गुरुवार, 24 सितंबर 2026

udaydinmaan: उत्तराखंड में चुनावी उल्टी गिनती शुरू

udaydinmaan: उत्तराखंड में चुनावी उल्टी गिनती शुरू: मिशन-2027 के लिए बूथ तक पहुंच गई है भाजपा कांग्रेस ने भी तेज की सरकार को घेरने की कवायद देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की उल्ट...

उत्तराखंड में चुनावी उल्टी गिनती शुरू

मिशन-2027 के लिए बूथ तक पहुंच गई है भाजपा कांग्रेस ने भी तेज की सरकार को घेरने की कवायद देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। चुनाव आयोग की घोषणा अभी बाकी है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनावी मौसम दस्तक दे चुका है। सत्ता की हैट्रिक के लक्ष्य के साथ भाजपा संगठन को बूथ से लेकर घर तक सक्रिय करने में जुटी है, तो कांग्रेस सरकार के कामकाज, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था और जनसरोकारों के मुद्दों को लेकर मैदान तैयार कर रही है। विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल मार्च 2027 में पूरा होना है। सामान्य चुनावी कार्यक्रम के हिसाब से इससे पहले मतदान होना है। फिलहाल समय से पहले चुनाव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में आने वाले महीने दोनों प्रमुख दलों के लिए संगठन, मुद्दों और उम्मीदवारों की जमीन तैयार करने के लिहाज से निर्णायक होंगे। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। पार्टी ने बूथ सशक्तीकरण, शक्ति केंद्रों की बैठक और घर-घर संपर्क जैसे कार्यक्रमों को गति दी है। सितंबर में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उत्तराखंड दौरे के दौरान भी संगठन और आगामी चुनाव की रणनीति पर मंथन हुआ। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने का नहीं, बल्कि सत्ता में लगातार दो कार्यकाल के बाद स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाली नाराजगी और अपेक्षाओं को साधने का भी होगा। पार्टी विकास, सांस्कृतिक पहचान और सरकार के फैसलों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस भी अब चुनावी तैयारी को गति दे रही है। प्रदेश संगठन को मजबूत करने, मोर्चों और विभागों को सक्रिय करने तथा राज्यभर में जनसंपर्क बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महिला सुरक्षा और सरकार के कामकाज को प्रमुख मुद्दों के रूप में उठा रहा है। राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के प्रस्तावित दौरों से भी कांग्रेस चुनावी माहौल को गर्म करने की तैयारी में है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि सरकार विरोधी मुद्दों को केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित न रखते हुए उन्हें बूथ स्तर के संगठन और स्थानीय नेतृत्व के साथ किस तरह जोड़ा जाए। 2027 का चुनाव केवल सत्ता और विपक्ष की पारंपरिक लड़ाई तक सीमित रहने के संकेत नहीं दे रहा। उत्तराखंड में भू-कानून, मूल निवास, पलायन, रोजगार, भर्ती परीक्षाएं, महिला सुरक्षा, चारधाम और पर्यटन, ग्रामीण सड़कें, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा राज्य की सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दे पहले ही राजनीतिक विमर्श में जगह बना चुके हैं। हल्द्वानी रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच हुआ विवाद भी राजनीतिक टकराव का हिस्सा बन चुका है। इस मुद्दे को लेकर दोनों दलों की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आई हैं। भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई के बावजूद क्षेत्रीय और छोटे दलों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड क्रांति दल समेत अन्य राजनीतिक संगठन अपने-अपने मुद्दों के साथ चुनावी जमीन तलाश रहे हैं। कई सीटों पर तीसरे विकल्प की मौजूदगी मुकाबले का गणित प्रभावित कर सकती है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, टिकटों को लेकर दलों के भीतर दावेदारियों का दबाव बढ़ेगा। मौजूदा विधायकों का प्रदर्शन, स्थानीय संगठन की स्थिति, जातीय-सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय असंतोष और जीत-हार का पिछला रिकार्ड टिकट वितरण में महत्वपूर्ण कारक बन सकते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ और मैदान का संतुलन हमेशा अहम रहा है। कुमाऊं और गढ़वाल के साथ मैदानी जिलों की राजनीतिक प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं। ऐसे में कोई भी दल केवल राज्यव्यापी नारे के सहारे चुनावी गणित नहीं साध सकता। चुनावी शंखनाद चाहे दल कर रहे हों, अंतिम फैसला मतदाता को करना है। आने वाले महीनों में राजनीतिक दल अपने-अपने दावे जनता के सामने रखेंगे। भाजपा अपने कार्यकाल और नीतियों का हिसाब देगी, कांग्रेस सरकार की कमियां गिनाएगी और क्षेत्रीय दल अपने मुद्दों को केंद्र में लाने की कोशिश करेंगे। अब उत्तराखंड की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू हो चुका हैकृदावों से ज्यादा उनके प्रमाण, नारों से ज्यादा जमीन पर काम और आरोपों से ज्यादा जनता के सवालों का जवाब। 2027 का चुनाव अभी दूर दिखाई देता है, लेकिन उसकी राजनीतिक घड़ी चल पड़ी है। अब हर बूथ पर सवाल होगा, हर सीट पर गणित होगा और हर दल को अपने दावों का हिसाब जनता के सामने रखना होगा।

उत्तराखंड बीजेपी का नया नेतृत्व

विधानसभा चुनाव-2027 की तैयारी के बीच बदली भाजपा की टीम रण से पहले भाजपा ने बदली टीम, उत्तराखंड में राम माधव की एंट्री दुष्यंत गौतम की विदाई, बांसुरी स्वराज व अरविंद मेनन बने सह-प्रभारी चुनावी तैयारी के बीच संगठन में बदलाव के कई मायने तलाशे जा रहे देहरादून। विधानसभा चुनाव-2027 की उल्टी गिनती के बीच भाजपा ने उत्तराखंड संगठन में बड़ा फेरबदल किया है। पार्टी ने लंबे समय से प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे दुष्यंत गौतम को हटाकर वरिष्ठ नेता राम माधव को उत्तराखंड का नया प्रभारी बनाया है। इसके साथ ही सांसद बांसुरी स्वराज और वरिष्ठ नेता अरविंद मेनन को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। नई नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से लागू होंगी। भाजपा का यह बदलाव ऐसे समय हुआ है, जब उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के लिए संगठनात्मक तैयारियां तेज हो चुकी हैं। लिहाजा नई प्रभारी टीम की तैनाती को केवल सामान्य संगठनात्मक फेरबदल के बजाय चुनावी तैयारियों के अगले चरण से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, पार्टी ने नियुक्तियों के पीछे कोई विस्तृत कारण सार्वजनिक नहीं किया है। दुष्यंत गौतम करीब छह वर्ष तक उत्तराखंड भाजपा के प्रभारी रहे। उनके कार्यकाल में पार्टी ने कई संगठनात्मक और राजनीतिक गतिविधियां संचालित कीं। हालांकि, हाल के समय में उनके नाम को लेकर राज्य की राजनीति में विवाद भी सामने आए। विशेष रूप से अंकिता भंडारी प्रकरण से संबंधित सोशल मीडिया सामग्री को लेकर विवाद हुआ था। गौतम ने इन आरोपों को खारिज किया था और कानूनी कार्रवाई भी की थी। ऐसे में उनकी जगह बदलाव को लेकर राजनीतिक चर्चाएं स्वाभाविक हैं, लेकिन भाजपा ने आधिकारिक रूप से इसे विवादों से जोड़कर कोई कारण नहीं बताया है। अब पार्टी ने राम माधव को उत्तराखंड की कमान सौंपी है। राम माधव भाजपा के वरिष्ठ संगठनात्मक नेताओं में रहे हैं और इससे पहले जम्मू-कश्मीर सहित विभिन्न राजनीतिक-संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। अगस्त 2026 में उन्हें भाजपा की राष्ट्रीय टीम में उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली थी। उत्तराखंड के साथ उन्हें तमिलनाडु की संगठनात्मक जिम्मेदारी भी दी गई है। प्रभारी के साथ सह-प्रभारियों की टीम भी बदल दी गई है। बांसुरी स्वराज और अरविंद मेनन को उत्तराखंड का सह-प्रभारी बनाया गया है। इससे पहले रेखा वर्मा यह जिम्मेदारी संभाल रही थीं। नई व्यवस्था में रेखा वर्मा को मध्य प्रदेश का सह-प्रभारी बनाया गया है। बांसुरी स्वराज दिल्ली से भाजपा सांसद हैं और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। वहीं अरविंद मेनन लंबे समय से भाजपा के संगठनात्मक कामकाज से जुड़े रहे हैं। नई टीम में एक ओर वरिष्ठ संगठनात्मक अनुभव है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े नए चेहरे को उत्तराखंड में जिम्मेदारी दी गई है। 2027 का चुनाव नई प्रभारी टीम के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा होगा। उसके सामने सरकार और संगठन के बीच समन्वय, बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय रखना, कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को साधना और चुनावी मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाना जैसी चुनौतियां होंगी। इसके साथ ही टिकट वितरण से पहले पार्टी के भीतर दावेदारियों का दबाव भी बढ़ेगा। मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन, स्थानीय संगठन की स्थिति, क्षेत्रीय समीकरण और संभावित प्रत्याशियों की स्वीकार्यता जैसे मुद्दे नई टीम के सामने होंगे। उत्तराखंड में पहाड़ और मैदान की अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए संगठन के लिए क्षेत्रीय संतुलन भी महत्वपूर्ण होगा। गढ़वाल, कुमाऊं और मैदानी जिलों की राजनीतिक प्राथमिकताओं को एक चुनावी रणनीति में पिरोना नई टीम की अहम जिम्मेदारी होगी। भाजपा पहले ही संगठनात्मक बैठकों, बूथ स्तर की तैयारियों और जनसंपर्क गतिविधियों को तेज कर चुकी है। ऐसे समय में केंद्रीय नेतृत्व की नई टीम की तैनाती का अर्थ यह भी है कि चुनावी तैयारियों की निगरानी के लिए संगठन के शीर्ष स्तर से उत्तराखंड पर फोकस बढ़ा है। अब देखना यह होगा कि राम माधव के नेतृत्व वाली नई टीम प्रदेश संगठन, सरकार और कार्यकर्ताओं के बीच किस तरह तालमेल बनाती है और आने वाले महीनों में भाजपा की चुनावी रणनीति किस रूप में सामने आती है। प्रभारी बदला है, सह-प्रभारी बदले हैंकृअब नजर इस पर होगी कि क्या भाजपा की चुनावी रणनीति भी उसी अनुपात में बदलेगी। 2027 के रण में संगठन की यह नई टीम कितनी निर्णायक भूमिका निभाती है, इसका जवाब आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति देगी।

बुधवार, 23 सितंबर 2026

udaydinmaan: सर्वे की ‘चमक’ और जमीन की ‘हकीकत’

udaydinmaan: सर्वे की ‘चमक’ और जमीन की ‘हकीकत’: एक मीडिया सर्वे में भाजपा आगे, जमीन पर सवाल बरकरार 2027 से पहले आंकड़ों ने बढ़ाया भाजपा का आत्मविश्वास लेकिन रोजगार, पलायन और भर्ती जैसे सवाल ...

सर्वे की ‘चमक’ और जमीन की ‘हकीकत’

एक मीडिया सर्वे में भाजपा आगे, जमीन पर सवाल बरकरार 2027 से पहले आंकड़ों ने बढ़ाया भाजपा का आत्मविश्वास लेकिन रोजगार, पलायन और भर्ती जैसे सवाल अब भी सामने देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक सर्वेक्षणों की बाढ़ आ गई है। अधिकांश चर्चित सर्वे भाजपा को बढ़त दिखा रहे हैं। कहीं भाजपा को स्पष्ट बहुमत के करीब बताया जा रहा है तो कहीं उसे 50 से अधिक सीटों का अनुमान दिया जा रहा है। भाजपा भी इन आंकड़ों को अपने पक्ष में माहौल का प्रमाण बता रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सर्वे की यह चमक उत्तराखंड की जमीन पर भी उतनी ही दिखाई दे रही है? एक सर्वे में भाजपा को 54 और कांग्रेस को 14 सीटों का अनुमान लगाया गया है। वहीं दूसरे सर्वे में दोनों दलों के बीच मत-समर्थन का अंतर काफी कम बताया गया। आंकड़ों का यह अंतर खुद बता रहा है कि चुनाव से कई महीने पहले किए गए सर्वे को अंतिम राजनीतिक सच्चाई मानना जोखिम भरा है। सवाल सरकार से भी है और सर्वे करने वालों से भी। यदि भाजपा के पक्ष में इतना मजबूत जनमत है तो पहाड़ के गांवों से लेकर शहरों तक रोजगार, सरकारी भर्तियों, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, भू-कानून और मूल निवास जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में क्यों हैं? यदि सरकार की नीतियों को लेकर व्यापक संतोष है तो विपक्ष को लगातार इन मुद्दों पर सरकार को घेरने का अवसर क्यों मिल रहा है? यहां सरकार के सामने एक दूसरा पक्ष भी है। सत्ता में रहने का अर्थ केवल योजनाओं और उपलब्धियों की सूची पेश करना नहीं, बल्कि जनता के रोजमर्रा के सवालों का जवाब देना भी है। उत्तराखंड का मतदाता सड़क, रोजगार, स्कूल और अस्पताल को आंकड़ों से नहीं, अपने अनुभव से मापता है। भाजपा संगठन और चुनावी तैयारी में काफी आगे दिखाई देती है। बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने की कोशिश, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और लगातार राजनीतिक कार्यक्रम पार्टी को चुनावी मशीनरी के स्तर पर बढ़त दे सकते हैं। लेकिन संगठन की ताकत और मतदाता की संतुष्टि एक ही चीज नहीं हैं। सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास के सरकारी दावों का लाभ आम मतदाता को उतना महसूस हो रहा है, जितना सरकारी प्रचार में दिखाई देता है? भर्ती परीक्षाओं और युवाओं के रोजगार से जुड़े विवाद, पहाड़ों में पलायन, बंद होते स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और आपदा के बाद पुनर्निर्माण जैसे सवाल किसी सर्वे की एक पंक्ति से खत्म नहीं होते। इनका जवाब जमीन पर चाहिए। भाजपा के लिए सर्वे निश्चित रूप से राजनीतिक राहत का संदेश हैं। लेकिन यही आंकड़े पार्टी के सामने एक चुनौती भी रखते हैं। यदि चुनाव तक यही बढ़त कायम रहती है तो उसे वास्तविक मतों में बदलना होगा। टिकट वितरण, स्थानीय उम्मीदवारों के प्रति नाराजगी, क्षेत्रीय समीकरण और सरकार के प्रति स्थानीय असंतोष कई सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं। कांग्रेस के लिए भी तस्वीर आसान नहीं है। केवल सरकार विरोधी मुद्दे गिनाने से चुनावी मुकाबला नहीं बनता। उसे संगठन, प्रत्याशी और स्थानीय मुद्दों को मतदाताओं के भरोसे में बदलना होगा। राजनीतिक दल सर्वे के आंकड़ों को अपने-अपने पक्ष में पढ़ सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम कसौटी सर्वे नहीं, मतदाता है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह सर्वे की बढ़त के भरोसे सवालों को हल्का न समझे। क्योंकि सत्ता के गलियारों में लोकप्रियता का दावा और गांव की चौपाल पर जनता का अनुभवकृदोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते। 2027 की लड़ाई अभी बाकी है। फिलहाल सर्वे भाजपा को आगे दिखा रहे हैं, लेकिन उत्तराखंड के सामने सवालों की लंबी सूची भी खड़ी है। इन सवालों का जवाब आंकड़ों से नहीं, सरकार के काम और जनता के अनुभव से तय होगा। सर्वे चाहे जिस दिशा में इशारा करें, अंतिम सवाल यही रहेगाकृक्या सरकार के दावे मतदाता के अनुभव से भी मेल खाते हैं?

