गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

टिकट बंटवारे का ‘फार्मूला’ फिलहाल फाइनल

आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टियों की रणनीति तय --भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेता स्थानीय नेताओं की खंगाल रहे कुंडली --पार्टी हाईकमान प्रदेश में जिताउ और टिकाउ प्रत्याशी की कर रही खोज --भाजपा संगठन संभावित प्रत्याशियों के ग्राउंड जीरों की ले रही है टोह --कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का दल भी प्रदेश के दौरों में हो गया है व्यस्त चुनावी साल में राजनैतिक दलों की तैयारियां दिन-प्रतिदिन तेज हो रही है। राजनैतिक दल अपनी रणनीति तय करने के लिए स्थानीय और हाईकमान स्तर पर बैठकों में तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगे है। राजनैतिक विशेषज्ञों की मानें तो पार्टियों के लिए सबसे बड़ी समस्या टिकट बंटवारा होता है। इसके लिए दलों ने अपना फार्मूला तय कर दिया है। कांग्रेस और भाजपा के सूत्रों की माने तो टिकट को लेकर फाइनल गाइडलाइन जारी कर दी गई है। बता दें कि सूबे में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। हालांकि अभी चुनाव आयोग ने इसकी घोषणा तो नहीं की है, लेकिन राजनैतिक दलों ने अभी से अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। क्योंकि टिकट बटवारे को लेकर भाजपा और कांग्रेस में घमासान मच जाता है। शायद इसी कारण पार्टियों ने अपना फार्मूला तय कर दिया है। हालांकि चुनाव की घोषणा होते-होते इसमें कई बदलाव देखने को मिलते है, लेकिन राजनैतिक दलों की पहली प्राथमिकता रहती है कि टिकट बंटवारे को लेकर घमासान कम मचे। इसलिए सभी दल पहले से यह तय कर लेते हैं कि किस मापदंड के हिसाब से टिकटों का बंटवारा करना है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा और कांग्रेस में अंदरखाने चल रही बैठकों में यह तय हो गया है और इसके लिए भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेताओं को संभावित प्रत्याशियों की कुंडली खंगालने के काम पर लगा दिया गया है। राजनैतिक सूत्र बताते हैं कि पार्टी हाईकमान मैदान में उन्हीं नेताओं को उतारेगी, जो जिताउ हो और सीट पक्की हो। इसके लिए दल सभी बिंदूओं पर कार्य कर रही है। क्षेत्र में जिस नेता की जितनी पकड़ उतनी उस नेता के जीतने के चांस ज्यादा रहते है। भाजपा की बात करें तो भाजपा की वर्तमान में सरकार है और भाजपा में ही सबसे अधिक टिकट को लेकर घमासान मचने की संभावना है। इसी को देखते हुए भाजपा ने अपनी टीम को सक्रिय कर दिया है। भाजपा की टीम अंदरखाने संभावित प्रत्याशियों की कुंडली खंगालने का कार्य कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस के बडे़ नेताओं की उत्तराखंड दौरे भी इसी कारण लग रहे है। कांग्रेस भी चाहती है कि उनका संभावित प्रत्याशी वह हो जो जीत दर्ज कर सके। इसके लिए कांग्रेस भी हर एंगिल से जांच करने में जुटी है। ज्ञात हो कि विधानसभा चुनाव के समय टिकट बंटवारों को लेकर दलों में घमासान मचता है। इसको कम करने के लिए दल अभी से तैयारी में लग जाते है। वर्तमान एआई के युग में हालांकि यह सब बहुत सरल हो गया है, लेकिन जमीनी हकीकत के लिए जमीन पर जाना आवश्यक है। इसी रणनीति के तहत दल कार्य कर रहे है। प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेताओं के दौरों को लेकर राजनैतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों दल अपनी जीत को पक्की करने के लिए सभी हथकंडे अपना रहे हैं। प्रत्याशियों की खोज जमीन पर जाकर ही पूरी हो सकती है। इसके लिए पार्टी जिताउ और टिकाउ संभावित प्रत्याशी की खोज कर रही है। भाजपा संगठन और कांग्रेस संगठन ग्राउंड जीरों का कार्यकर्ताओं की टोह लेने में लगी है। इसके लिए दोनों दलों के नेताओं और संगठन के पदाधिकारियों के प्रदेश में दौरे शुरू हो गए है।

