मंगलवार, 16 जून 2026
‘तकली’ की घूमती धुरी अब थमी
पहाड़ की ऊन, भेड़-बकरियां और सदियों पुरानी आजीविका विलुप्ति के कगार पर
कभी हर आंगन में गूंजती थी तकली की खनक, आज नई पीढ़ी को इसका नाम तक नहीं मालूम
कभी थी गढ़वाल और कुमाऊं की पारंपरिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा
देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल उसके मंदिरों, मेलों और लोकगीतों में ही नहीं बसती, बल्कि उन छोटे-छोटे औजारों में भी जीवित रही है जिन्होंने सदियों तक लोगों की आजीविका को सहारा दिया। इन्हीं में से एक थी तकली जो पहाड़ की महिला और पुरूषों के हाथों में घूमती थी और भेड़ों की ऊन को धागे में बदल देती थी। यही धागा आगे चलकर गर्म कपड़ों, पट्टू, थुलमा, पंखी और कई पारंपरिक वस्त्रों का आधार बनता था। आज समय बदल गया है। मशीनों से बने कपड़ों और बाजार की चकाचौंध के बीच तकली की धीमी गति कहीं खो गई है। पहाड़ के गांवों में कभी आम दृश्य रही तकली अब संग्रहालयों और बुजुर्गों की यादों तक सिमटती जा रही है।
एक समय था जब गढ़वाल और कुमाऊं के अधिकांश गांवों में भेड़-बकरियां पालना आम बात थी। ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले परिवार सैकड़ों भेड़ों के झुंड रखते थे। गर्मियों में ये झुंड बुग्यालों की ओर निकल जाते और सर्दियों में निचले इलाकों की ओर लौट आते। भेड़ों से प्राप्त ऊन केवल घरेलू जरूरतों को ही पूरा नहीं करती थी, बल्कि व्यापार का भी महत्वपूर्ण साधन थी। ग्रामीण ऊन बेचकर अपनी आर्थिक जरूरतें पूरी करते थे। कई परिवारों की पूरी आजीविका इसी पर निर्भर थी।
भेड़ों से ऊन काटने के बाद उसे साफ किया जाता था। फिर गांव की महिलाएं और पुरूष तकली की मदद से उस ऊन को बारीक धागे में बदलती थीं। घर के आंगन, चौक और खेतों की मेड़ों पर बैठकर महिलाएं बातचीत के साथ-साथ तकली चलाती थीं। यह केवल काम नहीं था बल्कि सामाजिक जीवन का हिस्सा था। लोकगीतों और कहानियों के बीच तकली घूमती रहती और धीरे-धीरे ऊन मजबूत धागे में बदल जाती। यही धागा बाद में करघों पर कपड़ों का रूप लेता था। सड़कें बढ़ीं, बाजार गांवों तक पहुंचे और सस्ते मशीन निर्मित कपड़े उपलब्ध होने लगे। इसके बाद ऊन और हाथ से बने वस्त्रों की मांग घटने लगी। भेड़ पालन में बढ़ती लागत, चरागाहों का सिमटना और युवा पीढ़ी का अन्य रोजगारों की ओर रुझान भी इस परंपरा के कमजोर होने का बड़ा कारण बना। आज कई गांवों में भेड़ों के बड़े झुंड दिखाई नहीं देते। तकली चलाने वाली बुजुर्ग महिलाएं और पुरूष तो हैं, लेकिन सीखने वाले हाथ नहीं हैं।
तकली का गायब होना केवल एक औजार का गायब होना नहीं है। इसके साथ एक पूरी जीवनशैली, लोक ज्ञान और पारंपरिक अर्थव्यवस्था भी खत्म होती जा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भेड़ पालन, ऊन उत्पादन और पारंपरिक हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जाए तो यह रोजगार का नया माध्यम बन सकता है। पर्यटन और हस्तशिल्प बाजारों से जोड़कर इस विरासत को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
70 वर्षीय ग्रामीण महिलाएं आज भी याद करती हैं कि कैसे शाम ढलते ही घर के आंगन में बैठकर तकली चलाई जाती थी। सर्दियों के लिए थुलमा और पंखी तैयार किए जाते थे। गांव के हर घर में ऊन की खुशबू और मेहनत की गर्माहट महसूस होती थी। अब वह दिन केवल स्मृतियों में हैं। तकली की घूमती धुरी धीरे-धीरे थम रही है और उसके साथ पहाड़ की एक अनमोल विरासत भी खामोश होती जा रही है।
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