा में बिजली उत्पादन होने की संभावना है, जिससे उत्तराखंड की ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृ(ि होगी। ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इससे न केवल प्रदेश की जरूरतें पूरी होंगी बल्कि अतिरिक्त बिजली अन्य राज्यों को भी उपलब्ध कराई जा सकेगी। इससे राज्य की आय में भी वृ(ि होने की उम्मीद है। किशाऊ परियोजना का महत्व केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका सबसे बड़ा लाभ यमुना बेसिन से जुड़े क्षेत्रों को मिलेगा। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में पेयजल और सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल उपलब्ध कराने में यह परियोजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार जल संरक्षण और जल प्रबंधन की दृष्टि से भी यह परियोजना भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। जलवायु परिवर्तन और घटते जल स्रोतों के दौर में बड़े जलाशयों का महत्व और बढ़ गया है। किसी भी बड़ी परियोजना की तरह किशाऊ बांध से भी हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना है। निर्माण कार्यों में स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। साथ ही सड़क, पुल, संचार और अन्य आधारभूत सुविधाओं का विस्तार भी होगा। परियोजना क्षेत्र में बाजार, परिवहन और अन्य आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने की उम्मीद है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है। जहां एक ओर परियोजना विकास के नए अवसर लेकर आ रही है, वहीं दूसरी ओर प्रभावित गांवों के लोगों की चिंताएं भी कम नहीं हैं। बांध बनने से कई गांवों और कृकृषि भूमि के जलमग्न होने की आशंका जताई जाती रही है। स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि पुनर्वास और मुआवजा नीति को पूरी पारदर्शिता के साथ लागू किया जाए। उनका कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन प्रभावित परिवारों के अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हिमालयी क्षेत्र पहले से ही भूस्खलन, भू-धंसाव और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणविदों की चिंताएं भी सामने आती रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना के निर्माण और संचालन के दौरान पर्यावरणीय मानकों का कड़ाई से पालन करना होगा। नदी पारिस्थितिकी, वन क्षेत्र और जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों का लगातार अध्ययन आवश्यक होगा। उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पर्यटन, कृकृषि और जलविद्युत पर आधारित है। किशाऊ परियोजना राज्य के राजस्व और औद्योगिक विकास को नई दिशा दे सकती है। यदि परियोजना के लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचते हैं तो यह सीमांत क्षेत्रों में विकास का नया अध्याय लिख सकती है। किशाऊ बांध परियोजना को लेकर उम्मीदें भी बड़ी हैं और आशंकाएं भी। सरकार इसे विकास का इंजन मान रही है, जबकि प्रभावित क्षेत्र के लोग अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं। आने वाले वर्षों में यह परियोजना केवल एक बांध नहीं होगी, बल्कि यह तय करेगी कि उत्तराखंड विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में कितना सफल होता है। यदि पुनर्वास, पर्यावरण और स्थानीय हितों का ध्यान रखते हुए परियोजना को आगे बढ़ाया गया तो किशाऊ बांध वास्तव में उत्तराखंड की तस्वीर बदलने वाला साबित हो सकता है। उत्तराखंड के विकास के इतिहास में कई परियोजनाएं आईं और गईं, लेकिन किशाऊ बांध को लेकर जो उम्मीदें हैं, वह इसे एक साधारण परियोजना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि यह सपना धरातल पर कब और किस रूप में साकार होता है।

मंगलवार, 16 जून 2026

भाजपा-कांग्रेस के लिए नाक और साख की जंग

विधानसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा उत्तराखंड चुनाव 2027 है सत्ता से ज्यादा प्रतिष्ठा की लड़ाई भाजपा बचाएगी साख, कांग्रेस तलाशेगी वापसी का रास्ता देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अब केवल सत्ता हासिल करने की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि प्रदेश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के लिए नाक और साख का सवाल बनता जा रहा है। एक तरफ भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटकर नया राजनीतिक इतिहास रचने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर कांग्रेस एक दशक से चले आ रहे सत्ता के सूखे को समाप्त कर अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने की चुनौती से जूझ रही है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे साफ है कि दोनों दल इस मुकाबले को प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर चल रहे हैं। प्रदेश से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर चल रहा है और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। उत्तराखंड बनने के बाद राज्य की राजनीति में सत्ता परिवर्तन का इतिहास रहा है। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि प्रदेश में हर चुनाव में सरकार बदलती है। लेकिन 2022 में भाजपा ने इस मिथक को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। अब भाजपा की नजर तीसरी बार सत्ता हासिल करने पर है। यदि पार्टी ऐसा करने में सफल रहती है तो यह उत्तराखंड की राजनीति में एक नया अध्याय होगा। मुख्यमंत्री, सरकार और संगठन सभी चुनावी तैयारी में जुट गए हैं। सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया जा रहा है। भाजपा के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लगातार तीसरी जीत पार्टी की नीतियों, संगठन और नेतृत्व पर जनता की मुहर मानी जाएगी। दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने अस्तित्व और साख की चुनौती है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी लगातार सत्ता से बाहर है। ऐसे में 2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं बल्कि अपनी प्रासंगिकता साबित करने का अवसर भी है। कांग्रेस को उम्मीद है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, भर्ती घोटाले, भू-कानून और क्षेत्रीय मुद्दों के सहारे वह जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है। पार्टी नेतृत्व लगातार कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और संगठन को नई ऊर्जा देने में जुटा है। यदि कांग्रेस इस चुनाव में भी सत्ता तक नहीं पहुंच पाती है तो पार्टी के सामने संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि कांग्रेस नेतृत्व इस चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रहा है। उत्तराखंड का चुनाव केवल प्रदेश नेतृत्व तक सीमित नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की नजर भी इस चुनाव पर है। भाजपा के लिए यह प्रधानमंत्री और पार्टी नेतृत्व की लोकप्रियता को बरकरार रखने की परीक्षा होगी, जबकि कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपने पुनरुत्थान की रणनीति को मजबूती देने का अवसर। इसी कारण दोनों दलों के राष्ट्रीय नेता लगातार उत्तराखंड की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों में दिल्ली की सक्रियता साफ दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव मुद्दों, नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमता की संयुक्त परीक्षा होगा। भाजपा जहां अपने विकास कार्यों और योजनाओं के आधार पर जनता का विश्वास दोबारा हासिल करना चाहेगी, वहीं कांग्रेस सरकार विरोधी माहौल को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन चुका है। भाजपा के लिए सत्ता बचाना और कांग्रेस के लिए सत्ता में लौटना केवल चुनावी लक्ष्य नहीं, बल्कि नाक और साख का सवाल बन गया है।

