गुरुवार, 14 मई 2026
‘अधूरे वादों’ पर सियासत 25 साल से ‘मौन’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-6
पहाड़ के उजड़ते गांवों की पीड़ा पर सजेगी विधानसभा 2027 की चुनावी बिसात
क्रासर
---पर्वतीय जिलों से लगातार बढ़ रहा पलायन राजनीतिक दलों के लिए बड़ी चुनौती
---सरकारी नौकरियों की कमी और भर्ती विवादों से युवाओं में बढ़ी है नाराजगी
---सीमांत गांवों से पलायन को लेकर सुरक्षा और विकास दोनों पर उठ रहे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। राज्य की राजनीति में पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी हमेशा से केंद्र में रहे हैं। पहाड़ों के खाली होते गांव, युवाओं की बेरोजगारी और बेहतर अवसरों की तलाश में मैदानों व दूसरे राज्यों की ओर बढ़ता पलायन अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। राजनीति में अभी तक वादों और सियासत का खेल चलता रहा है, लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव में सियासत के ‘अधूरे वादों’ जो अभी तक मौन साधा है उस पर प्रश्न उठने लाजमी हैं और हो सकता है कि यह सत्ता के खेल में भारी पड़ सकता है।
उत्तराखंड राज्य गठन के समय लोगों ने उम्मीद की थी कि अलग राज्य बनने से पहाड़ों में रोजगार बढ़ेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं सुधरेंगी और गांव आबाद रहेंगे। लेकिन 25 साल बाद भी तस्वीर काफी हद तक उलट दिखाई देती है। राज्य के पर्वतीय जिलोंकृपौड़ी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ सहित अन्य जिलों में पलायन सबसे अधिक हुआ है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि पलायन सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सामरिक चुनौती भी बन गया है। भारत-चीन सीमा से लगे कई गांव लगभग खाली हो चुके हैं। 2024 में सामने आई एक रिपोर्ट में 11 सीमांत गांव पूरी तरह खाली पाए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमांत क्षेत्रों का खाली होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी चिंता का विषय है।
उत्तराखंड का युवा आज सरकारी नौकरी, सेना भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं पर सबसे ज्यादा निर्भर है। लेकिन भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती घोटाले और सीमित अवसरों ने युवाओं में गहरा असंतोष पैदा किया है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक युवाओं का गुस्सा कई बार देखने को मिला है। विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य में उद्योगों की कमी, पर्वतीय क्षेत्रों में निवेश न होना और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का कमजोर होना बेरोजगारी का बड़ा कारण है। पर्यटन और सेना भर्ती पर अत्यधिक निर्भरता भी राज्य की अर्थव्यवस्था को सीमित करती है।
उत्तराखंड के कई गांव अब घोस्ट विलेज कहलाने लगे हैं। गांवों में सिर्फ बंद मकान और सूने आंगन बच गए हैं। खेत बंजर हो रहे हैं और पारंपरिक खेती खत्म होती जा रही है। हालांकि कुछ गांवों ने उम्मीद भी जगाई है। बागेश्वर जिले के खाती और वाछम जैसे गांवों ने पर्यटन, होमस्टे और जड़ी-बूटी आधारित रोजगार के जरिए पलायन को काफी हद तक रोका है। यहां स्थानीय युवाओं ने गांव छोड़ने के बजाय गांव में ही रोजगार के अवसर बनाए। हालांकि सरकार यह भी दावा कर रही है कि हाल के वर्षों में रिवर्स माइग्रेशन यानी गांवों में वापसी का ट्रेंड बढ़ा है। लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि गांव लौटने वालों की संख्या अभी भी बाहर जाने वालों से काफी कम है।
प्रदेश में होने वाले आगामी चुनाव केवल सड़क और बिजली पर नहीं, बल्कि पहाड़ की स्थिरता पर टिके होंगे। यदि सरकारें पहाड़ों में लघु उद्योगों और आईटी क्लस्टर्स को बढ़ावा देने में विफल रहती हैं, तो पलायन का यह आंकड़ा आने वाले समय में उत्तराखंड की जनसांख्यिकी को पूरी तरह बदल सकता है। इससे आने वाले समय में विधानसभा सहित सभी अन्य चुनावों पर भी फर्क पडे़गा और राजनीति पर भी।
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पलायन की स्थिति है चिंताजनक
उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार राज्य में पलायन की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। 2011 से 2022 के बीच राज्य के लगभग 1792 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, जिन्हें अब घोस्ट विलेज कहा जाता है। 2011 में यह संख्या 1034 थी। अल्मोड़ा, पौड़ी गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल से सबसे अधिक पलायन दर्ज किया गया है। पौड़ी जिले में अकेले 1.5 लाख से अधिक लोगों ने अपने घर छोड़े हैं। लगभग 50 प्रतिशत पलायन का मुख्य कारण आजीविका के अवसरों का अभाव है। इसके बाद स्वास्थ्य और शिक्षा का स्थान आता है। पलायन करने वालों में 26 से 35 वर्ष की आयु के युवाओं की संख्या सबसे अधिक है, जो राज्य की उत्पादक शक्ति को कमजोर कर रही है।
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