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

कांग्रेस और बीजेपी में ‘जंग’

उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां में अभी से आ गई है तेजी कांग्रेस प्रदेश सरकार की नाकामियों को लेकर भाजपा को घेरने की कर रही तैयारीं भाजपा ने बनाई सरकार की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जाने की रणनीति उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसकी सरगर्मियां अभी से तेज हो गई हैं। चुनाव से पहले कांग्रेस और बीजेपी ने एक दूसरे को घेरने के लिए अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस भाजपा सरकार की नामामियों को उजागर करने की रणनीति पर कार्य कर रही है। दूसरी ओर भाजपा अपनी उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड जनता के बीच ले जाने को तैयार है। बता दें कि चुनावी साल में देश के प्रमुख दलों में ‘जंग’ होना स्वाभाविक है। इसके लिए दोनों दल चुनाव से एक साल पहले ही तैयारी कर लेते हैं और चुनाव आते-आते दोनों दलों की जंग तेज हो जाती है। अकेले उत्तराखंड की बात करें तो सूबे में सत्ता पर बारी-बारी से अभी तक भाजपा और कांग्रेस ने राज किया है। पिछले दो चुनाव हालांकि भाजपा ने जीतकर कांग्रेस को पटखनी अवश्य दी है, लेकिन इस बार भाजपा के लिए भी विधानसभा चुनाव की जंग आसान नहीं है। क्योंकि सत्ता से दूर बैठी कांग्रेस पिछले लंबे समय से प्रदेश में सरकार विरोधी हवा बनाने में लगी है और चुनाव से पूर्व इसकी लपटें भाजपा के अभियान को प्रभावित कर सकती हैं। चुनाव की घोषणा से पूर्व भाजपा कांग्रेस की जंग तेज होती दिख रही है। भाजपा जहां अपने पिछले चुनाव के वायदों को पूरा करने के साथ ही प्रदेश सरकार की उपलब्धियों को लेकर मैदान में जाने की तैयारी कर रही है। भाजपा प्रदेश सरकार के कई फैसलों को लेकर जनता के बीच जाने का मन बना चुकी है। क्योंकि प्रदेश की सरकार के कई फैसले देश में नजीर बने हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो आगामी चुनाव में इसका भाजपा को फायदा भी मिलेगा। वही दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश सरकार की उपलब्धियों को मात्र दिखावा मान रही है। कांग्रेस सूत्रों की माने तो विधानसभा चुनाव में प्रदेश सरकार की नाकामियों को लेकर उतरा जाएगा। प्रदेश सरकार और भाजपा चाहे जितने भी दावे कर ले, लेकिन प्रदेश की जनता आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। इसके साथ ही प्रदेश सरकार ने जिस तरह की कार्यसंस्कृत को ईजाद किया है यह प्रदेश के भविष्य के लिए हानिकारक है। सूबे में विधानसभा चुनाव की अभी घोषणा होना बाकी है। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस की जंग शुरू हो गई है। विधानसभा चुनाव तक यह जंग विकराल रूप धारण कर लेगी और इसके दुष्परिणाम चुनाव परिणाम पर पडे़गे। सत्ता भाजपा के हाथ में रहती है या फिर कांग्रेस के हाथ चली जाएगी, यह तो बाद में पता चलेगा। लेकिन चुनावी मैदान में उतरने से पहले दोनों ही दल अपनी-अपनी तैयारियों में लगकर खुद को मजबूत करने में लगे हैं। हालांकि दोनों दल मैदान में उतर चुके हैं और अपनी उपस्थिति जनता के सामने प्रदर्शित कर रहे हैं, जबकि विधानसभा के चुनाव की घोषणा होना अभी बाकी है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

पैराशूट’ नेताओं को ‘फरमान’

--सोशल मीडिया के ‘लाइव’ कांसेप्ट नेताओं के लिए मुसीबत --एआई नेता की कुंडली खंगाल कर आमजन के सामने रखेगा --राजनैतिक दलों की मजबूरी बनी जमीनी नेताओं पर दाव खेलना देहरादून। चुनावी साल में राजनैतिक दल अपनी रणनीति तैयार करने में लगे है। आज के एआई दौर में मतदाताओं को रिझाने के लिए दलों को जी-जान लगाने पडे़गी। क्योंकि एआई ने अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली है कि उसके सामने अब किसी की नहीं चलने वाली है। शायद यही कारण है कि राजनैतिक दल इस बार ‘पैराशूट’ के बजाय जमीनी नेताओं पर ‘दाव’ खेलने के मूड़ में है। इसके लिए पार्टियों ने फरमान तक जारी कर दिए हैं। राजनीति के विशेषज्ञों की माने तो पार्टियों के लिए आने वाला विधानसभा चुनाव किसी पहाड़ से कम नहीं है। गांव-गांव, घर-घर और शहर-शहर में आमजन अब बहुत जागरूक हो गया है और हर जगह से ‘लाइव’ का कांसेप्ट इस चुनाव में नेताओं को भारी पड़ सकता है। सोशल मीडिया के साथ एआई की मजबूत पकड़ इस बार के चुनाव में साफ देखने को मिलेगी। सोशल मीडिया के ‘लाइव’ कांसेप्ट नेताओं के लिए जहां मुसीबत बन सकती है। वही एआई किस समय किस नेता की कुंडली खंगाल कर आमजन के सामने रख दे पता नहीं है। इसके अभी से संकेत दिखने लगे है। हालांकि अभी चुनाव में लंबा समय है, लेकिन दलों की अभी से जो रणनीति उसमें स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। बता दें कि विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आने के लिए विधायकों के टिकट के बंटवारे में अपनी रणनीति बदलने की योजना है। इसके चलते उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में पैराशूट की बजाए जमीनी नेताओं पर भाजपा दांव लगाने की रणनीति पर चर्चा हो रही है। पार्टी में टिकट वितरण में असंतोष को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत नेताओं को तवज्जो देने की रणनीति बनाई जा रही है। पार्टी हाईकमान के आदेश पर उत्तराखंड में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट इसके लिए सभी मंत्री और विधायकों को अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता साबित करने को कहा गया है। इसकी शुरूआत भाजपा ने हरिद्वार से कर दी है। पार्टी सूत्रों ने बताया कि हाल में हुई कोर ग्रुप की बैठक से पहले ही शीर्ष नेतृत्व साफ कर चुका है कि इस बार किसी भी मंत्री, विधायक को सीट बदलने की इजाजत नहीं दी जाएगी। इसके अलावा अलग अलग सीटों के मजबूत चेहरों को भी अपने अपने विधानसभा क्षेत्रों में ही सक्रियता के लिए कहा गया है। भाजपा ने पिछले चुनावों में कुछ नेताओं की सीट बदली थी तो कुछ दूसरे दलों से आए नेताओं को ऐन वक्त पर टिकट दे दिया था। इस वजह से कईई जगह पार्टी को आंतरिक असंतोष का भी सामना करना पड़ा। इसे देखते हुए इस बार केवल स्थानीय स्तर पर मजबूत और सक्रिय चेहरों पर ही दांव लगाने की योजना पर काम किया जा रहा है। पार्टी के मंत्री, विधायकों को तो इस संदर्भ में साफ तौर पर संकेत दिए जा चुके हैं। भाजपा के करीब आधा दर्जन मंत्री और विधायक अपनी मौजूदा सीट को छोड़कर दूसरे स्थान से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। लेकिन शीर्ष नेतृत्व के फरमान की वजह से उनकी योजना को तगड़ा झटका लगा है। इसके साथ ही अपने क्षेत्र से बाहर तैयारी कर रहे नेताओं को भी इससे निराशा हाथ लग सकती है। यही हाल कांग्रेस का भी है। कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस भी जमीनी नेताओं को तबज्जों देकर अपनी जीत सुनिश्चित करने की योजना बना रही है। हालांकि कांग्रेस की रणनीति अभी सिर्फ आक्रामक दिख रही है, लेकिन सूत्र बताते है कि आने वाले समय में कांग्रेस की बैठकों में स्पष्ट हो जाएगा कि चुनावी रण में उतरने के लिए क्या सही है और क्या गलत है। बता दें कि भाजपा जहां चुनावी रथ को तेजी के साथ आगे बढ़ा रही है वहीं कांग्रेस अभी रणनीति बनाने पर ही लगी है। इसका फायदा आने वाले विधानसभा चुनाव में किसे मिलेगा यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। लेकिन यह अवश्य है कि भाजपा और कांग्रेस सोशल मीडिया के लाइन कांसेप्ट और एआई की पहुंच को लेकर अपनी-अपनी रणनीति तय करने में लगी है।

