रविवार, 30 अगस्त 2026
बैकफुट पर बीजेपी, कांग्रेस ने ‘दलित कार्ड’ खेला
कांग्रेस ने स्थानीय विवाद को बनाया राष्ट्रीय मुद्दा, एकजुट होकर खोला मोर्चा
खरगे के अपमान को कांग्रेस ने बनाया सामाजिक बराबरी की लड़ाई का मुद्दा
दिग्गजों से लेकर राहुल तक मैदान में, सम्मान बनाम मानसिकता की सियासत
देहरादून। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित शुद्धिकरण के मामले ने उत्तराखंड कांग्रेस को एकजुट होकर राजनीतिक मोर्चा खोलने का मौका दे दिया है, जिस विवाद को शुरुआत में स्थानीय स्तर की घटना माना जा रहा था, कांग्रेस ने उसे अब दलित सम्मान, सामाजिक बराबरी और वैचारिक लड़ाई का मुद्दा बना दिया है। खरगे की आठ अगस्त को हल्द्वानी में सभा हुई थी। इसके बाद 10 अगस्त को रामलीला मैदान में हवन और गंगाजल छिड़कने का कार्यक्रम हुआ। इसके बाद विवाद ने राजनीतिक रंग पकड़ लिया। भाजपा ने आयोजन से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया है, जबकि कांग्रेस लगातार इस मामले में कार्रवाई की मांग कर रही है। कांग्रेस के लिए यह विवाद इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि पार्टी इसे केवल खरगे के अपमान के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक बराबरी के सवाल के रूप में पेश कर रही है। राज्यसभा में खरगे ने भी इस घटना पर आपत्ति जताई थी। बाद में संसद में मामला उठा और भाजपा की ओर से जांच तथा कार्रवाई का आश्वासन दिया गया।
अब कांग्रेस के प्रदेश स्तर के दिग्गज नेताओं ने भी मोर्चा संभाल लिया है। प्रीतम सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से मिलकर निष्पक्ष जांच की मांग कर चुका है। यानी पार्टी इस मामले को सड़क से राजभवन और राजभवन से राष्ट्रीय राजनीति तक ले जाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। 29 अगस्त को राहुल गांधी के इस मुद्दे पर खुलकर सामने आने के बाद विवाद की राजनीतिक धार और तेज हो गई। राहुल ने कथित शुद्धिकरण को छुआछूत से जोड़ते हुए भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधा तथा कार्रवाई और एफआइआर की मांग की। इससे उत्तराखंड कांग्रेस के लिए साफ राजनीतिक संदेश गया हैकृमुद्दा छोड़ना नहीं है, बल्कि इसे राष्ट्रीय बहस में बनाए रखना है।
कांग्रेस को इसमें एक साथ कई राजनीतिक संदेश दिखाई दे रहे हैं। पहला, दलित सम्मान का सवाल। दूसरा, सामाजिक न्याय का मुद्दा। तीसरा, भाजपा की वैचारिक राजनीति पर हमला और चौथा, आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का अवसर। हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौती भी कम नहीं है। भाजपा लगातार कह रही है कि शुद्धिकरण कार्यक्रम से उसका कोई संबंध नहीं था। ऐसे में कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी से आगे ले जाने के लिए उसे ठोस तथ्य और जांच के निष्कर्ष सामने रखने होंगे। यही कारण है कि कांग्रेस अब मामले की निष्पक्ष जांच की मांग पर जोर दे रही है। पार्टी का तर्क है कि यदि घटना गलत है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और यदि भाजपा का इससे कोई संबंध नहीं है तो वह भी निष्पक्ष जांच के माध्यम से स्पष्ट हो जाएगा।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज होने के बीच कांग्रेस इस विवाद को राजनीतिक रूप से हल्के में लेने के मूड में नहीं है। प्रदेश में दलित मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में कांग्रेस की कोशिश साफ दिखाई दे रही है कि शुद्धिकरण विवाद को सामाजिक सम्मान के बड़े सवाल से जोड़कर भाजपा के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जाए। दूसरी ओर भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह इस मामले को लगातार बढ़ते राजनीतिक विवाद में बदलने से कैसे रोके। पार्टी के सामने एक तरफ धार्मिक भावनाओं से जुड़ा पक्ष है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सामाजिक भेदभाव के आरोप। यही वजह है कि हल्द्वानी का रामलीला मैदान अब केवल एक मैदान नहीं रह गया है। यह उत्तराखंड की आने वाली चुनावी राजनीति में वैचारिक टकराव का नया प्रतीक बनता दिखाई दे रहा है।
प्रीतम सिंह से लेकर प्रदेश कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं और अब राहुल गांधी तक इस मुद्दे पर सक्रियता बताती है कि कांग्रेस इसे महज एक दिन की बयानबाजी नहीं बनाना चाहती। पार्टी इसे लगातार राजनीतिक विमर्श में रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। खास बात यह है कि कांग्रेस के भीतर लंबे समय से संगठन, नेतृत्व और चुनावी रणनीति को लेकर अलग-अलग आवाजें उठती रही हैं। ऐसे में यह मुद्दा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को एक साझा राजनीतिक मंच भी दे रहा है। यानी हल्द्वानी में शुद्धिकरण का विवाद अब कांग्रेस के लिए केवल सम्मान का सवाल नहीं, बल्कि 2027 की सियासत का एक संभावित राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है।
आने वाले दिनों में कांग्रेस का रुख और आक्रामक हुआ तो यह मुद्दा उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में विकास बनाम वैचारिक संघर्ष की नई बहस खड़ी कर सकता है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस इस मुद्दे को कितनी दूर तक ले जाती है और भाजपा इसका जवाब किस राजनीतिक रणनीति से देती है।
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