दिल्ली से देहरादून तक मंथन

संगठन को धार देने में जुटे भाजपा और कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता बूथ से सत्ता तक का गणित, भाजपा-कांग्रेस की बैठकें हुई तेज देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी तैयारी का बिगुल बजा दिया है। सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ही संगठन को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं। देहरादून से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर जारी है, जिसमें बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, क्षेत्रीय समीकरण और चुनावी रणनीति पर मंथन किया जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों यह समझ चुकी हैं कि उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में चुनावी जीत का आधार मजबूत संगठन ही होता है। यही वजह है कि दोनों दल चुनावी मैदान में उतरने से पहले अपनी संगठनात्मक कमजोरियों को दूर करने में जुटे हैं। भाजपा ने मिशन 2027 के तहत बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत बनाने की रणनीति तैयार की है। प्रदेश नेतृत्व लगातार राष्ट्रीय पदाधिकारियों और केंद्रीय नेताओं के साथ बैठकें कर रहा है। पार्टी का जोर उन बूथों और विधानसभा क्षेत्रों पर है जहां पिछले चुनावों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हो पाया था। भाजपा नेतृत्व कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने में जुटा है कि विधानसभा चुनाव में जीत की नींव बूथों पर ही रखी जाएगी। इसके लिए बूथ समितियों का पुनर्गठन, पन्ना प्रमुखों की सक्रियता और सरकार की योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों को भी अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपे जाने की चर्चा है। संगठन का लक्ष्य चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरना और किसी भी प्रकार की गुटबाजी को समाप्त करना है। कांग्रेस भी आगामी चुनाव को सत्ता में वापसी के अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी में लगातार संगठनात्मक बैठकों का आयोजन किया जा रहा है। प्रदेश संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और जिला स्तर पर समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि यदि संगठन मजबूत रहा तो सरकार के खिलाफ जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया जा सकेगा। इसी कारण पार्टी बूथ स्तर तक अपनी इकाइयों को सक्रिय करने और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को फिर से जोड़ने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय नेताओं के साथ बैठकों में प्रदेश के राजनीतिक हालात, स्थानीय मुद्दों और संभावित चुनावी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हो रही है। पार्टी विशेष रूप से युवा, महिला और सोशल मीडिया नेटवर्क को मजबूत करने पर भी फोकस कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता बढ़ना इस बात का संकेत है कि चुनाव को गंभीरता से लिया जा रहा है। दोनों दलों के लिए उत्तराखंड प्रतिष्ठा का चुनाव बनने जा रहा है। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का रिकार्ड बनाना चाहती है, जबकि कांग्रेस एक दशक बाद सत्ता में वापसी का सपना देख रही है। ऐसे में संगठनात्मक मजबूती ही दोनों दलों की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है। आने वाले महीनों में दोनों दलों के राष्ट्रीय नेताओं के उत्तराखंड दौरे बढ़ सकते हैं। कार्यकर्ता सम्मेलन, प्रशिक्षण शिविर, जनसंवाद कार्यक्रम और संगठनात्मक बैठकें चुनावी माहौल को और तेज करेंगी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि चुनावी जंग भले 2027 में होनी है, लेकिन उसकी बुनियाद अभी से रखी जा रही है। उत्तराखंड की राजनीति में फिलहाल मुद्दों से ज्यादा संगठन की मजबूती पर जोर दिखाई दे रहा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों यह मानकर चल रही हैं कि मजबूत संगठन ही 2027 की सत्ता की चाबी साबित होगा।

