सोमवार, 10 अगस्त 2026

बदलते दौर में खो गई ‘बुलाक’ की चमक

सदियों की कहानी कहती एक छोटी-सी बुलाक की वह चमक पहाड़ के गांवों में कभी सुहाग और समृद्धि की पहचान थी बुलाक आज के फैशन के बीच लोक-संस्कृति की विरासत बचाने की चुनौती देहरादून। पहाड़ की पगडंडियों पर चलती कोई महिला जब अपने पारंपरिक परिधान में नजर आती है तो उसके माथे की बिंदी, गले का गलोबंद, कानों के कर्णफूल और नाक की बुलाककृसब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं, जिसमें पहाड़ की लोकसंस्कृति सांस लेती दिखाई देती है। पहाड़ की स्त्री के श्रृंगार में बुलाक केवल सोने का एक आभूषण नहीं रही, बल्कि यह उसकी पहचान, परिवार की परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रही है। आज जब पहाड़ के गांव बदल रहे हैं, पहनावा बदल रहा है और नई पीढ़ी का फैशन भी बदल रहा है, तब बुलाक की चमक कुछ कम जरूर हुई है, लेकिन उसकी कहानी अब भी उतनी ही पुरानी और खूबसूरत है। बुलाक को देखकर पहली नजर में शायद कोई इसे नाक का साधारण आभूषण समझे, लेकिन पहाड़ के पारंपरिक श्रृंगार में इसका अपना विशेष स्थान रहा है। खासकर पहाड़ी महिलाओं के पारंपरिक आभूषणों में बुलाक का उल्लेख आते ही पुरानी पीढ़ी के सामने गांव की महिलाएं, त्योहारों के अवसर पर सजे आंगन और पारंपरिक परिधानों में सजी पहाड़ की बेटियों की तस्वीर उभर आती है। सोने या अन्य धातु से बनी बुलाक अपने आकार और डिजाइन में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग दिखाई दे सकती है। कहीं इसमें महीन नक्काशी होती है तो कहीं यह साधारण लेकिन बेहद आकर्षक डिजाइन में दिखाई देती है। यही विविधता पहाड़ के आभूषणों की खूबसूरती है। पहाड़ के पारंपरिक समाज में शादी-ब्याह केवल दो व्यक्तियों का रिश्ता नहीं, बल्कि पूरे गांव और परिवार का उत्सव होता था। ऐसे अवसरों पर महिलाओं का पारंपरिक श्रृंगार विशेष महत्व रखता था। दुल्हन के परिधान के साथ बुलाक भी उसके श्रृंगार का हिस्सा बनती थी। बुजुर्ग महिलाएं अपनी बहुओं और बेटियों को पुराने गहनों के बारे में बतातीं और कई परिवारों में पीढ़ियों से संभालकर रखे गए आभूषण विशेष अवसरों पर निकाले जाते थे। इस तरह एक बुलाक सिर्फ आभूषण नहीं रहती थी। उसमें मां की याद होती थी, दादी की कहानी होती थी और परिवार की कई पीढ़ियों का स्पर्श जुड़ा होता था। पहाड़ में पारंपरिक आभूषणों की एक खास खूबी यह रही कि वे स्थानीय कारीगरों की कला से जुड़े थे। सुनार केवल गहना बनाने वाला कारीगर नहीं होता था, बल्कि वह स्थानीय संस्कृति और परिवारों की पसंद को भी समझता था। बुलाक के डिजाइन में स्थानीय शिल्प की झलक दिखाई देती थी। महीन काम, छोटे आकार और पारंपरिक आकृतियां इसे सामान्य बाजार में मिलने वाले आभूषणों से अलग बनाती थीं। लेकिन वक्त बदला। गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा। पारंपरिक परिधान रोजमर्रा की जिंदगी से दूर होने लगे। इसके साथ ही कई पुराने आभूषण भी संदूकों और संदूकों के भीतर रखी स्मृतियों तक सीमित होते गए। आज की पीढ़ी पारंपरिक गहनों को नए अंदाज में पहनना चाहती है। यही कारण है कि बुलाक भी अब केवल पारंपरिक पोशाक तक सीमित नहीं है। कुछ युवा इसे आधुनिक परिधानों के साथ भी पहनने लगी हैं। सोशल मीडिया ने भी पारंपरिक आभूषणों को नई पहचान देने में भूमिका निभाई है। पहाड़ की संस्कृति और पारंपरिक पहनावे को लेकर बढ़ती रुचि ने बुलाक जैसे आभूषणों को फिर चर्चा में ला दिया है। लेकिन यहां सवाल केवल फैशन का नहीं है। अगर बुलाक केवल फैशन बनकर रह गई और उसके पीछे की कहानी भूल गई तो एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है। कई घरों में पुराने आभूषणों की अपनी कहानी होती है। मां की शादी में पहनी गई बुलाक बेटी की शादी तक पहुंचती है। कभी दादी की बुलाक पोती के श्रृंगार का हिस्सा बन जाती है। इन गहनों की कीमत केवल सोने के भाव से नहीं लगाई जा सकती। क्योंकि उनकी असली कीमत उस कहानी में है जो उनके साथ जुड़ी है। एक छोटी-सी बुलाक कभी किसी मां की विदाई की गवाह रही होगी। कभी किसी बेटी के विवाह में चमकी होगी। कभी किसी त्योहार पर गांव की महिलाओं के सामूहिक उत्सव का हिस्सा बनी होगी। इसलिए पहाड़ के पुराने संदूक में रखी बुलाक वास्तव में बीते समय की एक छोटी-सी डायरी है। पलायन और बदलती जीवनशैली ने पहाड़ के पारंपरिक पहनावे और आभूषणों को प्रभावित किया है। गांव खाली हो रहे हैं तो पारंपरिक शिल्प से जुड़े कई कारीगरों के सामने भी बाजार की चुनौती है। जरूरत इस बात की है कि बुलाक जैसे आभूषणों को केवल संग्रहालय की वस्तु न बनने दिया जाए। इन्हें आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़ा जाए, स्थानीय कारीगरों को बाजार मिले और नई पीढ़ी को इनके सांस्कृतिक महत्व के बारे में बताया जाए। स्कूलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और स्थानीय मेलों में पहाड़ के पारंपरिक आभूषणों की प्रदर्शनी और इनके पीछे की कहानियां नई पीढ़ी तक पहुंचाई जा सकती हैं। पहाड़ की संस्कृति को समझने के लिए हमेशा बड़े-बड़े स्मारकों की जरूरत नहीं होती। कभी किसी बुजुर्ग महिला के संदूक में रखा छोटा-सा गहना भी पूरी संस्कृति की कहानी कह देता है। बुलाक भी ऐसा ही एक गहना है। उसकी चमक में पहाड़ की स्त्री का श्रृंगार है, उसके डिजाइन में स्थानीय कारीगर की मेहनत है, उसकी स्मृति में परिवार की पीढ़ियां हैं और उसके अस्तित्व में पहाड़ की लोकसंस्कृति की वह डोर है जो अतीत को वर्तमान से जोड़ती है। बुलाक छोटी है, लेकिन इसकी कहानी बहुत बड़ी है और शायद यही वजह है कि जब पहाड़ की कोई बेटी अपनी नाक में बुलाक सजाती है, तो वह सिर्फ गहना नहीं पहनतीकृवह अपने साथ पहाड़ की एक पूरी विरासत लेकर चलती है।

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