शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

गांव की ‘धार’ पर ‘लास्ट पोस्ट’

चरवाहे गए, गीत थमे और पहाड़ के गांव का समाचार कक्ष भी वीरान मोबाइल की घंटी और पलायन के सन्नाटे के बीच एक संस्कृति खत्म बिना इंटरनेट के जो धार पूरे गाँव को जोड़ती थी आज वह हो गई वीरान जहाँ से सूरज सबसे पहले झाँकता था आज वहीं अब पसर गया है सन्नाटा पहाड़ों में धार में पीढ़ियों की स्मृतियों, संस्कृति और जीवन दर्शन भी ठप देहरादून। पहाड़ में अगर किसी से पूछा जाए कि गाँव कहाँ है, तो अक्सर जवाब मिलता हैकृउस धार के उस पार। यह जवाब केवल दिशा नहीं बताता, बल्कि पहाड़ की पूरी सभ्यता का परिचय देता है। धार... यानी पहाड़ की वह ऊँची रेखा, जहाँ खड़े होकर एक साथ कई गाँव दिखाई देते हैं। जहाँ से सूरज सबसे पहले झाँकता है और शाम की आखिरी किरण भी सबसे देर तक ठहरती है। जहाँ हवा सिर्फ चलती नहीं, बल्कि लोकगीत गाती है, जहाँ से बादल नीचे दिखाई देते हैं और इंसान को अपनी सीमाओं का एहसास होता है। पहाड़ के गाँवों में धार केवल भूगोल नहीं, जीवन का केंद्र रही है। कभी इसी धार पर चरवाहे अपने पशु लेकर निकलते थे। महिलाएँ घास के गट्ठर सिर पर रखकर लौटती थीं। बच्चे स्कूल जाते समय यहीं खेलते थे। बुजुर्ग पत्थरों पर बैठकर मौसम का अनुमान लगाते थे। दूर कहीं धुआँ उठता दिखता तो पता चल जाताकृकिसी घर में चूल्हा जल चुका है। धार, पहाड़ का सबसे बड़ा समाचार कक्ष भी थी। किस गाँव में शादी है, कहाँ देवता की डोली निकलेगी, किस खेत में पहली जुताई हुई, कहाँ बारिश हुई और कहाँ नहींकृइन सबकी खबरें मोबाइल नहीं, धार पर मिलती थीं। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। आज उसी धार पर घास पहले से अधिक उग आई है, क्योंकि वहाँ चलने वाले पैरों की संख्या कम हो गई है। जिन पगडंडियों पर कभी बच्चों की चहल-पहल होती थी, वहाँ अब झाड़ियाँ हैं। कई गाँवों में घर बंद हैं। ताले लगे हैं। लोग रोजगार की तलाश में मैदानों और महानगरों की ओर चले गए। धार अब भी वहीं है, लेकिन उसे देखने वाली आँखें कम हो गई हैं। पहाड़ का पलायन केवल आबादी का कम होना नहीं है। यह स्मृतियों का भी पलायन है। जब गाँव खाली होते हैं, तो केवल मकान नहीं सूने होते, बल्कि धार भी अनाथ हो जाती है। क्योंकि धार को जीवित रखने के लिए पत्थर नहीं, लोग चाहिए। फिर भी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आज कई युवा वापस गाँव लौट रहे हैं। कोई सेब और कीवी की खेती कर रहा है, कोई होमस्टे चला रहा है, कोई मंडुवा और झंगोरा को फिर से पहचान दिला रहा है। कुछ लोग लोकगीतों और लोकभाषा को डिजिटल दुनिया तक पहुँचा रहे हैं। यह वापसी छोटी है, लेकिन महत्वपूर्ण है। गाँव की धार आज भी उनका इंतजार कर रही है। पर्यटन बढ़ रहा है, लेकिन चुनौती यह है कि विकास ऐसा हो जो धार की आत्मा को न तोड़े। यदि हर धार पर कंक्रीट ही उग आया, यदि हर पगडंडी सड़क बन गई और हर जंगल केवल सेल्फ़ी का स्थान रह गया, तो पहाड़ अपनी पहचान खो देगा। धार हमें धैर्य भी सिखाती है। वहाँ खड़े होकर समझ आता है कि जीवन केवल भागने का नाम नहीं है। पहाड़ की हवा बताती है कि ऊँचाई का अर्थ अहंकार नहीं, दृष्टि होता है, जो जितना ऊपर होता है, उसे उतना ही दूर तक देखना पड़ता है। शायद यही कारण है कि पहाड़ के लोग कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराना जानते हैं। उनकी सबसे बड़ी पूँजी बैंक का खाता नहीं, बल्कि गाँव की धार से जुड़ी यादें हैं। आज जब पूरी दुनिया तेजी से बदल रही है, तब पहाड़ के गांव की धार हमें यह याद दिलाती है कि विकास का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। क्योंकि किसी भी समाज की असली पहचान उसकी सबसे ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उन सबसे ऊँची धारों से होती है, जहाँ खड़े होकर लोग अपने अतीत को याद करते हैं और भविष्य का रास्ता तलाशते हैं। जब अगली बार आप किसी पहाड़ी गाँव जाएँ, तो केवल मंदिर या पर्यटन स्थल ही न देखें। एक बार गाँव की धार पर भी जाकर खड़े होइए। हो सकता है, वहाँ आपको पहाड़ का सबसे सुंदर दृश्य नहीं, बल्कि उसकी सबसे गहरी आत्मा दिखाई दे जाए। शायद मेरी भी गांव की धार पर यह लास्ट पोस्ट होगी, गांव की तस्वीर भी लास्ट होगी, गांव की संस्कृति, सभ्यता और पुरखों की स्मृतियों के साथ जीवन दर्शन का नजरियां भी लास्ट ही होगा।

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