‘तकली’ की घूमती धुरी अब थमी

पहाड़ की ऊन, भेड़-बकरियां और सदियों पुरानी आजीविका विलुप्ति के कगार पर कभी हर आंगन में गूंजती थी तकली की खनक, आज नई पीढ़ी को इसका नाम तक नहीं मालूम कभी थी गढ़वाल और कुमाऊं की पारंपरिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल उसके मंदिरों, मेलों और लोकगीतों में ही नहीं बसती, बल्कि उन छोटे-छोटे औजारों में भी जीवित रही है जिन्होंने सदियों तक लोगों की आजीविका को सहारा दिया। इन्हीं में से एक थी तकली जो पहाड़ की महिला और पुरूषों के हाथों में घूमती थी और भेड़ों की ऊन को धागे में बदल देती थी। यही धागा आगे चलकर गर्म कपड़ों, पट्टू, थुलमा, पंखी और कई पारंपरिक वस्त्रों का आधार बनता था। आज समय बदल गया है। मशीनों से बने कपड़ों और बाजार की चकाचौंध के बीच तकली की धीमी गति कहीं खो गई है। पहाड़ के गांवों में कभी आम दृश्य रही तकली अब संग्रहालयों और बुजुर्गों की यादों तक सिमटती जा रही है। एक समय था जब गढ़वाल और कुमाऊं के अधिकांश गांवों में भेड़-बकरियां पालना आम बात थी। ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले परिवार सैकड़ों भेड़ों के झुंड रखते थे। गर्मियों में ये झुंड बुग्यालों की ओर निकल जाते और सर्दियों में निचले इलाकों की ओर लौट आते। भेड़ों से प्राप्त ऊन केवल घरेलू जरूरतों को ही पूरा नहीं करती थी, बल्कि व्यापार का भी महत्वपूर्ण साधन थी। ग्रामीण ऊन बेचकर अपनी आर्थिक जरूरतें पूरी करते थे। कई परिवारों की पूरी आजीविका इसी पर निर्भर थी। भेड़ों से ऊन काटने के बाद उसे साफ किया जाता था। फिर गांव की महिलाएं और पुरूष तकली की मदद से उस ऊन को बारीक धागे में बदलती थीं। घर के आंगन, चौक और खेतों की मेड़ों पर बैठकर महिलाएं बातचीत के साथ-साथ तकली चलाती थीं। यह केवल काम नहीं था बल्कि सामाजिक जीवन का हिस्सा था। लोकगीतों और कहानियों के बीच तकली घूमती रहती और धीरे-धीरे ऊन मजबूत धागे में बदल जाती। यही धागा बाद में करघों पर कपड़ों का रूप लेता था। सड़कें बढ़ीं, बाजार गांवों तक पहुंचे और सस्ते मशीन निर्मित कपड़े उपलब्ध होने लगे। इसके बाद ऊन और हाथ से बने वस्त्रों की मांग घटने लगी। भेड़ पालन में बढ़ती लागत, चरागाहों का सिमटना और युवा पीढ़ी का अन्य रोजगारों की ओर रुझान भी इस परंपरा के कमजोर होने का बड़ा कारण बना। आज कई गांवों में भेड़ों के बड़े झुंड दिखाई नहीं देते। तकली चलाने वाली बुजुर्ग महिलाएं और पुरूष तो हैं, लेकिन सीखने वाले हाथ नहीं हैं। तकली का गायब होना केवल एक औजार का गायब होना नहीं है। इसके साथ एक पूरी जीवनशैली, लोक ज्ञान और पारंपरिक अर्थव्यवस्था भी खत्म होती जा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भेड़ पालन, ऊन उत्पादन और पारंपरिक हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जाए तो यह रोजगार का नया माध्यम बन सकता है। पर्यटन और हस्तशिल्प बाजारों से जोड़कर इस विरासत को पुनर्जीवित किया जा सकता है। 70 वर्षीय ग्रामीण महिलाएं आज भी याद करती हैं कि कैसे शाम ढलते ही घर के आंगन में बैठकर तकली चलाई जाती थी। सर्दियों के लिए थुलमा और पंखी तैयार किए जाते थे। गांव के हर घर में ऊन की खुशबू और मेहनत की गर्माहट महसूस होती थी। अब वह दिन केवल स्मृतियों में हैं। तकली की घूमती धुरी धीरे-धीरे थम रही है और उसके साथ पहाड़ की एक अनमोल विरासत भी खामोश होती जा रही है।

उत्तराखंड में बढ़ी राजनीतिक हलचल

कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी के दौरे से पहले भाजपा हुई सक्रिय नितिन नवीन के मसूरी पहुंचते ही तेज हुई राजनीतिक चर्चाएं भाजपा-कांग्रेस के कार्यक्रम से पहले बढ़ा राजनीतिक तापमान देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी के प्रस्तावित उत्तराखंड दौरे से ठीक पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन का अचानक मसूरी पहुंचना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। भाजपा इसे संगठनात्मक कार्यक्रम और नियमित गतिविधि बता रही है, लेकिन राजनीतिक जानकार इसके समय और संदेश को लेकर कई मायने निकाल रहे हैं। मसूरी में नितिन नवीन की मौजूदगी ऐसे समय में सामने आई है जब कांग्रेस अपनी नई रणनीति के साथ संगठन को सक्रिय करने की तैयारी कर रही है। ऐसे में भाजपा अध्यक्ष का पहाड़ की राजनीति के केंद्र माने जाने वाले मसूरी में पहुंचना सियासी तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है। पार्टी नेतृत्व बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाए रखने के लिए लगातार बैठकों और संवाद कार्यक्रमों पर जोर दे रहा है। सूत्रों के अनुसार भाजपा नेतृत्व आगामी चुनाव को देखते हुए संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जनसंपर्क अभियानों पर विशेष फोकस कर रहा है। मसूरी दौरे को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी का उत्तराखंड दौरा भी संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है और 2027 के चुनाव को वापसी के अवसर के रूप में देख रही है। कांग्रेस नेतृत्व जिला और ब्लाक स्तर पर संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने और चुनावी रणनीति तैयार करने में जुटा है। प्रभारी के दौरे के दौरान संगठन की समीक्षा और आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों पर चर्चा होने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मसूरी केवल पर्यटन नगरी ही नहीं बल्कि प्रदेश की राजनीति का भी महत्वपूर्ण केंद्र रही है। यहां होने वाली बैठकों और नेताओं की गतिविधियों को अक्सर बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाता है। नितिन नवीन का मसूरी दौरा भाजपा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने के साथ-साथ विपक्ष को यह संदेश देने का प्रयास भी माना जा रहा है कि पार्टी चुनावी तैयारी में किसी भी स्तर पर पीछे नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की बढ़ती दिलचस्पी यह संकेत दे रही है कि उत्तराखंड का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों दल संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले महीनों में राष्ट्रीय नेताओं के दौरे और बढ़ेंगे तथा चुनावी गतिविधियां और तेज होंगी। अभी चुनाव में समय है, लेकिन नेताओं के दौरे, संगठनात्मक बैठकें और बढ़ती राजनीतिक सक्रियता यह साफ संकेत दे रही है कि उत्तराखंड में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। कांग्रेस प्रभारी के दौरे से पहले भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की मसूरी मौजूदगी ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है और दोनों दलों के बीच चुनावी प्रतिस्पर्धा की झलक अभी से दिखाई देने लगी है।

