शनिवार, 13 जून 2026

‘हैट्रिक’ की राह में अपनों की ‘बेरुखी’

न जनता की नाराजगी झेलेंगे, न कार्यकर्ताओं की दूरी,अपनों को मनाने में जुटी भाजपा सियासी बिसात पर शह-मात का खेल शुरू, हमलों से पहले ढाल तैयार करने की होड़ तीसरी बार सत्ता का ख्वाब, लेकिन पहले मोर्चे दुरुस्त करने का अग्निपरीक्षा का प्लान पार्टी नेताओं की नाराजगी के मोर्चों को साधने की कवायद, गांव-गांव पहुंचने लगे नेता देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की उलटी गिनती भले ही अभी बाकी हो, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही भाजपा अब उन मोर्चों को मजबूत करने में जुट गई है, जहां उसे आने वाले चुनाव में नुकसान की आशंका दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर यह मंथन तेज है कि चुनावी रण में उतरने से पहले जनता की नाराजगी, कार्यकर्ताओं की दूरी और विपक्ष के हमलों से पैदा हो रहे राजनीतिक नुकसान को कैसे कम किया जाए। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल सरकार के कामकाज का मूल्यांकन नहीं होगा, बल्कि यह भी परीक्षा होगी कि पार्टी जनता के बीच अपनी पकड़ कितनी मजबूत बनाए रख पाती है। यही वजह है कि संगठन से लेकर सरकार तक अब डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर काम होता दिखाई दे रहा है। उत्तराखंड की राजनीति में हर चुनाव सत्ता के प्रति जनता के मूड को बदलने वाला साबित हुआ है। राज्य गठन के बाद लंबे समय तक यहां सरकारों के बदलने का ट्रेंड रहा है। हालांकि भाजपा ने 2022 में इस मिथक को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2027 में उसके सामने चुनौती इस रिकॉर्ड को आगे बढ़ाने की है। पार्टी नेतृत्व जानता है कि पांच साल के कार्यकाल के अंतिम दौर में सरकार के खिलाफ स्थानीय स्तर पर छोटी-छोटी नाराजगियां भी चुनाव में बड़ा असर डाल सकती हैं। इसलिए अब फोकस उन मुद्दों पर है, जिन पर जनता सीधे सवाल उठा रही है। उत्तराखंड में रोजगार और पलायन लंबे समय से चुनावी मुद्दे रहे हैं। पहाड़ के गांवों से युवाओं का लगातार बाहर जाना, खाली होते गांव, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के सीमित अवसर विपक्ष के लिए बड़े हथियार बन सकते हैं। भाजपा सरकार विकास योजनाओं और निवेश के दावों के जरिए इन सवालों का जवाब देने की तैयारी में है, लेकिन पार्टी के रणनीतिकारों को यह भी अहसास है कि केवल योजनाओं की घोषणा से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसका असर जमीन पर दिखाई देना जरूरी है। इसी कारण सरकार और संगठन के स्तर पर उन क्षेत्रों की पहचान की जा रही है जहां जनता तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में कमी रही है। 2027 के चुनाव में टिकट वितरण भाजपा के लिए सबसे अहम रणनीतिक फैसलों में से एक होगा। पार्टी अपने विधायकों और संभावित उम्मीदवारों की जमीनी पकड़ को परखने में जुटी है। सूत्रों के मुताबिक जिन क्षेत्रों में विधायकों के प्रति नाराजगी या जनता से दूरी की शिकायतें सामने आ रही हैं, वहां संगठन स्तर पर फीडबैक लिया जा रहा है। पार्टी यह आकलन कर रही है कि कौन से चेहरे चुनावी माहौल में मजबूत साबित हो सकते हैं और किन सीटों पर नए चेहरों की जरूरत पड़ सकती है। यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उत्तराखंड में कई विधानसभा सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी रहता है और उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि चुनाव परिणाम को प्रभावित करती है। भाजपा की चुनावी ताकत उसका मजबूत संगठन माना जाता है, लेकिन समय के साथ कई क्षेत्रों में पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी और गुटबाजी भी चुनौती बन सकती है। पार्टी अब सक्रिय कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाने, पुराने नेताओं को साथ जोड़ने और बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। भाजपा का प्रयास है कि चुनाव के समय तक हर बूथ पर सक्रिय टीम तैयार हो और कार्यकर्ताओं में उत्साह बना रहे। कांग्रेस समेत विपक्षी दल भाजपा सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था, भू-कानून, मूल निवास और पहाड़ की पहचान जैसे मुद्दों पर घेरने की तैयारी कर रहे हैं। भाजपा की रणनीति इन मुद्दों पर विपक्ष को आक्रामक होने से पहले ही जवाब तैयार करने की है। पार्टी सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ भावनात्मक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। उत्तराखंड छोटा राज्य होने के बावजूद राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहां कुछ हजार वोटों का अंतर कई सीटों का समीकरण बदल सकता है। इसलिए भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी राज्य की चुनावी तैयारियों पर नजर बनाए हुए है। संगठन, सरकार और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर तालमेल बनाना भाजपा की प्राथमिकताओं में शामिल है। पार्टी नहीं चाहती कि चुनाव के समय कोई ऐसा मुद्दा सामने आए, जिसे समय रहते संभाला जा सकता था। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने विकास के एजेंडे को जनता के भरोसे में बदल पाए। सत्ता में रहने के कारण सरकार को उपलब्धियों के साथ-साथ असंतोष का जवाब भी देना होगा। 2027 का चुनाव भाजपा के लिए केवल सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की ऐतिहासिक कोशिश होगी। इसलिए चुनावी रण में उतरने से पहले पार्टी हर उस कमजोरी को दूर करना चाहती है, जो भविष्य में नुकसान का कारण बन सकती है। डैमेज कंट्रोल की यह कवायद आने वाले महीनों में और तेज होने के संकेत हैं। अब नजर इस बात पर होगी कि भाजपा की रणनीति जमीन पर कितना असर दिखाती है और जनता का मूड 2027 में किस दिशा में जाता है।

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