सोमवार, 3 अगस्त 2026
कागजों में ‘सेवक’ और मंचों पर ‘महाराज’
स्वागत भाषणों में समय स्वाहा, पहाड़ के दर्द सुनने की नेताओं को फुर्सत ही नहीं
सुर्खियों की राजनीति छोड़िए, मेघालय माडल अपनाकर नीयत साफ कीजिए सरकार
उत्तराखंड में नेताओं के स्वागत में फिजूलखर्च, समस्याओं पर आज भी पसरा है सन्नाटा
माला नहीं, जनता का होगासम्मान, मेघालय सरकार का फैसला बन गया है मिसाल
देहरादून। पहले एक खबर बनी। फिर एक आदेश आया और अब उस आदेश ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या लोकतंत्र में जनता सबसे ऊपर है या फिर मंच पर बैठे वीआईपी? मेघालय सरकार ने वीआईपी संस्कृति पर ऐसा फैसला लिया है, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। अब वहां किसी भी सरकारी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक या अन्य जनप्रतिनिधियों का औपचारिक अभिनंदन, शॉल ओढ़ाने, माला पहनाने और स्मृति चिन्ह देने जैसी परंपरा नहीं होगी। इसके बजाय कार्यक्रमों में आम नागरिकोंकृकिसान, शिक्षक, महिला समूह, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता या किसी स्थानीय उपलब्धि हासिल करने वाले व्यक्तिकृको सम्मानित किया जाएगा और उन्हें अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा।
मेघालय सरकार का तर्क साफ है कि सरकारी कार्यक्रम जनता के टैक्स के पैसे से होते हैं। इसलिए उनका केंद्र भी जनता ही होनी चाहिए, न कि मंच पर बैठे नेता। सरकारी आयोजन विकास कार्यों की समीक्षा, योजनाओं की जानकारी और लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए होने चाहिए, न कि नेताओं के स्वागत-सत्कार के लिए। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि सरकारी संस्कृति बदलने की कोशिश माना जा रहा है।
अब प्रश्न उठता है कि क्या उत्तराखंड भी ले सकता है ऐसा फैसला? देवभूमि उत्तराखंड में शायद ही कोई सरकारी कार्यक्रम ऐसा होता हो, जहां मंच पर नेताओं के स्वागत में फूल-मालाओं की कतार न लगी हो। कई बार कार्यक्रम का बड़ा हिस्सा स्वागत भाषण, शाल ओढ़ाने और स्मृति चिन्ह देने में ही निकल जाता है। जनता घंटों इंतजार करती रहती है कि आखिर उनकी समस्या पर कब बात होगी। अगर मेघालय की तरह उत्तराखंड में भी ऐसा आदेश लागू हो जाए तो तस्वीर काफी बदल सकती है। क्या बदल सकता है? सरकारी कार्यक्रमों में समय की बचत होगी, मंच पर नेताओं के बजाय जनता की उपलब्धियों को सम्मान मिलेगा और गांव की महिला, सैनिक परिवार, किसान, शिक्षक और युवा मंच के केंद्र में होंगे। अधिकारियों का फोकस स्वागत व्यवस्था से हटकर योजनाओं के क्रियान्वयन पर होगा। जनता और सरकार के बीच संवाद बढ़ेगा।
उत्तराखंड के सरकारी कार्यक्रमों में अक्सर देखने को मिलता हैकृकि मंच पर लंबी कुर्सियों की कतार,स्वागत के लिए कई-कई संस्थाओं की लाइन,दर्जनों मालाएं और शाल,नेताओं के लंबे भाषण और अंत में जनता के सवाल पूछने का समय ही खत्म। कई बार तो किसी योजना के शुभारंभ से ज्यादा चर्चा स्वागत समारोह की होती है। ऐसे में मेघालय का माडल उत्तराखंड के लिए भी एक नई सोच पेश करता है। सरकारी कार्यक्रमों का खर्च जनता के टैक्स से चलता है। यदि उसी पैसे से नेताओं का स्वागत, स्मृति चिन्ह, फूल-मालाएं और औपचारिक आयोजन किए जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह खर्च वास्तव में आवश्यक है? अगर यही राशि किसी विद्यालय, अस्पताल, पुस्तकालय, आंगनबाड़ी, महिला समूह या छात्रवृत्ति पर खर्च हो, तो उसका सीधा लाभ समाज को मिलेगा।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 करीब हैं। ऐसे समय में यदि राज्य सरकार भी मेघालय जैसी पहल करती है, तो यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा कि सरकार वास्तव में वीआईपी संस्कृति खत्म करना चाहती है। यह कदम विपक्ष और सत्ताकृदोनों के लिए एक परीक्षा भी होगा। क्योंकि मंच पर सम्मान पाने की परंपरा किसी एक दल तक सीमित नहीं रही है। उत्तराखंड के लोग वर्षों से पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पेयजल जैसे मुद्दों पर जवाब चाहते हैं। ऐसे में यदि सरकारी कार्यक्रमों का केंद्र जनता बन जाए, तो लोकतंत्र की भावना और मजबूत होगी। आखिर लोकतंत्र में सबसे बड़ा वीआईपी कौन होना चाहिएकृमंत्री या मतदाता?
मेघालय सरकार का फैसला केवल माला हटाने का आदेश नहीं है, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं को बदलने का प्रयास है। यदि उत्तराखंड भी इस माडल को अपनाता है, तो सरकारी कार्यक्रमों की संस्कृति में बड़ा बदलाव आ सकता है। नेताओं के स्वागत की जगह यदि किसी सीमांत गांव की महिला, किसी सरकारी स्कूल के मेधावी छात्र, किसी सैनिक की शहादत देने वाले परिवार, किसी नवाचारी किसान या आपदा में उत्कृष्ट कार्य करने वाले स्वयंसेवक का सम्मान हो, तो लोकतंत्र की असली तस्वीर सामने आएगी। सवाल अब यही हैकृक्या उत्तराखंड भी वीआईपी संस्कृति से आगे बढ़कर जनता ही सबसे बड़ा सम्मान का संदेश देने का साहस दिखाएगा, या फिर सरकारी मंचों पर फूल-मालाओं और औपचारिक अभिनंदन की परंपरा पहले की तरह जारी रहेगी?
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