बुधवार, 20 मई 2026

राजकीय शोक के बीच ‘जश्न के सुर’

पूर्व सीएम मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी के निधन पर पूरे प्रदेश में तीन दिन का राजकीय शोक देहरादून के निजी संस्थानों में कार्यक्रमों और उत्सवों की तस्वीरें सवाल खड़े कर रही यक्ष प्रश्न क्या निजी संस्थानों पर लागू नहीं होते सरकारी संवेदनाओं के कोई भी नियम देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ जननेता मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी के निधन पर प्रदेश सरकार ने तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। सरकारी भवनों पर झंडे झुके हैं, कई सरकारी कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए हैं और राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर शोक की भावना व्यक्त की जा रही है। लेकिन इसी बीच कुछ निजी शिक्षण संस्थानों में चल रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आयोजनों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दून स्थित डीआईटी जैसे बड़े संस्थानों में कथित तौर पर सामान्य गतिविधियों और आयोजनों की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब पूरा प्रदेश राजकीय शोक में है तो क्या ऐसे संस्थानों पर संवेदनशीलता और सरकारी निर्देश लागू नहीं होते? क्या निजी संस्थानों के लिए नियम और परंपराएं अलग हैं? राजकीय शोक केवल औपचारिक सरकारी आदेश नहीं होता, बल्कि वह समाज की सामूहिक संवेदना और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। खासकर जब बात ऐसे व्यक्ति की हो जिसने सेना और राजनीति दोनों में प्रदेश की पहचान बनाई हो। ऐसे समय में बड़े आयोजनों, उत्सवों और मनोरंजन कार्यक्रमों को सीमित करना सामाजिक मर्यादा का हिस्सा माना जाता रहा है। यही कारण है कि अब लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या प्रशासन ने निजी संस्थानों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे? और यदि किए थे तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ? यदि निर्देश जारी नहीं हुए तो यह भी प्रशासनिक गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है। शिक्षा संस्थानों को केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों और संवेदनशीलता का माध्यम भी माना जाता है। ऐसे में यदि राजकीय शोक के दौरान भी सामान्य उत्सव और मंचीय कार्यक्रम जारी रहें, तो यह नई पीढ़ी के सामने किस तरह का संदेश प्रस्तुत करता हैकृयह भी विचार का विषय बन गया है। अब निगाहें सरकार और प्रशासन पर टिक गई हैं। प्रदेश में कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने मांग उठाई है कि मामले का संज्ञान लिया जाए और स्पष्ट किया जाए कि राजकीय शोक के दौरान निजी संस्थानों की क्या जिम्मेदारी तय होती है। क्योंकि सवाल केवल एक कार्यक्रम का नहीं, बल्कि उस संवेदनशीलता का है जो किसी समाज की पहचान बनती है।

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