शुक्रवार, 8 मई 2026
देवभूमि पर ‘अपनों’ का ‘दाग’
क्रासर
देवभूमि में संगठन-सत्ता के बीच पिस रही है कानून-व्यवस्था
उत्तराखंड में महिला अपराधों ने बढ़ाया प्रदेश में सियासी पारा
सूबे में बेटियों की सुरक्षा पर बड़ा विपक्षी पूछ रहे हैं सवाल
भाजपा नेताओं के नाम आने से गरमाया राजनीतिक माहौल
देहरादून। उत्तराखंड में सत्ता, संगठन और कानून व्यवस्था कटघरे में है। चंपावत से लेकर हरिद्वार तक ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने सरकार की बेटी बचाओ के नारों पर सवाल खड़े किए हैं। प्रदेश में महिलाओं के विरु( अपराध और उनमें सत्ताधारी दल से जुड़े चेहरों की संलिप्तता ने प्रदेश के राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। अंकिता भंडारी हत्याकांड के बाद जनता के भीतर जो आक्रोश पैदा हुआ था, वह अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ कि नए मामलों ने फिर बहस छेड़ दी है।
सबसे ताजा और चौंकाने वाला मामला मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र चंपावत से सामने आया है। यहाँ एक 10वीं की छात्रा के साथ गैंगरेप के मामले में भाजपा के एक मंडल उपाध्यक्ष, एक पूर्व प्रधान और एक छात्र पर गंभीर आरोप लगे हैं। पीड़ित एक दोस्त की मेहंदी की रस्म में गई थी, जहाँ से उसे बंधक बनाकर इस घृणित कार्य को अंजाम दिया गया। इससे पूर्व हरिद्वार में एक पूर्व भाजपा महिला मोर्चा नेत्री ने अपने ही प्रेमी और उसके साथियों को अपनी नाबालिग बेटी का यौन शोषण करने की अनुमति दी। वही अल्मोड़ा के भाजपा ब्लाक प्रमुख भगवत बोरा पर एक 14 वर्षीय किशोरी के साथ दुष्कर्म का आरोप लगा था। मामला तब बढ़ा जब आरोपी ने पीड़िता के परिवार को धमकाने की कोशिश की।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले महिला सुरक्षा एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। खासतौर पर पहाड़ की महिलाओं और युवाओं के बीच यह भावना मजबूत हो रही है कि राजनीति में चरित्र और जवाबदेही पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। सवाल केवल किसी एक पार्टी या नेता का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो जनता लोकतंत्र और शासन व्यवस्था पर करती है। सत्ता में बैठे लोग महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के मुद्दे पर कितने गंभीर हैं।
उत्तराखंड में पिछले कुछ समय में सत्तारूढ़ भाजपा के कुछ नेताओं और उनके करीबियों पर गंभीर आरोप लगने का क्रम जारी हैं, जिससे प्रदेश की राजनीति में उबाल है। विपक्ष इन मुद्दों को कानून-व्यवस्था की विफलता बताकर सरकार को घेर रहा है। राजनैतिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में इन मुद्दों की आंच से भाजपा को नुकसान भी हो सकता है।
बाक्स
इंसाफ की सबसे लंबी लड़ाई
उत्तराखंड के इतिहास में सबसे ज्यादा चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में मई 2025 में कोटद्वार कोर्ट ने मुख्य आरोपी पुलकित आर्य ;पूर्व भाजपा नेता का बेटाद्ध और उसके साथियों को दोषी करार दिया। हालांकि यह मामला हत्या का था, लेकिन इसमें स्पेशल सर्विस के नाम पर यौन उत्पीड़न के दबाव की बात सामने आई थी, जिसने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया था।
साफ्ट हिदुत्व’ और ‘विकास’ का एजेंडा
क्रासर
--मुख्यमंत्री लगातार ले रहे हैं बडे़ फैसले, भाजपा कर रही बड़ी रैलियां
--सरकार को घेरने की रणनीति पर कांग्रेस पार्टी लगातार कार्य कर रही
--कांग्रेस के लिए पैदा कर दी हैं भाजपा सरकार ने कई नईईचुनौतियां
देहरादून। प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनावी साल में एक ओर भाजपा जहां ’साफ्ट हिदुत्व’ और ’विकास’ के एजेंडे के साथ चुनाव की तैयारियां कर रही है। वही दूसरी ओर कांग्रेस के लिए भाजपा सरकार ने कई नईईचुनौतियां पैदा कर रही है। एक ओर जहां प्रदेश सरकार चुनावी मोड में आ गई है। वही कांग्रेस भी मैदान मंे आक्रामक होकर उतरने को तैयार है।
उत्तराखंड में भाजपा सरकार पूरी तरह चुनावी मोड में आ गई है। इसके लिए सरकार बडे़ फैसले लेने में लगी है ताकी आगामी विधानसभा चुनाव में मजबूती के साथ मैदान में उतरा जा सके। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जहां लगातार बडे़ फैसले ले रहे हैं वही भाजपा प्रदेश में बड़ी रैलियां आयोजित कर रही है। दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी कांग्रेस भी विधानसभा चुनाव के लिए पूरी तैयारी के साथ भाजपा सरकार को घेरने के लिए रणनीति पर कार्य कर रही है।
बता दें कि प्रदेश सरकार चुनावी मोड में नजर आ रही है और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार बड़े फैसले ले रहे हैं। वही भाजपा हिंदुत्व और विकास को लेकर जनता के सामने जाने की तैयारी में हैं। भाजपा जहां सरकार की उपलब्धियों को अपनी जीत में परिवर्तित करने में लगी है वही इसके लिए भाजपा प्रदेश में बडे़ नेताओं की रैलियां आयोजित करवा रही है। इसके साथ ही सूबे के अलग-अलग क्षेत्रों में महिला आरक्षण विल को लेकर भी जनसमर्थन जुटाने में लगी है। दूसरी ओर कांग्रेस बिल के विरोध में धरना और प्रदर्शन करने में लगी है। इसके साथ ही कांग्रेस सरकार की नाकामियों को लेकर मैदान में उतरने को तैयार है।
प्रदेश में सरकार द्वारा लिए गए हालिया फैसलों से यह लग रहा है कि प्रदेश सरकार चुनावी मोड में आ गई है। चुनावी साल में मुख्यमंत्री धामी ने उत्तराखंड मदरसा बोर्ड को भंग करने की एक बड़ी घोषणा की है। सरकार का कहना है कि जुलाईई 2026 से सभी मदरसों में अनिवार्य रूप से उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम लागू किया जाएगा, जो मदरसे इसे नहीं मानेंगे, उन्हें बंद करने की चेतावनी दी गई है। इस कदम को राज्य में शिक्षा सुधार और समान नागरिक संहिता की दिशा में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है।
यही नहीं आगामी चुनावों को देखते हुए मुख्यमंत्री धामी काफी सक्रिय हैं। उन्होंने राज्य के 29 विधानसभा क्षेत्रों की चरणवार समीक्षा शुरू की है। इसके तहत वह लंबित घोषणाओं और विकास कार्यों का जायजा ले रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य शासन के प्रदर्शन को बेहतर बनाना और जनता के बीच सरकार की पहुंच को मजबूत करना है। चुनावी साल में सीएम धामी के सक्रिय होने से यह तो साफ हो गया है कि आगामी विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लगा जाएगा। शायद यही कारण है कि वह लगातार क्षेत्रों में जा रहे है। हालांकि विधानसभा चुनाव की अभी घोषणा होना बाकी है, लेकिन प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस भी चुनावी मोड में आ गए है।
‘परंपरा’ पर लगा ‘विराम’
उत्तराखंड में मार्च महीने को लेकर स्थापित धारणा की ध्वस्त
मंत्रिमंडल विस्तार से टूटी सत्ता परिवर्तन की पुरानी परिपाटी
भाजपा हाईकमान ने भाजपा में सब कुछ ठीक का दिया संदेश
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीतिक अस्थिरता लंबे समय से देखी जा रही थी और यह अस्थिरता एक अजीब परंपरा का रूप ले चुकी थी। प्रदेश में भाजपा की सरकार के समय राजनीतिक अस्थिरता की परंपरा रही है। लेकिन वर्तमान में फिलहाल इस पर विराम लग गया है ऐसा राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है।
बता दें कि लंबे समय से भाजपा के शासनकाल में नेतृत्व परिवर्तन की परंपरा रही है। अभी तक प्रदेश में जब-जब भाजपा की सरकार रही तब-तब सरकार के कार्यकाल का अंतिम वर्ष आते-आते नेतृत्व परिवर्तन लगभग तय मान लिया जाता था और यह परंपरा जैसी बन गई थी। लेकिन वर्तमान में भाजपा के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है का संदेश आमजन तक जा चुका था। ऐसे में भाजपा हाईकमान को उचित फैसला तो लेना ही था। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो भाजपा में उपजे असंतोष का ही परिणाम है कि प्रदेश सरकार को अंतिम वर्ष में मंत्री पद बांटने पडे़।
माना जा रहा है कि प्रदेश में भाजपा की स्थिति ठीक नहीं होने के कारण भाजपा केंद्रीय नेतृत्व के आदेश पर प्रदेश में चार सालों के इंतजार के बाद कैबिनेट विस्तार किया गया। इसके साथ ही प्रदेश में चल रही तमाम अटकलों पर लगाम लगने का संदेश भी दिया है। ज्ञात हो कि धामी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा ने उत्तराखंड में मुख्यमंत्री को रिपीट कर स्थिरता का संदेश दिया था और अब पांचवें वर्ष में मंत्रिमंडल विस्तार कर यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यह सरकार परंपरागत राजनीति से अलग, आत्मविश्वास और प्रदर्शन की राजनीति पर चल रही है। वही दूसरी ओर जहां विरोधी दल यह अनुमान लगा रहे थे कि इतिहास खुद को दोहराएगा और धामी को भी बदला जाएगा। लेकिन फिलहाल ऐसा कुछ होगा दिख नहीं रहा है। अगर ऐसा होता तो चुनावी साल में मंत्रीमंडल विस्तार नहीं होता।
सूत्रों की माने तो भाजपा हाईकमान ने मंत्रिमंडल विस्तार कर राजनीतिक संदेश दिया है कि भाजपा में सब ठीक है। फैसले ने एक और संकेत साफ कर दिया है भाजपा अब उत्तराखंड में नेतृत्व को लेकर किसी प्रयोग के मूड में नहीं है। धामी केवल वर्तमान के मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति के केंद्र बिंदु बन चुके हैं। इसके साथ ही धामी की छवि को ‘स्थायी नेतृत्व’ है का संदेश दिया है।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया नकारात्मक: चौहान
भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान ने कहा कि धामी सरकार के मंत्रिमंडल मे विस्तार से कार्यकर्ताओं मे उत्साह है और कांग्रेस की प्रतिक्रिया इसमें नकारात्मक और हताशा से भरी हुईई है। धामी के नेतृत्व में प्रदेश सरकार निरंतर विकास, सुशासन और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को कांग्रेस मे मंत्री अथवा दायित्व स्टेटस सिंबल बन जाता है, लेकिन भाजपा का मिशन सेवा है और इसी धेय के साथ हर कार्यकर्ता को दायित्व सौंपा जाता है।
कांग्रेस पृष्ठभूमि के लोगों को बनाया मंत्री: गोदियाल
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि राज्य में मंत्रिमंडल का विस्तार भाजपा की अंदरूनी कलह को दबाने के लिए किया गया है, जिसमें भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ विधायकों को सम्मान देने की बजाय कांग्रेस से दल बदल कर गये विधायकों को अधिक तवज्जो दी है। इसीलिए मंत्रिमंडल विस्तार में कांग्रेस पृष्ठभूमि के लोगों को मंत्री बनाया गया है। इससे आने वाले समय में भाजपा के अंदर असंतोष ओर पनपेगा और यह सबके सामने जल्द आ जाएगा।
‘प्रश्नों’ को जवाब का ‘इंतजार’
उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र
600 से ज्यादा सवालों से गरमाएगा सदन
विपक्ष ने किया सड़क से सदन तक हंगामा
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र में विधायकों के प्रश्नों को जवाब का इंतजार रहेगा। विपक्ष के आक्रामक रूख से सरकार परेशान रहेगी। यह हम नहीं कह रहे है अभी तक के इतिहास में ऐसा ही होता आया है।
बता दें कि विधानसभा सत्र के पहले दिन राज्यपाल के अभिभाषण के साथ ही सीएम ने बजट पेश किया। सत्र के दूसरे दिन की कार्ययोजना के हिसाब से प्रश्नकाल होगा। इसके साथ ही सरकार आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट और कैग की सात रिपोर्ट सदन पटल पर रखने के साथ ही कुछ अध्यादेश भी सदन पटल पर रखे जाएंगे।
कार्ययोजना के अनुसार इस बार पक्ष-विपक्ष के विधायकों के 600 प्रश्न मिले हैं। अभी तक के इतिहास की बात करें तो सीएम के पास सबसे अधिक विभाग हैं और सीएम हमेशा प्रश्नों से बचते आये हैं। इससे विपक्ष को बोलने का मौका मिलता है और वह सरकार को चारों ओर से घेरने में कामयाब रहता है।
ज्ञात हो कि पहले दिन सड़क से सदन तक विपक्ष ने खूब हंगामा किया और आज भी विपक्ष चुप नहीं बैठने वाला है। पहले दिन सत्र शुरू होते ही विपक्ष ने सदन से वाकआउट कर सड़क पर भी प्रदर्शन किया। विपक्ष सदन की समययावधि बढ़ाने की मांग कर रहा है।
भाजपा में आकर खुली ‘किस्मत’
कांग्रेस मुक्त करने वाली भाजपा हुई कांग्रेस युक्त
सरकार में सात मंत्री कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले
देहरादून। कांग्रेस पार्टी के नेताओं की माने तो प्रदेश को कांग्रेस मुक्त करने का नारा देने वाली भाजपा अब खुद कांग्रेस युक्त हो गई है। वर्तमान कैबिनेट विस्तार के बाद धामी सरकार में अब बड़ी संख्या उन नेताओं की हो गई है, जिनकी राजनीतिक जड़ें कभी कांग्रेस में रही हैं।
बता दें कि भाजपा और कांग्रेस में दल छोड़कर आने और जाने वालों का लंबा इतिहास रहा है। खासकर चुनाव के समय भाजपा से कांग्रेस और कांग्रेस से भाजपा में आने व जाने वालों की लिस्ट लंबी होती है। भाजपा से कांग्रेस में जाने वालों को तो अभी तक कोई फायदा नहीं मिला। कार्यकर्ता और पदाधिकारी जिस कारण भाजपा को छोड़कर कांग्रेस में गए वहा भी उन्हें उन्हीं परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन कांग्रेस छोडकर भाजपा में आने में से कई नेताओं की किस्मत खुली है।
राजनीतिक विशेषज्ञ बताते हैं कि वर्तमान भाजपा सरकार में कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों को देखकर तो ऐसा ही लगता है। वर्तमान में चर्चा यह है कि धामी सरकार में अब बड़ी संख्या उन नेताओं की हो गईई है, जिनकी राजनीतिक जड़ें कभी कांग्रेस में रही हैं।
कैबिनेट में जिन पांच विधायकों को जगह दी गईई है, उनमें से केवल मदन कौशिक, खजान दास तो पूरी तरह से भाजपा पृष्ठभूमि के हैं। बाकी भरत सिंह चौधरी, राम सिंह कैड़ा, प्रदीप बत्रा कांग्रेसी बैकग्राउंड के रहे हैं। इसके साथ ही कैबिनेट के पुराने मंत्रियों को देखें तो सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल, सौरभ बहुगुणा, रेखा आर्य भी कांग्रेस बैंकग्राउंड के रहे हैं।
सोशल मीडिया पर इस पर कई मीम्स भी बनकर वायरल हो रहे है। कैबिनेट विस्तार के बाद जहां सोशल मीडिया पर लोग इन मीम्स को जहां खूब शेयर कर रहे हैं। वही कुछ दिनों से सीएम बदलने के मीम्स अब कही नहीं दिख रहे हैं। कैबिनेट विस्तार के बाद सोशल मीडिया यूजर की बहस में अब सिर्फ कांग्रेस वाली भाजपा का ही जिक्र हो रहा है।
उत्तराखंड बीजेपी में ‘भूचाल’
देहरादून। उत्तराखंड में राजनीतिक माहौल गरमाने लगा है। बीजेपी में अंदरखाने चल रही कलह अब खुलकर सामने आ गई है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व बीकेटीसी अध्यक्ष अजेंद्र अजय के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने उत्तराखंड बीजेपी में भूचाल ला दिया है। अजेंद्र अजय ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर बीजेपी से मोहभंग होने की बात कही है, जिसके बाद से सियासी गलियारों में हलचल मच गईई है।
सोशल मीडिया पोस्ट में बीजेपी से मोहभंग होने की बात कहते हुए अजेंद्र अजय ने लिखा है कि उत्तराखंड में वर्तमान में जिस प्रकार का राजनीतिक परिदृश्य देखने को मिल रहा है, उससे राजनीति के प्रति मोहभंग सा होता जा रहा है। मोदी जी ने कहा था कि तीसरा दशक उत्तराखंड का होगा। तीसरा दशक ऐसा होगा, हम जैसे कार्यकर्ताओं और देवभूमि की जनता ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उनकी पोस्ट के बाद बीजेपी के भीतर चल रही अंर्तकलह की खबरों पर मुहरर लग गई है।
प्रदेश को सरकार का ‘चुनावी झुनझुना’
क्रासर--धामी मंत्रिमंडल में किए पांच नए मंत्री शामिल
--भाजपा के विधायकों की मनोकामना हुई पूर्ण
--राज्यपाल ने दिलाई नए मंत्रियों को शपथ ई
देहरादून। प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा नेे विधायकों की मनोकामना पूर्ण कर दी है। सूबे में मंत्रियों के पद लंबे समय से रिक्त थे और भाजपा सरकार ने चुनावी साल में इन्हें भरा। राजनीति के विशेषज्ञों की माने तो चुनावी साल में भाजपा सरकार का यह प्रदेश के लिए ‘चुनावी झुनझुना’ है।
बता दें कि लंबे समय से प्रदेश में विकास की गति अवरू( थी और मंत्री पद खाली थे, लेकिन सरकार ने इन्हें नहीं दिया। अब सरकार का मात्र एक साल बचा है और भाजपा सरकार ने पांच नए मंत्री बनाकर सूबे की जनता के साथ मजाक किया है। क्योंकि जब तक नए मंत्री विभागों के काम-काज को समझेंगे तब तक चुनाव का समय हो जाएगा। राजनीति के विशेषज्ञों की माने तो इससे साफ जाहिर होता है कि सरकार का यह चुनावी एजेंडा है।
सरकार और संगठन में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है इसकी चर्चा प्रदेश में लंबे समय से होती आ रही है। कई बार इसके परिणाम सड़क से लेकर सदन तक दिखे हैं जब सरकार के मंत्री और कार्यकर्ता आपस में उलझे और अपनी बयानबाजी को लेकर चर्चा में रहे है। इससे सगठन के साथ ही सरकार की छवि को काफी हानि हो रही है। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है, लेकिन ऐन चुनाव से पहले विधायकों को सरकार में शामिल कर मंत्री बनाने से स्पष्ट हो गया है।
बता दें कि उत्तराखंड राज्य में साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले धामी मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया है। राज्य सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए क्षेत्रीय, जातीय और महिला-युवा संतुलन साधने की कोशिश की है। साल 2022 में सरकार के गठन के बाद से ही मंत्रिमंडल के कईई पद खाली चल रहे थे, जिसके बाद से ही समय-समय पर मंत्रिमंडल विस्तार की सुगबुगाहट उठती रही है। ऐसे में वर्तमान सरकार के कार्यकाल को चार साल पूरा होने से ठीक तीन दिन पहले मंत्रिमंडल का विस्तार कर दिया गया है।
साल 2022 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत 9 विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली थी। ऐसे में सरकार के गठन के साथ ही तीन मंत्रिमंडल के पद खाली चल रहे थे, लेकिन कुछ समय बाद ही यानी 26 अप्रैल 2023 को परिवहन मंत्री चंदन रामदास के निधन के बाद एक और मंत्रिमंडल का पद खाली हो गया। इसके साथ ही 16 मार्च 2025 में वित्त मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल की ओर से दिए गए विवादित बयान के बाद उन्हें भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। ऐसे में धामी मंत्रिमंडल में पांच मंत्री के पद खाली चल रहे थे।
अब मंत्रियों की संख्या हुई 12
लोक भवन में नव नियुक्त कैबिनेट मंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया गया। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान राज्यपाल गुरमीत सिंह ने पांच विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलाई। ऐसे में अब धामी मंत्रिमंडल में मंत्रियों की संख्या बढ़कर 12 हो गई है।
इन विधायकों को मिली जगह
रुद्रप्रयाग विधानसभा सीट से विधायक भरत चौधरी
रुड़की विधानसभा सीट से विधायक प्रदीप बत्रा
हरिद्वार विधानसभा सीट से विधायक मदन कौशिक
राजपुर विधानसभा सीट से विधायक खजान दास
भीमताल विधानसभा सीट से विधायक राम सिंह कैड़ा
दायित्व भी जल्द बंटेंगे
सरकार ने निगमों, बोर्ड व आयोगों में पार्टी पदाधिकारियों को दायित्वधारी बनाया है। अभी दायित्वधारियों के कई पद खाली हैं। सूत्रों के अनुसार अब जल्द ही दो दर्जन और पदों पर दायित्वधारी बनाए जाएंगे।
विधानसभा चुनाव अगले वर्ष
अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। प्रदेश में राजनीतिक स्थायित्व के संदेश के इस क्रम में पार्टी अपने विधायकों एवं कार्यकर्ताओं का भी मनोबल बढ़ाने की तैयारी कर रही है। मंत्रिमंडल के विस्तार और दायित्व वितरण के माध्यम से पार्टी का मनोबल बढ़ाने के साथ ही संदेश भी दिया जाना है।
41 घंटे 10 मिनट चला सदन
1.11 लाख करोड़ का बजट ध्वनिमत से पारित
विधानसभा सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित
बजट सत्र में सीएम ने गिनाईं सरकार की उपलब्धिया
कई मुद्दों से गरमाया सदन, बाहर विपक्ष ने दिया धरना
देहरादून। पांच दिवसीय बजट सत्र पर सदन में चर्चा के साथ आधी रात सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। सरकार ने एक लाख करोड़ से ज्यादा का बजट पारित किया। इसके साथ ही चर्चा के दौरान जहां सत्ता पक्ष ने बजट को विकसित उत्तराखंड 2047 के संकल्प और सभी वर्गों को पूरा करने वाला बताया। वहीं, विपक्ष ने इसे निराशाजनक बताते हुए कहा कि इसमें आमजन के लिए कुछ नहीं है।
बता दें कि विधानसभा सत्र के पहले दिन वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 111703.21 करोड़ रुपये का बजट पेश किया था। वर्तमान वित्तीय वर्ष की तुलना में इस बजट के आकार में 10.41 प्रतिशत की वृ(ि की गई है। सरकार को नए वित्तीय वर्ष में 111703.21 करोड़ का राजस्व प्राप्त होने का अनुमान है। इसमें 67525.77 करोड़ राजस्व प्राप्तियों व 42617.35 करोड़ पूंजीगत प्राप्तियों का योगदान शामिल होगा। कर मुक्त बजट में राजस्व घाटे का अनुमान नहीं है। वही, 12579.70 करोड़ राजकोषीय घाटा होने का अनुमान लगाया गया है।
बजट सत्र में वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट और 12 विधेयकों को पारित किए गए। दौरान विधानसभा को 50 अल्प सूचित प्रश्न प्राप्त हुए और तारांकित प्रश्न 545 प्राप्त हुए। विधानसभा सत्र के दौरान 291 प्रश्नों के उत्तर दिए गए। विधानसभा के बजट सत्र के दौरान चार अध्यादेशों को मंजूरी दी गई।
उत्तराखंड की राजनीति में आएगा ‘भूचाल’
सूर्य, मंगल और राहु के कारण होगी राजनीति में हलचल
विधानसभा के बजट सत्र में विपक्ष करेगा जोरदार हंगामा
विधानसभा चुनाव के लिए होगा सकारात्मक माहौल तैयार
देहरादून। विधानसभा चुनाव आने वाले है और विपक्ष सरकार को विधानसभा के बहाने अवश्य घेरेगा। फिलहाल ग्रह और नक्षत्रों के परिवर्तन से प्रदेश की राजनीति में भूचाल आने की संभावना है। गैरसैंण में विधानसभा का बजट सत्र है और विपक्ष इस सत्र में हंगामा करेगा ही। यदि सत्ता पक्ष संयम और समझदारी से काम लेता है तो ग्रहों की अनुकूल स्थिति राज्य की राजनीति में स्थिरता और सकारात्मक बदलाव ला सकती है।
ज्योतिष के अनुसार मार्च 2026 के दौरान सूर्य, मंगल और राहु की युति के कारण राज्य में राजनीति में हलचल हो सकती है। ग्रहों का गोचर अनजाने में विवाद की स्थिति पैदा कर सकता है। उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र को लेकर उत्तराखंड ज्योतिष रत्न आचार्य डा. चंडी प्रसाद घिल्डियाल ने ज्योतिषीय आकलन जारी किया है।
उन्होंने बताया कि बृहस्पति के मार्गी होने का प्रभाव शासन और नीति निर्माण की प्रक्रिया पर सकारात्मक पड़ेगा। इससे सरकार के निर्णय लेने की गति बढ़ेगी और प्रशासनिक स्तर पर मजबूती देखने को मिल सकती है। यह समय सरकार के लिए जनता के बीच अपनी छवि मजबूत करने का अवसर भी बन सकता है। इसके साथ ही 2027 के चुनावों के लिए सकारात्मक माहौल तैयार किया जा सकता है।
ग्रहों की वर्तमान स्थिति मंत्रियों और अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय के संकेत दे रही है, जिससे लंबे समय से लंबित परियोजनाओं को गति मिल सकती है। उनके अनुसार बुध और गुरु की अनुकूल स्थिति सरकार की निर्णय क्षमता को परिपक्व बनाएगी और यह समय राजनीतिक चुनौतियों के बीच सरकार के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस दौरान मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक समन्वय से जुड़े विषयों पर भी चर्चा संभव है।
राजनैतिक दलों में ‘अंतर्कलह’
क्रासर--कांग्रेस का आरोप-सरकार और संगठन में है तालमेल की कमी
--नेता प्रतिपक्ष यशपाल ने मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सरकार को घेरा
--भाजपा का आरोप-कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नहीं बना पाए अपनी टीम
--कहा-कांग्रेस के सभी नेता चाहते हैं पार्टी में पद, हो रही है खींचतान
