शनिवार, 1 अगस्त 2026
कंडाली की ‘छपाक’ और बचपन का ‘शोर’
पहाड़ की पगडंडियों, गदेरों और बेफिक्र दिनों की वह ख़ूबसूरत दास्तान
दो मिनट का रोना और फिर पहाड़ की पगडंडियों पर वही खेल शुरू
नंगे पांव दौड़ना, गदेरों में छलांगें व बिछुआ घास की वह मीठी चुभन
हर पहाड़ी के दिल में आज भी जिंदा है बचपन का वह खट्टा-मीठा दर्द
देहरादून। अरे... कंडाली लग गई! यह आवाज कभी पहाड़ के हर गांव में सुनाई देती थी। अगले ही पल बच्चों का शोर, हंसी और भागमभाग शुरू हो जाती थी। कोई हाथ सहला रहा होता, कोई पत्ते रगड़ रहा होता, तो कोई साथी को चिढ़ाते हुए कहता अब समझ आया, खेत में दौड़ने का नतीजा! पहाड़ में बचपन का मतलब सिर्फ स्कूल जाना नहीं था। बचपन का मतलब थाकृनंगे पांव पगडंडियों पर दौड़ना, जंगलों में गाय-बकरियां चराना, गदेरों में मछलियां पकड़ना, पेड़ों पर चढ़ना और इन्हीं सबके बीच कभी न कभी कंडाली की छपाक खाना। यह छपाक सिर्फ शरीर पर नहीं लगती थी, बल्कि पहाड़ के हर बच्चे की यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती थी। कंडाली का पौधा दिखने में जितना साधारण, उसका स्पर्श उतना ही तेज। इसके महीन कांटे त्वचा में चुभते और कुछ ही सेकंड में हाथ-पैर जलने लगते। ऐसा लगता मानो किसी ने सैकड़ों सूइयां एक साथ चुभो दी हों। लेकिन पहाड़ के बच्चों के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। दो मिनट रोने के बाद फिर वही खेल शुरू।
आज की तरह उस समय हर घर में दवा नहीं होती थी। दादी कहती थींकृबांज का पत्ता रगड़ दो, कोई कहता बिच्छू बूटी का असर अपने आप उतर जाएगा, तो कोई मिट्टी या ठंडा पानी लगाने की सलाह देता। कुछ देर बाद जलन कम हो जाती और बच्चे फिर जंगल की ओर निकल पड़ते। कई गांवों में कंडाली सिर्फ गलती से नहीं लगती थी। दोस्तों की शरारत में भी इसका खूब इस्तेमाल होता था। किसी की पीठ पर हल्की सी कंडाली छुआ दी और फिर पूरा गांव हंसी से गूंज उठता। उस समय गुस्सा भी आता था और दोस्ती भी उतनी ही मजबूत रहती थी।
समय बदला। विज्ञान ने बताया कि यही कंडाली पोषक तत्वों का खजाना है। इससे स्वादिष्ट साग बनता है, आयुर्वेदिक दवाइयां तैयार होती हैं और आज यह जैविक खेती व पहाड़ी व्यंजनों की पहचान बन चुकी है जो पौधा कभी बच्चों को रुलाता था, वही आज शहरों के बड़े-बड़े होटलों के मेन्यू में जगह बना चुका है। मोबाइल, इंटरनेट और कोचिंग के दौर में पहाड़ का बचपन भी बदल गया है। अब बच्चे जंगलों में कम जाते हैं। पगडंडियों की जगह सड़कें हैं, गदेरों की जगह मोबाइल गेम्स और पेड़ों पर चढ़ने की जगह सोशल मीडिया ने ले ली है। इसलिए नई पीढ़ी शायद कभी उस एहसास को नहीं समझ पाएगी, जब कंडाली की छपाक लगते ही पूरा दोस्ताना ठहाकों में बदल जाता था।
पहाड़ छोड़ चुके लाखों लोग जब अपने गांव लौटते हैं और कहीं खेत की मेड़ पर कंडाली का पौधा देखते हैं, तो अनायास मुस्कुरा देते हैं। उन्हें याद आता हैकृवह बचपन...वह पगडंडी...वह खेत...वह बारिश...
और कंडाली की वह तेज जलन, जो आज सबसे मीठी याद बन चुकी है। कभी जिस बिच्छू घास से बचकर भागते थे, आज उसी की तस्वीर देखकर बचपन लौट आता है। शायद इसलिए पहाड़ के लोग कहते हैंकृकंडाली की छपाक भूल सकते हो, लेकिन उससे जुड़ी यादें कभी नहीं।
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