‘स्ट्रांग रूम’ बना सियासी रणभूमि

बेहड़ को थप्पड़ के आरोप से किच्छा की राजनीति में भूचाल पूर्व विधायक शुक्ला और कांग्रेस विधायक बेहड़ आमने-सामने पुलिस के सामने हाथापाई के आरोप, दोनों पर कार्रवाई का दबाव देहरादून। नगर निकाय चुनाव में मतपेटियों की सुरक्षा के लिए बनाया गया स्ट्रांग रूम मंगलवार को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निगरानी का केंद्र बनने के बजाय सियासी टकराव का अखाड़ा बन गया। कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ और भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के समर्थकों के बीच विवाद इतना बढ़ा कि हाथापाई की नौबत आ गई। बेहड़ ने आरोप लगाया कि शुक्ला के साथ मौजूद एक युवक ने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में उन्हें थप्पड़ मारा। घटना के बाद किच्छा की सियासत गरमा गई और दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। विवाद की शुरुआत स्ट्रांग रूम के बाहर लगाए गए पर्दे को लेकर हुई। बेहड़ ने इसकी पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए आपत्ति दर्ज कराई। इसी दौरान पूर्व विधायक राजेश शुक्ला समर्थकों के साथ मौके पर पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच कहासुनी शुरू हुई और देखते ही देखते माहौल तनावपूर्ण हो गया। आरोप है कि इसी दौरान शुक्ला के साथ आए एक समर्थक ने बेहड़ के साथ धक्का-मुक्की की और उन्हें थप्पड़ मारा। मामला यहीं नहीं रुका। दोनों पक्षों के समर्थक आमने-सामने आ गए। पुलिस और अधिकारियों ने बीच-बचाव किया, लेकिन तनाव इतना बढ़ गया कि पुलिस को भीड़ हटाने के लिए लाठियां फटकारनी पड़ीं। बाद में पुलिस ने पूर्व विधायक राजेश शुक्ला को हिरासत में लिया। धरने पर बैठे विधायक बेहड़ को भी पुलिस अपने साथ कोतवाली ले गई। देर शाम दोनों को छोड़े जाने की जानकारी सामने आई। इस पूरे घटनाक्रम ने किच्छा की पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को फिर सामने ला दिया है। बेहड़ और शुक्ला के बीच राजनीतिक टकराव नया नहीं है और दोनों के बीच पुरानी तनातनी का जिक्र स्थानीय रिपोर्टों में भी सामने आया है। लेकिन इस बार विवाद की गंभीरता इसलिए बढ़ गई कि मामला चुनावी प्रक्रिया से जुड़े स्ट्रांग रूम के बाहर हुआ और आरोप पुलिस-प्रशासन की मौजूदगी में मारपीट तक पहुंचने का है। सवाल केवल यह नहीं है कि थप्पड़ किसने मारा, बल्कि यह भी है कि चुनावी प्रक्रिया की संवेदनशील जगह पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच तनाव इस स्तर तक कैसे पहुंचा? बेहड़ ने घटना पर कार्रवाई की मांग करते हुए पुलिस को तहरीर देने की बात कही है। वहीं पुलिस ने उपलब्ध साक्ष्यों और सीसीटीवी के आधार पर कार्रवाई की बात कही है। किच्छा का यह घटनाक्रम अब केवल दो नेताओं की भिड़ंत नहीं रह गया है। यह कांग्रेस और भाजपा के स्थानीय शक्ति-संतुलन, राजनीतिक वर्चस्व और चुनावी मर्यादा पर भी सवाल खड़े कर रहा है। मतपेटियां स्ट्रांग रूम में पहुंच चुकी हैं, लेकिन किच्छा की सियासत का तापमान अभी नीचे आता नहीं दिख रहा।

सियासी जंग की ‘नई फाइल’

उत्तराखंड की सियासत विकास के दावों से दाग तक सिमट रही है अब जंग दूसरों पर आरोप लगाने से पहले अपना हिसाब देखे 2027 से पहले आरोपों की सियासत ने पकड़ा जोर किसके दामन में कितने दाग के सवाल तक पहुंचा देहरादून। उत्तराखंड में 2027 का चुनाव अभी सामने नहीं आया, लेकिन सियासी बारूद बिछना शुरू हो गया है। कांग्रेस सरकार पर सवाल दाग रही है और भाजपा अब सवालों का जवाब देने के बजाय कांग्रेस के राजनीतिक अतीत की फाइलें खोलने में जुट गई है। इसी क्रम में भाजपा ने कांग्रेस पर ऐसा तंज कसा है, जिसने सियासी बहस को सरकार के कामकाज से उठाकर किसके दामन में कितने दाग के सवाल तक पहुंचा दिया है। भाजपा ने व्यंग्य करते हुए कहा कि लगता है कांग्रेस नेता अपने ही ऊपर लगे आरोपों की चार्जशीट लेकर घूम रहे हैं। एक लाइन का यह तंज दरअसल 2027 की राजनीति की बदलती भाषा का संकेत है। कांग्रेस सरकार से हिसाब मांग रही है तो भाजपा पलटकर कांग्रेस से उसके पुराने हिसाब का जवाब मांग रही है। यानी चुनावी मैदान में अब आरोपों की फाइल बनाम उपलब्धियों की फाइल खुलने लगी है। कांग्रेस की ओर से सरकार पर लगातार कई मुद्दों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। रोजगार, भर्ती, महंगाई, पलायन और जनहित से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष सरकार को घेर रहा है। भाजपा का जवाब हैकृसिर्फ सरकार पर उंगली उठाने से राजनीति की जवाबदेही पूरी नहीं होती। विपक्ष को अपने नेताओं और अपने कार्यकाल से जुड़े सवालों का भी जवाब देना चाहिए। यानी भाजपा ने कांग्रेस के हमले की दिशा बदलने की कोशिश की है। सवाल सरकार से था, जवाब कांग्रेस के अतीत की तरफ मोड़ दिया गया। राजनीतिक दल चुनाव से पहले जनता के सामने अपनी-अपनी कहानी रखने की तैयारी में हैं। भाजपा अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को मुद्दा बनाएगी, जबकि कांग्रेस सरकार की कमियों और जनता से जुड़े सवालों को केंद्र में रखने की कोशिश करेगी। लेकिन भाजपा के ताजा हमले से साफ है कि चुनावी मुकाबला केवल विकास और योजनाओं तक सीमित रहने वाला नहीं है। पुराने विवाद, नेताओं के बयान और एक-दूसरे के कार्यकाल का रिकार्ड भी चुनावी हथियार बन सकता है। यही राजनीति का वह मोड़ है जहां सवाल बदलते देर नहीं लगती कि किसने क्या किया से लेकर किसने क्या किया था तक। इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जनता के सवाल हैं। उत्तराखंड का युवा रोजगार और भर्ती चाहता है। पहाड़ पलायन और बुनियादी सुविधाओं का जवाब मांगता है। किसान, कर्मचारी, व्यापारी और आम परिवार अपनी-अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद करता है। ऐसे में राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जितना तेज होगा, उतना ही बड़ा सवाल यह रहेगा कि क्या चुनावी बहस जनता के वास्तविक मुद्दों पर टिकेगी या फिर एक-दूसरे की राजनीतिक चार्जशीट पढ़ने में ही पूरा चुनाव निकल जाएगा? भाजपा का चार्जशीट वाला तंज इस बात का संकेत है कि 2027 की लड़ाई में राजनीतिक हमले और धारदार होने वाले हैं। कांग्रेस सरकार के पांच साल का हिसाब मांगेगी तो भाजपा कांग्रेस के पुराने रिकार्ड का हिसाब सामने रखेगी। आगे यह टकराव किस स्तर तक जाएगा, यह आने वाले महीनों में साफ होगा। फिलहाल दोनों दलों ने अपनी-अपनी राजनीतिक तलवारें निकाल ली हैं। अब मुकाबला सिर्फ कौन सही का नहीं, बल्कि कौन किसका हिसाब खोलता है का भी है और उत्तराखंड की जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा।

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

udaydinmaan: भाजपा फिर ‘नमो फैक्टर’ के भरोसे

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udaydinmaan: कांग्रेस में ‘उत्साह’ भाजपा में ‘बेचैनी’: हरदा बनाम भाजपा, या कांग्रेस के भीतर भी एक संदेश उत्तराखंड में चुनावी दहलीज पर पुराने चेहरे की वापसी हरदा के स्वागत में शक्ति प्रदर्शन या का...

भाजपा के भीतर खिंची ‘लकीरें’

चकराता के लोगों को सदस्यता दिलाने पहुंचे नेता लौटे बैरंग एक दिन पहले किया प्रदर्शन, अगले दिन ज्वाइनिंग पर रोक चुनावी साल में संगठन बनाम स्थानीय समीकरण की परीक्षा मैं तो सस्ता आदमी हूं कहकर सवाल टाल गए मंत्री खजान दास देहरादून। चुनावी साल में भाजपा एक तरफ संगठन की मजबूती और 2027 में भारी बहुमत से सत्ता में वापसी के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ चकराता प्रकरण ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को सार्वजनिक मंच पर ला दिया है। करीब 60 लोगों की भाजपा में प्रस्तावित ज्वाइनिंग रुकना महज एक सदस्यता कार्यक्रम का टलना नहीं, बल्कि संगठन और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के बीच बढ़ती दूरी का संकेत बनकर सामने आया है। चकराता क्षेत्र से करीब 26 परिवारों के लगभग 60 लोगों को भाजपा में शामिल कराने के लिए प्रदेश कार्यालय लाया गया था। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मधु चौहान और दर्जाधारी राज्य मंत्री गीता राम गौड़ के नेतृत्व में पहुंचे इन लोगों को उम्मीद थी कि पार्टी कार्यालय में बाकायदा सदस्यता ग्रहण कराई जाएगी। लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही पूरा घटनाक्रम बदल गया और ज्वाइनिंग टल गई। रिपोर्टों के मुताबिक, कैबिनेट मंत्री खजान दास को जब चकराता से आए लोगों की सदस्यता की जानकारी मिली तो वह प्रदेश कार्यालय पहुंचे और ज्वाइनिंग का विरोध किया। इसके बाद सदस्यता कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सका और लोगों को वापस लौटना पड़ा। मामला यहीं नहीं रुका। जब मंत्री से ज्वाइनिंग रोके जाने को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने पहले सवाल को टालने की कोशिश की और भाजपा के 2027 में फिर सरकार बनाने का दावा किया। लेकिन ज्वाइनिंग के सवाल पर उनका मैं तो सस्ता आदमी हूं वाला जवाब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। इस पूरे घटनाक्रम की टाइमिंग ने सवाल और गहरे कर दिए हैं। ज्वाइनिंग से ठीक एक दिन पहले चकराता क्षेत्र से जुड़े भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने खजान दास के सरकारी आवास के बाहर प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों ने समाज कल्याण विभाग की योजनाओं में क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं और उनके प्रस्तावों की कथित अनदेखी के आरोप लगाए थे। कुछ प्रदर्शनकारियों ने योजनाओं में कथित कमीशनखोरी के आरोप भी लगाए, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। खजान दास ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि यदि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों में एक प्रतिशत भी सच्चाई साबित होती है तो वह मंत्री पद से इस्तीफा देने तक को तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह पूरे प्रदेश के मंत्री हैं और योजनाओं की स्वीकृति संबंधित क्षेत्रों से मिले प्रस्तावों के आधार पर हुई है। मामले में भाजपा संगठन ने इसे अलग तरीके से रखा है। प्रदेश महामंत्री कुंदन परिहार के मुताबिक प्रदेश कार्यालय में ज्वाइनिंग की पूर्व सूचना संगठन को नहीं दी गई थी और प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट उस समय कार्यालय में मौजूद नहीं थे। इसलिए कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ाया गया। संगठन का यह स्पष्टीकरण अपने स्थान पर है, लेकिन राजनीतिक सवाल इससे खत्म नहीं होते। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि करीब 60 लोगों को सदस्यता दिलाने की तैयारी प्रदेश कार्यालय तक पहुंची और ऐन वक्त पर कार्यक्रम रोकना पड़ा? यदि कार्यक्रम की सूचना संगठन को नहीं थी तो लोगों को प्रदेश कार्यालय तक किस स्तर से लाया गया? और यदि यह केवल प्रक्रिया का मामला था तो मंत्री के हस्तक्षेप की नौबत क्यों आई? उत्तराखंड भाजपा पहले ही 2027 की तैयारी में संगठन को मजबूत करने और बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने पर जोर दे रही है। ऐसे समय में किसी विधानसभा क्षेत्र के नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी खुलकर सामने आना पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। चकराता में घटनाक्रम अब दो अलग-अलग तस्वीरें सामने रख रहा हैकृएक तरफ भाजपा का केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व संगठन की एकजुटता का संदेश दे रहा है, दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर विरोध, प्रदर्शन और सदस्यता कार्यक्रम के रुकने जैसी घटनाएं राजनीतिक संदेश को उलझा रही हैं। यह घटनाक्रम भाजपा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव केवल बड़े नेताओं के भाषणों और प्रदेश कार्यालय के कार्यक्रमों से नहीं जीते जाते। बूथ तक संगठन की स्वीकार्यता और स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। भाजपा लगातार अपने संगठन को अनुशासित और मजबूत राजनीतिक ढांचे के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ऐसे में जब पार्टी में शामिल होने के लिए पहुंचे लोगों को सदस्यता लिए बिना लौटना पड़े और उसी घटनाक्रम में पार्टी के एक मंत्री का विरोध सामने आए, तो स्वाभाविक रूप से संगठनात्मक समन्वय पर सवाल उठते हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि ज्वाइनिंग रुकने को सीधे किसी बड़े संगठनात्मक संकट का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। भाजपा संगठन ने इसे सूचना और प्रक्रिया का मामला बताया है और बातचीत से समाधान की बात सामने आई है। लेकिन राजनीतिक संदेश को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। चुनावी दहलीज पर खड़ी भाजपा के लिए असली चुनौती विरोधियों के आरोपों से ज्यादा अपने ही घर में उठती आवाजों को समय रहते संभालने की है। चकराता की 60 सदस्यताओं पर लगा ब्रेक इसलिए चर्चा में है, क्योंकि सवाल केवल 60 लोगों का नहीं है। सवाल यह है कि चुनावी मैदान में उतरने से पहले भाजपा अपने स्थानीय समीकरणों, नाराज कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच तालमेल को किस तरह साधती है। एक दिन प्रदर्शन, अगले दिन ज्वाइनिंग पर रोक और फिर संगठन की सफाईकृचकराता का घटनाक्रम फिलहाल भाजपा के लिए असहज राजनीतिक तस्वीर जरूर पेश कर रहा है।

कांग्रेस में ‘उत्साह’ भाजपा में ‘बेचैनी’

हरदा बनाम भाजपा, या कांग्रेस के भीतर भी एक संदेश उत्तराखंड में चुनावी दहलीज पर पुराने चेहरे की वापसी हरदा के स्वागत में शक्ति प्रदर्शन या कांग्रेस का है संदेश 2027 से पहले फिर आमने-सामने पुराने सियासी चेहरे देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में कुछ चेहरे ऐसे हैं जिनकी मौजूदगी भर से राजनीतिक तापमान बदल जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की लंबे समय बाद उत्तराखंड वापसी ने एक बार फिर यही साबित किया है। दिल्ली से प्रदेश लौटे रावत का रास्ते भर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया और देहरादून में रोड शो के जरिए अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई। रावत की वापसी ऐसे समय हुई है, जब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो चुकी हैं और कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, चेहरे और राजनीतिक रणनीति को लेकर चर्चाएं लगातार चल रही हैं। ऐसे में उनके स्वागत को भाजपा जहां शक्ति प्रदर्शन और कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस के नेता इसे वरिष्ठ नेता के प्रति कार्यकर्ताओं के सम्मान और समर्थन के तौर पर पेश कर रहे हैं। यानी हरदा लौटे तो सिर्फ स्वागत नहीं हुआ,सियासी संदेश भी पढ़े जाने लगे। भाजपा नेताओं ने रावत के रोड शो को सीधे कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जोड़ दिया है। भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने सवाल उठाया कि यदि कांग्रेस में रावत को पूरा सम्मान और महत्व मिल रहा है तो शक्ति प्रदर्शन की जरूरत क्यों पड़ी? भाजपा ने यह सवाल भी उठाया कि इस प्रदर्शन का संदेश आखिर किसे दिया जा रहा हैकृकांग्रेस आलाकमान को, प्रदेश नेतृत्व को या पार्टी के भीतर अपने समर्थकों को? भाजपा विधायक विनोद चमोली ने इससे भी तीखा हमला करते हुए रावत के रोड शो को राजनीतिक ड्रामा बताया और उनके हालिया इस्तीफे से जुड़े घटनाक्रम को मुद्दा बनाया। भाजपा का आरोप है कि रावत कांग्रेस के भीतर अपने राजनीतिक प्रभाव को फिर से स्थापित करने के लिए शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान ने भी रोड शो को कांग्रेस की गुटीय रस्साकशी से जोड़ते हुए निशाना साधा। कांग्रेस के नजरिए से देखें तो तस्वीर दूसरी है। पार्टी के कार्यकर्ताओं का सड़क पर उतरकर किसी वरिष्ठ नेता का स्वागत करना यह बताता है कि रावत की राजनीतिक पकड़ और समर्थक आधार को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खुद रावत ने हरिद्वार पहुंचने पर कहा कि वह पार्टी के सिपाही हैं और पार्टी का निर्णय सर्वाेपरि है। यही बयान भाजपा के हमलों के बीच कांग्रेस के लिए राजनीतिक जवाब भी बनता है। रावत ने पार्टी से दूरी बनाने के बजाय खुद को संगठन के साथ खड़ा बताया है। इसलिए भाजपा जिस रोड शो को शक्ति प्रदर्शन बता रही है, कांग्रेस उसी दृश्य को वरिष्ठ नेता के प्रति कार्यकर्ताओं के भरोसे के रूप में देख रही है। रावत की वापसी का समय भी महत्वपूर्ण है। उनके पूर्व ओएसडी से जुड़े परिसर में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद उत्तराखंड की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए हैं। रावत ने इस कार्रवाई को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा और चुनाव से पहले केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए। दूसरी तरफ भाजपा नेता इस प्रकरण को उनके राजनीतिक बचाव और कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जोड़ रहे हैं। यहां एक बात स्पष्ट हैकृईडी की कार्रवाई और उससे जुड़े आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी से अलग रखकर देखा जाना चाहिए। जांच में सामने आने वाले तथ्यों और किसी राजनीतिक दल के आरोपों में अंतर है। हरीश रावत की वापसी ने कांग्रेस के भीतर एक पुराना सवाल फिर जीवित कर दिया हैकृक्या उत्तराखंड कांग्रेस चुनावी राजनीति में उनके अनुभव और जनसंपर्क का कितना इस्तेमाल करेगी? दूसरी ओर भाजपा के लिए रावत अब भी एक ऐसा राजनीतिक चेहरा हैं, जिस पर हमला करके कांग्रेस की पुरानी राजनीति, नेतृत्व और कथित गुटबाजी को निशाना बनाया जा सकता है। यही वजह है कि रावत के स्वागत का कार्यक्रम भी भाजपा के लिए राजनीतिक मुद्दा बन गया। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस अभी अपने भीतर की नेतृत्व संबंधी चर्चाओं से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है। ऐसे में रावत की सक्रिय वापसी इन चर्चाओं को और गति दे सकती है। रावत का रोड शो भाजपा के खिलाफ संदेश है या कांग्रेस के भीतर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता का प्रदर्शनकृइसका अंतिम अर्थ राजनीतिक परिस्थितियां तय करेंगी। लेकिन इतना जरूर है कि सड़क पर उमड़ी भीड़ ने दोनों दलों को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर किया है। भाजपा इसे कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे रावत के प्रति कार्यकर्ताओं के समर्थन के रूप में देख रही है। दोनों के दावों के बीच असली राजनीतिक सवाल यही है कि क्या यह स्वागत केवल भावनात्मक था या 2027 की चुनावी रणनीति का शुरुआती संकेत भी? उत्तराखंड की राजनीति में चुनाव के पहले पुराने चेहरे अक्सर नए समीकरण पैदा करते हैं। हरीश रावत की वापसी भी उसी क्रम का हिस्सा बनती दिख रही है। उनके समर्थकों का उत्साह कांग्रेस के लिए राजनीतिक ऊर्जा का संकेत है, जबकि भाजपा का लगातार हमला बताता है कि वह रावत की सक्रियता को चुनावी विमर्श से बाहर नहीं रहने देना चाहती। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि रावत की वापसी के बाद कांग्रेस में उनकी भूमिका क्या रहती है, प्रदेश नेतृत्व के साथ उनका तालमेल किस दिशा में जाता है और पार्टी 2027 की लड़ाई में उनके अनुभव को किस तरह इस्तेमाल करती है। फिलहाल तस्वीर साफ हैकृहरदा की वापसी से कांग्रेस में उत्साह है, भाजपा में बेचौनी नहीं तो कम से कम राजनीतिक सक्रियता जरूर बढ़ी है और उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में एक पुराना अध्याय फिर से सुर्खियों में आ गया है।

