बुधवार, 22 जुलाई 2026
सुविधाओं के बाजार में यादों का ठिकाना ‘व्यासी’
चारधाम यात्रा की तस्वीर बदली, लेकिन व्यासी में आज भी जिंदा है पुरानी यादों की सोंधी महक
चमचमाती सड़कों और कैफे के दौर में व्यासी, यहाँ आज भी ठहरती हैं यात्रियों की पुरानी यादें
बदरीनाथ हाईवे का व्यासी एक दौर में था गढ़वाल के पहाड़ी गांवों की आत्मीयता का पहला पता
ऋषिकेश-बदरीनाथ मार्ग का वह पड़ाव, जहां पराठों की खुशबू आज भी है हर पहाड़ी के जहन में
देहरादून। चारधाम यात्रा मार्ग पर आज चमचमाती सड़कें हैं। आधुनिक होटल हैं, फूड प्लाजा हैं, कैफे हैं और हर कुछ किलोमीटर पर यात्रियों के लिए नई सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन इन सबके बीच ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित व्यासी आज भी एक ऐसा नाम है, जिसे सुनते ही पुरानी पीढ़ी की आंखों में यादों की पूरी यात्रा उतर आती है। व्यासी केवल एक पड़ाव नहीं था, बल्कि पहाड़ और यात्रियों के बीच आत्मीयता का पहला परिचय था। यह वह स्थान था, जहां पहाड़ की कठिन यात्रा शुरू होने से पहले लोग कुछ पल सुकून से बैठते थे, जहां चूल्हे पर सिकते पराठों की महक भूख ही नहीं, सफर की थकान भी मिटा देती थी।
आज ऋषिकेश से बदरीनाथ की यात्रा पहले की तुलना में कहीं आसान हो गई है। लेकिन तीन-चार दशक पहले यह सफर किसी परीक्षा से कम नहीं होता था। सड़कें संकरी थीं, जगह-जगह कच्चे हिस्से थे और बरसात में घंटों जाम लग जाना सामान्य बात थी। उस दौर में व्यासी यात्रियों के लिए राहत का पहला बड़ा ठिकाना हुआ करता था। चमोली, रुद्रप्रयाग और बदरीनाथ-केदारनाथ, हेमकुड सहित अन्य स्थानों की ओर जाने वाली लगभग हर बस, टैक्सी और ट्रक यहां कुछ देर जरूर रुकते थे। बस रुकते ही यात्री सीधे ढाबों की ओर बढ़ते और कुछ ही देर में पूरे बाजार में चाय की भाप और तवे पर सिकते पराठों की खुशबू फैल जाती थी।
यदि गढ़वाल के किसी बुजुर्ग या पुराने यात्री से व्यासी की पहचान पूछी जाए तो पहला जवाब होगाकृव्यासी के पराठे। देसी घी या मक्खन से सने मोटे पराठे, आलू की सब्जी, घर का बना अचार और कुल्हड़ की चाय। यह भोजन किसी होटल के मेन्यू का हिस्सा नहीं था, बल्कि पहाड़ की मेहमाननवाजी का प्रतीक था। कई परिवारों के बच्चों के लिए गांव की यात्रा का सबसे रोमांचक पड़ाव व्यासी ही होता था। बच्चे बस में बैठकर पूछते रहते थेकृव्यासी कब आएगा? क्योंकि उन्हें मालूम होता था कि अब गर्मागर्म पराठे मिलने वाले हैं। व्यासी केवल तीर्थयात्रियों का पड़ाव नहीं था। गढ़वाल के हजारों लोगों के लिए यह घर लौटने का पहला एहसास था। ऋषिकेश और देहरादून से अपने गांव लौटते लोग जब व्यासी पहुंचते थे, तो मानो उन्हें लगता था कि अब वह सचमुच अपने पहाड़ में प्रवेश कर चुके हैं।
यहां गंगा की कलकल, जंगलों की हरियाली और पहाड़ों से आती ठंडी हवा यात्रियों का स्वागत करती थी। कई लोग भोजन से पहले गंगा किनारे जाकर कुछ देर बैठते थे। किसी के लिए यह विश्राम था, तो किसी के लिए प्रकृति के बीच कुछ पल बिताने का अवसर। चारधाम आल वेदर रोड परियोजना के बाद इस पूरे मार्ग की तस्वीर बदल चुकी है। यात्रा पहले की अपेक्षा तेज और सुविधाजनक हो गई है। नए होटल, आधुनिक रेस्टोरेंट और फूड कोर्ट यात्रियों को आकर्षित कर रहे हैं। आज भी जो लोग वर्षों बाद इस मार्ग से गुजरते हैं, उनकी नजर अनायास ही व्यासी के बोर्ड पर टिक जाती है। कई वाहन यहां धीमे हो जाते हैं, क्योंकि यादें अक्सर रफ्तार से ज्यादा मजबूत होती हैं।
व्यासी ने केवल यात्रियों को भोजन नहीं दिया, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार और पहचान भी दी। यहां के ढाबे, छोटी दुकानें और स्थानीय उत्पाद बेचने वाले परिवार वर्षों तक इस मार्ग की जीवनरेखा बने रहे। यात्रियों और स्थानीय लोगों के बीच जो अपनापन यहां दिखाई देता था, वह आज भी पहाड़ की सामाजिक संस्कृति का उदाहरण माना जाता है। यहां कोई ग्राहक नहीं होता था, हर आने वाला मेहमान होता था। आज की पीढ़ी शायद व्यासी को केवल एक स्थान के रूप में जानती है, लेकिन इसके पीछे दशकों का इतिहास और हजारों यात्राओं की स्मृतियां जुड़ी हैं। यह वह पड़ाव है जिसने चारधाम यात्रा को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय अनुभव भी बनाया।
आज के दौर में भी व्यासी सिखाता है कि यात्राएं केवल मंजिल तक पहुंचने का नाम नहीं होतीं, बल्कि रास्ते में मिलने वाले लोग, स्वाद, दृश्य और पड़ाव ही उन्हें यादगार बनाते हैं। व्यासी आज भी वहीं हैकृगंगा के किनारे, पहाड़ों की गोद में। समय ने उसका स्वरूप बदला होगा, लेकिन उसकी आत्मा आज भी वैसी ही है। जब भी कोई पुराना यात्री इस मार्ग से गुजरता है, उसके मन में एक ही बात कौंधती है। व्यासी इसलिए खास नहीं कि वहां कभी अच्छे पराठे मिलते थे, बल्कि इसलिए कि वहां पहाड़ का अपनापन परोसा जाता था और यही अपनापन उसे आज भी गढ़वाल की यात्रा का सबसे भावनात्मक पड़ाव बनाता है।
‘इस्तीफा दो या गद्दी छोड़ो’
केंद्रीय शिक्षा मंत्री पर अब आर-पार का संग्राम हुआ शुरू, संसद में से लेकर सड़कों पर जंग
भाजपा बोलीदृ-राजनीति चमकाने का हथियार, कांग्रेस ने कहा-जवाबदेही से भाग नहीं सकती सरकार
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर घमासान तेज, पेपर लीक व युवाओं के आंदोलन ने बढ़ाई सियासी तपिश
नई दिल्ली। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग अब केवल विपक्ष का राजनीतिक नारा नहीं रह गई है, बल्कि संसद से लेकर सड़क तक राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुकी है। एक ओर कांग्रेस और विपक्षी दल पेपर लीक प्रकरण, युवाओं के आंदोलन और जंतर-मंतर पर हुई पुलिस कार्रवाई को मुद्दा बनाकर शिक्षा मंत्री की नैतिक जिम्मेदारी तय करने की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी इसे पूरी तरह राजनीति से प्रेरित अभियान बताकर विपक्ष पर युवाओं को गुमराह करने का आरोप लगा रही है। संसद के मानसून सत्र में यह मुद्दा लगातार गूंज रहा है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की, जबकि सदन के बाहर भी प्रदर्शन और राजनीतिक बयानबाजी ने माहौल गरमा दिया है। इससे साफ है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा अब केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है।
भाजपा का कहना है कि विपक्ष पेपर लीक और छात्रों की नाराजगी को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहा है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि केंद्र सरकार परीक्षा प्रणाली में सुधार, तकनीकी निगरानी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए लगातार कदम उठा रही है, लेकिन विपक्ष तथ्यों के बजाय भावनाओं की राजनीति कर रहा है। भाजपा का यह भी कहना है कि किसी भी अनियमितता की जांच एजेंसियां कर रही हैं और केवल राजनीतिक दबाव बनाकर किसी मंत्री का इस्तीफा मांगना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है। पार्टी के अनुसार, विपक्ष का उद्देश्य युवाओं की समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि संसद का कामकाज बाधित करना और सरकार को राजनीतिक रूप से घेरना है।
कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जब लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर हो और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हों, तब सरकार केवल राजनीतिक साजिश का तर्क देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि बार-बार परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर विवाद सामने आ रहे हैं, तो संबंधित मंत्रालय की जवाबदेही तय होना स्वाभाविक है। पार्टी का आरोप है कि सरकार आंदोलनकारियों की बात सुनने के बजाय पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझी हुई है। राहुल गांधी सहित विपक्ष के कई नेताओं ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को नैतिक जवाबदेही का प्रश्न बताया है और कहा है कि सरकार को युवाओं का विश्वास बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए लाठीचार्ज के बाद छात्र और युवा संगठनों के विरोध-प्रदर्शन कई राज्यों तक फैल गए। उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों में भी प्रदर्शन हुए, जहां युवाओं ने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठाई। इसी आंदोलन ने विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का नया अवसर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं के मुद्दे पर यदि आंदोलन लंबा चलता है, तो यह आने वाले चुनावी विमर्श को भी प्रभावित कर सकता है। संसद के भीतर विपक्ष शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़ा है, जबकि सरकार इस मांग को खारिज कर रही है। सदन के बाहर प्रदर्शन, प्रेस कॉन्फ्रेंस और राजनीतिक बयानबाजी ने इस मुद्दे को और अधिक गर्मा दिया है। भाजपा का कहना है कि विपक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं में अविश्वास का माहौल बना रहा है, जबकि कांग्रेस का आरोप है कि सरकार आलोचना को स्वीकार करने के बजाय उसे राजनीतिक षड्यंत्र बताकर टाल रही है।
इस पूरे विवाद में दोनों पक्ष केवल एक मंत्री के इस्तीफे की लड़ाई नहीं लड़ रहे, बल्कि युवाओं के बीच अपना राजनीतिक संदेश स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि सरकार व्यवस्था सुधारने के लिए प्रतिबद्ध है और विपक्ष मुद्दों का राजनीतिकरण कर रहा है। कांग्रेस और विपक्ष यह दिखाना चाहते हैं कि वे युवाओं की आवाज के साथ खड़े हैं और सरकार जवाबदेही से बच रही है। यानी, लड़ाई केवल धर्मेंद्र प्रधान के पद पर बने रहने या न रहने की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक नैरेटिव की है, जो आने वाले समय में युवाओं की राजनीति को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल भाजपा अपने रुख पर कायम है और इस्तीफे की मांग को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित बता रही है। दूसरी ओर कांग्रेस और विपक्ष इस मुद्दे को छोड़ने के संकेत नहीं दे रहे। यदि युवाओं का आंदोलन जारी रहता है और संसद में गतिरोध बना रहता है, तो यह टकराव और तेज हो सकता है।
स्पष्ट है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा अब प्रशासनिक निर्णय से अधिक राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह बहस केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहती है या परीक्षा व्यवस्था और युवाओं की चिंताओं पर ठोस नीति-स्तर की चर्चा भी आगे बढ़ती है।
दिल्ली से उठी चिंगारी, देशभर में फैली
जंतर-मंतर लाठीचार्ज के बाद कई राज्यों में जेन जेड का प्रदर्शन तेज
पेपर लीक पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग ने पकड़ लिया है तूल
उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में भी युवाओं ने विरोध-प्रदर्शन हुआ शुरू
नई दिल्ली/देहरादून। दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर संसद कूच कर रहे युवाओं पर हुए लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ने की गूंज अब राजधानी की सीमाओं से निकलकर पूरे देश में सुनाई देने लगी है। जिस आंदोलन को शुरुआत में दिल्ली तक सीमित माना जा रहा था, वह अब राष्ट्रीय युवा असंतोष का रूप लेता दिखाई दे रहा है। कई राज्यों में छात्रों और युवाओं ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं, जबकि उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में भी युवाओं ने विरोध-प्रदर्शन कर पेपर लीक मामलों की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठानी शुरू कर दी है।
संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने बैरिकेडिंग की, लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में भी लिया गया। लेकिन इस कार्रवाई के बाद आंदोलन कमजोर पड़ने के बजाय और व्यापक हो गया। अगले ही दिन जंतर-मंतर पर फिर बड़ी संख्या में युवा जुटे। सोशल मीडिया पर आंदोलन के समर्थन में अभियान तेज हो गया और देश के कई विश्वविद्यालयों तथा छात्र संगठनों ने भी प्रदर्शन की घोषणा कर दी। युवाओं का कहना है कि उनका आंदोलन केवल किसी एक परीक्षा या एक भर्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग का आंदोलन है।
दिल्ली की घटना के बाद विभिन्न राज्यों में छात्र संगठनों, युवा मंचों और सामाजिक संगठनों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। कई स्थानों पर मशाल जुलूस निकाले गए, धरने दिए गए और जिलाधिकारियों के माध्यम से ज्ञापन सौंपे गए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि राजधानी में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर बल प्रयोग किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवाल खड़े करता है। आंदोलन अब केवल पेपर लीक का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि युवाओं के सम्मान, भविष्य और शासन की जवाबदेही का प्रतीक बनता जा रहा है।
देवभूमि उत्तराखंड भी इस आंदोलन की आंच से अछूता नहीं रहा। देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, श्रीनगर और अन्य स्थानों पर छात्र संगठनों और युवाओं ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। कई जगहों पर केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी हुई और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपे गए। उत्तराखंड के युवाओं का कहना है कि राज्य पहले ही भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और पेपर लीक जैसी घटनाओं का दंश झेल चुका है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर उठ रहे आंदोलन के प्रति उनका समर्थन स्वाभाविक है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि परीक्षा प्रणाली पर भरोसा ही खत्म हो जाए, तो युवाओं के सामने सबसे बड़ा संकट उनके भविष्य का होता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को भी सरकार को घेरने का बड़ा अवसर दिया है। संसद के भीतर और बाहर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया और सरकार पर युवाओं की आवाज दबाने का आरोप लगाया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार आंदोलन को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है, जबकि असली मुद्दा युवाओं का भविष्य और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता है।
सरकार की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है और किसी को भी संसद की सुरक्षा व्यवस्था भंग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि केवल प्रशासनिक कार्रवाई से यह आंदोलन थमता नहीं दिख रहा। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती हैकृएक ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखना और दूसरी ओर युवाओं के बीच बढ़ते असंतोष को संवाद के माध्यम से कम करना। यदि आंदोलन और राज्यों में फैलता है, तो यह केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक चुनौती भी बन सकता है।
प्रदर्शन कर रहे युवाओं का कहना है कि वर्षों की मेहनत के बाद यदि परीक्षाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान उन लाखों अभ्यर्थियों का होता है जिन्होंने ईमानदारी से तैयारी की है। उनका तर्क है कि भर्ती और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि लगातार विवाद सामने आते हैं, तो युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठने लगता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच शीघ्र संवाद स्थापित नहीं हुआ, तो यह आंदोलन और व्यापक हो सकता है। विशेष रूप से ऐसे समय में, जब युवाओं के मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। दिल्ली से उठी यह आवाज अब कई राज्यों तक पहुंच चुकी है। उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों में शुरू हो रहे प्रदर्शन संकेत दे रहे हैं कि यह केवल राजधानी का आंदोलन नहीं रहा। जंतर-मंतर पर चली लाठियों की गूंज अब देशभर के विश्वविद्यालयों, सड़कों और जनसभाओं तक सुनाई दे रही है। सवाल केवल यह नहीं कि प्रदर्शन कब थमेगा, बल्कि यह है कि क्या सरकार युवाओं की नाराजगी को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानेगी या उसे लोकतांत्रिक संवाद का अवसर समझेगी। आने वाले दिनों में इसी सवाल का जवाब इस आंदोलन की दिशा और देश की राजनीति दोनों तय कर सकते हैं।
सड़क से संसद तक ‘संग्राम’
युवाओं पर लाठीचार्ज के बाद भड़क गया जनआक्रोश
राहुल गांधी के नेतृत्व में पीएम आवास का किया घेराव
युवाओं के आक्रोश ने सत्ता को कमरों से बाहर निकली
नई दिल्ली। संसद के भीतर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं, लेकिन असली लड़ाई अब संसद से निकलकर सड़कों पर दिखाई देने लगी है। संसद कूच कर रहे युवाओं पर हुए लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल के बाद जो आंदोलन थमता हुआ दिखाई दे रहा था, उसने अब नया राजनीतिक मोड़ ले लिया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पूरा विपक्ष प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च करता दिखा और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर चौतरफा हमला बोला।
