मंगलवार, 23 जून 2026

एजुकेशन हब में ‘मौत के जाल’

राजधानी देहरादून में हादसों को न्योता दे रहे हैं कई कोचिंग सेंटर और तंग गलियों में बने हास्टल बेसमेंट में क्लासरूम और संकरी गलियों में हास्टल और फायर सेफ्टी के नाम पर सिर्फ खानापूरी एजुकेशन हब के पीछे छिपा मौत का जाल,बिना पुलिस वेरिफिकेशन और एनओसी के चल रहा खेल दून में मोटी फीस और महंगे किराए की वसूली, लेकिन सुरक्षा के नाम पर है जीरो मैनेजमेंट देहरादून। राजस्थान के कोटा से लेकर दिल्ली के मुखर्जी नगर तक, कोचिंग सेंटरों में सुरक्षा को लेकर सवाल बार-बार उठते रहे हैं। लेकिन उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी स्थिति बहुत अलग नहीं दिखती। शहर में हजारों छात्र-छात्राएं प्रतियोगी परीक्षाओं, मेडिकल, इंजीनियरिंग, डिफेंस और अन्य कोर्सों की तैयारी के लिए आते हैं। इनके लिए कोचिंग संस्थानों के साथ-साथ पीजी, हास्टल और किराए के कमरों का एक विशाल नेटवर्क खड़ा हो चुका है। सवाल यह है कि क्या इन इमारतों में पढ़ने और रहने वाले छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित है, या फिर ये कोचिंग सेंटर किसी संभावित हादसे का इंतजार कर रहे लाक्षागृह बन चुके हैं? पिछले एक दशक में देहरादून उत्तर भारत के प्रमुख कोचिंग केंद्रों में शामिल हुआ है। शहर के नेहरू कालोनी, बल्लूपुर, प्रेमनगर, घंटाघर, राजपुर रोड और क्लेमेंटटाउन क्षेत्रों में सैकड़ों छोटे-बड़े कोचिंग संस्थान संचालित हो रहे हैं। इनके साथ हास्टल और पीजी की भी भरमार है। हजारों छात्र दूसरे जिलों और राज्यों से यहां आते हैं। लेकिन बढ़ती संख्या के मुकाबले सुरक्षा मानकों की निगरानी और अनुपालन पर सवाल लगातार उठते रहे हैं। सूरत कोचिंग सेंटर अग्निकांड के बाद 2019 में देहरादून और राज्य के अन्य शहरों में बड़े पैमाने पर फायर सेफ्टी जांच अभियान चलाया गया था। उस दौरान देहरादून में 55 कोचिंग सेंटरों, होटलों और व्यावसायिक भवनों को अग्नि सुरक्षा इंतजामों की कमी के कारण नोटिस जारी किए गए थे। जांच में फायर एक्सटिंग्विशर, फायर अलार्म और आपातकालीन निकासी व्यवस्था जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी सामने आई थी। इसी अवधि में राज्य स्तर पर कई कोचिंग संस्थानों को फायर एनओसी और सुरक्षा मानकों का पालन न करने पर चेतावनी दी गई थी। शहर में बड़ी संख्या में ऐसे कोचिंग सेंटर संचालित हैं जो व्यावसायिक या आवासीय इमारतों के ऊपरी तल पर चल रहे हैं। कई जगहों पर प्रवेश और निकास के लिए केवल एक संकरा रास्ता है। बिजली के तारों का जाल, सीमित वेंटिलेशन और भीड़भाड़ वाली कक्षाएं किसी भी आपात स्थिति में खतरा बढ़ा सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आग लगने की स्थिति में सबसे बड़ा जोखिम निकासी का होता है। यदि एक ही सीढ़ी या दरवाजा हो और सैकड़ों छात्र मौजूद हों, तो भगदड़ की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी देहरादून के कई कोचिंग संस्थानों का निरीक्षण करने के बाद सरकार को पत्र लिखकर संचालन के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने की मांग की थी। आयोग ने पाया था कि कई संस्थानों में मानक संचालन प्रक्रिया और छात्रों की सुरक्षा से जुड़े बुनियादी प्रावधानों का अभाव है। आयोग ने फीस, बुनियादी सुविधाओं और छात्र सुरक्षा पर नियमन की जरूरत बताई थी। केंद्र सरकार की कोचिंग सेंटर नियमन संबंधी गाइडलाइन स्पष्ट कहती है कि कोचिंग भवनों को फायर सेफ्टी और बिल्डिंग सेफ्टी मानकों का पालन करना होगा और संबंधित अधिकारियों से सुरक्षा प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा। पर्याप्त जगह, वेंटिलेशन, प्राथमिक उपचार और आपातकालीन सहायता व्यवस्था भी अनिवार्य है। लेकिन सवाल यह है कि देहरादून में चल रहे सभी कोचिंग सेंटर और उनसे जुड़े हास्टल क्या वास्तव में इन मानकों पर खरे उतरते हैं? देहरादून में बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान हैं जो कोचिंग के साथ हास्टल सुविधा भी उपलब्ध कराते हैं। इनमें सैकड़ों छात्र एक ही परिसर में रहते हैं। ऐसे में केवल क्लासरूम ही नहीं, बल्कि हास्टल, मेस, रसोई, बिजली व्यवस्था और आपातकालीन निकास मार्गों की भी नियमित जांच आवश्यक है। देहरादून को शिक्षा नगरी कहा जाता है। लेकिन यदि किसी भवन में फायर एनओसी नहीं है, निकासी का पर्याप्त इंतजाम नहीं है, या क्षमता से अधिक छात्रों को बैठाया जा रहा है, तो वह भवन पढ़ाई का केंद्र कम और संभावित दुर्घटना का केंद्र अधिक बन सकता है। कोटा, सूरत और दिल्ली जैसे हादसों ने देश को चेताया है। अब सवाल यह है कि क्या देहरादून प्रशासन, नगर निकाय, फायर विभाग और शिक्षा विभाग मिलकर व्यापक सुरक्षा आडिट करेंगे, या फिर किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही व्यवस्थाएं जागेंगी? क्योंकि जब हजारों छात्र अपने सपनों के साथ इन इमारतों में प्रवेश करते हैं, तो उन्हें सिर्फ शिक्षा ही नहीं, सुरक्षा का भरोसा भी मिलना चाहिए।

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