भाजपा फिर ‘नमो फैक्टर’ के भरोसे

अब उत्तराखंड में 300 जगहों पर नमो सेवा-अनकही कहानियां प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले जनसंपर्क का नया प्रयोग स्थानीय मुद्दों के बीच मोदी का चेहरा बनेगा भाजपा का सहारा भाजपा की रणनीति साफकृचेहरा राष्ट्रीय, मैदान होगा स्थानीय देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट तेज होने के साथ भाजपा ने एक बार फिर अपनी राजनीति के सबसे बड़े चेहरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जनसंवाद के केंद्र में लाने की कवायद शुरू कर दी है। इस बार चुनावी मंच भाषणों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रंगमंच के जरिए मोदी के सार्वजनिक जीवन की कहानी जनता तक पहुंचाई जाएगी। भाजपा के सेवा संकल्प अभियान के तहत नमो सेवा-अनकही कहानियां कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों से जुड़े प्रसंगों को नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से पेश करने की योजना है। उत्तराखंड में 17 अक्टूबर के बीच सभी विधानसभा क्षेत्रों में स्कूलों, महाविद्यालयों, सामुदायिक भवनों, पंचायत भवनों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर करीब 300 मंचन प्रस्तावित हैं। यानी भाजपा अब मोदी के राजनीतिक सफर को सिर्फ भाषणों में नहीं, बल्कि संवाद, अभिनय और भावनात्मक प्रस्तुति के जरिए घर-घर तक पहुंचाने की तैयारी में है। भाजपा की चुनावी राजनीति में नरेंद्र मोदी का चेहरा लंबे समय से केंद्रीय भूमिका में रहा है। उत्तराखंड में भी पार्टी की राष्ट्रीय नेतृत्व वाली राजनीति और स्थानीय संगठन के बीच मोदी की लोकप्रियता को जोड़ने की रणनीति दिखाई देती रही है। अब जबकि 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है, नमो सेवा-अनकही कहानियां को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम मानना राजनीतिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा। इसकी व्यापकता खुद बताती है कि यह एक बड़े जनसंपर्क अभियान का हिस्सा है। भाजपा प्रधानमंत्री के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों को सेवा, समर्पण, सुशासन और जनकल्याण के प्रसंगों के रूप में प्रस्तुत करने जा रही है। उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा के सामने एक दिलचस्प चुनौती है। एक तरफ प्रदेश सरकार का अपना कामकाज, स्थानीय विधायक, मंत्री और संगठन हैं, तो दूसरी तरफ पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्रीय चेहरा है। ऐसे में मोदी के जीवन और सार्वजनिक सेवा की कहानी को विधानसभा स्तर तक ले जाना इस अंतर को पाटने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। यानी संदेश कुछ ऐसा हैकृकि चुनाव विधानसभा का हो सकता है, लेकिन भाजपा के राजनीतिक अभियान की धुरी मोदी ही रहेंगे। हालांकि इस रणनीति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मोदी के 25 वर्षों की कहानी स्थानीय राजनीतिक सवालों को पीछे कर पाएगी? उत्तराखंड में बेरोजगारी, पलायन, भू-कानून, मूल निवास, भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता, ग्रामीण सड़कों, स्वास्थ्य सेवाओं और पहाड़ में शिक्षा जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं। 2027 में मतदाता इन सवालों पर भी दलों से जवाब मांगेंगे। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती केवल मोदी की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की नहीं होगी, बल्कि मोदी के राष्ट्रीय विमर्श और उत्तराखंड के स्थानीय सरोकारों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाने की भी होगी। राजनीतिक दलों ने लंबे समय से जनसभाओं, यात्राओं, इंटरनेट मीडिया और बूथ अभियानों का इस्तेमाल किया है। अब भाजपा ने रंगमंच को भी राजनीतिक संवाद के माध्यम के रूप में जोड़ा है। नाट्य मंचन का असर भाषण से अलग होता है। कहानी, पात्र, संवाद और भावनात्मक प्रसंग किसी राजनीतिक यात्रा को अधिक सहज तरीके से लोगों तक पहुंचा सकते हैं। भाजपा इसी माध्यम से मोदी के सार्वजनिक जीवन की ऐसी घटनाओं को सामने लाने की तैयारी में है, जिन्हें पार्टी अनकही कहानियां के रूप में प्रस्तुत कर रही है। यही वजह है कि स्कूल से पंचायत भवन और सामुदायिक भवन से सार्वजनिक स्थल तक मंचन की योजना को केवल कार्यक्रमों की सूची नहीं, बल्कि व्यापक जनसंपर्क अभियान के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा की रणनीति से यह संकेत जरूर मिलता है कि पार्टी आगामी चुनाव में मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व को अपने अभियान का महत्वपूर्ण आधार बनाए रखना चाहती है। हालांकि मोदी लहर जैसी राजनीतिक धारणा का वास्तविक प्रभाव चुनावी परिणामों से ही आंका जा सकता है। फिलहाल पार्टी ने मोदी के जन्मदिन से जुड़े सेवा कार्यक्रमों को एक महीने तक चलाने का फैसला किया है और उत्तराखंड में भी कई कार्यक्रमों के जरिए संगठन को सक्रिय किया जा रहा है। इसमें नमो सेवा-अनकही कहानियां सबसे अलग इसलिए है क्योंकि यहां मोदी की राजनीतिक यात्रा को कहानी बनाकर जनता के सामने रखने की कोशिश हो रही है। भाजपा के इस अभियान का दूसरा राजनीतिक असर विपक्ष पर पड़ना स्वाभाविक है। कांग्रेस के सामने चुनौती होगी कि वह भाजपा के मोदी-केंद्रित अभियान का जवाब केवल आलोचना के जरिए देती है या अपने वैकल्पिक नेतृत्व, स्थानीय मुद्दों और राज्य से जुड़े सवालों को समान प्रभावी ढंग से जनता के बीच ले जाती है। 2027 का चुनाव इसलिए दिलचस्प हो सकता है कि एक ओर भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व और सरकार की उपलब्धियों को केंद्र में रखेगी, जबकि विपक्ष के सामने स्थानीय मुद्दों और प्रदेश सरकार के कामकाज को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाने की चुनौती होगी। भाजपा मोदी के 25 साल के सार्वजनिक जीवन को मंच पर उतारने जा रही है। लेकिन असली राजनीतिक परीक्षा मंच से बाहर होगी। क्या नाट्य मंचन लोगों को चुनावी मुद्दों से जोड़ पाएगा? क्या मोदी का चेहरा स्थानीय असंतोष और क्षेत्रीय सवालों पर भी उतना ही प्रभावी रहेगा? और क्या भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता को विधानसभा स्तर के राजनीतिक समीकरणों में बदल पाएगी? इन सवालों का जवाब आने वाले महीनों में राजनीतिक जमीन देगी। फिलहाल इतना जरूर है कि चुनाव से पहले भाजपा ने अपनी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पत्ता खोल दिया है उत्तराखंड के विधानसभा मैदान में फिर एक बार नमो फैक्टर को जनसंपर्क के रंगमंच पर उतारने की तैयारी है।

826 स्कूल बंद सरकार ‘मौन’

स्कूल बंद होने का दावा, सरकार की चुप्पी पर गरमाया सवाल बच्चे कहां गए, गांव कैसे बचेंगे और सरकार जवाब कब देगी स्कूल ठीक करो अभियान ने 10 दिन में मांगा सरकार से हिसाब रोडमैप नहीं मिला तो दो अक्टूबर के बाद आंदोलन की चेतावनी देहरादून। उत्तराखंड में एक तरफ शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने के दावे हैं, दूसरी तरफ गांवों में स्कूलों के दरवाजे बंद होने का सवाल खड़ा है। स्कूल ठीक करो अभियान के तहत काकरोच जनता पार्टी ने दावा किया है कि पिछले पांच वर्षों में 826 प्राथमिक विद्यालय बंद हुए हैं। संगठन ने सरकार से इस आंकड़े पर स्पष्ट जवाब और विद्यालयवार स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है। यह आंकड़ा सही है तो सवाल बेहद सीधा हैकृकि 826 स्कूल आखिर बंद क्यों हुए? और अगर यह आंकड़ा गलत है तो सरकार सामने आकर इसे गलत साबित क्यों नहीं करती? मामला सिर्फ 826 भवनों का नहीं है। मामला उन बच्चों का है जिनकी पहली पाठशाला बंद हुई। मामला उन अभिभावकों का है जिन्हें अपने बच्चों को दूसरे विद्यालयों तक भेजना पड़ा। मामला उन गांवों का है जहां स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि गांव की मौजूदगी और भविष्य का भी प्रतीक है। स्कूल बंद करने का निर्णय कागज पर शायद एक प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकता है, लेकिन पहाड़ में उसका असर कहीं बड़ा होता है। एक स्कूल बंद होता है तो बच्चे दूसरे विद्यालय तक पहुंचने के लिए अधिक दूरी तय कर सकते हैं। परिवारों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आती है और छोटे गांवों में शिक्षा की सुविधा कमजोर होती है। इसलिए सरकार को केवल स्कूलों की संख्या बताने से काम नहीं चलेगा। उसे बताना होगा कि बंद हुए 826 विद्यालयों में कितने बच्चे पढ़ते थे, उन्हें किन विद्यालयों में भेजा गया, कितनी दूरी तय करनी पड़ रही है और कितने शिक्षकों की तैनाती प्रभावित हुई। यही वह हिसाब है, जिसका इंतजार अब सरकार से किया जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल बनाने की बातें अपनी जगह हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों की बुनियादी जरूरतें आज भी सवाल बनकर खड़ी हैं। अभियान ने शिक्षक, पेयजल, शौचालय, बिजली और सुरक्षित भवन जैसी सुविधाओं को लेकर समयबद्ध योजना की मांग की है। सवाल यह है कि जिस स्कूल में शिक्षक पर्याप्त नहीं, पानी नहीं, शौचालय उपयोग लायक नहीं या भवन सुरक्षित नहीं, वहां आधुनिक शिक्षा के बड़े-बड़े दावे आखिर कितने कारगर होंगे?बच्चे को डिजिटल पाठ पढ़ाने से पहले उसे सुरक्षित स्कूल देना होगा। सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या कम होने को विद्यालय बंद करने का कारण माना जाता है तो अगला सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता हैकृकि सरकारी स्कूलों से बच्चों का भरोसा क्यों घट रहा है? क्या वजह शिक्षक की कमी है? क्या वजह सुविधाओं की कमी है? क्या वजह निजी स्कूलों की ओर बढ़ता आकर्षण है? या फिर सरकारी शिक्षा व्यवस्था में लगातार हुई उपेक्षा ने अभिभावकों को विकल्प तलाशने पर मजबूर किया? इन सवालों का जवाब केवल शिक्षा विभाग नहीं, पूरी सरकार को देना होगा। काकरोच जनता पार्टी ने सरकार को दस दिन के भीतर रिपोर्ट और शिक्षा सुधार का रोडमैप देने की मांग की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि जवाब नहीं मिला तो दो अक्टूबर के बाद शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया जाएगा। अब सरकार के सामने दो रास्ते हैंकृया तो आंकड़ों के साथ स्थिति स्पष्ट करे और बताए कि विद्यालयों को बचाने तथा सुधारने के लिए क्या समयबद्ध योजना है, या फिर विपक्षी संगठनों और जनता के सवालों का सामना करे। लेकिन इस बार सवाल केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उत्तराखंड ने वर्षों से पलायन, गांवों की खाली होती आबादी और पहाड़ में घटती सुविधाओं की चिंता देखी है। ऐसे में यदि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की संख्या भी लगातार घट रही है तो इसे केवल शिक्षा विभाग की प्रशासनिक कवायद मानकर आगे बढ़ जाना गंभीर सवालों को अनदेखा करना होगा। 826 स्कूल बंद होने का दावा एक आंकड़ा नहीं, सरकार की जवाबदेही की परीक्षा है। सरकार बताएकृकि कितने स्कूल बंद हुए? क्यों बंद हुए? उन स्कूलों के बच्चे अब कहां पढ़ रहे हैं? कितने विद्यालयों में शिक्षक कम हैं? कितने स्कूलों में पानी, बिजली और शौचालय की समस्या है? कितने भवन बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं? सरकार को इन सवालों का जवाब भाषण से नहीं, आंकड़ों और समयबद्ध कार्ययोजना से देना होगा। क्योंकि जिस पहाड़ से बच्चे स्कूल जाने के लिए निकलते हैं, उसी पहाड़ से अगर स्कूल ही गायब होते गए तो फिर विकास की मंजिल किसके लिए बनाई जा रही है?

सोमवार, 21 सितंबर 2026

udaydinmaan: डिजिटल क्रांति में भी ‘चढ़ावा’

udaydinmaan: डिजिटल क्रांति में भी ‘चढ़ावा’: 25 साल के उत्तराखंड में जीरो टालरेंस का ढोंग और तहसीलों का नंगानाच राजस्व तंत्र में दीमक, सरकार की निगरानी पर सवाल राज्य बनने से पहले से चली...

