udaydinmaan
रविवार, 10 मई 2026
सूबे में चढ़ने लगा ‘सियासी’ पारा
फ्लैग--चुनावी साल में दल-बदल की राजनीति से अटकलों का बाजार गर्माया
चुनाव की घोषणा से पहले दलों की राजनैतिक तैयारी
भाजपा और कांग्रेस में चलने लगा दल-बदल का खेल
अब दिनभर लगने लगी दलों के मुख्यालयों में भारी भीड़
देहरादून। चुनावी साल में दल-बदल आम बात है और यह राजनीति सभी दलों में देखने को मिलती है। प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के इस ‘खेल’ से जहां सियासी पारा चढ़ने लगा है। चुनाव की घोषणा से पहले दलों की राजनैतिक तैयारी का मतलब ‘हम ही हम हैं बाकी सब कम है’ का संदेश होता है।
प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। सत्तारूढ़ भाजपा की तैयारी जहां सभी सीटों पर जीत दर्ज करने की है वही कांग्रेस भी पीछे कहा रहने वाली है। यही कारण है कि दोनों दलों में तोड़फोड़ अभी से शुरू हो चुकी है, जबकि अभी चुनाव की तारीख तक घोषित नहीं हुई है। चुनावी साल है और इस समय किसी भी कमी का मतलब खतरा होता है। शायद यही कारण है कि दोनों दल सक्रिय हो गए है।
राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो चुनाव की घोषणा से पूर्व सभी राजनैतिक दल जनता में यह संदेश देना चाहते है कि उनका दल सबसे अच्छा है। इसी कारण दल-बदल की राजनीति पर दलों का चुनाव से पूर्व जोर रहता है। सूत्रों की माने तो भाजपा और कांग्रेस में तो दल-बदल की राजनीति को एक मिशन के रूप में लिया जाता है। दलों में इसके लिए स्पेशल विंग तैयार की जाती है, जिसका काम सिर्फ दूसरे दल के लोगों को अपने दल में शामिल करवाना होता है।
अकेले भाजपा की बात करें तो भाजपा संगठन और सरकार की उपलब्धियों को लेकर अपनी तैयारी कर रही है। वही दूसरी ओर कांग्रेस सरकार की नाकामी को मुद्दा बनाकर आमजन के बीच जाकर तोड़फोड़ में लगी है। आजकल कोई ऐसा दिन नहीं है जब एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का क्रम जारी न हो। इसके साथ ही राजनैतिक दलों के मुख्यालयों में पार्टी ज्वांइन करने वालों की लंबी लाइनें न लगी हों। हालांकि मतदाता सब समझता है कि चार साल तक जिसे दुत्कारा जा रहा था आजकल एकदम से वह पूज्यनीय कैसे बन गया। चुनावी साल है और इस समय कुछ भी हो सकता है।
कई लोगों ने ली भाजपा की सदस्यता
भाजपा मुख्यालय में ज्वाइनिंग कार्यक्रम में पाटीं के वरिष्ठ नेता एवं बीस सूत्रीय क्रियान्वहन समिति के उपाध्यक्ष ज्योति गैरोला एवं प्रदेश महामंत्री कुंदन परिहार ने कई लोगों को भाजपा की सदस्यता दिलाई।
भाजपा का दामन थामने वालों में पूर्व लेबर डिप्टी कमिश्नर सुरेश आर्य ने कहा कि पूरी सर्विस के दौरान मुझे लोगों की सेवा का अवसर मिला है। सेवानिवृत्ति के बाद भी में सेवा के कामों को आगे बढ़ाना चाहता था, जिसके लिए मुझे सर्वश्रेष्ठ पार्टी भाजपा महसूस हुईई। पीएम मोदी जैसा नेतृत्व और राज्य में धामी जैसे कर्मशील मुख्यमंत्री, हम सबके यहां आने की महत्वपूर्ण वजह है। भाजपा की सदस्यता लेने वालों में नरेश भारद्वाज आकाश पवार, राहुल पाल, रोशन, अंशुल तिवारी, अंकित तिवारी, पीयूष चौहान, सुनील चौहान, बृजेश कुमार, हिमांशु चंद्र, दीपक कुमार, गोपाल राम, कैलाश चंद्र, चयनिका आर्य, प्रियंका आर्य, भावना आर्य, कैलाश कुमार, सुंदर सिंह, गणेश मेहरा, वीरेंद्र कुमार, जीवन सिंह रावत, सरिता आर्या, मीनू आर्य, ज्योति तिवारी, गीता तिवारी, विक्रम सिंह, कुलदीप सिंह, मेजर सिंह, प्रीतम सिंह, कश्मीर सिंह, संजीव चौहान, कुलविंदर सिंह आदि थे।
‘नेताओं’ को मिल गया ‘रोजगार’
विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले ही नेताओं की पौ बारह
सभी दलों ने अपने छोटे-बड़े सभी नेताओं को मैदान में उतारा
चुनाव लड़ने वाले संभावित प्रत्याशियों ने कर ली है पूरी तैयारी
देहरादून। प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा होनी अभी बाकी है, लेकिन चुनावी साल में नेताओं को समय से पहले ही ‘रोजगार’ मिल गया है। देश की प्रमुख पार्टियों भाजपा हो या कांग्रेस या फिर अन्य दल सभी दलों ने विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। दलों ने अपने छोटे-बड़े सभी नेताओं को मैदान में उतार दिया है। इससे जहां छुटभैया नेताओं सहित कार्यकर्ताओं की मौज आ गई है। अर्थात समय से पहले ‘रोजगार’ मिलने से सभी खुश नजर आ रहे हैं।
बता दें कि उत्तराखंड सहित देश के पांच राज्यों में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने है। इस चुनाव के लिए सभी दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। दलों ने जमीनी कार्यकर्ताओं से लेकर बडे़ नेताओं को जमीन पर उतारने की रणनीति के साथ बूथ स्तर तक टीम खड़ी कर दी है। इसके साथ ही अपने-अपने क्षेत्र में चुनाव लड़ने वाले संभावित प्रत्याशियों ने भी पूरी तैयारी कर ली है। संभावित प्रत्याशियों ने अपने कार्यकर्ताओं के लिए ‘लंगर’ लगाने के साथ-साथ उनकी सुख-सुविधाओं का भी विशेष ख्याल रखा जा रहा है। संभावित प्रत्याशियों ने अभी से जमीनी कार्यकर्ताओं को रोजगार दे दिया है कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अकेले भाजपा की बात करें तो भाजपा की प्रदेश में सरकार है और उसके पास प्रयाप्त संसाधन भी है। इसी के चलते सबसे पहले भाजपा ने अपने सभी संसाधनों को चुनाव की घोषणा से पूर्व सक्रिय कर दिया है। भाजपा ने अपने नेताओं को जहां जिलों की कमान दी है वही जमीनी कार्यकर्ताओं को भी बूथ स्तर तक सरकार की योजनाओं की जानकारी के साथ भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए कह दिया है। इसके साथ ही भाजपा ने बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक कार्यक्रमों को आयोजन कर चुनावी माहौल तैयार कर दिया है। इसके लिए प्रदेश में भाजपा अलग-अलग स्थानों पर अपने बडे़ नेताओं की जनसभाएं भी आयोजित करने लग गई है। ताकी आगामी विधानसभा चुनाव में जीत के लिए अभी से माहौल तैयार हो सके।
दूसरी ओर कांग्रेस भी मैदान में कूद गई है। हालांकि अभी कांग्रेस के अंदर एकजुटता का अभाव दिख रहा है, लेकिन उसके बाद भी कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस के बडे़े नेताओं के साथ-साथ जमीन से जुडे़ नेताओं को एकजुट कर बूथ स्तर तक पकड़ को मजबूत करने में लगे हुए हैं। यह अलग बात है कि कांग्रेस अध्यक्ष अपनी टीम लंबे समय बाद भी तैयार नहीं कर पाए है। इसके बाद भी प्रदेश अध्यक्ष प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर जाकर कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के साथ-साथ सरकार की नाकामियों को जिक्र कर जनता को भाजपा की नामामियां गिनाकर कांग्रेस के पक्ष में खड़ा कर रहे है।
वही चुनावी साल में अन्य दल भी अपनी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरने के लिए जोर लगा रहे हैं। प्रदेश के एकमात्र क्षेत्रिय दल यूकेडी की यूथ ब्रिगेड ने तो एक साल पहले ही चुनाव का माहौल तैयार कर दिया था और गांव-गांव जाकर लोगों को इस बार चुनाव में भाजपा-कांग्रेस को दरकिनार करने का आहवान कर रही है। यूकेडी के साथ अभी आमजन का भी पूरा समर्थन मिल रहा है, लेकिन चुनाव के समय यह जनसमर्थन मिलेगा या नहीं यह तो समय ही बताएगा।
वैसे भी चुनाव छोटा हो या फिर बड़ा, जमीनी कार्यकर्ताओं के बिना जीत पाना आसान नहीं होता है। शायद यही कारण है कि संभावित प्रत्याशियों ने कार्यकर्ताओं के एकजुट करने के साथ-साथ गांव-गांव दस्तक दे दी है, जिसका विधानसभा चुनाव में उनको फायदा मिलेगा।
उत्तराखंड के इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार
मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष में हो रही हैं भारी अनियमितताएं: डा. हरक सिंह
कहा-उधमसिह नगर और चम्पावत जनपदों में ही मिल रहा है मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष का लाभ
इन जिलों में भाजपा से जुडे हुए पदााधिकारियों और उनके परिजनों को प्रतिवर्ष मिल रहा है मुख्यमंत्री विवेकाधीनकोष से लाभ
देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड के इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष में हो रहा है। अगर मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए ताकि सच्चाई जनता के सामने आ सके।
पत्रकारों से बातचीत में डा.रावत ने सूचना के अधिकार के तहत मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष के प्राप्त दस्तावेजों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष में भारी अनियमितता हुई है। दस्तावेजों के अनुसार केवल उधम सिंह नगर और चंपावत जिलों के आंकड़े ही यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि इस कोष की किस प्रकार बंदरबांट की जा रही है। उन्होंने बताया कि सूचना के अधिकार में उधम सिंह नगर और चम्पावत जनपद से सूचनाएं मागी गई कि किन-किन लाभार्थियों को मुख्यमंत्री विवेकाधिन कोष का लाभ मिला है। पहले तो सूचनाएं देने में विलंब किया गया फिर आधी अधूरी सूचनाएं दी गई, लेकिन जो सूचनाए प्राप्त हुईई वह बहुत चौकाने वाली व लंबी सूची है।
उन्होंने बताया कि उधमसिह नगर और चम्पावत जनपद मुख्यमंत्री से संबंधित जनपद है, क्योकि खटीमा से वह पहले विधायक रहे है और चम्पावत से वर्तमान में विधायक है और दोनो ही जनपदों में भाजपा से जुडे हुए पदााधिकारियों और उनके परिजनों को प्रतिवर्ष मुख्यमंत्री विवेकाधीनकोष से लाभ दिया जा रहा है जो जनता के धन का दुरुप्रयोग है।
उन्होंने सीएम विवेकाधीन कोष के लाभार्थियों के नाम भी गिनाये, जिसमें सुबोध मजुमदार, भारत सिह, गोदावरी, कान्ता रानी, भरत बांगा, कामील खान, गजेन्द्र सिह बिष्ट, पूरन सिह, संतोष कुमार अग्रवाल,ं मुकेश शर्मा, शान्ता बडोला, राजेन्द्र प्रसाद आदि को 05 लाख रुपए और हयात सिह मेहरा जो भाजपा कापरेटिव से संबंधित है, को 04 लाख रुपए की सहायता दी गईई है। इसके अतिरिक्त तारा देवी, जसवीर चौधरी, निकिता खडायत, कुसुम देवी, हेम लता जैसे लाभार्थियों को भी 04 लाख, 03 लाख, 02 लाख जैसी बडी रकम दी गई। चम्पावत मंेे बिना नाम के व्यक्ति को 2023-24 में 03 लाख और एक जगह चम्पावत में ही अध्यक्ष नाम से 02 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी गई है। उन्होंने कहा कि यह तो मात्र चंद उदाहरण रखे गए है, पूरी सूची चौकाने वाली है। इससे साबित होता है कि उत्तराखंड के इतिहास का यह सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है।
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कांग्रेस का ट्रैक रिकार्ड जगजाहिर
भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान ने कहा कि मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष को लेकर कांग्रेस का ट्रैक रिकार्ड जगजाहिर है और उसे दो कार्यकाल मे जनता ने इसी वजह से सबक सिखाया था। कांग्रेस को पुराने कार्यकाल को याद करने की जरूरत है। चौहान ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि पहली निर्वाचित कांग्रेस सरकार मे राज्य से बाहर दूसरे प्रदेश मे भी राहत कोष बंटा और जमकर सरकारी धन की बंदरबांट हुई। यही कारण रहा कि आखिकार जनता ने कांग्रेस को विदा कर दिया। उन्होंने कहा कि 2012 मे कांग्रेस सरकार आई तो सिलसिला नहीं रुका। सीएम के अलावा तत्कालीन विस अध्यक्ष ने अपनी विस क्षेत्र में करोड़ो रुपये अपने चहेतों को बांट दिये। लेकिन तब जनता ने ऐसा सबक कांग्रेस को सिखाया कि वह अस्तित्व की तलाश मे जूझ रही है। अब भाजपा को विवेकाधीन कोष के मामले मे कांग्रेस मिथ्या आरोपों के जरिये घेरने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेसियों की ‘सियासी स्वाद’ से दूरी
राजनैतिक बयानबाजी से मचे घमासान से कांग्रेसी अभी भी चुप
कांग्रेस नेता हरीश रावत ने आयोजित की थी दून में फल पार्टी
कांग्रेस के बडे़ नेताओं के नहीं पहुंचने से आपसी ‘खटास’ दिखी
देहरादून। कांग्रेस नेताओं के बीच बयानबाजी से मचा घमासान जारी है। कांग्रेसियों के लिए पूर्व सीएम हरीश रावत द्वारा आयोजित ‘सियासी स्वाद’ पार्टी में कांग्रेस के बडे़े नेताओं ने दूरी बनाए रखी, जबकि राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस पार्टी का आयोजन कांग्रेस में मचे घमासान को कम करना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस के बडे़ नेताओं के पार्टी में नहीं पहुंचने से आपसी ‘खटास’ साफ देखी गई।
बता दें कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व सीएम हरीश रावत ने फल पार्टी का आयोजन किया था। इसका मकसद सभी कांग्रेस नेताओं को एकजुट कर चुनाव के लिए एकता का संदेश देना था, लेकिन पार्टी में समर्थक और कार्यकर्ता तो भारी संख्या में पहुंचे मगर पार्टी के बडे़ नेताओं की नाराजगी पार्टी में नहीं आने से साफ दिखी।
ज्ञात हो कि पूर्व सीएम हरीश रावत पार्टी से नाराज होकर राजनैतिक अवकाश पर चले गए थे। इसके बाद पार्टी में बयानबाजी का दौर शुरू हुआ और यह बडे़ घमासान के रूप में सामने आयी। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के सूबे में बैठकों के माध्यम से पार्टी में एकता का संदेश दिया गया, लेकिन यह जमीन पर कही नहीं दिखा। हरदा की फल पार्टी से यह साबित हो गया कि कांग्रेस में अभी भी अंदर खाने खटपट चल रही है और यह आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बडे़ खतरे का संकेत है।
राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो हरदा के राजनैतिक अवकाश के बाद कांग्रेस को एकजुट करने के लिए हरदा की फल पार्टी राजधानी में आयोजित की गई। लेकिन इस पार्टी में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह, चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरक सिंह रावत सहित कई बडे़ नेता उपस्थित नहीं थे। इससे साफ संकेत जाता है कि कांग्रेस पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है और यह पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं है।
दूसरी ओर राजनैतिक विशेषज्ञों की मानें तो राजनीतिक अवकाश के बाद आयोजित हरदा की फल पार्टी से एक बड़ा संदेश जा रहा है कि अब हरीश रावत फिर से राजनीति में सक्रिय हो गए हैं। पार्टी का आयोजन कर स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के साथ ही आम जनता से जुड़ने की कोशिशें कर चुके हैं। एक बार फिर अपनी राजनीतिक सक्रियता का संदेश तो दिया गया, लेकिन पार्टी में कांग्रेस के बडे़ नेताओं की अनुपस्थिति से यह भी संदेश गया है कि घमासान अभी कम नहीं हुआ है।
चुनावी मोड में भाजपा और कांग्रेस
बीजेपी बना रही है हैट्रिक लगाकर तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने का प्लान
कांग्रेस अपनी खोयी हुई जमीन तलाशने और सत्ता वापसी की बना रही रणनीति
कांग्रेस चुनावी तैयारियों में जुटी, बीजेपी नजर रही पूरी तरह से चुनावी मोड में
देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 की हालांकि अभी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस अभी से मैदान में कूद गए है। 2027 का विधानसभा चुनाव बीजेपी और कांग्रेस के लिए अहम है। बीजेपी 2027 में हैट्रिक लगाकर तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने का प्लान कर रही है, तो वहीं कांग्रेस अपनी खोयी हुई जमीन तलाशने में लगी हुई है, ताकि उसे भी सत्ता वापस मिल सके।