‘कमजोर कड़ियों’ को मजबूत करने में जुटी भाजपा-कांग्रेस

हारे हुए बूथों का एक्स-रे कर रही भाजपा, पन्ना प्रमुखों से लेकर संगठन को किया जा रहा है री-बूट पिछली गलतियों से सबक लेकर भाजपा के मजबूत गढ़ों में सेंध लगाने का मास्टर प्लान किया तैयार सत्ता विरोधी लहर को मात देने के लिए भाजपा की पैनी नजर, तो वापसी के लिए कांग्रेस का आक्रामक रुख देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा और कांग्रेस ने अभी से अपनी चुनावी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। दोनों दलों का सबसे बड़ा फोकस उन विधानसभा सीटों पर है, जहां पिछली बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा जहां अपनी हारी हुई सीटों और बूथों की समीक्षा कर जीत की हैट्रिक का रास्ता तलाश रही है, वहीं कांग्रेस उन सीटों को दोबारा जीतने और भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने की रणनीति बना रही है। भाजपा ने विशेष रूप से हारे हुए बूथों पर फोकस करने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने का अभियान शुरू किया है। प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी कई महीने शेष हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सत्ता में बैठी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस दोनों ने अपनी पिछली हार का पोस्टमार्टम शुरू कर दिया है। दोनों दलों के रणनीतिकार उन विधानसभा क्षेत्रों की फाइलें खंगाल रहे हैं, जहां पिछली बार हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी माहौल को नियंत्रित करने और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की है। पार्टी नेतृत्व मानता है कि यदि पिछली बार हारी हुई सीटों और कमजोर बूथों पर प्रदर्शन सुधारा गया तो 2027 का चुनाव अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इसी कारण संगठन स्तर पर बूथों की समीक्षा, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय समीकरणों का आकलन किया जा रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस को विश्वास है कि भाजपा सरकार के खिलाफ बढ़ती जन असंतुष्टि, बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और अधूरे वादों के मुद्दे उसे राजनीतिक बढ़त दिला सकते हैं। कांग्रेस उन सीटों पर विशेष ध्यान दे रही है जहां पिछली बार जीत का अंतर कम रहा था। पार्टी स्थानीय नेताओं को सक्रिय करने और क्षेत्रीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा संगठन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि चुनावी जीत का रास्ता बूथों से होकर गुजरता है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने हारे हुए बूथों और सीटों का विस्तृत विश्लेषण शुरू किया है। प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में उन कारणों की समीक्षा की जा रही है जिनकी वजह से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। स्थानीय नाराजगी, गुटबाजी, टिकट वितरण और संगठनात्मक कमजोरियों को चिन्हित किया जा रहा है। संगठन पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को गांव-गांव जाकर फीडबैक लेने की जिम्मेदारी दी गई है। भाजपा की कोशिश है कि चुनाव से पहले किसी भी प्रकार की नाराजगी को दूर कर एकजुटता का संदेश दिया जाए। कांग्रेस भी इस बार कोई मौका गंवाना नहीं चाहती। पार्टी ने उन सीटों की सूची तैयार की है जहां जीत का अंतर बेहद कम रहा था। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि यदि संगठन को मजबूत किया गया और स्थानीय मुद्दों को सही ढंग से उठाया गया तो कई सीटों पर तस्वीर बदल सकती है। प्रदेश नेतृत्व लगातार जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में बैठकों के जरिए कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने में जुटा है। कांग्रेस की रणनीति भाजपा सरकार के खिलाफ जनभावनाओं को चुनावी समर्थन में बदलने की है। दोनों दलों में संभावित उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर भी नजर रखी जा रही है। जिन नेताओं की अपने क्षेत्रों में सक्रियता कम पाई जाएगी, उनके टिकट पर संकट खड़ा हो सकता है। पार्टी संगठन अब केवल राजनीतिक पहचान नहीं बल्कि जमीनी पकड़ और जनसंपर्क को भी टिकट का आधार बनाने की तैयारी में है। गढ़वाल और कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर तराई के मैदानी इलाकों तक राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। गांवों की चौपालों, बाजारों और सामाजिक आयोजनों में नेताओं की मौजूदगी बढ़ने लगी है। चुनाव भले दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है। उत्तराखंड की राजनीति में यह दौर चुनावी तैयारी का पहला अध्याय माना जा रहा है। भाजपा अपनी सत्ता बचाने और इतिहास रचने की कोशिश में है, जबकि कांग्रेस सत्ता में वापसी का अवसर तलाश रही है। फिलहाल दोनों दलों की नजर उन सीटों पर है जहां पिछली हार ने उन्हें सबक दिया था। आने वाले महीनों में यही सीटें चुनावी रणभूमि का सबसे बड़ा केंद्र बनने वाली हैं।

भाजपा: सत्ता-संगठन में ‘परफेक्ट ट्यूनिंग’

