रविवार, 10 मई 2026
डिजिटल’ चमक बनाम ‘जमीनी’ सच्चाई
--देवभूमि में सियासत अब केवल पहाड़ों की पगडंडियों तक सीमित नहीं रही
--हाई-स्पीड इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ‘डिजिटल वार’ में हुई तब्दील
--उत्तराखंड की राजनीति में होने वाला है ‘डेटा’ और ‘डेमोग्राफी’ का बड़ा खेल
देहरादून। चुनावी साल में देवभूमि की सियासत अब केवल पहाड़ों की पगडंडियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह हाई-स्पीड इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए ‘डिजिटल वार’ में तब्दील हो चुकी है। आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति में ‘डेटा’ और ‘डेमोग्राफी’ का बड़ा खेल होने वाला है। डिजिटल माध्यमों से सूचनाएं फैल रही हैं, लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव में वोट उसी दल को मिलेगा जो पहाड़ की धूल और धूप में जनता के बीच खड़ा होग।
बता दें कि राज्य सरकार और राजनीतिक दल लगातार ‘डिजिटल उत्तराखंड’ के नारे को आगे बढ़ा रहे हैं। ई-गवर्नेंस, आनलाइन सेवाएं, स्मार्ट सिटी, और सोशल मीडिया पर सक्रियताकृइन सबके जरिए विकास की एक आधुनिक तस्वीर पेश की जा रही है। सरकारी योजनाओं की जानकारी अब मोबाइल एप और पोर्टल के जरिए गांव-गांव तक पहुंचाने का दावा किया जा रहा है। नेताओं की डिजिटल रैलियां, फेसबुक लाइव और व्हाट्सऐप कैंपेन चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
डिजिटल चमक-धमक के बावजूद उत्तराखंड की जीत का रास्ता आज भी उन्हीं कठिन चढ़ाइयों और गांवों से होकर गुजरता है। प्रदेश में इस समय भू-कानून और मूल निवास इस वक्त का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। जमीन पर लोग अपनी संस्कृति और संसाधनों को बचाने के लिए लामबंद हो रहे हैं। यह मुद्दा सोशल मीडिया पर तो है ही, लेकिन इसकी जड़ें पहाड़ के हर घर के चूल्हे तक पहुंच चुकी हैं। इसके साथ ही पलायन और रोजगार भी बड़ा मुद्दा बन गया है। ‘खंडित’ होते गांवों को बचाना और स्थानीय युवाओं को पहाड़ में ही रोजगार देना आज भी सबसे बड़ी चुनौती है। सड़कों का जाल बिछने के बावजूद, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में पलायन एक कड़वी सच्चाई बनी हुई है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह डिजिटल क्रांति पहाड़ के आखिरी गांव तक पहुंच पाई है? कई दूरस्थ इलाकों में आज भी नेटवर्क की समस्या, इंटरनेट की धीमी गति और डिजिटल साक्षरता की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है। डिजिटल दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और कहानी बयां करती है। उत्तराखंड में ’पलायन’ सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। गांव खाली हो रहे हैं और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। बेरोजगारी का संकट भी गहराता जा रहा है, खासकर शिक्षित युवाओं में असंतोष बढ़ रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंता का विषय है। पहाड़ी क्षेत्रों में अस्पतालों की कमी, डाक्टरों की अनुपलब्धता और आपातकालीन सेवाओं का अभाव आज भी लोगों के लिए परेशानी का कारण है। कई गांवों में आज भी सड़क और परिवहन की सुविधा सीमित है। शिक्षा के क्षेत्र में भी स्कूलों की स्थिति, शिक्षकों की कमी और संसाधनों का अभाव जमीनी सच्चाई को उजागर करता है।
राजनीतिक दल अब यह समझ चुके हैं कि केवल डिजिटल प्रचार से चुनाव नहीं जीते जा सकते। इसलिए एक ओर जहां सोशल मीडिया पर आक्रामक कैंपेन चल रहा है, वहीं दूसरी ओर ‘डोर-टू-डोर’ संपर्क, जनसभाएं और स्थानीय मुद्दों पर फोकस भी बढ़ाया जा रहा है। उत्तराखंड की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह डिजिटल विकास और जमीनी जरूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाए। जब तक गांवों में रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति नहीं सुधरेगी, तब तक डिजिटल दावों की चमक अधूरी ही मानी जाएगी। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता ‘डिजिटल वादों’ को ज्यादा तवज्जो देती है या ‘जमीनी मुद्दों’ को प्राथमिकता देती है या नहीं।
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