चुनावी साल में कोई कोर-कसर बाकी न रहे इसके लिए राजनैतिक दल समय से पहले ही अपनी तैयारियों में लग जाते है। प्रदेश में कांग्रेस भले ही अभी चुनावी तैयारियों जुटी हो, लेकिन बीजेपी पूरी तरह से चुनावी मोड में नजर आ रही है। भाजपा सत्ता को अपने पास रखने की रणनीति पर काम कर रही है और कांग्रेस खोई जमीन तलाशने के लिए जंग के मैदान में कूद गई है। हालांकि दोनों दलों के अंदर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। इसके बाद भी दोनों दल चुनावी मोड में दिख रहे है। कांग्रेस के साथ भाजपा अपने बडे़ नेताओं का दौरा करवाने में लगे है।
अकेले भाजपा की बात करें तो चुनाव से पहले सरकार की उपलब्धियों को व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करने की भाजपा और सरकार तैयारी कर रही है। प्रदेश सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि राज्य में बुनियादी ढांचे, पर्यटन, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी योजनाओं को गति दी गई है और कई परियोजनाएं अब जमीन पर दिखाई देने लगी हैं। चुनावी साल में भाजपा को जनता के बीच जाना है और इसके लिए रणनीति पहले से अगर पक्की नहीं होगी तो भाजपा को इसके दुष्परिणाम देखने को मिल सकते है। इसके लिए भाजपा सरकार की उपलब्धियों को अपना चुनावी हथियार बनाने की दिशा में कार्य कर रही है।
दूसरी ओर सरकार की इस कवायद पर विपक्षी दल कांग्रेस ने सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस का कहना है कि सरकार केवल दावे कर रही है, जबकि धरातल पर विकास कार्यों की स्थिति उतनी मजबूत नहीं है। कांग्रेस ने सरकार से मांग की है कि वह अब तक किए गए कामों का पूरा लेखा-जोखा जनता के सामने रखने के लिए श्वेत पत्र जारी करे। कांग्रेस की इस मांग को हालांकि भाजपा सिरे से खारिज कर रही है, लेकिन कांग्रेस के आक्रामक रूख के चलते भाजपा के लिए यह समस्या बड़ी हो सकती है।
प्रदेश में विधानसभा चुनाव कब होंगे इसकी अभी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन लगभग एक साल का समय अभी है और इसी के चलते भाजपा और कांग्रेस अभी से चुनावी मोड में आ गए है। प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा सरकार के कामों को लेकर जनता के बीच जाएगा और चुनावी रण में जीत के लिए दाव खेलेगी। वही कांग्रेस सरकार के कामों को नाकामी बताते हुए मैदान में कूदेगी। आने वाले समय में चुनावी रण में भाजपा और कांग्रेस की रणनीति देखने को मिलेगी और विधानसभा चुनाव की घोषणा तक यह जंग के रूप में बदल जाएगी।
‘सब कुछ ठीक नहीं’
फ्लैग--भाजपा-कांग्रेस में पार्टी कार्यकर्ता नाराज, दलों को छोड़ने का सिलसिला शुरू
क्रासर--सूबे में 2027 में विधानसभा चुनाव से पहले राजनैतिक दलों में हलचल शुरू
--भाजपा के असंतुष्ठ बने भाजपा के लिए मुसीबत, कांग्रेस के कार्यकर्ता भी है नाराज
--कांग्रेस में प्रदेश की टीम का अता-पता नहीं, भाजपा से भी जमीनी कार्यकर्ता हैं नाखुश
देहरादून। प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनावी साल में राजनैतिक दलों में सब कुछ ठीक नहीं है। एक ओर जहां पार्टियों खासकर भाजपा और कांग्रेस में दलों के जमीनी कार्यकर्ता नाराज हैं, वहीं पार्टी छोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया है। चुनावी साल में दलों में हलचल से पार्टियों के लिए बड़ी समस्या है।
बता दें कि राज्य गठन के बाद से सूबे में बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस ने राज किया है। राज्य गठन को लेकर आमजन की भावना के अनुरूप राज्य आज दिन तक नहीं बना, लेकिन दोनों दलों ने आमजन में अपनी पकड़ मजबूत की। इसी के चलते दलों को सत्ता का सुख भोगने को मिला। सबसे बड़ी बात यह है कि आमजन को पता है कि राज्य उनकी भावनाओं के अनुरूप नहीं बना और विकास भी राजनैतिक दलों के हिसाब से हो रहा है। उसके बाद भी लोग दलों के साथ जुडे़ हैं और हर चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को सपोट करते आ रहे है।
प्रदेश में जहां भाजपा ने राज्य बनने के बाद अपनी मजबूत पकड़ बनायी वही कांग्रेस के पुराने कार्यकताओं के चलते सूबे में खुद को मजबूत रखने में आज दिनतक कायम है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव राज्य की जनता पर पड़ा और भाजपा का परिवार बढ़ता गया। आज भाजपा की प्रदेश में सरकार है, लेकिन सरकार के कामकाज को लेकर आमजन नाराज तो है ही भाजपा के अपने जमीनी कार्यकर्ता भी नाराज चल रहे हैं। इसके कई उदाहरण पिछले कुछ समय से सामने आ रहे है। भाजपा में सिर्फ जमीनी कार्यकर्ता ही नहीं पदाधिकारी से लेकर पूर्व मंत्री से लेकर आम कार्यकर्ता भी नाराज चल रहे हैं।
यही हाल कांग्रेस का भी है। कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है यह हमारा दावा नहीं बल्कि कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं का है। एक तो सत्ता से लंबे समय से दूरी कांग्रेस हाईकमान की नीतियां जमीनी कार्यकर्ता बताते है। वही दूसरी और प्रदेश नेतृत्व को भी इसके लिए जमीनी कार्यकर्ता जिम्मेदार मानते हैं। कांग्रेस जहां अपनी रणनीति नहीं बना पा रही है वहीं नेतृत्व और अनावश्यक बयानबाजी भी दल के लिए खतरा बनता जा रहा है। इससे भी कार्यकर्ता नाराज नजर आ रहे हैं।
चुनावी साल में भाजपा और कांग्रेस में जमीनी कार्यकर्ताओं की नाराजगी दलों को भारी पड़ सकती है। क्योंकि एक ओर जहां भाजपा लगातार दो बार विधानसभा चुनाव में विजय हासिल कर सरकार में है और उसके जमीनी कार्यकर्ता नाराज चल रहे हैं उससे भाजपा को विधानसभा चुनाव में इसका असर देखने को मिल सकता है। दूसरी और कांग्रेस ने प्रदेश हाईकमान तो बदला, लेकिन लंबे समय बाद भी टीम को तैयार नहीं कर पाना यह दर्शाता है कि दल में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है और आने वाले विधानसभा चुनाव में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी’
क्रासर--भाजपा नेता अजेंद्र की नई सोशल मीडिया पोस्ट ने राजनैतिक गलियारों में मचाया तहलका
--पार्टी के लिए ‘अपने’ ही मुसीबत खड़ी करते आ रहे है और इसे हलके में ले रही है पार्टी
--सोशल मीडिया पोस्ट में दस्तावेजों और विषयों को सार्वजनिक करने की बात भी लिखी
देहरादून। अंतरकलह से गुजर रही भाजपा के लिए कफील आज़र अमरोहवी के गजल की यह लाइन ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी’ आने वाले चुनाव में भारी पड़ सकती है। चुनावी साल में सभी पार्टियां जहां सोच-समझकर कार्य करती है वही भाजपा अपनों के रूठने को हलके में ले रही है। लंबे समय से भाजपा के लिए उसके ‘अपने’ ही मुसीबत खड़ी करते आ रहे है और पार्टी इसे चुनावी साल में हलके में ले रही है। हाल ही में भाजपा नेता अजेंद्र अजय की सोशल मीडिया पोस्ट की चर्चा जहां राजनैतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई थी। इसके बाद भाजपा नेता अजेंद्र की नई सोशल मीडिया पोस्ट ने फिर से राजनैतिक गलियारों में तहलका मचा दिया है।
बता दें कि भाजपा के वरिष्ठ नेता अजेंद्र अजय की नई सोशल मीडिया पोस्ट से राज्य में हलचल पैदा कर दी है। सूत्रों के अनुसार भाजपा नेता अजेंद्र अजय, पार्टी और सरकार से नाराज चल रहे हैं। भाजपा नेता अजेंद्र अजय का कहना है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त किया था। इसके बाद से ही उन्हें हर तरह से घेरने का प्रयास किया जा रहा है। अजेंद्र अजय ने लिखा है कि कि उनके बारे में मीडिया एवं सोशल मीडिया के जरिए यह भी प्रचारित करने की कोशिश हो रही है कि अजेंद्र अजय फलां गुट का है और फलां का आदमी है।
सोशल मीडिया पोस्ट में अजेंद्र अजय ने लिखा है कि किन विषयों को लेकर उनकी नाराजगी है, इस बात को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के साथ ही अन्य स्तरों पर भी व्यक्त कर चुके हैं। यही नहीं, जिन विषयों को लेकर उनकी नाराजगी है और उन्होंने जिन विषयों को उठाया है वह कोई उनका व्यक्तिगत मामला नहीं बल्कि सार्वजनिक महत्व का मामला है। ऐसे में इन सब विषयों से संबंधित कुछ दस्तावेज प्राप्त होने के बाद जल्द ही दस्तावेजों और विषयों को सार्वजनिक करेंगे।
सोशल मीडिया पर दस्तावेजों वाली लाइन लिखकर भाजपा नेता अजेंद्र ने एक नई सनसनी फैला दी है। राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा है कि किसी भी सरकार में सब कुछ ठीक तो होता नहीं है और भाजपा में भी कुछ गलत हुआ है। इस ओर भाजपा नेता की सोशल मीडिया पोस्ट का यही मतलब होता है। अगर यह सब सार्वजनिक हुआ तो आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। लेकिन पार्टी इसे हलके में ले रही है। एक ओर जहां भाजपा की ओर से पूरे मामले में अभी तक कोई बयान नहीं आया है। वही दूसरी ओर भाजपा नेता अपनी उल जूलूल बयानबाजी से पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं।
‘पैराशूट’ नेताओं को ‘फरमान’
फ्लैग--एआई के दौर में राजनैतिक दलों को बदलनी पड़ रही है अपनी राीति-नीति
क्रासर--सोशल मीडिया के ‘लाइव’ कांसेप्ट नेताओं के लिए मुसीबत
--एआई नेता की कुंडली खंगाल कर आमजन के सामने रखेगा
--राजनैतिक दलों की मजबूरी बनी जमीनी नेताओं पर दाव खेलना
देहरादून। चुनावी साल में राजनैतिक दल अपनी रणनीति तैयार करने में लगे है। आज के एआई दौर में मतदाताओं को रिझाने के लिए दलों को जी-जान लगाने पडे़गी। क्योंकि एआई ने अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली है कि उसके सामने अब किसी की नहीं चलने वाली है। शायद यही कारण है कि राजनैतिक दल इस बार ‘पैराशूट’ के बजाय जमीनी नेताओं पर ‘दाव’ खेलने के मूड़ में है। इसके लिए पार्टियों ने फरमान तक जारी कर दिए हैं। राजनीति के विशेषज्ञों की माने तो पार्टियों के लिए आने वाला विधानसभा चुनाव किसी पहाड़ से कम नहीं है।
गांव-गांव, घर-घर और शहर-शहर में आमजन अब बहुत जागरूक हो गया है और हर जगह से ‘लाइव’ का कांसेप्ट इस चुनाव में नेताओं को भारी पड़ सकता है। सोशल मीडिया के साथ एआई की मजबूत पकड़ इस बार के चुनाव में साफ देखने को मिलेगी। सोशल मीडिया के ‘लाइव’ कांसेप्ट नेताओं के लिए जहां मुसीबत बन सकती है। वही एआई किस समय किस नेता की कुंडली खंगाल कर आमजन के सामने रख दे पता नहीं है। इसके अभी से संकेत दिखने लगे है। हालांकि अभी चुनाव में लंबा समय है, लेकिन दलों की अभी से जो रणनीति उसमें स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।
बता दें कि विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आने के लिए विधायकों के टिकट के बंटवारे में अपनी रणनीति बदलने की योजना है। इसके चलते उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में पैराशूट की बजाए जमीनी नेताओं पर भाजपा दांव लगाने की रणनीति पर चर्चा हो रही है।
पार्टी में टिकट वितरण में असंतोष को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत नेताओं को तवज्जो देने की रणनीति बनाई जा रही है। पार्टी हाईकमान के आदेश पर उत्तराखंड में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट इसके लिए सभी मंत्री और विधायकों को अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता साबित करने को कहा गया है। इसकी शुरूआत भाजपा ने हरिद्वार से कर दी है।
पार्टी सूत्रों ने बताया कि हाल में हुई कोर ग्रुप की बैठक से पहले ही शीर्ष नेतृत्व साफ कर चुका है कि इस बार किसी भी मंत्री, विधायक को सीट बदलने की इजाजत नहीं दी जाएगी। इसके अलावा अलग अलग सीटों के मजबूत चेहरों को भी अपने अपने विधानसभा क्षेत्रों में ही सक्रियता के लिए कहा गया है। भाजपा ने पिछले चुनावों में कुछ नेताओं की सीट बदली थी तो कुछ दूसरे दलों से आए नेताओं को ऐन वक्त पर टिकट दे दिया था। इस वजह से कईई जगह पार्टी को आंतरिक असंतोष का भी सामना करना पड़ा। इसे देखते हुए इस बार केवल स्थानीय स्तर पर मजबूत और सक्रिय चेहरों पर ही दांव लगाने की योजना पर काम किया जा रहा है।
पार्टी के मंत्री, विधायकों को तो इस संदर्भ में साफ तौर पर संकेत दिए जा चुके हैं। भाजपा के करीब आधा दर्जन मंत्री और विधायक अपनी मौजूदा सीट को छोड़कर दूसरे स्थान से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। लेकिन शीर्ष नेतृत्व के फरमान की वजह से उनकी योजना को तगड़ा झटका लगा है। इसके साथ ही अपने क्षेत्र से बाहर तैयारी कर रहे नेताओं को भी इससे निराशा हाथ लग सकती है।
यही हाल कांग्रेस का भी है। कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस भी जमीनी नेताओं को तबज्जों देकर अपनी जीत सुनिश्चित करने की योजना बना रही है। हालांकि कांग्रेस की रणनीति अभी सिर्फ आक्रामक दिख रही है, लेकिन सूत्र बताते है कि आने वाले समय में कांग्रेस की बैठकों में स्पष्ट हो जाएगा कि चुनावी रण में उतरने के लिए क्या सही है और क्या गलत है। बता दें कि भाजपा जहां चुनावी रथ को तेजी के साथ आगे बढ़ा रही है वहीं कांग्रेस अभी रणनीति बनाने पर ही लगी है। इसका फायदा आने वाले विधानसभा चुनाव में किसे मिलेगा यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। लेकिन यह अवश्य है कि भाजपा और कांग्रेस सोशल मीडिया के लाइन कांसेप्ट और एआई की पहुंच को लेकर अपनी-अपनी रणनीति तय करने में लगी है।
बीजेपी में ‘भगदड़’ कांग्रेस में ‘फूट’
चुनाव से पूर्व राजनैतिक दलों का यह ट्रेंड आज नया नहीं
पार्टियों में ‘बगावत’ आम बात, प्रजातंत्र की है एक प्रक्रिया
दलों में जुड़ने व टूटने का सिलसिला रहता है लगातार जारी
देहरादून। राजनीति के अपने ही अलग और अनोखे रंग चुनावी साल में बार-बार दिखते है। उत्तराखंड में विधानसभा के चुनाव की घोषणा से पूर्व भाजपा में जहां ‘भगदड़’ मची है, वही कांग्रेस में ‘फूट’ भी सार्वजनिक हो गई है। चुनाव से पूर्व राजनैतिक दलों का यह ट्रेंड आज नया नहीं है। देश के इतिहास में अभी तक हुए चुनावों में यह सामान्य रूप से चलता आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा। क्योंकि यह राजनीति का ही एक अनोखा रूप है।
बता दें कि उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव से पूर्व सभी दल अपनी हलचलें तेज कर देते हैं और चुनाव आते-आते यह अपने चरम पर होती है। प्रदेश में दो प्रमुख दलों के बीच मुख्य मुकाबला होता है और यह मुकाबला किसी महाभारत से कम नहीं होता है। राजनैतिक दल इसके लिए एक साल से तैयारियों में लगे रहते है। एक-दूसरे दल से लोगों को तोड़ना और जोड़ना चुनाव से पूर्व लगा रहता है। इससे दलों में फूट और भगदड़ मचना स्वाभाविक है। प्रदेश में वैसे भी भाजपा और कांग्रेस में यह साफ देखा जाता है। हालांकि प्रदेश में क्षेत्रिय दल भी है, लेकिन इस दल से जुडे़ लोग दल में लंबे समय से है और दल के प्रति अपनी निष्ठा को निभाते है।
