बुधवार, 17 जून 2026

सरकारी ‘नाकामी’ ने छीनी एक ‘उम्मीद’

नीट विवाद की भेंट चढ़ी देहरादून की एक होनहार जिंदगी नीट विवाद में घिरा सिस्टम, सवालों के घेरे में सरकार देहरादून की छात्रा की मौत ने खड़े किए कई सवाल सुसाइड नोट में अच्छी तैयारी और रैंक की उम्मीद सरकार की नाकामी और कीमत चुका रहे ‘बच्चे’ देहरादून। देहरादून में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की मौत ने केंद्र सरकार और परीक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बताया जा रहा है कि छात्रा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि उसने नीट परीक्षा की अच्छी तैयारी की थी और उसे अच्छी रैंक आने की पूरी उम्मीद थी। लेकिन जिस परीक्षा व्यवस्था पर उसने भरोसा किया, वही व्यवस्था विवादों और अनिश्चितताओं में उलझ गई। यह घटना केवल एक छात्रा की मौत नहीं है, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था पर सवाल है जो करोड़ों युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी संभालने का दावा करती है। जब छात्र सालों तक दिन-रात मेहनत करते हैं, परिवार अपनी जमा पूंजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करता है और फिर परीक्षा की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं, तो सबसे बड़ा धोखा उन युवाओं के साथ होता है जिन्होंने ईमानदारी से मेहनत की होती है। देश में पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं से लेकर प्रवेश परीक्षाओं तक पेपर लीक की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। हर बार सरकार जांच, कार्रवाई और सुधार के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदलती। नीट जैसे देश के सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षा में भी विवाद सामने आना इस बात का प्रमाण है कि सरकार परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने में पूरी तरह सफल नहीं रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि परीक्षा प्रणाली में सेंध लगती है तो उसकी सजा छात्रों को क्यों भुगतनी पड़ती है? आखिर उन अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही कब तय होगी जिनकी जिम्मेदारी परीक्षा को निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराना है? देहरादून की छात्रा के सुसाइड नोट की पंक्तियांकृमैंने अच्छी तैयारी की थी, मुझे अच्छी रैंक आने की उम्मीद थीकृसरकारी दावों की पोल खोलती नजर आती हैं। यह केवल एक छात्रा की पीड़ा नहीं, बल्कि लाखों युवाओं की आवाज है जो आज यह महसूस कर रहे हैं कि उनकी मेहनत व्यवस्था की खामियों के सामने बेबस है। सरकार लगातार युवाओं को देश का भविष्य बताती है, लेकिन जब वही युवा परीक्षा विवादों, बेरोजगारी और अनिश्चितता से जूझ रहे हों तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर युवाओं की चिंता प्राथमिकता में क्यों नहीं है? बता दें कि नीट देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में से एक है, जिसमें हर साल लाखों विद्यार्थी डाक्टर बनने का सपना लेकर शामिल होते हैं। वर्ष 2026 में भी 22 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी थी, लेकिन पेपर लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और दोबारा परीक्षा कराने का फैसला लिया गया। इस निर्णय ने छात्रों को मानसिक रूप से झकझोर दिया। महीनों की मेहनत, आर्थिक खर्च और भावनात्मक दबाव के बाद छात्रों को फिर उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है। एक मेडिकल छात्र बनने का सपना केवल छात्र का नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें उससे जुड़ी होती हैं। कई परिवार अपनी आर्थिक सीमाओं को पार कर बच्चों को कोचिंग और पढ़ाई के बेहतर अवसर उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं या परीक्षा रद्द होती है, तो सबसे बड़ा आघात उन छात्रों को पहुंचता है जिन्होंने ईमानदारी से तैयारी की होती है। देहरादून की छात्रा के सुसाइड नोट में लिखे शब्दकृमैंने अच्छी तैयारी की थी, मुझे अच्छी रैंक की उम्मीद थी आज पूरे देश के छात्रों की पीड़ा को सामने ला रहे हैं। यह सवाल उठ रहा है कि आखिर छात्रों की मेहनत का मूल्य कौन चुकाएगा? किसी भी लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों का भरोसा बनाए रखना होती है। लेकिन जब करोड़ों छात्रों के भविष्य से जुड़ी परीक्षाओं पर बार-बार सवाल उठें, जब मेहनती छात्र निराशा में डूबने लगें और जब एक छात्रा अपने नोट में अपनी मेहनत और उम्मीदों का जिक्र करके दुनिया से विदा हो जाए, तब यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह जाती, बल्कि शासन और व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन जाती है। आज देश जानना चाहता है कि परीक्षा प्रणाली की खामियों की जिम्मेदारी कौन लेगा? कितने और युवाओं के सपने टूटेंगे? और आखिर कब सरकार ऐसी व्यवस्था दे पाएगी जिस पर छात्रों को पूरा भरोसा हो सके? बाक्स जवाबदेही पर उठ रहे सवाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पेपर लीक हुआ तो जिम्मेदार कौन है? यदि परीक्षा की गोपनीयता नहीं बचाई जा सकती तो इसकी कीमत छात्रों को क्यों चुकानी पड़ रही है? अभिभावकों का कहना है कि हर बार जांच, कमेटी और कार्रवाई की बात होती है, लेकिन व्यवस्था में स्थायी सुधार दिखाई नहीं देता। पेपर लीक की घटनाएं अब अपवाद नहीं बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही हैं। सरकार और एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती केंद्र सरकार और परीक्षा एजेंसियों ने परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाने तथा दोबारा परीक्षा के लिए अतिरिक्त इंतजाम करने की घोषणा की है। परीक्षा अवधि बढ़ाने, प्रश्न पुस्तिका में बदलाव और सुरक्षा उपायों को मजबूत करने जैसे कदम उठाए गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन उपायों से छात्रों का टूटा हुआ भरोसा वापस आ पाएगा?

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