बुधवार, 17 जून 2026
नीट की ‘दौड़’ में टूट रहे ‘सपने’
देहरादून में मेधावी छात्रा की आत्महत्या ने खड़े किए कई सवाल
छात्रा ने सुसाइड नोट में नीट में अच्छी रैंक आने का किया जिक्र
सफलता के बाद भी तनाव में जी रहे हजारों मेधावी छात्र-छात्राएं
परीक्षाओं के दबाव और मानसिक स्वास्थ्य पर फिर छिड़ी बहस
विशेषज्ञ बोले, रैंक व अंकों से ज्यादा जरूरी है मानसिक संतुलन
देहरादून। डाक्टर बनने का सपना लेकर लाखों छात्र हर वर्ष राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा ‘नीट’ में बैठते हैं। इस परीक्षा को देश की सबसे कठिन और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में गिना जाता है। एक-एक अंक और एक-एक रैंक भविष्य का रास्ता तय करती है। लेकिन इस प्रतियोगिता की चमक के पीछे एक ऐसी दुनिया भी है जहां तनाव, चिंता, अवसाद और असुरक्षा का अंधेरा लगातार गहराता जा रहा है।
देहरादून के पटेलनगर क्षेत्र में एक मेधावी छात्रा द्वारा आत्महत्या की घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। पुलिस को मिले सुसाइड नोट में छात्रा ने नीट में अच्छी रैंक प्राप्त होने का उल्लेख किया है। यह तथ्य अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आमतौर पर माना जाता है कि अच्छी रैंक और सफलता मिलने के बाद छात्रों की परेशानियां समाप्त हो जाती हैं, लेकिन यह घटना बताती है कि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
यह मामला केवल एक छात्रा की दुखद मौत का नहीं, बल्कि उस मानसिक दबाव का प्रतीक बन गया है, जिससे देशभर के लाखों छात्र गुजर रहे हैं। मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की होड़ ने बच्चों की जिंदगी को किताबों, टेस्ट सीरीज और रैंकिंग तक सीमित कर दिया है। बचपन और युवावस्था का बड़ा हिस्सा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में गुजर जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार छात्र परीक्षा पास करने के बाद भी मानसिक दबाव से मुक्त नहीं हो पाते। अच्छी रैंक आने के बावजूद पसंदीदा कालेज मिलने की चिंता, भविष्य को लेकर अनिश्चितता, परिवार और समाज की अपेक्षाएं तथा लगातार बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव उन्हें भीतर ही भीतर परेशान करता रहता है।
मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि कई छात्र अपनी भावनाओं को परिवार और मित्रों के साथ साझा नहीं कर पाते। बाहर से वह सामान्य और सफल दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर गहरी चिंता और अकेलेपन से जूझ रहे होते हैं। ऐसे मामलों में समय रहते संवाद और सहयोग नहीं मिलने पर स्थिति गंभीर हो सकती है। पिछले एक दशक में देशभर में कोचिंग संस्कृति तेजी से बढ़ी है। लाखों छात्र घर-परिवार से दूर रहकर वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। सुबह से रात तक पढ़ाई, टेस्ट, रैंकिंग और प्रतिस्पर्धा का माहौल मानसिक दबाव को बढ़ाता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों का मूल्यांकन केवल अंकों और रैंक के आधार पर किया जाना भी समस्या का बड़ा कारण है। जब सफलता को केवल एक परीक्षा से जोड़ दिया जाता है, तो छात्र असफलता या अनिश्चितता को स्वीकार नहीं कर पाते। समाज में डाक्टर और इंजीनियर बनने को आज भी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। कई बार अभिभावक अनजाने में बच्चों पर अत्यधिक अपेक्षाओं का बोझ डाल देते हैं। बच्चे परिवार की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए अपनी भावनाओं को दबा लेते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अभिभावकों को बच्चों के अंकों और रैंक से अधिक उनकी मानसिक स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चा तनाव, चिंता या उदासी के संकेत दे रहा हो तो उसे गंभीरता से लेना आवश्यक है।
देहरादून, हल्द्वानी और अन्य शहरों में बड़ी संख्या में छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। शिक्षा के बढ़ते केंद्रों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों, कालेजों और कोचिंग संस्थानों में नियमित काउंसलिंग व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए ताकि छात्र अपनी समस्याओं को खुलकर साझा कर सकें। पटेलनगर की यह घटना केवल एक परिवार का दर्द नहीं है। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल है जिसमें बच्चों की सफलता को उनकी रैंक से मापा जाता है, लेकिन उनके मानसिक संघर्षों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
यह समय शिक्षा व्यवस्था, अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के लिए आत्ममंथन का है। यदि हम केवल परिणामों पर ध्यान देंगे और बच्चों की भावनाओं को नहीं समझेंगे, तो ऐसी दुखद घटनाएं चिंता का विषय बनी रहेंगी। आज जरूरत इस बात की है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों को यह भरोसा दिया जाए कि उनकी पहचान केवल एक परीक्षा, एक रैंक या एक परिणाम से नहीं है। उनका जीवन, उनका आत्मविश्वास और उनका मानसिक स्वास्थ्य किसी भी परीक्षा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
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