कमीशनखोरी की बलि चढ़े ‘गरीब’

मंत्री खजान दास के खिलाफ पार्टी कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूटा कार्यकर्ताओं का दावा,कृकांग्रेसियों को बांटे जा रहे 80 प्रतिशत काम अपनों के ही निशाने पर कैबिनेट मंत्री, आवास के बाहर उग्र प्रदर्शन मंत्री खजान दास बोले- आरोप साबित हुए तो मंत्री पद ही छोड़ दूंगा देहरादून। भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन के बाद अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण योजनाओं में कथित कमीशनखोरी को लेकर प्रदेश की सियासत गरमा गई है। प्रदर्शनकारियों ने कैबिनेट मंत्री खजान दास के सरकारी आवास के बाहर प्रदर्शन करते हुए योजनाओं के लाभार्थी चयन और विकास कार्यों के आवंटन में अनियमितता के गंभीर आरोप लगाए। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि योजनाओं के काम आवंटित करने में 15 से 20 प्रतिशत तक कमीशन लिया जा रहा है और इसके चलते करीब 80 प्रतिशत काम कांग्रेस से जुड़े लोगों को दिए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पात्र लाभार्थियों को योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है, जबकि राजनीतिक रूप से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है। उनका कहना था कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए संचालित योजनाओं का उद्देश्य जरूरतमंद और पात्र लोगों तक सरकारी सहायता पहुंचाना है, लेकिन कथित अनियमितताओं के कारण वास्तविक लाभार्थी पीछे छूट रहे हैं। मंत्री खजान दास ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए बेहद कड़ा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों में यदि एक भी आरोप साबित हो जाता है तो वह मंत्री पद से इस्तीफा देने को तैयार हैं। मंत्री ने इससे भी आगे बढ़कर कहा कि आरोप साबित होने पर वह आत्महत्या तक कर लेंगे। मंत्री के इस बयान के बाद मामला और अधिक राजनीतिक चर्चा में आ गया है। चकराता क्षेत्र से आए भाजपा नेताओं का मंत्री के आवास के बाहर प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि आरोप विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं की ओर से लगाए गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने योजनाओं में पारदर्शिता, पात्र लोगों को लाभ और कामों के निष्पक्ष आवंटन की मांग उठाई। उनका कहना है कि यदि योजनाओं में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं है तो लाभार्थी चयन और कामों के आवंटन की प्रक्रिया सार्वजनिक की जानी चाहिए। इसके साथ ही कथित कमीशनखोरी और राजनीतिक पक्षपात के आरोपों की जांच कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। मंत्री खजान दास के बयान ने अब विवाद को सीधे आरोप बनाम प्रमाण के सवाल में बदल दिया है। मंत्री ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को चुनौती देते हुए कहा है कि यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो वह अपने पद पर बने रहने का अधिकार नहीं समझेंगे। हालांकि, आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि या जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है। मामले ने भाजपा के भीतर चकराता विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक खींचतान को भी सतह पर ला दिया है। एक ओर पार्टी से जुड़े नेता मंत्री पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, वहीं मंत्री आरोपों को पूरी तरह नकारते हुए सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं। अब निगाह इस बात पर है कि लगाए गए आरोपों की कोई औपचारिक जांच होती है या नहीं और सरकार अथवा संबंधित विभाग लाभार्थी चयन तथा कार्य आवंटन से जुड़े रिकार्ड सार्वजनिक कर इस विवाद की तस्वीर साफ करता है या नहीं। फिलहाल कमीशनखोरी के आरोप और मंत्री का बेहद कठोर बयान देहरादून की सियासत के केंद्र में आ गए हैं।

भाजपा में ‘अपनों’ की ही अनदेखी पर ‘महासंग्राम’

अपनी ही सरकार पर भड़कीं भाजपा नेता मधु चौहान, वायरल वीडियो से मचा हड़कंप अपनी ही सरकार के खिलाफ भाजपा कार्यकर्ताओं का फूटा गुस्सा, संगठन में उथल-पुथल। सरकारी योजनाओं में तवज्जो न मिलने से नाराज कार्यकर्ताओं ने खोल दिया है मोर्चा देहरादून। भाजपा कार्यकर्ताओं का अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो को लेकर चर्चा में है। भाजपा नेता मधु चौहान के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन के दौरान उन्होंने सरकार की योजनाओं में कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर अपेक्षित अवसर नहीं मिलने का मुद्दा उठाया। प्रदर्शन के दौरान दिया गया उनका बयान अब सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है। वायरल वीडियो में मधु चौहान यह कहते हुए सुनाई दे रही हैं कि भाजपा का कार्यकर्ता पार्टी के हर कार्यक्रम में पूरी निष्ठा के साथ जुटता है। कभी उसे दीया जलाओ, कभी थाली बजाओ जैसे कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए कहा जाता है और कार्यकर्ता पूरे उत्साह के साथ पार्टी के कार्यक्रमों में अपनी भूमिका निभाता है। लेकिन जब सरकार की योजनाओं से जुड़े काम कार्यकर्ताओं को देने की बात आती है तो कथित तौर पर कांग्रेस से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी का कार्यकर्ता लगातार संगठन के लिए मेहनत करता है, लेकिन सरकार की योजनाओं और कामों में उसे अपेक्षित भागीदारी नहीं मिल रही है। इससे कार्यकर्ताओं के भीतर असंतोष और निराशा बढ़ रही है। उनका कहना था कि कार्यकर्ताओं की इसी नाराजगी का परिणाम है कि उन्हें अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है। मधु चौहान के बयान ने भाजपा के भीतर कार्यकर्ताओं की भूमिका और सरकार के स्तर पर उन्हें मिलने वाले अवसरों को लेकर बहस छेड़ दी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि चुनाव और संगठन के कार्यक्रमों के दौरान कार्यकर्ताओं से पूरी ताकत के साथ काम लिया जाता है, लेकिन सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और कामों के आवंटन में उनकी उपेक्षा की जा रही है। चकराता क्षेत्र में योजनाओं के लाभार्थी चयन और कामों के आवंटन को लेकर पहले से ही भाजपा नेताओं की नाराजगी सामने आ रही है। ऐसे में मधु चौहान का वीडियो सामने आने से मामला और तूल पकड़ गया है। यह विवाद कैबिनेट मंत्री खजान दास के उस बयान के बाद और चर्चा में है, जिसमें उन्होंने अपने ऊपर लगाए जा रहे कमीशनखोरी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यदि उनके खिलाफ लगाया गया एक भी आरोप साबित हो जाता है तो वह मंत्री पद से इस्तीफा देने के साथ आत्महत्या तक कर लेंगे। एक तरफ भाजपा नेताओं की ओर से योजनाओं के कामों में कथित पक्षपात और कांग्रेस से जुड़े लोगों को प्राथमिकता देने के आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं मंत्री इन आरोपों को पूरी तरह नकार रहे हैं। ऐसे में मधु चौहान का वायरल वीडियो भाजपा के भीतर चल रहे असंतोष को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ले आया है। हालांकि वीडियो में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अब सवाल यह है कि सरकार और संगठन इस नाराजगी को किस तरह देखते हैं और क्या योजनाओं के लाभार्थी चयन तथा कार्य आवंटन की प्रक्रिया को लेकर कोई स्पष्ट जांच या तथ्य सार्वजनिक किए जाते हैं। फिलहाल चकराता से उठी कार्यकर्ताओं की आवाज देहरादून की सियासत में चर्चा का नया विषय बन गई है।

उत्तराखंड में ‘मुन्नाभाइयों’ की सेंधमारी

फर्जी डोमिसाइल के सहारे डाक्टरी की सीट पर कब्जा करने का आरोप एमबीबीएस की 370 सीटों के डोमिसाइल पर उठे सवाल, जांच के आदेश एनईईटी के बाद दाखिले में इस्तेमाल प्रमाणपत्रों पर घपले का जताया अंदेशा देहरादून एसडीएम और पटवारी की भूमिका भी आ गई है सवालों के घेरे में देहरादून। उत्तराखंड में एमबीबीएस दाखिलों से जुड़े डोमिसाइल प्रमाणपत्रों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एनईईटी के बाद राज्य में एमबीबीएस की 855 सीटों में से करीब 370 सीटों के लिए इस्तेमाल किए गए डोमिसाइल प्रमाणपत्रों में कथित गड़बड़ी का अंदेशा सामने आया है। मामले में प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया और संबंधित राजस्व अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। मामले को लेकर पत्रकार प्रदीप बहुगुणा ने स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल से मुलाकात कर उन्हें पूरे प्रकरण की जानकारी दी और निष्पक्ष जांच की मांग की। उन्होंने मंत्री के समक्ष यह सवाल उठाया कि यदि दाखिले के लिए प्रस्तुत डोमिसाइल प्रमाणपत्रों में किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो इसकी जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जानी चाहिए। स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी देहरादून को पूरे प्रकरण की जांच के निर्देश दिए हैं। मंत्री के अनुसार जिलाधिकारी को एक सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने को कहा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान यदि किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। मंत्री ने कहा कि प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में यदि किसी स्तर पर अनियमितता या लापरवाही पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा। मामले में डोमिसाइल प्रमाणपत्र जारी करने के दौरान राजस्व विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। आरोपों के मुताबिक कुछ प्रमाणपत्रों को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या संबंधित आवेदकों की पात्रता और स्थायी निवास से जुड़े दस्तावेजों का नियमानुसार सत्यापन किया गया था या नहीं। ऐसे में जांच में प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया, संबंधित दस्तावेज, राजस्व अभिलेख और सत्यापन रिपोर्ट की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी। एसडीएम और पटवारी स्तर पर हुई कार्रवाई भी जांच का हिस्सा बन सकती है। एमबीबीएस की कुल 855 सीटों में से 370 सीटों से जुड़े डोमिसाइल प्रमाणपत्रों पर सवाल उठना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मेडिकल दाखिलों में राज्य कोटे की सीटों के लिए पात्रता से जुड़े दस्तावेज अहम भूमिका निभाते हैं। यदि जांच में प्रमाणपत्रों में अनियमितता साबित होती है तो इसका असर संबंधित दाखिलों की वैधता पर भी पड़ सकता है। हालांकि फिलहाल यह घपला साबित नहीं हुआ है और पूरे मामले की वास्तविक स्थिति जिलाधिकारी की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी। जांच का दायरा कितना व्यापक रखा जाता है और किन-किन प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच होती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। स्वास्थ्य मंत्री के स्तर से जांच के आदेश के बाद अब निगाह एक सप्ताह में आने वाली रिपोर्ट पर टिकी है। यदि जांच में किसी अधिकारी या अन्य स्तर पर गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो कार्रवाई के साथ यह भी स्पष्ट होगा कि डोमिसाइल प्रमाणपत्रों के सत्यापन की व्यवस्था में चूक कहां हुई।

डिजिटल क्रांति में भी ‘चढ़ावा’

25 साल के उत्तराखंड में जीरो टालरेंस का ढोंग और तहसीलों का नंगानाच राजस्व तंत्र में दीमक, सरकार की निगरानी पर सवाल राज्य बनने से पहले से चली आ रही शिकायतें बरकरार तहसीलों में काम के बदले सुविधा शुल्क के हैं आरोप शासन तक शिकायतों के बावजूद जवाबदेही पर सवाल देहरादून। उत्तराखंड को अलग राज्य बने ढाई दशक से अधिक समय हो गया। इस दौरान सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, मुख्य सचिव बदले और प्रशासनिक ढांचे में कई सुधार हुए। डिजिटल व्यवस्था आई, आनलाइन प्रमाणपत्र और राजस्व सेवाओं का विस्तार हुआ, अधिकारियों को जवाबदेह बनाने के दावे हुए और भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस की नीति भी घोषित होती रही। लेकिन जमीन पर राजस्व तंत्र को लेकर आम आदमी की शिकायतों का चरित्र बहुत नहीं बदला। जमीन की पैमाइश हो, दाखिल-खारिज हो, विरासत का मामला हो, खसरा-खतौनी में सुधार हो या प्रमाणपत्र से जुड़ा कामकृराजस्व कार्यालयों के चक्कर काटने वाले नागरिकों की शिकायतें आज भी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शासन-प्रशासन तक ऐसी शिकायतें पहुंचती रही हैं तो फिर इस कथित सिस्टम को तोड़ने के लिए निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती? यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राजस्व व्यवस्था सीधे आम नागरिक की संपत्ति और अधिकारों से जुड़ी है। एक रिकार्ड की गलती परिवारों को वर्षों तक विवाद में उलझा सकती है। एक लंबित आवेदन किसान, भूमिधर या ग्रामीण को बार-बार कार्यालय पहुंचने के लिए मजबूर कर सकता है। यही वह बिंदु है जहां पारदर्शिता की कमी और कथित बिचौलिया संस्कृति नागरिक के लिए सबसे बड़ी परेशानी बनती है। राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार को लेकर शिकायतें समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर उठती रही हैं। सवाल यह नहीं कि शिकायत किसने की या किस कर्मचारी पर आरोप लगा। असली सवाल यह है कि शिकायत मिलने के बाद सिस्टम ने क्या किया? यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ लगातार शिकायतें आती हैं और फिर भी वह उसी तरह संवेदनशील काम करता रहता है, तो सवाल केवल उस कर्मचारी पर नहीं, बल्कि उसे निगरानी में रखने वाले पूरे प्रशासनिक ढांचे पर उठता है। सरकार का भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख प्रशासनिक बैठकों और सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देता है। लेकिन शासन की नीति की वास्तविक परीक्षा सचिवालय में नहीं, तहसील की चौखट पर होती है। आम आदमी के लिए मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव की भ्रष्टाचार विरोधी घोषणाओं का मतलब तभी है जब उसका असर उस कर्मचारी तक दिखाई दे जो उसकी फाइल देख रहा है। यहीं सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता हैकृकि क्या भ्रष्टाचार विरोधी अभियान बड़े मामलों और सुर्खियों तक सीमित है या रोजमर्रा के प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर भी उतनी ही कठोर निगरानी है? राजस्व सेवाओं को ऑनलाइन करने के पीछे मकसद यही था कि नागरिक को दफ्तरों के चक्कर कम लगाने पड़ें और प्रक्रिया पारदर्शी बने। लेकिन डिजिटल व्यवस्था के बावजूद जहां अंतिम सत्यापन, रिपोर्ट, रिकार्ड सुधार या मौके की कार्रवाई अधिकारी-कर्मचारी के स्तर पर निर्भर रहती है, वहां मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश बनी रहती है। यही कारण है कि सरकार को सिर्फ यह बताने से काम नहीं चलेगा कि कितनी सेवाएं आनलाइन कर दी गईं। उसे यह भी बताना होगा कि आनलाइन व्यवस्था के बाद शिकायतों की संख्या कितनी बदली, कितने अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई और कितने मामलों में समयसीमा का उल्लंघन हुआ। भ्रष्टाचार की शिकायत सामने आने पर किसी एक कर्मचारी पर कार्रवाई करना जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं। यदि समस्या किसी प्रक्रिया में है तो व्यक्ति बदलने से प्रक्रिया नहीं बदलती। जरूरत इस बात की है कि सरकार तहसीलवार ऐसे मामलों का स्वतंत्र परीक्षण कराए जिनमेंकृ एक ही काम के लिए बार-बार कार्यालय बुलाने की शिकायत हो। आवेदन लंबे समय तक लंबित रहे हों। रिकार्ड में बार-बार संशोधन हुआ हो। बिचौलियों की भूमिका की शिकायत हो। अधिकारियों के खिलाफ बार-बार शिकायतें आई हों। शिकायत के बाद भी कार्रवाई का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध न हो। ऐसी समीक्षा से यह सामने आ सकता है कि समस्या कुछ व्यक्तियों तक सीमित है या प्रक्रिया के भीतर ही कोई ऐसी खामी है जिसका फायदा उठाया जा रहा है। यदि सरकार वास्तव में राजस्व तंत्र को भ्रष्टाचार से मुक्त करने को लेकर गंभीर है तो उसे जिलावार आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। पिछले पांच वर्षों में राजस्व विभाग के खिलाफ कितनी भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतें मिलीं? कितनी शिकायतों की जांच हुई? कितनी सही पाई गईं? कितने कार्मिक निलंबित हुए? कितनों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई? कितने मामलों में मुकदमा दर्ज हुआ? और कितने मामलों में शिकायत निराधार पाई गई? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने पर ही यह पता चलेगा कि शिकायतों को लेकर सरकार की निगरानी व्यवस्था वास्तव में कितनी प्रभावी है। उत्तराखंड में जमीन का सवाल केवल कागज का सवाल नहीं है। पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन परिवार, खेती, आवास और भविष्य से जुड़ी है। मैदानी इलाकों में भी जमीन से संबंधित विवाद और रिकार्ड आम नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में राजस्व कार्यालयों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी का सीधा असर नागरिक के अधिकारों पर पड़ सकता है कि जिस व्यक्ति के पास पैसा, पहुंच या प्रभाव नहीं है, उसके लिए सरकारी कार्यालय की प्रक्रिया सरल होना सुशासन की पहली शर्त है। अगर उसे अपने वैधानिक काम के लिए किसी बिचौलिए का सहारा लेना पड़े, तो यह सिर्फ प्रशासनिक असुविधा नहीं बल्कि शासन की विश्वसनीयता का सवाल है। उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई के दावे लगातार किए जाते रहे हैं। लेकिन राजस्व तंत्र में शिकायतों की वास्तविक स्थिति और उन पर हुई कार्रवाई का पूरा आंकड़ा जनता के सामने आना चाहिए। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर मुख्य सचिव और जिलाधिकारी कार्यालय तक शिकायतें पहुंचने की बात यदि सही है, तो सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि उन शिकायतों का परिणाम क्या हुआ। किस अधिकारी ने जांच की? क्या रिपोर्ट बनी? क्या कार्रवाई हुई? अगर कार्रवाई नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई? और अगर शिकायतें गलत थीं तो शिकायतकर्ताओं को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई? सरकार से अब सिर्फ जीरो टालरेंस’ का बयान नहीं, कार्रवाई का हिसाब चाहिए। क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे प्रभावी संदेश भाषण नहीं, कार्रवाई का रिकार्ड होता है। और यदि किसी सरकारी तंत्र के खिलाफ वर्षों से एक जैसी शिकायतें आती रहें, तो समस्या सिर्फ उस तंत्र में काम करने वालों की नहीं रहतीकृवह उस व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर भी सवाल बन जाती है। उत्तराखंड के राजस्व तंत्र पर लगे इन आरोपों की निष्पक्ष, समयबद्ध और तहसीलवार जांच अब सिर्फ प्रशासनिक जरूरत नहीं, शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा भी है।

रविवार, 20 सितंबर 2026

udaydinmaan: कागजों पर ‘नकली हकदार’

udaydinmaan: कागजों पर ‘नकली हकदार’: उत्तराखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों का बड़ा खेल सरकारी तंत्र की बहुस्तरीय जांच दरकिनार, पात्रों के हक पर डाका नौकरी से लेकर दाखिले और सरकारी योज...

