बुधवार, 17 जून 2026
विकास की ‘बिजली’ चमकेगी और दर्द देगा ‘विस्थापन’
उत्तराखंड-हिमाचल बार्डर पर किशाऊ बांध महापरियोजना की सुगबुगाहट
बरसों की कागजी दौड़ व बैठकों के दौर के बाद आखिरकार जमीन पर उतरेगी महापरियोजना
उत्तराखंड-हिमाचल ही नहीं पूरे उत्तर भारत की बिजली, पानी और सिंचाई का संकट होगा कम
हजारों को रोजगार, क्षेत्र के विकास की जगी उम्मीद, पर्यावरण की चिंता व विस्थापन का दर्द
देहरादून। यमुना नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना को उत्तराखंड की सबसे महत्वाकांक्षी जलविद्युत और बहुउद्देशीय परियोजनाओं में गिना जाता है। वर्षों से फाइलों और बैठकों में उलझी यह परियोजना अब धरातल पर उतरने की दिशा में आगे बढ़ रही है। नई दिल्ली में छह राज्यों के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में इस परियोजना को हरी झंडी मिलने के साथ छह राज्यों के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर हुए। केद्र सरकार का दावा है कि किशाऊ बांध न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे उत्तर भारत की ऊर्जा, सिंचाई और पेयजल जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। वहीं स्थानीय स्तर पर इसे विकास और चुनौतियों के दोहरे पहलू के रूप में देखा जा रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर यमुना नदी पर बनने वाली यह परियोजना लंबे समय से चर्चा में रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परियोजना तय समय पर पूरी होती है तो यह प्रदेश के आर्थिक और सामाजिक विकास की तस्वीर बदल सकती है।
उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश कहा जाता है। राज्य की नदियां बिजली उत्पादन की अपार संभावनाएं रखती हैं। किशाऊ बांध परियोजना से बड़ी मात्रा में बिजली उत्पादन होने की संभावना है, जिससे उत्तराखंड की ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृ(ि होगी। ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इससे न केवल प्रदेश की जरूरतें पूरी होंगी बल्कि अतिरिक्त बिजली अन्य राज्यों को भी उपलब्ध कराई जा सकेगी। इससे राज्य की आय में भी वृ(ि होने की उम्मीद है। किशाऊ परियोजना का महत्व केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका सबसे बड़ा लाभ यमुना बेसिन से जुड़े क्षेत्रों को मिलेगा। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में पेयजल और सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल उपलब्ध कराने में यह परियोजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार जल संरक्षण और जल प्रबंधन की दृष्टि से भी यह परियोजना भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। जलवायु परिवर्तन और घटते जल स्रोतों के दौर में बड़े जलाशयों का महत्व और बढ़ गया है। किसी भी बड़ी परियोजना की तरह किशाऊ बांध से भी हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना है। निर्माण कार्यों में स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। साथ ही सड़क, पुल, संचार और अन्य आधारभूत सुविधाओं का विस्तार भी होगा। परियोजना क्षेत्र में बाजार, परिवहन और अन्य आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने की उम्मीद है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है। जहां एक ओर परियोजना विकास के नए अवसर लेकर आ रही है, वहीं दूसरी ओर प्रभावित गांवों के लोगों की चिंताएं भी कम नहीं हैं। बांध बनने से कई गांवों और कृकृषि भूमि के जलमग्न होने की आशंका जताई जाती रही है।
स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि पुनर्वास और मुआवजा नीति को पूरी पारदर्शिता के साथ लागू किया जाए। उनका कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन प्रभावित परिवारों के अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हिमालयी क्षेत्र पहले से ही भूस्खलन, भू-धंसाव और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणविदों की चिंताएं भी सामने आती रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना के निर्माण और संचालन के दौरान पर्यावरणीय मानकों का कड़ाई से पालन करना होगा। नदी पारिस्थितिकी, वन क्षेत्र और जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों का लगातार अध्ययन आवश्यक होगा।
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पर्यटन, कृकृषि और जलविद्युत पर आधारित है। किशाऊ परियोजना राज्य के राजस्व और औद्योगिक विकास को नई दिशा दे सकती है। यदि परियोजना के लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचते हैं तो यह सीमांत क्षेत्रों में विकास का नया अध्याय लिख सकती है। किशाऊ बांध परियोजना को लेकर उम्मीदें भी बड़ी हैं और आशंकाएं भी। सरकार इसे विकास का इंजन मान रही है, जबकि प्रभावित क्षेत्र के लोग अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं। आने वाले वर्षों में यह परियोजना केवल एक बांध नहीं होगी, बल्कि यह तय करेगी कि उत्तराखंड विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में कितना सफल होता है। यदि पुनर्वास, पर्यावरण और स्थानीय हितों का ध्यान रखते हुए परियोजना को आगे बढ़ाया गया तो किशाऊ बांध वास्तव में उत्तराखंड की तस्वीर बदलने वाला साबित हो सकता है।
उत्तराखंड के विकास के इतिहास में कई परियोजनाएं आईं और गईं, लेकिन किशाऊ बांध को लेकर जो उम्मीदें हैं, वह इसे एक साधारण परियोजना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि यह सपना धरातल पर कब और किस रूप में साकार होता है।
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