दूसरी ओर चुनावी साल में भाजपा-कांग्रेस में नेताओं का आना और जाना लगा रहता है। पहले यहां भाजपा की बात करें तो भाजपा वर्तमान समय में सत्ता में है और सत्ता के बल पर आगामी विधानसभा चुनाव में जीत के लिए अपनी पकड़ बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाने में लगी है। सरकार में रहते हुए भाजपा सभी कार्यकर्ताओं और नेताओं को तो खुश नहीं कर सकती है। इसलिए भाजपा से नाराज लोगों का कांग्रेस में जाना स्वाभाविक है। यह कहा जाए कि चुनावी साल में भाजपा में भगदड़ मची है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भी पिछले दिनों सामने आया है। भाजपा के छह बडे़ नेता कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके साथ ही अगर कांग्रेस के दावों को सच माने तो कई भाजपा नेता कांग्रेस में शामिल होने के लिए कांग्रेस के संपर्क में है। यह अपने आप में यह दर्शाता है कि भाजपा में भगदड़ मची है और आगे ओर भी भगदड़ मचेगी।
दूसरी ओर कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस में छह भाजपा नेताओं के शामिल होने के साथ ही फूट पड़ गई और यह फूट सावजनिक हो गई है। कांग्रेस के बडे़ नेता के राजनैतिक अवकाश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके साथ ही कांग्रेस ने प्रदेश की अपनी नये अध्यक्ष के साथ टीम अभी तक खड़ी नहीं की। इससे साफ संदेश जाता है कि कांग्रेस के अंदर फूट है और कांग्रेस में सब ठीक नहीं चल रहा है। कांग्रेस नेताओं के नाराज होने का क्रम जारी है और यह विधानसभा चुनाव में टिकट बटवारे तक जारी रह सकती है। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो पार्टियों में फूट,भगदड़ से राजनैतिक माहौल खराब होता ही है। इसके साथ ही चुनाव के समय इससे नुकसान भी होता है और यह क्रम दोनों दलों में जारी रहता है।
चुनावी साल में पार्टियों में ‘बगावत’ आम बात है और प्रजातंत्र की यह एक प्रक्रिया है। छोटे चुनाव हो या बडे़ यह होता ही है। देश की प्रमुख पार्टियों पर सभी की नजरें रहती हैं, लेकिन चुनाव के समय सभी दलों में यह सब चलता रहता है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के समय तो देश के प्रमुख दलों में अंतरकलह समान्य बात है और दलों में जुड़ने और टूटने का सिलसिला लगातार जारी रहता है। इसके फायदे और नुकसान चुनाव के समय दलों को होता है।
अंदरूनी असंतोष से बीजेपी में ‘विद्रोह’
क्रासर--भाजपा नेता के पीएम मोदी के बयान को कोट कर सन्यास लेने की धमकी से बना मामला संवदनशील
--अंदरूनी नाराजगी का चेहरा बने भाजपा नेता अजेंद्र अजय, कांग्रेस भी हो गई है मामले में सक्रिय
--आंतरिक कलह सार्वजनिक होने से भाजपा असहज, हाईकमान तक पहुंच गया है मामला
देहरादून। चुनावी साल में पार्टियों के नेताओं की नाराजगी कोई नई बात नहीं है। भाजपा में अंदरूनी असंतोष का हम पहले ही खुलासा कर चुके हैं, लेकिन इसके बाद भी पार्टी के अंदर किस तरह के हालात है यह बीकेटीसी के पूर्व अध्यक्ष की सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के बयान को कोट कर सन्यास लेने की धमकी से स्पष्ट हो गई है। वही दूसरी ओर कांग्रेस भी भाजपा के अंदरूनी असंतोष के मुद्दे को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए तैयार हो गई है।
राजनीतिक जानकार बताते है कि भाजपा आंतरिक कलह आज कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कई नेता सरकार और पार्टी को असहज कर चुके हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता अरविंद पांडे,बिशन सिंह चुफाल, चैंपियन,पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत सहित कई ऐसा नेता है जो समय-समय पर अपनी ही पार्टी और सरकार के खिलाफ बयानवाजी कर राजनीतिक हलकों में सुर्खियां बटोरते रहे हैं। इस बार मामला भाजपा के लिए पीएम मोदी के नाम का जिक्र होने के कारण संवेदनशील हो गया है।
बता दें कि उत्तराखंड राज्य में भाजपा की राजनीतिक स्थिति मजबूत मानी जाती है। दूसरी ओर समय-समय पर पार्टी के भीतर से उठने वाली नाराजगी की आवाजें नेतृत्व के लिए चुनौती बनती रही हैं। इसी कड़ी में अब अजेंद्र अजय का बयान चर्चा का विषय बन गया है, जो अंदरूनी असंतोष का परिणाम है। चुनावी साल में पार्टियों में खींचतान लगी रहती है। कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा में यह स्थिति बनना आम बात है। इस बार चुनाव से पहले भाजपा में खींचतान एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। बीकेटीसी के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा नेता अजेंद्र अजय के एक बयान ने न केवल पार्टी के अंदर हलचल मचा दी है, बल्कि विपक्ष को भी भाजपा पर हमला करने का मौका दे दिया है।
ज्ञात हो कि अजेंद्र अजय वाले प्रकरण में खास बात यह रही कि अजेंद्र ने अपनी नाराजगी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान से भी जोड़ा, जिसमें उन्होंने कहा था कि आने वाला दशक उत्तराखंड का दशक होगा। अजेंद्र अजय का कहना था कि यदि सच में राज्य के लिए यह दशक महत्वपूर्ण बनने वाला है, तो राज्य में व्यवस्थाओं और कामकाज में भी उसी स्तर की गंभीरता दिखाई देनी चाहिए। अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ाकर अजेंद्र ने जहां पार्टी के अंदर हलचल पैदा कर दी है। वहीं दूसरी ओर विपक्ष को भी हमलावर होने का मौका दे दिया है।
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मामले में की कांग्रेस ने एंट्री
भाजपा में हलचल के बीच कांग्रेस सक्रिय होकर सरकार और भाजपा को घेरने की रणनीति बना रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा के भीतर बढ़ती नाराजगी का संकेत बताया है। उन्होंने कहा कि अजेंद्र अजय ने जो कहा है, वह केवल उनकी व्यक्तिगत राय नहीं है, बल्कि भाजपा के कई कार्यकर्ताओं की भावना को दर्शाता है।
उत्तराखंड में बढ़ने लगी चुनावी ‘सरगर्मी’
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027
भाजपा और कांग्रेस चुनावी मोड में
पार्टियों के बडे़ नेताओं के दौरे शुरू
देहरादून। चुनावी साल में भाजपा और कांग्रेस की गतिविधियां तेज हो गई हैं। एक ओर भाजपा जहां तेज गति से अभी से चुनावी गतिविधियों में जुट गई है वहीं कांग्रेस भी चुनाव की तैयारियों में जुट गई है। गैरसैंण में बजट सत्र के बाद राजनीतिक गलियारों में गतिविधियां तेज होने की संभावना है।
उत्तराखंड में चुनावी सरगर्मी बढ़ती दिखाईईदे रही है, बीजेपी जहां संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर पूरी सक्रियता के साथ मैदान में उतर चुकी है तो वहीं कांग्रेस भी अपनी तैयारियों को गति देने की कोशिश में लगी है। पार्टियों के बड़े नेताओं की मौजूदगी, संगठनात्मक गतिविधियों और राजनीतिक कार्यक्रमों को देखें तो दोनों दलों सक्रिय हो गये हैं। प्रदेश में जहां बीजेपी अपनी मौजूदा सरकार के चार साल पूरे होने का जश्न मनाने की तैयारी में जुटी हुई है और इसे चुनावी हवा तैयार करने की दिशा में कार्य कर रही है।
दरअसल, वर्तमान सरकार को 23 मार्च को चार साल पूरे होने जा रहे हैं। ऐसे में सरकार अपनी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान चलाने की तैयारी कर रही है। विभिन्न जिलों में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें सरकार के चार साल के कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाया जा रहा है। भाजपा इसे पूर्ण रूप से भूनाने के मूड में है।
वही कांग्रेस प्रदेश स्तर पर कुछ सक्रिय जरूर दिख रही है, लेकिन पार्टी अभी तक चुनावी मोड में नजर नहीं आ रही है और संगठनात्मक गतिविधियों की रफ्तार बीजेपी की तुलना में काफी धीमी दिखाई देती है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सक्रिय हैं, लेकिन पार्टी अभी तक चुनावी मोड में कम दिख रही है।
कांग्रेस और बीजेपी में ‘जंग’
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां में अभी से आ गई है तेजी
कांग्रेस प्रदेश सरकार की नाकामियों को लेकर भाजपा को घेरने की कर रही तैयारीं
भाजपा ने बनाई सरकार की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जाने की रणनीति
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसकी सरगर्मियां अभी से तेज हो गई हैं। चुनाव से पहले कांग्रेस और बीजेपी ने एक दूसरे को घेरने के लिए अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस भाजपा सरकार की नामामियों को उजागर करने की रणनीति पर कार्य कर रही है। दूसरी ओर भाजपा अपनी उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड जनता के बीच ले जाने को तैयार है।
बता दें कि चुनावी साल में देश के प्रमुख दलों में ‘जंग’ होना स्वाभाविक है। इसके लिए दोनों दल चुनाव से एक साल पहले ही तैयारी कर लेते हैं और चुनाव आते-आते दोनों दलों की जंग तेज हो जाती है। अकेले उत्तराखंड की बात करें तो सूबे में सत्ता पर बारी-बारी से अभी तक भाजपा और कांग्रेस ने राज किया है। पिछले दो चुनाव हालांकि भाजपा ने जीतकर कांग्रेस को पटखनी अवश्य दी है, लेकिन इस बार भाजपा के लिए भी विधानसभा चुनाव की जंग आसान नहीं है। क्योंकि सत्ता से दूर बैठी कांग्रेस पिछले लंबे समय से प्रदेश में सरकार विरोधी हवा बनाने में लगी है और चुनाव से पूर्व इसकी लपटें भाजपा के अभियान को प्रभावित कर सकती हैं।
चुनाव की घोषणा से पूर्व भाजपा कांग्रेस की जंग तेज होती दिख रही है। भाजपा जहां अपने पिछले चुनाव के वायदों को पूरा करने के साथ ही प्रदेश सरकार की उपलब्धियों को लेकर मैदान में जाने की तैयारी कर रही है। भाजपा प्रदेश सरकार के कई फैसलों को लेकर जनता के बीच जाने का मन बना चुकी है। क्योंकि प्रदेश की सरकार के कई फैसले देश में नजीर बने हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो आगामी चुनाव में इसका भाजपा को फायदा भी मिलेगा। वही दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश सरकार की उपलब्धियों को मात्र दिखावा मान रही है। कांग्रेस सूत्रों की माने तो विधानसभा चुनाव में प्रदेश सरकार की नाकामियों को लेकर उतरा जाएगा। प्रदेश सरकार और भाजपा चाहे जितने भी दावे कर ले, लेकिन प्रदेश की जनता आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। इसके साथ ही प्रदेश सरकार ने जिस तरह की कार्यसंस्कृत को ईजाद किया है यह प्रदेश के भविष्य के लिए हानिकारक है।
सूबे में विधानसभा चुनाव की अभी घोषणा होना बाकी है। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस की जंग शुरू हो गई है। विधानसभा चुनाव तक यह जंग विकराल रूप धारण कर लेगी और इसके दुष्परिणाम चुनाव परिणाम पर पडे़गे। सत्ता भाजपा के हाथ में रहती है या फिर कांग्रेस के हाथ चली जाएगी, यह तो बाद में पता चलेगा। लेकिन चुनावी मैदान में उतरने से पहले दोनों ही दल अपनी-अपनी तैयारियों में लगकर खुद को मजबूत करने में लगे हैं। हालांकि दोनों दल मैदान में उतर चुके हैं और अपनी उपस्थिति जनता के सामने प्रदर्शित कर रहे हैं, जबकि विधानसभा के चुनाव की घोषणा होना अभी बाकी है।
पिटकुल मामले में ‘जन प्रहार’
हाईकोर्ट के आदेश के बाद पिटकुल और शासन-प्रशासन में मची है खलबली
दून में आयोजित पत्रकार वार्ता में जन प्रहार ने मामले में की पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग
जन प्रहार ने प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर खडे़ किए कई सवाल
देहरादून। पिटकुल को लेकर जन प्रहार ने सरकार पर निशाना साधते हुए एक बड़ी अनियमितता की आशंका जताई है। प्रदेश में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के बहुत दावे हो रहे है, लेकिन शासन-प्रशासन प्रकरण में क्या कर रहा है। यह स्पष्ट नहीं है। दून में आयोजित पत्रकार वार्ता में जन प्रहार के प्रदेश सयोजक सुजाता पाल और सह सयोजक पंकज क्षेत्री ने प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खडे़ किए हैं।
बता दें कि उत्तराखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पिटकुल के एमडी प्रकाश चंद्र ध्यानी की नियुक्ति को 2021 के चयन नियमों का उल्लंघन माना, जिसके अनुसार एमडी के पास इंजीनियरिंग की डिग्री होनी चाहिए। कोर्ट ने सरकार को बार-बार निर्देश देने के बावजूद, 3 साल से तैनात अधिकारी को न हटाने पर सख्त रुख अपनाया और प्रमुख सचिव ऊर्जा आर. मीनाक्षी सुंदरम को 19 मार्च तक पेश होने को कहा है। यहां सबसे खास बात यह है कि पिटकुल एक तकनीकी संस्था है, लेकिन पीसी ध्यानी के पास अपेक्षित योग्यता नहीं थी। इसका संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने आदेश जारी किए।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद पिटकुल में खलबली मच गई और उस दिन से लेकर आज दिन में पिटकुल में अपनों को फायदा दिलाने के लिए अलग ही घटनाक्रम चल रहा है। इन घटनाक्रमों के बीच यह भी सामने आ रहा है कि सरकार द्वारा पिटकुल के प्रबंध निदेशक पद से संबंधित नियमों में नए सिरे से बदलाव करने के पश्चात नई नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की जा रही है। पूरे प्रशासनिक घटनाक्रम की पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े होते हैं। यदि वास्तव में नियमों में बदलाव किसी एक व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया जा रहा है, तो यह प्रशासनिक सि(ांतों और न्यायिक व्यवस्था की भावना के विपरीत है।
पत्रकार वार्ता में हाईकोर्ट में मामले के केस में पक्षकार दीप्ति पोखरियाल, सुजाता पाल, पंकज सिंह क्षेत्री, प्रदेश प्रवक्ता रविंद्र सिंह गुंसाई आदि थे।
पूरे मामले का यह है घटनाक्रम
18 फरवरी -उच्च न्यायालय उत्तराखंड ने पिटकुल के प्रबंध निदेशक प्रकाश चंद्र ध्यानी की नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया।
22 फरवरी-मामले में जन प्रहार द्वारा मीडिया के माध्यम से सरकार से स्पष्टीकरण मांगा गया और न्यायालय के आदेश के अनुपालन को लेकर प्रश्न उठाए गए।
23 फरवरी-प्रकरण की जानकारी महालेखा परीक्षक को भी प्रेषित की गई ताकि मामले की निष्पक्ष जांच हो सके।
24 फरवरी-मुख्य सचिव से मुलाकात कर उन्हें पूरे मामले से अवगत कराया गया और न्यायालय के आदेश के अनुपालन को लेकर स्थिति स्पष्ट करने का आग्रह किया गया।
26 फरवरी-कैबिनेट बैठक के सभी निर्णय सार्वजनिक किए, लेकिन राज्य के तीनों निगमों के प्रबंध निदेशक और निदेशक पदों के नियम के बदलाव सार्वजनिक नहीं किया गया।
27 फरवरी प्रमुख सचिव ऊर्जा को समन जारी कर 19 मार्च को न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया।
जन प्रहार ने पिटकुल मुख्यालय के बाहर ऊर्जा मंत्री का प्रतीकात्मक पुतला दहन कर विरोध दर्ज किया
3 मार्च - पिटकुल और यूपीसीएल के निदेशक पदों पर नियुक्ति की चल रही प्रक्रिया के अंतर्गत चयन साक्षात्कार स्थगित।
जन प्रहार ने की मांग
-पिटकुल के एमडी पद से जुड़े सभी आदेश और निर्णय सार्वजनिक किए जाएं।
-नियमों में हालिया बदलाव की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जाए।
-न्यायालय के आदेश के अनुपालन की स्थिति स्पष्ट की जाए।
-यदि किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो इसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए।
-आवेदन करते समय अभ्यर्थियों की उम्र 45 से 58 वर्ष से 45 से 60 वर्ष क्यों कर दी गईई?
-टेक्निकल पद पर टेक्निकल क्वालिफिकेशन की अर्हता क्यों समाप्त की गई?