कागजों पर ‘नकली हकदार’

उत्तराखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों का बड़ा खेल सरकारी तंत्र की बहुस्तरीय जांच दरकिनार, पात्रों के हक पर डाका नौकरी से लेकर दाखिले और सरकारी योजनाओं तक पहुंच रहे फर्जी दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था पर उठ रहे सवाल, असली हकदारों के अधिकार पर भी संकट सिर्फ फर्जी प्रमाणपत्र धारक नहीं, उत्तराखंड में जारी करने वाला भी कटघरे में देहरादून। उत्तराखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों का मामला केवल कुछ जालसाजों तक सीमित नहीं है। जाति, मूल निवास, स्थायी निवास, जन्म, शैक्षिक योग्यता और अन्य दस्तावेजों से जुड़े फर्जीवाड़े की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसे प्रमाणपत्र तैयार कैसे हो जाते हैं और सरकारी तंत्र की कई स्तरों वाली सत्यापन व्यवस्था के बावजूद वह संबंधित संस्थानों तक पहुंच कैसे जाते हैं? सरकारी नौकरी, शैक्षणिक प्रवेश, आरक्षण, छात्रवृत्ति और विभिन्न सरकारी योजनाओं में प्रमाणपत्र व्यक्ति की पात्रता तय करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। ऐसे में किसी एक फर्जी प्रमाणपत्र का इस्तेमाल केवल कागजों में हेराफेरी नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के अवसर पर भी असर डाल सकता है जो वास्तव में उस पात्रता का हकदार है। फर्जी प्रमाणपत्रों के मामलों में सबसे बड़ा सवाल किसी एक दस्तावेज के गलत होने से आगे बढ़कर यह है कि इसके पीछे पूरा तंत्र कैसे काम करता है। प्रमाणपत्र बनाने से लेकर उसमें दर्ज जानकारी का सत्यापन, संबंधित कार्यालय में रिकॉर्ड की उपलब्धता और नियुक्ति या प्रवेश के समय दस्तावेजों की जांचकृहर चरण की अपनी जिम्मेदारी है। यदि कोई व्यक्ति गलत प्रमाणपत्र के आधार पर लाभ हासिल कर लेता है तो यह जांचना जरूरी है कि प्रमाणपत्र जारी करने वाले स्तर पर क्या हुआ, दस्तावेज का रिकार्ड वास्तविक था या नहीं और सत्यापन के दौरान संबंधित संस्था ने किन दस्तावेजों को आधार बनाया। सरकारी नौकरियों में आरक्षण या विशेष श्रेणी का लाभ लेने के लिए प्रस्तुत प्रमाणपत्रों की सत्यता बेहद महत्वपूर्ण है। फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्ति मिलने की स्थिति में मामला केवल नियुक्त व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इससे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों के अधिकार पर सवाल खड़ा होता है। उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां सरकारी नौकरी को लेकर युवाओं में भारी प्रतिस्पर्धा है, वहां प्रमाणपत्रों की जांच व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेजों का डिजिटल सत्यापन, संबंधित विभाग के मूल रिकार्ड से मिलान और संदिग्ध प्रमाणपत्रों की अनिवार्य पुनः जांच जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं। जब जमीन के रिकार्ड से लेकर आधारभूत सरकारी सेवाओं तक का बड़ा हिस्सा डिजिटल हो चुका है, तब प्रमाणपत्र सत्यापन की व्यवस्था भी तकनीक आधारित होनी चाहिए। प्रत्येक प्रमाणपत्र को एक विशिष्ट डिजिटल पहचान दी जा सकती है, जिसे संबंधित विभाग ऑनलाइन सत्यापित कर सके। इससे प्रमाणपत्र में छेड़छाड़ या किसी दूसरे व्यक्ति के दस्तावेज का इस्तेमाल करने की संभावना कम की जा सकती है। फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन जांच यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए। यदि प्रमाणपत्र किसी सरकारी या अधिकृत व्यवस्था से जारी हुआ है तो यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि उसमें गलत जानकारी दर्ज होने की जिम्मेदारी किसकी थी। फर्जी प्रमाणपत्र का लाभार्थी सामने दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे का सिस्टम अक्सर दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि प्रत्येक बड़े मामले में प्रमाणपत्र की पूरी आडिट ट्रेल सामने आनी चाहिएकृआवेदन किसने किया, सत्यापन किसने किया, प्रमाणपत्र किस स्तर से जारी हुआ और बाद में उसका सत्यापन किस अधिकारी या संस्था ने किया। फर्जी प्रमाणपत्रों के खेल का सबसे कम चर्चा वाला पक्ष उन युवाओं का है जो वास्तविक पात्रता रखते हुए भी प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट सकते हैं। एक गलत प्रमाणपत्र किसी दूसरे व्यक्ति को वह लाभ दिला सकता है, जिसके लिए वह पात्र नहीं है। इसलिए इसे केवल प्रशासनिक या कानूनी गड़बड़ी मानकर छोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। यह समान अवसर और भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता का सवाल भी है। उत्तराखंड में संवेदनशील श्रेणी के प्रमाणपत्रों का चरणबद्ध डिजिटल ऑडिट किया जाना चाहिए। विशेष रूप से उन प्रमाणपत्रों की पुनः जांच जरूरी है जिनके आधार पर सरकारी नौकरी, आरक्षण अथवा अन्य महत्वपूर्ण सरकारी लाभ हासिल किया गया है। इसके साथ ही फर्जी प्रमाणपत्रों के मामलों में दोष सिद्ध होने पर लाभार्थी के साथ-साथ प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में शामिल जिम्मेदार लोगों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि फर्जी प्रमाणपत्र किसने बनाया। बड़ा सवाल यह है कि सरकारी रिकार्ड की दीवारों को पार कर वह प्रमाणपत्र सिस्टम के भीतर पहुंचा कैसे? उत्तराखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों के खिलाफ कार्रवाई तभी प्रभावी मानी जाएगी, जब सरकार कुछ मामलों में कार्रवाई करके रुकने के बजाय पूरी व्यवस्था की जड़ तक पहुंचे।

विधायक निधि के 573 करोड़ ‘अनयूज्ड’

पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की रफ्तार सुस्त, विधायक निधि खर्च में पहाड़ पीछे, मैदान आगे आरटीआई में सामने आई तस्वीर,1664 करोड़ की निधि उपलब्ध, खर्च हुए करीब 1091 करोड़ पहाड़ का रिपोर्ट कार्ड, 34 विधानसभा क्षेत्रों में 62 फीसदी ही बजट का हुआ है इस्तेमाल देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले विधायक निधि के इस्तेमाल का आंकड़ा विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक अहम सवाल खड़ा कर रहा है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2022-23 से जून 2026 तक प्रदेश के विधायकों के लिए करीब 1,664 करोड़ रुपये की विधायक निधि उपलब्ध रही, लेकिन इसमें से करीब 1,091.29 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके। यानी लगभग 573 करोड़ रुपये की राशि खर्च नहीं हो सकी। आरटीआई से सामने आए आंकड़ों में सबसे बड़ा अंतर भौगोलिक आधार पर दिखाई देता है। उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ के 34 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 807.5 करोड़ रुपये उपलब्ध रहे, जिनमें से लगभग 501.07 करोड़ रुपये खर्च हुए। यानी खर्च की दर करीब 62 प्रतिशत रही। प्रति विधायक औसत खर्च करीब 14.74 करोड़ रुपये रहा। इसके उलट हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर के 20 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 475 करोड़ रुपये की निधि उपलब्ध रही और लगभग 337.86 करोड़ रुपये खर्च हुए। यहां खर्च की दर करीब 71.1 प्रतिशत रही और प्रति विधायक औसत खर्च लगभग 16.88 करोड़ रुपये रहा। यानी पहाड़ और मैदान के बीच औसत खर्च में करीब 2.14 करोड़ रुपये प्रति विधायक का अंतर सामने आया। देहरादून और नैनीताल के मिश्रित भौगोलिक स्वरूप वाले 16 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 66.4 प्रतिशत निधि खर्च हुई। इससे तस्वीर यह बनती है कि विधायक निधि खर्च की रफ्तार में मैदान सबसे आगे और पर्वतीय क्षेत्र सबसे पीछे रहे। हालांकि यह आंकड़ा खर्च की स्थिति बताता है कि इससे कम खर्च के कारण अपने आप साबित नहीं होते। भौगोलिक पहुंच, प्रशासनिक प्रक्रियाएं और परियोजनाओं की प्रकृति जैसे कई कारण हो सकते हैं। राजनीतिक दलों के हिसाब से आंकड़ों को देखें तो तस्वीर और दिलचस्प है। विधायकवार दर्ज खर्च प्रतिशत के साधारण औसत में कांग्रेस विधायकों का आंकड़ा करीब 68.4 प्रतिशत, जबकि भाजपा विधायकों का करीब 64.4 प्रतिशत बताया गया है। यानी इस गणना में कांग्रेस विधायक करीब चार प्रतिशत अंक आगे हैं। हालांकि इसे दोनों दलों की कुल विधायक निधि की अंतिम या भारित व्यय दर नहीं माना जाना चाहिए। दोनों दलों के विधायकों की संख्या अलग है और विधानसभा क्षेत्रवार उपलब्ध निधि तथा खर्च भी अलग-अलग है। दिलचस्प बात यह है कि सबसे अधिक खर्च प्रतिशत वाले विधायकों में दोनों प्रमुख दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं। उपलब्ध आरटीआई आंकड़ों के अनुसार भाजपा के रुड़की विधायक प्रदीप बत्रा और कांग्रेस के पिरान कलियर विधायक फुरकान अहमद करीब 77 प्रतिशत खर्च के स्तर पर हैं। कांग्रेस के रवि बहादुर और काजी निजामुद्दीन करीब 76 प्रतिशत पर दर्ज हैं। यानी विधायक निधि खर्च को केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष की लड़ाई के चश्मे से देखना तस्वीर को अधूरा कर देगा। असली अंतर विधानसभा क्षेत्र और भौगोलिक परिस्थितियों के स्तर पर अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। दूसरी तरफ कई विधानसभा क्षेत्रों में खर्च की रफ्तार काफी कम है। उपलब्ध आंकड़ों में टिहरी विधानसभा क्षेत्र में करीब 30 प्रतिशत, यमकेश्वर में 44 प्रतिशत, चकराता में 51 प्रतिशत, कपकोट में 52 प्रतिशत और चंपावत में करीब 53 प्रतिशत खर्च दर्ज है। यहां सवाल केवल विधायक निधि खर्च होने का नहीं, बल्कि उस धनराशि से क्षेत्र की कौन-सी प्राथमिकताएं पूरी हुईं और किन कारणों से राशि खर्च नहीं हो पाई, इसका भी है। विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही समय बचा है। ऐसे में विधायक निधि का यह आंकड़ा विधायकों के विकास कार्यों के दावों की पड़ताल का एक आधार जरूर बन सकता है। लेकिन अधिक खर्च का अर्थ अपने आप बेहतर विकास और कम खर्च का अर्थ अपने आप खराब प्रदर्शन नहीं है। यह जानना भी जरूरी है कि खर्च किस काम पर हुआ, काम की गुणवत्ता कैसी रही और उसका वास्तविक लाभ जनता तक कितना पहुंचा। सबसे बड़ा सवाल पहाड़ के लिए है। राज्य गठन के बाद से पर्वतीय क्षेत्रों के विकास और पलायन पर लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे में यदि उपलब्ध विधायक निधि का बड़ा हिस्सा समय रहते खर्च नहीं हो पाता, तो सरकार और विधायकोंकृदोनों के सामने जवाबदेही का सवाल खड़ा होता है। विधायक निधि बढ़ाना आसान हो सकता है, लेकिन उसे समय पर, पारदर्शी तरीके से और जरूरत के मुताबिक जमीन पर उतारना असली परीक्षा है। आरटीआई के आंकड़े फिलहाल इतना जरूर बता रहे हैं कि उत्तराखंड में विकास की रकम उपलब्ध होने के बावजूद उसके इस्तेमाल की रफ्तार पहाड़ और मैदान में एक जैसी नहीं है।

‘घर वापसी’ पर सियासी संग्राम

हरदा के शक्ति प्रदर्शन पर भाजपा का तंज, सम्मान की वापसी या भ्रष्टाचार के सवालों का जवाब हरीश रावत कि भाजपा ने रोड शो को लेकर कांग्रेस की अंदरूनी सियासत पर साधा निशाना मुन्ना सिंह चौहान बोलेकृकांग्रेस को स्पष्ट करना चाहिए शक्ति प्रदर्शन का संदेश किसके लिए देहरादून। पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत के उत्तराखंड लौटने और प्रस्तावित स्वागत कार्यक्रम को लेकर सियासत गरमा गई है। भाजपा ने रावत के कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने सवाल उठाया कि यदि रावत को कांग्रेस में पूरा सम्मान और महत्व मिल रहा है तो उनके स्वागत के नाम पर शक्ति प्रदर्शन की जरूरत क्यों पड़ रही है? भाजपा ने इसे कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और राजनीतिक वर्चस्व की खींचतान से जोड़ते हुए सवाल किया कि इस शक्ति प्रदर्शन का संदेश आखिर किसे दिया जा रहा है। भाजपा के इस हमले की टाइमिंग भी महत्वपूर्ण है। रावत लंबे स्वास्थ्य अवकाश के बाद 20 सितंबर को रामपुर तिराहा से उत्तराखंड की यात्रा शुरू कर रहे हैं। वहीं, पिछले दिनों उनके पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े मामले में ईडी की कार्रवाई के बाद रावत ने कांग्रेस के कुछ सांगठनिक पदों से हटने की पेशकश की थी। हालांकि उन्होंने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा देने की बात नहीं कही थी। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि रावत के स्वागत में प्रस्तावित शक्ति प्रदर्शन का उद्देश्य क्या है। पार्टी के अनुसार यदि यह महज एक वरिष्ठ नेता के स्वास्थ्य लाभ के बाद प्रदेश लौटने का स्वागत है तो इसे लेकर इतनी राजनीतिक चर्चा क्यों हो रही है और यदि यह शक्ति प्रदर्शन है तो इसका संदेश कांग्रेस के भीतर किसे दिया जा रहा है। भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने इसी सवाल को आधार बनाकर कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर निशाना साधा। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव को लेकर खींचतान पहले से दिखाई दे रही है और रावत का कार्यक्रम इसी अंतर्कलह को सामने ला रहा है। रावत की वापसी ऐसे समय हो रही है जब उनके पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना के खिलाफ ईडी की कार्रवाई राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बनी हुई है। ईडी की कार्रवाई 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मनी लान्ड्रिंग मामले की जांच के सिलसिले में हुई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कार्रवाई में नकदी, सोना और महंगी घड़ियां बरामद किए जाने की बात सामने आई है। रावत ने इस प्रकरण के बाद कहा था कि उनकी वजह से कांग्रेस के भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए, इसलिए उन्होंने प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी सदस्य और कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य पदों से हटने की पेशकश की। उन्होंने मामले की सच्चाई जांच से सामने आने की बात भी कही। इसके बाद रावत ने अपने ऊपर नौकरी के बदले पैसे लेने के आरोपों से सार्वजनिक रूप से इनकार करते हुए सोशल मीडिया पर भावनात्मक प्रतिक्रिया दी और अपनी मां की सौगंध का उल्लेख किया। अब भाजपा इसी घटनाक्रम को कांग्रेस की आंतरिक राजनीति से जोड़ रही है। भाजपा का सवाल है कि जिस नेता ने हाल में पार्टी के महत्वपूर्ण सांगठनिक पदों से हटने की पेशकश की, उनके लिए अचानक बड़े स्तर पर स्वागत और शक्ति प्रदर्शन की जरूरत क्यों महसूस हुई? भाजपा की ओर से इसे रावत के कांग्रेस में अपने राजनीतिक महत्व और सम्मान को लेकर चल रही कवायद के रूप में पेश किया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि यदि संगठन में रावत की भूमिका और सम्मान को लेकर कोई असमंजस नहीं है तो फिर शक्ति प्रदर्शन के जरिए राजनीतिक संदेश देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के सामने दो स्तरों की चुनौती खड़ी की है। एक ओर उसे 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सरकार के खिलाफ अपना राजनीतिक नैरेटिव मजबूत करना है, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय और नेतृत्व के सवाल को संभालना है। रावत के समर्थकों की सक्रियता कांग्रेस के लिए राजनीतिक ऊर्जा का माध्यम बन सकती है, लेकिन भाजपा इसे पार्टी की अंदरूनी खींचतान के तौर पर प्रचारित कर रही है। हालिया राजनीतिक विश्लेषणों में भी रावत की भूमिका, कांग्रेस के चुनावी नैरेटिव और संगठन में उनके समर्थक खेमे को लेकर सवाल उठाए गए हैं। रामपुर तिराहा पर उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि देकर रावत प्रदेश की यात्रा शुरू करेंगे। इसके बाद उनका कार्यक्रम हरिद्वार और देहरादून तक है। लंबे स्वास्थ्य अवकाश के बाद उनकी यह वापसी ऐसे समय हो रही है जब प्रदेश की राजनीति 2027 के चुनाव की ओर बढ़ रही है। यही वजह है कि रावत के स्वागत का कार्यक्रम केवल स्वागत समारोह तक सीमित नहीं रह गया है। भाजपा ने इसे कांग्रेस के भीतर चल रही राजनीतिक हलचल से जोड़ दिया है। अब सवाल भाजपा ने उछाला है, जवाब कांग्रेस और रावत के पास हैकृयह आयोजन सिर्फ एक वरिष्ठ नेता की वापसी का स्वागत है, भ्रष्टाचार से जुड़े सवालों के बीच राजनीतिक समर्थन का प्रदर्शन है, या कांग्रेस के भीतर अपने राजनीतिक सम्मान और प्रभाव को फिर से स्थापित करने की कवायद? रामपुर तिराहा से हरदा की वापसी के साथ यह सवाल भी उत्तराखंड की सियासत में कदम रख चुका है।

शनिवार, 19 सितंबर 2026

udaydinmaan: फर्जीवाड़े की ‘डाक्टरी’ पर सरकारी मुहर

udaydinmaan: फर्जीवाड़े की ‘डाक्टरी’ पर सरकारी मुहर: स्वतंत्रता सेनानियों के हक पर डाका, सोता रहा तंत्र एक हफ्ते की मियाद या लीपापोती की है नई तैयारी चार अभ्यर्थियों के एमबीबीएस दाखिले पहले ही ...

