गुरुवार, 18 जून 2026
घड़ी नहीं ‘गंज्याली’ की थाप से जागता था पहाड़
ओखली में गंज्याली की हर चोट नहीं कूटती थी केवल धान या मंडुवा
पहाड़ की आत्मनिर्भरता, महिलाओं का श्रम व लोकगीतों की थी मिठास
सदियों पुरानी पहाड़ की लोक संस्कृति की सुनाई देती थी वह धड़कन
रील और रील्स की दुनिया में कहीं गुम हो गई बुजुर्गों की प्यारी विरासत
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों की सुबह कभी अलार्म की आवाज से नहीं, बल्कि ओखली में पड़ती गंज्याली की लयब( थाप से होती थी। यह आवाज इतनी परिचित थी कि गांव के लोग बिना घड़ी देखे समझ जाते थे कि दिन निकलने वाला है। पहाड़ की रसोई में चूल्हे की पहली आंच जलने से पहले ओखली में गंज्याली चलती थी और पूरे आंगन में उसकी ठक-ठक...ठक-ठक की गूंज फैल जाती थी। यह केवल एक घरेलू काम नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा था।
गंज्याली लकड़ी से बना एक मजबूत और भारी उपकरण है, जिसका उपयोग ओखली में धान, मंडुवा, झंगोरा, गेहूं, गहत और अन्य अनाज कूटने के लिए किया जाता था। पहाड़ के लगभग हर घर के आंगन में पत्थर या मजबूत लकड़ी की ओखली बनी होती थी और उसके साथ गंज्याली हमेशा खड़ी रहती थी। यह रसोई का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा थी, जितना चूल्हा, सिलबट्टा या तांबे का भड्डू। पहाड़ में खेती आसान नहीं थी। सीढ़ीदार खेतों में महीनों की मेहनत के बाद जब धान या मंडुवा की फसल घर आती थी, तब उसका अंतिम रूप गंज्याली ही देती थी। धान को ओखली में डालकर गंज्याली से कूटा जाता, जिससे उसका छिलका अलग होता और शु( चावल तैयार होता। मंडुवा और झंगोरा भी इसी प्रक्रिया से साफ किए जाते थे। यह पूरी प्रक्रिया धैर्य, ताकत और अनुभव मांगती थी।
गंज्याली का सबसे गहरा रिश्ता पहाड़ की महिलाओं से था। सुबह घर के काम शुरू होने से पहले वह ओखली के पास पहुंच जाती थीं। कई बार दो महिलाएं आमने-सामने खड़ी होकर बारी-बारी से गंज्याली चलाती थीं। दोनों की थाप में इतना तालमेल होता था कि एक पल की चूक भी नहीं होती। इस दौरान वह गढ़वाली और कुमाऊंनी लोकगीत गातीं, सुख-दुख साझा करतीं और गांव-समाज की बातें भी करतीं। इस तरह ओखली केवल अनाज कूटने की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का केंद्र भी बन जाती थी।
बुजुर्ग बताते हैं कि गंज्याली से कूटा गया चावल मशीन से निकले चावल की तुलना में अधिक स्वादिष्ट होता था। उसमें अनाज का प्राकृतिक स्वाद और पौष्टिकता बनी रहती थी। यही कारण था कि पहाड़ के लोगों का भोजन सादा होने के बावजूद बेहद पौष्टिक माना जाता था। आज भी कई बुजुर्ग मानते हैं कि मशीनों ने सुविधा तो दी, लेकिन स्वाद और परंपरा दोनों कहीं पीछे छूट गए। पहाड़ में किसी घर की समृ(ि का अंदाजा उसके आंगन से लगाया जाता था, जिस घर में मजबूत ओखली और अच्छी गंज्याली होती, उसे आत्मनिर्भर परिवार माना जाता था। उस समय बाजार पर निर्भरता बहुत कम थी। घर का अनाज घर में ही तैयार होता था और परिवार अपनी जरूरतें स्वयं पूरी करता था।
समय के साथ बिजली से चलने वाली राइस मिलें, आटा चक्कियां और आधुनिक मशीनें गांव-गांव तक पहुंच गईं। अब कुछ ही मिनटों में वही काम हो जाता है, जिसके लिए पहले घंटों मेहनत करनी पड़ती थी। सुविधा बढ़ी, लेकिन गंज्याली की आवाज गांवों से धीरे-धीरे गायब हो गई। आज अधिकांश घरों में ओखली और गंज्याली या तो किसी कोने में रखी हैं या फिर पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं।
लोक संस्कृति के जानकार मानते हैं कि गंज्याली केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर है। इसे लोक संग्रहालयों, विद्यालयों, सांस्कृतिक मेलों और ग्रामीण पर्यटन से जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है। यदि गांवों में पारंपरिक अनाजों और जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा, तो गंज्याली जैसी विरासत भी फिर से सम्मान पा सकती है। आज जब पहाड़ के गांवों से पलायन बढ़ रहा है और पारंपरिक जीवनशैली तेजी से बदल रही है, तब गंज्याली की खामोशी बहुत कुछ कहती है। कभी जिसकी थाप से सुबह जागती थी, आज वह किसी पुराने घर के आंगन में चुपचाप खड़ी है। ऐसा लगता है मानो वह आने वाली पीढ़ियों से पूछ रही होकृक्या मेरी ठक-ठक अब हमेशा के लिए थम जाएगी? गंज्याली की आवाज भले ही धीमी पड़ गई हो, लेकिन उसकी हर चोट में आज भी पहाड़ की मिट्टी की खुशबू, मेहनतकश हाथों का पसीना, लोकगीतों की मिठास और आत्मनिर्भर उत्तराखंड की पूरी कहानी जीवित है। यही गंज्याली की सबसे बड़ी पहचान है और यही उसकी सबसे अमूल्य विरासत।
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