शुक्रवार, 29 मई 2026

‘डबल इंजन’ बनाम ‘पहाड़ का दर्द’

2027 के विधानसभा चुनाव में विकास माडल पर आमने-सामने हो सकते है सत्ता और विपक्ष क्रासर ---भाजपा विकास कार्यों को बनाएगी चुनावी हथियार, विपक्ष उठाएगा जमीनी सवाल ---सड़क, पर्यटन और निवेश के दावों के बीच पलायन-बेरोजगारी पर घिरेगी सरकार ---पहाड़ के गांव, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जनता के बीच बढ़ेगी बहस देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे राज्य की राजनीति में विकास माडल सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। भाजपा जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में अपने डबल इंजन विकास माडल को जनता के सामने रखेगी, वहीं कांग्रेस और क्षेत्रीय दल इसी माडल की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करने की तैयारी में हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के 27 साल बाद भी पहाड़ पलायन, बेरोजगारी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में आगामी चुनाव में जनता यह सवाल पूछ सकती है कि आखिर उत्तराखंड का वास्तविक विकास माडल क्या है और उसका लाभ आम लोगों तक कितना पहुंचा? भाजपा सरकार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सड़कों, एक्सप्रेस-वे, आल वेदर रोड, रेल परियोजनाओं, पर्यटन कारिडोर, धार्मिक पुनर्निर्माण और निवेश सम्मेलनों को अपने विकास मॉडल की पहचान के रूप में पेश कर रही है। हाल ही में पेश किए गए 1.11 लाख करोड़ रुपये के बजट में भी सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर, युवा, महिला और ग्रामीण विकास पर फोकस दिखाया है। भाजपा का दावा है कि डबल इंजन सरकार के कारण उत्तराखंड में सड़क, स्वास्थ्य, पर्यटन और निवेश के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम हुए हैं। केदारनाथ पुनर्निर्माण, चारधाम यात्रा प्रबंधन, होम-स्टे नीति, नए मेडिकल कालेज और सीमांत क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क को पार्टी अपनी उपलब्धियों के रूप में गिना रही है। पार्टी संगठन पहले ही मिशन-2027 के लिए सक्रिय दिखाई दे रहा है और मुख्यमंत्री धामी को चुनाव का चेहरा बनाए जाने के संकेत भी साफ दिख रहे हैं। हालांकि विपक्ष इसी विकास माडल पर सबसे ज्यादा हमला बोलने की तैयारी में है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार का विकास केवल कागजों और विज्ञापनों तक सीमित है। पहाड़ों से लगातार पलायन, गांवों में खाली घर, अस्पतालों में डाक्टरों की कमी, सरकारी स्कूलों की बदहाली और युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी विपक्ष के प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। कांग्रेस यह भी सवाल उठा रही है कि यदि विकास हुआ है तो पहाड़ों के दूरस्थ गांव आज भी सड़क, इंटरनेट और स्वास्थ्य सेवाओं से क्यों जूझ रहे हैं? राज्य में बढ़ती आपदाएं, जंगल की आग, पेयजल संकट और अनियोजित शहरीकरण को भी विपक्ष विकास माडल की विफलता के तौर पर पेश करने की रणनीति बना रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव विकास के दावे बनाम विकास की हकीकत पर केंद्रित हो सकता है। भाजपा जहां बड़े प्रोजेक्ट, धार्मिक पर्यटन और निवेश को अपनी ताकत बताएगी, वहीं विपक्ष गांव, किसान, रोजगार और पलायन जैसे स्थानीय मुद्दों को जनता के बीच ले जाएगा। क्षेत्रीय दल भी इस बहस को पहाड़ बनाम मैदान के नजरिये से देखने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया और युवाओं के बीच यह चर्चा तेजी से बढ़ रही है कि राज्य का विकास माडल स्थानीय संसाधनों, रोजगार और पहाड़ी अस्मिता को कितना मजबूत कर पाया है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में अब केवल सड़क और भवन निर्माण को विकास नहीं माना जाएगा। जनता रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन रोकने और गांवों को जीवित रखने वाले माडल की तलाश में है। ऐसे में 2027 का चुनाव इस बात का फैसला भी करेगा कि उत्तराखंड भविष्य में धार्मिक पर्यटन आधारित विकास माडल पर आगे बढ़ेगा या स्थानीय जरूरतों और पहाड़ी अर्थव्यवस्था पर आधारित नए माडल की मांग तेज होगी।

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