मुख्य सचिव से भी मिल चुका है मामले में जन प्रहार का प्रतिनिधिमंडल
बता दें कि इससे पूर्व भी जन प्रहार उत्तराखंड के प्रतिनिधिमंडल ने मामले में मुख्य सचिव से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा और पिटकुल एमडी प्रकाश चंद्र ध्यानी को तत्काल बर्खास्त करने की मांग की है। आदेश में पिटकुल के प्रबंध निदेशक प्रकाश चंद्र ध्यानी की नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया गया है। जन प्रहार के सह संयोजक पंकज सिंह क्षेत्री ने कहा कि यह मामला पिटकुल के एमडी प्रकाश चंद्र ध्यानी की नियुक्ति का ही नहीं, बल्कि उनके पद पर लगातार कार्यरत रहकर सामान्य रूप से कार्य करने से शासन की पारदर्शिता, नियमों के पालन और सार्वजनिक धन की सुरक्षा से जुड़े सवालों को खड़ा करता है।
राजधानी पर भाजपा-कांग्रेस की ‘चुप्पी’
हर चुनाव में राजनैतिक दलों का मुद्दा बन जाता है गैरसैंण
चुनाव खत्म होते ही राजधानी पर नहीं करता है कोई भी बात
हकीकत में प्रदेश के आमजन की हसरत आज भी है अधूरी
देहरादून। चुनावी साल में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर यह तो प्रजातंत्र में नेताओं के लिए खजाना है और इस खजाने से कब कौन सा अस्त्र बाहर निकालना है यह नेताओं को खूब पता होता है। बात चली है तो भाजपा और कांग्रेस के उस सफेद झूठ के बारे में करते हैं, जिसे बोलकर सत्ता पर काबिज होना इन दोनों दलों को अच्छी तरह से आता है। यह मुद्दा है प्रदेश की राजधानी की। राज्य बने 25 साल हो गए, लेकिन आज भी राज्य की राजधानी का मुद्दा हर चुनाव के समय उठ जाता है और शुरू हो जाता है आरोप-प्रत्यारोपों का दौर।
बता दें कि वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बना और राज्य की देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाया गया। उस समय भी यह उम्मीद जताईई गई थी कि भविष्य में राजधानी के प्रश्न पर व्यापक विचार किया जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे समय बीतता गया और अस्थायी राजधानी स्थायी व्यवस्था का रूप लेती चली गई। राज्य के लोगों की गैरसैंण राजधानी की मांग धूमिल होती चली गई। नेताओं को अपने ठाठ-बाठ के लिए पहाड़ चढ़ना मंजूर नहीं था और नेतागिरी करने के लिए यह मुद्दा तो लंबा चलाना था। साल-दर-साल चुनाव होते रहे, गैरसैंण का मुद्दा चुनाव के समय उठता रहा, लेकिन हकीकत आज भी यह है कि आमजन की हसरत आज भी अधूरी है।
इसके साथ ही जब-जब गैरसैंण पर बात हुई तो कुछ न कुछ हुआ और इसी का परिणाम था कि जब भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन का निर्माण हुआ तो पहाड़ के लोगों के भीतर एक नईई आशा जगी। उन्हें लगा कि शायद अब राज्य की सत्ता धीरे-धीरे पहाड़ की ओर लौटेगी। लेकिन आज भी कभी कभार सपने की तरह यहां नेताओं को हुजूम उमड़ता है और कुछ दिन मौज-मस्ती पर फिर गैरसैंण बीरान हो जाता है।
आज की स्थिति यह है कि भराड़ीसैंण का विधानमंडल परिसर अत्यंत भव्य और आधुनिक है। वहां विधानसभा भवन, विधायक आवास, अधिकारियों के आवास और कईई अन्य बुनियादी ढांचे विकसित किए गए हैं। इन परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। लेकिन इन सबके बावजूद साल भर में केवल कुछ ही दिनों के लिए वहां विधानसभा सत्र आयोजित होता है।
अब चुनावी साल है और भाजपा कांग्रेस का यह फिर मुद्दा होगा, लेकिन सिर्फ चुनावी। चुनाव खत्म होते ही सभी नेता देहरादून में एसी की हवा खाने में मस्त हो जाएंगे और पांच साल तक चप्पी साधे रहेंगे। हर चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ने गैरसैंण को लेकर सफेद झूठ बोला है और आगे भी बोलेंगे। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर राजनैतिक दलों ने गैरसैंण की समस्या का समाधान कर दिया तो आने वाले समय में किस बात की राजनीति करेंगे। शायद यही कारण है कि आज भी इस मुद्दे को दोनों दल अलझाये हुए हैं।
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लंबे समय बाद दिखे भाजपा प्रदेश प्रभारी दुष्यंत
लंबे समय बाद भाजपा के प्रदेश प्रभारी एवं राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत गौतम प्रदेश में दिखे। भाजपा की संगठनात्मक बैठक में भाग लेने के लिए पहुंचे थे। देहरादून में कुआंवाला में आयोजित बैठक में गौतम ने मुख्यमंत्री धामी को 4 वर्ष पूरे करने वाले पाटीं के पहले मुख्यमंत्री बनने की बधाईई दी। उनके कार्यकाल की प्रशंसा करते हुए कहा, वह आंदोलनकारियों के सपनों के अनुरूप राज्य का निर्माण कर रहे हैं। े जनता के मन जीतने का तो काम कर ही रहे हैं, साथ ही पीएम मोदी के कहे अनुशार उत्तराखंड का दशक लाने के लिए जी जान से जुटे हैं। उनके नेतृत्व में आपदा का भी समाधान निकालकर, राज्य आज विकसित भारत के मिशन में सर्वोपरि नामों में शुमार है।
टिकट बंटवारे का ‘फार्मूला’ फिलहाल फाइनल
फ्लैग--आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टियों की रणनीति तय
--भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेता स्थानीय नेताओं की खंगाल रहे कुंडली
--पार्टी हाईकमान प्रदेश में जिताउ और टिकाउ प्रत्याशी की कर रही खोज
--भाजपा संगठन संभावित प्रत्याशियों के ग्राउंड जीरों की ले रही है टोह
--कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का दल भी प्रदेश के दौरों में हो गया है व्यस्त
देहरादून। चुनावी साल में राजनैतिक दलों की तैयारियां दिन-प्रतिदिन तेज हो रही है। राजनैतिक दल अपनी रणनीति तय करने के लिए स्थानीय और हाईकमान स्तर पर बैठकों में तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगे है। राजनैतिक विशेषज्ञों की मानें तो पार्टियों के लिए सबसे बड़ी समस्या टिकट बंटवारा होता है। इसके लिए दलों ने अपना फार्मूला तय कर दिया है। कांग्रेस और भाजपा के सूत्रों की माने तो टिकट को लेकर फाइनल गाइडलाइन जारी कर दी गई है।
बता दें कि सूबे में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। हालांकि अभी चुनाव आयोग ने इसकी घोषणा तो नहीं की है, लेकिन राजनैतिक दलों ने अभी से अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। क्योंकि टिकट बटवारे को लेकर भाजपा और कांग्रेस में घमासान मच जाता है। शायद इसी कारण पार्टियों ने अपना फार्मूला तय कर दिया है। हालांकि चुनाव की घोषणा होते-होते इसमें कई बदलाव देखने को मिलते है, लेकिन राजनैतिक दलों की पहली प्राथमिकता रहती है कि टिकट बंटवारे को लेकर घमासान कम मचे। इसलिए सभी दल पहले से यह तय कर लेते हैं कि किस मापदंड के हिसाब से टिकटों का बंटवारा करना है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा और कांग्रेस में अंदरखाने चल रही बैठकों में यह तय हो गया है और इसके लिए भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेताओं को संभावित प्रत्याशियों की कुंडली खंगालने के काम पर लगा दिया गया है।
राजनैतिक सूत्र बताते हैं कि पार्टी हाईकमान मैदान में उन्हीं नेताओं को उतारेगी, जो जिताउ हो और सीट पक्की हो। इसके लिए दल सभी बिंदूओं पर कार्य कर रही है। क्षेत्र में जिस नेता की जितनी पकड़ उतनी उस नेता के जीतने के चांस ज्यादा रहते है। भाजपा की बात करें तो भाजपा की वर्तमान में सरकार है और भाजपा में ही सबसे अधिक टिकट को लेकर घमासान मचने की संभावना है। इसी को देखते हुए भाजपा ने अपनी टीम को सक्रिय कर दिया है। भाजपा की टीम अंदरखाने संभावित प्रत्याशियों की कुंडली खंगालने का कार्य कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस के बडे़ नेताओं की उत्तराखंड दौरे भी इसी कारण लग रहे है। कांग्रेस भी चाहती है कि उनका संभावित प्रत्याशी वह हो जो जीत दर्ज कर सके। इसके लिए कांग्रेस भी हर एंगिल से जांच करने में जुटी है।
ज्ञात हो कि विधानसभा चुनाव के समय टिकट बंटवारों को लेकर दलों में घमासान मचता है। इसको कम करने के लिए दल अभी से तैयारी में लग जाते है। वर्तमान एआई के युग में हालांकि यह सब बहुत सरल हो गया है, लेकिन जमीनी हकीकत के लिए जमीन पर जाना आवश्यक है। इसी रणनीति के तहत दल कार्य कर रहे है। प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेताओं के दौरों को लेकर राजनैतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों दल अपनी जीत को पक्की करने के लिए सभी हथकंडे अपना रहे हैं। प्रत्याशियों की खोज जमीन पर जाकर ही पूरी हो सकती है। इसके लिए पार्टी जिताउ और टिकाउ संभावित प्रत्याशी की खोज कर रही है। भाजपा संगठन और कांग्रेस संगठन ग्राउंड जीरों का कार्यकर्ताओं की टोह लेने में लगी है। इसके लिए दोनों दलों के नेताओं और संगठन के पदाधिकारियों के प्रदेश में दौरे शुरू हो गए है।
ध्याण: मैत की ‘महक’ और ससुराल की ‘साख’
उत्तराखंड के पहाड़ों की परंपरा का अनोखा और अटूट रिश्ता
---बेटी ससुराल जाती है ‘ध्याण’ बनकर जोड़ती है दो रिश्तों को
---दो परिवारों, दो गांवों और दो संस्कृतियों का है आपसी मिलन
---पहाड़ के गांवों में ध्याण का मायके से रिश्ता होता है बेहद खास
संतोष बेंजवाल
देहरादून। पहाड़ के लोक-जीवन में ‘ध्याण’ मात्र एक शब्द नहीं, बल्कि एक संपूर्ण संस्कृति और सम्मान का प्रतीक है। हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों में जब कोई बेटी ब्याह कर ससुराल की देहरी लांघती है, तो वह केवल एक ‘वधू’ की नई पहचान नहीं पाती, बल्कि अपने मायके के लिए वह ‘ध्याण’ के एक पूजनीय और भावनात्मक रिश्ते में बंध जाती है।
पहाड़ की परंपराओं के अनुसार विवाहित बेटी को ध्याण कहा जाता है। वह एक ऐसा जीवंत सेतु है जो दो परिवारों, दो गांवों और दो संस्कृतियों को आपस में जोड़ती है। बुजुर्ग कहते हैं कि जिस घर की ध्याण खुशहाल होती है, उस घर की सात पीढ़ियां तर जाती हैं। मैत के लिए वह आज भी वही छोटी बच्ची है जो कभी गांव की पगडंडियों पर दौड़ती थी, जबकि ससुराल के लिए वह घर की मर्यादा और लक्ष्मी का रूप है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में बोली जाने वाली भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भावनाओं की गहराई को व्यक्त करने का जरिया भी है। यहां के शब्दों में रिश्तों की गर्माहट और जीवन की सादगी साफ झलकती है। पहाड़ी समाज में ‘ध्याण’ का अर्थ केवल एक विवाहित बेटी नहीं, बल्कि वह भावनात्मक पहचान है, जिसमें बेटी दूर रहकर भी अपने घर की आत्मा बनी रहती है। विवाह के बाद उसका घर बदल जाता है, जिम्मेदारियां बदल जाती हैं, लेकिन मायके के प्रति उसका स्नेह और अधिकार वैसा ही बना रहता है।
पहाड़ के गांवों में ध्याण का मायके से रिश्ता बेहद खास होता है। साल भर में जब भी वह मायके आती है, तो घर का माहौल बदल जाता है। उसके आने से आंगन में फिर से रौनक लौट आती है। मां-बाप के चेहरे पर संतोष और खुशी दिखाई देती है, जबकि भाई-बहनों के लिए यह मिलन पुराने दिनों की यादों को ताजा कर देता है। पहाड़ में त्योहार, मेलों और विशेष अवसरों पर ध्याण को मायके बुलाने की परंपरा रही है। यह सिर्फ एक सामाजिक रिवाज नहीं, बल्कि उस भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है, जो समय और दूरी के बावजूद कायम रहता है।
पहाड़ी समाज में बेटी की विदाई हमेशा भावुक क्षण होता है। ध्याण के रूप में उसकी पहचान उस दर्द को भी समेटे होती है, जो उसे मायके से दूर होने पर महसूस होता है। लेकिन यही दूरी हर मुलाकात को और भी खास बना देती है। जब ध्याण मायके लौटती है, तो वह सिर्फ एक बेटी नहीं, बल्कि खुशियों का पूरा संसार लेकर आती है। उसकी उपस्थिति घर के हर कोने को जीवंत कर देती है।
‘ध्याण’ का आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी जड़ों के प्रति उसका लगाव कम नहीं हुआ है। वह आज भी अपनी लोक-संस्कृति की सबसे बड़ी संवाहक है। ‘ध्याण’ आज भी पहाड़ की संस्कृति और संवेदना यह उस अटूट रिश्ते की पहचान है, जो बेटी के ससुराल जाने के बाद भी मायके से कभी नहीं टूटता। आज बेटियां शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं। इसके बावजूद ध्याण की परंपरा और उससे जुड़ी भावनाएं आज भी पहाड़ों में उतनी ही मजबूत हैं।
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लोक गीतों में ध्याण की गूंज
पहाड़ की अस्मिता और ध्याण का रिश्ता इतना गहरा है कि हमारे लोक गीत इसके बिना अधूरे हैं। उंची डांडियों मा बांज-बुरांश फूलिगे, पर मेरो भाई भिटौली ले के नी औई...। यह पंक्तियां उस ध्याण की पीड़ा और प्रतीक्षा को दर्शाती हैं, जो ससुराल के कठिन श्रम के बीच अपने मायके की यादों में डूबी रहती है।
नंदा है देवभूमि की सबसे बड़ी ध्याण
उत्तराखंड की आराध्य देवी मां नंदा को भी राज्य की ध्याण माना जाता है। नंदा राजजात यात्रा दरअसल एक ध्याण की अपने ससुराल जाने की ही विदाई यात्रा है। जब मां नंदा को विदा किया जाता है, तो हर पहाड़ी की आंख इसलिए नम होती है क्योंकि वह अपनी ही घर की बेटी यानी ध्याण को विदा कर रहा होता है।
राज्यों के चुनाव नतीजों ने बदली देश की राजनीति
बंगाल में ‘कमल’, तमिलनाडु में विजय का ‘धमाका’
केरल में उलटफेर, असम-पाडुचेरी में एनडीए का दबदबा
परिणामों से बदला पावर बैलेंस, दलों के लिए नई चुनौती
विस चुनाव परिणामों में दिख गया मतदाता का बदला मूड
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों ने देश की राजनीति की दिशा बदलने की उम्मीद है। पांच राज्यों के चुनावी समर में जहाँ पश्चिम बंगाल में सत्ता का ऐतिहासिक परिवर्तन देखने को मिल रहा है, वहीं तमिलनाडु में फिल्मी पर्दे से राजनीति में उतरे अभिनेता विजय ने सबको चौंका दिया है।
पांच राज्यों में हुए विधानसभा के चुनाव परिणाम के रुझानों के अनुसार
इस बार सबसे बड़ा उलटफेर पश्चिम बंगाल में होने वाला है, जहाँ भाजपा ने दो-तिहाई बहुमत के साथ टीएमसी के 15 साल के शासन को उखाड़ फेंकने की दिशा में आगे बढ़ रही है। रुझानों के अनुसार बीजेपी 190 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की ओर है। सोनार बांग्ला के नारे ने इस बार जमीन पर काम किया और ममता बनर्जी का खेला उन पर ही भारी पड़ता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हार की संभावना और तृणमूल के बड़े मंत्रियों का पिछड़ना इस बात का संकेत है कि जनता ने पूरी तरह से बदलाव के लिए वोट किया है।
दूसरी ओर दक्षिण भारत की राजनीति में आज एक नया सितारा उभरा है। अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्टी कड़गम ने अपने पहले ही चुनाव में द्रविड़ राजनीति के दिग्गजोंकृको कड़ी टक्कर दी है। उनकी पार्टी 100 से ज्यादा सीटों पर आगे चल रही है, जिससे एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता से बाहर होती दिख रही है। इसके साथ ही केरल में हर पांच साल में सत्ता बदलने का रिवाज फिर से लौटने वाला है। पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली एलडीएफ को इस बार बड़ी शिकस्त मिल रही है। यहां लोगों ने एंटी-इंकंबेंसी और भ्रष्टाचार के मुद्दों ने केरल की जनता को विकल्प चुनने पर मजबूर किया।
पूर्वाेत्तर में बीजेपी का किला अभेद्य बना हुआ है। असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन ने 80 से अधिक सीटें जीतकर हैट्रिक की ओर है। वही पाडुचेरी में यहाँ एन. रंगासामी की पार्टी और बीजेपी गठबंधन फिर से सरकार बनाने जा रही है।
बता दें कि पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम से बंगाल में बीजेपी की जीत और तमिलनाडु में विजय का उदय आने वाले 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए एक नया नैरेटिव तैयार हो रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभी तक के चुनाव परिणाम आने वाले राष्ट्रीय चुनावों के लिए संकेतक साबित हो सकते हैं, जहां भाजपा अपने संगठन विस्तार और योजनाओं के दम पर आगे बढ़ने की कोशिश करेगी, वहीं विपक्षी दल इन नतीजों से सीख लेकर अपनी रणनीति को धार देंगे। पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय लोकतंत्र में मतदाता का मिजाज तेजी से बदल रहा हैकृऔर यही बदलाव आने वाले समय में राजनीति की दिशा तय करेगा।
सूखती ‘जल धाराएं’ और प्यासे ‘पहाड़’
सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां भी हो गई लुप्त
पहाड़ के गांवों में सदियों पुरानी जल संस्कृति पर संकट
अनियोजित विकास और जलवायु परिवर्तन बना कारण
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ी गांव पलायन के कारण आज खाली हो गए हैं और इसके साथ ही पहाड़ की वह विरासत भी खत्म होने के कगार पर है। आज वह विरासत भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही जो सदियों से यहां के गांवों की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र होती थी। यहां बात हो रही है हिमालय की वादियों में स्थित गांवों में सदियों से प्यास बुझाते आ रहे पारंपरिक जल स्रोत ‘धारा’ और ‘नौले’ की। यह प्राकृतिक जल स्रोत, आधुनिकता की चकाचौंध और जलवायु परिवर्तन की मार के कारण धीरे-धीरे सूखने की कगार पर हैं।
पहाड़ के जीवन में पारंपरिक जल स्रोत ‘धारा’ और ‘नौले’ का विशेष महत्व रहा है। यह ‘धारा’ और ‘नौले’ सिर्फ प्यास ही नहीं बुझाते थे, बल्कि यह गांवों में सामुहिकता की एक मिशाल थी। सुबह-शाम ‘धारा’ और ‘नौले’ के आसपास महिलाओं और ग्रामीणों का जमावड़ा लगता था, जिससे आपसी संवाद और सामुदायिक एकता मजबूत होती थी। कई स्थानों पर धाराओं के पास देवस्थल भी बनाए गए, जहां लोग जल को पवित्र मानकर उसकी पूजा करते हैं।
गांवों में स्थानीय लोगों ने पीढ़ियों से इन जल स्रोतों को संरक्षित रखने के लिए प्राकृतिक संतुलन बनाए रखा। धारा के आसपास के जलग्रहण क्षेत्र में पेड़-पौधों का संरक्षण किया जाता था और वहां किसी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं होने दिया जाता था। यही कारण था कि यह स्रोत सालभर पानी उपलब्ध कराते थे। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में यह सब नहीं हो रहा है और लोग मोबाइल और टीबी पर चिपके रहते हैं। इस कारण प्राकृतिक जलस्रोत भी आज अकेले होकर दम तोड़ने लग गए है।
विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ यही एक कारण नहीं है बल्कि वनों की अंधाधुंध कटाई, सड़क और भवन निर्माण, और जलवायु परिवर्तन इसके प्रमुख कारण हैं। पहाड़ों में हो रहे अनियोजित विकास ने जलग्रहण क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाया है। इसके अलावा, गांवों से हो रहे पलायन के चलते इन स्रोतों की नियमित देखरेख भी कम हो गई है। धाराओं के सूखने से गांवों में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। कई क्षेत्रों में अब लोगों को दूर-दराज से पानी लाना पड़ता है या फिर सरकारी टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इससे न केवल दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है, बल्कि पारंपरिक जीवनशैली भी टूट रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते इन स्रोतों के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है। जलग्रहण क्षेत्रों में पौधरोपण, वर्षा जल संचयन और पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देने जैसे उपाय कारगर साबित हो सकते हैं। साथ ही, स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी बेहद जरूरी है।
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प्रकृति का अद्भुत इंजीनियरिंग कौशल
पहाड़ में पानी के प्राकृति स्रोत केवल पानी निकालने की जगह नहीं, बल्कि प्राचीन इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना हैं। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, पहाड़ की आंतरिक परतों से छनकर आने वाला यह पानी न केवल मिनरल्स से भरपूर होता है, बल्कि प्राकृतिक रूप से फिल्टर भी होता है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि धाराओं का पानी औषधीय गुणों से युक्त होता है, जो पेट की बीमारियों और पथरी जैसी समस्याओं में रामबाण माना जाता था।
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संस्कृति और परम्परा का संगम
पहाड़ में धाराओं का महत्व केवल प्यास बुझाने तक सीमित नहीं है। देवभूमि की परंपराओं में धारा पूजन का विशेष स्थान है। नवविवाहित वधू का पहली बार धारा पर जाकर पूजा करना इस बात का प्रतीक है कि जल ही जीवन का मूल है। सिंहमुख और गरुड़मुख जैसी कलाकृतियों से सजे ये स्रोत स्थापत्य कला का भी उत्कृष्ट उदाहरण पेश करते हैं।
‘आस्था’ के द्वार से ‘सियासी’ दस्तक
फ्लैग---कांग्रेस ने बदला अपना गेम प्लान, अब मंदिर की सीढ़ियों से करेगी चुनावी शंखनाद
---कांग्रेस के लिए प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा का गढ़वाल दौरा अहम
---उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल से इस बार से सियासत का नया अध्याय
---कांग्रेस पार्टी अब आस्था के जरिए जनता से जुड़ने की कोशिश करेगी
देहरादून। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल से इस बार सियासत का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। कांग्रेस ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर जैसे प्रमुख धामों से करने का फैसला लिया है, जिससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि इस बार आस्था के केंद्र सियासी संदेशों के प्रमुख मंच बनेंगे।
कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा का गढ़वाल दौरा प्रमुख धार्मिक स्थलों पर केंद्रित रहेगा, जो यह संकेत देगा है कि पार्टी अब आस्था के जरिए जनता से जुड़ने की कोशिश करेगी। ज्ञात हो कि अब तक उत्तराखंड की राजनीति में धार्मिक मुद्दों और सनातन आस्था के प्रतीकों पर मुख्य रूप से भाजपा की पकड़ मजबूत मानी जाती रही है। भाजपा ने लंबे समय से धार्मिक आयोजनों और आस्था से जुड़े प्रतीकों को अपनी राजनीति का अहम हिस्सा बनाया है, लेकिन अब कांग्रेस भी उसी पिच पर उतरती नजर आ रही है, जिससे सियासी मुकाबला और दिलचस्प होने की संभावना है।
बता दें कि कांग्रेस की गढ़वाल क्षेत्र के रुद्रप्रयाग, चमोली और अन्य जिलों में प्रस्तावित बैठकों को केवल संगठनात्मक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जा रहा है। यह कार्यक्रम स्थानीय भावनाओं को समझने और उनसे जुड़ने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इन इलाकों में धार्मिक आस्था का गहरा प्रभाव है, ऐसे में यहां से सियासी संदेश देना बेहद प्रभावी माना जाता है। कुमारी शैलजा का यह दौरा 6 मई से शुरू होने जा रहा है। वह सबसे पहले )षिकेश पहुंचेंगी, जहां वह रात्रि विश्राम करेंगी। इसके बाद 7 मई से उनके राजनीतिक कार्यक्रमों की शुरुआत होगी। इस दिन वह श्रीनगर में जिला कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करेंगी और संगठन की स्थिति का जायजा लेंगी।
8 मई को उनका कार्यक्रम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब वह केदारनाथ धाम पहुंचेंगी और वहां पूजा-अर्चना करेंगी। यह दौरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दृदृष्टि से भी अहम होगा। इसी दिन वह अगस्त्यमुनि में कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगी और इसके बाद रुद्रप्रयाग में भी जिला स्तर के नेताओं के साथ बैठक करेंगी। इसके अगले दिन यानी 9 मई को उनका दौरा चमोली जिले में रहेगा, जहां वह बदरीनाथ धाम पहुंचेंगी और वहीं रात्रि विश्राम करेंगी। 10 मई को सुबह वह बदरीनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगी और इसके बाद जोशीमठ में कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगी। इस दौरान पार्टी की रणनीतियों और आगामी चुनावों को लेकर चर्चा की जाएगी।
11 मई को कुमारी शैलजा टिहरी गढ़वाल के चंबा में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करेंगी। इस तरह करीब 5 से 6 दिनों के इस दौरे में वह पौड़ी, रुद्रप्रयाग, चमोली और टिहरी जैसे महत्वपूर्ण जिलों में जाकर संगठन की स्थिति का आकलन करेंगी और कार्यकर्ताओं की नब्ज टटोलेंगी। हालांकि इस पूरे दौरे का सबसे अहम पहलू बदरीनाथ और केदारनाथ धाम में होने वाले कार्यक्रम हैं। यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि इसके जरिए कांग्रेस एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह भी आस्था और परंपरा के साथ खड़ी है और जनता की भावनाओं को समझती है।
उत्तराखंड की राजनीति में अब तक भाजपा को ही धर्म के मोर्चे पर मजबूत माना जाता रहा है, लेकिन कांग्रेस ने बदरीनाथ और केदारनाथ धाम से अपने अभियान की शुरुआत कर यह साफ कर दिया है कि वह अब गढ़वाल के धार्मिक महत्व को अपनी सियासत का मुख्य आधार बनाने जा रही है। यह महज एक यात्रा नहीं, बल्कि देवभूमि के जनमानस को यह बताने की कोशिश है कि आस्था पर किसी का एकाधिकार नहीं है।
‘यूकेडी की नई रणनीति और नए तेवर’
पहाड़ की राजनीति में फिर जगेगी क्षेत्रीय स्वर की गूंज
स्थानीय मुद्दों को चुनावी हथियार बनाकर उतरेगी मैदान में
यूकेडी नए तेवर व रणनीति के साथ देगी अपनी दस्तक
देहरादून। क्षेत्रीय अस्मिता और पहाड़ के मुद्दे को लेकर आंदोलनों में जन्मी यूकेडी ने पहले अलग राज्य, फिर राजधानी, स्थायी राजधानी, गैरसैंण विकास, पलायन, रोजगार और जल-जंगल-जमीन जैसे मुद्दों को लेकर जमीनी लड़ाई लड़ी है। प्रदेश के आमजन के साथ आंदोलनों में खड़ी यूकेडी को सत्ता दिलाने में जनता ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। आगामी चुनावी समर में जहां एक ओर भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपनी पूरी ताकत झोंकेंगी, वहीं क्षेत्रीय दल यूकेडी भी एक बार फिर मजबूती के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है। लंबे समय से हाशिये पर दिख रही यूकेडी अब नए तेवर और रणनीति के साथ चुनावी परिदृश्य में अपनी दस्तक दे रही है।
1979 में मसूरी में जन्मी यह यूकेडी कभी उत्तराखंड राज्य गठन का सबसे बड़ा चेहरा थी। क्षेत्रीय स्वाभिमान के तेवर के साथ राज्य आंदोलन से लेकर अब तक यूकेडी ने राज्य में अपनी आक्रामकता को बरकरार रखा है, लेकिन राज्य बनने के बाद भाजपा और कांग्रेस के राजनीतिक जाल में फंसकर पीछे छूट गई। उत्तराखंड की राजनीति में जब भी तीसरे विकल्प की बात आती है, तो यूकेडी का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। राज्य आंदोलन की कोख से उपजी यह पार्टी आज एक बार फिर चुनावी समर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए कमर कस चुकी है।
इस बार यूकेडी अपनी छवि बदलने की कोशिश में है। पार्टी संगठन में युवाओं को आगे लाने और नए चेहरों को टिकट देने की रणनीति पर काम कर रही है। इससे पार्टी न सिर्फ नई ऊर्जा लाना चाहती है, बल्कि युवा मतदाताओं को भी अपने पक्ष में आकर्षित करना चाहती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यूकेडी युवाओं और स्थानीय नेतृत्व को सही तरीके से सामने लाती है, तो वह कई सीटों पर किंगमेकर की भूमिका निभा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अगर यूकेडी सही रणनीति अपनाती है और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाती है, तो वह न सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकती है, बल्कि चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में भी आ सकती है।
यूकेडी के युवा नेताओं ने उत्तराखंडियत की भावना को सोशल मीडिया और जमीनी आंदोलनों में हवा दी है। पहाड़ की पहचान और क्षेत्रीय स्वाभिमान को पुनर्जीवित करने की भी कोशिश की है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या यूकेडी इस बार अपनी खोई साख वापस पा सकेगी, या फिर राष्ट्रीय दलों के बीच उसकी आवाज फिर दबकर रह जाएगी।
परियों के देश में प्रकृति रचती है ‘जादुई संसार’
उत्तराखंड में प्रकृति और लोककथाएं मिलकर रचती हैं जादू
गढ़वाल-कुमाऊं के कई गांवों में आज भी जीवित है विश्वास
घने जंगलों, बुग्यालों और निर्जन घाटियों में है परियों का वास
देहरादून। उत्तराखंड सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक अनुभव हैकृएक ऐसी दुनिया, जहां प्रकृति और लोककथाएं मिलकर जादू रचती हैं। आप मानो या ना मानो लेकिन इस पहाड़ी राज्य की वादियों में एक और दुनिया बसती है। यह कोई कल्पना मात्र नहीं, बल्कि लोककथाओं, मान्यताओं और प्रकृति की अद्भुत छटा से जन्मी एक ऐसी अनुभूति है, जिसे यहां आने वाला हर व्यक्ति कहीं न कहीं महसूस करता है।
गढ़वाल और कुमाऊं के कई दूरस्थ गांवों में आज भी यह विश्वास जीवित है कि घने जंगलों, बुग्यालों और निर्जन घाटियों में परियों का वास होता है। खासकर रात के समय या पूर्णिमा की चांदनी में, जब बर्फ से ढकी चोटियां चमक उठती हैं और हवा में एक अनोखी खामोशी फैल जाती है, तो स्थानीय लोग इन परियों की उपस्थिति का जिक्र करते हैं। चमोली, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जैसे क्षेत्रों के ऊंचे बुग्यालकृजहां दूर-दूर तक केवल हरी घास और आसमान का विस्तार दिखता हैकृअक्सर परियों के खेलने की जगह कहे जाते हैं। ग्रामीणों की मानें तो इन जगहों पर अचानक मौसम बदल जाना, अजीब सी रोशनी दिखना या किसी अनजानी ध्वनि का सुनाई देना, परियों के संकेत माने जाते हैं।
लोककथाओं में परियों को सुंदर, सफेद वस्त्रों में लिपटी, बेहद कोमल और रहस्यमयी बताया गया है। कहा जाता है कि वह इंसानों से दूर रहना पसंद करती हैं, लेकिन कभी-कभी किसी भटके हुए यात्री की मदद भी कर देती हैं। कई बुजुर्ग आज भी ऐसे किस्से सुनाते हैं, जब उन्होंने या उनके पूर्वजों ने अलौकिक अनुभव महसूस किए।
हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के छोटे-छोटे गांव किसी स्वर्ग से कम नहीं। औली की बर्फीली ढलानें, फूलों की घाटी की रंग-बिरंगी चादर और नैनीताल की शांत झीलें हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। यहां का हर दृदृश्य एक जीवित चित्र की तरह लगता है। उत्तराखंड की संस्कृति और लोककथाओं में भी परियों का जिक्र खूब मिलता है। पहाड़ों के बुजुर्ग आज भी उन कहानियों को सुनाते हैं, जिनमें परियां रात के सन्नाटे में नृत्य करती थीं और इंसानों से दूर, अपने रहस्यमयी संसार में रहती थीं। कई गांवों में आज भी ऐसी जगहों को परियों का डांडा या परियों का थान कहा जाता है। परियों का देश कहे जाने वाले इस राज्य में हर साल लाखों पर्यटक आते हैं। लेकिन बढ़ता पर्यटन पर्यावरण के लिए चुनौती भी बन रहा है। इस जादुई सुंदरता को बचाए रखने के लिए जिम्मेदार पर्यटन बेहद जरूरी है।
हालांकि आधुनिक विज्ञान इन बातों को अंधविश्वास या प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या मानता है, लेकिन यह भी सच है कि उत्तराखंड की प्रकृति में कुछ ऐसा जादू है, जो इन कहानियों को जीवंत बना देता है। ऊंचे-ऊंचे देवदार के जंगल, बहती नदियों की मधुर ध्वनि और बादलों का धरती पर उतर आनाकृयह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं, जो किसी भी कल्पनालोक से कम नहीं।
ऊमी: अन्न, आस्था और प्रकृति का पर्व
उत्तराखंड के पहाड़ों की संस्कृति में प्रकृति के साथ गहरे रिश्ते की अनोखी परंपरा
नए गेहूँ का पहला दाना पहले देवता के नाम, फिर हमारे लिए बनता है प्रसाद
‘ऊमी’ निकालने की परंपरा सिर्फ अन्न का भोग नहीं, बल्कि यह है एक सोच कृ
प्रकृति के प्रति सम्मान, जीवन के प्रति आभार और समाज के प्रति जुड़ाव
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में एक परंपरा है, जो आज भी पहाड़ के गांवों में निभाई जाती है। फाल्गुन की विदाई और चैत्र के आगमन के साथ ही जब खेतों में गेहूँ की बालियाँ सुनहरी आभा बिखेरने लगती हैं, तो ग्रामीण भारत की फिजाओं में एक खास तरह की सोंधी खुशबू घुल जाती है। यह खुशबू है ‘ऊमी’ की होती है।
पहाड़ में गेहॅू की कच्ची-पक्की बालियों को धीमी आंच पर भूनकर जब इन्हें हाथों से रगड़कर दाने निकाले जाते हैं, तो वह ‘ऊमी’ कहलाती है। पहाड़ के गांवों में नए अन्न का पहला दाना घर का कोई सदस्य तब तक नहीं चखता, जब तक इसे कुल देवता, क्षेत्रपाल या ग्राम देवता को अर्पित न कर दिया जाए। मान्यता है कि क्षेत्रपाल देवता ने कड़कती धूप और ठंड में फसल की रक्षा की है, इसलिए पहला हक उन्हीं का है।
उत्तराखंड के पहाड़ी जीवन में हर परंपरा के पीछे प्रकृति, आस्था और जीवन दर्शन का अद्भुत मेल दिखाई देता है। इस परंपरा के पीछे गहरी मान्यता है कि अन्न केवल मानव श्रम का परिणाम नहीं, बल्कि प्रकृति और दैवीय कृपा का संयुक्त वरदान है। इसलिए इसे सीधे उपभोग करने से पहले उस शक्ति को समर्पित करना आवश्यक माना जाता है, जिसने इसे संभव बनाया।
आज के दौर में तेजी से बदलती जीवनशैली और शहरीकरण के कारण ऐसी परंपराएं धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। खेतों से जुड़ाव कम हो रहा है और बाजार आधारित जीवन शैली बढ़ रही है। इसके बावजूद कई गांवों में आज भी ऊमी को उत्साह के साथ बनाकर उत्सव के रूप में मनाते हैं। आज जब दुनिया पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही है, तब पहाड़ की यह परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति के साथ संतुलन और सम्मान ही सच्ची समृ(ि का मार्ग है।
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गांवों के ऑगन में ऊमी की खुशबू
अग्नि में तपे इन दानों को जब गुड़ या शक्कर के साथ मिलाकर भगवान को भोग लगाया जाता है, तो वह ऊमी एक दिव्य प्रसाद में बदल जाती है। गाँव की चौपालों और आंगन में जब घर-घर से ऊमी की खुशबू आती है, तो मानों पूरी प्रकृति उत्सव मना रही होती है। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि यह प्रसाद परिवार में सुख-शांति और अन्न के भंडार भरे रहने का प्रतीक है। आयुर्वेद के अनुसार )तु परिवर्तन के समय नया अनाज सीधे खाना भारी हो सकता है, लेकिन अग्नि में भूनने से यह सुपाच्य और हल्का हो जाता है। यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है और शरीर को नई ऊर्जा प्रदान करता है।
दूनघाटी में शिक्षा के मंदिरों में ‘शोर संस्कृति’
सुलगते सवाल
शिक्षा के मंदिर या फिर इवेंट मैनेजमेंट के केंद्र
महंगे कलाकारों पर करोड़ों के दांव का मकसद
गरीब मेधावियों की अनदेखी अखिर कब तक
कालेजों ने शिक्षा की गुणवत्ता को किया दरकिनार
स्टार पावर के दम पर अपनी ब्रांडिंग करने में जुटे
देहरादून। दूनघाटी में प्राइवेट यूनिवर्सिटी में शोर संस्कृति का नया ट्रेड शुरू हो गया है। यूनिवर्सिटी लाखों-करोड़ों की फीस लेने के बाद छात्र-छात्राओं को संगीत की धुनों पर थिरकते नजर आ रहे हैं। हालांकि यूनिवर्सिटी प्रशासन ऐसे कार्यक्रमों को छात्र-छात्रओं के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी बताता है। वहीं दूसरी ओर समाज का एक वर्ग इन आयोजनों पर होने वाले भारी-भरकम खर्च को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। आज बहस इस बात पर छिड़ गई है कि क्या प्राइवेट यूनिवर्सिटी अपनी मूल दिशा से भटककर मनोरंजन के अड्डे बनते जा रहे हैं।
दूनघाटी की प्राइवेट यूनिवर्सिटी में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में नामी गायकों, डीजे और कलाकारों को बुलाने की एक होड़ सी मची है। एक ही रात के लिए लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जिस छात्र की फीस से यह पैसा आता है, क्या उसे बदले में वैसी विश्वस्तरीय शैक्षणिक सुविधाएं मिल रही हैं? जानकारों का मानना है कि प्राइवेट यूनिवर्सिटी अब शिक्षा की गुणवत्ता के बजाय स्टार पावर के दम पर अपनी ब्रांडिंग करने में जुटे हैं।
वही दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि यूनिवर्सिटी अब पढ़ाई, शोध और नवाचार के बजाय नाचने-गाने के अड्डे में तब्दील होती दिख रही हैं। जब साल भर का फोकस कल्चरल इवेंट्स और सेलिब्रिटी नाइट्स पर रहेगा, तो छात्र के भीतर बौ(िक गंभीरता कैसे विकसित होगी। अभिभावकों का कहना है कि आज भी कई छात्र आर्थिक अभाव के कारण अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में भव्य आयोजनों पर खर्च को लेकर असंतोष स्वाभाविकहै। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए और शिक्षा के मूल उद्देश्यकृज्ञान और समान अवसरकृको सर्वोपरि रखना चाहिए।
अब सबसे गंभीर प्रश्न आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को लेकर आता है। ए ओर जहां यूनिवर्सिटी आर्टिस्ट्स को बुलाने के लिए बजट का पिटारा खोल देती है। वही जब बात किसी गरीब परिवार के प्रतिभाशाली छात्र की फीस माफी या छात्रवृत्ति की आती है, तो नियम-कायदों का हवाला दिया जाता है। यूनिवर्सिटी करोड़ों रूपये चंद घंटों के शोर में बर्बाद हुआ, उसे ग्रामीण क्षेत्रों के उन बच्चों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था जो संसाधन न होने के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं?