रूठे नेताओं को मनाकर भीतरघात का खतरा टालने की कोशिश कमजोर कड़ियों को मजबूत कर क्लीन स्वीप की चल रही तैयारी चुनावी शंखनाद से पहले कुनबे को एक रखने की कवायद शुरू देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही भाजपा ने संगठन और सत्ता के बीच समन्वय मजबूत करने के साथ-साथ नाराज नेताओं को साधने की कवायद भी तेज कर दी है। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व लगातार संगठन को मजबूत करने, हारी हुई सीटों पर विशेष फोकस करने और कार्यकर्ताओं व नेताओं को एकजुट रखने पर जोर दे रहा है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ महीने दूर हों, लेकिन भाजपा ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। पार्टी नेतृत्व को यह एहसास है कि लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का रास्ता केवल सरकारी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता से होकर गुजरता है। यही वजह है कि भाजपा के बड़े नेता अब उन नेताओं और कार्यकर्ताओं को मनाने में जुट गए हैं जो पिछले कुछ वर्षों में टिकट, दायित्व या संगठनात्मक उपेक्षा को लेकर नाराज रहे हैं। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन विधानसभा क्षेत्रों की है जहां 2022 के चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था या जीत का अंतर बेहद कम रहा था। पार्टी नेतृत्व इन सीटों पर विशेष रणनीति बना रहा है और सांसदों, विधायकों तथा वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंप रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव से पहले किसी भी प्रकार की अंदरूनी नाराजगी भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। यही कारण है कि संगठन स्तर पर ऐसे नेताओं से संवाद बढ़ाया जा रहा है जो पिछले चुनावों के बाद खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे थे। कई वरिष्ठ नेताओं को फिर से सक्रिय भूमिका देकर कार्यकर्ताओं में संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि पार्टी सभी को साथ लेकर चलना चाहती है। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी हालिया बैठकों में सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया है। पार्टी सांसदों और विधायकों को निर्देश दिए गए हैं कि वह अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली लोगों, सामाजिक संगठनों और पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क बढ़ाएं। इसके पीछे मकसद चुनावी माहौल बनने से पहले संगठन को पूरी तरह सक्रिय करना है। दूसरी ओर टिकट की दावेदारी को लेकर भी भाजपा सतर्क दिखाई दे रही है। प्रदेश नेतृत्व पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि उम्मीदवार चयन का आधार केवल जीतने की क्षमता होगी और इसके लिए कई स्तरों पर सर्वे कराए जाएंगे। ऐसे में टिकट की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं को अभी से अनुशासन में रहने का संदेश दिया जा रहा है। भाजपा की रणनीति साफ हैकृपहले संगठन को एकजुट करना, फिर सरकार की उपलब्धियों को गांव-गांव तक पहुंचाना और अंत में चुनावी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतरना। पार्टी को लगता है कि यदि नाराज नेताओं को समय रहते मना लिया गया तो 2027 की राह अपेक्षाकृत आसान हो सकती है। लेकिन यदि असंतोष खुलकर सामने आया तो विपक्ष को भाजपा के खिलाफ बड़ा मुद्दा मिल सकता है। कुल मिलाकर उत्तराखंड भाजपा में इन दिनों चुनावी तैयारी के साथ-साथ मनाओ और साथ लाओ अभियान भी चल रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी अपने रूठे नेताओं को कितनी सफलता से मना पाती है और इसका असर 2027 के चुनावी समीकरणों पर कितना पड़ता है।

दून में खो गया ‘रिटायरमेंट पैराडाइज’

दम तोड़ रही दून घाटी, प्रदूषण, जाम और अपराध के साए में अपनों का शहर अपराध के ग्रहण ने छीना दून का पुराना गौरव और रिटायरमेंट सिटी का तमगा शिक्षा नगरी में अब बढ़ने लगा है खौफ, जीवन की गुणवत्ता को लेकर लोग चिंतित देहरादून। कभी अपनी शांत फिजाओं, हरियाली, साफ-सुथरे वातावरण और सुकून भरे जीवन के लिए पहचानी जाने वाली दून घाटी आज तेजी से बदल रही है। पहाड़ों की गोद में बसी यह खूबसूरत वादी अब बढ़ते अपराध, यातायात अव्यवस्था, अतिक्रमण, प्रदूषण और अनियोजित शहरीकरण जैसी समस्याओं से जूझ रही है, जिस दून को कभी रिटायरमेंट सिटी और शिक्षा नगरी कहा जाता था, वहां अब लोगों के बीच सुरक्षा और जीवन की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। राजधानी बनने के बाद देहरादून का तेजी से विस्तार हुआ। विकास की रफ्तार ने शहर को नई पहचान दी, लेकिन इसके साथ कई समस्याएं भी जन्म लेती गईं। आबादी बढ़ी, वाहनों की संख्या कई गुना बढ़ गई और शहर की सड़कों पर दबाव लगातार बढ़ता गया। सुबह और शाम के समय प्रमुख मार्गों पर लगने वाले लंबे जाम अब दूनवासियों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। दून घाटी की सबसे बड़ी पहचान उसकी हरियाली और प्राकृतिक सौंदर्य रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में लगातार हो रहे निर्माण कार्यों, पेड़ों की कटाई और कंक्रीट के जंगलों ने इस पहचान को चुनौती दी है। शहर के आसपास की कृकृषि भूमि और खुले क्षेत्र तेजी से कालोनियों में बदल रहे हैं। परिणामस्वरूप पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हो रहा है और भूजल स्तर पर भी दबाव बढ़ रहा है। सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, सामाजिक माहौल में भी बदलाव महसूस किया जा रहा है। कभी शांत और सुरक्षित माने जाने वाले शहर में अब चोरी, लूट, साइबर ठगी, नशे से जुड़े अपराध और आपराधिक घटनाओं की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। बाहरी राज्यों से बढ़ते पलायन और तेजी से बढ़ती आबादी के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी प्रशासन के लिए चुनौती बनता जा रहा है। शिक्षा और संस्कृति के लिए प्रसि( दून में आज युवा पीढ़ी के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। नशे का बढ़ता जाल, सोशल मीडिया से जुड़े अपराध और बदलती जीवनशैली समाज के लिए चिंता का विषय बन रहे हैं। कई सामाजिक संगठन और बु(िजीवी समय-समय पर इस मुद्दे पर चिंता जता चुके हैं। जानकार बताते हैं कि समस्या विकास की नहीं, बल्कि अनियोजित विकास की है। यदि समय रहते शहर के लिए दीर्घकालिक योजना नहीं बनाई गई तो दून घाटी अपनी मूल पहचान खो सकती है। यातायात सुधार, हरित क्षेत्रों का संरक्षण, जल स्रोतों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने जैसे कदम अब बेहद जरूरी हो गए हैं। दून की पहचान केवल राजधानी होने से नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, प्रकृति और शांत जीवनशैली से रही है। आज जरूरत इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उसी दून को देख सकें, जिसकी खूबसूरती और शांति कभी पूरे देश में मिसाल मानी जाती थी। दून घाटी के सामने खड़ी चुनौतियां केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं हैं। शहर के नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और समाज के हर वर्ग को मिलकर यह तय करना होगा कि विकास की दौड़ में दून अपनी आत्मा न खो दे। क्योंकि यदि दून की शांति और प्राकृतिक पहचान खत्म हो गई, तो केवल एक शहर नहीं, बल्कि उत्तराखंड की एक महत्वपूर्ण विरासत भी खो जाएगी।

