रविवार, 10 मई 2026
देवभूमि के रण में ‘एंटी-इंकंबेंसी’
भाजपा का सीएम धामी का चेहरा और विकास पर दांव
कांग्रेस पार्टी सत्ता में वापसी के लिए कर रही जद्दोजहद
भाजपा करवा रही है वर्तमान विधायकों का परफार्मेंस सर्वे
देहरादून। उत्तराखंड में सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता पहाड़ों की चढ़ाई जितना ही कठिन माना जाता है। हालाँकि 2022 में भाजपा ने मिथक तोड़ते हुए दोबारा सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2027 की डगर दोनों मुख्य दलोंकृभाजपा और कांग्रेसकृके लिए नई चुनौतियाँ लेकर आ रही है। भाजपा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह आगामी चुनाव मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही लड़ेगी। भाजपा अपने वर्तमान विधायकों का परफार्मेंस सर्वे करा रही है ताकि एंटी-इंकंबेंसी ‘सत्ता विरोधी लहर’ को कम करने के लिए टिकट वितरण में बदलाव किया जा सके। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस बार परिवर्तन के नारे के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है।
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म होता जा रहा है। राज्य की दो प्रमुख पार्टियांकृभारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसकृअपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुट गई हैं। इसके अलावा आम आदमी पार्टी और क्षेत्रीय दल भी इस बार चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे मुकाबला और दिलचस्प होता नजर आ रहा है।
इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी, पलायन और महंगाई बना हुआ है। पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहा पलायन राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसे लेकर विपक्ष सरकार पर लगातार सवाल उठा रहा है। वहीं, सत्ताधारी भाजपा विकास कार्यों, सड़क, स्वास्थ्य और पर्यटन के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों को गिनाकर जनता का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है। युवाओं के लिए रोजगार और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी चुनावी बहस के केंद्र में हैं।
राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो इस बार टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका काफी अहम रहने वाली है। कई सीटों पर बगावत और असंतोष की स्थिति भी देखने को मिल सकती है, जो चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है। इसके साथ ही, नए मतदाताओं की भूमिका भी निर्णायक साबित हो सकती है, जिनके मुद्दे और अपेक्षाएं पारंपरिक राजनीति से अलग हैं। वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग की तैयारियां भी जोरों पर हैं और जल्द ही चुनाव की तारीखों की घोषणा होने की संभावना है। भारत निर्वाचन आयोग राज्य में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मजबूत कर रहा है।
दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल जैसे नेताओं की सक्रियता और स्थानीय मुद्दों अंकिता भंडारी केस, बेरोजगारी और अग्निवीर योजना को लेकर कांग्रेस सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही पार्टी के भीतर की गुटबाजी और मजबूत संगठनात्मक ढांचे की कमी कांग्रेस के लिए अभी भी एक बड़ा रोड़ा बनी हुई है। वही प्रदेश में आम आदमी पार्टी और यूकेडी पिछली बार के प्रदर्शन के बाद अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है, जबकि उत्तराखंड क्रांति दल मूल निवास और भू-कानून जैसे भावनात्मक मुद्दों पर क्षेत्रीय मतदाताओं को एकजुट करने का प्रयास कर रहा है।
उत्तराखंड का आगामी विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य की दिशा तय करने वाला अहम पड़ाव है। अब देखना दिलचस्प होगा कि जनता किसे अपना विश्वास देती है और किसके हाथ में राज्य की बागडोर सौंपती है। 2026 का अंत होते-होते उत्तराखंड की सड़कों पर चुनावी रैलियों का शोर बढ़ जाएगा। जहाँ भाजपा डबल इंजन की ताकत और धामी के युवा चेहरे पर भरोसा कर रही है, वहीं कांग्रेस जनता के बीच असंतोष को वोटों में बदलने की ताक में है।
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