फर्जीवाड़े की ‘डाक्टरी’ पर सरकारी मुहर

स्वतंत्रता सेनानियों के हक पर डाका, सोता रहा तंत्र एक हफ्ते की मियाद या लीपापोती की है नई तैयारी चार अभ्यर्थियों के एमबीबीएस दाखिले पहले ही निरस्त देहरादून। उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के तहत एमबीबीएस दाखिलों में कथित फर्जी प्रमाणपत्रों का मामला अब सीमित संख्या में सामने आए मामलों से कहीं बड़ा होता दिखाई दे रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप बहुगुणा ने चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल को 370 संदिग्ध अभ्यर्थियों की सूची सौंपते हुए उनके स्थायी निवास, शैक्षणिक अभिलेख और आरक्षण से जुड़े प्रमाणपत्रों की व्यापक जांच की मांग की है। मंत्री ने जिलाधिकारियों से एक सप्ताह में जांच रिपोर्ट तलब की है। मामले की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि शुरुआती जांच में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के प्रमाणपत्रों में गड़बड़ी पाए जाने के बाद चार एमबीबीएस दाखिले निरस्त किए जा चुके हैं। प्रशासन की जांच में जिस स्वतंत्रता सेनानी के नाम का प्रमाणपत्र लगाया गया था, उसका नाम संबंधित सरकारी पंजिका में नहीं मिला। आवेदन में दिए गए पतों की स्थलीय जांच में भी कई विसंगतियां सामने आईं। जांच के दौरान एक ही स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर वर्मा पुत्र खजान सिंह के नाम का इस्तेमाल कई अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों में किए जाने का मामला सामने आया। प्रशासनिक जांच में संबंधित नाम सरकारी अभिलेखों में नहीं मिलने और आवेदकों के बताए पतों पर परिवार के नहीं पाए जाने जैसी बातें सामने आईं। शपथपत्रों और पारिवारिक विवरणों में भी विसंगतियां दर्ज की गईं। इसके बाद चारों प्रमाणपत्र निरस्त किए गए और एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने इनके आधार पर हुए एमबीबीएस दाखिले भी रद्द कर दिए। संबंधित प्रकरण में पुलिस मुकदमा भी दर्ज किया गया है। नए स्तर पर सामने आई 370 अभ्यर्थियों की सूची ने जांच का दायरा काफी बढ़ा दिया है। शिकायतकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया है कि सूची में शामिल कुछ अभ्यर्थियों ने उत्तराखंड के बाहर के राज्यों में पढ़ाई की, इसके बावजूद उन्होंने उत्तराखंड का स्थायी निवास और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र किस आधार पर हासिल किया। हालांकि सूची में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को संदिग्ध या दोषी मानना उचित नहीं होगा। 370 नाम जांच का विषय हैं, दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं। इसलिए अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती निष्पक्ष और दस्तावेज-आधारित सत्यापन की है। मामले की पुलिस जांच में अब आनलाइन आवेदन प्रक्रिया का डिजिटल रिकार्ड महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आवेदन से लेकर प्रमाणपत्र अपलोड करने और स्वीकृति तक की प्रक्रिया का रिकार्ड उपलब्ध होने के कारण यह पता लगाया जा सकता है कि दस्तावेज किस स्तर पर प्रस्तुत हुए और किन अधिकारियों अथवा स्तरों से उनका सत्यापन किया गया। यही जांच का सबसे अहम बिंदु है। यदि कहीं फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए, तो केवल लाभ लेने वाले अभ्यर्थी तक जांच सीमित रखने के बजाय यह भी देखना होगा कि प्रमाणपत्र जारी करने और सत्यापन की सरकारी प्रक्रिया में कहां चूक हुई। चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभाग को संदिग्ध दस्तावेज मिलने पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। अब 370 नामों की जांच में प्रशासन को यह तय करना होगा कि कौन-सा प्रमाणपत्र वास्तविक है, कौन-सा संदिग्ध है और किन मामलों में दस्तावेजों की सत्यता पर कोई प्रश्न नहीं है। यह प्रकरण केवल कुछ एमबीबीएस सीटों का विवाद नहीं है। यदि जांच में बड़े पैमाने पर दस्तावेजी गड़बड़ियां प्रमाणित होती हैं तो इससे प्रमाणपत्र जारी करने, राजस्व अभिलेखों के सत्यापन और चिकित्सा शिक्षा में आरक्षण व्यवस्था की निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जांच पारदर्शी हो और वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित न हों। स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों के लिए निर्धारित अवसर किसी अपात्र व्यक्ति के कारण छिनना भी उतना ही गंभीर विषय है जितना किसी निर्दाेष अभ्यर्थी को बिना पर्याप्त सत्यापन के संदेह के घेरे में रखना। 370 नामों की सूची अब सरकार के लिए केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गई है। जांच रिपोर्ट यह तय करेगी कि मामला कुछ फर्जी प्रमाणपत्रों तक सीमित है या इसके पीछे प्रमाणपत्र जारी करने और सत्यापन की व्यवस्था में कहीं बड़ी खामी मौजूद है।

खुद लिखी ‘पटकथा’ और बन गए ‘मसीहा’

2022 में चुनावी रण से भागे, 2027 में 20 हजार का दंभ सहसपुर में हरक का दावा, 20 हजार पार जीत की गारंटी हरक सिंह रावत ने हाईकमान के सामने रखा अपना दावा सहसपुर से चुनाव लड़ने की इच्छा जताकर जीत का आंकड़ा कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर अब बढ़ेगी सियासी हलचल देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ कांग्रेस अब पूरी तरह चुनावी मोड में दिखाई देने लगी है। संगठनात्मक गतिविधियों के साथ ही पार्टी नेताओं की विधानसभा सीटों पर दावेदारी भी सामने आने लगी है। इसी कड़ी में कांग्रेस की चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष और पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने सहसपुर विधानसभा सीट को लेकर बड़ा दावा किया है। रावत का कहना है कि यदि कांग्रेस हाईकमान उन्हें सहसपुर से चुनाव मैदान में उतारता है तो वह पार्टी की जीत को 20 हजार से अधिक मतों के अंतर से सुनिश्चित करने की गारंटी देते हैं। हरक का यह बयान ऐसे समय आया है जब कांग्रेस 2027 की चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने में जुटी है। ऐसे में उनके दावे को केवल व्यक्तिगत चुनावी इच्छा के रूप में नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर टिकट की संभावित दौड़ के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। सहसपुर विधानसभा क्षेत्र देहरादून जिले की महत्वपूर्ण सीटों में शामिल है। क्षेत्र में ग्रामीण और शहरी आबादी के साथ विभिन्न सामाजिक समूहों की मौजूदगी चुनावी समीकरणों को बहुस्तरीय बनाती है। ऐसे में यहां किसी मजबूत चेहरे को उतारना कांग्रेस की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। हरक सिंह रावत लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और कई सरकारों में मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनका राजनीतिक अनुभव और अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रियता कांग्रेस के लिए उपयोगी हो सकती है। हालांकि किसी सीट पर चुनाव लड़ने और टिकट मिलने का अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व को करना है। हरक सिंह रावत ने अपने दावे को केवल चुनाव लड़ने की इच्छा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीत के अंतर का आंकड़ा भी सामने रखा है। 20 हजार से अधिक वोटों से जीत की गारंटी का दावा राजनीतिक तौर पर बड़ा संदेश है। इस दावे के कई राजनीतिक अर्थ निकाले जा सकते हैं। पहला, हरक रावत सहसपुर में अपने जनाधार को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं। दूसरा, वह पार्टी नेतृत्व को यह संदेश देना चाहते हैं कि उन्हें यदि जिम्मेदारी दी जाती है तो वह सीट को कांग्रेस के पक्ष में निर्णायक रूप से मोड़ सकते हैं। तीसरा, चुनाव से पहले ही संभावित प्रत्याशियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा में यह बयान उनकी दावेदारी को सार्वजनिक रूप से स्थापित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि जीत का वास्तविक अंतर चुनाव परिणाम आने पर ही तय होगा। अभी यह हरक सिंह रावत का राजनीतिक दावा है, जिसे चुनावी परिस्थितियों, प्रत्याशियों, स्थानीय मुद्दों और मतदाताओं के रुझान की कसौटी पर परखा जाना बाकी है। हरक सिंह रावत वर्तमान में कांग्रेस की चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हैं। ऐसे में उनका किसी विधानसभा सीट को लेकर इस तरह खुलकर दावा करना पार्टी के भीतर चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है। सवाल यह भी है कि क्या चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल रहे वरिष्ठ नेता खुद चुनाव मैदान में उतरेंगे या संगठन की व्यापक रणनीति पर काम करेंगे। कांग्रेस में टिकट वितरण को लेकर अभी अंतिम तस्वीर सामने नहीं आई है। लेकिन नेताओं की सार्वजनिक दावेदारी से साफ है कि विधानसभा चुनाव की तैयारियां अब केवल संगठनात्मक बैठकों तक सीमित नहीं हैं। संभावित उम्मीदवार अपने-अपने राजनीतिक क्षेत्र में जमीन तैयार करने लगे हैं। कांग्रेस के सामने 2027 में एक तरफ भाजपा की चुनावी तैयारियों का मुकाबला करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर टिकट के दावेदारों को साधने की जिम्मेदारी भी होगी। यदि एक ही सीट से कई मजबूत नेता दावेदारी करते हैं तो टिकट वितरण पार्टी नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा बन सकता है। हरक सिंह रावत का सहसपुर को लेकर सामने आया दावा इसी व्यापक तस्वीर का हिस्सा है। अब देखना होगा कि पार्टी हाईकमान उनकी दावेदारी को किस नजर से देखता है और सहसपुर में कांग्रेस किस चेहरे पर भरोसा जताती है। फिलहाल हरक ने गेंद हाईकमान के पाले में डाल दी हैकृसहसपुर से टिकट मिला तो 20 हजार से अधिक मतों की जीत की गारंटी। अब कांग्रेस नेतृत्व के सामने सवाल केवल प्रत्याशी चुनने का नहीं, बल्कि हर दावेदार की राजनीतिक ताकत को चुनावी रणनीति में बदलने का भी है।

उत्तराखंड में भाजपा की ‘सुनामी’

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने किया बड़ा दावा प्रदेश का राजनीतिक माहौल भाजपा के पक्ष में, जमीनी स्तर पर दिख रहे बदलाव के संकेत जमीन पर असंतोष, हवा में सुनामी का दावा, 2027 से पहले महेंद्र भट्ट का आत्ममुग्ध शगूफा सत्ता के चश्मे से गायब हो गए उत्तराखंड के बेरोजगारी, पलायन और भ्रष्टाचार आदि सभी मुद्दे देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच सियासी बयानबाजी भी तेज होने लगी है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने दावा किया है कि प्रदेश की राजनीतिक हवाएं भाजपा के पक्ष में बह रही हैं और आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की सुनामी दिखाई देगी। उन्होंने कहा कि यह केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि प्रदेश में दिखाई दे रहे कई संकेतों से स्पष्ट हो रहा है। महेंद्र भट्ट के बयान से साफ है कि भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी राजनीतिक आक्रामकता बढ़ा दी है। पार्टी जहां संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर जोर दे रही है, वहीं वरिष्ठ नेता सरकार की उपलब्धियों और संगठन की सक्रियता को चुनावी आधार बनाने में जुटे हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का कहना है कि प्रदेश में राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और इसके संकेत जमीनी स्तर पर दिखाई दे रहे हैं। उनके अनुसार जनता के बीच सरकार के कामकाज को लेकर सकारात्मक माहौल है और संगठन लगातार मजबूत हो रहा है। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश का चुनाव होगा। ऐसे में पार्टी नेतृत्व अभी से अपने कार्यकर्ताओं और संगठन को चुनावी लक्ष्य के अनुरूप सक्रिय कर रहा है। महेंद्र भट्ट का सुनामी वाला बयान इसी चुनावी आत्मविश्वास को सामने रखता है। भाजपा के इस दावे के साथ कांग्रेस पर भी राजनीतिक दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है। कांग्रेस जहां सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, पलायन और अन्य मुद्दों को लेकर हमलावर है, वहीं भाजपा विपक्ष के दावों का जवाब सरकार के कामकाज और संगठनात्मक मजबूती के जरिए देने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। 2027 के चुनाव में दोनों प्रमुख दलों के बीच मुकाबला केवल सत्ता और विपक्ष की लड़ाई नहीं रहेगा, बल्कि अपने-अपने दावों को जमीन पर साबित करने की चुनौती भी होगी। महेंद्र भट्ट ने राजनीतिक माहौल को भाजपा के पक्ष में बताते हुए सुनामी का दावा जरूर किया है, लेकिन इस दावे की वास्तविक राजनीतिक परीक्षा चुनाव में ही होगी। फिलहाल चुनाव की अधिसूचना और अंतिम प्रत्याशी तय होने में समय है। आने वाले महीनों में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों का चयन, संगठन की सक्रियता और मतदाताओं के बीच दोनों दलों की स्वीकार्यता जैसे कारक तस्वीर को प्रभावित करेंगे। भाजपा ने फिलहाल चुनावी नैरेटिव की दिशा तय करने की कोशिश शुरू कर दी हैकृसंदेश साफ है कि पार्टी खुद को 2027 की लड़ाई में मजबूत स्थिति में मान रही है। अब कांग्रेस इस दावे का जवाब किस मुद्दे और किस रणनीति से देती है, यह उत्तराखंड की अगली राजनीतिक जंग की दिशा तय करने वाले प्रमुख पहलुओं में होगा।

चेलों ने लूटा प्रदेश और गुरु बने ‘सत्यवादी’

ईडी की आंच से बचने को हरीश रावत ने चला भावनात्मक पैंतरा पूर्व सीएम को याद आई मां, आंसुओं से धुलेंगे भ्रष्टाचार के दाग जांच एजेंसियों की कार्रवाई और आरोपों से घिरे पूर्व सीएम हरीश देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में चुनावी रण अभी पूरी तरह खुला भी नहीं है और आरोप-प्रत्यारोप के तीरों ने निशाना साधना शुरू कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ उठ रहे आरोपों के बीच अब खुद रावत मैदान में उतर आए हैं। लेकिन इस बार उनका जवाब सामान्य राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि भावनाओं से लिपटा हुआ राजनीतिक प्रतिआक्रमण है। हाथों में मां की तस्वीर, मां की सौगंध और फिर बड़ा दावाकृन नौकरी दिलाने के नाम पर कभी पैसा लिया और न किसी राजनीतिक पद के लिए। रावत ने अपने अंदाज में सवाल भी खड़ा किया और जवाब भी दिया। संदेश साफ थाकृआरोप लगाने वालों को वह केवल राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत आस्था को सामने रखकर चुनौती दे रहे हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब उनके पूर्व विशेष कार्याधिकारी और वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना से जुड़ी प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। जांच एजेंसी की कार्रवाई के बाद रावत पहले ही कांग्रेस के कुछ संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं। हालांकि उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने की बात नहीं कही। हरीश रावत के लिए मौजूदा विवाद केवल किसी एक आरोप का जवाब देने तक सीमित नहीं है। यह उनके दशकों लंबे राजनीतिक सफर और सार्वजनिक छवि से जुड़ा सवाल बन गया है। यही वजह है कि रावत ने जवाब देते हुए राजनीतिक शब्दावली के बजाय परिवार और आस्था का सहारा लिया। मां की तस्वीर हाथ में लेकर सौगंध खाना दरअसल अपने समर्थकों और राजनीतिक विरोधियों दोनों को संदेश देने की कोशिश है कि वह इस आरोप को व्यक्तिगत रूप से अपनी प्रतिष्ठा पर हमला मान रहे हैं। रावत का कहना है कि उन्होंने कभी नौकरी लगवाने के नाम पर पैसा नहीं लिया। राजनीतिक पद दिलाने के बदले धन लेने के आरोपों से भी उन्होंने इनकार किया है। यानी पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोपों की पूरी राजनीतिक धार को अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी के सवाल से जोड़ दिया है। रावत के जवाब का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि आरोपों के शोर को वह सबूत की कसौटी पर कसने की चुनौती दे रहे हैं। उनका कहना है कि उनके राजनीतिक जीवन में पहले भी आरोप लगाए गए, लेकिन वह उन हमलों के बीच खड़े रहे। यहीं से मामला महज बचाव का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिरोध का रूप लेता दिखाई दे रहा है। रावत जानते हैं कि चुनावी राजनीति में किसी नेता पर लगा आरोप केवल अदालत या जांच एजेंसी तक सीमित नहीं रहता। वह जनता की धारणा का हिस्सा बन जाता है। ऐसे में रावत ने शुरुआती स्तर पर ही अपनी राजनीतिक कथा गढ़ने की कोशिश की हैकृआरोप बनाम हरीश रावत की साख। चंदन सिंह जीना से जुड़े मामले में ईडी की कार्रवाई के बाद भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का राजनीतिक आधार मिला है, जबकि कांग्रेस इसे व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देख रही है। ऐसे में रावत का भावुक वीडियो इसी टकराव की अगली कड़ी माना जा सकता है। भाजपा की ओर से जहां जांच और कार्रवाई को कानून की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, वहीं रावत ने अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों को राजनीतिक हमले के रूप में प्रस्तुत किया है। यही विरोधाभास आने वाले दिनों में इस मुद्दे को और गरमा सकता है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और भाजपा को सत्ता से चुनौती देने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे समय में कांग्रेस के सबसे पुराने और प्रभावशाली चेहरों में शामिल हरीश रावत पर उठते सवाल पार्टी के लिए भी राजनीतिक महत्व रखते हैं। रावत के सामने दोहरी चुनौती हैकृएक तरफ आरोपों का जवाब देना और दूसरी तरफ यह संदेश देना कि वह अभी भी सक्रिय राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में हैं। इसीलिए उनका मां की सौगंध वाला वीडियो महज सफाई नहीं है। यह राजनीतिक रूप से अपने समर्थक आधार को साधने और विरोधियों के हमले की धार को भावनात्मक मोर्चे पर रोकने की कोशिश भी है। उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत की शैली हमेशा से अलग रही है। कभी पहाड़ की संस्कृति, कभी लोक भोजन, कभी खेत-खलिहान और कभी पहाड़ी अस्मिताकृरावत राजनीति को सीधे जनभावनाओं से जोड़ने के लिए जाने जाते हैं। इस बार भी उन्होंने वही रास्ता चुना है, लेकिन मुद्दा कहीं ज्यादा गंभीर है। हाथ में मां की तस्वीर लेकर दिया गया बयान उनके लिए राजनीतिक बचाव का भावनात्मक कवच बन गया है। अब असली सवाल यह है कि क्या यह भावनात्मक अपील आरोपों के राजनीतिक असर को रोक पाएगी? इसका जवाब आने वाले दिनों की जांच, सामने आने वाले दस्तावेजों और दोनों दलों की राजनीतिक रणनीति से मिलेगा। हरीश रावत ने संकेत दे दिया है कि वह चुप बैठने वाले नहीं हैं। उन्होंने संघर्ष जारी रखने की बात कही है। यानी आने वाले दिनों में यह मामला और मुखर हो सकता है। एक तरफ जांच एजेंसी की कार्रवाई है, दूसरी तरफ रावत की राजनीतिक सफाई। एक तरफ भाजपा के हमले की जमीन है, दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर रावत की अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता का सवाल। 2027 की चुनावी बिसात पर अभी कई मोहरे चलने बाकी हैं। लेकिन हरीश रावत ने अपने ऊपर लगे आरोपों के जवाब में पहली चाल चल दी हैकृहाथों में मां की तस्वीर, जुबान पर सौगंध और सामने राजनीतिक चुनौती। अब सवाल यह नहीं कि रावत चुप होंगे या नहीं। सवाल यह है कि उनके इस भावनात्मक पलटवार के बाद भाजपा और कांग्रेस की सियासी लड़ाई किस नए मोड़ पर पहुंचती है।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

