रविवार, 10 मई 2026
दिन में ‘बंदर’ और रात को ‘सुअर’
पहाड़ की दास्तान
---दिन में बंदरों पर पहरा, रात को सुअरों का आतंक
---पलायन के बीच खेती बचाना ग्रामीणों की चुनौती
---जंगली जानवरों से प्रभावित है पहाड़ के सभी गांव
देहरादून। मुझे अपने बचपन के वह दिन याद हैं जब पहाड़ छोटे-छोटे खेतों में जब सुबह की पहली किरण पड़ती थी, तो कभी यहाँ हरियाली मुस्कुराती थी। कोदा, झंगोरा और गहत की महक से मन तृप्त होता था। लेकिन आज मंजर बदल चुका है। अब पहाड़ में सुबह लोग हल की मूंठ नहीं थामते, बल्कि हाथ में गुलेल और पत्थर लेकर बंदरों को भगाने के साथ सुबह की शुरूआत होती है।
बता दें कि पहाड़ की सुबह कभी खेतों में हरियाली, बैलों की घंटियों और धान-गेहूं की खुशबू से शुरू होती थी। गांव की महिलाएं पहाड़ के पगडंडियों वाले खेतों की ओर निकलती थीं और यहां के पुरूष अपनी मेहनत से पत्थरों के बीच अनाज बोते थे। लेकिन आज वही खेत सूने पड़े हैं। बंदरों और जंगली सुअरों ने पहाड़ और पहाड़ के लोगों की बची-खुची उम्मीद भी रौंद दी है।
उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में खेती अब संघर्ष बन चुकी है। किसान दिन-रात मेहनत कर फसल तैयार करता है, लेकिन कटाई से पहले ही बंदरों के झुंड और जंगली सुअर खेतों में घुसकर सब कुछ बर्बाद कर देते हैं। मक्का, गेहूं, आलू, मंडुवा और सब्जियां अब इंसानों से ज्यादा जंगली जानवरों का भोजन बन रही हैं।
रुद्रप्रयाग जिले के रूमसी गांव के जगतराम कहते हैं अब खेती नहीं, जंग लड़ रहे हैं। यह दर्द अकेले उनका नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी अंचल का है। दिन के उजाले में बंदरों की टोली हमला करती है। वह केवल अनाज नहीं खाते, बल्कि फसल को तहस-नहस कर देते हैं। छोटे-छोटे बच्चों की तरह पाली गई पौध को जब बंदर उखाड़ कर फेंक देते हैं, तो किसान की आंखों में आंसू नहीं, एक गहरी शून्यता उतर आती है।
सूरज ढलते ही जंगली सुअर सामने आ जाते है। टिन के कनस्तरों को पीटकर सुअरों को भगाने की कोशिश होती है, लेकिन अक्सर सुअर कुछ ही मिनटों में पूरी मेहनत को मिट्टी में मिला देते हैं। आज पहाड़ में जंगली जानवरों के डर से खेती छोड़ने वाले परिवारों की संख्या बढ़ती जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले जंगल और गांव के बीच संतुलन था, लेकिन अब जंगलों का दायरा बदलने और मानव हस्तक्षेप बढ़ने से जंगली जानवर आबादी की ओर आने लगे हैं। आज के समय में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई गांवों में लोगों ने खेती छोड़ दी है, जो खेत कभी अन्न उगाते थे, वहां अब घास और झाड़ियां नजर आती हैं। गांव की बूढ़ी आंखें आज भी उस दौर को याद करती हैं, जब पहाड़ आत्मनिर्भर था और खेत जीवन की पहचान थे। अगर ऐसा ही रहा तो आने वाली पीढ़ियां पहाड़ के खेतों को केवल किताबों में ही हरे-भरे देखने और पढ़ने के लिए मजबूर हो जाएगी।
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