गुरुवार, 18 जून 2026
70 सीटें, चार कोने और एक गद्दी
उत्तराखंड की सियासत में तीसरे-चौथे मोर्चे का खौफ, बदलेगी राष्ट्रीय दलों की रणनीति
राष्ट्रीय दलों के वोट बैंक में सेंध लगाने को तैयार क्षेत्रीय और बाहरी सूरमा
उत्तराखंड की 70 सीटों पर आप व यूकेडी की एंट्री से उड़े दिग्गजों के तोते
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। अब तक मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा माना जा रहा था, लेकिन आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल की सक्रियता ने चुनावी रण को त्रिकोणीय ही नहीं बल्कि कई सीटों पर चतुष्कोणीय बनाने के संकेत दे दिए हैं। आप ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है, जबकि यूकेडी पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि वह उत्तराखंडियत, भू-कानून, मूल निवास और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों पर पूरे दमखम के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी। भले ही आप और यूकेडी सरकार बनाने की स्थिति में न दिखें, लेकिन दोनों दल भाजपा और कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि दोनों राष्ट्रीय दलों ने अपनी चुनावी रणनीति को नए सिरे से तैयार करना शुरू कर दिया है।
भाजपा को चिंता इस बात की है कि शहरी क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य को मुद्दा बनाकर मध्यम वर्ग और युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश करेगी। दूसरी ओर कांग्रेस को डर है कि सत्ता विरोधी मतों का बिखराव सीधे भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है। यूकेडी की सक्रियता भी दोनों दलों के लिए चुनौती है। उत्तराखंड आंदोलन की विरासत रखने वाला यह दल पर्वतीय क्षेत्रों में भू-कानून, मूल निवास, पलायन और स्थानीय रोजगार जैसे भावनात्मक मुद्दों को फिर से चुनावी विमर्श के केंद्र में लाने की तैयारी में है।
दिल्ली और पंजाब के बाद उत्तराखंड में संगठन को नए सिरे से खड़ा करने में जुटी आम आदमी पार्टी ने नई प्रदेश इकाई के गठन के साथ बड़ा संदेश दिया है कि वह केवल औपचारिक उपस्थिति नहीं बल्कि हर विधानसभा क्षेत्र में मजबूत लड़ाई लड़ेगी। पार्टी का दावा है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और रोजगार को चुनाव का मुख्य एजेंडा बनाएगी और सभी 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी।
यूकेडी लंबे समय से कह रही है कि राष्ट्रीय दल उत्तराखंड के मूल मुद्दों को भूल चुके हैं। पार्टी का फोकस सशक्त भू-कानून, मूल निवास 1950 आधारित नीति की मांग, पलायन रोकने की ठोस योजना, पर्वतीय जिलों में रोजगार, राज्य आंदोलन की मूल भावना पर रहेगा। यदि यूकेडी कुछ क्षेत्रों में प्रभावी प्रदर्शन करती है तो वह कई सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों का गणित बिगाड़ सकती है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार देहरादून, हरिद्वार, )षिकेश, रुड़की, काशीपुर, हल्द्वानी, रुद्रपुर और कोटद्वार जैसे शहरी क्षेत्रों में आप अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास करेगी, जबकि यूकेडी का प्रभाव टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है।
दोनों बड़े दल अब केवल एक-दूसरे पर हमला करने तक सीमित नहीं रह सकते। उन्हें छोटे दलों के प्रभाव को भी ध्यान में रखकर उम्मीदवार चयन, संगठन विस्तार और स्थानीय मुद्दों पर अधिक फोकस करना होगा। भाजपा बूथ स्तर पर संगठन मजबूत कर रही है, जबकि कांग्रेस भी जिलों और ब्लाकों में संगठनात्मक बैठकों के जरिए चुनावी तैयारी तेज कर चुकी है।
उत्तराखंड की राजनीति में अब केवल भाजपा बनाम कांग्रेस का सीधा मुकाबला नहीं दिख रहा। आम आदमी पार्टी की 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा और यूकेडी की आक्रामक तैयारी ने चुनावी समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। सरकार कौन बनाएगा, इसका उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि तीसरे और चौथे मोर्चे की सक्रियता भाजपा और कांग्रेस दोनों की चुनावी रणनीति को प्रभावित करेगी। यदि आप और यूकेडी अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावी वोट हासिल करते हैं, तो 2027 का चुनाव उत्तराखंड के इतिहास के सबसे दिलचस्प और बहुकोणीय चुनावों में से एक साबित हो सकता है।
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