देहरादून। चुनावी साल में राजनैतिक दलों में घमासान न हो यह हो ही नहीं सकता है और एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप न हो यह भी नहीं हो सकता है। यही नहीं राजनैतिक दलों में ‘अंतर्कलह’ यह तो आम बात है। चुनावी साल में हर नेता अपना टिकट पक्का करना चाहता है और इसके लिए वह किसी भी ‘हद’ तक जा सकता है। यहां भाजपा और कांग्रेस की बात करें तो दोनों दलों में ‘अंतर्कलह’ साफ देखा जा सकता है। राजनैतिक दलों की प्रदेश को लेकर जो भी ‘रणनीति’ हो, लेकिन यह साफ है कि दोनों दलों में कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
भाजपा की बात करें तो भाजपा की प्रदेश में अभी सरकार है। भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव में जीत पक्की करने के लिए समय, संसाधन और जनता का विश्वास कायम रखने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन प्रमुख विपक्षी कांग्रेस की माने तो संगठन और सरकार में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं हैं। अगर कांग्रेस की माने तो भाजपा में ‘अंतर्कलह’ है और इसका खामियाजा उसे आने वाले चुनाव में भुगतना होगा। यही नहीं कांग्रेस का आरोप है कि सरकार प्रदेश में ठीक काम नहीं कर रही है। इससे संगठन और सरकार के मध्य किसी भी बात को लेकर एक राय नहीं है।
बता दें कि अगर कांग्रेस के आरोपों को सही माना जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा में कई ऐसे अच्छे नेता है जिन्हें संगठन में दूर रखा हुआ है। प्रदेश में जहां मंत्री पद खाली है और सरकार इन चार सालों में इस पर फैसला नहीं ले पायी। यह दर्शाता है कि ‘अंतर्कलह’ के कारण इस पर फाइनल मोहर नहीं लग पा रही है। इसके साथ ही भाजपा नेताओं के ‘बिगडे़ बोल’ कई बार भाजपा और सरकार के लिए मुसीबत बन रहे है। यही नहीं जिस पार्टी की सरकार सत्ता में होती है उसके कार्यकर्ता चाहते हैं कि सरकार के सत्ता में होने का उन्हें फायदा मिले, लेकिन प्रदेश में दायित्वधारियों को लेकर चर्चाएं तो होती हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद वह चर्चा फिर बंद हो जाती है। इसका मतलब सरकार और संगठन में सब ठीक नहीं है।
दूसरी ओर कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष तो बदल दिया, लेकिन अभी तक कांग्रेस की टीम खड़ी नहीं हो पायी है। भाजपा के नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस अपने घर के झगडे़े से निपटे तो कांग्रेस अध्यक्ष अपनी टीम खड़ी करें, लेकिन कांग्रेस में जो ‘अंतर्कलह’ चल रहा है उससे कांग्रेस के नेता भी खुद की पार्टी के विरोध में बयानवाजी कर रहे हैं। एक ओर कांग्रेस प्रदेश सरकार पर आक्रामक हो रखी है वहीं कांग्रेस नेताओं के आपसी खींचतान से कांग्रेस की टीम खड़ी नहीं हो पा रही है। सूत्रों की माने तो कांग्रेस में हर नेता ही चाहत है कि उसे टीम में पद मिले। शायद यही कारण है कि कांग्रेस भी ‘अंतर्कलह’ का शिकार हो गई है।
सरकार और संगठन में तालमेल नहीं: यशपाल
उत्तराखंड में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर बड़ा राजनीतिक हमला बोला है। नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य ने भाजपा सरकार और संगठन के बीच तालमेल की कमी का आरोप लगाते हुए कहा कि यही वजह है कि लंबे समय से मंत्रिमंडल विस्तार नहीं हो पा रहा है। यशपाल आर्य ने कहा कि भाजपा सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी के भीतर ही कईई विधायक नाराज बताए जा रहे हैं और सरकार तथा संगठन के बीच सामंजस्य की कमी साफ दिखाई दे रही है।
उत्तराखंड में यूकेडी की ‘दहाड़’
यूकेडी की युवा ब्रिगेड ने प्रदेश सरकार की नाम में दम
विभिन्न मुद्दों को लेकर लंबे समय सड़कों पर हैं युवा
युवाओं के हुजूम से प्रदेश सरकार दिख रही है असहज
देहरादून। चुनावी साल में यूकेडी आक्रामक रूख सरकार के लिए मुसीबत पैदा कर रहा है। प्रदेश के विभिन्न मुद्दों को लेकर विगत लंबे समय से यूकेडी की युवा ब्रिगेड ने प्रदेश सरकार की नाम में दम कर रखा है। प्रदेश हित से जुड़ा छोटा हो या बड़ा मुद्दा यूकेडी से जुडे़ युवाओं का हुजूम सड़क पर दिख जाता है और प्रदेश सरकार इससे असहज नजर आती है।
बता दें कि उत्तराखंड राज्य में यह चुनावी साल है और सरकार किसी भी हाल में अपने पक्ष में अपनी किरकिरी नहीं करना चाहती है। क्योंकि लगातार दो साल से सत्ता पर काबिज सरकार आने वाले चुनाव में हैट्रिक लगाने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती है। हालांकि प्रदेश सरकार और संगठन मिलकर प्रदेश में ऐसा वातावरण तैयार करने में लगी है कि प्रदेश में सबकुछ ठीक है, लेकिन कई बार कई मुद्दों को लेकर सरकार युवाओं के आगे झूकने को मजबूर हो जाती है।
प्रदेश में लंबे समय से कई मुद्दों को लेकर यूकेडी की युवा ब्रिगेड सड़क से लेकर सदन तक हंगामा कर रही है। यही नहीं यूकेडी की युवा ब्रिगेड में जेड जेन को लेकर भी सरकार के मन में आशंका है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले विधानसभा चुनाव में युवा उसकी गणित को बिगाड़ सकते है। हालांकि सगठन की ओर से ऑल ईज वेल कहा जा रहा है, लेकिन हकीकत सरकार को भी पता है। पिछले कुछ समय से प्रदेश में जो युवाओं ने माहौल बनाया है और प्रदेश की मूल भावना को लेकर यूकेडी की युवा ब्रिगेड जो तंज कसकर आंदोलन कर रही है उससे आने वाले समय में भाजपा और कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है।
विधानसभा चुनाव के लिए जहां भाजपा और कांग्रेस ने अपनी रणनीति तैयार की है उस पर यूकेडी की युवा ब्रिगेड बड़ा प्रहार कर सकती है। इसके कई उदाहरण अभी तक सामने आ चुके है। अब फिलहाल बात गैरसैंण सत्र की करें तो यूकेडी की युवा ब्रिगेड ने जिस प्रकार से सत्र के पहले ही दिन अपनी उपस्थिति दर्ज कर दहाड़ मारी है उससे सरकार और भाजपा संगठन सकते में है। क्योंकि सरकार ने सत्र के लिए जो प्लान बनाया था उसके विपरीत यूकेडी की युवा ब्रिगेड ने अपने प्रदर्शन से सरकार को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में वह एका के साथ मैदान में उतरकर सरकार और भाजपा संगठन के लिए मुसीबत पैदा करेंगे।
फिर ‘हिंदूत्व’ पर भाजपा का ‘दांव’
भाजपा तैयार कर रही है हिंदूत्व के आधार पर अपने लिए जमीन तैयार
केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने उत्तराखंड में दे दिए है इस बात के संकेत
हिंदुत्व के साथ मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद की रणनीति तैयार
देहरादून। उत्तराखंड में भी हिंदुत्व के मुद्दे पर राजनीतिक ध्रुवीकरण जिस तेजी से हुआ है, उससे भाजपा सत्ता में पहुंची और उसमें निरंतरता भी आई है। इस कारण पहले वर्ष 2017 और फिर वर्ष 2022 में प्रदेश में भाजपा की सरकारें बनीं। धर्मनगरी में घुसपैठियों पर सख्ती और समान नागरिक संहिता की पहल के साथ जनसांख्यिकीय असंतुलन से निपटने का इरादा, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनावी शंखनाद के दौरान हर उस विषय को छुआ, जिससे हिंदू मतदाता गहरे प्रभावित होता है।
प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा की हरिद्वार रैली में इसका शंखनाद हो चुका है। केंद्रीय मंत्री अमित शाह की हरिद्वार में हिंदुत्व की दहाड़ से साफ हो गया है कि भाजपा फिर प्रदेश में हिंदुत्व का कार्ड खेलेगी। क्योंकि जिस हिसाब से विपक्ष हावी है उसे कमजोर करने के लिए नई रणनीति के साथ मैदान में उतरना आवश्यक है। यही कारण है कि भाजपा इस बार भी हिंदुत्व के कार्ड पर चुनावी मैदान में उतरेगी।
बता दें कि वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार जीत पाने के लिए भाजपा को अपने इस आजमाए हुए अस्त्र पर ही भरोसा है। हिंदुत्व के साथ मतदाताओं को लामबंद करने में विकास कार्यों की गति तेज करने, सुशासन और भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस की नीति को दी गईई प्राथमिकता ने खाद-पानी का काम किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने की जनसभा के साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि पार्टी हिंदुत्व की अपनी परंपरागत लीक पर ही मजबूती से कदम बढ़ाती दिखाई देगी।
‘सीक्रेट’ मीटिंग और ‘शक्ति’ प्रदर्शन
क्रासर--बैठक में कैबिनेट विस्तार को लेकर हो सकती है चर्चा
--दायित्व बंटवारे को लेकर भी हो सकती है फाइनल बात
--हरिद्वार के बहाने भाजपा करना चाहती है शक्ति प्रदर्शन
देहरादून। विधानसभा चुनाव का अभी बिगुल नहीं बजा है, लेकिन चुनावी साल में अगर समय से पहले तैयारी से ‘राह’ आसान होगी। भाजपा विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत के लिए अभी से तैयारी में जुट गई है। इसी को देखते हुए भाजपा ‘सीक्रेट’ मीटिंग के साथ अपने बडे़े नेता के सामने ‘शक्ति’ प्रदर्शन कर रही है।
प्रदेश में आगामी साल में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसके लिए भाजपा अभी से मैदान में कूद गई है। आज केंद्रीय मंत्री अमित शाह हरिद्वार में कई कार्यक्रमों में भाग लेंगे और पार्टी के नाराज कार्यकर्ताओं सहित सूबे के बडे़ भाजपा नेताओं के साथ बैठक करेंगे। इसके लिए प्रदेश भाजपा कई दिनों से तैयारी कर रही थी। शुक्रवार को भाजपा प्रदेश मुख्यालय में कई दौर की ‘गुप्त’ बैठकों में कई विषयों पर चर्चा की गई।
बता दें कि मंत्रीमंडल विस्तार, दायित्वधारियों का मामला, पार्टी से नाराज चल रहे कार्यकर्ताओं को लेकर आज हरिद्वार की गुप्त बैठक के बाद फैसला होने की संभावना है। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय अमित शाह जहां कई कार्यक्रमों में भाग लेंगे, वहीं हरिद्वार में एक विशाल जनसभा को भी संबोधित करेंगे। जनसभा को सफल बनाने के लिए भाजपा ने पूरा जोर लगा रखा है। देहरादून-हरिद्वार-रूड़की से लेकर सभी जिलों से भाजपा कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को भारी संख्या में हरिद्वार पहुंचने के लिए कहा गया है। इससे साफ जाहिर है कि हरिद्वार में जनसभा के बहाने भाजपा केंद्रीय मंत्री अमित शाह के सामने शक्ति प्रदर्शन करना चाहती हैं।
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चुनाव की रणनीति होगी तैयार: महेंद्र
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने बताया कि हरिद्वार में ’टोली बैठक’ आयोजन किया जाएगा, जिसमें कोर ग्रुप के 14 अलावा सदस्यों के अलावा 9 और सदस्यों को शामिल किया गया है। इस तरह से इस टोली बैठक में कुल 24 बड़े नेता शामिल होंगे। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने बताया कोर ग्रुप के साथ कुछ और लोगों को जोड़ा गया है, इसे टोली बैठक नाम दिया गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ कुल 24 लोगों की यह बैठक होगी। बैठक में आगामी 2027 विधानसभा चुनाव से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चाएं होंगी। इसके साथ ही चुनाव की रणनीति तैयार की जाएगी। उन्होंने कहा प्रदेश में दायित्व बंटवारे और कैबिनेट विस्तार को लेकर भी इस बैठक में चर्चा की जा सकती है।
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हरिद्वार बना राजनीति का गढ़
केंद्रीय मंत्री अमित शाह का हरिद्वार दौरा प्रदेश भाजपा के लिए एक मौका है उनके सामने अपनी शक्ति दिखाने का। इसके लिए हरिद्वार एक सप्ताह से राजनीति का गढ़ बना हुआ है। संगठन, सरकार और प्रशानिक तैयारियां यहां साफ देखी जा सकती है। भाजपा के दावों की बात करें तो कार्यक्रम में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और आम लोग शामिल होंगे। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस आयोजन में करीब डेढ़ लाख लोग शामिल हो सकते हैं। कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह एक विशाल जनसभा को संबोधित करेंगे। इस जनसभा को भाजपा के लिए शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है।
‘आमजन’ चुनावी साल में ‘देवतुल्य’
क्रासर--चुनावी साल में नेताओं को आखिरकार आ ही गई जनता की याद
--किसी न किसी बहाने दे रहे है नेताजी जनता की ‘चौखट’ पर दस्तक
