रविवार, 31 मई 2026
देवभूमि की रीढ़ हो रही है ‘खोखली’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-22
उत्तराखंड में पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट बनेगा बड़ा मुद्दा
---पहचान की जंग, खंडहर मकान व थमते कदम
---डिग्रियों के बोझ तले दबा है पहाड़ का भविष्य
---बुनियादी सुविधाओं की खाई पाटना बड़ी चुनौती
---चुनावी शोर के बीच बड़ा यक्ष प्रश्न बनेगा पलायन
देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात धीरे-धीरे सजने लगी है। भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दल अपने-अपने स्तर पर संगठन मजबूत करने और चुनावी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। लेकिन इस बार चुनावी चर्चा केवल सत्ता परिवर्तन या चेहरों तक सीमित नहीं रहने वाली। पहाड़ के गांवों में अब सबसे बड़ा सवाल पहाड़ का भविष्य बनता जा रहा है। यही कारण है कि आगामी चुनाव में पलायन, खाली होते गांव, युवाओं की बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली, पर्यावरणीय संकट और स्थानीय पहचान जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ सकते हैं।
उत्तराखंड राज्य बनने के पीछे सबसे बड़ी भावना थी कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर होगा। लेकिन राज्य गठन के 25 साल बाद भी हजारों गांव खाली हो चुके हैं। पहाड़ का युवा रोजगार के लिए देहरादून, दिल्ली, चंडीगढ़ और महानगरों की ओर पलायन कर रहा है। गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं ही बची हैं। खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है और पारंपरिक आजीविकाएं संकट में हैं। ऐसे में आमजन के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर पहाड़ का भविष्य क्या होगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल विकास के दावों का नहीं, बल्कि पहाड़ बचाने की लड़ाई के रूप में भी देखा जा सकता है। भाजपा सरकार लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क, चारधाम परियोजना, निवेश और पर्यटन को अपनी उपलब्धि बता रही है। हाल ही में पेश बजट में भी ग्रामीण सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और कुंभ 2027 से जुड़ी परियोजनाओं पर विशेष जोर दिया गया है। हालांकि विपक्ष और सामाजिक संगठन यह सवाल उठा रहे हैं कि बड़े विकास मॉडल के बावजूद पहाड़ के मूल मुद्दे क्यों नहीं सुलझ पाए। पर्वतीय क्षेत्रों में अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं, कई स्कूल छात्र संख्या कम होने से बंद होने की कगार पर हैं और युवाओं को स्थायी रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे। यही कारण है कि गांवों से लगातार पलायन जारी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में अब मैदानी विकास बनाम पहाड़ी असंतोष की भावना भी उभर रही है। देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में तेजी से शहरीकरण हो रहा है, जबकि दूरस्थ पहाड़ी जिलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी अब भी बरकरार है। इससे क्षेत्रीय असंतुलन का मुद्दा भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
सोशल मीडिया और युवाओं के बीच क्षेत्रीय राजनीति की चर्चा भी बढ़ रही है। कई मंचों पर राष्ट्रीय दलों के प्रति नाराजगी और क्षेत्रीय विकल्प की मांग खुलकर दिखाई दे रही है। कुछ आनलाइन चर्चाओं में युवाओं ने उत्तराखंड क्रांति दल जैसे क्षेत्रीय दलों को मजबूत विकल्प बनाने की बात कही है, हालांकि संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व संकट को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि 2027 के चुनाव में कोई दल पहाड़ के भविष्य को लेकर ठोस रोडमैप प्रस्तुत करता हैकृजैसे स्थानीय रोजगार, पर्वतीय कृषि, ग्रामीण पर्यटन, शिक्षा-स्वास्थ्य सुधार और पर्यावरण संरक्षणकृतो वह जनता के बीच मजबूत पकड़ बना सकता है। खासतौर पर युवा मतदाता अब केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर जवाबदेही मांग रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन और आपदाएं भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकती हैं। जोशीमठ भू-धंसाव, अतिवृष्टि, जंगलों में आग और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं ने पहाड़ में विकास माडल पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। लोगों के बीच यह चर्चा बढ़ रही है कि बिना पर्यावरणीय संतुलन के विकास का माडल पहाड़ के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है। राजनीतिक तौर पर भाजपा अभी मजबूत संगठन और नेतृत्व के दम पर चुनावी तैयारी में आगे दिखाई दे रही है। पार्टी ने बूथ स्तर तक रणनीति तेज कर दी है। वहीं कांग्रेस जनता के असंतोष को मुद्दा बनाने की कोशिश में जुटी है। दूसरी ओर क्षेत्रीय दल पहाड़ बनाम दिल्ली माडल की भावना को हवा देने का प्रयास कर सकते हैं।
स्पष्ट है कि 2027 का चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि उत्तराखंड का पहाड़ आने वाले वर्षों में किस दिशा में जाएगा। यदि गांव खाली होते रहे, युवा पलायन करते रहे और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में पहाड़ का भविष्य केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल बन सकता है।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें