शनिवार, 16 मई 2026
‘महंगाई डायन खाए जात है’
विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-9
रसोई से लेकर पेट्रोल पंप तक महंगा, 2027 के विधानसभा चुनाव का बनेगा मुद्दा
---महंगाई की मार से भी तपेगा 2027 का चुनावी रण
---पहाड़ में जेब खाली, चुनाव में भारी पड़ेगी महंगाई
---चुनाव से पहले गैस, राशन और पेट्रोल सब महंगा
देहरादून। ‘महंगाई डायन खाए जात है’ 2010 की फिल्म पीपली लाइव का गाना है, जो महंगाई की मार और आम आदमी की व्यथा को दर्शाता है। आज के दौर में जहां पहले ही महंगाई से लोग परेशान थे। वही पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने का फर्क सभी चीजों पर पडे़गा और यह असर लंबे समय तक रहने वाला है। क्योंकि आमजन की कमाई तो बढ़ी नहीं, लेकिन महंगाई ने अपने पांव इत कदर फैला दिए है कि आमजन के लिए यह परेशानी वाला समय है। यह कहे कि ‘महंगाई डायन खाए जात है’ तो इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। पहाड़ से लेकर मैदान तक जनता जिन मुद्दों से सबसे ज्यादा परेशान है, उनमें महंगाई सबसे ऊपर है। गैस सिलेंडर, खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, पेट्रोल-डीजल और बच्चों की पढ़ाई तक हर चीज की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। ऐसे में आने वाले चुनाव में महंगाई बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।
प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में स्थिति और अधिक गंभीर है। पहाड़ों में पहले ही रोजगार और पलायन की समस्या है, ऊपर से रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ने से लोगों का जीवन मुश्किल होता जा रहा है। गांवों में रहने वाले बुजुर्ग और सीमित आय वाले परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कई जगहों पर लोग कह रहे हैं कि आमदनी नहीं बढ़ी, लेकिन खर्च दोगुना हो गया। शहरी क्षेत्रों में भी महंगाई ने मध्यम वर्ग को परेशान कर रखा है। देहरादून, हल्द्वानी और हरिद्वार जैसे शहरों में किराया, बिजली बिल, स्कूल फीस और राशन का खर्च लगातार बढ़ रहा है। गृहिणियों का कहना है कि पहले जो सामान एक महीने चलता था, अब वही आधे महीने में खत्म हो रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाएगा। कांग्रेस समेत अन्य दल पहले ही महंगाई को लेकर सरकार पर हमला बोल रहे हैं। वहीं सत्ताधारी दल विकास योजनाओं और केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को जनता के सामने रखकर जवाब देने की तैयारी में है।
बाक्स
रसोई से लेकर खेती तक मार
बीते एक साल में दालों, खाद्य तेल और रसोई गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने मध्यम और गरीब वर्ग की कमर तोड़ दी है। पहाड़ी क्षेत्रों में परिवहन लागत बढ़ने के कारण मैदानी इलाकों की तुलना में सामान 10-15 प्रतिशत महंगा मिल रहा है। प्रदेश के पहाड़ी जिलों में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हैं। सीमित रोजगार, खेती में घटती आय और पलायन के बीच महंगाई ने ग्रामीण परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
चारधाम यात्रा पर दिख रहा असर
वर्तमान में चल रही चारधाम यात्रा के दौरान बढ़ती भीड़ ने स्थानीय मांग को बढ़ा दिया है, जिससे स्थानीय निवासियों के लिए फल, दूध और सब्जियों की कमी और कीमतों में तेजी देखी जा रही है। वैसे भी चारधाम यात्रा का टाइम पीरियड इतना कम होता है कि हर कोई इस समय में अपनी कमाई कम समय में बढ़ाना चाहता है। वही महंगाई की मार से सभी परेशान हैं।
आम आदमी की जेब पर सीधा असर
देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल ईंधन का मुद्दा नहीं रह गई हैं, बल्कि यह आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा सबसे बड़ा आर्थिक सवाल बन चुकी हैं। पेट्रोल-डीजल महंगे होते ही परिवहन खर्च बढ़ता है, जिसका असर सब्जियों, राशन, दूध और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई देता है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में इसका असर और अधिक गंभीर है, क्योंकि यहां परिवहन पूरी तरह सड़क मार्ग पर निर्भर है। महंगे ईंधन के कारण गांव से शहर तक सामान पहुंचाने की लागत बढ़ रही है, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता को उठाना पड़ता है। सरकारें अक्सर अंतरराष्ट्रीय बाजार और टैक्स को वजह बताती हैं, लेकिन जनता को राहत देने के लिए स्थायी नीति की जरूरत महसूस हो रही है। पेट्रोल-डीजल आज केवल वाहन चलाने का साधन नहीं, बल्कि महंगाई की धुरी बन चुका है।
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