बुधवार, 24 जून 2026

उत्तराखंड में ‘बिसात’ पर सजे ‘मोहरे’

भाजपा की हैट्रिक की जिद और कांग्रेस कर रहा वापसी की जंग देहरादून से सीमांत क्षेत्रों तक सूबे में छिड़ गया सत्ता का महाभारत क्षेत्रीय दल और बागी भी बदल सकते हैं कई विस सीटों का गणित देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति इस समय शतरंज की बिसात जैसी दिखाई दे रही है। मोहरे सज चुके हैं, रणनीतियां बन रही हैं और राजनीतिक हमले भी तेज होने लगे हैं। चुनाव की तारीख भले घोषित न हुई हो, लेकिन सत्ता की लड़ाई का बिगुल बज चुका है। आने वाले महीनों में दल-बदल, नए गठबंधन, टिकट की खींचतान और बड़े राजनीतिक दांव उत्तराखंड की सियासत को और अधिक गर्माने वाले हैं। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव का राजनीतिक दलों ने चुनावी शंखनाद लगभग कर दिया है। राजधानी देहरादून से लेकर सीमांत जिलों तक राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतर चुकी है, जबकि कांग्रेस पिछले एक दशक से सत्ता से बाहर रहने के बाद वापसी का रास्ता तलाश रही है। दूसरी ओर उत्तराखंड क्रांति दल, बसपा, आम आदमी पार्टी और निर्दलीय चेहरे भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। प्रदेश की राजनीति में इस समय सबसे बड़ी लड़ाई केवल सरकार बनाने की नहीं, बल्कि जनमत को अपने पक्ष में मोड़ने की है। भाजपा विकास, बुनियादी ढांचे, निवेश, समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच जा रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली, शिक्षा व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और स्थानीय मुद्दों को चुनावी हथियार बना रही है। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश में जुटे हैं और कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी लहर (एंटी इनकंबेंसी) को नियंत्रित करना है। लगातार दो कार्यकाल सरकार चलाने के बाद जनता की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। कई विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी की चर्चाएं हैं। पार्टी इसलिए संगठन और सरकार दोनों के प्रदर्शन को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है। भाजपा यह भी जानती है कि उत्तराखंड की राजनीति में हर चुनाव में मतदाता सत्ता बदलने का इतिहास रखते आए हैं। हालांकि 2022 में भाजपा ने इस परंपरा को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी। अब पार्टी तीसरी बार सत्ता में लौटने का नया इतिहास लिखना चाहती है। कांग्रेस को उम्मीद है कि महंगाई, बेरोजगारी, युवाओं की नाराजगी और स्थानीय समस्याएं उसके लिए राजनीतिक अवसर बन सकती हैं। लेकिन कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं है। संगठनात्मक मजबूती, गुटबाजी पर नियंत्रण और मजबूत स्थानीय नेतृत्व उसके लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी। यदि कांग्रेस इन चुनौतियों से पार पा लेती है तो मुकाबला सीधा और कांटे का हो सकता है। उत्तराखंड में चुनाव भले भाजपा और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला होता हो, लेकिन कई सीटों पर क्षेत्रीय दल और निर्दलीय उम्मीदवार जीत-हार का अंतर तय करते रहे हैं। उत्तराखंड क्रांति दल राज्य आंदोलन की विरासत को फिर से राजनीतिक ताकत में बदलने की कोशिश कर रहा है। यदि पार्टी सीमित सीटों पर भी प्रभावी प्रदर्शन करती है तो कई सीटों का समीकरण बदल सकता है। 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 70 में से 47 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं। बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद विधानसभा में भाजपा के पास 47 और कांग्रेस के पास 20 सदस्य हैं। विधानसभा में बहुमत के लिए 36 सीटों की आवश्यकता होती है। इस बार सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार, व्हाट्सऐप नेटवर्क, बूथ प्रबंधन और माइक्रो कैडर पर विशेष जोर रहेगा। दोनों दल युवा मतदाताओं और पहली बार मतदान करने वालों तक पहुंचने के लिए अलग-अलग अभियान तैयार कर रहे हैं। उम्मीदवारों के चयन में जीतने की क्षमता और स्थानीय स्वीकार्यता पहले से अधिक महत्वपूर्ण होगी।

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