बता दें कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी प्रदेश में, जहां कई माता-पिता पेट काटकर अपने बच्चों को शहर पढ़ने भेजते हैं, वहां विश्वविद्यालयों की नैतिक जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। मनोरंजन आवश्यक है, लेकिन वह शिक्षा की लागत और गरीबों के हक को मारकर नहीं होना चाहिए।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह बहस केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र से जुड़ा सवाल है। जरूरी है कि विश्वविद्यालय शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखें, ताकि न तो प्रतिभाओं का दमन हो और न ही शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो।
कांग्रेस के लिए ‘टर्निंग प्वाइंट’
कांग्रेस पार्टी मिशन उत्तराखंड
संगठन में जान फूंकेगी कुमारी शैलजा, कांग्रेस में हलचल तेज
संगठन मजबूती और चुनावी रणनीति पर रहेगा खास फोकस
चुनाव से पहले आंतरिक मतभेद सार्वजनिक होने से बचाना
देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस में नई ऊर्जा भरने और सांगठनिक बिखराव को रोकने के लिए कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा छह मई से प्रदेश के दौरे पर है। सूत्रों की माने तो उत्तराखंड कांग्रेस पिछले कुछ समय से गुटबाजी और आंतरिक असंतोष की चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में कुमारी शैलजा का दौरा ‘डैमेज कंट्रोल’ के तौर पर भी देखा जा रहा है। वह प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं, पदाधिकारियों और जिला स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर संगठनात्मक समन्वय पर जोर देंगी। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि चुनाव से पहले किसी भी तरह का आंतरिक मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने न आए।
सूत्रों की मानें तो कुमारी शैलजा के इस दौरे का मुख्य एजेंडा पार्टी के भीतर चल रही अंतर्कलह को शांत करना है। कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक, कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के बीच तालमेल की कमी जगजाहिर है। प्रभारी का प्रयास होगा कि सभी गुटों को एक मंच पर लाकर एकजुट कांग्रेश का संदेश दिया जाए। कुमारी शैलजा का कार्यक्रम सिर्फ बैठकों तक सीमित नहीं रहेगा। वह कार्यकर्ता सम्मेलनों और जनसभाओं को भी संबोधित करेंगी, जिससे जमीनी स्तर पर पार्टी की सक्रियता बढ़े।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुमारी शैलजा का सख्त मिजाज और संगठनात्मक अनुभव उत्तराखंड कांग्रेस के लिए बूस्टर डोज साबित हो सकता है, जहाँ भाजपा अपनी डबल इंजन सरकार के कार्यों को गिना रही है, वहीं शैलजा का दौरा कांग्रेस कार्यकर्ताओं में यह विश्वास पैदा करने की कोशिश है कि पार्टी अभी भी मुख्य मुकाबले में मजबूती से खड़ी है।
इसके साथ ही उत्तराखंड में आगामी चुनाव से पहले कुमारी शैलजा का दौरा कांग्रेस के लिए ‘टर्निंग प्वाइंट’ साबित हो सकता है। अगर यह दौरा संगठन में एकजुटता और कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा करने में सफल रहता है, तो कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं को नई दिशा मिल सकती है।अब देखना होगा कि यह दौरा सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाता है या वास्तव में पार्टी के लिए मजबूत राजनीतिक आधार तैयार करता है।
6 मई से गढ़वाल मंडल का दौरा
कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा अपना 6 मई से अपना गढ़वाल मंडल का दौरा करने जा रही हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने बताया कि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से तैयार है। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी )षिकेश से लेकर बदरीनाथ, केदारनाथ और टिहरी के दौरे पर आ रही हैं।
पूरब से पश्चिम तक दिख रही बदलते भारत की नई सियासी तस्वीर
धर्म, राष्ट्रवाद और विकास के संगम ने बदल दी राजनीति की दिशा
भारत की बदलती सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का भी है संकेत
गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर की पहाड़ियों पर सूर्य की पहली किरण से लेकर गुजरात के कच्छ के रण में डूबते सूरज की लालिमा तक देश की धमनियों में आज भगवा रंग एक नए उत्साह के साथ बह रहा है। कभी केवल वैराग्य और संन्यास का प्रतीक माना जाने वाला भगवा रंग आज आधुनिक भारत की पहचान और आत्मविश्वास का पर्याय बन चुका है। भगवा रंग को देश की राजनीति से जोड़कर भाजपा ने इसे आज अपना हथियार बनाकर देश के 70 प्रतिशत हिस्से पर अपनी पकड़ को मजबूत किया है।
प्राचीन काल में भगवा रंग धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाने वाला अब राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ चुका है और जनमानस की सोच में भी गहराई तक उतर चुका है। देश में पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक भगवा लहर केवल एक राजनीतिक ट्रेंड नहीं, बल्कि भारत की बदलती सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का संकेत भी है।
पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा जैसे राज्यों में पहले जहां क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व था, वहीं अब भगवा विचारधारा ने मजबूत चुनौती पेश की है। खासकर पश्चिम बंगाल में हाल के वर्षों में राजनीतिक संघर्ष का केंद्र यही विचारधारा बन गई है। यहां जय श्रीराम जैसे नारों ने चुनावी माहौल को पूरी तरह बदल दिया। इसी प्रकार गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भगवा पहले से ही सियासत का अहम हिस्सा रहा है। यहां यह केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और गौरव का प्रतीक बन चुका है।
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में भगवा राजनीति अपने चरम पर है। यहां धार्मिक स्थलों के विकास, मंदिर निर्माण और सांस्कृतिक आयोजनों ने इस विचारधारा को और मजबूत किया है। दक्षिण भारत जहां परंपरागत रूप से क्षेत्रीय दलों और अलग राजनीतिक विचारधाराओं का प्रभाव रहा है, वहां भी भगवा धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा है। तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में अब यह केवल सीमित प्रभाव तक नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक चर्चा का अहम हिस्सा बन चुका है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे कई कारण हैंकृराष्ट्रवाद की भावना, धार्मिक पहचान का पुनर्जागरण,मजबूत नेतृत्व और सोशल मीडिया के जरिए विचारधारा का तेज प्रसार के साथ ही विकास के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव का संदेश भी लोगों को आकर्षित कर रहा है। राजनैतिक दलों की बात करें तो वर्तमान में देश की राजनीति में भी भगवा रंग का प्रभुत्व देखने को मिल रहा है। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो देश के लगभग 70 प्रतिशत हिस्से पर भगवा रंग चढ़ाने में भाजपा का हाथ है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के रणनीतिकारों की राजनैतिक चाल सफल होती दिख रही है। शायद यही कारण है कि भगवा का रंग देश पर चढ़ रहा है।
बंद कमरों में जीत का ‘अमृत’ मंथन
---चुनावी रणनीति पर मंथन, जीत का खाका तैयार करने में जुटे राजनैतिक दल
---संगठन से लेकर सोशल मीडिया तक बना रहे है राजनैतिक दल नई रूपरेखा
---रणनीति परंपरागत न होकर पूरी तरह डेटा और डिलीवरी पर होगी आधारित
देहरादून। प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए राजनीति गर्माने लगी है। सत्ता पक्ष और विपक्षकृदोनों ही अपने-अपने स्तर पर चुनावी रणनीति को धार देने में जुट गए हैं। राजनैतिक दलों के बंद कमरों में सियासी मंथन से जीत के अमृत निकालने की कोशिश की जा रही है, जो सत्ता की राह को आसान बना सके। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बार की रणनीति परंपरागत न होकर पूरी तरह डेटा और डिलीवरी पर आधारित होगा। अभी तक राजनैतिक दल प्रदेश के नेताओं के साथ बैठकों में रणनीति पर विचार कर रहे हैं और जल्द ही राष्ट्रीय नेताओं के साथ प्रदेश में विधानसभा चुनाव की जीत के लिए सियासी मंथन होगा। इसके लिए भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेताओं के उत्तराखंड दौरे तय हो गए हैं।
सूत्रों की माने तो अभी तक प्रदेश स्तरीय नेताओं की बैठकों मंे विधानसभा चुनाव में जीत के लिए बनी रणनीति को पार्टी हाईकमान को भेज दिया गया है और पार्टी हाईकमान की स्वीकृति के बाद इस पर फिर से मंथन होगा। वैसे भी विधानसभा चुनाव में सफलता की कुंजी माने जाने वाले बूथ प्रबंधन को इस बार भी सबसे अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। प्रत्येक बूथ पर कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय करने, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और छूटे हुए मतदाताओं को जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने की योजना बनाई जा रही है। राजनैतिक बैठकों में मंथन का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु राज्य का साइलेंट वोटर है। इसमें विशेष रूप से पहाड़ की मातृशक्ति और युवा वर्ग शामिल हैं। रणनीतिकार जानते हैं कि रैलियों में दिखने वाली भीड़ अक्सर वोटों में तब्दील नहीं होती, इसलिए इस बार फोकस डोर-टू-डोर संवाद और महिलाओं के कल्याण की योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाने पर है।
इसके साथ ही उत्तराखंड के संदर्भ में भू-कानून, पलायन और रोजगार जैसे मुद्दे हमेशा हावी रहते हैं। रणनीति इस बार ऐसी बनाई जा रही है, जिसमें राष्ट्रीय नेतृत्व की छवि का मेल स्थानीय मुद्दों से कराया जा सके। बैठकों में इस बात पर मंथन हो रहा है कि कैसे क्षेत्रीय अस्मिता को ठेस पहुंचाए बिना विकास के बड़े दावों को पेश किया जाए। राजनीतिक मंथन का अमृत वही दल चख पाएगा, जो जनता की भावनाओं और जमीनी हकीकत के बीच सही संतुलन बना पाएगा। इस बार मुकाबला केवल चेहरे का नहीं, बल्कि भरोसे का है।
सूत्रों के अनुसार पार्टी नेतृत्व जल्द प्रदेश स्तर के नेताओं के साथ-साथ जिला और मंडल स्तर के पदाधिकारियों के साथ बैठक कर जमीनी फीडबैक लेना और उसी के आधार पर चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने की दिशा में कार्य कर रहा है। कुल मिलाकर, यह रणनीतिक मंथन आगामी चुनाव की दिशा और दशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अब देखना होगा कि यह योजनाएं जमीनी स्तर पर कितना असर दिखा पाती हैं। यह आने वाले चुनाव के परिणाम पर निर्भर करेगा और सत्य का पता भी चल पाएगा।
दूनघाटी बनेगी सियासी ‘रणभूमि’
विधानसभा का विशेष सत्र में नारी सम्मान लोकतंत्र में अधिकार पर होगी चर्चा
भाजपा इस अधिकार को बता रही है अपनी उपलब्धि और कांग्रेस सरकार की नाकामी
विधानसभा सत्र से पूर्व भाजपा और कांग्रेस नेताओं के बयान पक्ष-विपक्ष में आने लगे
देहरादून। 28 अप्रैल को विधानसभा का विशेष सत्र है और यह सत्र भी सियासी रणभूमि बनने वाला है। राजनैतिक सूत्रों की माने तो सत्र तो नारी शक्ति वंदन पर चर्चा के लिए है, लेकिन सदन में बहस कम, शोर ज्यादा होगा। यह वही मुद्दा है जो सालों से राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में सजता रहा है और संसद में अटकता रहा है। एक ओर भाजपा जहां इसे अपनी उपलब्धि बताना चाहती है और कांग्रेस इसे अधूरा वादा कहती है।
विधानसभा का कोई भी सत्र हो उसमें हो-हल्ला होना लाजमी है। सत्ता पक्ष अपनी मनमर्जी चलाती है और विपक्ष सरकार का विरोध करती है। यह प्रथा लंबे समय से चली आ रही है। विधानसभा के सदन में राजनीति न हो यह हो नहीं सकता है। इसके साथ ही विधानसभा में नेता मर्यादा को तार-तार न करें यह भी हो नहीं सकता है। हालांकि विधानसभा सत्र के लिए सभी तैयारियां पूरी हो गई हैं इसके बाद भी सत्र के दौरान पक्ष और विपक्ष को असली चेहरा तो दिखेगा ही।
विधानसभा सत्र से पूर्व भाजपा और कांग्रेस नेताओं के बयान आने लगे है। भाजपा इसे अपनी उपलब्धि बताकर प्रचारित कर रही है। वही कांग्रेस इसे भाजपा सरकार की नाकामी बात रही है। कांग्रेस तो सदन से लेकर सड़क तक आंदोलन करने के मूड में है। शायद यही कारण है कि कांग्रेस ने अपनी चारधाम यात्रा को फिलहाल रदद कर दिया है। क्योंकि सदन में हो-हल्ला करने का समय है तो इसे कांग्रेस गवा नहीं सकती है।
विधानसभा सत्र के बहाने कांग्रेस की रणनीति साफ दिख रही है कि पहले सदन में सरकार को घेरो, फिर सड़क पर उतरकर माहौल बनाओ। यह राजनीति का क्लासिक माडल है अंदर हमला, बाहर अभियान। लेकिन जनता पूछ रही है इस रणनीति में उसका स्थान कहां है? क्या वह सिर्फ भीड़ है, या फिर वोट बैंक?
कांग्रेस चारधाम यात्रा निकलेगी, बयान आएंगे, सदन में हंगामा होगा, टीवी डिबेट होंगी, लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं सुधरेंगी या नहीं, यात्रियों की सुरक्षा बढ़ेगी या नहीं, यह अब भी सवाल ही है। देहरादून से लेकर बदरीनाथ तक और विधानसभा से लेकर गांव तक राजनीति अपनी पूरी ताकत में है। कांग्रेस चुनावी साल में सदन से लेकर सड़क तक अपनी ताकत न दिखाये यह हो नहीं सकता है।
‘हां मैं तांत्रिक हूं ...’
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर खुद को तांत्रिक माना
पूर्व सीएम हरीश रावत ने खोले अपने राजनीतिक जीवन के पन्ने
पूर्व में कांग्रेस के एक नेता ने किया था नेता और तांत्रिक का जिक्र
देहरादून। कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से दूर है और सत्ता में वापसी के लिए छटपटा रही है। इसके चलते कांग्रेस के अंदर भी कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कांग्रेस के बडे़े नेता के कुछ दिन पूर्व के राजनैतिक अवकाश का मुद्दा अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि एक नया मुद्दा कांग्रेस के लिए मुसीबत बनने वाला है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर खुद को तांत्रिक माना है। इसके बाद सूबे की राजनीति में एक नया तूफान आ गया है।
बता दें कि कुछ दिन पहले हल्द्वानी में कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा के सामने कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी ने अपने संबोधन में नेता और तांत्रिक का जिक्र किया था। उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए नेता और तांत्रिक के बीच का अंतर समझने की बात कही थी। उनके इस बयान के बाद उत्तराखंड में चर्चा तेज हो गई थी कि आखिर कांग्रेस में यह तांत्रिक कौन है। अब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए सेशल मीडिया अकाउंट पर एक लंबी पोस्ट लिख कर खुद को तांत्रिक बताया है।
अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा है कि मैं तांत्रिक हूं। 1968 में देश के सभी दिग्गज आदरणीय इंदिरा गांधी जी के विरु( हो गए थे। सिंडिकेट-इंडिकेट का संघर्ष था। लखनऊ विश्वविद्यालय में उन्हें आमंत्रित किया। राज नारायण और तत्कालीन मुख्यमंत्री टीएम सिंह आदि के प्रबल विरोध के बावजूद लखनऊ विश्वविद्यालय में उनकी सभा करवाई। सबके मन को जीतकर वह दिल्ली चली गई। उन्होंने इतिहास बनाया और मैं युवक कांग्रेस का कार्यकर्ता बन गया। वर्ष 1977 में हमारे जिलों में कांग्रेस लगभग खाली हो गई। मैं, इंदिरा भक्त कांग्रेसजनों और युवा कांग्रेसजनों के साथ कांग्रेस का झंडा थामकर खड़ा रहा। सन् 1990 के बाद पहाड़ों में कांग्रेस संकट में आईई। कई सूरमा दाएं-बाएं हो गए। राज्य आंदोलन के फलस्वरूप कांग्रेस को खलनायक चित्रित करने लगे। यहां तक कि सन् 1996 में लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार नहीं मिल पा रहे थे, तब भी मैं साथियों के साथ कांग्रेस का झंडा थामे खड़ा रहा।
आज के कालखंड में भी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के खिलाफ झंडा थामे खड़ा हूं। केंद्र सरकार का दंश झेला और झेल रहा हूं। मगर कांग्रेस और उत्तराखंडियत का झंडा थामे अटल खड़ा हूं। मैं हारा, मगर हार के बाद न कांग्रेस छोड़ी, न क्षेत्र छोड़ा। यदि अल्मोड़ा संसदीय सीट आरक्षित नहीं होती, हारता-जीतता मगर वहीं से लड़ता। हरिद्वार ने मुझे अपनाया, तो मैं अभी पूरी शक्ति और समर्पण के साथ हरिद्वार के भाईई-बहनों के साथ हूं। मैंने हर चुनाव में सीट नहीं बदली है। कार्यकर्ताओं के साथ हार में भी खड़ा रहा हूं। यही कारण है कि जिन विधानसभा सीटों में मैं हारा, दूसरे चुनाव में कांग्रेस जीती है। शायद इसलिए मैं तांत्रिक हूं, शायद इसीलिए मैं घमंडी हूं और गलतफहमी का शिकार हूं। तंत्र का सहारा लिए अब भी खड़ा हूं। मगर यह तंत्र कार्यकर्ताओं और उत्तराखंडियत पर विश्वास रखने वाले भाईई-बहनों का है।
देवभूमि के रण में ‘एंटी-इंकंबेंसी’
भाजपा का सीएम धामी का चेहरा और विकास पर दांव
कांग्रेस पार्टी सत्ता में वापसी के लिए कर रही जद्दोजहद
भाजपा करवा रही है वर्तमान विधायकों का परफार्मेंस सर्वे
