रविवार, 10 मई 2026

‘मैत का मसाण’ एक लोक पीड़ा

पहाड़ में लोक विश्वास और परंपरा की है यह एक अनोखी कथा मैत का मसाण ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो कभी पीछा नहीं छोड़ती उत्तराखंड के लोकगीतों व न्यौली में मिलता है इसका विस्तृत वर्णन देहरादून। पहाड़ की लोक संस्कृति में मायका एक बेटी के लिए भावनाओं का सबसे सुरक्षित कोना होता है। लेकिन मैत का मसाण एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो उनका पीछा नहीं छोड़ती है। एक बेटी, जिसने पूरा बचपन एक घर की चौखट के भीतर बिताया, शादी के बाद उसी घर के लिए पराई हो जाती है और उसके साथ ही मैत का मसाण भी उसके साथ चला जाता है। पहाड़ी गांवों में सामाजिक ढांचा कुछ इस तरह बुना गया है कि बेटी को दान की वस्तु मानकर विदा किया जाता है। शादी के बाद उसका गोत्र और कुल बदल जाता है। विडंबना देखिए कि जिस आंगन में उसने चलना सीखा, मृत्यु के बाद वहां उसे दो गज जमीन मिलना भी दुश्वार हो जाता है। मैत का मसाण शब्द दरअसल उस पुरुष प्रधान सोच का प्रतीक है, जो यह मानती है कि स्त्री का अस्तित्व केवल उसके पति के घर से जुड़ा है। यदि कोई विवाहित महिला अपने मायके में अंतिम सांस लेती है, तो अक्सर शव को ससुराल भेजने की जद्दोजहद शुरू हो जाती है, ताकि कुल की परंपरा न टूटे। उत्तराखंड के कई लोकगीतों और न्यौली में इस विछोह का वर्णन मिलता है। झुमैलो और चौती जैसे गीतों में बेटियां गाती हैं कि बाबा के घर में मेरा क्या है? बस एक याद मैत का मसाण बनने का डर असल में एक स्त्री के उस अकेलेपन को दर्शाता है, जहाँ वह न पूरी तरह ससुराल की हो पाती है और न ही मायके का उस पर कोई कानूनी या सामाजिक दावा बचता है। यह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक चोट भी है जो महिलाओं को ताउम्र अहसास कराती है कि उनका अपना कोई स्थायी घर नहीं है। बता दें कि देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ रहस्यमयी लोककथाओं और परंपराओं के लिए भी जानी जाती है। इन्हीं लोकविश्वासों में एक नाम अक्सर सुनने को मिलता हैकृमैत का मसाण। पहाड़ों में प्रचलित यह कथा सिर्फ डर या अंधविश्वास की कहानी नहीं, बल्कि समाज की मान्यताओं, भावनाओं और सांस्कृतिक सोच को दर्शाती है। मसाण शब्द उत्तराखंड के लोकजीवन में उन आत्माओं या शक्तियों के लिए इस्तेमाल होता है, जिन्हें असमय या असंतुष्ट माना जाता है। वहीं मैत का अर्थ होता है मायका या जन्मस्थान। इस तरह मैट का मसाण उस आत्मा को कहा जाता है, जो अपने मायके से जुड़ी मानी जाती है। लोकमान्यता है कि ऐसी आत्माएं अपने अपनों के आसपास रहती हैं और कभी-कभी संकेतों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। ग्रामीण इलाकों में इस तरह की कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही हैं। खासकर बुजुर्ग लोग इसे एक चेतावनी या सीख के रूप में भी बताते हैंकृकि जीवन में रिश्तों, परंपराओं और संस्कारों का सम्मान जरूरी है। कई जगहों पर इससे जुड़े छोटे-छोटे अनुष्ठान और पूजा-पाठ भी किए जाते हैं, ताकि घर-परिवार में शांति बनी रहे। हालांकि, आधुनिक समय में लोग इन बातों को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। कुछ लोग इसे आस्था और संस्कृति का हिस्सा मानते हैं, तो कुछ इसे सिर्फ लोककथा या कल्पना समझते हैं। लेकिन एक बात साफ है कि मैत का मसाण जैसी कहानियां उत्तराखंड की समृ( लोकसंस्कृति का अहम हिस्सा हैं और इन्हें समझना, उस क्षेत्र की पहचान को समझने जैसा है। मैट का मसाण केवल एक रहस्यमयी कथा नहीं, बल्कि उत्तराखंड के लोगों की भावनाओं, विश्वासों और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी एक गहरी परंपरा हैकृजो आज भी पहाड़ों की हवा में जीवित है। आज जब नारी शक्ति और समानता की बातें हो रही हैं, तो इन पुरानी और दकियानूसी परंपराओं पर भी सवाल उठने लगे हैं। नई पीढ़ी अब इस बात को स्वीकार करने लगी है कि बेटी का अधिकार भी माता-पिता की मिट्टी पर उतना ही है जितना बेटे का। कई प्रगतिशील परिवारों ने इन वर्जनाओं को तोड़कर बेटियों को मायके में ही अंतिम विदाई दी है। हालांकि, दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में आज भी मैत का मसाण एक वर्जना है। इस सोच को बदलने की जरूरत है ताकि पहाड़ की बेटियों को जीते जी ही नहीं, बल्कि मृत्यु के पश्चात भी अपने घर में पूरा सम्मान और स्थान मिल सके।

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