--शुभकामना संदेशों, होली मिलन समारोहों में दिखाया अलग अंदाज
देहरादून। राजनीति भी क्या गजब चीज है। क्योंकि यहां सब चलता है। प्रजातंत्र में जनता को चार साल तक घंटों लाइन में खड़ा रखने वाले नेताओं के लिए आमजन कब ‘देवतुल्य’ हो जाये पता नहीं चलता है। यही तो असली ‘राजनीति’ है भाई। चुनाव आते ही नेताओं को जनता की याद आ जाती है और वह जनता की चौखट पर जाकर उसे ही अपना सब कुछ मान लेते हैं।
सूबे में विधानसभा के चुनाव होने वाले है और नेेताओं की सक्रियता देखी जा सकती है। चुनावी साल में अगर जनता को समय पर याद नहीं किया गया तो जनता नाराज हो जाएगी और जनता के रूठने का नेताओं को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए कोई भी नेता जनता से ‘पंगा’ नहीं लेना चाहता है और किसी न किसी बहाने जनता की ‘चौखट’ पर दस्तक दे रहा है। छोटा हो या बड़ा कार्यक्रम नेताजी उसमें शामिल होकर जनता को सबसे बड़ा शुभचिंतक प्रदर्शित कर रहे हैं।
चुनावी साल में नेताजी कोई भी मौका नहीं चूकना चाहते हैं। होली तो नेताओं के लिए लंबा आयोजन था जनता के साथ घुलने-मिलने का और नेताओं ने इसका भी पूरा फायदा लिया। होली की शुभकामनाओं से लेकर घर-घर दस्तक और होली मिलन समारोहों के बहाने जनता के बीच ‘पैठ’ बनाने की हर छोटी-बड़ी चाल चली गई और यह प्रदर्शित किया गया कि हम ही हैं आपके असली शुभचिंतक।
होली पर राजनीति के ‘रंग’ कुछ अलग ही दिखे। यह पहली बार नहीं हुआ है, ऐसा तो लंबे समय से होता आया है। लेकिन इस बार नेताओं ने जनता को चुनाव से पहले ही ‘देवतुल्य’ बना दिया है। होली के बहाने इसके कई उदाहरण दिखे। शुभकामना संदेशों, होली मिलन समारोहों में नेताजी आमजन से ऐसे मिल रहे थे, जैसे कि इन्होंने ही उनकी नैया पार लगाई होगी। क्योंकि चुनाव के साल में यह सब ‘ड्रामा’ नहीं किया गया तो आने वाले समय में देवतुल्य जनता नाराज हो जाएगी।
चार साल तक जनता को कीडे़-मकोडे़ समझने वाले नेताजी जनता की और मधुमखियों की तरह आजकल इसलिए आकर्षित नहीं हो रहे हैं, क्योंकि विधानसभा चुनाव में किस नेता को टिकट मिल जाए पता नहीं। इसलिए जनता के बीच पैठ तो बनानी ही पडे़गी। आपको बता दूं कि अभी बीते चार साल तक नेताजी आमजन का फोन उठाने में अपनी तौहीन समझते थे मिलना तो बहुत दूर की बात है। नेताजी से मिलने के लिए आमजन मीलों पैदल चलकर,घंटों लाइन में रहकर, भूखे और प्यासे रहकर कई-कई दिनों तक नेताजी आमजन को दर्शन तक नहीं देते थे। नेताजी के लिए आज वहीं आमजन देवतुल्य बन गए है। आने वाले विधानसभा चुनाव में आमजन नेताजी के चार साल की बेरूखी को याद रखते हैं या नहीं यह तो आने वाले समय में पता चलेगा, लेकिन कुछ समय के लिए ही सही नेताजी की जनता से ‘देवतुल्य’ मित्रता कुछ सुकून तो दे रही है।
उत्तराखंड में राजनीतिक ‘घमासान’
प्रदेश के 6 बड़े नेताओं पर कांग्रेस की नजर, 3 कुमाऊं मंडल और 3 गढ़वाल मंडल से
देहरादून। उत्तराखंड में राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। राज्य में प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस की इस ‘जंग’ का आगाज काफी समय पहले हो गया था।
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्य के 6 बड़े नेता कांग्रेस ज्वांइन करने वाले हैं, जिन नेताओं की कांग्रेस ज्वाइन करने की चर्चा है वह उत्तराखंड की 6 महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों से जुड़े हैं। यानी कांग्रेस विधानसभा चुनाव 2027 के 9 महीने पहले ही विधानसभा सीटों पर फील्डिंग सेट करने की तैयारी कर चुकी है। सूत्रों के अनुसार इन 6 नेताओं और 6 विधानसभा सीटों में गढ़वाल मंडल से तीन तो कुमाऊं मंडल से भी तीन सीटें शामिल हैं। खास बात यह है कि इन नेताओं की ज्वाइनिंग दिल्ली में होगी।
बता दें कि उत्तराखंड कांग्रेस ने एक नया ट्रेंड सेट किया है। जब अंकिता भंडारी मामले पर कांग्रेस को प्रेस कान्फ्रेंस करनी थी तो तब भी उन्होंने स्थान दिल्ली चुना था। आज जब उत्तराखंड के 6 बड़े नेताओं के कांग्रेस ज्वाइन करने की चर्चा है तो तब भी यह कार्यक्रम दिल्ली में होने जा रहा है। ऐसी चर्चा है कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के साथ पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के नेता भी इस मौके पर मौजूद रहेंगे।
उत्तराखंड के दो गांवों में नहीं मनाते हैं ग्रामीण होली
150 साल पुरानी मान्यता
रुद्रप्रयाग जिले के खुरजान व क्वीली के ग्रामीण निभा रहे हैं परंपरा
गांवों में होली पर रंग और ढोल-नगाड़ों संग नहीं मनाया जाता जश्न
इष्टदेवी को नहीं है शोर-शराबा, हुड़दंग और चमकीले रंग पसंद
देहरादून। देशभर में फागुन के महीने में लोग रंगों और गुलाल में सराबोर नजर आते हैं और होली का त्योहार देभर में रंग, गुलाल और खुशियों के साथ मनाया जाता है। लेकिन उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में दो गांव ऐसे भी हैं, जहां डेढ़ सदी से होली के त्योहार पर सन्नाटा पसरा रहता है। इन गांवों में लोग होली पर सिर्फ पकवान बनाकर होली का आनंद लेते है। इन गांवों के ग्रामीण परंपरा का निर्वहन करते हुए 150 से अधिक साल से होली खेलने से परहेज करते है।
ग्रामीण बताते हैं कि इसके पीछे एक धार्मिक मान्यता और पुरानी लोककथा है। ग्रामीणों के अनुसार उनकी इष्टदेवी मां त्रिपुरा सुंदरी को शोर-शराबा, हुड़दंग और चमकीले रंग पसंद नहीं हैं। गांव के लोगों का विश्वास है कि यदि वहे होली खेलेंगे तो देवी की शांति भंग होगी और इसका दुष्परिणाम पूरे गांव को भुगतना पड़ सकता है। इसी कारण यहां के लोग सादगी और शांति के साथ सामान्य दिन की तरह समय बिताते हैं। वह देवी की पूजा-अर्चना तो करते हैं, लेकिन रंगों का प्रयोग नहीं करते हैं।
ग्रामीणों का मानना है कि देवी की कृपा से ही उनका गांव सुरक्षित और खुशहाल है। यह परंपरा बताती है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में त्योहारों को लेकर अपनी-अपनी मान्यताएं और परंपराएं हैं, जहां एक ओर देशभर में होली रंगों और उत्साह का प्रतीक है, वहीं उत्तराखंड के दो गांवों में यह दिन आस्था, श्र(ा और अनुशासन का प्रतीक बन गया है।
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महामारी के बाद बदली परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, लगभग 150 से 300 साल पहले गांव के लोगों ने होली खेलने की कोशिश की थी। इसके कुछ ही समय बाद गांव में हैजा जैसी भयंकर महामारी फैल गई और कई लोगों की जान चली गई। ग्रामीणों ने इस घटना को दैवीय प्रकोप माना और यह मान लिया कि देवी होली के शोर-शराबे से नाराज हो गई थी। तभी से गांव में होली खेलने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई और तब से आज तक यह परंपरा चली आ रही है।
गैरसैंण है उत्तराखंड की ‘आत्मा’
‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ वाला पर्यटन मंत्री का बयान पर्वतीय क्षेत्र के लोगों के दिल पर दे गया ‘जख्म’
भराड़ीसैंण स्थित विधानमंडल भवन पर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के एक ‘बयान’ हास्यास्पद
भराड़ीसैंण राज्य का प्रशासनिक और राजनीतिक केंद्र ही नहीं, पर्वतीय क्षेत्र की भौगोलिक और सामाजिक आत्मा
देहरादून। गैरसैंण उत्तराखंड की ‘आत्मा’ है। यह राज्य की मांग को लेकर लंबे समय तक आंदोलन करने वाले पर्वतीय क्षेत्र के उन लोगों की है, जिन्होंने लंबा आंदोलन किया। आंदोलन के दौरान भूख, प्यास, प्राणों की आहुति और संघर्ष आज भी उन आंदोलनकारियों को याद है जो आज उस इतिहास के गवाह हैं। गैरसैंण में राज्य का प्रशासनिक और राजनीतिक केंद्र ही नहीं है, बल्कि राज्य की भौगोलिक और सामाजिक आत्मा यहां बसती है। ऐसे में ‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ वाला बयान पर्वतीय क्षेत्र के लोगों के दिल पर ‘जख्म’ दे गया है।
गैरसैंण में विधानसभा के बजट सत्र के दौरान राज्य के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के एक ‘बयान’ ने सभी के आंखों में आसु ला दिए, जिन्होंने राज्य आंदोलन में अपनी सक्रिय भूमिका निभायी। पहले तो राज्य बने इतने लंबे समय बाद गैरसैंण राजधानी तो नहीं बनी, लेकिन सरकार इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी के तौर पर प्रचारित कर रही है। वर्तमान में यहां सत्र का आयोजन हो रहा है, तो पहाड़वासियों को लगा था कि आने वाले समय में यह राजधानी बन ही जाएगी। राज्य के पर्यटन मंत्री ने गैरसैंण को ‘टैंट हाउस’ बनाने का बयान देकर घी में आग देने का काम करने के साथ ही पहाड़वासियों की आत्मा पर चोट मार दी है।
बता दें कि उत्तराखंड राज्य का निर्माण पहाड़ के लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह कहना है पहाड़ के लोगों का। राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान जिस मांग को लेकर पहाड़ के आमजन सड़क पर उतरकर ‘कोदा, झंगोरा’ खाएंगे उत्तराखंड बनाएंगे का नारा दिया गया था वह पर्वतीय क्षेत्र की आत्मा की आवाज थी, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को यह आवाज नहीं सुनाई दी। राज्य का निर्माण तो हुआ पर राज्यवासियों के अनुरूप नहीं। आंदोलनकारियों की दिल की तमन्ना थी कि राज्य की राजधानी वहां होनी चाहिए, जहां राज्य की आत्मा का वास हो, लेकिन सत्ताधीशों को यह मंजूर नहीं था।
पर्यटन मंत्री का एक ‘शब्द’ जिसने पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की भावना को आहत कर दिया है। क्योकि गैरसैंण एक स्थान ही नहीं, बल्कि एक बडे़ आंदोलन की स्मृति का केंद्र है, जिसमें पहाड़ के हजारों युवाओं ने अपने सपने और अपने जीवन दांव पर लगाए थे। गैरसैंण को लेकर पर्यटन मंत्री का बयान राजनीतिक विवाद ही नहीं, पहाड़ के लोगों के दिल में एक गहरी टीस पैदा करता है।
उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज का वह बयान भराड़ीसैंण स्थित विधानमंडल भवन को भविष्य में वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने की संभावना का जिक्र किया। इसके बाद प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया है। भाजपा के नेता जहां पर्यटन मंत्री को बचाने में लगी है वहीं अन्य दलों ने इसे सड़क से लेकर सदन तक मुद्दा बना दिया है और आने वाले समय में यह आग की तरह प्रदेश में फैल सकता है।
47 मंदिरों में गैर सनातनियों के प्रवेश पर रोक
बीकेटीसी का फैसला
बदरी-केदार मंदिर समिति ने बजट बैठक में पारित किया प्रस्ताव
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 121.7 करोड़ का बजट पारित
देहरादून। बदरी-केदार मंदिर समिति ने बदरी-केदार सहित 47 मंदिरों में गैर हिंदुओं के लिए प्रवेश वर्जित करने का निर्णय लिया है।
बदरी केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा कि बीकेटीसी के अधीन आने वाले मंदिरों में गैर हिंदुओं के प्रवेश वर्जित का प्रस्ताव पारित किया गया है। देहरादून स्थित बीकेटीसी के शिविर कार्यालय में बजट बैठक बीकेटीसी के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी की अध्यक्षता में हुईई बजट बैठक के दौरान आगामी वित्तीय वर्ष 2026- 27 के लिए 121.7 करोड़ रुपए का बजट पारित किया गया। इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर भी मुहर लगी, जिस पर देशभर की निगाहें टिकी हुई थी। दरअसल, बजट बैठक के दौरान बदरीनाथ और केदारनाथ समेत बीकेटीसी के अंडर आने वाले उत्तराखंड के 47 मंदिरों में गैर सनातनियों के प्रवेश वर्जित का प्रस्ताव रखा गया। इस पर सहमति बनने के साथ ही इस प्रस्ताव को पारित कर दिया गया।
इन मंदिरों में प्रवेश पर लगाया प्रतिबंध
