मंगलवार, 19 मई 2026

उत्तराखंड में ‘चुनावी बिसात’ पर ‘हेल्थकेयर’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-12 विधानसभा चुनाव 2027 में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली भी बनेगा बड़ा राजनीतिक मुद्दा क्रासर ---उत्तराखंड के पहाड़ों की हकीकत, डाक्टरों की कमी और बंद पड़े अस्पताल ---ईलाज के लिए पहाड़ से मैदान की दौड़ और खर्च बढ़ने से परेशान है आमजन ---बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था पर 2027 में जनता लिख सकती है नया प्रिस्क्रिप्शन देहरादून। मैदान की चकाचौंध से दूर, राज्य के सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी एक गर्भवती महिला को डोली में बिठाकर अस्पताल ले जाने की तस्वीरें या रेफरल सेंटर बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र महज प्रशासनिक खामी नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन चुके हैं। उत्तराखंड में सड़क, पानी और रोजगार की तरह अब स्वास्थ्य भी पहाड़ के लोगों की सबसे बड़ी चिंता बनता जा रहा है। राज्य के दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी गर्भवती महिलाओं को कई किलोमीटर डोली या निजी वाहनों से अस्पताल पहुंचाना पड़ता है, जबकि गंभीर मरीजों के लिए देहरादून, हल्द्वानी या )षिकेश ही अंतिम उम्मीद बनकर रह गए हैं। राज्य के अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र वर्षों से डाक्टरों और विशेषज्ञों की कमी से जूझ रहे हैं। कई अस्पतालों में भवन तो खड़े हैं, लेकिन भीतर न डाक्टर हैं, न मशीनें और न ही पर्याप्त स्टाफ। पहाड़ के अनेक इलाकों में स्वास्थ्य केंद्र केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं, जहां मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद सीधे शहर भेज दिया जाता है। स्वास्थ्य सुविधाओं की यह कमजोरी केवल इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पलायन पर भी पड़ रहा है, जिन गांवों में स्कूल और अस्पताल कमजोर हैं, वहां से परिवार स्थायी रूप से मैदानों की ओर बसने लगे हैं। पहाड़ का बुजुर्ग और गरीब वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित है, जो आर्थिक अभाव में बड़े शहरों का इलाज नहीं करा पाता। राजनीतिक दलों ने वर्षों से स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के दावे किए, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी सवालों के घेरे में है। एम्स )षिकेश, मेडिकल कालेजों और हेलीकाप्टर स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बड़ी योजनाओं का प्रचार जरूर हुआ, लेकिन दूरस्थ गांवों तक उनका प्रभाव सीमित नजर आता है। चुनाव नजदीक आते ही अब स्वास्थ्य के नाम पर नई घोषणाओं और वादों की तैयारी शुरू हो चुकी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में स्वास्थ्य माडल मैदानी राज्यों जैसा नहीं हो सकता। यहां मोबाइल हेल्थ यूनिट, टेलीमेडिसिन, पर्वतीय भत्ते के साथ डाक्टरों की स्थायी तैनाती और गांव आधारित स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करना जरूरी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कोरोना काल के बाद से उत्तराखंड के ग्रामीण मतदाताओं में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है। अब लोग केवल सड़क और बिजली पर संतुष्ट नहीं हैं। पलायन कर चुके प्रवासियों का एक बड़ा वर्ग, जो चुनावों में अपने पैतृक गांवों का रुख करता है, वह भी इस मुद्दे को हवा दे रहा है। उनका तर्क है कि अगर पहाड़ों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और अच्छे स्कूल हों, तो लोग अपनी जन्मभूमि छोड़ने को मजबूर नहीं होंगे। बाक्स भाजपा और कांग्रेस के अपने-अपने दावे चुनावी बिगुल बजने से पहले ही भाजपा और कांग्रेस सहित तमाम क्षेत्रीय दलों ने स्वास्थ्य के मोर्चे पर मोर्चाबंदी शुरू कर दी है। सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार राज्य में आयुष्मान उत्तराखंड योजना की सफलता, दूरदराज के क्षेत्रों में एयर एम्बुलेंस सेवा की शुरुआत और अल्मोड़ा व श्रीनगर जैसे पहाड़ी जिलों में मेडिकल कालेजों की स्थापना को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। सरकार का दावा है कि टेलीमेडिसिन के जरिए उन्होंने डाक्टरों की कमी को पाटने का प्रयास किया है। अगर सब ठीक रहा तो विपक्षी दल इस चुनावी समर में मशीन है पर आपरेटर नहीं, अस्पताल है पर डाक्टर नहीं के नारे के साथ जनता के बीच जा सकते हैं। विपक्ष का आरोप है कि पहाड़ों के जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक में सर्जन, महिला रोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ के पद खाली पड़े हैं। आपातकाल में मरीजों को सीधे देहरादून, )षिकेश या सुशीला तिवारी अस्पताल हल्द्वानी रेफर कर दिया जाता है, जिससे तीमारदारों की जेब और जान दोनों पर बन आती है।

कोई टिप्पणी नहीं: