बुधवार, 27 मई 2026
‘राष्ट्रीय चेहरों’ की पहाड़ में ‘एंट्री’
भाजपा और कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के दौरे से होने वाला है चुनावी रण का आगाज
---भाजपा अध्यक्ष नितिन व कांग्रेस नेता राहुल के दौरों से बढ़ी तपिश
---देवभूमि में गरमाई सियासत, बड़े नेताओं के दौरों से बढ़ी हलचल
---दिल्ली से दून तक सियासी हलचल तेज,स्थानीय मुद्दों पर फोकस
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के प्रस्तावित उत्तराखंड दौरों ने साफ संकेत दे दिए हैं कि 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात अब तेजी से बिछने लगी है। दोनों राष्ट्रीय दल अब पहाड़ की राजनीति को केवल संगठनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि भविष्य की सत्ता की लड़ाई के रूप में देखने लगे हैं। देहरादून से लेकर कुमाऊं और गढ़वाल तक राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इन दौरों का उद्देश्य सिर्फ कार्यकर्ताओं में जोश भरना नहीं, बल्कि जनता के मूड को समझना और चुनावी नैरेटिव तय करना भी है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पार्टी उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा डबल इंजन विकास, समान नागरिक संहिता, चारधाम परियोजना और निवेश को बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में पेश कर रही है। पार्टी सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष का फोकस बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और गुटबाजी को नियंत्रित करने पर रहेगा। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि उत्तराखंड में संगठन पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा 2027 में राष्ट्रीय नेतृत्व और हिंदुत्व के मुद्दों के साथ-साथ विकास परियोजनाओं को भी प्रमुख हथियार बनाएगी।
दूसरी ओर कांग्रेस नेता राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस इस बार बेरोजगारी, भर्ती घोटाले, पलायन, महंगाई और पहाड़ की बदहाल स्वास्थ्य-शिक्षा व्यवस्था को लेकर भाजपा सरकार को घेरने की तैयारी में है। राहुल गांधी पहले भी अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान रोजगार, सामाजिक न्याय और संविधान बचाने जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना चुके हैं। उत्तराखंड में उनका फोकस युवाओं, महिलाओं और पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं पर रहने की संभावना है। कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि भाजपा सरकार इवेंट और प्रचार में ज्यादा व्यस्त है, जबकि गांवों में पलायन और बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दोनों बड़े नेताओं के दौरे यह दिखाते हैं कि उत्तराखंड अब राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण चुनावी राज्य बन चुका है। राज्य छोटा जरूर है, लेकिन यहां की राजनीतिक दिशा राष्ट्रीय संदेश देने का काम करती है। पिछले कुछ वर्षों में अंकिता भंडारी हत्याकांड, भर्ती परीक्षाओं में धांधली, सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति जैसे मुद्दों ने सरकार के सामने चुनौती खड़ी की है। वहीं भाजपा अब भी मजबूत संगठन और केंद्र सरकार की योजनाओं के दम पर बढ़त बनाए हुए है।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाला चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं,बल्कि नैरेटिव की लड़ाई होगा। भाजपा राष्ट्रवाद, विकास और मजबूत नेतृत्व की बात करेगी, जबकि कांग्रेस जनता के स्थानीय मुद्दों और असंतोष को चुनावी हथियार बनाएगी। दोनों नेताओं के दौरे इस बात का संकेत हैं कि आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति और अधिक आक्रामक होने वाली है। पहाड़ में अब चुनावी माहौल धीरे-धीरे गर्माने लगा है।
उत्तराखंड सरकार लगातार अपनी पुलिस को मित्र पुलिस कहकर प्रचारित करती रही है, लेकिन धरातल पर हेम भट्ट जैसी घटनाएं इस दावों की पोल खोलती हैं। जनता और सरकार के बीच सेतु का काम करने वाले पत्रकारों का इस तरह उत्पीड़न यह साफ दर्शाता है कि तंत्र अब अपनी कमियों को छिपाने के लिए तानाशाही पर उतारू है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए, क्योंकि सरकार की इस चुप्पी को पत्रकारों के दमन को मूक सहमति माना जा रहा है।
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