शनिवार, 20 जून 2026
थम गए घराट के ‘पाट’ अब बची हैं सिर्फ ‘यादें’
घराट’ कृपानी की शक्ति से चलने वाली पारंपरिक आटा चक्की थी पहाड़ की विरासत
--गधेरों के किनारे घराट कभी थे गांव की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक जीवन का केंद्र
--पलायन, आधुनिक चक्कियों और बदलती जीवनशैली ने धरोहर को इतिहास के पन्नों तक समेटा
--कभी पहाड़ में गांवों के घराट के आसपास हर समय रहती थी लोगों की खूब चहल-पहल
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में बहती छोटी-छोटी नदियों और गधेरों के किनारे कभी एक ऐसी विरासत जीवंत हुआ करती थी, जिसकी घर्र-घर्र की आवाज पूरे गांव के जीवन की लय बन जाती थी। यह विरासत थी ‘घराट’ कृपानी की शक्ति से चलने वाली पारंपरिक आटा चक्की। आज भले ही घराटों के पाट थम चुके हों, लेकिन पहाड़ की स्मृतियों में उनकी आवाज आज भी उतनी ही जीवित है। एक समय था जब गांव का हर परिवार अपने खेतों में उगे गेहूं, मंडुवा, झंगोरा, मक्का और जौं की बोरियां पीठ पर लादकर कई किलोमीटर पैदल चलकर घराट तक पहुंचता था। वहां आटा पिसवाने की कोई जल्दबाजी नहीं होती थी। क्योंकि घराट केवल अनाज पीसने की जगह नहीं था, बल्कि वह गांव का सबसे बड़ा सामाजिक केंद्र था।
घराट के आसपास हर समय लोगों की चहल-पहल रहती थी। कोई अपनी बारी का इंतजार करता, कोई खेती-किसानी की चर्चा करता, तो कोई दूर शहर या फौज में नौकरी कर रहे बेटे का हाल सुनाता। महिलाएं लोकगीत गातीं, बच्चे गधेरे के किनारे खेलते और बुजुर्ग पुराने किस्सों से नई पीढ़ी को गांव का इतिहास सुनाते। कई बार घराट ही वह जगह बन जाता, जहां रिश्ते तय होते, गांव की समस्याओं पर चर्चा होती और सामूहिक फैसले लिए जाते। आज की भाषा में कहें तो घराट गांव की चौपाल, पंचायत और संवाद केंद्रकृतीनों का संगम था।
घराट पहाड़ के लोगों की प्रकृति के साथ तालमेल की अद्भुत मिसाल था। इसमें न बिजली की जरूरत पड़ती थी और न ही डीजल की। गधेरे का बहता पानी लकड़ी के पंखों को घुमाता और वही शक्ति पत्थर के भारी पाट को चलाती थी। धीरे-धीरे पिसा हुआ आटा स्वाद, पौष्टिकता और खुशबू में अलग पहचान रखता था। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण और हरित ऊर्जा की बात कर रही है, तब यह याद करना जरूरी है कि उत्तराखंड के गांव सदियों पहले ही जल ऊर्जा का ऐसा उपयोग कर रहे थे, जो पूरी तरह प्रकृति के अनुकूल था।
रूद्रप्रयाग जिले के दानकोट निवासी देवी प्रसाद गौड बताते हैं कि घराट में पिसे मंडुवे की रोटी, झंगोरे का आटा या गेहूं का स्वाद कुछ अलग ही होता था। आटा गर्म नहीं होता था, इसलिए उसमें अनाज की प्राकृतिक खुशबू और पोषण बना रहता था। यही कारण था कि घराट का आटा केवल भोजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का भी आधार माना जाता था। समय बदला, गांवों से पलायन बढ़ा और बिजली से चलने वाली चक्कियां गांव-गांव तक पहुंच गईं। इसके साथ ही घराटों की रौनक भी खत्म होने लगी। जिन रास्तों पर कभी अनाज की बोरियां लेकर लोग चलते थे, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं। कई घराट ढह चुके हैं, कुछ मलबे में बदल गए हैं और कुछ केवल नाम भर रह गए हैं। पहाड़ के खाली होते गांवों के साथ घराट भी वीरान हो गए। पानी अब भी बहता है, लेकिन उसे घुमाने वाले पाट और वहां जुटने वाला समाज बिखर चुका है।
इतिहासकार डा. भगवती प्रसाद पुरोहित मानते हैं कि घराट केवल तकनीकी संरचना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान हैं। यह उस दौर की याद दिलाते हैं, जब गांव आत्मनिर्भर थे और स्थानीय संसाधनों के सहारे अपना जीवन चलाते थे। यदि इन घराटों का संरक्षण किया जाए, तो इन्हें ग्रामीण पर्यटन, पारंपरिक खाद्य उत्पादों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जा सकता है। कई देशों में ऐसी पारंपरिक जलचक्कियां आज भी पर्यटन का बड़ा आकर्षण हैं। उत्तराखंड भी इस दिशा में पहल कर अपनी विरासत को नई पहचान दे सकता है।
आज भी बरसात के दिनों में जब किसी पुराने घराट के पास से बहता पानी तेज होता है, तो लगता है मानो पत्थरों के बीच कहीं वह पुरानी घर्र-घर्र की आवाज अब भी छिपी हुई है। वह आवाज केवल चक्की के घूमने की नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर पहाड़, सामूहिक जीवन, आपसी प्रेम और प्रकृति के साथ संतुलन की थी। आज जरूरत केवल घराटों को बचाने की नहीं, बल्कि उस संस्कृति को बचाने की है जिसने पहाड़ को सदियों तक जीवंत बनाए रखा। क्योंकि जब घराट बंद हुए, तब केवल चक्कियां नहीं रुकींकृपहाड़ की एक पूरी जीवनशैली धीरे-धीरे खामोश हो गई। हालांकि प्रदेश में आज कुछ संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही है, लेकिन वह भी सिर्फ सरकार बजट की आस में इससे जुडे़ है। बजट खत्म तो उनकी जिम्मेदारी भी खत्म।
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