गुरुवार, 2 जुलाई 2026

धिंगारू: हरी चादर पर सजे ‘लाल मोती’

धिंगारू को कहते हैं पहाड़ के गांवों में बचपन की मीठी याद धिंगारू डालियों पर टंगी होती थी बचपन की लाल मुस्कान बचपन में धिंगारू के लाल फल बन जाते थे सबसे बड़ी दौलत देहरादून। पहाड़ के बच्चों का बचपन कभी बाजारों में नहीं बिकता था। वह जंगलों की पगडंडियों, सीढ़ीनुमा खेतों, गाड़-गधेरों और पेड़ों की डालियों पर पलता था। जेब में पैसे कम होते थे, लेकिन प्रकृति की दौलत इतनी थी कि हर मौसम अपने साथ कोई न कोई मिठास लेकर आता था। उन्हीं मिठासों में एक नाम है दृधिंगारू। गर्मियों की तपती दोपहर में जब पहाड़ की ढलानों पर हवा धीरे-धीरे बहती है, तब गांवों के आसपास और जंगलों के किनारों पर खड़े धिंगारू के पेड़ लाल-लाल फलों से भर उठते हैं। दूर से देखने पर लगता है, मानो किसी ने हरी चादर पर लाल मोती टांक दिए हों। शायद यही वजह है कि पहाड़ के निचले इलाकों में इसे प्यार से पहाड़ी सेब कहा जाता है। एक समय था जब स्कूल से लौटते बच्चों के कदम सीधे घर की ओर नहीं, बल्कि धिंगारू के पेड़ों की ओर मुड़ जाते थे। कोई पेड़ की शाखा पकड़कर ऊपर चढ़ जाता, कोई नीचे खड़ा होकर गिरते फलों को अपनी कमीज में समेट लेता। फिर शुरू होता खट्टे-मीठे स्वाद का उत्सव। एक फल मुंह में जाता, दूसरा जेब में और तीसरा किसी दोस्त के हिस्से में। उस समय न किसी को विटामिन का पता था और न एंटीआक्सीडेंट का। बच्चों के लिए धिंगारू सिर्फ एक फल नहीं था, बल्कि गर्मियों की छुट्टियों का साथी, दोस्ती का स्वाद और बचपन की सबसे मीठी यादों में से एक था। आज जब पहाड़ के अनेक गांव सूने हो रहे हैं और बच्चों की दुनिया मोबाइल की स्क्रीन तक सिमट गई है, तब धिंगारू के पेड़ भी जैसे किसी का इंतजार कर रहे हैं। वह अब भी हर साल लाल फलों से लद जाते हैं, लेकिन उन्हें तोड़ने वाले छोटे-छोटे हाथ कम होते जा रहे हैं। उनकी शाखाओं पर अब भी हवा गुनगुनाती है, लेकिन बच्चों की खिलखिलाहट पहले जैसी नहीं सुनाई देती। धिंगारू को स्वास्थ्य का वरदान माना गया है। कहा जाता है कि यह फल हृदय को स्वस्थ रखने, पाचन को बेहतर बनाने और शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा देने में सहायक होता है। इसमें पाए जाने वाले प्राकृतिक एंटीआक्सीडेंट शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मददगार माने जाते हैं। शायद इसी कारण पहाड़ के बुजुर्ग इसे केवल फल नहीं, बल्कि प्रकृति की दवा भी कहते हैं। लेकिन धिंगारू की सबसे बड़ी विशेषता उसके औषधीय गुण नहीं, बल्कि उसकी भावनात्मक विरासत है। यह फल उस दौर की याद दिलाता है, जब जीवन सरल था, खुशियां छोटी थीं और प्रकृति ही सबसे बड़ा खिलौना और सबसे बड़ा बाजार हुआ करती थी। धिंगारू का स्वाद आज भी उन लोगों की स्मृतियों में बसा है, जो रोज़गार की तलाश में पहाड़ छोड़कर शहरों में बस गए। जब कभी गांव की याद आती है, तो आंखों के सामने सबसे पहले किसी पहाड़ी ढलान पर खड़ा वह पेड़ उभरता है, जिसकी शाखाओं पर लाल-लाल धिंगारू चमक रहे होते हैं। दरअसल, धिंगारू केवल एक फल नहीं है। वह पहाड़ के बचपन की लाल मुस्कान है, जो हर गर्मी में चुपचाप खिल उठती है और हमें याद दिलाती है कि प्रकृति ने हमारी स्मृतियों में कितनी मिठास घोल रखी है। शायद इसलिए पहाड़ के लोग कहते हैंकृजिसने धिंगारू का स्वाद चखा है, उसने पहाड़ के बचपन का एक टुकड़ा अपने भीतर हमेशा के लिए संजो लिया है।

