बुधवार, 17 जून 2026

ओखल: पहाड़ के गांवों का धड़कता दिल अब ‘खामोश’

कभी हर आंगन की शान होती थी पत्थर की ओखल मसालों की खुशबू के साथ जुड़ी हैं पीढ़ियों की यादें आधुनिक मशीनों ने छीनी परंपरागत रसोई की पहचान ओखल में कूटा मसाला आज भी देता है असली स्वाद देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल लोकगीतों, मेलों और मंदिरों में ही नहीं बसती, बल्कि वह उन छोटी-छोटी चीजों में भी सांस लेती है जो सदियों से लोगों के जीवन का हिस्सा रही हैं। ऐसी ही एक विरासत है पत्थरों की बनी ओखल जो कभी पहाड़ के हर गांव, हर आंगन और हर रसोई की पहचान हुआ करती थी। आज भले ही उसकी जगह मिक्सर और ग्राइंडर ने ले ली हो, लेकिन ओखल की खट-खट की आवाज आज भी पहाड़ के बुजुर्गों के कानों में गूंजती है। एक समय था जब सुबह की पहली किरण के साथ गांव के घरों से ओखल में मसाले कूटने की आवाज सुनाई देती थी। यह केवल रसोई का काम नहीं होता था, बल्कि पूरे परिवार के जीवन की लय का हिस्सा होता था। पत्थर की ओखल में लहसुन, अदरक, भांग, जीरा, जख्या और लाल मिर्च कूटते हुए महिलाएं लोकगीत गाती थीं। उस खट-खट की आवाज में पहाड़ की जिंदगी की सरलता और आत्मीयता बसती थी। पहाड़ के लोग कहते हैं कि ओखल में कूटा मसाला केवल मसाला नहीं होता था, उसमें मेहनत, धैर्य और अपनापन भी घुला होता था। पत्थर पर कूटने से मसालों का स्वाद और सुगंध वैसी निकलती थी, जैसी मशीनों में पिसने से नहीं आती। भांग की चटनी हो, सिलबट्टे पर पिसा नमक हो या ओखल में कूटी गई हरी मिर्च, इन सबका स्वाद आज भी लोगों की यादों में ताजा है। पहाड़ के गांवों में ओखल केवल रसोई का उपकरण नहीं थी। यह घर की समृ(ि और परंपरा का प्रतीक भी मानी जाती थी। कई घरों में बड़ी-बड़ी पत्थर की ओखलें वर्षों तक एक ही स्थान पर रहती थीं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उनका उपयोग होता रहता था। बुजुर्ग बताते हैं कि शादी-ब्याह, त्योहार और विशेष अवसरों पर बड़ी मात्रा में मसाले और अनाज कूटने के लिए ओखल का उपयोग किया जाता था। गांव की महिलाएं एक-दूसरे के घर जाकर सामूहिक रूप से काम करती थीं। काम के साथ हंसी-मजाक और लोकगीतों का ऐसा संगम होता था जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं खो गया है। समय बदला, तकनीक आई और पहाड़ की रसोई भी बदल गई। बिजली से चलने वाले मिक्सर और ग्राइंडर ने काम को आसान बना दिया। कुछ ही मिनटों में मसाले तैयार होने लगे। सुविधा बढ़ी, लेकिन कहीं न कहीं स्वाद और आत्मीयता का एक हिस्सा पीछे छूट गया। आज कई गांवों में पत्थर की ओखल आंगन के किसी कोने में उपेक्षित पड़ी दिखाई देती है। कुछ घरों में वह अब फूलों के गमले का आधार बन गई है तो कहीं केवल पुरानी यादों की निशानी भर रह गई है। ओखल केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि पहाड़ की लोक संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। इसमें पहाड़ की महिलाओं का श्रम, पारिवारिक जीवन की आत्मीयता और पारंपरिक खान-पान की पूरी कहानी छिपी है। जब भी कोई बुजुर्ग ओखल को देखता है तो उसे अपने बचपन का गांव, मां के हाथों का स्वाद और परिवार के साथ बिताए वह दिन याद आ जाते हैं जब जीवन में सुविधाएं कम थीं, लेकिन अपनापन बहुत अधिक था। आज जब दुनिया अपनी जड़ों की ओर लौटने की बात कर रही है, तब पत्थर की ओखल जैसी पारंपरिक धरोहरों को भी सहेजने की जरूरत है। यह केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि पहाड़ की स्मृतियों, स्वाद और संस्कृति का हिस्सा है। शायद आने वाली पीढ़ियां कभी यह न जान सकें कि सुबह-सुबह ओखल की खट-खट की आवाज कैसी लगती थी। लेकिन पहाड़ के बुजुर्गों के लिए वह आवाज आज भी किसी लोकगीत की तरह दिल में गूंजती है। पत्थरों की वह ओखल आज भी गांव के किसी पुराने आंगन में चुपचाप खड़ी है। वह बोलती नहीं, लेकिन उसकी खामोशी कहती है कि उसने पीढ़ियों को पाला है, रिश्तों को जोड़ा है और पहाड़ की रसोई को स्वाद दिया है। समय बदल गया, लोग बदल गए, लेकिन ओखल में बसी यादें आज भी पहाड़ के दिल में जिंदा हैं।

कोई टिप्पणी नहीं: