शुक्रवार, 26 जून 2026
‘मुद्दे’ गायब और बयानों में ‘उबाल’
नेताओं को एक-दूसरे की कमियां गिनाने से ही फुर्सत नहीं मिल रही
चुनावी मौसम आने वाला है, इसलिए मुद्दे नहीं, बयान उगलने लगे नेता
भाजपा-कांग्रेस और यूकेडी पर हमलावर, कांग्रेस के निशाने पर प्रधानमंत्री तक
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में काफी समय शेष है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी गमरग् अभी से महसूस की जाने लगी है। विकास, रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर बहस होने के बजाय राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तीखी बयानबाजी का दौर शुरू हो चुका है। भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के नेताओं की भाषा में बढ़ती तल्खी इस बात का संकेत है कि चुनावी रणभूमि की तैयारी शुरू हो गई है।
हाल के दिनों में भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने कांग्रेस और उत्तराखंड क्रांति दल पर हमलों की धार तेज कर दी है। भाजपा नेताओं का दावा है कि विपक्ष के पास जनता के सामने रखने के लिए कोई ठोस एजेंडा नहीं है और इसलिए वह केवल सरकार की आलोचना तक सीमित है। दूसरी ओर कांग्रेस भाजपा सरकार और केंद्र सरकार पर लगातार हमले बोल रही है। कई मौकों पर कांग्रेस नेताओं के बयान सीधे प्रधानमंत्री तक को निशाने पर लेते दिखाई दिए हैं। जवाब में भाजपा इसे प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर हमला बताकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है।
आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा चाहती है कि चुनावी विमर्श राष्ट्रीय नेतृत्व, राष्ट्रवाद और केंद्र सरकार की योजनाओं के इर्द-गिर्द घूमे। वहीं कांग्रेस कोशिश कर रही है कि चुनाव को स्थानीय मुद्दों और सरकार विरोधी भावनाओं पर केंद्रित किया जाए। यूकेडी क्षेत्रीय अस्मिता और राज्य आंदोलन की मूल भावना को पुनर्जीवित करने की कोशिश में है।
दिलचस्प बात यह है कि चुनावी माहौल गर्म करने में सोशल मीडिया की भूमिका भी तेजी से बढ़ी है। नेताओं के भाषणों के छोटे-छोटे वीडियो क्लिप, बयान और प्रतिक्रियाएं कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच रही हैं। राजनीतिक दल जानते हैं कि आज की राजनीति में बयान केवल सभा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सोशल मीडिया के जरिए दूर-दराज के गांवों तक पहुंच जाता है। यही कारण है कि हर बयान अब एक सुनियोजित राजनीतिक संदेश बनता जा रहा है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या जनता भी इसी प्रकार की राजनीति चाहती है? प्रदेश के सामने आज भी बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और आपदा प्रबंधन जैसी गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। पहाड़ के खाली होते गांव, युवाओं के रोजगार का संकट और बढ़ती शहरी अव्यवस्थाएं ऐसे मुद्दे हैं जिन पर ठोस बहस की अपेक्षा की जाती है। इसके बावजूद राजनीतिक दलों की प्राथमिकता फिलहाल एक-दूसरे पर हमले करने में अधिक दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव नजदीक आते ही बयानबाजी का स्तर और अधिक तीखा हो सकता है। पिछले चुनावों का इतिहास भी यही बताता है कि जैसे-जैसे मतदान का समय करीब आता है, व्यक्तिगत आरोप, राजनीतिक कटाक्ष और जुबानी हमले बढ़ने लगते हैं। इस बार भी उसके संकेत समय से पहले दिखाई देने लगे हैं।
भाजपा के लिए चुनौती दस वर्षों की सत्ता के बाद जनता के विश्वास को बनाए रखने की है। कांग्रेस के सामने खुद को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करने की चुनौती है। वहीं यूकेडी और अन्य छोटे दल अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में सभी दलों को लगता है कि आक्रामक राजनीति उन्हें चर्चा में बनाए रख सकती है।
हालांकि लोकतंत्र में स्वस्थ आलोचना और राजनीतिक बहस जरूरी मानी जाती है, लेकिन जब बहस मुद्दों से हटकर केवल आरोपों और व्यक्तिगत हमलों तक सीमित हो जाए तो जनता के वास्तविक सरोकार पीछे छूटने लगते हैं। उत्तराखंड की राजनीति इस समय ठीक उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तलवारें म्यान से बाहर निकाल दी हैं। अब देखना यह होगा कि आने वाले महीनों में चुनावी चर्चा विकास और जनहित के मुद्दों पर केंद्रित होती है या फिर आरोप-प्रत्यारोप की यह राजनीति ही पूरे चुनावी विमर्श पर हावी रहती है।
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