बीकेटीसी ने इन 47 मंदिरों में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया है। बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के साथ ही त्रियुगीनारायण मंदिर, नरसिंह मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, ओंकारेश्वर मंदिर, कालीमठ मंदिर, ब्रह्मकपाल शिला एवं परिक्रमा- बदरीनाथ, तप्त कुंड, शंकराचार्य समाधि, मद्महेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर, योगध्यान बदरी, भविष्य बदरी, आदि बदरी, वृ( बदरी, माता मूर्ति मंदिर, वासुदेव मंदिर, गौरी कुंड मंदिर, आदिकेदारेश्वेर मंदिर, पांच शिला बदरीनाथ ;नारद शिला, नृसिंह शिला, बाराही शिला, गरुड़ शिला और मार्कण्डेय शिलाद्ध, पांच धाराएं ;प्रह्लाद धारा, कूर्मा धारा, भृगु धारा, उर्वशी धारा और इंदिरा धाराद्ध, ऊखीमठ में उषा का मंदिर, कालिशिला और वसुधारा शामिल हैं। बीकेटीसी और गंगोत्री यमुनोत्री मंदिर समितियां पहले ही साफ कर चुकी हैं कि गैर हिंदू मतलब जो सनातन धर्म को नहीं मानते उनका प्रवेश मंदिर में वर्जित किया गया है।
बीकेटीसी के पास है इनकी व्यवस्था
बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अधीन बदरी-केदार समेत 47 अन्य मंदिर आते हैं। बीकेटीसी इन मंदिरों की व्यवस्था देखती है। बीकेटीसी 1939 के अधिनियम के तहत काम करती है। बदरी-केदार मंदिर समिति बदरीनाथ और केदारनाथ समेत अन्य मंदिरों के कपाट खुलने और बंद होने की व्यवस्था करती है। इसके साथ ही इन मंदिरों के विकास और तीर्थयात्रियों की सुख-सुविधाओं के लिए बजट पास करना भी इनका जिम्मा है।
दलों में ‘सब ठीक है’ का ‘दिखावा’
फ्लैग---होली पर राजनीतिक दलों के मिलन समारोहों का सच
क्रासर--बुरा न मानो होली है
--मिलन समारोहों में पार्टी नेता जमकर उड़ा रहे हैं अबीर गुलाल
--रंग लगाकर एक दूसरे को दे रहे हैं नेता होली की शुभकामनाएं
--सालभर एक-दूसरे को गलियाने वाले लग रहे हैं आपस में गले
देहरादून। चुनावी साल में नेता कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहते हैं। खासकर जब होली का समय हो, तब नेताओं को मौका मिल जाता है कि हम एक है और हमने कोई मनमुटाव नहीं है अर्थात ‘सब ठीक है’ का दिखावा तो जरूरी हो जाता है।
बता दें कि प्रदेश में होली मिलन समारोहों की धूम मची है। खासकर राजनैतिक दलों के कार्यालय, नेताओं के आवास, नेताओं के अपने आफिस और हर उस छोट-बडे़ कार्यक्रमों में सब ठीक है का दिखावा चल रहा है। सालभर तक मनमुटाव, ईईर्ष्या या रंजिशों के चलते जो एक-दूसरे की टांग खिचाई पर लगे रहते हैं और एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिए कोई कमी नहीं छोड़ते हैं होली के बहाने आयोजित समारोहों में ‘एका’ का संदेश देना चाहते हैं। लेकिन हकीकत क्या है यह होली के बाद सभी को दिख जात है।
वैसे भी होली तो सामाजिक समरसता और प्रेम का संदेश देने वाला पर्व है और इस समय नेताओं ने अगर मौके का फायदा नहीं उठाया तो वह नेता भी किस काम का। प्रदेश में भाजपा, कांग्रेस, यूकेडी, सपा, बसपा, आप सहित सभी पार्टियों के कार्यालयों और नेताओं के अपने आफिसों में होली मिलन समारोहों का आयोजन किया जा रहा है। पार्टी नेता किसी भी परिस्थिति में सब ठीक है के फार्मूले के तहत जनता को यह विश्वास दिखना चाहते हैं कि हम ही आपके सबसे बडे़ शुभचिंतक है। क्योंकि चुनावी साल है और जनता को नाराज करने का मतलब अपने लिए मुसीबत का पहाड़ खड़ा करना है।
आपको बता दें कि नेताओं ने अलग-अलग स्थानों पर होली मिलन समारोह आयोजित कर लोगों को होली की बधाई दी जा रही है और इस बहाने जनता को साधने की कोशिश भी हो रही है। दलों के छोटे-बडे़ नेता पार्टियों का आयोजन कर एक दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर शुभकामनाएं देने के साथ ही अपना राग अपालने के साथ ही जनता के बीच यह संदेश देना चाहते हैं कि हम भी आपके सबसे बडे़े नेता और शुभचिंतक है। भाजपा हो या कांग्रेस या फिर अन्य दलों के नेता सभी होली के बहाने जनता को साधने का कार्य कर रहे हैं। ‘सफेदपोश’ इस ‘एका’ के पीछे का कारण चुनावी साल है।
प्रदेश में भाजपा मुख्यालय से लेकर जिले और मंडल कार्यालयों में होली मिलन कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। यही तस्वीर कांग्रेस सहित अन्य दलों की भी है। सभी दल के नेता आपसी सद्भाव और सांस्कृतिक विविधता के रंगों के साथ सामाजिक एकता को सुदृढ़ करने संदेश दे रहे हैं, जबकि उनके अंदर क्या है सभी जानते हैं। प्रदेश भर में होली की धूम मची हुई है और कांगेस-बीजेपी सहित सभी दलों के नेता होली मिलन कार्यक्रमों में शामिल होकर कार्यकर्ताओं और जनता के साथ होली खेल रहे है। असली बजह क्या है यह सभी जानते है। चुनावी साल में अगर ऐसे आयोजन नहीं होंगे तो नेता को नेताजी कौन कहेगा। क्योंकि बुरा न मानो होली है भाई !
डांस पार्टी’ पर महेंद्र भटृ की ‘चुप्पी’
सब हैडिंग या फलैग---‘मुंबई वाली डांस पार्टी’ से प्रदेश की राजनीति में आया ‘भूचाल’
क्रासर--चैंपियन की जुबानी मिसाइल की चपेट में आए नेता
--भाजपा-कांग्रेस में मची खलबली, चुनावी साल में बवाल
--भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की नहीं आयी प्रतिक्रिया
--कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल व अन्य ने दिया ‘जवाब’
देहरादून। प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए बिगुल तो आधिकारिक तौर पर अभी बजा नहीं हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। भाजपा जहां प्रदेश में हिंदू सम्मेलनों के जरिए गांव-गांव, गली-गली,मोहल्ला, बाजार और शहरों को भाजपा मय बनाने का प्रयास कर रही है। वहीं कांग्रेस प्रदेश सरकार की नीतियों के बल पर सरकार और भाजपा को घेरने में लग गई है। भाजपा और कांग्रेस में ‘जंग’ तेज हो गई है।
हाल ही में पूर्व विधायक कुंवर प्रणव सिंह ‘चैंपियन’ ने ‘मुंबई वाली डांस पार्टी’ को लेकर प्रदेश की राजनीति में जो ‘भूचाल’ ला रखा है वह अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है। चैंपियन ने कांग्रेस के जिन नेताओं का नाम लिया उन सभी ने अपनी प्रतिक्रिया ‘मुंबई वाली पार्टी’ को लेकर दे दी है, लेकिन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने ‘मुंबई वाली डांस पार्टी’ पर कोई भी टिप्पणी नहीं दी है। राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी साल में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की ‘चप्पी’ कई सवाल खड़े कर रही है। इसके साथ ही उनकी प्रतिक्रिया के नहीं आने से ‘दाल में कुछ काला’ नजर आ रहा है।
बता दें कि पूर्व विधायक कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन का हाल में एक विवाह समारोह में डांसर पर नोट उड़ाने का वीडियो वायरल हुआ है। उसके बाद आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हुआ और यह भाजपा-कांग्रेस तक पहुंच गया। मामले में कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत, उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश गोदियाल और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भटृ का नाम सामने आया। इस पर हरक सिंह रावत और गणेश गोदियाल में अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर अपना पक्ष रखा, लेकिन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भटृ ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया जारी नहीं की तो राजनीति के विशेषज्ञ महेंद्र की ‘चुप्पी’ को कई अर्थों में ले रहे है। ले भी क्यों नहीं क्योंकि यह चुनावी साल है और सभी को कुछ न कुछ मसाला चाहिए।
सोशल मीडिया पर छाई है ‘मुंबई वाली डांस पार्टी’
प्रदेश में आजकल सबसे ज्यादा ‘मुंबई वाली डांस पार्टी’ की चर्चा है। सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्मों पर इस खबर की सबसे अधिक चर्चा हो रही है। फेसबुक, एक्स, यूटयूब से लेकर अन्य सभी सोशल मीडिया पर इसी पार्टी का जिक्र हो रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, हरक सिंह रावत और चैंपियन के वीडियो वायरल हो रहे हैं और प्रश्नों की बौछारें भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की ओर हो रही है। वही भाजपा की ओर से अभी तक कोई भी प्रतिक्रिया जारी नहीं की गई है।
विवाद कांग्रेस का इतिहास, भाजपा को विवाद में घसीटना व्यर्थ
भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान ने डांस पार्टी विवाद पर कांग्रेस अध्यक्ष गोदियाल के बयान को सफेद झूठ और खुद की पोल खुलते ही धर्मराज युधिष्ठर का चोला ओढ़ने की कोशिश करार दिया है। चौहान ने कांग्रेस अध्यक्ष की भट्ट को लेकर की गई टिप्पणी को झूठा बताते हुए कहा कि यह उनकी मामले को भाजपा की ओर मोड़कर कांग्रेस अध्यक्ष खुद से ध्यान हटाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि डांस पार्टी विवाद कांग्रेस पार्टी के काले अध्याय का हिस्सा रहा है। जनता भाजपा अध्यक्ष के संस्कार, व्यवहार, कार्यसंस्कृति और सार्वजनिक जीवन से जनता अच्छी तरह परिचित है।
कांग्रेस की असली ‘अग्नि परीक्षा’
कांग्रेस के अंदर चल रहे द्वंद को खत्म करने की बड़ी चुनौती
भाजपा को हराने की रणनीति कम, कांग्रेस के द्वंद्व पर चर्चा
कांग्रेस प्रदेश प्रभारी शैलजा का दावा, संपर्क में कई बड़े नेता
देहरादून। विधानसभा 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन कांग्रेस की असली अग्नि परीक्षा अभी से शुरू हो गई है। कांग्रेस पार्टी के मंचों पर यह सवाल यह नहीं उठ रहा हैै कि भाजपा को कैसे हराना है, इस बार पर ज्यादा चर्चा हो रही है कि वह नेता फिर नाराज हो गया। अब सवाल यह है कि कांग्रेस के अंदर चल रहे द्वंद को कैसे खत्म किया जाए। इस पर मंथन के बजाय नेतृत्व की बात पर चर्चा ज्यादा हो रही है।
चुनावी साल में राजनीति के कई रंग देखने को मिलते हैं। खासकर अगर विधानसभा का चुनाव हो तो उस समय आंतरिक द्वंद, विरोधाभास, अंतरकलह, दल-बदल और अन्य कई ऐसे चोचले दिखते हैं, जिससे जनता दलों के दलदल को समझने में पीछे नहीं रहती है। यहां खासकर कांग्रेस की हो रही है। यह कहा जाए कि कांग्रेस इस समय अग्नि परीक्षा के दौर से गुजर रही है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
बता दें कि कांग्रेस पार्टी में सब ठीक नहीं है। यह पार्टी के अंदर चल रहे घटनाक्रम से साफ हो गया है। हरदा के राजनैतिक अवकाश, पीसीसी का गठन नहीं होना, पार्टी में दूसरे दलों को शामिल करवाने से लेकर कई अन्य कारणों से कांग्रेस में गुटबाजी सामने आयी है। कांग्रेस के लिए चुनावी साल में पार्टी के अंदर घमासान से अग्नि परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ रहा है। इसके बाद भी नेता कह रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी में सब ठीक है।
कांग्रेस पार्टी के अंदर कुछ ठीक नहीं है। क्योंकि राजनीति में उपवास हमेशा नैतिक दबाव का हथियार रहा है। लेकिन यहां सवाल उठता है यह आत्ममंथन था या संगठन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश है। जब एक वरिष्ठ नेता बार-बार सार्वजनिक मंचों से अपनी ही पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, तो यह सुधार की प्रक्रिया कम और शक्ति प्रदर्शन ज्यादा लगने लगता है। वही कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी में सब ठीक हो जाएगा, लेकिन कोई भी साफ-साफ यह नहीं कह रहा कि समस्या क्या है। क्योंकि समस्या का नाम लेना, शायद सबसे मुश्किल काम है।
दूसरी ओर, उत्तराखंड दौरे पर पहुंची कांग्रेस प्रदेश प्रभारी शैलजा ने दावा किया कि उत्तराखंड कांग्रेस में कोई गुटबाजी नहीं है। पार्टी के अंदर सब कुछ जल्द ठीक हो पाएगा। यदि किसी की नाराजगी भी है तो पार्टी फोरम पर उसे भी दूर किया जाएगा और सबको समझा भी लिया जाएगा। कांग्रेस मजबूती से चुनाव लड़ेगी और निश्चित रूप से बीजेपी को हराकर जीत भी दर्ज करेगी।
जल्द होगा पीसीसी का गठन
नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि जल्द ही उत्तराखंड में पीसीसी यानी प्रदेश कांग्रेस कमेटी का गठन होगा। प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने भी पीसीसी का गठन करने की बात सार्वजनिक मंच पर कही है। कांग्रेस की जितनी ही कमजोर इकाइयां है, उन्हें मजबूत किया जाएगा।
राजनीति में ‘अर्जित’ अवकाश!