उत्तराखंड में बढ़ने लगी चुनावी ‘सरगर्मी’

उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 भाजपा और कांग्रेस चुनावी मोड में पार्टियों के बडे़ नेताओं के दौरे शुरू देहरादून। चुनावी साल में भाजपा और कांग्रेस की गतिविधियां तेज हो गई हैं। एक ओर भाजपा जहां तेज गति से अभी से चुनावी गतिविधियों में जुट गई है वहीं कांग्रेस भी चुनाव की तैयारियों में जुट गई है। गैरसैंण में बजट सत्र के बाद राजनीतिक गलियारों में गतिविधियां तेज होने की संभावना है। उत्तराखंड में चुनावी सरगर्मी बढ़ती दिखाईईदे रही है, बीजेपी जहां संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर पूरी सक्रियता के साथ मैदान में उतर चुकी है तो वहीं कांग्रेस भी अपनी तैयारियों को गति देने की कोशिश में लगी है। पार्टियों के बड़े नेताओं की मौजूदगी, संगठनात्मक गतिविधियों और राजनीतिक कार्यक्रमों को देखें तो दोनों दलों सक्रिय हो गये हैं। प्रदेश में जहां बीजेपी अपनी मौजूदा सरकार के चार साल पूरे होने का जश्न मनाने की तैयारी में जुटी हुई है और इसे चुनावी हवा तैयार करने की दिशा में कार्य कर रही है। दरअसल, वर्तमान सरकार को 23 मार्च को चार साल पूरे होने जा रहे हैं। ऐसे में सरकार अपनी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान चलाने की तैयारी कर रही है। विभिन्न जिलों में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें सरकार के चार साल के कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाया जा रहा है। भाजपा इसे पूर्ण रूप से भूनाने के मूड में है। वही कांग्रेस प्रदेश स्तर पर कुछ सक्रिय जरूर दिख रही है, लेकिन पार्टी अभी तक चुनावी मोड में नजर नहीं आ रही है और संगठनात्मक गतिविधियों की रफ्तार बीजेपी की तुलना में काफी धीमी दिखाई देती है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सक्रिय हैं, लेकिन पार्टी अभी तक चुनावी मोड में कम दिख रही है।