‘मिक्सी’ के शोर में खो गया पहाड़ के ‘सिलबट्टे’ स्वाद

केवल भोजन का जरिया नहीं, बल्कि पहाड़ की विरासत और जीवंतता की पहचान थी रसोई भांग के बीज, लहसुन और हरी मिर्च के साथ सिलबट्टे पर पिसे नमक का स्वाद आज भी यादों में जिंदा आधुनिक दौर में भी हैं लोग पहाड़ के इस पारंपरिक और सेहतमंद स्वाद के मुरीद देहरादून। पहाड़ की रसोई केवल भोजन बनाने की जगह नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और स्वाद का संगम है। इस रसोई की पहचान रहे सिलबट्टे की खट-खट की आवाज आज भले कम सुनाई देती हो, लेकिन इसके स्वाद की चर्चा आज भी गांव से लेकर शहर तक होती है। पहाड़ के घरों में कभी हर दिन सिलबट्टे पर मसाले, नमक, लहसुन, हरी मिर्च और भांग के बीज पीसे जाते थे। इनसे बनने वाली चटनियों और व्यंजनों का स्वाद ऐसा होता था कि खाने वाला उंगलियां चाटता रह जाए। सिलबट्टा केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि पहाड़ की पाक परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा है। पहाड़ी महिलाएं सुबह-सुबह सिल पर मसाले पीसती थीं। मसालों के पिसने के साथ ही उनकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी। यही वजह थी कि पहाड़ के भोजन में एक अलग ही सोंधापन और प्राकृतिक स्वाद महसूस होता था। सिलबट्टे पर मसाले पीसने से उनमें मौजूद प्राकृतिक तेल और सुगंध बरकरार रहती है। मिक्सर की तेज गति से पैदा होने वाली गर्मी मसालों के स्वाद और खुशबू को कुछ हद तक प्रभावित कर देती है, जबकि सिलबट्टे पर धीरे-धीरे पिसे मसाले अपना मूल स्वाद बनाए रखते हैं। यही कारण है कि सिलबट्टे की चटनी और मिक्सर की चटनी के स्वाद में साफ अंतर महसूस होता है। उत्तराखंड की प्रसि( भांग की चटनी, तिल की चटनी, लहसुन-मिर्च का नमक और भांगजीरा से तैयार मसाले जब सिलबट्टे पर पिसते हैं तो उनमें एक अलग ही स्वाद पैदा होता है। पहाड़ के बुजुर्ग आज भी दावा करते हैं कि सिलबट्टे पर पिसी भांग की चटनी का मुकाबला कोई आधुनिक मशीन नहीं कर सकती। गांवों में आज भी कई घर ऐसे हैं जहां पारंपरिक व्यंजन बनाते समय सिलबट्टे का इस्तेमाल किया जाता है। शादी-ब्याह और विशेष अवसरों पर बनने वाले व्यंजनों के लिए लोग आज भी सिलबट्टे को प्राथमिकता देते हैं। इसका कारण केवल स्वाद नहीं, बल्कि उससे जुड़ी भावनाएं और पारंपरिक पहचान भी है। हालांकि बदलती जीवनशैली और समय की कमी के कारण सिलबट्टे की जगह मिक्सर ने ले ली है, लेकिन इसके बावजूद पहाड़ की नई पीढ़ी भी पारंपरिक स्वाद को पहचानने लगी है। कई लोग गांव जाने पर सिलबट्टे पर बनी चटनी और मसालों का स्वाद लेने की इच्छा रखते हैं। यही वजह है कि कुछ परिवारों ने आज भी अपनी रसोई में सिलबट्टे को संभालकर रखा हुआ है। सिलबट्टा पहाड़ की उस विरासत का प्रतीक है, जो बताती है कि स्वाद केवल मसालों में नहीं, बल्कि उन्हें तैयार करने की प्रक्रिया में भी छिपा होता है। आधुनिकता की दौड़ में भले सिलबट्टे की खट-खट धीमी पड़ गई हो, लेकिन उसके स्वाद की मिठास आज भी लोगों की यादों में जिंदा है।