‘हरदा’ के 15 दिन का अर्जित अवकाश पर हो रही सियासत
कांग्रेस में घमासान मचना स्वाभाविक, भाजपा में भी खटपट
‘अवकाश’ पर प्रदेश की राजनीति में होने वाला है कुछ बड़ा
संतोष बेंजवाल
देहरादून। राजनीति में ‘अर्जित’ अवकाश पर आमजन आश्चर्य चकित हैं। राजनेताओं के इस ‘खेल’ को आमजन बखूबी समझती है और चुनावी साल में तो इस प्रकार के ‘खेल’ चर्चा में तो आते ही हैं। प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के अंदर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है यह तो कई बार सामने आ चुका है। लेकिन राजनीति में अर्जित अवकाश की राजनीति किसी बडे़ तूफान के आने से पहले की ‘खामोशी’ लग रही है।
बता दें कि सत्ता से दूर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए वह सब कुछ करेगी, जिसकी जरूरत होगी। इसके लिए कांग्रेस ने अपने मोहरे चलने शुरू कर दिए है। वही भाजपा भी यही चाहेगी कि सत्ता उन्हीं के पास रहे और वह भी इसके लिए अपनी ‘चाल’ चलने में लगी है। अभी हालिया मामला कांग्रेस के बडे़े नेता हरीश रावत का है। उन्होंने 15 दिन के अर्जित अवकाश के बहाने कांग्रेस और भाजपा दोनों को सकते में डाल रखा है। भाजपा और कांग्रेस के रणनीतिकारों की माने तो यह अर्जित अवकाश कोई बड़ा तूफान लेकर आने वाला है।
राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो यह साफ है कि हरदा के अवकाश के बाद वह कुछ बड़ा करने वाले हैं और उनकी अगली चाल जो भी होगी वह प्रदेश की राजनीति में बड़ा भूचाल लाने के लिए काफी है। वैसे भी प्रदेश में जल्द ही विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और ऐसे में अपनी-अपनी साख बचाने और सुधारने की दिशा में नेता लगे हुए है। प्रदेश में कोई बड़ा राजनीतिक तूफान आने का अंदेशा ‘हरदा’ की सोशल मीडिया पोस्ट से भी लगाया जा रहा है। हाल ही में ‘हरदा’ ने सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर सभी को आश्चर्य चकित कर दिया है। इसके बाद सभी इस पोस्ट पर अपनी-अपनी राय दे रहे है, लेकिन
इस पोस्ट के मायने काफी अहम है।
हरदा ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि मैंने 15 दिन का अर्जित अवकाश लिया। केंद्र सरकार के कर्मचारियों के मध्य वर्षों काम किया। इसलिये अर्जित अवकाश का महत्व मेरे मन में रचा-बसा है और अवकाश भी ऐसा लिया जिसके दौरान मैं निरंतर अपने सामाजिक दायित्वों को पूरा कर रहा हूं। मेरा सौभाग्य है कि मैं जहाँ कही जाता हूँ तो ये लगता है कि कांग्रेस लोगों के बीच में आ गईई है। फिर भी कई लोग दनादन गोले बरसा रहे हैं। मुझ पर गोले बरसाने वालों में तीन प्रकार के लोग हैं। एक तो मेरे कुछ कांग्रेस के भाई-बहन हैं। मैं उनसे तो पूछ ही सकता हूं कि क्या अर्जित अवकाश लेना अपराध है? अर्जित अवकाश लेने से मैंने क्या ऐसा कर दिया, जिससे हमारे साथियों को गुस्सा व चिंतित होकर के दनादन सोशल मीडिया में मुझ पर गोले दागने पड़ रहे हैं।
इन लोगों में कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने 2022 में मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मामले को मुझ पर चस्पा करने के लिए आईटी का सहारा लेकर क्रिएटिव बनाये और पोस्ट डाली, उनके ये कृकृत्य मेरे पास आज भी संरक्षित हैं और आज भी ये आईटी का सहारा लेकर मेरी छवि बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
दूसरे वह लोग हैं जो कांग्रेस के कटु आलोचक हैं, उनमें से आधे लोग भाजपानिष्ठ हैं, जिन्होंने हमारे नेताओं और हमारी हमेशा आलोचना की है। वह भी मेरे अर्जित अवकाश से बहुत बेचैन हैं और लंबे-लंबे लेख लिखे जा रहे हैं, लंबी-लंबी पोस्ट डाले जा रहे हैं, लंबी-लंबी कास्ंिटग हो रही है, फेसबुक/सोशल मीडिया पर यह जताने की कोशिश हो रही हैं कि हरीश रावत कांग्रेस पर अब भार ही भार है। जब उन लोगों का पूरा ब्यौरा देखा तो आश्चर्य हो रहा है कि उनको कांग्रेस की इतना चिंता क्यों हो रही है, जो वह हरीश रावत रूपी भार को निपटा देना चाहते हैं? आप उनकी पोस्ट व लेखों को पढ़िए तो उन्होंने ढूंढ-ढूंढ करके मेरे सार्वजनिक जीवन के उन प्रसंगों को उकेरा है, जहां मैं विफल हुआ हूं या हारा हूं। इनमें से कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है कि उसने समालोचना के तौर पर भी कांग्रेस के पक्ष को रखा हो! हमेशा भाजपा के पक्ष को रखा है और कांग्रेस पर बरसते रहे हैं, मगर उनको आज कांग्रेस की बहुत चिंता हो रही है तो मैं कम से कम इस बात का सुकून महसूस कर रहा हूं कि बहुत सारे कांग्रेस के आलोचकों को मैंने अपने इस अर्जित अवकाश की बात कहकर इन्हें कांग्रेस के पक्ष में कर दिया है।
इसके साथ ही हरदा ने पोस्ट में कई अन्य बातों का जिक्र किया है। पोस्ट के माध्यम से जहां उन्होंने कांग्रेस के नेताओं पर तंज कसे हैं वही उन्होंने भाजपा को भी घेरा है। पोस्ट में उन्होंने यह भी संकेत दिए है कि वह कुछ नया करने वाले है। इसके साथ ही उन्होंने पिछले चुनावों का भी जिक्र किया है। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो प्रदेश की राजनीति में कुछ बड़ा तो होने वाला है पर क्या! यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
विस चुनाव, अर्धकुंभ और जनगणना
2027 में उत्तराखंड की सरकारी मशीनरी की ‘अग्निपरीक्षा’
--सियासी गलियारों में विधानसभा चुनाव की चर्चाएं पर बढ़ रही हैं परेशानियां
--अर्धकुंभ और जनगणना की तैयारियों को लेकर अफसरों के छूटने लगे पसीने
संतोष बेंजवाल
देहरादूनः उत्तराखंड के लिए 2027 में विधानसभा चुनाव, हरिद्वार अर्धकुंभ और राष्ट्रीय जनगणना का आयोजन राज्य की सरकारी मशीनरी की अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। एक और जहां सियासी गलियारों में समय से पहले चुनाव की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। दूसरी ओर अर्धकुंभ और जनगणना की तैयारियों को लेकर अफसरों के अभी से पसीने छूटने लगे है, जबकि इनमें अभी लंबा समय है।
बता दें कि राज्य की 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव मूल रूप से फरवरी-मार्च 2027 में प्रस्तावित हैं। ठीक उसी दौरान हरिद्वार में अर्धकुंभ का भव्य आयोजन होना है, जो 14 जनवरी 2027 से शुरू होकर 20 अप्रैल 2027 तक चलेगा। इसमें 10 प्रमुख स्नान तिथियां हैं, जिनमें फरवरी-मार्च के चार अमृत स्नान ;6 फरवरी मौनी अमावस्या, 11 फरवरी बसंत पंचमी, 20 फरवरी माघ पूर्णिमा और मार्च-अप्रैल के अमृत स्नानद्ध शामिल हैं। लाखों-करोड़ों श्र(ालुओं की भीड़, शाही स्नान और अखाड़ों की व्यवस्था को देखते हुए सुरक्षा, ट्रैफिक, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन की चुनौती पहले से ही भारी है।
इसके अलावा जनगणना की प्रक्रिया भी फरवरी-मार्च 2027 के आसपास शुरू होने वाली है, जिसमें हजारों सरकारी कर्मचारियों को घर-घर सर्वे के लिए लगाना पड़ेगा। इसके साथ ही सियासी गलियारों और सोशल मीडिया में इन दिनों यह चर्चा गरम है कि क्या सरकार चुनाव नवंबर-दिसंबर 2026 में करा सकती है? कारण साफ है, अर्धकुंभ जैसा बड़ा और धार्मिक आयोजन, जनवरी से अप्रैल तक होगा। अगर चुनाव फरवरी-मार्च में हुए तो कुंभ की सुरक्षा और चुनावी ड्यूटी में टकराव होना साफ है। ऐसे में सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर भाजपा को अपनी वापसी पर भरोसा है तो वह 2026 के अंत में चुनाव करा सकती है, ताकि कुंभ के दौरान शांतिपूर्ण माहौल बना रहे।
पहाड़ी शहर बनेंगे ‘स्मार्ट’
चुनावी साल में प्रदेश सरकार ने खेला मूलभूत सुविधाओं के लिए मास्टर स्ट्रोक
पहाड़ी जनपदों में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार सहित अन्य समस्याओं का अंबार
पहाड़ी शहरों को स्मार्ट बनाने से रोजगार व पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद
संतोष बेंजवाल
देहरादून। सूबे के पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं के लिए आमजन प्रतिदिन सड़क पर उतरकर मांग कर रहे हैं और उनकी आवाज सरकार के कानों तक नहीं पहुंच रही है। राज्य बने इतना लंबा समय हो गया और आज भी पहाड़ के लोग खुद को ठगा ही महसूस कर रहे हैं। क्योंकि जिस मूल धारणा को लेकर राज्य का गठन किया गया था वह आज भी अधूरा है। ऐसे में प्रदेश सरकार प्रदेश के पहाड़ी शहरों को स्मार्ट बनाने की योजना बनाकर चुनावी साल में मतदाताओं को अपनी ओर खींचने के लिए दाव खेला है।
बता दें कि प्रदेश को बने दो दशक से भी अधिक का समय हो गया है और सूबे के खासकर पहाड़ी जिलों में विकास की किरण के नाम पर सिर्फ योजनाएं ही बनी हैं धरातल पर आज दिन तक कुछ नहीं दिखा। चुनाव आते ही नेता अपने पुराने वायदों को भूलकर नई योजना का शिगूफा फेंककर आमजन को यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि उनका भला करने वाला कोई ओर नहीं है सिर्फ वही हैं और जनता भी नेताओं के बहकावे में आ जाते है।
पहले पहाड़ी जिलों की बात करें तो पहाड़ी जनपदों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा था और आज भी है। पहाड़ी जिलों में स्वास्थ्य सुविधा का ऐसा बुरा हाल है कि यहां अस्पताल तो बने हैं, लेकिन उनमें डाक्टर और स्वास्थ्य सुविधाओं का भारी अकाल है। इससे ऐसा लगता है कि अस्पताल सफेद हाथी के समान है। आमजन स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार को लेकर सड़क से सदन तक अपनी मांग रख चुकी है, लेकिन सरकार आंकड़ों की बाजीगरी खेलकर आमजन को चुनावी साल में वादों की झड़ी लगाकर फिर से खेल खेल देती है।
यही हाल प्रदेश के पहाड़ी जनपदों में शिक्षा और रोजगार का भी है। शिक्षा के नाम पर स्कूल भवन जो सालों पहले बने थे आज भी वैसे ही है। स्कूलों में शिक्षक तो है, लेकिन उन स्कूलों में अब पढ़ने वाले बच्चों की संख्या इतनी कम है कि अब सरकार को मजबूरन उन्हें बंद करने के लिए सोचना पड़ रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पहाड़ी जिलों में रोजगार का है। पहाड़ी जनपदों में रोजगार की कमी के कारण आज गांव के गांव खाली होने की कगार पर है। पहाड़ में जो संपन्न है वह मैदानी क्षेत्रों की ओर रूख कर चुका है और जो गांवों में बचे है वह मजबूरी में जिंदगी और मौत के बीच जीवन काट रहे है।
पहाड़ी जिलों में समस्याओं का अंबार है और इनसे उन्हें छुटकारा नहीं मिल पा रहा है। इसके पीछे कारण जो भी हो, लेकिन इसे प्रदेश सरकार की नाकामी ही कहा जा सकता है। क्योंकि जिस उददेश्य से राज्य का गठन हुआ था वह कही दिख तो रहा नहीं है और आमजन यह कहने को मजबूर है कि इससे अच्छा तो हम यूपी में ही ठीक थे। वैसे तो सरकार ने अनेक योजनाओं के माध्यम से पहाड़ी जिलों का विकास करना चाहा, लेकिन कोई भी योजना धरातल पर क्यों नहीं उतरती है यह यक्ष प्रश्न है, जो लंबे समय से अनुतरीय है और शायद रहेगा।
