मंगलवार, 16 जून 2026

‘मिक्सी’ के शोर में खो गया पहाड़ के ‘सिलबट्टे’ स्वाद

केवल भोजन का जरिया नहीं, बल्कि पहाड़ की विरासत और जीवंतता की पहचान थी रसोई भांग के बीज, लहसुन और हरी मिर्च के साथ सिलबट्टे पर पिसे नमक का स्वाद आज भी यादों में जिंदा आधुनिक दौर में भी हैं लोग पहाड़ के इस पारंपरिक और सेहतमंद स्वाद के मुरीद देहरादून। पहाड़ की रसोई केवल भोजन बनाने की जगह नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और स्वाद का संगम है। इस रसोई की पहचान रहे सिलबट्टे की खट-खट की आवाज आज भले कम सुनाई देती हो, लेकिन इसके स्वाद की चर्चा आज भी गांव से लेकर शहर तक होती है। पहाड़ के घरों में कभी हर दिन सिलबट्टे पर मसाले, नमक, लहसुन, हरी मिर्च और भांग के बीज पीसे जाते थे। इनसे बनने वाली चटनियों और व्यंजनों का स्वाद ऐसा होता था कि खाने वाला उंगलियां चाटता रह जाए। सिलबट्टा केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि पहाड़ की पाक परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा है। पहाड़ी महिलाएं सुबह-सुबह सिल पर मसाले पीसती थीं। मसालों के पिसने के साथ ही उनकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी। यही वजह थी कि पहाड़ के भोजन में एक अलग ही सोंधापन और प्राकृतिक स्वाद महसूस होता था। सिलबट्टे पर मसाले पीसने से उनमें मौजूद प्राकृतिक तेल और सुगंध बरकरार रहती है। मिक्सर की तेज गति से पैदा होने वाली गर्मी मसालों के स्वाद और खुशबू को कुछ हद तक प्रभावित कर देती है, जबकि सिलबट्टे पर धीरे-धीरे पिसे मसाले अपना मूल स्वाद बनाए रखते हैं। यही कारण है कि सिलबट्टे की चटनी और मिक्सर की चटनी के स्वाद में साफ अंतर महसूस होता है। उत्तराखंड की प्रसि( भांग की चटनी, तिल की चटनी, लहसुन-मिर्च का नमक और भांगजीरा से तैयार मसाले जब सिलबट्टे पर पिसते हैं तो उनमें एक अलग ही स्वाद पैदा होता है। पहाड़ के बुजुर्ग आज भी दावा करते हैं कि सिलबट्टे पर पिसी भांग की चटनी का मुकाबला कोई आधुनिक मशीन नहीं कर सकती। गांवों में आज भी कई घर ऐसे हैं जहां पारंपरिक व्यंजन बनाते समय सिलबट्टे का इस्तेमाल किया जाता है। शादी-ब्याह और विशेष अवसरों पर बनने वाले व्यंजनों के लिए लोग आज भी सिलबट्टे को प्राथमिकता देते हैं। इसका कारण केवल स्वाद नहीं, बल्कि उससे जुड़ी भावनाएं और पारंपरिक पहचान भी है। हालांकि बदलती जीवनशैली और समय की कमी के कारण सिलबट्टे की जगह मिक्सर ने ले ली है, लेकिन इसके बावजूद पहाड़ की नई पीढ़ी भी पारंपरिक स्वाद को पहचानने लगी है। कई लोग गांव जाने पर सिलबट्टे पर बनी चटनी और मसालों का स्वाद लेने की इच्छा रखते हैं। यही वजह है कि कुछ परिवारों ने आज भी अपनी रसोई में सिलबट्टे को संभालकर रखा हुआ है। सिलबट्टा पहाड़ की उस विरासत का प्रतीक है, जो बताती है कि स्वाद केवल मसालों में नहीं, बल्कि उन्हें तैयार करने की प्रक्रिया में भी छिपा होता है। आधुनिकता की दौड़ में भले सिलबट्टे की खट-खट धीमी पड़ गई हो, लेकिन उसके स्वाद की मिठास आज भी लोगों की यादों में जिंदा है।

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