देहरादून। उत्तराखंड में सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता पहाड़ों की चढ़ाई जितना ही कठिन माना जाता है। हालाँकि 2022 में भाजपा ने मिथक तोड़ते हुए दोबारा सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2027 की डगर दोनों मुख्य दलोंकृभाजपा और कांग्रेसकृके लिए नई चुनौतियाँ लेकर आ रही है। भाजपा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह आगामी चुनाव मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही लड़ेगी। भाजपा अपने वर्तमान विधायकों का परफार्मेंस सर्वे करा रही है ताकि एंटी-इंकंबेंसी ‘सत्ता विरोधी लहर’ को कम करने के लिए टिकट वितरण में बदलाव किया जा सके। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस बार परिवर्तन के नारे के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है।
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म होता जा रहा है। राज्य की दो प्रमुख पार्टियांकृभारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसकृअपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुट गई हैं। इसके अलावा आम आदमी पार्टी और क्षेत्रीय दल भी इस बार चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे मुकाबला और दिलचस्प होता नजर आ रहा है।
इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी, पलायन और महंगाई बना हुआ है। पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहा पलायन राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसे लेकर विपक्ष सरकार पर लगातार सवाल उठा रहा है। वहीं, सत्ताधारी भाजपा विकास कार्यों, सड़क, स्वास्थ्य और पर्यटन के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों को गिनाकर जनता का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है। युवाओं के लिए रोजगार और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी चुनावी बहस के केंद्र में हैं।
राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो इस बार टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका काफी अहम रहने वाली है। कई सीटों पर बगावत और असंतोष की स्थिति भी देखने को मिल सकती है, जो चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है। इसके साथ ही, नए मतदाताओं की भूमिका भी निर्णायक साबित हो सकती है, जिनके मुद्दे और अपेक्षाएं पारंपरिक राजनीति से अलग हैं। वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग की तैयारियां भी जोरों पर हैं और जल्द ही चुनाव की तारीखों की घोषणा होने की संभावना है। भारत निर्वाचन आयोग राज्य में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मजबूत कर रहा है।
दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल जैसे नेताओं की सक्रियता और स्थानीय मुद्दों अंकिता भंडारी केस, बेरोजगारी और अग्निवीर योजना को लेकर कांग्रेस सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही पार्टी के भीतर की गुटबाजी और मजबूत संगठनात्मक ढांचे की कमी कांग्रेस के लिए अभी भी एक बड़ा रोड़ा बनी हुई है। वही प्रदेश में आम आदमी पार्टी और यूकेडी पिछली बार के प्रदर्शन के बाद अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है, जबकि उत्तराखंड क्रांति दल मूल निवास और भू-कानून जैसे भावनात्मक मुद्दों पर क्षेत्रीय मतदाताओं को एकजुट करने का प्रयास कर रहा है।
उत्तराखंड का आगामी विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य की दिशा तय करने वाला अहम पड़ाव है। अब देखना दिलचस्प होगा कि जनता किसे अपना विश्वास देती है और किसके हाथ में राज्य की बागडोर सौंपती है। 2026 का अंत होते-होते उत्तराखंड की सड़कों पर चुनावी रैलियों का शोर बढ़ जाएगा। जहाँ भाजपा डबल इंजन की ताकत और धामी के युवा चेहरे पर भरोसा कर रही है, वहीं कांग्रेस जनता के बीच असंतोष को वोटों में बदलने की ताक में है।
पहाड़ बनाम मैदान का बदलता संतुलन
क्षेत्रीय असंतुलन चुनावी रणनीतियों को करेगा चुनाव में प्रभावित
हालिया निकाय चुनावों में निर्दलीयों की जीत से बढ़ी दलों की चिंता
भाजपा के मजबूत बूथ मैनेजमेंट पर कांग्रेस की रणनीति है कमजोर
देहरादून। चुनावी साल में राजनीति के नजरिए से प्रदेश की असली बात न हो तो फिर क्या बात हो सकती है। प्रदेश की सरकारों के एसी रूमों में बनी रणनीतियों के चलते आज पहाड़ खाली हो गये हैं और मैदान ओवरफ्लो। इससे साफ जाहिर होता है कि इसके दुष्परिणाम क्या होंगे। उत्तराखंड का चुनावी गणित हमेशा से ‘पहाड़ बनाम मैदान’ के संतुलन पर टिका रहा है। मैदानी क्षेत्रों में जहां जनसंख्या अधिक है, वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में मुद्दे अलग और अधिक संवेदनशील होते हैंकृजैसे पलायन, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं। इस बार भी यही क्षेत्रीय असंतुलन चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर रहा है।
यह साल विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल है और इस साल सत्ता के गलियारों से निकलकर पहाड़ की कंदराओं तक राजनेताओं के पहुंच का सिलसिला शुरू हो गया है। सूबे में एक ओर जहां भाजपा अपने विकास कार्यों और हिंदुत्व के एजेंडे को धार दे रही है, जबकि कांग्रेस छोटे क्षेत्रीय दलों और निर्दलीयों के साथ मिलकर एक नया विकल्प पेश करने की फिराक में है। चुनावी साल में भाजपा और कांग्रेस के लिए हर बार नई मुसीबते सामने आती हैं। इस बार भी ऐसा लगता है कि छोटे दलों की सक्रियता फिर से इन दलों को परेशान कर सकती है।
चुनावी साल में भाजपा जहाँ अपने मिशन रिपीट के जोश को बरकरार रखने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए नई रणनीति बुन रही है। हालिया निकाय चुनावों में भाजपा ने नगर निगमों और पालिकाओं में बढ़त तो बनाई, लेकिन निर्दलीयों की बड़ी जीत ने दोनों प्रमुख दलों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषकर पहाड़ी जिलों में निर्दलीय प्रत्याशियों का दबदबा यह संकेत देता है कि जनता अब केवल पार्टी के नाम पर नहीं, बल्कि उम्मीदवार के स्थानीय रसूख और काम पर मुहर लगा रही है।
विपक्ष में बैठी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक गुटबाजी को खत्म करना है। हालांकि, बेरोजगारी, भू-कानून और अंकिता भंडारी प्रकरण जैसे मुद्दों पर पार्टी ने सरकार को घेरने की कोशिश की है, लेकिन संगठन के स्तर पर अभी भी कांग्रेस को एक ऐसी धार की तलाश है जो भाजपा के मजबूत बूथ मैनेजमेंट का मुकाबला कर सके।
आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर प्रदेश में सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी रणनीतियों को धार दे रहे हैं। लेकिन इस बार का चुनाव पारंपरिक मुद्दों से आगे बढ़कर ‘नए समीकरणों’ और ‘बदलते मतदाता व्यवहार’ का चुनाव बनता दिख रहा है। राज्य में सत्तारूढ़ दल के सामने सबसे बड़ा सवाल एंटी-इंकम्बेंसी को लेकर है। मतदाता अब सिर्फ घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव के आधार पर निर्णय लेने के मूड में दिखाई दे रहा है।
उत्तराखंड की राजनीति में समय-समय पर तीसरे विकल्प की चर्चा होती रही है। क्षेत्रीय दल और निर्दलीय उम्मीदवार कुछ सीटों पर प्रभाव डाल सकते हैं, खासकर वहां जहां स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ मजबूत होती है। हालांकि, पूरे राज्य में तीसरे मोर्चे का प्रभाव सीमित ही रहने की संभावना है, लेकिन यह बड़े दलों के वोट शेयर को जरूर प्रभावित कर सकता है। इस बार भी अभी तक यूकेडी के युवा ब्रिगेड की प्रदेश के पहाड़ी जिलों में सक्रियता भाजपा और कांग्रेस को सोचने पर मजबूर कर रही है। इसके साथ ही अपनी रणनीति भी बदलने की ओर इशारा कर रही है। चुनाव परिणाम क्या होंगे यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन चुनाव के इस सेमीफाइलन साल में भाजपा और कांग्रेस के लिए यूकेडी बड़ी समस्या के रूप में दिख रही है।
‘मैत का मसाण’ एक लोक पीड़ा
पहाड़ में लोक विश्वास और परंपरा की है यह एक अनोखी कथा
मैत का मसाण ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो कभी पीछा नहीं छोड़ती
उत्तराखंड के लोकगीतों व न्यौली में मिलता है इसका विस्तृत वर्णन
देहरादून। पहाड़ की लोक संस्कृति में मायका एक बेटी के लिए भावनाओं का सबसे सुरक्षित कोना होता है। लेकिन मैत का मसाण एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो उनका पीछा नहीं छोड़ती है। एक बेटी, जिसने पूरा बचपन एक घर की चौखट के भीतर बिताया, शादी के बाद उसी घर के लिए पराई हो जाती है और उसके साथ ही मैत का मसाण भी उसके साथ चला जाता है।
पहाड़ी गांवों में सामाजिक ढांचा कुछ इस तरह बुना गया है कि बेटी को दान की वस्तु मानकर विदा किया जाता है। शादी के बाद उसका गोत्र और कुल बदल जाता है। विडंबना देखिए कि जिस आंगन में उसने चलना सीखा, मृत्यु के बाद वहां उसे दो गज जमीन मिलना भी दुश्वार हो जाता है। मैत का मसाण शब्द दरअसल उस पुरुष प्रधान सोच का प्रतीक है, जो यह मानती है कि स्त्री का अस्तित्व केवल उसके पति के घर से जुड़ा है। यदि कोई विवाहित महिला अपने मायके में अंतिम सांस लेती है, तो अक्सर शव को ससुराल भेजने की जद्दोजहद शुरू हो जाती है, ताकि कुल की परंपरा न टूटे।
उत्तराखंड के कई लोकगीतों और न्यौली में इस विछोह का वर्णन मिलता है। झुमैलो और चौती जैसे गीतों में बेटियां गाती हैं कि बाबा के घर में मेरा क्या है? बस एक याद मैत का मसाण बनने का डर असल में एक स्त्री के उस अकेलेपन को दर्शाता है, जहाँ वह न पूरी तरह ससुराल की हो पाती है और न ही मायके का उस पर कोई कानूनी या सामाजिक दावा बचता है। यह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक चोट भी है जो महिलाओं को ताउम्र अहसास कराती है कि उनका अपना कोई स्थायी घर नहीं है।
बता दें कि देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ रहस्यमयी लोककथाओं और परंपराओं के लिए भी जानी जाती है। इन्हीं लोकविश्वासों में एक नाम अक्सर सुनने को मिलता हैकृमैत का मसाण। पहाड़ों में प्रचलित यह कथा सिर्फ डर या अंधविश्वास की कहानी नहीं, बल्कि समाज की मान्यताओं, भावनाओं और सांस्कृतिक सोच को दर्शाती है।
मसाण शब्द उत्तराखंड के लोकजीवन में उन आत्माओं या शक्तियों के लिए इस्तेमाल होता है, जिन्हें असमय या असंतुष्ट माना जाता है। वहीं मैत का अर्थ होता है मायका या जन्मस्थान। इस तरह मैट का मसाण उस आत्मा को कहा जाता है, जो अपने मायके से जुड़ी मानी जाती है। लोकमान्यता है कि ऐसी आत्माएं अपने अपनों के आसपास रहती हैं और कभी-कभी संकेतों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।
ग्रामीण इलाकों में इस तरह की कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही हैं। खासकर बुजुर्ग लोग इसे एक चेतावनी या सीख के रूप में भी बताते हैंकृकि जीवन में रिश्तों, परंपराओं और संस्कारों का सम्मान जरूरी है। कई जगहों पर इससे जुड़े छोटे-छोटे अनुष्ठान और पूजा-पाठ भी किए जाते हैं, ताकि घर-परिवार में शांति बनी रहे।
हालांकि, आधुनिक समय में लोग इन बातों को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। कुछ लोग इसे आस्था और संस्कृति का हिस्सा मानते हैं, तो कुछ इसे सिर्फ लोककथा या कल्पना समझते हैं। लेकिन एक बात साफ है कि मैत का मसाण जैसी कहानियां उत्तराखंड की समृ( लोकसंस्कृति का अहम हिस्सा हैं और इन्हें समझना, उस क्षेत्र की पहचान को समझने जैसा है।
मैट का मसाण केवल एक रहस्यमयी कथा नहीं, बल्कि उत्तराखंड के लोगों की भावनाओं, विश्वासों और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी एक गहरी परंपरा हैकृजो आज भी पहाड़ों की हवा में जीवित है।
आज जब नारी शक्ति और समानता की बातें हो रही हैं, तो इन पुरानी और दकियानूसी परंपराओं पर भी सवाल उठने लगे हैं। नई पीढ़ी अब इस बात को स्वीकार करने लगी है कि बेटी का अधिकार भी माता-पिता की मिट्टी पर उतना ही है जितना बेटे का। कई प्रगतिशील परिवारों ने इन वर्जनाओं को तोड़कर बेटियों को मायके में ही अंतिम विदाई दी है। हालांकि, दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में आज भी मैत का मसाण एक वर्जना है। इस सोच को बदलने की जरूरत है ताकि पहाड़ की बेटियों को जीते जी ही नहीं, बल्कि मृत्यु के पश्चात भी अपने घर में पूरा सम्मान और स्थान मिल सके।
दिन में ‘बंदर’ और रात को ‘सुअर’
पहाड़ की दास्तान
---दिन में बंदरों पर पहरा, रात को सुअरों का आतंक
---पलायन के बीच खेती बचाना ग्रामीणों की चुनौती
---जंगली जानवरों से प्रभावित है पहाड़ के सभी गांव
देहरादून। मुझे अपने बचपन के वह दिन याद हैं जब पहाड़ छोटे-छोटे खेतों में जब सुबह की पहली किरण पड़ती थी, तो कभी यहाँ हरियाली मुस्कुराती थी। कोदा, झंगोरा और गहत की महक से मन तृप्त होता था। लेकिन आज मंजर बदल चुका है। अब पहाड़ में सुबह लोग हल की मूंठ नहीं थामते, बल्कि हाथ में गुलेल और पत्थर लेकर बंदरों को भगाने के साथ सुबह की शुरूआत होती है।
बता दें कि पहाड़ की सुबह कभी खेतों में हरियाली, बैलों की घंटियों और धान-गेहूं की खुशबू से शुरू होती थी। गांव की महिलाएं पहाड़ के पगडंडियों वाले खेतों की ओर निकलती थीं और यहां के पुरूष अपनी मेहनत से पत्थरों के बीच अनाज बोते थे। लेकिन आज वही खेत सूने पड़े हैं। बंदरों और जंगली सुअरों ने पहाड़ और पहाड़ के लोगों की बची-खुची उम्मीद भी रौंद दी है।
उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में खेती अब संघर्ष बन चुकी है। किसान दिन-रात मेहनत कर फसल तैयार करता है, लेकिन कटाई से पहले ही बंदरों के झुंड और जंगली सुअर खेतों में घुसकर सब कुछ बर्बाद कर देते हैं। मक्का, गेहूं, आलू, मंडुवा और सब्जियां अब इंसानों से ज्यादा जंगली जानवरों का भोजन बन रही हैं।
रुद्रप्रयाग जिले के रूमसी गांव के जगतराम कहते हैं अब खेती नहीं, जंग लड़ रहे हैं। यह दर्द अकेले उनका नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी अंचल का है। दिन के उजाले में बंदरों की टोली हमला करती है। वह केवल अनाज नहीं खाते, बल्कि फसल को तहस-नहस कर देते हैं। छोटे-छोटे बच्चों की तरह पाली गई पौध को जब बंदर उखाड़ कर फेंक देते हैं, तो किसान की आंखों में आंसू नहीं, एक गहरी शून्यता उतर आती है।
सूरज ढलते ही जंगली सुअर सामने आ जाते है। टिन के कनस्तरों को पीटकर सुअरों को भगाने की कोशिश होती है, लेकिन अक्सर सुअर कुछ ही मिनटों में पूरी मेहनत को मिट्टी में मिला देते हैं। आज पहाड़ में जंगली जानवरों के डर से खेती छोड़ने वाले परिवारों की संख्या बढ़ती जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले जंगल और गांव के बीच संतुलन था, लेकिन अब जंगलों का दायरा बदलने और मानव हस्तक्षेप बढ़ने से जंगली जानवर आबादी की ओर आने लगे हैं। आज के समय में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई गांवों में लोगों ने खेती छोड़ दी है, जो खेत कभी अन्न उगाते थे, वहां अब घास और झाड़ियां नजर आती हैं। गांव की बूढ़ी आंखें आज भी उस दौर को याद करती हैं, जब पहाड़ आत्मनिर्भर था और खेत जीवन की पहचान थे। अगर ऐसा ही रहा तो आने वाली पीढ़ियां पहाड़ के खेतों को केवल किताबों में ही हरे-भरे देखने और पढ़ने के लिए मजबूर हो जाएगी।
पहाड़ की ‘खोली’ के गणेश
पत्थरों की विरासत और लकड़ी पर उकेरे होते थे भगवान
यह है आस्था, प्रकृति और लोकजीवन का अद्भुत संगम
आज पहाड़ में कई घरों में लटके हैं ताले और दीवारें ढह रही
खंडहरों में खोली के गणेश आज भी अपनी जगह पर अडिग
संतोष बेंजवाल
देहरादून। हिमालय की वादियों में जब सर्द हवाएं चलती हैं और धुंध की चादर पुराने गांवों को ढक लेती है, तब भी ऊंचे पहाड़ों पर बने पठाल की छत वाले घरों की चौखटें एक अलग ही चमक बिखेरती हैं। इन घरों के मुख्य द्वार, जिसे पहाड़ी में खोली कहा जाता है, पर विराजे गणेश जी केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि उस घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य की तरह पहरेदार होते हैं।
पहाड़ के गांवों में जाने पर गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी का यह मांगल गीत याद आता है-दैणा होया खोली का गणेशा हे...दैणा होया मोरी का नारेणा हे... पहाड़ के उन पुराने घरों को देखकर जिनकी खोलियों में आज भी गणेश जी विराजमान है। आपको बता दें कि पुराने समय में जब पहाड़ में घर बनते थे, तो सबसे पहले स्थानीय शिल्पकार को बुलाया जाता था। वह केवल मिस्त्री नहीं, बल्कि एक कलाकार होता था। टुन या देवदार की सख्त लकड़ी पर जब उसकी छैनी चलती थी, तो वह सबसे पहले चौखट के ठीक बीचों-बीच सिरदल पर एक छोटा सा सिंहासन बनाता था।
उस छोटे से खांचे में भगवान गणेश की आकृति उकेरी जाती थी। हाथ में मोदक, बड़ी सूंड और सौम्य आंखेंकृ गणेश जी का यह स्वरूप विघ्नहर्ता के रूप में घर की दहलीज पर बैठ जाता था। माना जाता था कि जिस घर की खोली में गणेश होंगे, वहाँ दुख और दरिद्रता कभी प्रवेश नहीं कर पाएगी।
यह दर्शाता है कि देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों में धार्मिक आस्था केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकजीवन की हर परत में रची-बसी है। गढ़वाल और कुमाऊं के ग्रामीण इलाकों में आज प्रकृति, परिवार और संस्कृति के गहरे संबंध खोली के गणेश के रूप में दिखते हैं। पहले पहाड़ के हर घरों के मुख्य द्वार पर गणेश की आकृति होती थी, लेकिन बदलते परिवेश में यह अब यह कम दिखती है।
पहाड़ी की संस्कृति और स्थापत्य कला में खोली का गणेश मात्र एक मूर्ति नहीं, बल्कि घर की मर्यादा, सुरक्षा और सौभाग्य का प्रतीक है। पहाड़ों के पुराने घरों की नक्काशीदार लकड़ी की चौखट ‘खोली’ के ऊपर विराजमान गणेश जी की यह परंपरा आज भी पहाड़ की पहचान है। पहाड़ी भाषा में खोली का अर्थकृमुख्य द्वार या देहरी होता है। हिंदू धर्म में गणेश जी को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य माना गया है। शायद यही कारण रहा होगा कि हमारे बुर्जूगों ने इसे सर्वोच्च स्थान दिया होगा।