पहाड़ का भाग्य पहाड़ जैसा ही है और यहां के लोगों के लिए तो राज्य बनने से पहले और आज भी वैसे का वैसा ही है। वर्तमान विधानसभा सत्र में सरकार ने प्रदेश के शहरों के लिए योजना तैयार कर उसके लिए बजट का प्रावधान किया है। चुनावी साल है और कुछ नया तो करना ही पडे़गा। अगर ऐसा नहीं किया तो मतदाता नाराज हो जाएंगे। प्रदेश सरकार ने पर्वतीय शहरों को स्मार्ट सिटी की तर्ज पर विकसित करने का मास्टर स्ट्रोक चल दिया है, जिससे आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने और आधुनिक नगरीय व्यवस्था को विस्तार देने में मदद मिलेगी।
प्रदेश सरकार का फोकस शहरों में सुरक्षित और सुगम आवागमन, बेहतर आधारभूत ढांचे और योजनाब( नगरीय विकास पर है। इसके तहत पैदल मार्ग, आवास और अन्य नगरीय सुविधाओं के विस्तार से नागरिकों को अधिक सुविधाजनक शहरी वातावरण मिलेगा। इसके साथ ही पर्यटन और अन्य आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। प्रदेश सरकार के चुनावी साल में इस मास्टर स्ट्रोक से आमजन क्या सोचती है यह तो आने वाले विधानसभा चुनाव में पता चलेगा, लेकिन यह अवश्य है कि अगर सरकार की यह योजना धरातल पर उतरती है तो इससे कुछ हद तक पलायन पर ब्रेक लग सकता है।
‘पहले छह और अब 12’
कांग्रेस के दावे से उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा भूचाल आने की है संभावना
भाजपा के बड़े नेताओं के कांग्रेस में शामिल होने का कांग्रेस कर रही है दावा
कांग्रेस पहले ही भाजपा के छह नेताओं को शामिल करवा चुकी है पार्टी में
संतोष बेंजवाल
देहरादून। अगर कांग्रेस का दावा सही निकला तो उत्तराखंड की राजनीति में भूचाल आना लाजमी है। वैसे तो कांग्रेस में अंदर ही अंदर कुछ खटपट चल रही है और वह सार्वजनिक भी हो गई है। भाजपा के छह नेताओं को कांग्रेस में शामिल करवाने के बाद कांग्रेस में आपसी विवाद की स्थिति बनी हुई है। इसके बाद से ही कांग्रेस दावा कर रही है कि भाजपा के 12 बडे़ नेता जल्द ही कांग्रेस में शामिल होंगे। वही दूसरी ओर भाजपा इसे कांग्रेस का शिगूफा बता रही है।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की घोषणा से पहले ही हलचल तेज हो गई है। इससे यह माना जा रहा है कि भाजपा और कांग्रेस में बड़ा राजनीतिक उलटफेर हो सकता है। प्रदेश में चुनाव का माहौल बनाने के लिए भाजपा ने पहले शुरूआत कर दी है और प्रदेश में किसी न किसी बहाने राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की जनसभाएं करवाकर बाजी मारनी शुरू कर दी है। इसके साथ ही दल बदलने का भी सिलसिला शुरू हो गया है।
वही दूसरी ओर कांग्रेस भी चुनाव के लिए माहौल बनाने में पीछे रहने वाली कहा है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव 2027 की घोषणा से पहले ही मैदान में जंग की तैयारी कर ली है। कांग्रेस पहले अपने प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करने में लगी है। कांग्रेस ने पहले भाजपा के छह बडे़ नेताओं को कांग्रेस में शामिल किया और अब दावा कर रही है कि भाजपा के 12 नेताओं की जल्द ही कांग्रेस में एंट्री होने वाली है। चुनाव की घोषणा से पहले चुनावी माहौल बनाने का यह क्रम नया नहीं है। अभी तक के चुनावों में चुनाव से पूर्व ऐसा ही खेल खेला जाता रहा है और यह खेल आगे भी खेला जाएगा। कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक भाजपा के करीब 12 बड़े नेताओं के नाम पर मंथन जारी है और जल्द ही बड़ी ज्वांइनिंग हो सकती है।
बता दें कि 28 मार्च को दिल्ली में पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, नारायण पाल, भीमलाल आर्य, गौरव गोयल, अनुज गुप्ता और लाखन सिंह नेगी जैसे चेहरे कांग्रेस में शामिल हुए थे। इन नेताओं का संबंध भारतीय जनता पाटीं से रहा है, जिससे प्रदेश की राजनीति में हलचल और तेज हो गई है। अब सबकी नजरें आगामी दिनों में होने वाले बड़े सियासी घटनाक्रम पर टिकी हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का दावा है कि बीजेपी के कईई सिटिंग विधायक भी कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन कानून कार्रवाई और अपने बचे हुए कार्यकाल की वजह से खुद को थामे हुए हैं।
दूसरी ओर भाजपा कांग्रेस के ज्वाइनिंग दावों को शिगूफा बताते हुए हवा में उड़ा दिया। भाजपा कहा कि जिस तरह लगातार बड़ी संख्या में कांग्रेस नेता पार्टी छोड़ कर गए हैं, उससे घर बचाने की कयावद में कांग्रेस नेता शिगूफे छोड़ रहे हैं। कांग्रेस को विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले ही अपनी हार दिख रही है। कांग्रेस के नेता सिर्फ आंदोलन कर रहे हैं और जनता की उनको कोई चिंता पहले भी नहीं थी और आज भी नहीं है।
‘चुनावी रण’ के लिए भाजपा ने दिखाई ‘ताकत’
भाजपा पूरे जोश-खरोस के साथ उतरेगी चुनावी रण में का संदेश
दो माह में भाजपा ने उत्तराखंड में आयोजित की तीसरी बड़ी सभा
सभी नेताओं को एक मंच पर खड़ा कर अपनी एकजुटता दिखाई
संतोष बेंजवाल
देहरादून। चुनावी साल में राजनीतिक गलियारे में उमड़ा जनसैलाब भाजपा के लिए संजीवनी का काम करेगा। यह हम नहीं राजनैतिक विशेषज्ञ कह रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक दल किसी न किसी बहाने अपनी ताकत दिखाने में लगे रहते हैं और इसमें भाजपा ने हाथ मार लिया है। दून में आयोजित पीएम के कार्यक्रम के बहाने भाजपा ने प्रमुख विपक्षी कांग्रेस को यह संदेश दे दिया है कि भाजपा पूरे जोश-खरोस के साथ चुनावी रण में उतरेगी।
बता दें कि चुनावी साल में भाजपा विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में अपने पक्ष में माहौल बनाना चाहती है। इसके लिए पार्टियों में कंपटीशन लंबे समय से शुरू हो जाता है। भाजपा ने भी इसी रणनीति के तहत अपनी राजनैतिक चाल चलनी शुरू कर दी है।
यही कारण है कि भाजपा ने दो माह में उत्तराखंड में तीसरी बड़ी सभा कर बड़ा संदेश दिया है। भाजपा ने प्रदेश में अभी तक हरिद्वार में गृह मंत्री अमित शाह की जनसभा फिर हल्द्वानी में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की सभा आयोजित कर कांग्रेस को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि प्रदेश में भाजपा के पक्ष में आम जनमानस खड़ा है। चुनावी साल में भाजपा के लिए प्रदेश में बडे़ नेताओं की सभाओं का सिलसिला शुरू हो गया है और यह चुनावी घोषणा तक लगातारी जारी रहने की संभावना है।
भाजपा प्रदेश में डबल इंजन की सरकार को लंबे समय से प्रचारित करती रही है और इसके लिए केंद्र से बार-बार प्रदेश के लिए बजट मिलना डबल इंजन की सरकार को दिखाता है। भाजपा चुनावी साल में कोई कोर कसर छोड़ना नहीं चाहती है और इसके लिए अभी से बड़ी सभाओं का आयोजन करने के साथ-साथ भले ही पार्टी के अंदर जो भी मनमुटाव हो उसे सार्वजनिक करने से बच रही है। शायद यही कारण रहा कि भाजपा ने पीएम की रैली में एकजुटता का संदेश देने के लिए अपने नेताओं को एक मंच पर खड़ा कर अपनी एकजुटता दिखाई।
भाजपा का स्पष्ट संदेश था कि पार्टी में कोई भेदभाव नहीं है और सभी एकजुट है। दून में पीएम के कार्यक्रम में मंच पर बड़ी संख्या में पूर्व मुख्यमंत्रियों, वर्तमान सांसदों, कैबिनेट मंत्रियों के साथ-साथ राज्य के सभी छोट-बडे़े नेताओं को खड़ा कर संदेश दिया है कि भाजपा की ताकत एकजुटता के साथ आगामी विधानसभा चुनाव में कूदेगी।
वही राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो दून में पीएम मोदी के कार्यक्रम के बहाने भाजपा ने अपनी ताकत भी दिखाई है। राजधानी के चप्पे-चप्पे पर भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी से पीएम भी खुश नजर आये। यह कहे कि पीएम मोदी भी राजधानी में 12 किलोमीटर लंबे राजनीतिक गलियारे में उमड़े जनसैलाब से राज्य की राजनीति के साथ ही जनता का मिजाज भी भांप गए। उन्होंने मंच से देरी का जिक्र करते हुए इसकी तस्दीक भी की। इससे एक ओर जहां कांग्रेस धरासायी नजर आ रही है। दूसरी ओर भाजपा गदगद दिख रही है।
‘हरदा’ की पालिटिक्स की ‘पाठशाला’
चुनाव से पहले चर्चा में रहना है तो वह ‘हरदा’ से सीखें
‘हरदा’ की पाठशाला में पढ़ा नेता अभी फेल नहीं होता
कांग्रेसियों के साथ-साथ अन्य दलों के नेता भी दीवाने
संतोष बेंजवाल
देहरादून। राजनेताओं के लिए ‘हरदा’ राजनीति की पाठशाला के रूप में माना जा सकता है। चुनाव से पहले चर्चा में रहना है तो वह ‘हरदा’ से सीखें। राजनीति के हर रंग में कैसे रंगना है यह हरीश रावत अच्छी तरह से जानते है। चुनावी साल में तो उनकी भूमिका ओर भी महत्वपूर्ण हो जाती है और वह इसका भी फायदा लेना जानते है। इसीलिए ‘हरदा’ की पाठशाला में पढ़ा नेता अभी फेल नहीं होता है। ‘हरदा’ की पालिटिक्स पर कांग्रेसियों के साथ-साथ कई अन्य भी दीवाने है।
बता दें कि उत्तराखंड की राजनीति में सिर्फ और सिर्फ हरीश रावत की चर्चा चल रही थी। दरअसल हरीश रावत जानते हैं कि चर्चा में कैसे रहना है। यह उनका आज का नहीं बल्कि पुराना रिकार्ड है कि वह जब चाहे तब चर्चा में रह सकते है। इस बार भी उन्होंने राजनैतिक अवकाश के बहाने एक नई बहस शुरू करने के साथ ही सभी को अपनी ओर खींच लिया और वह खुद चर्चा के केंद्र में आ गए।
राजनीति विशेषज्ञों की माने तो हरीश रावत ने यह कदम सोच-समझकर उठाया था। इस दौरान कांग्रेस ज्वाइन करने वाले नेताओं की चर्चा तो बैकग्राउंड में चली गई, लेकिन 15 दिन के राजनीतिक अवकाश पर गए हरीश रावत दिन-रात चर्चा में रहे। इस दौरान हरीश रावत ने अपनी राजनीतिक ताकत का उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस के बड़े नेताओं को असहसास करा दिया।
सूत्र बताते है कि हरीश रावत अपने 15 दिन के राजनीतिक अवकाश से लौट आए हैं। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा पांच दिन के उत्तराखंड दौरे पर हैं। आज से उत्तराखंड का राजनीतिक परिदृश्य बदलेगा।
राजनैतिक दलों का मिशन ‘कुनबा’ शुरू
प्रदेश में 2027 में होने हैं विधानसभा के चुनाव
भाजपा-कांग्रेस में कुनबा बढ़ाने की जंग है जारी
दलों में इस राजनीति से कई बार उपजा असंतोष
संतोष बेंजवाल
देहरादून। चुनावी साल में राजनैतिक दल अपनी रणनीति के साथ अपने ‘कुनबे’ को बढ़ाने में लग गए है। प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस में ‘कुनबा’ बढ़ाने को लेकर कई बार अंतरकलह का भी सामना करना पड़ता है। अकेले प्रदेश में विगत दिनों कांग्रेस में उपजे असंतोष भी कुनबा बढ़ाने की लड़ाई का ही परिणाम था। यही नहीं भाजपा में भी इसको लेकर ‘द्वंद’ सामने आया था। इसके बाद भी प्रमुख दलों की रणनीति दूसरे दलों के लोगों को अपने दल में शामिल करने की जारी है।