सूबे में चढ़ने लगा ‘सियासी’ पारा

चुनाव की घोषणा से पहले दलों की राजनैतिक तैयारी भाजपा और कांग्रेस में चलने लगा दल-बदल का खेल अब दिनभर लगने लगी दलों के मुख्यालयों में भारी भीड़ देहरादून। चुनावी साल में दल-बदल आम बात है और यह राजनीति सभी दलों में देखने को मिलती है। प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के इस ‘खेल’ से जहां सियासी पारा चढ़ने लगा है। चुनाव की घोषणा से पहले दलों की राजनैतिक तैयारी का मतलब ‘हम ही हम हैं बाकी सब कम है’ का संदेश होता है। प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। सत्तारूढ़ भाजपा की तैयारी जहां सभी सीटों पर जीत दर्ज करने की है वही कांग्रेस भी पीछे कहा रहने वाली है। यही कारण है कि दोनों दलों में तोड़फोड़ अभी से शुरू हो चुकी है, जबकि अभी चुनाव की तारीख तक घोषित नहीं हुई है। चुनावी साल है और इस समय किसी भी कमी का मतलब खतरा होता है। शायद यही कारण है कि दोनों दल सक्रिय हो गए है। राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो चुनाव की घोषणा से पूर्व सभी राजनैतिक दल जनता में यह संदेश देना चाहते है कि उनका दल सबसे अच्छा है। इसी कारण दल-बदल की राजनीति पर दलों का चुनाव से पूर्व जोर रहता है। सूत्रों की माने तो भाजपा और कांग्रेस में तो दल-बदल की राजनीति को एक मिशन के रूप में लिया जाता है। दलों में इसके लिए स्पेशल विंग तैयार की जाती है, जिसका काम सिर्फ दूसरे दल के लोगों को अपने दल में शामिल करवाना होता है। अकेले भाजपा की बात करें तो भाजपा संगठन और सरकार की उपलब्धियों को लेकर अपनी तैयारी कर रही है। वही दूसरी ओर कांग्रेस सरकार की नाकामी को मुद्दा बनाकर आमजन के बीच जाकर तोड़फोड़ में लगी है। आजकल कोई ऐसा दिन नहीं है जब एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का क्रम जारी न हो। इसके साथ ही राजनैतिक दलों के मुख्यालयों में पार्टी ज्वांइन करने वालों की लंबी लाइनें न लगी हों। हालांकि मतदाता सब समझता है कि चार साल तक जिसे दुत्कारा जा रहा था आजकल एकदम से वह पूज्यनीय कैसे बन गया। चुनावी साल है और इस समय कुछ भी हो सकता है। कई लोगों ने ली भाजपा की सदस्यता भाजपा मुख्यालय में ज्वाइनिंग कार्यक्रम में पाटीं के वरिष्ठ नेता एवं बीस सूत्रीय क्रियान्वहन समिति के उपाध्यक्ष ज्योति गैरोला एवं प्रदेश महामंत्री कुंदन परिहार ने कई लोगों को भाजपा की सदस्यता दिलाई। भाजपा का दामन थामने वालों में पूर्व लेबर डिप्टी कमिश्नर सुरेश आर्य ने कहा कि पूरी सर्विस के दौरान मुझे लोगों की सेवा का अवसर मिला है। सेवानिवृत्ति के बाद भी में सेवा के कामों को आगे बढ़ाना चाहता था, जिसके लिए मुझे सर्वश्रेष्ठ पार्टी भाजपा महसूस हुईई। पीएम मोदी जैसा नेतृत्व और राज्य में धामी जैसे कर्मशील मुख्यमंत्री, हम सबके यहां आने की महत्वपूर्ण वजह है। भाजपा की सदस्यता लेने वालों में नरेश भारद्वाज आकाश पवार, राहुल पाल, रोशन, अंशुल तिवारी, अंकित तिवारी, पीयूष चौहान, सुनील चौहान, बृजेश कुमार, हिमांशु चंद्र, दीपक कुमार, गोपाल राम, कैलाश चंद्र, चयनिका आर्य, प्रियंका आर्य, भावना आर्य, कैलाश कुमार, सुंदर सिंह, गणेश मेहरा, वीरेंद्र कुमार, जीवन सिंह रावत, सरिता आर्या, मीनू आर्य, ज्योति तिवारी, गीता तिवारी, विक्रम सिंह, कुलदीप सिंह, मेजर सिंह, प्रीतम सिंह, कश्मीर सिंह, संजीव चौहान, कुलविंदर सिंह आदि थे।

राजधानी पर भाजपा-कांग्रेस की ‘चुप्पी’