उत्तराखंड में ‘मिशन 2027’ की जल्दबाजी

2027 की जंग का काउंटडाउन शुरू, उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी चालें तेज उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की आहट, लेकिन लड़ाई आज से शुरू भाजपा संगठन के सहारे आगे, कांग्रेस नेतृत्व और एकजुटता की तलाश में, यूकेडी जनभावनाओं के मुद्दों पर सक्रिय देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों पूरी तरह 2027 विधानसभा चुनाव के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। सरकार के फैसले, विपक्ष के आंदोलन, नेताओं के दौरे और संगठनात्मक बैठकों के पीछे एक ही लक्ष्य दिखाई दे रहा हैकृ2027 की चुनावी जंग की तैयारी। चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीतियों को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है। प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर में सत्तारूढ़ भाजपा अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की छवि, संगठन की सक्रियता और केंद्र-राज्य की डबल इंजन सरकार का लाभ पार्टी को आत्मविश्वास दे रहा है। समान नागरिक संहिता, निवेश सम्मेलन, नकल विरोधी कानून और आधारभूत ढांचे के विकास को भाजपा अपने राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बना चुकी है। पार्टी की रणनीति साफ हैकृसरकारी योजनाओं के लाभार्थियों, महिलाओं, युवाओं और नए मतदाताओं के बीच अपनी पैठ और मजबूत करना। भाजपा संगठन भी बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने में जुट गया है। हालांकि, बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और स्थानीय मुद्दों पर बढ़ती जन अपेक्षाएं भाजपा के लिए चुनौती बन सकती हैं। वहीं, मुख्य विपक्षी कांग्रेस अभी भी अपने राजनीतिक पुनर्गठन के दौर से गुजर रही है। पार्टी लगातार सरकार को बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर घेरने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद को एक मजबूत और एकजुट विकल्प के रूप में स्थापित करने की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी नहीं है, लेकिन उन मुद्दों को जन आंदोलन में बदलने और संगठन को एकजुट रखने की क्षमता ही उसके भविष्य का निर्धारण करेगी। पार्टी के भीतर नेतृत्व और गुटीय समीकरण अभी भी उसके लिए बड़ी परीक्षा बने हुए हैं। दूसरी ओर, उत्तराखंड क्रांति दल एक बार फिर राज्य आंदोलन की मूल भावना को जीवित करने की कोशिश में है। मूल निवास, सशक्त भू-कानून, पहाड़ से पलायन और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दों को लेकर यूकेडी लगातार सक्रियता दिखा रही है। हालांकि, सीमित जनाधार और संगठनात्मक कमजोरी उसे राज्य की मुख्यधारा की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने से रोक रही है। राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति और अधिक गर्माने वाली है। भाजपा विकास और स्थिरता का संदेश लेकर जनता के बीच जाएगी, कांग्रेस सरकार विरोधी भावनाओं को अपने पक्ष में करने का प्रयास करेगी और यूकेडी क्षेत्रीय अस्मिता को पुनर्जीवित करने की लड़ाई लड़ेगी। फिलहाल, प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है कि 2027 का चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन उसकी लड़ाई आज से ही शुरू हो चुकी है। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों की जमीन तैयार कर रहा है, विपक्ष मुद्दों की तलाश में है और क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व की लड़ाई को नए सिरे से परिभाषित करने में जुटे हैं। आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत का हर कदम, हर बयान और हर राजनीतिक समीकरण इसी चुनावी मंजिल की ओर बढ़ता दिखाई देगा।

जब ‘विकास’ पहुंचा तब गांव ‘खाली’

