शनिवार, 16 मई 2026

डिग्रियां ‘हाथ’ में और ‘नौकरियां हवा’ में

विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-10 विधानसभा चुनाव 2027 के महासमर में बेरोजगारी बन सकता है गेमचेंजर क्रासर ---पलायन और खाली होते गांवों के बीच रोजगार का मुद्दा रहेगा मुखर ---पेपर लीक और भर्ती घोटालों की टीस युवाओं के दिलों में है जिंदा ---इस बार चुनावी मंचों पर विकास से ज्यादा रोजगार पर होगी बहस ---प्रदेश में सरकारी भर्तियों की धीमी रफ्तार से युवाओं में है नाराजगी देहरादून। पहाड़ के गांवों से लेकर शहरों तक युवा रोजगार और भविष्य को लेकर बेचौन हैं। सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या, भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक जैसी घटनाओं और निजी क्षेत्र में अवसरों की कमी ने युवाओं के भीतर गहरी नाराजगी है। विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राज्य में सियासी पारा चढ़ने लगा है। 70 विधानसभा सीटों वाले इस पर्वतीय राज्य में सत्ता की चाबी इस बार किस करवट बैठेगी, इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों ने गुणा-भाग भी शुरू कर दिया है। लेकिन इन सबके बीच धरातल पर एक ऐसा मुद्दा है, जो इस बार पारंपरिक पहाड़ बनाम मैदान या जातिगत समीकरणों पर भारी पड़ता दिख रहा हैकृवह मुद्दा है बेरोजगारी का। उत्तराखंड के सियासी गलियारों से लेकर चाय की दुकानों और युवाओं के चौपालों तक इस बात की गूंज साफ सुनाई दे रही है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में रोजगार के वादों और दावों पर ही लड़ा जाएगा। राज्य गठन के ढाई दशक बाद भी पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी का यहां के काम न आना एक स्थायी दर्द बन चुका है। रोजगार की तलाश में मैदानी इलाकों और दूसरे राज्यों का रुख करते युवा आज भी उत्तराखंड की सबसे बड़ी कड़वी हकीकत हैं। हालांकि सरकार की ओर से स्वरोजगार और होमस्टे जैसी योजनाओं के जरिए युवाओं को रोकने की कोशिशें की गईं, लेकिन धरातल पर उनकी रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं दिख रही है। पहाड़ी जिलों से लगातार हो रहा पलायन इस बात का गवाह है कि गांवों में युवाओं के पास आजीविका के साधन बेहद सीमित हैं। बीते वर्षों में राज्य ने सरकारी भर्तियों में कई उतार-चढ़ाव और विवाद देखे हैं। यूकेएसएसएससी और लोक सेवा आयोग की कुछ परीक्षाओं में हुए घोटालों और पेपर लीक के मामलों ने प्रदेश के युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया है। हालांकि सरकार ने सख्त नकल विरोधी कानून लागू कर डैमेज कंट्रोल की बड़ी कोशिश की, लेकिन युवाओं के मन में परीक्षाओं के लटकने, समय पर रिजल्ट न आने और नियुक्तियों में देरी को लेकर जो टीस पैदा हुई थी, वह आगामी चुनाव में ईवीएम तक पहुंच सकती है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल इस मुद्दे को भुनाने में अभी से लग गया हैं। कांग्रेस ने हाल ही में सांगठनिक स्तर पर बदलाव कर युवाओं और बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार रोजगार के आंकड़े केवल कागजों पर दिखा रही है, जबकि हकीकत में लाखों पंजीकृत बेरोजगार कतार में खड़े हैं। विपक्ष इस बार के चुनाव में रोजगार गारंटी, समयब( भर्ती कैलेंडर और खाली पड़े सरकारी पदों को भरने जैसे मुद्दों को अपने घोषणापत्र का मुख्य हिस्सा बना सकता है। दूसरी ओर सत्तारूढ़ भाजपा इस मोर्चे पर रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रणनीति अपना रही है। सरकार का तर्क है कि पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए देश का सबसे कड़ा नकल विरोधी कानून उत्तराखंड में ही लागू है। इसके अलावा ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के जरिए प्रदेश में आए निवेश, इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और पर्यटन के क्षेत्र में पैदा हो रहे नए अवसरों को सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर सकती है। भाजपा का दावा है कि सरकारी नौकरियों के अलावा निजी क्षेत्र और स्वरोजगार के माध्यम से लाखों युवाओं को आत्मनिर्भर बनाया गया है। उत्तराखंड में युवा मतदाताओं की संख्या कुल मतदाता वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। यह वह वर्ग है जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है और पारंपरिक राजनीति से इतर सिर्फ नतीजे चाहता है। डिजिटल जनगणना और सीमांकन की आहट के बीच, युवा वर्ग राजनीतिक दलों से ठोस रोडमैप भी मांगेगा और जो भी दल युवाओं को सुरक्षित भविष्य और रोजगार का सबसे विश्वसनीय भरोसा देगा 2027 में सत्ता का रास्ता उसी के लिए साफ होगा। अब देखना यह होगा कि जवानी के दम पर उत्तराखंड की सत्ता हासिल करने का यह ख्वाब किस दल का पूरा होता है और कौन बेरोजगारी के इस चक्रव्यूह में उलझकर रह जाता है।

कोई टिप्पणी नहीं: