रविवार, 17 मई 2026

पहाड़ में ‘खामोश’ क्रांति की ‘आहट’

विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-11 विधानसभा चुनाव 2027 में महिला वोट बैंक लिखेगी सत्ता की नई पटकथा क्रासर ---काफल के पेड़ों से लेकर बांज के जंगलों तक गूंज रही बदलाव की आहट ---पहाड़ का पानी और जवानी ही लिखेगी उत्तराखंड का नया सियासी भविष्य ---देवभूमि की महिलाएं ही विधानसभा चुनाव में बनेगी अनाउंसड किंगमेकर देहरादून। पहाड़ की वादियों में इन दिनों बर्फ भले ही पिघल रही हो, लेकिन सियासत का पारा चढ़ चुका है। उत्तराखंड की राजनीति में सालों से एक घिसा-पिटा जुमला दोहराया जाता थाकृपहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी यहां के काम नहीं आती। लेकिन इस विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड ने इस जुमले को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया है। नया नैरेटिव कुमाऊं के काफल के पेड़ों से लेकर गढ़वाल के बांज के जंगलों तक गूंज रहा है और एक खामोश क्रांति की आहट सुनाई दे रही है। इस बार देवभूमि की महिलाएं अब सिर्फ साइलेंट वोटर नहीं बल्कि अनाउंसड किंगमेकर की भूमिका निभाएंगी। मुझे याद है जब पृथक राज्य आंदोलन चल रहा था उस समय हाथ में दरांती, कंडी और भीमल से बनी रस्सी के साथ आंदोलन में अपनी अग्रणी भूमिका निभा रही थी। उसी मातृशक्ति के संघर्ष का परिणाम उत्तराखंड राज्य बना, लेकिन राज्य बनने के बाद वह हाशिये पर चली गई। महिलाओं के उस संघर्ष को सभी ने भुला दिया। उत्तराखंड के गांवों में पुरुषों के पलायन के बाद खेती, पशुपालन, पानी, जंगल और परिवार की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य के हजारों गांव आंशिक या पूर्ण पलायन की मार झेल रहे हैं। ऐसे में गांव बचाने की सबसे बड़ी लड़ाई महिलाएं ही लड़ रही हैं। महंगाई, गैस सिलेंडर, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और शराब के खिलाफ आंदोलनों ने महिलाओं के भीतर राजनीतिक चेतना को और तेज किया है। आज अखबार के पन्नों पर भले ही दावों की चमक हो, लेकिन पहाड़ के गांवों की पगडंडियों पर सन्नाटा और संघर्ष आज भी बरकरार है। गढ़वाल और कुमाऊं के पहाड़ी जिलों में तो महिलाओं की आंखों में उम्मीद के साथ-साथ एक तीखा सवाल भी तैरता दिखता है। पुरुष रोजगार की तलाश में मैदानों का रुख कर चुके हैं। पीछे छूटे गांवों में भूतिया मकानों के बीच अकेली महिलाएं ही खेती, मवेशी, बच्चों की पढ़ाई और बुजुर्गों की दवा का बोझ उठा रही हैं। लेकिन पहाड़ की नीति-नियंताओं ने इन वीरांगनाओं को आज दिन तक दुत्कारा ही है। सरकार लाख दावे कर रही हो, लेकिन यह सच्चाई है कि पहाड़ की वीरांगनाएं आज भी संर्घष कर रही हैं। दरअसल पहाड़ की महिलाओं का गुस्सा और संघर्ष विधानसभा चुनाव की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहेगा, बल्कि यह महिला विश्वास की लड़ाई भी होगा, जो दल महिलाओं के मुद्दों को सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रखेगा, उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। दिलचस्प बात यह भी है कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार के दौर में महिला मतदाता पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक और मुखर हुई हैं। गांवों की चौपाल से लेकर मोबाइल स्क्रीन तक अब महिलाएं राजनीतिक बहस का हिस्सा बन रही हैं। हाल ही में संपन्न हुए पंचायत चुनावों के आंकड़ों ने राजनीतिक विश्लेषकों को अपने केलकुलेटर दोबारा उठाने पर मजबूर किया था। बता दें कि राज्य की लगभग 32 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां महिला वोटरों की संख्या या तो पुरुषों से अधिक है, या उनका वोटिंग टर्नआउट पुरुषों को पछाड़ देता है। यही वजह है कि इस बार दिल्ली से लेकर देहरादून तक के रणनीतिकार महिलाओं के आगे नतमस्तक दिख रहे हैं। 2027 की चुनावी बिसात पर महिला अस्मिता और अधिकार सबसे बड़ा मोहरा बनेगा और भाजपा-कांग्रेसकृखुद को महिलाओं का सबसे बड़ा रक्षक साबित करने की होड़ में दिख रहा हैं। भाजपा जहां महिला वोट बैंक को साधने के लिए उज्ज्वला योजना, लखपति दीदी, स्वयं सहायता समूह और महिला सशक्तिकरण योजनाओं को बड़ा हथियार बनाएगी। सरकार का दावा है कि राज्य में लाखों महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा गया है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी बढ़ी है। वहीं कांग्रेस भी खुद को महिलाओं का सबसे बड़ा हितैषी बना रही है।

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