उत्तराखंड में पहाड़ के गांवों की यही है सबसे बड़ी विडंबना सड़क, बिजली और नेटवर्क तो पहुंचा पर लोग पलायन कर गए सुविधाएं चमक रहीं, लेकिन बूढ़ी आंखों को है अपनों का इंतजार देहरादून। पहाड़ के उस गांव में अब सड़क है। बिजली के खंभे खड़े हैं। मोबाइल नेटवर्क भी आता है। कई घरों तक पानी की पाइपलाइन पहुंच चुकी है। सरकारी योजनाओं के बोर्ड भी चमक रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच अगर कुछ नहीं है, तो वह हैकृलोगों की आवाज। पहाड़ के गांव आज इसी विडंबना की कहानी कह रहे हैं, जिन गांवों तक विकास पहुंचाने के लिए वर्षों तक संघर्ष हुआ, आज उन्हीं गांवों में ताले लटके हैं। कहीं बूढ़े मां-बाप अकेले रह गए हैं, तो कहीं पूरा गांव ही वीरान हो चुका है। कभी पहाड़ की जिंदगी कभी सामूहिक संस्कृति की पहचान हुआ करती थी। सुबह खेतों में हलचल, शाम को चौपालों में बैठकी और त्योहारों में पूरे गांव की रौनक दिखाई देती थी। लेकिन अब गांवों की पगडंडियों पर सन्नाटा पसरा है। स्कूलों में बच्चों की संख्या घट गई है। कई प्राथमिक विद्यालय बंद होने की कगार पर हैं। विकास के नाम पर सड़कें तो बन गईं, लेकिन रोजगार नहीं बन पाया। अस्पताल की इमारत खड़ी हो गई, मगर डॉक्टर नहीं पहुंचे। इंटरनेट आ गया, लेकिन गांव में ऐसा काम नहीं आया जिससे युवा वहीं रह सकें। नतीजा यह हुआ कि पहाड़ की जवानी मैदानों की ओर उतर गई। आज देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे शहरों में उत्तराखंड के युवाओं की लंबी कतार दिखाई देती है। कोई होटल में नौकरी कर रहा है, कोई सिक्योरिटी गार्ड है, तो कोई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में संघर्ष कर रहा है। गांव में सिर्फ बुजुर्ग और यादें बची हैं। सबसे दर्दनाक तस्वीर उन घरों की है, जहां कभी चूल्हा जलता था, आज वहां घास उग आई है। कई गांवों में साल में सिर्फ गर्मियों की छुट्टियों के दौरान ही थोड़ी हलचल दिखाई देती है, जब शहरों में बसे लोग अपने पुश्तैनी घरों का ताला खोलने लौटते हैं। राज्य बनने के समय उम्मीद थी कि अलग उत्तराखंड बनने से पहाड़ों की तस्वीर बदलेगी। कुछ बदलाव हुए भी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा रह गयाकृअगर गांवों में लोग ही नहीं बचे, तो विकास आखिर किसके लिए? विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ सड़क और भवन बना देना विकास नहीं होता। असली विकास वह है, जो लोगों को अपने गांव में सम्मानजनक जीवन और रोजगार दे सके। जब तक गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की मजबूत व्यवस्था नहीं होगी, तब तक पलायन की यह कहानी रुकने वाली नहीं। क्योकि सच यही है कि आज गांवों में विकास तो पहुंचा, मगर गांवों में लोग नहीं बचे हैं।

‘अस्तित्व की आखिरी जंग’