दिल्ली की सड़कों पर उठते नारों ने यह संदेश दे दिया है कि यह केवल छात्रों या युवाओं का विरोध नहीं रह गया है, बल्कि अब यह राजनीतिक प्रतिरोध का बड़ा मंच बनता जा रहा है। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिस आंदोलन को शुरुआती दौर में सीमित मानकर देखा जा रहा था, उसी आंदोलन के बढ़ते दबाव ने सत्ता पक्ष के नेताओं और सरकार के प्रतिनिधियों को भी एयर-कंडीशन दफ्तरों से निकलकर सड़क पर आने और प्रदर्शनकारियों से संवाद करने के लिए मजबूर कर दिया। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत है।
लोकतंत्र में सरकारें संसद के बहुमत से चलती हैं, लेकिन राजनीतिक माहौल अक्सर सड़क का मूड तय करता है। पिछले कुछ दिनों में यही देखने को मिला। संसद मार्ग पर लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस छोड़ी गई, बैरिकेड लगाए गए, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। लेकिन इसके बाद भी आंदोलन खत्म नहीं हुआ। जंतर-मंतर पर युवाओं की भीड़ लगातार जुटती रही। आंदोलनकारियों के बीच एक नारा तेजी से लोकप्रिय हुआकृलाठी खाई है, झुकेंगे नहीं। यह केवल नारा नहीं, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध का संकेत है जिसने आंदोलन को नई ऊर्जा दी। सरकार शायद यह मानकर चल रही थी कि पुलिस कार्रवाई के बाद विरोध कमजोर पड़ जाएगा, लेकिन घटनाक्रम ने ठीक उलटा संदेश दिया। हर लाठीचार्ज के बाद आंदोलन और व्यापक होता दिखाई दिया।
विपक्ष लंबे समय से ऐसे किसी बड़े मुद्दे की तलाश में था, जिस पर वह सरकार को एक साथ घेर सके। युवाओं के आंदोलन ने वह अवसर उपलब्ध करा दिया। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों का एकजुट होकर प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च करना केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं था। इसका स्पष्ट राजनीतिक संदेश था कि विपक्ष अब युवाओं के असंतोष को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। लोकसभा के भीतर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर तीखे हमले हुए और सदन के बाहर इस्तीफे की मांग ने आंदोलन को राजनीतिक धार दे दी। यह वही रणनीति है, जिसे विपक्ष पिछले कुछ वर्षों से अपनाता रहा हैकृजनता के किसी बड़े असंतोष को राजनीतिक आंदोलन में बदलना।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार ने इस आंदोलन की गंभीरता को देर से समझा? जिन नेताओं को अब तक केवल प्रेस कान्फ्रेंस और सोशल मीडिया के जरिए प्रतिक्रिया देते देखा जा रहा था, वे अब आंदोलनकारियों से बातचीत करते नजर आने लगे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया। दरअसल, सरकार को यह एहसास होने लगा है कि यदि युवाओं का असंतोष लंबा खिंचता है, तो उसका असर केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले विधानसभा चुनावों और भविष्य की राजनीति पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। युवा किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत होते हैं। जब यही वर्ग सड़कों पर उतर आता है, तो सरकारें केवल प्रशासनिक कार्रवाई के भरोसे स्थिति को नियंत्रित नहीं रख सकतीं।
सरकार लगातार यह कह रही है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। यह तर्क अपनी जगह सही भी है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हर विरोध का जवाब पुलिस बल से दिया जा सकता है? यदि हजारों युवा अपनी बात कहने के लिए राजधानी तक पहुंच रहे हैं, तो यह केवल सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि भरोसे का संकट भी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे आंदोलनों में सबसे बड़ी गलती तब होती है, जब सत्ता उन्हें केवल प्रशासनिक चुनौती मानकर देखती है। यदि संवाद की जगह टकराव हावी हो जाए, तो आंदोलन का दायरा और बढ़ जाता है।
लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष लगातार सरकार को घेरने के लिए नए मुद्दों की तलाश में था। युवाओं का आंदोलन अब उसके लिए एक मजबूत राजनीतिक नैरेटिव बनता दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी लगातार युवाओं, छात्रों और रोजगार के मुद्दों को उठाते रहे हैं। अब सड़क पर चल रहे आंदोलन ने उनकी राजनीति को नई जमीन दे दी है। यदि यह आंदोलन लंबे समय तक जारी रहता है, तो विपक्ष इसे ष्युवा बनाम सरकारष् के राजनीतिक फ्रेम में बदलने की कोशिश करेगा। राजनीति में कई बार सबसे बड़ा नुकसान विरोध से नहीं, बल्कि विरोध को कम आंकने से होता है। सरकार के सामने चुनौती केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नहीं, बल्कि यह भरोसा दिलाने की भी है कि युवाओं की आवाज सुनी जा रही है। यदि सरकार केवल पुलिस कार्रवाई के सहारे आंदोलन को नियंत्रित करने की कोशिश करती है, तो इससे विपक्ष को और बड़ा राजनीतिक अवसर मिल सकता है। वहीं यदि संवाद, समाधान और पारदर्शिता की दिशा में ठोस पहल होती है, तो स्थिति सामान्य होने की संभावना भी बन सकती है।
दिल्ली की सड़कों पर पिछले कुछ दिनों में जो तस्वीर बनी है, उसका संदेश स्पष्ट हैकृलाठी से भीड़ हट सकती है, लेकिन असंतोष नहीं। जब युवा लगातार सड़कों पर डटे रहें, विपक्ष उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर मार्च करे और सरकार के प्रतिनिधियों को भी बातचीत के लिए मैदान में उतरना पड़े, तो यह केवल एक आंदोलन नहीं रहता, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति का महत्वपूर्ण क्षण बन जाता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस चुनौती का जवाब केवल प्रशासनिक कदमों से देती है या संवाद और राजनीतिक पहल के जरिए। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी होगा कि विपक्ष इस मुद्दे को रचनात्मक समाधान की दिशा में ले जाता है या केवल राजनीतिक लाभ तक सीमित रखता है। फिलहाल इतना तय है कि संसद के भीतर की बहस अब सड़क पर उतर चुकी है, और सड़क की गूंज संसद की दीवारों तक साफ सुनाई दे रही है।
सत्ता की ‘होड़’ और अन्य दलों का ‘खेल’
भाजपा-कांग्रेस ही नहीं, बसपा, सपा और आप भी उतरी मैदान में
संगठन विस्तार, कार्यकर्ता सम्मेलन और जनसंपर्क अभियान तेज
2027 की सत्ता की जंग का बिगुल उत्तराखंड में समय से पहले बजा
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी रणभूमि में अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। सत्तारूढ़ भाजपा जहां अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और क्षेत्रीय दल भी अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने के लिए लगातार सक्रियता बढ़ा रहे हैं। इस बार चुनावी मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा। भले ही सत्ता की सीधी लड़ाई इन्हीं दो दलों के बीच मानी जा रही हो, लेकिन छोटे दल कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बनाकर परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और प्रदेश नेतृत्व लगातार संगठनात्मक बैठकों, कार्यकर्ता सम्मेलनों और जनसंपर्क अभियानों में व्यस्त हैं। भाजपा की रणनीति साफ हैकृसरकार की योजनाओं, चारधाम परियोजनाओं, सड़क, रेल, पर्यटन, निवेश और महिला कल्याण कार्यक्रमों को चुनावी मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाना। पार्टी गांव-गांव और घर-घर पहुंचने की रणनीति पर काम कर रही है। बूथ समितियों को सक्रिय करने के साथ-साथ युवा, महिला और सोशल मीडिया नेटवर्क को भी मजबूत किया जा रहा है। भाजपा का मानना है कि मजबूत संगठन और लाभार्थी वर्ग उसके लिए सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, किसानों और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर है। प्रदेश स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ता सम्मेलन, संवाद कार्यक्रम और जनसभाओं के जरिए सरकार की नीतियों को जनता के सामने चुनौती देने की कोशिश कर रही है। पार्टी का प्रयास है कि सत्ता विरोधी भावना को एक संगठित राजनीतिक अभियान में बदला जाए। हालांकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व के बीच तालमेल बनाए रखना भी है।
बहुजन समाज पार्टी भी प्रदेश में अपने संगठन को दोबारा सक्रिय करने में जुट गई है। पार्टी दलित, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है। बसपा की रणनीति उन विधानसभा क्षेत्रों पर केंद्रित है जहां उसका परंपरागत वोट प्रतिशत चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखता है। पार्टी छोटे-छोटे कार्यकर्ता सम्मेलनों और सदस्यता अभियानों के जरिए अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। समाजवादी पार्टी भी सीमित संगठन होने के बावजूद उत्तराखंड में अपनी राजनीतिक उपस्थिति बनाए रखने का प्रयास कर रही है। विशेषकर तराई और सीमावर्ती क्षेत्रों में पार्टी कार्यकर्ताओं के माध्यम से जनसंपर्क अभियान चलाया जा रहा है। सपा का लक्ष्य फिलहाल बड़े पैमाने पर सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक मौजूदगी और वोट आधार को मजबूत करना माना जा रहा है।
दिल्ली और पंजाब की राजनीति के बाद उत्तराखंड में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के बावजूद आम आदमी पार्टी ने अपनी सक्रियता पूरी तरह समाप्त नहीं की है। पार्टी शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और रोजगार जैसे मुद्दों पर फिर से जनता के बीच जाने की तैयारी में है। हालांकि पिछले चुनाव के बाद संगठन कमजोर हुआ है, लेकिन पार्टी नए चेहरों और स्थानीय नेतृत्व के सहारे अपनी पहचान फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रही है। उत्तराखंड क्रांति दल सहित अन्य क्षेत्रीय दल भी राज्य की अस्मिता, मूल निवास, भू-कानून, रोजगार, जल-जंगल-जमीन और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर सक्रिय हैं। हालांकि पिछले चुनावों में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव सीमित रहा, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि स्थानीय मुद्दे चुनाव के केंद्र में आए तो कुछ क्षेत्रों में उनका प्रभाव बढ़ सकता है।
इस बार लगभग सभी दलों की रणनीति में दो वर्ग सबसे महत्वपूर्ण दिखाई दे रहे हैंकृयुवा और महिलाएं। युवाओं के लिए रोजगार, भर्ती, शिक्षा और स्वरोजगार प्रमुख मुद्दे हैं, जबकि महिलाओं के लिए महंगाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा, स्वयं सहायता समूह और कल्याणकारी योजनाएं चुनावी एजेंडे का हिस्सा बन रही हैं। राजनीतिक दलों का मानना है कि यही दो वर्ग चुनाव परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। गढ़वाल और कुमाऊं के साथ-साथ पहाड़ और मैदान के मुद्दों का संतुलन साधना हर दल की मजबूरी है। पलायन, खाली होते गांव, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन जैसे मुद्दे पर्वतीय क्षेत्रों में चुनावी बहस का केंद्र बन सकते हैं, जबकि तराई क्षेत्रों में कृकृषि, उद्योग और रोजगार प्रमुख विषय रहेंगे। राजनीतिक दलों की लगातार बढ़ती गतिविधियां इस बात का संकेत हैं कि 2027 का चुनाव अब केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि राजनीतिक तैयारी का वर्तमान बन चुका है। बैठकों, रैलियों, सदस्यता अभियानों, जनसंवाद कार्यक्रमों और सोशल मीडिया अभियानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड में चुनावी शंखनाद समय से पहले हो चुका है।
उत्तराखंड की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता अब केवल चुनावी घोषणाओं से नहीं, बल्कि संगठन की मजबूती, स्थानीय मुद्दों की समझ और जनता के बीच लगातार मौजूदगी से तय होगा। भाजपा अपनी सरकार के कामकाज पर भरोसा जता रही है, कांग्रेस बदलाव की उम्मीद जगाने में लगी है, जबकि बसपा, सपा, आप और क्षेत्रीय दल इस मुकाबले में अपनी प्रासंगिकता साबित करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। आने वाले महीनों में यह सक्रियता और तेज होने की संभावना है, क्योंकि 2027 की लड़ाई का पहला दौर अब मैदान में उतर चुका है।
भाजपा ‘अपनों’ के ही बयानों में उलझी
खेल मंच से उठी चिंगारी ने सुलगाई बयानबाजी की सियासत, संगठन को देनी पड़ी सफाई
कैबिनेट मंत्री भरत चौधरी की टिप्पणी पर भाजपा नेता रामशरण नौटियाल का पलटवार
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता को देनी पड़ी सफाई, विस चुनाव से पहले पार्टी के भीतर रार
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच भाजपा के भीतर बयानबाजी का नया विवाद सामने आ गया है। खेलकूद प्रतियोगिता के एक मंच से कैबिनेट मंत्री भरत चौधरी के दिए गए बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। मामला तब और तूल पकड़ गया जब भाजपा नेता, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रामशरण नौटियाल ने सार्वजनिक रूप से मंत्री के बयान का विरोध करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। विवाद बढ़ता देख भाजपा प्रदेश प्रवक्ता नवीन ठाकुर को भी पार्टी का पक्ष स्पष्ट करने के लिए सामने आना पड़ा। घटनाक्रम ने यह संदेश दिया है कि चुनावी तैयारियों के बीच भाजपा में केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि अपने नेताओं के बीच भी बयानबाजी चर्चा का विषय बन रही है।
खेलकूद प्रतियोगिता जैसे गैर-राजनीतिक मंच पर दिए गए मंत्री के बयान को शुरुआत में सामान्य टिप्पणी माना गया, लेकिन जैसे ही उसकी राजनीतिक व्याख्या शुरू हुई, मामला संगठन तक पहुंच गया। भाजपा नेता रामशरण नौटियाल ने सार्वजनिक रूप से मंत्री की टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए इसे अनुचित बताया। उन्होंने संकेत दिए कि पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा स्वीकार नहीं की जा सकती। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी दल में आंतरिक मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन जब वे सार्वजनिक मंचों पर सामने आने लगें, तो विपक्ष को हमला बोलने का अवसर मिल जाता है।
मामला बढ़ने के बाद भाजपा प्रदेश प्रवक्ता नवीन ठाकुर ने बयान जारी कर पार्टी का पक्ष रखा और यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा एक अनुशासित संगठन है तथा व्यक्तिगत बयानों को पार्टी की आधिकारिक लाइन नहीं माना जाना चाहिए। इसके बावजूद राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की रही कि यदि सब कुछ सामान्य था, तो प्रदेश नेतृत्व को सफाई देने की आवश्यकता क्यों पड़ी? विपक्ष ने भी इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा की आंतरिक खींचतान से जोड़ते हुए कहा कि चुनाव से पहले पार्टी के भीतर असंतोष सतह पर आने लगा है। चकराता विधानसभा सीट हमेशा से राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील मानी जाती रही है। यहां स्थानीय नेतृत्व, संगठन और चुनावी समीकरणों का विशेष महत्व रहता है। ऐसे में पूर्व प्रत्याशी और मंत्री के बीच सार्वजनिक मतभेद की चर्चा ने स्थानीय राजनीति को नई दिशा दे दी है। कार्यकर्ताओं के बीच भी इस घटनाक्रम को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी वर्ष में स्थानीय नेताओं की नाराजगी को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि बूथ स्तर की सक्रियता ही चुनावी जीत-हार का आधार बनती है। कांग्रेस ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भाजपा पहले अपने घर को संभाले। विपक्ष का आरोप है कि सरकार और संगठन के भीतर समन्वय की कमी अब सार्वजनिक रूप से दिखाई देने लगी है। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि पार्टी के भीतर संवाद की परंपरा है और किसी एक बयान को लेकर राजनीतिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 के नजदीक आते ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। ऐसे समय में नेताओं के हर बयान का राजनीतिक अर्थ निकाला जा रहा है। भाजपा जहां संगठन को मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों के आधार पर चुनावी तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल बनाने में जुटी है। ऐसे में सत्ता पक्ष के भीतर किसी भी प्रकार का सार्वजनिक मतभेद विपक्ष के लिए राजनीतिक हथियार बन सकता है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासित संगठन माना जाता है। लेकिन यदि स्थानीय स्तर पर नेताओं के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आते हैं, तो संगठन को समय रहते उन्हें सुलझाना होगा।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी नेतृत्व का प्रयास यही रहेगा कि किसी भी विवाद को लंबा न खिंचने दिया जाए और कार्यकर्ताओं के बीच एकजुटता का संदेश जाए। खेलकूद प्रतियोगिता के मंच से शुरू हुआ एक बयान अब उत्तराखंड की राजनीति का मुद्दा बन चुका है। मंत्री भरत चौधरी की टिप्पणी, रामशरण नौटियाल की सार्वजनिक नाराजगी और उसके बाद प्रदेश प्रवक्ता की सफाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनावी मौसम में शब्दों का राजनीतिक वजन कई गुना बढ़ जाता है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि भाजपा नेतृत्व इस विवाद को केवल बयानबाजी मानकर आगे बढ़ता है या संगठनात्मक स्तर पर संवाद के जरिए इसे शांत करता है। क्योंकि चुनावी राजनीति में कई बार विपक्ष से ज्यादा चुनौती अपने घर के भीतर उठे सवाल बन जाते हैं।
मंगलवार, 21 जुलाई 2026
udaydinmaan: यूकेडी में ‘अंदरूनी’ हलचल
udaydinmaan: यूकेडी में ‘अंदरूनी’ हलचल: चुनाव से पहले राष्ट्रीय दलों की राह पर उत्तराखंड क्रांति दल आशुतोष नेगी पर कार्रवाई से क्षेत्रीय राजनीति में खलबली 2027 चुनाव से पहले यूकेडी...