उत्तराखंड में ‘मोदी ब्रांड’ के सहारे भाजपा

उत्तराखंड में भाजपा ने गांव-गांव तक पहुंचा दिया चुनावी संदेश भाजपा की प्रदेश में मोदी लहर को फिर से बनाने की है कवायद मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने पर प्रदेशभर में हो रहे हैं कार्यक्रम मंत्री, विधायक और संगठन पदाधिकारी जिलों में कर रहे जनसंपर्क लाभार्थी सम्मेलनों के जरिए वोटरों तक पहुंचने की बनी है रणनीति विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर चुनावी माहौल बनाने की कोशिश देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूरे होने को एक बड़े राजनीतिक अभियान में बदल चुकी है। प्रदेश के हर जिले में कार्यक्रम आयोजित कर भाजपा न केवल केंद्र सरकार की उपलब्धियां गिना रही है, बल्कि 2027 के चुनाव के लिए माहौल बनाने की कोशिश भी कर रही है। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री, सांसद, विधायक, जिला प्रभारी और संगठन के पदाधिकारी लगातार जिलों का दौरा कर रहे हैं। जनसभाएं, संवाद कार्यक्रम, लाभार्थी सम्मेलन, चौपाल और प्रेस वार्ताओं के माध्यम से भाजपा जनता के बीच यह संदेश देने में जुटी है कि उत्तराखंड के विकास की कहानी प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व से जुड़ी हुई है। भाजपा की रणनीति का केंद्र बिंदु मोदी ब्रांड है। पार्टी अच्छी तरह जानती है कि उत्तराखंड में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता आज भी उसके सबसे मजबूत राजनीतिक हथियारों में से एक है। केदारनाथ धाम से प्रधानमंत्री मोदी का भावनात्मक जुड़ाव, चारधाम परियोजनाओं में केंद्र की भूमिका और सीमांत क्षेत्रों के विकास को भाजपा चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बना रही है। भाजपा का सबसे बड़ा फोकस उन लाखों लोगों पर है जो केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं से लाभान्वित हुए हैं। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, किसान सम्मान निधि, हर घर जल और मुफ्त राशन जैसी योजनाओं के लाभार्थियों को पार्टी अपने सबसे मजबूत समर्थक वर्ग के रूप में देख रही है। संगठन की ओर से बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए गए हैं कि वह लाभार्थियों से संपर्क करें और उन्हें केंद्र सरकार की योजनाओं की जानकारी के साथ-साथ भाजपा की नीतियों से जोड़ें। यही कारण है कि हाल के कार्यक्रमों में लाभार्थी सम्मेलन प्रमुख आकर्षण बने हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अभी से चुनावी विमर्श अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास कर रही है। पार्टी चाहती है कि 2027 का चुनाव स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी, पलायन और महंगाई जैसे मुद्दों के बजाय विकास, राष्ट्रवाद और मोदी नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमे। भाजपा नेताओं के भाषणों में लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि उत्तराखंड में सड़क, रेल, स्वास्थ्य और धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य हुए हैं। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, ऑल वेदर रोड, केदारनाथ पुनर्निर्माण, मानसखंड मंदिर माला मिशन और सीमांत गांवों के विकास को उपलब्धियों के रूप में गिनाया जा रहा है। भाजपा प्रदेश में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यों को भी प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों से जोड़कर प्रस्तुत कर रही है। समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, सख्त भू-कानून और निवेश को बढ़ावा देने जैसे फैसलों को डबल इंजन सरकार की सफलता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। पार्टी नेतृत्व मानता है कि यदि केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियों को एक साथ जनता के सामने रखा जाए तो इसका राजनीतिक लाभ 2027 में मिल सकता है। भाजपा के इस व्यापक अभियान ने कांग्रेस की चिंता भी बढ़ा दी है। कांग्रेस लगातार बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और भर्ती घोटालों जैसे मुद्दों को उठाकर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रही है। लेकिन भाजपा की कोशिश है कि चुनावी बहस को राष्ट्रीय नेतृत्व और विकास के मुद्दों पर केंद्रित रखा जाए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत संगठन और मोदी की लोकप्रियता है, जबकि कांग्रेस अभी भी संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व के सवालों से जूझती दिखाई देती है। भाजपा के कार्यक्रमों की श्रृंखला को राजनीतिक गलियारों में विधानसभा चुनाव 2027 के लिए शुरुआती चुनावी अभियान के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जा रहा है, बूथ समितियों को मजबूत बनाया जा रहा है और सोशल मीडिया के माध्यम से युवा मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति पर काम चल रहा है। स्पष्ट है कि भाजपा उत्तराखंड में 2027 की चुनावी लड़ाई को केवल राज्य सरकार के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रखना चाहती। पार्टी का पूरा जोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल, केंद्र सरकार की योजनाओं और राष्ट्रीय नेतृत्व की छवि को चुनावी मुद्दा बनाने पर है। आने वाले महीनों में यह अभियान और तेज होने की संभावना है, क्योंकि भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतर चुकी है।

पहाड़ की मिट्टी का वरदान है ‘चौलाई’

पहाड़ की पारंपरिक फसल में छिपा है सेहत का खजाना चौलाई को बाजार मिला तो बदल जाएंगी किसानों की तस्वीर आज दुनियाभर में सुपरफूड के रूप में बढ़ रही इसकी पहचान देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में यदि किसी फसल ने सदियों से लोगों की भूख मिटाने के साथ-साथ उन्हें ताकत और सेहत भी दी है, तो वह है चौलाई। कभी गांवों के खेतों में आमतौर पर उगाई जाने वाली यह पारंपरिक फसल आज सुपरफूड के रूप में दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस चौलाई को पहाड़ के लोग वर्षों से खाते आ रहे हैं, उसकी असली कीमत अब दुनिया समझने लगी है। पहाड़ की सीढ़ीनुमा खेती में उगने वाली चौलाई केवल एक अनाज नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रही है। बदलते समय के साथ भले ही लोगों की खान-पान की आदतें बदल गई हों, लेकिन चौलाई का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। गढ़वाल और कुमाऊं के अधिकांश क्षेत्रों में चौलाई की खेती वर्षों से होती रही है। कम पानी और कम संसाधनों में तैयार होने वाली यह फसल पहाड़ के किसानों के लिए हमेशा भरोसेमंद रही है। बरसात के मौसम में बोई जाने वाली चौलाई शरद )तु तक तैयार हो जाती है। पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले लगभग हर गांव में चौलाई के खेत दिखाई देते थे। घरों में इसकी रोटी बनती थी, लड्डू बनाए जाते थे और धार्मिक आयोजनों में भी इसका विशेष महत्व होता था। विशेषज्ञों के अनुसार चौलाई में प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, फाइबर और कई आवश्यक खनिज तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे आज सुपरफूड की श्रेणी में रखा जा रहा है। पहाड़ के लोगों का मानना है कि चौलाई शरीर को ताकत देने के साथ-साथ लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखती है। खेतों में दिनभर काम करने वाले लोग चौलाई की रोटी और अन्य व्यंजन खाकर कठिन श्रम करते थे। आज जब लोग मोटे अनाजों और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की ओर लौट रहे हैं, तब चौलाई की मांग लगातार बढ़ रही है। उत्तराखंड के गांवों में चौलाई का नाम आते ही सबसे पहले चौलाई के लड्डू याद आते हैं। गुड़ के साथ तैयार किए जाने वाले ये लड्डू केवल स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि पौष्टिक भी होते हैं। मेले, त्योहार और धार्मिक आयोजनों में चौलाई के लड्डुओं की विशेष मांग रहती है। बचपन की यादों में आज भी गांव के बुजुर्ग चौलाई के मीठे लड्डुओं का स्वाद महसूस करते हैं। पहाड़ों से बढ़ते पलायन का असर चौलाई की खेती पर भी पड़ा है, जिन खेतों में कभी चौलाई लहलहाती थी, उनमें से कई आज बंजर पड़े हैं। खेती से युवाओं के दूर होने और बाजार की कमी के कारण चौलाई का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। हालांकि सरकार और विभिन्न संस्थाएं मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर रही हैं। किसानों को चौलाई की व्यावसायिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि उनकी आय बढ़ सके। आज चौलाई केवल गांवों तक सीमित नहीं है। बड़े शहरों से लेकर विदेशों तक इसकी मांग बढ़ रही है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग चौलाई का आटा, लड्डू, कुकीज और अन्य उत्पाद पसंद कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उत्तराखंड के किसान वैज्ञानिक तरीके से चौलाई की खेती करें और बेहतर बाजार उपलब्ध हो तो यह फसल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। चौलाई उत्तराखंड की उस समृ( विरासत का प्रतीक है, जिसने सदियों तक पहाड़ के लोगों को पोषण और ऊर्जा दी। आधुनिक जीवनशैली में जब लोग प्राकृतिक और पौष्टिक भोजन की तलाश कर रहे हैं, तब चौलाई एक बार फिर लोगों की थाली में सम्मान के साथ लौट रही है। यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि पहाड़ की मेहनत, आत्मनिर्भरता और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली की कहानी है। चौलाई के हर दाने में उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू और पहाड़ के लोगों के संघर्ष की गाथा छिपी हुई है।