हर चुनाव में राजनैतिक दलों का मुद्दा बन जाता है गैरसैंण चुनाव खत्म होते ही राजधानी पर नहीं करता है कोई भी बात हकीकत में प्रदेश के आमजन की हसरत आज भी है अधूरी देहरादून। चुनावी साल में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर यह तो प्रजातंत्र में नेताओं के लिए खजाना है और इस खजाने से कब कौन सा अस्त्र बाहर निकालना है यह नेताओं को खूब पता होता है। बात चली है तो भाजपा और कांग्रेस के उस सफेद झूठ के बारे में करते हैं, जिसे बोलकर सत्ता पर काबिज होना इन दोनों दलों को अच्छी तरह से आता है। यह मुद्दा है प्रदेश की राजधानी की। राज्य बने 25 साल हो गए, लेकिन आज भी राज्य की राजधानी का मुद्दा हर चुनाव के समय उठ जाता है और शुरू हो जाता है आरोप-प्रत्यारोपों का दौर। बता दें कि वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बना और राज्य की देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाया गया। उस समय भी यह उम्मीद जताईई गई थी कि भविष्य में राजधानी के प्रश्न पर व्यापक विचार किया जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे समय बीतता गया और अस्थायी राजधानी स्थायी व्यवस्था का रूप लेती चली गई। राज्य के लोगों की गैरसैंण राजधानी की मांग धूमिल होती चली गई। नेताओं को अपने ठाठ-बाठ के लिए पहाड़ चढ़ना मंजूर नहीं था और नेतागिरी करने के लिए यह मुद्दा तो लंबा चलाना था। साल-दर-साल चुनाव होते रहे, गैरसैंण का मुद्दा चुनाव के समय उठता रहा, लेकिन हकीकत आज भी यह है कि आमजन की हसरत आज भी अधूरी है। इसके साथ ही जब-जब गैरसैंण पर बात हुई तो कुछ न कुछ हुआ और इसी का परिणाम था कि जब भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन का निर्माण हुआ तो पहाड़ के लोगों के भीतर एक नईई आशा जगी। उन्हें लगा कि शायद अब राज्य की सत्ता धीरे-धीरे पहाड़ की ओर लौटेगी। लेकिन आज भी कभी कभार सपने की तरह यहां नेताओं को हुजूम उमड़ता है और कुछ दिन मौज-मस्ती पर फिर गैरसैंण बीरान हो जाता है। आज की स्थिति यह है कि भराड़ीसैंण का विधानमंडल परिसर अत्यंत भव्य और आधुनिक है। वहां विधानसभा भवन, विधायक आवास, अधिकारियों के आवास और कईई अन्य बुनियादी ढांचे विकसित किए गए हैं। इन परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। लेकिन इन सबके बावजूद साल भर में केवल कुछ ही दिनों के लिए वहां विधानसभा सत्र आयोजित होता है। अब चुनावी साल है और भाजपा कांग्रेस का यह फिर मुद्दा होगा, लेकिन सिर्फ चुनावी। चुनाव खत्म होते ही सभी नेता देहरादून में एसी की हवा खाने में मस्त हो जाएंगे और पांच साल तक चप्पी साधे रहेंगे। हर चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ने गैरसैंण को लेकर सफेद झूठ बोला है और आगे भी बोलेंगे। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर राजनैतिक दलों ने गैरसैंण की समस्या का समाधान कर दिया तो आने वाले समय में किस बात की राजनीति करेंगे। शायद यही कारण है कि आज भी इस मुद्दे को दोनों दल अलझाये हुए हैं। बाक्स लंबे समय बाद दिखे भाजपा प्रदेश प्रभारी दुष्यंत लंबे समय बाद भाजपा के प्रदेश प्रभारी एवं राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत गौतम प्रदेश में दिखे। भाजपा की संगठनात्मक बैठक में भाग लेने के लिए पहुंचे थे। देहरादून में कुआंवाला में आयोजित बैठक में गौतम ने मुख्यमंत्री धामी को 4 वर्ष पूरे करने वाले पाटीं के पहले मुख्यमंत्री बनने की बधाईई दी। उनके कार्यकाल की प्रशंसा करते हुए कहा, वह आंदोलनकारियों के सपनों के अनुरूप राज्य का निर्माण कर रहे हैं। े जनता के मन जीतने का तो काम कर ही रहे हैं, साथ ही पीएम मोदी के कहे अनुशार उत्तराखंड का दशक लाने के लिए जी जान से जुटे हैं। उनके नेतृत्व में आपदा का भी समाधान निकालकर, राज्य आज विकसित भारत के मिशन में सर्वोपरि नामों में शुमार है।

सब कुछ ठीक नहीं’