udaydinmaan: देवभूमि में ‘आस्था’ पर ‘सियासत’
udaydinmaan: देवभूमि में ‘आस्था’ पर ‘सियासत’: राजधानी में एक ही दिन में दो मुख्यालयों में घंटों चला ‘सियासी महाभारत’ भाजपा ने कहाकृसत्य सामने आएगा, कांग्रेस बोली चोरी नहीं, सिस्टम की मिल...
udaydinmaan: कलाकार नहीं, लोक स्मृति के प्रहरी थे ‘दर्जी’
udaydinmaan: कलाकार नहीं, लोक स्मृति के प्रहरी थे ‘दर्जी’: ढोल की थाप, सुई-धागे का हुनर और लोकगीतों की महककृयही थे पहाड़ में दर्जी जब गांवों का चौक ही बन जाता था रंगमंच और दर्जी होते थे उसके असली नायक...
udaydinmaan: उत्तराखंड में ‘इलेक्शन मोड’ आन
udaydinmaan: उत्तराखंड में ‘इलेक्शन मोड’ आन: भाजपा हैट्रिक की तैयारी में और कांग्रेस ने रची सत्ता की व्यूह रचना भाजपा का विकास कार्ड पर कांग्रेस का पलायन व रोजगार पर वार चुनाव में स्थान...
udaydinmaan: जेन जेड की ‘आवाज’ पर राष्ट्रीय बहस
udaydinmaan: जेन जेड की ‘आवाज’ पर राष्ट्रीय बहस: जंतर-मंतर से युवाओं की हुंकार से सोशल मीडिया पर गूंजा देश राहुल गांधी से लेकर बालीवुड सितारे तक जेन जेड के समर्थन में सरकार पर दबाव, पुलिस ...
udaydinmaan: राजनीतिक दलों के ‘वार रूम’ तैयार
udaydinmaan: राजनीतिक दलों के ‘वार रूम’ तैयार: विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर दलों ने जारी किया जंग का ब्लूप्रिंट कांग्रेस ने बदली चाल, सरकार विरोधी माहौल को वोट में बदलेगी पार्टी अब मेनिफेस...
यूकेडी में ‘अंदरूनी’ हलचल
चुनाव से पहले राष्ट्रीय दलों की राह पर उत्तराखंड क्रांति दल
आशुतोष नेगी पर कार्रवाई से क्षेत्रीय राजनीति में खलबली
2027 चुनाव से पहले यूकेडी में आपरेशन क्लीन या कुछ ओर
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में अब अनुशासन का डंडा केवल राष्ट्रीय दलों तक सीमित नहीं रह गया है। भाजपा और कांग्रेस में लगातार अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के बाद अब क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल भी उसी राह पर चलता दिखाई दे रहा है। पार्टी ने वरिष्ठ नेता आशुतोष नेगी को केंद्रीय उपाध्यक्ष पद से हटाकर साफ संकेत दे दिया है कि संगठन के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी या समानांतर राजनीति अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश की राजनीति धीरे-धीरे 2027 विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है और हर दल अपने संगठन को मजबूत व अनुशासित दिखाने की कोशिश में जुटा है। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यूकेडी जैसी क्षेत्रीय पार्टी, जो वर्षों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, इस समय अनुशासनात्मक कार्रवाई का जोखिम उठा सकती है?
पिछले कुछ महीनों में भाजपा ने कई नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किए और संगठन विरोधी गतिविधियों पर कार्रवाई की। कांग्रेस ने भी कई नेताओं पर अनुशासनात्मक कदम उठाए। अब यूकेडी में आशुतोष नेगी को केंद्रीय उपाध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद यह संदेश गया है कि क्षेत्रीय दल भी अब अंदरूनी असहमति को खुलकर स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल एक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि संगठन के भीतर अनुशासन स्थापित करने की कोशिश है। यूकेडी लंबे समय से गुटबाजी, नेतृत्व विवाद और लगातार कमजोर होते जनाधार से जूझती रही है। ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता पर कार्रवाई दो तरह के संदेश देती है। एक ओर नेतृत्व अपनी पकड़ मजबूत दिखाता है, वहीं दूसरी ओर असंतुष्ट नेताओं का नया खेमा भी तैयार हो सकता है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि पार्टी इस विवाद को समय रहते नहीं संभालती, तो चुनाव से पहले इसका नुकसान संगठनात्मक स्तर पर उठाना पड़ सकता है। उत्तराखंड में यूकेडी कभी राज्य आंदोलन की सबसे मजबूत राजनीतिक आवाज हुआ करती थी। लेकिन समय के साथ पार्टी का जनाधार लगातार सिमटता गया। आज स्थिति यह है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच क्षेत्रीय राजनीति के लिए जगह बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में यदि पार्टी के भीतर ही असंतोष खुलकर सामने आने लगे, तो उसका असर चुनावी तैयारियों पर भी पड़ सकता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यूकेडी नेतृत्व अब चुनाव से पहले संगठन को एकजुट और नियंत्रित रखना चाहता है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि व्यक्तिगत बयान या अनुशासनहीनता को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। हालांकि विपक्षी दल इस कार्रवाई को यूकेडी की आंतरिक कमजोरी और नेतृत्व संकट के रूप में भी पेश कर सकते हैं। आशुतोष नेगी को पद से हटाने का फैसला केवल एक संगठनात्मक आदेश नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति में बदलते राजनीतिक व्यवहार का संकेत भी है। अब चाहे राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय, हर पार्टी चुनाव से पहले अनुशासन पहले, असहमति बाद में की नीति पर चलती नजर आ रही है।
लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है कि अनुशासन संगठन को मजबूत भी करता है और कभी-कभी असंतोष की नई चिंगारी भी जगा देता है। यूकेडी के लिए यह फैसला किस दिशा में जाएगा, इसका जवाब आने वाले महीनों में पार्टी की एकजुटता और 2027 की चुनावी तैयारियां देंगी।
देवभूमि में ‘आस्था’ पर ‘सियासत’
राजधानी में एक ही दिन में दो मुख्यालयों में घंटों चला ‘सियासी महाभारत’
भाजपा ने कहाकृसत्य सामने आएगा, कांग्रेस बोली चोरी नहीं, सिस्टम की मिलीभगत
बदरीनाथ धाम के चढ़ावे में कथित चोरी के मुद्दे पर आमने-सामने आए भाजपा-कांग्रेस
देहरादून। बदरीनाथ धाम के चढ़ावे में कथित चोरी का मामला अब केवल जांच का विषय नहीं रहा, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा सियासी हथियार बनता जा रहा है। राजधानी देहरादून में महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित भाजपा और कांग्रेस मुख्यालयों में हुई दो अलग-अलग पत्रकार वार्ताओं ने यह साफ कर दिया कि देवभूमि की आस्था अब राजनीतिक अखाड़े के केंद्र में आ चुकी है।एक ओर भाजपा प्रदेश मुख्यालय में बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी मीडिया के सामने आए और आरोपों को राजनीतिक साजिश करार देते हुए कहा कि जांच चल रही है और सच सामने आएगा। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस मुख्यालय में प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सरकार और बीकेटीसी पर तीखा हमला बोलते हुए पूरे प्रकरण को प्रशासनिक विफलता और जवाबदेही के संकट का प्रतीक बताया।
भाजपा की प्रेस वार्ता का मूल संदेश था कि सरकार ने मामले को दबाने के बजाय जांच कराई, आरोपी के खिलाफ कार्रवाई हुई और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। पार्टी ने विपक्ष पर आस्था के मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया। इसके कुछ ही समय बाद कांग्रेस ने उसी मुद्दे पर मोर्चा खोल दिया। गणेश गोदियाल ने सवाल उठाया कि यदि व्यवस्थाएं इतनी मजबूत थीं तो आखिर चढ़ावे की चोरी हुई कैसे? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर देने से जवाबदेही पूरी हो जाती है, या शीर्ष स्तर पर भी नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
बदरीनाथ धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में चढ़ावे में कथित चोरी की घटना स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं से जुड़ा विषय है। लेकिन जिस तरह दोनों प्रमुख दल इसे अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव के अनुरूप पेश कर रहे हैं, उससे यह मामला अब धार्मिक भावना से आगे बढ़कर चुनावी विमर्श का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को सरकार की पारदर्शिता बनाम विपक्ष की राजनीति के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है, जबकि कांग्रेस इसे भ्रष्ट व्यवस्था और जवाबदेही के अभाव का प्रतीक बनाकर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है।
विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों की रणनीति स्पष्ट दिखने लगी है। कांग्रेस सरकार की साख पर सवाल खड़े करने के लिए बदरीनाथ प्रकरण को लगातार उठाना चाहती है। वहीं भाजपा यह संदेश देने में जुटी है कि उसने मामले में कार्रवाई कर यह साबित किया है कि भ्रष्टाचार पर उसकी नीति जीरो टालरेंस की है। यानी यह लड़ाई केवल एक चोरी की नहीं, बल्कि विश्वास बनाम जवाबदेही की राजनीतिक लड़ाई बनती जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या बदरीनाथ धाम जैसे पवित्र स्थल से जुड़ा मामला निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तक सीमित रहेगा, या फिर 2027 के चुनाव तक यह भाजपा और कांग्रेस के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा?
फिलहाल तस्वीर यही है कि एक मुख्यालय से सफाई दी जा रही है, दूसरे मुख्यालय से सवाल दागे जा रहे हैं। बीच में खड़ी है देवभूमि की जनता, जो यह जानना चाहती है कि आखिर चढ़ावे की सुरक्षा में चूक कैसे हुई, जिम्मेदार कौन है, और भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों इसके लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।
कलाकार नहीं, लोक स्मृति के प्रहरी थे ‘दर्जी’
ढोल की थाप, सुई-धागे का हुनर और लोकगीतों की महककृयही थे पहाड़ में दर्जी
जब गांवों का चौक ही बन जाता था रंगमंच और दर्जी होते थे उसके असली नायक
गीतों की गूंज, ढोल की थाप, सुई-धागे का हुनर होता था पूरे गांव की मुस्कान
देहरादून। हे दर्जी दिदा मीकू तु अंगढी बणै दे मेरि घगरि परै चमकदार मज़री लगै दे..गढ़वाल के इस पुराने गीत की धुन जब भी सुनी जाती है तो पहाड़ के गांवों का जीवन जीने वाले के जहन में पहाड़ के उस दर्जी की याद आती है, जो पहाड़ के लिए एक कलाकार ही नहीं लोक संस्कृति का संरक्षक था। पहाड़ के गांवों में एक समय ऐसा भी था, जब मनोरंजन के लिए न टेलीविजन था, न मोबाइल और न ही डीजे की कानफोड़ू आवाज। तब गांव की असली रौनक बनकर आते थे दर्जी और उनके साथ कुछ कलाकार भी जिन्हें बद्दी और बदयौण कहा जाता था। उत्तराखंड के पहाड़ों में अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था, लेकिन उनका काम एक ही थाकृगीतों, नृत्य, लोककथाओं और अपने हुनर से पूरे गांव को एक सूत्र में पिरो देना। जैसे ही किसी गांव में शादी-ब्याह, मेला, देवी-देवताओं का उत्सव या कोई बड़ा सामाजिक आयोजन होता, दर्जी अपने साथ ढोल, लोकगीत, रंग-बिरंगे वस्त्र और सुई-धागे का हुनर लेकर पहुंच जाते। उनके आने की खबर पूरे गांव में उत्सव का संदेश बन जाती।
सूरज ढलते ही गांव का चौक जगमगा उठता। बच्चे सबसे आगे, महिलाएं समूह बनाकर, बुजुर्ग अपने अनुभवों के साथ और युवा उत्साह से भरेकृहर कोई एक जगह इकट्ठा हो जाता। फिर शुरू होता लोकगीतों, नृत्यों और हास्य-व्यंग्य का ऐसा सिलसिला, जो देर रात तक चलता। दर्जी केवल गीत नहीं गाते थे, वह पहाड़ की आत्मा गाते थे। उनके गीतों में प्रेम था, विरह था, देवी-देवताओं की महिमा थी, वीरों की गाथाएं थीं और समाज को जोड़ने वाले संदेश भी थे। उनकी प्रस्तुति में मनोरंजन के साथ लोकशिक्षा भी छिपी होती थी।
दर्जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह केवल लोक कलाकार नहीं थे। गांव में ठहरने के दौरान वह कपड़े सिलते, नए वस्त्र तैयार करते, पुराने कपड़ों की मरम्मत करते और शादी-ब्याह के लिए विशेष परिधान भी बनाते थे। आज जिसे मल्टी-स्किल कहा जाता है, वह कला बद्दी सदियों पहले जी रहे थे। वह अपने श्रम से आजीविका कमाते थे और अपनी कला से गांव को आनंद देते थे। दर्जी एक गांव से दूसरे गांव जाते थे। वह केवल कार्यक्रम नहीं करते थे, बल्कि लोककथाएं, नए गीत, सामाजिक संदेश और आसपास के क्षेत्रों की खबरें भी साथ लेकर चलते थे। इस तरह वह पहाड़ के गांवों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी बन जाते थे। उनके आने से केवल एक आयोजन नहीं होता था, बल्कि गांव का सामाजिक जीवन भी जीवंत हो उठता था।
समय बदला। गांवों में सड़कें आईं, फिर टेलीविजन, मोबाइल और इंटरनेट ने जगह बना ली। रेडीमेड कपड़ों ने सुई-धागे की जरूरत कम कर दी और डीजे ने लोकधुनों की जगह ले ली। धीरे-धीरे दर्जी की आवाज पहाड़ की घाटियों से ओझल होने लगी। आज गांवों के चौक तो हैं, लेकिन वहां लोकगीतों की वह सामूहिक गूंज नहीं है। नई पीढ़ी बद्दी शब्द से भी अपरिचित होती जा रही है। बद्दी किसी एक व्यक्ति या समुदाय का नाम भर नहीं थे। वह उस पहाड़ की पहचान थे, जहां कला आजीविका भी थी और समाज को जोड़ने का माध्यम भी। उन्होंने बिना किसी मंच, बिना किसी प्रचार और बिना किसी पुरस्कार के पीढ़ियों तक पहाड़ की लोकसंस्कृति को जीवित रखा।
आज जब उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की बात कर रहा है, तब जरूरत है कि दर्जी जैसी लोक परंपराओं का दस्तावेजीकरण हो, उन पर शोध हो और उन्हें लोक महोत्सवों, विद्यालयों तथा सांस्कृतिक आयोजनों में सम्मानपूर्वक स्थान मिले।
उत्तराखंड में ‘इलेक्शन मोड’ आन
भाजपा हैट्रिक की तैयारी में और कांग्रेस ने रची सत्ता की व्यूह रचना
भाजपा का विकास कार्ड पर कांग्रेस का पलायन व रोजगार पर वार
चुनाव में स्थानीय मुद्दों की कसौटी पर होगी सत्ता की असली परीक्षा
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की औपचारिक घोषणा भले अभी दूर हो, लेकिन राज्य की राजनीति पूरी तरह चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। एक ओर भाजपा लगातार तीसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस संगठन को पुनर्जीवित करने, बूथ स्तर तक पहुंच बनाने और स्थानीय मुद्दों को चुनाव का केंद्र बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा का दावा है कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएं, मजबूत संगठन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में किए गए कार्य उसे फिर सत्ता तक पहुंचाएंगे। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, पेपर लीक, स्वास्थ्य और पहाड़ों से जुड़े बुनियादी सवालों पर सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी उसका बूथ नेटवर्क और संगठनात्मक ढांचा है। पार्टी लंबे समय से बूथ प्रबंधन, लाभार्थी संपर्क और कार्यकर्ता-आधारित चुनावी माडल पर काम करती रही है। चुनाव से पहले भी संगठन को गांव-गांव और घर-घर तक सक्रिय करने की कवायद तेज है। भाजपा का आकलन है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ उसे चुनावी बढ़त दिला सकता है। सत्ता में लगातार दो कार्यकाल पूरे करने के बाद किसी भी सरकार के सामने स्वाभाविक रूप से स्थानीय असंतोष की चुनौती आती है। कई क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार, पेयजल, शिक्षा और पलायन जैसे मुद्दे अभी भी प्रमुख चुनावी विषय बने हुए हैं।
इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ स्थानीय नाराजगी की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में सुनाई देती हैं। ऐसे में भाजपा के लिए उम्मीदवार चयन भी एक अहम चुनौती हो सकता है। कांग्रेस इस बार केवल सरकार विरोधी राजनीति तक सीमित रहने के बजाय बूथ संगठन, मेनिफेस्टो और जनसंपर्क पर विशेष जोर देती दिखाई दे रही है। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व ने संगठनात्मक एकजुटता और चुनावी तैयारी पर विशेष बल दिया है। यदि कांग्रेस स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के साथ संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत कर पाती है, तो कई सीटों पर मुकाबला पहले से अधिक कड़ा हो सकता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार इन मुद्दों की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है। युवाओं के लिए रोजगार और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, पलायन और पर्वतीय क्षेत्रों का विकास, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं, पर्यटन, चारधाम और स्थानीय अर्थव्यवस्था, महिला सुरक्षा और स्वरोजगार, आपदा प्रबंधन और पुनर्वास, महंगाई और किसान हित प्रमुख हैं। भाजपा की रणनीति विकास, संगठन और नेतृत्व पर केंद्रित रहने की संभावना है, जबकि कांग्रेस स्थानीय असंतोष, सामाजिक-आर्थिक मुद्दों और संगठन विस्तार के जरिए चुनावी बढ़त बनाने की कोशिश करेगी। क्षेत्रीय दल भी कुछ सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि 2027 का चुनाव केवल नारों का नहीं, बल्कि माइक्रो मैनेजमेंट बनाम जनभावनाओं की लड़ाई होगा। भाजपा का लक्ष्य अपने मजबूत संगठन को वोट में बदलना होगा, जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वह सरकार विरोधी रुझानों को प्रभावी चुनावी समर्थन में बदल पाए। यानी कि प्रचंड बहुमत का दावा और सत्ता परिवर्तन की उम्मीदकृदोनों की असली परीक्षा अब चुनावी मैदान में होगी। उत्तराखंड की राजनीति का अगला अध्याय बूथों पर लिखा जाएगा, जहां अंतिम फैसला मतदाता करेगा।
जेन जेड की ‘आवाज’ पर राष्ट्रीय बहस
जंतर-मंतर से युवाओं की हुंकार से सोशल मीडिया पर गूंजा देश
राहुल गांधी से लेकर बालीवुड सितारे तक जेन जेड के समर्थन में
सरकार पर दबाव, पुलिस बोली-कानून-व्यवस्था थी प्राथमिकता
नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन अब केवल छात्रों का प्रदर्शन नहीं रह गया है। सोशल मीडिया की ताकत ने इसे राष्ट्रीय बहस में बदल दिया है। विपक्षी नेताओं, फिल्मी हस्तियों और छात्र संगठनों के खुलकर सामने आने से केंद्र सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है। वहीं सरकार और पुलिस अपने कदमों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक बता रही है। प्रदर्शन के दौरान सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी है। एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर आंदोलन से जुड़े हैशटैग लगातार ट्रेंड करते रहे। हजारों लोग छात्रों के समर्थन में पोस्ट साझा करते दिखे, जबकि सत्ता पक्ष के समर्थकों ने पुलिस कार्रवाई को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी बताया।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और युवाओं की आवाज को दबाने के बजाय उसे सुना जाना चाहिए। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार संवाद की जगह दमन का रास्ता अपना रही है। कांग्रेस के अलावा अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर उठाने के संकेत दिए हैं। सिर्फ राजनीति ही नहीं, फिल्म जगत की कई चर्चित हस्तियां भी छात्रों के समर्थन में सामने आईं। अभिनेता सोनू सूद ने कहा कि छात्रों को लाठियां नहीं, गले लगाने वाले हाथ चाहिए। अभिनेता रितेश देशमुख ने लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का समर्थन किया। वरिष्ठ अभिनेत्री शबाना आजमी ने असहमति के सम्मान की बात कही, जबकि अभिनेता प्रकाश राज ने सरकार से छात्रों के साथ संवाद स्थापित करने की अपील की। इन प्रतिक्रियाओं के बाद आंदोलन को सोशल मीडिया पर और अधिक गति मिली।
विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन इसलिए भी अलग दिखाई दे रहा है क्योंकि इसकी सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया बन गया है। प्रदर्शन स्थल से लाइव वीडियो, पुलिस कार्रवाई के दृश्य और छात्रों के बयान कुछ ही मिनटों में देशभर में पहुंच गए। कई विश्वविद्यालयों के छात्र संगठनों ने भी आनलाइन समर्थन अभियान शुरू कर दिया है।
हालांकि सरकार और दिल्ली पुलिस ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने बैरिकेडिंग पार करने और प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर बढ़ने का प्रयास किया था। ऐसे में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की गई। पुलिस का दावा है कि किसी भी प्रकार की कार्रवाई नियमानुसार की गई और सार्वजनिक सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता थी। सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का सम्मान करती है, लेकिन किसी भी प्रदर्शन को कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सरकार का यह भी आरोप है कि कुछ राजनीतिक दल छात्रों के आंदोलन को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आंदोलन को जिस तरह विपक्ष और सामाजिक क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों का समर्थन मिला है, उससे सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ा है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष इस मुद्दे को कानून-व्यवस्था और राजनीतिक उकसावे के नजरिए से देख रहा है। ऐसे में संसद सत्र के दौरान इस मुद्दे पर तीखी टकराहट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल छात्र संगठन अपने आंदोलन को जारी रखने पर अड़े हैं और सरकार की ओर से भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात दोहराई जा रही है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या दोनों पक्षों के बीच संवाद का रास्ता निकलता है या यह आंदोलन आने वाले दिनों में और व्यापक रूप लेता है।
बाक्स
यह है पूरा मामला
देशभर से छात्र अपनी विभिन्न मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की और हिरासत की घटनाएं सामने आईं। कार्रवाई के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ा, जबकि सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। आंदोलन अभी जारी है और इस पर देशभर की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।
राजनीतिक दलों के ‘वार रूम’ तैयार
विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर दलों ने जारी किया जंग का ब्लूप्रिंट
कांग्रेस ने बदली चाल, सरकार विरोधी माहौल को वोट में बदलेगी पार्टी
अब मेनिफेस्टो से माहौल और बूथ से वोट साधने की तैयारी में है कांग्रेस
भाजपा के मजबूत संगठन के सामने कांग्रेस की असली परीक्षा बूथ पर
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। सत्ता में बैठी भाजपा जहां संगठन और लाभार्थी नेटवर्क के भरोसे लगातार अपनी चुनावी मशीनरी को धार दे रही है, वहीं कांग्रेस ने अब अपनी रणनीति का केंद्र दो मोर्चों को बनाया हैकृजनता से सीधे जुड़े मुद्दों पर आधारित मेनिफेस्टो और बूथ स्तर तक संगठन का पुनर्गठन। पार्टी के भीतर यह समझ बन रही है कि केवल सरकार के खिलाफ माहौल बनाना पर्याप्त नहीं होगा। यदि उस असंतोष को मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचाया गया, तो राजनीतिक लाभ सीमित रह सकता है। यही वजह है कि कांग्रेस अब भाषणों से ज्यादा बूथ और घोषणा पत्र की राजनीति पर जोर देती दिखाई दे रही है।
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस इस बार घोषणा पत्र को चुनाव के आखिरी दिनों में जारी होने वाला औपचारिक दस्तावेज नहीं रहने देना चाहती। पार्टी चाहती है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं, स्थानीय रोजगार, महिला सुरक्षा और युवाओं के अवसर जैसे मुद्दों पर पहले जनसंपर्क किया जाए और उसी आधार पर घोषणा पत्र तैयार हो। रणनीति यह है कि जब कार्यकर्ता गांव-गांव और वार्ड-वार्ड जाएंगे, तो वह केवल प्रचार नहीं करेंगे, बल्कि लोगों की प्राथमिकताओं को भी दर्ज करेंगे। इससे पार्टी को यह संदेश देने का अवसर मिलेगा कि उसका एजेंडा ऊपर से तय नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी से तैयार हुआ है।
उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बेहद कम रहा है। ऐसे में बूथ प्रबंधन का महत्व और बढ़ जाता है। कांग्रेस का आकलन है कि यदि प्रत्येक बूथ पर सक्रिय टीम, नियमित मतदाता संपर्क और मतदान दिवस की प्रभावी तैयारी हो, तो कई सीटों पर मुकाबला बदला जा सकता है। इसी कारण पार्टी बूथ समितियों के पुनर्गठन, निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और नए स्वयंसेवकों को जोड़ने पर जोर दे रही है। संगठन के भीतर यह संदेश दिया जा रहा है कि चुनाव केवल बड़े नेताओं की रैलियों से नहीं, बल्कि मतदान केंद्र तक पहुंचने वाले नेटवर्क से जीते जाते हैं।
दूसरी ओर भाजपा के सामने अलग तरह की चुनौती है। सत्ता विरोधी रुझान की चर्चा के बीच पार्टी अपने संगठित ढांचे, लाभार्थी संपर्क अभियानों और बूथ नेटवर्क पर भरोसा बनाए हुए है। भाजपा लंबे समय से बूथ सशक्तीकरण, पन्ना प्रमुख और नियमित संगठनात्मक बैठकों के माडल पर काम करती रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका चुनावी प्रबंधन है, जबकि कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यही क्षेत्र रहा है। इसलिए 2027 का मुकाबला केवल नारों का नहीं, बल्कि संगठनात्मक क्षमता की परीक्षा भी होगा। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है। यदि पार्टी केवल सरकार की आलोचना तक सीमित रहती है, तो उसका लाभ सीमित हो सकता है। लेकिन यदि वह रोजगार, शिक्षा, पलायन, स्वास्थ्य, पर्यटन, कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर स्पष्ट और विश्वसनीय रोडमैप पेश करती है, तो वह चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकती है।
वहीं भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपनी उपलब्धियों और विकास के दावों के साथ-साथ स्थानीय असंतोष का भी प्रभावी जवाब दे। चुनाव नजदीक आते-आते उम्मीदवार चयन, स्थानीय समीकरण और क्षेत्रीय मुद्दे भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आने वाले महीनों में दोनों दलों की सक्रियता गांवों, कस्बों और बूथों पर सबसे अधिक दिखाई देगी। बड़े मंचों और सोशल मीडिया से आगे बढ़कर घर-घर संपर्क, स्थानीय बैठकों और संगठन विस्तार पर जोर बढ़ सकता है। ऐसे में 2027 की चुनावी तस्वीर केवल राजधानी की राजनीतिक हलचल से तय नहीं होगी, बल्कि उन हजारों बूथों पर लिखी जाएगी जहां मतदाता अंतिम फैसला करेंगे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस का यह बदलाव एक संदेश भी हैकृपार्टी चुनाव को केवल सरकार बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं, बल्कि संगठन बनाम संगठन की चुनौती के रूप में देख रही है। दूसरी ओर भाजपा अपने स्थापित चुनावी ढांचे को और मजबूत करने में जुटी है।
यानी 2027 की लड़ाई का पहला दौर शुरू हो चुका है। अभी मंचों पर भाषण कम हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के वार रूम पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि किस दल की रणनीति जनता के बीच अधिक प्रभाव छोड़ती है और कौन अपने संगठन को मतदान के दिन तक सबसे प्रभावी ढंग से सक्रिय रख पाता है।
सोमवार, 20 जुलाई 2026
udaydinmaan: श्रम, संघर्ष और संस्कृति की प्रतीक है ‘घस्यारी’
udaydinmaan: श्रम, संघर्ष और संस्कृति की प्रतीक है ‘घस्यारी’: देवभूमि की असली देवी है घस्यारी, बुग्यालों से भी भारी है इनका हौसला खूबसूरत नज़ारों के पीछे छिपा संघर्ष, जिसने सदियों से बचा कर रखी है पहाड़ क...
udaydinmaan: बाहर जेन जेड और सदन के भीतर विपक्ष ने सरकार को घेरा
udaydinmaan: बाहर जेन जेड और सदन के भीतर विपक्ष ने सरकार को घेरा: संसद के बाहर युवाओं हल्ला, भीतर सरकार पर विपक्ष का वार रोजगार, पेपर लीक, शिक्षा के मुद्दे पर दिल्ली में गरमाया माहौल संसद के मानसून सत्र के ...
udaydinmaan: हैट्रिक के ‘ख्वाब’ में चुनौतियों का ‘पहाड़’
udaydinmaan: हैट्रिक के ‘ख्वाब’ में चुनौतियों का ‘पहाड़’: लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के ऐतिहासिक लक्ष्य के साथ भाजपा ने झोंकी ताकत समय से पहले चुनावी तैयारी के बावजूद सत्ता विरोधी लहर का डर पा...
udaydinmaan: सत्ता परिवर्तन के संदेश संग कांग्रेस मैदान में
udaydinmaan: सत्ता परिवर्तन के संदेश संग कांग्रेस मैदान में: विधानसभा चुनाव की आहट के साथ कांग्रेस ने झोंकी ताकत सत्ता परिवर्तन का संदेश लेकर सड़कों पर उतरने की रणनीति सिर्फ रैलियां नहीं, सुस्त पड़े कार...
udaydinmaan: पहाड़ में ‘सेर’ और ‘पाथा’
udaydinmaan: पहाड़ में ‘सेर’ और ‘पाथा’: जब तराजू नहीं, भरोसा तौलता था सौदा, गांव की अर्थव्यवस्था का आधार था ‘पाथा’ न डिजिटल तराजू थे, न इलेक्ट्रानिक कांटे, फिर भी व्यापार में थी ईम...
udaydinmaan: सात मोड़ पर ‘सियासत’ सात सौ पर ‘सन्नाटा’
udaydinmaan: सात मोड़ पर ‘सियासत’ सात सौ पर ‘सन्नाटा’: जहाँ तक आराम से दौड़ सकती हैं एसी गाड़ियाँ, कैमरे व बयानबाजी का पाखंड सिर्फ वहीं तक जनता ने नेताओं को फर्श से अर्श पर पहुँचाया, बदले में मिली...
udaydinmaan: संसद चलो पर ‘डंडे’ की दीवार
udaydinmaan: संसद चलो पर ‘डंडे’ की दीवार: जंतर-मंतर से खदेड़े गए प्रदर्शनकारी, कई लोग हिरासत में बैरिकेड तोड़ संसद की ओर बढ़ी भीड़, पुलिस का लाठीचार्ज राजधानी रणक्षेत्र में तब्दील, संसद ...