सत्ता की होड़ के बीच क्षेत्रीय अस्मिता की परीक्षा और वजूद की लड़ाई उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के भविष्य का फैसला करेगा आगामी चुनाव भू-कानून और मूल निवास की सुगबुगाहट के बीच यूकेडी बनेगा तीसरा विकल्प देहरादून। उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति का अध्याय अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। राज्य आंदोलन की भावना, स्थानीय अस्मिता, भू-कानून, मूल निवास और युवाओं के मुद्दे आज भी प्रासंगिक हैं। सवाल केवल इतना है कि क्या यूकेडी इन मुद्दों को जन आंदोलन में बदलने और खुद को एक विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने में सफल होगी? आगामी विधानसभा चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि यह भी तय करेगा कि उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका भविष्य में कितनी प्रभावी रह पाएगी। यूकेडी के लिए यह चुनाव किसी सामान्य राजनीतिक मुकाबले से कहीं अधिक, अपने अस्तित्व और पुनर्जीवन की लड़ाई है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की आहट के साथ प्रदेश की राजनीति एक बार फिर नए समीकरणों की ओर बढ़ रही है। भाजपा और कांग्रेस जहां सत्ता की सीधी लड़ाई में जुटी हैं, वहीं राज्य के एकमात्र क्षेत्रीय दल, उत्तराखंड क्रांति दल के सामने अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने और खोई हुई जमीन वापस पाने की चुनौती है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका समाप्त हो रही है या फिर यूकेडी के लिए अभी भी संभावनाओं के दरवाजे खुले हैं? उत्तराखंड राज्य आंदोलन में यूकेडी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। अलग राज्य की मांग को जन-जन तक पहुंचाने और पहाड़ की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने में पार्टी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राज्य गठन के बाद उम्मीद थी कि यूकेडी उत्तराखंड की राजनीति में एक मजबूत क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरेगी। शुरुआती वर्षों में पार्टी ने विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और कई क्षेत्रों में प्रभाव भी बनाया। लेकिन समय के साथ संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व संघर्ष और लगातार गुटबाजी ने पार्टी के जनाधार को कमजोर कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यूकेडी के कमजोर होने के पीछे कारण पार्टी लंबे समय तक नेतृत्व संकट से जूझती रही। कई नेताओं ने अलग राह पकड़ी, जिससे संगठन कमजोर हुआ। भाजपा और कांग्रेस की तुलना में यूकेडी बूथ स्तर तक मजबूत संगठन खड़ा नहीं कर पाई। राज्य आंदोलन की विरासत युवा मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच सकी। भाजपा और कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल कर क्षेत्रीय राजनीति की जमीन को काफी हद तक सीमित कर दिया। राजनीतिक परिस्थितियां बताती हैं कि उत्तराखंड में क्षेत्रीय राजनीति की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। प्रदेश में कई ऐसे मुद्दे हैं जो क्षेत्रीय दलों को नई ऊर्जा दे सकते हैं। इसमें प्रदेश में सशक्त भू-कानून और मूल निवास की मांग लगातार उठती रही है। यह मुद्दा स्थानीय अस्मिता से सीधे जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही पर्वतीय जिलों से पलायन और युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। स्थानीय संसाधनों पर उत्तराखंडियों के अधिकार की मांग भी समय-समय पर जोर पकड़ती रही है। क्षेत्रीय असंतुलन और विकास के सवाल भी कई बार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहे हैं। वर्तमान में यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि खुद को प्रासंगिक साबित करना है। पार्टी को यह साबित करना होगा कि वह केवल राज्य आंदोलन की विरासत पर राजनीति नहीं कर रही, बल्कि वर्तमान समस्याओं का ठोस समाधान भी प्रस्तुत कर सकती है। इसके लिए पार्टी कोकृ मजबूत संगठन खड़ा करना, युवा नेतृत्व को आगे लाना, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्म पर सक्रिय होना, स्थानीय आंदोलनों के साथ खुद को जोड़ना और विधानसभा चुनाव को अस्तित्व की लड़ाई के रूप में लड़ना होगा। प्रदेश की राजनीति लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटी हुई है। हालांकि समय-समय पर जनता के एक वर्ग में तीसरे विकल्प की मांग भी उठती रही है। यदि यूकेडी इस राजनीतिक रिक्तता को समझकर खुद को नए स्वरूप में प्रस्तुत करती है, तो उसके लिए संभावनाएं बन सकती हैं। लेकिन यदि पार्टी अपने पुराने विवादों और गुटबाजी से बाहर नहीं निकल पाती, तो उसके लिए आने वाला चुनाव और भी कठिन साबित हो सकता है।

बुधवार, 1 जुलाई 2026

चुनावी ‘आहट’ के बीच कांग्रेस में ‘रार’

