रविवार, 31 मई 2026
‘पहाड़ों में जीवंत होता है द्वापर युग’
देवभूमि में आस्था और इतिहास का साक्षात संगम है पांडव नृत्य, इस दौरान
---उत्तराखंड के गांवों में सदियों से जीवित है पांडव नृत्य की परंपरा
---लोक संस्कृति, आस्था और महाभारत कथाओं का अद्भुत संगम
---नई पीढ़ी तक लोक विरासत पहुंचाने की चुनौती बनी बड़ी चिंता
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ केवल प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक स्थलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृ( लोक संस्कृति और परंपराओं के लिए भी देशभर में अलग पहचान रखते हैं। इन्हीं लोक परंपराओं में एक महत्वपूर्ण और प्राचीन परंपरा है पांडव नृत्य। गढ़वाल के कई गांवों में आज भी यह लोकनृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और लोकजीवन का जीवंत हिस्सा माना जाता है।
पांडव नृत्य का संबंध महाभारत काल की कथाओं से माना जाता है। लोक मान्यता है कि पांडव अपने वनवास और अज्ञातवास के दौरान हिमालयी क्षेत्रों में भी पहुंचे थे। इसी विश्वास के चलते उत्तराखंड के गांवों में पांडवों को देवतुल्य सम्मान दिया जाता है और उनके जीवन प्रसंगों को लोकनृत्य एवं गीतों के माध्यम से मंचित किया जाता है। यह नृत्य मुख्य रूप से गढ़वाल क्षेत्र के रुद्रप्रयाग, चमोली जिलों के गांवों में अधिक प्रचलित है। सर्दियों के मौसम, धार्मिक आयोजनों और विशेष मेलों के दौरान गांवों में रातभर पांडव नृत्य आयोजित किया जाता है। ढोल, दमाऊं, रणसिंघा और थाली की पारंपरिक धुनों के बीच कलाकार महाभारत के विभिन्न प्रसंगों को अभिनय और नृत्य के जरिए जीवंत कर देते हैं।
पांडव नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आध्यात्मिकता मानी जाती है। गांवों में इसे केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देव अनुष्ठान के रूप में देखा जाता है। कई स्थानों पर कलाकारों में देव अवतरण की मान्यता भी जुड़ी होती है। स्थानीय लोग मानते हैं कि प्रस्तुति के दौरान पांडवों की आत्मिक शक्ति कलाकारों में प्रवेश करती है और पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। इस लोकनृत्य में भीम, अर्जुन, द्रौपदी, श्रीकृष्ण और दुर्याेधन जैसे पात्रों की विशेष भूमिका होती है। कलाकार पारंपरिक वेशभूषा पहनकर घंटों तक नृत्य करते हैं। संवादों से अधिक यहां भाव-भंगिमा, लोकगीत और वाद्ययंत्रों की धुन कहानी को आगे बढ़ाती है। कई बार पूरा गांव रातभर जागकर इस आयोजन का हिस्सा बनता है।
लोक संस्कृति के जानकारों का मानना है कि पांडव नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना का प्रतीक है। गांवों में यह आयोजन लोगों को एक मंच पर जोड़ता है। बुजुर्गों से लेकर बच्चे तक इसमें भाग लेते हैं और इसी माध्यम से नई पीढ़ी अपनी लोक विरासत से जुड़ती है।
हालांकि आधुनिकता और पलायन के दौर में यह परंपरा चुनौतियों का सामना भी कर रही है। गांव खाली हो रहे हैं और लोक कलाकारों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। युवा पीढ़ी का रुझान आधुनिक मनोरंजन की ओर बढ़ने से पारंपरिक लोक कलाओं पर संकट गहराने लगा है। कई सांस्कृतिक संगठनों और लोक कलाकारों का कहना है कि यदि समय रहते संरक्षण नहीं मिला तो आने वाले वर्षों में यह विरासत कमजोर पड़ सकती है। इसके बावजूद पहाड़ के कई गांव आज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बचाए हुए हैं। जब रात के सन्नाटे में ढोल-दमाऊं की थाप गूंजती है और पांडव नृत्य शुरू होता है, तब ऐसा लगता है मानो महाभारत का इतिहास फिर से जीवंत हो उठा हो। यही कारण है कि पांडव नृत्य केवल एक लोक परंपरा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।
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