रविवार, 10 मई 2026

पहाड़ बनाम मैदान का बदलता संतुलन

क्षेत्रीय असंतुलन चुनावी रणनीतियों को करेगा चुनाव में प्रभावित हालिया निकाय चुनावों में निर्दलीयों की जीत से बढ़ी दलों की चिंता भाजपा के मजबूत बूथ मैनेजमेंट पर कांग्रेस की रणनीति है कमजोर देहरादून। चुनावी साल में राजनीति के नजरिए से प्रदेश की असली बात न हो तो फिर क्या बात हो सकती है। प्रदेश की सरकारों के एसी रूमों में बनी रणनीतियों के चलते आज पहाड़ खाली हो गये हैं और मैदान ओवरफ्लो। इससे साफ जाहिर होता है कि इसके दुष्परिणाम क्या होंगे। उत्तराखंड का चुनावी गणित हमेशा से ‘पहाड़ बनाम मैदान’ के संतुलन पर टिका रहा है। मैदानी क्षेत्रों में जहां जनसंख्या अधिक है, वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में मुद्दे अलग और अधिक संवेदनशील होते हैंकृजैसे पलायन, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं। इस बार भी यही क्षेत्रीय असंतुलन चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर रहा है। यह साल विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल है और इस साल सत्ता के गलियारों से निकलकर पहाड़ की कंदराओं तक राजनेताओं के पहुंच का सिलसिला शुरू हो गया है। सूबे में एक ओर जहां भाजपा अपने विकास कार्यों और हिंदुत्व के एजेंडे को धार दे रही है, जबकि कांग्रेस छोटे क्षेत्रीय दलों और निर्दलीयों के साथ मिलकर एक नया विकल्प पेश करने की फिराक में है। चुनावी साल में भाजपा और कांग्रेस के लिए हर बार नई मुसीबते सामने आती हैं। इस बार भी ऐसा लगता है कि छोटे दलों की सक्रियता फिर से इन दलों को परेशान कर सकती है। चुनावी साल में भाजपा जहाँ अपने मिशन रिपीट के जोश को बरकरार रखने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए नई रणनीति बुन रही है। हालिया निकाय चुनावों में भाजपा ने नगर निगमों और पालिकाओं में बढ़त तो बनाई, लेकिन निर्दलीयों की बड़ी जीत ने दोनों प्रमुख दलों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषकर पहाड़ी जिलों में निर्दलीय प्रत्याशियों का दबदबा यह संकेत देता है कि जनता अब केवल पार्टी के नाम पर नहीं, बल्कि उम्मीदवार के स्थानीय रसूख और काम पर मुहर लगा रही है। विपक्ष में बैठी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक गुटबाजी को खत्म करना है। हालांकि, बेरोजगारी, भू-कानून और अंकिता भंडारी प्रकरण जैसे मुद्दों पर पार्टी ने सरकार को घेरने की कोशिश की है, लेकिन संगठन के स्तर पर अभी भी कांग्रेस को एक ऐसी धार की तलाश है जो भाजपा के मजबूत बूथ मैनेजमेंट का मुकाबला कर सके। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर प्रदेश में सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी रणनीतियों को धार दे रहे हैं। लेकिन इस बार का चुनाव पारंपरिक मुद्दों से आगे बढ़कर ‘नए समीकरणों’ और ‘बदलते मतदाता व्यवहार’ का चुनाव बनता दिख रहा है। राज्य में सत्तारूढ़ दल के सामने सबसे बड़ा सवाल एंटी-इंकम्बेंसी को लेकर है। मतदाता अब सिर्फ घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव के आधार पर निर्णय लेने के मूड में दिखाई दे रहा है। उत्तराखंड की राजनीति में समय-समय पर तीसरे विकल्प की चर्चा होती रही है। क्षेत्रीय दल और निर्दलीय उम्मीदवार कुछ सीटों पर प्रभाव डाल सकते हैं, खासकर वहां जहां स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ मजबूत होती है। हालांकि, पूरे राज्य में तीसरे मोर्चे का प्रभाव सीमित ही रहने की संभावना है, लेकिन यह बड़े दलों के वोट शेयर को जरूर प्रभावित कर सकता है। इस बार भी अभी तक यूकेडी के युवा ब्रिगेड की प्रदेश के पहाड़ी जिलों में सक्रियता भाजपा और कांग्रेस को सोचने पर मजबूर कर रही है। इसके साथ ही अपनी रणनीति भी बदलने की ओर इशारा कर रही है। चुनाव परिणाम क्या होंगे यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन चुनाव के इस सेमीफाइलन साल में भाजपा और कांग्रेस के लिए यूकेडी बड़ी समस्या के रूप में दिख रही है।

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