बता दें कि प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनाव की घोषणा से पहले भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य दल अपनी पार्टी को बड़ा करने की दिशा में कार्य कर रहे है। मतदाताओं को अपने पक्ष में माहौल है को प्रदर्शित करने के लिए दल इस रणनीति पर कार्य कर रहे हैं। हालांकि इससे दलों में बिखराव और अंतरकलह के साथ कई अन्य परेशानियों से जूझना पड़ता है। इसके बाद भी सभी दल चुनाव से पूर्व अपने पक्ष में माहौल बनाना चाहते हैं। दलों की यह राजनीति चुनाव के समय उनके काम आयेगी या नहीं यह तो चुनाव के समय ही पता चलेगा, लेकिन दल अभी से इसी बहाने माहौल तैयार कर रहे हैं।
अकेले भाजपा की बात करें तो भाजपा में सब ठीक है यह तो संभव नहीं है, लेकिन भाजपा अपने कुनबे को बढ़ाने में लगी है। वर्तमान में प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा से जुड़ने वालों की लाइन लंबी है। खासकर सूबे में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के कार्यकर्ता भाजपा से जुड़ना चाहते है। यह हमारा नहीं भाजपा का है। भाजपा प्रदेश कार्यालय में प्रतिदिन ज्वांनिंग कार्यक्रम और भाजपा की विज्ञप्ति इस बात की पुष्टि करती है। भाजपा से जुडे़ने वालों को सरकार से उम्मीद है कि उनका भाजपा में आने से भला होगा। वही विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा कुनबे को बड़ा करना चाहती है ताकी विधानसभा चुनाव के समय जमीन पर भाजपा के पक्ष में मतदान के लिए मतदाताओं को रिझा सके।
दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए सभी जुगत लगा रही है। कांग्रेस के रणनीतिकार जहां भाजपा के बडे़ नेताओं को दल में शामिल करवा रही है। वहीं सत्ता में वापसी की ‘चाहत’ में शायद ‘लालच’ देकर भाजपा के बडे़ नेताओं को दल में जगह दे रही है। इस बात की पुष्टि विगत दिनों कांग्रेस के बडे़ नेताओं में उपजे असंतोष ने कर दी है। कांग्रेस के एक बडे़े नेता अपने चहेते को दल में शामिल करवाना चाहते थे, लेकिन हाईकमान से इसकी छूट नहीं मिली तो वह तिलमिला गए और राजनैतिक अवकाश पर चले गए। कांग्रेस में यह घटनाक्रम कोई नया नहीं है। इससे पहले के भी कई उदाहरण हैं जब कांग्रेस में आपसी फूट पड़ी है।
वही प्रदेश के एकमात्र क्षेत्रिय दल यूकेडी की सक्रियता और गांव-गांव सदस्यता अभियान से भाजपा और कांग्रेस में खलबली मची हुई है। क्योंकि इस बार यूकेडी का नेतृत्व युवा कर रहे हैं और सभी को हालिया राजनैतिक घटनाक्रम जो पड़ोसी देश नेपाल में घटा उससे भाजपा और कांग्रेस का असहज होना लाजमी है। इसके साथ ही विधानसभा चुनाव को देखते हुए अन्य दल भी खुद की उपस्थिति दर्ज करवाने में लगे है। अब विधानसभा चुनाव में यह दिलचस्प होगा कि जनता किसके सिर ताज पहनाती है।
पूर्व सैनिकों ने ज्वाइन की भाजपा
सीमांत क्षेत्र से संख्या में आए पूर्व सैनिकों ने भाजपा सदस्यता ग्रहण की है। भाजपा मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में प्रदेश महामंत्री तरुण बंसल और दीप्ति रावत ने धारचूला विधानसभा से आए सभी पूर्व सैनिकों को पटका पहनाकर पार्टी में स्वागत किया। भाजपा में शामिल होने वाले धारचूला से आए पूर्व सैनिकों में कैप्टन भूपाल सिंह रावल, अध्यक्ष गौरव सेनानी संगठन, सूबे मेजर, दीवान सिरवाल, सूवेदार पुष्कर वम, सूबेदार धन सिंह, नायब सूबेदार नारायण सिंह आदि शामिल थे।
विधानसभा चुनाव का अनौपचारिक ‘शंखनाद’
2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए दल तैयारियों में जुटे
भाजपा ने अपने बडे़े नेताओं की तीन जनसभाएं कर दिखाई ताकत
कांग्रेस सहित अन्य दल जनसभाओं में जनसैलाब से दिख रहे परेशान
संतोष बेंजवाल
देहरादून। चुनावी साल में चुनाव से पूर्व बड़ी जनसभाओं का सफल आयोजन किसी भी दल के लिए संजीवनी का काम करता है। पीएम मोदी के दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस वे के उदघाटन पर उमड़ी भीड़ से भाजपाई गदगद हैं और इसे आगामी विधानसभा चुनाव से पहले अपनी जीत का मंत्र मान रहे हैं। यह कहा जाए कि भाजपा ने विधानसभा चुनाव 2027 का अनौपचारिक ‘शंखनाद’ कर दिया है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
बता दें कि उत्तराखंड सहित अन्य राज्यों में 2027 में विधानसभा के चुनाव होने है और इसके लिए सभी दल अभी से अपनी तैयारियों में जुट गए है। अकेले उत्तराखंड की बात करें तो यहां सत्ता में भाजपा है और भाजपा किसी भी सूरत में सत्ता पर काबिज रहना चाहती है। इसके लिए पार्टी रणनीति के साथ कार्य कर रही है। भाजपा ने चुनाव की घोषणा से पहले तीन बड़ी जनसभाओं का आयोजन कर कांग्रेस को सकते में डाल दिया है।
भाजपा के तीन बडे़ नेताओं की जनसभाओं में जिस तरह से जनसैलाब उमड़ा उससे जहां भाजपा गदगद है। वही दूसरी ओर कांग्रेस सहित अन्य दलों के लिए यह किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो पीएम मोदी की जनसभा में उमड़ा जनसैलाब भाजपा के लिए अच्छे संकेत है। वहीं दूसरी ओर पीएम मोदी भी भीड़ को देखकर प्रदेश में मतदाताओं के मूड़ को समझ चुके है। यही कारण है कि उन्होंने प्रदेश के भाजपा नेताओं की जहां तारीफ की वही सभी से बडे़ प्यार से मिले। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो यह भाजपा के लिए शुभ संकेत है।
राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत कर दी है। राज्य में तीन जनसभाएं कर भाजपा अब गांव-गांव दस्तक देने की तैयारी में है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा ने अपने नेताओं को जिम्मेदारियां भी दे दी है और सभी वोटरों को लुभाने के लिए लावा-लस्कर के साथ दस्तक दे रहे हैं। वैसे भी सरकार ने चुनावी साल में जहां कैबिनेट का कोरम पूरा किया वही कई नेताओं को पदभार देकर अपनी पकड़ को मजबूत करने का काम किया है। चुनावी साल में यह सब करना भी चुनावी रणनीति का ही एक हिस्सा है।
दूसरी ओर भाजपा की जनसभाओं में उमडे़ जनसैलाब के बाद कांग्रेस सहित अन्य दल भी सकते में है। खासकर पीएम मोदी की रैली में जिस प्रकार से आमजन उमड़े थे उससे कांग्रेस को मिर्च लगी ही अन्य दल भी अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर हुए है। कांग्रेस की बात करें तो पहले ही कांग्रेस अंतरकलह से जूझ रही है और इसके साथ ही लंबे समय से सत्ता से दूरी के कारण नेताओं में एकजुटता नहीं दिख रही है। आगामी विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस के लिए किसी महाभारत से कम नहीं होगा।
विधानसभा चुनाव की अभी औपचारिक घोषणा होना बाकी है, लेकिन भाजपा ने तो चुनाव की अनौपचारिक घोषणा कर दी है। कांग्रेस सहित अन्य दल अभी तक अपनी रणनीति बनाने में लगे हैं, जबकि राज्य में चुनाव के लिए एक साल से भी कम का समय है। राज्य में भाजपा सत्ता में है तो उसके पास संसाधन सभी हैं, लेकिन अन्य दलों के पास संसाधनों को जुटाने में समय लगेगा। इसके बाद भी कांग्रेस सहित अन्य दलों में आपसी खींचतान जारी है जो आने वाले विधानसभा चुनाव में भारी पड़ सकता है।
रम्माणः परंपरा, आस्था और लोकनाट्य का जीवंत संगम
अप्रैल में आयोजित होने वाले रम्माण में बदल जाता है पूरा गांव एक बड़े रंगमंच में
ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा-मुखौटों संग करते है पौराणिक-लोक कथाओं का मंचन
ढोल-दमाऊं की थाप, पारंपरिक गीत और नृत्य इस आयोजन को बना देते हैं जीवंत
परंपरा में आधुनिक तकनीक या मंच की जरूरत नहीं,पूरी तरह लोक शैली में संपन्न
संतोष बेंजवाल
देहरादून। उत्तराखंड के चमोली जिले के सलूर-डुंगरा गांव में हर साल मनाया जाने वाला रम्माण उत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है। यह उत्सव गांव के आराध्य देवता भैरव को समर्पित होता है और स्थानीय लोगों की आस्था, सामाजिक एकता और परंपराओं को एक सूत्र में पिरोता है। रम्माण का आयोजन हर साल बैसाख महीने में किया जाता है, जब पूरा गांव एक बड़े रंगमंच में बदल जाता है।
रम्माण की सबसे बड़ी खासियत इसका लोकनाट्य स्वरूप है। इसमें गांव के लोग पारंपरिक वेशभूषा और मुखौटों के साथ विभिन्न पौराणिक और लोक कथाओं का मंचन करते हैं। रामायण, महाभारत के प्रसंगों के साथ-साथ स्थानीय कथाएं भी इसमें शामिल होती हैं। ढोल-दमाऊं की थाप, पारंपरिक गीत और नृत्य इस आयोजन को और भी जीवंत बना देते हैं। खास बात यह है कि इस पूरी परंपरा को निभाने के लिए किसी आधुनिक तकनीक या मंच की जरूरत नहीं होतीकृयह पूरी तरह लोक शैली में संपन्न होता है।
यह उत्सव सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश देने का भी एक सशक्त जरिया है। रम्माण के माध्यम से गांव के लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हैं और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। इसमें हर वर्ग और उम्र के लोग भाग लेते हैं, जिससे सामुदायिक एकता और भाईचारे की भावना मजबूत होती है। इस आयोजन में अनुशासन और परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है, जो इसे और भी खास बनाता है।
रम्माण की इस अनूठी परंपरा को वैश्विक पहचान भी मिल चुकी है। इसे यूनेस्को की सूची में शामिल किया गया है, जो इसकी सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है। यह सम्मान न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व की बात है। ऐसे समय में जब आधुनिकता के कारण लोक परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं, रम्माण जैसे उत्सव हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने का कार्य कर रहे हैं।
मुखौटों के पीछे की दुनिया
अप्रैल के महीने में जब पहाड़ों पर हरियाली छाने लगती है, तब सलूड़-डुंग्रा गांव के लोग रम्माण उत्सव की तैयारी करते हैं। यह उत्सव भगवान भूमियाल देवता को समर्पित है। इसमें गांव के लोग रामायण के प्रसंगों को एक नाटक के रूप में मंचित करते हैं, लेकिन यहाँ कोई संवाद नहीं होते। सब कुछ नृृत्य, संगीत और मुखौटों के जरिए व्यक्त किया जाता है। ग्रामीण इन मुखौटों को पहनकर नर्तक जब ढोल-दमाऊं की थाप पर थिरकते हैं, तो पूरा गांव भक्ति के रस में डूब जाता है। रम्माण में इस्तेमाल होने वाले मुखौटे लकड़ी के बने होते हैं और इनमें से कुछ तो सदियों पुराने हैं। गांव के लोगों का मानना है कि नृत्य के दौरान देवताओं की शक्ति वास्तव में उन नर्तकों में समा जाती है।
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