रविवार, 10 मई 2026
‘हां मैं तांत्रिक हूं ...’
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर खुद को तांत्रिक माना
पूर्व सीएम हरीश रावत ने खोले अपने राजनीतिक जीवन के पन्ने
पूर्व में कांग्रेस के एक नेता ने किया था नेता और तांत्रिक का जिक्र
देहरादून। कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से दूर है और सत्ता में वापसी के लिए छटपटा रही है। इसके चलते कांग्रेस के अंदर भी कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कांग्रेस के बडे़े नेता के कुछ दिन पूर्व के राजनैतिक अवकाश का मुद्दा अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि एक नया मुद्दा कांग्रेस के लिए मुसीबत बनने वाला है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर खुद को तांत्रिक माना है। इसके बाद सूबे की राजनीति में एक नया तूफान आ गया है।
बता दें कि कुछ दिन पहले हल्द्वानी में कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा के सामने कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी ने अपने संबोधन में नेता और तांत्रिक का जिक्र किया था। उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए नेता और तांत्रिक के बीच का अंतर समझने की बात कही थी। उनके इस बयान के बाद उत्तराखंड में चर्चा तेज हो गई थी कि आखिर कांग्रेस में यह तांत्रिक कौन है। अब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए सेशल मीडिया अकाउंट पर एक लंबी पोस्ट लिख कर खुद को तांत्रिक बताया है।
अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा है कि मैं तांत्रिक हूं। 1968 में देश के सभी दिग्गज आदरणीय इंदिरा गांधी जी के विरु( हो गए थे। सिंडिकेट-इंडिकेट का संघर्ष था। लखनऊ विश्वविद्यालय में उन्हें आमंत्रित किया। राज नारायण और तत्कालीन मुख्यमंत्री टीएम सिंह आदि के प्रबल विरोध के बावजूद लखनऊ विश्वविद्यालय में उनकी सभा करवाई। सबके मन को जीतकर वह दिल्ली चली गई। उन्होंने इतिहास बनाया और मैं युवक कांग्रेस का कार्यकर्ता बन गया। वर्ष 1977 में हमारे जिलों में कांग्रेस लगभग खाली हो गई। मैं, इंदिरा भक्त कांग्रेसजनों और युवा कांग्रेसजनों के साथ कांग्रेस का झंडा थामकर खड़ा रहा। सन् 1990 के बाद पहाड़ों में कांग्रेस संकट में आईई। कई सूरमा दाएं-बाएं हो गए। राज्य आंदोलन के फलस्वरूप कांग्रेस को खलनायक चित्रित करने लगे। यहां तक कि सन् 1996 में लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार नहीं मिल पा रहे थे, तब भी मैं साथियों के साथ कांग्रेस का झंडा थामे खड़ा रहा।
आज के कालखंड में भी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के खिलाफ झंडा थामे खड़ा हूं। केंद्र सरकार का दंश झेला और झेल रहा हूं। मगर कांग्रेस और उत्तराखंडियत का झंडा थामे अटल खड़ा हूं। मैं हारा, मगर हार के बाद न कांग्रेस छोड़ी, न क्षेत्र छोड़ा। यदि अल्मोड़ा संसदीय सीट आरक्षित नहीं होती, हारता-जीतता मगर वहीं से लड़ता। हरिद्वार ने मुझे अपनाया, तो मैं अभी पूरी शक्ति और समर्पण के साथ हरिद्वार के भाईई-बहनों के साथ हूं। मैंने हर चुनाव में सीट नहीं बदली है। कार्यकर्ताओं के साथ हार में भी खड़ा रहा हूं। यही कारण है कि जिन विधानसभा सीटों में मैं हारा, दूसरे चुनाव में कांग्रेस जीती है। शायद इसलिए मैं तांत्रिक हूं, शायद इसीलिए मैं घमंडी हूं और गलतफहमी का शिकार हूं। तंत्र का सहारा लिए अब भी खड़ा हूं। मगर यह तंत्र कार्यकर्ताओं और उत्तराखंडियत पर विश्वास रखने वाले भाईई-बहनों का है।
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