--सूबे में 2027 में विधानसभा चुनाव से पहले राजनैतिक दलों में हलचल शुरू --भाजपा के असंतुष्ठ बने भाजपा के लिए मुसीबत, कांग्रेस के कार्यकर्ता भी है नाराज --कांग्रेस में प्रदेश की टीम का अता-पता नहीं, भाजपा से भी जमीनी कार्यकर्ता हैं नाखुश देहरादून। प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनावी साल में राजनैतिक दलों में सब कुछ ठीक नहीं है। एक ओर जहां पार्टियों खासकर भाजपा और कांग्रेस में दलों के जमीनी कार्यकर्ता नाराज हैं, वहीं पार्टी छोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया है। चुनावी साल में दलों में हलचल से पार्टियों के लिए बड़ी समस्या है। बता दें कि राज्य गठन के बाद से सूबे में बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस ने राज किया है। राज्य गठन को लेकर आमजन की भावना के अनुरूप राज्य आज दिन तक नहीं बना, लेकिन दोनों दलों ने आमजन में अपनी पकड़ मजबूत की। इसी के चलते दलों को सत्ता का सुख भोगने को मिला। सबसे बड़ी बात यह है कि आमजन को पता है कि राज्य उनकी भावनाओं के अनुरूप नहीं बना और विकास भी राजनैतिक दलों के हिसाब से हो रहा है। उसके बाद भी लोग दलों के साथ जुडे़ हैं और हर चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को सपोट करते आ रहे है। प्रदेश में जहां भाजपा ने राज्य बनने के बाद अपनी मजबूत पकड़ बनायी वही कांग्रेस के पुराने कार्यकताओं के चलते सूबे में खुद को मजबूत रखने में आज दिनतक कायम है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव राज्य की जनता पर पड़ा और भाजपा का परिवार बढ़ता गया। आज भाजपा की प्रदेश में सरकार है, लेकिन सरकार के कामकाज को लेकर आमजन नाराज तो है ही भाजपा के अपने जमीनी कार्यकर्ता भी नाराज चल रहे हैं। इसके कई उदाहरण पिछले कुछ समय से सामने आ रहे है। भाजपा में सिर्फ जमीनी कार्यकर्ता ही नहीं पदाधिकारी से लेकर पूर्व मंत्री से लेकर आम कार्यकर्ता भी नाराज चल रहे हैं। यही हाल कांग्रेस का भी है। कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है यह हमारा दावा नहीं बल्कि कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं का है। एक तो सत्ता से लंबे समय से दूरी कांग्रेस हाईकमान की नीतियां जमीनी कार्यकर्ता बताते है। वही दूसरी और प्रदेश नेतृत्व को भी इसके लिए जमीनी कार्यकर्ता जिम्मेदार मानते हैं। कांग्रेस जहां अपनी रणनीति नहीं बना पा रही है वहीं नेतृत्व और अनावश्यक बयानबाजी भी दल के लिए खतरा बनता जा रहा है। इससे भी कार्यकर्ता नाराज नजर आ रहे हैं। चुनावी साल में भाजपा और कांग्रेस में जमीनी कार्यकर्ताओं की नाराजगी दलों को भारी पड़ सकती है। क्योंकि एक ओर जहां भाजपा लगातार दो बार विधानसभा चुनाव में विजय हासिल कर सरकार में है और उसके जमीनी कार्यकर्ता नाराज चल रहे हैं उससे भाजपा को विधानसभा चुनाव में इसका असर देखने को मिल सकता है। दूसरी और कांग्रेस ने प्रदेश हाईकमान तो बदला, लेकिन लंबे समय बाद भी टीम को तैयार नहीं कर पाना यह दर्शाता है कि दल में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है और आने वाले विधानसभा चुनाव में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

‘नेताओं’ को मिल गया ‘रोजगार’

विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले ही नेताओं की पौ बारह सभी दलों ने अपने छोटे-बड़े सभी नेताओं को मैदान में उतारा चुनाव लड़ने वाले संभावित प्रत्याशियों ने कर ली है पूरी तैयारी देहरादून। प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा होनी अभी बाकी है, लेकिन चुनावी साल में नेताओं को समय से पहले ही ‘रोजगार’ मिल गया है। देश की प्रमुख पार्टियों भाजपा हो या कांग्रेस या फिर अन्य दल सभी दलों ने विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। दलों ने अपने छोटे-बड़े सभी नेताओं को मैदान में उतार दिया है। इससे जहां छुटभैया नेताओं सहित कार्यकर्ताओं की मौज आ गई है। अर्थात समय से पहले ‘रोजगार’ मिलने से सभी खुश नजर आ रहे हैं। बता दें कि उत्तराखंड सहित देश के पांच राज्यों में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने है। इस चुनाव के लिए सभी दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। दलों ने जमीनी कार्यकर्ताओं से लेकर बडे़ नेताओं को जमीन पर उतारने की रणनीति के साथ बूथ स्तर तक टीम खड़ी कर दी है। इसके साथ ही अपने-अपने क्षेत्र में चुनाव लड़ने वाले संभावित प्रत्याशियों ने भी पूरी तैयारी कर ली है। संभावित प्रत्याशियों ने अपने कार्यकर्ताओं के लिए ‘लंगर’ लगाने के साथ-साथ उनकी सुख-सुविधाओं का भी विशेष ख्याल रखा जा रहा है। संभावित प्रत्याशियों ने अभी से जमीनी कार्यकर्ताओं को रोजगार दे दिया है कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अकेले भाजपा की बात करें तो भाजपा की प्रदेश में सरकार है और उसके पास प्रयाप्त संसाधन भी है। इसी के चलते सबसे पहले भाजपा ने अपने सभी संसाधनों को चुनाव की घोषणा से पूर्व सक्रिय कर दिया है। भाजपा ने अपने नेताओं को जहां जिलों की कमान दी है वही जमीनी कार्यकर्ताओं को भी बूथ स्तर तक सरकार की योजनाओं की जानकारी के साथ भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए कह दिया है। इसके साथ ही भाजपा ने बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक कार्यक्रमों को आयोजन कर चुनावी माहौल तैयार कर दिया है। इसके लिए प्रदेश में भाजपा अलग-अलग स्थानों पर अपने बडे़ नेताओं की जनसभाएं भी आयोजित करने लग गई है। ताकी आगामी विधानसभा चुनाव में जीत के लिए अभी से माहौल तैयार हो सके। दूसरी ओर कांग्रेस भी मैदान में कूद गई है। हालांकि अभी कांग्रेस के अंदर एकजुटता का अभाव दिख रहा है, लेकिन उसके बाद भी कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस के बडे़े नेताओं के साथ-साथ जमीन से जुडे़ नेताओं को एकजुट कर बूथ स्तर तक पकड़ को मजबूत करने में लगे हुए हैं। यह अलग बात है कि कांग्रेस अध्यक्ष अपनी टीम लंबे समय बाद भी तैयार नहीं कर पाए है। इसके बाद भी प्रदेश अध्यक्ष प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर जाकर कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के साथ-साथ सरकार की नाकामियों को जिक्र कर जनता को भाजपा की नामामियां गिनाकर कांग्रेस के पक्ष में खड़ा कर रहे है। वही चुनावी साल में अन्य दल भी अपनी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरने के लिए जोर लगा रहे हैं। प्रदेश के एकमात्र क्षेत्रिय दल यूकेडी की यूथ ब्रिगेड ने तो एक साल पहले ही चुनाव का माहौल तैयार कर दिया था और गांव-गांव जाकर लोगों को इस बार चुनाव में भाजपा-कांग्रेस को दरकिनार करने का आहवान कर रही है। यूकेडी के साथ अभी आमजन का भी पूरा समर्थन मिल रहा है, लेकिन चुनाव के समय यह जनसमर्थन मिलेगा या नहीं यह तो समय ही बताएगा। वैसे भी चुनाव छोटा हो या फिर बड़ा, जमीनी कार्यकर्ताओं के बिना जीत पाना आसान नहीं होता है। शायद यही कारण है कि संभावित प्रत्याशियों ने कार्यकर्ताओं के एकजुट करने के साथ-साथ गांव-गांव दस्तक दे दी है, जिसका विधानसभा चुनाव में उनको फायदा मिलेगा।