बुधवार, 27 मई 2026

उत्तराखंडियत’ से बढ़ी राष्ट्रीय दलों की ‘बेचौनी’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-19 इस बार फिर से क्षेत्रीय अस्मिता को नए सिरे से राजनीतिक ताकत बनाएगी प्रदेश की जनता ---दिल्ली बनाम देहरादून की राजनीति में फंसा पहाड़ ---भू-कानून, मूल निवास और पलायन पर होगा वार ---राष्ट्रीय दलों को चुनौती देने को क्षेत्रीय चेहरे तैयार देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक बहस का केंद्र बदलता दिख रहा है। इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता परिवर्तन का नहीं रहेगा, बल्कि उत्तराखंडियत बनाम राष्ट्रीय राजनीति की विचारधारा का भी बनता जा रहा है। राज्य आंदोलन की भावनाओं, पहाड़ी पहचान, मूल निवास, भू-कानून, पलायन और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दे अब फिर राजनीतिक मंचों पर लौटने लगे हैं। उत्तराखंड बनने के पीछे सबसे बड़ी भावना थी अलग पहाड़ी पहचान और स्थानीय विकास। लेकिन राज्य गठन के 25 साल बाद भी पहाड़ों में खाली होते गांव, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का संकट लोगों के मन में सवाल खड़े कर रहा है। ऐसे में क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा फिर से मजबूत होता दिख रहा है। भाजपा 2027 में भी राष्ट्रीय नेतृत्व,हिंदुत्व,राष्ट्रवाद और डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी संगठन अभी से चुनावी तैयारी में जुट गया है। प्रत्याशियों के चयन से लेकर बूथ स्तर तक रणनीति बनाई जा रही है। भाजपा का फोकस चारधाम परियोजना, सड़क, रेल और निवेश जैसे बड़े विकास कार्यों को चुनावी नैरेटिव बनाने पर रहेगा। पार्टी राष्ट्रीय नेतृत्व के चेहरे और केंद्र की योजनाओं के सहारे चुनावी बढ़त बनाए रखना चाहती है। राज्य आंदोलन से निकला उत्तराखंड क्रांति दल भी 2027 में सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। पार्टी एक बार फिर मूल मुद्दों भू-कानून, स्थायी निवास, जल-जंगल-जमीन और पहाड़ी पहचान को केंद्र में ला रही है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भावनात्मक मुद्दों के बावजूद क्षेत्रीय दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मजबूत संगठन और भरोसेमंद नेतृत्व की है। सोशल मीडिया और युवाओं में समर्थन दिखने के बावजूद जमीनी नेटवर्क अभी कमजोर माना जा रहा है। अंकिता भंडारी हत्याकांड, भर्ती घोटाले, पलायन और बेरोजगारी जैसे मुद्दों ने युवाओं के भीतर व्यवस्था के प्रति नाराजगी पैदा की है। पहाड़ के गांवों में यह भावना भी बढ़ रही है कि राष्ट्रीय दल चुनाव के समय तो पहाड़ की बात करते हैं, लेकिन बाद में प्राथमिकता मैदानी राजनीति को मिलती है।यही कारण है कि हमारा उत्तराखंड कैसा हो? का सवाल अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन रहा है। सोशल मीडिया पर भी मूल निवास,सख्त भू-कानून और पहाड़ी अधिकार जैसे मुद्दे तेजी से ट्रेंड कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि उत्तराखंड की राजनीति राष्ट्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमेगी या फिर राज्य अपनी क्षेत्रीय अस्मिता को नए सिरे से राजनीतिक ताकत बनाएगा। यदि क्षेत्रीय भावनाएं मजबूत हुईं तो राष्ट्रीय दलों को भी स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा स्पष्ट रुख अपनाना पड़ सकता है। वहीं अगर राष्ट्रवाद और विकास का नैरेटिव हावी रहा तो भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का फायदा मिल सकता है।

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