गुरुवार, 14 मई 2026

रोजगार-भू-कानून बनेगे ‘गेमचेंजर’

क्रासर ---पलायन, पहचान, विकास, महिला शक्ति और संगठनकृपर तय होगी सत्ता की राह ---रोजगार और पलायन, पहाड़ में खाली होते गांवों की बढ़ती चिंता पर होगा फोकस ---उत्तराखंड की अस्मिता, युवाओं के सब्र और नेतृत्व की साख का भी होगा टेस्ट देहरादून। प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की रणभेदी बजने में अभी समय है, लेकिन इस बार का चुनाव उत्तराखंड की राजनीति अब हर पांच साल में बदलाव के मिथक से आगे निकल चुका है। 2027 का रण केवल विकास के दावों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह राज्य की अस्मिता, युवाओं के सब्र और नेतृत्व की साख का टेस्ट भी होगा। इसके साथ ही इस बार का चुनाव पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर आमजन से जुड़े ठोस सवालों पर केंद्रित होता दिख रहा है। पहाड़ की चुनौतियों, सीमित संसाधनों और बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच मतदाता अब सीधे जवाब चाहता है। राजनीतिक दल भी अपनी रणनीतियों को कुछ मुद्दों के इर्द-गिर्द गढ़ रहे हैं, जो सत्ता का रास्ता तय करेंगे। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनैतिक दल अपनी तैयारियों में लगे हैं और हर उस रणनीति को तैयार कर रहे हैं जो सत्ता के लिए सही हो। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो इस बार के विधानसभा चुनाव में राज्य के मूद्दों के ज्यादा हावी रहने के संकेत मिल रहे हैं। वैसे भी विपक्ष और प्रदेश के सबसे पुराने क्षेत्रिय दल यूकेडी के यूथ ब्रिगेड की रणनीति राष्ट्रीय दलों पर भारी पड़ सकती है। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो आगामी विधानसभा चुनाव में इन मुद्दों पर ज्यादा बात होने की संभावना है। इसमें राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन सबसे गंभीर चुनौती बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों और सामाजिक अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि कई गांव आंशिक या पूरी तरह खाली हो चुके हैं। युवाओं के सामने रोजगार के सीमित अवसर, भर्तियों में देरी और निजी क्षेत्र का अभाव उन्हें मैदानों और अन्य राज्यों की ओर धकेल रहा है। कृषि और पारंपरिक व्यवसाय भी अब पहले जैसे सहारा नहीं दे पा रहे। इसके साथ ही राज्य में सख्त भू-कानून की मांग अब जनआंदोलन का रूप ले चुकी है। स्थानीय लोग बाहरी निवेश और जमीन खरीद पर नियंत्रण की मांग कर रहे हैं। यह मुद्दा सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि पहाड़ की पहचान, संस्कृति और संसाधनों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही मूल निवास का सवाल भी इसी के साथ मजबूती से उभर रहा है। खासतौर पर पर्वतीय सीटों पर यह मुद्दा निर्णायक असर डाल सकता है। क्षेत्रीय दल और सामाजिक संगठन इसे चुनावी केंद्र में ला रहे हैं। वही दूसरी ओर सत्तारूढ़ पक्ष अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाएगा। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन से जुड़े प्रोजेक्ट्स को प्रमुखता दी जा रही है। चारधाम यात्रा, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और निवेश को सरकार अपनी ताकत के रूप में पेश करेगी। हालांकि, विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। 2027 का चुनाव यह तय करेगा कि उत्तराखंड अपनी मूल पहचान को बचाने के साथ-साथ आधुनिक विकास की दौड़ में कहां खड़ा है। यह चुनाव केवल नारों का नहीं, बल्कि पहाड़ के स्वाभिमान का होगा। यह सब राजनैतिक दलों को पता है और वह इसके लिए अपनी रणनीति तय करने में लगे हैं,ताकी जनता के बीच जाकर अपने आप को ही हीरो साबित कर सके और चुनाव में वोट अपने पक्ष में डलवा सके, लेकिन राज्य की जनता का असली मूड क्या होगा यह तो आने वाले समय में पता चलेगा। बाक्स रोजगार और पलायन, पहाड़ की जवानी का सवाल भू-कानून और पहचान, सूबे में अस्मिता की लड़ाई विकास और एंटी-इंकम्बेंसी,10 साल बनाम विकल्प संगठन व नेतृत्व, चेहरे की चमक बनाम कैडर ताकत इसके साथ ही महंगाई और अन्य मुद्दे भी होंगे भारी

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