संसद चलो पर ‘डंडे’ की दीवार
जंतर-मंतर से खदेड़े गए प्रदर्शनकारी, कई लोग हिरासत में
बैरिकेड तोड़ संसद की ओर बढ़ी भीड़, पुलिस का लाठीचार्ज
राजधानी रणक्षेत्र में तब्दील, संसद सत्र के पहले दिन चढ़ा पारा
नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन देश की राजधानी का राजनीतिक तापमान उबाल पर पहुंच गया। काकरोच जनता पार्टी के संसद चलो मार्च को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग तक अभेद्य सुरक्षा घेरा खड़ा कर दिया। जैसे ही हजारों प्रदर्शनकारी बैरिकेड पार कर संसद की ओर बढ़ने लगे, पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज किया। कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, जबकि पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
सुबह से ही जंतर-मंतर पर देशभर से आए छात्रों, युवाओं और काकरोच जनता पार्टी समर्थकों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया था। मंच से लगातार शांतिपूर्ण मार्च का आह्वान किया जा रहा था, लेकिन जैसे ही भीड़ संसद मार्ग की ओर बढ़ी, पुलिस ने पहले बैरिकेडिंग से रोकने की कोशिश की। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड हटाने का प्रयास किया, जिसके बाद सुरक्षा बलों ने भीड़ को पीछे धकेलने के लिए बल प्रयोग किया। कई स्थानों पर लाठीचार्ज के दृश्य सामने आए और दर्जनों लोगों को पुलिस वाहनों में बैठाकर ले जाया गया।
दिल्ली पुलिस पहले ही स्पष्ट कर चुकी थी कि संसद चलो मार्च की कोई अनुमति नहीं दी गई है। नई दिल्ली जिले में बीएनएसएस की धारा 163 लागू होने तथा संसद क्षेत्र को हाई-सिक्योरिटी जोन घोषित किए जाने का हवाला देते हुए पुलिस ने किसी भी जुलूस को अवैध बताया था। इसी के मद्देनजर जंतर-मंतर, संसद भवन, इंडिया गेट और आसपास के इलाकों में भारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई थी। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि भी कम राजनीतिक नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर हुई परीक्षा अनियमितताओं और पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन अब शिक्षा व्यवस्था, युवाओं के रोजगार और सरकारी जवाबदेही का बड़ा प्रतीक बन चुका है। आंदोलन को नया बल तब मिला जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को उनके अनशन के दौरान अस्पताल ले जाया गया। उनके समर्थकों का आरोप है कि यह कार्रवाई आंदोलन को कमजोर करने के लिए की गई, जबकि प्रशासन का कहना है कि स्वास्थ्य कारणों से चिकित्सकीय हस्तक्षेप जरूरी था।
सोमवार को वांगचुक की अनुपस्थिति में भी प्रदर्शनकारियों का उत्साह कम नहीं दिखा। उनकी पत्नी भी आंदोलन स्थल पर पहुंचीं और समर्थकों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की अपील की। दूसरी ओर काकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व ने दावा किया कि उनका मार्च पूरी तरह अहिंसक था और टकराव प्रशासन की सख्ती का परिणाम है। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा घेरा तोड़ने का प्रयास किया, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पैदा हुई। अधिकारियों के अनुसार संसद सत्र के पहले दिन किसी भी तरह की सुरक्षा चूक स्वीकार्य नहीं थी, इसलिए आवश्यक बल प्रयोग किया गया। हालांकि सोशल मीडिया और विभिन्न वीडियो में लाठीचार्ज और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने के दृश्य तेजी से वायरल हुए, जिससे सरकार की कार्रवाई पर सवाल भी उठने लगे।
घटनाक्रम के बीच विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर लोकतांत्रिक विरोध को दबाने का आरोप लगाया। कई विपक्षी नेताओं ने कहा कि यदि युवाओं को अपनी बात संसद तक पहुंचाने से रोका जाएगा तो असंतोष और बढ़ेगा। वहीं भाजपा और सरकार समर्थक नेताओं ने पुलिस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि संसद की सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता है और बिना अनुमति किसी भी भीड़ को संवेदनशील क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने दिया जा सकता। दिल्ली मेट्रो ने भी सुरक्षा कारणों से कुछ समय के लिए कई स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद कर दिए, जिससे आम यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। राजधानी के वीआईपी क्षेत्र में यातायात लंबे समय तक प्रभावित रहा।
संसद के मानसून सत्र की शुरुआत जिस तरह सड़कों पर टकराव के साथ हुई है, उसने साफ संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं का असंतोष संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने वाला है। सरकार इसे कानून-व्यवस्था का मामला बता रही है, जबकि आंदोलनकारी इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश के रूप में पेश कर रहे हैं। यही टकराव अब राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचता दिखाई दे रहा है।
सात मोड़ पर ‘सियासत’ सात सौ पर ‘सन्नाटा’
जहाँ तक आराम से दौड़ सकती हैं एसी गाड़ियाँ, कैमरे व बयानबाजी का पाखंड सिर्फ वहीं तक
जनता ने नेताओं को फर्श से अर्श पर पहुँचाया, बदले में मिलीं सिर्फ अधूरी सड़कें
उत्तराखंड का हाल, जहां सड़क नहीं पहुंची, वहां राजनीति भी नहीं पहुंचती
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का भी अपना एक भूगोल है। यह भूगोल नक्शे से नहीं, बल्कि सड़कों से तय होता है। जहां तक एसी वाली गाड़ियां आराम से पहुंच जाती हैं, वहां धरना भी होता है, प्रदर्शन भी होता है, कैमरे भी पहुंचते हैं और नेताओं के बयान भी। लेकिन जहां पहुंचने के लिए सात सौ मोड़ पार करने पड़ें, जहां सड़क आज भी अधूरी हो, जहां एंबुलेंस नहीं पहुंचती और मरीजों को चारपाई पर ढोना पड़ता हो, वहां न कोई आंदोलन दिखाई देता है और न कोई राजनीतिक संवेदना।
प्रदेश बनने के बाद से लेकर आज तक पुरोला की जनता ने हर दल और हर चेहरे पर भरोसा किया। कभी कांग्रेस को मौका दिया, कभी भाजपा को। मालामाल नेताओं को जनता ने वोट देकर विधानसभा और संसद तक पहुंचाया। किसी को विधायक बनाया, किसी को सांसद। चुनाव दर चुनाव उम्मीद यही रही कि अब शायद गांव तक सड़क पहुंचेगी, अस्पताल बेहतर होंगे, पलायन रुकेगा और पहाड़ की जिंदगी आसान होगी। नेता बदलते रहे, सरकारें बदलती रहीं, चुनावी नारे बदलते रहे, मगर पुरोला के कई गांवों की तस्वीर नहीं बदली। जिन नेताओं को जनता ने सिर आंखों पर बैठाया, वह राजधानी की राजनीति में रम गए। उनके परिवार शहरों में बस गए। बच्चों की पढ़ाई महानगरों में हुई, इलाज बड़े अस्पतालों में हुआ और सुविधाओं से भरपूर जीवन उनकी नई पहचान बन गया। दूसरी ओर, जिन लोगों के वोट से यह राजनीतिक सफर तय हुआ, वह आज भी सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
हाल के दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में सड़क और प्रदर्शन दोनों चर्चा का विषय बने हैं। लेकिन एक सवाल बार-बार उठता हैकृक्या आंदोलन भी अब सड़क देखकर तय होंगे? जहां तक आरामदायक सड़क है, वहां प्रदर्शन करना आसान है। मीडिया पहुंच जाएगा, कैमरे लग जाएंगे, सोशल मीडिया पर वीडियो बन जाएंगे और कुछ घंटे बाद सब अपने-अपने घर लौट जाएंगे। लेकिन प्रदेश के पुरोला जैसे इलाकों में, जहां गांव तक पहुंचने के लिए सैकड़ों मोड़ और कई किलोमीटर पैदल रास्ता तय करना पड़ता है, वहां कौन जाएगा? क्या किसी बड़े नेता ने कभी दोणी जैसे दूरस्थ गांवों तक जाकर वहां की वास्तविक स्थिति देखने की कोशिश की?
बता दें कि पुरोला क्षेत्र का दोणी गांव केवल एक गांव नहीं, बल्कि उस विकास माडल पर सवाल है, जिसमें राजधानी चमकती है लेकिन सीमांत अंधेरे में रह जाता है। बताया जाता है कि आज भी गांव के लोग सड़क के अभाव में गंभीर कठिनाइयों का सामना करते हैं। बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना किसी परीक्षा से कम नहीं। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की तकलीफें चुनावी भाषणों का हिस्सा तो बनती हैं, लेकिन समाधान का नहीं। जब कोई मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाता, तब वह केवल एक व्यक्ति की नहीं, पूरे सिस्टम की असफलता होती है।
आज का दौर सोशल मीडिया का है। नेताओं के वीडियो वायरल होते हैं। कहीं पेड़ के चारों ओर घूमकर रील बनाई जाती है, कहीं विकास के दावे कैमरे के सामने दोहराए जाते हैं। लेकिन पहाड़ की असली रील कोई कैमरा रिकार्ड नहीं करता। वह रील उस मरीज की है जिसे चार लोग कंधे पर उठाकर सड़क तक ला रहे हैं। वह रील उस बुजुर्ग की है जो इलाज के लिए घंटों सफर करता है। वह रील उस छात्र की है जिसे पढ़ाई के लिए गांव छोड़ना पड़ता है। वह रील उस मां की है जो बारिश में फिसलते रास्तों पर राशन ढोती है। यह रील वायरल नहीं होती, क्योंकि यहां कैमरे कम और तकलीफें ज्यादा हैं।
कल्पना कीजिए, यदि दोणी गांव तक अच्छी सड़क होती, यदि वहां एसी कारें पहुंच सकतीं, यदि राजनीतिक काफिले आसानी से पहुंच जाते, तो शायद वहां भी मंच सजता, नारे लगते, फोटो खिंचती और सरकार पर दबाव बनाने के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते। शायद किसी राष्ट्रीय नेता का काफिला रोकने की घोषणा भी होती। शायद संसद में आवाज उठाने की चेतावनी भी दी जाती। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यह गांव सात मोड़ों पर नहीं, सात सौ मोड़ों के पार है। वहां पहुंचना कठिन है, इसलिए वहां की पीड़ा भी राजनीति की प्राथमिकता नहीं बन पाती।
उत्तराखंड सरकार लगातार विकसित उत्तराखंड, अंतिम छोर तक विकास और सड़क हर गांव तक जैसे दावे करती रही है। कई सड़क परियोजनाओं की घोषणाएं भी हुई हैं। लेकिन यदि राज्य बनने के ढाई दशक बाद भी सीमांत गांव सड़क के लिए तरस रहे हैं, तो सवाल केवल किसी एक गांव का नहीं, बल्कि विकास की पूरी अवधारणा का है। क्या विकास केवल चारधाम मार्ग तक सीमित रहेगा? क्या राजधानी और पर्यटन क्षेत्रों की चमक ही विकास का पैमाना होगी?क्या सीमांत क्षेत्रों का नागरिक केवल चुनाव के समय याद किया जाएगा?
प्रदेश में पुरोला, दोणी और ऐसे ही अनेक गांव अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होंगे। उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उनकी सड़क कब बनेगी, एंबुलेंस कब पहुंचेगी, अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता कब आसान होगा और उनके बच्चों को भी वही सुविधाएं कब मिलेंगी जो राजधानी के लोगों को सहज उपलब्ध हैं। क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा राजधानी की चौड़ी सड़कों पर नहीं, बल्कि उन सात सौ मोड़ों के पार होती है जहां आज भी विकास पहुंचने का इंतजार कर रहा है।
पहाड़ में ‘सेर’ और ‘पाथा’
जब तराजू नहीं, भरोसा तौलता था सौदा, गांव की अर्थव्यवस्था का आधार था ‘पाथा’
न डिजिटल तराजू थे, न इलेक्ट्रानिक कांटे, फिर भी व्यापार में थी ईमानदारी की मिसाल
डिजिटल जमाने ने छीन लिया पहाड़ के ‘सेर-पाथा’ वाला वह आपसी विश्वास
देहरादून। आज जब हर दुकान पर डिजिटल मशीनें लगी हैं और वजन ग्रामों में मापा जाता है, तब नई पीढ़ी शायद यह भी नहीं जानती कि कभी उत्तराखंड के पहाड़ों में सेर और पाथा ही व्यापार और जीवन का आधार हुआ करते थे। ये केवल वजन और माप की इकाइयां नहीं थीं, बल्कि पहाड़ की सामाजिक संस्कृति, विश्वास और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की पहचान थीं। पहाड़ के गांवों में धान, झंगोरा, मंडुवा, गेहूं, राजमा, गहत, भट्ट और मसूर जैसे अनाज का लेन-देन अक्सर पाथा से होता था। लकड़ी से बना एक विशेष पात्र होता था, जिसे पाथा कहा जाता था। उसमें अनाज भरकर मापा जाता था। किसी ने दो पाथा मंडुवा दिया, किसी ने पांच पाथा गेहूं उधार लिया। गांव की छोटी-बड़ी खरीद-बिक्री का यही सबसे विश्वसनीय तरीका था।
उस समय न रसीद होती थी, न बिल। केवल जुबान और भरोसा ही सबसे बड़ा दस्तावेज होता था। जब गांव से लोग कस्बों के बाजार पहुंचते थे, तब वहां सेर का बोलबाला होता था। घी, तेल, गुड़, चीनी, नमक और दालें सेर के हिसाब से खरीदी जाती थीं। दुकानदार लोहे के बाट और तराजू से सामान तौलता था। एक सेर, आधा सेर, पाव और छटांक जैसी इकाइयां हर घर की महिलाओं और किसानों की जुबान पर रहती थीं। आज की पीढ़ी किलो और ग्राम जानती है, लेकिन कभी पूरे पहाड़ की अर्थव्यवस्था सेर के इर्द-गिर्द घूमती थी।
उस दौर की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि व्यापार केवल लाभ कमाने का माध्यम नहीं था। दुकानदार जानता था कि सामने वाला ग्राहक उसका पड़ोसी भी है। किसान जानता था कि अगली फसल तक उधार भी मिल जाएगा। यदि किसी के घर शादी होती, तो पूरा गांव अनाज पाथा-पाथा जोड़कर मदद करता। यदि किसी परिवार की फसल खराब हो जाती, तो पड़ोसी बिना हिसाब-किताब के अनाज दे देते। यही पहाड़ की असली सामाजिक पूंजी थी।
पहाड़ के दूरस्थ इलाकों में नकदी का प्रचलन बहुत कम था। कई बार लोहार, बढ़ई, दर्जी और अन्य पारंपरिक कारीगरों को मजदूरी पैसे से नहीं, बल्कि अनाज में दी जाती थी। इसे स्थानीय स्तर पर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों से जाना जाता था। कटाई के मौसम में पूरा गांव श्रमदान करता और बाद में पाथा के हिसाब से अनाज बांटा जाता। यह केवल लेन-देन नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का हिस्सा था।
स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे भारत में मीट्रिक प्रणाली लागू हुई। सेर की जगह किलोग्राम और पाथा जैसे पारंपरिक मापों का स्थान आधुनिक मानकों ने ले लिया। बाजार आधुनिक हुए, पैकेजिंग आई, इलेक्ट्रानिक तराजू आए और पुरानी माप-तौल की प्रणालियां इतिहास बनने लगीं। आज गांवों के बुजुर्ग ही शायद बता सकें कि एक पाथा में कितना अनाज आता था या एक सेर का वास्तविक महत्व क्या था। सेर और पाथा के खत्म होने के साथ केवल माप-तौल नहीं बदली, बल्कि गांवों की जीवनशैली भी बदल गई। अब उधार मोबाइल ऐप में दर्ज होता है। रिश्ते बैंक खाते से मापे जाने लगे हैं। सामुदायिक सहयोग की जगह बाजार ने ले ली है। विश्वास की जगह लिखित अनुबंध ने ले ली है। पहाड़ की पारंपरिक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे आधुनिक बाजार में समा गई।