udaydinmaan: कोल पावर प्लांट पर घिरी धामी सरकार

udaydinmaan: कोल पावर प्लांट पर घिरी धामी सरकार: कांग्रेस ने निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने और निविदा की शर्तों में हेरफेर का लगाया आरोप सरकार का दावाकृदीर्घकालिक बिजली संकट से निपटने के लिए ...

कोल पावर प्लांट पर घिरी धामी सरकार

कांग्रेस ने निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने और निविदा की शर्तों में हेरफेर का लगाया आरोप सरकार का दावाकृदीर्घकालिक बिजली संकट से निपटने के लिए पारदर्शी तरीके से लिया फैसला विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राज्य की राजनीति में चरम पर पहुंची बयानबाजी देहरादून। विधानसभा चुनाव की आहट के बीच उत्तराखंड की सियासत में बिजली का मुद्दा गरमाने लगा है। छत्तीसगढ़ स्थित प्रस्तावित कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना से 1320 मेगावाट बिजली खरीद के 25 वर्षीय करार को लेकर कांग्रेस ने धामी सरकार को सीधे निशाने पर लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सार्वजनिक क्षेत्र की प्रस्तावित परियोजना को समाप्त कर निजी कंपनी से बिजली खरीद का रास्ता तैयार किया गया और निविदा की शर्तों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए। दूसरी ओर सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को नियमसम्मत, प्रतिस्पर्धी और राज्य की दीर्घकालिक बिजली जरूरतों को पूरा करने वाला बताया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने दिल्ली में प्रेस वार्ता कर आरोप लगाया कि 1320 मेगावाट की बिजली खरीद के लिए जारी निविदा में कुल 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किया गया। कांग्रेस का सवाल है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में निविदा शर्तों में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी और क्या इससे किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने की स्थिति बनी। कांग्रेस के मुताबिक वर्ष 2024 में उत्तराखंड सरकार ने यूजेवीएनएल और टीएचडीसी के संयुक्त उपक्रम के माध्यम से 1320 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट लगाने का प्रस्ताव रखा था। पार्टी का दावा है कि केंद्र से सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद जनवरी 2025 में इस परियोजना को समाप्त कर दिया गया और फरवरी 2025 में बिजली खरीद के लिए नया टेंडर जारी किया गया। कांग्रेस का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राज्य की अपनी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बिजली परियोजना विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही थीं, तो उस प्रस्ताव को समाप्त करने के बाद बाहर से बिजली खरीदने का फैसला क्यों किया गया। पार्टी ने टेंडर में पावर प्लांट को उत्तराखंड के बजाय देश में कहीं भी स्थापित किए जाने की अनुमति, एक ही बोलीदाता से पूरी 1320 मेगावाट बिजली लेने तथा ट्रांसमिशन लागत से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि इन बदलावों का सीधा संबंध छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित परियोजना से है। उत्तराखंड कैबिनेट ने अगस्त 2026 में यूपीसीएल को अदाणी पावर से 25 साल तक 1320 मेगावाट बिजली खरीदने के लिए समझौता करने की अनुमति दी थी। प्रस्तावित दर 5.746 रुपये प्रति यूनिट बताई गई है। नियामक आयोग की स्वीकृति की प्रक्रिया भी इस करार का हिस्सा है। सरकार का तर्क है कि इससे राज्य की भविष्य की आधार-भार बिजली जरूरत सुरक्षित होगी और बिजली खरीद की लागत में अनिश्चितता कम होगी।यही दीर्घकालिक करार अब कांग्रेस के राजनीतिक हमले का केंद्र बन गया है। कांग्रेस ने 25 वर्षों में संभावित भुगतान को लेकर भी सवाल उठाए हैं और पूरी निविदा प्रक्रिया के दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि वह सत्ता में आने पर इस करार की समीक्षा करेगी और यदि किसी स्तर पर अनियमितता मिलती है तो कार्रवाई की जाएगी। कांग्रेस के आरोपों के बीच सरकार ने अपना पक्ष भी सामने रखा है। प्रमुख सचिव ऊर्जा आर मीनाक्षी सुंदरम ने कहा है कि 1320 मेगावाट बिजली खरीद की प्रक्रिया नियमों, तकनीकी आवश्यकताओं और प्रतिस्पर्धी बोली व्यवस्था के तहत आगे बढ़ी है। उनके अनुसार आरएफक्यू चरण में पांच कंपनियां पात्र पाई गई थीं और अंतिम चयन प्रतिस्पर्धी बोली के आधार पर किया गया। प्रमुख सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि प्लांट के लिए उत्तराखंड के बाहर स्थान चुनने का विकल्प तकनीकी, पर्यावरणीय और कोयला परिवहन लागत को ध्यान में रखते हुए रखा गया। सरकार का कहना है कि निश्चित शुल्क की सीमा में बदलाव से उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और अंतिम दरों का निर्धारण नियामकीय प्रक्रिया के तहत होगा। सियासी लड़ाई केवल कांग्रेस के आरोपों तक सीमित नहीं है। भाजपा ने पलटवार करते हुए कांग्रेस शासनकाल में काशीपुर के गैस आधारित बिजली संयंत्रों से जुड़े महंगे बिजली करार का मुद्दा उठाया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने मौजूदा करार की दर को कांग्रेस शासनकाल के कथित गैस पावर करार की तुलना में कम बताते हुए इसे राज्य की दीर्घकालिक बिजली जरूरत सुरक्षित करने वाला फैसला बताया है। इस तरह बिजली का मुद्दा अब महज ऊर्जा नीति का सवाल नहीं रह गया है। यह आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच आर्थिक फैसलों, सरकारी बनाम निजी क्षेत्र और जनता पर संभावित वित्तीय बोझ के सवालों को लेकर राजनीतिक टकराव का नया मैदान बनता जा रहा है। इस पूरे विवाद में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन जनता के सामने कुछ ठोस सवाल हैंकृनिविदा की शर्तों में बड़े पैमाने पर बदलाव क्यों किए गए? सार्वजनिक क्षेत्र की प्रस्तावित परियोजना को समाप्त करने का तकनीकी आधार क्या था? छत्तीसगढ़ से बिजली खरीदना उत्तराखंड के लिए दीर्घकाल में कितना किफायती होगा? 25 साल के करार की कुल वित्तीय देनदारी क्या होगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इस पूरी प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता के सभी मानकों का पालन हुआ? सरकार इन सवालों का तथ्यात्मक जवाब देकर विवाद को खत्म कर सकती है। वहीं कांग्रेस के लिए भी आरोपों से आगे बढ़कर दस्तावेजों और ठोस तथ्यों के साथ अपने सवालों को साबित करना चुनौती होगी। बिजली की जरूरत उत्तराखंड की है, भुगतान भी उत्तराखंड के उपभोक्ताओं को करना है। इसलिए चुनावी शोर से अलग इस करार की असली कसौटी यही होगी कि 25 साल की यह व्यवस्था राज्य को कितनी सुनिश्चित, किफायती और विश्वसनीय बिजली देती है।

सेवा संकल्प के बहाने भाजपा की चुनावी तैयारी

चुनाव की तारीखों से पहले ही जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ाने और संगठन की ताकत परखने की कवायद ज़िले से लेकर मंडल स्तर तक सेवा सेतु और बहुउद्देशीय शिविरों के जरिए जनता के बीच पहुंचेगी पार्टी भाजपा के पास जनता की नब्ज टटोलने, उपलब्धियां गिनाने और संगठन को बूथ तक कसने का मौका देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तारीख भले अभी घोषित नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां लगातार चुनावी रंग ले रही हैं। इसी क्रम में भाजपा का सेवा संकल्प अभियान महज सेवा कार्यक्रमों की श्रृंखला नहीं, बल्कि सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने और संगठन की जमीनी सक्रियता परखने का बड़ा अवसर बनकर सामने आया है। अभियान के तहत 11 प्रमुख कार्यक्रम प्रस्तावित हैं और इन्हें जिलों से लेकर मंडल स्तर तक ले जाने की तैयारी है। भाजपा की घोषित रणनीति में सेवा, जनभागीदारी, संवाद और नवाचार को केंद्र में रखा गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अनुसार अभियान के जरिए केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं से हुए बदलाव तथा लाभार्थियों की कहानियों को जनता के सामने रखा जाएगा। सेवा सेतु जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सरकारी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने और शिविरों के जरिए संवाद करने की भी योजना है। यहीं से इस अभियान का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है। चुनावी वर्ष में किसी भी दल के लिए जनता से सीधा संपर्क केवल संगठनात्मक गतिविधि नहीं होता। वह यह समझने का माध्यम भी बनता है कि सरकार की योजनाओं को लेकर जमीन पर क्या प्रतिक्रिया है, किन वर्गों तक लाभ पहुंचा है और किन मुद्दों पर लोगों की शिकायतें बरकरार हैं। भाजपा के सामने इस समय एक तरफ सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच स्थापित करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ संगठन को चुनावी मोड में सक्रिय बनाए रखने की जरूरत है। पार्टी पहले ही बूथ सशक्तीकरण, शक्ति केंद्र बैठकों और घर-घर संपर्क जैसे कार्यक्रमों के जरिए संगठन को अंतिम छोर तक सक्रिय करने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है। ऐसे में सेवा संकल्प अभियान इन गतिविधियों को व्यापक जनसंपर्क से जोड़ने का माध्यम बन सकता है। पार्टी ने अभियान के अलग-अलग कार्यक्रमों की जिम्मेदारी मंत्रियों और संगठन के पदाधिकारियों को भी सौंपी है। इससे सरकार और संगठन के बीच समन्वय की परीक्षा भी होगी। भाजपा का जोर केंद्र और राज्य की योजनाओं के लाभार्थियों तक पहुंचने पर है। आशीर्वाद का दीया, नमो सेवा गाथा, कहानी बदलाव की, सेवा मेरा योगदान और सेवा सेतु जैसे कार्यक्रम इसी उद्देश्य से तैयार किए गए हैं। लेकिन राजनीतिक रूप से असली सवाल यह होगा कि क्या योजनाओं का लाभ पाने वाला वर्ग उसी अनुपात में सरकार के पक्ष में राजनीतिक समर्थन भी व्यक्त करता है? यह स्वतः मान लेना उचित नहीं होगा। लाभार्थी की संतुष्टि कई मुद्दों में से एक हो सकती है। रोजगार, महंगाई, पलायन, स्थानीय विकास, भू-कानून, मूल निवास और सरकारी भर्ती जैसे सवाल भी मतदाताओं के राजनीतिक रुख को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि सेवा संकल्प अभियान भाजपा के लिए केवल उपलब्धियां बताने का मंच नहीं, बल्कि फीडबैक लेने की जमीन भी बन सकता है। भाजपा के इस अभियान ने कांग्रेस के सामने भी राजनीतिक चुनौती खड़ी की है। यदि भाजपा घर-घर जाकर सरकार की उपलब्धियों और योजनाओं का प्रचार करती है तो कांग्रेस को उसी जनता के बीच सरकार के दावों की पड़ताल और अपने मुद्दों को प्रभावी ढंग से रखने की जरूरत होगी। कांग्रेस के लिए रोजगार, महंगाई, भर्ती परीक्षाओं, पलायन, कानून-व्यवस्था और विकास के सवाल पहले से राजनीतिक मुद्दे हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में मुकाबला केवल भाषणों और प्रेस वार्ताओं तक सीमित रहने के बजाय सरकार ने क्या किया बनाम जनता को क्या मिला के सवाल पर केंद्रित हो सकता है। सेवा संकल्प अभियान की सफलता का एक पैमाना यह भी होगा कि भाजपा का संगठन कितनी प्रभावी ढंग से इसे बूथ स्तर तक पहुंचाता है। पार्टी ने पहले ही चुनावी तैयारियों को बूथ और शक्ति केंद्र स्तर तक ले जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसलिए आने वाला एक महीना भाजपा के लिए कार्यकर्ताओं की सक्रियता, जनसंपर्क की क्षमता और स्थानीय नेतृत्व की पकड़ परखने का अवसर भी है। जहां संगठन मजबूत है, वहां अभियान आसानी से जमीन पकड़ सकता है, जहां स्थानीय स्तर पर असंतोष या निष्क्रियता है, वहां वही अभियान पार्टी के लिए फीडबैक का माध्यम बन सकता है। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा ने सेवा को अपने जनसंपर्क अभियान का केंद्रीय शब्द बनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने से इसे जोड़ा गया है और उत्तराखंड में अभियान को विकसित भारत 2047 के संकल्प से जोड़ने की बात कही गई है। लेकिन चुनावी राजनीति में किसी अभियान की वास्तविक प्रभावशीलता नारों से नहीं, जनता की प्रतिक्रिया से तय होती है। सेवा संकल्प अभियान के दौरान भाजपा के सामने यही सबसे महत्वपूर्ण फीडबैक होगा कि सरकार की उपलब्धियों का संदेश कितनी दूर तक पहुंचा और जमीन पर जनता किन सवालों को प्राथमिकता दे रही है। कुल मिलाकर, चुनावी साल में भाजपा का सेवा संकल्प अभियान सरकार के कामकाज का प्रचार अभियान होने के साथ-साथ संगठन के लिए जनता की नब्ज टटोलने का अवसर भी है। अब देखना यह होगा कि भाजपा इस जनसंपर्क से केवल अपनी उपलब्धियों की सूची तैयार करती है या जनता की शिकायतों और अपेक्षाओं को भी चुनावी रणनीति में जगह देती है। 2027 की राजनीतिक लड़ाई में यही फीडबैक आगे चलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