आज जब हम पहाड़ के वीरान होते गांवों की ओर देखते हैं, तो दिल बैठ जाता है। कई घरों में ताले लटके हैं, दीवारें ढह रही हैं, लेकिन उन खंडहरों की चौखटों पर आज भी वह खोली का गणेश अपनी जगह पर अडिग है। पलायन ने इंसान को तो घर से दूर कर दिया, लेकिन गणेश जी आज भी उसी सूनी देहरी की रक्षा कर रहे हैं। कई लोग अब इन पुरानी चौखटों को उखाड़कर शहरों में ले जा रहे हैं, ताकि आधुनिक कंक्रीट के घरों में अपने पूर्वजों की उस आस्था को फिर से जीवित कर सकें।
पहाड़ के गांव की सरहद पर ‘अदृष्य प्रहरी’
देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में माना जाता है देवताओं का वास
यहाँ की सबसे अनूठी परंपरा है क्षेत्रपाल या भूमिपाल की अवधारणा
पहाड़ के हर गांव में क्षेत्र रक्षक के रूप में करते हैं क्षेत्रपाल देवता वास
देहरादून। गांव में स्थित किसी पुराने पेड़ के नीचे, पत्थरों से बना एक छोटा सा मंदिर, जहां लोहे के त्रिशूल, घंटियां और पत्थर की मूर्तियां क्षेत्रपाल देवता के मंदिर में होती हैं। पहाड़ के हर गांव की सरहद पर एक ऐसा रक्षक देवता विराजमान होता है। यह देवता सिर्फ पूजा के प्रतीक नहीं, बल्कि क्षेत्र के रक्षक, मार्गदर्शक और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं।
पहाड़ की परंपरा के अनुसार हर गांव की अपनी एक निश्चित सीमा होती है। इस सीमा की रक्षा का उत्तरदायित्व क्षेत्र रक्षक देवता का होता है। मान्यता है कि जब गांव के लोग सो जाते हैं, तब देवता अपने दिव्य घोड़े पर सवार होकर हाथ में मशाल लेकर गांव की सरहदों का चक्कर लगाते हैं और हिंसक पशुओं व बुरी आत्माओं से गांव की रक्षा करते हैं। गांव में कोई भी शुभ कार्य होकृचाहे शादी-ब्याह हो, जनेऊ संस्कार हो या नई फसल की कटाईकृसबसे पहले क्षेत्रपाल को याद किया जाता है।
क्षेत्रपाल देवताओं के मंदिर आलीशान नहीं होते। अक्सर किसी विशाल पीपल या बांज के पेड़ के नीचे, पत्थरों से बना एक छोटा सा थान होता है। वहां लोहे के त्रिशूल, घंटियां और पत्थर की मूर्तियां स्थापित होती हैं। यह सादगी इस बात का प्रतीक है कि देवता प्रकृति के कितने करीब हैं और हर ग्रामीण के लिए सुलभ हैं। पहाड़ के लोग कानून से ज्यादा अपने ग्राम देवता और क्षेत्रपाल से डरते हैं। यह विश्वास गांव में अनुशासन और नैतिकता बनाए रखने का काम करता है। ऐसी मान्यता है कि यदि गांव में कोई चोरी होती है या आपसी विवाद सुलझ नहीं पाता, तो क्षेत्रपाल के थान पर न्याय की गुहार लगाई जाती है।
आधुनिक युग में भी पहाड़ की यह परंपरा अटूट है। यह विज्ञान के लिए कौतूहल हो सकता है, लेकिन एक पहाड़ी के लिए यह उसकी आस्था और पहचान है। यह क्षेत्र रक्षक देवता केवल पत्थर की मूर्तियां नहीं, बल्कि हिमालयी संस्कृति के वह प्रहरी हैं, जिन्होंने सदियों से इन दुर्गम गांवों को जीवंत बनाए रखा है। आज भले ही युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हों, लेकिन अपने गांव और क्षेत्र देवता के प्रति उनकी आस्था आज भी कायम है।
खेत की मेड़ पर ‘डाइनिंग टेबल’
--आपसी मेलजोल और प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है ‘पंगत’
--पहाड़ की परंपराकृमें एक साथ बैठकर भोजन करने की प्रथा
--रिश्तों, श्रम और सादगी का यह उत्सव आज भी है जीवित
--पहली ग्रास अक्सर जमीन पर देवता या प्रकृति को देते हैं
देहरादून। उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों पर जब धूप की पहली किरणें सीढ़ीदार खेतों को छूती हैं, तो केवल खेती का काम शुरू नहीं होता, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव की शुरुआत होती है। पहाड़ में खेती केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि आपसी मेलजोल और प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है। यहाँ की एक सुंदर परंपरा हैकृपंगत में बैठकर खेत में ही भोजन करना।
खेतों में एक साथ बैठकर खाना खाने की यह परंपरा उत्तराखंड के पहाड़ों की आत्मा है। यह हमें सिखाती है कि सादगी में भी खुशी होती है और मिल-बांटकर जीने में ही असली समृ(ि छिपी है। पहाड़ की यह परंपरा आज भी रिश्तों को मजबूत करने और जीवन को सहज बनाने का संदेश देती है। आज पलायन के कारण पहाड़ के कई खेत बंजर हो और मकान बीरान हो गए हैं, लेकिन जो लोग आज भी वहाँ टिके हैं, उन्होंने इस परंपरा को जीवित रखा है। खेत में बैठकर एक साथ भोजन करना हमें सिखाता है कि खुशी अकेले नहीं, बल्कि मिल-बाँटकर जीने में है। मिट्टी की वह सोंधी खुशबू और अपनों के साथ साझा किया गया वह पिसा हुआ नमक आज भी हर उस पहाड़ी की यादों में बसा है जो अपने गांव से दूर शहर में बैठा है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में जीवन सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि सामूहिकता और अपनत्व की जीवंत परंपराओं का भी प्रतीक है। इन्हीं परंपराओं में एक खूबसूरत परंपरा हैकृखेतों में काम के बीच एक साथ बैठकर खाना खाना। यह सिर्फ भूख मिटाने का समय नहीं, बल्कि रिश्तों को सींचने, थकान मिटाने और जीवन को साझा करने का अवसर होता है। पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थिति में अकेले खेती करना लगभग असंभव है। इसलिए यहाँ सामूहिक मदद की परंपरा है। जब गाँव में किसी एक के खेत की रोपाई या कटाई होती है, तो पूरा गाँव अपनी कुदाल और दरांती लेकर पहुँच जाता है।
अकेले कुमाऊं के कुछ हिस्सों में खेतों में काम के दौरान हुड़का बजाकर लोकगीत गाए जाते हैं। धुनों की ताल पर हाथ चलते हैं और थकान का नामोनिशान नहीं होता। दोपहर होते-होते जब सूरज सिर पर आ जाता है, तो काम रोक दिया जाता है। किसी बड़े बांज या बुरांश के पेड़ की छाँव में, या सीधे खेत की मेड़ पर ही बैठने का इंतजाम होता है। खेत में बैठकर खाने का स्वाद किसी फाइव-स्टार होटल के खाने से कहीं ऊपर होता है। यह भोजन केवल भूख मिटाने के लिए नहीं होता, बल्कि यह गाँव की सोशल नेटवर्किंग का समय होता है। बुजुर्ग यहाँ बैठकर पुरानी कहानियाँ सुनाते हैं। युवा अपनी भविष्य की योजनाओं और शहर की बातों पर चर्चा करते हैं। महिलाएं अपने लोकगीतों जैसे झुमैलो या चांचरी के जरिए सुख-दुख साझा करती हैं। भोजन शुरू करने से पहले, पहली ग्रास कौर अक्सर जमीन पर देवता या प्रकृति के नाम से रखी जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि हम जो खा रहे हैं, वह उस मिट्टी की ही देन है।
हालांकि, बदलते समय और पलायन के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। गांवों में लोगों की संख्या घट रही है और खेती का दायरा भी सिमट रहा है। इसके बावजूद जहां भी यह परंपरा जीवित है, वहां यह आज भी उतनी ही गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ निभाई जाती है। प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में जून से लेकर अगस्त तक धान की रौपाई के समय यह परंपरा हर जगह दिख जाती है। इसके साथ ही आज के दौर में जहां शादी व अन्य समारोहों में टेंट का प्रचलन बढ़ गया है। इसके बाद भी पहाड़ के गांवों में आज भी कई स्थानों पर इस परंपरा को निभाया जाता है। बदलते दौर में पहाड़ को अगर आपने करीब से देखना है तो आ जाइए मेने पहाड़।
‘डिजिटल कुरुक्षेत्र’ में पक्ष और विपक्ष की ‘अग्नि परीक्षा’
चुनावी रंण में एक अदृश्य जंग सोशल मीडिया पर भी दिखेगी
मतदाताओं की सोच प्रभावित कर चुनावी रणनीति का केंद्र बनेगा
सोशल मीडिया अब जनमत निर्माण का बनेगा एक बड़ा साधन
पार्टियां कंटेंट क्रिएशन और डिजिटल मैनेजमेंट पर कर रही निवेश
देहरादून। सूबे में आगामी विधानसभा चुनाव में जहां एक ओर रैलियां, जनसभाएं और रोड शो दिखेगा। वहीं दूसरी ओर एक अदृश्य जंग सोशल मीडिया पर लड़ी जाएगी। विधानसभा चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका भले ही आंखों से दिखाई न दे, लेकिन इसका प्रभाव बेहद गहरा हो सकता है। यह न केवल मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर रहा है, बल्कि चुनावी रणनीति का केंद्र भी बन सकता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस बार की असली जंग सड़कों के साथ-साथ स्क्रीन पर भी लड़ी जाएगी है। इस यु( में पक्ष और विपक्ष की अग्नि परीक्षा होना लाजमी है।
बता दें कि सोशल मीडिया के युग में अदृश्य चुनावी यु( न हो यह हो ही नहीं सकता है। राजनीतिक दल अब सोशल मीडिया को सिर्फ प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफार्म पर माइक्रो-टारगेटिंग के जरिए अलग-अलग वर्गों तक अलग संदेश पहुंचाया जाएगा है। युवा, महिलाएं और पहली बार वोट देने वाले मतदाता इस डिजिटल अभियान के मुख्य केंद्र में हैं। छोटे-छोटे मैसेज, वीडियो क्लिप और ग्राफिक्स के जरिए राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जा रहा है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी कहे जाने वाले इस अनौपचारिक नेटवर्क के जरिए सूचनाएं तेजी से फैलती हैंकृचाहे वह सही हों या भ्रामक। यही कारण है कि सोशल मीडिया अब जनमत निर्माण का एक बड़ा साधन बनेगा है।
सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह उन मतदाताओं तक भी पहुंच बना लेता है जो सार्वजनिक रूप से अपनी राय जाहिर नहीं करते। घर-घर तक पहुंचने वाले मोबाइल फोन और सस्ते इंटरनेट ने साइलेंट वोटर को सीधे राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनते है। नेताओं की छवि गढ़ने और विरोधियों के खिलाफ माहौल बनाने में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभा सकता है। एक वायरल वीडियो या पोस्ट कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंचकर धारणा बदल सकता है। यही वजह है कि पार्टियां अब कंटेंट क्रिएशन और डिजिटल मैनेजमेंट पर भारी निवेश कर रही हैं।
सोशल मीडिया पर जहां राष्ट्रीय मुद्दे तेजी से ट्रेंड करते हैं, वहीं स्थानीय समस्याओं को भी अब डिजिटल मंच मिल गया है। गांव की सड़क, पानी या रोजगार से जुड़ी समस्याएं भी वायरल होकर बड़े मुद्दे बन सकते हैं, जिससे चुनावी एजेंडा प्रभावित होता है। सत्ता पक्ष जहां अपनी उपलब्धियों को डिजिटल माध्यम से प्रचारित कर रहा है, वहीं विपक्ष इन प्लेटफार्म्स का उपयोग सरकार की कमियों को उजागर करने के लिए कर रहा है। दोनों के बीच यह डिजिटल मुकाबला चुनाव से पूर्व ही तेज हो गया है।
राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो आम मतदाता को आगामी विधानसभा चुनाव में ‘डिजिटल कुरुक्षेत्र’ के बारे में पूरी जानकारी रखनी होगी। हालांकि अभी चुनाव आयोग ने चुनाव की घोषणा तो नहीं की है, लेकिन अभी से सर्तक और जानकारी पूरी रखनी मतदाता की भी जिम्मेदारी है। क्योंकि वर्तमान जो दौर चल रहा है उससे आगामी विधानसभा चुनाव में मतदाता को ही नुकसान गलत पार्टी या नेता चुनकर हो सकता है। चुनाव अभी दूर है और सोशल मीडिया पर अभी से अदृश्य चुनावी वार चलने लगा है। इसलिए अभी से सावधान रहें।
पर्वतों से 2027 की जंग में परिवर्तन की लहर
कांग्रेस पार्टी की बड़े नेता की उत्तराखंड में बड़ी रैली करने की तैयारी
आक्रामक होकर कांग्रेस सत्ता पक्ष को हर मोर्चे पर देगा बड़ी चुनौती
युवा और महिला मोर्चा को भी सक्रिय भूमिका में लाने की रणनीति
देहरादून। उत्तराखंड में सियासत में पारा चढ़ने लगा है। आगामी विधानसभा चुनावों के लिए विपक्षी दल कांग्रेस ने कमर कस ली है। कांग्रेस प्रदेश सरकार को पलायन, बेरोजगारी, अग्निपथ योजना, भ्रष्टाचार, पेपर लीक, बढ़ती महंगाई, अंकिता भंडारी जैसे मुद्दों पर हमलावर रुख अपनाए हुए है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस अपने बड़े नेता की उत्तराखंड में बड़ी रैलियां करने की तैयारी में हैं। इसके जरिए कांग्रेस राज्य की जनता को बदलाव का संदेश देने की कोशिश करेगी। वैसे भी कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने स्पष्ट किया है कि पार्टी इस बार जमीन से जुड़े चेहरों पर दांव लगाएगी। देहरादून के राजपुर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में हुई हालिया बैठक में साफ संदेश हर बूथ, कांग्रेस मजबूत दिया गया।
पार्टी नेतृत्व ने बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया है। जिला और ब्लाक स्तर पर कार्यकर्ताओं की बैठकें लगातार आयोजित की जा रही हैं, ताकि चुनावी तैयारियों को धार दी जा सके। युवा और महिला मोर्चा को भी सक्रिय भूमिका में लाने की रणनीति बनाई जा रही है।
वैसे भी राज्य में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पाटी और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस अपनी रणनीति को आक्रामक बनाते हुए सत्ता पक्ष को हर मोर्चे पर चुनौती देने की तैयारी में है। इससे आने वाले विधानसभा चुनाव में इस बार मुकाबला कठिन होने वाला है।
बाक्स
भाजपा ने देवभूमि को केवल नारों में उलझाया है। हम काम की राजनीति और पहाड़ की जवानी को बचाने के संकल्प के साथ मैदान में उतर रहे हैं। जनता बदलाव का मन बना चुकी है।
गणेश गोदियाल, अध्यक्ष, उत्तराखंड कांग्रेस
डिजिटल’ चमक बनाम ‘जमीनी’ सच्चाई
--देवभूमि में सियासत अब केवल पहाड़ों की पगडंडियों तक सीमित नहीं रही
--हाई-स्पीड इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ‘डिजिटल वार’ में हुई तब्दील
--उत्तराखंड की राजनीति में होने वाला है ‘डेटा’ और ‘डेमोग्राफी’ का बड़ा खेल
देहरादून। चुनावी साल में देवभूमि की सियासत अब केवल पहाड़ों की पगडंडियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह हाई-स्पीड इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए ‘डिजिटल वार’ में तब्दील हो चुकी है। आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति में ‘डेटा’ और ‘डेमोग्राफी’ का बड़ा खेल होने वाला है। डिजिटल माध्यमों से सूचनाएं फैल रही हैं, लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव में वोट उसी दल को मिलेगा जो पहाड़ की धूल और धूप में जनता के बीच खड़ा होग।
बता दें कि राज्य सरकार और राजनीतिक दल लगातार ‘डिजिटल उत्तराखंड’ के नारे को आगे बढ़ा रहे हैं। ई-गवर्नेंस, आनलाइन सेवाएं, स्मार्ट सिटी, और सोशल मीडिया पर सक्रियताकृइन सबके जरिए विकास की एक आधुनिक तस्वीर पेश की जा रही है। सरकारी योजनाओं की जानकारी अब मोबाइल एप और पोर्टल के जरिए गांव-गांव तक पहुंचाने का दावा किया जा रहा है। नेताओं की डिजिटल रैलियां, फेसबुक लाइव और व्हाट्सऐप कैंपेन चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
डिजिटल चमक-धमक के बावजूद उत्तराखंड की जीत का रास्ता आज भी उन्हीं कठिन चढ़ाइयों और गांवों से होकर गुजरता है। प्रदेश में इस समय भू-कानून और मूल निवास इस वक्त का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। जमीन पर लोग अपनी संस्कृति और संसाधनों को बचाने के लिए लामबंद हो रहे हैं। यह मुद्दा सोशल मीडिया पर तो है ही, लेकिन इसकी जड़ें पहाड़ के हर घर के चूल्हे तक पहुंच चुकी हैं। इसके साथ ही पलायन और रोजगार भी बड़ा मुद्दा बन गया है। ‘खंडित’ होते गांवों को बचाना और स्थानीय युवाओं को पहाड़ में ही रोजगार देना आज भी सबसे बड़ी चुनौती है। सड़कों का जाल बिछने के बावजूद, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में पलायन एक कड़वी सच्चाई बनी हुई है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह डिजिटल क्रांति पहाड़ के आखिरी गांव तक पहुंच पाई है? कई दूरस्थ इलाकों में आज भी नेटवर्क की समस्या, इंटरनेट की धीमी गति और डिजिटल साक्षरता की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है। डिजिटल दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और कहानी बयां करती है। उत्तराखंड में ’पलायन’ सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। गांव खाली हो रहे हैं और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। बेरोजगारी का संकट भी गहराता जा रहा है, खासकर शिक्षित युवाओं में असंतोष बढ़ रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंता का विषय है। पहाड़ी क्षेत्रों में अस्पतालों की कमी, डाक्टरों की अनुपलब्धता और आपातकालीन सेवाओं का अभाव आज भी लोगों के लिए परेशानी का कारण है। कई गांवों में आज भी सड़क और परिवहन की सुविधा सीमित है। शिक्षा के क्षेत्र में भी स्कूलों की स्थिति, शिक्षकों की कमी और संसाधनों का अभाव जमीनी सच्चाई को उजागर करता है।
राजनीतिक दल अब यह समझ चुके हैं कि केवल डिजिटल प्रचार से चुनाव नहीं जीते जा सकते। इसलिए एक ओर जहां सोशल मीडिया पर आक्रामक कैंपेन चल रहा है, वहीं दूसरी ओर ‘डोर-टू-डोर’ संपर्क, जनसभाएं और स्थानीय मुद्दों पर फोकस भी बढ़ाया जा रहा है। उत्तराखंड की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह डिजिटल विकास और जमीनी जरूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाए। जब तक गांवों में रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति नहीं सुधरेगी, तब तक डिजिटल दावों की चमक अधूरी ही मानी जाएगी। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता ‘डिजिटल वादों’ को ज्यादा तवज्जो देती है या ‘जमीनी मुद्दों’ को प्राथमिकता देती है या नहीं।
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