कांग्रेस पार्टी में परिवर्तन संकल्प पर भारी पड़ रहा है आपसी कलह मंच पर खींचतान के बाद महिला कांग्रेस की कार्यकारिणी की भंग चुनाव से पहले गुटबाजी से फिर बैकफुट पर आया मुख्य विपक्षी दल देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट तेज होने लगी है। भाजपा ने जहां संगठन और सरकार के बीच तालमेल बैठाकर चुनावी तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अभी भी अपने भीतर की खींचतान से जूझता नजर आ रहा है। पिथौरागढ़ में आयोजित परिवर्तन संकल्प सम्मेलन के दौरान सामने आए घटनाक्रम और उसके बाद जिला महिला कांग्रेस की पूरी कार्यकारिणी को भंग करने का फैसला इस बात का संकेत है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। कांग्रेस का परिवर्तन संकल्प सम्मेलन का उद्देश्य संगठन को मजबूत करना, कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरना और आगामी चुनावों के लिए राजनीतिक रणनीति तय करना था। लेकिन सम्मेलन से जो तस्वीर बाहर आई, उसने पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए। मंच पर नेताओं के बीच मतभेद, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और अनुशासनहीनता के आरोपों ने यह संदेश दिया कि कांग्रेस अभी भी अपने आंतरिक विरोधाभासों से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है। उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी की समस्या से जूझती रही है। नेतृत्व परिवर्तन, टिकट वितरण और संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर समय-समय पर असंतोष सामने आता रहा है। पार्टी चुनावी पराजयों के बाद भी इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं खोज पाई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि उसकी अपनी आंतरिक राजनीति है। जब नेता और कार्यकर्ता एक-दूसरे से संघर्ष में व्यस्त हों, तब जनता के मुद्दों पर एकजुट आंदोलन खड़ा करना कठिन हो जाता है। लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष सत्ता को जवाबदेह बनाने का सबसे बड़ा माध्यम होता है। उत्तराखंड में बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा और महंगाई जैसे अनेक मुद्दे हैं, जिन पर सरकार को घेरा जा सकता है। लेकिन विपक्ष की ऊर्जा यदि आंतरिक विवादों में ही खर्च हो जाए, तो जनसरोकार के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। यही कारण है कि कांग्रेस लगातार सरकार के खिलाफ बड़ा जनआंदोलन खड़ा करने में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाई है। जनता भी ऐसे विपक्ष को लेकर आश्वस्त नहीं होती, जो स्वयं अपने संगठन को एकजुट रखने में संघर्ष कर रहा हो। पिथौरागढ़ जिला महिला कांग्रेस की पूरी कार्यकारिणी को भंग करने का निर्णय केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है। प्रदेश नेतृत्व यह बताना चाहता है कि संगठन में अनुशासनहीनता और सार्वजनिक विवादों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हालांकि, राजनीतिक जानकार यह भी मानते हैं कि केवल कार्रवाई कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक संगठन के भीतर संवाद, समन्वय और सामूहिक नेतृत्व की भावना विकसित नहीं होगी, तब तक गुटबाजी की समस्या समय-समय पर सामने आती रहेगी। 2027 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए अस्तित्व और पुनरुत्थान दोनों का अवसर है। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश कर रही है। लेकिन इसके लिए पार्टी को पहले अपने घर को व्यवस्थित करना होगा। यदि कांग्रेस रणनीति की राजनीति छोड़कर आपसी ‘रण’ में उलझी रही, तो सत्ता की लड़ाई उसके लिए और कठिन हो सकती है। जनता एक ऐसे विकल्प की तलाश में रहती है, जो संगठित, अनुशासित और मुद्दों पर केंद्रित हो। फिलहाल, कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपने भीतर के मतभेदों को समाप्त कर एकजुटता का संदेश देना है।

