शुक्रवार, 12 जून 2026

‘गहत की दाल’ आज बनी वैश्विक ‘सुपरफूड’

पहाड़ी रसोई की शान, जो विज्ञान की कसौटी पर भी है महान रसोई का सहारा गहत आज सुपरफूड के रूप में बनी पहचान गहत में है पहाड़ की परंपरा और पोषण का है अनमोल संगम देहरादून। गढ़वाल में गहत, कुमाऊं में कुल्थ केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि पहाड़ों की इस औषधीय दाल के आगे आज आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक है। जो स्थान पहाड़ों में अपनों के सत्कार का है, वही स्थान पहाड़ी थाली में गहत का है। सदियों से जो दाल उत्तराखंड के सुदूर गांवों की रसोई में लोहे की कड़ाई पर सुलगती आंच पर पकती रही, आज उसने आधुनिक पोषण विज्ञान की दुनिया में तहलका मचा रखा है। पहाड़ों में यदि किसी दाल को सबसे अधिक सम्मान मिला है तो वह है गहत की दाल। गढ़वाल में इसे गहत और कुमाऊं में कुल्थ कहा जाता है। सदियों से पहाड़ी रसोई का हिस्सा रही यह दाल आज आधुनिक पोषण विज्ञान की कसौटी पर भी खरी उतर रही है। कभी ग्रामीण परिवारों के भोजन का सामान्य हिस्सा मानी जाने वाली गहत अब सुपरफूड के रूप में पहचान बना रही है। पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में उगने वाली गहत केवल एक फसल नहीं बल्कि स्थानीय जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है। कम पानी, कम संसाधनों और कठिन जलवायु में भी यह फसल आसानी से तैयार हो जाती है। यही कारण है कि इसे पहाड़ के किसानों की भरोसेमंद फसल माना जाता रहा है। गहत की दाल का स्वाद अन्य दालों से अलग होता है। पहाड़ी घरों में इसे सिलबट्टे पर मसाले पीसकर धीमी आंच में पकाया जाता है। सर्दियों के दिनों में गर्मागर्म गहत की दाल और मंडुवे या गेहूं की रोटी का स्वाद आज भी लोगों को बचपन की यादों में ले जाता है। गहत से केवल दाल ही नहीं बल्कि परांठे, डुबके, फाणु और रस जैसे कई पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते हैं। गांवों में किसी विशेष अवसर या मेहमान के आने पर भी गहत के व्यंजन परोसे जाते रहे हैं। गहत की दाल शरीर को गर्म रखती है और ठंड के मौसम में विशेष लाभ पहुंचाती है। बुजुर्गों का मानना है कि यह पथरी की समस्या में भी लाभकारी होती है। यही कारण है कि पहाड़ों में इसे घरेलू उपचार का हिस्सा भी माना जाता रहा है। आयुर्वेद और आधुनिक पोषण विशेषज्ञ भी गहत को प्रोटीन, फाइबर, आयरन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर मानते हैं। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच अब शहरों में भी इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। एक समय था जब गहत की दाल केवल पहाड़ी घरों तक सीमित थी, लेकिन अब देश के बड़े शहरों और आनलाइन बाजारों में भी इसकी मांग बढ़ रही है। जैविक उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता ने गहत को नई पहचान दी है। उत्तराखंड के किसान भी इसे नकदी फसल के रूप में देखने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गहत के उत्पादन और विपणन को बढ़ावा दिया जाए तो यह किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ उत्तराखंड की पारंपरिक कृकृषि को भी नई मजबूती दे सकती है। आज जब फास्ट फूड और आधुनिक खानपान की संस्कृति तेजी से बढ़ रही है, तब गहत जैसी पारंपरिक फसलें हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही हैं। पहाड़ की मिट्टी में उपजी यह दाल न केवल स्वाद का खजाना है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वास्थ्य और परंपरा की अमूल्य विरासत भी है।

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