रविवार, 7 जून 2026
वक्त और फैशन बदला पर नहीं बदला ‘गलोबंद’ का टशन
---सामाजिक पहचान व सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है गलोबंद
---गढ़वाल और कुमाऊं में पारंपरिक महिलाओं का प्रमुख आभूषण
---विशेष रूप से पहना जाता है विवाह व मांगलिक अवसरों पर
---कई परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में है यह संरक्षित
---पहाड़ के लोकगीतों व लोक संस्कृति में है इसका विशेष स्थान
देहरादून। उत्तराखंड की समृ( लोक संस्कृति में अनेक ऐसे प्रतीक हैं जो केवल परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज की पहचान भी हैं। इन्हीं में से एक है गलोबंद जो सदियों से पहाड़ की महिलाओं के गले की शोभा बढ़ाने के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बना हुआ है। आधुनिकता की तेज़ रफ्तार के बावजूद गलोबंद आज भी उत्तराखंड की लोक विरासत में अपना विशेष स्थान बनाए हुए है।
पहाड़ की महिलाओं का पारंपरिक श्रृंगार विविध आभूषणों से सुसज्जित रहा है। नथ, पौंजी, हंसुली, गुलूबंद, चरेऊ और गलोबंद जैसे आभूषण न केवल सौंदर्य बढ़ाते हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और सामाजिक परंपराओं को भी अभिव्यक्त करते हैं। इनमें गलोबंद सबसे विशिष्ट माना जाता है। काले मखमली कपड़े या मोटे धागे की पट्टी पर सोने, चांदी अथवा धातु के कलात्मक टुकड़ों को पिरोकर बनाया जाने वाला यह आभूषण गले से सटा रहता है और महिलाओं के व्यक्तित्व में अलग ही गरिमा जोड़ देता है।
लोक संस्कृति के जानकार बताते हैं कि गलोबंद का इतिहास कई पीढ़ियों पुराना है। पुराने समय में जब पहाड़ के गांवों में आधुनिक आभूषण आसानी से उपलब्ध नहीं थे, तब स्थानीय कारीगर हाथों से गलोबंद तैयार करते थे। प्रत्येक डिजाइन में स्थानीय कला और पारंपरिक सौंदर्यबोध की झलक दिखाई देती थी। कई परिवारों में गलोबंद केवल गहना नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत माना जाता था, जिसे मां अपनी बेटी और सास अपनी बहू को सौंपती थी।
उत्तराखंड के विवाह समारोहों में गलोबंद का विशेष महत्व रहा है। दुल्हन के श्रृंगार में इसे शुभता और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। मांगल गीतों और लोक नृत्यों में भी गलोबंद का बार-बार उल्लेख मिलता है। पहाड़ की लोक गायिकाओं द्वारा गाए जाने वाले कई गीतों में महिलाओं के श्रृंगार और आभूषणों का वर्णन मिलता है, जिनमें गलोबंद प्रमुख स्थान रखता है।
समय के साथ फैशन बदलता गया, लेकिन गलोबंद की लोकप्रियता कम नहीं हुई। आज यह पारंपरिक परिधान के साथ-साथ आधुनिक परिधानों में भी नए रूप में दिखाई देने लगा है। राज्य के सांस्कृतिक मेलों, उत्तरायणी, नंदा देवी महोत्सव और विभिन्न लोक उत्सवों में युवा पीढ़ी भी गलोबंद पहनकर अपनी संस्कृति से जुड़ाव का प्रदर्शन कर रही है। सोशल मीडिया के दौर में भी पारंपरिक पहाड़ी वेशभूषा और गलोबंद की तस्वीरें व्यापक रूप से पसंद की जा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्वीकरण के इस दौर में जब स्थानीय परंपराएं धीरे-धीरे सिमटती जा रही हैं, तब गलोबंद जैसे सांस्कृतिक प्रतीक नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। यह केवल गले का आभूषण नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक स्मृति, लोक कला और महिलाओं की पहचान का जीवंत दस्तावेज है।
आज भी जब किसी पर्व, विवाह या सांस्कृतिक आयोजन में पारंपरिक वेशभूषा पहने कोई पहाड़ी महिला गलोबंद धारण करती है, तो उसमें केवल सौंदर्य नहीं झलकता, बल्कि सदियों पुरानी लोक परंपरा की चमक दिखाई देती है। यही कारण है कि गलोबंद उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का ऐसा अनमोल आभूषण है, जिसकी चमक समय के साथ और अधिक निखरती जा रही है।
पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, लोकगीतों और पर्वों तक सीमित नहीं है। यहां के पारंपरिक आभूषण भी इस विरासत के महत्वपूर्ण वाहक हैं। गलोबंद उन्हीं में से एक है, जो आज भी पहाड़ की महिलाओं के गले में संस्कृति, गौरव और पहचान बनकर दमक रहा है।
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