आज जब उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की बात करता है, तब केवल लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक वेशभूषा ही नहीं, बल्कि सेर, पाथा, नाली, मुट्ठी, छटांक जैसी पारंपरिक माप प्रणालियां भी हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। स्कूलों में स्थानीय इतिहास पढ़ाया जाए, संग्रहालयों में पुराने बाट, तराजू और पाथा प्रदर्शित किए जाएं, और गांवों के बुजुर्गों की स्मृतियों को दस्तावेज़ बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि पहाड़ की पहचान केवल हिमालय नहीं, बल्कि उसकी जीवन-पद्धति भी है।
पहाड़ का सेर केवल वजन नहीं था और पाथा केवल माप नहीं था। वे उस दौर के प्रतीक थे, जब इंसान की नीयत तराजू से भारी होती थी, भरोसा किसी रसीद का मोहताज नहीं था और गांव की समृद्धि केवल धन से नहीं, बल्कि आपसी विश्वास से मापी जाती थी। शायद यही कारण है कि पुराने लोग आज भी कहते हैंकृपहाड़ बदल गया है, लेकिन सेर और पाथा के साथ जो अपनापन गया, उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी।
सत्ता परिवर्तन के संदेश संग कांग्रेस मैदान में
विधानसभा चुनाव की आहट के साथ कांग्रेस ने झोंकी ताकत
सत्ता परिवर्तन का संदेश लेकर सड़कों पर उतरने की रणनीति
सिर्फ रैलियां नहीं, सुस्त पड़े कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा
फूंककर संगठन को जमीनी स्तर पर री-बूट करने की कोशिश
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव-2027 की आहट के बीच कांग्रेस ने प्रदेश में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। पार्टी की परिवर्तन संकल्प यात्रा को आगामी चुनाव के लिए माहौल बनाने और सत्ता परिवर्तन के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने की बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस इस यात्रा के माध्यम से भाजपा सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, परिवर्तन संकल्प यात्रा प्रदेश के विभिन्न जिलों और विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरेगी। यात्रा का उद्देश्य केवल सरकार के खिलाफ माहौल बनाना नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरना और संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करना भी है।
कांग्रेस का मानना है कि प्रदेश में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, बढ़ती महंगाई और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर जनता में नाराजगी है। पार्टी इन्हीं मुद्दों को यात्रा का प्रमुख आधार बनाकर जनता के बीच जाने की रणनीति बना रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह यात्रा केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनता की आवाज को विधानसभा तक पहुंचाने का अभियान होगी। पार्टी का दावा है कि प्रदेश में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है और परिवर्तन संकल्प यात्रा उसी जनभावना को स्वर देने का प्रयास है।
पिछले कुछ चुनावों में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता रही है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व इस यात्रा के जरिए कार्यकर्ताओं और नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यात्रा का एक बड़ा उद्देश्य कार्यकर्ताओं में यह संदेश देना भी है कि पार्टी चुनावी मोड में आ चुकी है और सत्ता में वापसी के लिए गंभीरता से तैयारी कर रही है। परिवर्तन संकल्प यात्रा के दौरान कांग्रेस सरकार की नीतियों, बढ़ती बेरोजगारी, पलायन, कृषि संकट और नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाएगी। पार्टी यह संदेश देने का प्रयास करेगी कि प्रदेश को एक वैकल्पिक राजनीतिक दिशा की आवश्यकता है।
दूसरी ओर भाजपा कांग्रेस की इस यात्रा को राजनीतिक नौटंकी बताते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने रखने की तैयारी में है। भाजपा का कहना है कि विकास कार्यों और बड़े निर्णयों के दम पर वह तीसरी बार भी जनता का विश्वास हासिल करेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि परिवर्तन संकल्प यात्रा को केवल एक संगठनात्मक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह कांग्रेस के लिए चुनावी शंखनाद भी है और कार्यकर्ताओं के लिए एकजुटता का संदेश भी।
हालांकि, यात्रा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कांग्रेस अपने भीतर की गुटबाजी को कितना नियंत्रित कर पाती है और जनता के बीच एक मजबूत विकल्प के रूप में खुद को कितनी प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर पाती है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की राजनीति अब पूरी तरह चुनावी रंग में रंगने लगी है और कांग्रेस की परिवर्तन संकल्प यात्रा आने वाले दिनों में प्रदेश की सियासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने जा रही है। यह यात्रा केवल सड़कों पर चलने वाला राजनीतिक कारवां नहीं, बल्कि 2027 की सत्ता की लड़ाई का पहला बड़ा संदेश भी मानी जा रही है।
हैट्रिक के ‘ख्वाब’ में चुनौतियों का ‘पहाड़’
लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के ऐतिहासिक लक्ष्य के साथ भाजपा ने झोंकी ताकत
समय से पहले चुनावी तैयारी के बावजूद सत्ता विरोधी लहर का डर पार्टी के भीतर बरकरार
धरातल पर स्थानीय मुद्दे, पलायन और बेरोजगारी जैसे तीखे सवाल हैं सबसे बड़ी चुनौती
एंटी इनकंबेंसी को विकास और हिंदुत्व के एजेंडे से संतुलित करने की चल रही है तैयारी
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी कुछ समय दूर हो, लेकिन भाजपा ने चुनावी शंखनाद समय से पहले ही कर दिया है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर भाजपा ने बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक अपनी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। पार्टी का मानना है कि यदि संगठन मजबूत रहा और सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा, तो सत्ता की हैट्रिक का रास्ता आसान हो सकता है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी माहौल एंटी इनकंबेंसी, स्थानीय मुद्दे और बेरोजगारी जैसे सवाल भाजपा के सामने बड़ी चुनौती बने रहेंगे।
भाजपा का पहला फोकस संगठन को पूरी तरह चुनावी मोड में लाना है। बूथ समितियों के पुनर्गठन, पन्ना प्रमुखों को सक्रिय करने और शक्ति केंद्रों को मजबूत करने का अभियान तेज किया जा रहा है। पार्टी की रणनीति साफ हैकृचुनाव प्रचार शुरू होने से पहले हर बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ता तैयार हों। प्रदेश नेतृत्व लगातार जिला, मंडल और बूथ स्तर की बैठकों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को संदेश दे रहा है कि चुनाव केवल नेताओं के भरोसे नहीं, बल्कि बूथ की मजबूती से जीते जाते हैं। भाजपा चाहती है कि चुनावी बहस विकास, आधारभूत ढांचे, चारधाम परियोजना, निवेश, पर्यटन, महिला सशक्तीकरण और केंद्र-राज्य के समन्वय पर केंद्रित रहे। पार्टी का प्रयास होगा कि सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को चुनावी समर्थन में बदला जाए। इसके साथ ही प्रधानमंत्री की योजनाओं, सड़क, रेल और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को भी चुनावी अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाया जाएगा।
2027 के चुनाव में बड़ी संख्या में पहली बार मतदान करने वाले युवा शामिल होंगे। भाजपा की रणनीति इस वर्ग तक सोशल मीडिया, डिजिटल अभियान और युवा सम्मेलनों के जरिए पहुंचने की है। हालांकि यही वर्ग बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और रोजगार के अवसरों जैसे मुद्दों पर सबसे अधिक सवाल भी पूछ रहा है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती केवल प्रचार नहीं, बल्कि विश्वास कायम रखने की भी होगी। महिला स्वयं सहायता समूह, उज्ज्वला, आवास, जल जीवन मिशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े लाभार्थियों तक सीधा संवाद भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी का मानना है कि महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार सुविधाएं लंबे समय से पर्वतीय क्षेत्रों के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। भाजपा इन क्षेत्रों में विकास कार्यों को प्रमुखता से सामने लाने की तैयारी कर रही है। लेकिन विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि अनेक गांव आज भी सड़क, डॉक्टर और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में चुनावी मुकाबले में स्थानीय मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण रहेंगे जितने बड़े विकास परियोजनाएं।
राजनीतिक संकेत बताते हैं कि भाजपा विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के मुद्दों को भी अपने अभियान का हिस्सा बनाए रख सकती है। चारधाम, देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत, समान नागरिक संहिता जैसे विषय समर्थक वर्ग के बीच प्रमुख मुद्दे बने रह सकते हैं। भाजपा की रणनीति केवल अपने संगठन को मजबूत करने तक सीमित नहीं है। पार्टी कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों की गतिविधियों पर भी करीबी नजर रखे हुए है। यदि विपक्ष साझा मुद्दों पर एकजुट होता है, तो चुनावी मुकाबला अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
लगातार सत्ता में रहने वाली किसी भी सरकार के सामने सबसे बड़ा जोखिम सत्ता विरोधी रुझान होता है। स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी, अधूरी घोषणाएं, भर्ती, बेरोजगारी, पलायन और महंगाई जैसे मुद्दे भाजपा के लिए चुनौती बन सकते हैं। यही कारण है कि पार्टी संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर दे रही है, ताकि असंतोष को समय रहते कम किया जा सके।
भाजपा का लक्ष्य केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि चुनाव का नैरेटिव तय करना है। पार्टी चाहती है कि मुकाबला विकास बनाम वादों के आधार पर हो, जबकि विपक्ष सरकार से रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और स्थानीय समस्याओं पर जवाब मांगने की तैयारी में है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 का रण धीरे-धीरे आकार ले रहा है। भाजपा ने संगठनात्मक तैयारी और चुनावी रणनीति पर काम तेज कर दिया है, लेकिन अंतिम फैसला जनता करेगी। सत्ता पक्ष के सामने उपलब्धियों को भरोसे में बदलने की चुनौती है, जबकि विपक्ष के सामने असंतोष को वोट में बदलने की। अगले महीनों में यही तय करेगा कि 2027 में उत्तराखंड की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
बाहर जेन जेड और सदन के भीतर विपक्ष ने सरकार को घेरा
संसद के बाहर युवाओं हल्ला, भीतर सरकार पर विपक्ष का वार
रोजगार, पेपर लीक, शिक्षा के मुद्दे पर दिल्ली में गरमाया माहौल
संसद के मानसून सत्र के पहले दिन सड़क व सदन में महासंग्राम
नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के साथ ही देश की राजनीति में सड़क और सदन दोनों का तापमान बढ़ गया। एक ओर लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष ने केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश की, तो दूसरी ओर जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में जुटे नई पीढ़ी के युवाओं ने इन्हीं सवालों को लेकर अपनी आवाज बुलंद की। इससे यह संदेश गया कि जिन मुद्दों पर संसद के भीतर बहस हो रही है, वही मुद्दे संसद के बाहर भी युवाओं के आक्रोश का कारण बने हुए हैं। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि डिग्री हासिल करने के बाद भी रोजगार के अवसर सीमित हैं, सरकारी भर्तियां समय पर पूरी नहीं हो रहीं और पेपर लीक जैसी घटनाओं ने लाखों युवाओं के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनकी लड़ाई किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि अपने भविष्य और अधिकारों के लिए है।
संसद के मानसून सत्र के पहले दिन लोकसभा और राज्यसभा में विपक्षी दलों ने युवाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की कोशिश की। विपक्ष का कहना था कि देश का सबसे बड़ा वर्ग रोजगार, शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर चिंतित है और सरकार को इन सवालों पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। सत्ता पक्ष ने अपनी योजनाओं, कौशल विकास, स्टार्टअप, डिजिटल इंडिया और रोजगार सृजन की पहलों का हवाला देते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज किया। जंतर-मंतर पर सबसे ज्यादा गूंजा सवाल थाकृडिग्री है... नौकरी कहां है? युवाओं का कहना था कि प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार विवाद, भर्तियों में देरी और रिक्त पदों को समय पर न भरने से लाखों अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। उनका आरोप था कि सरकार घोषणाएं तो करती है, लेकिन युवाओं को समय पर अवसर नहीं मिल रहे।
इस प्रदर्शन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें बड़ी संख्या में ऐसे युवा शामिल दिखे जो पहली बार किसी बड़े जन आंदोलन का हिस्सा बने। सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाली यह पीढ़ी अब केवल आनलाइन विरोध तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि नीतिगत फैसलों में अपनी भागीदारी और जवाबदेही भी चाहती है।
संसद के भीतर विपक्ष की आक्रामकता और संसद के बाहर युवाओं का प्रदर्शन आने वाले समय की राजनीति का संकेत माना जा सकता है। देश में करोड़ों युवा मतदाता हैं और उनकी प्राथमिकताएं अब रोजगार, शिक्षा, पारदर्शी भर्ती और बेहतर अवसरों पर अधिक केंद्रित होती दिखाई दे रही हैं। ऐसे में यह वर्ग 2027 के विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। जंतर-मंतर का प्रदर्शन और संसद में चली बहस, दोनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि युवाओं के मुद्दे अब केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रह गए हैं। चुनौती यह है कि इन सवालों का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर नीतिगत फैसलों और समयबद्ध कार्रवाई के रूप में सामने आए।
udaydinmaan: यहाँ मूर्तियाँ नहीं, प्रकृति है पहला भगवान
udaydinmaan: यहाँ मूर्तियाँ नहीं, प्रकृति है पहला भगवान: देवभूमि का लोकपर्व हरेला और प्रकृति से है देवत्व का नाता आधुनिक पर्यावरण संकट को रास्ता दिखाती पहाड़ की परंपराएँ पहाड़ में जंगल देवता, नदियाँ ...
