रविवार, 21 जून 2026

भीमलः उत्तराखंड के पहाड़ों का ‘कल्पवृक्ष’

भीमल के पेड़ में दवा भी, सहारा भी और आजीविका भी पहाड़ की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रहा भीमल का पेड़ औषधीय गुणों से लेकर मजबूत रेशे तक हर रूप में अनमोल देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में प्रकृति ने ऐसी अनेक धरोहरें दी हैं, जिन्होंने सदियों से ग्रामीण जीवन को आत्मनिर्भर बनाया। इन्हीं में से एक है भीमल का पेड़। पहाड़ के बुजुर्ग इसे केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि जीवन का साथी मानते हैं। इसकी छाल से निकलने वाला मजबूत रेशा हो, पत्तियों से मिलने वाला पौष्टिक चारा, लकड़ी का घरेलू उपयोग या फिर इसके औषधीय गुणकृभीमल का हर हिस्सा किसी न किसी रूप में मानव और पशुओं के लिए उपयोगी रहा है। एक समय था जब पहाड़ के लगभग हर गांव के आसपास भीमल के पेड़ सहज ही दिखाई देते थे। गांव की महिलाएं इसकी छाल से रेशा निकालकर मजबूत रस्सियां बनाती थीं। इन रस्सियों का उपयोग खेतों में, पशुपालन में, घास और लकड़ी बांधने, पुल बनाने और घरेलू कार्यों में वर्षों तक किया जाता था। आज भले ही नायलॉन और प्लास्टिक ने उनकी जगह ले ली हो, लेकिन भीमल की रस्सी की मजबूती और टिकाऊपन का मुकाबला आज भी मुश्किल माना जाता है। पहाड़ की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक पशुपालन पर आधारित रही है। भीमल की मुलायम और पौष्टिक पत्तियां गाय, बैल, बकरी और भैंस के लिए उत्कृष्ट चारे के रूप में जानी जाती हैं। विशेषकर सर्दियों में, जब हरा चारा कम उपलब्ध होता है, तब भीमल की पत्तियां पशुओं के पोषण का बड़ा आधार बनती हैं। यही कारण है कि ग्रामीण परिवार आज भी अपने खेतों की मेड़ों और घरों के आसपास भीमल लगाना पसंद करते हैं। आयुर्वेद और लोक चिकित्सा में भीमल का विशेष महत्व है। ग्रामीण परंपराओं में इसकी छाल और पत्तियों का उपयोग घाव भरने, सूजन कम करने तथा त्वचा संबंधी समस्याओं में किया जाता रहा है। माना जाता है कि इसकी छाल में ऐसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि किसी भी औषधीय उपयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक मानी जाती है। भीमल केवल इंसान के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी वरदान है। इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़कर रखती हैं, जिससे पहाड़ी ढलानों पर कटाव कम होता है। वर्षा के पानी को भूमि में समाहित करने में भी यह वृक्ष मददगार माना जाता है। यही कारण है कि जल संरक्षण और भूस्खलन रोकने के प्रयासों में भी भीमल जैसे स्थानीय वृक्षों को महत्वपूर्ण माना जाता है। पहले गांवों में महिलाएं भीमल के रेशे से रस्सी, डोरी, जाल और कई हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करती थीं। इन उत्पादों की स्थानीय बाजारों में अच्छी मांग रहती थी। यदि आधुनिक डिजाइन और विपणन से जोड़ा जाए, तो भीमल आधारित हस्तशिल्प आज भी ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार का सशक्त माध्यम बन सकता है। बदलती जीवनशैली, पलायन और प्लास्टिक उत्पादों के बढ़ते उपयोग के कारण भीमल के पेड़ों की संख्या और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान में लगातार कमी आ रही है। नई पीढ़ी भीमल की उपयोगिता से धीरे-धीरे अनजान होती जा रही है। वन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो पहाड़ अपनी एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर खो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भीमल के पौधों का बड़े पैमाने पर रोपण किया जाए और इसके रेशे व अन्य उत्पादों का वैज्ञानिक ढंग से मूल्य संवर्धन किया जाए, तो यह पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती दे सकता है। जैविक और प्राकृतिक उत्पादों की बढ़ती मांग के दौर में भीमल से बने उत्पाद देश-विदेश के बाजारों में अपनी अलग पहचान बना सकते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग कहते हैंकृजिस गांव में भीमल है, वहां पशुधन भी स्वस्थ रहता है और प्रकृति भी खुशहाल रहती है। आधुनिकता की दौड़ में यदि इस वृक्ष और इससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान को सहेजा जाए, तो भीमल आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृ( लोक संस्कृति, आत्मनिर्भरता और प्रकृति से जुड़ाव का जीवंत प्रतीक बना रहेगा।

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