शनिवार, 20 जून 2026

फिर ‘भाजपा’ या अब ‘कांग्रेस’

उत्तराखंड में ‘हैट्रिक’ पर भाजपा की नजर और वापसी के लिए बेताब दिख रही है प्रदेश में कांग्रेस भाजपा तीसरी बार सत्ता बचाने की चुनौती में, कांग्रेस सत्ता परिवर्तन की परंपरा लौटाने की कोशिश में संगठन, बूथ, बागी, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दे तय करेंगे सूबे में अगली सरकार देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी कुछ महीने दूर हों, लेकिन प्रदेश में चुनावी रण लगभग सज चुका है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने संगठनात्मक बैठकों, कार्यकर्ता सम्मेलनों, जनसंपर्क अभियानों और केंद्रीय नेताओं के लगातार दौरों के जरिए यह संकेत दे दिया है कि अब हर राजनीतिक कदम चुनावी चश्मे से देखा जाएगा। भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का इतिहास रचना चाहती है, जबकि कांग्रेस 2022 में टूटी सत्ता परिवर्तन की परंपरा को फिर से स्थापित करने की कोशिश में है। उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि राज्य गठन के बाद लंबे समय तक सत्ता भाजपा और कांग्रेस के बीच बदलती रही। वर्ष 2022 में पहली बार भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इस परंपरा को तोड़ा। अब 2027 का चुनाव इस सवाल का जवाब देगा कि क्या यह बदलाव स्थायी है या मतदाता फिर सत्ता परिवर्तन की ओर लौटेंगे। भाजपा इस चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उतरने का स्पष्ट संकेत दे चुकी है। पार्टी का पूरा फोकस संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, पिछले चुनाव में हारे बूथों की समीक्षा, लाभार्थी वर्ग को फिर से जोड़ने और केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं को चुनावी मुद्दा बनाने पर है। राष्ट्रीय नेतृत्व भी लगातार उत्तराखंड पर विशेष ध्यान दे रहा है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती एंटी-इनकंबेंसी को नियंत्रित करना है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण स्थानीय स्तर पर विधायकों के खिलाफ नाराजगी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे चुनाव में असर डाल सकते हैं। दूसरी ओर कांग्रेस ने भी चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। राहुल गांधी, प्रदेश प्रभारी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के लगातार उत्तराखंड दौरे इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। पार्टी संगठन को सक्रिय करने, पुराने नेताओं को साथ लाने, नए चेहरों को अवसर देने और युवाओं के बीच पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस की रणनीति सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, पर्वतीय क्षेत्रों में खाली होते गांव और स्थानीय विकास के मुद्दों को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाना है। राजनीतिक दल भले ही बड़े-बड़े दावे कर रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और भी है। उत्तराखंड का मतदाता अब केवल बड़े नेताओं की रैलियों से प्रभावित नहीं होता। गांवों में सड़क, पेयजल, अस्पताल, स्कूल, मोबाइल नेटवर्क, वन्यजीवों का आतंक, खेती की बदहाली और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। पहाड़ से लगातार पलायन आज भी सबसे बड़ा सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न है। हजारों गांव आंशिक या पूरी तरह खाली हो चुके हैं। चुनाव के समय यह मुद्दा हर दल उठाता है, लेकिन समाधान अभी भी अधूरा माना जाता है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह चुनाव इस बात की भी परीक्षा होगा कि जनता विकास के दावों को प्राथमिकता देती है या स्थानीय असंतोष को। भाजपा के सामने उपलब्धियों को जनसमर्थन में बदलने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस के सामने असंतोष को वोट में बदलने की। अंतिम फैसला हमेशा की तरह उत्तराखंड की जनता के हाथ में होगा, जो राज्य गठन के बाद कई बार यह साबित कर चुकी है कि वह किसी भी राजनीतिक दल को स्थायी जनादेश देने के बजाय उसके कामकाज का कठोर मूल्यांकन करती है। बाक्स बागी बन सकते हैं गेम चेंजर उत्तराखंड के लगभग हर चुनाव में टिकट वितरण के बाद बगावत देखने को मिलती रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ऐसे कई नेता हैं जो वर्षों से टिकट की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि टिकट वितरण में असंतोष बढ़ता है तो निर्दलीय उम्मीदवार कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय बना सकते हैं। प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर हजार या उससे भी कम वोटों का रहा है। ऐसे में बागी उम्मीदवार चुनावी समीकरण बिगाड़ सकते हैं। अभी तक की सरकारें 2002-कांग्रेस सरकार 2007-भाजपा सरकार 2012-कांग्रेस सरकार 2017-भाजपा सरकार 2022-भाजपा सरकार

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