शनिवार, 18 जुलाई 2026
पेपरलीक बनाम किरदारलीक
राहुल के सवालों से ध्यान भटकाने की कोशिश या भाजपा की रणनीतिक चूक
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बयान के बाद सियासी जंग तेज
कांग्रेस पार्टी ने साधा निशानाकृपेपरलीक पर जवाब नहीं, विरोध की राजनीति
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में राहुल गांधी के पेपरलीक मुद्दे ने एक बार फिर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी जुबानी जंग छेड़ दी है। कांग्रेस का आरोप है कि राहुल गांधी द्वारा युवाओं के रोजगार, भर्ती घोटालों और पेपरलीक जैसे मुद्दों पर सवाल उठाने के बाद भाजपा ने मूल मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश की। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि दून में बड़े आयोजन और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के जरिए युवाओं के सवालों को दबाने का प्रयास किया गया।
कांग्रेस के सोशल मीडिया और पार्टी नेताओं की ओर से यह भी कहा गया कि भारी बारिश के बीच महिला कार्यकर्ताओं को विरोध प्रदर्शन के लिए उतारना भाजपा की राजनीतिक मजबूरी को उजागर करता है। कांग्रेस ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि पेपरलीक की क्लास से ध्यान भटकाने की कोशिश में भाजपा का किरदारलीक हो गया। राहुल गांधी ने अपने उत्तराखंड दौरे के दौरान राज्य में भर्ती परीक्षाओं में पेपरलीक, बेरोजगारी और युवाओं के भविष्य को प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं और युवाओं का विश्वास कमजोर हुआ है। कांग्रेस का दावा है कि इन्हीं सवालों ने भाजपा को असहज कर दिया।
दूसरी ओर भाजपा ने राहुल गांधी के आरोपों को राजनीतिक नौटंकी करार दिया। भाजपा नेताओं का कहना है कि राज्य सरकार ने भर्ती घोटालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है, दोषियों को जेल भेजा गया है और देश का सबसे कड़ा नकल विरोधी कानून लागू किया गया है। भाजपा का दावा है कि कांग्रेस युवाओं को गुमराह करने का प्रयास कर रही है और उसका विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है। हालांकि कांग्रेस इस जवाब से संतुष्ट नहीं है। पार्टी का कहना है कि यदि सरकार के पास उपलब्धियां हैं तो उन्हें तथ्यों के साथ सामने रखा जाना चाहिए, न कि विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक आयोजनों के जरिए विमर्श को दूसरी दिशा में मोड़ा जाए। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि जनता अब रोजगार, महंगाई और शिक्षा जैसे मुद्दों पर स्पष्ट जवाब चाहती है।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह टकराव केवल राहुल गांधी के दौरे तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक आने के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों युवाओं को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। भर्ती परीक्षाएं, पेपरलीक, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में आते दिख रहे हैं। भाजपा का फोकस राहुल गांधी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का है, जबकि कांग्रेस सरकार की जवाबदेही तय करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में असली सवाल यही है कि चुनावी बहस का केंद्र पेपरलीक, बेरोजगारी और युवाओं का भविष्य रहेगा या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और विरोध प्रदर्शन।
श्रम, संघर्ष और संस्कृति की प्रतीक है ‘घस्यारी’
देवभूमि की असली देवी है घस्यारी, बुग्यालों से भी भारी है इनका हौसला
खूबसूरत नज़ारों के पीछे छिपा संघर्ष, जिसने सदियों से बचा कर रखी है पहाड़ की साख
पहाड़ की घस्यारी का सिर पर घास का गट्ठर, कंधों पर पूरे पहाड़ का जीवन
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल हिमालय, देवदार, बुग्याल और मंदिरों से नहीं है। इस प्रदेश की असली ताकत उन महिलाओं में बसती है, जिन्हें गांवों में प्यार से घस्यारी कहा जाता है। घस्यारीकृयानी वह महिला जो रोज जंगलों से पशुओं के लिए घास काटकर लाती है। यह शब्द छोटा है, लेकिन इसके भीतर संघर्ष, साहस, श्रम और पूरे पहाड़ की अर्थव्यवस्था का इतिहास समाया हुआ है।
सुबह के चार या पांच बजे का समय। गांव अभी नींद में डूबा होता है, लेकिन घस्यारी की दिनचर्या शुरू हो चुकी होती है। चूल्हा जलाना, परिवार के लिए भोजन बनाना, बच्चों को तैयार करना और फिर हाथ में दरांती, पीठ पर रस्सी और सिर पर टोकरा लेकर जंगल की ओर निकल पड़ना। कई किलोमीटर की चढ़ाई, फिसलन भरे रास्ते, जंगली जानवरों का डर और मौसम की मारकृयह सब उसके लिए रोजमर्रा की बात है।
जंगल पहुंचकर वह घंटों खड़ी ढलानों पर घास काटती है। फिर 30 से 40 किलो तक का घास का गट्ठर सिर या पीठ पर बांधकर वापस गांव लौटती है। यह केवल घास नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की आजीविका होती है। पशु उसी घास से पलते हैं, खेतों के लिए गोबर की खाद बनती है और वही खाद अगली फसल की उम्मीद बन जाती है। पहाड़ की खेती का पूरा चक्र घस्यारी के श्रम पर टिका है।
विडंबना यह है कि जिस महिला के श्रम से गांव की अर्थव्यवस्था चलती है, उसका नाम शायद ही किसी सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण में दिखाई देता हो। वह किसान भी है, पशुपालक भी, वन संरक्षण की प्रहरी भी और परिवार की आधारशिला भी, लेकिन उसके काम को अक्सर ष्घर का कामष् कहकर अनदेखा कर दिया जाता है। पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन ने घस्यारी का बोझ और बढ़ा दिया है। रोजगार की तलाश में पुरुष शहरों की ओर चले गए। गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं बचीं। खेतों की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है, पशुओं की देखभाल भी और जंगल से चारा लाने का काम भी। एक महिला अब कई भूमिकाएं अकेले निभा रही है।
घस्यारी का जंगल से रिश्ता केवल जरूरत का नहीं, बल्कि संवेदनाओं का भी है। वह जानती है कि किस पेड़ की टहनी काटनी है और किसे छोड़ देना है। कौन-सी घास पशुओं के लिए पौष्टिक है और किस मौसम में कौन-सा चारा सुरक्षित रहेगा। यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय ने नहीं दिया, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव ने सिखाया है।
उत्तराखंड का प्रसिद्ध चिपको आंदोलन भी इन्हीं पहाड़ की महिलाओं की चेतना का परिणाम था। जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का स्रोत नहीं थे, बल्कि पानी, मिट्टी, पशुधन और जीवन का आधार थे। इसलिए जब पेड़ों पर कुल्हाड़ी चली, तो सबसे पहले घस्यारी ही पेड़ों से लिपट गई। उसने दुनिया को सिखाया कि पर्यावरण संरक्षण किताबों से नहीं, जीवन से सीखा जाता है।
आज आधुनिकता गांवों तक पहुंच रही है। सड़कें बनी हैं, गैस सिलेंडर पहुंचे हैं, कुछ जगह चारा काटने की मशीनें भी हैं, लेकिन पहाड़ की घस्यारी का संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। कई गांव आज भी ऐसे हैं जहां रोज घंटों पैदल चलकर घास लानी पड़ती है। बारिश हो या बर्फबारी, यह सिलसिला नहीं रुकता। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमने कभी घस्यारी के श्रम का वास्तविक मूल्यांकन किया? क्या उसकी मेहनत को आर्थिक पहचान मिली? क्या उसके लिए सुरक्षित जंगल मार्ग, आधुनिक उपकरण, चारा विकास योजनाएं और स्वास्थ्य सुविधाएं पर्याप्त हैं? यदि नहीं, तो विकास की तस्वीर अभी अधूरी है।
पहाड़ की घस्यारी केवल एक महिला नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवंत संस्कृति है। उसके सिर पर रखा घास का गट्ठर केवल चारा नहीं, बल्कि पहाड़ की सभ्यता, खेती, पशुपालन और आत्मनिर्भरता का भार है। जिस दिन गांव की घस्यारी जंगल जाना छोड़ देगी, उस दिन पहाड़ का पारंपरिक जीवन भी बदल जाएगा। आज जरूरत केवल उसकी प्रशंसा करने की नहीं, बल्कि उसके श्रम को सम्मान, सुरक्षा और नीति में उचित स्थान देने की है। क्योंकि सच यही है कि उत्तराखंड के पहाड़ आज भी घस्यारी के कदमों की आहट पर सांस लेते हैं।
‘युवा दांव’ से मचा ‘सियासी शोर’
देशभर से पहुंचे छात्र, पेपर लीक व बेरोजगारी पर राहुल का सीधा हमला
देश के युवाओं का भविष्य छीना गया तो सत्ता से हिसाब भी युवा ही लेंगे
देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम की गवाह नहीं बनी, बल्कि उस बेचौनी का मंच बन गई जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के भीतर पल रही है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम ने यह संदेश देने की कोशिश की कि 2027 की चुनावी लड़ाई केवल नेताओं के भाषणों से नहीं, बल्कि युवाओं के सवालों से तय होगी। दून में सुबह से ही छात्रों का उत्साह देखने लायक था। उत्तराखंड के अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश से पहुंचे छात्र अपने हाथों में तख्तियां लिए दिखाई दिए। किसी के पोस्टर पर पेपर लीक बंद करो लिखा था, तो कोई मेहनत का हक चाहिए की मांग कर रहा था। मंच से पहले मैदान बोल रहा था।
राहुल गांधी ने अपने भाषण में सीधे सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि आज देश का युवा नौकरी नहीं, न्याय मांग रहा है। मेहनत छात्र करता है, लेकिन व्यवस्था उसकी उम्मीदों पर ताला लगा देती है। पेपर लीक केवल एक अपराध नहीं, यह लाखों युवाओं के सपनों की चोरी है। उन्होंने कहा कि जिस देश का युवा निराश होगा, उस देश का भविष्य भी कमजोर होगा। युवाओं की आवाज दबाकर लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। राहुल ने अपने संबोधन में बार-बार छात्रों को संघर्ष जारी रखने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जब युवा सवाल पूछता है तो सत्ता असहज हो जाती है। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, अधिकार है।
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि मंच पर भाषण से अधिक चर्चा छात्रों के अनुभवों की हुई। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे कई युवाओं ने अपनी समस्याएं साझा कीं। किसी ने वर्षों से अटकी भर्ती का दर्द बताया तो किसी ने परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग उठाई। माहौल कई बार राजनीतिक सभा से अधिक छात्र संवाद जैसा दिखाई दिया।
राहुल गांधी के कार्यक्रम के समानांतर भाजपा ने भी राजनीतिक मोर्चा संभाला। कांग्रेस का आरोप है कि राहुल के कार्यक्रम की धार कम करने के लिए समानांतर गतिविधियों और विरोध प्रदर्शनों पर जोर दिया गया। भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि उसने केवल राहुल गांधी के बयानों का लोकतांत्रिक विरोध किया और राज्य सरकार भर्ती घोटालों पर सख्त कार्रवाई कर चुकी है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की रही कि राहुल गांधी जिस मुद्दे को लेकर आए थेकृपेपर लीक, बेरोजगारी और युवाओं का भविष्यकृवही कार्यक्रम के बाद सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। कांग्रेस इसे अपनी रणनीतिक सफलता मान रही है, जबकि भाजपा सरकार की ओर से नकल विरोधी कानून, दोषियों पर कार्रवाई और भर्ती सुधारों को अपनी उपलब्धि के रूप में सामने रखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक सड़क, धर्म, विकास और क्षेत्रीय अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन अब रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता भी बड़े चुनावी मुद्दे बनते दिख रहे हैं। राहुल गांधी ने अपने पूरे भाषण में यही संदेश देने की कोशिश की कि यदि युवा नाराज है तो सत्ता की सबसे मजबूत कुर्सी भी डगमगा सकती है। कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दीकृयुवाओं के आक्रोश को राजनीतिक मुद्दा बनाना। देहरादून का छात्रों की गूंज कार्यक्रम भीड़ जुटाने की कवायद भर नहीं था। यह सत्ता को यह याद दिलाने की कोशिश थी कि प्रतियोगी परीक्षा देने वाला युवा अब केवल अभ्यर्थी नहीं, बल्कि एक जागरूक मतदाता भी है। आने वाले विधानसभा चुनाव में वह रोजगार, भर्ती और शिक्षा जैसे मुद्दों पर जवाब मांग सकता है।
अब नजर भाजपा पर है। क्या वह इस चुनौती का जवाब केवल राजनीतिक पलटवार से देगी या युवाओं के सामने ठोस उपलब्धियों और नई घोषणाओं के साथ उतरेगी? क्योंकि चुनावी मौसम में नारे कुछ दिन चलते हैं, लेकिन युवाओं के सवाल लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़ते।
जंतर-मंतर पर ‘लोकतंत्र’ की घेराबंदी
अस्पताल पहुंचे सोनम वांगचुक, आंदोलन स्थल खाली कराने से उठे सवाल
21 दिन के अनशन के बाद पुलिस ने सोनम वांगचुक को अस्पताल पहुंचाया
प्रदर्शनकारियों को हटाने की कार्रवाई से विपक्ष ने किया सरकार पर हमलाकृ
नई दिल्ली। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी असहमति को सुनने की क्षमता मानी जाती है। लेकिन शनिवार को राजधानी के जंतर-मंतर से जो तस्वीर सामने आई, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या देश में विरोध दर्ज कराने की लोकतांत्रिक जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है? 21 दिनों से अनशन पर बैठे शिक्षाविद सोनम वांगचुक को पुलिस सफदरजंग अस्पताल ले गई और इसके साथ ही जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन को हटाने की कार्रवाई शुरू हो गई। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक और संवैधानिक बहस को तेज कर दिया है।
पुलिस का कहना है कि वांगचुक की तबीयत गंभीर हो रही थी और डाक्टरों की सलाह पर उन्हें अस्पताल ले जाना आवश्यक था। प्रशासन का तर्क है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन की रक्षा उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन आंदोलनकारियों का आरोप है कि यह केवल चिकित्सीय हस्तक्षेप नहीं, बल्कि आंदोलन की धार कुंद करने की कोशिश थी। उनके अनुसार, प्रदर्शनकारियों को हटाकर उस आवाज को कमजोर करने का प्रयास किया गया जो पिछले कई दिनों से सत्ता के सामने असहज सवाल खड़े कर रही थी।
जंतर-मंतर वर्षों से देश में लोकतांत्रिक विरोध का प्रतीक माना जाता रहा है। किसान आंदोलन हो, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान हो या छात्र और सामाजिक संगठनों के प्रदर्शनकृयहीं से कई राष्ट्रीय बहसों ने जन्म लिया। ऐसे में किसी आंदोलन का इस तरह अचानक समाप्त होना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक प्रश्न खड़े करता है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यदि किसी अनशनकारी की हालत गंभीर हो जाए, तो प्रशासन पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी होती है।
सवाल केवल इतना नहीं कि सोनम वांगचुक अस्पताल क्यों पहुंचे। बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी आंदोलन की सबसे प्रभावशाली घड़ी वही होती है, जब उसे प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ता है? इतिहास बताता है कि कई बार आंदोलनों को रोकने की कोशिशों ने उन्हें और अधिक राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।
विपक्ष ने इस कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट बताते हुए सरकार को घेरा है। दूसरी ओर सरकार समर्थक पक्ष का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और किसी भी नागरिक की जान की रक्षा करना प्रशासन का दायित्व है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं, लेकिन इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि असहमति और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बीच संतुलन बनाना लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा है।
राजनीतिक ष्टि से भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। जब देश में युवाओं, परीक्षाओं, रोजगार और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर बहस तेज है, तब किसी प्रमुख आंदोलन का इस तरह समाप्त होना स्वाभाविक रूप से सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव को और तीखा करेगा। यह भी संभव है कि जंतर-मंतर से हटी आवाज अब संसद, अदालतों, सोशल मीडिया और देशभर के विश्वविद्यालयों तक और व्यापक रूप से पहुंचे।
फिलहाल तस्वीर साफ हैकृसोनम वांगचुक अस्पताल में हैं, जंतर-मंतर खाली कराया जा रहा है, लेकिन जिन सवालों को लेकर आंदोलन शुरू हुआ था, वह अभी भी देश की राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में बने हुए हैं। लोकतंत्र की असली कसौटी अब यही होगी कि इन सवालों का जवाब संवाद से मिलता है या टकराव से।
इधर ‘छात्रों की गूंज’ उधर ‘युवा अग्निवीर संवाद’
विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड में युवाओं को साधने के लिए सियासी जंग तेज
राहुल गांधी ने बेरोजगारी, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था को बनाया चुनावी मुद्दा
सीएम धामी ने संवाद के जरिए राष्ट्रसेवा और रोजगार के अवसरों का संदेश दिया
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति दो समानांतर राजनीतिक आयोजनों के नाम रहा। एक ओर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का छात्रों की गूंजश् कार्यक्रम था, जहां हजारों छात्र-युवाओं की मौजूदगी में पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाए गए। दूसरी ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का युवा अग्निवीर संवाद था, जहां सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं और अग्निवीरों के साथ संवाद कर राष्ट्रसेवा, अनुशासन और भविष्य के अवसरों का संदेश दिया गया। पहली नजर में यह दो अलग-अलग कार्यक्रम दिखाई देते हैं, लेकिन राजनीतिक मायने कहीं अधिक गहरे हैं। दोनों आयोजनों का लक्ष्य एक ही थाकृउत्तराखंड का युवा मतदाता जो 2027 के विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने बार-बार प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, बेरोजगारी और युवाओं के भविष्य का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वर्षों तक मेहनत करने वाले युवाओं के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए और यदि व्यवस्था उनकी मेहनत का सम्मान नहीं कर पाती, तो सरकारों को जवाब देना होगा। राहुल ने अपने संबोधन में कहा कि देश का युवा नौकरी की भीख नहीं मांग रहा, वह अपनी मेहनत का अधिकार मांग रहा है। पेपर लीक केवल एक परीक्षा नहीं बिगाड़ता, बल्कि लाखों परिवारों का भरोसा भी तोड़ देता है। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएं और लोकतांत्रिक तरीके से सवाल पूछते रहें। कांग्रेस का पूरा प्रयास इस कार्यक्रम के जरिए युवाओं की नाराजगी को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का था।
उधर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने युवा अग्निवीर संवाद में सेना में जाने की तैयारी कर रहे युवाओं और अग्निवीरों से संवाद किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान वीरभूमि की रही है और यहां का युवा देश की सुरक्षा में हमेशा अग्रणी रहा है। धामी ने अग्निवीर योजना से जुड़े युवाओं का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि राज्य सरकार पूर्व अग्निवीरों को विभिन्न सरकारी सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में प्राथमिकता देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने युवाओं से अनुशासन, कौशल विकास और आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। भाजपा का संदेश स्पष्ट था कि युवा केवल सरकारी नौकरी का उम्मीदवार नहीं, बल्कि उद्यमिता, कौशल, सेना और नए अवसरों के माध्यम से भी अपना भविष्य बना सकता है।