विपक्ष में बिखराव के बीच भाजपा की ‘प्रो-एक्टिव’ पालिटिक्स

उत्तराखंड में तीसरी बार कमल खिलाने के लिए भाजपा का मिशन मोड आगामी चुनाव के लिए भाजपा ने झोंकी ताकत, घर-घर पहुंचेगी उपलब्धियों की लिस्ट विकास पखवाड़े के जरिए भाजपा की आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की कवायद शुरू देहरादून। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने अपने पुराने प्रदर्शन में सुधार करने और सरकार की योजनाओं को अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने की रणनीति पर काम तेज कर दिया है। पार्टी ने विकास पखवाड़ा को जनसंपर्क और जनकल्याण की नई मुहिम के रूप में आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है, जिसके माध्यम से सरकार की उपलब्धियों और योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाने की तैयारी की जा रही है। भाजपा का मानना है कि लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का रास्ता केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि जनता तक योजनाओं की वास्तविक पहुंच और उनके प्रभावी क्रियान्वयन से होकर गुजरता है। यही वजह है कि संगठन और सरकार दोनों विकास पखवाड़े को मिशन मोड में संचालित करने की तैयारी में जुट गए हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार विकास पखवाड़े के दौरान बूथ स्तर तक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, महिला सशक्तीकरण और स्वरोजगार से जुड़े कार्यों की जानकारी आम जनता तक पहुंचाई जाएगी। इसके साथ ही कार्यकर्ताओं को लोगों की समस्याएं सुनने और उनके समाधान के लिए प्रशासन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी दी जाएगी। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि जनता के बीच लगातार संवाद और योजनाओं के प्रभावी प्रचार-प्रसार से सरकार के प्रति विश्वास और मजबूत होगा। राजनीतिक दृष्टि से भाजपा उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रही है, जहां पिछले चुनावों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं रहा था। पार्टी संगठन ने ऐसे विधानसभा क्षेत्रों की पहचान कर वहां विशेष रणनीति बनाने के संकेत दिए हैं। स्थानीय मुद्दों, क्षेत्रीय असंतोष और जन अपेक्षाओं को समझते हुए संगठनात्मक गतिविधियों को तेज किया जा रहा है। भाजपा नेताओं का कहना है कि पार्टी केवल अपनी उपलब्धियों का प्रचार नहीं करेगी, बल्कि जनता से फीडबैक लेकर कमियों को दूर करने का प्रयास भी करेगी। यही कारण है कि विकास पखवाड़े को जनसंवाद और जनविश्वास के अभियान के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा लंबे समय से अंत्योदय की अवधारणा को अपनी राजनीति का आधार बताती रही है। पार्टी का दावा है कि सरकार की योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना ही उसका लक्ष्य है। विकास पखवाड़े के दौरान भी इसी सोच को केंद्र में रखा गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस अभियान के माध्यम से दोहरे उद्देश्य साधना चाहती है। पहला, सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाना और दूसरा, आगामी चुनाव से पहले संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करना। हालांकि भाजपा इस अभियान को पूरी तरह विकास और जनसेवा से जोड़कर देख रही है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे आगामी चुनावों की तैयारियों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही भाजपा कोई भी राजनीतिक जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रही है। ऐसे में विकास पखवाड़ा केवल सरकारी योजनाओं के प्रचार का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनता से सीधा संवाद स्थापित कर अपने पुराने प्रदर्शन में सुधार करने और नए राजनीतिक समीकरण बनाने की एक व्यापक रणनीति के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है।

