मंगलवार, 23 जून 2026

‘अतीत’ बने पहाड़ के ‘कोठार’

सिर्फ अनाज का भंडार नहीं, स्मृतियों का अनमोल संसार था कोठार का एक कोना सीमेंट के जंगलों में खो गई काष्ठशिल्प की विरासत,आधुनिक जीवनशैली ने छीनी पहचान पुरखों की थाती में नई पीढ़ी के लिए सिर्फ कौतूहल बनकर रह गए हैं आज कोठार देहरादून। पहाड़ के पुराने घरों में एक कमरा ऐसा होता था, जो सिर्फ कमरा नहीं होता था। वह घर की समृ(ि का प्रतीक होता था, परिवार की सुरक्षा का भरोसा होता था और बच्चों के लिए सबसे प्रिय ठिकाना भी। इसे पहाड़ में कोठार कहा जाता था। आज सीमेंट के मकानों और आधुनिक जीवनशैली के बीच कोठार धीरे-धीरे इतिहास बनते जा रहे हैं। लेकिन जिन लोगों ने अपना बचपन गांवों में बिताया है, उनके लिए कोठार केवल अनाज रखने की जगह नहीं, बल्कि यादों का एक जीवित संसार है। जब गांवों में बाजार दूर थे और हर परिवार अपनी जरूरत का अधिकांश अनाज खुद पैदा करता था, तब कोठार घर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता था। गेहूं, धान, मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट और राजमा जैसे अनाज पूरे साल के लिए यहीं सुरक्षित रखे जाते थे। मिट्टी, पत्थर और लकड़ी से बने इन कोठारों में अनाज को नमी, चूहों और कीड़ों से बचाने के लिए विशेष इंतजाम किए जाते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति का अंदाजा भी अक्सर कोठार में भरे अनाज से लगाया जाता था। बुजुर्ग कहा करते थे जिसका कोठार भरा हो, उसका मन भी भरा रहता है। दिन में जहां अनाज की बोरियां और लकड़ी के बक्से रखे रहते थे, वहीं रात होते ही यही कोठार बच्चों का शयनकक्ष बन जाता था। सर्दियों की ठंडी रातों में जब बाहर बर्फीली हवाएं चलती थीं, तब कोठार के भीतर एक अलग ही गर्माहट महसूस होती थी। अनाज की बोरियों के बीच बिछे बिस्तरों पर बच्चे, भाई-बहन और कई बार मेहमान भी साथ सोते थे। दादी की कहानियां, मां की लोरियां और लालटेन की मंम रोशनी में बीतती रातें आज भी कई लोगों की स्मृतियों में जिंदा हैं। कोठार की अपनी एक महक होती थी। ताजे धान, सूखे गेहूं, मंडुवे और लकड़ी की मिश्रित खुशबू। आज भी जब गांव लौटे लोग किसी पुराने कोठार का दरवाजा खोलते हैं तो वह खुशबू उन्हें सीधे बचपन में पहुंचा देती है। याद आता है कि कैसे अनाज की बोरियों पर चढ़कर खेला करते थे, कैसे छिपन-छिपाई का सबसे सुरक्षित अड्डा वही हुआ करता था। कई बच्चों के लिए कोठार किसी रहस्यमयी दुनिया से कम नहीं था। कोठार सिर्फ अनाज का भंडार नहीं था, वह पहाड़ की आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। वह बताता था कि परिवार ने साल भर मेहनत की है और आने वाले मौसमों के लिए तैयारी भी कर ली है। आज बाजारों और ऑनलाइन डिलीवरी के दौर में शायद यह एहसास कम हो गया है कि एक समय भोजन की सुरक्षा घर के कोठार से तय होती थी। पलायन ने सबसे ज्यादा असर गांवों के कोठारों पर भी डाला है, जिन कमरों में कभी अनाज से भरी बोरियां रखी रहती थीं, वहां आज सन्नाटा पसरा है। कई घरों के कोठार बंद पड़े हैं। कुछ टूट चुके हैं और कुछ आधुनिक निर्माण की भेंट चढ़ गए हैं। उनके साथ ही एक जीवनशैली, एक संस्कृति और यादों का एक पूरा संसार भी धीरे-धीरे गायब हो रहा है। जब गांव के बुजुर्ग अपने पुराने दिनों को याद करते हैं तो उनकी आंखों में चमक आ जाती है। वह खेती की बात करते हैं, फसलों की बात करते हैं और फिर अनायास ही कोठार का जिक्र आ जाता है। शायद इसलिए कि कोठार में केवल अनाज नहीं रखा जाता था।वहां परिवार की मेहनत रखी जाती थी।वहां आने वाले कल की उम्मीद रखी जाती थी।वहां बच्चों का बचपन रखा जाता था।और सबसे बढ़कर, वहां पहाड़ की आत्मा बसती थी। आज भले ही कोठार खाली हों, लेकिन उनकी यादें अब भी हजारों पहाड़ी दिलों में भरी हुई हैं।

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