सैन्य बहुल राज्य का सियासी गणित

पूर्व सैनिकों और सैन्य परिवारों के वोटों को साधने के लिए 2027 चुनाव से पहले राजनीतिक बिसात बिछना शुरू अग्निवीर पर सियासी संग्राम, भाजपा ने कांग्रेस को घेरा,54 लाख आवेदनों को बनाया हथियार सत्तारूढ़ दल का दावाकृयोजना के तहत आए रिकार्ड आवेदनों ने साबित किया युवाओं का भरोसा देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच अग्निवीर योजना एक बार फिर सियासी विमर्श के केंद्र में आती दिख रही है। कांग्रेस लगातार अग्निपथ योजना को युवाओं के भविष्य और रोजगार से जोड़कर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा ने इसे लेकर कांग्रेस पर युवाओं को भ्रमित करने का आरोप लगाया है। भाजपा का कहना है कि अग्निवीरों के लिए सेवा के बाद रोजगार और करियर का रोडमैप स्पष्ट है और बड़ी संख्या में युवाओं द्वारा आवेदन किया जाना योजना में उनकी रुचि को दर्शाता है। उत्तराखंड में सैन्य सेवा का सामाजिक और भावनात्मक महत्व लंबे समय से रहा है। बड़ी संख्या में युवा सेना में भर्ती को करियर के साथ-साथ गौरव और सेवा का अवसर मानते हैं। ऐसे में अग्निपथ योजना का मुद्दा सीधे युवाओं और पूर्व सैनिक परिवारों से जुड़ता है। विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए यह वर्ग महत्वपूर्ण राजनीतिक समूह है। यही कारण है कि अग्निवीर योजना अब केवल रक्षा भर्ती की नीति नहीं, बल्कि युवा रोजगार और भविष्य से जुड़ा राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है। भाजपा ने अग्निपथ योजना के पक्ष में सबसे बड़ा राजनीतिक तर्क बड़ी संख्या में प्राप्त आवेदनों को बनाया है। पार्टी का कहना है कि 54 लाख आवेदन इस बात का संकेत हैं कि देश के युवाओं में सेना में भर्ती होने को लेकर उत्साह और रुचि बनी हुई है। भाजपा के मुताबिक यदि युवा योजना को पूरी तरह अस्वीकार करते, तो इतनी बड़ी संख्या में आवेदन नहीं आते। पार्टी इसे कांग्रेस के उस नैरेटिव का जवाब मान रही है जिसमें अग्निपथ योजना को युवाओं के लिए नुकसानदेह बताया जाता है। हालांकि आवेदन की संख्या को योजना के प्रति युवाओं की पूर्ण संतुष्टि का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। आवेदन यह जरूर बताते हैं कि सेना में भर्ती के प्रति आकर्षण कायम है, जबकि योजना के दीर्घकालिक प्रभाव का आकलन सेवा पूरी करने वाले अग्निवीरों के रोजगार और करियर के आंकड़ों से होगा। कांग्रेस का मुख्य राजनीतिक हमला अग्निवीर की चार वर्ष की सेवा अवधि को लेकर रहा है। पार्टी का तर्क है कि सेना में नियमित भर्ती की जगह सीमित अवधि की सेवा व्यवस्था से युवाओं के सामने चार साल बाद करियर को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है। विपक्ष इस मुद्दे को बेरोजगारी से जोड़कर युवाओं के बीच ले जाने की कोशिश करता रहा है। कांग्रेस के लिए अग्निवीर योजना केंद्र सरकार की रोजगार नीति पर सवाल उठाने का माध्यम भी बन रही है। भाजपा का पलटवार है कि कांग्रेस युवाओं के सामने उपलब्ध अवसरों को नजरअंदाज कर केवल भ्रम का वातावरण बनाने का प्रयास कर रही है। अग्निपथ योजना पर भाजपा का बचाव केवल योजना के प्रावधानों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट हैकृसरकार सेना को युवा शक्ति से जोड़ रही है और अग्निवीरों को सेवा के बाद भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था कर रही है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और असम राइफल्स में पूर्व अग्निवीरों के लिए कांस्टेबल/राइफलमैन भर्ती में 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान सरकार की ओर से किया गया है। कई राज्यों ने भी पुलिस और अन्य सेवाओं में पूर्व अग्निवीरों के लिए अवसर या प्राथमिकता संबंधी फैसले लिए हैं। भाजपा इन्हीं प्रावधानों को अग्निवीरों के लिए तैयार किए गए रोडमैप के तौर पर प्रस्तुत कर रही है। उत्तराखंड के लिए अग्निवीर योजना का राजनीतिक महत्व दूसरे राज्यों की तुलना में अलग है। पहाड़ों में सेना की नौकरी को लेकर पीढ़ियों पुरानी परंपरा रही है। सेना में भर्ती यहां रोजगार के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा और देशसेवा से भी जुड़ी रही है। इसलिए कांग्रेस अगर अग्निवीर योजना को युवाओं के भविष्य का सवाल बनाती है तो भाजपा के लिए जरूरी होगा कि वह प्रदेश के युवाओं के बीच योजना के बाद के अवसरों को स्पष्ट रूप से रखे। वहीं कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह अपने आरोपों को ठोस आंकड़ों और अग्निवीरों की वास्तविक स्थिति से जोड़कर जनता के सामने रखे। 2027 की चुनावी राजनीति में अग्निवीर योजना पर बहस आगे और तेज हो सकती है। भाजपा इसे युवा शक्ति, राष्ट्र सेवा और रोजगार के नए अवसरों से जोड़ सकती है, जबकि कांग्रेस इसे स्थायी रोजगार और युवाओं के भविष्य के सवाल के रूप में उठाएगी। इस राजनीतिक टकराव में 54 लाख आवेदनों का आंकड़ा भाजपा के लिए बड़ा प्रचार बिंदु है, लेकिन चुनावी विमर्श में इससे आगे भी सवाल खड़े होंगेकृचार साल बाद अग्निवीरों का करियर कैसा रहा, कितनों को स्थायी रोजगार मिला और पुनर्वास की व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित हुई? यानी अग्निवीर पर चुनावी सियासत में फिलहाल दो नैरेटिव आमने-सामने हैंकृभाजपा का युवाओं का उत्साह और अवसर बनाम कांग्रेस का भविष्य की सुरक्षा और स्थायी रोजगार। आने वाले चुनावी महीनों में इन दोनों दावों की असली परीक्षा युवाओं के बीच होने वाली राजनीतिक बहस और उपलब्ध आंकड़ों से होगी।

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

udaydinmaan: उत्तराखंड में बीजेपी का ‘बूथ स्ट्राइक’ प्लान

udaydinmaan: उत्तराखंड में बीजेपी का ‘बूथ स्ट्राइक’ प्लान: राजधानी से बाहर निकली बीजेपी, जिलों में नए कमान संभालेंगे सेनापति प्रदेश में विधायकों और सांसदों को भी मिल गया है बूथ स्तर का टास्क उत्तराखं...

उत्तराखंड में बीजेपी का ‘बूथ स्ट्राइक’ प्लान

राजधानी से बाहर निकली बीजेपी, जिलों में नए कमान संभालेंगे सेनापति प्रदेश में विधायकों और सांसदों को भी मिल गया है बूथ स्तर का टास्क उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा आ गई ‘इलेक्शन मोड’ में देहरादून। उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी औपचारिक रूप से घोषित नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक दलों की तैयारियों ने चुनावी तापमान बढ़ा दिया है। इस मुकाबले में भाजपा की सबसे स्पष्ट ताकत उसका संगठनात्मक ढांचा, सत्ता की मशीनरी से जुड़ा जनसंपर्क और बूथ स्तर तक पहुंच बनाने की कोशिश है। हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि पार्टी ने चुनावी तैयारी को केवल राजधानी की बैठकों तक सीमित रखने के बजाय विधानसभा और मंडल स्तर तक फैलाना शुरू कर दिया है। भाजपा ने 19 संगठनात्मक जिलों के प्रभारी और सह प्रभारी नियुक्त किए हैं। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी प्रदेश को चुनावी दृष्टि से अलग-अलग संगठनात्मक इकाइयों में सक्रिय कर रही है। इससे पहले प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में सांसदों, विधायकों और वरिष्ठ संगठन पदाधिकारियों की अगुवाई में कोर कमेटियां बनाने की योजना भी सामने आई थी। इन समितियों को चुनाव तक संगठनात्मक गतिविधियों, जनसंपर्क अभियानों और पार्टी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने हल्द्वानी की प्रदेश कार्यसमिति में कहा कि पार्टी की बूथ स्तर तक की रणनीति तैयार है। उन्होंने निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए 2027 में पूरी ताकत से चुनाव लड़ने की बात कही। यानी भाजपा की चुनावी रणनीति का पहला आधार संगठन की निरंतर सक्रियता है। पार्टी चुनाव से कुछ महीने पहले कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के बजाय काफी पहले से नेटवर्क को चुनावी भूमिका में लगाने का प्रयास कर रही है। भाजपा की दूसरी बड़ी ताकत सत्ता में होना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को चुनावी संवाद का हिस्सा बना रही है। हल्द्वानी में धामी ने चारधाम, आलवेदर रोड, पर्यटन और रोजगार को सरकार के प्रमुख कामों के रूप में सामने रखा तथा योजनाओं को घर-घर पहुंचाने पर जोर दिया। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 2027 का चुनाव मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इससे भाजपा के सामने नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक स्तर पर एक स्पष्ट राजनीतिक रेखा दिखाई देती हैकृसंगठन की कमान भट्ट के हाथों में और सरकार का चेहरा धामी। भाजपा अपने संगठनात्मक दावे को हाल के निकाय चुनावों के प्रदर्शन से जोड़ रही है। पार्टी नेतृत्व ने हल्द्वानी कार्यसमिति में 11 नगर निगमों और छह सहकारिता जिलों में जीत का उल्लेख किया। इसके अलावा अगस्त में श्रीनगर की निर्दलीय महापौर आरती भंडारी समेत 10 पार्षद भाजपा में शामिल हुए थे। इससे राज्य के सभी 11 नगर निगमों के महापौर भाजपा के साथ होने की स्थिति बनी। यह आंकड़ा भाजपा को शहरी निकायों में अपने संगठन और राजनीतिक विस्तार को रेखांकित करने का आधार देता है। हालांकि विधानसभा चुनाव का सामाजिक और भौगोलिक समीकरण निकाय चुनावों से अलग होता है, इसलिए इन परिणामों को सीधे विधानसभा परिणाम का संकेत मानना उचित नहीं होगा। भाजपा की राजनीतिक कार्यशैली की एक विशेषता यह है कि संगठन चुनाव के बीच निष्क्रिय रहने के बजाय लगातार कार्यक्रमों और अभियानों के जरिए कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने की कोशिश करता है। प्रदेश कार्यसमिति, जिला प्रभारियों की नियुक्ति और विधानसभा स्तर की कोर कमेटियां इसी ढांचे का हिस्सा हैं। 2025 में पार्टी ने 42 प्रदेश पदाधिकारियों की टीम भी घोषित की थी, जिसे 2027 की तैयारी से जोड़ा गया था। यही निरंतरता भाजपा को चुनावी मुकाबले में अपनी राजनीतिक बात बूथ तक ले जाने का ढांचा देती है। भाजपा के सामने सत्ता में होने की अपनी चुनौतियां भी हैं। बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद, भू-कानून, मूल निवास, आपदा और विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव जैसे मुद्दे विपक्ष के राजनीतिक विमर्श में बने हुए हैं। हाल के दिनों में हरिद्वार-देहरादून समेत प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बीच सामाजिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर तीखी बयानबाजी भी हुई है। ऐसे में भाजपा के लिए केवल संगठन का विस्तार पर्याप्त नहीं होगा। उसे संगठन की ताकत को सरकार के कामकाज के जनअनुभव से जोड़ना होगा। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वह भाजपा के मजबूत संगठनात्मक ढांचे के मुकाबले अपना संदेश कितनी प्रभावी ढंग से बूथ तक पहुंचा पाती है। इस समय भाजपा की रणनीति को तीन शब्दों में समझा जा सकता हैकृ कि संगठन, सरकार और जनसंपर्क। संगठन बूथ तक, सरकार की उपलब्धियां घर-घर तक और राजनीतिक संदेश प्रदेश के हर क्षेत्र तक पहुंचाने की कोशिश हो रही है। हल्द्वानी में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी वाली प्रदेश कार्यसमिति और उसके बाद सामने आई चुनावी तैयारियां इसी दिशा की कड़ी हैं। लेकिन चुनावी राजनीति में संगठन की ताकत अंततः जनता के मुद्दों से ही परखी जाती है। 2027 की लड़ाई में भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही रहेगा कि वह अपनी संगठनात्मक बढ़त को जनता के रोजमर्रा के सवालोंकृरोजगार, महंगाई, पलायन, विकास, कानून-व्यवस्था और पहाड़ की बुनियादी जरूरतोंकृसे किस तरह जोड़ती है। यही वह मोर्चा होगा जहां संगठन की ताकत और जनमत आमने-सामने होंगे।

कांग्रेस की ‘एकजुटता’ की परीक्षा

कांग्रेस का संगठनात्मक कसावट बनाम आंतरिक गुटबाजी पर फोकस भाजपा से मुकाबले से पहले कांग्रेस को साधने होंगे अपने सभी समीकरण संगठन की खींचतान से नेतृत्व की अस्पष्टता तक कांग्रेस की खास तैयारी देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से सीधा मुकाबला करने से पहले अपने संगठन को एकजुट और चुनावी रूप से सक्रिय रखने की है। कांग्रेस ने चुनाव अभियान कार्यालय, पांच चुनावी समितियां, जोनल जिम्मेदारियां और जनसंपर्क अभियानों के जरिए तैयारी तेज की है, लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व और गुटीय समन्वय से जुड़े सवाल लगातार राजनीतिक चर्चा में बने हुए हैं। उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से विभिन्न वरिष्ठ नेताओं के बीच राजनीतिक खींचतान चर्चा का विषय रही है। अप्रैल 2026 में हरीश रावत के राजनीतिक अवकाश को लेकर विवाद खुलकर सामने आया था और इसके बाद पार्टी के भीतर अलग-अलग खेमों के बीच मतभेदों की खबरें आईं। चुनाव के लिहाज से यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस के सामने केवल भाजपा सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाने की चुनौती नहीं है, बल्कि उन मुद्दों को एक साझा राजनीतिक संदेश में बदलने की भी जरूरत है। कांग्रेस के पास प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जैसे अनुभवी चेहरे हैं। जुलाई में कांग्रेस महासचिव संगठन केसी वेणुगोपाल ने देहरादून में वरिष्ठ नेताओं, जिला अध्यक्षों और अग्रिम संगठनों के साथ चुनावी रणनीति पर बैठक की थी। लेकिन यही बहु-नेतृत्व व्यवस्था पार्टी के लिए समन्वय की चुनौती भी पैदा करती है। सवाल यह है कि चुनाव के मैदान में कौन सा चेहरा अंतिम राजनीतिक दिशा तय करेगा और टिकट, संगठन तथा अभियान के स्तर पर सभी प्रमुख नेता किस सीमा तक एक लाइन पर रहेंगे? कांग्रेस ने अगस्त में पांच समितियां गठित कर चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाया और सितंबर में प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने सभी विभागों तथा प्रकोष्ठों को सक्रिय करने, जिला और विधानसभा स्तर पर प्रभारियों की नियुक्ति तथा जमीनी संपर्क बढ़ाने पर जोर दिया। यह तथ्य अपने आप में कांग्रेस की एक बड़ी चुनौती को रेखांकित करता हैकृचुनाव सिर पर हैं और संगठन को लगातार पुनर्गठित तथा सक्रिय किया जा रहा है। जून में प्रकाशित एक विश्लेषण में भी राज्य कांग्रेस की पूर्ण कार्यकारिणी के गठन में लंबे समय से चली आ रही देरी को संगठनात्मक कमजोरी के रूप में रेखांकित किया गया था। कांग्रेस बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महंगाई, कानून-व्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा और विकास से जुड़े मुद्दों को लगातार उठा रही है। जून में पार्टी ने प्रदेशव्यापी जनसंपर्क अभियान शुरू कर इन मुद्दों को जनता तक ले जाने की घोषणा की थी। लेकिन विपक्ष में रहते हुए मुद्दे उठाना और उन्हें चुनावी समर्थन में बदलना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि सरकार विरोधी मुद्दों को केवल विरोध के नारों तक सीमित न रखकर बूथ स्तर पर प्रभावी राजनीतिक अभियान में बदला जाए। सितंबर में हरीश रावत के पूर्व ओएसडी एवं वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना से जुड़े मामले में ईडी की कार्रवाई के बाद राजनीतिक विवाद और तेज हुआ। इसके बाद रावत ने कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी और कांग्रेस कार्यसमिति की स्थायी आमंत्रित सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा की। रावत ने कहा कि उनका उद्देश्य पार्टी के भ्रष्टाचार-विरोधी संघर्ष को कमजोर न होने देना है। इस घटनाक्रम का राजनीतिक असर क्या होगा, यह अलग प्रश्न है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि चुनावी तैयारी के बीच कांग्रेस को अपने सबसे वरिष्ठ नेताओं से जुड़े विवादों का राजनीतिक प्रबंधन भी करना पड़ रहा है। भाजपा जहां बूथ, मंडल और जिला स्तर पर चुनावी ढांचे को लगातार सक्रिय करने पर जोर दे रही है, वहीं कांग्रेस को अपने संगठनात्मक ढांचे में समन्वय और जमीनी सक्रियता दोनों मजबूत करनी हैं। कांग्रेस नेतृत्व खुद कार्यकर्ताओं को कागजों तक सीमित न रहने और जनता के बीच सक्रिय होने का संदेश दे चुका है। इसलिए कांग्रेस की कमजोरी को केवल गुटबाजी कहकर खत्म करना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती तीन स्तरों पर हैकृनेतृत्व में समन्वय, संगठन में स्पष्टता और मुद्दों को बूथ तक पहुंचाने की क्षमता। कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ कई मुद्दे हैं और पार्टी ने चुनावी तैयारियां भी तेज कर दी हैं। राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के प्रस्तावित कार्यक्रमों के जरिए अभियान को गति देने की तैयारी भी सामने आई है। लेकिन चुनावी राजनीति में राष्ट्रीय चेहरों की मौजूदगी तभी संगठनात्मक लाभ में बदलती है, जब स्थानीय नेतृत्व एकजुट संदेश दे और कार्यकर्ता उसे बूथ तक लेकर जाएं। यही कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा हैकृभाजपा के खिलाफ मुद्दे उसके पास हैं, नेता भी कम नहीं हैं। अब इन नेताओं, मुद्दों और संगठन को एक चुनावी दिशा में कितनी मजबूती से जोड़ा जाता है, यह 2027 की लड़ाई में महत्वपूर्ण रहेगा।