जख्या और फरड़ पहाड़ की आत्मा

पीढ़ियों से चली आ रही पहाड़ की खाद्य परंपरा पहाड़ की रसोई से उठती मिट्टी की सौंधी खुशबू यह मसाला ही नहीं, बल्कि पहाड़ की है स्मृतियां देहरादून। पहाड़ की रसोई में जब चूल्हे पर लोहे की कढ़ाई चढ़ती है, उसमें सरसों का तेल गर्म होता है और फिर एक चुटकी जख्या या फरड़ उसमें डाली जाती है, तो उठने वाली छन्न-छन्न की आवाज केवल तड़के की नहीं होती, बल्कि वह पहाड़ की आत्मा की आवाज होती है। उसकी सुगंध पूरे घर में फैल जाती है और बरबस ही बचपन, गांव और मां के हाथों के बने भोजन की यादें ताजा हो उठती हैं। उत्तराखंड के पहाड़ों में जख्या और फरड़ केवल मसाले नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक ऐसी खाद्य परंपरा हैं, जिसने सादगी भरे पहाड़ी भोजन को एक अनूठी पहचान दी है। पहाड़ के लोगों के लिए भोजन कभी केवल पेट भरने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि प्रकृति और संस्कृति के साथ एक गहरा रिश्ता भी रहा है। इसी रिश्ते का स्वाद हैं जख्या और फरड़। पहाड़ की दाल हो, आलू के गुटके, कापा, फाणु, चौंसू या फिर मौसमी सब्जियांकृइन सबका असली स्वाद जख्या और फरड़ के तड़के से ही निखरता है। इनकी सुगंध इतनी अलग और मनमोहक होती है कि साधारण-सा भोजन भी स्वाद का उत्सव बन जाता है। गांवों में आज भी बुजुर्ग कहते हैं जख्या पड़ जाए तो भोजन में जान आ जाती है। शायद यही वजह है कि पहाड़ से दूर रहने वाले लोग भी अपने गांव जाते समय जख्या और फरड़ की छोटी-छोटी पोटलियां साथ लेकर लौटते हैं, ताकि शहर की रसोई में भी पहाड़ की खुशबू जिंदा रह सके। एक समय था जब पहाड़ के घरों में गैस चूल्हे नहीं थे। मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ियां जलती थीं और मां या दादी कढ़ाई में जख्या का तड़का लगाती थीं। उसकी खुशबू आंगन से लेकर खेतों तक पहुंच जाती थी। बच्चे खेलते-खेलते घर की ओर दौड़ पड़ते थे, क्योंकि उन्हें पता होता था कि आज खाने में कुछ खास बना है। आज भले ही जीवन की रफ्तार बदल गई हो, लेकिन जख्या और फरड़ की खुशबू अब भी लोगों को उनके बचपन और गांव की यादों से जोड़ देती है। जख्या और फरड़ केवल स्वाद ही नहीं बढ़ाते, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माने जाते हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि ये पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं और शरीर को गर्म रखने में भी मदद करते हैं। पहाड़ के कठिन जीवन और सीमित संसाधनों के बीच इन्हीं प्राकृतिक मसालों ने भोजन को स्वाद और स्वास्थ्य दोनों प्रदान किए। बाजारवाद और आधुनिक खान-पान के दौर में कई पारंपरिक खाद्य पदार्थ लोगों की थाली से गायब हो गए हैं, लेकिन जख्या और फरड़ आज भी पहाड़ की पहचान बने हुए हैं। अब इनकी मांग देश के बड़े शहरों तक पहुंच चुकी है। आर्गेनिक उत्पादों के बढ़ते चलन ने इन पारंपरिक मसालों को नई पहचान दी है। कई काश्तकार इनकी खेती की ओर लौट रहे हैं और स्थानीय उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के प्रयास भी हो रहे हैं। यह केवल आर्थिक अवसर नहीं, बल्कि पहाड़ की खाद्य संस्कृति को बचाने की एक महत्वपूर्ण पहल भी है। जब किसी रसोई में जख्या और फरड़ का तड़का लगता है, तो केवल भोजन नहीं पकता, बल्कि पहाड़ की मिट्टी, खेत, जंगल, चूल्हा, मां की ममता और गांव की यादें भी जीवंत हो उठती हैं। क्योंकि जख्या और फरड़ सिर्फ मसाले नहीं हैं, वे पहाड़ की उस विरासत का स्वाद हैं, जो हर पहाड़ी के दिल में बसती है। उनकी खुशबू में घर है, गांव है और अपनेपन का वह एहसास है, जिसे शब्दों में नहीं, केवल महसूस किया जा सकता है।

उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का संकट

प्रदेश में ढाई दशक में बूढ़ा वट वृक्ष बनकर रह गई उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति जिस पहचान और अस्मिता के दम पर खड़ा हुआ था आंदोलन, राष्ट्रीय दलों के चक्रव्यूह में फंसा आज खुद अपने ही घर में बेगाना हो गया है एकमात्र क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक समय ऐसा भी था, जब क्षेत्रीय दलों की आवाज सत्ता के गलियारों में मजबूती से गूंजती थी। अलग राज्य आंदोलन के दौरान और उसके बाद शुरुआती वर्षों में क्षेत्रीय राजनीति केवल चुनावी विकल्प नहीं, बल्कि पहाड़ की अस्मिता, स्थानीय अधिकारों और जनभावनाओं की प्रतिनिधि मानी जाती थी। लेकिन आज जब राज्य अपने गठन के ढाई दशक पूरे करने की ओर बढ़ रहा है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति का दौर समाप्ति की ओर है? उत्तराखंड राज्य आंदोलन की लड़ाई में एकमात्र क्षेत्रीय दल, उत्तराखंड क्रांति दल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राज्य गठन के बाद लोगों को उम्मीद थी कि यह दल प्रदेश की राजनीति में एक मजबूत शक्ति के रूप में उभरेगा और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय दलों के मुकाबले अधिक मजबूती से उठाएगा। शुरुआती चुनावों में यूकेडी ने अपनी उपस्थिति दर्ज भी कराई, लेकिन धीरे-धीरे पार्टी का जनाधार सिमटता चला गया। इस गिरावट के पीछे कई कारण रहे। सबसे बड़ा कारण संगठनात्मक कमजोरी और लगातार गुटबाजी रही। पार्टी कई बार टूट का शिकार हुई, नेतृत्व को लेकर विवाद सामने आए और कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे राष्ट्रीय दलों की ओर खिसकता गया। परिणाम यह हुआ कि राज्य आंदोलन की अगुवाई करने वाला दल राजनीतिक मुख्यधारा से लगभग बाहर हो गया। दूसरी ओर, भाजपा और कांग्रेस ने क्षेत्रीय मुद्दों को अपने राजनीतिक एजेंडे में शामिल करना शुरू कर दिया। भू-कानून, मूल निवास, पलायन, बेरोजगारी और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय दलों ने भी उठाया, जिससे क्षेत्रीय दलों की विशिष्ट पहचान कमजोर होती गई। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि उत्तराखंड में क्षेत्रीय राजनीति पूरी तरह समाप्त हो गई है। दरअसल, जिन मुद्दों पर क्षेत्रीय दलों का जन्म हुआ था, वे आज भी जिंदा हैं। पहाड़ों से लगातार पलायन हो रहा है, युवाओं में बेरोजगारी को लेकर असंतोष है, भूमि और संसाधनों पर स्थानीय अधिकार की बहस जारी है और कई वर्गों में यह भावना भी है कि राज्य आंदोलन के मूल सपने अभी पूरे नहीं हुए हैं। यही कारण है कि समय-समय पर क्षेत्रीय राजनीति की आवश्यकता फिर महसूस होने लगती है। जब भी स्थानीय अस्मिता और उत्तराखंडियत के सवाल प्रमुखता से उठते हैं, तब क्षेत्रीय दलों के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुलते दिखाई देते हैं। लेकिन इसके लिए केवल भावनात्मक मुद्दे पर्याप्त नहीं होंगे। क्षेत्रीय दलों को मजबूत संगठन, स्पष्ट नेतृत्व, युवा चेहरों और जमीनी आंदोलनों के जरिए खुद को पुनर्जीवित करना होगा। आज उत्तराखंड की राजनीति दो राष्ट्रीय दलों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई दिखाई देती है, लेकिन लोकतंत्र में राजनीतिक रिक्तता हमेशा बनी नहीं रहती। यदि जनता को यह महसूस होता है कि उनके स्थानीय मुद्दों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है, तो क्षेत्रीय राजनीति एक बार फिर नई ऊर्जा के साथ उभर सकती है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि क्षेत्रीय राजनीति का दौर खत्म हो रहा है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या क्षेत्रीय दल बदलते राजनीतिक दौर के अनुरूप खुद को बदल पाने में सफल होंगे? यदि वे ऐसा कर पाए, तो उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय स्वर फिर बुलंद हो सकते हैं। लेकिन यदि वे आंतरिक संघर्ष और नेतृत्व संकट से बाहर नहीं निकल पाए, तो राज्य आंदोलन की विरासत केवल इतिहास की किताबों तक सीमित होकर रह जाएगी।