शनिवार, 13 जून 2026

‘मीडिया संवाद में संवाद गायब’

सवालों से दूरी या संवाद का नया माडल, भाजपा मुख्यालय के मीडिया संवाद पर उठे सवाल पत्रकारों को बुलाया, उपलब्धियां सुनाई, राष्ट्रगान और कार्यक्रम समाप्त, कोई सवाल-जवाब नहीं भाजपा मुख्यालय में आयोजित संवाद पर छिड़ी बहस, कांग्रेस बोली-प्रेस कान्फ्रेंस या प्रस्तुति सभा देहरादून। दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के प्रदेश मुख्यालय में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम अब राजनीतिक और पत्रकारिता जगत में चर्चा का विषय बन गया है। कार्यक्रम में पत्रकारों को आमंत्रित तो किया गया, लेकिन जिस तरह पूरा आयोजन संचालित हुआ, उसने संवाद और प्रेस कान्फ्रेंस की परंपराओं को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् से हुई। इसके बाद मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के 12 वर्षों के कार्यकाल की उपलब्धियों को विस्तार से रखा। केंद्र सरकार की योजनाओं, विकास कार्यों और उपलब्धियों पर करीब एक घंटे तक प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान हुआ और आयोजन समाप्त घोषित कर दिया गया। लेकिन पूरे कार्यक्रम के दौरान सबसे अधिक जिस बात की चर्चा रही, वह थी पत्रकारों के सवालों के लिए मंच का न खुलना। आमतौर पर मीडिया संवाद या प्रेस वार्ता का उद्देश्य पत्रकारों और सत्ता पक्ष के बीच प्रत्यक्ष संवाद माना जाता है, जहां पत्रकार जनहित से जुड़े प्रश्न पूछते हैं और सरकार या संगठन अपना पक्ष रखता है। लेकिन इस आयोजन में संवाद की जगह एकतरफा प्रस्तुति देखने को मिली। राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि पत्रकारों को केवल उपलब्धियां सुनाने के लिए बुलाया जाए और उनसे सवाल पूछने का अवसर ही न दिया जाए, तो ऐसे कार्यक्रम का स्वरूप मीडिया संवाद कम और प्रचार कार्यक्रम अधिक प्रतीत होता है। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका केवल सूचना ग्रहण करने की नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगने की भी होती है। पत्रकार जनता की ओर से सवाल पूछते हैं और यही प्रक्रिया लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत बनाती है। ऐसे में सवाल-जवाब का अभाव स्वाभाविक रूप से बहस को जन्म देता है। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि सरकार और संगठन अपने कामकाज को लेकर आश्वस्त हैं तो उन्हें पत्रकारों के सवालों से परहेज नहीं होना चाहिए। विपक्ष इसे संवाद से अधिक एकतरफा संप्रेषण की संज्ञा दे रहा है। हालांकि भाजपा नेताओं का तर्क है कि कार्यक्रम का उद्देश्य प्रधानमंत्री के कार्यकाल की उपलब्धियों को साझा करना था और यह एक विशेष प्रस्तुति थी, न कि पारंपरिक प्रेस कान्फ्रेंस। पार्टी का कहना है कि मीडिया के साथ नियमित रूप से संवाद और प्रेस वार्ताएं होती रहती हैं। फिर भी देहरादून में हुए इस आयोजन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या राजनीति में मीडिया संवाद का स्वरूप बदल रहा है? क्या प्रेस कान्फ्रेंस अब सवालों और जवाबों का मंच कम और उपलब्धियों के प्रस्तुतीकरण का माध्यम अधिक बनती जा रही हैं? लोकतंत्र में प्रेस और सत्ता के रिश्ते की मजबूती सवाल पूछने और जवाब देने की संस्कृति पर टिकी होती है। ऐसे में भाजपा मुख्यालय का यह आयोजन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मीडिया और राजनीति के बदलते संबंधों पर नई बहस की शुरुआत भी बन गया है।