रविवार, 9 अगस्त 2026
पहाड़ में बचपन की आखिरी आवाज ‘धगुली’
स्मार्टफोन के शोर में खो गई धगुली की छनकाहट, सूने पड़े आंगन और स्क्रीन पर सिमटा पहाड़ का बचपन
न महंगे खिलौने, न बाजार की जरूरत, खेत-खलिहान और धगुली से सजता था बच्चों का संसार
खाली होते गांव और मोबाइल स्क्रीन का अकेलापन, अब इतिहास बन गई सामूहिक खेलों की वह टोली
देहरादून। पहाड़ के गांव में बचपन कभी बहुत महंगा नहीं था। खेलने के लिए बाजार से खिलौने खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती थी। खेत की मेड़, घर का आंगन, जंगल की पगडंडी और पत्थरों के बीच बहता पानी ही बच्चों का खेल का मैदान हुआ करता था। खिलौने भी आसपास की चीजों से बन जाते थे। इन्हीं खिलौनों में एक थी धगुली। धगुली हाथ में आती तो बच्चे की चाल में जैसे कोई उत्सव उतर आता। उसे घुमाने पर निकलती आवाज दूर तक सुनाई देती। वह आवाज सिर्फ धातु की नहीं थी, वह पहाड़ के उस बचपन की आवाज थी जिसमें खेल था, शरारत थी और सामूहिकता थी। आज गांवों में धगुली की आवाज कम सुनाई देती है। उसकी जगह मोबाइल फोन की आवाज ने ले ली है। कभी आंगन में बच्चों की टोली होती थी, अब कई आंगन खाली हैं। कभी एक बच्चा धगुली लेकर निकलता तो चार और उसके पीछे हो लेते थे। अब बच्चे स्क्रीन पर अकेले खेलते हैं।
धगुली शायद बहुत मामूली चीज थी, लेकिन पहाड़ के बचपन के लिए उसका महत्व मामूली नहीं था। वह खिलौना बच्चों को किसी दुकान से नहीं मिलता था। घर के बड़े-बुजुर्ग उसे बनाते थे या आसपास से उपलब्ध चीजों से बच्चे खुद अपना खेल तैयार करते थे। यही तो पहाड़ के बचपन की खासियत थीकृकम साधनों में ज्यादा खुशी। आज जब बाजार बच्चों के लिए हजारों तरह के खिलौने बेचता है, तब उस दौर का बच्चा बिना किसी महंगे खिलौने के भी खुश था। धगुली के साथ खेलते हुए बच्चों की टोली गांव की गलियों से गुजरती थी। किसी के घर के आंगन में थोड़ी देर खेलना, फिर दूसरे घर की ओर भाग जाना। रास्ते में किसी दोस्त का इंतजार करना। कभी खेत की मेड़ पर बैठ जाना और कभी जंगल की ओर निकल जाना।
बचपन का अपना भूगोल था। उस भूगोल में कोई मोबाइल नेटवर्क नहीं था, लेकिन संवाद खूब था। कोई आनलाइन गेम नहीं था, लेकिन खेलों की कमी नहीं थी। कोई वर्चुअल दोस्त नहीं था, क्योंकि दोस्त सामने होते थे और धगुली की आवाज उन दोस्तों को एक-दूसरे से जोड़ती थी। पहाड़ में बच्चों के खेल कभी केवल खेल नहीं होते थे। उनमें जीवन की छोटी-छोटी सीख छिपी होती थी। बच्चे मिलकर खेलते थे तो उनमें बांटने की आदत आती थी। हारते थे तो अगली बार जीतने की कोशिश करते थे। किसी दोस्त के पास खिलौना नहीं होता तो दूसरा अपना खिलौना उसके साथ साझा कर लेता था। यानी खिलौना छोटा था, लेकिन उससे बनने वाला सामाजिक संसार बड़ा था।
आज बच्चे के पास खिलौनों की कमी नहीं है, लेकिन साथ खेलने वाले बच्चों की कमी जरूर हो गई है। यह सिर्फ तकनीक का असर नहीं है। इसके पीछे पहाड़ के गांवों का बदलता जीवन भी है। पलायन ने पहाड़ के कई गांवों से बच्चों की टोली छीन ली। जिन घरों में कभी बच्चों की आवाज गूंजती थी, वहां अब बुजुर्गों की खामोशी है। स्कूलों में छात्र संख्या घटती गई। कई गांवों के रास्तों पर अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं रही। ऐसे में धगुली भी धीरे-धीरे स्मृति का हिस्सा बन गई।
