रविवार, 10 मई 2026
‘यूकेडी की नई रणनीति और नए तेवर’
पहाड़ की राजनीति में फिर जगेगी क्षेत्रीय स्वर की गूंज
स्थानीय मुद्दों को चुनावी हथियार बनाकर उतरेगी मैदान में
यूकेडी नए तेवर व रणनीति के साथ देगी अपनी दस्तक
देहरादून। क्षेत्रीय अस्मिता और पहाड़ के मुद्दे को लेकर आंदोलनों में जन्मी यूकेडी ने पहले अलग राज्य, फिर राजधानी, स्थायी राजधानी, गैरसैंण विकास, पलायन, रोजगार और जल-जंगल-जमीन जैसे मुद्दों को लेकर जमीनी लड़ाई लड़ी है। प्रदेश के आमजन के साथ आंदोलनों में खड़ी यूकेडी को सत्ता दिलाने में जनता ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। आगामी चुनावी समर में जहां एक ओर भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपनी पूरी ताकत झोंकेंगी, वहीं क्षेत्रीय दल यूकेडी भी एक बार फिर मजबूती के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है। लंबे समय से हाशिये पर दिख रही यूकेडी अब नए तेवर और रणनीति के साथ चुनावी परिदृश्य में अपनी दस्तक दे रही है।
1979 में मसूरी में जन्मी यह यूकेडी कभी उत्तराखंड राज्य गठन का सबसे बड़ा चेहरा थी। क्षेत्रीय स्वाभिमान के तेवर के साथ राज्य आंदोलन से लेकर अब तक यूकेडी ने राज्य में अपनी आक्रामकता को बरकरार रखा है, लेकिन राज्य बनने के बाद भाजपा और कांग्रेस के राजनीतिक जाल में फंसकर पीछे छूट गई। उत्तराखंड की राजनीति में जब भी तीसरे विकल्प की बात आती है, तो यूकेडी का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। राज्य आंदोलन की कोख से उपजी यह पार्टी आज एक बार फिर चुनावी समर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए कमर कस चुकी है।
इस बार यूकेडी अपनी छवि बदलने की कोशिश में है। पार्टी संगठन में युवाओं को आगे लाने और नए चेहरों को टिकट देने की रणनीति पर काम कर रही है। इससे पार्टी न सिर्फ नई ऊर्जा लाना चाहती है, बल्कि युवा मतदाताओं को भी अपने पक्ष में आकर्षित करना चाहती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यूकेडी युवाओं और स्थानीय नेतृत्व को सही तरीके से सामने लाती है, तो वह कई सीटों पर किंगमेकर की भूमिका निभा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अगर यूकेडी सही रणनीति अपनाती है और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाती है, तो वह न सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकती है, बल्कि चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में भी आ सकती है।
यूकेडी के युवा नेताओं ने उत्तराखंडियत की भावना को सोशल मीडिया और जमीनी आंदोलनों में हवा दी है। पहाड़ की पहचान और क्षेत्रीय स्वाभिमान को पुनर्जीवित करने की भी कोशिश की है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या यूकेडी इस बार अपनी खोई साख वापस पा सकेगी, या फिर राष्ट्रीय दलों के बीच उसकी आवाज फिर दबकर रह जाएगी।
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