बुधवार, 20 मई 2026
‘सपनों’ की नीलामी पर सिस्टम की ‘खामोशी’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-13
भर्ती घोटाले और भ्रष्टाचार की आग में तपेगा 2027 का चुनावी रण
क्रासर
---पेपर लीक, नियुक्तियों पर सवाल और सिस्टम पर अविश्वास
---युवाओं की नाराजगी क्या बदल देगी राजनीति का समीकरण
---उत्तराखंड राज्य की राजनीति के लिए यह चेतावनी का समय
---इतिहास गवाह हैकृजब-जब भरोसा टूटा तब सरकारें ही बदली
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक विकास, पलायन, सड़क और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही, लेकिन अब प्रदेश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता था। उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में सरकारी नौकरी सिर्फ रोजगार नहीं होती, वह परिवार की आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और स्थिर भविष्य का प्रतीक होती है। पहाड़ के गांवों से निकलने वाला युवा सीमित संसाधनों के बावजूद दिन-रात तैयारी करता है। माता-पिता खेत बेचकर और कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। लेकिन जब परीक्षाओं के पेपर बाजार में बिकने लगें, नियुक्तियों पर सवाल उठने लगें और मेहनत की जगह सिस्टम की चर्चा होने लगे, तब सबसे पहले भरोसा मरता है।
यही कारण है कि भर्ती घोटाले उत्तराखंड में केवल कानूनी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गए हैं। यह अब भावनात्मक और राजनीतिक संकट बन चुका है। युवाओं के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि सत्ता और व्यवस्था उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। यही आक्रोश आने वाले विधानसभा चुनावों में निर्णायक रूप ले सकता है।
प्रदेश में पटवारी भर्ती, पुलिस भर्ती, विधानसभा भर्ती और विभिन्न आयोगों की परीक्षाओं को लेकर उठे विवादों ने सरकार और व्यवस्था दोनों की साख को झटका दिया। कई परीक्षाएं रद्द हुईं, गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन युवाओं के मन में बैठा अविश्वास अभी खत्म नहीं हुआ है। गांवों में चौपालों से लेकर शहरों के कोचिंग सेंटरों तक एक ही चर्चा सुनाई देती हैकृक्या मेहनत करने वालों को सच में न्याय मिलेगा?
राजनीतिक दल भी अब इस मुद्दे की गंभीरता को समझने लगे हैं। विपक्ष लगातार सरकार को भर्ती माफिया और सिस्टम में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेर रहा है, जबकि सत्तापक्ष कार्रवाई और सख्त कानूनों का हवाला देकर खुद को जवाबदेह साबित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन चुनावी राजनीति में धारणा अक्सर तथ्यों से ज्यादा असर डालती है और यही चिंता सत्ता पक्ष के भीतर भी दिखाई देने लगी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और परिवार की आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा माध्यम मानी जाती है। ऐसे में भर्ती प्रक्रियाओं पर उठे सवाल सीधे लाखों युवाओं और उनके परिवारों की भावनाओं से जुड़ जाते हैं। यही कारण है कि यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और राजनीतिक रूप ले चुका है।
पहाड़ के दूरस्थ गांवों में रहने वाले युवाओं का दर्द और भी गहरा है। सीमित संसाधनों के बीच वर्षों तक तैयारी करने वाले युवाओं को जब पेपर लीक या भ्रष्टाचार की खबरें सुनाई देती हैं तो उनके भीतर व्यवस्था के प्रति निराशा और गुस्सा दोनों बढ़ता है। कई युवा इसे पलायन और टूटते भरोसे की सबसे बड़ी वजह भी मानने लगे हैं।
2027 का चुनाव केवल सड़कों, बिजली और विकास योजनाओं तक सीमित नहीं रहने वाला। इस बार युवाओं का सवाल सीधा होगाकृनौकरी मिलेगी या सिर्फ आश्वासन? राजनीतिक दलों के भाषणों में राष्ट्रवाद, विकास और योजनाओं के साथ-साथ भर्ती घोटालों और भ्रष्टाचार का मुद्दा भी पूरी ताकत से गूंजेगा।
उत्तराखंड की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब युवाओं का आक्रोश सत्ता के लिए चुनौती बना हो, लेकिन इस बार मामला केवल बेरोजगारी का नहीं, बल्कि भरोसे के टूटने का भी है। और लोकतंत्र में जब भरोसा टूटता है, तब चुनाव केवल सत्ता बदलने का नहीं, व्यवस्था को जवाब देने का माध्यम बन जाता है।
बाक्स
सिस्टम की साख पर लगा बट्टा
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की नींव में यह सोच थी कि यहाँ के संसाधनों पर यहाँ के युवाओं का हक होगा। लेकिन हालिया वर्षों में यूकेएसएसएससी से लेकर लोक सेवा आयोग तक की परीक्षाओं में जो कुछ देखने को मिला, उसने पूरे सिस्टम की साख पर बट्टा लगा दिया है। जब परीक्षा से ठीक पहली रात को पेपर लाखों रुपयों में बिक जाता है, तो वह केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं बिकता, बल्कि उस गरीब मां-बाप की उम्मीदें नीलाम होती हैं जिन्होंने पेट काटकर अपने बच्चे को पढ़ाया होता है। अखबारों की सुर्खियां गवाह हैं कि जांचें हुईं, गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन युवाओं के मन में यह सवाल आज भी जस का तस हैकृ क्या इस खेल के असली मगरमच्छ कभी पकड़े जाएंगे?
बिकाऊ तंत्र के आगे बेबस युवा
उत्तराखंड के गठन के ढाई दशक बाद भी अगर युवाओं को योग्यता के बजाय सिफारिश और पैसों के दम पर नौकरियां मिलने का डर सताए, तो यह पूरे नीतिगत ढांचे की विफलता है। 2027 का चुनाव यह तय नहीं करेगा कि कौन सी पार्टी जीतेगी, बल्कि यह तय करेगा कि क्या उत्तराखंड का युवा अब भी बिकाऊ तंत्र के आगे बेबस रहेगा या फिर अपने वोट की चोट से एक नया, पारदर्शी और जवाबदेह उत्तराखंड लिखेगा। पहाड़ की जवानी अब चुप रहने के मूड में नहीं है, और यही इस बार के लोकतंत्र के महापर्व का सबसे बड़ा सच है।
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