आज अगर किसी पहाड़ी गांव में धगुली की चर्चा छेड़ दी जाए तो बुजुर्गों के चेहरे पर एक अलग चमक दिखाई देती है। व अपने बचपन में लौट जाते हैं। उन्हें याद आता है कि कैसे त्योहारों के दिनों में बच्चे नए उत्साह के साथ खेलते थे। कैसे गांव के एक छोर से दूसरे छोर तक बच्चों की टोली निकलती थी। कैसे घर की महिलाएं अपने काम के बीच बच्चों की आवाज सुनकर मुस्कुरा देती थीं। किसी दादी के पास धगुली से जुड़ी कहानी है तो किसी नाना के पास उसके साथ खेले गए खेल की याद। वह दौर अब तस्वीरों में नहीं, स्मृतियों में बचा है और स्मृतियां भी तब तक बचती हैं जब तक कोई उन्हें सुनाने वाला हो।
आज पहाड़ का बच्चा भी उसी डिजिटल दुनिया का हिस्सा है, जिसमें शहर का बच्चा है। उसके हाथ में स्मार्टफोन है, स्क्रीन है और आनलाइन मनोरंजन है। इसमें बुराई नहीं कि समय बदल रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बदलते समय के साथ हम अपनी छोटी-छोटी लोक स्मृतियों को भी खोते जा रहे हैं? धगुली कोई ऐतिहासिक धरोहर नहीं होगी। शायद उसका कोई संग्रहालय भी न बने। लेकिन किसी संस्कृति की पहचान केवल बड़ी चीजों से नहीं होती। वह उन छोटी चीजों में भी छिपी होती है जिन्हें लोग सामान्य समझकर भूल जाते हैं। एक खिलौना भी संस्कृति का हिस्सा हो सकता है। एक खेल भी इतिहास हो सकता है। एक आवाज भी किसी पीढ़ी की पहचान बन सकती है। धगुली ऐसी ही एक पहचान है।
जरूरी नहीं कि आज के बच्चों को वही पुराने खिलौने दिए जाएं और उनसे कहा जाए कि वे उसी तरह खेलें जैसे उनके दादा-दादी खेलते थे। समय को पीछे नहीं लौटाया जा सकता। लेकिन उस समय की कहानियां जरूर आगे ले जाई जा सकती हैं। स्कूलों में स्थानीय खेलों और खिलौनों पर गतिविधियां हों। गांवों में बुजुर्ग बच्चों को पुराने खेल सिखाएं। स्थानीय मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में पहाड़ के पारंपरिक खिलौनों को जगह मिले। बच्चों को बताया जाए कि उनके गांव में मोबाइल फोन आने से पहले बचपन कैसा था। क्योंकि धगुली को बचाना वास्तव में एक खिलौने को बचाना नहीं है। यह उस बचपन की स्मृति को बचाना है जिसमें खुशियां बाजार से नहीं, अपने आसपास से पैदा होती थीं।
पहाड़ बदल रहा है। घर बदल रहे हैं। रास्ते बदल रहे हैं। बच्चों के खेल बदल रहे हैं। लेकिन पहाड़ की स्मृतियों को पूरी तरह बदल जाने देना जरूरी नहीं। कभी किसी पुराने संदूक में पड़ी धगुली को निकालिए। उसे बच्चे के हाथ में दीजिए। शायद वह बच्चा पहले उसे अजीब नजरों से देखे। फिर उसे घुमाए और जब उससे वह पुरानी आवाज निकलेगी, तो संभव है कि पास बैठा कोई बुजुर्ग अचानक मुस्कुरा उठे। उस मुस्कान में उसका पूरा बचपन छिपा होगा। धगुली की वह आवाज शायद लौटकर फिर गांव की गलियों में न गूंजे, लेकिन उसकी कहानी अगली पीढ़ी तक जरूर पहुंच सकती है। क्योंकि पहाड़ सिर्फ पहाड़ नहीं होता। वह उन आवाजों का भी घर है, जो समय बीतने के बाद सुनाई देना बंद हो जाती हैंकृलेकिन खत्म नहीं होतीं।
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