शुक्रवार, 26 जून 2026

हिसूल: महंगी चाकलेट पर भारी पहाड़ का ‘खजाना’

गर्मियों की छुट्टियों में फिर याद आया हिसूल वाला बचपन पहाड़ की मिट्टी में उगा वह स्वाद, जो अब यादों में सिमटा गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों की जेब का खजाना था हिसूल आज जंगलों में सिमटती जा रही है यह प्राकृतिक सौगात देहरादून। एक समय था जब गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही गांव के बच्चे सुबह-सुबह टोकरियां और छोटे डिब्बे लेकर जंगलों की ओर निकल पड़ते थे। न किसी माल की जरूरत होती थी, न किसी महंगे चाकलेट की। जंगलों में लगे हिसूल के पौधे ही बच्चों के लिए सबसे बड़ा खजाना हुआ करते थे। लाल, बैंगनी और काले रंग के छोटे-छोटे फलों से लदे पौधे बच्चों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर देते थे। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल बर्फ से ढके शिखर, नदियां और देवस्थल ही नहीं हैं, बल्कि यहां के जंगलों में उगने वाले जंगली फल और वनस्पतियां भी हैं, जिन्होंने पीढ़ियों के बचपन और जीवन को मिठास से भर दिया। इन्हीं में से एक है हिसूल जो गर्मियों के मौसम में जंगलों और पहाड़ी ढलानों पर उगने वाला एक पौष्टिक और स्वादिष्ट जंगली फल है। हिसूल केवल स्वाद का खजाना नहीं है, बल्कि यह पोषण से भी भरपूर है। स्थानीय लोग मानते हैं कि इसमें विटामिन, एंटीआक्सीडेंट और शरीर को ऊर्जा देने वाले तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि जंगल में काम करने वाले लोग थकान मिटाने और शरीर को तरोताजा रखने के लिए हिसूल खाते थे। गर्मियों की चिलचिलाती धूप में जब पहाड़ के प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगते हैं, तब हिसूल जैसे जंगली फल प्रकृति की ओर से ऊर्जा का स्रोत बन जाते हैं। यही कारण है कि इसे पहाड़ के पारंपरिक खान-पान और जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता रहा है। समय बदला, गांव खाली होने लगे और जंगलों तक जाने वाले रास्ते भी सुनसान पड़ गए। नई पीढ़ी मोबाइल और बाजार की पैकिंग वाली चीजों में उलझ गई। आज कई बच्चे हिसूल का नाम तक नहीं जानते। आज जंगलों में बढ़ती आग, जलवायु परिवर्तन और पारंपरिक वनस्पतियों के संरक्षण के प्रति घटती रुचि के कारण हिसूल जैसे कई जंगली फल धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रहे हैं। गांव के बुजुर्ग आज भी उस दौर को याद करते हैं, जब बच्चों के कपड़े हिसूल के रस से रंग जाते थे और घर लौटने पर मां की डांट भी पड़ती थी। लेकिन उस डांट में भी अपनापन था, क्योंकि वह प्रकृति से जुड़ा बचपन था। हिसूल केवल एक जंगली फल नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, स्मृतियों और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि असली समृ(ि जंगलों की उस जैव विविधता में छिपी है, जिसे हम धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। जिस पहाड़ में कभी बच्चे हिसूल तोड़ते हुए बड़े होते थे, वहां अब जंगलों की जगह कंक्रीट और बचपन की जगह मोबाइल ने ले ली है। अगर हिसूल और ऐसी वन संपदाओं को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि पहाड़ के जंगलों में कभी मिठास भी उगती थी।

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