उत्तराखंड देश के उन राज्यों में है जहां बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। सेना में भर्ती की परंपरा भी यहां बेहद मजबूत रही है। इसके साथ ही पलायन, सीमित औद्योगिक विकास और रोजगार के अवसरों की कमी जैसे मुद्दे लंबे समय से चर्चा में हैं। यही कारण है कि आज राज्य का युवा केवल रोजगार ही नहीं, बल्कि पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और सम्मानजनक अवसरों की भी अपेक्षा रखता है। भाजपा और कांग्रेस दोनों इस मनोविज्ञान को समझ रही हैं और उसी के अनुरूप अपनी रणनीति तैयार कर रही हैं।
देहरादून में हुए दोनों कार्यक्रमों ने एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर दीकृउत्तराखंड की राजनीति का केंद्र अब युवा है। एक मंच से व्यवस्था से सवाल पूछने का संदेश दिया गया, तो दूसरे मंच से राष्ट्र निर्माण और अवसरों का भरोसा जगाने की कोशिश हुई। अब असली परीक्षा राजनीतिक दलों की नहीं, बल्कि उनके वादों की है। क्योंकि आज का युवा केवल भाषण नहीं सुनता, वह परिणाम भी देखता है। चुनावी मंचों पर तालियां बज सकती हैं, लेकिन मतदान केंद्र तक वही मुद्दे पहुंचते हैं जो युवाओं के जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं। 2027 की चुनावी बिसात पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपनी चाल चल दी है। अब देखना यह है कि उत्तराखंड का युवा किस नैरेटिव पर अधिक भरोसा करता हैकृव्यवस्था से जवाब मांगने वाले संदेश पर या अवसर और राष्ट्रनिर्माण के वादे पर।
बाक्स
दो मंच, दो विचारधाराएं और लक्ष्य एक
देहरादून में जो श्य दिखाई दिया, वह आने वाले चुनाव की दिशा का संकेत भी था। राहुल गांधी ने युवाओं की नाराजगी, असंतोष और जवाबदेही को राजनीतिक मुद्दा बनाया। मुख्यमंत्री धामी ने युवाओं की आकांक्षा, राष्ट्रसेवा और अवसरों को केंद्र में रखा। कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की कि सरकार युवाओं की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है, जबकि भाजपा ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि सरकार अवसर पैदा कर रही है और युवाओं को नई दिशा दे रही है।
आगामी चुनाव युवाओं के इर्द-गिर्द
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का विधानसभा चुनाव जातीय या पारंपरिक समीकरणों के साथ-साथ युवाओं के मुद्दों पर भी लड़ा जाएगा। भाजपा अपने शासन, योजनाओं, निवेश, सैन्य परंपरा और रोजगार सृजन के प्रयासों को चुनावी मुद्दा बनाएगी, जबकि कांग्रेस बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था को सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी के रूप में पेश करने का प्रयास करेगी। यानी आने वाले महीनों में युवाओं को लेकर दोनों दलों के बीच राजनीतिक मुकाबला और तेज होने की पूरी संभावना है।
‘पंदेरा’ था पहाड़ का ‘सोशल नेटवर्क’
यहां रिश्तों की मिठास व लोकगीतों की गूंज से बुझती थी प्यास
पहाड़ के उसकी कहानी जो कभी था सामाजिक विश्वविद्यालय
यहां पहाड़ का मीठा पानी और यहां सजती थी रिश्तों की चौपाल
आज नल बुझा रहे हैं प्यास, लेकिन सूख गए रिश्तों के वह झरने
देहरादून। पहाड़ में अगर किसी बुजुर्ग से पूछिए कि गांव की सबसे जीवंत जगह कौन-सी थी, तो शायद वह मंदिर, चौपाल या बाजार का नाम न ले। वह मुस्कुराते हुए कहेगाकृपंदेरा। पंदेरा... यानी वह पत्थरों से बना प्राकृतिक जलस्रोत, जहां पहाड़ की छाती से रिसता हुआ मीठा पानी पूरे गांव की प्यास बुझाता था। लेकिन पंदेरा केवल पानी भरने की जगह नहीं था। वह गांव का सामाजिक विश्वविद्यालय था, जहां जीवन बहता था, रिश्ते बनते थे, गीत गूंजते थे और पूरे गांव की धड़कन सुनाई देती थी।
सुबह की पहली किरण के साथ सिर पर गागर और कमर पर डलिया लिए महिलाएं पंदेरे की ओर निकल पड़ती थीं। रास्ते भर हंसी-मजाक, लोकगीत और पहाड़ी बोली की मिठास बिखरी रहती थी। कोई अपनी बहू की तारीफ कर रही होती, कोई बेटी की शादी की चिंता साझा करती, तो कोई खेतों की फसल का हाल सुनाती। गांव की आधी खबरें अखबार से पहले पंदेरे पर पहुंच जाती थीं। पंदेरा केवल जलस्रोत नहीं था, बल्कि समाज को जोड़ने वाली अदृश्य डोर था। यहां कोई बड़ा-छोटा नहीं होता था। अमीर-गरीब का भेद मिट जाता था। सबकी गागर एक ही धार से भरती थी।
नई-नवेली बहुओं के लिए पंदेरा गांव को समझने की पहली पाठशाला था। यहीं उन्हें रिश्तों की पहचान मिलती, रीति-रिवाजों की सीख मिलती और गांव की संस्कृति से परिचय होता। बुजुर्ग महिलाओं का अनुभव और युवतियों का उत्साह मिलकर एक ऐसा संसार रचते थे, जिसे किसी किताब में नहीं पढ़ाया जा सकता। पहाड़ के अनेक लोकगीतों में पंदेरा बार-बार आता है। पानी भरती महिलाओं की सामूहिक आवाजें घाटियों में गूंजती थीं। वे गीत केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि दुख-सुख बांटने का माध्यम भी थे। कई प्रेम कहानियों की शुरुआत भी पंदेरे की पगडंडियों से हुई और कई सामाजिक रिश्तों की नींव भी यहीं पड़ी।
समय बदला। जल जीवन मिशन और पाइपलाइन गांव-गांव पहुंची। यह विकास की बड़ी उपलब्धि थी। महिलाओं का श्रम कम हुआ, पानी घर तक पहुंचा और जीवन आसान हुआ। लेकिन इस सुविधा के साथ अनजाने में एक सामाजिक विरासत भी पीछे छूट गई। अब गागर की जगह प्लास्टिक की टंकी है। पंदेरे की जगह रसोई का नल है। लोकगीतों की जगह मोबाइल की रिंगटोन है। गांव की खबरें अब सोशल मीडिया से मिलती हैं, लेकिन उनमें वह अपनापन नहीं है जो पंदेरे की बैठकों में होता था।
आज उत्तराखंड के हजारों पारंपरिक नौले, धारे और पंदेरे उपेक्षा का शिकार हैं। कहीं झाड़ियां उग आई हैं, कहीं पानी का स्रोत ही सूख गया है। कुछ जगहों पर सीमेंट और निर्माण ने प्राकृतिक जलधाराओं का रास्ता रोक दिया है। विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि इन पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी पहाड़ में पंदेरा नाम की भी कोई जगह होती थी। जरूर इसके लिए केवल सरकारी योजनाएं ही नहीं, बल्कि सामुदायिक भागीदारी भी जरूरी है। गांव के लोग यदि अपने पंदेरों की सफाई, संरक्षण और पुनर्जीवन का संकल्प लें, तो ये जलस्रोत फिर से जीवित हो सकते हैं। कई गांवों ने यह कर भी दिखाया है।
इसके साथ ही, पंदेरे को केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। स्कूलों के बच्चे वहां जाएं, लोकगीत गाए जाएं, पारंपरिक जल संरक्षण की शिक्षा दी जाए और स्थानीय त्योहारों में इन स्थलों का सम्मान हो। क्योंकि पहाड़ का पंदेरा सिर्फ पत्थरों के बीच बहता पानी नहीं था। वह पहाड़ की सामूहिक स्मृति था। वहां से केवल गागरें नहीं भरती थीं, मन भी भरते थे। वहां केवल पानी नहीं बहता था, बल्कि अपनापन, संवाद और संस्कृति भी बहती थी। आज जब हम आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, तब यह याद रखना होगा कि विकास का अर्थ केवल नई सुविधाएं नहीं होता। विकास वह भी है, जिसमें हम अपनी जड़ों को बचाकर आगे बढ़ें। क्योंकि जिस दिन पहाड़ का आखिरी पंदेरा सूख जाएगा, उस दिन केवल एक जलस्रोत नहीं, बल्कि पहाड़ की एक पूरी संस्कृति भी इतिहास बन जाएगी।
दून से राहुल गांधी का युवा दांव
छात्रों की गूंज’ में बेरोजगारी, पेपर लीक और भविष्य की राजनीति पर करेंगे संवाद
उत्तराखंड से 2027 का चुनावी नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रही है कांग्रेस
देहरादून। देहरादून एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया, जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी छात्रों की गूंज कार्यक्रम के माध्यम से युवाओं और छात्रों से सीधा संवाद करना है। कार्यक्रम का घोषित उद्देश्य छात्रों की समस्याओं को सुनना और उनकी आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाना है, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे केवल एक छात्र संवाद नहीं, बल्कि आगामी चुनावों की रणनीतिक भूमिका के रूप में भी देख रहे हैं।
राहुल गांधी ने संवाद के दौरान बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा करेंगे। वह छात्रों से सवाल भी लेंगे और उनके अनुभव भी सुनेंगे। कार्यक्रम में मौजूद कई छात्रों ने प्रतियोगी परीक्षाओं में हो रही देरी, बार-बार पेपर लीक होने और रोजगार के सीमित अवसरों को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त करेंगे। देश भर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई भर्ती परीक्षाएं पेपर लीक विवादों में घिरी हैं। उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं रहा। यूकेएसएसएससी भर्ती घोटाले से लेकर अन्य भर्ती प्रक्रियाओं पर उठे सवालों ने युवाओं के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा किया है। इसी पृष्ठभूमि में राहुल गांधी ने कहा कि पेपर लीक केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि युवाओं के सपनों पर हमला है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब मेहनत करने वाला छात्र वर्षों तैयारी करता है और फिर परीक्षा रद्द हो जाती है, तो केवल एक परीक्षा नहीं टूटती, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें टूटती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी का यह कार्यक्रम केवल छात्र हितों तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं। कांग्रेस युवाओं, बेरोजगारों और प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों को एक बड़े राजनीतिक वर्ग के रूप में देख रही है। उत्तराखंड में बेरोजगारी लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रही है। पहाड़ों से पलायन, सीमित औद्योगिक विकास और सरकारी नौकरियों की घटती संख्या के कारण युवाओं में असंतोष बढ़ा है। कांग्रेस इसी असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है।
उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक सड़क, बिजली, पानी और क्षेत्रीय अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन अब कांग्रेस युवाओं, रोजगार और शिक्षा को चुनावी विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास कर रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि कांग्रेस बेरोजगारी, पेपर लीक और पलायन जैसे मुद्दों पर युवाओं को संगठित करने में सफल होती है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में यह एक महत्वपूर्ण फैक्टर बन सकता है।
राहुल गांधी के ‘छात्र संवाद’ पर बीजेपी की घेराबंदी
राहुल से पूछिए कांग्रेस राज के घोटालों का भी हिसाब
छात्रों की गूंज से पहले भाजपा का राहुल पर पलटवार
कहा-संवाद हो तो सवाल एकतरफा नहीं होने चाहिए
देहरादून। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के देहरादून में प्रस्तावित छात्रों की गूंज कार्यक्रम से पहले उत्तराखंड की राजनीति गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के छात्र संवाद को राजनीतिक कार्यक्रम बताते हुए छात्रों से अपील की है कि वह केवल वर्तमान सरकार से ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के शासनकाल से जुड़े विवादों और घोटालों पर भी राहुल गांधी से सवाल पूछें। भाजपा का कहना है कि यदि यह कार्यक्रम वास्तव में छात्रों के सवाल सुनने का मंच है, तो उसमें सवालों पर किसी प्रकार की वैचारिक या राजनीतिक सीमा नहीं होनी चाहिए। छात्रों को यह अधिकार होना चाहिए कि वह वर्तमान सरकार के साथ-साथ पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल, भर्ती प्रक्रियाओं, भ्रष्टाचार के आरोपों और शासन की कार्यशैली पर भी जवाब मांगें।
राहुल गांधी का छात्रों की गूंज कार्यक्रम बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर केंद्रित बताया जा रहा है। कांग्रेस इसे युवाओं की आवाज को राष्ट्रीय मंच देने की पहल बता रही है। लेकिन भाजपा इसे आगामी चुनावों से जोड़कर देख रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यदि कार्यक्रम निष्पक्ष संवाद है, तो उसमें केवल भाजपा सरकारों की आलोचना नहीं, बल्कि कांग्रेस के शासनकाल का भी मूल्यांकन होना चाहिए।
भाजपा नेताओं का तर्क है कि लोकतंत्र में संवाद तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसमें असहज सवाल पूछने की भी पूरी स्वतंत्रता हो। यदि छात्रों को प्रश्न पूछने का अवसर दिया जा रहा है, तो उन्हें यह भी पूछना चाहिए कि कांग्रेस शासन के दौरान युवाओं के लिए कौन-से स्थायी सुधार किए गए, भर्ती प्रक्रियाओं की स्थिति क्या थी और भ्रष्टाचार के आरोपों पर कांग्रेस का पक्ष क्या है।
उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच युवा मतदाता दोनों प्रमुख दलों की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। कांग्रेस बेरोजगारी, पेपर लीक और रोजगार को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा अपने विकास कार्यों, पारदर्शी भर्ती प्रणाली और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को सामने रख रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच वैचारिक संघर्ष अब और तेज होगा। कांग्रेस सरकार की जवाबदेही तय करने की बात कर रही है, जबकि भाजपा विपक्ष से उसके अतीत का हिसाब मांग रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि छात्र केवल वर्तमान सरकार से ही नहीं, बल्कि राहुल गांधी से भी कुछ अहम सवाल पूछ सकते हैंकृ।
भाजपा का कहना है कि लोकतंत्र में जवाबदेही सभी राजनीतिक दलों की होनी चाहिए, केवल सत्ता पक्ष की नहीं। दूसरी ओर कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी छात्रों की वास्तविक समस्याओं को सुनने और उन्हें राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने के लिए संवाद कर रहे हैं। पार्टी का कहना है कि बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दे किसी दल के नहीं, बल्कि पूरे देश के युवाओं के हैं।
राहुल के बहाने कांग्रेस में लौटी ‘रौनक’
उत्तराखंड दौरे ने कार्यकर्ताओं में भरेंगे जोश
छात्रों की गूंज से कांग्रेस देगी राजनीतिक संदेशकृ
युवाओं के मुद्दों पर सीधे मैदान में उतरेगा विपक्ष
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी कुछ समय दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। इसी क्रम में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा कांग्रेस के लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संगठन में नई ऊर्जा भरने वाला अवसर बन गया है। लंबे समय बाद ऐसा देखने को मिला कि प्रदेश कांग्रेस का लगभग पूरा संगठन एक ही मंच पर सक्रिय और उत्साहित दिख रहा है। राहुल गांधी के देहरादून आगमन और छात्रों की गूंज कार्यक्रम ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया उत्साह पैदा कर दिया है। कांग्रेस भले इस कार्यक्रम को छात्रों के मुद्दों पर संवाद बता रही हो, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके जरिए पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह आगामी चुनाव में बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा और युवाओं के भविष्य को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है।
उत्तराखंड में लंबे समय से बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर असंतोष रहा है। कांग्रेस इन्हीं मुद्दों को सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। राहुल गांधी के दौरे का सबसे बड़ा असर संगठनात्मक स्तर पर देखने को मिलेगा। पिछले कुछ समय से गुटबाजी और निष्क्रियता के आरोप झेल रही प्रदेश कांग्रेस में इस कार्यक्रम के बहाने नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ गई है। जिला इकाइयों से लेकर प्रदेश नेतृत्व तक तैयारियों में जुटा दिखाई दिया। कार्यकर्ताओं का मानना है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रिय मौजूदगी से संगठन में मनोबल बढ़ा है और चुनावी तैयारियों को गति मिलेगी।
हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षक यह भी मानते हैं कि किसी एक दौरे से संगठन की पुरानी चुनौतियां स्वतः समाप्त नहीं हो जातीं। कांग्रेस के सामने अभी भी बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करना, गुटीय मतभेदों को कम करना और एकजुट चुनावी रणनीति बनाना जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। राहुल गांधी के दौरे को भाजपा ने राजनीतिक कार्यक्रम करार देते हुए उस पर सवाल उठाए हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस युवाओं के मुद्दों का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस का रिकार्ड भी जनता के सामने है। यानी राहुल गांधी के दौरे ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह जितना बढ़ाया है, उतना ही भाजपा को भी अपनी राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज करने का अवसर दिया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड का चुनाव केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहेगा। राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। राहुल गांधी के प्रस्तावित दौरे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस इस बार चुनावी तैयारी आखिरी समय पर नहीं, बल्कि काफी पहले से शुरू करना चाहती है। यदि राहुल गांधी भविष्य में भी उत्तराखंड का नियमित दौरा करते हैं और पार्टी युवाओं, महिलाओं, किसानों तथा पलायन जैसे स्थानीय मुद्दों पर लगातार अभियान चलाती है, तो कांग्रेस को संगठनात्मक लाभ मिल सकता है।
राहुल गांधी के दौरे ने कांग्रेस में उत्साह का संचार जरूर किया है, लेकिन चुनाव केवल उत्साह से नहीं जीते जाते। उत्साह को संगठन में, संगठन को जनसमर्थन में और जनसमर्थन को वोट में बदलना सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा होती है। उत्तराखंड की राजनीति में यह अक्सर देखा गया है कि बड़े नेताओं की सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ हमेशा चुनावी परिणामों में नहीं बदलती। इसलिए कांग्रेस के लिए यह दौरा शुरुआत तो माना जा सकता है, लेकिन मंजिल नहीं।
राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा कांग्रेस के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त और संगठनात्मक ऊर्जा का स्रोत बनकर उभर सकता है। इससे कार्यकर्ताओं में जोश लौटेगा और पार्टी को एक नया चुनावी नैरेटिव गढ़ने का अवसर मिलेगा। अब यह कांग्रेस की रणनीति और संगठनात्मक क्षमता पर निर्भर करेगा कि वह इस उत्साह को 2027 के विधानसभा चुनाव तक कितनी मजबूती से बनाए रख पाती है। फिलहाल इतना तय है कि राहुल गांधी के प्रस्तावित दौरे ने उत्तराखंड कांग्रेस में नई हलचल पैदा कर दी है और यही हलचल आने वाले महीनों में राज्य की राजनीति का तापमान तय करने में भूमिका निभा सकती है।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)